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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 01 2018 07:44:51 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

फेसबुक पर मौजूद फेक प्रोफाइल्स को डिलीट करने का अभियान चलाने की जगह सयाने लोग फेसबुक को डिलीट करने का अभियान क्यों चला रहे है ? क्योंकि, वे उन "सच्ची खबरों" से डरे हुए है जिन्हें फ़ैलाने के लिए कार्यकर्ता फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे है !!!
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फेक न्यूज फेसबुक की फेक प्रोफाइल एवं उन पेजों से सर्कुलेट की जाती है , जिनके admins की जानकारी छिपाई गयी है। इस समस्या का निस्तारण दिए गए तरीके से आसानी से किया जा सकता है --

(a) यूजर को यह सुविधा दी जानी चाहिए कि यदि वह चाहे तो अपनी प्रोफाइल को अपनी किसी आई डी जैसे लाइसेंस , वोटर आई डी , पासपोर्ट या आधार कार्ड से लिंक कर सके।
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(b) जब कोई यूजर किसी व्यक्ति की प्रोफाइल को देखेगा कि यह प्रोफाइल किसी आई डी से लिंक्ड है या नहीं, तो वह अमुक प्रोफाइल को फ़ॉलो करने या न करने का फैसला कर सकता है।
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(c) जब व्यक्ति किसी फेक प्रोफाइल को देखता है लेकिन वह यह जानता है कि यह व्यक्ति कौन है, तो वह अमुक प्रोफाइल को फ़ॉलो करने या न करने का फैसला कर सकता है।
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(d) यूजर ऐसी फेक प्रोफाइल्स को अन फ़ॉलो कर सकता है जिनके बारे में वह नहीं जानता।
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(e) इसके अलावा फेसबुक ऐसा फीचर ला सकता है , जिससे यह प्रदर्शित हो कि अमुक प्रोफाइल को कितने वेरिफाइड यूजर्स ने लाइक किया है , एवं लाइक करने वालो में कितने यूजर्स अन वेरीफाईड है। उदाहरण के लिए , "likes by verified profiles = N" एवं "likes by unverified profiles = M" से चिन्हित किया जा सकता है।

इन उपायों से अन वेरीफाईड एवं फेक प्रोफाइल्स का प्रभाव कम से कमतर होता चला जाएगा।
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लेकिन जो भी महाशय फेसबुक पर फेक न्यूज के खिलाफ पुकारा लगा रहे है , वे इन प्रस्तावित बदलावों का विरोध कर रहे है। वे सरकार द्वारा फेक न्यूज एवं फेक प्रोफाइल को कंट्रोल करवाना चाहते है !! या वे फेसबुक को डिलीट करने का अभियान चलाते है !!!
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क्यों ?
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क्योंकि उन्हें फेक न्यूज से भय नहीं है , बल्कि वे उन सच्ची खबरों से भयभीत है जिन्हें फेसबुक के माध्यम से फैलाया जा रहा है।
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उदाहरण के लिए -- यह एक तथ्य है कि पिछले 70 वर्षो से जवाहर लाल गाज़ी से लेकर देवी इंदिरा गाँधी एवं मोदी साहेब तक के नेतृत्व में सभी केन्द्रीय सरकारें टाटा को झारखंड में 1 रूपये प्रति एकड़ प्रति वर्ष के हिसाब से कोयला खोदने दे रही है !!! टाटा पिछले 70 वर्षो से उन सभी संपादको को पैसा खिलाकर या दबाकर यह सुनिश्चित किया कि यह जानकारी भारत की जनता तक न पहुंचे। लेकिन अब फेसबुक के कारण इस जानकारी को छिपाना मुश्किल होता जा रहा है !!!
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इसी तरह से यह भी एक तथ्य है कि , नेता छोटे कारोबारियों का लगातार पीछे लगे हुए है ताकि उन्हें वैट , जीएसटी , एक्साइज आदि कानूनों द्वारा रगेदा जा सके, लेकिन यही नेता गोदरेज द्वारा अकेले मुंबई में ही कब्जाई गई 500,000 करोड़ मूल्य की जमीन पर 1 रूपये का भी टेक्स डालने को राजी नहीं है !!! अब तक नेता एवं गोदरेज यह सुनिश्चित करने में कामयाब रहे है कि यह जानकारी भारतीयों तक नहीं पहुचे। लेकिन सोशल मीडिया के आने से अब ये सच्ची ख़बरें नागरिको तक पहुँच रही है।
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इसके अलावा मोरिशस रूट से अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों द्वारा निवेश किये गए धन से भारत में खरीदी गयी जमीनों एवं मिशनरीज द्वारा अधिगृहित की गयी अकूत भूमि बैंको के बारे में भी जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से लगातार निकलकर सामने आ रही है !!
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हालांकि , ये सभी सूचनाएं बहुत धीमी गति से फ़ैल रही है , लेकिन सोशल मीडिया के कारण कम से कम ये सूचनाएं अब फ़ैल तो रही है।
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और फेसबुक का क्या , मोदी साहेब खुद फेक प्रोफाइल के धंधे में है। मोदी साहेब के प्रधानमन्त्री कार्यालय ने mygov / newindia नाम से अधिकृत वेबसाईट बनाई है। इस वेबसाईट पर कोई भी मतदाता अपना कोई भी प्रस्ताव या सुझाव अपलोड कर सकता है , तथा कोई भी मतदाता इस सुझाव पर अपना वोट दर्ज कर सकता है। लेकिन मोदी साहेब ने जान बुझकर इस वेबसाईट पर यह व्यवस्था बनायीं है कि कोई भी व्यक्ति अपनी फर्जी आई डी बनाकर वोट कर सके !!! उन्होंने यूजर की प्रोफाइल को उसकी आई डी से लिंक करने की व्यवस्था को जानबूझकर इसमें से हटा दिया है !! क्यों वे पीएम की अधिकृत वेबसाईट पर फर्जी प्रोफाइल एवं फर्जी वोटिंग को बढ़ावा दे रहे है ? आप खुद समझ सकते है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 01 2018 11:34:03 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

खाद्य पदार्थो में मिलावट रोकने के लिए प्रस्तावित क़ानून -- "राईट टू रिकॉल मिलावट रोकथाम अधिकारी" एवं मिलावट की शिकायतों का निपटान नागरिको की ज्यूरी द्वारा।
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यदि आपने राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का ड्राफ्ट पढ़ा है तो यह ड्राफ्ट उसी के समान है। किन्तु यदि आपने राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी के लिए प्रस्तावित ड्राफ्ट नहीं पढ़ा है एवं आप खाद्य पदार्थो में मिलावट की रोकथाम चाहते है तो यह ड्राफ्ट आपके लिए उपयोगी होगा।
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प्रूफ रीडिंग के बाद हम यह ड्राफ्ट newindia .in पर अपलोड करेंगे। नागरिको से अपील है कि वे @pmoindia पर पीएम को एवं अपने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ट्विट करके इस क़ानून को लागू करने की मांग करे।
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इस कानून में जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी = DAAO ( District Anti Adulteration Officer ) पर राइट टू रिकॉल एवं मिलावट से सम्बन्धित विवादों के निपटान हेतु ज्यूरी द्वारा सुनवाई का प्रावधान किया गया है।
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कृपया इस बात पर भी विशेष रूप से ध्यान दें कि, सोनिया-मोदी-केजरीवाल खुद के राजनितिक / आर्थिक फायदों के लिए हमेशा से ही मिलावट रोकने के लिए प्रभावी कानून का विरोध करते रहे है। और कोंग्रेस-बीजेपी एवं आम आदमी पार्टी के सभी कार्यकर्ता भी इस क़ानून के विरोध में है।
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यदि आप देश के खाद्य पदार्थो में मिलावट रोकना चाहते है तो कृपया सोनिया-मोदी-केजरीवाल का समर्थन करके अपना समय एवं उर्जा नष्ट न करे। इन नेताओं एवं पार्टियों का समर्थन करने की जगह इस क़ानून को लागू करवाने का प्रयास करें।
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खाद्य पदार्थो में मिलावट रोकने के लिए प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट
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[ टिप्पणी : मिलावट रोकने का यह कानूनी ड्राफ्ट मुख्यमंत्री द्वारा सीधा राज्य के राजपत्र ( गैजेट ) में छापा जा सकता है, मुख्यमंत्री को विधानसभा या लोकसभा से इस प्रस्ताव को पारित करवाने की आवश्यकता नहीं है। ]
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इस ड्राफ्ट के तीन भाग है -
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भाग - I : नागरिकों के लिए सामान्य निर्देश
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भाग- II : ड्राफ्ट में दी गयी प्रक्रिया का सारांश
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भाग- III : अधिकारियों के लिए निर्देश एवं इस सम्बन्ध में टिप्पणियाँ
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इस ड्राफ्ट के महत्वपूर्ण खंड है - (1.1) , (2) , (7.1) , (7.2) , (7.5) , (8.1) , (15.1) , (15.2) , (J.4.1)

इस कानून-ड्राफ्ट के लेखको की राय में अन्य खंड अति-महत्वपूर्ण नही है और केवल सामान्य समझ के लिए है। ]
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राईट टू रिकॉल जल मिलावट रोकथाम अधिकारी को रिकॉल करने की जो प्रक्रिया यहाँ दी गयी है , उसे विस्तृत रूप से समझने के लिए - <https://newindia>; .in/causes/rtr-deo/ पर रखें गए राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी का ड्राफ्ट देखें I

इस ड्राफ्ट में दी गयी ज्यूरी ट्रायल की प्रक्रियाओ को विस्तृत रूप से समझने के लिए कृपया - <https://newindia>; .in/causes/jury-sys/ पर रखे गए ड्राफ्ट को देखें I
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भाग - I : नागरिकों के लिए सामान्य निर्देश
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(1) पदासीन जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी को या नये ज़िला मिलावट रोकथाम अधिकारी की उम्मीदवारी को अनुमोदित करना :
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(1.1) यदि कोई मतदाता अपने जिले के मिलावट रोकथाम अधिकारी को बदलना चाहता है, तो वह पटवारी कार्यालय में किसी भी दिन उपस्थित होकर किसी उम्मीदवार को अपना अनुमोदन दे सकता है। अनुमोदन दर्ज करवाने की इस प्रक्रिया के लिए समय , दिनांक , अवधि आदि का कोई निर्बन्धन लागू नहीं होगा। इन अनुमोदनों के आधार पर जिले के मिलावट रोकथाम अधिकारी को बदला जा सकेगा।
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(1.2) मिलावट रोकथाम अधिकारी खाद्य पदार्थो में मिलावट की जाँच आदि के लिए लैब आदि की स्थापना करेगा, मिलावटीयों को पकड़ने के लिए मुखबिरों का जाल बिछाएगा एवं मिलावटीयों के संस्थानों पर छापे मारने की कार्यवाही सम्पन्न करेगा। उसे ये कार्यवाही इस तरह से करेगा कि उन कारोबारियों को न्यूनतम असुविधा का सामना करना पड़े जो मिलावटी वस्तुओ के कारोबार में शामिल नहीं है। यदि मिलावट रोकथाम अधिकारी यह काम सावधानी से नहीं करेगा तो आप यानी जिले के मतदाता ऐसे अधिकारी को नौकरी से निकाल कर दुसरे व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त कर सकेंगे।
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(2) आप को ( आशय मतदाता से है ) किसी मिलावट की शिकायत या किसी विवाद के निपटान हेतु ज्यूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि किसी कारोबारी द्वारा मिलावट करना पाया जाता है या मिलावट अधिकारी के कर्मचारियों द्वारा कर्तव्य में लापरवाही या अकर्मण्यता दिखायी जाती है तो इन शिकायतों का निपटान करने के लिए ज्यूरी बुलाई जायेगी, एवं यदि ज्यूरी में आपको बुलाया गया है तो आपको नगर परिषद् में उपस्थित होकर विवाद की सुनवाई करनी होगी एवं आरोपियों पर फैसला देना होगा। यदि आप ज्यूरी में उपस्थित होने से इनकार करते है तो ग्रेंड ज्यूरी आप पर दंड लगा सकती है।
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भाग - II : ड्राफ्ट में दी गई प्रक्रिया का सार
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(3) टिप्पणी: सम्पूर्ण ड्राफ्ट का सार
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(3.1) मतदाताओ के पास मिलावट रोकथाम अधिकारी को बदलने या नौकरी से निकालने की प्रक्रिया होगी एवं उसके स्टाफ के खिलाफ की गयी शिकायतों एवं मिलावट आदि के मामलो का निपटान नागरिको की ज्यूरी द्वारा किया जायेगा।
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(3.2) राईट टू रिकॉल मिलवाट रोकथाम अधिकारी की प्रक्रिया को और भी अच्छे से समझने के लिए कृपया राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी का ड्राफ्ट देखें। यह ड्राफ्ट ‘newindia dot in / causes/RtrDeo3 ’ पर देखा जा सकता है।
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(3.3) किसी राज्य के मतदाता अमुक राज्य में दर्ज कुल मतदाताओं के स्पष्ट बहुमत का प्रदर्शन करके अमुक राज्य में स्थित किसी जिले में लागू राईट टू रिकॉल जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी एवं ज्यूरी प्रक्रियाओ को 4 साल तक के लिये निरस्त कर सकते है। और भारत देश के मतदाता देश में दर्ज कुल मतदाताओं के स्पष्ट बहुमत का प्रदर्शन करके किसी राज्य या जिले में लागू इन प्रक्रियाओ को 4 साल तक के लिये निरस्त कर सकते है।
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भाग III : अधिकारीयों के लिए निर्देश और टिप्पणीयां
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(4) टिप्पणी क्या है : ये टिप्पणीयां इस कानूनी ड्राफ्ट का वास्तविक हिस्सा नहीं है। कार्यकर्ता और नागरिक ड्राफ्ट को समझने हेतु इसका उपयोग कर सकते है। जूरी सदस्य इन टिप्पणीयों का उपयोग किसी मामले के फैसले के लिए सन्दर्भ के रूप में ले सकते है। किन्तु ये टिप्पणीयां किसी पर भी बाध्यकारी नहीं है।
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(5) शब्द "कर सकते है" का आशय है - किसी भी प्रकार का नैतिक-कानूनी बंधन नहीं। इसका स्पष्ट अर्थ है "कर सकते है" या "ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है"।
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(6) मिलावट रोकथाम अधिकारी के लिए उम्मीदवारी
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(6.1) मुख्यमंत्री प्रत्येक जिले के लिए मिलावट रोकथाम अधिकारी की नियुक्ति करेंगे। यदि जिला बड़ा है तो मुख्यमंत्री जिले को दो या अधिक संभागो में बाँट सकते है और प्रत्येक संभाग के लिए अलग से मिलावट रोकथाम अधिकारी की नियुक्ति कर सकते है।
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(6.2) यदि किसी व्यक्ति के पास स्नातक डिग्री है तथा वह लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए आवश्यक पात्रता पूरी करता है, तो वह मिलावट रोकथाम अधिकारी बनने के लिए आवेदन कर सकता है। यदि इन पात्रताओ को धारण करने वाला कोई व्यक्ति जिला कलेक्टर के समक्ष आता है और कार्यरत मिलावट रोकथाम अधिकारी को प्रतिस्थापित करने के लिए स्वयं को पंजीकृत करने हेतु आवेदन करता है तो जिला कलेक्टर सांसद के चुनाव में ली जाने वाली राशि के बराबर शुल्क लेकर उसका आवेदन स्वीकार करेगा। आवेदन स्वीकृत होने पर जिला कलेक्टर एक सीरियल नंबर जारी करेगा और उम्मीदवार का नाम और अन्य सम्बंधित सूचना मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखेगा। यदि उम्मीदवार चाहे तो लिखित में आवेदन करके अपनी उम्मीदवारी वापिस ले सकते है।
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(6.3) जिला कलेक्टर कार्यरत मिलावट रोकथाम अधिकारी को बिना कोई शुल्क लिए उम्मीदवार के रूप में पंजीकृत करेगा। उम्मीदवारों की सूची में कार्यरत मिलावट रोकथाम अधिकारी का सीरियल नंबर 1 होगा।
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(7) नागरिको द्वारा प्रतिस्थापक उम्मीदवारो या कार्यरत मिलावट रोकथाम अधिकारी को अनुमोदित करना :
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(7.1) यदि कोई मतदाता पटवारी कार्यालय आकर मुख्यमंत्री द्वारा निर्धारित शुल्क देता है, और अधिकतम पांच उम्मीदवारों को मिलावट रोकथाम अधिकारी के पद के लिए अनुमोदित करता है और/ या वह कार्यरत मिलावट रोकथाम अधिकारी को अनुमोदित करता है तो पटवारी उसकी स्वीकृति को कंप्यूटर में दर्ज करेगा और बदले में उसे रसीद देगा। इस रसीद में नागरिक की मतदाता पहचान पत्र संख्या, दिनांक / समय और उम्मीदवार जिन्हे उसने अनुमोदित किया है दर्ज होंगे।
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(7.2) यदि कोई मतदाता अपना अनुमोदन निरस्त करने आता है तो पटवारी उसके एक या उससे अधिक अनुमोदन बिना कोई शुल्क लिए निरस्त कर देगा। इस निरस्तीकरण को भी मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखा जाएगा।
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(7.3) टिप्पणी : अनुमोदनों के बारे में स्पष्टीकरण - (i) मतदाता किसी भी दिन अनुमोदन दर्ज कर सकता है और इसके लिए कोई समय सीमा नहीं है। अपनी सुविधानुसार विभिन्न मतदाता अपने अनुमोदन किसी भी दिन दर्ज कर सकते है। (ii) मान लीजिये, एक मतदाता ने उम्मीदवार A, B और C को अनुमोदित किया है। तब A, B और C की अनुमोदन संख्या 1 से बढ़ जाएगी। (iii) अब मतदाता किसी भी दिन अपना कोई भी अनुमोदन निरस्त कर सकता है। मान लीजिये कि अमुक मतदाता ने C के अनुमोदन को निरस्त किया है, तो C की अनुमोदन संख्या 1 से कम हो जाएगी और A और B के अनुमोदनों की संख्या अपरिवर्तित रहेगी। (iv) मतदाता किसी अन्य उम्मीदवार को भी किसी भी दिन अनुमोदित कर सकता है। मान लीजिये कि अमुक मतदाता D को अनुमोदित करता है, तो ऐसी स्तिथि में D की अनुमोदन संख्या 1 से बढ़ जाएगी और A और B की अनुमोदन संख्या अपरिवर्तित रहेगी।
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(7.4) पटवारी प्रत्येक मतदाता द्वारा दर्ज अनुमोदन को मतदाता की मतदाता संख्या, नाम और उसके द्वारा अनुमोदित उम्मीदवारों के नाम के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखेगा।

(7.5) अनुमोदन दर्ज करने की प्रक्रिया खुली और सार्वजानिक होगी। अर्थात प्रत्येक मतदाता द्वारा दर्ज किये गए अनुमोदनों को मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखा जाएगा और यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए खुली एवं दृश्य होगी।
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(8) जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी को बदले जाने के लिए शर्त : यदि
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(8.1) किसी नए उम्मीदवार को प्राप्त अनुमोदनों की संख्या अमुक जिले के मतदाताओ की कुल संख्या के 35% (सभी दर्ज मतदाताओ की कुल संख्या के 35%) से अधिक हो, और
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(8.2) उसे मिले अनुमोदनों की संख्या पदासीन मिलावट रोकथाम अधिकारी को मिले अनुमोदनों की संख्या से उतनी अधिक है जो उस जिले में दर्ज अभिभावको की कुल संख्या के 2% के बराबर हो। और
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(8.3) उसके अनुमोदनों की संख्या सबसे अधिक हो।
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तभी और सिर्फ तभी मुख्यमंत्री पदासीन मिलावट रोकथाम अधिकारी को पद से हटा सकते है और ऊपर दी गयी शर्ते पूरी करने वाले नए उम्मीदवार को मिलावट रोकथाम अधिकारी नियुक्त कर सकते है, या उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है।
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(9) टिपण्णी :
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(9.1) ऊपर दी गयी धाराओं में इंगित "35%" और "2%" से आशय है "मतदाता सूचि में दर्ज कुल मतदाताओ की संख्या का 35% और 2% "। उदाहरण : यदि किसी जिले में 20 लाख मतदाता है तो 35% और 2% का अर्थ क्रमशः 700,000 और 40,000 होगा। यहाँ यह संख्या अनुमोदन दर्ज कराने वाले मतदाताओ की संख्या से अप्रभावित रहेगी। और जल वितरण अधिकारी के प्रतिस्थापन के लिए ऊपर दी गयी तीनो धाराओं (8.1) ,(8.2) ,(8.3) में दी गयी शर्तो का पूरा होना जरुरी होगा।
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(9.2) उदहारण – 1 : मान लीजिए किसी जिले में 20,00,000 मतदाता है ,तथा मान लीजिए कि पदासीन मिलावट रोकथाम अधिकारी को 500,000 मतदाताओ के अनुमोदन मिले है। तब यदि किसी उम्मीदवार को 20,00,000 के 35% = 700,000 मतदाताओ के अनुमोदन मिलते है, सिर्फ तभी मुख्यमंत्री उस नए उम्मीदवार को जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी नियुक्त कर सकते है या उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है।
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(9.3) उदहारण – 2 : मान लीजिए किसी जिले में 20,00,000 मतदाता है तथा मान लीजिए कि पदासीन मिलावट रोकथाम अधिकारी के पास 800,000 मतदाताओ का अनुमोदन है। तब किसी उम्मीदवार के अनुमोदनों की संख्या (800,000 + 2% of 20,00,000) = (800,000 + 40,000) = 840,000, होना जरुरी है। सिर्फ तभी मुख्यमंत्री उसे मिलावट रोकथाम अधिकारी नियुक्त कर सकेंगे या उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है।
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(10) कोई नागरिक किसी राज्य में अधिकतम 5 जिलों का और पुरे भारत में अधिकतम 15 जिलों का मिलावट रोकथाम अधिकारी बन सकता है। यदि कोई मिलावट रोकथाम अधिकारी मतदाताओ के अनुमोदन द्वारा मिलावट रोकथाम अधिकारी बना है अर्थात प्रत्येक जिले में उसे 35% मतदाताओ से ज्यादा मतदाताओ के समर्थन प्राप्त है , तो उसका वेतन एवं भत्ते एक जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी के वेतन एवं भत्तों से उतना गुना होगा जितने जिलो में वह मिलावट रोकथाम अधिकारी के पद पर कार्यरत है। उदाहरण के लिए- यदि कोई व्यक्ति भारत के 7 जिलों में मिलावट रोकथाम अधिकारी है, और सिर्फ 5 जिलों में ही उसको मिले अनुमोदनों की संख्या 35% से ज्यादा है तो उसे पांच गुणा वेतन मिलेगा न कि सात गुणा। किन्तु यदि कोई व्यक्ति 5 जिलो में मिलावट रोकथाम अधिकारी है एवं 4 या 5 जिलों में प्रत्येक जिले से उसे मिले अनुमोदनों की संख्या 35% से कम है, तब उसका वेतन सिर्फ एक जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी के वेतनमान के बराबर होगा।
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(11) कार्य अवधि: कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में एक जिले में अधिकतम 8 साल तक मिलावट रोकथाम अधिकारी रह सकता है। इसके बाद वह किसी अन्य जिले में मिलावट रोकथाम अधिकारी बन सकता है या अमुक जिले में किसी अन्य पद पर सेवा दे सकता है।
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(12) कोई भी सेवानिवृत्ति लाभ नहीं : यदि कोई व्यक्ति मतदाताओ के समर्थन द्वारा मिलावट रोकथाम अधिकारी बना है और वह किसी भी राजकीय सेवा कैडर से नहीं आता है तो कार्य अवधी समाप्त होने पर या हटा दिये जाने पर उसे किसी भी प्रकार की सेवानिवृत्ति राशी एवं पेंशन लाभ आदि नहीं मिलेंगे। जिला / राज्य / भारत सरकार द्वारा पारित किये गए किसी कानून या प्रस्ताव द्वारा उसे सेवानिवृति लाभ दिए जा सकेंगे परन्तु यह कानून मिलावट रोकथाम अधिकारी को किसी भी प्रकार के सेवानिवृत्ति लाभ देने के लिए कोई प्रावधान नहीं करता।
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(13) मतदाताओ द्वारा अनुमोदित मिलावट रोकथाम अधिकारी का वेतनमान एवं भत्ते : मतदाताओ द्वारा अनुमोदित मिलावट रोकथाम अधिकारी का वेतन एवं भत्ते वरिष्ठता एवं अन्य पात्रताओं की अवहेलना करते हुए राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किये जाने वाले जिला कलेक्टर के वेतनमान के समकक्ष होंगे। मिलावट रोकथाम अधिकारी सरकारी आवास, सरकारी वाहन, ड्राइवर या अपने आवास पर प्राप्त की जाने वाली सेवाओं की पूर्ती के लिए किसी भी प्रकार के अतिरिक्त स्टाफ का पात्र नहीं होगा। किन्तु मिलावट रोकथाम अधिकारी इन सेवाओं के बराबर निर्धारित राशि भत्ते के रूप में प्राप्त कर करेगा। इस सम्बन्ध में मुख्यमंत्री का फैसला अंतिम होगा। किन्तु मतदाताओ के अनुमोदन से नियुक्त सभी मिलावट रोकथाम अधिकारी राज्य सरकार द्वारा निर्धारित वेतनमान के समान वेतन प्राप्त करेंगे। यदि जिले के मतदाता चाहे तो वे बहुमत का प्रदर्शन करके मिलावट रोकथाम अधिकारी के वेतन में अतिरिक्त वृध्दि कर सकेंगे।
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(14) मतदाताओ द्वारा अनुमोदित व्यक्ति को मुख्यमंत्री द्वारा मिलावट रोकथाम अधिकारी नियुक्त करना : इस सम्बन्ध में फैसला मुख्यमंत्री करेंगे। मुख्यमंत्री मतदाताओ द्वारा अनुमोदित व्यक्ति को ओएसडी (OSD = Officer on Special Duty) के रूप में या मिलावट रोकथाम अधिकारी के रूप में नियुक्ति दे सकते है। मुख्यमंत्री का फैसला अंतिम होगा।
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(15) टेस्टिंग लेब्स लगाना , खोजी कुत्ते जुटाना , मुखबिरों का जाल बिछाना , गुमनाम एवं नामजद शिकायतों को दर्ज करने के लिए वेबसाईट / एप्लीकेशन बनाना।
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(15.1) मिलावट रोकथाम अधिकारी आवश्यकतानुसार टेस्टिंग लेब लगा सकेगा, खोजी कुत्ते खरीद सकेगा या उन्हें किराए पर ले सकेगा , ईमानदार प्रतिस्पर्धियो एवं मुखबिरों से ख़बरें जुटा सकेगा। मिलावट अधिकारी एक मोबाईल एप्किकेशन / वेबसाईट भी उपलब्ध करवाएगा, जहाँ पर नागरिक गुमनाम या नामजद शिकायते दर्ज करवा सके।
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(15.2) विश्वसनीय सूत्रों एवं सूचनाओं का इस्तेमाल करके किसी इकाई पर छापे मार सकेगा और घटना स्थल पर ही वस्तु की जाँच कर सकेगा या फिर लेब में जाँच करने के लिए सेम्पल ले सकेगा। और यदि इस दौरान कोई व्यक्ति / कारोबारी हिंसा करता है या उसके कार्य में बाधा डालता है तो मिलावट रोकथाम अधिकारी अमुक आरोपियों की शिकायत ज्यूरी के समक्ष कर सकेगा।
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(15.3) मिलावट तब मानी जायेगी, जब आरोपी ने तय मापदंडो से अधिक मात्रा में मिलावट की हो।
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(15.4) जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी खाद्य पदार्थो में मिलावट की सीमा से सम्बंधित मापदंड के बारे में मुख्यमंत्री एवं नागरिको को सुझाव दे सकेगा। इसी क़ानून में दी गयी "जनता की आवाज" की धाराओं का प्रयोग करते हुए मिलावट रोकथाम अधिकारी स्वयं द्वारा सुझाए गए मिलावट से संबधित मापदंडो को प्रकाशित कर सकेगा एवं इन्हें लागू कर सकेगा।
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(J) मिलावट सम्बंधित मामलो एवं मिलावट अधिकारी के स्टाफ से सम्बंधित शिकायतों के निपटान के लिए जूरी प्रक्रिया
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(J.1) टिपण्णी : प्रस्तावित जूरी प्रक्रिया के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए ‘ newindia dot in /causes/DJSM ‘ देखें
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(J.2) जब कभी मिलावट रोकथाम अधिकारी / उसके स्टाफ एवं कारोबारी के बीच कोई विवाद होगा या कोई मामला , आर्थिक दंड आदि तय किया जाएगा तो मिलावट रोकथाम अधिकारी मामले के निपटान के लिए नागरिको की ज्यूरी का इस्तेमाल करेगा। यह भाग ज्यूरी के गठन से सम्बंधित प्रक्रिया देता है।
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(J.3) मिलावट रोकथाम अधिकारी प्रत्येक जिले में एक जूरी प्रशासक नियुक्त करेंगे, जिसे जिला जूरी प्रशासक कहा जाएगा। जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी जूरी प्रशासक को किसी भी दिन बदल सकते है।
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(J.4) विवादों का निपटारा
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(J.4.1) प्रत्येक मामले के लिए जिला जूरी प्रशासक जिले की मतदाता सूची में से रेंडमली 30 से 55 वर्ष की आयु के कुछ उन नागरिक चुनेगा जो कि पिछले 10 वर्षों में कभी जूरी मंडल में ज्यूरर बन कर नहीं आये है एवं अतीत में उनको किसी भी मामले में दोषी नही पाया गया है।
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(J.4.2) जूरी सदस्यों की संख्या : जूरी सदस्यों की न्यूनतम संख्या 12 और अधिकतम 100 हो सकती है। यदि जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी द्वारा लगाए हुए जुर्माने की राशि 1 लाख से कम है तो जूरी सदस्यो की संख्या 12 होगी और उसके बाद प्रत्येक 1 लाख ज्यादा जुर्माने की रकम के लिए एक जूरी सदस्य और बढ़ाया जाएगा। जूरी सदस्यों की संख्या अधिकतम 100 हो सकती है। यदि मामला जुर्माने का नही है , बल्कि किसी अधिकारी के खिलाफ दुर्व्यवहार या भ्रष्टाचार का आरोप है तो जूरी सदस्यों की संख्या 50 होगी ।
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(J.4.3) जूरी सदस्य दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपने विवेक एवं कानूनी सीमा के अनुसार जुर्माने की राशि निर्धारित करेंगे । जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी 67% जुरी सदस्यो द्वारा अनुमोदित जुर्माने की राशि को तय किया गया जुर्माना मानेंगे।
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(J.4.4) यदि 67% से अधिक जुरी सदस्य ये घोषित करते है कि, अभियुक्त कर्मचारी को पद से निलंबित किया जाना चाहिए तो जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी अभियुक्त कर्मचारी को निलंबित करेंगे ।
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(S) देश अथवा राज्य के नागरिको द्वारा राईट टू रिकॉल मिलावट रोकथाम अधिकारी के क़ानून को निलंबित करने की प्रक्रिया :
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(S.1) राज्य के मतदाता ( सभी मतदाता, न कि सिर्फ वे मतदाता जिन्होंने वोट किया है ) मुख्यमंत्री द्वारा स्थापित की गयी प्रक्रिया का उपयोग करते हुए इस कानून को किसी जिले / राज्य में 4 वर्ष तक के लिए निलंबित कर सकते है। इस प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित होना चाहिए कि अमुक राज्य के कुल मतदाताओं ( न कि सिर्फ उन मतदाताओं ने जिन्होंने अनुमोदन की प्रक्रिया में भाग लिया है ) का बहुमत स्पष्ट रूप से इस निलंबन का समर्थन करता है। साथ ही राज्य के मतदाता अपने बहुमत का प्रयोग करते हुए इस निलंबन को 4 वर्षो की अवधि में असीमित आवृतियों तक बढ़ा सकेंगे।
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(S.2) देश के मतदाता ( सभी मतदाता, न कि सिर्फ वे मतदाता जिन्होंने वोट किया है ) प्रधानमंत्री द्वारा स्थापित की गयी प्रक्रिया का उपयोग करते हुए इस कानून को किसी जिले / राज्य में 4 वर्ष तक के लिए निलंबित कर सकते है। इस प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित होना चाहिए कि देश के कुल मतदाताओं ( न कि सिर्फ उन मतदाताओं ने जिन्होंने अनुमोदन की प्रक्रिया में भाग लिया है ) का बहुमत स्पष्ट रूप से इस निलंबन का समर्थन करता है। साथ ही देश के मतदाता अपने बहुमत का प्रयोग करते हुए इस निलंबन को 4 वर्षो की अवधि के लिए असीमित आवृतियों तक बढ़ा सकेंगे।
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(S.3) टिपण्णी : यहाँ "S" सम्प्रभुता ( Sovereignty ) का द्योतक है। आशय यह है कि, किसी भी जिले में लागू प्रक्रिया को राज्य / देश के मतदाता बहुमत का प्रदर्शन करके निलंबित कर सकते है, तथा किसी जिले / राज्य में लागू प्रक्रिया को देश के मतदाताओं का बहुमत निलंबित कर सकता है।
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(RV) [ सीमांकित मतदान या रेंज वोटिंग के लिए टिप्पणी ]
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अबाध्यकारी निर्देश - इस विधेयक के लागू होने के बाद चुनाव आयोग मतदाताओ को यह अनुमति दे सकेगा कि वे किसी उम्मीदवार को 0 से 100 के बीच अंक दे सके या फिर सामान्य रूप से हाँ / नहीं का अनुमोदन कर सके। यदि मतदाता द्वारा सामान्य अनुमोदन किया जाता है तो इस अनुमोदन को 100 अंको के समकक्ष माना जाएगा। किन्तु यदि मतदाता उम्मीदवार को अंक देता है तो मतदाता द्वारा दिए गए अंक ही मान्य होंगे। उम्मीदवार द्वारा प्राप्त किये गए सभी अंक ही उम्मीदवार के कुल अंको की संख्या मानी जायेगी। पदासीन अधिकारी के कुल अंको की मान्य संख्या दी गयी दोनों परिस्थितियों में से उच्च अंक को निर्दिष्ट करने वाली संख्या को माना जाएगा -- (अ) पदासीन अधिकारी को प्राप्त कुल मत * 67, (ब) चुनाव के बाद पदासीन अधिकारी द्वारा प्राप्त अंक।

प्रतिस्थापक चुनाव तब आयोजित किया जाएगा जब किसी उम्मीदवार के कुल अंको की संख्या ( पदासीन अधिकारी के कुल अंको की संख्या + अमुक निर्वाचन क्षेत्र में दर्ज कुल मतदाताओ की संख्या * 100 / 10 ) के बराबर हो। तथा पदासीन अधिकारी का प्रतिस्थापन तब होगा जब उम्मीदवार को पदासीन अधिकारी से अधिक वोट मिलते है , और नए उम्मीदवार को पदासीन अधिकारी को पिछले चुनावों में मिले वोटो से 10% अधिक वोट मिलते है, या फिर नए उम्मीदवार को निर्वाचन क्षेत्र में दर्ज कुल मतदाताओ के 51% मतों से ज्यादा मिलते है। इस विधेयक की धारा ( CV.1 ) का उपयोग करते हुए यदि देश के कुल मतदाताओं के 51% नागरिक इस व्यवस्था को लागू करने के "हाँ" दर्ज कर देते है तो चुनाव आयोग इस प्रणाली को लागू कर सकता है या नही भी कर सकता है। यह कथित सीमांकित मतदान प्रणाली या रेंज वोटिंग सिस्टम ऐरो की कथित असम्भाव्यता प्रमेय ( Arrow’s Impossibility Theorem ) से प्रतिरक्षा प्रदान करती है।
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(CV) जनता की आवाज (Citizens’ Voice):
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(CV.1 ) [ जिला कलेक्टर या उसके द्वारा नियुक्त कर्मचारी के लिए निर्देश ]
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यदि देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाला कोई भी नागरिक मतदाता इस विधेयक की किसी धारा में बदलाव चाहता हो अथवा वह इस विधेयक से सम्बन्धित कोई शिकायत दर्ज करना चाहता हो तो ऐसा नागरिक मतदाता जिला कलेक्टर के कार्यालय में उपस्थित होकर एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकता है। जिला कलेक्टर या उसका क्लर्क इस शपथपत्र को 30 रूपए प्रति पृष्ठ का शुल्क लेकर दर्ज करेगा तथा एक सीरियल नंबर जारी करके इस शपथपत्र को स्कैन करके अमुक मतदाता के छाया चित्र (फोटो) एवं अन्य विवरण के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा।
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(CV.2 ) [ तलाटी अथवा पटवारी के लिए निर्देश ]
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किसी पटवारी कार्यालय के कार्यक्षेत्र में निवास करने वाला कोई भी नागरिक मतदाता यदि इस विधेयक अथवा इसकी किसी धारा पर अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहता हो अथवा ऊपर दी गयी धारा (CV.1 ) के तहत प्रस्तुत किसी भी शपथपत्र पर अपनी हां / नहीं दर्ज कराना चाहता हो, तो वह मतदाता अपना पहचान पत्र लेकर तलाटी के कार्यालय में उपस्थित होगा और उपलब्ध आवेदन पर शपथपत्र का सीरियल नंबर दर्ज करके अपनी हाँ / नही दर्ज करेगा। पटवारी 3 रूपए का शुल्क लेकर इस हाँ / नहीं को दर्ज करके एक रसीद जारी करेगा । मतदाता द्वारा दर्ज की गयी हाँ / नहीं को मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर मतदाता के नाम, मतदाता पहचान संख्या, दिनांक एवं अन्य विवरणों के साथ रखा जाएगा।
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---------- जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी को बदलने के लिए प्रस्तावित ड्राफ्ट का समापन ----------

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Sun Apr 01 2018 19:42:42 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

