Posts for 2020-02


Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Feb 01 2020 08:39:56 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

देश में तनाव भड़काने के आरोपियों का जूरी द्वारा सार्वजानिक नार्को टेस्ट करने के लिए पीएम को ट्वीट भेजा गया।
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@PMOindia , प्रधानमंत्री जी, जामिया के शूटर एवं शरजिल इमाम का जूरी के सामने सार्वजनिक नार्को टेस्ट के आदेश जारी करें - #NarcoTestJamiyaShooter , #JuryTrialOnJamiyaShooter
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Feb 01 2020 17:29:17 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Rakesh Suri Ghaziabad UpActivist:

आज 01-02-2020 को मैं laxmi nagar विधानसभा क्षेत्र में REDO ड्राफ्ट का पैम्फलेट वितरण करने अणिमा ओझा जी के साथ गया।

अणिमा ओझा जी ने मतदाताओं को वोट वापसी क़ानून के बारे में जानकारी दी।

राकेश सूरी
9560354335

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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Feb 04 2020 18:06:49 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान घटी एक रोचक घटना :
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आज सुबह जब राकेश जी सूरी पटपड़गंज विधानसभा क्षेत्र के मयूर विहार फेस 2 में वोट वापसी कानून का प्रचार कर रहे थे तो एक महिला मतदाता ने वोट वापसी पासबुक लेने के बाद पूछा कि आपका इस एक पासबुक एवं पैम्फलेट प्रिन्टिंग में कितना खर्चा आया है ?
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सूरी जी ने बताया कि -- वोट वापसी पासबुक , दिल्ली REDO ड्राफ्ट पैम्फलेट एवं चुनाव चिन्ह वाले पैम्फलेट को मिलाकर 10 रुपये का खर्च हुआ।

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तब महिला ने कहा कि -- यदि आपको बुरा नहीं लगे तो मैं आपको इस पैम्फलेट कि cost 10 रुपये देना चाहती हूँ।
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सूरी जी ने कहा -- मुझे बुरा नहीं लगेगा आप मुझे 10 रुपये दे सकते हैं।

महिला मतदाता ने उन्हें 10 रूपये भुगतान करके कहा कि -- मैं आपके द्वारा वितरण वोट वापसी कानून ड्राफ्ट को पढ़कर समझने का प्रयास करूंगी।

राकेश सूरी
9560354335

सलंग्न : महिला मतदान द्वारा दिये गए नोट की तस्वीर
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Rakesh Suri Ghaziabad UpActivist:

आज बहुत ही interesting बात हुई,

आज सुबह जब मैं पटपड़गंज विधानसभा क्षेत्र के मयूर विहार फेस 2 में वोट वापसी कानून का प्रचार कर था तो एक महिला मतदाता ने मेरा पैम्फलेट लेने के बाद पूछा कि आपका इस एक पैम्फलेट प्रिन्टिंग में कितना खर्चा आया तो मैने उनका बताया कि वोट वापसी पासबुक , REDO पत्र पैम्फलेट , चुनाव चिन्ह वाले पैम्फलेट को मिलाकर 10 रुपये का खर्च आया

तो उस महिला ने कहा कि मैं आपको इस पैम्फलेट कि cost 10 रुपये देना चाहती हैं अगर आपको बुरा नहीं लगे तो । मैंने कहा मुझे बुरा नहीं लगेगा आप मुझे 10 रुपये दे सकते हैं।

महिला मतदाता ने मुझे अपना व्हाट्सएप नंबर भी दिया और कहा कि मैं आपके द्वारा वितरण वोट वापसी कानून ड्राफ्ट को पढ़कर समझने का प्रयास करूंगी।

मुझे अच्छा लगा उनका response देखकर ।

राकेश सूरी
9560354335

महिला मतदान द्वारा दिये गए नोट की तस्वीर

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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Feb 05 2020 08:33:53 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

हाईजेकिंग ऑफ जूरी कोर्ट :
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अरुणाचल प्रदेश के वरिष्ठ IPS IGP धालीवाल का दावा है कि वे जूरी सिस्टम का समर्थन करते है !!!
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तो सिर्फ जग्गी वासुदेव (उर्फ सदगुरू) नहीं, अब सरकार में शीर्ष पद पर बैठा आईपीएस अधिकारी भी ज्यूरी कोर्ट की मूवमेंट हाईजेक करने सामने आया है !!
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इन सभी वर्षों में, वासुदेव उर्फ ​​सद्गुरु और आईपीएस धालीवाल ने हमेशा जज कोर्ट का समर्थन किया। और जब जूरी कोर्ट की हमारा आंदोलन आगे बढ़ता जा रहा है तो इन लोगों ने इस बारे में बात करना शुरू कर दिया है।
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शीर्ष पद बैठे इस स्तर के IPS गृह मंत्रालय, केंद्रीय सरकार और PMO की लिखित मंजूरी के बाद ही इस तरह के लेख अखबार में लिख सकते हैं !!!
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मतलब खुद प्रधानमंत्री भी जूरी कोर्ट की मूवमेंट को हाइजेक करके नष्ट करने में रुचि दिखा रहे है !!
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तो हमने वासुदेव उर्फ ​​सद्गुरु और डीआईजी धालीवाल जैसे शक्तिशाली लोगों को उनकी इच्छा के विरुद्ध जूरी सिस्टम के बारे में बोलने के लिए बाध्य कर दिया है। बेचारे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी जजों की पूजा करने और लोगों से जूरी कोर्ट की जानकारी छिपाने का काम किया है। और अब वे इस तरह दर्शा रहे है जैसे वे दशकों से जूरी सिस्टम का समर्थन कर रहे थे !! हद है कपट की ।
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उनका लक्ष्य जूरी कोर्ट आंदोलन को नष्ट करना या भारत में FAKE जूरी कोर्ट लाना है। दरअसल, वे मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा लोगों का चयन करने को नहीं कह रहे है। बल्कि उनका प्रस्ताव है कि कुछ "अच्छे और बुद्धिमान" लोगों की सूची बनायी जानी चाहिए और फिर इसमें से जूरी का चयन किया जाना चाहिए। और इनके सबसे फर्जीवाड़े का सबूत यह है कि इन्होने इसके लिए कोई प्रक्रिया या ड्राफ्ट नहीं दिया है। बस हवा बाजी कर रहे है, ताकि जूरी कोर्ट के समर्थको का समय बर्बाद किया जा सके।
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हमारा लक्ष्य भारत में सच्चा जूरी सिस्टम लाना है। और अब जूरी सिस्टम के इन फर्जी समर्थको की संख्या बढ़ने से हमारे काम का बोझ भी बढ़ गया है। हमें न केवल 90 करोड़ मतदाताओं को जूरी कोर्ट के बारे में सूचित करना है बल्कि उन तक यह जानकारी भी पहुंचानी है कि हमारे द्वारा प्रस्तावित जूरी कोर्ट एक बेहतर प्रक्रिया है, और साथ ही हमें नागरिको को यह भी सूचित करना होगा कि जग्गी वासुदेव उर्फ ​​सद्गुरु और यह डीआईजी धालीवाल एक प्रक्रिया विहीन जूरी सिस्टम की बात करके लोगो को भ्रमित कर रहे है।
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डीआईजी धालीवाल द्वारा प्रस्तावित बकवास प्रस्ताव यहाँ देखें - <https://tinyurl.com/IpsDhaliwalFakeJury>;
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हमारे द्वारा प्रस्तावित प्रक्रिया - <https://www.facebook.com/groups/VoteVapsi/permalink/910754152657118/>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Feb 05 2020 21:35:02 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भीलवाड़ा जूरी पंचायत गेजेट में छापने के लिए सीएम को चिट्ठी भेजी गयी

Ashok Jain VotevapsiCm:

नागरिक कर्तव्य दिवस
(प्रत्येक माह की 5 ता. )
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वोट वापसी पासबुक जारी करने, ज्यूरी कोर्ट सिस्टम लाने, हिन्दू बोर्ड कानून ,गौ निती कानून लाने की मांग - प्रधानमंत्री जी को पत्र भेजकर करी |
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स्थान :
हेड पोस्ट ऑफिस
भीलवाड़ा राजस्थान |
05-02-2020

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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Feb 05 2020 21:37:17 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

जमशेदपुर : नागरिक कर्तव्य दिवस

Mahesh Kumar Jamshedpur LsCandidate:

नागरिक कर्तव्य दिवस
(प्रत्येक माह की 5 तारिक, शाम 5 बजे ,स्थान हेड पोस्ट आफिस बिस्टुपुर )
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वोट वापसी पासबुक जारी करने, ज्यूरी कोर्ट सिस्टम लाने, हिन्दू बोर्ड कानून ,गौ निती कानून लाने की मांग - प्रधानमंत्री जी को पत्र भेजकर करी |
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स्थान :
हेड पोस्ट ऑफिस
बिस्टुपुर जमशेदपुर
झारखंड |
05-02-2020

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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Feb 07 2020 21:02:33 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

क्या भारतीय सेना पाकिस्तानी सेना को 7 से 10 दिन में हरा पाएगी जैसा मोदी जी कहते हैं?
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<https://www.hindustantimes.com/india-news/india-needs-7-10-days-to-defeat-pakistan-in-war-pm-modi/story-IC3Gef8WxnjGNZKII2kA7H.html>;
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भारत ने 65 एवं 71 में पाकिस्तान को हराया, और 1980 से 1982 के बीच पाकिस्तान को हर समय यह अंदेशा बना रहता था कि, भारत किसी भी समय पाकिस्तान पर हमला कर सकता है। सेना को इस तरह के निर्देश थे कि यदि भारतीय सैनिक उन्हें उकसाते है या सीमा उलंघन करते है तो वे धैर्य से काम ले। क्योंकि तब भारत पाकिस्तान पर हमला करने का बहाना देख रहा था।
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वजह यह थी कि, तब तक भारत की सेना पाकिस्तान के मुकाबले में ज्यादा आत्मनिर्भर ( आत्मनिर्भर को 5-10 पढ़ें ) थी। भारत परमाणु बम बना चुका था, एवं हम खुद के हथियार बनाने के दिशा में काम कर रहे थे। पाकिस्तान के पास परमाणु बम नहीं था। कारगिल युद्ध तक भी भारत की सेना पाकिस्तान की तुलना में ज्यादा ताकतवर एवं आत्मनिर्भर थी।
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1999 में पाकिस्तान परमाणु परिक्षण करके बराबरी पर आया। लेकिन बाद में सामरिक परमाणु बम बना लेने के कारण संतुलन काफी हद तक बदल चुका है। आज यदि भारत एवं पाकिस्तान का युद्ध होता है तो इन शर्तो के अधीन नताइज इस तरह के होंगे :
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(1) यदि भारत-पाक अपने अपने हथियारों से लड़ते है
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1.1. इन्फेंट्री : फर्स्ट राउंड में पाकिस्तान की सेना हारने लगेगी। लेकिन तब वे भारत की सेना पर सामरिक बमों का इस्तेमाल करेंगे। भारत की सेना के पास सामरिक बम नहीं होने के कारण हमारे पास इसका कोई डिफेंड नहीं है। कृपया इस बात को नोट करें कि भारत के पास सामरिक परमाणु अस्त्र बनाने की तकनीक है, किन्तु भारत ने सामरिक बम बनाए नहीं है, और न ही इनका कभी परिक्षण हुआ है। पाकिस्तान ने 2014 में सामरिक बम बनाना शुरु कर दिए थे और वे ready to use है ।
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भारत के पास सिर्फ परम्परागत परमाणु हथियार है। किन्तु इनका इस्तेमाल सेना पर नहीं किया जा सकता।
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अमेरिका ने भारत के सांसदों को धमकाकर / घूस देकर 2008 में हमारा परमाणु कार्यक्रम बंद करवा दिया था। इस एग्रीमेंट के अनुसार यदि भारत अपना मिलिट्री परमाणु कार्यक्रम आगे बढाता है तो हमें पहले अमेरिका से अनुमति लेनी पड़ेगी। अब यदि हमें सामरिक परमाणु बम बनाने है तो भारत के पास 2 रास्ते है :
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(i) भारत का प्रधानमंत्री अमेरिका से इसकी अनुमति ले, या
(ii) 123 एग्रीमेंट केंसिल करें।
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यदि भारत सामरिक परमाणु बम बनाना शुरू कर देता है तो 1 से 2 वर्ष में हम सामरिक बम बना सकते है। कृपया इसमें अपनी जेब से तीसरा विकल्प न जोड़े कि, पीएम अमेरिका से पूछे बिना भी तो बम बनाना शुरू कर सकता है। क्योंकि प्रेक्टिकलि ऐसा करने के लिए सेना का आत्मनिर्भर होना जरुरी होता है।
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यदि आपको किसी देश की जमीन पर कब्ज़ा करना हो तो सामने वाले देश की सेना रूपी दीवार को तोडना होता है। इस दीवार को तोड़ने के लिए इन्फेंट्री चाहिए। और भारत की इन्फेंट्री पाकिस्तान की सीमा में तब तक नहीं घुस सकती जब तक पाकिस्तान की इन्फेंट्री सामरिक परमाणु बम से लैस है।
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तो मान लीजिये कि मना करने के बावजूद भारत मिग-21* का इस्तेमाल करके हमले करता है और पाकिस्तान को काफी नुकसान दे देता है, तब भी भारत की इन्फेंट्री पाकिस्तान की जमीन पर बड़े पैमाने पर कब्ज़ा नहीं कर सकती। क्योंकि पाकिस्तान की इन्फेंट्री के पास सामरिक बम है। तो हम वायुसेना का इस्तेमाल करके उनके ठिकाने ध्वस्त कर सकते है, लेकिन टेक ओवर नहीं कर सकते।
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(*) मिग-21 प्लेन काफी पुराने है और इस वजह से इसमें न तो किल स्विच है, और न ही इसको लेकर स्पेयर पार्ट्स की उतनी समस्या है। चूंकि भारत काफी सालो से मिग-21 इस्तेमाल कर रहा है अत: रूस ने इसके रूटीन स्पेयर पार्ट्स का डिजाइन भारत को दिया हुआ है और इनके उत्पादन की अनुमति भी दे रखी है। मलतब हम मिग-21 का इस्तेमाल रूस से बिना पूछे भी कर सकते है। पर इसमें जोखिम यह है कि रूस आगे से हमें मिग-29, सुखोई, आईएनएस विक्रमादित्य के स्पेयर पार्ट्स भी देना बंद कर देगा।
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सामरिक परमाणु अस्त्र एवं परम्परागत परमाणु अस्त्र में क्या अंतर है इस बारे में इस जवाब में बिंदु संख्या 1.1 देखें - Pawan Kumar Sharma का जवाब - अगर पाकिस्तान ने आज भारत पर युद्ध की घोषणा की तो क्या होगा?
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अब ऊपर जो मैंने स्थिति दी है उसे खारिज करने के लिए बुद्धिजीवी आपको निचे दिए गए क्रम में स्टोरी सुनायेंगे
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(a) सबसे पहले तो वे यह कहेंगे कि सामरिक परमाणु बम नाम की कोई चीज नहीं होती है। परमाणु बम मतलब सिर्फ परमाणु बम होता है। और यह भारत के पास भी है और पाकिस्तान के पास भी है।
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(b) इसके बाद वे कह देंगे कि जब युद्ध होगा तो पाकिस्तान हमारी सेना पर सामरिक बम नहीं चलाएगा
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(c) पाकिस्तान ये बम चला भी देगा तो हमारी सेना इसके लिए कोई न कोई रणनीति निकाल लेगी।
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(d) और अंत में कह देंगे कि भारत और पाकिस्तान का अब युद्ध नही होगा, और होगा भी तो परमाणु युद्ध नहीं होगा ।
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(e) और फिर भी यदि आप कहेंगे कि युद्ध हो सकता है, तो व कहेंगे कि आप लोगो में भय फैला रहे हो !!
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मतलब पेड मीडिया द्वारा दिया गया इस टाइप का काफी सारा सामान उनके झोले में पड़ा रहता है। वे एक एक करके निकालते जायेंगे और आपको देते जायेंगे, लेकिन वे किसी भी सूरत में इस बात का समर्थन नहीं करेंगे कि भारत को सामरिक बम बनाने शुरू करने चाहिए !!
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1.2. वायु सेना : दोनों देशो को फाइटर प्लेन बनाने नहीं आते। दोनों देश इधर उधर से खरीद कर अपना काम चलाते है। फाइटर प्लेन सिर्फ 3 देश बनाते है :
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(i) अमेरिका-ब्रिटेन –फ़्रांस
(ii) रूस
(iii) चीन
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यदि युद्ध शुरू होता है तो सबसे पहले भारत-पाकिस्तान के प्रधानमन्त्रियो को उपरोक्त देशो से संपर्क करना पड़ेगा। भारत के पास 2 विकल्प है – रूस एवं अमेरिका। पाकिस्तान के पास भी 2 ही विकल्प है – चीन एवं अमेरिका !!
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यदि इन तीनो देशो ने साफ़ बोल दिया कि अभी कोई झमेला नहीं चाहिए, शान्ति रखो। तो बस ख़तम। अब यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि, यदि ये देश STOP बोल देते है तो नए प्लेन तो छोड़िये 2-4 दिन से ज्यादा दोनों देश उन फाइटर प्लेन का भी इस्तेमाल नहीं कर पायेंगे, जो ख़रीदे जा चुके है । क्योंकि फाइटर प्लेन के साथ एंड यूज मोनिटरिंग एग्रीमेंट होता है।
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मतलब इन्हें आप जबरदस्ती नहीं उड़ा सकते। और मना करने पर भी उड़ाओगे तो वे देश आइन्दा आपको स्पेयर पार्ट्स नहीं भेजेंगे। मतलब एक पॉइंट के बाद अमुक से लिए गए सारे फाइटर प्लेन हमारे लिए आगे के लिए भी बेकार हो जायेंगे, हम पर अन्तराष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा भी होगा कि हमने हथियार आयात समझौते का उलंघन किया है, आइन्दा हमें हथियार भी नहीं मिलेंगे और पेनल्टी के रूप में काफी मोटे डॉलर भी देने पड़ेंगे !! बिलकुल यही स्थिति पकिस्तान के साथ होगी।
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किल स्विच एवं एंड यूज मोनिटरिंग के बारे में अधिक जानकारी के लिए यह जवाब पढ़े - Pawan Kumar Sharma का जवाब - आयातित हथियारों में किल स्विच क्या होते हैंं और इसके हमें क्या नुकसान हैं ?
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1.3. नौ सेना : भारत नौ सैनिक हथियारों में पाकिस्तान से आगे है। किन्तु पनडुब्बियों और एयर क्राफ्ट कैरियर आदि फिर से रूसी है। मतलब इधर भी दोनों देश युद्ध लड़ने के लिए ऊपर दिए गए देशो पर निर्भर है। वैसे भी फाइटर प्लेन वगेरह न होने से नौ सेना की परास काफी घट जाती है।
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(2) यदि अमेरिका भारत को हथियारों की पूरी मदद देता है :
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तब मामला बहुत सीधा है। अमेरिका भारत को 50 ड्रोन और लेसर गाईडेड मिसाइले भेजेगा, और ये आयटम 2 – 3 दिन में ही पाकिस्तान की आधी मिलिट्री पॉवर तोड़ देंगे। पाकिस्तान के पास जो रडार और फाइटर प्लेन है, वे अमेरिकी है। अत: जब अमेरिकी ड्रोन / मिसाइले पाकिस्तान पर हमला करने जायेंगे तो ये रडार एवं फाईटर प्लेन काम करना बंद कर देंगे। मतलब, यदि अमेरिका भारत को हथियारों की मदद देना शुरू करता है और पाकिस्तान को कोई मदद नहीं देता है तो भारत हफ्ते भर में पाकिस्तान को पूरी तरह से ध्वस्त कर देगा। और भारत का इसमें कोई सैनिक नहीं मरेगा !!
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अब यदि चीन पाकिस्तान को अर्जेंट में ड्रोन, फाईटर प्लेन देना शुरू करता है, तो पाकिस्तान लड़ाई थोड़ी लम्बी खींच सकता है, लेकिन बच तब भी नहीं पायेगा। क्योंकि अमेरिकी प्लेन, ड्रोन आदि चीन से काफी ज्यादा उन्नत है।
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(3) यदि अमेरिका पाकिस्तान को हथियारों की मदद देता है :
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यदि रूस हमें अर्जेंट में हथियार नहीं भेजता तो वही सब कुछ भारत के साथ होगा जो मैंने ऊपर वाले बिंदु में पाकिस्तान के लिए लिखा है। अब हमारे साथ समस्या यह है कि यदि भारत का पीएम अमेरिका के खिलाफ जाकर कोई क़ानून छापता है तो अमेरिका को पाकिस्तान को हथियार भेजकर इतना बड़ा झमेला करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि भारत में अमेरिका अब इतना मजबूत हो चुका है कि, पीएम अमेरिकी हितो के खिलाफ नहीं जा सकता। उनका काम कहने भर से ही हो जाता है। वाजपेयी के समय बात और थी। तब भारत में पेड मीडिया एवं सोशल मीडिया अमेरिकी धनिकों के कंट्रोल में नहीं था। अत: वाजपेयी को कंट्रोल में लाने के लिए उन्हें पाकिस्तान को हथियार भेजकर कारगिल पर चढ़ाई करने को कहना पड़ा।
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समाधान ?
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भारत के पास विशाल मात्रा में प्राकृतिक संसाधन एवं सभी प्रकार के खनिज है। यदि हम निचे दिए गए 4 क़ानून छाप दें तो अगले 5-7 वर्षो में भारत की सेना को आत्मनिर्भर बना सकते है :
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(i) भारत सामरिक बम बनाने का प्रोजेक्ट शुरू करे ।
(ii) भारत में निजी क्षेत्र की कम्पनियो को हथियार निर्माण की अनुमति नहीं है !! यदि भारत में हथियारों के निर्माण हेतु लाइसेंस का क़ानून ख़त्म करके सिर्फ रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नीति लागू करने के लिए वोइक क़ानून छापना चाहिए ।
(iii) फैक्ट्री मालिको अदालतों-थानों से बचाने के लिए जूरी कोर्ट कानून गजेटे में छापा जाए
(iv) जीएसटी केंसल करके जमीन सस्ती करने के लिए प्रस्तावित रिक्त भूमि कर
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क्या भारतीय सेना पाकिस्तानी सेना को 7 से 10 दिन में हरा पाएगी जैसा मोदी जी कहते हैं?
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हमें नेताओं के भाषण, स्पीचे, इंटरव्यू, डायलॉग, बयान वगेरह कभी सुनने ही नहीं चाहिए । हमें सिर्फ यह देखना चाहिए कि, वह गेजेट में कौनसे क़ानून छाप रहे है ।
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2015 में मैंने सांसद को SMS भेजा था कि पाकिस्तान सामरिक बम बना रहा है, अत: हमें भी बनाने शुरू करने चाहिए। 2016 में मोदी साहेब ने शरीफ से यह प्रोजेक्ट रोकने को कहा लेकिन शरीफ ने इनकार कर दिया। फिर मोदी साहेब ने अमेरिका से कहा कि वे पाकिस्तान पर दबाव बनाए कि वे सामरिक बम न बनाए, लेकिन पाकिस्तान ने साफ़ कर दिया कि सामरिक बमों का उत्पादन जारी रहेगा।
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चूंकि भारत के पास सामरिक बम नहीं है और पाकिस्तान सामरिक बम बना रहा था तो हमारे पास सामरिक बमों का प्रोजेक्ट शुरु करने की वाजिब वजह मौजूद थी। यदि भारत भी सामरिक बम बनाने का प्रोजेक्ट शुरू कर देता तो अमेरिका-ब्रिटेन-फ़्रांस पर बहुत ज्यादा दबाव आता और या तो वे पाकिस्तान को रोक देते या फिर हम भी सामरिक बम बना लेते । मैंने 2016 में मोदी साहेब को ट्विट किया कि वे सामरिक बम का प्रोजेक्ट शुरू करे। 2018 में मैंने फिर से ट्विट किया कि सामरिक बम का प्रोजेक्ट शुरू करो। और हथियारों के निर्माण को लाइसेंस मुक्त करने के लिए कई बार बोल चुका हूँ। उन्होंने हमारी सेना को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक भी क़ानून नहीं छापा !!
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अब तक मैं संघ=बीजेपी के हजारो कार्यकर्ताओ एवं मोदी साहेब के समर्थको को बोल चुका हूँ कि वे भी मोदी साहेब को इस बारे में ट्विट भेजे। किन्तु वे यह मांग करने से इंकार कर देते है। उनका कहना होता है कि इस तरह की मांग करने से संगठन की एकता भंग होती है। इसीलिए इस मुद्दे पर हमें कुछ बोलना नहीं है !! और इस दौरान ये सभी लोग सोशल मीडिया एवं पेड मीडिया पर पाकिस्तान की ऐसी तैसी करने के एलान भी चलाते रहते है।
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इस तरह के एलान एवं बयानबाजी के चक्कर 6 वर्ष बर्बाद करने की जगह पर यदि वे सामरिक बम बनाने का प्रोजेक्ट शुरू करने का क़ानून छापते तो वास्तव में हमारी सेना की स्थिति सुधरती। शरीफ ने डायलॉग मारने की जगह क़ानून छापा और बम बना लिए !! यदि भारत के 5-7 लाख लोग भी गंभीरता से इस मांग को उठाना शुरू करें तो मोदी साहेब को यह फैसला लेने के लिए बाध्य किया जा सकता है।
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मांग करने के लिए पीएम को यह ट्विट भेजे - #MakeTacticalNuke
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Feb 10 2020 12:43:46 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री के पास गेजेट में इबारतें छापने की विशिष्ट शक्ति होती है। और वे बहुधा वे ऐसी इबारतें छापने में अपना वक्त जाया करना पंसद नहीं करते जिससे लाभ न हो। चूंकी भारत के ज्यादातर कार्यकर्ताओ को पेड मीडिया द्वारा नेताओं के बयानों, भाषणों एवं विचारधाराओ की जुगाली करने के लिए सधाया गया है अत: वे इस विषय में रुचि नहीं लेते कि पीएम गेजेट में क्या और क्यों छाप रहा है। अत: भारत के बहुधा नागरिक इस प्रकार के भ्रष्टाचार से परिचित ही नहीं है। हाल ही छापे गये एक क़ानून का उदाहरण देखिये
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(i) 17 जनवरी 2020 को मोदी साहेब ने गेजेट में छापा कि –
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"In exercise of the powers conferred by Explanation 1 to section 44A of the Code of Civil Procedure, 1908 (5 of 1908), the Central Government hereby declares, United Arab Emirates to be a reciprocating territory for the purposes of the said section..."
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"नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 1 के खंड 44A द्वारा प्रदत्त शक्तियों के तहत केंद्र सरकार निर्धारित करती है कि संयुक्त अरब अमीरात उक्त धारा के प्रयोजनों के लिए एक पारस्परिक क्षेत्र है..।"
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<https://indianexpress.com/article/explained/dubai-reciprocating-territory-india-6226390/?fbclid=IwAR0hsnhVqrCN_McG2zLQUt5QQYjRjKVzWUXIIo-ifyY9dct5FZpLUKNrtv4>;
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(ii) इस इबारत का क्या आशय है ?
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अब तक यूएई में यदि कोई व्यक्ति / कम्पनी किसी भारतीय व्यक्ति या भारतीय कम्पनी के विरुद्ध अदालत में वाद दायर करता है, और यूएई कोर्ट भारतीय व्यक्ति की संपत्ति को जब्त करने का आदेश जारी करता है, तो अभी तक यूएई कोर्ट के ये आदेश सिर्फ यूएई तक ही लागू हो सकते थे, भारतीय सीमा में नहीं।
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लेकिन मोदी साहेब द्वारा छापा गया यह क़ानून कहता है कि, अब यूएई कोर्ट एनआरआई या गैर-एनआरआई या भारतीय व्यक्ति की भारत में स्थित संपत्ति को जब्त करने के आदेश भी जारी कर सकेगी !! वहां की अदालत जो फैसला देगी वे यहाँ पर सीधे लागू होंगे। दुबई से आदेश लाकर यहाँ की अदालत में जमा कर दीजिये। और यहाँ की अदालत संपत्ति जब्त करने के आदेश निकाल देगी !!
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(iii) इसमें संभावित भ्रष्टाचार क्या है ?
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कायदा यह है कि इस तरह का क़ानून उस दिन से प्रभावी होना चाहिए जिस दिन से यह क़ानून लागू हुआ है। क्योंकि आज से 10 साल पहले यदि दुबई के किसी बैंक ने भारत के किसी व्यक्ति या फर्म को लोन दिया था तो अमुक बैंक यह जानता था कि यदि व्यक्ति को कारोबार में घाटा होता है तो बैंक का पैसा डूब जाएगा, और बैंक अमुक व्यक्ति की सिर्फ उतनी ही संपत्ति पर दावा कर सकेगा, जितनी संपत्ति UAE में स्थित है।
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किन्तु मोदी साहेब ने यह क़ानून भूतलक्षी प्रभाव ( Retrospectively) के साथ लागू किया है !! मतलब आज से 20 साल पहले तक भी जितना पैसा UAE के बैंको का डूब चुका था वह सारा पैसा मोदी साहेब की इस इबारत ने जिन्दा कर दिया है !! पेड इकोनॉमिक टाइम्स ने रिपोर्ट किया है कि UAE के लगभग आधा दर्जन बैंक भारत के डिफाल्टर्स से 50,000 करोड़ की वसूली की तयारी में लग गए है !!
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<https://economictimes.indiatimes.com/industry/banking/finance/banking/uae-banks-headed-for-india-to-recover-rs-50000-crore/articleshow/74019520.cms?fbclid=IwAR2EDVyZus2o9C3-z0dvV8dkRzbwMoQlSYus1Ad7eus9JMiymBF6SCjgcxM&from=mdr>;
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डिफाल्टर्स की इस सूची में भारतीय फर्म्स, कम्पनियां एवं व्यक्तिगत ऋण भी शामिल है। जिन लोगो का दुबई से सरोकार है वे इस बात से परिचित होंगे कि यहाँ से जाने वाले कई लोग वहां पर पर्सनल या बिजनेस लोन ले लेते है। इसमें वे लोन भी होते है जो बैंक अधिकारीयों की मिली भगत से लिए जाते है, और लोन लेने वाला भी जानता है कि, लोन मुझे देना नहीं है।
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उदाहरण के लिए मान लीजिये कि, X दुबई में पैसा कमाने के लिए 2 साल के वीजा पर जाता है और कोई लेबर वर्क करता है। तो वहां पर पहले से रह रहा व्यक्ति उसके नाम पर 1 करोड़ का लोन दिलाने की सेटिंग करेगा। इसमें से 90 लाख रू बैंक अधिकारी एवं स्थानीय मांडवाल रख लेंगे और 10 लाख X को देंगे। फिर ये लोग X को भारत रवाना कर देंगे। इस तरह से लोन लेकर भारत आ जाने वाले भारतीयों की संख्या हजारों में है।
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इसी तरह कई लोग वहां पर पैसा लगाकर धंधा शुरू करते है, और फिर काम बढाने के लिए लोन ले लेते है। और यदि उन्हें घाटा हो जाता है तो सब छोड़ छाड़ कर वापिस भारत आ जाते है। कई कोरबार पार्टनरशिप फर्म के रूप में होते है, यदि एक फर्म उड़ जाती है, तो गारंटर फर्म भी काम समेट कर निकल जाती है। UAE की बैंको का ये सारा पैसा अब खड़ा हो चुका है। पहले बैंक नोटिस भेजना शुरू करेंगे और फिर कुर्की के आदेश !!
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(iv) यदि 20,000 करोड़ की भी वसूली हो जाती है, तो बैंकिंग कम्पनियों के लिए यह शुद्ध मुनाफा होगा !! यह मुनाफा उन्हें मोदी साहेब की सिर्फ 3 लाइनों की इबारत ने बनाकर दिया है !! यह अनुमान लगाने की बात है कि मोदी साहेब ने यह इबारत छापने के लिए क्या लिया होगा।
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मेरा अनुमान है कि, मोदी साहेब ने इसके लिए कम से कम 2% ( 20,000*2% ) यानी 400 करोड़ का मीडिया कवरेज* चार्ज किया होगा। मेरा अनुमान गलत भी हो सकता है। आप अपना अनुमान लगाने के लिए स्वतन्त्र है।
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(*) मेरा मानना है कि श्री अरविन्द केजरीवाल की तरह मोदी साहेब भी नकदी कभी नहीं लेते है। हालांकि कोंग्रेस के ज्यादातर नेता सीधे नकदी लेने में ही मानते है। मोदी साहेब जो भी क़ानून छापते है उसके एवज में सीधे मीडिया चैनल्स को भुगतान करने के लिए कह देते है। अभ्यर्थी पेड मीडिया को भुगतान कर देता है, और पेड मीडिया अमुक राशि के बराबर उन्हें सकारत्मक फुटेज दे देता है। उनकी रैली का निर्बाध प्रसारण वगेरह।
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यदि कोई व्यक्ति अपना सारा राजनैतिक ज्ञान पेड मीडिया के माध्यम से नहीं ले रहा हो तो यह बात समझ सकता है कि UAE के लिए मोदी साहेब ने ऐसा क़ानून छापा है जो दुबई के धनिकों को अतिरिक्त फायदा पहुंचाता है, और इसके एवज में हजारो भारतीयों को कोर्ट कचहरी, कुर्की, जब्ती आदि का सामना करना पड़ेगा। सिर्फ एक जीनियस ही बता सकता है कि दुबई में रहने वाले धन कुबेरों को फायदा पहुँचाने के लिए भारतीयों पर जाया तौर पर वजन क्यों डाला गया है। यदि मामला भारत का हो तब भी बात समझ आती है। दुबई के धनिक यदि अपना पैसा गँवा चुके है तो हम क्यों अपने नागरिको को इनके हवाले कर रहे है ? वो भी भूतलक्षी प्रभाव के साथ।
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हमें नहीं पता कि इनमे से कितने लोगो की आर्थिक स्थिति कितनी टूटी हुयी है। कोई आदमी चलकर दुबई में फ्रोड करने नहीं जाता है, और न ही वहां से ऐसे भागकर आता है। हालात बिगड़ जाते है, व्यक्ति को घाटा हो जाता है। अब ये वसूली भारत में फिर से उनका पीछा करना शुरू करेगी। ऐसे में किसी के पास सिर्फ एक घर है तो कोर्ट के आदेश से वह घर जब्त हो जाएगा, और नीलामी होगी !! और ऐसे कितने लोगो के नाम पर वारंट निकलेंगे, और उन्हें भागना पड़ेगा, हमें कोई अंदाजा नहीं !!
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मेरे मानने में इस क़ानून को भूतलक्षी प्रभाव से छापने की अन्य कोई वजह नहीं है। क्योंकि इससे भारत को एवं भारत के किसी भी नागरिक को किसी भी तरह का फायदा नहीं है। यह क़ानून छपवाने के लिए UAE के बैंक मालिक काफी समय से लोबिंग कर रहे थे। कोंग्रेस ने कोशिश भी की थी, परन्तु "दुबई जैसे" देश के बैंको को भारत में इतना बड़ा जैकपॉट देने की वे हिम्मत नहीं जुटा पाए।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Feb 12 2020 22:25:04 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Rameshwar Jat Jury BhilwaraRj:

8 महीने पहले जिस दिल्ली में 7 की 7 लोकसभा सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी आज विधानसभा चुनाव में 70 में से महज 8 सीट ही जीत पाई ।

यह कैसे सम्भव है ?

दिल्ली के लोग लोकसभा में मोदी जी को पसंद कर रहे है , देश के भविष्य की डोर मोदी के हाथ मे देना चाहते है लेकिन विधानसभा में केजरीवाल के हाथ मे ?

जबकि अभी तो देश मे धारा 370, राम मंदिर व नागरिकता संसोधन अधिनियम जैसे मुद्दे ताजे ही है और इन मुद्दों पर मोदीजी को जनता का साथ भी है । हमारे गृहमंत्री जी कई बार कह चुके है कि प्रधानमंत्री कार्यालय पर भेजे गए पत्रों से पता चलता है कि जनता किसके साथ है ।

फिर दिल्ली में यह उलटफेर कैसे हो सकता है ?

मानो या ना मानो धूर्त केजरीवाल ने अमेरिकी - ब्रिटिश धनिकों के साथ मिल कर EVM के साथ साथ विविपेट से छेड़खानी जरूर की है । बिना छेड़खानी के इतनी सीटे नही आ सकती है ।

केजरीवाल को आशंका थी कि अमेरिकी - ब्रिटिश धनिक धोखा नही कर दे इसलिए छेड़खानी का आरोप चुनाव से पहले ही बीजेपी पर लगा दिया था ।

अन्यथा योगी आदित्यनाथ जैसा उ. प. का मुख्यमंत्री, अमित शाह जैसा गृहमंत्री और देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव में उतरने के बाद भी केवल 8 सीट ही जीत पाए , यह बिना छेड़खानी सम्भव नही है ।

अतः सभी जिम्मेदार देश वासियों को evm हटाकर बैलेट पेपर से फिर से चुनाव कराने की पोस्टकार्ड लिखकर मांग करनी चाहिए ।
अगर बैलेट पेपर से चुनाव करवाते है तो दिल्ली में आज मोदीजी 50 सीट जीत जाएंगे । #CancelEVM

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Feb 15 2020 23:36:43 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

जब कुरान में ऐसी आयतें लिखी हुई हैं, जिनमें लिखा है कि गाय का मांस नहीं खाना चाहिए, फिर मुस्लिम लोग गाय को काटकर क्यों खाते हैं?
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भारत में शरिया नाफ़िज़ नहीं है, इसीलिए इस बात से कोई फर्क नहीं आता कि कुरान में क्या लिखा है। किसी भी राज्य का शासन गेजेट में लिखी गयी इबारतो पर चलता है, कुरान, बाइबिल या मनु स्मृति में लिखे गए दर्शन पर नहीं।
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(A) मध्य काल :
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(a1) भारत में गायों पर सबसे पहला हमला अलाउद्दीन खिलजी ने किया था। उसके शासन काल में काफी गायें काटी गयी।
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(a2) बाबर के शुरुआती दौर में गाय काटने की अनुमति थी, लेकिन बाद में बाबर ने गौ कशी पर प्रतिबन्ध लगा दिए थे। बाबर जब मरा तो हुमायूं को वसीयत कर गया था कि, हिन्दुस्तान में गाय न कटने देना।
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(a3) अकबर, जहांगीर एवं शाहजहाँ के काल में भी गाय काटने पर प्रतिबन्ध रहे।
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(a4) औरंगजेब ने अपने शुरूआती दौर में गाय काटने की इजाजत दी, लेकिन कुछ वर्षो के बाद उसने भी गेजेट में गाय न काटने के आदेश निकाल दिए थे
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(a5) उसके बाद से बहादुर शाह जफ़र तक लगातार गाय काटने पर प्रतिबन्ध जारी रहे।
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(B) ब्रिटिश काल :
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जब गोरे भारत आये तो हिन्दू-मुस्लिम के बीच तनाव बढ़ाने के लिए कई सारे क़ानून छापें। पेड इतिहासकार इन कानूनों के बारे में कभी नहीं लिखते बल्कि उनकी इस नीति को सिर्फ “फूट डालो राज करो” टाइप का अस्पष्ट वाक्य लिखकर निपटा देते है। यदि पेड इतिहासकार कानूनों की डिटेल लिखेंगे तो पाठक यह जान जायेंगे कि मौजूदा सरकार कौनसे क़ानून छापकर और कौनसे कानूनों की अवहेलना करके गाय का इस्तेमाल हिन्दू-मुस्लिम के बीच तनाव बढाने में कर रही है।
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बहरहाल, गोरो ने भारत में गाय काटने की अनुमति देना शुरू किया। नीति यह थी कि गाय काटने की इजाजत देने से मुस्लिम तबका गाय खाने लगेगा, और इससे हिन्दूओ में रोष पैदा होगा। तो क़ानून आने के बाद कत्लखानो में गायें कटने लगी और हिन्दू-मुस्लिमो में तनाव बढ़ने लगा। 1870 के आस पास भारत में पहला गौ बचाओ आन्दोलन शुरू हुआ। यह आन्दोलन देश व्यापी था और लगभग 25 वर्षो तक निरंतर बढ़ता रहा। लेकिन गोरे टस से मस नहीं हुए। बल्कि उन्होंने अदालत से यह रूलिंग निकाली कि गाय हिन्दुओ के लिए पवित्र नहीं है, अत: इसे काटना जायज है !! इसी दौरान गाय काटने को लेकर हिन्दू-मुस्लिम दंगे भी होने लगे।
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(C) आजादी के बाद :
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जवाहर लाल के शासन काल में गौ कशी जारी रही। बाद में साधु-संतो इस मांग को लेकर संसद का घेराव किया गया और इंदिरा जी ने भारत के उन सभी राज्यों में गौ कशी निषिद्ध क़ानून बनवाये जहाँ पर कोंग्रेस सरकार थी।
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तो भारत के ज्यादातर राज्यों में गौ हत्या प्रतिबन्ध के क़ानून तो है। लेकिन जिन राज्यों में गौ हत्या गैर कानूनी है, उन राज्यों में भी गाय काटी जाती है। वजह ?
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असल में सभी क़ानून ठीक से तभी काम करते है, जब क़ानून तोड़ने वालो को पकड़ने वाली पुलिस एवं दंड देने वाली अदालतें ठीक से काम करती है।
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भारत में कोई भी क़ानून ठीक से काम नहीं करते, और वे ठीक से इसीलिए काम नहीं करते क्योंकि भारत की पुलिस एवं अदालतें ठीक से काम नहीं करती। असल में, भारत की पुलिस एवं अदालतें सबसे ज्यादा भ्रष्ट है, और इसीलिए भारत के सभी प्रकार के विभागों में भ्रष्टाचार है। जब तक हम पुलिस एवं अदालतें नहीं सुधारते तब तक गौ कशी को प्रभावी ढंग से रोका नहीं जा सकता।
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(D) समाधान ?
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मैंने इस समस्या के समाधान के लिए 2 क़ानून प्रस्तावित किये है :
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(d1) गौ हत्या रोकने के लिए गौ-नीति नामक क़ानून ड्राफ्ट
(d2)पुलिस एवं अदालतें सुधारने के लिए जूरी कोर्ट नामक क़ानून ड्राफ्ट
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यदि प्रस्तावित गौ नीति को गेजेट में छाप दिया जाता है तो भारत में गाय काटना लगभग बंद हो जायेगी, और देशी गाय की प्रजाति का सरंक्षण शुरू होगा। गौ नीति नामक क़ानून ड्राफ्ट का मुख्य उद्देश्य देशी गाय की प्रजाति को बचाना है।
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प्रस्तावित जूरी कोर्ट मेरा मुख्य प्रस्ताव है, और यह भारत की पुलिस एवं अदालतों को सुधारने के लिए लिखा गया है। जूरी कोर्ट एक अलग क़ानून है, इसका ड्राफ्ट आप जूरी कोर्ट मंच में देख सकते है।
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(E) पेड मीडिया काल : असली बाधा
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सबसे पहले आपको एक बात अच्छे से समझ लेनी चाहिए कि आज के दौर में भारत की ऐसी कोई भी राजनैतिक पार्टी या नेता पेड मीडिया के प्रायोजको के एजेंडे के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं दिखा सकता, जिसका फोटो आप पेड मीडिया यानी कि मुख्य धारा के टीवी चैनल्स एवं अख़बारो में देखते हो।
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गाय बचाने में रुचि रखने वाले लगभग सभी कार्यकर्ता इस बात की अवहेलना कर रहे है कि गाय को लेकर पेड मीडिया के प्रायोजको का एजेंडा क्या है।
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(e1) ऐसे क़ानून जारी रखना जिससे गाय का इस्तेमाल करके हिन्दू-मुस्लिम के बीच तनाव बढ़ाना।
(e2) देशी गाय की प्रजाति को लुप्त करके इसके उत्पादों पर एकाधिकार बनाना।
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दुसरे शब्दों में, पेड मीडिया में नजर आने वाली भारत की मुख्य धारा की किसी पार्टी के नेता गाय बचाने के भावुक या उकसाऊ बयान तो दे सकते है, किन्तु गाय बचाने का क़ानून गेजेट में नहीं छाप सकते। मतलब यदि आप पेड मीडिया पार्टियों से गाय बचाने का क़ानून छापने की उम्मीद कर रहे है, तो सालों साल इन्तजार करने के बाद भी अंत में आपको निराशा ही हाथ लगेगी।
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मेरे विचार में यदि आपको देशी गाय की नस्ल बचाने में रुचि है तो निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए :
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(i) प्रस्तावित गौ-नीति क़ानून का ड्राफ्ट पढ़ें
(ii) यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो अपने राज्य के मुख्यमंत्री को ट्विट भेजे कि वे गौ-नीति के ड्राफ्ट को गेजेट में छापे। आप चाहे तो यह ट्विट पीएम को भी भेज सकते है।
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यदि आपको लगता है कि प्रस्तावित गौ-नीति क़ानून ठीक नहीं है, तो जिस भी पार्टी से आपको उम्मीद है, उसके नेताओं को ट्विट करें कि वे गौ हत्या रोकने के लिए जिस क़ानून ड्राफ्ट का समर्थन करते है, उसका ड्राफ्ट आपको भेजे। यदि अमुक पार्टी के नेता आपको कोई जवाब नहीं देते है तो अमुक पार्टी के कार्यकर्ताओ से ड्राफ्ट मांगे। सोशल मीडिया पर आपको अमुक पार्टी के कार्यकर्ता आसानी से मिल जायेंगे।
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यदि अमुक पार्टी के नेता या कार्यकर्ता आपको गौ हत्या रोकने का कोई ड्राफ्ट नहीं देते है, तो मेरे विचार में यह बात साबित है कि उन्हें गाय बचाने की बातें करने में तो रुचि है, किन्तु गाय बचाने के लिए आवश्यक क़ानून लागू करने में उनकी रुचि बिलकुल नहीं है। और जैसा कि मैंने ऊपर बताया पेड मीडिया द्वारा प्रायोजित पार्टियाँ गाय बचाने के एलान तो दे सकती है किन्तु वे इसके लिए आवश्यक क़ानून गेजेट में छापने का समर्थन नहीं कर सकती है।
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अगले चरण में सोशल मीडिया पर अपनी मित्र सूची तलाश करें। वहां पर आपको काफी कार्यकर्ता मिलेंगे जो गाय बचाने को लेकर मुखर रूप से लिखते है, और इसमें रुचि लेते है। उनसे पूछे कि वे गौ हत्या रोकने के लिए कौनसा क़ानून गेजेट में छपवाना चाहते है ? उनसे भी ड्राफ्ट मांगे।
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इस तरह गाय में रुचि रखने वाली सभी पार्टियों, नेताओं, कार्यकर्ताओ आदि से गाय बचाने का ड्राफ्ट माँगना शुरू करें। यदि इनमे से कोई व्यक्ति आपको कोई ड्राफ्ट देता है तो उसके ड्राफ्ट की तुलना गौ-नीति ड्राफ्ट से करें। यदि उनका ड्राफ्ट बेहतर है तो उस ड्राफ्ट की मांग करें और मुझे भी वह ड्राफ्ट भेजे, ताकि मैं भी अमुक ड्राफ्ट को गेजेट में छापने के लिए पीएम को कह सकूं।
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यदि कोई भी व्यक्ति आपको इसका ड्राफ्ट नहीं देता है तो उन्हें प्रस्तावित गौ-नीति का ड्राफ्ट दें, और उनसे कहें कि यदि वे प्रस्तावित गौ-नीति क़ानून ड्राफ्ट का समर्थन करते है तो पीएम को ट्विट भेजकर इस मांग को आगे बढ़ा सकते है।
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सार : कुरान या ऐसे धर्मग्रंथो आदि में जो भी लिखा हो उसका पालन लोग अपनी सुविधानुसार एवं चयनात्मक रूप से करते है, किन्तु गेजेट में लिखी हुई इबारत का पालन करना सभी के लिए अनिवार्य होता है। सार यह है कि जिन नागरिको को गाय बचाने में रुचि है उन्हें गेजेट में लिखी हुई इबारतो पर ध्यान देना चाहिए, कुरान में लिखी आयतों पर नहीं !!
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कैसे पेड मीडिया के प्रायोजक भारत में देशी गाय की नस्ल पर एकाधिकार बनाने की नीति पर काम कर रहे है, कैसे वे गाय का इस्तेमाल हिन्दू-मुस्लिम तनाव बढ़ाने में करते है, और कैसे इसे रोका जा सकता है, इसका विवरण मैंने इस जवाब में विस्तार से दिया है। इस जवाब में ही मैंने प्रस्तावित गौ-नीति क़ानून के विवरण भी दिए है।
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भारत में देसी गाय की क्या स्थिति है? देसी गाय को कैसे बचाया जा सकता है --<https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/862195567486855/>;
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और एक बात – भारत में गाय को लेकर हिन्दू-मुस्लिम तनाव घटता बढ़ता रहेगा। किन्तु यदि ईरान एवं अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता है तो भारत में यह तनाव निर्णायक स्तर पर बढ़ जाएगा। गाय का इस्तेमाल करके पेड मीडिया के प्रायोजक भारत में ऐसे सिविल वॉर को ट्रिगर कर सकते है जो दशको लम्बा खिंच सकता है।
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और जब अमेरिका ईरान पर हमला करेगा तो ज्यादातर से भी ज्यादातर सम्भावना है कि वे इसे ट्रिगर कर देंगे। लेकिन यदि भारत के कार्यकर्ता प्रस्तावित गौ-नीति गेजेट में छपवाने में सफल हो जाते है, तो पेड मीडिया के प्रायोजको के हाथ से तंदूर दहकाने का एक अस्त्र निकल जाएगा।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Feb 17 2020 16:42:18 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सिकंदर महान के बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य क्या हैं?
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सिकंदर के जीतने का असली कारण यह था कि उसके पास दुनिया के सबसे बेहतर हथियार थे !!
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(1) भाले : जूरी सिस्टम होने के कारण ग्रीस ने हल्की एवं मजबूत धातु का अविष्कार कर लिया था , जिसकी वजह से वे 18 फुट तक लम्बे भाले बना पाए !! इतने लम्बे होने के बावजूद इनमे नम्यता नहीं थी और ये हल्के भी थे। छह फुटी भालो का 18 फुट के भालो से कोई मुकाबला नहीं था।
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(2) जीन : ग्रीस ने जीन यानी काठी भी बनायी !! तब तक भारत समेत शेष विश्व में घोड़ो पर बिना जीन के ही बैठा जाता था। जीन होने से घुड़सवार का संतुलन, घोड़े पर पकड़ एवं युद्ध करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। ( श्री चन्द्र प्रकाश द्विवेदी के चाणक्य धारावारिक में आप भारतीय घुड़सवारो को बिना जीन के देख सकते है।)
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(3) किला तोडू मचान : जूरी सिस्टम के कारण ग्रीक बेहतर मचान बनाने में सफल हो गए थे। सिकन्दर की सेना किले की दीवार के साथ मचान जब मचान लगाती थी तो इन मचानो की ऊंचाई किलो की दीवारों से भी ऊँची हो जाती थी। इससे किले की दीवारे सिकन्दर का हमला रोकने में नाकाम साबित हुयी।
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(4) चमड़े के बख्तर : जूरी सिस्टम के कारण ग्रीस ने सस्ते एवं मुलायम चमड़े का उत्पादन बड़े पैमाने पर करना शुरू किया। बड़े पैमाने पर चमड़े का उत्पादन होने के कारण ज्यादातर ग्रीक सैनिक का अधिकाँश चमड़े द्वारा आवृत होता था। यह चमड़ा मुलायम एवं हल्का था अत: सैनिको को लड़ने में परेशानी नहीं होती थी एवं तीर आदि इन्हें भेद नहीं पाते थे। जबकि शेष विश्व ने सैनिक भारी भरकम जिरह बख्तर लाद कर लड़ रहे थे।
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(5) गुलेले : जूरी सिस्टम की वजह से ग्रीस वासी बेहतर गुलेले बना पाए। ये गुलेले 300 किलो तक के पत्थरो को 500 से 600 मीटर दूरी तक फेंक सकती थी। इनका इस्तेमाल किले की दीवारों को तोड़ने एवं दूर से ही सेना पर हमला करने के लिए किया जाता था।
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(6) बड़ी एवं हलकी ढाल : ग्रीक्स की ढाल भी काफी बड़ी एवं हल्की थी। सख्त चमड़े की बने होने के बावजूद यह इतनी हल्की थी कि इसे उठाया जा सकता था। ग्रीक्स के केटापल्ट भी बहुत मारक थे !
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तो सिकन्दर को जब मालूम हुआ कि उसके पास दुनिया के सबसे आधुनिक एवं मारक हथियार है , एवं अन्य किसी सेना के पास ऐसे हथियार नहीं है तो उसमे इस महत्त्वाकांक्षा ने जन्म लिया कि दुनिया जीतने का प्रयास करना चाहिए। और जब आपके पास इतने ताकतवर हथियार हो तो साहस वगेरह खुद ब खुद आ जाता है।
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इतिहास की पाठ्य पुस्तक में सिकन्दर का अध्याय इस पंक्ति से शुरु होना चाहिए कि आखिर ग्रीक शेष विश्व की तुलना में इतने बेहतर हथियार बनाने में कामयाब किस वजह से हो गए थे ?
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जूरी सिस्टम के अलावा इसका कोई अतिरिक्त कारण नहीं था। यदि इतिहास की कोई पुस्तक यह नहीं बताती कि जूरी सिस्टम किस तरह तकनीकी आविष्कार को प्रोत्साहित करके समुदाय को बेहतर हथियारों का निर्माण करने में सक्षम करता है तो मेरे विचार में ऐसी पुस्तक इतिहास नहीं बताती , बल्कि इतिहास पर मिट्टी डालने का काम करती है।
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चूंकि सभी इतिहासकार पेड होते है , और उनके प्रायोजक नहीं चाहते कि नागरिको को हथियारों के महत्त्व की सूचना दी जाए, अत: वे इस बात को भुला देते है कि सारा इतिहास युद्धों का इतिहास है, और युद्ध में निर्णायक तत्व हथियार ही है। जिस सेना के पास ज्यादा बेहतर हथियार होंगे वो सेना जीत जायेगी।
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अब इसमें साहस , महत्वकांक्षा , नैतिक बल क्या कर लेगा !! बन्दुक के सामने कोई लाठी लेकर जायेगा तो उसका साहस क्या काम आएगा !! तो इतिहास कार जब सिकन्दर पर 100 पेज लिखेंगे तो उसके हथियारों की चर्चा सिर्फ 2 पेज में समेट देंगे, और शेष 98 पेज में अजीब किस्म के दार्शनिक एवं अप्रासंगिक कारण लिखेंगे -- महत्त्वाकांक्षा, नैतिक बल, अनुशासन, साहस, कुशल रणनीति, संगठन, एकता !!!
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दरअसल ये छात्रों को भ्रमित करने के लिए इतिहास नहीं कवितायेँ लिखते है।
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हेनरी फोर्ड सही था — History is more or less Bunk !!
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मतलब इतिहास जिस तरह से लिखा जाता है , यह एक बकवास है !! कभी कम तो कभी ज्यादा !!
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इतिहास को किस तरह लिखा जाना चाहिए इसकी प्रक्रिया इस जवाब में देखें -- <https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/1035102530196157/>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Feb 17 2020 16:44:18 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

चंगेज खान कैसे इतने बड़े सामाज्य का मालिक बना ,उसके चरित्र में क्या विशेषता थी?
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दो वजहें मुख्य थी :
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(i) छोटे और ज्यादा मारक धनुषो का निर्माण ,
(ii) हथियार बनाने वाले इंजीनियर्स को संरक्षण !!
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चारित्रिक विशेषताओं से इतने बड़े साम्राज्य खड़े नहीं किये जाते। साम्राज्य खड़ा करने के लिए जंग जीतनी होती है। जंग जीतने के लिए बेहतर हथियार चाहिये। जिसकी सेना के पास बेहतर हथियार होंगे वह राजा जंग जीतता जाएगा और उसका साम्राज्य फैलता जाएगा।
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(1) तब तक दूर तक तीर फेंकने वाले धनुष लगभग 6 फुट लम्बे होते थे , और इन्हें जमीन पर टेक कर चलाया जाता था। यदि कोई घुड़सवार इसे चलाना चाहेगा तो इनकी लम्बाई के कारण उसे असुविधा होगी और वह लम्बे धनुष से एक ही तरफ तीर चला सकेगा, अपनी दिशा नहीं बदल सकेगा। लेकिन मंगोलों ने सिर्फ 3-4 फुट के धनुषों का बड़े पैमाने पर निर्माण किया। ये धनुष ज्यादा दूरी तक भी मार करते थे और इनकी गति में बेहद तीव्र थी।
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धनुषों को दस अलग-अलग सामग्रियों से बनाया जाता था। धनुष के बाहरी हिस्से को लचीला बनाने के लिए हिरण की आंतो, गोंद और अन्य ऊतक इस्तेमाल होते थे। इससे धनुष को ज्यादा ताना जा सकता था और तीर ज्यादा दूरी तक मार करता था। धनुष की भीतरी परत कठोर बनाने के लिए सींगो के बुरादे में गोंद मिलाकर लगाई जाती थी। कठोरता बढ़ने से तीर की गति बढ़ती है।
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छोटे और हल्के धनुष होने के कारण चंगेज खान के घुड़सवार घोड़े पर बैठकर भी लम्बी दूरी तक सभी दिशाओ में निशाना लगाने में सक्षम थे , और इस वजह से चंगेज खान की फ़ौज बेहद मारक बन गयी थी। उसके प्रतिद्वंदियों के पास इस तरह के हथियार नहीं थे।
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(2) चंगेज खान ने जिन भी राज्यों को फ़तेह किया उनके कारीगरों एवं इंजीनियरों का कभी क़त्ल नहीं किया। वह हथियार निर्माण में काम आ सकने वाले कारीगरों को अपनी तरफ मिला लेता था , ताकि हथियार निर्माण की तकनीको में इजाफा हो। इस तरह उसने आर्मी को मजबूत करने वाले और उत्पादकता बढ़ाने वाले मानव संसाधनों में इजाफा किया और उसकी सेना मजबूत होती रही।
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चंगेज खान के धनुषो के बारे में अधिक विवरण यहाँ देख सकते है - Mongolian Archery
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Feb 17 2020 19:09:54 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