फेसबुक के सोफ्टवेयर में इस तरह के फीचर है जो मनोरंजक सामग्री एवं लुगदी लेखन के प्रसार को बढ़ावा , किन्तु गंभीर एवं सार्थक गतिविधियो को हतोत्साहित करते है।
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लुगदी लेखन सामग्री एवं मनोरंजन --- लुगदी लेखन में "टाइप एन्ड थ्रो" किस्म का पाठ्य शामिल है। घटनाओ पर की गयी त्वरित एवं चलताऊ संक्षिप्त प्रतिक्रियाएं, जो कि 2-4 घंटे में काल कलवित हो जाती है। अगले दिन न तो लिखने वाले को याद रहती है और न ही पढ़ने वाले पर इसका प्रभाव रहता है। अपने दैनिक कार्यकलाप एवं विभिन्न रोचक विषयों पर फेसबुक पर मित्रो से चर्चा करना मनोरंजन में शामिल है। पूरी दुनिया में 95% से अधिक नागरिक इन्ही कार्यो के लिए फेसबुक का ज्यादातर इस्तेमाल करते है।
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गंभीर एवं सार्थक गतिविधियाँ --- इसमें विस्तृत विषय वस्तु से सम्बंधित पाठ्य शामिल है। ये पाठ्य सामाजिक, धार्मिक , सामुदायिक एवं राजनैतिक व्यवस्था में सुधार लाने से सम्बन्धित विवरणों से युक्त या किसी विषय पर नए अनुसन्धान से सम्बंधित होते है। इनका पाठ्य विशद होता है। कुछ 5% यूजर ये गतिविधियाँ बहुतायत से करते है।
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ज्यादातर यूजर्स अपना अधिकाँश मनोरंजन मूलक गतिविधियों पर खर्च करते है , तथा साथ ही वे राजनैतिक या व्यवस्थागत सुधार की सामग्री का भी प्रसार करते है। लेकिन ये ज्यादातर यूजर अपनी तरफ से सार्थक विषय से सम्बंधित पोस्ट खोजते नहीं है। यदि इनके सामने कोई सार्थक पोस्ट आयेगी तो ये इसे पढ़ लेते है, एवं सहमत होने पर उसे आगे बढ़ा देते है। यहाँ यह बात समझना जरुरी है कि -- यदि उनकी न्यूज फीड में कोई सार्थक पोस्ट आएगी तो वे इसे पढ़ लेंगे और उनकी न्यूज फीड में नहीं आने पर वे नहीं पढेंगे। मान लीजिये कि, ऐसे 100 यूजर्स के सामने यदि कोई सार्थक पोस्ट जाती है तो सम्भावनाएं है कि इनमे से 15 लोग इसे सरसरी निगाह से पढ़ लेंगे एवं कोई 1 यूजर इसे आगे शेयर कर देगा या अपनी वाल पर कॉपी करके रखेगा।
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फेसबुक के सोफ्टवेयर के पास ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे वह किसी पोस्ट की विषय वस्तु के बारे में स्वत: ही यह अंदाजा लगा सके, कि विषय वस्तु सार्थक है या मनोरंजक है। अत: यह निर्धारित करने के लिए फेसबुक किसी पोस्ट को दिए गए वर्गों में विभाजित करता है -- a) विस्तृत पाठ्य , २) फोटो , वीडियो एवं छोटे पाठ्य। यदि किसी पोस्ट में प्लेन टेक्स्ट है एवं यह विस्तृत भी है, तो फेसबुक का सोफ्टवेयर इस पर फ़िल्टर लगा देता है , किन्तु फोटो, वीडियो एवं छोटे पाठ्य होने पर इसे बूस्ट करता है। फेसबुक का सोफ्टवेयर यूजर्स को (a) श्रेणी के स्तम्भ पढने से रोकने के लिए जाया तौर पर उनका डेटा एवं समय श्रेणी (b) पर खर्च करने की नीति पर काम करता है।
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१) फेसबुक आधे पेज से ज्यादा लम्बे आर्टिकल्स पर फ़िल्टर लगाता है , एवं लम्बाई बढ़ने के साथ साथ फिल्टरिंग बढ़ती जाती है। यदि आपने 1 पेज से अधिक लम्बा पाठ्य पोस्ट किया है तो फेसबुक इसे कम लोगो की न्यूज फीड में भेजेगा। और यदि यह पोस्ट 4 पेज से अधिक का है तो इसकी न्यूज फीड और भी कम यूजर की वाल पर जायेगी। फेसबुक का सोफ्टवेयर यह चिन्हित करता है कि अमुक पोस्ट में सिर्फ टेक्स्ट है, कोई इमेज वगेरह नहीं है।

किन्तु यदि आपने इस टेक्स्ट के साथ कोई इमेज अटेच कर दी है तो फेसबुक का सोफ्टवेयर इसे मनोरंजक पोस्ट की तरह चिन्हित करके बूस्ट कर देता है।
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२) फेसबुक सभी प्रकार की इमेजेस , फोटो , वीडियो आदि को बूस्ट करता है , जिससे ये फोटो / वीडियो ज्यादा यूजर्स की न्यूज फीड पर जाते है। ये फोटो , वीडियो यूजर्स का डेटा एवं समय जाया तौर पर खा लेते है।
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३) यदि आपने प्रोफाइल पिक्चर अपडेट की है तो अधिकतम यूजर्स को न्यूज फीड जाती है।
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फेसबुक ज्यादा से ज्यादा फोटो, वीडियो की न्यूज फीड आपकी वाल पर भेजता है। ताकि यूजर्स का डेटा एवं प्राथमिक समय मनोरंजन पर व्यतीत किया जा सके। मान लीजिये कोई यूजर कुल 30 मिनिट से 1 घंटा प्रतिदिन फेसबुक पर बिताता है। तो जब भी वह फेसबुक पर आएगा उसे फोटो , वीडियो वगेरह ज्यादातर दिखाई देंगे। वह इमेज एवं वीडियो देखेगा एवं निकल जाएगा। पाठ्य सामग्री की न्यूज फीड अपेक्षाकृत कम होने से उसे इन्हें पढने का अवसर नहीं मिलेगा।
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उल्लेखनीय है कि , जटिल विषय को समझने एवं समझाने का सबसे प्रभावी माध्यम पाठ्य सामग्री ही है। वीडियो किसी जटिल विषय को आसानी से नहीं समझा पाते, अलबत्ता वे दर्शक के मन में यह भाव पैदा कर देते है कि उसे विषय समझ आ गया है। पर अंततोगत्वा वीडियो मनोरंजन ही करते है। इसीलिए फेसबुक प्लेन टेक्स्ट पर फ़िल्टर लगाता है, लेकिन वीडियो को बूस्ट करता है।
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४) फेसबुक ने यूजर्स का अतिरिक्त समय खाने के लिए टेग करने का ऑप्शन दिया हुआ है। और ऐसा फीचर जान बुझकर नहीं जोड़ा गया है जिससे व्यक्ति खुद को टेग होने से बचा सके। ज्यादातर यूजर टेग रिमूव करना जानते भी नहीं है, एवं टैग रिमूव में काफी समय खर्च हो जाता है। फेसबुक ने टैग वाली पोस्ट पर नोटिफिकेशन ऑफ़ करने का फीचर भी नहीं जोड़ा हुआ है। फेसबुक टेग किये गए सभी पोस्ट्स के सभी कमेंट्स की नोटिफिकेशन भेजते रहता है। असीमित नोटिफिकेशन होने कारण यूजर नोटिफिकेशन देखना बंद कर देता है , और काम के कमेन्ट की नोटिफिकेशन अपठित रह जाती है। इस तरह फोटो , वीडियो से बचा हुआ समय फेसबुक टेग के माध्यम से चूस लेता है। अलबत्ता मनोरंजन प्रधान यूजर्स को टेग करने या टैग होने से कोई समस्या नहीं आती। लेकिन सीमित समय में सार्थक एक्टिविटी करने वाले यूजर को डेटा एवं समय की काफी हानि होती है।
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५) फेसबुक ने जानबूझकर सर्चिंग ऑप्शन इतना पूअर किया हुआ है कि व्यक्ति खुद के ही पुराने पोस्ट नहीं ढूंढ पाता। टाइप एंड थ्रो सामग्री को वापिस ढूँढने की आवश्यकता नहीं होती, किन्तु सार्थक विषय पर किये गए विस्तृत पोस्ट की फिर से जरूरत आ जाती है। इसके लिए एक्टिविटी लॉग में निरंतर स्क्रोल करते रहना होता है, जो कि एक अवधि के बाद व्यवहारिक नही है। पोस्ट करो और भूल जाओ।
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६) फेसबुक ने जान बुझकर ऐसी व्यवस्था नहीं दी है जिससे यूजर अपनी प्रोफाइल पर विभिन्न विषयों से सम्बंधित पोस्ट्स के लिए अलग से सेक्शन बना सके , एवं आगंतुक जब किसी यूजर की वाल पर आये तो वह अपनी रुचि एवं विषय की पोस्ट के वर्ग में दर्ज पोस्ट्स को चयनात्मक आधार पर पढ़ सके।
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७) यदि आप किसी आर्टिकल में कोई लिंक / न्यूज लिंक रखते है तो फेसबुक पोस्ट पर फ़िल्टर लगा देता है।
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८) फेसबुक में सेमी ब्लोक करने का ऑप्शन नहीं दिया गया है। ऐसा कोई विकल्प नहीं है जिससे यूजर किसी व्यक्ति के कमेन्ट करने पर तो रोक लगा सके किन्तु वह उसके पब्लिक पोस्ट देखता रह सके। ब्लोक करने से यूजर पूरी तरह से गायब हो जाता है।
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९) नोट्स सेक्शन में यूजर अपने चयनित पोस्ट रख सकता है , एवं इन तक तुरंत पहुँच सकता है। किन्तु फेसबुक ने नोट्स सेक्शन की पहुंच काफी मुश्किल बनायी है। मोबाइल पर यह खैर काफी मुश्किल है ही लेकिन कंप्यूटर पर भी इसे ऐसी जगह रखा गया है कि अमूमन यूजर को नोट्स सेक्शन तब तक नहीं मिलता जब तक उन्हें रूट न बताया जाए।
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१०) फेसबुक का सोफ्टवेयर लिंक्स से युक्त इंडेक्स पोस्ट को सपोर्ट नहीं करता। यदि आप पोस्ट्स के लिंक्स की सूची बनाते है तो आपको इन्हें लगातार एडिट करते रहना होता है। बार बार एडिट करने से फेसबुक अमुक पोस्ट को डिलीट कर देता है। फेसबुक कई लिंक्स होने के कारण भी बहुधा इन्हें डिलीट कर देता है।
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११) फेसबुक ने प्रोफाइल को वेरीफाई करने का ऑप्शन नहीं दिया हुआ है। इससे नामालूम एवं सच्ची प्रोफाइल में अंतर करना मुश्किल हो जाता है। फेक प्रोफाइल से अनुचित सामग्री का प्रसार बढ़ता है।
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समाधान ?
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1) यदि आपको किसी व्यक्ति के राजनैतिक पोस्ट्स की नियमित फीड बेक चाहिए तो उसकी प्रोफाइल को "see first" या "get notification" , या "close friends" का मार्क करके रखें।
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2) अपने महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक पोस्ट्स के लिंक किसी एक स्टेटस पोस्ट में रखें एवं इस पोस्ट का लिंक अपने कवर / प्रोफाइल पिक्चर के डिस्क्रिप्शन में रख दें। आप को जब भी यह पोस्ट चाहिए तब आप सिर्फ एक क्लिक करके इन्हें पढ़ सकते है। यदि आप अपने कवर पिक्चर पर यह लिख देते है कि , इस पिक्चर को क्लिक करके डिस्क्रिप्शन को देखें तो जो भी यूजर आपकी प्रोफाइल पर आएगा, वह स्वत: इन महत्त्वपूर्ण पोस्ट्स को बिना ढूंढें सीधे पढ़ सकेगा।
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3) अपनी प्रोफाइल में जाकर किसी विषय से सम्बंधित एक एल्बम क्रियेट करें। प्रथम पोस्ट में एक फोटो अपलोड करें। अब आप इस एल्बम में जितने चाहे उतने चित्र विहीन पोस्ट रख सकते है। और आप इस तरह से 50 विषयों से सम्बंधित 50 एल्बम बना सकते है। जब भी आप कोई पोस्ट करें तो सम्बंधित विषय के एल्बम में पोस्ट कर दे। इस तरह आप विभिन्न विषयों के लिए एल्बम बना सकते है , एवं इन एल्बम में पोस्ट्स को ढूंढना बेहद आसान है।
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4) किसी विषय पर सार्थक चर्चा के लिए अलग से कन्वर्सेशन थ्रेड का इस्तेमाल कर सकते है। इस लिंक को आप सेव कर सकते है। विषय / व्यक्ति से सम्बंधित चर्चा के लिए ऐसे कई थ्रेड बनाये जा सकते है। इससे किसी विषय / व्यक्ति से सम्बंधित आपकी चर्चा सुरक्षित रहेगी एवं आपके लिए इस तक पहुंचना आसान हो जाएगा।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 01 2018 20:39:10 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

एससी एसटी एक्ट के तहत की जाने वाली तुरंत गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट की रोक ;
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यथा स्थिति भी बदतर है एवं सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग भी इसे बदतर ही बनाये रखेगी। असल मुद्दा यह है कि हम ऐसे विवादों के निपटान के लिए किस प्रक्रिया का उपयोग कर रहे है। हमें निष्पक्ष एवं त्वरित न्याय प्रणाली चाहिये।
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प्रस्तावित समाधान
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एससी एसटी एक्ट के तहत दर्ज किये गये विवादों का निपटान नागरिको की ज्यूरी द्वारा किया जाए। ज्यूरी ट्रायल के अलावा इस क़ानून में चाहे आप कोई बदलाव करें या न करें, दोनों ही सूरतो में स्थिति जस की तस यानी बदतर ही रहेगी।
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यह देखना दुखद है कि , विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के साथ साथ ज्यादातर दलित एवं सामान्य वर्ग के कार्यकर्त्ता भी समाधान पर काम करने की जगह एक दुसरे के खिलाफ जातिगत वैमनस्य बढ़ाने वाला जहर उगल रहे है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Apr 02 2018 07:36:07 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

एससी एसटी एक्ट : समस्या का समाधान करने की जगह सभी राजनैतिक पार्टियों एवं नेताओं द्वारा इसका इस्तेमाल विभाजन करके अपना गुट बढाने में किया जा रहा है।
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ध्रुवीकरण / विभाजन करके राजनीति में अच्छे खासे वोट खींचे जा सकते है। यही वजह है कि विभिन्न राजनैतिक पार्टियाँ एवं उनके नेता अपनी भरसक कोशिश समुदाय में अलगाव बढाने में करते है। यदि किसी विषय पर समुदाय में दो वर्ग बन जाते है तो ये दोनो वर्ग अलग अलग पार्टियों को वोट करेंगे। यदि विभाजन समाप्त हो जाता है तो फिर से एक वर्ग बन जायेगा एवं ऐसा होते ही कोई एक पार्टी अपने वोट गंवा देगी , एवं उसका अस्तित्व ख़त्म हो जायेगा।
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संघ , कोंग्रेस , बीजेपी , सपा , आम आदमी पार्टी आदि सभी पार्टियाँ इस धंधे में शामिल है। ये सभी नेता हर धर्म एवं समुदाय में हर हाल में विभाजन करने की फिराक में रहते है। जो संगठन विभाजन करेगा, अलग हुआ गुट उसकी और चला जायेगा एवं उसे वोट करेगा। इस तरह ये अपना वोट निरंतर साधते रहते है। मतलब इनकी रोजी-रोटी समस्या है , एवं समस्या ही रहेगी। समाधान आने से राजनैतिक पार्टी की रोजी ख़त्म हो जाती है।
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एससी एसटी क़ानून का कितना गलत इस्तेमाल किया जा रहा है इस बात पर भी बहस करने की कोई तुक नहीं है। मूल समस्या यह है कि वस्तु स्थिति चाहे जो हो , हर स्थिति में एक पक्ष दुसरे पक्ष पर दमन करने का आरोप लगाते रहेंगे। सबकी अपनी धारणाएं है। किसी सामान्य वर्ग के व्यक्ति से पूछिए तो वह कहेगा कि इस क़ानून के कारण हम पर दमन हो रहा है , ( चाहे दमन नहीं हो रहा हो , पर उसे ऐसा ही लगता है की दमन हो रहा है ) , ठीक इसी तरह यदि इस क़ानून में बदलाव कर दिया जाता है तो फिर दलित कहेंगे कि हम पर दमन बहुत बढ़ गया है , ( चाहे दमन नहीं बढ़ा हो , पर उसे ऐसा ही लगता है कि दमन बढ़ गया है ) !! और नागरिक चाहे कुछ न कहे , पर दोनों समुदायों के नेता अपने अपने वर्ग के नागरिको को यह समझाते रहेंगे कि दूसरा पक्ष तुम पर दमन कर रहा है।
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मूल समस्या --- असल में मूल समस्या दंड देने की प्रक्रिया में मौजूद है। हर मुकदमे की परिस्थितियां अलग होती है। अत: कोई मुकदमा झूठा है या नहीं , इसका फैसला तो मुकदमा देखकर ही किया जा सकता है। लेकिन मुकदमो की सुनवाई का अधिकार जब जज के पास एवं जांच का अधिकार पुलिस अधिकारी के पास हो तो जिस पक्षकार के पास इन्हें चुकाने के लिए मोटा पैसा होगा उसी आधार पर ये फैसला होता है कि मामले की जांच कैसे होगी एवं क्या फैसला आयेगा।
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समाधान --- हमारा प्रस्ताव है कि एससी एसटी एक्ट के तहत दर्ज किये गए मामलो की सुनवाई नागरिको की जूरी द्वारा की जाए। प्रत्येक मुकदमे के लिए अलग से ज्यूरी होगी एवं यह जूरी सुनवाई करके मामले का त्वरित फैसला दे सकेगी। जूरी में 12 नागरिक होंगे , जिनका चयन मतदाता सूची से रेंडमली किया जाएगा। इस तरह हम प्रत्येक मुकदमे में सही तरीके से न्याय कर सकते है। जूरी द्वारा सुनवाई होने से किसी भी पक्ष द्वारा दमन की कोई शिकायत नहीं रह जायेगी।
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समस्या यह है कि संघ , बसपा, सपा , कोंग्रेस, आम आदमी पार्टी , भीम सेना, भीम आर्मी समेत विभाजन की राजनीति पर निर्भर सभी अन्य संगठन जूरी सिस्टम का विरोध कर रहे है। वे जानते है कि, जूरी सिस्टम आने से समस्या का समाधान होकर हाथ से विभाजन का मौका निकल जाएगा।
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यदि आप इस समस्या का स्थायी समाधान चाहते है तो पीएम को ट्विट करके मांग करें कि इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित किया जाए। इसके अतिरिक्त प्रत्येक तरीका विभाजन एवं दमन को सिर्फ बढ़ाएगा , कम नहीं करेगा।
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एससी एसटी एक्ट के मामलो के लिए हमने अलग से जूरी सिस्टम का ड्राफ्ट प्रस्तावित नहीं किया है। किन्तु जूरी सिस्टम के लिए हमारे द्वारा प्रस्तावित सामान्य ड्राफ्ट में कुछ मामूली परिवर्तन करके इस ड्राफ्ट को लागू किया जा सकता है। प्रस्तावित ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/829456537232542>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Apr 04 2018 19:07:16 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

मोदी साहेब ने देश के सामने यह झूठ बोला कि वे पिछड़ी जाति के है --- लेकिन मोदी साहेब की जाति "मोढ घांची" को ओबीसी का स्टेटस उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद 2002 में मिला था।
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मोदी साहेब ने वोट खींचने के लिए पूरे देश में घूम घूम कर कहा कि , "मैं पिछड़ी जाति में पैदा हुआ था" !! और इस तरह उन्होंने अपनी जाति को आधार बनाकर वोट मांगे। यदि वे ऐसा नहीं करते तो मैं उनकी जाति पर कोई टिपण्णी नहीं करता।
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तकनिकी रूप से मोदी साहेब की जाति को ओबीसी के रूप में लिस्ट करने की प्रक्रिया जब मोदी साहेब के मुख्यमंत्री बनने के 2 माह पूर्व ही शुरू की गयी थी , तब मोदी साहेब और आडवाणी जी केशुभाई पटेल को हटाकर मोदी साहेब को मुख्यमंत्री बनाने की योजना पर काम कर रहे थे। और मोदी साहेब और आडवाणी जी की इस मुहीम में उन्हें आप्रवासी भारतीयों की और से पर्याप्त मदद आ रही थी। मोढ घांची को ओबीसी में शामिल किया गया था ताकि केशुभाई के खिलाफ ओबीसी कार्ड खेला जा सके , और बाद में मोढ घांची को ओबीसी में जोड़ दिया गया।
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मोढ घांची तेल बेचने के कारोबार में रहे है। मोढ शब्द से मायने है -- कारोबारी , सेठ या समृद्ध व्यक्ति। और मोढ घांची कभी भी सामाजिक या आर्थिक रूप से पिछड़े हुए नहीं रहे। हालांकि मोढ घांची ज्यादा शिक्षित नहीं थे, लेकिन उसकी वजह यह थी कि इस जाति के लोगो के पास बहुधा जमा जमाया कारोबार होता था अत: वे अपने बच्चो को अपने घर के धंधे में लगाने में ही रुचि लेते थे। असल में मोढ घांची का दर्जा वैश्य समुदाय के समकक्ष है। 1950 के दशक में जब जाति व्यवस्था काफी मजबूत थी , तब भी मोढ घांची एवं मोढ वणिक के बीच वैवाहिक सम्बन्ध होने के सैंकड़ो उदाहरण है। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि मोढ घांची वैश्यों की तरह ही माने जाते थे और उनके सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े होने की बात गले उतारना मुश्किल है।
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जब 1994 में विहिप के कुछ कार्यकर्ताओ के माध्यम से यह बात सामने आयी थी कि मोदी साहेब राम, कृष्ण , विश्वनाथ मंदिर के निर्माण के लिए भारत में जनमत संग्रह करवाने का विरोध कर रहे है , और उनकी मंशा यह है कि यदि मंदिर बनाना है तो संसद में बहुमत लाकर ही बनाया जाना चाहिए , उसी समय यह बात साफ़ हो गयी थी कि मोदी साहेब को मंदिर निर्माण में कोई रुचि नहीं है , और वे सिर्फ इस मुद्दे पर पब्लिक को बुत्ता देकर वोट खींचना चाहते है। लेकिन तब भी उनकी जाति हमारे लिए कोई मुद्दा नहीं थी। लेकिन 2009 मोदी साहेब ने SC/ST/OBC के वोट खींचने के लिए यह पुकारें लगानी शुरु की, कि "मैं पिछड़ा हूँ , मैं पिछड़ा हूँ , मैं पिछडे हुओ का बेटा हूँ" , और संघ के सभी स्वयंसेवकों ने भी उनके इस झूठ का प्रचार करना शुरू किया तो अब नागरिको को यह जानकारी देना आवश्यक हो जाता है , कि मोदी साहेब पिछड़े हुए नहीं है , बल्कि वे राजनैतिक लाभ लेने के लिए पूरे देश में यह झूठ फैला रहे है कि वे पिछड़े वर्ग से आते है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Apr 05 2018 09:41:12 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

good comedy video on reservation by amit shah and mohan bhagwat !!
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संघ के नेता अमित शाह कह रहे है कि -- शोसल मीडिया पर यह अफवाह फैलायी जा रही है कि बीजेपी आरक्षण को ख़त्म कर देगी !! दरअसल उनका इशारा संघ के शीर्ष नेता मोहन भागवत एवं मनमोहन वैद्य की तरफ है !!!

दूसरी तरफ बीजेपी के नेता मोहन भगवत एवं मनमोहन वैद्य कह रहे है कि -- आरक्षण ख़त्म होना चाहिए, लेकिन सत्ता में बैठे लोग इसे ख़त्म नहीं करना चाहते !!! उनका इशारा मोदी साहेब और अमित शाह की तरफ है !!
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और संघ एवं बीजेपी के कार्यकर्ता कह रहे है कि -- बीजेपी एवं संघ अलग अलग है !! जब हम खाकी हाफ पेंट एवं सफ़ेद शर्ट पहनते है तब हम संघ के कार्यकर्ता है , अत: तब हम आरक्षण के खिलाफ है , लेकिन युनिफोर्म उतारकर , नहाने धोने के बाद हम फिर से बीजेपी के कार्यकर्ता हो जाते है !!!
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और जब उनसे यह पुछा जाता है की वे ऐसा कैसे कर पाते है ? उनका जवाब -- वैसे ही जैसे शक्तिमान एवं गंगाधर करते है !!
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Rahul Arya Ballari Karnataka:

Classic Doublespeak!!
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On one hand, Amit Shah, the president of BJP, says that BJP will never end reservation nor will they allow anyone to end it. But RSS leaders say that reservation must be ended !!!
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Confusion for all Bhakts !!

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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Apr 06 2018 18:11:12 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भीलवाडा के MLVTI इंजीनियरिंग कोलेज में अंतिम वर्ष के छात्रों को राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम , मल्टी इलेक्शन एवं जनमत संग्रह कानूनों के महत्त्व एवं इन कानूनों का निर्माण प्रोद्योगिकी एवं हथियारों के उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभाव पर जानकारी दी गयी।

Ishwar Choudhary BhilwaraRj:

भीलवाडा के MLVTI इंजीनियरिंग कोलेज में अंतिम वर्ष के छात्रों को पवन जी द्वारा राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम , मल्टी इलेक्शन एवं जनमत संग्रह कानूनों के महत्त्व एवं इन कानूनों का निर्माण प्रोद्योगिकी एवं हथियारों के उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभाव पर जानकारी दी गयी।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Apr 06 2018 18:43:19 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

मैकाले व्यवस्था Vs गुरुकुल व्यवस्था Vs वर्तमान शिक्षा व्यवस्था -- प्रस्तावित समाधान
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यह आलेख अकादमिक शिक्षा व्यवस्था के बारे में सामान्य एवं मूलभूत जानकारी देता है। अकादमिक शिक्षा व्यवस्था के मूलभूत तत्वों की अवहेलना करने के कारण शैक्षिक सुधार के इच्छुक कार्यकर्ता बहुधा व्यवस्था में सुधार की सही दिशा में कार्य नहीं कर पाते। साथ ही इस लेख में ऐसी प्रस्तावित प्रक्रिया के बारे में भी बताया गया है जो कि ज्ञात शिक्षा व्यवस्थाओ में सबसे बेहतर है।
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शिक्षा का उद्देश्य - शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य "युद्ध में" तथा द्वितीय उद्देश्य "बाजार में" टिके रहने की काबिलियत जुटाना है।
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युद्ध में टिके रहने से सम्बंधित शिक्षा से क्या आशय है ?

शिक्षा व्यवस्था को इस तरीके का होना चाहिए जिससे छात्रों के तकनीकी कौशल में वृद्धि हो ताकि ये छात्र आगे चलकर इंजीनियरिंग के क्षेत्र में विभिन्न आविष्कार करने में सक्षम हो जाये। यदि देश की तकनिकी शिक्षा का स्तर बेहतर होगा तो वहां के छात्र आगे चलकर तकनीक के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन करेंगे। इससे नागरिक जीवन में आ रही विभिन्न समस्याओ का समाधान तकनीकी आविष्कारो से किया जा सकेगा और यही तकनीक आगे चलकर आधुनिक हथियारों का निर्माण करेगी। यदि किसी देश की पीढ़ी में बेहतर स्वदेशी हथियारों को बनाने की काबिलियत होगी तो अमुक देश की सेना मजबूत होगी तथा यह देश दुश्मन देश की सेनाओं से युद्ध के दौरान टिका रहेगा। तकनिकी शिक्षा के अभाव में इसका उल्टा होगा। तकनीक में पिछड़ने से देश हथियारों के निर्माण में पिछड़ जायेगा। सैन्य दृष्टी से कमजोर होने पर वह आसान निशाना बनेगा और युद्ध में हारकर अपनी सभी संपदा गवां देगा।

उदाहरण के लिए दो देशो "अ" तथा "ब" पर विचार कीजिये। 'अ' देश में छात्रों को भूगोल, इतिहास, दर्शन, साहित्य, कला, संगीत आदि की प्रमुख रूप से शिक्षा दी जाती है जबकि देश 'ब' में छात्रों को प्रमुख रूप से गणित एवं विज्ञान पढाया जाता है। इस स्थिति में गणित एवं विज्ञान के अध्यापन के कारण 'ब' देश के छात्र रोजगार के लिए निर्माण उद्योग की और रूख करेंगे और धनार्जन के लिए इसी क्रम में वे नयी तकनीको का आविष्कार कर लेंगे। वे साईकिल में इंजन लगाकर मोटर साइकिल बना देंगे , फिर कारो के इंजन बनाने लगेंगे और जल्दी ही ट्रेन एवं ट्रक के इंजन बनाने लगेंगे और अंत में वे टैंक का इंजन बना लेंगे।

चूंकि देश 'अ' के नागरिक इंजीनियरिंग में इतने कुशल नहीं है अत: वे तकनीक के क्षेत्र में पिछड़े हुए रहेंगे। जब 'ब' देश के पास के पास बेहतर टेंक बनाने की क्षमता आ जायेगी तो वे बड़े पैमाने पर इनका निर्माण करेंगे और देश 'अ' पर हमला करके उसे लूट लेंगे। देश 'अ' के नागरिको को अपनी सम्पत्ति गवांनी पड़ेगी और उन पर 'ब' देश का शासन स्थापित हो जाएगा। मानव सभ्यता का पूरा इतिहास युद्धों का इतिहास है। जिन देशो ने बेहतर हथियार बनाये उन्होंने सम्पन्न किन्तु तकनिकी रूप से पिछड़े हुए देशो पर कब्ज़ा कर लिया। इसीलिए एक बेहतर शिक्षा व्यवस्था उसी को कहा जा सकता है जो अमुक देश की सैन्य शक्ति को मजबूत बनाए।
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बाजार में टिके रहने की काबिलियत जुटाने से क्या आशय है ?
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शिक्षा रोजगारोन्मुख होनी चाहिए। इतिहास, भूगोल, साहित्य, कला, संगीत, राजनीति विज्ञान, लोक प्रशासन, दर्शन शास्त्र आदि विषय बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन नहीं करते। दरअसल इन विषयों में कोई उत्पादकता ही नहीं है। इनका अध्ययन देश के लिए अनुत्पादक है। जबकि विज्ञान, गणित तथा तकनिकी हुनर से सम्बंधित विषय निर्माण इकाइयों को बढ़ावा देते है तथा इससे बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन होता है। होलसेल, ट्रेडिंग, रिटेलिंग, सेवा आदि व्यवसाय निर्माण इकाइयों पर ही निर्भर करते है। यदि किसी देश में तकीनीकी शिक्षा प्राप्त मानव संसाधन ज्यादा होगा तो अमुक देश में बड़े पैमाने पर निर्माण इकाइयों की स्थापना होगी। इस तरह से विज्ञान-गणित एवं तकनीकी शिक्षा बड़े पैमाने पर रोजगार जुटाती है। आधुनिक तकनिकी उत्पादन बढने से निर्माता की बिक्री बढकर उसे मुनाफा में रुपया प्राप्त होता है। उत्पादकता बढ़ने से निर्यात बढ़ता है, जिससे दूर दराज का पैसा भी देश अपनी और खींचने लगता है , एवं इससे पूरे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। इस तरह नागरीय जीवन समृद्ध हो जाता है।
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अकादमिक शिक्षा व्यवस्था के अंग :
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1. शिक्षण स्थल एवं कक्षा कक्ष
2. परीक्षा
3. अध्यापन विधियाँ
4. अध्यापको का प्रशिक्षण
5. पाठ्यक्रम
6. प्रायोगिक शिक्षा
7. नैतिक शिक्षा
8. भाषा
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1. शिक्षण स्थल एवं कक्षा कक्ष - शिक्षक द्वारा छात्रों को सामूहिक शिक्षा घर पर भी दी जा सकती है, किसी अन्य शिक्षा केंद्र जैसे विद्यालय आदि पर भी दी जा सकती है। छात्र नियमित रूप से पढने विद्यालय भी जा सकते है और उनके आवास की व्यवस्था विद्यालय में भी की जा सकती है। शिक्षा स्थल वातानुकूलित भी हो सकते है और टिन टप्पर के भी। शिक्षण स्थल एक अप्रभावी अंग है। अत: यह शिक्षा की गुणवत्ता को अधिक प्रभावित नहीं करता।

शिक्षण स्थल पर अनुचित कोलाहल न हो, वातावरण शांत तथा अध्ययन के लिए अनुकूल हो, इतना काफी है। काल में परिवर्तन एवं विकास के साथ साथ शिक्षण स्थल में बदलाव आते रहेंगे। शिक्षा स्थलो का ढांचा किसी शिक्षा व्यवस्था के बेहतर या कमतर होने के निर्धारण का प्रभावी अंग नहीं है। अत: शिक्षा केंद्र के आधार के पर यह तय नहीं किया जा सकता कि अमुक तरीके का शिक्षा स्थल गुरुकुल एवं अमुक शिक्षा स्थल मेकाले व्यवस्था का द्योतक है। हालांकि सामूहिक शिक्षण समय एवं संसाधनों की बचत करता है तथा छात्रों के बीच आपसी संवाद उनकी समझ को बढ़ाता है। अत: सामूहिक शिक्षा ज्यादा बेहतर विकल्प है। एकाकी शिक्ष्ण छात्र के समुचित विकास एवं संवाद कुशलताओ को बाधित कर सकता है।
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2. परीक्षा एवं अंक : छात्र पाठ्यक्रम रट कर अच्छे अंक ला सकते है, अत परीक्षाओ का ढांचा इस तरह का होना चाहिए कि रटने वाले छात्रों की अपेक्षा वे छात्र अधिक अंक हासिल कर पाए जिनमे वास्तविक बोध विकसित हुआ है। परीक्षाएं छात्रों को सतर्क रखती है तथा मोटे तौर पर यह अंदाजा दे सकती है कि छात्र कैसा प्रदर्शन कर रहा है किन्तु असल परीक्षा बाजार लेता है। अत: अंततोगत्वा अकादमिक परीक्षाओ में लाये गए अंको का एक सीमा के बाद कोई महत्त्व नहीं है।

मैकाले व्यवस्था तथा आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में परीक्षांए छात्रों के बोध का सही आकलन नहीं कराती। ग्रेड सिस्टम एवं अंक प्रणाली का वर्चस्व होने के कारण छात्र / शिक्षक / अभिभावक अच्छे अंक लाने को ही एक मात्र उद्देश्य समझते है। सरकारी नौकरियों एवं विभिन्न निजी क्षेत्रो में नौकरी पाने की प्रतिस्पर्धा बढ़ने से अब छात्र बढ़त लेने के लिए कोचिंग संस्थानों का रूख करने लगे है। इस तैयारी के कारण छात्रों के पाठ्यक्रम एवं समझ का दायरा काफी विस्तृत हो जाता है। किन्तु उद्देश्य फिर भी वास्तविक कौशल विकसित करना न होकर परीक्षा पास करना ही होता है।
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3. अध्यापन विधियाँ - अध्यापन विधी ऐसी होनी चाहिए जिससे छात्रों को जो शिक्षा दी जा रही है वह पुस्तको में न रह जाए। गुरुकुल व्यवस्था में स्मरण करना अध्यापन का प्रधान अंग था। रोज का पाठ रोज स्मरण करके दोहराया जाता था, जिससे पढ़ाये जाने वाला पाठ याद रहता था। मैकाले व्यवस्था ने शिक्षा को पुस्तकों में पहुंचा दिया। अर्ध वार्षिक एवं वार्षिक परीक्षा होने से छात्र परीक्षा के दिनों में अध्ययन करते है तथा शेष सत्र में पढ़ाई पर ध्यान नहीं देते। उल्लेखनीय है कि कुछ 25 वर्ष पहले तक एक वर्ष में चार परीक्षाएं ली जाती थी -- प्रत्येक दो महीने एक कक्षा टेस्ट होता था, छह महीने में एक अर्द्ध वार्षिक परीक्षा होती थी तथा साल के अंत में वार्षिक परीक्षा होती थी। कक्षा टेस्ट तथा वार्षिक परीक्षा में प्राप्त अंको के 40% अंक वार्षिक परीक्षाओ में जुड़ते थे। किन्तु सत्र के दौरान ली जाने वाली ये परीक्षाएं ज्यादातर स्कूलों में समाप्त कर दी गयी तथा वर्तमान व्यवस्था में साल के अंत में सिर्फ एक परीक्षा होती है तथा इसी परीक्षा के आधार पर परिणाम तय होता है। जो कि एक अकुशल व्यवस्था है।
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4. अध्यापको का प्रशिक्षण एवं चयन - यह तीसरा सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है, जो शिक्षा को प्रभावित करता है। शिक्षक जितने बेहतर होंगे शिक्षण भी उतना ही बेहतर होगा। एक अच्छा शिक्षक वह है जिसका विषय पर पूर्ण अधिकार हो तथा साथ ही उसमे "शिक्षण तत्व" भी हो। समझाने का कौशल एवं रुचि शिक्षण तत्व कहलाता है। कई व्यक्तियों में यह बेहद उच्च स्तर का होता है जबकि कई में निम्न। यदि किसी व्यक्ति के पास विषय की ढेर सारी जानकारी है किन्तु उसमे पढ़ाने या सिखाने का कौशल या रूचि नहीं है तो ऐसा व्यक्ति अच्छे से शिक्षा नहीं दे पायेगा। अत: अकादमिक स्तर पर शिक्षण तत्व विहीन विद्वान् शिक्षक अनुपयोगी है।
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वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक को स्थायी वेतन दिया जाता है, किन्तु अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद उसे बोनस नहीं मिलता। इस वजह से जिन प्रतिभाशाली व्यक्तियों में शिक्षण तत्व होता है वे शिक्षा के पेशे की और आकर्षित नहीं होते और जो इस पेशे में आते वे भी जब देखते है कि ज्यादा मेहनत करने के बावजूद परितोष में कोई अतिरिक्त वृद्धि नहीं होगी तो कुछ ही समय में वे हतोत्साहित हो जाते है।

मैकाले व्यवस्था में भी शिक्षक वैतनिक होते थे तथा शिक्षण तत्व को आकर्षित करने की कोई नीति नहीं थी। गुरुकुल व्यवस्था में शिक्षक वैतनिक भी होते थे, अवैतनिक भी होते थे और स्वैच्छिक भी होते थे। किन्तु गुरुकुल व्यवस्था में भी शिक्षण तत्व को आकर्षित करने और उन्हें अतिरिक्त परितोष देने की व्यवस्था नहीं थी।
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आज कोचिंग सेंटर्स में जो अध्यापक शिक्षण देते है उन्हें प्रदर्शन के आधार पर अधिक भुगतान मिलता है। यही वजह है कि यदि आपको अच्छे शिक्षको की तलाश है तो आपको कोचिंग सेंटर्स की और रूख करना पड़ेगा। लेकिन कोचिंग सेंटर्स में शिक्षा लेने के लिए छात्रों को ऊँचे दाम चुकाने होते है। वंचित तबके के लोग यह भुगतान नहीं कर पाते और अच्छे शिक्षको से शिक्षा पाने से वंचित हो जाते है। उदाहरण के लिए पीएमटी ( डॉक्टर के लिए ली जाने वाली प्रवेश परीक्षा ) एवं आई आई टी में कक्षा 12 तक के पाठ्यक्रम में से प्रश्न पूछे जाते है। किन्तु जिन भी छात्रों को ये परीक्षाएं देनी होती है उनमे से अधिकांश छात्र 12 वी कक्षा पास करके कोचिंग सेंटर्स का रूख करते है, ताकि वे इन परीक्षाओ की अच्छी तैयारी कर सके। इस तरह आज कोचिंग सेंटर बड़ा व्यापार बन चुका है। और इसका एक मात्र कारण यह है कि स्कूलों के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि वे सर्वश्रेष्ठ शिक्षको को आकर्षित कर सके।
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इस तरह से शिक्षक तत्व एवं शिक्षको को प्रेरणा देने वाली प्रणाली शिक्षा व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण अंग है , किन्तु गुरुकुल व्यवस्था, वर्तमान व्यवस्था एवं मेकाले व्यवस्था में इस तरह के कोई प्रावधान नहीं थे जो श्रेष्ठ शिक्षको को आकर्षित कर सके। अत: इस श्रेणी में तीनो ही व्यवस्थाएं दोष पूर्ण है। इसी लेख में आगे वह प्रक्रिया सुझाई गयी है, जिससे हम अकादमिक शिक्षा में शिक्षक तत्व को आकर्षित कर सके।
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5. पाठ्यक्रम : पाठ्यक्रम या सिलेबस शिक्षा व्यवस्था का दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है। यदि किसी देश की शिक्षा व्यवस्था में गणित-विज्ञान प्रधान रूप से पढ़ाई जाती है तो अमुक देश तकनीक के क्षेत्र में तेजी से विकास करेगा और युद्ध एवं बाजार की प्रतिस्पर्धा में टिका रहेगा। तकनीकी कौशल और गणित-विज्ञान किस तरह से देश को अर्थव्यवस्था एवं सैन्य शक्ति को मजबूत बनाते है, इसका विवरण ऊपर "शिक्षा का उद्देश्य" शीर्षक के अंतर्गत दिया गया है।
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6. प्रायोगिक शिक्षा : यह किसी भी शिक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। क्योंकि जबानी शिक्षाएं या ज्ञान यदि व्यवहार में नहीं लाया जाए तो इसके कोई मायने नहीं होते। किन्तु व्यवहार में लाने के लिए इसका प्रयोग बाजार में किया जाना चाहिए न कि प्रयोग शाला में। व्यवहार में लाने के लिए बाजार में कौशल विकास एवं प्रयोग के अवसर होने चाहिए। यदि देश की प्रशासनिक एवं न्याय व्यवस्था अच्छी होगी तो बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होगी और कारीगरों / तकनीशियनों / इंजीनियरों को काम करने के समान अवसर मिलेंगे। उदाहरण के लिए, ज्यूरी सिस्टम किसी देश के औद्योगिकीय एवं तकनीकी विकास को सुरक्षा एवं गति देता है, जबकि जज सिस्टम निर्माण इकाइयों के समान अवसरों को समाप्त कर देता है। तो ज्यूरी सिस्टम होने के कारण ग्रीस के कारीगरों ने निर्माण के क्षेत्र में तेजी से विकास किया और वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ हथियारों का निर्माण कर पाए। इसी तरह से जब ब्रिटेन में ज्यूरी सिस्टम आया तो वहां औद्योगिक क्रांति हुयी। आज अमेरिका तकनीक के क्षेत्र में सबसे आगे है तो इसका कारण मजबूत ज्यूरी सिस्टम है। भारत में जज सिस्टम होने के कारण प्रशासन ने निर्माण इकाइयों एवं तकनीशियनों को प्रोत्साहित नहीं किया और हम आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में पिछड़े रहे तथा आज भी पिछड़े हुए है।
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सार यह है कि, किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू ऐसा प्रशासन है जो निर्माण इकाइयों एवं कारीगरों / तकनीशियनों / इंजीनियरों को सुरक्षा एवं प्रोत्साहन देता है, ताकि किताबो में पढाई गयी शिक्षा को व्यवहार में लाया जा सके। दूसरा महत्त्वपूर्ण अंग विज्ञान-गणित का पाठ्यक्रम है जो कि कारीगरों / तकनीशियनों / इंजीनियरों का आधार तैयार करता है। तथा तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग ऐसे शिक्षको को आकर्षित करने की व्यवस्था है जिनमे शिक्षक तत्व हो।
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7. नैतिक शिक्षा : व्यक्ति नैतिक शिक्षा वास्तविक परिस्थितियों से ग्रहण करता है, पुस्तकों से नहीं। मान लीजिये पाठ्यपुस्तकों में बच्चो को पढ़ाया जाता है कि, सफलता प्राप्त करने के लिए ईमानदारी से परिश्रम करना आवश्यक है , एवं बेईमानी करने या क़ानून का पालन न करने का परिणाम बुरा होता है। किन्तु जब बच्चे अपने आस पास देखते है कि भ्रष्ट आचरण करने वाले एवं क़ानून तोड़ कर किसी भी तरह की तिकड़म से पैसा बनाने वाले आलिशान जीवन जी रहे है जबकि ईमानदारी से मेहनत करने वाले तिकड़मों के अभाव में पिछड़ गए है तो वह यही शिक्षा ग्रहण करेगा कि यदि उसे सफल होना है तो येन केन प्रकारेण तिकड़म लगाना आवश्यक है। और जब बच्चे देखते है कि क़ानून तोड़ने वाले व्यक्ति पुलिस-जज आदि को घूस देकर आसानी से छूट जाते है तो आप उन्हें किसी भी तरह यह नहीं समझा सकते कि क़ानून का पालन न करने पर उसे बुरे परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
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कुल मिलाकर यदि हमें बच्चो को नैतिक शिक्षा देनी है तो पहले हमें अपने देश के पुलिस प्रशासन एवं अदालतों को सुधारना होगा। इन सुधारो के अभाव में पाठ्य पुस्तको में शामिल नैतिक शिक्षा व्यवहारिक जगत से सामना होते ही तिरोहित हो जायेगी। शिक्षा तब असर करती है जब उसके लिए हमारे पास व्यवहारिक नजीर हो। फिलहाल हमारे पास उल्टी नजीर है। अत: पाठयपुस्तको में शामिल नैतिक शिक्षा बच्चो पर कोई असर नहीं डालेगी।
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8. भाषा : भाषा गौण विषय है। जिस देश में जो भाषा प्रचलित हो शिक्षा उस भाषा में दी जा सकती है , या अभिभावक जिस भाषा में बच्चो को शिक्षा देना चाहे वे उस भाषा में शिक्षण करवा सकते है। किन्तु जिस भाषा में शिक्षण दिया जा रहा है , यह आवश्यक है कि अमुक भाषा में उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त पुस्तकें उपलब्ध हो। उदाहरण के लिए यदि आप बच्चो को विज्ञान-गणित एवं कंप्यूटर की शिक्षा देना चाहते है तो संस्कृत भाषा का चुनाव नहीं किया जा सकता। तब आपको मूल पुस्तकों के अनुवाद उपलब्ध कराने होंगे। जो कि अपने आप में एक दुष्कर कार्य है।
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भारत में शिक्षा सुधार के लिए हमने जो शिक्षा प्रणाली प्रस्तावित की है उसकी रूपरेखा नीचे दी गयी है।
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१) सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए प्रक्रिया :
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जिले के सरकारी स्कूल शिक्षा अधिकारी के नियंत्रण में काम करते है। हमने प्रस्ताव किया है कि जिला शिक्षा अधिकारी को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार जिले के स्थानीय अभिभावकों को दिया जाए। राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी क़ानून का सीधा प्रभाव यह होगा कि शिक्षा अधिकारी सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए कार्य करेगा या अपनी नौकरी गवांयेगा। शिक्षा अधिकारी को चुनने एवं निष्कासित करने की प्रक्रिया का विस्तृत ड्राफ्ट इस लिंक पर देखा जा सकता है -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/821128631398666>;
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कैसे राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी कानून शिक्षा में सुधार ले आएगा ?