पुराने जमाने में राजा-महाराजा किला क्यों बनवाते थे?
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एक बड़ी वजह यह है कि वे बेहतर तोपे नहीं बना पा रहे थे !!
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जिन राजाओं के पास बेहतर हथियार नहीं थे, उनके पास सिर्फ 2 रास्ते थे :
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(1) ऐसे हथियार बनाओ ताकि दुश्मन आक्रमण न करें, या
(2) ऐसे किले बनाओ जिससे दुश्मन आक्रमण न कर सके
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हथियारों की इंजीनियरिंग को जज एवं पुलिस सबसे ज्यादा एवं सीधे तौर पर प्रभावित करते है। जज सिस्टम होने के कारण भारत में जटिल इंजीनियरिंग लगातार पिछड़ी रही, अत: भारतीय राजा बेहतर हथियार नहीं बना पाए, और फिर उन्होंने सुरक्षा के लिए किले बनाने शुरू किये।
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एकत्रीकरण की प्रक्रिया होने के कारण मुगलों के पास बेहतर तोपखाना था। लेकिन यूरोपीय देशो में जूरी सिस्टम आने के कारण गोरो के तकनिकी विकास की स्पीड मुगलों से 10 गुना ज्यादा तेज थी। जूरी सिस्टम के कारण गोरो ने ( पुर्तगाल, स्पेन, फ़्रांस, जर्मन, ब्रिटेन आदि ) न सिर्फ ज्यादा बेहतर तोपे बनायी बल्कि उन्होंने बंदूक बनाना भी सीख लिया था। बन्दुक एवं बेहतर तोपखाना होने के कारण गोरो ने पूरी दुनिया में अपने उपनिवेश स्थापित किये।
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अलेक्जेंडर के पास तब दुनिया के सबसे बेहतर हथियार थे अत: ग्रीस ने कभी भी सुरक्षा की दृष्टी से किले नहीं बनाए। चंगेज खान, तैमूर, नादिर शाह एवं यूरोपियन देशो ने भी किले वगेरह नहीं बनाए। मुगलों ने भी किले बनाने पर ज्यादा भार नहीं दिया.
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इतिहास में जितने भी विजित आक्रमणकारी रहे है, उन्होंने कभी किले नहीं बनाए। उन्होंने बेहतर हथियार बना लिए थे, और इस वजह से उन्हें किले बनाने की जरूरत नहीं रह गयी थी। जिन साम्राज्यो के पास बेहतर हथियार नहीं थे, उन्होंने किले बनाने की दिशा में काम करना शुरू किया। किलो के साथ समस्या यह है कि घेरा डालकर आक्रमणकारी रसद रोक देते थे। फिर उन्होंने रसद के लिए किले से सुरंगे निकालना शुरू किया। और जब महत्त्वाकांक्षी या लालची सिपहसालार सुरंग का पता बता देता तो किले के द्वार खोलकर लड़ने के सिवा कोई चारा नहीं रहता था।
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चीन इससे भी आगे गया। उसने आक्रमणकारियों से बचने के लिए दीवार बनाना शुरू किया। यदि राजा नागरिको को हथियार रखने की अनुमति एवं हथियार चलाने का प्रशिक्षण देने पर शक्ति लगाते तो उन्हें दीवार खड़ी करने जैसे बकवास प्रोजेक्ट पर काम नहीं करना पड़ता !! लेकिन उन्होंने नागरिको को हथियार रखने की अनुमति एवं प्रशिक्षण नहीं दिया
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क्यों ?
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क्योंकि राजा को लगता था कि, यदि नागरिको के पास हथियार आ गये तो वे राजा के खिलाफ विद्रोह* कर सकते है, या उनका प्रतिद्वंदी नागरिको को राजा के खिलाफ भड़का सकता है।
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(*) उस समय तक पेड मीडिया नहीं आया था, अत: इस तर्क का आविष्कार नहीं हुआ था कि नागरिको को हथियार देने से वे एक दुसरे को मार देंगे। इस ज्ञान की उत्पत्ति 20 वीं शताब्दी में हुई थी। भारत में आर्म्स एक्ट आने के बाद। आज आप किसी भी बुद्धिजीवी से पूछेंगे तो वह आपको यही बतायेगा कि नागरिको को हथियार देने से वे एक दुसरे को मार देते है !! )
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यहाँ जिस प्रकार के किले की चर्चा की गयी है उसका आशय सुरक्षा की दृष्टी से बनाए गए किले से है, रिहाईश के लिए बनाए गए कलात्मक किले से नहीं। उदाहरण के लिए लाल किला सुरक्षा की दृष्टी से नहीं बनाया गया था। यह एक महलनुमा किला है। किन्तु मेहरानगढ़, कुम्भलगढ़, चित्तोड़गढ़ आदि किले सुरक्षा की दृष्टी से बनाए गए थे।
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ऐसा नहीं है कि भारतीयों के पास तकनिकी आविष्कार करने की क्षमता नहीं थी। लेकिन आविष्कार करना अलग बात है और कम लागत में मॉस प्रोडक्शन करना दूसरी बात है। तो भारत में कारीगर जो भी आविष्कार करते थे जज सिस्टम होने के कारण न तो उनका बड़े पैमाने पर उत्पादन हो पाता था और न ही उसकी गुणवत्ता में सुधरती थी। उदाहरण के लिए 17 वीं शताब्दी में भारत में बंदूके आनी शुरु हुयी और 18 वीं सदी में भारतीय कारीगर जो बंदूके बना रहे थे, उनका डिजाइन एवं गुणवत्ता ब्रिटिश बन्दूको से ज्यादा बेहतर था। गोरो ने इस भारतीय डिजाइन को एडोप्ट किया और बाद में लाखों बंदूके भारतीय डिजाइन से कॉपी करके ही बनायी गयी।
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लेकिन आगे गोरो ने हथियार बनाने के कारखानों पर लाइसेंस नीति डाल दी थी, अत: भारत में बन्दूको का निर्माण सिर्फ वही कारखाने कर रहे थे, जिन पर गोरो का नियंत्रण था।
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तोपों एवं बन्दूको का जमाना जा चुका है और आज फाइटर प्लेन, ड्रोन आदि निर्णायक हथियार है। लेकिन हथियारों के निर्माण में भारत आज भी वहीँ पर खड़ा है। मतलब, न तो हमें एक प्रभावी राइफल बनाने आती है और न ही टैंक का इंजन बनाने आता है। ड्रोन और फाइटर प्लेन तो बहुत आगे की बात है। वजह फिर से वही है, जो 1000 साल पहले थी :
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(i) जज एवं पुलिस का भ्रष्टाचार
(ii) जमीनों के क़ानून
(iii) रेग्रेसिव कर प्रणाली ( जीएसटी )
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जब तक हम उपरोक्त 4 कानूनों को नहीं सुधारते तब तक हम स्वदेशी तकनीक आधारित हथियार बनाने की क्षमता नहीं जुटा पायेंगे। इन चार व्यवस्थाओ को सुधारने के लिए हमें गेजेट में 2 क़ानून छपवाने की जरूरत है :
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(A) जूरी कोर्ट : इस क़ानून के आने से भारत में पुलिस एवं जजों के भ्रष्टाचार में 70% तक की गिरावट आ जायेगी
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(B) रिक्त भूमि कर : यह प्रस्तावित क़ानून जीएसटी की जगह लेगा। रिक्त भूमि कर एक प्रोग्रेसिव कर है, और इस टेक्स के आने के बाद जीएसटी रद्द हो जाएगा।
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जूरी कोर्ट एवं रिक्त भूमि कर आने से कैसे हम फाइटर प्लेन एवं ड्रोन बनाने की तकनीक जुटा लेंगे, इस बारे में मैंने अपने कई जवाबो में विस्तार से बताया है। इसके कुछ विवरण इन जवाबो में पढ़े :
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क्या जापानियों के आने से हमें बुलेट ट्रेन की तकनीक नहीं मिलेगी, जैसे ऑटोमोबाइल में विदेशियों के आने से मिली ?
<https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/947179485655129/>;
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विश्व स्तरीय अंतरिक्ष और मिसाइल प्रोग्राम होने के बावजूद भी भारत तेजस के लिए जेट इंजन क्यों नहीं बना पाया?
<https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/916131638759914/>;
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[ सम्पादन : टिप्पणी में पूछे गए प्रश्न पर स्पष्टीकरण :
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(1) हथियारों की गुणवत्ता और किले बनाने की वजह का जज एवं जूरी सिस्टम से क्या सम्बन्ध है ?
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जज सिस्टम तकनिकी विकास का सबसे बड़ा दुश्मन है। पिछले 2000 साल की हिस्ट्री का सार यही है कि जिस राज्य की अदालतें बेहतर तरीके से काम कर रही थी, उन्होंने बेहतर हथियार बनाए और अन्य साम्राज्यों को गुलाम बना लिया। भारत की अदालतें भ्रष्ट थी इसीलिए हम बेहतर हथियार नहीं बना पा रहे है।
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एलेक्जेंडर एवं ब्रिटिश के पास बेहतर अदालतें थी अत: उन्होंने बेहतर हथियार बनाए। बेहतर हथियार होने की वजह से उन्होंने पूरी दुनिया में विजय अभियान चलाने शुरू किये और उन्हें अपनी "सुरक्षा" के लिए किले बनाने की जरूरत नहीं रह गए थी। तो इस तरह कोई राजा किले बनाएगा या सेना खड़ी करके साम्राज्य विस्तार का अभियान चलाएगा, इसे मुख्य रूप से अमुक राज्य की अदालतों का स्ट्रक्चर एवं जजों भ्रष्टाचार प्रभावित करता है।
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(2) ब्रिटिशर्स ने फोर्ट विलियम, सेंट जॉर्ज फोर्ट एवं माहिम फोर्ट क्यों बनाए ?
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ब्रिटिश ने भारत में जो किले बनाए थे उनका इस्तेमाल सामान एवं हथियारों को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता था। गोरो का माल बन्दरगाहो पर आता था। अत: माल एवं हथियारों को सुरक्षित करने के लिए उन्होंने बन्दरगाहो के करीब किले बनाये। इन किलो में गोरो का शस्त्रागार वगेरह का भण्डारण किया जाता था। ये किले 16 वीं से 17 वीं सदी में बनाए गए थे, और जब गोरे भारत को पूरी तरह से टेक ओवर कर चुके थे तब भी इन किलो का इस्तेमाल असलहा आदि रखने में किया जाता था।
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2a. सेंट जॉर्ज फोर्ट : कोलकाता में हुबली नदी के किनारे बनाया गया था। इसमें कोलकाता बन्दर पर आने वाले माल एवं असलहा स्टोर किया जाता था।
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2b. फोर्ट विलियम : इसे मद्रास बन्दर के करीब बनाया गया।
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2c. फोर्ट माहिम : इसे ब्रिटिश ने नहीं बनाया था। यह किला गोरो को पुर्तगाल से मिला। इस किले में वे बॉम्बे बन्दर पर आने वाले माल एवं असलहे को स्टोर करते थे।
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दुसरे शब्दों में ये किले उनकी तिजौरी की तरह थे, जिनका इस्तेमाल गोरे अपनी जिंसो एवं हथियारों को रखने के लिए करते थे। भारत के राजाओं ने जो किले बनाये वे दुर्गम थे, पहाड़ो पर स्थित थे, उन्हें बनाने में दशको लगते थे, और इनका इस्तेमाल युद्ध से बचने के लिए किया जाता था।
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(3) फ़्रांस में नेपोलियन ने तटीय इलाकों में किले क्यों बनवाए थे ?
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नेपोलियन ने सीमा रक्षा के लिए किले बनाए थे, रिहाईश या युद्ध से बचने के लिए नहीं। जिन हिस्सों को उसने टेकओवर किया था वहां पर अंग्रेज हमला करने वाले थे। तो उसने समुद्र तटो पर सेना की जमावट करने के लिए मोर्चे बनाये। ये किले इस मोर्चे का हिस्सा थे। असल में इन्हें किले भी नहीं कहा जा सकता। ये बंकरनुमा किले थे जिनमे सिर्फ सैनिक दस्ता एवं शस्त्रागार होता था।
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दूसरी बात, नेपोलियन के पास इंग्लिश सेना के मुकाबले में निर्णायक हथियार नहीं थे। जब आपके पास हथियारों में निर्णायक बढ़त नहीं हो तो सैन्य रणनीति परिणाम को प्रभावित करती है। नेपोलियन का एज हथियारों की गुणवत्ता नहीं थी। अत: वह रणनीतिक बढ़त पाने के लिए अपनी सेना की जमावट बेहतर तरीके से कर रहा था। बंकरनुमा किले उसी का हिस्सा थे।
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(4) ब्रिटेन में भी कई किले है।
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ब्रिटेन के सभी किले 600 ईस्वी से पहले बनाए गए थे, और 14 सदीं आते आते इनमे से ज्यादातर का इस्तेमाल होना बंद हो गया था। वजह - 12 वीं सदी में ब्रिटेन में जूरी सिस्टम आ चुका था और उन्होंने बेहतर हथियार बनाना शुरू कर दिए थे। बंदूक और तोपे आने के कारण उन्होंने साम्राज्य विस्तार के अभियान चलाने शुरू कर दिए थे, अत: किलो की जरूरत नहीं रह गयी थी।
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बॉटम लाइन यह है कि — जिस काल में जो राजा निर्णायक हथियार बना लेता था वह अपना पैसा आर्मी खड़ी करने पर लगाना शुरू करता था। किले बनाने से राज्य की इकॉनोमी पर बहुत वजन आता था। लेकिन जब कोई राजा देखता था कि उसके आस पास ऐसे राज्य मौजूद है जिनसे उसे खतरा है, और उसके पास निर्णायक हथियार नहीं है तो वह डिफेंसिव मोड में आकर किले बनाने में पैसा फूंकना शुरू कर देता था।
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(5) पेड़ मीडिया तब नहीं था तो फिर भाट चारन वगैरह कौन थे ?
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यह खुली हुयी बात थी कि कि भाट-चारण आदि को राजा पेमेंट करता है। अत: यह पेड मीडिया नहीं था। पेड मीडिया उसे कहते है जो यह बात छिपाता है कि उसे अमुक खबर देने के लिए पेमेंट कौन कर रहा है। जब आप डाबर का विज्ञापन देखते है तो यह बात जानते है कि यह क्लिप दिखाने के लिए पेमेंट डाबर कर रहा है, अत: यह पेड न्यूज नहीं है। यह विज्ञापन है।
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किन्तु जब आप पेड सुधीर चौधरी का एनालिसिस या पेड रविश कुमार का प्राइम टाइम देखते है तो यह बात नहीं जानते कि उनके 45 मिनिट के प्रोग्राम की पेमेंट किसने की है। अत: या पेड न्यूज है। दुसरे शब्दों में, भाट एवं चारण के कथ्य विज्ञापनों की तरह थे और नागरिक जानते थे कि इसकी पेमेंट राजा करता है। तो उनके द्वारा दी गयी सूचनाएं / कथ्य आदि को जनता राजा के विज्ञापनो की तरह सुनती थी, न्यूज की तरह नही।
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सम्पादन समाप्त ]
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Feb 18 2020 11:01:06 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

ट्रंप की भारत यात्रा : प्रधानमंत्री को ट्विट करें कि अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में में कोरोना वायरस संक्रमण की जांच करने वाले स्टाफ की नियुक्ति करें।
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यह एक राजनीतिक पोस्ट नहीं है। यह केवल सामान्य स्वास्थ्य सलाह है
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ट्रम्प के स्वागत के लिए लगभग 5 लाख लोग सड़कों पर इकट्ठा होंगे, और लगभग 50,000 लोग मोटेरा स्टेडियम आएंगे !!
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अब अगर उनमें से एक में भी कोरोना वायरस का संक्रमण है, तो यह संक्रमण सैंकड़ो में, और फिर एवं हजारो में फ़ैल सकता है।
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तो कृपया पीएम को ट्वीट करे कि वे मोटेरा स्टैडियम और आस पास के उन स्थलों पर कोरोनो वायरस चेकर्स लगाए जहाँ पर नागरिक समूहों का जमाव होगा।
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मेरा ट्वीट - "@PmoIndia कृपया ट्रम्प के वेलकम इवेंट के लिए मोटेरा स्टेडियम में कोरोना वायरस संक्रमण की जांच करने वाले स्टाफ की नियुक्ति करें। अन्यथा, यदि किसी व्यक्ति को कोरोना का संक्रमण है, तो यह हजारों लोगो में फ़ैल सकता है #PutCoronaInfectionheckersAtMotera"
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@PmoIndia pls put corona virus infection checker at Motera Stadium, Ahmedabad for Welcome Trump event. Otherwise , if one person has corona infection, 100s may catch infection . #PutCoronaInfectionCheckersAtMotera "
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Feb 18 2020 18:52:07 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

यूपीए सरकार ने 2008 मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान को कोई उत्तर नहीं क्यों दिया था?
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भारत की सेना हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है। अत: सैन्य कार्यवाही करने के लिए पहले हमें अमेरिका से इसकी अनुमति लेनी होती है। 9/11 के बाद अफगानिस्तान को ध्वस्त करने के लिए अमेरिका पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा था।
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अमेरिका ने F-16, एंटी मिसाईल सिस्टम, रडार, हेलीकॉप्टर आदि जैसे कॉम्प्लेक्स वेपन इसी दौरान पाकिस्तान को दिए थे। दूसरे शब्दों में तब अमेरिका को पाकिस्तान की भारत से ज्यादा जरूरत थी। तो उन्होंने भारत को इसकी अनुमति नहीं दी।
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यदि भारत अमेरिका के खिलाफ जाकर रूस की सहायता से पाकिस्तान को जवाब देने की कोशिश करता तो अमेरिका की बेकिंग होने के कारण पाकिस्तान की तरफ से जो जवाब आता उससे निपटने में हम अक्षम है। अत: भारत ने सैन्य कार्यवाही न करने का फैसला किया।
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एयर स्ट्राइक के लिए हमें लेसर गाईडेड बमों की जरूरत थी। सटीक निशाना लगाने वाले ये बम दुनिया के सिर्फ 6 देश ही बनाते है :
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(1) अमेरिका-ब्रिटेन-फ़्रांस-इस्राएल
(2) रूस
(3) चीन

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अमेरिका से हरी झंडी मिलने के बाद इस्राएल ने हमें "स्पाइस" नामक लेसर गाईडेड* बम दिए, और तब भारत की सेना स्ट्राइक कर पायी। यदि हमें ये बम नहीं मिलते तो एनडीए सरकार भी स्ट्राइक नहीं कर पाती।
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(*) उल्लेखनीय है कि कारगिल वॉर के दौरान भी भारत को लेजर गाईडेड बमो की जरूरत पड़ी थी, और तब हमने विदेशी निवेश की अनुमति के लिए ढ़ेर सारे कागज़ साइन करके फ़्रांस+इस्राएल से ये बम लिए थे।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Feb 18 2020 18:55:46 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सरकार जितने रुपये छापती है, उतने ही पैसों के बदले सोना क्यों रखना पड़ता है?
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यह गलत धारणा है कि सरकार को रूपये छापने के लिए सोना रखना पड़ता है। सरकार को नोट छापने के लिए कुछ नहीं रखना पड़ता। सरकार जब मर्जी हो तब रूपये छाप सकती है और छापती भी रहती है। और सरकार ( RBI ) जब भी रूपये छापती है, इन्फ्लेशन बढ़ जाता है।
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पहले विश्व युद्ध एवं फिर द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कई देश कंगाल होने लगे, और उन्होंने गोल्ड स्टेंडर्ड के अनुपात को गिराना शुरू कर दिया था।
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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने कई देशो पर डॉलर स्टेंडर्ड थोप दिया। उन्होंने नेताओ को धमकाया और पेड आर्थिक विशेषज्ञों के माध्यम से जनता को समझाया कि गोल्ड स्टेंडर्ड बकवास सिस्टम है, और उन्हें विदेशी मुद्रा कोष सोने की जगह डॉलर में रखना चाहिए। गोल्ड स्टेंडर्ड का अनुपात तो सस्टेन नहीं किया जा सकता, यह बात ठीक है, किन्तु इसकी जगह हमें डॉलर स्टेंडर्ड क्यों रखना चाहिए , इसका जवाब कोई भी पेड आर्थिक विशेषग्य ठीक से नहीं देता।
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डॉलर स्टेंडर्ड डालने के बाद अमेरिका ने धड़ाधड़ डॉलर छापकर देशो को पकडाने शुरू किये और बदले में उनसे सोना ले लिया। आज दुनिया में सबसे ज्यादा सोना अमेरिका के पास है - 8000 टन !! अब सब देश फोरेक्स डॉलर में रखने लगे तो डॉलर की डिमांड बढ़ी और डॉलर अंतराष्ट्रीय करेंसी के रूप में स्थापित हो गया। इस तरह अमेरिका ने कागजो के बदले पूरी दुनिया से सोना खींचा !!
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भारत के पास अब फोरेक्स के रूप में ज्यादातर सिर्फ दो तरह के पेपर है -
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(i) एक पेपर जो अमेरिका छापता है, और
(ii) एक पेपर जो भारत छापता है !!
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और इन दोनों की मेटेरियल वैल्यू जीरो है !! अभी हमारे पास जितना फोरेक्स है उसमे सोने का प्रतिशत लगभग 6% के आस पास है। बाकी सब कागज है।
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समाधान ?
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हमें अपने फोरेक्स का एक बड़ा हिस्सा क्रूड ऑयल के रूप में रखना शुरू करना चाहिए। डॉलर सिर्फ उतना रखें जितनी लेन देन में जरूरत है। धीरे धीरे क्रूड ऑयल का अनुपात बढ़ाते जाए। जब भी तेल के दाम गिरे हमें क्रूड ऑयल ले लेना चाहिए। 50% तक हमें फोरेक्स तेल के रूप में रख सकते है। इस तरह यह हमारा स्ट्रेटेजिक रिजर्व हो जाएगा। ताकि कभी कुछ झमेला ( यानी युद्ध या मंदी वगेरह ) आये तो ये तेल काम आ सके।
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काम की बात : आज अमेरिका के पास डॉलर छापने की मशीने भी है, और सबसे ज्यादा सोना भी है। और दुनिया में जितना तेल है, उसके अधिकांश हिस्से पर भी अमेरिका का नियंत्रण है !! और यह सब उसके पास इसीलिए क्योंकि उसकी सेना दुनिया की सबसे मजबूत सेना है। अमेरिका की सेना इसीलिए मजबूत है, क्योंकि अमेरिका दुनिया के सबसे जटिल एवं आधुनिक हथियारों का उत्पादन करता है।
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और अमेरिका दुनिया के सबसे ताकतवर हथियारों का उत्पादन इसीलिए कर पाता है क्योंकि उनके पास विशालकाय कम्पनियां है। और उनके पास विशालकाय कम्पनियां इसीलिए है क्योंकि उनके पास तकनिकी उत्पादन करने वाले छोटे-छोटे कारखानों का आधार है। और उनके पास छोटे छोटे कारखानों का आधार इसीलिए है, क्योंकि जूरी सिस्टम एवं वोट वापसी होने के कारण वहां के नागरिक अमेरिकी कारखाना मालिको की जज-पुलिस-नेता माफिया से रक्षा कर पाते है।
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सार यह है की - पूरी अर्थव्यवस्था सेना पर खड़ी होती है, सेना स्वदेशी आधुनिक जटिल हथियारों के उत्पादन पर खड़ी होती है, हथियारों के उत्पादन के लिए बड़ी कम्पनियां चाहिए, बड़ी कम्पनियों को खड़ा करने के लिए छोटे कारखानों का आधार चाहिए , और छोटे कारखानों को जजों-पुलिस से बचाने के लिए जूरी सिस्टम चाहिए। चूंकि हमारी अदालतें अमेरिका की तुलना में बदतर है, अत: हमारी अर्थव्यवस्था भी हर लिहाज से बदतर है। और जितना ही अमेरिकीयों का भारत में दखल बढेगा, वे इसे और भी बदतर बना देंगे !!
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Feb 19 2020 19:51:30 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

दांडी मार्च का क्या महत्व है?
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दांडी मार्च अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी की पूर्ण स्वराज्य की मांग को तोड़ने के लिए निकाला गया था !!
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गोरो ने नमक पर टेक्स प्लासी का युद्ध जीतने के साथ ही लगा दिया था। आगे जैसे जैसे वे अन्य इलाकों का अधिग्रहण करते गए वैसे वैसे नमक पर टेक्स भी बढता गया। 1860 में गोरो की कुल आय में 10% हिस्सा नमक के टेक्स से आता था। 1882 में साल्ट एक्ट पास होने से नमक बनाने पर ब्रिटिश साम्राज्य का एकाधिकार हो गया। इस दौरान नमक को लेकर लगातार देश भर में विरोध प्रदर्शन और आन्दोलन होते रहते थे। तो नमक का क़ानून और इसका देश में विरोध कोई नयी बात नहीं थी।
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1923 में गोरो ने नमक पर टेक्स अचानक दुगना कर दिया !! तो मोहन भाई को यह बात समझने में 7 साल क्यों लगे कि नमक पर डबल टेक्स डालना एक गलत फैसला है ? इसके जवाब के लिए आपको उनके दांडी मार्च की टाइमिंग देखनी पड़ेगी।
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अप्रेल , 1929 में अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी ने असेम्बली में बम फेंका, जून, 1929 में ट्रायल शुरू हुयी और जेल में 66 दिन की भूख हड़ताल के कारण सितम्बर, 1929 में महात्मा जतीन्द्र नाथ दास का प्राणांत हो गया।
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पहले सांडर्स का वध , फिर काकोरी काण्ड , और फिर असेम्बली में बम फेंक कर गिरफ्तारी देनें से ये क्रांतिकारी अचानक से सबकी नजरो में आ गए। और जब इन्होने 66 दिन लम्बी भूख हड़ताल की और अपने प्राण भी दे दिए तो इनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी की तस्वीर की भी इसमें भूमिका थी। असेम्बली में बम फेंकने से एन पहले अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी ने यह फोटो निकलवाई थी, और अपने साथी क्रांतिकारियों को देकर गए थे।
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फोटो का इस्तेमाल बांटे जाने वाले पर्चो एवं समाचार पत्रों के लिए किया जाना था। जैसे जैसे ट्रायल आगे बढ़ रही थी वैसे वैसे कार्यकर्ता भी पूर्ण स्वराज्य की मांग को लेकर जनता के बीच पर्चे बाँट रहे थे। छोटे समाचार पत्रों ने जब रोजाना ट्रायल के संवाद और घटनाक्रम छापना शुरू किये तो उनकी बिक्री बढ़ने लगी, और इस वजह से मुख्य धारा के बड़े समाचार पत्रों को अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी के बारे में ख़बरें छापनी पड़ी।
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इस पूरे घटनाक्रम का प्रभाव यह हुआ कि अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी की लोकप्रियता सिर्फ 1 वर्ष के भीतर मोहन दास से आगे निकल गयी थी। खुद जवाहर लाल और मोहन ने इस बात को स्वीकार किया था कि जनमानस की ऐसी लोकप्रियता और स्नेह सदियों में किसी को नसीब होता है। कुल मिलाकर भारत के लोगो को एन वक्त पर अनशन तोड़ देने के आदी एक बुड्ढे की बजाय 21-22 साल के ऐसे दिलेर नवयुवको पर ज्यादा भरोसा हो गया था जो अपनी जान की बाजी लगा चुके थे।
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गोरो को अब यह भय था कि - अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी की लोकप्रियता बढ़ने से देश के अन्य नवयुवक भी भगत सिंह जी का अनुसरण करेंगे। और उनका अनुसरण करने का मतलब है, वे कहीं से बन्दुक जुटाएंगे और आते जाते अंग्रेज अधिकारियो पर गोलियां चलाकर गुम हो जायेंगे। अगर इस तरह नवयुवको ने 10-12 गोरो को भी उड़ा दिया गया तो अंग्रेज अधिकारियो में दहशत फैलेगी और वे नौकरी छोड़ कर इंग्लेंड रवाना हो जायेंगे !!
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मोहन को चिंता थी कि - यदि अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी की लोकप्रियता इसी तरह से बढती रही तो आजादी आन्दोलन का नेतृत्व उनके हाथ से निकल जाएगा। क्योंकि अब ज्यादातर भारतीयों को उनकी चरखा रेजिमेंट पर भरोसा नहीं रह गया था।
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गोरो एवं मोहन भाई ने तय यह पाया थी कि कोई ऐसा आन्दोलन शुरू किया जाए जिससे पूरे देश का ध्यान भगत सिंह जी से हटाया जा सके। उस समय कोई बढ़िया मुद्दा नजर नहीं आ रहा था, तो 1923 के नमक क़ानून पर मूवमेंट खड़ी करने पर बात ठहरी। किन्तु मूवमेंट का डिजाइन तय नहीं हो पा रहा था। अनशन में उतना प्रभाव नहीं बनता , क्योंकि क्रन्तिकारी अनशन में अपनी जान देकर उनसे एक स्टेप आगे निकल चुके थे।
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धरना और चरखा वगेरह में भी खाली बैठ कर भजन गाने होते है , अत: इसका आकर्षण 2-3 दिन में ख़त्म हो जाता। कोई ऐसी युक्ति चाहिए थी कि महीने दो महीने तक जनता को पूरी तरह से फंसा कर रखा जा सके। जिसमे नयापन और एक ऐसा सिलसिला हो जो लोगो को किसी रोचक क्लाइमेक्स की तरफ ले जाता हो। तो इन तत्वों की मांग पूरी करने का आदर्श सामने रखकर 25 दिन के दांडी मार्च का फोर्मेट बनाया गया।
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मोहन ने पहले से ही घोषणा कर दी थी कि 12 मार्च को निकलेंगे। पेड मीडिया भी सभी को बता रहा था कि मोहन भाई बड़ी भयंकर मूवमेंट के लिए निकलने वाले है, और इससे अंग्रेजी राज में हडकंप है !! तब भी सिर्फ 60-70 लोग इकट्ठे हुए और उन्होंने इन लोगो के साथ यात्रा शुरू की। अंग्रेजो ने पेड समाचार पत्रों के सभी पेज पर मोहन की दांडी मार्च के विवरण छापने शुरू किये , और साथ में यह भी छापा जाता था कि वायसराय दांडी मार्च से बहुत घबरा गए है , यदि उन्होंने नमक बना दिया तो ब्रिटिश साम्राज्य पूरी तरह से हिल जाएगा।
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अखबारों में नियमित रूप से छापा जाता था कि आज मोहन भाई 10 किमी चले है , उन्होंने 3 किमी चलने के बाद अमुक जगह पर चिउड़ा खाया था, उस जगह यात्रियों को घूघरी दी गयी। अभिनव सेवा समिति ( इन्हें फंडिग टाटा , बिरला आदि कर रहे थे ) ने रात में टेंट लगवाये है।
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इसे कवर करने के लिए लन्दन से पत्रकारों को भी बुलाया गया , और वे अपनी डायरिया लेकर मोहन के साथ चलते जाते थे , और उनके साक्षात्कार लेते थे। मामले को रोचक बनाने के लिए अख़बार में रिपोर्ट किया जाता था कि गोरो द्वारा कल मार्च रोक दिया जायेगा। देखते है क्या होता है, आदि आदि। ख़बरों के साथ ही मोहन के फोटो भी प्रकाशित किये जाते थे। इस तरह 12 मार्च 1930 से 6 अप्रेल 1930 के बीच पेड मीडिया की सहायता से देश भर में वैसा ही एक सनसनीखेज तमाशा खड़ा किया गया जैसा कि 2012 में द अन्ना के लिए खड़ा किया गया था !!
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इस पूरी नौटंकी का नतीजा यह हुआ कि अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी एवं उनके द्वारा खड़ी की गयी पूर्ण स्वराज्य की मांग खबरो से बाहर हो गयी !! दांडी पहुँचने के बाद जनता का ध्यान खींचने के लिए लोगो को गिरफ्तार करना शुरू किया गया। मोहन को भी गिरफ्तार किया गया। इसी दौरान मोहन भाई को छोड़ कर बाकी लोगो को दांडी में लट्ठ भी खाने पड़े !!
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मोहन को गिरफ्तार करने के बाद भी जेल से रोज रिपोर्टिंग की जाती थी। इसी दौरान ट्रायल को स्पीड देने के लिए वायसराय ने 1 मई 1930 में एक स्पेशल ट्रिब्यूनल बनाया और नियमित सुनवाई के आदेश दिए। 30 सितम्बर को ट्रायल ख़त्म हुआ। कुछ दिन जेल में आराम करने के बाद मोहन भाई नमक क़ानून पर तबसरा करने के लिए द्वितीय गोलमेज सम्मलेन के लिए इंग्लेंड निकल गए !!
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लगभग 2 महीने तक चले डेली सोप ; दांडी मार्च का नतीजा -
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स्क्रिप्ट बहुत अच्छे से लिखी गयी थी , और सब कुछ अंग्रेजो एवं मोहन भाई की योजना के अनुसार हुआ। मोहन भाई ने महीने भर तक देश में माहौल बनाया , लोगो को मीलो पैदल चलवाया, नमक बनाने के एवज में कार्यकर्ताओ को लठ्ठ खिलाये , कुछ की हड्डियाँ तुड़वायी और बाद में मामला बीच में लटका कर लंदन निकल गए !!

और नमक के क़ानून का क्या हुआ ?
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वेल , गोरो ने न तो नमक क़ानून रद्द किया और न ही कोई राहत दी !!
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और इस पूरे भम्भड़ के अंत में सबसे रोचक बात यह हुयी कि ब्रिटिश को नमक से होने वाली आय बढ़ गयी !! मतलब उन्होंने इसकी निगरानी और भी बढ़ा दी थी। दांडी मार्च की सफलता के अन्य विवरण आपको पेड इतिहासकारों द्वारा लिखी गयी पेड पाठ्य पुस्तको में मिल जायेंगे !!
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[ क्या आप जानते है अहिंसा मूर्ती महात्मा चन्द्रशेखर आजाद एवं महात्मा सच्चिन्द्र नाथ सान्याल ने 1925 में HSRA = हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोशिएसन की स्थापना की थी एवं अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह ने इस संगठन की सदस्यता 1927 में ली थी।
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HSRA के मेनिफेस्टो में यह स्पष्ट रूप से लिखा था कि : हम जिस गणराज्य की स्थापना करना चाहते है उसमे नागरिको के पास वोट वापसी लेने का अधिकार भी होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो लोकतंत्र एवं मजाक बनकर रह जाएगा !! ]
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Feb 19 2020 19:58:55 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

फ़िल्म शोले से संबंधित कम ज्ञात तथ्य क्या है?
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शोले , 1954 में बनी अकिरा कुरोसोवा कि महान फिल्म सेवेन समुराई का रीमेक है !!
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सेवेन समुराई में एक्टिविज्म के एक क्रूर और अनिवार्य सिद्धांत BBB = Betrayal By Beneficiaries का स्पर्श है।
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एक गाँव डाकुओ के गिरोह से पीड़ित है। वे लड़ना नहीं चाहते। अत: 7 जरायम पेशा योद्धाओ को रोटीयों के बदले अपनी जंग लड़ने के लिए किराए पर ले आते है। हालांकि उनकी हैसियत समुराई योद्धाओ को अनुबंधित द्रव्य देने की भी नहीं है।
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किन्तु समुराई जंग लड़ने का फैसला करते है। एक लम्बी लड़ाई के बाद समुराई योद्धा डाकुओ का सफाया कर देते है, जिसमे 4 समुराई योद्धा भी मारे जाते है। लेकिन डाकुओ के भय से मुक्त होते ही गाँव के लोग अपने टुच्चेपन पर लौट आते है , और बचे हुए समुराई योद्धाओ को गाँव छोड़कर जाना पड़ता है। उनके लिए वहां कोई जगह नहीं है।
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बाद में लगभग सभी देशो में इस थीम पर फिल्मे बनायी गयी, और आज भी इस थीम पर लगातार फिल्मे बनायी जाती है। आपराधिक पृष्ठभूमि पर बनने वाली फिल्मो में यह सबसे ज्यादा लोकप्रिय थीम है। लेकिन किसी भी फिल्मकार ने सेवेन समुराई का अंत नहीं दोहराया। क्योंकि इस फिल्म का अंत कठोर यथार्थ है, व दर्शको के हाजमे के खिलाफ पड़ता है।
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शोले में वीरू बसंती के साथ वापिस शहर लौटने के लिए ट्रेन पर सवार हो रहा है। उसे विदाई देने के लिए प्लेटफोर्म पर सिर्फ ठाकुर खड़ा है !! शेष गाँव वाले अपने अपने रोजगार में व्यस्त है !!! वीरू गाँव में ही रह जाना चाहता था। किन्तु जंग जीत जाने के बाद वीरू के लिए यही बेहतर है कि वह गाँव छोड़ दे। अब गाँव वालो को उसकी जरुरत नहीं रह गयी है। यदि गब्बर जेल से फिर छूट आता है तो वीरू को फिर बुला लिया जाएगा !!
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शोले के दर्जनों वर्जन मौजूद है, और एक संस्करण यह है कि, गब्बर जज को पैसा देकर फिर छूट जाता है, और आकर ठाकुर के पैर भी काट देता है। लूटपाट शुरू होने पर गाँव वाले वीरू को फिर से बुलाते है, लेकिन बसंती वीरू को लौटकर जाने से मना कर देती है !!
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BBB = अर्थात , जिसे लाभ पहुँचाने के लिए पीड़ा सही गयी हो उसी के द्वारा तिरस्कृत होना !! जब एक्टिविस्ट देश की व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए गंभीर प्रयास करते है, और जब इनके लम्बे संघर्ष के नतीजे में अमुक परिवर्तन आते है, तो समुदाय इन्हें जीते जी भुला देता है, और बहुधा उन्हें तिरस्कार झेलना पड़ता है। किन्तु जब / यदि वे मर जाते है तो भरपयी करने के लिए इनमे से कुछ की मूर्तियाँ लगा दी जाती है !!
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लम्बे संघर्ष के कारण ज्यादातर इनमे वह शक्ति नहीं रह जाती कि, वे इन सकारात्मक परिवर्तनों का लाभ उठा कर इसका उपभोग कर सके। और समुदाय उन्हें एवज में अतिरिक्त लाभ देने की अवहेलना करता है। समुदाय हमेशा ऐसा करते आया है, और एक्टिविस्ट हमेशा बावजूद इसके समुदाय के लिए लड़ते रह कर तिरस्कृत होते रहते है !!
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अहिंसा मूर्ती महात्मा बटुकेश्वर दत्त जी ने अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी के साथ असेम्बली में बम फेंका था। उन्हें जेल हुई और लगभग 1947 तक वे निरंतर जेल में रहे। टीबी होने के कारण उनका शरीर अशक्त हो गया था।
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आजादी के बाद न तो उन्हें पेंशन दी गयी, न ही उनके जीवन यापन का कोई प्रबंध किया गया। 48 वर्ष की आयु में उन्होंने शादी की और ट्यूशन पढ़ाकर, सब्जी बेचकर अपना गुजारा किया !! बावजूद इसके वे लेंड रिफोर्म्स लाने के लिए आन्दोलन एवं प्रयास करते रहे !! बेहद गरीबी में जीवन बिताते हुए 1965 में महात्मा बटुकेश्वर दत्त को एक अनजान मृत्यु नसीब हुयी !! आजादी के बाद उन्होंने जो जीवन जिया, वह उस संघर्ष से ज्यादा त्रासद था जो उन्होंने आजादी पाने के लिए किया था !!
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Feb 20 2020 16:15:44 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