भारत में लगभग 700 जिला शिक्षा अधिकारी हैं । सभी बुद्धिमान, काबिल तथा कार्यकुशल है। और उनमें से, मान लीजिए, 10-15 ऐसे होंगे जो भ्रष्टाचार में रूचि नहीं रखते। इस राइट टू रिकॉल -जिला शिक्षा अधिकारी प्रक्रिया में एक धारा यह कहती है कि यदि कोई अधिकारी मुख्यमंत्री द्वारा शिक्षा अधिकारी नियुक्त होता है तो वह केवल एक ही जिले का शिक्षा अधिकारी हो सकता है। लेकिन यदि नागरिकों ने उसे शिक्षा अधिकारी बनाया है तो वह राज्य में 5 जिलों और पूरे भारत में 10 जिलों का भी जिला शिक्षा अधिकारी बन सकता है और वह इन सभी जिलों का वेतन प्राप्त करेगा। अर्थात यदि कोई व्यक्ति 4 जिलों का जिला शिक्षा अधिकारी है और उसे नागरिकों ने नियुक्त किया है तो उसका वेतन 4 गुना होगा। यह ज्यादा सस्ता है क्योंकि वेतन ही चार गुना बढ़ेगा, चिकित्सा लाभ और कई आजीवन मिलने वाले लाभ 4 गुना नहीं बढ़ेंगे।
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इसलिए वर्तमान 700 जिला शिक्षा अधिकारियों में से, मान लीजिए, 5-15 भ्रष्ट नहीं है । यदि एक बार रॉइट टू रिकॉल लागू हो जाता है तो उन्हें सीधी तरक्की और पदोन्नति का अवसर मिल जायेगा। वे अपने जिले के स्कूलों में अच्छे बदलाव लेकर आएँगे , एवं बीच के अधिकारियों को घूस लेने से रोकेंगे । इस बात का ध्यान रखेंगे कि ठेकेदार सही वस्तुएँ जैसे ब्लैकबोर्ड , कुर्सियां आदि स्कूलों को देते हैं। वे ध्यान रखेंगे कि शिक्षक स्कूल में हाजिर रहें, आदि। अब मान लीजिए, इन सभी मामलों में मुख्यमंत्री इन अधिकारियों का तबादला कर देते है । तब लगभग 7-15 ऐसे मामलों में से, कम से कम 2-3 मामलों में तो माता-पिता अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए जिला शिक्षा अधिकारी कानून का उपयोग करके उस तबादला किए गए अधिकारी को वापस ले आएंगे।
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इस तरह, भारत के 700 जिलों में से 2-5 जिलों में शिक्षा सुधार आएगा। तो शेष जिलों का क्या होगा ? मान लीजिए आप 'A' जिले में रहते है, तथा 'A' जिले का जिला शिक्षा अधिकारी भ्रष्ट और नाकाबिल है। मान लीजिए, पास में ही पांच अन्य जिले B, C, D, D और E है। मान लीजिए, केवल E जिले में ही अच्छा जिला शिक्षा अधिकारी है। तो जिला A के नागरिकों के पास विकल्प होगा कि वे अपने जिले के जिला शिक्षा अधिकारी को हटा सकते है और E जिले के जिला शिक्षा अधिकारी को डबल पोस्ट/दोहरा कार्यभार दे सकते है । इसी विकल्प और अधिकार के कारण कि “अब नागरिक राईट टू रिकॉल - जिला शिक्षा अधिकारी का उपयोग करके मुझे हटा सकते हैं और मेरे पद पर E जिले के जिला शिक्षा अधिकारी को ला सकते हैं”, अन्य जिलो के जिला शिक्षा अधिकारीयों के मन में भय पैदा होगा। इसलिए या तो वे 2-3 महीनों में ही सुधर जाएंगे या तो नागरिक उन्हें राइट टू रिकॉल-जिला शिक्षा अधिकारी का प्रयोग करके हटा देंगे। इस तरह इस कानून के गैजेट में प्रकाशित होने के 8-10 महीनों में ही सभी 700 जिला शिक्षा अधिकारी या तो सुधर जाएंगे या बदल दिए जाएंगे।
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10-20 महीनों के अंदर ही ,“जल्दी अमीर बनने” और “भाड़ में जाए जनता” की मानसिकता वाले अधिकारी प्रशासन से हटना शुरू होंगे और दुबारा इन प्रशासनिक पदों पर नहीं आ पाएंगे। इससे वास्तव में सेवा करने की इच्छा वाले लोगों को आने का ज्यादा मौका मिलेगा और भ्रष्टाचारी लोग ईमानदार लोगो के काम में कम बाधा डाल सकेंगे | वर्तमान सरकारी सिस्टम में एक कमी यह है कि यदि कोई ईमानदार व्यक्ति दो लोगों का काम करता है तो भी उसे दो व्यक्ति के बराबर वेतन नहीं मिलता, जबकि व्यापार में ऐसा होना आम बात है । ये बातें ईमानदार लोगों को सरकारी नौकरी में आने से हतोत्साहित करती हैं। पर इस प्रस्तावित राइट टू रिकॉल प्रक्रिया में, अधिकारीयों को एक से अधिक पद मिल सकता है तथा उसके अनुसार वे अधिक वेतन पा सकते है। इससे शासन में ईमानदार और समर्पित व्यक्तियों को आने का ज्यादा मौका मिलेगा।
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राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का क़ानून आने से शिक्षा अधिकारी अपने जिलो में बेहतर पाठ्यक्रम शामिल करेंगे , योग्य शिक्षको की नियुक्ति करेंगे , शिक्षको के काम का निरंतर मूल्यांकन करेंगे एवं निष्पक्ष ढंग से परीक्षाओं का संचालन सुनिश्चित करेंगे। यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो जिले के अभिभावक बहुमत का प्रदर्शन करके उन्हें नौकरी से निकाल सकेंगे। यदि किसी जिले के अभिभावक किसी विषय को पाठ्यक्रम में शामिल करवाना चाहते है या हटाना चाहते है तो वे बहुमत का प्रदर्शन करके शिक्षा अधिकारी को ऐसा करने के लिए निर्देश दे सकते है। प्रस्तावित राईट टू रिकॉल क़ानून में शिक्षा अधिकारी को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार सिर्फ अभिभावकों को होगा, आम मतदाताओ को नहीं। अत: इस हेतु जिला स्तर पर अभिभावकों की अलग से मतदाता सूचियाँ तैयार की जायेगी।
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२) गणित-विज्ञान का स्तर सुधारने के लिए "सात्य प्रणाली" की रूपरेखा
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गणित-विज्ञान एक जटिल विषय है, तथा यह बेहद महत्त्वपूर्ण भी है। इसके स्तर में विशेष रूप से सुधार लाने के लिए हमने सात्य प्रणाली प्रस्तावित की है। सात्य प्रणाली राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का क़ानून आने के बाद ही लागू की जा सकेगी। इसकी प्रकिया निम्न तरीके से होगी :
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a) कोई भी व्यक्ति शिक्षा अधिकारी कार्यालय में जाकर 200 रू जमा करके खुद को शिक्षक के रूप में पंजीकृत करवा सकेगा। शिक्षा अधिकारी उसका आवेदन स्वीकार करके एक रजिस्ट्रेशन नंबर जारी करेगा।
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b) कोई भी छात्र शिक्षा अधिकारी कार्यालय में जाकर खुद को एक छात्र के रूप में पंजीकृत करवा सकेगा।
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c) शिक्षक छात्रों को आकर्षित करेगा एवं उन्हें स्वतन्त्र रूप से पढ़ायेगा।
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d) पढ़ाने की जगह , ब्लेक बोर्ड, फर्नीचर आदि की व्यवस्था शिक्षक को स्वयं करनी होगी।
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e) यदि छात्र को पाठ समझ नहीं आ रहा है तो छात्र अपना शिक्षक किसी भी समय बदल सकता है।
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f) शिक्षा अधिकारी शिक्षको को कोई भी वेतन नहीं देगा। यदि अभिभावक चाहे तो शिक्षक को कुछ शुल्क दे सकते है।
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g) शिक्षा अधिकारी मासिक , त्रेमासिक , अर्ध वार्षिक एवं वार्षिक परीक्षाएं आयोजित करवाएगा। सभी प्रश्न बहु वैकल्पिक प्रकार के होंगे।
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h) शिक्षा अधिकारी प्रश्नमाला पहले से प्रकाशित करेगा। प्रश्नमाला में 10,000 से 25,000 तक प्रश्न हो सकते है।
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i) शिक्षा अधिकारी जिले के परीक्षा परिणाम के आधार पर ग्रेडिंग करेगा तथा प्रदर्शन के आधार पर शिक्षको को पुरूस्कार देगा। जितना पुरूस्कार शिक्षक को मिलेगा, उतना ही पुरूस्कार उन छात्रों को भी दिया जाएगा जिन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया है।

स्पष्टीकरण -- मान लीजिये कोई शिक्षक 30 छात्रों को पढाता है। इनमे से 3 छात्र "अ ,ब एवं स' वरीयता सूची में स्थान पाते है , एवं 1 छात्र 'द' जिले में 100 वीं रेंक हासिल करता है। यदि वरीयता सूची के लिए शिक्षा अधिकारी 10,000 रूपये एवं 100 वी रेंक के लिए 2000 रूपये पारितोषिक तय करता है तो शिक्षक 10,000*3 = 30,000 + 2000 =32,000 रूपये प्राप्त करेगा। साथ ही शिक्षा अधिकारी इन छात्रों को भी क्रमश: 10,000 एवं 2,000 रूपये का पुरूस्कार देंगे।
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j) गणित-विज्ञान के अतिरिक्त इतिहास, सामाजिक विज्ञान , भूगोल आदि विषयों से ग्रेड का निर्धारण नहीं होगा, एवं इन विषयों में छात्र को सिर्फ पास होना होगा।
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तो हमारे द्वारा प्रस्तावित व्यवस्था शिक्षा प्रणाली के मूलभूत बिन्दुओ को इस तरह प्रभावित करती है --
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1. शिक्षण स्थल एवं कक्षा कक्ष -- इस पर हमने कम भार दिया है। मौजूदा व्यवस्था की तरह ही शिक्षण स्थलों एवं कक्षा कक्ष में शिक्षण दिया जाएगा।
2. परीक्षा -- गणित-विज्ञान की परीक्षाएं मासिक , त्रेमासिक , अर्ध वार्षिक एवं वार्षिक होगी। परीक्षाएं खुली एवं कम्प्युटरीकृत होगी।
3. अध्यापन विधियाँ - सात्य प्रणाली के तहत। इस पर हमने विशेष रूप से भार दिया है।
4. अध्यापको का प्रशिक्षण - स्वतंत्र एवं प्रतिस्पर्धी। शिक्षको को अच्छा प्रदर्शन करने पर आर्थिक पारितोषिक एवं सम्मान।
5. पाठ्यक्रम - विशेष रूप से गणित-विज्ञान को शामिल किया जाएगा। अभिभावकों की सहमती से शिक्षा अधिकारी तय करेगा।
6. प्रायोगिक शिक्षा - गणित-विज्ञान के लिए शिक्षा अधिकारी प्रयोगशालाएं स्थापित करेगा।
7. नैतिक शिक्षा - न्यूनतम भार
8. भाषा -- पाठ्यक्रम द्विभाषी होगा। अभिभावक यह तय करेंगे कि किस भाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए।
9 . प्रशासन - जिला शिक्षा अधिकारी को चुनने एवं बदलने का अधिकार अभिभावकों के पास होगा।
10. लागत -- सरकारी स्कूलों को बेहतर करने पर विशेष भार दिया गया है।
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इस व्यवस्था के आने से अंतिम परिणाम यह होगा कि सरकारी स्कूलो की दशा बेहतर हो जाएगी एवं उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा छात्रों को मुफ्त मिलेगी। साथ ही छात्रों एवं शिक्षको को अच्छा प्रदर्शन करने पर पारितोषिक भी मिलेगा। यह शिक्षा प्रणाली भारत में गणित-विज्ञान के स्तर को इतना बेहतर बना देगी कि हमें निर्माण इकाइयों के लिए पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध हो जाएगा। अगला चरण वेल्थ टेक्स एवं जूरी सिस्टम लाना होगा। यदि तब हम भारत में जूरी सिस्टम एवं वेल्थ टेक्स लाने में सफल हो जाते है , तो कुछ ही वर्षो में हम प्रोद्योगिकीय विकास में आत्मनिर्भर होकर "मेड इन इण्डिया , मेड बाय इन्डियन" हथियारों का उत्पादन करने में सक्षम हो जायेंगे।
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यदि आप राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी एवं सात्य प्रणाली का समर्थन करते है तो कृपया पीएम के ट्विटर हेंडल पर यह ट्विट करें --

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@pmoindia , I insturct you to print law mentioned in <https://newindia.in/causes/rtr-deo/>; , sha1 - 11a286e10a7341dbfc3b4fb4c0d8843fb3af286f , #RtrDeo
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Apr 07 2018 20:19:12 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

पूरा पैसा देने बावजूद भ्रष्ट जजों ने सलमान खान को बरी क्यों नहीं किया है ?
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सलमान खान के अति निकटस्थ लोगो का आरोप है कि -- हमारे देश में जज सबसे ज्यादा भ्रष्ट एवं एहसान फरामोश है। जजों एवं नेताओं ने सलमान की जिन्दगी बर्बाद कर दी है। सलमान पिछले 20 सालो से दिन रात फिल्मो में अथक परिश्रम करके भ्रष्ट नेताओं एवं जजों को लगातार हफ्ता चुका रहे है। कभी किसी के साथ पतंग उड़ाते है एवं कभी उनके निजी आयोजनों में जाकर ठुमके लगाते है। बावजूद इसके उन्हें साफ बरी नहीं किया जा रहा है।
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इतना पैसा खाने के बाद भी भ्रष्ट जजों ने सलमान की एक टांग फिर से अदालत में बाँध कर रख ली है। सलमान ने उन्हें मुकदमे से बरी होने के पूरे पैसे चुकाए थे , किन्तु भ्रष्ट जजों ने उन्हें दोषी करार दे दिया। मतलब वे रिहा तो हुए , किन्तु बा इज्जत बरी नहीं हो पाए।
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बेईमानो के भी कुछ उसूल होते है। लेकिन जजों के कोई उसूल नहीं। हमारे जज भ्रष्टाचार के धंधे में भी इतने बेईमान क्यों है ? वे पैसा लेकर भी किसी व्यक्ति को साफ़ तौर पर निर्दोष करार क्यों नहीं देते ? उनके गले में फंदा डाल कर क्यों रखते है ?
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 08 2018 17:59:27 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

कैसे मोदी साहेब और संघ के स्वयंसेवक निजी स्कूलों की फ़ीस तय करने के नाम पर उनसे घूस वसूल रहे है !!
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मोदी साहेब ने जो क़ानून लागू किया है उसके अनुसार यदि कोई स्कूल सालाना 18,000 रू से ज्यादा फ़ीस लेना चाहता है तो स्कूल को इसके लिए संघ के कार्यकर्ताओ की कमेटी से अनुमति लेनी पड़ेगी !!!
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किसी स्कूल ने कक्षा 1 के लिए 1,15,000 रू सालाना फ़ीस की अनुमति मांगी थी , कमेटी ने उन्हें 1,15,000 रू वसूलने की अनुमति तो नहीं दी , लेकिन वे 85,000 रू सालाना की अनुमति लेने में सफल रहे !!! इसी तरह से कई स्कूलों को 20,000 से 50,000 रू की अनुमति दी गयी।
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फ़ीस तय करने का पूरा अधिकार संघ के कार्यकर्ताओ के पास है। इस कमेटी की नियुक्ति मोदी साहेब द्वारा ही की जाती है !!
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तो आप खुद अंदाजा लगा सकते है कि , मोदी साहेब एवं संघ के स्वयं सेवक स्कूलों की फ़ीस तय करने के मामले में कितना पैसा बना रहे है।
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फिलहाल यह कानून गुजरात में ही लागू किया गया है। लेकिन जल्दी ही योगी जी भी इस तरह का क़ानून लाने को उतावले है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 08 2018 18:22:28 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

हमें भारतीय संविधान में से अल्पसंख्यक शब्द निकाल देना चाहिए।
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यदि संविधान में संशोधन किये बिना इस समस्या को हल करना हो तो प्रधानमंत्री अल्पसंख्यक आयोग के बजट में 90% एवं आयोग के स्टाफ में 95% की कटौती करें। इससे अल्पसंख्यक आयोग जमा हो जाएगा , और निर्जीव होकर एक तरफ पड़ा रहेगा। संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि अल्पसंख्यक आयोग को इतना उतना बजट देना होगा , और इसमें इतना स्टाफ रखना होगा। इस तरह मोदी साहेब बिना संविधान में संशोधन किये भारत में "माइनोरिटी स्टेटस" का यह सर्कस ख़त्म कर सकते है।
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माइनोरिटी स्टेटस पाने के लिए किसी समुदाय को अलग से वर्ग बनाना होता है। तो इसी वजह से 2014 में जैन हिन्दू धर्म से अलग हो गये, एवं अब लिंगायत समुदाय ने भी भी खुद को हिन्दूओ से अलग कर लिया है। कर्नाटक सरकार ने लिंगायत को हिन्दू धर्म से अलग करने के लिए क़ानून पास कर दिया है।
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माइनोरिटी स्टेटस मिलने से पहला फायदा यह है कि, अमुक वर्ग को अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिलने लगते है , एवं अमुक समुदाय को सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि, उनके स्कूल एवं धर्म स्थल सरकारी पकड़ से बाहर हो जाते है। सरकार जिस गति से हिंदू मंदिरो को टेक ओवर करके हजम कर रही है , जिस तरह से निजी स्कूलो से हफ्ता वसूल रही है , उसे देखते हुए यह इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि जल्दी ही हम कई अन्य समुदायों को भी माइनोरिटी स्टेटस की मांग के लिए सड़को पर उतरते देखेंगे। सरकारें अपने वोट बढ़ाने के लिए इन्हे माइनोरिटी स्टेटस देती चली जायेगी।
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ज्ञातव्य है कि , RTE एक्ट अल्पसंख्यको के स्कूलों पर लागू नहीं होता , एवं सरकार सिर्फ हिन्दू मंदिरो को ही टेक ओवर कर सकती है, माइनोरिटी स्टेटस प्राप्त समुदाय के धर्म स्थलों को नहीं।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 08 2018 18:45:50 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सलमान खान की जमानत -- संघ के मंत्रियो एवं स्वयंसेवको ने इस मामले में कितनी घूस खायी होगी ?
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कांग्रेस के जमाने में यह खुली हुयी बात थी कि जो भी घूस इकट्ठी की जाती थी उसमे से लगभग 35% हिस्सा मुख्यमंत्री एवं अन्य शीर्ष मंत्रियो को जाता था। लेकिन 1 जनवरी 2014 से हालात बदल गए। अब मंत्रियो को भेजे जानी वाली यह राशि 50% हो गयी है। क्योंकि मंत्रियो को इसमें से 15% हिस्सा संघ के स्वयसेवको को देना होता है। 2013 तक पार्टी के छोटे कार्यकर्ताओ को इकट्ठी की गयी घूस में से कुछ भी नहीं मिलता था। लेकिन सोशल मीडिया ने आज कार्यकर्ताओ की ताकत इतनी बढ़ा दी है कि वे किसी पार्टी को टक्कर देने वाला राजनैतिक विकल्प खड़ा कर सकते है , एवं उनकी इसी क्षमता की वजह से आज मन्त्री जो पैसा इकट्ठा करते है उसमे से एक हिस्सा छोटे छोटे कार्यकर्ताओ को भी देना पड़ता है। और यह हिस्सा प्रत्येक कार्यकर्ता प्राप्त करता है।
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उदाहरण के लिए आज संघ के स्वयंसेवक चाहे तो सोशल मीडिया के माधयम से मोदी साहेब को टक्कर देने वाला एक राजनैतिक विकल्प खड़ा कर सकते है , लेकिन 2013 से पहले ऐसा करना संभव नहीं था। तो आज मोदी साहेब जितनी भी घूस इकट्ठी करते है, उसमे से एक हिस्सा उन्हें 40 लाख स्वयंसेवको को भी देना होता है।
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यह सच्चाई है। कांग्रेस के दिनों में भी यह सच था, और बीजेपी के दौर में भी यही परम्परा बनी हुयी है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब कांग्रेस की जगह घूस में हिस्सा लेने वाले संघ के मंत्री एवं स्वंयसेवक है। क्योंकि राजस्थान सरकार इस समय संघ के नेताओ के नियंत्रण में है। तो पब्लिक प्रोसिक्यूटर द्वारा लिये गए पैसे में से एक बड़ा हिस्सा संघ के नेताओ एवं स्वयंसेवको की जेब में गया है। जज एवं पुलिस अधिकारियो द्वारा वसूली गयी घूस अलग से है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 08 2018 19:23:22 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

इस बात की जांच की जानी चाहिए कि सलमान खान को जमानत देने में 24 घंटे का विलम्ब क्यों हुआ !! ऐसी घटनाओ से जनता का पैसे पर से भरोसा टूटता है। माननीय न्यायाधीश दीपक जी मिश्रा को इस मामले का संज्ञान लेकर जमानत में विलम्ब के कारणों का पता लगाना चाहिए।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 08 2018 20:21:09 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भीलवाड़ा में कल एक पुलिस अधिकारी ने आम नागरिक को 20,000 की घूस देने की कोशिश की !!! असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर ( ASI ) बैंक में एक कारोबारी के बैग से 20,000 रूपये चुराते रंगे हाथो पकडे गए। मामला रफा दफा करने के लिए उन्होंने डबल पैसे देने की पेशकश की। लेकिन पुलिस के भ्रष्टाचार से आहत जनता ने उनकी धुनाई कर दी।
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पुलिस महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं उद्दंडता में कमी लाने के लिए हमारा प्रस्ताव है कि राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख एवं ज्यूरी सिस्टम कानूनों को गैजेट में प्रकाशित किया जाए। इन कानूनों के आने से पुलिस तमीज से पेश आने लगेगी एवं नागरिक अपराधों में भी नाटकीय ढंग से गिरावट आएगी। इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट देखने के लिए मेरी कवर पिक्चर को क्लिक करें एवं डिस्क्रिप्शन देखें।
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न्यूज लिंक --- <https://goo.gl/9yLiFK>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 08 2018 20:52:29 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

जब संघ के शीर्ष नेता मोहन भागवत कहते है कि -- "भारत में निवास करने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू है।" तो यह बयान हिन्दुओ को विभाजित कर देता है। किंतु यही कथन यदि किसी धार्मिक संगठन या आम हिन्दू नागरिक द्वारा कहा जाएगा तो यह हिन्दुओ में विभाजित नहीं करता।
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कैसे ?
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जब यह बयान कोई राजनैतिक संगठन देता है तो यह बयान हिन्दुओ का धार्मिक नहीं बल्कि राजनैतिक रूपांतरण करने की मंशा बताता है। संघ 100 बार कहता है कि तुम हिन्दू हो , वो भी हिन्दू है , ये भी हिंदू है , और भारत में रहने वाला हर एक व्यक्ति हिन्दू है । फिर संघ कहता है कि -- हिन्दू खतरे में है , हिन्दू खतरें में है। और फिर संघ कहता है कि हम हिन्दूवादी पार्टी है। तो जब तुम हिन्दू हो , और हिन्दू खतरे में है, और हम हिंदूवादी पार्टी है तो तुम हमें वोट देकर हिन्दूओ और हिंदुत्व को बचाओ। यदि तुम हमें वोट नहीं दोगे तो हिन्दू खतरे में आ जाएगा। इस पूरी खिचड़ी का घूम फिर कर सार यही निकलता है कि -- कुल मिलाकर तुम हमें वोट दो।
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इससे विपक्षी पार्टियों को हिंदुत्व से दिक्कत शुरू हो जाती है। उन्हें दिक्कत यह है कि जब संघ यह बात बोलता है तो हिन्दू उनकी और दौड़ लगाते है, एवं उनके वोट कम होने लगते है। तो यदि यह सिलसिला जारी रहा तो आने वाले समय में हम ऐसे कई समुदायों एवं व्यक्तियों को जो संघ को वोट नहीं करना चाहते , यह कहते देख सकते है कि -- "हम हिन्दू नहीं है" !!!
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यदि यही बात बात कोई गैर राजनैतिक व्यक्ति या संगठन कहेगा तो टकराव टल जाएगा। मोहन भागवत यह बात जानते है। लेकिन वे वोट लेने के लिए एकता के नाम हिन्दुओ में विभाजन का जोखिम उठाने के लिए तैयार है।
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दरअसल एकता का आव्हान दुनिया में सबसे अधिक विभाजन कारी सिद्धांत है। यदि कोई व्यक्ति एकता की बात करें तो आपके दिमाग में संदेह के बादल तुरंत घुमड़ने चाहिए। सभी एकतावादी नेता बुनियादी तौर पर विभाजनकारी होते है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Apr 09 2018 10:47:57 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सभी को सूचित किया जाता है कि , मैं राईट टू रिकॉल , जूरी सिस्टम कानूनों के प्रचार के लिए आगामी विधानसभा / लोकसभा चुनावों के लिए संभावित उम्मीदवार हूँ।
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फिलहाल , हमारे देश में ऐसी कोई पंजीकृत राजनैतिक पार्टी नहीं है -- १) जो राईट टू रिकॉल / ज्यूरी सिस्टम आदि कानूनों को देश में लागू करवाने के लिए कटिबद्ध हो , २) नागरिको में इन कानूनों के ड्राफ्ट्स का प्रचार कर रही हो , तथा ३) उन्होंने अपनी पार्टी के पदाधिकारियों पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं लागू की हो। अत: ज्यादातर सम्भावना है कि मैं निर्दलीय चुनाव लडूंगा।
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चूंकि संघ=बीजेपी अभी सत्ता में है , और यदि संघ देश में सिर्फ यह 2 क़ानून -- (1) टू चाइल्ड लॉ , एवं (2) बांग्लादेशियों को खदेड़ने के लिए आवश्यक क़ानून लागू कर देता है , तो मैं चुनाव नहीं लडूंगा एवं चुनाव के दौरान सिर्फ बीजेपी के पक्ष में प्रचार करूँगा। इसके अतिरिक्त मैं यह भी घोषणा करता हूँ कि बीजेपी को ये दो कानून पास करने के एवज में मैं प्रति क़ानून 1,000 रूपये की दर से कुल 2,000 रूपये का चंदा दूंगा। मैं जानता हूँ कि यह राशि कम है। किन्तु यह राशि मेरी हैसियत के अनुसार है , बीजेपी की हैसियत के अनुसार नहीं। इसके अतिरिक्त मैंने कुल 200 क़ानून प्रस्तावित किये है। अत: 200 कानूनों के हिसाब से यह राशि 200*1000 = 2,00000 होती है। अत: मैं किसी एक क़ानून को पास करने के लिए 1000 रूपये से ज्यादा नहीं दे सकता हूँ। चुनावी नतीजे आने के बाद मैं फिर से नागरिको में ज्यूरी सिस्टम एवं राईट टू रिकॉल कानूनों के ड्राफ्ट्स का प्रचार करता रहूँगा।
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इस दौरान यदि कोई राजनैतिक पार्टी अपने एजेंडे में राईट टू रिकॉल / ज्यूरी सिस्टम आदि कानूनों को शामिल करती है एवं इन क़ानून ड्राफ्ट्स का प्रचार करती है, तथा मुझे अपनी पार्टी से टिकेट देती है तो मैं अमुक पार्टी की और से चुनाव लडूंगा। यदि ऐसी कोई पार्टी मुझे टिकेट नहीं देती है तो मैं निर्दलीय चुनाव लडूंगा एवं साथ ही ऐसी सभी पार्टियों के लिए भी चुनाव प्रचार करूँगा जिन्होंने इन क़ानून ड्राफ्ट्स को अपने एजेंडे में शामिल किया है।
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यदि मैं किसी वजह से चुनाव लड़ने में असमर्थ रहता हूँ तो उस उम्मीदवार के पक्ष में चुनाव प्रचार करूँगा जो राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम कानूनों का समर्थन करते है।
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मैं जिन कानूनो का समर्थन करता हूँ उनके प्रस्तावित ड्राफ्ट्स देखने के लिए मेरी फेसबुक प्रोफाइल पर क्लिक करें एवं डिस्क्रिप्शन देखें।
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मेरी फेसबुक प्रोफाइल का लिंक -- <https://www.facebook.com/pawan.jury>;
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यह सूचना मैंने कुछ साल भर पहले से अपनी फेसबुक प्रोफाइल के डिस्क्रिप्शन में दर्ज करके रखी है। किन्तु फिर भी चुनाव लड़ने के सम्बन्ध में निरंतर प्रश्न पूछे जाने के कारण फिर से सूचित किया जा रहा है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Apr 09 2018 17:18:05 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

जस्टिस यू. यू. ललित चिंकारा के शिकार के मामले में सलमान के वकील थे !!! और भी है ---
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१) जस्टिस ललित के पापा मुंबई हाई कोर्ट में जज थे। तो एक जज के सफल वकील पुत्र होने के हिसाब से उनका जज बन जाना स्वाभाविक है। इस मामले में वे भी अपवाद नहीं है।
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२) सलमान के अलावा उन्होंने पुणे के घोडा व्यवसायी हसन अली खान का भी केस लड़ा था। हसन अली खान पर अवैध रूप से हजारो करोड़ की सम्पत्ति अर्जित करने का मामला था।
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३) जब पंजाब के भ्रष्ट मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह भ्रष्टाचार के मामले में फंस गए थे तब भी उनकी पैरवी ललित ने ही की थी।
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४) ललित बीजेपी के सांसद नवजोत सिंह सिद्धू पर हत्या के मुकदमे में भी सिद्धू के वकील थे। इस मामले को हत्या की जगह सदोष मानव वध के रूप में दर्शाया गया।
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दुसरे शब्दों में यह जज भी अन्य जजों के समान ही सिर से पाँव तक भ्रष्ट है , और इस आदमी का नैतिक मूल्यों से कोई लेना देना नहीं है। इस बात का सिर्फ अनुमान ही किया जा सकता है कि इन मामलो में अपने मुवक्किलों को बरी कराने के लिए इसने जजों से कैसे सेटिंग की होगी , और फैसला अपने पक्ष में लिखवाने के लिए जजों को कितनी घूस दी होगी।
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और हमेशा की तरह अपने बचाव में इस आदमी के पास भी वही थका हुआ स्पष्टीकरण है कि -- "मेरे मुवक्किल को बचाना मेरा पेशागत दायित्व है।"
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फिर यह आदमी 2014 में डायरेक्ट सुप्रीम कोर्ट का जज बन जाता है !! और जज बनने के बाद यह आदमी न्यायपालिका में व्याप्त भयंकर भ्रष्टाचार और भयंकर भाई भतीजावाद को कम करने के लिए कोई प्रयास नहीं करता।
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और यही आदमी आने वाले समय में चीफ जस्टिस ऑफ़ इण्डिया का पदभार संभालेगा !!! और फिर हमसे यह उम्मीद की जाती है कि हम इसे माननीय भी कहें !!!
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हमारे देश में यह क़ानून है कि , किसी भी वकील को उठाकर सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक में जज बनाया जा सकता है। और संघ के स्वयंसेवक इतने गिरे हुए है कि वे अदालतों में इस प्रकार की नियुक्ति व्यवस्था का समर्थन करते है !!! आज तक मोदी साहेब और उनके स्वयंसेवको ने देश की अदालतों को सुधारने एवं उनमे भ्रष्टाचार कम करने के लिए एक भी क़ानून पास नहीं किया , और न ही ऐसा कोई प्रस्ताव किया। संघ के सभी स्वयंसेवक अदालतों में भ्रष्टाचार के समर्थक है। वजह आप उनसे खुद पूछिए।
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यदि आप अदालतों में सुधार लाना चाहते है तो आपको इस बात को समझने की जरूरत है कि सोनिया-मोदी-केजरीवाल एवं इनके कार्यकर्ता मौजूदा व्यवस्था के समर्थक है। जजों का भ्रष्टाचार कम करने में कांग्रेस-बीजेपी-आपा के कार्यकर्ताओ की बिलकुल रुचि नहीं है। रुचि इसीलिए नहीं है क्योंकि इस भ्र्ष्टाचार से होने वाली आय इनके नेताओ की जेब में जाती है ,एवं इसमें से एक हिस्सा इन्हे भी मिलता है।
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यदि आप भारत की अदालतों में सुधार लाना चाहते है तो राईट टू रिकॉल जज एवं ज्यूरी सिस्टम कानूनों की मांग करें। इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट देखने के लिए मेरी फेसबुक प्रोफाइल का कवर पिक्चर क्लिक करें तथा डिस्क्रिप्शन देखें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Apr 10 2018 17:14:09 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Ishwar Choudhary BhilwaraRj:

सभी को सूचित किया जाता है कि , मैं राईट टू रिकॉल , जूरी सिस्टम कानूनों के प्रचार के लिए आगामी विधानसभा / लोकसभा चुनावों के लिए संभावित उम्मीदवार हूँ।
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फिलहाल , हमारे देश में ऐसी कोई पंजीकृत राजनैतिक पार्टी नहीं है -- १) जो राईट टू रिकॉल / ज्यूरी सिस्टम आदि कानूनों को देश में लागू करवाने के लिए कटिबद्ध हो , २) नागरिको में इन कानूनों के ड्राफ्ट्स का प्रचार कर रही हो , तथा ३) उन्होंने अपनी पार्टी के पदाधिकारियों पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं लागू की हो। अत: ज्यादातर सम्भावना है कि मैं निर्दलीय चुनाव लडूंगा।
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चूंकि संघ=बीजेपी अभी सत्ता में है , और यदि संघ देश में सिर्फ यह 2 क़ानून -- (1) टू चाइल्ड लॉ , एवं (2) बांग्लादेशियों को खदेड़ने के लिए आवश्यक क़ानून लागू कर देता है , तो मैं चुनाव नहीं लडूंगा एवं चुनाव के दौरान सिर्फ बीजेपी के पक्ष में प्रचार करूँगा। इसके अतिरिक्त मैं यह भी घोषणा करता हूँ कि बीजेपी को ये दो कानून पास करने के एवज में मैं प्रति क़ानून 1,000 रूपये की दर से कुल 2,000 रूपये का चंदा दूंगा। मैं जानता हूँ कि यह राशि कम है। किन्तु यह राशि मेरी हैसियत के अनुसार है , बीजेपी की हैसियत के अनुसार नहीं। इसके अतिरिक्त मैंने कुल 200 क़ानून प्रस्तावित किये है। अत: 200 कानूनों के हिसाब से यह राशि 200*1000 = 2,00000 होती है। अत: मैं किसी एक क़ानून को पास करने के लिए 1000 रूपये से ज्यादा नहीं दे सकता हूँ। चुनावी नतीजे आने के बाद मैं फिर से नागरिको में ज्यूरी सिस्टम एवं राईट टू रिकॉल कानूनों के ड्राफ्ट्स का प्रचार करता रहूँगा।
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इस दौरान यदि कोई राजनैतिक पार्टी अपने एजेंडे में राईट टू रिकॉल / ज्यूरी सिस्टम आदि कानूनों को शामिल करती है एवं इन क़ानून ड्राफ्ट्स का प्रचार करती है, तथा मुझे अपनी पार्टी से टिकेट देती है तो मैं अमुक पार्टी की और से चुनाव लडूंगा। यदि ऐसी कोई पार्टी मुझे टिकेट नहीं देती है तो मैं निर्दलीय चुनाव लडूंगा एवं साथ ही ऐसी सभी पार्टियों के लिए भी चुनाव प्रचार करूँगा जिन्होंने इन क़ानून ड्राफ्ट्स को अपने एजेंडे में शामिल किया है।
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यदि मैं किसी वजह से चुनाव लड़ने में असमर्थ रहता हूँ तो उस उम्मीदवार के पक्ष में चुनाव प्रचार करूँगा जो राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम कानूनों का समर्थन करते है।
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मैं जिन कानूनो का समर्थन करता हूँ उनके प्रस्तावित ड्राफ्ट्स देखने के लिए मेरी फेसबुक प्रोफाइल पर क्लिक करें एवं डिस्क्रिप्शन देखें।
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मेरी फेसबुक प्रोफाइल का लिंक -- <https://www.facebook.com/ishwar.choudhary.7731>;
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यह सूचना मैंने कुछ साल भर पहले से अपनी फेसबुक प्रोफाइल के डिस्क्रिप्शन में दर्ज करके रखी है। किन्तु फिर भी चुनाव लड़ने के सम्बन्ध में निरंतर प्रश्न पूछे जाने के कारण फिर से सूचित किया जा रहा है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Apr 11 2018 18:17:40 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Lee Kuan Yew = LKY ने सिंगापुर की काया पलटने के लिए एक बेहद आसान रास्ता चुना --- उसने देश ब्रिटिश के हवाले कर दिया !!! नतीजा --- 1960 में सिंगापुर में ईसाई आबादी सिर्फ 4% थी , जो कि अब बढ़कर 20% हो गयी है। इसके अलावा आज सिंगापुर की पूरी अर्थव्यवस्था ब्रिटिश , अमेरिकन और यूरोपियन कम्पनियों के नियंत्रण में है !!
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1920 के आसपास ब्रिटिश साम्राज्य ने अपना प्रभाव बढाने के लिए एक नए तरीके का इस्तेमाल करना शुरू किया। वे ऐसे नेताओं को प्रोत्साहन देने लगे जो बोलते तो ब्रिटिश के खिलाफ थे , लेकिन कार्य सभी ऐसे करते थे जिससे ब्रिटिश को फायदा हो। महादुरात्मा गांधी इस कैटेगरी में उनका सबसे बेहतर प्रोडक्ट था। उसकी भाषणबाजी ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ होती थी , अत: इसे सुनकर ब्रिटिश के खिलाफ लोगो में पनप रहा गुस्सा काफूर हो जाता था। लेकिन महादुरात्मा गांधी इस नौटंकी द्वारा क्रन्तिकारी युवाओं को बड़ी तेजी से नारेबाज एवं निरापद सामाजिक कार्यकर्ताओ में रूपांतरित कर रहा था।
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बाद में इस तकनीक का इस्तेमाल उन नेताओं को उभारने में किया गया, जिनका ब्रिटिश जाहिर तौर पर छद्म विरोध करते थे एवं अमुक नेता भी इस तरह से प्रदर्शित करता था कि वह ब्रिटिश-विरोधी नजर आये। लेकिन अमुक नेता उन नीतियों का समर्थन करता था जिससे अमेरिकी-ब्रिटिश उद्योगपतियों को फायदा हो और स्थानीय उद्योग टूटते चले जाए। लेकिन इसे इस तरह रचा जाता था जिससे अवाम को यह लगे कि अमेरिकी-ब्रिटिश हमारे नेता का प्रतिरोध कर रहे है , लेकिन इस प्रतिरोध के बावजूद हमारा नेता आगे बढ़ता जा रहा है !!!
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सिंगापुर का LKY = ली इसी श्रेणी का नेता था। उसके तेवर देखकर लगता था कि यह आदमी अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के खिलाफ है , और अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक भी कभी कभार उसके प्रति अपना रोष प्रकट करते थे। साथ ही अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक इस तरह का दिखावा करते थे जिससे अवाम को यह लगे कि अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक 'ली' को तोडना चाहते है। लेकिन अमेरिकी-ब्रिटिश धनिको एवं 'ली' के बीच इस तरह का सुविधापूर्ण गठजोड़ था कि ये दोनों एक दुसरे को फायदा पहुंचाते थे !! और 'ली' ने पश्चिमी धनिकों के पक्ष में इस तरह की नीतियाँ बनायी कि पूरे सिंगापुर में स्थानीय उद्योगों का नाश हो गया !!
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सिंगापुर आज सिर्फ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं कारोबारियों का हेडक्वाटर बन कर रह गया है। सिंगापुर में किसी भी प्रकार की निर्माण इकाइयां नहीं है , हथियारों का निर्माण तो दूर की बात है। सिंगापुर की तुलना यदि इस्राएल से की जाये तो इस्राएल में निर्माण इकाइयों का मजबूत ढांचा मौजूद है , एवं अपने आधुनिक हथियारों का उत्पादन इस्राएल खुद करता है।
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1960 के बाद सिंगापुर के इतिहास में मुख्य रूप से ध्यान देने योग्य बात यह है कि --- आखिर क्यों मलेशिया व इंडोनेशिया सिंगापुर को आपस में आधा आधा बाँट लेने में सफल नहीं हुए थे ? जवाब अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक है। तब इंडोनेशिया एंव मलेशिया के नेताओं पर भी अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का पर्याप्त नियंत्रण था, और वे सिंगापुर को टेकओवर होने देना नहीं चाहते थे।
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बाद में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों एवं जापानियों का कारोबारी नियंत्रण एशिया में बढ़ गया। लेकिन इन सभी देशो में सैन्य विद्रोह और / या कम्युनिस्ट क्रांति की सम्भावना के चलते उन्हें एक सुरक्षित देश की तलाश थी। उन्होंने पहली प्राथमिकता सिंगापुर को दी। हांगकांग उनकी दूसरी पसंद था।
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'ली' ने सब कुछ आउटसोर्स कर लिया था -- नीतियों से लेकर निष्पादन तक !! बदले में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने सिंगापुर शहर को उतने अच्छे से प्रबंधित किया, जितना पश्चिम में भी कोई शहर नहीं है।
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तो इसमें दिक्कत क्या है ?
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इस तरह के विकास के लिए मोटी कीमत चुकानी पड़ती है। पहला नुकसान यह है कि जब विदेशी पूँजी आती है तो वह स्थानीय धर्म को अपने धर्म से बदल देती है --- कोई दया नहीं , कोई अपवाद नहीं। मोदी साहेब के अंध भगत एवं संघ के स्वयंसेवक विदेशी निवेश आने की ख़ुशी में जो बार-बालाओं की तरह सड़को पर नृत्य कर रहे है उसकी वजह यह है कि, वे इस कड़वे सत्य पर चर्चा से बचना चाहते है !! 1960 में जब 'ली' ने सत्ता सम्भाली थी तो सिंगापुर में इसाईयत सिर्फ 4% थी, जो कि अब बढ़कर 20% हो गई है !! यह वृद्धि दर भी तब है , जब ईसाई समुदाय में जन्म दर काफी निम्न रहती है। इस सम्बन्ध में और अधिक जानकारी के लिए गूगल करें।
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अगला नुकसान -- अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियों ने स्थानीय निर्माण एवं हथियार निर्माण इकाइयों को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया। आज सिंगापुर बन्दुक नहीं बनाता , कारतूस नहीं बनाता और यहाँ तक कि वे 1 ग्राम गन पाउडर तक नहीं बनाते !! सिंगापुरियन कारे तो नहीं बनाते , लेकिन वे कारो के टायर तक नहीं बनाते !! वहां सभी प्रकार का बेहतरीन सामान उपलब्ध है -- लेकिन यह सभी आयातित है !!
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गणित-विज्ञान एवं इंजनियरिंग की शिक्षा का स्तर वहां अच्छा है --- लेकिन वास्तविक निर्माण इकाइयां न होने की वजह से यह शिक्षा सिर्फ पाठ्यक्रम एवं जबानी जमा खर्च तक ही सीमित है। वहां इसकी कोई व्यवहारिक उपयोगिता नहीं। आप पसंद करे या न करे, लेकिन सिर्फ निर्माण इकाइयों की आपसी प्रतिस्पर्धा ही इंजीनियरिंग के स्नातको को अपना हुनर तराशने का अवसर देती है। किताबी ज्ञान सिर्फ आभासी ज्ञान है। एक दुसरे का चमड़ा उधेड़ देने वाली वास्तविक प्रतिस्पर्धा में इंजीनियरिंग के स्नातको की क्षमता उस किशोर के समान है , जिसने ब्रूस ली की सभी फिल्मे दर्जनों बार देखी हो लेकिन उसे कभी रिंग में उतरने का अवसर न मिला हो।
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लेकिन अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने सिंगापूर को अधिगृहित करने बाद उनकी विज्ञान-गणित एवं इंजीनियरिंग की शिक्षा का कबाड़ा क्यों नहीं कर दिया ? वजह -- अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक सिंगापुर को समृद्ध होता दिखाना चाहते थे , वर्ना सिंगापुर के मलेशिया में विलय होने की मांग बढ़ जाती। लेकिन फिलिपिन्स के साथ ऐसी कोई शर्त नहीं थी, अत: अमरीकी-ब्रिटिश धनिकों ने फिलिपिन्स में विज्ञान-गणित की शिक्षा को बर्बाद कर दिया। अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने साउथ कोरिया में भी 1960 में प्रवेश किया था। तब कोरिया में ईसाई आबादी 4% थी, जो आज बढ़कर 40% हो गयी है !! लेकिन नार्थ कोरिया के साथ संभावित प्रतिरोध से निपटने के लिए अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने साऊथ कोरिया में निर्माण इकाईयो को बनाए रखा , लेकिन हथियार निर्माण इकाइयों को पूरी तरह से खत्म कर दिया। साउथ कोरिया में भी आज जो निर्माण इकाईया है उन पर तथा उनकी समूची अर्थव्यस्था पर अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का नियंत्रण है।
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लेकिन जैसे ही अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक मलेशिया को ख़त्म करने में सफल होंगे , जो कि वे चाइना को कमजोर करने के बाद ही कर सकेंगे, वैसे ही सिंगापुर को वे फिलिपिन्स में रूपांतिरत कर देंगे। और तब सिंगापुर किसी भी तरह अपनी अर्थव्यवस्था बचा नहीं सकेगा , क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था पर आज भी उनका नियंत्रण नहीं है।
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समाधान ?
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हमारे पास यहाँ भारत में पहले से इतनी समस्याएँ मौजूद है कि हमें दुसरे देशो की समस्याओ पर अपना सिर एवं डेटा खपाना शोभा नहीं देता। अत: उनकी समस्या के समाधान पर अपनी उर्जा खर्च करने से हमें परहेज करना चाहिए।
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परन्तु सिंगापुर की दशा से हम एक जाना पहचाना एवं सीधा सबक ले सकते है --- विदेशी पूँजी किसी भी तरीके से हमारे लिए अच्छे परिणाम नहीं देने वाली है। अत: संघ के स्वयंसेवको द्वारा एफडीआई के पक्ष में दिए जा रहे सभी एलान पूरी तरह से गलत एवं भ्रामक है। स्थानीय निर्माण इकाइयों को सुधारने का सबसे आसान एवं सटीक तरीका है -- राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम , वेल्थ टेक्स एवं जनमत प्रक्रियाओ से युक्त शासन।
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इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट देखने के लिए मेरे कवर पिक्चर पर क्लिक करें एवं डिस्क्रिप्शन देखें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Apr 12 2018 13:29:37 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राजनैतिक दल अपने वोट बैंक के आधार पर नीतियाँ बनाते है। सभी प्रकार के वोट बैंको को मीडिया सबसे अधिक प्रभावित करता है। भारत का मीडिया पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नियन्त्रण में है। इस लिहाज से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत का सबसे बड़ा वोट बैंक है। अत: भारत के सभी राजनैतिक दल इस सबसे बड़े वोट बैंक को साधने की कोशिश में रहते है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितो एवं भारत की जनता के हितो के बीच स्वाभाविक टकराव है। अत: जैसे जैसे बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में मजबूत होगी, वैसे वैसे भारतीय नागरिक एवं देश कमजोर होगा। जैसे जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा बढ़ता जाएगा, वैसे वैसे भारत के अन्य वोट बैंको को प्रभावित करने की उनकी क्षमता बढती जायेगी। जैसे जैसे उनकी यह क्षमता बढ़ेगी, हमारी सभी राजनैतिक पार्टियाँ वोट पाने के लिए बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर और भी निर्भर होती चली जायेगी।
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राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष का क़ानून आने से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां मीडिया के माध्यम से मतदाताओं को प्रभावित करने की क्षमता खो देगी। राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट --- <https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/546885878822944>;
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अधिक विवरण जानने के लिए यह लेख पढ़े -- <https://www.facebook.com/notes/pawan-jury/858398990945005/>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Apr 12 2018 20:49:50 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

कठुआ , सासाराम एवं उन्नाव में हुए अपराधों का कारण -- जजों का भ्रष्टाचार , समाधान -- ज्यूरी सिस्टम एवं राइट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख
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अपराधियों के हौसलें सिर्फ इसीलिए बढे हुए है क्योंकि वे जानते है कि हमारे जज एवं पुलिस अधिकारी भ्रष्ट है। सलमान खान का हालिया मामला इसकी पुष्टि करता है। न्यायपालिका एवं पुलिस के भ्रष्ट हो जाने पर इस तरह के अपराध बढ़ना स्वभाविक है।
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राजनैतिक हिन्दू और छद्म सेकुलर कार्यकर्ता / नेता इन विवादों में हिन्दू-मुस्लिम पृष्ठभूमि ढूंढ रहे है। वे यह भूल जाते है कि यदि भारत में अदालतों का यही हाल रहा तो ऐसा हादसा किसी भी वक्त उनके साथ भी गुजर जा सकता है। अफ़सोस की बात यह है कि इन हादसों पर चच्च चच्च करने वाले और एक दूसरे को ज्ञान बांटने वाले कभी भी उन कानूनों की मांग नहीं करते जिससे भारत की अदालतों में व्याप्त भ्रष्टाचार में कमी आये !! वे ऐसे हादसों पर अपनी भड़ास निकालने के लिए राजनैतिक टिप्पणियां करते है , एक दूसरे को इंसानियत के उपदेश देते है , लोगो के गिरते स्तर पर लानत भेजते है , पुर दर्द संवेदनाएं प्रसारित करते है और समाधान के नाम पर दर्शन झाड़ते है । किन्तु भारत की अदालतों एवं पुलिस विभाग को कार्यकुशल बनाने के लिए आवश्यक कानूनों की मांग कभी नहीं करते।
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समाधान : राईट टू रिकॉल जज , ज्यूरी सिस्टम एवं ज्यूरी सिस्टम कानूनों के आने से अपराधियों के हौसलें पस्त हो जाएंगे एवं अपराधों में नाटकीय रूप से कमी आएगी। इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट देखने के लिए मेरा फेसबुक कवर पेज क्लिक करें एवं डिस्क्रिप्शन देखें।
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कृपया ध्यान दें : मोदी साहेब , सोनिया गाँधी , केजरीवाल एवं इनके अंध भगत उपरोक्त सभी कानूनों का विरोध कर रहे है। उनका मानना है कि भारत की अदालतों एवं पुलिस व्यवस्स्था में सुधार की कोई आवश्यकता नहीं है। मौजूदा व्यवस्था एकदम सटीक ढंग से काम कर रही है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Apr 13 2018 06:48:51 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

जब कोंग्रेस शासन में थी एवं स्त्री के खिलाफ अपराध होते थे तो मोदी साहेब इस आशय की बात कहते थे कि सरकार निकम्मी है , एवं बीजेपी के सत्ता में आते ही इस तरह के अपराध जादुई ढंग से ख़त्म हो जायेंगे। तब हम नागरिको को लगातार यह सूचना दे रहे थे कि कानूनों में व्यवस्थागत सुधार लाये बिना इस तरह के अपराधो को रोका जाना संभव नहीं है। हम तब भी बीजेपी से यह पूछ रहे थे कि , यदि आप सत्ता में आये तो पुलिस एवं जजों का भ्रष्टाचार कम करने के लिए जिन कानूनों को लागू करेंगे उनके ड्राफ्ट दीजिये।
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लेकिन मोदी साहेब के अंध भगतो एवं संघ के स्वयंसेवक नागरिको को लगातार यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे थे कि, मोदी साहेब जादूगर है !! अत: उनके पीएम बनते ही ऐसे अपराध जादुई तरीके से गायब हो जायेंगे। आज उन्हें सत्ता में आये 4 वर्ष हो चुके है। और भारत के प्रत्येक नागरिक को पता है कि जजों एवं पुलिस प्रशासन में जो भ्रष्टाचार कोंग्रेस के कार्यकाल में था , उसमे रत्ती भर भी कमी नहीं आयी है। और इसी वजह से स्त्रीयो के खिलाफ अपराधो में भी वृद्धि हुयी है। और अब राहुल गांधी केंडल मार्च निकाल कर नागरिको को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे है कि , ऐसे हादसों का उपाय यह है कि इण्डिया गेट पर जाकर कई दर्जन मोमबत्तियां फूंक की जाए !!! जैसे जैसे मोम जलेगा वैसे वैसे जजों एवं पुलिस के भ्रष्टाचार में कमी आएगी !! जब कोंग्रेस सत्ता में थी तब यही जादूगरी बीजेपी के नेता एवं कार्यकर्ता दिखा रहे थे !!
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मोमबत्तियां जलाने , अनशन करने , उपवास करने और संवेदना जताने से इस तरह के हादसों को रोका नहीं जा सकता। इसके लिए हमें पुलिस एवं जजों का भ्रष्टाचार कम करने के लिए आवश्यक क़ानून लागू करने होंगे। शेष सभी कौतुक समय काटने एवं खुद को ज्यादा फिक्रमंद दिखाने के पैंतरे है।
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जो कार्यकर्ता स्त्री अपराधो में कमी लाना चाहते है उन्हें सबसे पहले या समझना होगा कि सोनिया-मोदी-केजरीवाल एवं उनके अंध भगत उन सभी कानूनों का विरोध कर रहे है जिससे पुलिस एवं जजों के भ्रस्टाचार में कमी आये। यदि आप पुलिस एवं जजों के भ्रष्टाचार को कम करना चाहते है तो राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख , राईट टू रिकॉल जज एवं ज्यूरी सिस्टम कानूनों की मांग करें। इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट देखने के लिए मेरी कवर पिक्चर पर क्लिक करें एवं डिस्क्रिप्शन देखें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Apr 13 2018 20:56:00 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

FAQ - 1
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राईट टू रिकॉल - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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[ इस प्रश्नमाला में राईट टू रिकाल कानूनों के बारे में सामान्य जानकारी दी गयी है। यह जानकारी नवागुंतक कार्यकर्ता के लिए उपयोगी है। प्रिंट करवाकर नागरिको में वितरण करने के लिए इस प्रश्नमाला का संशोधित पीडीऍफ़ इस पोस्ट के पहले कमेन्ट में देखा जा सकता है। ]
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1) भारत को राईट टू रिकॉल एवं ज्यूरी सिस्टम क़ानूनो की जरूरत क्यों है ?

रिकालिस्ट : यदि यह क़ानून लागू नहीं किये गये तो भारत में शिक्षा का स्तर गिरता जाएगा , बड़े पैमाने पर गरीबी आएगी, बेरोजगारी बढ़ेगी , हम इंजीनियरिंग के क्षेत्र में पिछड जायेंगे , स्थनीय निर्माण इकाइयां ध्वस्त हो जायेगी , सेना कमजोर हो जायेगी और भारत में बड़े पैमाने पर इसाई धर्म में धर्मान्तरण होंगे। इन कानूनों के अभाव में हमारी अर्थव्यवस्था को विदेशी कम्पनियां टेक ओवर कर लेगी और भारत बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एक उपनिवेश बन कर रह जाएगा। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। यदि कोई उपाय नहीं किया गया तो इसे रोका नहीं जा सकता। क्योंकि इस प्रक्रिया को बढाने वाले क़ानून पहले से ही मौजूद है। और यदि इस दौरान हमारा सामना युद्ध से होता है , जिसकी सम्भावना बेहद ज्यादा है, तो भारत का इराकीकरण हो जाएगा। यदि ये क़ानून लागू नहीं किये गए तो ज्यादातर से भी ज्यादा सम्भावना है कि भारत को जातीय एवं धार्मिक आधार पर एक सिविल वॉर का सामना करना पड़ेगा जिसके नतीजे में भारत के भौगोलिक रूप से और भी विभाजित होने की संभावनाएं प्रबल है।
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2) आप कह रहे है कि शिक्षा का स्तर गिरता जायेगा , लेकिन शिक्षा व्यवस्था में तो सुधार हो रहा है। इतने प्राइवेट स्कूल खुल गए है। पहले सिर्फ सरकारी स्कूलों होते थे।

रिकालिस्ट : यह सब सरकारी स्कूलों के बदहाल होने की कीमत पर हो रहा है। ज्यादा से ज्यादा अभिभावक प्राइवेट स्कूलों में जाने के लिए इसीलिए बाध्य है क्योंकि सरकारी स्कूल बदतर होते जा रहे है।
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3) तो प्राइवेट स्कूलों में जाने से क्या दिक्कत है ?

रिकालिस्ट : ज्यादातर प्राइवेट स्कूल कारोबारी इकाइयां है। उनका टार्गेट किसी न किसी तरह अभिभावकों से पैसा खींचना रहता है। वे अभिभावकों से जितना पैसा वसूलते है , उसका सिर्फ 20% ही शिक्षा पर खर्च करते है। अभिभावकों का शेष 80% पैसा स्कूल द्वारा किये जा रहे शोशे एवं गैर शैक्षणिक मदों में बर्बाद हो जाता है। इससे गरीबी बढती है। यही सिलसिला जारी रहा तो सरकारी स्कूलों का स्तर और भी गिरता चला जाएगा एवं निजी स्कूलों में शिक्षा और भी महंगी होती चली जायेगी।
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4) पर प्राइवेट स्कूलों में पढाई तो अच्छी होती है।

रिकालिस्ट : ऐसा नहीं है। भारत में गणित-विज्ञान का स्तर गिरता जा रहा है। सरकारो द्वारा लगातार ऐसी नीतियां लागू की जा रही है जिससे गणित-विज्ञान की शिक्षा कमजोर हो। गणित-विज्ञान का सिलेबस कमतर हो जाने की वजह से पढाई का स्तर दोनों तरह की स्कूलों में गिर रहा है। सरकारी स्कूलों में भी एवं प्राइवेट स्कूलों में भी। शिक्षा का स्तर सुधारने एवं सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए हमें राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी की जरूरत है।
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5) राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का मतलब क्या है ?

रिकालिस्ट : राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का मतलब है -- जिले के शिक्षा अधिकारी को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार जिले के अभिभावकों को दिया जाए।
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6) अकेला राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का क़ानून पूरे देश के सरकारी स्कूल कैसे सुधार देगा ?

रिकालिस्ट : जिले की शिक्षा व्यवस्था बनाये रखने के लिए शिक्षा अधिकारी जिम्मेदार होता है। जब शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने का अधिकार जिले के अभिभावकों को मिल जायेगा तो शिक्षा अधिकारी ईमानदारी से कार्य करेगा एवं प्रत्येक जिले में सरकारी स्कूलों का शिक्षा स्तर सुधरेगा। इस तरह प्रत्येक शिक्षा अधिकारी अपने जिले की शिक्षा सुधारेगा। जो शिक्षा में सुधार नहीं लाएगा, उसे अमुक जिले के अभिभावक नौकरी से निकाल कर नये व्यक्ति को शिक्षा अधिकारी नियुक्त कर देंगे। इस तरह पूरे देश की शिक्षा का स्तर सुधरेगा।
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7) नौकरी से निकालने का अधिकार अभिभावकों को देने से शिक्षा अधिकारी ईमानदार कैसे हो जाएगा ?

रिकालिस्ट : अभी शिक्षा अधिकारी की नियुक्ति राज्य के शिक्षा मंत्री / मुख्यमंत्री द्वारा होती है। अत: वह उनके फायदे के लिए ही काम करता है। शिक्षा अधिकारी प्राइवेट स्कूलों से घूस इकट्ठी करता है और अपने उच्च अधिकारियों एवं मंत्रियो को भेजता है। जब शिक्षा अधिकारी को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार जिले के अभिभावकों के पास होगा तो शिक्षा अधिकारी जनता को राहत पहुँचाने के लिए काम करने लगेगा। वह सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाएगा। यदि वह ऐसा नहीं करता तो, अभिभावक उसे नौकरी से निकाल देंगे। जो शिक्षा अधिकारी इमानदारी से काम करेंगे एवं अच्छे नतीजे देंगे वे पद पर बने रहेंगे व शेष पर नौकरी गवाने का खतरा मंडराने लगेगा। अब या तो ये अकार्यकुशल अधिकारी खुद को सुधार लेंगे या फिर नौकरी से निकाल दिए जायेंगे।
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8) आपको ऐसा क्यों लगता है कि राईट टू रिकॉल क़ानून आने से शिक्षा अधिकारी ईमानदारी से काम करने लगेगा एंव कार्यकुशल हो जाएगा ? हो सकता है इस क़ानून के आने से भी कोई परिवर्तन न आये।

रिकालिस्ट : हमारा मानना है कि यदि कोई परिवर्तन लाया जा सकता है तो सिर्फ इसी तरीके से लाया जा सकता है। अन्य कोई भी तरीका नहीं है। या फिर यूँ कह सकते है कि इससे बेहतर नतीजे देने वाला अन्य कोई ज्ञात तरीका नहीं है।
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9) आप ऐसा किस आधार पर कहते है ?

रिकालिस्ट : देखिये , व्यक्ति सिर्फ दो ही वजह से अपने आप में सुधार लाता है। या तो उसे दंड दिया जाए या फिर उसे प्रोत्साहन दिया जाए। राईट टू रिकॉल क़ानून इन दोनों प्रकार की परिस्थितियो की रचना करता है। मौजूदा व्यवस्था में यदि कोई शिक्षा अधिकारी ईमानदारी से प्रजा हित में काम भी करना चाहता है तो उसे इसके लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता। उसे सिर्फ अपने मंत्री एवं उच्च अधिकारियों को खुश रखना होता है। तो वह पदोन्नति पाने एवं अपनी नौकरी बचाए रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा घूस इकट्ठी करता है एवं अपने उच्च अधिकारियो को हफ्ता पहुंचाता है।

लेकिन राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का क़ानून आने से अब उसे यह भय रहेगा कि यदि मैं सरकारी स्कूलों को बेहतर नहीं बनाऊंगा तो अभिभावक मुझे नौकरी से निकाल देंगे। इस भय से वह अपनी नौकरी बचाने के लिए अच्छा काम करने लगेगा। दूसरा पहलु यह है कि, आज यदि किसी अधिकारी को प्रमोशन चाहिए तो उसे अपने उच्च अधिकारियो को खुश करना होता है , जनता को नहीं। राईट टू रिकॉल क़ानून आने से यदि उसे प्रमोशन चाहिए तो उसे ऐसे कार्य करने होंगे जिससे सरकारी स्कूलों का स्तर सुधरे। इस तरह वह पदोन्नति पाने के लिए अपनी कार्यकुशलता सुधारने के लिए बाध्य होगा।

हमने जो क़ानून प्रस्तावित किया है , उसके अनुसार यदि कोई शिक्षा अधिकारी अच्छा काम करता है और नागरिक उसके कार्यो का अनुमोदन करते है तो वह एक साथ 5 जिलो का शिक्षा अधिकारी बन सकेगा। इस तरह उसका वेतन 5 गुना हो जायेगा। तो यह प्रावधान ईमानदार एवं कार्यकुशल अधिकारी को प्रोत्साहित करेगा कि वह अपनी परफोर्मेंस सुधारे। इस तरह राईट टू रिकॉल की प्रक्रिया किसी अधिकारी पर दंड एवं पुरूस्कार दोनों तत्वों का अध्यारोपण करती है।
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10) क्या बिना राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओ को लाये मौजूदा व्यवस्था में ऐसे सुधार नहीं किये जा सकते कि शिक्षा व्यवस्था बेहतर हो जाए।

रिकालिस्ट : हमारे विचार में राईट टू रिकॉल के अलावा इसका कोई उपाय नहीं है। अभी जो व्यवस्था है उसका डिजाइन कुछ ऐसा है कि शिक्षा अधिकारी एवं मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सभी अधिकारी एवं नेता शिक्षा व्यवस्था को तोड़ने व बदतर बनाने के लिए काम करते है। जो कोई ईमानदार अधिकारी या नेता शिक्षा को बेहतर बनाने की कोशिश करता है , उसे व्यवस्था से बाहर कर दिया जाता है। लेकिन नागरिको एवं अभिभावको के पास ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है जिससे वे ईमानदार अधिकारी एवं मंत्री को पद पर बनाए रख सके एवं भ्रष्ट को बाहर कर सके। जब तक शिक्षा अधिकारी को जनता के प्रति जवाबदेह नहीं किय जाता तब तक सुधार नहीं लाया जा सकता।
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11) लेकिन नागरिको के पास अपने नेताओं चुनने का अधिकार है। फिर भी वे भ्रष्ट लोगो को ही चुन रहे है। अत: राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी क़ानून आने से भी कोई बदलाव नहीं आएगा।

रिकालिस्ट : हमें सिर्फ अपने विधायक , सांसद , सरपंच एवं पार्षद को ही चुनने का अधिकार है , लेकिन इन्हें भी नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं है। अत: हम जिसे भी चुनते है वह चुन लिए जाने के तुरंत बाद भ्रष्ट हो जाता है। अब हम अगले 5 वर्ष तक उन्हें हटा तो सकते नहीं है। और हमारे पास ऐसा कोई यंत्र भी नहीं है कि यह पता लगा सके कि अमुक नेता चुन लिए जाने के बाद भी ईमानदार बना रहेगा। तो अपने नेताओं को नौकरी से निकालने का अधिकार न होने के कारण ही देश में सभी नेता भ्रष्ट है। और जो ईमानदार है , वे भी कुछ समय में जब देखते है कि ईमानदार होने में कोई लाभ नहीं है किन्तु भ्रष्ट हो जाने में लाभ ही लाभ है तो वे भी भ्रष्ट हो जाते है।
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12) लेकिन शिक्षा अधिकारी की नियुक्ति करना तो मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। आम नागरिक उसे कैसे चुन सकते है।

हमने राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी की जो प्रक्रिया दी है , उसमे अभिभावक शिक्षा अधिकारी के उम्मीदवार को सिर्फ अनुमोदित करेंगे। इन अनुमोदनो के आधार पर मुख्यमंत्री शिक्षा अधिकारी की नियुक्ति करेंगे। यदि मुख्यमंत्री चाहे तो अभिभावकों द्वारा अनुमोदित व्यक्ति को शिक्षा अधिकारी नियुक्त कर सकते है या नहीं भी कर सकते है। इस तरह मुख्यमंत्री के अधिकारों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया है। अत: यह पूरी तरह से संवैधानिक है।
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13) तो जब जनता द्वारा अनुमोदित व्यक्ति को मुख्यमंत्री शिक्षा अधिकारी नियुक्त न करने के लिए स्वतंत्र है तो फिर इस राईट टू रिकॉल क़ानून का क्या मतलब रह जाता है ?

रिकालिस्ट : मुख्यमंत्री यदि जनता द्वारा अनुमोदित व्यक्ति को शिक्षा अधिकारी नियुक्त नहीं करेंगे तो इससे जनता को यह मालूम हो जाएगा कि मुख्यमंत्री जनता की आवाज को तवज्जो नहीं देता है, और वह इस पद पर जनता के आदमी को नहीं बल्कि अपने आदमी को बिठाए रखना चाहता है। इससे मुख्यमंत्री जनता के सामने एक्सपोज हो जाएगा और अपने वोट गवां देगा। अत: मुख्यमंत्री इस प्रकार के स्पष्ट जनमत के खिलाफ जाने का दुस्साहस नहीं करेगा।
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14) शिक्षा अधिकारी चुना कैसे जाएगा ? चुनाव कैसे होंगे ? कौन उम्मीदवार हो सकेगा ? उसे जनता कैसे निकालेगी ?
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अभिभावक पटवारी कार्यालय में जाकर या अपने रजिस्टर्ड मोबाईल से एसएम्एस द्वारा किसी भी उम्मीदवार को अनुमोदित कर सकेंगे। कोई भी व्यक्ति जो सांसद का चुनाव लड़ने की योग्यता रखता है , वह कलेक्टर कार्यालय में किसी भी दिन आवेदन प्रस्तुत करके उम्मीदवार के रूप में पंजीकृत हो सकेगा। इस प्रक्रिया के स्पष्टीकरण के लिए कृपया हमारे द्वारा प्रस्तावित राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का ड्राफ्ट पढ़ें।
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15) अनुमोदन सिर्फ अभिभावक ही करेंगे क्या ?

रिकालिस्ट : हाँ। शिक्षा अधिकारी को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार सिर्फ जिले के अभिभावकों को होगा।
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16) लेकिन अभिभावकों की अलग से वोटर लिस्ट तो उपलब्ध नहीं है।

रिकालिस्ट : यह क़ानून लागू होने के बाद जिला कलेक्टर प्रत्येक जिले में अभिभावकों की अलग से मतदाता सूचियाँ तैयार करेगा। यदि किसी दम्पति के 0-18 वर्ष की आयु के बीच कोई संतान है , तो उसका नाम मतदाता सूची में शामिल किया जाएगा।
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17) कार्यरत शिक्षा अधिकारियों का क्या होगा ? क्या इन सभी को निकाल दिया जाएगा ?

रिकालिस्ट : नहीं। जिले के अभिभावक यह तय करेंगे कि कार्यरत शिक्षा अधिकारी की नौकरी चालू रखनी है या नहीं। यदि कार्यरत शिक्षा अधिकारी अपने काम में सुधार नहीं लाता है तो अभिभावक उसे हटाकर किसी दुसरे उम्मीदवार को अनुमोदित कर सकेंगे। तो इस तरह कार्यकुशल शिक्षा अधिकारी टिके रहेंगे एवं निकम्मो को अभिभावकों द्वारा निकाल दिया जाएगा।
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18) जिन्हें अभिभावक निकाल देंगे क्या उनकी सरकारी नौकरी चली जायेगी ?

रिकालिस्ट : इसका फैसला मुख्य्मंत्री करेंगे। यदि मुख्यमंत्री चाहते है कि अभिभावकों द्वारा खारिज किये गए अधिकारी को सरकारी नौकरी से निकाल दिया जाना चाहिये तो वे उसे नौकरी से निकाल सकेंगे। और यदि वे उसे सरकारी सेवा में बनाए रखना चाहते है तो उसे अन्य किसी विभाग में टेप देंगे। अभिभावकों को इससे कोई सरोकार नहीं होगा।
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19) कक्षाओं का सिलेबस कौन तय करेगा ?

रिकालिस्ट : इसमें मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी। मतलब राज्य बोर्ड का सिलेबस राज्य का शिक्षा मंत्री एवं केन्द्रीय बोर्ड का सिलेबस केन्द्रीय शिक्षा मंत्री ही तय करेंगे। किन्तु जिला शिक्षा अधिकारी सिलेबस के बारे में अपने सुझाव सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कर सकेंगे। मंत्री इन सुझावो पर विचार कर सकेंगे।
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20) आप सिलेबस तय करने का अधिकार स्थानीय जिला शिक्षा अधिकारी को क्यों नहीं दे रहे है ?

रिकालिस्ट : यदि ऐसा किया गया तो प्रत्येक जिले में अलग अलग सिलेबस हो जाएगा और विभिन्न जिलो एवं राज्यों के शिक्षण में एक रूपता नहीं रह जायेगी। अत: सिलेबस राज्य एवं केंद्र के मंत्री ही तय करेंगे। किन्तु यदि शिक्षा अधिकारी चाहे तो अपने जिले में नागरिको के अनुमोदन से पाठ्यक्रम में अतिरिक्त कोई पाठ वगेरह जोड़ सकता है।

21) सिलेबस को लेकर आपके क्या प्रस्ताव है ?

रिकालिस्ट : हमारा प्रस्ताव है कि पाठ्यक्रम को इस तरह से बनाया जाए कि अधिकतम से अधिकतम भार गणित-विज्ञान एवं इंजीनियरिंग के विषयों पर रहे। कला आदि विषयों पर न्यूनतम भार दिया जाए। हमारा प्रस्ताव है कि 10 वीं कक्षा तक डिविजन बनाने के लिए सिर्फ गणित-विज्ञान को ही शामिल किया जाए। सामाजिक विज्ञान, राजनीती विज्ञान , इतिहास, भूगोल आदि विषयों में सिर्फ पासिंग मार्क्स का प्रावधान रखा जाए। ताकि ज्यादा से ज्यादा छात्र गणित-विज्ञान की तरफ आकर्षित हो।
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22) अगर शिक्षा मंत्री सिलेबस में गणित-विज्ञान पर भार नहीं देगा तो जिला शिक्षा अधिकारी गणित-विज्ञान के शिक्षा के स्तर में कैसे सुधार ला पायेगा ?

रिकालिस्ट : इसमें अगर मगर की कोई गुंजाइश ही नहीं है। पिछले 25 वर्षो से यह साफ़ देखा जा सकता है कि सभी राजनैतिक पार्टियों के मंत्री लगातार ऐसे आदेश निकाल रहे है जिससे गणित-विज्ञान की शिक्षा के स्तर में गिरावट आये। तो इसके लिए हमें राईट टू रिकॉल शिक्षा मंत्री के क़ानून की जरूरत है। राईट टू रिकॉल मंत्री का क़ानून लाकर ही शिक्षा मंत्री को काबू किया जा सकेगा। अन्यथा कोई उपाय नहीं। राईट टू रिकॉल मंत्री के अभाव में राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी का क़ानून वांछित बदलाव नहीं ला पायेगा।
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23) मंत्रीयो को भारत में गणित-विज्ञान का स्तर गिराने में क्या रुचि है ? इससे उन्हें क्या फायदा ?

रिकालिस्ट : मंत्रियो को रुचि नहीं है। लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इसमें रुचि है। उनका सारा बिजनेस तकनीक एवं हथियार निर्माण उद्योगों पर टिका हुआ है। यदि किसी देश में गणित-विज्ञान एवं इंजीनियरिंग का विकास होगा एवं अदालतें चुस्त हो जायेगी तो अमुक देश जटिल प्रोद्योगिकी विकास में सक्षम हो जाता है। भारत तकनीक के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर बुरी तरह से निर्भर है। वे भारत में अपने कारोबार का एकाधिकार बनांये रखने के लिए भारत को गणित-विज्ञान में पिछड़ा बनाए रखना चाहते है। अत: वे मंत्रीयो , सीएम एवं पीएम को ऐसे क़ानून लागू करने के लिए बाध्य करते है।
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24) वे पीएम एवं सीएम को बाध्य कैसे कर सकते है ?