जनसँख्या नियंत्रण के लिए प्रस्तावित टू चाइल्ड लॉ
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( Two Child Law ; Proposal for Population Control )
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क़ानून का सार : यह प्रस्तावित क़ानून दो से अधिक संतान रखने वाले नागरिको पर कुछ दंडात्मक प्रावधान लगाता है। परन्तु जिन अभिभावकों के 1 या 2 या 3 पुत्रियाँ है किन्तु कोई भी पुत्र नहीं है, उन्हें इस क़ानून के अनुसार कुछ अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिलेंगे, एवं उन्हें किसी भी प्रकार के आर्थिक दंड का सामना भी नहीं करना होगा। जिनके 4 पुत्रियाँ है उनको प्राप्त होने वाले अतिरिक्त आर्थिक लाभ रोक दिए जायेंगे, किन्तु उन्हें भी किसी आर्थिक दंड का सामना नहीं करना पड़ेगा। किन्तु यदि किसी व्यक्ति के 2 पुत्र या एक पुत्री एक पुत्र है और फिर भी वे एक संतान और पैदा करते है तो उन्हें कुछ आर्थिक दंड का सामना करना पड़ेगा।
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तो इस तरह यह क़ानून पुत्रियों को कुछ अतिरिक्त छूट प्रदान करते है। इस कानून को धन विधेयक के रूप में लोकसभा से साधारण बहुमत द्वारा पारित करके देश में लागू किया जा सकता है। इस क़ानून को राज्यसभा से पास करने की जरूरत नहीं है। यह क़ानून ड्राफ्ट भारतीय संविधान के किसी भी मौजूदा प्रावधान का उलंघन नहीं करता, अत: इसके लिए किसी प्रकार के संवैधानिक संशोधन की भी ज़रूरत नहीं है। #TwoChildLaw
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यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो पीएम को एक पोस्टकार्ड भेजे । पोस्टकार्ड में यह लिखे :
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प्रधानमंत्री जी, कृपया टू चाइल्ड लॉ क़ानून गेजेट में छापें- #TwoChildLaw , #P20180436120.
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--------क़ानून ड्राफ्ट का प्रारम्भ--------
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[ टिप्पणी : इस ड्राफ्ट में दो भाग है - (I) नागरिकों के लिए सामान्य निर्देश, (II) नागरिकों और अधिकारियों के लिए निर्देश। टिप्पणियाँ इस क़ानून का हिस्सा नहीं है। नागरिक एवं अधिकारी टिप्पणियों का इस्तेमाल दिशा निर्देशों के लिए कर सकते है। ]
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भाग (I) नागरिको के लिए निर्देश :
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(01) यह कानून लागू होने के 1 साल बाद जिन नागरिको के संतानों की संख्या 2 से अधिक है तथा इसमें से 1 संतान का जन्म यह कानून लागू होने के 1 साल बाद हुआ है, उन्हें सरकार से प्राप्त होने वाले अनुदानों एवं अन्य आर्थिक सहायताओ में 33% की कटौती कर दी जायेगी। और यदि उनकी संतानो की संख्या 3 से अधिक है, तथा एक संतान का जन्म यह कानून लागू होने के एक साल बाद हुआ है तो कटौती 66% होगी।
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(02) यह कानून लागू होने के एक साल बाद, जिनकी 4 से अधिक संताने है और 1 संतान का जन्म यह कानून लागू होने के एक साल बाद हुआ है तो उन्हें 2 साल तक के कारावास और जुर्माने का सामना करना पड़ेगा। जिनकी 5 से अधिक संताने है, और साथ में 2 संतानो का जन्म यह कानून लागू होने के एक साल बाद पैदा हुआ है तो उन्हें 2 और सालो के कारावास और जुर्माने का सामना करना पड़ेगा।
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(03) जुर्माने और सजा का निर्णय जूरी मंडल करेगा। जूरी का चयन ज़िले / राज्य की मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा किया जाएगा। जूरी सदस्यों का आयु वर्ग 25-55 वर्ष के मध्य होगा, तथा जूरी मंडल में 12-1500 तक नागरिक हो सकेंगे।
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(04) यदि किसी दंपत्ति के दो बेटियां हैं तो इस कानून में सजा आदि तय करने के उद्देश्य से उन्हें एक संतान ही माना जायेगा। आदिवासियों में संतानो की मृत्यु दर अधिक है। अत: आदिवासियों को एक संतान "अधिक" रखने की अतिरिक्त छूट दी गयी है। यह छूट सिर्फ आदिवासियों को प्राप्त होगी, अनुसूचित जातियों या अन्य पिछड़ा वर्ग या अल्पसंख्यको को यह विशेषाधिकार नहीं मिलेगा। जुड़वा, विकलांग संतानों और अन्य दुर्लभ जटिल मामलों के बारे में स्पष्टीकरण खंड 12 में दिया गया है।
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(05) प्रत्येक व्यक्ति, पुरुष या स्त्री, के लिए संतानों को अलग-अलग गिना जायेगा। तो उन मामलों में जब किसी को पूर्व विवाह से संताने थी या विवाह के अलावा संताने थी , संतान संख्या पति और पत्नी के लिए अलग अलग हो सकती है। किसी विवाद की स्थिति में वास्तविक जैविक पिता या माता को ही पिता या माता माना जाएगा। जूरी सदस्य किसी विवाद का निर्णय करने के लिए डीएनए टेस्ट के आदेश दे सकते है।
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भाग (II) : नागरिकों और अधिकारियों के लिए निर्देश
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(06) प्रधानमंत्री एक राष्ट्रीय जनसँख्या नियंत्रण अधिकारी (NPCO = National Population Control Officer) को नियुक्त करेंगे जिसे भारत के नागरिक वोट वापसी प्रक्रियाओं का प्रयोग करके बदल सकेंगे। राष्ट्रीय जनसँख्या नियंत्रण अधिकारी स्टाफ के लिए केंद्र या राज्य सरकार से पदासीन कर्मचारियों को ले सकेगा, सरकारी विभागों में उपलब्ध आंकड़ो / सेवाओ का उपयोग कर सकेगा या वह अस्थायी आधार पर अधिक कर्मचारियों की भर्ती भी कर सकता है। कर्मचारियों और आंकड़ो / सेवाओ का उपयोग करके राष्ट्रीय जनसँख्या नियंत्रण अधिकारी भारत में सभी नागरिकों और उनके माता-पिता और संतानों की सूची तैयार करेगा।
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(07) 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका कोई भी नागरिक यदि जिला कलेक्टर के सामने स्वयं या किसी वकील के माध्यम से NPCO बनने के लिए ऐफिडेविट प्रस्तुत कर सकेगा। जिला कलेक्टर सांसद के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क लेकर अर्हित पद के लिए उसका आवेदन स्वीकार कर लेगा, तथा उसे एक विशिष्ट सीरियल नम्बर जारी करेगा। कलेक्टर यह एफिडेविट स्कैन करके प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा।
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(08) मतदाता द्वारा प्रत्याशियों का समर्थन करने के लिए हाँ दर्ज करना :
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कोई भी नागरिक किसी भी दिन पटवारी कार्यालय में जाकर NPCO के किसी भी प्रत्याशी के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर में मतदाता की हाँ को दर्ज करके रसीद देगा। पटवारी मतदाताओं की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम एवं मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है।
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(8.1) स्वीकृति (हाँ) दर्ज करने के लिए मतदाता 3 रूपये फ़ीस देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी।
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(8.2) यदि कोई मतदाता अपनी स्वीकृती रद्द करवाने आता है तो पटवारी एक या अधिक नामों को बिना कोई फ़ीस लिए रद्द कर देगा।
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(8.3) प्रत्येक सोमवार को महीने की 5 तारीख को, कलेक्टर पिछले महीने के अंतिम दिन तक प्राप्त प्रत्येक प्रत्याशियों को मिली स्वीकृतियों की गिनती प्रकाशित करेगा। पटवारी अपने क्षेत्र की स्वीकृतियो का प्रदर्शन प्रत्येक सोमवार को करेगा। स्वीकृतियों का प्रदर्शन 5 तारीख को कैबिनेट सचिव द्वारा भी किया जाएगा।
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[ टिपण्णी : कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी स्वीकृति SMS, ATM एवं मोबाईल एप द्वारा दर्ज करवा सके।
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रेंज वोटिंग - प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता किसी प्रत्याशी को -100 से 100 के बीच अंक दे सके। यदि मतदाता सिर्फ हाँ दर्ज करता है तो इसे 100 अंको के बराबर माना जाएगा। यदि मतदाता अपनी स्वीकृति दर्ज नही करता तो इसे शून्य अंक माना जाएगा । किन्तु यदि मतदाता अंक देता है तब उसके द्वारा दिए अंक ही मान्य होंगे। रेंज वोटिंग की ये प्रक्रिया स्वीकृति प्रणाली से बेहतर है, और ऐरो की व्यर्थ असम्भाव्यता प्रमेय ( Arrow’s Useless Impossibility Theorem ) से प्रतिरक्षा प्रदान करती है।]
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(09) भुगतान और आर्थिक सहायता में कटौती, जुर्माना और कारावास
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(9.1) यदि किसी व्यक्ति, पुरुष या स्त्री, के पास निर्धारित संतानों की संख्या से अधिक संताने है, तो खनिज रॉयल्टी भुगतान में कटौती, आर्थिक सहायता/अनुदान आदि में कटौती, जुर्माना और कारावास लागू हो सकते है। आदिवासियों के संतानों की संख्या अन्य के लिए निर्धारित संतानों की संख्या से एक संतान अधिक हो सकती है। सिर्फ आदिवासियों को ही यह छूट मिलेगी। अनुसूचित जातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग या अल्पसंख्यको को यह विशेषाधिकार नहीं मिलेगा।
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(9.2) यह कानून लागू होने के 1 साल बाद यदि किसी व्यक्ति के कोई संतान पैदा नहीं हुई है , तो सजा या भुगतान और आर्थिक सहायता में कटौती नहीं होगी। लेकिन भुगतान में वृद्धि हो सकती है।
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(9.3) इस खंड में D का अर्थ है सिर्फ एक पुत्री, और S का अर्थ है सिर्फ एक पुत्र। DD का अर्थ है दो पुत्रियाँ और DS का अर्थ है पहली संतान पुत्री और दूसरी संतान पुत्र है। DDS का अर्थ है पहली संतान पुत्री है, दूसरी पुत्री है और तीसरी पुत्र है। दूसरे शब्दों में, इस खंड में संतानों के पैदा होने का क्रम बताया गया है ना कि सिर्फ कुल संख्या। DSD का अर्थ होगा पहली संतान पुत्री, दूसरी पुत्र और तीसरी पुत्री है। और इसी तरह SDD, DSD अलग अलग क्रम को दर्शाता है।
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(9.3.1) निसंतान - यदि किसी व्यक्ति की आयु 18 से 23 वर्ष के मध्य है तब उसे प्राप्त होने वाली खनिज रॉयल्टी एवं सरकारी जमीनों के किराये से प्राप्त होने वाली राशि में 33% की अधिक वृद्धि हो जायेगी। 23 वर्ष की आयु के बाद निसंतान होने पर कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं मिलेगा।
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(9.3.2) S - कोई सजा नहीं और ना ही खनिज रॉयल्टी का अतिरिक्त भुगतान।
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(9.3.3) D या DD या DDD - कोई सजा नहीं और खनिज रॉयल्टी में 33% की अतिरिक्त वृद्धि।
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(9.3.4) DDDD - कोई सजा नहीं और खनिज रॉयल्टी में 66% की अतिरिक्त वृद्धि।
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(9.3.5) SS, SD, DS, DDS, DDDS, DDDDS, DDDDD - कोई सजा नहीं और खनिज रॉयल्टी का कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं।
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(9.3.6) एक संतान, पुत्र या पुत्री खंड (9.3.5) के बाद - खनिज रॉयल्टी में 33% कटौती 10 साल के लिए , ना कारावास और ना जुर्माना।
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(9.3.7) एक संतान, पुत्र या पुत्री खंड (9.3.6) के बाद - खनिज रॉयल्टी में 66% कटौती 10 साल के लिए , 20 वर्ष के लिए मताधिकार का निलम्बन, ना कारावास और ना जुर्माना। ( मताधिकार निलम्बन एवं इसकी अवधि का फैसला जूरी मंडल द्वारा किया जाएगा। )
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(9.3.8) एक संतान, पुत्र या पुत्री खंड (9.3.7) के बाद - खंड (9.3.7) की सजा और साथ में 10 साल के लिए आय का 10% जुर्माना ( न्यूनतम रु 1000 प्रति महिना और अधिकतम रु 10000 प्रति माह ), ना कारावास।
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(9.3.9) एक संतान, पुत्र या पुत्री खंड (9.3.8) के बाद - खंड (9.3.8) की सजा और साथ में 2 साल तक का कारावास।
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(9.3.10) प्रत्येक संतान के लिए खंड (9.3.9) के बाद - खंड (9.3.9) की सजा और साथ में प्रति संतान के लिए 2 अधिक साल के लिए कारावास और बाध्यकारी नसबंदी।
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[ टिप्पणी : बिंदु 7 में दिए गए मताधिकार के निलम्बन एवं इसकी अवधि का फैसला नागरिको की जूरी करेगी। जूरी चाहे तो निलंबन के बाद भी यह अवधि घटा सकती है, या मतदाता सूची में नाम जोड़ने के आदेश जारी कर सकती है। यदि इस क़ानून के तहत मताधिकार से वंचित किया गया कोई नागरिक चुनाव लड़ना चाहता है तो जूरी सदस्य चुनाव लड़ने की अवधि के लिए अमुक व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में जोड़ने के आदेश जारी कर सकती है, या उसे चुनाव लड़ने की अनुमति दे सकती है, ताकि व्यक्ति चुनाव लड़ने से वंचित न रहे। ]
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(9.4) यह कानून लागू होने के 5 साल बाद, अधिक संतान उत्पत्ति पर होने वाली सजा इस प्रकार है :
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(9.4.1) खंड (9.3.1) से (9.3.5) तक के मामलों में संतान संख्या के लिए - कोई सजा नहीं।
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(9.4.2) खंड (9.3.6) में संतान संख्या के लिए, खंड (9.3.7) में दी गयी सजा मिलेगी, और खंड (9.3.7) में संतान संख्या के लिए, खंड (9.3.8) में दी गयी सजा मिलेगी, और सभी खंडो के लिए इसी प्रकार से सजा मिलेगी। दूसरे शब्दों में, खंड (9.3.5) के बाद सभी खंडो के लिए सजा "एक स्तर आगे" हो जाएगी।
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(10) जुर्माना संग्रहित करने में नियम - जुर्माना प्रत्येक माता-पिता पर 1000 रू प्रति महीना न्यूनतम तथा 10,000 रू प्रति महीना अधिकतम होगा। लेकिन संग्रहित जुर्माना मासिक आय के 10% से अधिक नहीं होगा। यदि व्यक्ति की आय 10,000 रू से कम है तब उसकी आय का 10% जुर्माना ही लिया जायेगा, और शेष राशि लंबित जुर्माना के रूप में रखी जाएगी। लंबित जुर्माने पर प्रचलित दर के अनुसार ब्याज देय होगा। लंबित जुर्माना के मामले में, अवधि 10 साल के बाद भी बढाई जा सकती है, जब तक कि सारा लंबित जुर्माना ब्याज सहित संग्रहित नहीं हो जाता। अमुक व्यक्ति चाहे तो लंबित जुर्माना शीघ्र अति शीघ्र अदा कर सकता है।
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[ टिप्पणी : खनिज रॉयल्टी : खनिज रॉयल्टी एवं सरकारी जमीनों से प्राप्त होने वाले प्रावधान तब लागू होंगे जब प्रधानमंत्री प्रस्तावित धन वापसी पासबुक का क़ानून गेजेट में छापकर भारत के सभी खनिज एवं प्राकृतिक संसाधनों को भारतीय नागरिको की संपत्ति घोषित कर देते है। जब तक धन वापसी पासबुक गेजेट में नहीं आता, तब तक उन सभी आर्थिक अनुदानों, सब्सिडी आदि में कटौती होगी जो आर्थिक अनुदान नागरिको को केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा दिए जा रहे है। ]
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(11) अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष प्रावधान : धारा (10) के प्रावधान लागू करते समय जिस एक संतान ( पुत्र या पुत्री ) की छूट दी जायेगी उसका चयन एवं संतानों की गणना इस तरीके से की जायेगी जिससे जुर्माने की राशि में अधिकतम कटौती हो। लेकिन अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति जिन्होंने सरकारी नौकरी या निजी नौकरी या सरकारी या निजी कॉलेज में दाखिला लेने के लिए आरक्षण का लाभ लिया है, इस विशेषाधिकार से वंचित रहेंगे। और अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति जिनकी संपत्ति रु 1 करोड़ से अधिक या सालाना आय 5 लाख रू है उन्हें भी इसका लाभ नहीं मिलेगा। ये छूटें सिर्फ अनुसूचित जनजाति के लिए है।
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(12) कुछ जटिल और विशेष परिस्थितियां :
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(12.1) इस कानून के पारित होने से पूर्व ( या पारित होने के 1 वर्ष के अन्दर ) जन्मी संतानों के कारण कोई भी जुर्माना या सजा नहीं होगी।
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(12.2) यदि अंत में जन्मी संताने जुडवा हैं तो उनको एक संतान ही गिना जाएगा। लेकिन यदि जुडवा संतानों के बाद कोई संतान जन्म लेती है तो जुडवा बच्चों को दो अलग संतानों के रूप में गिना जाएगा।
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(12.3) गोद ली गयी संतानों को गिना नहीं जाएगा।
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(12.4) दिव्यांग संतानों को गिना जाएगा। माता-पिता को दिव्यांग संतानों के लिए 66% अधिक खनिज रोयल्टी दी जाएगी।
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(12.5) यदि जन्मित संतान पुत्र या पुत्री नहीं है तो ऊपर लिखे नियमो को लागू करते समय उस संतान को पुत्री के रूप में गिना जाएगा।
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(13) जुर्माने एवं सजा निर्धारण के लिए जूरी ट्रायल :
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(13.1) जब भी कभी राष्ट्रीय जनसख्या नियंत्रण अधिकारी ( या उनके कर्मचारी ) किसी नागरिक को खनिज रॉयल्टी एवं सब्सिडी आदि के रूप में मिलने वाली धन राशि को कम करने का निर्णय करेंगे या किसी तरह की सजा देना या जुर्माना लगाना चाहेंगे तो मामले के विचार के लिए राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी 25 से 55 तक की उम्र के नागरिकों को रैंडमली चुनेंगे और एक जूरी मंडल का गठन करेंगे। और जब भी कोई नागरिक किसी राष्ट्रिय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी के कर्मचारिओं के विरुद्ध कोई शिकायत दर्ज कराना चाहेंगे तब भी राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी वेसे ही एक जूरी मंडल का गठन करेंगे।
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(13.2) राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी जूरी के संचालन के लिए निम्नलिखित अधिकारीयों की नियुक्ति करेगा :
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(13.2.1) प्रत्येक जिले के लिए एक जिला जूरी प्रशासक ,
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(13.2.2) प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्य जूरी प्रशासक,
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(13.2.3) राष्ट्रीय स्तर पर एक राष्ट्रिय जूरी प्रशासक।
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टिप्पणी : जिला, राज्य एवं राष्ट्रिय जूरी प्रशासक जूरी मंडल के दायरे में होंगे। यदि इन अधिकारियों एवं इनके किसी स्टाफ के खिलाफ कोई शिकायत आती है, तो सुनवाई जूरी द्वारा की जायेगी।
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(14) अधिक संतानों एवं अधिकारियों के प्रति शिकायतो का जूरी द्वारा निपटान :
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(14.1) अधिक संतान धारण करने वाले आरोपी नागरिक और राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी के बीच मामला उस जिला न्यायालय में दर्ज किया जाएगा जिस जिले का आरोपी निवासी है। यदि जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी के विरुद्ध कोई शिकायत है तो उस जिले के न्यायालय में मामले को दर्ज किया जाएगा जिस जिले में अधिकारी नियुक्त हैं। यदि कोई नागरिक या राष्ट्रिय जनसँख्या नियंत्रण अधिकारी मामले को उसी राज्य के किसी दुसरे जिले में स्थानांतरण करना चाहते हैं तो वे राज्य जूरी प्रशासक या राज्य उच्च न्यायालय की अनुमति से ऐसा कर सकते हैं। और इनमे से कोई भी पक्ष यदि मामले को राज्य से बाहर अन्य किसी राज्य के किसी जिले में स्थानान्तरित करना चाहते हैं तो वे राष्ट्रिय जूरी प्रशासक या सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति से ऐसा कर सकते हैं।
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(14.2) जिले में दर्ज हुए किसी भी मामले के लिए जिला जूरी प्रशासक जिले के विज्ञान, इन्जिनीयरिंग, गणित, चिकित्सा शास्त्र के स्नातकों की सूचि में से 25 से 55 वर्ष की आयु के 3 से 10 स्नातक चुनेगें जो की इस मामले में सहायता करने के इच्छुक हो। जूरी सदस्य चाहे तो इस पैनल से अमुक मामले में आवश्यक सलाह ले सकते है ।
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(14.3) जिला जूरी प्रशासक भारत की मतदाता सूची में से रैंडमली 25 से 55 वर्ष के नागरिकों को चुनेंगे। जूरी मंडल के लिए वे नागरिक पात्र होंगे जो पिछले 10 वर्षों के दौरान किसी जूरी मंडल में ज्यूरी सदस्य न बने हो तथा उनके ऊपर कोई आरोप सिद्ध न हुआ हो। व्यक्ति की उम्र वही मानी जायेगी जो वोटर लिस्ट में है।
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(14.4) जूरी का गठन एवं जूरी सदस्यों की संख्या का निर्धारण :
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(14.4.1) किसी अधिकारी के विरुद्ध हुई शिकायत के मामले में जूरी सदस्यों की संख्या न्यूनतम 12 और अधिकतम 1500 होगी। आरोपी अधिकारी के पद की वरिष्ठता के अनुसार श्रेणी-4, श्रेणी-3, श्रेणी-2 और श्रेणी-1 के लिए जूरी सदस्य संख्या 12, 50, 200 या 500 हो सकती है। यदि अधिकारी बहुत ही वरिष्ठ हैं तो सदस्यों की संख्या 500 से अधिक हो कर अधिकतम 1500 तक हो सकेगी।
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(14.4.2) अधिक संतानों के कारण नागरिक पर दर्ज मामले के लिए नागरिक की वार्षिक आय और संपत्ति के पांचवे हिस्से में से जो अधिक है, वो राशि यदि 5 लाख से अधिक है तो जूरी सदस्यों की संख्या 12 होगी और इस राशि में प्रत्येक 5 लाख की वृद्धि के साथ जूरी मंडल में 1 सदस्य बढाया जाएगा। वार्षिक आय की गणना के लिए नागरिक की पिछले 3 वर्षों की वार्षिक आय के औसत को वार्षिक आय माना जाएगा।
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(14.4.3) जूरी सदस्यों की अधिकतम संख्या 1500 होगी।
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(14.4.4) प्रत्येक मुकदमे की सुनवाई के लिए अलग से जूरी होगी और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी।
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(14.4.5) सभी श्रेणी के सरकारी कर्मचारी स्पष्ट रूप से जूरी ड्यूटी के दायरे से बाहर रहेंगे।
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(14.4.6) यदि किसी चिकित्सक को जूरी ड्यूटी पर बुलाया जाता है तो वह जूरी में न आने के लिए सूचना दे सकता है। जूरी सदस्य डॉक्टर पर जूरी ड्यूटी न करने के एवज में कोई आर्थिक दंड नहीं लगायेंगे।
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(14.4.7) यदि निजी क्षेत्र के कर्मचारी को जूरी ड्यूटी पर बुलाया गया है तो नियोक्ता उसे आवश्यक दिवसों के लिए अवैतनिक अवकाश प्रदान करेगा। नियोक्ता अवकाश के दिनों का वेतन कर्मचारी के वेतन से काट सकता है।
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(14.4.8) जूरी प्रशासक मतदाता सूची से लॉटरी द्वारा वांछित जूरी संख्या से दुगनी संख्या में नागरिकों को चुनकर उन्हें बुलावा भेजेगा। उनमे से किसी भी पक्षकार के रिश्तेदार, पडोसी, सहकर्मी आदि को जूरी सदस्यों में शामिल नहीं किया जाएगा।
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(14.5) जूरी सदस्यो को चुनने का क्षेत्र : जूरी सदस्य उन जिलों से चुने जाएंगे जहां के न्यायालय वीडियो कांफ्रेंस द्वारा उस जिला न्यायालय से जुड़े हों जहां मुकदमे की सुनवाई चलेगी। यदि कोई भी जिला न्यायालय उस जिले के न्यायालय से वीडियो कांफ्रेंस द्वारा नही जुडा हुआ है जहां सुनवाई चल रही है, तो सारे जूरी सदस्य उस जिले से ही चुने जाएंगे। सुनवाई उस भाषा में होगी जिस भाषा को ज्यूरी सदस्य भली भाँती समझते है।
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(14.6) सुनवाई सुबह 11 बजे शुरू होगी और सांय 4 बजे तक चलेगी, और मामले का निस्तारण होने तक सुनवाई निरंतर चलेगी। जब 65% से ज्यादा जूरी सदस्य कहेंगे कि वे काफी सुन चुके हैं, तब सुनवाई समाप्त होगी।
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(15) जुर्माने और निर्दोषता का निर्णयन :
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(15.1) किसी अधिकारी के विरुद्ध दर्ज शिकायत के मामले के लिए : यदि 75% से अधिक जूरी सदस्य ये घोषणा करते हैं कि आरोपी अधिकारी को निलंबित कर देना चाहिए तो राष्ट्रिय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी उनको निलंबित कर सकते हैं या ऐसा नहीं भी कर सकते हैं। यदि 75% से अधिक जूरी सदस्य किसी जुर्माने की राशि पर सहमत हो जाते हैं तो राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी आरोपी अधिकारी से जुर्माना ले सकते हैं या नहीं भी ले सकते हैं। यदि शिकायत कर्ता को ये लगता है कि राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी ने जूरी सदस्यों के निर्णय को लागू नही किया है तो वो भारत के नागरिकों से ये आग्रह कर सकते है कि वे वोट वापसी की धाराओं का प्रयोग करके राष्ट्रिय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी को नौकरी से निकालने की अनुमति दें।
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(15.2) अधिक संतान होने के कारण हुए मामले के लिए : आरोपी नागरिक को देय सरकारी अनुदानों में कटौती, जुर्माने और कारावास आदि पर 75% जूरी सदस्यों द्वारा लिए गये निर्णय को अंतिम निर्णय माना जाएगा। जिला जूरी मंडल के निर्णय के विरुद्ध राज्य उच्च न्यायालय के जज या जूरी मंडल के समक्ष और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के जज या जूरी मंडल के समक्ष अपील की जा सकेगी।
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(16) जनता की आवाज :
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(16.1) यदि कोई मतदाता इस कानून की किसी धारा में कोई आंशिक या पूर्ण परिवर्तन चाहता है या किसी मांग, सुझाव आदि के रूप में अर्जी देना चाहता है तो वह कलेक्टर कार्यालय में एक एफिडेविट जमा करवा सकेगा। जिला कलेक्टर 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर एफिडेविट जमा करेगा और इसे मतदाता के वोटर आई.डी नंबर के साथ राष्ट्रीय जनसँख्या अधिकारी एवं प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करके इस तरह रखेगा कि कोई भी व्यक्ति इसे बिना लॉग इन के देख सके।
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(16.2) यदि कोई मतदाता धारा (16.1) के तहत प्रस्तुत किये गए किसी एफिडेविट पर अपना समर्थन दर्ज कराना चाहे तो वह पटवारी कार्यालय में 3 रूपए का शुल्क देकर अपनी हां / ना दर्ज करवा सकता है। पटवारी इसे दर्ज करेगा और मतदाता की हाँ/ना को मतदाता के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर सार्वजनिक करेगा।
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[ टिपण्णी : यह क़ानून लागू होने के 4 वर्ष बाद यदि व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव आते है तो इस कानून की धारा (16.1) के तहत कोई भी नागरिक एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकता है, जिसमे उन कार्यकर्ताओ को सांत्वना के रूप में वाजिब प्रतिफल देने का प्रस्ताव होगा, जिन्होंने इस क़ानून को लागू करवाने के प्रयास किये है। कार्यकर्ता के जीवित नही होने पर प्रतिफल उसके नोमिनी को दिया जाएगा। यह प्रतिफल किसी स्मृति चिन्ह / प्रशस्ति पत्र या अन्य किसी रूप में हो सकता है। यदि 51% नागरिक इस शपथपत्र पर हाँ दर्ज कर देते है तो प्रधानमंत्री या राष्ट्रिय जनसँख्या अधिकारी इन्हें लागू करने के आदेश जारी कर सकते है, या नहीं भी कर सकते है। ]
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----------------कानून ड्राफ्ट का समापन----------
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इस क़ानून के गेजेट में आने से क्या बदलाव आएगा ?
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(i) भारत में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने का एक बड़ा कारण धार्मिक जनसँख्या के अनुपात का लगातार बिगड़ना है। यदि भारत में यह क़ानून कई दशक पहले आ जाता धार्मिक जनसँख्या के इस असंतुलन को रोका जा सकता था। किन्तु भारत की किसी भी राजनैतिक पार्टी एवं संगठन ने भारत में जनसँख्या नियंत्रण का क़ानून ड्राफ्ट सामने रखने तक की जहमत नहीं उठायी। क़ानून पास करना तो आगे की बात है। जनसँख्या नियंत्रण पर यह भारत का पहला एवं एक मात्र क़ानून ड्राफ्ट है। इस कानून के आने से भारत जनसँख्या नियंत्रण शुरू होगा और इस वजह से साम्प्रदायिक तनाव में भी कमी आएगी।
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(ii) हमारे समाज में बहुधा पुत्र प्राप्ति के लिए स्वाभाविक झुकाव देखने में आता है। अत: इस क़ानून को इस तरह लिखा गया है कि यदि किसी दम्पत्ति की प्रथम 4 संताने पुत्रियाँ है तो उसे सरकार से प्राप्त होने वाले अनुदान में अतिरिक्त वृद्धि होगी, और 5 पुत्रियाँ होने तक भी उसे किसी आर्थिक दंड का सामना नहीं करना पड़ेगा। इस तरह इस क़ानून के आने के बावजूद कन्या भ्रूण हत्या के मामलो में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी।
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इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करवाने के लिए हम क्या सहयोग कर सकते है ?
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1. कृपया “ प्रधानमंत्री कार्यालय , दिल्ली ” के पते पर पोस्टकार्ड लिखकर इस क़ानून की मांग करें। पोस्टकार्ड में यह लिखे : “प्रधानमंत्री जी, कृपया टू चाइल्ड लॉ क़ानून गेजेट में छापें- #TwoChildLaw , #TCL , #P20180436120
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2. ऊपर दी गयी इबारत उसी तरफ लिखे जिस तरफ पता लिखा जाता है। पोस्टकार्ड भेजने से पहले पोस्टकार्ड की एक फोटो कॉपी करवा ले। यदि आपको पोस्टकार्ड नहीं मिल रहा है तो अंतर्देशीय पत्र ( inland letter ) भी भेज सकते है।
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3. प्रधानमन्त्री जी से मेरी मांग नाम से एक रजिस्टर बनाएं। लेटर बॉक्स में डालने से पहले पोस्टकार्ड की जो फोटो कॉपी आपने करवाई है उसे अपने रजिस्टर के पन्ने पर चिपका देवें। फिर जब भी आप पीएम को किसी मांग की चिट्ठी भेजें तब इसकी फोटो कॉपी रजिस्टर के पन्नो पर चिपकाते रहे। इस तरह आपके पास भेजी गयी चिट्ठियों का रिकॉर्ड रहेगा।
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4. आप किसी भी दिन यह चिट्ठी भेज सकते है। किन्तु इस क़ानून ड्राफ्ट के लेखको का मानना है कि सभी नागरिको को यह चिठ्ठी महीने की एक निश्चित तारीख को और एक तय वक्त पर ही भेजनी चाहिए।
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तय तारीख व तय वक्त पर ही क्यों ?
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4.1. यदि चिट्ठियां एक ही दिन भेजी जाती है तो इसका ज्यादा प्रभाव होगा, और प्रधानमंत्री कार्यालय को इन्हें गिनने में भी आसानी होगी। चूंकि नागरिक कर्तव्य दिवस 5 तारीख को पड़ता है अत: पूरे देश में सभी शहरो के लिए चिट्ठी भेजने के लिए महीने की 5 तारीख तय की गयी है। तो यदि आप चिट्ठी भेजते है तो 5 तारीख को ही भेजें।
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4.2. शाम को 5 बजे इसलिए ताकि पोस्ट ऑफिस के स्टाफ को इससे अतिरिक्त परेशानी न हो। अमूमन 3 से 5 बजे के बीच लेटर बॉक्स खाली कर लिए जाते है, अब मान लीजिये यदि किसी शहर से 100-200 नागरिक चिट्ठी डालते है तो उन्हें लेटर बॉक्स खाली मिलेगा, वर्ना भरे हुए लेटर बॉक्स में इतनी चिट्ठियां आ नहीं पाएगी जिससे पोस्ट ऑफिस व नागरिको को असुविधा होगी। और इसके बाद पोस्ट मेन 6 बजे पोस्ट बॉक्स खाली कर सकता है, क्योंकि जल्दी ही वे जान जायेंगे कि पीएम को निर्देश भेजने वाले जिम्मेदार नागरिक 5-6 के बीच ही चिट्ठियां डालते है। इससे उन्हें इनकी छंटनी करने में अपना अतिरिक्त वक्त नहीं लगाना पड़ेगा। अत: यदि आप यह चिट्ठी भेजते है तो कृपया 5 बजे से 6 बजे के बीच ही लेटर बॉक्स में डाले। यदि आप 5 तारीख को चिट्ठी नहीं भेज पाते है तो फिर अगले महीने की 5 तारीख को भेजे।
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4.3. आप यह चिट्ठी किसी भी लेटर बॉक्स में डाल सकते है, किन्तु हमारे विचार में यथा संभव इसे शहर या कस्बे के हेड पोस्ट ऑफिस के बॉक्स में ही डाला जाना चाहिए। क्योंकि हेड पोस्ट ऑफिस का लेटर बॉक्स अपेक्षाकृत बड़ा होता है, और वहां से पोस्टमेन को चिट्ठियाँ निकालकर ले जाने में ज्यादा दूरी भी तय नहीं करनी पड़ती ।
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5. यदि आप फेसबुक पर है तो प्रधानमंत्री जी से मेरी मांग नाम से एक एल्बम बनाकर रजिस्टर पर चिपकाए गए पेज की फोटो इस एल्बम में रखें।
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6. यदि आप ट्विटर पर है तो प्रधानमंत्री जी को रजिस्टर के पेज की फोटो के साथ यह ट्विट करें :
@Pmoindia , कृपया टू चाइल्ड लॉ गेजेट में छापें - #TwoChildLaw , #TCL , #P20180436120
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7. Pm को चिट्ठी भेजने वाले नागरिक यदि आपसी संवाद के लिए कोई मीटिंग वगेरह करना चाहते है तो वे स्थानीय स्तर पर महीने के दुसरे रविवार यानी सेकेण्ड सन्डे को प्रात: 10 बजे मीटिंग कर सकते है। मीटिंग हमेशा सार्वजनिक स्थल पर रखी जानी चाहिए। इसके लिए आप कोई मंदिर या रेलवे-बस स्टेशन के परिसर आदि चुन सकते है। 2nd Sunday के अतिरिक्त अन्य दिनों में कार्यकर्ता निजी स्थलों पर मीटिंग वगेरह रख सकते है, किन्तु महीने के द्वितीय रविवार की मीटिंग सार्वजनिक स्थल पर ही होगी। इस सार्वजनिक मीटिंग का समय भी अपरिवर्तनीय रहेगा।
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8. अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी से प्रेरित यह एक विकेन्द्रित जन आन्दोलन है। (16) धाराओं का यह ड्राफ्ट ही इस आन्दोलन का नेता है। यदि आप भी यह मांग आगे बढ़ाना चाहते है तो अपने स्तर पर जो भी आप कर सकते है करें। यह कॉपी लेफ्ट प्रपत्र है, और आप इस बुकलेट को अपने स्तर पर छपवाकर नागरिको में बाँट सकते है। इस आन्दोलन के कार्यकर्ता धरने, प्रदर्शन, जाम, मजमे, जुलूस जैसे उन कदमों से बहुधा परहेज करते है जिससे नागरिको को परेशानी होकर समय-श्रम-धन की हानि होती हो। अपनी मांग को स्पष्ट रूप से लिखकर चिट्ठी भेजने से नागरिक अपनी कोई भी मांग Pm तक पहुंचा सकते है। इसके लिए नागरिको को न तो किसी नेता की जरूरत है और न ही पेड मीडिया की।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Feb 21 2020 11:43:50 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भारत में जनसंख्या वृद्धि दर को कम करने के लिए क्या करना चाहिए?
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जनसंख्या नियंत्रण का क़ानून गेजेट में छाप कर जनसँख्या वृद्धि दर को नियंत्रित किया जा सकता है। क़ानून लागू करने के लिए सबसे पहले हमें इसका ड्राफ्ट चाहिए, ताकि यह निर्धारित हो सके कि जनसँख्या नियंत्रण क़ानून में क्या प्रावधान होंगे, और यह कैसे काम करेगा।
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भारत में जनसँख्या नियंत्रण क़ानून यदि 1952 में छापा जाता तो Four Child Policy लागू करने से भी काम चल जाता था। यदि यह क़ानून 1992 में लाया जाता तब भी Three Child Policy काफी थी। 70 साल के टाइम पास ने हालात ऐसे कर दिए है कि अब जनसँख्या नियंत्रण के लिए हमें Two Child Policy की जरूरत है !!
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लेकिन यदि 2 बच्चों का क़ानून सीधे तौर पर लागू कर दिया जाए तो कन्या भ्रूण हत्या में विस्फोटक वृद्धि हो जाएगी। इसके अलावा गोद ली गयी संताने, दिव्यांग संताने, मंदबुद्धि संताने, आदिवासियों में बढ़ी हुयी शिशु मृत्यु दर आदि विषयों को भी दृष्टिगत रखना होता है। दुसरे शब्दों में जब तक हमारे सामने इसका ड्राफ्ट न हो तब तक जनसँख्या नियंत्रण की समस्या पर बात करके टाइम पास तो किया जा सकता है, किन्तु इस समस्या का समाधान करने की दिशा में कदम नहीं उठाया जा सकता। ड्राफ्ट के अभाव में पहले ही हम काफी वक्त जाया कर चुके है।
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70 साल का टाइम पास करने का यह श्रेय पेड मीडिया द्वारा प्रायोजित पार्टियों एवं पेड मीडिया द्वारा खड़े किये गए भारी भरकम नेताओं को जाता है। और इसका क्रेडिट उन कार्यकर्ताओ को भी दिया जाना चाहिए जो पेड मीडिया द्वारा खड़े गए इन ब्रांडेड नेताओं से चिपके रहते है, और समस्या के समाधान के लिए आवश्यक कानूनों की अवहेलना करते है !!
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पेड मीडिया के प्रायोजको का जनसँख्या नियंत्रण कानून को लेकर एजेंडा — पेड मीडिया के प्रायोजक 1951 से ही भारत में जनसँख्या नियंत्रण क़ानून लाने के खिलाफ रहे है !!
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पेड मीडिया द्वारा प्रायोजित पार्टियों का जनसँख्या नियंत्रण क़ानून पर स्टेंड :
(a) PMP01* हमेशा से जनसंख्या नियंत्रण क़ानून के खिलाफ रही है।
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(b) PMP02 के नेता एवं कार्यकर्ता धार्मिक जनसँख्या के बिगड़ते अनुपात के प्रति चिंता जताते रहे है, किन्तु जनसँख्या नियंत्रण के लिए क़ानून बनाने का वे हमेशा विरोध करते है !! दरअसल, उनकी रुचि इस समस्या को इस तरह उठाने रहती है कि इससे उनके वोट बढ़े। वे धार्मिक जनसँख्या के बिगड़ते संतुलन के बारे में नागरिको को सूचित करके वोट खींचते है। दुसरे शब्दों में, यह समस्या उन्हें वोट देती है। इसका समाधान होने से वोट खींचने का एक बिंदु उड़ जाएगा !!
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(c) PMP03 भी जनसँख्या नियंत्रण क़ानून के खिलाफ है। इसके नेता इस क़ानून के इस हद तक खिलाफ है कि वे इस मुद्दे पर कोई बात ही नहीं करना चाहते। वे चुप रहते है, और समस्या की अनदेखी करते है !!
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इस तरह ये इन तीनो पार्टियों के नेता एवं कार्यकर्ता पेड मीडिया के प्रायोजको के एजेंडे में खुद को एडजस्ट करके रखते है, और अलग अलग तरीको का इस्तेमाल करके इस क़ानून को टालते है।
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[ टिप्पणी : पेड मीडिया पार्टी से आशय ऐसी राजनैतिक पार्टी से होता है जो पेड मीडिया के प्रायोजको के एजेंडे के समर्थन में रहती है, और कभी भी उनके खिलाफ नहीं जाती। उदारहण के लिए, जनसँख्या नियंत्रण को लेकर पेड मीडिया के प्रायोजको का एजेंडा हमेशा से यह रहा है कि भारत में जनसँख्या नियंत्रण क़ानून नहीं आना चाहिए, अत: पेड मीडिया पार्टीयां यह क़ानून गेजेट में छापने के खिलाफ रहेगी।
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अब यहाँ इस बात को समझना जरुरी है कि, यहाँ मुख्य बिंदु क़ानून छापना है। तो कोई भी पेड मीडिया पार्टी जनसँख्या नियंत्रण का मुद्दा तो उठा सकती है, किन्तु क़ानून नहीं छाप सकती। मतलब अमुक पार्टियाँ जनसंख्या नियंत्रण पर डिबेट कर सकती है, “जागरूकता” फैला सकती है, और जनसँख्या नियंत्रण की आवश्यकता बताने को लेकर देश व्यापी हल्ला मचा सकती है, किन्तु क़ानून नही बना सकती। और उन्हें इसका क़ानून नहीं बनाना अत: पेड मीडिया पार्टियों के नेता एवं कार्यकर्ता कभी भी इसका ड्राफ्ट नहीं देंगे। ]
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(*) PMP01 - कोंग्रेस , PMP02 – संघ=बीजेपी , PMP03 – आम आदमी पार्टी
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समाधान :
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भारत में जनसँख्या नियंत्रण क़ानून का आज तक सिर्फ एक ही ड्राफ्ट लिखा गया है !!!
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(i) इस क़ानून का नाम Two Child Law है।
(ii) इस क़ानून में कुल 16 धाराएं है।
(iii) इस क़ानून का पहला संस्करण 2016 में प्रकाशित किया गया था।
(iv) फरवरी 2020 में इसे अपडेट किया गया है।
(v) इस प्रस्तावित क़ानून की हेश #TwoChildLaw है।
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यह क़ानून 2016 में ही पीएम को भेज दिया गया था, एवं तब से लगातार विभिन्न कार्यकर्ता पीएम को ट्विट करके इसे गेजेट में छापने का अनुरोध करते रहते है।
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निचे प्रस्तावित टू चाइल्ड लॉ का सारांश एवं इसकी एक महत्त्वपूर्ण धारा (9) का ब्यौरा दिया गया है :
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——-ड्राफ्ट के सारांश का प्रारंभ——
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इस कानून को धन विधेयक के रूप में लोकसभा से साधारण बहुमत द्वारा पारित करके देश में लागू किया जा सकता है। इस क़ानून को राज्यसभा से पास करने की जरूरत नहीं है। यह क़ानून ड्राफ्ट भारतीय संविधान के किसी भी मौजूदा प्रावधान का उलंघन नहीं करता, अत: इसके लिए किसी प्रकार के संवैधानिक संशोधन की भी ज़रूरत नहीं है।
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(9) भुगतान और आर्थिक सहायता में कटौती, जुर्माना और कारावास :
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(9.1) यदि किसी व्यक्ति, पुरुष या स्त्री, के पास निर्धारित संतानों की संख्या से अधिक संताने है, तो खनिज रॉयल्टी भुगतान में कटौती, आर्थिक सहायता/अनुदान आदि में कटौती, जुर्माना और कारावास लागू हो सकते है। आदिवासियों के संतानों की संख्या अन्य के लिए निर्धारित संतानों की संख्या से एक संतान अधिक हो सकती है। सिर्फ आदिवासियों को ही यह छूट मिलेगी। अनुसूचित जातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग या अल्पसंख्यको को यह विशेषाधिकार नहीं मिलेगा।
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(9.2) यह कानून लागू होने के 1 साल बाद यदि किसी व्यक्ति के कोई संतान पैदा नहीं हुई है , तो सजा या भुगतान और आर्थिक सहायता में कटौती नहीं होगी। लेकिन भुगतान में वृद्धि हो सकती है।
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(9.3) इस खंड में D का अर्थ है सिर्फ एक पुत्री, और S का अर्थ है सिर्फ एक पुत्र। DD का अर्थ है दो पुत्रियाँ और DS का अर्थ है पहली संतान पुत्री और दूसरी संतान पुत्र है। DDS का अर्थ है पहली संतान पुत्री है, दूसरी पुत्री है और तीसरी पुत्र है। दूसरे शब्दों में, इस खंड में संतानों के पैदा होने का क्रम बताया गया है ना कि सिर्फ कुल संख्या। DSD का अर्थ होगा पहली संतान पुत्री, दूसरी पुत्र और तीसरी पुत्री है। और इसी तरह SDD, DSD अलग अलग क्रम को दर्शाता है।
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(9.3.1) निसंतान - यदि किसी व्यक्ति की आयु 18 से 23 वर्ष के मध्य है तब उसे प्राप्त होने वाली खनिज रॉयल्टी एवं सरकारी जमीनों के किराये से प्राप्त होने वाली राशि में 33% की अधिक वृद्धि हो जायेगी। 23 वर्ष की आयु के बाद निसंतान होने पर कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं मिलेगा।
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(9.3.2) S - कोई सजा नहीं और ना ही खनिज रॉयल्टी का अतिरिक्त भुगतान।
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(9.3.3) D या DD या DDD - कोई सजा नहीं और खनिज रॉयल्टी में 33% की अतिरिक्त वृद्धि।
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(9.3.4) DDDD - कोई सजा नहीं और खनिज रॉयल्टी में 66% की अतिरिक्त वृद्धि।
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(9.3.5) SS, SD, DS, DDS, DDDS, DDDDS, DDDDD - कोई सजा नहीं और खनिज रॉयल्टी का कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं।
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(9.3.6) एक संतान, पुत्र या पुत्री खंड (9.3.5) के बाद - खनिज रॉयल्टी में 33% कटौती 10 साल के लिए , ना कारावास और ना जुर्माना।
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(9.3.7) एक संतान, पुत्र या पुत्री खंड (9.3.6) के बाद - खनिज रॉयल्टी में 66% कटौती 10 साल के लिए , 20 वर्ष के लिए मताधिकार का निलम्बन, ना कारावास और ना जुर्माना। ( मताधिकार निलम्बन एवं इसकी अवधि का फैसला जूरी मंडल द्वारा किया जाएगा। )
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(9.3.8) एक संतान, पुत्र या पुत्री खंड (9.3.7) के बाद - खंड (9.3.7) की सजा और साथ में 10 साल के लिए आय का 10% जुर्माना ( न्यूनतम रु 1000 प्रति महिना और अधिकतम रु 10000 प्रति माह ), ना कारावास।
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(9.3.9) एक संतान, पुत्र या पुत्री खंड (9.3.8) के बाद - खंड (9.3.8) की सजा और साथ में 2 साल तक का कारावास।
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(9.3.10) प्रत्येक संतान के लिए खंड (9.3.9) के बाद - खंड (9.3.9) की सजा और साथ में प्रति संतान के लिए 2 अधिक साल के लिए कारावास और बाध्यकारी नसबंदी।
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[ टिप्पणी : बिंदु (9.3.7) में दिए गए मताधिकार के निलम्बन एवं इसकी अवधि का फैसला नागरिको की जूरी करेगी। जूरी चाहे तो निलंबन के बाद भी यह अवधि घटा सकती है, या मतदाता सूची में नाम जोड़ने के आदेश जारी कर सकती है। यदि इस क़ानून के तहत मताधिकार से वंचित किया गया कोई नागरिक चुनाव लड़ना चाहता है तो जूरी सदस्य चुनाव लड़ने की अवधि के लिए अमुक व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में जोड़ने के आदेश जारी कर सकती है, या उसे चुनाव लड़ने की अनुमति दे सकती है, ताकि व्यक्ति चुनाव लड़ने से वंचित न रहे। ]
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(9.4) यह कानून लागू होने के 5 साल बाद, अधिक संतान उत्पत्ति पर होने वाली सजा इस प्रकार है :
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(9.4.1) खंड (9.3.1) से (9.3.5) तक के मामलों में संतान संख्या के लिए - कोई सजा नहीं।
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(9.4.2) खंड (9.3.6) में संतान संख्या के लिए, खंड (9.3.7) में दी गयी सजा मिलेगी, और खंड (9.3.7) में संतान संख्या के लिए, खंड (9.3.8) में दी गयी सजा मिलेगी, और सभी खंडो के लिए इसी प्रकार से सजा मिलेगी। दूसरे शब्दों में, खंड (9.3.5) के बाद सभी खंडो के लिए सजा "एक स्तर आगे" हो जाएगी।
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(10) जुर्माना संग्रहित करने में नियम - जुर्माना प्रत्येक माता-पिता पर 1000 रू प्रति महीना न्यूनतम तथा 10000 रू प्रति महीना अधिकतम होगा। लेकिन संग्रहित जुर्माना मासिक आय के 10% से अधिक नहीं होगा। तो यदि व्यक्ति की आय 10000 रू से कम है तब उसकी आय का 10% जुर्माना ही लिया जायेगा और शेष राशि "लंबित जुर्माना" के रूप में रखी जाएगी। लंबित जुर्माने पर प्रचलित दर के अनुसार ब्याज देय होगा। "लंबित जुर्माना" के मामले में, अवधि 10 साल के बाद भी बढाई जा सकती है, जब तक कि सारा लंबित जुर्माना ब्याज सहित संग्रहित नहीं हो जाता। अमुक व्यक्ति चाहे तो लंबित जुर्माना शीघ्र अति शीघ्र अदा कर सकता है। और राशियाँ 1000 रू और 10,000 रू महंगाई दर के अनुसार प्रति वर्ष बढाई जा सकती है।
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[ टिप्पणी : खनिज रॉयल्टी : खनिज रॉयल्टी एवं सरकारी जमीनों से प्राप्त होने वाले प्रावधान तब लागू होंगे जब प्रधानमंत्री प्रस्तावित धन वापसी पासबुक का क़ानून गेजेट में छापकर भारत के सभी खनिज एवं प्राकृतिक संसाधनों को भारतीय नागरिको की संपत्ति घोषित कर देते है। जब तक धन वापसी पासबुक गेजेट में नहीं आता, तब तक उन सभी आर्थिक अनुदानों, सब्सिडी आदि में कटौती होगी जो आर्थिक अनुदान नागरिको को केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा दिए जा रहे है। ]
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(12) कुछ जटिल और विशेष परिस्थितियां :
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(12.1) इस कानून के पारित होने से पूर्व ( या पारित होने के 1 वर्ष के अन्दर) जन्मी संतानों के कारण कोई भी जुर्माना या सजा नहीं होगी।
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(12.2) यदि अंत में जन्मी संताने जुडवा हैं तो उनको एक संतान ही गिना जाएगा। लेकिन यदि जुडवा संतानों के बाद कोई संतान जन्म लेती है तो जुडवा बच्चों को दो अलग संतानों के रूप में गिना जाएगा।
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(12.3) गोद ली गयी संतानों को गिना नहीं जाएगा।
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(12.4) दिव्यांग संतानों को गिना जाएगा। माता-पिता को दिव्यांग संतानों के लिए 66% अधिक खनिज रोयल्टी दी जाएगी।
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(12.5) यदि जन्मित संतान पुत्र या पुत्री नहीं है तो ऊपर लिखे नियमो को लागू करते समय उस संतान को पुत्री के रूप में गिना जाएगा।
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(13.1) जब भी कभी राष्ट्रीय जनसख्या नियंत्रण अधिकारी ( या उनके कर्मचारी ) किसी नागरिक को खनिज रॉयल्टी एवं सब्सिडी आदि के रूप में मिलने वाली धन राशि को कम करने का निर्णय करेंगे या किसी तरह की सजा देना या जुर्माना लगाना चाहेंगे तो मामले के विचार के लिए राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी 25 से 55 तक की उम्र के नागरिकों को रैंडमली चुनेंगे और एक जूरी मंडल का गठन करेंगे। और जब भी कोई नागरिक किसी राष्ट्रिय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी के कर्मचारिओं के विरुद्ध कोई शिकायत दर्ज कराना चाहेंगे तब भी राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी वेसे ही एक जूरी मंडल का गठन करेंगे। इस क़ानून से सम्बधित सभी प्रकार के मामलों का निपटान जूरी मंडल द्वारा किया जाएगा। किन्तु जूरी मंडल के फैसले की अपील उच्च या उच्चतम न्यायालयों में की जा सकेगी
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(06) प्रधानमंत्री एक राष्ट्रीय जनसँख्या नियंत्रण अधिकारी (NPCO = National Population Control Officer) को नियुक्त करेंगे जिसे भारत के नागरिक वोट वापसी प्रक्रियाओं का प्रयोग करके बदल सकेंगे। NPCO एवं उसका स्टाफ जूरी मंडल के दायरे में रहेगा एवं उसके खिलाफ कोई शिकायत आती है तो सुनवाई नागरिको की जूरी करेगी।
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[ टिप्पणी : वापसी एवं जूरी के दायरे में होने के कारण NPCO एवं उसका स्टाफ कार्यकुशलता एवं इमानदारी से काम करेगा। ]
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———ड्राफ्ट के सारांश समापन——-
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इस क़ानून के गेजेट में आने से क्या बदलाव आएगा ?
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(ia) भारत में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने का एक बड़ा कारण धार्मिक जनसँख्या के अनुपात का लगातार बिगड़ना है। यदि भारत में यह क़ानून कई दशक पहले आ जाता धार्मिक जनसँख्या के इस असंतुलन को रोका जा सकता था। किन्तु भारत की किसी भी राजनैतिक पार्टी एवं संगठन ने भारत में जनसँख्या नियंत्रण का क़ानून ड्राफ्ट सामने रखने तक की जहमत नहीं उठायी। क़ानून पास करना तो आगे की बात है। इस कानून के आने से भारत जनसँख्या नियंत्रण शुरू होगा और इस वजह से साम्प्रदायिक तनाव में भी कमी आएगी।
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(ib) हमारे समाज में बहुधा पुत्र प्राप्ति के लिए स्वाभाविक झुकाव देखने में आता है। अत: इस क़ानून को इस तरह लिखा गया है कि यदि किसी दम्पत्ति की प्रथम 4 संताने पुत्रियाँ है तो उसे सरकार से प्राप्त होने वाले अनुदान में अतिरिक्त वृद्धि होगी, और 5 पुत्रियाँ होने तक भी उसे किसी आर्थिक दंड का सामना नहीं करना पड़ेगा। इस तरह इस क़ानून के आने के बावजूद कन्या भ्रूण हत्या के मामलो में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी।
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पूरा ड्राफ्ट यहाँ देखें – <https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/1062761064096970/>;
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ऊपर दिए गए विवरणों को सलंग्न तालिका में भी दर्शाया गया है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Feb 21 2020 18:59:49 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सरकार पॉलीथिन के उपयोग पर रोक लगाने की बजाय पॉलीथिन बनाने वाली फैक्टरियों पर रोक क्यों नहीं लगती है ?
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क्रूड ऑयल की रिफायनिंग से कई प्रकार के सह उत्पाद एवं केमिकल वेस्ट निकलता है। पॉली एथिलीन (पॉलीथीन) भी इसी तरह का एक केमिकल वेस्ट है। कानूनन तेल कम्पनियों को इन्हें ठिकाने (Dispose) लगाना होता है। पॉलीथीन के इन दानो से प्लास्टिक के कैरी बेग बनते है। और फिर जो बच जाता है उसे तेल कम्पनियां इधर उधर समन्दर वगेरह में बहा कर डिस्पोज कर देती है। इसे डिस्पोज करने से कुछ पैसा वगेरह तो मिलता नहीं, उलटे लागत बढ़ जाती है !! तो तेल कम्पनियां चाहती है कि प्लास्टिक के ये दाने बिकते रहे !!
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सरकारें यदि कैरी बेग बनाने वाली फैक्ट्रियों को बेन कर देगी तो इन दानो की मांग घटेगी और तेल कंपनियों को घाटा होगा। बस यही वजह है !!
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बहरहाल, इस तरह के कई क़ानून है जिन्हें हम सिर्फ इसीलिए ढो रहे है क्योंकि इससे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को घाटा होता है। भारत में पेड मीडिया की प्रायोजक बहुराष्ट्रीय कम्पनियां है। अत: पेड मीडिया में नजर आने वाली कोई भी पार्टी एवं नेता पेड मीडिया के प्रयोजको के खिलाफ नहीं जाना चाहता।
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उदाहरण के लिए कभी टाटा को केमिकल वेस्ट के रूप में निकलने वाला अपना टनों सोडियम क्लोराइड दशको तक समन्दर में बहाना पड़ता था। लेकिन जब उन्होंने आयोडाइज्ड नमक का क़ानून बनवा दिया तो यह झक सफ़ेद Mineral Less शुद्ध NaCl केमिकल आयोडीन नमक के नाम से महंगे में बिकने लगा !! टाटा के पास आयोडीन की माइंसे भी थी। इस क़ानून के आने से आयोडीन की भी मांग बढ़ी और टाटा ने इधर से भी मुनाफा बनाया।
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यह सब 90 के दशक की बातें है, अत: ज्यादातर पाठक इस घटनाक्रम से परिचित नहीं होंगे। फिर उन्होंने खुला नमक बेचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया जिसकी वजह से समुद्री नमक ( जो कि मिनरल्स का सबसे अच्छा स्त्रोत है ) का फुटकर कारोबार बंद हो गया ।
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अब इस चक्कर में करोड़ो लोग Mineral Less नमक खाने के कारण कुपोषण के शिकार हो गए तो इससे राज नेताओं को कोई दिक्कत नहीं है। क्योंकि नेता को चुनाव जीतने के लिए पेड मीडिया का सपोर्ट चाहिए पेड मीडिया इन कम्पनियों के कब्जे में है।
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तेल कम्पनियां हथियार बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बाद दुसरे नंबर की सबसे ताकतवर कम्पनियां है। भारत की सभी राजनैतिक पार्टियो के नेता भी चुनाव जीतने वगेरह के लिए इन पर बुरी तरह से निर्भर करते है। वैसे भी भारत के पास तेल निकालने की तकनीक नहीं है। तो इन कम्पनियों से टकराव लेने का सवाल ही नहीं।
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कुछ 6-7 साल पहले जब मेरे एक परिचित ने बायो प्लास्टिक की मेनुफेक्चरिंग शुरू करने की कोशिश की थी तो मुझे इस विषय के बारे में जानकारी हुयी थी। बायो प्लास्टिक के कैरी बेग जो मैंने देखे थे वे पॉलीथीन के कैरी बेग के समान ही उपयोगी थे, किन्तु उनकी कीमत लगभग 30-40% ज्यादा थी। सरकार यदि इम्पोर्ट ड्यूटी का स्ट्रक्चर पलट दे और इसे प्रोत्साहित करने लगे तो इसका उत्पादन कम कीमत में होने लगेगा, और पॉलीथीन की एक बड़ी खपत को यह बाजार से बाहर कर सकता है।
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इसके अलावा और भी कई तरीके है, प्लास्टिक के कैरी बैग को रिप्लेस करने है। लेकिन नेता वगेरह तेल कम्पनियों से टकराव लेने से बचना चाहते है। इसीलिए सरकारें टोकन के रूप में छोटे छोटे अप्रभावी फैसले लेकर माहौल बनाये रखती है कि हम कोशिश कर रहे है !!
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इसके अलावा तेल कम्पनियां उन एनजीओ वगेरह को भी अनुदान देते रहती है जो पर्यावरण बचाने के नाम पर पॉलीथीन के खिलाफ मुहीम चलाकर जनता का ध्यान भटकाने का काम करते है। मतलब ये पेशेवर ज्ञान बांटने वाले पेड बुद्धिजीवी जनता में "जागरूकता" फैलाते है, और बदले में तेल कम्पनियां इन्हें अनुदान देते रहती है।
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यदि जागरूकता फैलाने वाले ये ज्ञानी गायब हो जायेंगे तो लोगो का ध्यान पॉलीथीन को रोकने के लिए कानून बनाने की और जाएगा और तेल कम्पनियों को घाटा होगा। तो पॉलीथीन को चलन में बनाए रखने का तरीका है कि कार्यकर्ताओं को कानूनों की मांग करने की जगह पर्यावरण पर ज्ञान बांटने और जागरुकता फैलाने में लगाए रखिये !!
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इसका स्थायी समाधान जूरी कोर्ट एवं रिक्त भूमि कर लागू करना है। जूरी कोर्ट के आने से भारत की कम्पनियां जल्दी ही रिफायनरी में काम आने वाले उपकरण बनाने की तकनीक जुटा लेगी और तब हमारे नेता तेल कम्पनियों के खिलाफ जाकर फैसले कर सकते है। ये रास्ता लम्बा है। मतलब जूरी कोर्ट आने के बाद भी कम से कम 6-7 वर्ष और लगेंगे इस तरह की तकनीक जुटाने में। लेकिन तेल निकालने की मशीने बनाने की क्षमता जुटाने के अलावा इन कम्पनियों के पंजे से बाहर आने का अन्य कोई उपाय भी नहीं है !!
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Feb 22 2020 11:29:50 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