रिकालिस्ट : चुनाव जीतने के लिए सभी नेता मीडिया पर निर्भर करते है। भारत में मीडिया पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पूरा नियन्त्रण है। यदि नेता बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिको की बात नहीं मानेंगे तो वे मीडिया द्वारा उनकी छवि ख़राब करके उनके वोट काट देंगे।
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25) भारत में गणित-विज्ञान एवं इंजीनियरिंग का स्तर वे कैसे तोड़ते है ? उदाहरण दीजिये।

रिकालिस्ट : भारत में 8 वीं क्लास तक फेल न करने का क़ानून इसीलिए लागू किया गया। यदि छात्रों को फेल न किया जाएगा तो वे गणित-विज्ञान पढेंगे नहीं लेकिन फिर भी पास होते चले जायेंगे। और आठवीं क्लास के बाद उन्हें गणित-विज्ञान कभी समझ नहीं आएगी, अत: उनमे से ज्यादातर छात्र सामाजिक विज्ञान , राजनीति विज्ञान एवं भूगोल जैसे अनुत्पादक विषयों की और रूख करेंगे।

इसके अलावा , गणित एवं विज्ञान का पाठ्यक्रम लगातार कमजोर किया जा रहा है , एवं पाठ्यक्रम में अनुत्पादक विषय एवं गैर शैक्षणिक गतिविधियों को जोड़ा जा रहा है। अभी हाल ही में केंद्र सरकार ने एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में आधी कटौती करने का फैसला किया है। इसके अलावा सरकारी स्कूलों को बदहाल बनाना भी इसी योजना का हिस्सा है। सरकारी स्कूल बदतर होने के कारण कस्बो एवं गावों के छात्र गणित-विज्ञान में पिछड़ जाते है , क्योंकि उन्हें कोचिंग
संस्थान उपलब्ध नहीं है। इस तरह एक बहुत बड़ा तबका गणित-विज्ञान की दौड़ से बाहर हो जाता है।

बच्चो को नाच, गाने , संगीत आदि अनुत्पादक गतिविधियों में धकलने के लिए टीवी पर इस तरह के धारावारीको का निरंतर प्रसारण किया जाता है। थ्री इडियट एवं दंगल जैसी फिल्मे छात्रों को गणित-विज्ञान एवं इंजीनियरिंग छोड़कर गैर शैक्षणिक गतिविधियों में खुद को खपाने के लिए प्रेरित करती है। खिलाडियों एवं विशेष रूप से क्रिकेट खिलाडियों को मीडिया पर विशेष रूप से प्रोत्साहन दिया जाता है। सरकार भी अभिनेताओं एवं खिलाडियो को लगातार पुरुस्कारों से सम्मानित करती है। समग्र प्रभाव यह बनता है कि प्रतिभाशाली छात्र शिक्षा को तवज्जो देने की जगह इन गैर उत्पादक गतिविधियों में जाने को प्रोत्साहित होते है।

इसके अलावा कक्षा 10 एवं 12 में पूछे जाने प्रश्नों को सरल किया जा रहा है। परीक्षा में ज्यादातर प्रश्न पाठ्यपुस्तक के पाठ में दिए गए अभ्यास प्रश्नों से ही पूछे जाने लगे है। ताकि छात्र को ज्यादा नही पढना पड़े , एवं वह सरलता से पास हो जाए। कुछ वर्षो पहले गणित-विज्ञान की वार्षिक परीक्षाओ में प्रश्न पाठ के अंदर से पूछे जाते थे, अभ्यास प्रश्नों में से नहीं। इस तरह वे बहुत ही धीमे धीमे और नजर में न आने वाले तरीको से गणित-विज्ञान एवं इंजीनियरिंग का स्तर तोड़ रहे है।
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26) लेकिन थ्री इडियट तो इंजीनियरिंग कोलेज पर ही बनी थी। उसमें पढने के लिए प्रेरित किया गया है।

रिकालिस्ट : थ्री इडियट छात्रों को यह तर्क मुहैया कराती है कि यदि आपकी इच्छा पढने की नहीं है तो आप न पढो। आप गणित-विज्ञान पढने की जगह गले में कैमरा लटकाकर जंगलो में जानवरों के फोटो निकालो। थ्री इडियट "जो अच्छा लगे वो करो" का सन्देश देती है। जाहिर है कि बच्चो की रुचि स्वाभाविक रूप से पढने में नहीं होती। उनकी रुचि खेलकूद , गाने बजाने और नाच गाने जैसे मनोरंजक विषयों में ही होती है।
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27) तो शिक्षा मंत्री पर राईट टू रिकॉल होने से क्या हो जाएगा। यदि पीएम एवं सीएम बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के एजेंडे पर कार्य करेंगे तो शिक्षा मंत्री उन्हें कैसे रोकेगा।

शिक्षा मंत्री पर राईट टू रिकॉल आने से शिक्षा मंत्री सीधे नागरिको द्वारा चुनकर आयेगा, और नागरिक ही उसे नौकरी से निकाल सकेंगे। न तो पीएम / सीएम उनका मंत्रालय बदल सकेंगे न ही उन्हें मंत्री पद से हटा सकेंगे। इस तरह शिक्षा मंत्री सिर्फ जनता के प्रति जवाबदेह होगा, और अपना कार्य ईमानदारी से करेगा या फिर अपनी नौकरी गवाएगा।
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28) आपने कहा कि हमारे नेता अपनी छवि बनाये रखने के लिए और वोट जुटाने के लिए मीडिया पर निर्भर है। मीडिया को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के चंगुल से आजाद करने के लिए हमें कैसा क़ानून चाहिए।
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रिकालिस्ट : देखिये , बात घूम फिर कर फिर से वहीँ आ जाती है। दूरदर्शन अध्यक्ष अभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से घूस खाता है और दूरदर्शन का स्तर कचरा बनाए रखता है। डीडी चेयरमेन के पास इतने संसाधन है कि यदि दूरदर्शन अध्यक्ष इमानदारी से काम करे तो वह प्राइवेट चेनल्स को जमा कर सकता है। लेकिन डीडी चेयरमेन को नौकरी से निकालने का अधिकार भारत की जनता के पास नहीं है। तो वह जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है। कोई भी अधिकारी उसी के हितो के लिए काम करता है जो उसे नौकरी से निकाल सकता है, उसे दण्डित कर सकता है और पदोन्नत कर सकता है। यदि ये अधिकार जनता के पास रहेंगे तो अमुक अधिकारी जनता के हितो के लिए काम करेगा वर्ना उस व्यक्ति के लिए काम करेगा जिसके पास ये अधिकार है। डीडी चेयरमेन के विषय में यह अधिकार पीएम के पास है। अत: वह पीएम को खुश रखने के लिए काम करता है। यदि डीडी चेयरमेन पर राईट टू रिकॉल आ जायेगा तो वह या तो ईमानदारी से काम करेगा या अपनी नौकरी गवायेगा।
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29) डीडी चेयरमेन कैसे चुना जाएगा एवं नागरिक इसे किस तरह नौकरी से निकालेंगे ?

रिकालिस्ट : दूरदर्शन अध्यक्ष को चुनने के लिए पूरे देश के मतदाता अनुमोदन दर्ज करेंगे। प्रत्येक राज्य में भी एक डीडी चेयरमेन होगा एवं उसे अमुक राज्य के मतदाता चुनेंगे। साथ ही नागरिक अपने अनुमोदन रद्द करके इन्हें किसी भी समय नौकरी से भी निकाल सकेंगे। इसकी विस्तृत प्रक्रिया देखने के लिए कृपया हमारे द्वारा प्रस्तावित राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष का ड्राफ्ट पढ़ें।
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30) और कौन कौन से पदों पर आपने राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओं का प्रस्ताव किया है ?

रिकालिस्ट : हमने जनप्रतिनिधियों में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री , मंत्री , मेयर , अधिकारियों में जिला शिक्षा अधिकारी , जिला पुलिस प्रमुख , जिला रसद अधिकारी , सीबीआई निदेशक , डीडी अध्यक्ष , सेंसर बोर्ड चेयरमेन एवं न्यायपालिका में जजों को शामिल करते हुए कुल 50 से ज्यादा पदों पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं प्रस्तवित की है।
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31) क्या सांसद , विधायक एवं सरपंच पर भी राईट टू रिकॉल नहीं होना चाहिए ?

रिकालिस्ट : होना चाहिए। हमने इन पदों के लिए भी राईट टू रिकॉल ड्राफ्ट प्रस्तावित किये है। परन्तु प्रचार के लिए हम इन पर ज्यादा भार नहीं देते।
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32) पुलिस प्रमुख की नियुक्ति तो परीक्षा पास करने से होती है। इसके लिए प्रशासनिक अनुभव एवं प्रशिक्षण भी चाहिए। आप पुलिस प्रमुख को चुनने का अधिकार नागरिको को कैसे दे सकते है ?

रिकालिस्ट : भारत में प्रधानमन्त्री बनने के लिए कोई प्रशिक्षण या योग्यता क्यों नहीं चाहिए। जबकि प्रधानमन्त्री को पूरा देश चलाना होता है !! प्रधानमंत्री के सामने तो पुलिस प्रमुख काफी छोटा पद है। दरअसल , पुलिस प्रमुख को यह देखना होता है कि क़ानून का पालन किया जा रहा है या नहीं। इसके लिए किसी प्रशिक्षण की जरुरत नहीं होती। यह ज्ञान व्यक्ति को सामान्य समझ से ही आ जाता है। तो जो पुलिस अधिकारी या प्रशासनिक अधिकारी पुलिस प्रमुख बनना चाहेगा , वह नागरिको से अनुमोदन ले सकता है। या मौजूदा पुलिस प्रमुख अपने आप में सुधार ले आएगा , तो नागरिको को उसे बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके अलावा पुलिस प्रमुख के अलावा उसका शेष स्टाफ उसी तरीके से नियुक्त होगा जिस तरीके से आज होता है। तो उसे तकनिकी मामलों में प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध होगा।
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33) क्या राईट टू रिकाल व्यवहारिक है ?

रिकालिस्ट : बिलकुल व्यवहारिक है। अमेरिका में जिला पुलिस प्रमुख को नौकरी से निकालने का अधिकार वहां के नागरिको के पास है। इसके अलावा अमेरिका में जजों , मुख्यमंत्री , मेयर, पब्लिक प्रोसिकूटर आदि पदों पर भी राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं है। यही वजह है कि अमेरिका के पुलिस प्रशासन में भारत की तुलना में कम भ्रष्टाचार है।
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34) किन्तु अमेरिका में लोग शिक्षित है। भारत जैसे अशिक्षित देश में राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख का क़ानून कैसे लागू किया जा सकता है ?

रिकालिस्ट : पहली बात तो यह कि अमेरिका में शिक्षा का स्तर ज्यादा बेहतर सिर्फ इसीलिए है क्योंकि वहां पर जिला शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने का अधिकार जिले के नागरिको के पास है। दूसरी बात यह कि , ईमानदार अधिकारी / नेता को चुनने एवं भ्रष्ट को निकालने की समझ पैदा करने के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है। यह कॉमन सेन्स की बात है। यह कॉमन सेन्स मानव मात्र में होता है। यदि कॉमन सेन्स का सम्बन्ध शिक्षा से होता है तो फिर भारत के सभी अशिक्षित नागरिको के सभी वोटिंग राइट्स क्यों नहीं छीन लिए जाने चाहिए ? बताइये। जब भारत के लोग अपने सांसदों एवं विधायको को चुन सकते है तो पुलिस प्रमुख को भी चुन सकते है।
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35) पुलिस प्रमुख को राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओ से बाहर रखने में क्या दिक्कत है ?

रिकालिस्ट : सबसे जरुरी एवं पहला क़ानून हमें राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख ही चाहिए। पुलिस सबसे ताकतवर विभाग है , एवं पुलिस प्रमुख के पास स्थानीय प्रशासन एवं अपराधो को नियंत्रित करने की सबसे ज्यादा शक्तियां होती है। सभी प्रकार के अपराधो की जांच पुलिस ही करती है। आज पुलिस प्रमुख सांसदों, विधयाको एवं मुख्यमंत्री के इशारों पर काम करता है। सारे भ्रष्टाचार की असली वजह यही है। पुलिस प्रमुख को नेताओं के चंगुल से आजाद करने की जरूरत है। पुलिस प्रमुख को प्रजा के अधीन किये बिना किस भी तरह से अपराध एवं दमन में कमी नहीं लायी जा सकती है।
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36) भारत में लोग जातिगत आधार पर वोट करते है। अत: वे अपनी जाति के व्यक्ति को पुलिस अधिकारी बना देंगे।

पहली बात - भारत के मतदाता जातीय आधार पर वोट नहीं करते है। भारत में पार्टी सिस्टम होने के कारण मतदाताओं के पास उम्मीदवारों के रूप में 2-3 विकल्प ही रहते है। बड़ी पार्टियो के ये उम्मीदवार भी भ्रष्ट और निकम्मे होते है। अत: मतदाता के पास उम्मीदवार को चुनने की कोई वजह नहीं रह जाती। अत: वे अपनी जाति को वजह बनाने के लिए बाध्य हो जाते है। यदि उनके पास अपनी जाति का एक भ्रष्ट और निकम्मा उम्मीदवार होगा किन्तु अन्य जाति का उम्मीदवार यदि कार्यकुशल एवं ईमानदार है तो वे ईमानदार एवं काबिल व्यक्ति को ही वोट करते है। किन्तु पेड मीडिया इसे इस तरह से रिपोर्ट करता है जिससे या सन्देश जाए कि भारत के मतदाता अपनी जाति के ही उम्मीदवार को वोट करने के आदि है। जब किसी जाति विशेष का ही उम्मीदवार क्षेत्र में अपनी जाति का बहुमत होने के बावजूद हार जाता है तो मीडिया इसे कभी रिपोर्ट नहीं करता। इस तरह यह भ्रम खड़ा किया गया है कि भारत के नागरिक जाति देखकर वोट करते है।

जातिय आधार पर वोटिंग को हतोत्साहित करने के लिए हमने इंस्टेंट रन ऑफ़ वोटिंग सिस्टम का प्रस्ताव किया है। इस प्रक्रिया के आने से जातिय आधार पर वोटिंग बड़े पैमाने पर हतोत्साहित होगी।

दूसरी बात - भारत में किसी भी जिले में किसी जाति का बहुमत नहीं है। अत: किसी जाति विशेष द्वारा अपनी जाति के उम्मीदवार को सिर्फ जातीय आधार पर पुलिस प्रमुख के रूप में चुन लिए जाने की सम्भावना बेहद कम है। और यदि वे अपनी जाति के व्यक्ति को चुन भी लेते है और यदि अमुक पुलिस प्रमुख निकम्मा और भ्रष्ट है तो वे उससे आजिज आकर उसे जल्दी ही नौकरी से निकाल देंगे।

तीसरी बात - यदि किसी क्षेत्र विशेष में अधिकाँश आबादी किसी एक ही जाति की है तो यह भी तय है कि अन्य उम्मीदवार भी उसी जाति के होंगे। तो इस वजह से एक ही जाति के एक से अधिक उम्मीदवार होने के कारण जातीय आधार पर वोटिंग करने की वजह स्वत: ही समाप्त हो जाएगी।
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37) भारत के लोग भ्रष्ट है। वे अपना वोट बेच देते है। अत: पुलिस प्रमुख वोट खरीद लेगा।

पहली बात - जब आप कहते है कि भारत के लोग भ्रष्ट है तो इसमें आप खुद को शामिल करते है या नहीं। यदि आप खुद को इसमें शामिल करते है तो आप खुद को भ्रष्ट कहिये, भारत के शेष नागरिको को क्यों भ्रष्ट कह रहे है ? और यदि आप खुद को इसमें शामिल नहीं करते है तो आपको पुनर्विचार करने की जरूरत है। क्योंकि आप खुद के अलावा देश के सभी नागरिको को भ्रष्ट कह रहे है।

दूसरी बात - भारत के लोग भ्रष्ट नहीं है। और वे अपना वोट नहीं बेचते है। लेकिन गरीब आदमी हर सूरत से पैसे लेने का अवसर नहीं गंवाता। तो मान लीजिये कि कोई गरीब व्यक्ति पैसे लेकर किसी उम्मीदवार को वोट करने का वादा करता है। लेकिन भारत में मतदान गुप्त होता है , अत: यह कभी पता नहीं लगाया जा सकता कि उसने पैसा लेकर किसे वोट किया है। और जो व्यक्ति किसी एक उम्मीदवार से पैसे लेता है वह सभी उम्मीदवारों से पैसे ले लेता है, और वोट उसे ही देता है जिसे उसे देना होता है। इस हिसाब से वोट खरीदने की थ्योरी काल्पनिक है।

तीसरी बात - उम्मीदवार किसी मतदाता को पैसे देने का साहस इसीलिए करता है क्योंकि वह जानता है कि एक बार वोट करने के बाद मतदाता अपना वोट अगले 5 वर्ष तक वापिस नहीं लौटा सकेगा। किन्तु हमारे द्वारा प्रस्तावित राईट टू रिकॉल क़ानून में मतदाता किसी भी दिन अपना वोट फिर से लौटा सकता है। इस वजह से कोई भी उम्मीदवार वोट खरीदने की कोशिश नहीं करेगा। क्योंकि उम्मीदवार एक ही व्यक्ति को रोज तो पैसे देने वाला नहीं है। इससे तो वह बर्बाद हो जाएगा। इस तरह राईट टू रिकॉल क़ानून वोटो की खरीद फरोख्त की समस्या को हमेशा के लिए ख़त्म कर देगा।
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38) भारत बहुत बड़ा देश है। राईट टू रिकॉल जैसे क़ानून छोटे देशो के लिए तो उपयुक्त है, किन्तु भारत जैसे देश के लिए ?

रिकालिस्ट : देश बड़ा छोटा होने से कुछ नहीं होता। प्रत्येक देश प्रशासन की दृष्टी से छोटी छोटी इकाइयों में विभाजित होता है। देश में राज्य , राज्य में जिले, जिलो में तहसील एवं गाँव आदि होते है। एक जिले में एक पुलिस प्रमुख होता है। भारत का जिला हो या अमेरिका का जिला हो या स्विट्जर्लेंड का जिला हो, जिले की आबादी एवं आकार कमोबेश एक जैसा ही रहता है। पुलिस प्रमुख या किसी जिला अधिकारी को शेष भारत से कोई मतलब नहीं , उसे सिर्फ अपना जिला देखना होता है।
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39) राईट टू रिकॉल आने से रोज रोज चुनाव होने लगेंगे ?

रिकालिस्ट : नहीं होंगे। अधिकारी को बदलने का अधिकार सिर्फ आपको नहीं दिया जा रहा है। रिकाल सिर्फ तब होगा जब किसी जिले के नागरिको का बहुमत रिकॉल करना चाहेगा। मान लीजिये किसी जिले में १० लाख मतदाता है, एवं पदासीन जिला पुलिस प्रमुख को ६ लाख अनुमोदन प्राप्त है। तो रिकॉल सिर्फ तब होगा जब किसी उम्मीदवार को पदासीन पुलिस प्रमुख से अधिक अनुमोदन प्राप्त हो एवं यह अनुमोदन ५ लाख से अधिक भी हो। तो कुछ हजार मतदाता के चाहने से रिकॉल होना संभव नहीं है। जब तक जिले के नागरिको का बहुमत नहीं चाहेगा तब तक रिकॉल नहीं होगा। लेकिन जैसे जैसे पुलिस प्रमुख का भ्रष्टाचार एवं निकम्मापन नागरिको के सामने आता जाएगा वैसे वैसे उसके अनुमोदनो की संख्या कम होती जाएगी। और जब उसका प्रदर्शन बेहद घटिया स्तर तक पहुँच जाएगा तो रिकाल होगा।

व्यवहारिक रूप से यह देखने में आया है कि रिकॉल की कभी नौबत ही नहीं आती। क्योंकि अधिकारी रिकॉल होने की सम्भावना देखकर तुरंत अपने व्यवहार में परिवर्तन ले आता है।
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40) राईट टू रिकॉल विदेशी कांसेप्ट है। हम स्वदेशी में मानते है।

पहली बात -- भारत की रेल से लेकर प्लेन एवं आपके मोबाइल से लेकर फेसबुक तक सब विदेशी है , तो पहले आप इन सब का त्याग कीजिये। वोट देने का अधिकार भी विदेश से ही आया है। अत: आप अपना मतदाता पहचान पत्र रद्द करवाइए और घोषणा कीजिये कि आप आइन्दा वोट नहीं करेंगे। क्योंकि वोट देना एवं अपने जनप्रतिनिधियों को चुनना भी एक विदेशी कोंसेप्ट है। पर आप ऐसा नहीं करेंगे। क्योंकि आप वोट करने का अधिकार चाहते है। हमने इसमें बस इतना जोड़ा है कि आपके पास वोट देने के साथ ही अपना वोट फिर से लौटा देने का अधिकार भी हो। इस तरह हम आपके अधिकारों में कानूनी वृद्धि कर रहे है। इसमें स्वदेशी विदेशी कुछ नहीं है।

दूसरी बात - महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने 19वीं शताब्दी में लिखी गयी अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में राजा के प्रजा अधीन होने की अवधारणा प्रस्तुत की थी, और उन्होंने यह विचार वेदों से लिया था। क्या वेद एवं सत्यार्थ प्रकाश विदेशी है ? महात्मा सच्चिन्द्र नाथ सान्याल एवं महात्मा चंदशेखर आजाद ने 1925 में अपनी पार्टी के मेनिफेस्टो में राईट टू रिकॉल कानूनों की मांग की थी। क्या ये क्रांतिकारी भी विदेशी थे ? राजिव भाई दीक्षित भी इन कानूनों की मांग कर रहे थे, क्या आप राजीव भाई को भी विदेशी मानते है ?
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41) महात्मा सच्चिन्द्र नाथ सान्याल एवं महात्मा चंदशेखर आजाद को तब राईट टू रिकॉल कानूनों कैसे सूझ गए थे ?

रिकालिस्ट : 1920 में भारत में पहली दफा चुनाव हुए थे एवं स्थानीय निकायों में भारतीय जनप्रतिनिधि चुने गए। लेकिन चुनने के तुरंत बाद इनमे से ज्यादातर ने अंग्रेजो से गठजोड़ बना लिए थे। इस घटना से महात्मा सच्चिन्द्र नाथ सान्याल, महात्मा चंदशेखर आजाद एवं अन्य क्रांतिकारी यह बात ताड़ गए थे कि बिना राईट टू रिकॉल के यदि आजादी आ भी जाती है दशा वही रहने वाली है। उन्होंने तात्कालीन परिस्थिति के आधार पर भविष्य का यह आकलन कर लिया था कि यदि "आजाद भारत में राईट टू रिकॉल क़ानून नहीं हुए तो लोकतंत्र एक मजाक बन कर रह जाएगा"। बाद में जब महात्मा भगत सिंह जी इनके सम्पर्क में आये तो उन्होंने भी इन कानूनों का समर्थन किया।
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42) अन्ना और केजरीवाल जी भी तो राईट टू रिकॉल कानूनों के समर्थक है ? आप भी उन्ही के साथ हो क्या ?

रिकालिस्ट : इस समय ये दोनों महाशय भारत में राईट टू रिकॉल कानूनों के सबसे बड़े फर्जी समर्थक है। ये दोनों ही राईट टू रिकॉल कानूनों का मौखिक समर्थन करते है किन्तु इसका ड्राफ्ट नही देते। इसके अलावा इन लोगो ने जनलोकपाल के ड्राफ्ट में राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं रखने से भी साफ़ मना कर दिया था। इस तरह हम इन्हें राईट टू रिकॉल कानूनों के फर्जी समर्थक कहते है। ये सिर्फ मौखिक बयानबाजी करके राईट टू रिकॉल कानूनों के समर्थक नागरिको के सामने यह दिखावा करना चाहते है कि वे राइट टू रिकॉल कानूनों के समर्थक है।
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43) वरुण गाँधी ने तो राईट टू रिकॉल सांसद के लिए कानूनी ड्राफ्ट दिया है। वे तो राईट टू रिकॉल के समर्थक है ?

रिकालिस्ट : वरुण गांघी ने जो राईट टू रिकॉल सांसद का जो ड्राफ्ट दिया है उसे पढ़िए। आप खुद जान जायेंगे कि वे इन कानूनों के कितने बड़े फर्जी समर्थक है। उन्होंने जो ड्राफ्ट दिया है उसके अनुसार सांसद को रिकॉल करना कभी भी सम्भव नही हो पायेगा , जबकि रिकॉल की मांग करने वाले कार्यकर्ताओ को ही गिरफ्तार किया जा सकता है !! इस तरह वे उल्टा राईट टू रिकॉल क़ानून लाना चाहते है, ताकि नागरिक राईट टू रिकॉल कानूनों से हमेशा के लिए नेगेटिव हो जाए।
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44) बीजेपी , कोंग्रेस , सपा , बसपा आदि पार्टियों का राईट टू रिकॉल कानूनों पर क्या रूख है ?

रिकालिस्ट : ये चारो पार्टियाँ एवं इनके सभी शीर्ष नेता राईट टू रिकॉल कानूनों के धुर विरोधी है। उन्हें राईट टू रिकॉल कानूनों से इतना विरोध है कि वे इस लफ्ज का नाम लेना तक पसंद नही करते। उन्हें यह भय रहता है कि इस लफ्ज का सार्वजनिक रूप से उच्चारण करने से इन कानूनों के बारे जानकारी नागरिको तक पहुँच जायेगी। देश की अन्य सभी राजनैतिक पार्टियाँ भी इन कानूनों की विरोधी है।
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45) आपके द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट आपको कहाँ से मिले है। इनका लेखक कौन है ?

रिकालिस्ट : एक बार लिख दिये जाने के बाद क़ानून ड्राफ्ट स्वतंत्र हो जाते है। इन्हें व्याख्या या स्पष्टीकरण के लिए लेखक या किसी सन्दर्भ की जरूरत नहीं होती है। क्या आप बता सकते है कि जीएसटी क़ानून किसने लिखा है ? नही। क्योंकि किसी भी क़ानून पर लिखने वाले का नाम नहीं होता। हमने ये ड्राफ्ट इंटरनेट पर प्राप्त किये थे। इन्हें किसने लिखा है इस बारे में हमें ठीक से जानकारी नहीं है। और हमे इसके लेखक का पता लगाने में रुचि भी नहीं है। यह एक अप्रासंगिक प्रश्न है।
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अगली प्रश्नमाला में जारी .....
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Apr 16 2018 19:40:40 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

A) क्या सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना करके बलात्कार , स्त्री शोषण , चोरी , डकैती , धोखाधड़ी जैसे अपराधो को रोका जा सकता है ?
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B) कैसे समुचित दंड विधान के अभाव में नैतिक मूल्यों का पालन करने वाले लोग पिछड़ जाते है ?
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A) क्या सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना करके बलात्कार एवं स्त्री शोषण जैसे अपराधो को रोका जा सकता है ?
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मान लीजिये कि किसी समुदाय के 1000 व्यक्तियों को सांस्कृतिक मूल्यों का पालन करने की शिक्षा दी जाती है। मान लीजिये कि इनमे से सिर्फ 1% यानी कि 10 लोगो पर पर इन उपदेशो का कोई असर नहीं होता , और ये 10 लोग सांस्कृतिक मूल्यों की अवहेलना करके लाभ उठाने की कोशिश करते है। जब ये 10 लोग ऐसा करेंगे तो इन्हें अतिरिक्त लाभ मिलेगा। अब यदि इन्हें कोई दंड न दिया जाए तो उनके हौंसले और भी बढ़ेंगे व ये और भी ज्यादा सांस्कृतिक मूल्यों की अवहेलना करके लाभ उठाने की कोशिश करेंगे। इन्हें लाभ की अवस्था में देखकर शेष लोग अपने आप को बेवकूफ समझने लगेंगे अत: वे भी सांस्कृतिक मूल्यों की अवहेलना करने लगेंगे। इस तरह सांस्कृतिक मूल्यों को धता बताने वालो की संख्या बढ़ती चली जायेगी !! जब इनकी संख्या क्रमिक रूप से बढती चली जायेगी तो सांस्कृतिक मूल्यों की अवहेलना करना चलन में आ जायेगा।
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अत: हमारे विचार में यदि आप सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना करना चाहते है तो आपको दंड के विधान को यानी अदालतों को चुस्त एवं निष्पक्ष बनाने की जरूरत है।
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B) कैसे समुचित दंड विधान के अभाव में नैतिक मूल्यों का पालन करने वाले लोग बर्बाद हो जाते है ?
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"ईमानदारी सर्वश्रेष्ठ नीति है" -- एक उदाहरण से समझते है कि यह नीति किस तरह किसी ईमानदार व्यक्ति को बर्बाद कर सकती है ;
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मान लीजिये कि किसी क्षेत्र में 100 कपड़ा डाई करने के कारखाने है। प्रत्येक प्रोसेस हाउस 1 लाख मीटर कपडा प्रतिदिन प्रोसेस करता है। मान लीजिये कि प्रोसेस करने की लागत 10 रूपये प्रति मीटर है। कानूनन इन प्रोसेस हाउस को अपशिष्ट जल को रिसाइकिल करना होता है। अब मान लीजिये कि इनमे से कोई एक प्रोसेस पैसा बचाने के लिए यह पानी रिसाइकिल न करके समीपस्थ नदी-नाले या मुक्त भूमि में बहाता है , और प्रदुषण अधिकारी को इसके बदले में 10 हजार की घूस दे देता है। इससे अमुक प्रोसेस की लागत 10 रूपये प्रति मीटर से घटकर 9.50 रह जायेगी और वह अपने टेक्सटाइल कम्पनियों को 50 पैसे कम में कपड़ा प्रोसेस करने का ऑफर देने लगेगा। अब यदि वह टेक्स भी चुराने लगता है तो उसकी लागत घटकर 9 रूपये रह जायेगी। यदि वह बिजली चोरी भी करने लगता है यह लागत घटकर और भी कम हो जायेगी। अब उसकी प्रतिस्पर्धी इकाइयों के पास सिर्फ दो विकल्प रहेंगे -- १) या तो वे भी बेईमानी करना शुरू करें, या २) बाजार से बाहर हो जाए !!
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यदि दंड का विधान करने की व्यवस्था चुस्त है तो अदालत इस एक व्यक्ति को त्वरित रूप से दण्डित कर देगी और अन्य प्रोसेस हाउस को बेईमानी करने के लिए बाध्य नहीं होना पड़ेगा।
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सार यह है कि जब हम देश में हो रहे अपराधो को कम करने पर विचार करे तो इसका समाधान हमें प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यस्था में ढूंढना चाहिए। बिना अदालतें सुधारे सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों से सम्बंधित विमर्श करना दिल्लगी है। इससे वास्तविक सुधार तो कभी आते नहीं परन्तु कार्यकर्ताओ का ध्यान वास्तविक समाधान से अवश्य हट जाता है। सांस्कृतिक-नैतिक मूल्यो का पालन करना अच्छी बात है , किन्तु हमें यह बात समझनी चाहिए कि समस्त सांस्कृतिक-नैतिक मूल्य प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था पर ही अवलंबित है।
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भारत के जज अव्वल दर्जे के भ्रष्ट है। नेता , अधिकारी आदि जजों के भ्रष्टाचार के सामने कही नही ठहरते। सिर्फ यही वजह है की भारत में सांस्कृतिक-नैतिक मूल्यों का निरंतर क्षरण होता जा रहा है।
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समाधान के रूप में हमारा प्रस्ताव है अदालतों को चुस्त एवं जजों को ईमानदार बनाने के लिए जूरी सिस्टम एवं राईट टू रिकॉल जज क़ानून गेजेट में प्रकाशित किये जाए। इन कानूनों के ड्राफ्ट देखने के लिए मेरी फेसबुक प्रोफाइल का कवर पेज क्लिक करके डिस्क्रिप्शन देखें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Apr 16 2018 20:15:54 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

एनकाउंटर से पैसा बनाने का तरीका ;
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मान लीजिये किसी राज्य में 50 दुर्दांत अपराधी है। जब नयी सरकार आती है तो वह इनमे से किन्ही 2-4 को चिन्हित करके उनका एनकाउंटर करती है । इससे शेष अपराधियों में यह भय आ जाता है कि उनका भी एनकाउंटर कर दिया जाएगा। वे जान बचाने के लिए नेताओ के पास पैसा लेकर पहुंचने लगते है। इस तरह 5 का एनकाउंटर करके वे शेष 45 से हफ्ता लेना शुरू कर देते है। 5 एनकाउंटर करने से उन्हें वोट मिलते है , और शेष 45 का एनकाउंटर न करने से पैसा !!
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ऑडियो लिंक -- <https://goo.gl/2ZKbHP>;
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न्यूज लिंक -- <https://goo.gl/Y8LRLs>;
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समाधान -- ज्यूरी सिस्टम , राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख , हथियारबंद नागरिक समाज कानूनों को गैजेट में प्रकाशित किया जाए। इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट देखने के लिए मेरे कवर पेज को क्लिक करें एवं डिस्क्रिप्शन देखें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Apr 16 2018 20:27:21 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

वे धीरे धीरे गणित-विज्ञान को बिलकुल खत्म कर देंगे। यदि रह भी गया तो सिर्फ सांकेतिक स्तर पर रह जाएगा !!
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news link -- <https://goo.gl/jH8Sbe>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Apr 19 2018 20:26:37 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

this article revealed , how kathua incident cooked !!

Rahul Arya Ballari Karnataka:

PLEASE READ THE POST FIRST AND THEN WATCH THE VIDEO.
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Over the last week or so, there has been a lot of talk about the rape and killing of a 8-year old kid in Rasana, Hiranagar (Tehsil), Kathua (District) in Jammu & Kashmir. Initially when the news broke out, I went through a couple of articles and, like most people, I was outraged. And thanks to the media, I was pretty much convinced that the accused persons were indeed the culprits. But I didn't want to jump the gun; so I decided to read all the news articles, watch as many videos as possible & read the all-important chargesheet filed by the Crime Branch before I posted my view. And I'm very glad that I took out the time (4hours a day for the past 4 days) to go through each and every word of the chargesheet and compare it with the information available in the public domain and social media.
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To say that there are loopholes in the investigation is an understatement. But let's begin at the very beginning. And I'll point to the discrepancies; and also raise some fundamental questions. I'll post the relevant links for those who are interested to read further. I've also attached a video which contains clips from a variety of sources.
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Link to the full text of the chargesheet filed by the Crime Branch:
<https://www.firstpost.com/india/kathua-rape-and-murder-case-full-text-of-chargesheet-filed-by-jammu-and-kashmir-police-4426853.html>;
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On 10th Jan, Asifa Banu, the 8-year old daughter of Mohd. Yousuf, had taken her horses for grazing at around 12:30pm. The horses returned back to the dhera by 4pm but Asifa was nowhere to be seen. The parents (or guardians) of the child enquired about her whereabouts and tried to track her down. Failing to find her, they lodged a complaint at the Hiranagar police station on the 12th of Jan. After a few days i.e. on Jan 17th, the dead body of Asifa was found in a nearby forest.
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During the course of investigation, the Hiranagar Police Station arrested a Juvenile who confessed to murdering the victim. He stated that he held the victim in a cattle shed for 7 days i.e. from 10th to the 16th of Jan but did not rape her. On the 16th, he did attempt to rape her and then proceeded to kill the girl by strangling her with the chunni that was worn by her.
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QUESTION 1: What was the motive to kidnap her? This question is very important as the juvenile DID NOT rape her for the first 6 days. So why did he kidnap a 8year old girl, keep her in his cattle shed and feed her everyday? There's not a mention of the motive in the chargesheet as far as the first investigation is concerned.
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QUESTION 2: The cattle shed is surrounded by houses. Was it possible that she could have been held there for 7 days without anyone noticing her? (Watch Clip 1 in the video)
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QUESTION 3: The juvenile is said to have fed the victim every day. If that is so, was human excreta and/or urine found in the cattle shed? No mention in the chargesheet.
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QUESTINO 4: Is there any physical or forensic evidence to prove that the victim was held in the cattle shed? Like for eg. hair strands, fingerprints, bits / pieces of the clothes worn by her, dna evidence, etc. Once again, the details are not found in the chargesheet.
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On the 23rd of Jan, the investigation was transferred to the J&K Crime Branch. Soon after, under the pretext of investigation, many Hindus were picked up randomly and tortured to obtain a confession. The locals demanded a fair and independent CBI investigation. But the demand was ignored by the state government. As a result, around 15 Hindu families migrated from Rasana towards the end of February. (Clip 2)
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ALLEGATION: Hindus are carrying out rallies to protect the rapists. And the Jammu Bar association too is trying to shield the rapists.
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FACT: The ones who are making this claim are wrong on multiple counts.
1. In the Indian legal system, there is something called "Presumption of innocence". It means that a person is considered to be innocent until proven guilty. So it would be totally wrong to say that the rallies are being organized to protect the rapists as the trial has just begun a few days ago (on 16th of April). The accused persons cannot be considered as criminals and rapists until it has been proven beyond reasonable doubt in a court of law. Legally speaking, the burden of proof is on the prosecution. It looks like our media and a certain section of the society who consider themselves "liberals" have already decided that the accused are guilty.
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2. The rallies were carried out for a number of reasons but the most important demands were to deport Rohingyas AND to transfer the investigation of the Kathua rape/murder case to the CBI. Note that the demand was for a fair investigation; not to end it. Here's an article dating back to 15th of February & it clearly states that the locals and the Hindu Ekta Manch demanded a CBI enquiry. This was almost 2 months before the outrage seen in the whole country.
<http://www.uniindia.com/kathua-rape-case-protesting-villagers-demand-cbi-probe-j-k-cm-reacts/states/news/1141094.html>;
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3. The bandh was called on the 11th of April 2018 for the following demands:
a. Deport illegal Rohingya & Bangladeshi immigrants.
b. Directing the officers of Tribal Affairs department to not dislocate tribals till Tribal policy is formulated.
c. Handing over the investigation of the Kathua rape / murder case to the CBI.
d. Resolution of the issues raised by the people of Nowshera, Sunderbani & Kalakote.
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Here is a video which shows the lawyers and other organizers shouting "Go back, Go back, Rohingyas go back" slogan at the rally. And the head of the Jammu Bar Association explains their demands. It was at this event that the flag was waved. It was not waved to protect the rapists. (A small segment of the same video can be watched in the attached video; clip 3)
<https://youtu.be/TIidZp5eAxI>;
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4. The daughter of the prime accused Sanji Ram has demanded that the investigation be handed over to the CBI. And if the CBI investigation uncovers conclusive proof of her father's guilt, then he should be punished. (Clip 4).
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Let us now look at the conclusions reached by the second investigation team i.e. the J&K Crime Branch.
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According to the chargesheet, the prime accused Sanji Ram was the mastermind of the crime. He sought the help of his nephew (the juvenile), his son Vishal, the nephew's friend Parvesh Kumar (Mannu), Special Police Officer Deepak Khajuria and four others to execute his plan and to cover-up his involvement.
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As per the chargesheet, here's how the events unfolded: On the 7th of Jan, Deepak Khajuria purchased one strip of Epitril 0.05mg containing 10 tablets. A couple of days later, on the 9th, the juvenile and his friend Mannu bought 4 Manars (a sedative?), consumed one and kept the other 3 in his pocket. On Jan 10th, the juvenile and his friend Mannu kidnapped Asifa. As Mannu held the legs of the victim, the juvenile administered Manars’ one by one forcibly to the victim. She was then raped by the juvenile; Mannu attempted to rape her but could not do it. They then took the girl and hid her inside Devisthan under the table over two Chatayees (plastic Mats) and then covered her with two Darees (cotton thread Mats).
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The next day ie 11th, two tablets of Epitril 0.05mg were given to the girl to sedate her. The juvenile then called Sanji Ram's son Vishal, told him about the kidnapping and asked him to return from Meerut in case he wanted to satisfy his lust. Vishal reached Rasana at 6am the following day (Jan 12th). At 8.30am, the victim was given 3 sedative tablets of the said drug and 3 more tablets were given to her on the next day i.e. Jan 13th. Vishal then proceeded to rape the victim. She was then taken to a nearby culvert with the intention of killing her. Deepak Khajuria raped the victim and she was killed immediately after. Her dead body was moved back into the Devisthaan for two days and on the 15th, it was dumped in the jungle. The dead body was discovered on the morning of 17th and a postmortem was conducted on the same day at 2:30pm.
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QUESTION 5: The chargesheet says that the accused Deepak Khajuria wanted to buy Epitril 0.5mg tablets but as it was not available at the medical store, the shopkeeper gave him a strip of Epitril 0.05mg tablets. I googled the name of these two drugs & their concentrations. I found out that Epitril is only available in the 0.25mg & 0.5mg concentration and not 0.05mg !!!
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To verify this information, I spoke to the owner of one of the most well-known medical stores in our area. He has been engaged in this line of work for more than 20 years. He confirmed that Epitril (Clonazepam) is not available in 0.05mg concentration.
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I then spoke to my Mamaji, Mr. Sudheer Kumar Dundigalla, a gold-medallist in M.Pharmacy and the Director of Care College of Pharmacy, Warangal. He told me that 0.05mg would be too low; and Epitril is NOT available in the said concentration.
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You can visit www . 1mg . com (remove spaces) and check for yourself.
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How could the accused persons have bought a tablet that isn't even available??!! Only 8 of the 10 tablets were used and the remaining two were found by the crime branch during the course of the investigation. So we'll know more if the pic of the strip is made public.
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QUESTION 6: The chargesheet says that the victim was killed on the 13th and her body was hidden in the temple for two days. As anyone with a little common sense would know, the body BEGINS to decompose after death. How is it possible that the body was kept for a period of close to 48 hours in the temple and nobody even smelled it? Absolutely impossible.
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QUESTION 7: The people of the nearby villages visit the temple every day. The diyas are lit twice every day; in the morning and evening. How could it be that the body was not spotted by any one? After all, this is a small temple with 4 windows (2 on one side; and 2 on the opposite side), a single room with no place to hide a dead-body. (Clip 5)
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QUESTION 8: The festivals of Lohri & Makar Sankranti fell on the 13th & 14th of Jan. It is common knowledge that Hindus make it a point to visit temples on the occasion of festivals. The locals say that hundreds of devotees were at the temple on the 14th of Jan. What is the probability of the dead body not being discovered by such a large crowd especially after the death of the victim (rotting smell)? Locals have also said that hundreds of devotees visit the temple every Sunday; this is important as 14th of Jan was infact a Sunday. So how could it be that the body was not discovered from a single-room temple?
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QUESTION 9: Why does the chargesheet not mention that there were three doors to the temple and each one could be opened with a different key? The chargesheet makes the claim that there is only one key and Sanji Ram possessed it.
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Here's the relevant section of the chargesheet: "..........Devisthan which is exclusively manned by accused Sanji Ram to the exclusion of any other person of the area."
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This is a white lie if you go by the statement of the locals. (Watch Clip 6)
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QUESTION 10: The table found at the temple was found to be around 2 feet high & around 2.5 feet in width. Is this table big enough to accommodate a dead body of a 8 year old girl? (Clip 7)
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QUESTION 11: The body was discovered in the forest nearby Sanji Ram's house. If Sanji Ram was indeed the "mastermind" that we are told he was, why did he choose to dump her body just 100 meters from his house? Why did he not dump it in the dense forest behind the temple? (Clip 8)
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QUESTION 12: ALTERNATIVE THEORIES: Has the Crime Branch looked into other possible suspects? For eg. The famous Kashmiri activist Sushil Pandit claims that the biological parents of Asifa were dead and she was being raised by her uncle. And Asifa had some property in her name. Any sane investigation will look into the financial aspect of the crime. If indeed these claims by Sushil ji are true, then one needs to look into those who would gain / benefit in the event of Asifa's death. (Clip 9)
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This clip was taken from a video of CNN Newspoint uploaded by News18 YouTube channel. Interestingly enough, this video deleted from their channel !!! I had downloaded the video and that is how I was able use the clip in the attached video. Here is the link where the video was originally posted.
<https://youtu.be/iIjq4FauMug>;
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QUESTION 13: ALTERNATIVE THEORIES: The daughter of Sanji Ram claims that on the 16th of Jan, the police and the Bakarwals searched the very area where the body was found on the next day (17th). But no dead body was found on the 16th at the same place. So this raises the possibility that the body was dumped in the said area on the night of 16th Jan. Sanji Ram's daughter and the locals have a very interesting theory. Please watch the video. (Clip 10)
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QUESTION 14: If the claim made by the locals (that hundreds of devotees were present at the temple on 14th) can be verified, then it more or less proves that there was no dead body at the temple. This raises a very disturbing question: If the dead body was not there at the temple at all, then how could the hair of the victim be found at the scene? Was it planted there?
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Let me explain: The only piece of physical evidence that ties Asifa to the temple is a strand of hair that was said to be found at the Devisthaan. Assuming that the police already had access to Asifa's clothes, hairs, etc. (which they surely would have, as the police took custody of the body on 17th), how does one prove that the strand of hair was not planted at the site by the ones who had access to it? This is important as one needs to remember that the crime branch was brought in on the 23rd of Jan i.e. 6 days after discovering the body. And it was this team that brought the temple into the picture; not the first one.
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If this line of enquiry is pursued, then it may lead to some very interesting answers.
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QUESTION 15: The accused Vishal (son of Sanji Ram) is said to have arrived in Rasana on the 12th of Jan. One needs to keep in mind that Vishal is a student of B.Sc. Agriculture and was appearing for his exams on the very same day !!! How could one person be present at two different places more than 500 kms apart at the same time? There is a picture that is being shown in various news channels and being circulated on social media which clearly shows Vishal's signature on the attendance sheet. The date is 12th Jan 2018 !! If this pic is indeed genuine, then it is sufficient to acquit Vishal and cast a serious doubt on the whole investigation. The chargesheet also mentions that the CCTV footage of the examination hall has been seized and sent to FSL (Forensic Science Laboratory). Will the UNEDITED video footage be released? If released, many questions will be answered. (See pic in the first comment)
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There are other facts which I haven't mentioned here like - the statements of many of the witnesses was obtained by torturing them; the witnesses revealed the extent of torture to the magistrate; the prosecution DID NOT give a copy of the full 490-page chargesheet which contains the statements of the witnesses and the evidence to the accused persons, the chargesheet mentions "investigations regarding the complete financial trail are underway", the accused have demanded narco test to prove their innocence, Vishal and his friends had been to an ATM around the said dates (the video footage of the CCTV cameras at the said ATM must be verified) etc. I chose not to elaborate on these points as the article would become too lengthy.
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I hope that it is now clear that both the investigating teams have done a rather poor job. This is why the locals have been demanding a CBI investigation. The locals are NOT shielding the rapists; they are probably the only ones in the state of J&K who are interested to find the truth. Most of the media, the leftist & liberal intellectuals, have already concluded that the accused are the culprits !!! What a shame.
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THE CORE PROBLEM: As with the Aarushi Talwar/Hemraj double murder case, this case has also shown us the drawbacks of the investigation agencies, hidden agendas, manufactured evidences, etc. Why is it that the police and investigation agencies indulge in such unlawful practices? In my opinion, there are two main reasons.
1. SP, Commissioner, and other heads are NOT directly elected by the citizens nor can they be recalled by the citizens. So they are neither accountable to the citizens nor do they fear them.
2. Even if the police officers / investigators are guilty, they know that they can get away by bribing the judges (yes, it happens more often than you may think).
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REAL AND ONLY SOLUTION:
1. The citizens should have the power to DIRECTLY ELECT AND RECALL their SP, Commissioner, etc. This will reduce corruption and inefficiencies of the police departments to a large degree.
2. The citizens should have the power to DIRECTLY ELECT AND RECALL the public prosecutor.
3. Judge system should be replaced with Jury System to make sure our courts are free from corruption and nepotism.
4. All the documents related to all civil and criminal cases like postmortem report, crime scene photographs, witness statements to the police (text and video), depositions of the witnesses and accused in the court, etc. should be uploaded to a designated government owned website.
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Please note that all of the so-called experts, political commentators, Kashmiri separatists masquerading as pro-justice like Shehla Rashid, bloggers like Dhruv Rathi, etc. have NOT proposed any SYSTEMIC SOLUTION or necessary LAW DRAFTS required to reduce the crimes against women. They only pay lip service and shout slogans. This proves that they have no intention of solving the problem.
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For more information on the proposed solutions, please read our manifesto at
www .rahulmehta . com /301 .htm (remove spaces).
And visit our YouTube channel
www.youtube.com/user/righttorecallgroup/videos
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Kindly share this post and the video. And post it to as many whatsapp and facebook groups as possible.
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(Original post by Rahul Arya, Right to Recall Party)

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 22 2018 07:32:59 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भारत में विभिन्न अपराधो के नतीजे में हजारो लोग मरते और पीड़ित होते है , लेकिन जज घूस खाकर इन मामलो को दफन कर देते है। तो मैं जज लोया की मृत्यु पर संवेदना जताने में अपना समय बर्बाद करने की कोई वजह नहीं देखता।
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हो सकता है जज लोया की मृत्यु स्वाभाविक रूप से हुई हो या फिर उनकी हत्या कर दी गयी हो। मुझे नहीं पता। लेकिन यदि उनकी हत्या भी की गयी थी तो क्या मुझे इसकी जांच की मांग पर अपने आप को खपाना चाहिए ?
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मुझे नहीं लगता कि, मुझे इस पर अपना समय एवं उर्जा जाया करनी चाहिए। क्योंकि यह आदमी भी भारत के सबसे ज्यादा भ्रष्ट , सबसे ज्यादा निकम्मे और सबसे ज्यादा नाकाबिल दस्ते का एक अंग था। और यह वर्ग हर वर्ष हजारों लोगो की हत्या एवं उत्पीडन के मामलों को दफन कर देता है।
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असल में जज लोया के साथ न्याय हुआ। उन्हें जिन्दगी भर जो किया इत्तिफाक से उन्हें इसकी सजा मिल गयी।
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इस आशय की विश्वसनीय अफवाहें है कि जज लोया को घूस के रूप में एक बड़ी राशि ऑफर की गयी थी। लेकिन लोया ने इनकार कर दिया। वे घूस में दुगनी राशि चाहते थे , और साथ में प्रमोशन भी !! तो किसी ने इस समस्या का "निपटान" सिर्फ एक चौथाई राशि में कर देने की सलाह दी।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 22 2018 16:30:27 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों ने दिसम्बर-2017 में यह क़ानून ( रूलिंग ) लागू किया था कि -- अब से नॉमिनी वारिस नहीं होगा !!! तो अब से नॉमिनी होने के बावजूद वसीयत के अभाव में यह तय करने के लिए विवाद कायम किया जा सकेगा कि सम्पत्ति का वारिस होगा !! भ्रष्ट मोदी साहेब और संघ के स्वयंसेवको ने इस रूलिंग के कारण खड़ी होने वाली समस्याओ को ख़त्म करने के लिए आवश्यक क़ानून को लागू करने से इनकार कर दिया है।
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तो अब से जिस सम्पत्ति का नॉमिनी है किन्तु वसीयत नहीं है तो मुकदमेबाजी की जा सकेगी। और यहाँ तक कि, यदि वसीयत मौजूद होने पर भी मामला दायर किया जा सकेगा। वारिसान के निर्धारण के लिए वकील 20 हजार से लेकर लाखों रूपये तक की फ़ीस वसूल सकेंगे। और यदि एक से अधिक पक्षकार दावेदार है और सम्पत्ति प्रचुर मात्रा में है तो फ़ीस कहीं ऊँची वसूल की जा सकेगी। इससे संपत्तियों के हस्तान्तरण में विलम्ब होगा और अर्थव्यवस्था धीमी होगी। यह पूरा ड्रामा सिर्फ इसीलिए किया गया है ताकि जज इस प्रकार के मामलो में मोटी घूस खा सके। क्योंकि यह जानी मानी बात है कि जहां मामला पैसो का हो जजों को घूस दिए बिना मामला नहीं सुलटाया जा सकता। तो इससे वकीलों एवं जजों दोनों की आमदनी बढ़ेगी।
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संघ के कई नेता वकालत के पेशे में है और संघ के कई कार्यकर्ताओं के वकीलों के साथ गहरे गठजोड़ है। अत: वे वकीलों एवं जजों की आमदनी बढ़ाना चाहते है। सिर्फ इसी वजह से संघ के स्वयंसेवकों एवं भ्रष्ट मोदी साहेब ने इस रूलिंग के प्रभाव को खत्म करने के लिए क़ानून बनाने से इनकार कर दिया है।
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समाधान -- ज्यूरी सिस्टम लाये बिना इन लोगो को किसी भी तरह से सुधारा नहीं जा सकता।
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ज्यूरी सिस्टम का प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट देखने के लिए मेरी कवर पिक्चर को क्लिक करे एवं डिस्क्रिप्शन देखें।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 22 2018 16:53:42 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज दीपक मिश्रा पर महाभियोग -- इस ड्रामे से हमारा कोई सरोकार नहीं बनता।
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मौजूदा सिस्टम में जज होने के लिए भ्रष्ट होना पहली शर्त है। दीपक मिश्रा एक भ्रष्ट जज है। यदि इन्हें हटा दिया जाता है ( -- जो कि मुमकिन नहीं नजर आता ) तो आने वाला जज भी भ्रष्ट होगा। इनसे पहले जो आदमी इस पद पर था वो भी भ्रष्ट था। जो सांसद मिश्रा पर महाभियोग लाने का समर्थन कर रहे है वे सभी भ्रष्ट है, और जो सांसद मिश्रा को पद पर बनाए रखना चाहते है वे भी भ्रष्ट है। सुप्रीम कोर्ट के जो 4 जज अपने दडबो से निकलकर जनता के सामने आकर मिश्रा के खिलाफ पुकारा लगा रहे थे , वे भी भ्रष्ट है। इन भ्रष्ट लोगो में आपसी हितो का टकराव हो रहा है , और यह ड्रामा उसी टकराव का नतीजा है।
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न तो जनता ने मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट के लिए चुना है और न ही जनता को पूछ कर उनकी नियुक्ति की गयी थी। तो इस सर्कस से हमारा कोई लेना देना नहीं बनता।
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मेरा प्रस्ताव है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार भारत के मतदाताओं को होना चाहिए। जब मतदाता अपने बहुमत का प्रदर्शन करके किसी न्यायधीश को पद से बेदखल करेंगे तो ऐसे महाभियोग के कुछ मायने होंगे।
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भ्रष्ट मोदी साहेब एवं संघ के सभी स्वयंसेवक ऐसे क़ानून का विरोध कर रहे है जिससे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश को नौकरी से निकालने की शक्ति आम नागरिको के पास हो। और सोनिया एवं केजरीवाल तो खैर ऐसे क़ानून के विरोधी है ही।
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देश में राईट टू रिकॉल पार्टी एक मात्र ऐसी पार्टी है जिसने भारत के मुख्य न्यायधीश को नौकरी से निकालने के लिए आवश्यक "राईट टू रिकॉल सुप्रीम कोर्ट न्यायधीश" का ड्राफ्ट दिया है। तो यदि आप न्यायपालिका में व्याप्त भाई भतीजावाद एवं भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए "राईट टू रिकॉल सुप्रीम कोर्ट न्यायधीश" का क़ानून चाहते है तो राईट टू रिकॉल पार्टी द्वारा प्रस्तावित क़ानूनो का प्रचार करें। सोनिया-मोदी-केजरीवाल के पास आपको देने के लिए सिर्फ 3 चीजे है -- भाषण , वादे और नौटंकी।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 22 2018 18:17:57 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भारत के जज भ्रष्ट एवं निकम्मे ही नहीं है , बल्कि वे अनिवार्य रूप से बहुधा "नाकाबिल" भी होते है।
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भारत में जजों के नियुक्ति की प्रक्रिया को जान बूझकर ऐसा बनाया गया है कि मेधावी व्यक्ति कभी भी जज नहीं बन पाता , लेकिन भ्रष्ट , भाई भतीजावादी एवं नाकाबिल लोग ही जज बन पाते है।
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जज की नियुक्ति के लिए दो तरह की प्रक्रियाओ का इस्तेमाल किया जाता है -- १) प्रतिस्पर्धी परीक्षा , २) सीधा मनोनयन या नियुक्ति।
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१) प्रतिस्पर्धी परीक्षा :
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न्यायिक सेवाओं की प्रतिस्पर्धी परीक्षा में भाग लेने के लिए अर्हता है कि , उम्मीदवार ने एलएलबी की हो , तथा उसे 5 वर्ष की वकालत का अनुभव हो। कक्षा 10 तक जिन छात्रों की मेधा अध्ययन में प्रदर्शित होती है वे विज्ञान-गणित में अच्छा प्रदर्शन कर पाते है। अत: मेधावी छात्रों की पहली किश्त यहाँ से गणित-विज्ञान विषय की और मुड़ जाती है और आगे चलकर मेडिकल / इंजीनियरिंग के पेशे की और रुख कर लेती है। इन शेष छात्रों में से मेधावी छात्रों की दूसरी खेप कक्षा 12 के बाद सीए फाउन्डेशन पास करके सीए का पेशा अपना लेती है।
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लॉजिक एवं विश्लेषण में अच्छा प्रदर्शन न करने वाले छात्र कला यानी आर्ट्स की शरण लेकर बीए करते है। मृत प्रकृति के इन अनुत्पादक विषयों को ढंग से आत्मसात कर लेने में सफल कुछ छात्र स्नातक के बाद प्रशासनिक सेवाओं में चयनित हो जाते है एवं बचे हुओ में से कुछ कम काबिल लोक सेवा / राज्य सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाएं पास कर लेते है। बचे हुए इन "शेष" छात्रों में से कुछ एलएलबी करते है व अगले कुछ वर्षो तक वकालत करते रहते है। और वकालत के 5 वर्ष बाद ये "बचे" हुए छात्र न्यायिक सेवाओं की परीक्षा देने की अर्हता हासिल कर लेते है !!! इनमे से भी जिन लोगो की वकालत चल निकलती है वे न्यायिक सेवाओं की और रुख नहीं करते , और न ही उन्हें इसके लिए समय रहता है।
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परीक्षा पास करने के बाद सभी छात्रों को अनिवार्य रूप से साक्षत्कार से गुजरना पड़ता है। साक्षत्कार जज लेते है और चयन करने के लिए वे अच्छी खासी घूस वसूलते है, या फिर अपने भाई भतीजो को पास कर देते है। तो इस तरह लगातार असफलताओं से गुजरते हुए एक छात्र जज बनने के लिए तैयार हो पाता है। और इनमे से ज्यादातर जज सिर्फ तब ही नियुक्त होते है जब वे साक्षत्कार में अच्छे अंक पाने के एवज में मोटा भुगतान करते है।
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२) सीधा मनोनयन या नियुक्ति
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इस प्रक्रिया में कोई प्रक्रिया नहीं है। जज प्रेक्टिस करने वाले वकीलों से मोटी घूस खाकर उन्हें सीधे लोअर कोर्ट , हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति दे देते है। जिस वकील के पास जितनी अच्छी सेटिंग और पैसा होगा उसके जज बनने के अवसर उतने ही बढ़ जायेंगे।
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ज्ञातव्य है कि चीन में जज के लिए आयोजित प्रतिस्पर्धी परीक्षा कक्षा 12 के बाद आयोजित की जाती है , एवं इस परीक्षा में गणित विषय का पर्चा भी होता है। इस तरह गणित का पेपर पास करने के कारण चीन के जजो में लॉजिक एवं विश्लेषण की ज्यादा काबलियत होती है। यदि छात्र परीक्षा पास कर लेता है , तो उसे बाद में क़ानून का पाठ्यक्रम पास करना होता है यानि एलएलबी की डिग्री लेनी होती है। इस तरह चीन फर्स्ट राउंड में ही उपलब्ध बेहतरीन मानव संसाधन में से जजो का चयन कर लेता है। दूसरा बड़ा अंतर है यह की चीन में साक्षत्कार नहीं लिए जाते। नियुक्ति सिर्फ लिखित परीक्षा द्वारा ही की जाती है। साक्षात्कार के अभाव में चीन के जजों की नियुती में भाई भतीजा वाद एवं भ्रष्टाचार मौजूद नहीं है। और इसी वजह से चीन की न्यायपालिका ज्यादा कार्यकुशलता से कार्य करती है। इसके अलावा चीन में भारत के 18,000 जजों के मुकाबले 2 लाख जज है।
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अमेरिका में जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार आम नागरिको के पास है। राईट टू रिकॉल जज होने कारण जज तमीज से पेश आते है और भ्रष्ट आचरण करने से परहेज करते है। यदि फिर भी वे भ्रष्टाचार करने से बाज नहीं आते तो जनता लात मार कर उन्हें पद से हटा देती है। और सबसे बड़ी बात यह कि, अमेरिका में जूरी सिस्टम होने के कारण मुकदमो की सुनवाई करने और दंड देने की शक्ति नागरिको के पास है। इस वजह से मुकदमो का फैसला महीने दो महीने में आ जाता है। दंड देने की प्रणाली सुचारू होने से देश एवं समाज के हर वर्ग में अपराध कम होता है एवं उत्पादकता में वृद्धि होती है।
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समाधान - हमने जजों के भ्रष्टाचार को काबू करने एवं न्यायपालिका को दुरुस्त करने के लिए हमने राईट टू रिकॉल जज एवं ज्यूरी सिस्टम कानूनों का प्रस्ताव किया है। राईट टू रिकॉल जज कानून लागू होने से भारत के नागरिको को भ्रष्ट जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार मिल जाएगा एवं ज्यूरी सिस्टम आने से दंड देने की शक्ति नागरिको के हाथो में आ जायेगी। निचे प्रस्तावित कानूनों के ड्राफ्ट दिए गए है। यदि आप इन कानूनों का समर्थन करते है तो प्रधानमंत्री को ट्विट करें कि इन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित किया जाए।
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१) जिला न्यायलय में ज्यूरी प्रक्रिया के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/829456537232542>;
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२) उच्च न्यायलय और उच्चतम न्यायलय में ज्यूरी प्रक्रिया के लिए प्रस्तावित ड्राफ्ट:
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/865700823608113>;
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३) राईट टू रिकॉल उच्चतम न्यायालय मुख्य न्यायाधीश के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/859860420858820>;
.
४) राईट टू रिकॉल उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट:
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/859860140858848>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 22 2018 20:09:54 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

एक मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है -- यदि भारत को आप तालाब मान लें तो हमारे जज मछलियाँ है। और ये सभी मछलियाँ निरंतर इस तालाब को गन्दा कर रही है।
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पुलिसकर्मी आपका दमन करेंगे तो आप थानेदार के पास जायेंगे। थानेदार भी भ्रष्ट है तो आप एसपी के पास पहुंचेंगे। यदि एसपी एवं कलेक्टर भी आपका दमन करते है तो आप अदालत पहुंचेंगे। अब यदि जज भी भ्रष्ट है ( जो कि वे है ) तो आप क्या करेंगे ? आपको वहां से न्याय नहीं बल्कि धक्के खाने को मिलेंगे। फिर आप हाई कोर्ट पहुंचेंगे। किन्तु वहां लोअर कोर्ट से भी ज्यादा भ्रष्ट लोग बैठे है। अब आपका और व्यवस्था का अंतिम ठिकाना सुप्रीम कोर्ट है। और यह खुली हुई बात है कि भारत का सुप्रीम कोर्ट भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा अड्डा है। अब सुप्रीम कोर्ट से आगे आपके पास या भारत के किसी भी नागरिक के पास कोई अपील नहीं है। इस तरह भारत के जज भ्रष्टाचार की गंगोत्री है। भारत के सभी प्रकार के सभी विभागों एवं मंत्रालयों में व्याप्त भयंकर भ्रस्टाचार की जड़ में जजों का भ्रष्टाचार है। यदि जज ईमानदार हो पूरे देश में सभी प्रकार के भ्रष्टाचार , अन्याय , दमन एवं उत्पीडन में कमी आ जायेगी।
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जजों का यह भ्रष्टाचार भारत की जड़ो को खोखला करके हर तरह से भारत को तोड़ रहा है। गरीबी, भुखमरी , अवरुद्ध औद्योगिक विकास , महंगाई , बलात्कार, शोषण , बेरोजगारी , अन्याय , गुंडागर्दी आदि सभी प्रकार की समस्याओं का एक मात्र कारण जजों का भ्रष्टाचार है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जब पटवारी घूस खाता है तो वह देश की अर्थव्यवस्था को उतना नुक्सान नहीं पहुंचाता , किन्तु जब जज भ्रष्ट हो जाते है तो देश को तोड़ कर पूरी व्यवस्था को ही ढहा देते है। इस तरह से जजों का भ्रष्टाचार एंटी-नेशनल है।
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हम नेताओं के भ्रष्टाचार के खिलाफ इतने मुखर है , किन्तु इस बात पर ध्यान देने की जहमत नहीं उठाते कि यदि नेता भ्रष्टाचार करता है तो उसकी एक मात्र वजह यह है कि हमारे जज भ्रष्ट है। यदि जज ईमानदार होंगे तो नेताओं के भ्रष्टाचार में नाटकीय रूप से कमी आ जायेगी। क्योंकि नेताओं को सजा देने का अधिकार भी जजों के पास ही है। लेकिन जज उन्हें सजा देने की जगह उनके भ्रष्टाचार में से अपने हिस्से की घूस वसूल कर लेते है।
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समाधान - हमने जजों के भ्रष्टाचार को काबू करने एवं न्यायपालिका को दुरुस्त करने के लिए हमने राईट टू रिकॉल जज एवं ज्यूरी सिस्टम कानूनों का प्रस्ताव किया है। राईट टू रिकॉल जज कानून लागू होने से भारत के नागरिको को भ्रष्ट जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार मिल जाएगा एवं ज्यूरी सिस्टम आने से दंड देने की शक्ति नागरिको के हाथो में आ जायेगी। निचे प्रस्तावित कानूनों के ड्राफ्ट दिए गए है। यदि आप इन कानूनों का समर्थन करते है तो प्रधानमंत्री को ट्विट करें कि इन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित किया जाए।
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१) जिला न्यायलय में ज्यूरी प्रक्रिया के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/829456537232542>;
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२) उच्च न्यायलय और उच्चतम न्यायलय में ज्यूरी प्रक्रिया के लिए प्रस्तावित ड्राफ्ट:
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/865700823608113>;
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३) राईट टू रिकॉल उच्चतम न्यायालय मुख्य न्यायाधीश के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/859860420858820>;
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४) राईट टू रिकॉल उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट:
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/859860140858848>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Apr 23 2018 10:49:52 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

खाद्य पदार्थो में मिलावट रोकने के लिए प्रस्तावित क़ानून -- "राईट टू रिकॉल खाद्य सुरक्षा अधिकारी"
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यदि आपने राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का ड्राफ्ट पढ़ा है तो यह ड्राफ्ट उसी के समान है। किन्तु यदि आपने राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी के लिए प्रस्तावित ड्राफ्ट नहीं पढ़ा है एवं आप खाद्य पदार्थो में मिलावट की रोकथाम चाहते है तो यह ड्राफ्ट आपके लिए उपयोगी होगा।
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प्रूफ रीडिंग के बाद हम यह ड्राफ्ट newindia .in पर अपलोड करेंगे। नागरिको से अपील है कि वे @pmoindia पर पीएम को एवं अपने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ट्विट करके इस क़ानून को लागू करने की मांग करे।
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इस कानून में जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी = DFSO ( District Food Safety Officer. ) पर राइट टू रिकॉल एवं मिलावट से सम्बन्धित विवादों के निपटान हेतु ज्यूरी द्वारा सुनवाई का प्रावधान किया गया है।
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कृपया इस बात पर भी विशेष रूप से ध्यान दें कि, सोनिया-मोदी-केजरीवाल खुद के राजनितिक / आर्थिक फायदों के लिए हमेशा से ही मिलावट रोकने के लिए प्रभावी कानून का विरोध करते रहे है। और कोंग्रेस-बीजेपी एवं आम आदमी पार्टी के सभी कार्यकर्ता भी इस क़ानून के विरोध में है।
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यदि आप देश के खाद्य पदार्थो में मिलावट रोकना चाहते है तो कृपया सोनिया-मोदी-केजरीवाल का समर्थन करके अपना समय एवं उर्जा नष्ट न करे। इन नेताओं एवं पार्टियों का समर्थन करने की जगह इस क़ानून को लागू करवाने का प्रयास करें।
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खाद्य पदार्थो में मिलावट रोकने के लिए प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट
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[ टिप्पणी : मिलावट रोकने का यह कानूनी ड्राफ्ट मुख्यमंत्री द्वारा सीधा राज्य के राजपत्र ( गैजेट ) में छापा जा सकता है, मुख्यमंत्री को विधानसभा या लोकसभा से इस प्रस्ताव को पारित करवाने की आवश्यकता नहीं है। ]
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इस ड्राफ्ट के तीन भाग है -
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भाग - I : नागरिकों के लिए सामान्य निर्देश
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भाग- II : ड्राफ्ट में दी गयी प्रक्रिया का सारांश
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भाग- III : अधिकारियों के लिए निर्देश एवं इस सम्बन्ध में टिप्पणियाँ
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इस ड्राफ्ट के महत्वपूर्ण खंड है - (1.1) , (2) , (7.1) , (7.2) , (7.5) , (8.1) , (15.1) , (15.2) , (J.4.1)

इस कानून-ड्राफ्ट के लेखको की राय में अन्य खंड अति-महत्वपूर्ण नही है और केवल सामान्य समझ के लिए है। ]
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राईट टू रिकॉल जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी को रिकॉल करने की जो प्रक्रिया यहाँ दी गयी है , उसे विस्तृत रूप से समझने के लिए - <https://newindia>; .in/causes/rtr-deo/ पर रखें गए राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी का ड्राफ्ट देखें I

इस ड्राफ्ट में दी गयी ज्यूरी ट्रायल की प्रक्रियाओ को विस्तृत रूप से समझने के लिए कृपया - <https://newindia>; .in/causes/jury-sys/ पर रखे गए ड्राफ्ट को देखें I
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भाग - I : नागरिकों के लिए सामान्य निर्देश
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(1) पदासीन जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी को या नये ज़िला खाद्य सुरक्षा अधिकारी की उम्मीदवारी को अनुमोदित करना :
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(1.1) यदि कोई मतदाता अपने जिले के खाद्य सुरक्षा अधिकारी को बदलना चाहता है, तो वह पटवारी कार्यालय में किसी भी दिन उपस्थित होकर किसी उम्मीदवार को अपना अनुमोदन दे सकता है। अनुमोदन दर्ज करवाने की इस प्रक्रिया के लिए समय , दिनांक , अवधि आदि का कोई निर्बन्धन लागू नहीं होगा। इन अनुमोदनों के आधार पर जिले के खाद्य सुरक्षा अधिकारी को बदला जा सकेगा।
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(1.2) खाद्य सुरक्षा अधिकारी खाद्य पदार्थो में मिलावट की जाँच आदि के लिए लैब आदि की स्थापना करेगा, मिलावटीयों को पकड़ने के लिए मुखबिरों का जाल बिछाएगा एवं मिलावटीयों के संस्थानों पर छापे मारने की कार्यवाही सम्पन्न करेगा। उसे ये कार्यवाही इस तरह से करेगा कि उन कारोबारियों को न्यूनतम असुविधा का सामना करना पड़े जो मिलावटी वस्तुओ के कारोबार में शामिल नहीं है। यदि खाद्य सुरक्षा अधिकारी यह काम सावधानी से नहीं करेगा तो आप यानी जिले के मतदाता ऐसे अधिकारी को नौकरी से निकाल कर दुसरे व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त कर सकेंगे।
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(2) आप को ( आशय मतदाता से है ) किसी मिलावट की शिकायत या किसी विवाद के निपटान हेतु ज्यूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि किसी कारोबारी द्वारा मिलावट करना पाया जाता है या खाद्य सुरक्षा अधिकारी के कर्मचारियों द्वारा कर्तव्य में लापरवाही या अकर्मण्यता दिखायी जाती है तो इन शिकायतों का निपटान करने के लिए ज्यूरी बुलाई जायेगी, एवं यदि ज्यूरी में आपको बुलाया गया है तो आपको नगर परिषद् में उपस्थित होकर विवाद की सुनवाई करनी होगी एवं आरोपियों पर फैसला देना होगा। यदि आप ज्यूरी में उपस्थित होने से इनकार करते है तो ग्रेंड ज्यूरी आप पर दंड लगा सकती है।
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भाग - II : ड्राफ्ट में दी गई प्रक्रिया का सार
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(3) टिप्पणी: सम्पूर्ण ड्राफ्ट का सार
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(3.1) मतदाताओ के पास खाद्य सुरक्षा अधिकारी को बदलने या नौकरी से निकालने की प्रक्रिया होगी एवं उसके स्टाफ के खिलाफ की गयी शिकायतों एवं मिलावट आदि के मामलो का निपटान नागरिको की ज्यूरी द्वारा किया जायेगा।
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(3.2) राईट टू रिकॉल खाद्य सुरक्षा अधिकारी की प्रक्रिया को और भी अच्छे से समझने के लिए कृपया राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी का ड्राफ्ट देखें। यह ड्राफ्ट ‘newindia dot in / causes/RtrDeo3 ’ पर देखा जा सकता है।
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(3.3) किसी राज्य के मतदाता अमुक राज्य में दर्ज कुल मतदाताओं के स्पष्ट बहुमत का प्रदर्शन करके अमुक राज्य में स्थित किसी जिले में लागू राईट टू रिकॉल जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी एवं ज्यूरी प्रक्रियाओ को 4 साल तक के लिये निरस्त कर सकते है। और भारत देश के मतदाता देश में दर्ज कुल मतदाताओं के स्पष्ट बहुमत का प्रदर्शन करके किसी राज्य या जिले में लागू इन प्रक्रियाओ को 4 साल तक के लिये निरस्त कर सकते है।
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भाग III : अधिकारीयों के लिए निर्देश और टिप्पणीयां
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(4) टिप्पणी क्या है : ये टिप्पणीयां इस कानूनी ड्राफ्ट का वास्तविक हिस्सा नहीं है। कार्यकर्ता और नागरिक ड्राफ्ट को समझने हेतु इसका उपयोग कर सकते है। जूरी सदस्य इन टिप्पणीयों का उपयोग किसी मामले के फैसले के लिए सन्दर्भ के रूप में ले सकते है। किन्तु ये टिप्पणीयां किसी पर भी बाध्यकारी नहीं है।
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(5) शब्द "कर सकते है" का आशय है - किसी भी प्रकार का नैतिक-कानूनी बंधन नहीं। इसका स्पष्ट अर्थ है "कर सकते है" या "ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है"।
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(6) खाद्य सुरक्षा अधिकारी के लिए उम्मीदवारी
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(6.1) मुख्यमंत्री प्रत्येक जिले के लिए खाद्य सुरक्षा अधिकारी की नियुक्ति करेंगे। यदि जिला बड़ा है तो मुख्यमंत्री जिले को दो या अधिक संभागो में बाँट सकते है और प्रत्येक संभाग के लिए अलग से खाद्य सुरक्षा अधिकारी की नियुक्ति कर सकते है।
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(6.2) यदि किसी व्यक्ति के पास स्नातक डिग्री है तथा वह लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए आवश्यक पात्रता पूरी करता है, तो वह खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनने के लिए आवेदन कर सकता है। यदि इन पात्रताओ को धारण करने वाला कोई व्यक्ति जिला कलेक्टर के समक्ष आता है और कार्यरत खाद्य सुरक्षा अधिकारी को प्रतिस्थापित करने के लिए स्वयं को पंजीकृत करने हेतु आवेदन करता है तो जिला कलेक्टर सांसद के चुनाव में ली जाने वाली राशि के बराबर शुल्क लेकर उसका आवेदन स्वीकार करेगा। आवेदन स्वीकृत होने पर जिला कलेक्टर एक सीरियल नंबर जारी करेगा और उम्मीदवार का नाम और अन्य सम्बंधित सूचना मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखेगा। यदि उम्मीदवार चाहे तो लिखित में आवेदन करके अपनी उम्मीदवारी वापिस ले सकते है।
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(6.3) जिला कलेक्टर कार्यरत खाद्य सुरक्षा अधिकारी को बिना कोई शुल्क लिए उम्मीदवार के रूप में पंजीकृत करेगा। उम्मीदवारों की सूची में कार्यरत खाद्य सुरक्षा अधिकारी का सीरियल नंबर 1 होगा।
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(7) नागरिको द्वारा प्रतिस्थापक उम्मीदवारो या कार्यरत खाद्य सुरक्षा अधिकारी को अनुमोदित करना :
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(7.1) यदि कोई मतदाता पटवारी कार्यालय आकर मुख्यमंत्री द्वारा निर्धारित शुल्क देता है, और अधिकतम पांच उम्मीदवारों को खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पद के लिए अनुमोदित करता है और/ या वह कार्यरत खाद्य सुरक्षा अधिकारी को अनुमोदित करता है तो पटवारी उसकी स्वीकृति को कंप्यूटर में दर्ज करेगा और बदले में उसे रसीद देगा। इस रसीद में नागरिक की मतदाता पहचान पत्र संख्या, दिनांक / समय और उम्मीदवार जिन्हे उसने अनुमोदित किया है दर्ज होंगे।
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(7.2) यदि कोई मतदाता अपना अनुमोदन निरस्त करने आता है तो पटवारी उसके एक या उससे अधिक अनुमोदन बिना कोई शुल्क लिए निरस्त कर देगा। इस निरस्तीकरण को भी मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखा जाएगा।
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(7.3) टिप्पणी : अनुमोदनों के बारे में स्पष्टीकरण - (i) मतदाता किसी भी दिन अनुमोदन दर्ज कर सकता है और इसके लिए कोई समय सीमा नहीं है। अपनी सुविधानुसार विभिन्न मतदाता अपने अनुमोदन किसी भी दिन दर्ज कर सकते है। (ii) मान लीजिये, एक मतदाता ने उम्मीदवार A, B और C को अनुमोदित किया है। तब A, B और C की अनुमोदन संख्या 1 से बढ़ जाएगी। (iii) अब मतदाता किसी भी दिन अपना कोई भी अनुमोदन निरस्त कर सकता है। मान लीजिये कि अमुक मतदाता ने C के अनुमोदन को निरस्त किया है, तो C की अनुमोदन संख्या 1 से कम हो जाएगी और A और B के अनुमोदनों की संख्या अपरिवर्तित रहेगी। (iv) मतदाता किसी अन्य उम्मीदवार को भी किसी भी दिन अनुमोदित कर सकता है। मान लीजिये कि अमुक मतदाता D को अनुमोदित करता है, तो ऐसी स्तिथि में D की अनुमोदन संख्या 1 से बढ़ जाएगी और A और B की अनुमोदन संख्या अपरिवर्तित रहेगी।
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(7.4) पटवारी प्रत्येक मतदाता द्वारा दर्ज अनुमोदन को मतदाता की मतदाता संख्या, नाम और उसके द्वारा अनुमोदित उम्मीदवारों के नाम के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखेगा।