डाकू सिस्टम, जज सिस्टम एवं जूरी सिस्टम में क्या अंतर है, और इनमे से कौनसा बेहतर है?
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(1) डकैत : जब कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का गिरोह हथियारों के बल पर किसी की संपत्ति का हरण करने को अपना पेशा बना ले तो वे डाकू है। डाकू सिस्टम में, ताकतवर आदमी कमजोर व्यक्ति की संपत्ति का हरण कर लेता है। बेरोजगारी, परिस्थिति, फितरत आदि के अतिरिक्त कई मामलो में बंदूक उठाने की एक बड़ी वजह अन्याय भी होता था। जब अदालतें ठीक से काम नहीं करती है तो अन्याय से पीड़ित लोग बागी होकर बंदूक उठा लेते है। ऐसे कई डाकू हुए जिन्होंने सिर्फ अन्याय की वजह से ही बंदूक उठायी, और बाद में वही उनका पेशा बन गया।
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(2) जज सिस्टम : भारत की जज प्रणाली में जिला स्तर पर एक शेषन जज होता है, और जिले में सभी मामलो में दंड देने की शक्ति इस एक आदमी के पास होती है। राज्य में यह शक्ति हाई कोर्ट जज के पास होती है। हाई कोर्ट जज शेषन जज को प्रमोट कर सकता है, या उसे नौकरी से निकाल सकता है। सुप्रीम कोर्ट के जज के पास पॉवर है कि वह हाई कोर्ट जज को प्रमोट कर सके या नौकरी से निकाल सके। जो व्यक्ति एक बार जज बन जाता है, उसके पास विभिन्न स्तरों पर दंड देने की यह शक्ति आजीवन बनी रहती है। एक जज फैसले देने में कितनी ईमानदारी बरतता है, यह खुला रहस्य है।
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(3) डकैत एवं जज सिस्टम में अंतर :
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डाकुओ में डकैती डालने के कोई नियम नहीं होते किन्तु जिस व्यवस्था में वह काम करते है, उसके अनुसार अमूमन डाकूओ के निशाने पर हमेशा अमीर इंसान रहता है, और कई वजहों से वे गरीब को निशाना नहीं बनाते।
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3.1. यदि वे गरीब आदमियों को लूटेंगे तो आवश्यक धन इकट्ठा करने के लिए ज्यादा आदमियों को निशाना बनाना पड़ेगा, अत: उनकी लागत बढ़ जाएगी !!
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3.2. गरीब आदमीयों को लूटने से समुदाय उनके खिलाफ हो जायेगा। इससे मुखबिरों की संख्या बढ़ जायेगी और वो पकड़े जायेंगे।
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3.3. एक हथियार विहीन अमीर आदमी के पास ऐसा कोई मैकेनिज्म नहीं होता कि वह डाकू को दबा सके। अत: डाकू के लिए अमीर को लूटने में कम जोखिम रहता है।
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लेकिन जज सिस्टम का डिजाइन ही कुछ ऐसा होता है कि जज बहुधा कमजोर आदमी को ही निशाना बनाते है। यदि जज ताकतवर आदमी से पैसा खींचने जाएगा तो उसका जोखिम बढ़ जाएगा। कैसे ?
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मान लीजिये, किसी साधारण आदमी का विवाद किसी मंत्री से हो जाता है, और जज को पता है कि गलती मंत्री की है। लेकिन मंत्री के खिलाफ फैसला देने से पहले जज सोचेगा कि, मंत्री किसी न किसी तरह से मुझे नुकसान पहुँचा सकता है। अत: जज ताकतवर आदमी यानी (मंत्री) के खिलाफ जाने का जोखिम नहीं उठाएगा। वह जानता है कि यदि मैं साधारण आदमी मेरा कुछ भी उखाड़ नहीं सकता !! अत: एक साधारण आदमी के खिलाफ फैसला देने में जज के लिए न्यूनतम जोखिम है।

इसी तरह से मान लीजिये कि A एक 5,000 करोड़ की पार्टी है और उसका एक मामला अदालत में है। मान लीजिये कि इस मामले में हजारो जनसाधारण लोग वादी के रूप में है। तब भी जज A से पैसा ले लेगा और क़ानून की कोई न कोई नजीर निकालकर उसके पक्ष में डिग्री दे देगा !! क्योंकि जज जानता है कि, जन साधारण के पक्ष में फैसला देने में उसे कोई लाभ नहीं है। लेकिन A के खिलाफ फैसला देने से वह घूस की राशि से भी वंचित होगा एवं A के ऊँचे संपर्को के कारण भविष्य में जज के लिए जोखिम बढ़ जाएगा।
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दुसरे शब्दों में, जज सिस्टम में अमीर आदमी के पास अपनी पहुँच एवं पैसे का इस्तेमाल करने का अवसर होता है। अत: जज बड़े आदमी पर कभी हाथ नहीं डालते। वे जानते है कि इससे हमारे लेने के देने पड़ सकते है। अत: जब किसी बड़े एवं छोटे आदमी की लड़ाई होगी तो जज स्वभाविक रूप से ताकतवर आदमी को छोड़ देगा और कमजोर की गर्दन मरोड़ देगा। चाहे कमजोर आदमियों की संख्या कितनी भी ज्यादा ही क्यों न हो।
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लेकिन यदि किसी डाकू के सामने अमीर एवं गरीब आदमी का झगडा आएगा तो वह अमीर को लूट लेगा और गरीब आदमी को जाने देगा। वजह यह है कि एक तो डाकू अमीर आदमी से ज्यादा पैसा वसूल सकता है, और तिस पर भी अमीर आदमी के पास डाकू को दबाने का कोई मैकेनिज्म नहीं है। तो जब भी किसी क्षेत्र में डाकू पनप जाते थे तो पुलिस को उन्हें पकड़ने में काफी दिक्कत आती थी। क्योंकि वे आम नागरिको / गरीब आदमी को अमूमन कोई परेशानी नहीं देते थे और इस वजह से नागरिको का समर्थन उन्हें प्राप्त रहता था।
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डाकुओ एवं जजों में दूसरा बड़ा फर्क यह है कि, डाकू यदि जन साधारण को ज्यादा लूटना शुरू करेगा तो नागरिक हथियार जुटा कर उसका प्रतिकार करना शुरू करेंगे। जबकि जज सिस्टम में यह लूट (जिसे घूसखोरी एवं भाई भतीजावाद के नाम से जाना जाता है) पूरी तरह से कानूनी होती है, और आदमी को गम खाकर बैठ जाना पड़ता है। यदि व्यक्ति जज पर घूसखोरी का आरोप लगाएगा तो जज अवमानना का आरोप बनाकर उसे जेल में डाल देंगे !!
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(4) जूरी सिस्टम : जूरी सिस्टम में दंड देने की शक्ति लगातार विभिन्न लोगो में हस्तांतरित होती रहती है। जूरी सिस्टम में प्रत्येक मुकदमे के लिए 12 से 15 मतदाताओ का लॉटरी द्वारा चयन करके जूरी मंडल का गठन किया जाता है। जब जज मुकदमा सुनता है तो मुकदमे के बगल में बैठकर यह जूरी भी मुकदमा सुनती है। सभी पक्षों को सुनने एवं पेश किये गए सबूतों को देखने के बाद प्रत्येक जूरी सदस्य बंद लिफाफे में अपना फैसला दे देता है, और जूरी भंग हो जाती है। बहुमत द्वारा दिए फैसले को जूरी का फैसला माना जाता है।
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[ वैसे जूरी सिस्टम एक कंसेप्ट है, और जूरी सिस्टम कितने बेहतर तरीके से काम करेगा यह इसके ड्राफ्ट पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए जूरी कोर्ट के प्रस्तावित ड्राफ्ट में अंतिम फैसला देने का अधिकार जज के पास ही है, और जूरी द्वारा दिए गए निर्णय की हैसियत परामर्शकारी है। इसके अलावा जूरी कोर्ट में जूरी मंडल को सिर्फ सरल मुकदमें सुनने का अधिकार दिया गया है, जटिल मुकदमो का नहीं। ]
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(5) डाकू सिस्टम, जज सिस्टम और जूरी सिस्टम में से कौनसा बेहतर है ?
वैसे डाकू सिस्टम अपने आप में कोई सिस्टम नहीं है, अत: यह लम्बे समय तक टिक नहीं सकता। वे सिर्फ बंदूक के बल पर अपनी सत्ता बनाते है। यदि डाकूओ की संख्या बढ़ने लगी और उन्होंने बड़े पैमाने पर लूट पाट शुरू की तो जन साधारण अपनी सुरक्षा के लिए खुद का सशस्त्रीकरण करना शुरू कर देगा। और जैसे ही नागरिको के पास हथियार आते है डाकू जमा हो जाते है। तब डाकू राहजनी और मौका देखकर लूट खसोट तो कर सकते है, किन्तु एलानिया डकैती नहीं कर सकते।
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चूंकि जज अपेक्षाकृत छोटे एवं कमजोर लोगो को लूटते है, अत: जज सिस्टम में ताकतवर लोग जजों से गठजोड़ बनाकर गलत वजहों से कारोबारी बढ़त एवं एकाधिकार बनाए रखने में सफल हो जाते है। यह एक बड़ी वजह है कि, ताकतवर लोग हमेशा जज सिस्टम की पैरोकारी करते है, ताकि जरूरत होने पर वे पैसा फेंक कर जजों को खरीद सके !!
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जूरी सिस्टम में, दंड देने की शक्ति लगातार विभिन्न लोगो में हस्तांतरित होती रहती है, अत: ताकतवर लोगो द्वारा इस तरह का गठजोड़ बनाया नहीं जा सकता। अत: मेरे विचार में जूरी सिस्टम जज सिस्टम की तुलना में बेहतर तरीके से काम करता है।
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न्याय प्रणाली को लेकर पेड मीडिया के प्रायोजको का एजेंडा है कि – भारत में जज सिस्टम चालू रहना चाहिए, अत: आप भारत की सभी पेड मीडिया पार्टियों एवं पेड मीडिया द्वारा खड़े किये गए ब्रांडेड नेताओं को जज सिस्टम के समर्थन में पायेंगे !! जूरी सिस्टम से उन्हें इतनी घृणा है कि वे इस पर बात करना तक पंसद नहीं करते !!
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(6) शोले :
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(1) ठाकुर गाँव वालो से कहता है – शंकर , गंगा कसम जब भी वक्त आया है तो हमने दरातियाँ पिघलाकर तलवारे बनायी है।
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असल में, गब्बर गाँव वालो को इसीलिए लूट रहा था क्योंकि वे हथियार विहीन थे। ठाकुर उन्हें लड़ने के लिए जब तलवारे बनाने की चाबी देता है तो काशीराम पलट कर जवाब देता है कि – ठाकुर, बंदूक और तलवार की लड़ाई में तब भी जीतेगी तो बंदूक ही !!
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पर चूंकि पेड मीडिया के प्रायोजक नागरिको को हथियारबंद करने के खिलाफ है, अत: पेड सलीम जावेद ने पटकथा में इस तथ्य को दर्ज नहीं किया था कि – सरकार नागरिको को बंदूके रखने की अनुमति नहीं दे रही है, लेकिन गब्बर को बंदूक रखने से रोक नहीं रही है, और इस वजह से रामगढ़ के वासी 2 बार टेक्स चुका रहे है। सरकार को भी और गब्बर को भी !!
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(2) गब्बर जिस तरह से चौपाल पर आकर धान इकट्ठा करता था, उस समय के डाकू जन साधारण से इस तरह हफ्ता वसूली नही करते थे। ठाकुर की तिजौरी में काफी पैसे थे, और उसके परिवार की हत्या करने के बाद वह असहाय एवं अकेला था। लेकिन गब्बर उसे कभी लूटने नहीं गया !!
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फ़िल्में आखिर फ़िल्में है, और इनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता। लेकिन चूंकि फ़िल्में भी पेड मीडिया का हिस्सा है, अत: इनमें बहुत सफाई के साथ ऐसी सूचनाओं को समायोजित कर दिया जाता है, जो पेड मीडिया के प्रायोजको के अनुकूल हो।
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बहरहाल, हमारे लिए बुरी खबर यह है कि अमेरिका, ब्रिटेन एवं फ़्रांस के बाद अब चाइना भी धीरे धीरे जज सिस्टम को कमजोर करके जूरी सिस्टम की तरफ जा रहा है। इसी साल उन्होंने एसेसर* सिस्टम का दायरा विस्तृत कर दिया है। मतलब, छोटी इकाइयों को सरंक्षण मिलने से चाइना अब और भी और ज्यादा बेहतर एवं ज्यादा सस्ती तकनिकी वस्तुओ का उत्पादन करने लगेगा। और इससे भारत एवं चीन के बीच शक्ति अनुपात और भी बिगड़ेगा !!
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(*) एसेसर सिस्टम जूरी सिस्टम का ही एक चिल्लर वर्जन है। मतलब यह कमजोर जूरी प्रथा की एक किस्म है। लेकिन तब भी यह जज सिस्टम जैसे बदतर सिस्टम से कई गुना बेहतर है।
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<https://www.scmp.com/comment/insight-opinion/united-states/article/2174295/how-peoples-jury-system-helping-chinese-courts>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Feb 22 2020 13:32:51 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

प्रति ध्रुविकरण : पेड़ मीडिया पार्टी के नेता वारिस पठान द्वारा 3 मार्च 2019 को यह फ़ोटो पोस्ट की गयी थी !! साथ में PMP02 के नेता भी है ।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Feb 22 2020 23:48:02 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

AIMIM के विधायक रहे वारिस पठान के विवादास्पद बयान "हम 15 करोड़ हैं लेकिन हम 100 करोड़ पर भारी हैं" को आप किस तरह से देखते हैं?
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2014 के लोकसभा चुनावों से पहले की बात है, जब PMP10 के नेता अकबरुद्दीन ओवैसी ने कुछ इसी आशय का एक विभाजनकारी बयान दिया था। यदि ओवैसी का जूरी ट्रायल किया जाता तो यह 100% तय था कि उसे हफ्ते भर में ही कम से कम 3 से 5 साल की जेल हो जाती।
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तब PMP02 के सभी नेताओं एवं कार्यकर्ताओ ने अकबरुद्दीन ओवैसी के जूरी ट्रायल का विरोध किया था। दरअसल, वे इस हेट स्पीच को भारत के प्रत्येक हिन्दू तक पहुँचाने का टार्गेट* लेकर काम कर रहे थे !!
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हिन्दू जब – “लोग-बाग़ बोल रहे है कि मोड़ी वजीरे आजम बन जायेगा। देखते है कि कईसा बनता है” डायलॉग सुनता था, तो इसे चुनौती की तरह लेता था, और यह तय कर लेता था कि पीएम तो मोदी ही बनना चाहिए !! इस अकेली हेट स्पीच ने PMP02 के नेता के खाते में लगभग 5 करोड़ वोट जोड़ दिए थे !!
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लगभग 3 करोड़ वोट मोदी साहेब के खाते में पेड रविश कुमार एवं पेड राजदीप सरदेसाई ने जोड़े थे। इन दोनों आदमियों को 2013 में यह पेमेंट मिलनी शुरू हुयी कि वे गोधरा काण्ड को फिर से जिन्दा करें, और हिन्दुओ को यह सूचना दें कि मोदी साहेब एंटी मुस्लिम एवं हिंदूवादी है !!
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दोनों ने यह काम बेहद सफाई से किया !! पेड रविश कुमार आज भी इसी लाइन पर प्रसारण करने की पेमेंट ले रहे है। वे अपने किसी भी एपिसोड में हिन्दुओ को यह सूचना देना नहीं भूलते कि मोदी साहेब हिंदूवादी है !! और यह सुनकर हिन्दू मोदी साहेब की और जाना शुरू कर देते है। ( भारत में कितने प्रतिशत हिन्दू है ? 80% !! )
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यह ध्रुवीकरण एवं प्रतिध्रुविकरण का सीधा फार्मूला है। यदि आप हिन्दुओ को किसी एक ध्रुव पर इकट्ठा करना चाहते है तो आपको दो तरह के समूह चाहिए होते है –
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(i) ध्रुवीकरण करने वाला समूह A : ऐसे नेता जो हिन्दुओ को ध्रुव X की तरफ खींचेंगे
(ii) प्रतिध्रुविकरण करने वाला समूह B : ऐसे नेता जो हिन्दुओ को ध्रुव X की तरफ धकेलेंगे
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यदि समूह B के नेता हिन्दुओ को धकेलते नहीं है तो हिन्दुओ को खींचने की समूह A के नेताओं की क्षमता घटती जाएगी, और हिन्दुओ को लगेगा कि समूह A के नेता ध्रुवीकरण करने के लिए हिन्दुवाद को जाया तौर पर बेच रहे है।
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दुसरे शब्दों में, मोदी साहेब एवं श्री अमित शाह जैसे नेताओ को टिकाये रखने के लिए ओवैसी, वारिस पठान, ममता बनर्जी, मुलायम सिंह जैसे समूह B के नेताओ का होना जरुरी है। यदि समूह B के नेता प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर रहे है तो उन्हें पेड मीडिया का इस्तेमाल करके टुकड़े टुकड़े गैंग, शरजिल इमाम और इस तरह के टोकन जमूरो को प्लांट करना पड़ेगा, ताकि संतुलन बनाकर रखा जा सके। ध्रुवीकरण की गाड़ी में दो पहिये होते है, यदि दुसरे पहिये में हवा कम होने लगे तो रफ़्तार धीमी हो जाती है।
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भारत में साम्प्रदायिक अलगाव बढ़ाना पेड मीडिया के प्रायोजको का एजेंडा है, और वे अपनी पार्टियों एवं नेताओं का इस्तेमाल ऐसा करने में कर रहे है। जैसे जैसे ईरान एवं अमेरिका में तनाव बढेगा वैसे वैसे भारत में भी हिन्दू-मुस्लिम तनाव एवं अलगाव बढ़ता चला जाएगा।
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मेरा बिंदु यह है कि, यदि 2013 में ओवेसी का जूरी ट्रायल एवं सार्वजनिक नार्को टेस्ट हो जाता तो पिछले 7 वर्षो से भड़काऊ बयानों का जो सिलसिला आप देख रहे है, वह शुरू होते ही ख़त्म हो जाता था !!
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PMP10 के नेता वारिस पठान के बयान पर मेरा स्टेंड :
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मेरा मानना है कि, यह बयान स्क्रिप्टेड है। पठान को किसने यह बयान देने को कहा इस बारे में मैं पक्के तौर पर कुछ कह नहीं सकता। इसके लिए मेरा प्रस्ताव निम्नलिखित है :
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मुंबई की मतदाता सूची में से 250 नागरिको की जूरी बुलायी जाये और पठान को इस जूरी के सामने पेश किया जाए। जूरी बहुमत से यह तय करेगी कि पठान का सार्वजनिक नार्को टेस्ट लिया जाना चाहिए या नहीं। यदि मुझे जूरी में आने का अवसर मिलता है तो मैं पठान से एक भी सवाल पूछे बिना इसका सीधा नार्को टेस्ट लेने की अनुशंषा करूँगा। ज्यादातर सम्भावना है कि नारको टेस्ट के इंजेक्शन में सोडियम पेंथानोल की दवाई भरी जा रही होगी उसी समय पठान सब कुछ बोलना शुरू कर देगा और सुई लगाने की नौबत नहीं आएगी।
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साथ ही मैं पठान पर निम्नलिखित दंड लगाने के लिए वोट करूँगा :
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(a) वारिस पठान पर उसकी संपत्ति का 20% आर्थिक दंड के रूप में वसूला जाए
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(b) 1 वर्ष का कारावास (यदि कोई साजिश नहीं पायी जाती है तो)
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(c) उसे जेल से छूटने के बाद अगले 3 माह तक किसी भी टीवी चेनल पर आने की अनुमति नहीं होगी
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(d) यदि यह बात सामने आ जाती है कि पठान को यह बयान देने के लिए किसने कहा था तो वारिस पठान की सजाएं 3 गुना हो जाएगी एवं सूत्रधार को भी यही सजाएं मिलेगी।
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पठान को यदि जूरी दण्डित कर देती है तो आप देखेंगे कि अगले दिन से भारत में कोई भी नेता साम्प्रदायिक तनाव भड़काने वाले बयान देने की हिम्मत नहीं दिखाएगा !!
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वारिस पठान द्वारा 3 मार्च 2019 को सलंग्न फ़ोटो पोस्ट की गयी थी !! साथ में PMP02 यानी संघ के नेता पियूष गोयल एवं डेविड फड़नवीस भी है।
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(i) पियूष गोयल, जिनका कहना है कि — ला इलाहा इल्ल्लाह.... रसूलउल्लाह ( कलमा ) मेरे दिल के बेहद करीब है, और रोज जब मैं पूजा करता हूँ तो यह कलमा अवश्य पढता हूँ !!
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37 सेकेण्ड का यह वीडियो देखें - <https://www.youtube.com/watch?v=c7V4lYk7lL4>;
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( मैं किसी के धार्मिक विश्वास में दखल नहीं करता, अत: मैं यहाँ उनके कलमा पढ़ने को मुद्दा नहीं बना रहा हूँ। मैं सिर्फ एक सूचना रख रहा हूँ। ताकि आम पाठक इससे सूचित रहे।)
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(ii) देवेन्द्र फड़नवीस ने जब से पेड मीडिया के प्रायोजको ( बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिक एवं मिशनरीज ) के निर्देश पर महाराष्ट्र के मंदिरों को टेक ओवर करना शुरू किया ताकि मंदिरों की संपत्ति बेचकर पैसा उगाया जा सके, तब से वे डेविड फड़नवीस के नाम से भी जाने जाते है। डेविड फड़नवीस ने महाराष्ट्र के 4,000 मंदिर ट्रस्टो की जमीन हथियाने के आदेश गेजेट में छापे थे
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<http://www.thehindu.com/news/cities/mumbai/state-govt-to-allow-sale-of-temple-land/article22407198.ece?fbclid=IwAR3soDokeiFKs8HXEztke96h_Q2Vl3EH0PDco9j17FWuPHkZG_uBJH16IoU>;
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इसके अलावा डेविड फड़नवीस ने मुख्यमंत्री रहते हुए मिशनरीज को आगे बढाने के लिए काफी प्रयास किये थे। उदाहरण, के लिए मुंबई में कोई आचार्य विकास मैसी कन्वर्जन के वर्क शॉप चला रहे थे, तो डेविड फड़नवीस ने अपने नेताओ को आदेश किये थे कि वे जनता को इस कार्यक्रम में शिरकत करने को कहे ताकि यीशु का सन्देश ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुँचाया जा सके।
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हालांकि अब मध्य प्रदेश में PMP01 के नेता कमलनाथ जब अपने प्रायोजको के निर्देश पर मंदिरों की जमीन हथिया रहे है तो PMP02 के नेता कमलनाथ के इस फैसले का विरोध कर रहे है !!
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<https://hindi.news18.com/news/madhya-pradesh/bhopal-kamal-nath-government-will-sell-temple-land-to-builders-mpmr-mpsg-2834104.html?fbclid=IwAR2UR4H9JcNbyEcjb0REweaSP2H1GKZ_J6R6HDp6UK1o7QTPV6q1PfI66LI>;
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[ टिप्पणी : फोटो में PMP10 के नेता वारिस पठान PMP02 के नेताओं के साथ नजर आ रहे है, किन्तु इस चित्र से मेरा आशय यह नहीं है कि, PMP02 के नेता डेविड फड़नवीस के कहने पर वारिस पठान ने यह बयान दिया है, या फिर वारिस पठान डेविड फड़नवीस के कंट्रोल में काम करते है। दरअसल, दोनों का प्रायोजक पेड मीडिया है, और वे सीधे पेड मीडिया के मालिको को ही रिपोर्ट करते है। इस तरह के बयान देने के लिए जजों पर कंट्रोल चाहिये। वर्ना जज पठान को 2 साल के लिए जेल में डाल देगा। हमारे जज भी सीधे पेड मीडिया के मालिको को रिपोर्ट करते है, अत: इस तरह की हरकत आदमी सिर्फ तभी कर सकता है, जब पेड मीडिया के प्रायोजक उसे निर्देश दें !! ]
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समाधान ?
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भारत के जिन कार्यकर्ताओ को हिन्दू-मुस्लिम तनाव भड़काने वाले इस सिलसिले को रोकने में रुचि है, उन्हें जूरी कोर्ट एवं सार्वजनिक नार्को टेस्ट के क़ानून को गेजेट में छपवाने को गंभीरता से लेना शुरू करना चाहिए। जूरी कोर्ट गेजेट में आने 24 घंटे के अंदर तनाव भड़काने वाला यह सारा तमाशा बंद हो जायेगा। क्योंकि तब आग लगाने वाले बयान देने वाले नेता जान जायेंगे कि अब उनके प्रायोजक उन्हें बचाने की क्षमता खो चुके है।
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पेड मीडिया पार्टियों का वारिस पठान के बयान पर स्टेंड :
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पेड मीडिया द्वारा प्रायोजित सभी पार्टियाँ एवं उनके नेता वारिस पठान को जूरी के सामने पेश किये जाने एवं उसका सार्वजनिक नार्को टेस्ट लेने के सख्त खिलाफ है। आपको यदि विश्वास न हो तो आप खुद उनके नेताओ से इस बारे में ट्विटर पर पूछ सकते है। वे यही कहेंगे कि न तो वारिस पठान को नागरिको की जूरी के सामने पेश किया जाना चाहिए और न ही उसका सार्वजनिक नार्को टेस्ट होना चाहिए !! उनका साफ़ स्टेंड है कि, वारिस पठान का मुकदमा जज ही सुनेगा।
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पेड मीडिया पार्टियों के सभी कार्यकर्ता एवं बुद्धिजीवी भी वारिस पठान के जूरी ट्रायल एवं सार्वजनिक नार्को टेस्ट के खिलाफ है। वे वारिस पठान को गालियाँ देंगे, और वारिस पठान के बयान का इस्तेमाल हिन्दुओ का खून गरम करने में करेंगे।
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दरअसल, आप आस पास नजर डालेंगे तो अपने चारो तरफ उन्ही लोगो को पायेंगे जो समाधान की अवहेलना करके इस तरह की घटनाओं का इस्तेमाल साम्प्रदायिक तनाव बढाने में कर रहे है !! और इनमे से कई लोगो को इस बात का अहसास तक नहीं है। और यही पेड मीडिया की ताकत है।
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( PMP = पेड मीडिया पार्टी। PMP01 - कोंग्रेस, PMP02 - संघ=बीजेपी , PMP03 - आम आदमी पार्टी, PMP10 - आल इण्डिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लमीन ( AIMIM )
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Feb 24 2020 11:04:05 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भारत में सर्वाधिक भिन्न प्रकार का राजनैतिक दल कौनसा है?
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वैसे लगभग सभी पार्टियों के नेता / कार्यकर्ता यह मानते है कि उनकी पार्टी सबसे भिन्न है। लेकिन RRP = Right To Recall Party जिस तरीके से काम करती है, मेरे विचार में यह भारत की सबसे अलग तरह की पार्टी है। यह पार्टी अच्छी है या बुरी है, यह बहस की बात है। लेकिन यह तय है कि स्वतंत्रता के बाद से अब तक जितनी भी पार्टियां हुयी है, यह उन सभी से बिलकुल अलग है।
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निचे मैंने RRP के संचालन, कार्य करने के तरीके एवं एजेंडे के बारे में कुछ मुख्य बिन्दुओ के बारे में बताया है, जो इसे भारत की अन्य राजनैतिक पार्टियों से अलग करते है।
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(1) पार्टी का फंड मैनेजमेंट :
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अन्य पार्टियों के उलट यह पार्टी केंद्रीय स्तर पर कोई पैसा इकट्ठा नहीं करती है। कोई बैंक एकाउंट भी नहीं है। RRP नकद में कोई चंदा भी नहीं लेती। बैंक एकाउंट नहीं होने के कारण पार्टी केन्द्रीय स्तर पर पैसो का कोई लेन देन नहीं करती है। यदि चुनाव आयोग आगे चलकर कोई ऐसा नियम बना देता है कि पार्टी को खाता खोलना अनिवार्य हो जाए तो बात अलग है।
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—यह पहला अंतर है। और पैसे को लेकर यह पार्टी एकदम अलग है।
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(2) प्रत्याशी द्वारा पैसा लेने का तरीका :
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यदि कोई व्यक्ति पार्टी के टिकेट पर चुनाव लड़ता है तो पार्टी न तो किसी भी रूप में उसे कोई आर्थिक सहायता देती है, और न ही किसी भी रूप में कोई आर्थिक सहायता लेती है। उम्मीदवार को खुद ही जमानत राशि देनी होती है, और खुद ही प्रचार के लिए पैसा जुटाना होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी प्रत्याशी को कोई आर्थिक सहयोग देना चाहते है तो स्थानीय स्तर पर जो कार्यकर्ता पार्टी की और से चुनाव लड़ते है उन्हें सहयोग कर सकते है।
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यदि कोई प्रत्याशी RRP की तरफ से चुनाव लड़ता है तो वह उम्मीदवारी दाखिल करने के बाद एक इलेक्शन एकाउंट खुलवाता है, और इस खाते को सार्वजनिक कर देता है। जो भी व्यक्ति अमुक प्रत्याशी को आर्थिक सहयोग करना चाहता है वह इस पर्सनल-इलेक्शन एकाउंट में अपनी जिम्मेदारी पर पैसा देगा, और प्रत्याशी खुद की जिम्मेदारी पर पैसा लेगा।
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इलेक्शन ख़त्म होने के बाद प्रत्याशी को इस खाते का स्टेटमेंट सार्वजनिक करना होता है। इलेक्शन ख़त्म होने के 1 महीने के भीतर यह एकाउंट बंद कर दिया जाता है, और हिसाब सार्वजनिक कर दिया जाता है। पार्टी का इस पर्सनल एकाउंट से कोई ताल्लुक नहीं होता है, यदि कोई प्रत्याशी इसमें से रुपया खा गया है तो पार्टी की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। इसमें पार्टी का नियम है कि -- नागरिक खुद की जिम्मेदारी पर प्रत्याशी को पैसा देवे।
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—यह दूसरा बड़ा अंतर है। इस पार्टी एवं इसके उम्मीदवार के बीच पैसो का लेन देन करने का कोई सिस्टम नहीं है।
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(3) पार्टी का संगठनात्मक ढांचा :
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पार्टी में सभी सदस्यों की हैसियत समान है, और सीनियर-जूनियर के आधार पर किसी भी व्यक्ति को कोई भी अतिरिक्त तवज्जो नहीं दी जाती। पार्टी या पार्टी के पदाधिकारीयों द्वारा सिर्फ सुझाव जारी किये जाते है, निर्देश नहीं। पार्टी द्वारा जारी सुझावो को पार्टी सदस्य मान भी सकते है, और नहीं भी मान सकते है। पार्टी का कोई सदस्य किसी भी अन्य सदस्य को कोई भी निर्देश नहीं दे सकता। सिर्फ सुझाव दे सकता है।
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RRP भारत की एक मात्र पार्टी है जिसमें पार्टी का अध्यक्ष पार्टी के सदस्यों द्वारा सीधे मतदान द्वारा चुना जाता है, और पार्टी के सदस्य किसी भी समय इन्हें निकालने के लिए मताधिकार का प्रयोग कर सकते है। पार्टी का कोई भी सदस्य अध्यक्ष बनने के लिए उम्मीदवारी कर सकता है, और चुनाव जीत कर पार्टी का अध्यक्ष बन सकता है।
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—पार्टी अध्यक्ष को निकालने का अधिकार पार्टी के सामान्य सदस्यों के पास होना तीसरा बड़ा अंतर है। ऐसा भारत की किसी भी पार्टी में नहीं होता है।
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(1.1) पार्टी के मतदाता सदस्यों को पीएम को उन कानूनों को गैजेट में छापने के निर्देश भेजने होते है जिनका वह समर्थन करता है। इससे सदस्य को पॉइंट्स मिलते है। इन पॉइंट्स के आधार पर मेंबर का मतदान भार बढ़ता है। अभी पॉइंट सिस्टम पूरी तरह से बना नहीं है, इसे बनाया जा रहा है। निचे पॉइंट्स जनरेट होने का एक संभावित विवरण दिया गया है, जो कि अंतिम नहीं है।
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(1.1.1) पोस्टकार्ड भेजने और इसकी फोटो कॉपी रखने पर 1 पॉइंट
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(1.1.2) FBCPBA का 1 पॉइंट्स प्रति सप्ताह
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(1.1.3) my letter to pm रजिस्टर बनाने के लिए 10 पॉइंट्स
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(1.1.4) पार्षद / सरपंच का चुनाव लड़ने पर 100 पॉइंट्स