(7.5) अनुमोदन दर्ज करने की प्रक्रिया खुली और सार्वजानिक होगी। अर्थात प्रत्येक मतदाता द्वारा दर्ज किये गए अनुमोदनों को मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखा जाएगा और यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए खुली एवं दृश्य होगी।
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(8) जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी को बदले जाने के लिए शर्त : यदि
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(8.1) किसी नए उम्मीदवार को प्राप्त अनुमोदनों की संख्या अमुक जिले के मतदाताओ की कुल संख्या के 35% (सभी दर्ज मतदाताओ की कुल संख्या के 35%) से अधिक हो, और
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(8.2) उसे मिले अनुमोदनों की संख्या पदासीन खाद्य सुरक्षा अधिकारी को मिले अनुमोदनों की संख्या से उतनी अधिक है जो उस जिले में दर्ज अभिभावको की कुल संख्या के 2% के बराबर हो। और
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(8.3) उसके अनुमोदनों की संख्या सबसे अधिक हो।
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तभी और सिर्फ तभी मुख्यमंत्री पदासीन खाद्य सुरक्षा अधिकारी को पद से हटा सकते है और ऊपर दी गयी शर्ते पूरी करने वाले नए उम्मीदवार को खाद्य सुरक्षा अधिकारी नियुक्त कर सकते है, या उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है।
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(9) टिपण्णी :
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(9.1) ऊपर दी गयी धाराओं में इंगित "35%" और "2%" से आशय है "मतदाता सूचि में दर्ज कुल मतदाताओ की संख्या का 35% और 2% "। उदाहरण : यदि किसी जिले में 20 लाख मतदाता है तो 35% और 2% का अर्थ क्रमशः 700,000 और 40,000 होगा। यहाँ यह संख्या अनुमोदन दर्ज कराने वाले मतदाताओ की संख्या से अप्रभावित रहेगी। और खाद्य सुरक्षा अधिकारी के प्रतिस्थापन के लिए ऊपर दी गयी तीनो धाराओं (8.1) ,(8.2) ,(8.3) में दी गयी शर्तो का पूरा होना जरुरी होगा।
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(9.2) उदहारण – 1 : मान लीजिए किसी जिले में 20,00,000 मतदाता है ,तथा मान लीजिए कि पदासीन खाद्य सुरक्षा अधिकारी को 500,000 मतदाताओ के अनुमोदन मिले है। तब यदि किसी उम्मीदवार को 20,00,000 के 35% = 700,000 मतदाताओ के अनुमोदन मिलते है, सिर्फ तभी मुख्यमंत्री उस नए उम्मीदवार को जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी नियुक्त कर सकते है या उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है।
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(9.3) उदहारण – 2 : मान लीजिए किसी जिले में 20,00,000 मतदाता है तथा मान लीजिए कि पदासीन खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पास 800,000 मतदाताओ का अनुमोदन है। तब किसी उम्मीदवार के अनुमोदनों की संख्या (800,000 + 2% of 20,00,000) = (800,000 + 40,000) = 840,000, होना जरुरी है। सिर्फ तभी मुख्यमंत्री उसे खाद्य सुरक्षा अधिकारी नियुक्त कर सकेंगे या उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है।
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(10) कोई नागरिक किसी राज्य में अधिकतम 5 जिलों का और पुरे भारत में अधिकतम 15 जिलों का खाद्य सुरक्षा अधिकारी बन सकता है। यदि कोई खाद्य सुरक्षा अधिकारी मतदाताओ के अनुमोदन द्वारा खाद्य सुरक्षा अधिकारी बना है अर्थात प्रत्येक जिले में उसे 35% मतदाताओ से ज्यादा मतदाताओ के समर्थन प्राप्त है , तो उसका वेतन एवं भत्ते एक जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी के वेतन एवं भत्तों से उतना गुना होगा जितने जिलो में वह खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत है। उदाहरण के लिए- यदि कोई व्यक्ति भारत के 7 जिलों में खाद्य सुरक्षा अधिकारी है, और सिर्फ 5 जिलों में ही उसको मिले अनुमोदनों की संख्या 35% से ज्यादा है तो उसे पांच गुणा वेतन मिलेगा न कि सात गुणा। किन्तु यदि कोई व्यक्ति 5 जिलो में खाद्य सुरक्षा अधिकारी है एवं 4 या 5 जिलों में प्रत्येक जिले से उसे मिले अनुमोदनों की संख्या 35% से कम है, तब उसका वेतन सिर्फ एक जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी के वेतनमान के बराबर होगा।
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(11) कार्य अवधि: कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में एक जिले में अधिकतम 8 साल तक खाद्य सुरक्षा अधिकारी रह सकता है। इसके बाद वह किसी अन्य जिले में खाद्य सुरक्षा अधिकारी बन सकता है या अमुक जिले में किसी अन्य पद पर सेवा दे सकता है।
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(12) कोई भी सेवानिवृत्ति लाभ नहीं : यदि कोई व्यक्ति मतदाताओ के समर्थन द्वारा खाद्य सुरक्षा अधिकारी बना है और वह किसी भी राजकीय सेवा कैडर से नहीं आता है तो कार्य अवधी समाप्त होने पर या हटा दिये जाने पर उसे किसी भी प्रकार की सेवानिवृत्ति राशी एवं पेंशन लाभ आदि नहीं मिलेंगे। जिला / राज्य / भारत सरकार द्वारा पारित किये गए किसी कानून या प्रस्ताव द्वारा उसे सेवानिवृति लाभ दिए जा सकेंगे परन्तु यह कानून खाद्य सुरक्षा अधिकारी को किसी भी प्रकार के सेवानिवृत्ति लाभ देने के लिए कोई प्रावधान नहीं करता।
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(13) मतदाताओ द्वारा अनुमोदित खाद्य सुरक्षा अधिकारी का वेतनमान एवं भत्ते : मतदाताओ द्वारा अनुमोदित खाद्य सुरक्षा अधिकारी का वेतन एवं भत्ते वरिष्ठता एवं अन्य पात्रताओं की अवहेलना करते हुए राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किये जाने वाले जिला कलेक्टर के वेतनमान के समकक्ष होंगे। खाद्य सुरक्षा अधिकारी सरकारी आवास, सरकारी वाहन, ड्राइवर या अपने आवास पर प्राप्त की जाने वाली सेवाओं की पूर्ती के लिए किसी भी प्रकार के अतिरिक्त स्टाफ का पात्र नहीं होगा। किन्तु खाद्य सुरक्षा अधिकारी इन सेवाओं के बराबर निर्धारित राशि भत्ते के रूप में प्राप्त कर करेगा। इस सम्बन्ध में मुख्यमंत्री का फैसला अंतिम होगा। किन्तु मतदाताओ के अनुमोदन से नियुक्त सभी खाद्य सुरक्षा अधिकारी राज्य सरकार द्वारा निर्धारित वेतनमान के समान वेतन प्राप्त करेंगे। यदि जिले के मतदाता चाहे तो वे बहुमत का प्रदर्शन करके खाद्य सुरक्षा अधिकारी के वेतन में अतिरिक्त वृध्दि कर सकेंगे।
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(14) मतदाताओ द्वारा अनुमोदित व्यक्ति को मुख्यमंत्री द्वारा खाद्य सुरक्षा अधिकारी नियुक्त करना : इस सम्बन्ध में फैसला मुख्यमंत्री करेंगे। मुख्यमंत्री मतदाताओ द्वारा अनुमोदित व्यक्ति को ओएसडी (OSD = Officer on Special Duty) के रूप में या खाद्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में नियुक्ति दे सकते है। मुख्यमंत्री का फैसला अंतिम होगा।
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(15) टेस्टिंग लेब्स लगाना , खोजी कुत्ते जुटाना , मुखबिरों का जाल बिछाना , गुमनाम एवं नामजद शिकायतों को दर्ज करने के लिए वेबसाईट / एप्लीकेशन बनाना।
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(15.1) खाद्य सुरक्षा अधिकारी आवश्यकतानुसार टेस्टिंग लेब लगा सकेगा, खोजी कुत्ते खरीद सकेगा या उन्हें किराए पर ले सकेगा , ईमानदार प्रतिस्पर्धियो एवं मुखबिरों से ख़बरें जुटा सकेगा। खाद्य सुरक्षा अधिकारी एक मोबाईल एप्किकेशन / वेबसाईट भी उपलब्ध करवाएगा, जहाँ पर नागरिक गुमनाम या नामजद शिकायते दर्ज करवा सके।
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(15.2) विश्वसनीय सूत्रों एवं सूचनाओं का इस्तेमाल करके किसी इकाई पर छापे मार सकेगा और घटना स्थल पर ही वस्तु की जाँच कर सकेगा या फिर लेब में जाँच करने के लिए सेम्पल ले सकेगा। और यदि इस दौरान कोई व्यक्ति / कारोबारी हिंसा करता है या उसके कार्य में बाधा डालता है तो खाद्य सुरक्षा अधिकारी अमुक आरोपियों की शिकायत ज्यूरी के समक्ष कर सकेगा।
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(15.3) मिलावट तब मानी जायेगी, जब आरोपी ने तय मापदंडो से अधिक मात्रा में मिलावट की हो।
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(15.4) जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी खाद्य पदार्थो में मिलावट की सीमा से सम्बंधित मापदंड के बारे में मुख्यमंत्री एवं नागरिको को सुझाव दे सकेगा। इसी क़ानून में दी गयी "जनता की आवाज" की धाराओं का प्रयोग करते हुए खाद्य सुरक्षा अधिकारी स्वयं द्वारा सुझाए गए मिलावट से संबधित मापदंडो को प्रकाशित कर सकेगा एवं इन्हें लागू कर सकेगा।
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(J) मिलावट सम्बंधित मामलो एवं खाद्य सुरक्षा अधिकारी के स्टाफ से सम्बंधित शिकायतों के निपटान के लिए जूरी प्रक्रिया
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(J.1) टिपण्णी : प्रस्तावित जूरी प्रक्रिया के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए ‘ newindia dot in /causes/DJSM ‘ देखें
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(J.2) जब कभी खाद्य सुरक्षा अधिकारी / उसके स्टाफ एवं कारोबारी के बीच कोई विवाद होगा या कोई मामला , आर्थिक दंड आदि तय किया जाएगा तो खाद्य सुरक्षा अधिकारी मामले के निपटान के लिए नागरिको की ज्यूरी का इस्तेमाल करेगा। यह भाग ज्यूरी के गठन से सम्बंधित प्रक्रिया देता है।
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(J.3) खाद्य सुरक्षा अधिकारी प्रत्येक जिले में एक जूरी प्रशासक नियुक्त करेंगे, जिसे जिला जूरी प्रशासक कहा जाएगा। जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी जूरी प्रशासक को किसी भी दिन बदल सकते है।
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(J.4) विवादों का निपटारा
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(J.4.1) प्रत्येक मामले के लिए जिला जूरी प्रशासक जिले की मतदाता सूची में से रेंडमली 30 से 55 वर्ष की आयु के कुछ उन नागरिक चुनेगा जो कि पिछले 10 वर्षों में कभी जूरी मंडल में ज्यूरर बन कर नहीं आये है एवं अतीत में उनको किसी भी मामले में दोषी नही पाया गया है।
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(J.4.2) जूरी सदस्यों की संख्या : जूरी सदस्यों की न्यूनतम संख्या 12 और अधिकतम 100 हो सकती है। यदि जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी द्वारा लगाए हुए जुर्माने की राशि 1 लाख से कम है तो जूरी सदस्यो की संख्या 12 होगी और उसके बाद प्रत्येक 1 लाख ज्यादा जुर्माने की रकम के लिए एक जूरी सदस्य और बढ़ाया जाएगा। जूरी सदस्यों की संख्या अधिकतम 100 हो सकती है। यदि मामला जुर्माने का नही है , बल्कि किसी अधिकारी के खिलाफ दुर्व्यवहार या भ्रष्टाचार का आरोप है तो जूरी सदस्यों की संख्या 50 होगी ।
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(J.4.3) जूरी सदस्य दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपने विवेक एवं कानूनी सीमा के अनुसार जुर्माने की राशि निर्धारित करेंगे । जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी 67% जुरी सदस्यो द्वारा अनुमोदित जुर्माने की राशि को तय किया गया जुर्माना मानेंगे।
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(J.4.4) यदि 67% से अधिक जुरी सदस्य ये घोषित करते है कि, अभियुक्त कर्मचारी को पद से निलंबित किया जाना चाहिए तो जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी अभियुक्त कर्मचारी को निलंबित करेंगे ।
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(S) देश अथवा राज्य के नागरिको द्वारा राईट टू रिकॉल खाद्य सुरक्षा अधिकारी के क़ानून को निलंबित करने की प्रक्रिया :
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(S.1) राज्य के मतदाता ( सभी मतदाता, न कि सिर्फ वे मतदाता जिन्होंने वोट किया है ) मुख्यमंत्री द्वारा स्थापित की गयी प्रक्रिया का उपयोग करते हुए इस कानून को किसी जिले / राज्य में 4 वर्ष तक के लिए निलंबित कर सकते है। इस प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित होना चाहिए कि अमुक राज्य के कुल मतदाताओं ( न कि सिर्फ उन मतदाताओं ने जिन्होंने अनुमोदन की प्रक्रिया में भाग लिया है ) का बहुमत स्पष्ट रूप से इस निलंबन का समर्थन करता है। साथ ही राज्य के मतदाता अपने बहुमत का प्रयोग करते हुए इस निलंबन को 4 वर्षो की अवधि में असीमित आवृतियों तक बढ़ा सकेंगे।
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(S.2) देश के मतदाता ( सभी मतदाता, न कि सिर्फ वे मतदाता जिन्होंने वोट किया है ) प्रधानमंत्री द्वारा स्थापित की गयी प्रक्रिया का उपयोग करते हुए इस कानून को किसी जिले / राज्य में 4 वर्ष तक के लिए निलंबित कर सकते है। इस प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित होना चाहिए कि देश के कुल मतदाताओं ( न कि सिर्फ उन मतदाताओं ने जिन्होंने अनुमोदन की प्रक्रिया में भाग लिया है ) का बहुमत स्पष्ट रूप से इस निलंबन का समर्थन करता है। साथ ही देश के मतदाता अपने बहुमत का प्रयोग करते हुए इस निलंबन को 4 वर्षो की अवधि के लिए असीमित आवृतियों तक बढ़ा सकेंगे।
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(S.3) टिपण्णी : यहाँ "S" सम्प्रभुता ( Sovereignty ) का द्योतक है। आशय यह है कि, किसी भी जिले में लागू प्रक्रिया को राज्य / देश के मतदाता बहुमत का प्रदर्शन करके निलंबित कर सकते है, तथा किसी जिले / राज्य में लागू प्रक्रिया को देश के मतदाताओं का बहुमत निलंबित कर सकता है।
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(RV) [ सीमांकित मतदान या रेंज वोटिंग के लिए टिप्पणी ]
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अबाध्यकारी निर्देश - इस विधेयक के लागू होने के बाद चुनाव आयोग मतदाताओ को यह अनुमति दे सकेगा कि वे किसी उम्मीदवार को 0 से 100 के बीच अंक दे सके या फिर सामान्य रूप से हाँ / नहीं का अनुमोदन कर सके। यदि मतदाता द्वारा सामान्य अनुमोदन किया जाता है तो इस अनुमोदन को 100 अंको के समकक्ष माना जाएगा। किन्तु यदि मतदाता उम्मीदवार को अंक देता है तो मतदाता द्वारा दिए गए अंक ही मान्य होंगे। उम्मीदवार द्वारा प्राप्त किये गए सभी अंक ही उम्मीदवार के कुल अंको की संख्या मानी जायेगी। पदासीन अधिकारी के कुल अंको की मान्य संख्या दी गयी दोनों परिस्थितियों में से उच्च अंक को निर्दिष्ट करने वाली संख्या को माना जाएगा -- (अ) पदासीन अधिकारी को प्राप्त कुल मत * 67, (ब) चुनाव के बाद पदासीन अधिकारी द्वारा प्राप्त अंक।

प्रतिस्थापक चुनाव तब आयोजित किया जाएगा जब किसी उम्मीदवार के कुल अंको की संख्या ( पदासीन अधिकारी के कुल अंको की संख्या + अमुक निर्वाचन क्षेत्र में दर्ज कुल मतदाताओ की संख्या * 100 / 10 ) के बराबर हो। तथा पदासीन अधिकारी का प्रतिस्थापन तब होगा जब उम्मीदवार को पदासीन अधिकारी से अधिक वोट मिलते है , और नए उम्मीदवार को पदासीन अधिकारी को पिछले चुनावों में मिले वोटो से 10% अधिक वोट मिलते है, या फिर नए उम्मीदवार को निर्वाचन क्षेत्र में दर्ज कुल मतदाताओ के 51% मतों से ज्यादा मिलते है। इस विधेयक की धारा ( CV.1 ) का उपयोग करते हुए यदि देश के कुल मतदाताओं के 51% नागरिक इस व्यवस्था को लागू करने के "हाँ" दर्ज कर देते है तो चुनाव आयोग इस प्रणाली को लागू कर सकता है या नही भी कर सकता है। यह कथित सीमांकित मतदान प्रणाली या रेंज वोटिंग सिस्टम ऐरो की कथित असम्भाव्यता प्रमेय ( Arrow’s Impossibility Theorem ) से प्रतिरक्षा प्रदान करती है।
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(CV) जनता की आवाज (Citizens’ Voice):
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(CV.1 ) [ जिला कलेक्टर या उसके द्वारा नियुक्त कर्मचारी के लिए निर्देश ]
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यदि देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाला कोई भी नागरिक मतदाता इस विधेयक की किसी धारा में बदलाव चाहता हो अथवा वह इस विधेयक से सम्बन्धित कोई शिकायत दर्ज करना चाहता हो तो ऐसा नागरिक मतदाता जिला कलेक्टर के कार्यालय में उपस्थित होकर एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकता है। जिला कलेक्टर या उसका क्लर्क इस शपथपत्र को 30 रूपए प्रति पृष्ठ का शुल्क लेकर दर्ज करेगा तथा एक सीरियल नंबर जारी करके इस शपथपत्र को स्कैन करके अमुक मतदाता के छाया चित्र (फोटो) एवं अन्य विवरण के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा।
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(CV.2 ) [ तलाटी अथवा पटवारी के लिए निर्देश ]
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किसी पटवारी कार्यालय के कार्यक्षेत्र में निवास करने वाला कोई भी नागरिक मतदाता यदि इस विधेयक अथवा इसकी किसी धारा पर अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहता हो अथवा ऊपर दी गयी धारा (CV.1 ) के तहत प्रस्तुत किसी भी शपथपत्र पर अपनी हां / नहीं दर्ज कराना चाहता हो, तो वह मतदाता अपना पहचान पत्र लेकर तलाटी के कार्यालय में उपस्थित होगा और उपलब्ध आवेदन पर शपथपत्र का सीरियल नंबर दर्ज करके अपनी हाँ / नही दर्ज करेगा। पटवारी 3 रूपए का शुल्क लेकर इस हाँ / नहीं को दर्ज करके एक रसीद जारी करेगा । मतदाता द्वारा दर्ज की गयी हाँ / नहीं को मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर मतदाता के नाम, मतदाता पहचान संख्या, दिनांक एवं अन्य विवरणों के साथ रखा जाएगा।
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---------- जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी को बदलने के लिए प्रस्तावित ड्राफ्ट का समापन ----------

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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Apr 23 2018 17:42:13 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

कैसे मोदी साहेब और संघ के स्वंयसेवक सऊदी अरब से घूस लेने के एवज में जम्मू इस्लामिस्ट कट्टरपंथियों के हवाले कर रहे है !!
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कश्मीर घाटी में निवास करने वाली जनसँख्या = 69 लाख ( इसमें 96% से ज्यादा मुस्लिम है )
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जम्मू एवं कश्मीर राज्य में मुस्लिम जनसँख्या = 86 लाख
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जम्मू में रहने वाले सिक्ख + हिन्दुओ की जनसँख्या = 36 लाख
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जम्मू में रहने वाले मुस्लिमो की जनसँख्या = 17 लाख
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तो यदि 20 लाख मुस्लिम कश्मीर से आकर जम्मू में बस जाते है तो कश्मीर में मुस्लिम मेजोरिटी में रहेंगे लेकिन जम्मू में भी मुस्लिमो का बहुमत हो जाएगा।
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तो इस योजना को अमली जामा पहनाने के लिए मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने 3 गेजेट नोटिफिकेशन प्रकाशित किये, जो यह कहते है कि -
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(1) यदि कोई मुस्लिम कश्मीर में आतंकियों दी जा रही धमकियों या दमन से पीड़ित होकर जम्मू में आकर निवास करता है तो उसे सरकार की तरफ से पुनर्वास के लिए जमीन दी जायेगी ( इससे पहले यह सुविधा सिर्फ कश्मीर के हिन्दूओ को ही उपलब्ध थी। क्योंकि उन्हें उत्पीडन का सामना करना पड़ रहा था और इसीलिए वे कश्मीर से पलायन करके जम्मू में शरण ले रहे थे। ) !!!
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(2) यदि कोई नोमद या जनजातिय व्यक्ति / समुदाय जम्मू में सरकारी जमीन पर कब्ज़ा कर लेता है तो तब तक उससे जमीन खाली नहीं कराई जायेगी जब तक सरकार उसे अन्य कोई जमीन उपलब्ध न करवा दे !!
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(3) और इसके बाद एक के बाद एक कई गेजेट नोटिफिकेशन जारी करके कई समुदायों को नोमद एवं जनजातियों का दर्जा दिया गया ( इनमे से ज्यादातर के पास फर्जी सर्टिफिकेट्स है ) !!!
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राज्य सरकार जो भी गेजेट नोटिफिकेशन जारी करती है वह सिर्फ तब ही प्रभाव में आ सकता है जब गवर्नर इस पर हस्ताक्षर करें। और गवर्नर प्रधानमंत्री की अनुमति के बाद ही हस्ताक्षर करता है !!
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दुसरे शब्दों में , प्रधानमंत्री मोदी साहेब खुद सक्रीय रूप से कश्मीर से musli. मुस्लिम आबादी को जम्मू में स्थानांतरित करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे है !!!
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और संघ के सभी स्वयंसेवको मोदी साहेब के इन फैसलों का मजबूती के साथ समर्थन किया है !!
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इसमें कोई संदेह नहीं है कि मोदी साहेब इसके एवज में सऊदी अरेबिया से मोटी घूस खा रहे है , और घूस का यह हिस्सा संघ के स्वयंसेवको की जेब में भी जाता है !!
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हमारे द्वारा प्रस्तावित समाधान -- भारत में राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह करवाकर धारा 370 एवं 35A को ख़त्म किया जाए ताकि भारत के अन्य राज्यों में निवास करने वाले लोग जम्मू कश्मीर में जाकर बस सके।
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यदि आप इस मुद्दे पर भारत में राष्ट्रव्यापी जनमत संग्रह का समर्थन करते है तो नीचे दिए गए newindia के लिंक पर वोट करें। newindia वेबसाईट भारत सरकार की अधिकृत वेबसाईट है जिस पर कोई भी नागरिक अपने सुझाव पीएम के सामने रख सकता है और इन पर वोट कर सकता है। इस लिंक पर हमने जनमत संग्रह का प्रस्तावित ड्राफ्ट अपलोड किया हुआ है -- <https://newindia.in/causes/tcp/>;
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इस बात पर भी विशेष रूप से ध्यान दें कि सोनिया-मोदी-केजरीवाल इनके अंध भगत एवं संघ के स्वयंसेवक भारत में जनमत संग्रह प्रक्रिया को लागू करने का विरोध कर रहे है। तथा ये सभी लोग जम्मू में मुस्लिम आबादी को बड़े पैमाने पर बसाने का समर्थन कर रहे है !!
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यह न्यूज लिंक भी देखें --- <https://www.pgurus.com/move-to-settle-kashmiri-muslims-in-jammu-is-fraught-with-dangerous-ramifications/>;
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<http://www.tribuneindia.com/news/jammu-kashmir/community/tired-of-violence-kashmiri-families-migrate-to-jammu-city/293877.html>;
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<https://twitter.com/madhukishwar/status/984466230428876800>;
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<https://timesofindia.indiatimes.com/india/jk-govt-told-to-withdraw-tribal-directive-ram-madhav/articleshow/63763353.cms>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Apr 24 2018 19:52:20 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

पूरी सम्भावना है कि सिर्फ पीडीपी ही नहीं बल्कि जम्मू कश्मीर में सत्ता में साझेदार संघ के नेताओं एवं स्वयंसेवको ने भी असीफा के संभावित फर्जी मामले में आरोपियों को फंसाने के लिए सक्रीय रूप से भूमिका निभाई होगी।
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क्योंकि आरोपी रोहिंग्यो को जम्मू से खदेड़ने के मुद्दे पर आगामी लोकसभा के चुनावों में उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहे थे !!! और इसी वजह से वे संघ के "हिन्दू वोटो को इकट्ठा करो" की योजना को जम्मू में धराशायी करने का वाजिब खतरा बन गए थे !!
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इस प्रकार के फर्जी मामलों का समाधान ?
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आसिफा के अभियुक्तों के खिलाफ आरोप सही भी हो सकते है और फर्जी भी। आरोपों की सत्यता जांचने के लिए मेरा प्रस्ताव है कि इसका निर्धारण ज्यूरी मंडल द्वारा किया जाए। मुझे जम्मू के पुलिस अधिकारियों, जजों एवं सीबीआई = कवर ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। किन्तु यदि ये आरोप फर्जी है तो ज्यादातर से भी ज्यादा संभावनाए है कि इसके मास्टर माइंड सिर्फ पीडीपी नेता ही नहीं है बल्कि संघ के स्वयंसेवक भी है।
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संघ के नेता एवं स्वयंसेवक आईपीएस अधिकारियो को इन हिंदूवादियों पर फर्जी मुकदमे लगाकर कर बदनाम करने को क्यों कहते है ?
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पीडीपी नेता, मोदी साहेब एवं संघ के स्वयंसेवक जम्मू में रोहिंग्यो व कश्मीर के मुस्लिमो को बड़े पैमाने पर बसाने की नीति पर काम कर रहे है , ताकि जम्मू में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाए !!! वहां के संघ के ज्यादातर नेताओ एवं स्वयंसेवको ने दिल्ली , मुंबई आदि में अपने मकान वगैरह खरीद लिए है। तो जब जम्मू जलेगा और वहां के हिन्दुओ को लथेड़ा जाएगा तो वे बड़े नुकसान से बचे रहेंगे। और इस काम के लिए संघ के नेताओ एवं कार्यकर्ताओ को सऊदी अरब अच्छा खासा पैसा भेज रहा है।
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तो वहां के सच्चे हिंदूवादी ( एवं सच्चे धर्म निरपेक्ष ) कार्यकर्ताओ ने रोहिंग्यो को खदेड़ने के लिए खुद ही प्रचार अभियान चलाया हुआ है। वे जम्मू में यह खुले आम कह रहे है कि सऊदी अरब से आने वाले पैसे के बदले में मोदी साहेब एवं संघ के स्वयंसेवक पूरी तरह से बिक चुके है। और साथ ही उन्होंने यह बात भी साफ़ कर दी है कि वे आगामी लोकसभा चुनावों में अपने उमीदवार उतारेंगे। और उनके चुनाव लड़ने से संघ=बीजेपी के हिन्दू वोट विभाजित हो जायेंगे।
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संघ के नेताओ एवं स्वयंसेवको का एक मात्र उद्देश्य हिन्दू वोटो के "एकजुट" करना है। उनका लक्ष्य हिन्दुओ को एकजुट करना नहीं है , बल्कि वे हिन्दू "वोटो" को एकजुट करना चाहते है। उनकी नीति है कि 100% हिन्दू वोट एक मुश्त उनके खाते में जाने चाहिए। और इस वजह से उन्हें वे सभी लोगो दुश्मन नजर आते है जो हिन्दू वोटो को विभाजित करते है। चाणक्य ने कहा था कि -- "दुश्मन को समूल रूप से नष्ट कर दिया जाना चाहिए" !! और संघ के सभी नेता और स्वयंसेवक चाणक्य की बहुत इज्जत करते है, और उनकी नीतियों का अनुसरण करते है।
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संघ के नेताओ एवं स्वयसेवको ने संत श्री आसाराम जी बापू एवं संत श्री राम रहीम गुरमीत जी पर आरोप ( झूठे-सच्चे ? ) लगाकर उनके संगठन को गिराने के लिए काफी मनोयोग से काम किया, क्योंकि वे हिन्दू दलितों/जनजातियों के वोटो को "एकजुट" करके उन तक सीधी पहुँच चाहते थे। दूसरे शब्दों में संघ के नेताओ एवं स्वयंसेवको का यह इतिहास रहा है कि वे उन सभी लोगो को कमजोर करने की दिशा में काम करते है जिनमे वे हिन्दू वोटो को संघ=बीजेपी से दूर करने की सम्भावना देखते है।
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तो जिस तरह संघ के स्वंयसेवको ने संत श्री आसाराम जी बापू एवं संत श्री राम रहीम गुरमीत जी को कारावास में भेजने के लिए कार्य किया उसी तरह से पूरी संभावनाएं है कि उन्होंने पीडीपी नेताओ के साथ मिलकर आसिफा मामले में हिन्दूवादियों को अभियुक्त बनाने के लिए उन पर फर्जी आरोप गढ़े हो। इस तरह संघ के हिन्दू वोट "एकजुट" रहेंगे और चुनावों में उन्हें ज्यादा वोट मिलेंगे।
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समाधान ?
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समाधान ज्यूरी सिस्टम है। ज्यूरी सिस्टम आने से पुलिस अधिकारियो , अन्य विभागीय अफसरों एवं मंत्रियो की झूठे मामले गढ़ने की क्षमता में नाटकीय रूप से गिरावट आएगी। यदि आप भारत में ज्यूरी सिस्टम लागू करना चाहते है तो दिए गए लिंक पर ज्यूरी सिस्टम ड्राफ्ट को वोट करें -- <https://newindia.in/causes/jury-sys/>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Apr 25 2018 17:41:43 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

कोंग्रेस के छुपे हुए एजेंटो की पहचान :
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कोंग्रेस के हित चिन्तक कभी भी सोनिया गांधी एवं रॉबर्ट वढेरा के सार्वजनिक नारको टेस्ट की मांग नहीं करते। यदि आप उनसे कहेंगे कि वे सोनिया एवं रॉबर्ट वढेरा के सार्वजनिक नार्को टेस्ट की मांग करे तो वे 100 बहाने बनायेंगे लेकिन यह मांग कभी भी नहीं करेंगे। यदि आप उनके पीछे पड़ जायेंगे तो रस्मी तौर पर कह देंगे कि, हाँ हम सोनिया व वढेरा के सार्वजनिक नारको टेस्ट का समर्थन करते है लेकिन वे कभी भी सार्वजनिक नारको टेस्ट के क़ानून की मांग का ट्विट पीएम को नहीं करेंगे , और न ही कभी वे अपनी वाल पर नार्को टेस्ट का ड्राफ्ट रखेंगे। दरअसल सोनिया का नारको टेस्ट की बात करते ही इन्हें खुद के बदन में हजारो सुईयां चुभती हुयी महसूस होती है। लेकिन नाटक यह हमेशा इस तरह से करेंगे जिससे यह लगे कि ये कोंग्रेस के खिलाफ है। और इनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि ये हर दुसरे-तीसरे आदमी पर कोंग्रेसी होने का आरोप लगाते है !!!
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तो आइन्दा जब आपका किसी कोंग्रेस के फर्जी विरोधी से पाला पड़े तो हमेशा उससे यही सवाल करे कि सोनिया के सार्वजनिक नारको टेस्ट की मांग करने से उन्हें इतना दर्द क्यों होता है !!
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ज्ञातव्य है कि मोदी साहेब और संघ के सभी स्वयंसेवक सोनिया के सार्वजनिक नारको टेस्ट का विरोध कर रहे है। ये लोग खुद के सुईयां लगवाने को तैयार है किन्तु सोनिया का नारको टेस्ट लेने के नाम से ही ये लोग तड़प उठते है।
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देश में राईट टू रिकॉल पार्टी एक मात्र ऐसी राजनैतिक पार्टी है जो पिछले 6 सालों से सोनिया एवं रोबर्ट वढेरा के सार्वजनिक नारको टेस्ट की मांग कर रही है। इसके लिए हमने क़ानून ड्राफ्ट भी प्रस्तावित किया है और इसे प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर अपलोड भी किया है। अब तक हजारो रिकालिस्ट मोदी साहेब को इस आशय का ट्विट भेज चुके है कि सोनिया का सार्वजनिक नारको टेस्ट लिया जाए। और सिर्फ यही वजह है कि फर्जी कोंग्रेसियो को राईट टू रिकॉल के कार्यकर्ता बर्दाश्त नहीं होते।
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नागरिको की ज्यूरी द्वारा सार्वजनिक नार्को टेस्ट का ड्राफ्ट देखने के लिए किसी भी रिकालिस्ट की फेसबुक प्रोफाइल पर क्लिक करें और डिस्क्रिप्शन देखें। फर्जी कोंग्रेसियो की कवर पिक्चर क्लिक करने पर आपको अंडा मिलेगा। आप पायेंगे कि वहां कोई ड्राफ्ट नहीं है। ऐसे दोहरे मापदंड वाले लोगो को एक्सपोज करें जो ऊपर से कोंग्रेस का विरोध करते है लेकिन सोनिया के सार्वजनिक नारको टेस्ट का विरोध करते है। क्योंकि वे जानते है कि इंजेक्शन लगने से उनकी प्रिय नेता सोनिया के सारे कर्म जनता के सामने आ जायेंगे। और यह वे बर्दाश्त नहीं कर सकते।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Apr 26 2018 17:53:28 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

देव नगरी बनारस में सैंकड़ो साल पुराने सैंकड़ो मंदिर "विकास" की चपेट में आ गए है, अत: इन्हें गिराया जा रहा है !! कुछ 100 से ज्यादा पौराणिक मंदिर निशाने पर है। हमारा प्रस्ताव है कि ऐसी किसी भी योजना पर पहले स्थानीय नागरिको की अनुमति ली जानी चाहिए। सरकार योजना का नक्शा एवं योजना की चपेट में आने वाले घर-मंदिर आदि बनारस की जनता के सामने रखे। इस पर जनमत संग्रह कराया जाए। कोई स्वतंत्र व्यक्ति भी अपनी वैकल्पिक योजना इस जनमत संग्रह में रख सकते है।
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संघ के सभी स्वयंसेवको ने इस मुद्दे पर जनमत संग्रह करने का विरोध करना शुरू कर दिया है। उनका मानना है कि इस बारे बनारस की जनता से राय लिए जाने की जरूरत नहीं है। मोदी साहेब ने जो भी आदेश दिए है वो ठीक है। कोंग्रेस एवं आम आदमी पार्टी के नेता भी जनमत संग्रह का विरोध कर रहे है।
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<https://www.youtube.com/watch?v=aHXY0RFEtEs>;
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<https://­www.patrika.com/­varanasi-news/­swaroopanand-ultimatu­m-to-government-for-­protection-of-kasi-h­eritage-2672834/>;

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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Apr 26 2018 18:09:30 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

संत श्री आसाराम जी बापू , संत श्री राम रहीम जी गुरमीत जी एवं अन्य संतो के मामलो में आये फैसले यह सिद्ध करते है कि यदि आप मिशनरीज के काम में बाधा बनेंगे तो कितना भी पैसा देकर आप जजों को नहीं खरीद सकते। हमारे भ्रष्ट जज एवं नेता पूरी तरह से मिशनरीज के नियंत्रण में है।
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संत श्री आसाराम जी एवं गुरमीत राम रहीम जी के पास सलमान खान से कई गुणा ज्यादा पैसा और समर्थक है। लेकिन फिर भी सलमान खान दोषी होने के बावजूद रिहा हुआ लेकिन हिन्दू संतो के निर्दोष होने के काफी सबूत होने के बावजूद उन्हें जेल भेज दिया गया । ऐसा नही है कि इन संतो के वकीलों ने जजों को घूस देने की कोशिश नहीं की होगी या राजनैतिक पहुँच का इस्तेमाल नहीं किया होगा। लेकिन क्योंकि मिशनरीज इनके संगठन को ख़त्म करना चाहती थी अत: इनके बचने की सम्भावना नहीं के बराबर थी।
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दूसरी बड़ी वजह यह रही कि, संघ सभी हिन्दू संतो को अपने प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है। संघ का मानना है कि सभी हिन्दू संत हिन्दुओ की एकता को विभाजित कर रहे है और इसकी वजह से संघ सभी हिन्दुओ को अपने "निचे" एकजुट नहीं कर पा रहा है। संघ एक संगठन के रूप में सभी हिन्दुओ को अपने झंडे तले चाहता है , अत: संघ के स्वयंसेवकों एवं नेताओं ने अपनी तरफ से इन हिन्दू संतो के ढांचे को तोड़ने के पूरे प्रयास किये।
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इन प्रकरणों में इन संतो के भक्तो एवं सच्चे हिंदुवादियो को हार का सामना इसीलिए करना पड़ा क्योंकि उन्होंने मुकदमो के बारे में जजों एवं अपने वकीलों पर हद से ज्यादा भरोसा किया। वे यह बात समझने में नाकाम रहे कि जूरी सिस्टम के अभाव में हर हाल में फैसला हिन्दू संतो के खिलाफ ही आएगा। यदि वे इन मामलो की सुनवाई जूरी द्वारा किये जाने की मांग करते तो इन मामलों में न्याय होता , और ये संत निर्दोष साबित होते। कम से कम एक निष्पक्ष सुनवाई के अवसर तो बन ही जाते।
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समस्या यह है कि यह सिलसिला अभी शुरू हुआ है , वक्त के साथ नुकसान बढ़ता ही जाएगा। मिशनरीज का उद्देश्य भारत में बड़े पैमाने पर इसाई धर्म फैलाना है , और इसमें सबसे बड़ी बाधा हिन्दू संत , आश्रम , मठ एवं मंदिर है। धार्मिक प्रतिको एवं धर्म को तोड़ने में यदि राजनैतिक सत्ता का प्रयोग किया जायेगा तो अमुक राजनैतिक पार्टी को वोटो का भारी का नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसीलिए वे इसके लिए भ्रष्ट जजों का इस्तेमाल करते है और आगे भी वे ऐसा ही करेंगे। हालांकि संघ=बीजेपी, कोंग्रेस , सपा , बसपा, आपा समेत देश के सभी शीर्ष राजनैतिक दल मिशनरीज की कठपुतलियां है अत: इन राजनैतिक दलों से मिशनरीज को रोकने की उम्मीद करना बेमानी है।
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समाधान ?
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समाधान ज्यूरी सिस्टम है। ज्यूरी सिस्टम आने से पुलिस अधिकारियो , अन्य विभागीय अफसरों एवं मंत्रियो की झूठे मामले गढ़ने की क्षमता में नाटकीय रूप से गिरावट आएगी। यदि आप भारत में ज्यूरी सिस्टम लागू करना चाहते है तो दिए गए लिंक पर ज्यूरी सिस्टम ड्राफ्ट को वोट करें -- <https://newindia.in/causes/jury-sys/>;
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हमने जजों के भ्रष्टाचार को काबू करने एवं न्यायपालिका को दुरुस्त करने के लिए हमने राईट टू रिकॉल जज एवं ज्यूरी सिस्टम कानूनों का प्रस्ताव किया है। राईट टू रिकॉल जज कानून लागू होने से भारत के नागरिको को भ्रष्ट जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार मिल जाएगा एवं ज्यूरी सिस्टम आने से दंड देने की शक्ति नागरिको के हाथो में आ जायेगी। निचे प्रस्तावित कानूनों के ड्राफ्ट दिए गए है। यदि आप इन कानूनों का समर्थन करते है तो प्रधानमंत्री को ट्विट करें कि इन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित किया जाए।
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१) जिला न्यायलय में ज्यूरी प्रक्रिया के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/829456537232542>;
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२) उच्च न्यायलय और उच्चतम न्यायलय में ज्यूरी प्रक्रिया के लिए प्रस्तावित ड्राफ्ट:
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/865700823608113>;
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३) राईट टू रिकॉल उच्चतम न्यायालय मुख्य न्यायाधीश के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/859860420858820>;
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४) राईट टू रिकॉल उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट:
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/859860140858848>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Apr 27 2018 10:23:02 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदु मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों ने सुप्रीम कोर्ट का न्यायधीश नियुक्त किया है। अमेरिका एवं लन्दन के धनिक इंदु मल्होत्रा के क्लाइंट रहे है , और उन्हें अपनी पैरवी करने के लिए मोटा धन चुकाते रहे है। दुसरे शब्दों में इंदु मल्होत्रा वर्षो से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के धनिकों के हितो की रक्षा करने के लिए उनकी तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करती रही है। सामान्य बुद्धि का व्यक्ति यह समझ सकता है कि अब वे सुप्रीम कोर्ट में बैठकर किसके हितो की रक्षा करेगी , या उन्हें किस एवज में सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया है।
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यही भारत में जजों के नियुक्त होने की प्रक्रिया है -- सुप्रीम कोर्ट के जजों को जो वकील या उनके प्रायोजक मोटी घूस चुकाते है उन्हें उठाकर सुप्रीम कोर्ट में जज बना दिया जाता है !! फिर न्यायमूर्ति पूजक हमसे यह उम्मीद करते है कि इस वकील को आज से हम ईमानदार , न्यायप्रिय, माननीय के साथ साथ फ़रिश्ता भी मानकर चले !! अच्छा तमाशा है।
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इंदु मल्होत्रा के कुछ क्लाइंट -- ANZ Grindlays Bank - लन्दन , , Agilent Technologies अमेरिका , Medtronic - अमेरिका , British Petroleum - लन्दन , Pepsico - अमेरिका , KPMG - नीदरलेंड
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न्यायमूर्ति पूजको को टीवी-अखबार की चपेट में न आकर इस बात को समझने की कोशिश करनी चाहिये कि , जो जिसका दिया खाता है वह उसकी कही धुन ही बजाता है। भारत में जजों की नियुक्ति करने एवं उन्हें निष्काषित की प्रक्रिया में भारत के आम नागरिको की कोई भूमिका नहीं होने से हमारी अदालतें विदेशियों के नियन्त्रण में है। वे अपनी इच्छा से अपने चमचो को जज बनवा देते है, और फिर हमें इन भ्रष्ट जजों को पूजने के लिए भी कहते है।
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समाधान ?
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जजों के भ्रष्टाचार को काबू करने एवं न्यायपालिका को दुरुस्त करने के लिए हमने राईट टू रिकॉल जज एवं ज्यूरी सिस्टम कानूनों का प्रस्ताव किया है। राईट टू रिकॉल जज कानून लागू होने से भारत के नागरिको को भ्रष्ट जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार मिल जाएगा एवं ज्यूरी सिस्टम आने से दंड देने की शक्ति नागरिको के हाथो में आ जायेगी। निचे प्रस्तावित कानूनों के ड्राफ्ट दिए गए है। यदि आप इन कानूनों का समर्थन करते है तो प्रधानमंत्री को ट्विट करें कि इन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित किया जाए।
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१) जिला न्यायलय में ज्यूरी प्रक्रिया के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/829456537232542>;
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२) उच्च न्यायलय और उच्चतम न्यायलय में ज्यूरी प्रक्रिया के लिए प्रस्तावित ड्राफ्ट:
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/865700823608113>;
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३) राईट टू रिकॉल उच्चतम न्यायालय मुख्य न्यायाधीश के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/859860420858820>;
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४) राईट टू रिकॉल उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट:
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/859860140858848>;
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वेल्थ टेक्स पार्टी
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Apr 27 2018 16:55:46 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री के पास क़ानून बनाने की विशिष्ट शक्ति है। अत: जब वे आपको लूटेंगे तो इसके लिए वे बन्दुक का नहीं बल्कि क़ानून का इस्तेमाल करेंगे।
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नेता को जो कहना होता है वह अपने भाषणों में कहता रहता है। लेकिन जो उसे करना होता है उसके लिए वह क़ानून लागू कर देता है। जो बात नेता बोलेगा वह देश में लागू नहीं होगी, लेकिन जो क़ानून नेता बनाएगा वह देश में लागू हो जाएगा। जैसा क़ानून बनाया जाएगा , देश में उसी तरह का परिवर्तन आएगा। जनता की आखों में धुल झोंकने में हुनरमंद नेता भाषण कुछ और देते है और क़ानून कुछ और लागू करते है। इन भाषणों का निरंतर सेवन करने वाले और नेता द्वारा लागू किये जा रहे कानूनों को न पढने वाले अपरिपक्व नागरिक इस फर्क को नहीं समझ पाते और धोखा खाते रहते है। वर्षो बाद जब उन्हें इस धोखे का पता चलता है तो क्षतिपूर्ति करने के लिए किसी और नेता के भाषण सुनना शुरू करते है और फिर कुछ समय बाद उससे भी धोखा खाते है। कभी कभी वे यह बात ताउम्र नहीं समझ पाते कि देश कानूनों से चलता है , अत: देश उसी दिशा में जाएगा जिस तरह के क़ानून बनाए जायेंगे। जो नेता का आकलन उसके द्वारा लागू किये गए कानूनों के आधार पर करना शुरू कर देते है वे इस बात को समझ पाते है कि कौन नेता समस्याओ के समाधान पर कार्य कर रहा है और कौन सिर्फ समस्याए उठाकर वोट खींच रहा है।
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उदाहरण के लिए कश्मीर में धारा 370 हटाना, कश्मीरी पंडितो को फिर से बसाना, 2 करोड़ बांग्लादेशी घुसपेठियो को बाहर खदेड़ना, दो बच्चों का क़ानून बनाना , मंदिरों को सरकारी नियन्त्रण से मुक्त करना , राम-कृष्ण-विश्वनाथ मंदिर बनवाना आदि संघ=बीजेपी के मुख्य मुद्दे रहे है। मोदी साहेब समेत संघ के सभी नेता सत्ता से बाहर रहते हुए इन मुद्दों पर करोड़ो बयान और भाषण दे चुके है। लेकिन जब मोदी साहेब के नेतृत्व में संघ सत्ता में आया तो उन्होंने इन मुद्दों पर क़ानून बनाने के लिए जो किया उसका विवरण देखिये :
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(A) कश्मीर पर -