(1.1.5) विधायक का चुनाव लड़ने पर 400 पॉइंट्स

(1.1.1) सांसद का चुनाव लड़ने के लिए 1000 पॉइंट्स

चुनावी प्रत्याशी को दान देने पर प्रत्याशी को जो वोट मिलते है, उसके हिसाब से प्रत्याशी को अतिरिक्त पॉइंट्स मिलते है। प्रत्याशी अपने दान दाताओं को इन पॉइंट्स में आनुपातिक रूप से पॉइंट्स ट्रांसफर कर सकता है। इसके अलावा विज्ञापन देने एवं विज्ञापनों के लिए अनुदान देने के लिए भी पॉइंट्स मिलते है।
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(4) पार्टी की सदस्यता एवं निष्कासन :
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सदस्यता : पार्टी की सदस्यता नि:शुल्क एवं स्वैच्छिक है। कोई भी व्यक्ति खुद को बिना किसी से पूछे RRP का सदस्य घोषित कर सकता है, और किसी भी समय RRP की सदस्यता स्वैच्छिक रूप से छोड़ सकता है। खुद को RRP का मेंबर कहने के साथ ही उसे पार्टी से सम्बंधित सभी मामलो में बोलने और पार्टी की और से व पार्टी के लिए काम करने के राइट्स मिल जाते है।
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निष्कासन : एक बार सदस्य बनने के बाद पार्टी सदस्य को किसी भी तरह से निष्काषित नहीं कर सकती है। पार्टी के पास अनुशासन सम्बन्धी कार्यवाही करने के भी कोई अधिकार नहीं है। यदि कोई सदस्य पार्टी के टिकेट पर लड़ रहे उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार करता है, या किसी अन्य पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ता है, या पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष आदि के खिलाफ किसी भी स्तर की आलोचना या खुला विरोध करते है, तब भी किसी भी सदस्य को पार्टी से निकाला नही जा सकता। जो व्यक्ति पार्टी में सदस्य बन गया वह खुद इस्तीफा देगा तो ही पार्टी से निकाला जाएगा।
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—सभी पार्टियों में निष्कासन के नियम होते है। लेकिन इस पार्टी में नहीं है।
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(5) पार्टी की मीटिंग एवं बैठके :
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पार्टी राष्ट्रिय एवं राज्य स्तर पर कभी कोई मीटिंग आयोजित नहीं करती है। सभी लोगो को अपने स्तर पर एक इकाई के रूप में काम करना होता है। टीम वर्क का सिस्टम यहाँ नहीं है। पार्टी कोई भी नीति बनाकर कार्यकर्ताओ को नहीं देती, न ही कोई रणनीति या पार्टी लाइन देती है। प्रत्येक सदस्य को प्रचार के लिए खुद ही नीति बनानी होती है, और खुद ही काम करना होता है।
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5.1. स्थानीय स्तर पर मीटिंग : पार्टी के कार्यकर्ता आपसी संवाद के लिए कोई मीटिंग वगेरह करना चाहते है तो वे स्थानीय स्तर पर मीटिंग वगेरह रख सकते है। स्थानीय स्तर की इस मीटिंग के लिए नियम एकदम स्पष्ट एवं अपरिवर्तनीय है :
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(i) ऐसी मीटिंग सिर्फ महीने के दुसरे रविवार यानी 2nd Sunday को प्रात: 10 बजे ही की जा सकती है।
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(ii) यह मीटिंग अनिवार्य रूप से सार्वजनिक स्थल पर ही रखी जानी चाहिए। इसके लिए कार्यकर्ता कोई मंदिर / रेलवे-बस स्टेशन / शेड / पार्क परिसर आदि चुन सकते है।
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(iii) यदि एक बार कोई सार्वजानिक परिसर तय हो जाता है तो फिर उस स्थान को किसी भी सूरत में बदला नहीं जा सकता है। फिर वह स्थान हमेशा के लिए तय हो जाएगा ।
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(iv) दुसरे रविवार के अतिरिक्त अन्य दिनों में कार्यकर्ता निजी स्थलों पर मीटिंग वगेरह रख सकते है, किन्तु पार्टी की ऑफिशियल मीटिंग महीने के द्वितीय रविवार को सार्वजनिक स्थल पर ही होती है।
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—इस पार्टी का सेट अप ऐसा है कि इसकी मीटिंग वगैरह खुद होती है। अध्यक्ष या अन्य पदाधिकारी मीटिंग न तो बुला सकते है, और न ही किसी मीटिंग को रोक सकते है। अन्य सभी पार्टियों में मीटिंग वगैरह के बारे में आला अधिकारी तय करते है।
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(6) पार्टी का मुख्य प्रतिद्वंदी :
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RRP बुनियादी रूप से भारत की किसी भी पार्टी / नेता के खिलाफ नहीं है। RRP के कई सदस्य एवं कार्यकर्ता देश की विभिन्न राजनैतिक पार्टियों एवं संगठनो में भी जुड़े हुए है। RRP में काम करने के लिए उन्हें उन पार्टियों को छोड़ना नहीं होता है, अत: RRP का अन्य राजनैतिक दलों से कोई प्रतिरोध नहीं। RRP का मुख्य और एक मात्र प्रतिद्वंदी पेड मीडिया है। RRP के कार्यकर्ता सिर्फ पेड मीडिया के खिलाफ काम करते है। RRP के कार्यकर्ताओ का लक्ष्य पेड मीडिया को विदेशी कम्पनियों के नियंत्रण से मुक्त करवाना है।
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(7) प्रचार का विकेन्द्रित तरीका :
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पार्टी के कार्यकर्ता प्रचार के लिए विकेन्द्रित तरीको का प्रयोग करते है, अत: प्रचार में पेड मीडिया का इस्तेमाल नहीं किया जाता। पेड मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ विज्ञापन देने में किया जाता है। विकेन्द्रित तरीको में पर्चे बांटना, बैनर लगाना, नागरिक सभाएं करना, सोशल मीडिया आदि शामिल है।
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जब भी कोई व्यक्ति RRP के संपर्क में आता है तो सबसे पहले उसे पार्टी के सदस्य द्वारा लिखित में निम्नलिखित सूचना दी जाती है :
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"यदि आप RRP के बारे में किसी भी टीवी/ अख़बार आदि में कोई खबर/ सूचना /विश्लेष्ण आदि देखें और यदि यह विज्ञापन के रूप में नहीं है, तो हमारा सुझाव है कि इसे गंभीरता से न ले और इसकी साफ़ तौर पर अवहेलना करें। पार्टी के सदस्य अपनी गतिविधियों आदि के बारे में सूचनाएं प्रकाशित कराने के लिए समाचार पत्रों के दफ्तरों में जाकर लॉबीइंग नहीं करते है। अत: यदि पेड मीडिया RRP के बारे में अच्छी खबरें प्रकाशित करता है, तब भी इस पर ध्यान न दें। हम नागरिको तक पहुँचने और संवाद करने के लिए कार्यकर्ताओं के विकेन्द्रित नेटवर्क का ही इस्तेमाल करते है। हालांकि यह तरीका धीमा है, पर हम इसी तरीके में मानते है।"

—यह सबसे बड़ा एवं निर्णायक अंतर है जो इस पार्टी को एकदम अलग कर देता है। सभी पार्टियां प्रचार के लिए पेड मीडिया का इस्तेमाल करती है। किन्तु यह पार्टी अख़बारों / टीवी से दूरी बनाकर रखती है।
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(8) पार्टी का एजेंडा :
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RRP के कार्यकर्ता किसी भी प्रकार की घोषणाओं एवं अस्पष्ट वादों में नहीं मानते है, बल्कि सिर्फ कानून ड्राफ्ट में मानते है। अत: पार्टी के मेनिफेस्टो में सिर्फ क़ानून ड्राफ्ट है, और क़ानून ड्राफ्ट के अलावा कुछ नहीं है। राईट टू रिकॉल पार्टी किसी भी प्रकार की विचारधारा में भी नहीं मानती है, सिर्फ क़ानूनड्राफ्ट धारा में मानती है। पार्टी के कार्यकर्ताओ एवं पार्टी का मूल उद्देश्य इन क़ानून ड्राफ्ट्स की जानकारी नागरिको तक पहुँचाना है ताकि इन्हें गेजेट में छपवाने के लिए मांग खड़ी की जा सके।
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—भारत की किसी भी पार्टी के मेनिफेस्टो में आपको वादे के रूप में क़ानून ड्राफ्ट्स नहीं मिलेंगे। RRP के मेनिफेस्टो में देश की विभिन्न समस्याओ का समाधान करने वाले 100 से ज्यादा कानून ड्राफ्ट्स है।
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(9) RRP का मुख्य लक्ष्य :
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RRP के कार्यकर्ताओ का मुख्य लक्ष्य भारत की सेना को अमेरिका के बराबर ताकतवर बनाना है। RRP के सभी क़ानून ड्राफ्ट्स इसी आदर्श को सामने रखकर लिखे गए है।
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—भारत की किसी भी पार्टी के एजेंडे में स्वदेशी हथियारों का उत्पादन करके सेना को आत्मनिर्भर बनाने का बिंदु शामिल नहीं है।
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(10) RRP की कार्य शैली :
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RRP के कार्यकर्ता एवं सदस्य पार्टी के नाम का प्रचार नहीं करते है। वे सिर्फ क़ानून ड्राफ्ट का प्रचार करते है। पार्टी के कार्यकर्ताओ का उद्देश्य सिर्फ कानूनों की मांग आगे बढ़ाना है। यदि कोई नागरिक RRP द्वारा प्रस्तावित कानूनों से सहमत है तो वह खुद अपने संसाधनों से अमुक कानूनों का प्रचार करना शुरू कर देता है।
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व्यक्ति को इसके लिए खुद ही काम करना होता है। न तो पार्टी कभी किसी को कोई काम करने के लिए बताती है, और न ही उन्हें काम करने से रोकती है। RRP के सदस्य सार्वजनिक मंचो पर रेंडमली सूचनांए एवं क़ानून ड्राफ्ट्स रखते रहते है। जिसे इनमे रुचि होती है वह अपनी तरफ से काम करना शुरू कर देता है। बस इसी तरह से लोग खुद आते है और अपनी मर्जी से क़ानून ड्राफ्ट्स की मांग को आगे बढ़ाते रहते है।
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—RRP पूरी तरह से विकेन्द्रित तरीके से काम करती है। केंद्रीय नियंत्रण शून्य है। आम नागरिक ही इसे चलाते है। इस पार्टी में कोई भी बड़ा ( ब्रांडेड ) आदमी नहीं है। सभी छोटे छोटे लोग मिलकर अपने खर्चे से पार्टी चला रहे है। और कौन कार्यकर्ता कितना काम कर रहा है, इसका भी कोई हिसाब नहीं।
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सार रूप में इस पार्टी की निम्नलिखित चीजे इसे अन्य पार्टियों से अलग करती है :
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(a) इस पार्टी में नेता नहीं होते, सभी कार्यकर्ता होते है।
(b) यह पार्टी एकता एवं जाया अनुशासन में नहीं मानती है।
(c) टीम वर्क में नहीं मानती है। हर कार्यकर्ता को एकल सदस्यीय टीम के रूप में काम करना होता है।
(d) संगठन को बड़ा करने में भी नहीं मानती है।
(e) इस पार्टी के पास कोई विचारधारा भी नहीं है।
(f) इस पार्टी के पास केन्द्रीय स्तर पर कोई रणनीति नहीं है। हर कार्यकर्ता को खुद ही रणनीति बनाकर काम करना पड़ता है।
(g) केन्द्रीय स्तर पर पैसे का लेनदेन शून्य है।
(h) नागरिको तक पहुँचने के लिए मीडिया का इस्तेमाल नहीं करती है।
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अत: इस पार्टी के काम करने का ढंग भारत की मौजूदा सभी पार्टियों से एकदम भिन्न है।
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RRP द्वारा प्रस्तावित मुख्य क़ानून ड्राफ्ट्स : <https://drive.google.com/drive/folders/1254e-5YvhuQWzT8lz6krz7NBAMQHHxPv>;
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राज्यों के लिए ड्राफ्ट्स - <https://drive.google.com/drive/folders/1tLvPx0aSZ8sJuNDVboRzNh324rlOq4Li>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Feb 26 2020 16:42:58 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Ganapati appears as Subhas Chandra Bose in this 1946 British Pathe (News from 1910-1970) video of Ganesh Chaturthi in Mumbai. This was in the wake of the INA trials and RIN mutiny.
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Freedom came due to efforts of Rashtrapita Ahimsamurti Mahatma Subhash Chandra Bose and Ahimsamurti Mahatma Udham Singh, Ahimsamurti Mahatma Bhagat Singh , Ahimsamurti Mahatma Chandrashekhar Azad , Ahimsamurti
Mahatma Veer Savarkar etc
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Not because of Mahaduratma Gandhi , Jawaharlal Ghazi, Vallabhbhai Patel, Lal Bahadur Shahstri , Hegadewar etc

Nationalist Proud Bhakt:

Ganapati appears as Subhas Chandra Bose in this 1946 British Pathe (News from 1910-1970) video of Ganesh Chaturthi in Mumbai. This was in the wake of the INA trials and RIN mutiny.

What bigger proof do you need to understand that it was Netaji who led us to freedom, not ahimsa?

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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Feb 26 2020 16:56:52 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