मोदी साहेब ने मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती द्वारा जारी किये गए 3 गेजेट नोटिफिकेशन को लागू करने की अनुमति दी, जो यह कहते है कि -
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(1) यदि कोई मुस्लिम कश्मीर में आतंकियों दी जा रही धमकियों या दमन से पीड़ित होकर जम्मू में आकर निवास करता है तो उसे सरकार की तरफ से पुनर्वास के लिए जमीन दी जायेगी ( इससे पहले यह सुविधा सिर्फ कश्मीर के हिन्दूओ को ही उपलब्ध थी। क्योंकि उन्हें उत्पीडन का सामना करना पड़ रहा था और इसीलिए वे कश्मीर से पलायन करके जम्मू में शरण ले रहे थे। ) !!!
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(2) यदि कोई नोमद या जनजातिय व्यक्ति / समुदाय जम्मू में सरकारी जमीन पर कब्ज़ा कर लेता है तो तब तक उससे जमीन खाली नहीं कराई जायेगी जब तक सरकार उसे अन्य कोई जमीन उपलब्ध न करवा दे !!
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(3) और इसके बाद एक के बाद एक कई गेजेट नोटिफिकेशन जारी करके कई समुदायों को नोमद एवं जनजातियों का दर्जा दिया गया ( इनमे से ज्यादातर के पास फर्जी सर्टिफिकेट्स है ) !!!
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जम्मू में फिलहाल हिन्दुओ का का बहुमत है , लेकिन इन कानूनों का प्रभाव यह होगा कि कश्मीर से बड़े पैमाने पर मुस्लिम और रोहिंग्ये जम्मू में आकर बस सकेंगे और जम्मू में भी हिन्दू अल्पसंख्यक हो जायेंगे। नतीजे में जम्मू के हिन्दुओ पर दमन शुरू होगा और उन्हें जान बचाकर जम्मू छोड़कर भागना पड़ेगा !! तो इस तरह मोदी साहेब और संघ के स्वयंसेवक कश्मीरी पंडितो को बसाने के नारे लगा रहे है लेकिन क़ानून वे ऐसे लागू कर रहे है जिससे जम्मू में मौजूद शेष हिन्दू भी उजड़ जाए। बाद में वे इन्हें फिर से बसाने के लिए भाषण देंगे और फिर से वोट इकट्ठे करेंगे।
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(B) धारा 370 पर -

धारा 370 हटाने का सबसे आसान एवं निरापद तरीका यह है कि कश्मीर का विलय उत्तराखंड एवं हिमाचल में कर दिया जाए। यह विलय करने के लिए हमें देशव्यापी जनमत संग्रह करवाना होगा। जनमत संग्रह में भारत के नागरिको बहुमत इस मुद्दे पर वोट कर देगा कि जम्मू कश्मीर का विलय इन दो राज्यों में कर के एक राज्य बना दिया जाना चाहिये। जो बात करोड़ो नागरिको के जनमत संग्रह में स्पष्ट हो जाती है, उसे संसद से पास हुआ ही माना जायेगा। क्योंकि संसद किसी भी तरह से देश के करोड़ो नागरिको से ऊपर नहीं है। दरअसल सांसद सिर्फ जनता के प्रतिनिधि है और उनके हवाले से ही संसद में बैठते है। अत: जब जनता स्वयं किसी मुद्दे पर अपना स्पष्ट बहुमत प्रकट कर दे ऐसे प्रस्ताव को संसद से आसानी से पास किया जा सकता है। जनता से स्पष्ट आदेश आने के बाद भी यदि कोई सांसद इस प्रस्ताव के खिलाफ संसद में वोट करता है तो जनता ऐसे सांसदों एवं पार्टियों की चुनावों में अच्छी खबर लेगी। क्योंकि तब यह साबित हो जाएगा कि अमुक सांसद या पार्टी स्वयं को जनमत से ऊपर समझती है और वे कश्मीर का भारत में विलय करने का विरोध कर रही है।
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लेकिन मोदी साहेब ने इस मुद्दे पर देश में जनमत संग्रह करवाने से साफ इनकार कर दिया। एवं देश की जनता ओ यह झूठ पकड़ाया कि धारा 370 ख़त्म करने के लिए हमारे पास पर्याप्त संख्या नहीं है। जाहिर है वे सरासर झूठ बोल रहे है। जनमत संग्रह करवाने के लिए किसी भी प्रकार के संविधान संशोधन की जरूरत नहीं है। यहाँ तक कि इसके लिए राज्यसभा में बहुमत की भी आवश्यकता नहीं है। पीएम कैबिनेट से प्रस्ताव मंजूर करके इसे गेजेट में प्रकाशित करके देश में जनमत संग्रह की प्रक्रियाए लागू कर सकते है।
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तो मोदी साहेब ने धारा 370 ख़त्म करने के लिए भाषण तो तमाम तरीके के दिए लेकिन उस क़ानून को लागू करने से स्पष्ट इनकार कर दिया जिससे धारा 370 को ख़त्म किया जा सकता है।
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(C) बांग्लदेशी घुसपेठियो पर --

भारत में 2 करोड़ मुस्लिम बंगलादेशी घुसपेठिये अवैध रूप से घुसे हुए है। बीजेपी ने 1998 का चुनाव भी इन्हें खदेड़ने के मुद्दे पर लड़ा था। लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने इन्हें खदेड़ने का क़ानून नहीं बनाया। फिर 2014 में मोदी साहेब ने अपने चुनाव प्रचार में दर्जन बार इस तरह का बयान दिया कि सत्ता परिवर्तन के अगले दिन ही बांग्लादेशी घुसपेठियो को देश छोड़कर जाना पड़ेगा। मोदी साहेब ने तब तक इन्हें खदेड़ने का कोई भी ड्राफ्ट सार्वजनिक नहीं किया था। लेकिन श्रोताओं ने भाषण सुने और उन्हें वोट दिए।
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लेकिन मोदी साहेब ने सत्ता में आने के बाद इस दिशा में निम्नलिखित कदम उठाये :
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१) मोदी साहेब ने आधार कार्ड के फार्म में इस घोषणा को जोड़ने से साफ़ इंकार कर दिया कि --"मैं शपथपूर्वक घोषणा करता हूँ कि मैं भारत का नागरिक हूँ"। इस घोषणा के अभाव में सभी अवैध मुस्लिम बांग्लादेशी घुसपेठिये कानूनी रूप से आधार कार्ड बनवाने के पात्र बन गए। मतदाता सूची में उन्होंने अपने नाम पहले ही जुड़वाँ लिए है। और जिन घुसपेठियो के नाम मतदाता सूची में नहीं है वे भी आधार कार्ड के आधार पर अपने नाम अब मतदाता सूचियों में जुड़वाँ रहे है !! इस तरह मोदी साहेब ने भाषण दिया उन्हें खदेड़ने का लेकिन क़ानून बनाया उन्हें बसाने का !!
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२) इतना ही नहीं मोदी साहेब के कार्यकाल में बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेडने की बात तो दूर रही , बल्कि बड़े पैमाने पर रोहिंग्ये भी देश में बसने लगे। और मोदी साहेब ने उन्हें खदेड़ने के लिए भी क़ानून बनाने से इनकार कर दिया। उनके स्वयंसेवकों ने रोहिंग्यो के खिलाफ भाषण दिए लेकिन इन्हें बसाने में शासन की तरफ से पूरी मदद की।

३) मोदी साहेब ने बांग्लदेशी शरणार्थीयो को देश की नागरिकता देने से भी साफ़ इनकार दिया। ज्ञातव्य है कि , शरणार्थी वे हिन्दू नागरिक है जो दमन के कारण बांग्लादेश से पलायन करके भारत में शरण लेने आये है। इसके अलावा मोदी साहेब ने उन 500 हिन्दू शर्णार्थियो को भी भारत से वापिस रवाना कर दिया जो पाकिस्तान में दमन होने के कारण भारत में नागरिकता लेने की आस में पिछले ३ साल से भारत में टिके हुए थे। उन्हें देश से खदेड़ दिए जाने के बाद उन्होंने पाकिस्तान में जाकर इस्लाम ग्रहण कर लिया। तो मोदी साहेब इस तरह का प्रोपेगेंडा खड़ा करते है कि वे हिन्दूओ के हित चिंतक है किन्तु वे ऐसे कानूनों को लागू करने का विरोध करते है जिससे हिन्दू हितो की रक्षा हो।

लेकिन संघ के यही नेता और स्वयंसेवक जब सत्ता में नहीं थे तो यह एलान देते थे कि यदि हम सत्ता में आये तो बांग्लादेश , पाकिस्तान आदि देशो में हो रहे दमन के कारण जिन हिन्दुओ को जान बचाने के लिए भारत में शरण लेनी पड़ रही है उन्हें हम नागरिकता देने का क़ानून लागू करेंगे। लेकिन यह उनकी भाषण नीति का हिस्सा थी। जब क़ानून बनाने की बारी आई तो उन्होंने उलटे क़ानून बनाए।
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(D) टू चाइल्ड पॉलिसी पर -

1951 में हिन्दुओ का प्रतिशत 84% था जो कि 2011 में गिर कर 79.80% रह गया है। जबकि इसी अवधि में मुस्लिम जनसख्याँ 9.8% से बढ़कर 14.23% हो गयी है !! सबसे बड़ी वजह यह है कि मुस्लिम समुदाय में परिवार नियोजन का पालन नहीं किया जाता , अत: उनकी जन्म दर उच्च है। पिछले 30 साल से संघ के नेताओ एवं स्वयंसेवको का यह सबसे प्रिय मुद्दा रहा है। वे पिछले 30 वर्षो से इस मुद्दे पर भाषण दे देकर वोट खींच रहे है। वे 1990 से ही टू चाइल्ड पोलिसी लाने के वादे कर रहे है। लेकिन सत्ता में आने के साथ ही उन्होंने टू चाइल्ड लॉ लाने से साफ़ इनकार कर दिया।

परिणामस्वरूप इन भाषणों से उन्हें वोट तो मिले लेकिन समस्या का समाधान नही हुआ। समस्या जस की तस है, तथा और भी भयावह होती जा रही है। इस मुद्दे पर भाषण देकर संघ के नेताओं ने कार्यकर्ताओ और देश के 30 साल बर्बाद कर दिए। अब वे अगले 10 साल तक सत्ता में बने रहेंगे लेकिन दो बच्चो का क़ानून नहीं बनायेंगे। और जब वे सत्ता से बाहर हो जायेंगे तो फिर से इस मुद्दे पर भाषण देकर वोट खींचने लगेंगे !!
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(E) राम मंदिर पर -

राम मंदिर का मुकदमा अदालत में है। मुकदमा जमीन को लेकर है। इस मुकदमे में न तो संघ पक्षकार है , न ही बीजेपी। संघ=बीजेपी के नेताओं ने भाषण दिए कि वे राम मंदिर का निर्माण करेंगे। जाहिर है भारत में सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश के लिए चुनाव नहीं होते। और न ही संघ के नेता और मोदी साहेब भारत के प्रधान न्यायाधीश के पद के लिए चुनाव लड़ रहे थे। फिर भी उन्होंने कहा कि हम मंदिर बनायेंगे। और जब वे सत्ता में आये तो उन्होंने इस मुद्दे पर कोमेडी करनी शुरू कर दी। कुछ बानगी देखिये :
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१) केन्द्रीय मंत्री राज्यवर्धन ने कहा कि -- "अयोध्या में राम मंदिर बन चुका है, मैं दर्शन करके आया हूँ !!

२) मोहन भागवत ने कहा कि -- हिन्दू कार्यकर्ताओ को 2050 तक मंदिर बनाने की जगह विज्ञान के अनुसन्धान पर ध्यान देना चाहिए !!

३) अमित शाह ने कहा कि -- राम मंदिर बनाने के लिए हमें 370 सीटे चाहिए !! ( सच्चाई यह है कि सिर्फ गेजेट नोटिफिकेशन द्वारा राम मंदिर निर्माण का क़ानून लागू किया जा सकता है। )

४) मोदी साहेब ने कहा - हमें देवालय से पहले शौचालय बनाने पर ध्यान देना चाहिए !! ( और उन्होंने शौचालय बनाये लेकिन मंदिर नहीं )

५) संघ के एक मंत्री ने कहा कि - राम मंदिर अब कोई मुद्दा नहीं है !!

६) और संघ के ही दुसरे मंत्री ने कहा -- 2018 तक राम मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा !!

इस बीच संघ के नेताओं एवं स्वयंसेवको ने काशी विश्वनाथ एवं मथुरा में कृष्ण मंदिर निर्माण का मुद्दा बिलकुल ही गायब कर दिया और राम मंदिर निर्माण का तो खैर उन्होंने अच्छा खासा तमाशा ही बना दिया।
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राम मंदिर ही नहीं , उन्होंने देश के अन्य हिन्दू मंदिरों को भी सरकारी नियन्त्रण से मुक्त नहीं किया , और इन मंदिरों का सोना सरकारी नियन्त्रण में ले लिया। संघ के सरकार ने जयपुर में दर्जनों मंदिर गिराए और अब काशी में सैकड़ो वर्ष पुराने 100 से अधिक मंदिर निशाने पर है !!
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समाधान ?
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समाधान बेहद सरल है। नेताओं के भाषण सुनना बंद कीजिये। भाषण शासन का अंग नहीं है। शासन कानूनों द्वारा संचालित होता है। यदि आप नेता के भाषण सुनना बंद कर देंगे तो उसके कार्यो का मूल्यांकन करने के लिए आपके पास सिर्फ एक रास्ता बचेगा -- आप इस बात पर ध्यान देना शुरू करेंगे कि हमारा नेता क़ानून कौन से लागू कर रहा है। और जब आप उसके द्वारा लागू कानूनों को देखना शुरू करेंगे तो नेता आपको झूठे वादे करके बेवकूफ बनाने की अपनी क्षमता खो देगा।
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"वेल्थ टेक्स पार्टी"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Apr 28 2018 07:36:51 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

आइ ए एस के पाठ्यक्रम में कुकिंग , डांसिंग, गायन , वादन आदि विषयो को शामिल क्यों नहीं किया जाना चाहिए। क्या ये विषय समाज एवं देश के लिए उपयोगी नहीं है ?
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मेरा बिंदु है कि -- राजनैतिक अंधविश्वास शास्त्र ( इसे राजनीति "विज्ञान" भी कहते है !! ) , समाज शास्त्र , इतिहास , अर्थशास्त्र आदि विषयो को पढ़ना किसी व्यक्ति के लिए काफी मजेदार हो सकता है जबकि अन्य किसी व्यक्ति को ये विषय बोर कर सकते है। लेकिन किसी व्यक्ति की योग्यता का निर्धारण इन विषयों की परीक्षा लेकर करना बिलकुल ही खुराफात है। क्योंकि इन विषयों की किताबों में जो बकवास लिखी गयी है उसे लिखने वाले "बुद्धिजीवी" तब भी धनिकों की कठपुतलियाँ थी एवं आज भी उनकी कठपुतलियाँ है। राजनीति शास्त्र की इन किताबों में जो ऊल जलूल कहानियां एवं सिद्धांत लिखे गए है उन्हें ढंग से घोट लेने वाले छात्र ही ऐसी परीक्षाओं में असाधारण प्रदर्शन कर पाते है। और इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इन विषयों की परीक्षा पास करने वाले छात्र उन छात्रों से बदतर अफसर साबित होंगे जिन्होंने डांसिंग, कुकिंग, गायन , मोडलिंग , ड्रामा आदि विषयों में प्रशिक्षण लिया है। सच में।
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चीन में सरकारी अफसरों की नियुक्ति के लिए आयोजित की जाने वाली परीक्षाओं में अनिवार्य रूप से गणित-विज्ञान को शामिल किया गया है। और कई कारणों में एक कारण यह भी है , जिसकी वजह से चीन भारत से मीलो आगे निकल चुका है। तो चीन के बाबूओ की न सिर्फ विश्लेषण क्षमता भारत के बाबुओ से बेहतर है , बल्कि वे व्यवहारिक परिस्थिति को समझने एवं इसे निष्पादित करने की ज्यादा बेहतर काबलियत भी रखते है। जबकि ऐसे अनुत्पादक विषयों की पुस्तको में लिखे गए अन्धविश्वास अपने दिमाग में जमा कर लेने के कारण भारत के प्रशासनिक अधिकारियो का दिमाग भोट हो जाता है।
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समाधान ?
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तो हमारा प्रस्ताव यह नहीं है कि -- भारत की प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षा के सिलेबस में कुकिंग, सिंगिंग, डांसिंग, ड्राइंग , ड्रामा, मेकअप , फैशन डिज़ाइनिंग , मूवी मेकिंग, मोडलिंग , रैम्प वाकिंग आदि विषयों को भी शामिल किया जाना चाहिए। बल्कि हमारा कहना है कि , सिविल सेवाओ की परीक्षाओं से इतिहास, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, दर्शन शास्त्र आदि विषयों को पूरी तरह से निकाल दिया जाना चाहिए। इसकी जगह सरकारी नियुक्तियों की प्रतिस्पर्धी परीक्षाओ में गणित-विज्ञान एवं इंजीनियरिंग को शामिल किया जाना चाहिए।
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इसके लिए हमें लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओ की जरूरत है। क्योंकि जब तक लोक सेवा आयोग अध्यक्ष को नौकरी से निकालने अक अधिकार जनता के पास नहीं होगा तब तक यह आदमी परीक्षाओ से इन अनुत्पादक एवं मनोरंजक विषयों को हटाकर विज्ञान-गणित जैसे उत्पादक विषयों को सिलेबस में शामिल नहीं करेगा।
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राईट टू रिकॉल लोक सेवा आयोग का ड्राफ्ट राईट टू रिकॉल मंत्री के ड्राफ्ट के समान ही है। हम जल्दी ही इसके लिए अलग से ड्राफ्ट प्रस्तुत करेंगे। राईट टू रिकॉल मंत्री का ड्राफ्ट देखने के लिए मेरे कवर पेज पर क्लिक करके डिस्क्रिप्शन देखें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 29 2018 07:02:17 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Vasim Afdab:

टारगेट पूरा करने के लिए मुसलमान से ब्याह दी आदिवासी लड़की, केंद्रीय मंत्री समेत बीजेपी के कई नेता रहे शामिल
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बीजेपी शासित मध्य प्रदेश में एक हैरान करने वाली घटना सामने आई है। जहां मंत्रियों और अफसरों की मौजूदगी में एक आदिवासी लड़की की मुस्लिम से शादी करा दी गई। जबकि लड़की का परिवार इसके लिए तैयार नहीं था। यह शादी मुख्यमंत्री कन्यादान योजना कार्यक्रम के तहत हुई।

<https://www.jansatta.com/rajya/tribal-girl-marriage-with-muslim-for-targeted-in-madhya-pradesh/644027/>;

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 29 2018 09:35:17 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

लाल किले के संचालन का निजीकरण -- "विक्रीते करिणि किमंकुशे विवाद" !! अर्थात जब हाथी ही बेच दिया तो अंकुश का क्या झगड़ा ?
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भारत में लाखों लोग रोज रेलवे प्लेटफोर्म का इस्तेमाल करते है, और एक आवश्यक सेवा होने के कारण रेलवे का इस्तेमाल करना जरुरी है। इससे बचा नहीं जा सकता। मोदी साहेब ने रेलवे के साथ रेलवे प्लेटफोर्म भी निजी कम्पनियों के हवाले कर दिए। अब निजी कम्पनियां इन प्लेत्फोर्म्स का उपयोग मुनाफा कमाने में करेगी। और यह मुनाफा सेवाओं के रूप में आम नागरिक यात्रियों से वसूला जाएगा।
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निजी कम्पनियां इस आवश्यक सेवा एवं राष्ट्रिय संपत्ति का दोहन कर सकेगी। इसी तरह से सरकारी स्कूल एवं सरकारी अस्पताल जैसी आवश्यक संस्थाओ को लगातार बदतर किया गया एवं इनके निजीकरण को बढ़ावा दिया गया। एयरपोर्ट से लेकर , खदाने , बैंक से लेकर ऊर्जा, तक सभी राष्ट्रीय संपत्तियां निजी कंपनियों को बेची जा रही है। तो बिकवाली के इस भम्भड़ में लाल किला तो बहुत ही अदना मुद्दा है। अच्छी बात यह हुयी कि सरकार ने डालमियाँ समूह को वहां पर प्लाट काट कर बेचने की अनुमति नहीं दी। मेहरबानी !!
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लाल किला एक अद्वितीय एवं अपने आप में अनूठी ईमारत है। इसका अपना ऐतिहासिक महत्त्व है। देश की राजधानी के दिल में बसी हुयी इस ईमारत के मेंटेनेंस का ठेका भी निजी हाथों में सौंप देना यह दिखाता है कि सरकार प्रबंधन में निकम्मी है , और उनका आत्म गौरव जमीन चाट रहा है। अन्य क्षेत्रो में निजीकरण इसीलिए किया गया क्योंकि संघ के नेता निकम्मे होने के साथ साथ भ्रष्ट भी है। अत: उन्होंने निजीकरण के एवज में घूस खाकर पैसे बनाये।
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लेकिन लाल किले जैसे राष्ट्रिय प्रतिक को निजी हाथों में सौंप देना सरकार के निकम्मेपन को दर्शाता है। इस फैसले में यह स्वीकारोक्ति है कि -- हम सिर्फ बेच सकते है , इन्हें ठीक नहीं कर सकते। लाल किला सिर्फ एक इमारत है। सिर्फ एक इमारत। ऐसी इमारत का प्रबधन करने के लिए किसी विशेष तकनीक या योग्यता की जरुरत नहीं होती। लेकिन सरकार की हैसियत एक इमारत का प्रबंधन करने की भी नहीं रही है। और नीयत तो खैर है ही नहीं।
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जनमत संग्रह प्रक्रियाएं एवं राईट टू रिकॉल पीएम क़ानून न होने का यह नतीजा है। इन प्रक्रियाओ के अभाव में अब सत्ताधारी लोग यह दर्शाने में सफल हो जाते है कि हमें जनता ने लाल किला बेचने के लिए ही वोट दिया था। देखो हमारे पास बहुमत है !! हमें अगले 5 साल तक सब कुछ करने की छूट है। और यह सब कुछ हम इस नाम पर करेंगे कि जनता हमारे साथ है।
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राईट टू रिकॉल पीएम का क़ानून एवं जनमत संग्रह की प्रक्रिया इस तरह की मनमानी पर रोक लगाती है। यदि भारत में राईट टू रिकॉल पीएम क़ानून या टीसीपी होता तो जनता मोदी साहेब को अपना अनुमोदन देकर या बता सकती थी कि -- हमने तुम्हे लाल किले का सञ्चालन निजी हाथो में देने के लिए वोट नहीं किया था। तुम्हे जिस काम के लिए वोट किया है वह काम करो।"
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लेकिन इन प्रक्रियाओ के अभाव में संघ के स्वयंसेवक अब नागरिको को यह कह रहे है कि -- हमारे सभी फैसलों में जनता की सहमती है।
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हम लगातार यह बात कह रहे है कि -- राईट टू रिकॉल कानूनों के बिना ये लोग किसी भी तरह से सुधरने वाले नहीं है। अत: यदि आप चाहते है कि आपके द्वारा चुना हुआ नेता आपके ही समर्थन का हवाला देकर देश को मटियामेट न कर दें , तो राईट टू रिकॉल पीएम एवं टीसीपी क़ानून की मागं करें। इन कानूनों के आने से आप देश के प्रधानमन्त्री के सामने अधिकृत रूप से यह दर्ज कर सकेंगे कि किस फैसले में आप पीएम के साथ है और किस में नहीं।
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और फिर भी यदि पीएम जनमत की अवहेलना करता है तो बहुमत का प्रदर्शन करके आप उन्हें नौकरी से निकालने की प्रक्रिया शुरू कर सकते है। जैसे ही आप पीएम को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया शुरू करेंगे वैसे ही पीएम सुधर कर सूत की तरह सीधा हो जाएगा। नौकरी से निकालने की नौबत नहीं आएगी।
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इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट देखने के लिए मेरी फेसबुक कवर पिक्चर पर क्लिक करके डिस्क्रिप्शन देखें।
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"वेल्थ टेक्स पार्टी"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 29 2018 12:10:23 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

प्रश्न -- राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम के प्रस्ताव अच्छे है , लेकिन आप बार बार मोदी साहेब और संघ का विरोध क्यों करते हो ? खुद के एजेंडे के प्रचार पर ध्यान दो , दुसरो की टांग खींचने से क्या लाभ है। इससे आपकी मांग को मिल रहा समर्थन और भी घट जाएगा। क्योंकि सबकी टांग खींचने से सभी आपके दुश्मन बन जायेंगे। फिर आपका समर्थन कौन करेगा। अत: आपका प्रचार का तरीका गलत है।
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स्पष्टीकरण --
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१) पहली बात तो यह है कि -- हम सिर्फ संघ या मोदी साहेब का ही विरोध नहीं करते , बल्कि कोंग्रेस, आम आदमी पार्टी, सपा , बसपा समेत देश की प्रत्येक उस पार्टी का विरोध करते है जो राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम का विरोध करते है। लेकिन चूंकि इस समय सत्ता में संघ है और देश में सभी फैसले संघ ले रहा है अत: विरोध का आधिक्य उन्ही के हिस्से में आता है। इससे बचने का कोई उपाय नहीं है।
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जब कोंग्रेस सत्ता में थी तब हम कोंग्रेस के गलत फैसलों का भी विरोध कर रहे थे। आप किसी भी रिकालिस्ट के 2014 से पहले के पोस्ट देख सकते है, या यू ट्यूब पर जाकर 2014 से पहले के वीडियो देख सकते है। वहां आपको ऐसे 100 से अधिक वीडियो मिलिंगे जो सिर्फ कोंग्रेस को कोसने के लिए बनाये गए थे। तब कोंग्रेस ऐसे फैसले ले रही थी जो देश हित में नहीं थे अत: उन्हें कोस रहे थे , अब संघ भी ऐसे फैसले कर रहा है तो उनकी भी आलोचना करते है। अब जबकि संघ सत्ता में है और देश के सारे नीति विषयक फैसले लेने का अधिकार भी उनके पास ही है तब भी आप यदि यह चाहते है कि हम विपक्ष की आलोचना करें लेकिन सत्ता की आलोचना न करे, तो आप हमारे साथ ज्यादती कर रहे है।
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२) दूसरी बात यह है कि -- हमने किसी भी राजनैतिक पार्टी या संगठन का विरोध खुद से शुरू नहीं किया है। हम चुपचाप राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम कानूनों की जनता मांग कर रहे थे और जनता में इनका प्रचार कर रहे थे। लेकिन संघ के स्वयंसेवकों ने नागरिको को यह कहकर भड़काना शुरू किया कि हमारे ड्राफ्ट देश विरोधी है, वामपंथी है , अला है, फला है आदि।
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तो जब उन्होंने राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम कानून ड्राफ्ट्स को गलत तरीके से कोसना शुरू किया तो हमें भी नागरिको को यह जानकारी देनी पड़ी कि, संघ के स्वयंसेवक इन कानूनों का विरोध कर रहे है। तो विरोध उन्होंने शुरू किया। हमने नहीं किया। इसी तरह से कोंग्रेस और आम आदमी पार्टी भी जनता को बरगला रही है कि हमारे ड्राफ्ट यूजलेस है। अत: हमे उनके बारे में भी जनता को सूचित करना पड़ता है।
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३) हम मानते है कि , एक सच्चा कार्यकर्ता वह है जो अपनी उर्जा का एक हिस्सा अच्छे कानूनों के प्रचार में लगाए और एक हिस्सा नागरिको में यह जानकारी फैलाने में लगाए कि कौन कौन लोग इन कानूनों का विरोध कर रहे है , अर्थात इन कानूनों के लागू होने में रोड़े डाल रहे है। यदि ऐसे लोगो को एक्सपोज नहीं किया गया तो इन कानूनों के समर्थक भी ऐसे लोगो का समर्थन करते रहेंगे जो इन कानूनों को लागू नहीं होने देना चाहते। यह काफी अप्रिय कार्य है। लेकिन एक कार्यकर्ता को यह करना पड़ता है।
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उदाहरण के लिए यदि हम कहते है कि देश से 2 करोड़ बंगलादेशी घुसपेठियो एवं रोहिंग्यो को देश से बाहर खदेड़ने के लिए क़ानून बनाना चाहिए तो हमें नागरिको को यह जानकारी भी देनी पड़ेगी कि संघ के स्वयसेवक एवं मोदी साहेब इन्हें खदेड़ने के कानून का विरोध कर रहे है। यदि हम नागरिको को यह जानकारी नहीं देंगे तो जो नागरिक इन्हें देश से खदेड़ने का समर्थन करते है वे भी गलतफहमी में संघ के साथ चिपके रहेंगे और उन्हें ही वोट करते रहेंगे। इस तरह ये क़ानून कभी भी नहीं आ पायेगा।
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तो हम नागरिको को यह सूचित करते है कि आप बंगलादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने के क़ानून का समर्थन तो करते है किन्तु इस बात को भी नोट करें कि संघ इस क़ानून का विरोध कर रहा है। ये जानकारी देने के बाद यह नागरिक के विवेक पर निर्भर है कि वह किसे चुनता है -- १) बंगलादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने के क़ानून को या , २) उस संघ को जो इस कानून का विरोध कर रहा है। दोनों सूचनाये होने के बाद वह जो भी तय करे, यह उसका अधिकार है। हमें उससे कोई सरोकार नहीं।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Apr 29 2018 18:44:26 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

मोदी साहेब और भ्रष्ट जज मिलकर यह सुनिश्चित कर रहे है कि डेरा सच्चा सौदा और आसाराम जी के आश्रम की सम्पत्ति सरकार / संघ के कब्जे में आ जाए !!!
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मोदी साहेब और जज वकीलों , प्रशासनिक अधिकारियों और संघ के कार्यकताओ को डेरा व आश्रम के बैंक खातों को चलाने के लिए नियुक्त कर रहे है, और इन आश्रमों के ट्रस्टियों को संघ के कार्यकर्ताओ द्वारा प्रतिस्थापित किया जा रहा है।
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दूसरे शब्दों में , ये सभी कोर्ट केस आदि के षड्यंत्र डेरे / आश्रम की सम्पत्ति को हड़प कर अपने कब्जे में ले लेने के लिए रची गयी थी।
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इन दोनों संतो एवं इनके आश्रमों की दलितों / आदिवासियों एवं अन्य पिछड़ा वर्ग में खासी स्वीकार्यता है। डेरा सच्चा सौदा में ज्यादातर दलित है व कुछ ओबीसी है , जबकि आसाराम बापू के अनुयायियों में आदिवासी / दलितों की संख्या अधिक है। इन दोनों मामलो को समझने में जातीय समीकरण बेहद महत्त्वपूर्ण है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Apr 30 2018 10:49:28 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राईट टू रिकॉल - जिला शिक्षा अधिकारी ( Rtr-DEO ) क़ानून ड्राफ्ट की कुंजी :
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(1) उम्मीदवारी - कोई भी व्यक्ति जो सांसद का चुनाव लड़ने की योग्यता पूरी करता है वह किसी भी दिन कलेक्ट्री में जाकर शिक्षा अधिकारी बनने के लिए अपना आवेदन जमा कर सकता है। जिस दिन आवेदन जमा होगा उसी दिन से अमुक व्यक्ति उम्मीदवार मान लिया जाएगा।
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(2) शिक्षा अधिकारी को अनुमोदित करने का अधिकार - शिक्षा अधिकारी को सिर्फ जिले के अभिभावक ही वोट कर सकेंगे। इसके लिए प्रत्येक जिले में अभिभावकों की अलग से वोटर लिस्ट होगी। जिन दम्पतियों की किसी संतान की आयु 0-18 वर्ष के बीच होगी उन्हें ही अभिभावक माना जायेगा।
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(3) अनुमोदन दर्ज करना - अभिभावक किसी भी दिन किसी भी उम्मीदवार को अनुमोदित कर सकते है या किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में दिया गया अनुमोदन रद्द कर सकते है।
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(4) अनुमोदन दर्ज करने की विधियाँ - अभिभावक पटवारी कार्यालय में जाकर उपस्थित होकर किसी उम्मीदवार के पक्ष में हाँ / नहीं दर्ज कर सकते है , या मोबाईल एप द्वारा या अपने रजिस्टर्ड मोबाईल नंबर से SMS करके या ATM से भी अपना अनुमोदन दर्ज कर सकते है।
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(5) अनुमोदनो का प्रदर्शन - प्रत्येक अभिभावक द्वारा दर्ज अनुमोदन को अभिभावक की मतदाता संख्या, नाम और उसके द्वारा अनुमोदित उम्मीदवारों के नाम के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखा जाएगा।
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(6) शिक्षा अधिकारी की नियुक्ति - जब किसी उम्मीदवार के अनुमोदनो की संख्या कार्यरत जिला शिक्षा अधिकारी के अनुमोदनो की संख्या से अधिक होगी, तथा उस उम्मीदवार के अनुमोदनो की संख्या अमुक ज़िले में दर्ज सभी अभिभावकों की संख्या से 35% से अधिक भी होगी, और यह आधिक्य कार्यरत जिला शिक्षा अधिकारी के अनुमोदनो से 2% अधिक भी होगा, तब मुख्यमंत्री ऐसे उम्मीदवार को नया जिला शिक्षा अधिकारी नियुक्त कर सकते है, या उन्हें ऐसा करने की आवयश्कता नही है। इस सम्बन्ध में मुख्यमंत्री का निर्णय अंतिम माना जायेगा।
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इस प्रक्रिया के लागू होने से जिले के अभिभावकों को अपने जिला शिक्षा अधिकारी को बदलने का अधिकार मिल जाएगा। यदि उनके जिले का शिक्षा अधिकारी भ्रष्ट है तो अभिभावक उसे नौकरी से निकाल कर किसी अन्य ईमानदार अधिकारी को नौकरी दे सकेंगे। नौकरी से निकाले जाने का यह भय शिक्षा अधिकारी के व्यवहार में परिवर्तन लाएगा और वह सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था निजी स्कूलों से बेहतर बनाने का प्रयास करेगा। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो अभिभावक उसे ईमानदार अधिकारी से बदल देंगे।
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गेजेट में प्रकाशित होने के लिए तैयार पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें -- <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1370743296377236>;
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इस ड्राफ्ट पर वोट करने के लिए एवं पीडीऍफ़ अपलोड करने के लिए भारत सरकार की वेबसाईट के इस लिंक पर जाएँ -- <https://newindia.in/causes/rtr-deo/>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Apr 30 2018 20:02:13 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

संघ=बीजेपी की वेबसाईट यह खुलासा करती है कि -- गंगाधर ही शक्तिमान है !!

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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Apr 30 2018 20:30:41 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

<https://www.hindujagruti.org/news/109398.html>;

Vasim Afdab:

शिवलिंग और शेषनाग को सब्बल और JCB की मदद से उखाड़ती देवेन्द्र - मोदी सेना
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अयोध्या में राम मंदिर तो बनाया नहीं , महाराष्ट्र बीजेपी सरकार के PWD ने पिछले हफ्ते धुले में प्राचीन श्री महाकालेश्वर मंदिर को यह कह कर तोड़ दिया कि यह unauthorized है .... 3.1/2 साल में बीजेपी ने महाराष्ट्र में अनगिनत मंदिर तोड़े है l सोचता हूँ बीजेपी द्वारा तोड़े गए प्राचीन मंदिर की एक लिस्ट पोस्ट करू ..ताकि उन हिन्दू वादियों की आँखे खुले जो सारा दिन मंदिर वही बनायेंगे का राग अलापते रहते है ..

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