NRCI ; प्रस्तावित भारतीय राष्ट्रिय नागरिकता रजिस्टर अधिनियम
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( Proposed NRCI ; National Register for Citizens of india )
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NRCI का सार : इस क़ानून में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर ( National Register for Citizens of india) बनाने की प्रक्रिया दी गयी है। गेजेट में प्रकाशित होने के साथ ही नागरिकता रजिस्टर बनने की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी। विभिन्न सरकारी एजेंसियों के अनुसार भारत में लगभग 2 करोड़ अवैध आर्थिक विदेशी ( illegal migrant ) निवास कर रहे है। इन अवैध विदेशियों में प्रताड़ित शरणार्थी भी है, और आर्थिक अवसरों की तलाश में आये विदेशी ( illegal economic migrant ) भी है। इस प्रस्तावित क़ानून में, कौन अवैध आर्थिक विदेशी है और कौन प्रताड़ित शरणार्थी है, इस बारे में अंतिम फैसला नागरिको की जूरी करेगी। यह क़ानून ड्राफ्ट निम्नलिखित कार्य करेगा :
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(1) अवैध आर्थिक विदेशीयों ( illegal economic migrant ) को चिन्हित करके उन्हें भारत से निष्कासित करेगा।
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(2) प्रताड़ित शर्णार्थियो ( Persecuted refugee ) को शरण देगा।
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(3) देश व्यापी नागरिकता रजिस्टर बनाएगा ।
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गृह मंत्री श्री अमित शाह ने भरोसा दिलाया है कि जल्दी ही वे देश व्यापी NRC का ड्राफ्ट लायेंगे। किन्तु जब तक सरकार देश व्यापी NRC का ड्राफ्ट सामने नहीं रखती, तब तक हम इस बारे में कोई अनुमान नहीं लगा सकते कि इसमें क्या प्रावधान होंगे। असम में NRC का जो ड्राफ्ट लागू किया गया था उसमें असम राज्य के लिए विशेष प्रावधान थे, अत: असम का NRC ड्राफ्ट पूरे भारत में लागू नहीं किया जा सकता है। प्रस्तावित NRCI इस कमी को पूरा करता है। इस क़ानून को मनी बिल / धन विधेयक के रूप में लोकसभा से पास करके गेजेट में छापा जा सकता है। #NRCI , #P20180436121
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यदि आप NRCI बनाने का समर्थन करते है तो पीएम को एक पोस्टकार्ड भेजे। पोस्टकार्ड में यह लिखे :
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प्रधानमंत्री जी, कृपया राष्ट्रिय नागरिकता रजिस्टर बनाने के लिए प्रस्तावित NRCI क़ानून गेजेट में छापे - #NRCI , #P20180436121
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--------क़ानून ड्राफ्ट का प्रारम्भ--------
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इस कानून में 2 खंड है :
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(i) नागरिको के लिए निर्देश
(ii) अधिकारियों एवं नागरिको के लिए निर्देश
(iii) टिप्पणियाँ इस क़ानून का हिस्सा नहीं है। नागरिक एवं अधिकारी टिप्पणियों का इस्तेमाल दिशा निर्देशों के लिए कर सकते है।
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भाग (I) : नागरिकों के लिए सामान्य निर्देश
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(1) यह क़ानून गेजेट में आने साथ ही पूरे भारत में लागू होगा।
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स्पष्टीकरण : असम के NRC में काफी विसंगितियाँ एवं कमियां थी, अत: असम में भी यह रजिस्टर बनाया जायेगा। उदाहरण के लिए असम का NRC न तो अवैध रूप से रह रहे आर्थिक विदेशियों को चिन्हित करता है, और न ही उन्हें डिपोर्ट करने की कोई व्यवस्था देता है।
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(2) इस क़ानून के गेजेट में प्रकाशित होने के बाद आपको पटवारी कार्यालय में जाकर एक NRCI फॉर्म भरना होगा। फॉर्म में आप निम्नलिखित जानकारियां देंगे – अपना एवं अपने रिश्तेदारों का वोटर आई डी नंबर, आधार नंबर एवं जन्म का वर्ष। राष्ट्रिय नागरिकता रजिस्ट्रार एक मोबाईल एप भी जारी करेगा ताकि आप NRCI फॉर्म ऑनलाइन भी भर सके।
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(2.1) यदि आपके पास वोटर आई डी एवं आधार नंबर नहीं है तो आप राशन कार्ड नंबर, पैन कार्ड नंबर, ड्राइविंग लाइसेंस या मनरेगा कार्ड नंबर लिखकर भी फॉर्म भर सकते है।
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(2.2) रिश्तेदारो में शामिल है - आपके माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, सगे भाई-बहन एवं संताने। यदि आपके किसी रिश्तेदार की मृत्यु हो चुकी है, तब भी आप इस बारे उतनी जानकारी देंगे जितनी आपको ज्ञात है।
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(2.3) यदि आपको अपने अन्य रिश्तेदारों की वोटर आई डी मालूम नहीं है तो आप सिर्फ अपना वोटर आई डी नंबर लिखकर भी फॉर्म भर सकते है।
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(2.4) फॉर्म जमा करते समय आपको वोटर आई डी या आधार कार्ड में से किसी एक कार्ड की फोटो कॉपी फॉर्म के साथ देनी होगी।
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(2.5) अवयस्क संतानों का नाम जब फॉर्म में लिखा जाएगा तो अवयस्क संतान का आधार कार्ड नंबर लिखना अनिवार्य होगा। यदि अवयस्क का आधार कार्ड नहीं है, तो आप आधार कार्ड बनवा सकते है।
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(3) NRCI फॉर्म में दी गयी किसी भी जानकारी के बारे में यदि कोई विवाद है तो मामले की सुनवाई नागरिको की जूरी द्वारा की जायेगी। जूरी मंडल का चयन वोटर लिस्ट में से लॉटरी द्वारा किया जाएगा । यदि लॉटरी में आपका नाम निकल आता है तो आपको जूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है। जूरी में आकर आपको आरोपी, पीड़ित, गवाहों व दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा प्रस्तुत सबूत देखकर बहस सुननी होगी और सजा / जुर्माना या रिहाई का फैसला देना होगा।
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(4) यदि आपका नाम वोटर लिस्ट में है, और आप इस क़ानून की किसी धारा में कोई आंशिक या पूर्ण परिवर्तन चाहते है, तो अपने जिले के कलेक्टर कार्यालय में इस क़ानून की धारा (15.1) के तहत एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकते है। कलेक्टर 20 रू प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर शपथपत्र स्वीकार करेगा, और इसे स्कैन करके प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर सार्वजनिक करेगा।
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[ टिप्पणी 1 : NRCI के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न :
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1a. क्या NRCI फॉर्म भरना अनिवार्य होगा ?
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हाँ। यह प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य होगा। यदि आप NRCI फॉर्म नहीं भरते है तो आपका नाम “सत्यापित नहीं” की सूची में डाला जा सकता है, और बाद में यह संदिग्धों की सूची में भी जा सकता है। यदि आपका नाम संदिग्धों की सूची में आ जाता है तो आपको नागरिको के जूरी मंडल के सामने पेश होना पड़ सकता है।
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1b. यदि मेरे पास वोटर आई डी एवं आधार कार्ड नहीं है तो मेरे पास क्या विकल्प है ?
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तब आप वोटर कार्ड या आधार कार्ड बनवा कर नागरिकता रजिस्टर में अपना नाम जुड़वा सकते है, या लाइसेंस नंबर, मनरेगा कार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड के आधार पर भी NRCI फॉर्म भर सकते है ।
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1c. क्या रिश्तेदारों के वोटर कार्ड नंबर आदि के बारे जानकारी देना अनिवार्य है ?
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आपको उतनी ही जानकारी देनी है, जितनी जानकारी आपके पास है। यदि आपके पास जानकारी नहीं है तो आप NRCI फॉर्म के कॉलम में “जानकारी नहीं है” लिख सकते है। जानकारी नहीं देने पर आप पर कोई मामला नहीं बनाया जाएगा, किन्तु यदि आप जानबूझकर गलत जानकारी देते है, तो जूरी आपको समन भेज सकती है, और दोषी पाए जाने पर आप पर दंड भी लगा सकती है।
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1d. नागरिकता रजिस्टर में आने के लिए मुझे कौनसे कागज दिखाने होंगे ?
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NRCI की प्रक्रिया वोटर आई डी नंबर एवं आधार कार्ड पर आधारित है । अत: आपको NRCI फॉर्म के साथ अपनी वोटर आई डी / आधार कार्ड / राशन कार्ड में से किसी दस्तावेज की फोटो कॉपी देनी होगी। किन्तु आपको अपने रिश्तेदारों आदि के सिर्फ नाम, वोटर आई डी नंबर आदि लिखकर देने है, किन्तु अपने रिश्तेदारों की वोटर आई डी की फोटो कॉपी आदि नहीं देनी होगी।
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1e. यदि मुझे पढना लिखना नहीं आता है तो मैं NRCI फॉर्म कैसे जमा करूँगा ?
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इसके लिए NRCI एजेंट होंगे। NRCI एजेंट को 1 फॉर्म भरने के लिए सरकार 30 रू देगी। अत: वे स्वयं आप तक पहुंचेंगे और आपका फॉर्म भरवाकर पटवारी कार्यालय में दाखिल कर देंगे।
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1f. NRCI की जरूरत क्यों है ?
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भारत में लगभग 2 करोड़ के लगभग अवैध आर्थिक विदेशी निवासी (illegal economic imigrant) रह रहे है। असम, बंगाल, पूर्वोत्तर के अलावा ये पूरे भारत में फैले हुए है। इनमे से ज्यादातर अवैध विदेशी निवासी पिछले 30 सालों के दौरान भारत में आये है। इस वजह से भारत के संसाधनों पर भार बढ़ रहा है, और ये हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा है। इन अवैध विदेशी निवासीयों में से कई समूह हिंसक अपराधो एवं तस्करी आदि में भी लिप्त है। यदि पाकिस्तान एवं चीन इन्हें बंगलादेशी सीमा के माध्यम से हथियार भेजना शुरु कर देते है तो ये अवैध विदेशी निवासी भारत में एक हिंसक गृह युद्ध शुरू कर सकते है। अत: इन्हें चिन्हित करके भारत से बाहर भेजना देश की सुरक्षा के लिए बहुत जरुरी है। CAA एवं असम में किये गए NRC ने इस समस्या का समाधान नहीं किया है, बल्कि इस तरह की धारणा खड़ी कर दी है, कि इस समस्या को सुलझा लिया गया है। अत: INRC को लागू अविलम्ब लागू किया जाना बेहद जरुरी है। ]
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भाग (II) : अधिकारियों के लिए निर्देश :
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(5) प्रधानमंत्री एक राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्ट्रार की नियुक्ति करेंगे, जिसे राष्ट्रिय नागरिकता रजिस्टर अधिकारी ( NCRO ) कहा जाएगा। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार सभी राज्यों में राज्य नागरिकता रजिस्ट्रारों (SNRO) की नियुक्ति करेगा। राष्ट्रिय रजिस्ट्रार प्रधानमंत्री की अनुमति से जिला कलेक्टरों को जिला रजिस्ट्रार के रूप में नियुक्त कर सकता है, या इच्छित जिलो में अलग से जिला रजिस्ट्रारो की नियुक्ति भी कर सकता है। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार अस्थायी तौर पर अधिकतम 2 वर्षों के लिए केंद्र / राज्य सरकार से वांछित अधिकारियों को डेपुटेशन पर नियुक्त कर सकते है, या प्रति नियुक्ति पर केंद्र या राज्य सरकार से अधिकारी ले सकते है। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार एवं उसका स्टाफ वोट वापसी एवं जूरी मंडल के दायरे में होगा। ( वोट वापसी की प्रक्रिया देखने के लिए कृपया धारा 14 देखें )
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(6) दसवीं कक्षा पास किया हुआ कोई भी मतदाता जिला कलेक्टर कार्यालय में NRCI एजेंट बनने के लिए आवेदन कर सकेगा।
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(6.1) NRCI एजेंट को 3 दिवसीय शिविर में NRCI फॉर्म भरने आदि की जानकारी का प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि वह अन्य नागरिको को फॉर्म भरने में सहायता कर सके। जिला कलेक्टर तहसील पंचायत समिती में इसका शिविर आयोजित कर सकता है।
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(6.2) NRCI एजेंट नागरिको के फॉर्म भरकर पटवारी कार्यालय में जमा करवा सकेगा, एवं NRCI एजेंट को जमा कराये गए प्रत्येक फॉर्म के लिए राष्ट्रिय रजिस्ट्रार की तरफ से 30 रू की दर से भुगतान किया जाएगा।
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[ टिप्पणी 2 : NRCI रजिस्टर बनाने का कार्य पूरी कार्यकुशलता एवं इमानदारी से से हो इसके लिए राष्ट्रीय नियंत्रण अधिकारी एवं उसके अधिकारी को वोट वापसी एवं जूरी मंडल के दायरे में किया गया है। यदि नागरिक यह पाते है कि NCRO पक्षपातपूर्ण ढंग से काम कर रहा है तो तो वोट वापसी प्रकिया का प्रयोग करके उसे निकालकर किसी अन्य व्यक्ति को यह पद देने के लिए अपनी स्वीकृति दर्ज करवा सकेंगे। ]
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(7) NRCI फॉर्म की स्क्रूटिनी एवं सत्यापन :
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(7.1) रजिस्ट्रार NRCI फॉर्म में दी गयी जानकारियों को नत्थी करके नागरिकता रजिस्टर सूची का निर्माण करेगा, और इसे सार्वजनिक करेगा। जो सूची सार्वजनिक की जायेगी उसमें नागरिक के सिर्फ वोटर आई डी नंबर होंगे, आधार नंबर नहीं। किसी भी नागरिक का आधार नंबर सार्वजनिक नहीं किया जायेगा। सूची में व्यक्ति के रिश्तेदारों के नाम एवं उनके वोटर आई डी नंबर आदि को इस तरह समूहीकृत( ग्रुपिंग) किया जाएगा कि, व्यक्ति के रिश्तेदारों को आसानी से चिन्हित किया जा सके। यह सूची निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत हो सकेगी :
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(7.1.1) प्रमाणिक सूची : जिन नागरिको के रिश्तेदारों का मिलान हो चुका है, एवं उपलब्ध जानकारी पूर्ण एवं पर्याप्त है, सूची में उनके नाम के आगे प्रमाणित या सत्यापित या Verified चिन्हित किया जायेगा।
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(7.1.2) अप्रमाणिक सूची : जिन नागरिको ने गलत जानकारी दी है, या रजिस्ट्रार द्वारा मांगे जाने पर भी सही जानकारी नहीं दी है, या रजिस्ट्रार को प्रथम दृष्टया लगता है कि जानकारी पर्याप्त नहीं है, तो रजिस्ट्रार सूची में उन नागरिको के आगे “सत्यापित नहीं” या “Unverified” शब्द अंकित करेगा।
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[ टिप्पणी 3 : मान लीजिये कि, X ने अपने फॉर्म में अपने माता-पिता, भाई एवं पत्नी का वोटर आई डी नंबर / आधार नंबर दर्ज किया है, तो रजिस्ट्रार यह मिलान करेगा कि क्या X के भाई ने भी अपने फॉर्म में X के बारे में यही सूचना दी है। इस तरह फॉर्म में रिश्तेदारों के बारे में दी गयी सभी जानकारियों का आपस में मिलान करके प्रमाणिक श्रेणी बनायी जायेगी।]
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(7.2) जिन नागरिको के रिश्तेदारों का मिलान नहीं हुआ है, या उनके द्वारा दी गयी जानकारी अधूरी होने के कारण उनके नाम प्रमाणित सूची में आने से रह गए है, रजिस्ट्रार उन्हें नोटिस भेजेगा कि वे फिर से NRCI फॉर्म भरकर अपने पटवारी कार्यालय में जमा करे। नागरिक इस फॉर्म में अपने एवं अपने रिश्तेदारों के बारे में वे सूचनाएं भी दे सकता है, जो उसने पूर्व में नहीं दी थी।
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(8) यदि कोई नागरिक पाता है कि सार्वजनिक की गयी सूची में किसी नागरिक एवं उनके रिश्तेदारों के बारे में गलत जानकारी रखी गयी है, तो वह इसकी सूचना या शिकायत रजिस्ट्रार को दे सकता है। सूची में जिन नागरिको के नाम के सामने Unverified दर्ज किया गया है वे जिला कलेक्टर कार्यालय, तहसील कार्यालय या पटवारी कार्यालय में फिर से NRCI फॉर्म भरकर दे सकते है, ताकि उन्हें सत्यापित करके प्रमाणिक सूची में डाला जा सके।
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(9) अवैध आर्थिक विदेशीयों (illegal economic migrant) को चिन्हित करना :
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(9.1) प्रधानमंत्री दूरसंचार विभाग को आदेश करेंगे कि वह राष्ट्रीय रजिस्ट्रार को पिछले 2 वर्षों में बांग्लादेश से किये गए, और बांग्लादेश को किये गए सभी फ़ोन कॉल्स की सूची दे। इस विवरण का उपयोग करके राष्ट्रीय रजिस्ट्रार संदिग्धों की सूची बनाएगा।
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(9.2) राष्ट्रीय रजिस्ट्रार बांग्लादेश में एजेंटों की नियुक्ति करेगा। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार अपने एजेंटों से भारत में रह रहे संदिग्धों के बांग्लादेश में निवास कर रहे रक्त संबंधियों के ब्लड ग्रुप और डीएनए नमूनों की जानकारी जुटाने के लिए कहेगा। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार एजेंटों से ऐसे दस्तावेज जुटाने के लिए भी कहेगा, जो संदिग्धों के बांग्लादेशी मूल का होना प्रमाणित करें।
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(9.3) कोई भी भारतीय नागरिक भारत में रह रहे अवैध आर्थिक विदेशी संदिग्धों की सूची राष्ट्रिय रजिस्ट्रार को निजी या सार्वजनिक रूप से दे सकता है, और उसे ये सूची संदेह के आधार पर घटते क्रम में बनाकर प्रस्तुत करनी होगी। यदि व्यक्ति द्वारा दी गयी जानकारी सही पायी जाती है, तो राष्ट्रीय रजिस्ट्रार उस व्यक्ति की इच्छानुसार उसे निजी या सार्वजनिक रूप से पारितोषिक दे सकता है।
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(9.4) यदि कोई बांग्लादेशी या पाकिस्तानी यह दावा करता है कि अमुक संदिग्ध उसका रिश्तेदार है, और यदि वह सत्यता की जांच करने के लिए अपना डीएनए सेम्पल देता है, और यदि डीएनए मिलान द्वारा यह सिद्ध हो जाता है कि, भारत में अवैध रूप से रह रहा अमुक विदेशी निवासी उसका रिश्तेदार है, तो राष्ट्रिय रजिस्ट्रार डीएनए मिलान के लिए रक्त नमूना देने वाले व्यक्ति को 1 लाख रूपये का पारितोषिक देगा।
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(9.5) राष्ट्रीय रजिस्ट्रार संदिग्धों के नाम, चित्र और अन्य जानकारी सरकारी वेबसाइट पर रखेगा, और उनके बांग्लादेशी रिश्तेदारों के नाम और अन्य जानकारी देने के लिए सभी से निवेदन करेगा।
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(9.6) उपरोक्त प्रक्रिया का पालन करके राष्ट्रीय रजिस्ट्रार उन संदिग्धों की सूची तैयार करेगा, जिनके अवैध विदेशी निवासी होने पर वह आश्वस्त है।
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(10) जूरी द्वारा सुनवाई ; अवैध विदेशी निवासी एवं प्रताड़ित शरणार्थी का निर्णयन
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(10.1) प्रत्येक संदिग्ध की सुनवाई के लिए राष्ट्रीय रजिस्ट्रार 30 से 55 वर्ष की आयु के मध्य के 100 मतदाताओं को 5 विभिन्न जिलो से चुनेगा । प्रथम जिला वह होगा जो उस जिले से सबसे निकट है, जहाँ से संदिग्ध पकड़ा गया है और जहाँ बांग्लादेशी जनसँख्या 10% से कम भी है। किसी जिले में अवैध विदेशी निवासियों की संख्या का प्रतिशत राष्ट्रीय रजिस्ट्रार अपनी जानकारी के आधार पर तय करेगा । अन्य 4 जिलें प्रथम जिले के निकटतम 4 जिलों में से होंगे और प्रत्येक जिले में अवैध आर्थिक विदेशी निवासीयों की जनसँख्या 10% से कम होनी चाहिए ।
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(10.1.1) राष्ट्रीय रजिस्ट्रार हर जिले से यादृच्छिक रूप से ( लॉटरी द्वारा ) 20 मतदाताओं को चुनेगा। मतदाताओ को चुनने के लिए मतदाता सूचियों का इस्तेमाल किया जाएगा।
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(10.1.2) राष्ट्रीय रजिस्ट्रार जिलों की संख्या 10 तक बढ़ा सकता है, और ऊपर दी गयी प्रक्रिया का प्रयोग करके प्रत्येक जिले से 20 मतदाताओं को क्रमरहित तरीके से चुन सकता है। जिलों की संख्या के संबंध में अंतिम निर्णय राष्ट्रीय रजिस्ट्रार का होगा।
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(10.2) आरोपी जूरी सदस्यों को बताएगा कि, क्या वह भारत में पैदा हुआ था या फिर अन्य किस देश में पैदा हुआ था। यदि वह भारत में पैदा हुआ था तो किस शहर या गाँव में पैदा हुआ था, तथा उसकी स्कूली शिक्षा कहाँ हुयी थी। वह अपने माता-पिता, भाई-बहन, सगे संबंधियों इत्यादि के बारे में भी विवरण देगा। यदि वह भारत के बाहर पैदा हुआ था, तो फिर वह भारत में रहने क्यों और कब आया था।
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(10.3) राष्ट्रीय रजिस्ट्रार के अधिकारी भी जूरी सदस्यों को यह जानकारी देंगे कि क्या अमुक व्यक्ति भारत में या भारत के बाहर पैदा हुआ था, और क्या वह एक अवैध आर्थिक विदेशी निवासी है या फिर वह एक प्रताड़ित शरणार्थी है।
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(10.4) यदि 50 से अधिक जूरी सदस्य आरोपी का सार्वजनिक रूप से पॉलीग्राफ टेस्ट, ब्रैनमैपिंग और / या सार्वजनिक नार्को टेस्ट लेने की सलाह देते है, तब ये टेस्ट लिए जायेंगे। प्रत्येक जूरी सदस्य अपना प्रश्न सुझाएगा और प्रत्येक जूरी सदस्य प्रत्येक प्रश्न को 0-100 के बीच अंक देगा। सबसे अधिक अंक प्राप्त करने वाले प्रश्नों को पहले पुछा जायेगा। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार सार्वजनिक नार्को-टेस्ट और ब्रेन-मैपिंग के लिए डॉक्टर का चयन करेगा। किन्तु यदि 67 से अधिक जूरी सदस्य किसी अन्य डॉक्टर को स्वीकृत करते है, तो उसी डॉक्टर को चुना जाएगा, जिसे जूरी सदस्यों ने स्वीकृत किया है। चुने हुए डॉक्टर के पास राष्ट्रीय रजिस्ट्रार द्वारा बताई गयी डिग्रीयां होनी चाहिए ।
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(10.5) सभी पक्षों को सुनने के बाद, प्रत्येक जूरी सदस्य अपनी राय बताएगा कि उसके विचार में आरोपी एक प्रमाणित भारतीय नागरिक है, या अवैध आर्थिक विदेशी निवासी है या फिर वह एक प्रताड़ित शरणार्थी है । प्रत्येक जूरी सदस्य यह भी बतायेगा कि यदि आरोपी एक अवैध आर्थिक विदेशी निवासी है तो भारत में अनुचित तरीके से प्रवेश करने के लिए उसे कितने वर्षों के लिए कारावास होना चाहिए, और कितना जुर्माना उस पर लगाना चाहिए, और यदि आरोपी एक प्रताड़ित शरणार्थी या भारतीय नागरिक है, तो उसे हुयी असुविधा के लिए मुआवजे की राशि कितनी होनी चाहिए। मुआवजे की राशि न्यूनतम 0 से अधिकतम 1,00,000 के मध्य होगी।
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(11) दंड एव कारावास का निर्णयन :
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(11.1) यदि 67% से अधिक जूरी सदस्य आरोपी को अवैध आर्थिक विदेशी निवासी घोषित कर देते हैं तो राष्ट्रीय रजिस्ट्रार प्रत्येक जूरी सदस्य द्वारा सुझाई गयी कारावास महीनो की मध्यस्थ संख्या को चुनेगा और उसे उतने महीनों के लिए जेल में डाल देगा। कारावास की अधिकतम अवधि 3 वर्ष होगी। रिहा होने पर राष्ट्रीय रजिस्ट्रार उसे उसके देश डिपोर्ट / डिटेंशन सेंटर भेज देगा।
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(11.2) यदि 50% से अधिक लेकिन 67% से कम जूरी सदस्य राय देते हैं कि वह अवैध आर्थिक विदेशी निवासी है, तब उसे कारावास नहीं होगा एवं उसे भारत में रहने दिया जायेगा। किन्तु उसके रहने का जिला राष्ट्रीय रजिस्ट्रार द्वारा तय किया जाएगा।
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(11.3) यदि 50% या उससे कम जूरी सदस्य तय करते हैं कि वह अवैध आर्थिक विदेशी है, तो उसे कोई सजा नहीं होगी।
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(11.4) यदि 50% से अधिक जूरी सदस्य उसे भारतीय नागरिक घोषित करते हैं, तब उसके विरुद्ध कोई भी कार्यवाही नहीं होगी और उसके विरुद्ध कोई प्रतिबंध लागू नहीं होंगे, तथा राष्ट्रीय रजिस्ट्रार ज्यूरी सदस्यों द्वारा सुझायी गयी राशियों की मध्यस्थ राशि के बराबर मुआवज़ा देगा।
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(11.5) यदि 50% से अधिक जूरी सदस्य उसे गैर-भारतीय नागरिक पर एक प्रताड़ित शरणार्थी घोषित करते हैं, तब राष्ट्रिय रजिस्ट्रार उसे NRCI सूची में शरणार्थी के रूप में वर्गीकृत करके शामिल कर लेगा और वह भारत में एक निवासी के रूप में राष्ट्रीय रजिस्ट्रार द्वारा बताये गए किसी जिले में रह सकता है।
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[ टिप्पणी 4 : अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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4a. क्या मुझे अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ेगी ?
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आप नागरिक नहीं हो यह साबित करने का भार राष्ट्रिय रजिस्ट्रार पर होगा, और इस बारे में अंतिम फैसला जूरी करेगी। यदि आपकी नागरिकता के बारे में कोई शिकायत आती है, या कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि आप भारत के नागरिक नहीं है, तो राष्ट्रिय रजिस्ट्रार को नागरिको की जूरी के सामने इसे साबित करना पड़ेगा। जब तक रजिस्ट्रार जूरी के सामने यह साबित नही करता तब तक आपका नाम NRCI में बना रहेगा।
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4b. नागरिकता रजिस्टर में से मेरा नाम हटाने का अंतिम फैसला कौन करेगा ?
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रजिस्ट्रार जूरी के सामने जुटाए गए साक्ष्य रखेगा, और आपको भी अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा। अंतिम फैसला नागरिको की जूरी करेगी, और इसकी अपील हाईकोर्ट जूरी और सुप्रीम कोर्ट जूरी में की जा सकेगी। ]
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(12) याचिकाएँ :
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(12.1) राष्ट्रीय रजिस्ट्रार या अपराधी, जूरी सदस्य के फैसले की अपील कर सकते है। यह अपील जिस जूरी मंडल के सामने की जायेगी उस जूरी में प्राथमिक जूरी मंडल के दोगुने जिलो से जूरी मंडल चुना जाएगा, तथा प्रत्येक जिले में से राष्ट्रीय रजिस्ट्रार 20 जूरी सदस्य क्रमरहित तरीके से चुनेगा।
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(12.2) द्वितीयक जूरी के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जा सकेगी।
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(12.3) कारावास / सज़ा में कटौती : राष्ट्रीय रजिस्ट्रार के अधिकारी अपराधी से सगे-संबंधियों के नाम और पते बताने के लिए कहेंगे। यदि वह अपने सगे संबंधियों या अन्य अवैध आर्थिक प्रवासीयों के बारे में जानकारी एवं सबूत दे देता है तो राष्ट्रीय रजिस्ट्रार उसकी सजा में कटौती करने की अनुशंषा कर सकता है। यदि जूरी अनुमति दे देती है तो सजा में कटौती कर दी जायेगी।
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(13) शरणार्थियों का भार पूरे भारत में विभाजित करने के लिए जिलो का निर्धारण :
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राष्ट्रीय रजिस्ट्रार उन जिलो की सूची तैयार करेगा जहाँ शरणार्थियों की जनसँख्या कम है। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार सीमावर्ती जिलो एवं ऐसे जिलो को जहाँ आर्थिक अवसर कम है, सूची में से हटा देगा। शरणार्थियों को उन जिलो में ही निवास करना होगा जिन्हें सूची में दर्ज किया गया है।
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[ टिप्पणी 5 : इस तरह असम, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, उत्तर पूर्व राज्य, मुंबई, गुडगाँव, नॉएडा, आदि इलाको के जिलों के नाम इस सूची में नहीं आयेंगे। क्योंकि ये क्षेत्र पहले ही अपने हिस्से के शरणार्थियों को शरण दे चुके है। सीमावर्ती जिले सुरक्षा की दृष्टी से संवेदनशील होते है, तथा कम आर्थिक अवसरो वाले शहर शरणार्थियों को जीवन यापन के लिए पर्याप्त अवसर नही दे सकेंगे।
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(14) वोट वापसी : राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर अधिकारी (NCRO)
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(14.1) 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका कोई भी नागरिक जिला कलेक्टर के सामने स्वयं या किसी वकील के माध्यम से NCRO बनने के लिए ऐफिडेविट प्रस्तुत कर सकेगा। जिला कलेक्टर सांसद के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क‍ लेकर उसका आवेदन स्वीकार कर लेगा, तथा उसे एक विशिष्ट सीरियल नम्बर जारी करेगा। कलेक्टर एफिडेविट को स्कैन करके प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा ।
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(14.2) कोई भी नागरिक किसी भी दिन पटवारी कार्यालय में जाकर NCRO के किसी भी प्रत्याशी के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर में मतदाता की हाँ को दर्ज करके रसीद देगा। पटवारी मतदाताओं की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम एवं मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है।
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(14.3) स्वीकृति (हाँ) दर्ज करने के लिए मतदाता 3 रूपये फ़ीस देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी
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(14.4) यदि कोई मतदाता अपनी स्वीकृती रद्द करवाने आता है तो पटवारी एक या अधिक नामों को बिना कोई फ़ीस लिए रद्द कर देगा।
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(14.4) प्रत्येक सोमवार को महीने की 5 तारीख को, कलेक्टर पिछले महीने के अंतिम दिन तक प्राप्त प्रत्येक प्रत्याशियों को मिली स्वीकृतियों की गिनती प्रकाशित करेगा। पटवारी अपने क्षेत्र की स्वीकृतियो का यह प्रदर्शन प्रत्येक सोमवार को करेगा। स्वीकृतियों का प्रदर्शन 5 तारीख को कैबिनेट सचिव द्वारा भी किया जाएगा।
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[ टिपण्णी : कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी स्वीकृति SMS, ATM एवं मोबाईल एप द्वारा दर्ज करवा सके।
रेंज वोटिंग – प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता किसी प्रत्याशी को -100 से 100 के बीच अंक दे सके। यदि मतदाता सिर्फ हाँ दर्ज करता है तो इसे 100 अंको के बराबर माना जाएगा। यदि मतदाता अपनी स्वीकृति दर्ज नही करता तो इसे शून्य अंक माना जाएगा । किन्तु यदि मतदाता अंक देता है तब उसके द्वारा दिए अंक ही मान्य होंगे। रेंज वोटिंग की ये प्रक्रिया स्वीकृति प्रणाली से बेहतर है, और ऐरो की व्यर्थ असम्भाव्यता प्रमेय (Arrow’s Useless Impossibility Theorem) से प्रतिरक्षा प्रदान करती है।]
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(15) जनता की आवाज
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(15.1) यदि कोई मतदाता इस कानून में कोई परिवर्तन चाहता है तो वह कलेक्टर कार्यालय में एक एफिडेविट जमा करवा सकेगा। जिला कलेक्टर 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर एफिडेविट को मतदाता के वोटर आई.डी नंबर के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करके रखेगा।
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(15.2) यदि कोई मतदाता धारा 15.1 के तहत प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर अपना समर्थन दर्ज कराना चाहे तो वह पटवारी कार्यालय मंट 3 रूपए का शुल्क देकर अपनी हां / ना दर्ज करवा सकता है। पटवारी इसे दर्ज करेगा और हाँ / ना को मतदाता के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल देगा।
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--------- NRCI ड्राफ्ट का समापन---------

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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Feb 26 2020 20:47:20 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

अगर एन.आर.सी. नहीं, तो आपकी समझ से ऐसा कौनसा कारगर तरीका हो सकता है जिससे गैरकानूनी अप्रवासियों को पहचाना जा सके?
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निचे मैंने प्रस्तावित NRCI ( National Register for Citizens of india ) का ड्राफ्ट का सार दिया है। NRCI के गेजेट में प्रकाशित होने के साथ ही देश व्यापी नागरिकता रजिस्टर बनने की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी। विभिन्न सरकारी एजेंसियों के अनुसार भारत में लगभग 2 करोड़ अवैध विदेशी ( illegal migrant ) निवास कर रहे है। इन अवैध विदेशियों में प्रताड़ित शरणार्थी भी है, और आर्थिक अवसरों की तलाश में आये विदेशी ( illegal economic migrant ) भी है। इस प्रस्तावित क़ानून में, कौन अवैध आर्थिक विदेशी है और कौन प्रताड़ित शरणार्थी है, इस बारे में अंतिम फैसला नागरिको की जूरी करेगी।
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यह क़ानून ड्राफ्ट निम्नलिखित कार्य करेगा :
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(1) अवैध आर्थिक विदेशीयों ( illegal economic migrant ) को चिन्हित करके उन्हें भारत से निष्कासित करेगा।
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(2) प्रताड़ित शर्णार्थियो ( Persecuted refugee ) को शरण देगा।
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(3) देश व्यापी नागरिकता रजिस्टर बनाएगा ।
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गृह मंत्री श्री अमित शाह ने भरोसा दिलाया है कि जल्दी ही वे देश व्यापी NRC का ड्राफ्ट लायेंगे।किन्तु जब तक सरकार देश व्यापी NRC का ड्राफ्ट सामने नहीं रखती, तब तक हम इस बारे में कोई अनुमान नहीं लगा सकते कि इसमें क्या प्रावधान होंगे। असम में NRC का जो ड्राफ्ट लागू किया गया था उसमें असम राज्य के लिए विशेष प्रावधान थे, अत: असम का NRC ड्राफ्ट पूरे भारत में लागू नहीं किया जा सकता है। प्रस्तावित NRCI इस कमी को पूरा करता है। इस क़ानून को मनी बिल / धन विधेयक के रूप में लोकसभा से पास करके गेजेट में छापा जा सकता है।
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अवैध निवासियों को लेकर पेड मीडिया के प्रायोजको का एजेंडा : पेड मीडिया के प्रायोजको का एजेंडा है कि, भारत में अवैध रूप से रह रहे इन 2 करोड़ विदेशी निवासियों को देश से बाहर नहीं भेजा जाना चाहिए। अत: सभी पेड मीडिया पार्टीयां एवं उनके नेता इन अवैध निवासियों को देश से बाहर भेजने का क़ानून गेजेट में छापने के खिलाफ है।
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ध्यान देने योग्य बात : जो लोग कथित NRC लाने की बात कर रहे है, वे जानबूझकर NRC का ड्राफ्ट सामने नहीं रख रहे है। और जो लोग कथित NRC का विरोध कर रहे है वे जानबूझकर इन 2 करोड़ अवैध निवासियों की समस्या की अनदेखी कर रहे है।
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प्रस्तावित NRCI नामक कानून ड्राफ्ट एक मात्र क़ानून ड्राफ्ट है जिसे इन अवैध निवासियों को खदेड़ने के लिए लिखा गया है। इस क़ानून के अलावा भारत में और कोई ड्राफ्ट उपलब्ध नहीं है।
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NRCI ; प्रस्तावित भारतीय राष्ट्रिय नागरिकता रजिस्टर का सार :
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(01) यह क़ानून गेजेट में आने साथ ही पूरे भारत में लागू होगा।
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[ टिप्पणी : असम के NRC में काफी विसंगितियाँ एवं कमियां थी, अत: असम में भी यह रजिस्टर बनाया जायेगा। उदाहरण के लिए असम का NRC न तो अवैध रूप से रह रहे आर्थिक विदेशियों को चिन्हित करता है, और न ही उन्हें डिपोर्ट करने की कोई व्यवस्था देता है। इसके अलावा असम NRC में कई जायज नागरिक कागजो के अभाव में NRC से बाहर रह गए है, और कई अवैध विदेशी छद्म दस्तावेजो की सहायता से NRC में सूचीबद्ध हो गए है। ]
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(02) इस क़ानून के गेजेट में प्रकाशित होने के बाद आपको पटवारी कार्यालय में जाकर एक NRCI फॉर्म भरना होगा। फॉर्म में आप निम्न जानकारियां देंगे – अपना एवं अपने रिश्तेदारों का वोटर आई डी नंबर, आधार नंबर एवं जन्म का वर्ष। राष्ट्रिय नागरिकता रजिस्ट्रार एक मोबाईल एप भी जारी करेगा ताकि आप NRCI फॉर्म ऑनलाइन भी भर सके।
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(2.1) यदि आपके पास वोटर आई डी एवं आधार नंबर नहीं है तो आप राशन कार्ड नंबर, पैन कार्ड नंबर, ड्राइविंग लाइसेंस या मनरेगा कार्ड नंबर लिखकर भी फॉर्म भर सकते है।
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(2.2) रिश्तेदारो में शामिल है - आपके माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, सगे भाई-बहन एवं संताने। यदि आपके किसी रिश्तेदार की मृत्यु हो चुकी है, तब भी आप इस बारे उतनी जानकारी देंगे जितनी आपको ज्ञात है।
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(2.3) यदि आपको अपने अन्य रिश्तेदारों की वोटर आई डी मालूम नहीं है तो आप सिर्फ अपना वोटर आई डी नंबर लिखकर भी फॉर्म भर सकते है।
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(2.4) फॉर्म जमा करते समय आपको वोटर आई डी या आधार कार्ड में से किसी एक कार्ड की फोटो कॉपी फॉर्म के साथ देनी होगी।
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(2.5) अवयस्क संतानों का नाम जब फॉर्म में लिखा जाएगा तो अवयस्क संतान का आधार कार्ड नंबर लिखना अनिवार्य होगा। यदि अवयस्क का आधार कार्ड नहीं है, तो आप आधार कार्ड बनवा सकते है।
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(05) प्रधानमंत्री एक राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्ट्रार की नियुक्ति करेंगे, जिसे राष्ट्रिय नागरिकता रजिस्टर अधिकारी (NCRO) कहा जाएगा। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार एवं उसका स्टाफ वोट वापसी एवं जूरी मंडल के दायरे में होगा।
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(06) दसवीं कक्षा पास कोई भी मतदाता जिला कलेक्टर कार्यालय में NRCI एजेंट बनने के लिए आवेदन कर सकेगा।
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(6.1) NRCI एजेंट को 3 दिवसीय शिविर में NRCI फॉर्म भरने आदि की जानकारी का प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि वह अन्य नागरिको को फॉर्म भरने में सहायता कर सके। जिला कलेक्टर तहसील पंचायत समिती में इसका शिविर आयोजित कर सकता है।
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(6.2) NRCI एजेंट नागरिको के फॉर्म भरकर पटवारी कार्यालय में जमा करवा सकेगा, एवं NRCI एजेंट को जमा कराये गए प्रत्येक फॉर्म के लिए राष्ट्रिय रजिस्ट्रार की तरफ से 30 रू की दर से भुगतान किया जाएगा।
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(07) NRCI फॉर्म की स्क्रूटिनी एवं सत्यापन
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(7.1) रजिस्ट्रार NRCI फॉर्म में दी गयी जानकारियों को नत्थी करके नागरिकता रजिस्टर सूची का निर्माण करेगा, और इसे सार्वजनिक करेगा। जो सूची सार्वजनिक की जायेगी उसमें नागरिक के सिर्फ वोटर आई डी नंबर होंगे, आधार नंबर नहीं। किसी भी नागरिक का आधार नंबर सार्वजनिक नहीं किया जायेगा। सूची में व्यक्ति के रिश्तेदारों के नाम एवं उनके वोटर आई डी नंबर आदि को इस तरह समूहीकृत( ग्रुपिंग) किया जाएगा कि, व्यक्ति के रिश्तेदारों को आसानी से चिन्हित किया जा सके। यह सूची निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत हो सकेगी :
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(7.1.1) प्रमाणिक सूची : जिन नागरिको के रिश्तेदारों का मिलान हो चुका है, एवं उपलब्ध जानकारी पूर्ण एवं पर्याप्त है, सूची में उनके नाम के आगे प्रमाणित या सत्यापित या Verified चिन्हित किया जायेगा।
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(7.1.2) अप्रमाणिक सूची : जिन नागरिको ने गलत जानकारी दी है, या रजिस्ट्रार द्वारा मांगे जाने पर भी सही जानकारी नहीं दी है, या रजिस्ट्रार को प्रथम दृष्टया लगता है कि जानकारी पर्याप्त नहीं है, तो रजिस्ट्रार सूची में उन नागरिको के आगे “सत्यापित नहीं” या “Unverified” शब्द अंकित करेगा।
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[ टिप्पणी 3 : मान लीजिये कि, X ने अपने फॉर्म में अपने माता-पिता, भाई एवं पत्नी का वोटर आई डी नंबर / आधार नंबर दर्ज किया है, तो रजिस्ट्रार यह मिलान करेगा कि क्या X के भाई ने भी अपने फॉर्म में X के बारे में यही सूचना दी है। इस तरह फॉर्म में रिश्तेदारों के बारे में दी गयी सभी जानकारियों का आपस में मिलान करके प्रमाणिक श्रेणी बनायी जायेगी।]
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(7.2) जिन नागरिको के रिश्तेदारों का मिलान नहीं हुआ है, या उनके द्वारा दी गयी जानकारी अधूरी होने के कारण उनके नाम प्रमाणित सूची में आने से रह गए है, रजिस्ट्रार उन्हें नोटिस भेजेगा कि वे फिर से NRCI फॉर्म भरकर अपने पटवारी कार्यालय में जमा करे। नागरिक इस फॉर्म में अपने एवं अपने रिश्तेदारों के बारे में वे सूचनाएं भी दे सकता है, जो उसने पूर्व में नहीं दी थी।
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(8) यदि कोई नागरिक पाता है कि सार्वजनिक की गयी सूची में किसी नागरिक एवं उनके रिश्तेदारों के बारे में गलत जानकारी रखी गयी है, तो वह इसकी सूचना या शिकायत रजिस्ट्रार को दे सकता है। सूची में जिन नागरिको के नाम के सामने Unverified दर्ज किया गया है वे जिला कलेक्टर कार्यालय, तहसील कार्यालय या पटवारी कार्यालय में फिर से NRCI फॉर्म भरकर दे सकते है, ताकि उन्हें सत्यापित करके प्रमाणिक सूची में डाला जा सके।
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(09) अवैध आर्थिक विदेशीयों (illegal economic migrant) को चिन्हित करना :
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(9.1) प्रधानमंत्री दूरसंचार विभाग को आदेश करेंगे कि वह राष्ट्रीय रजिस्ट्रार को पिछले 2 वर्षों में बांग्लादेश से किये गए, और बांग्लादेश को किये गए सभी फ़ोन कॉल्स की सूची दे। इस विवरण का उपयोग करके राष्ट्रीय रजिस्ट्रार संदिग्धों की सूची बनाएगा।
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(9.2) राष्ट्रीय रजिस्ट्रार बांग्लादेश में एजेंटों की नियुक्ति करेगा। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार अपने एजेंटों से भारत में रह रहे संदिग्धों के बांग्लादेश में निवास कर रहे रक्त संबंधियों के ब्लड ग्रुप और डीएनए नमूनों की जानकारी जुटाने के लिए कहेगा। एजेंट ऐसे दस्तावेज भी जुटाएंगे, जो संदिग्धों के बांग्लादेशी मूल का होना प्रमाणित करें।
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(9.3) कोई भी भारतीय नागरिक भारत में रह रहे अवैध आर्थिक विदेशी संदिग्धों की सूची राष्ट्रिय रजिस्ट्रार को निजी या सार्वजनिक रूप से दे सकता है, और उसे ये सूची संदेह के आधार पर घटते क्रम में बनाकर प्रस्तुत करनी होगी। यदि व्यक्ति द्वारा दी गयी जानकारी सही पायी जाती है, तो राष्ट्रीय रजिस्ट्रार उस व्यक्ति की इच्छानुसार उसे निजी या सार्वजनिक रूप से पारितोषिक दे सकता है।
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(9.4) यदि कोई बांग्लादेशी या पाकिस्तानी यह दावा करता है कि अमुक संदिग्ध उसका रिश्तेदार है, और यदि वह सत्यता की जांच करने के लिए अपना डीएनए सेम्पल देता है, और यदि डीएनए मिलान द्वारा यह सिद्ध हो जाता है कि, भारत में अवैध रूप से रह रहा अमुक विदेशी निवासी उसका रिश्तेदार है, तो राष्ट्रिय रजिस्ट्रार डीएनए मिलान के लिए रक्त नमूना देने वाले व्यक्ति को 1 लाख रूपये का पारितोषिक देगा।
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(9.5) राष्ट्रीय रजिस्ट्रार संदिग्धों के नाम, चित्र और अन्य जानकारी सरकारी वेबसाइट पर रखेगा, और उनके बांग्लादेशी रिश्तेदारों के नाम और अन्य जानकारी देने के लिए सभी से निवेदन करेगा।
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(9.6) उपरोक्त प्रक्रिया का पालन करके राष्ट्रीय रजिस्ट्रार उन संदिग्धों की सूची तैयार करेगा, जिनके अवैध विदेशी निवासी होने पर वह आश्वस्त है।
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(10) जूरी द्वारा सुनवाई : अवैध विदेशी निवासी एवं प्रताड़ित शरणार्थी का निर्णयन
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(10.1) प्रत्येक संदिग्ध की सुनवाई के लिए राष्ट्रीय रजिस्ट्रार 30 से 55 वर्ष की आयु के मध्य के 100 मतदाताओं को 5 विभिन्न जिलो से चुनेगा । प्रथम जिला वह होगा जो उस जिले से सबसे निकट है, जहाँ से संदिग्ध पकड़ा गया है और जहाँ बांग्लादेशी जनसँख्या 10% से कम भी है। किसी जिले में अवैध विदेशी निवासियों की संख्या का प्रतिशत राष्ट्रीय रजिस्ट्रार अपनी जानकारी के आधार पर तय करेगा । अन्य 4 जिलें प्रथम जिले के निकटतम 4 जिलों में से होंगे और प्रत्येक जिले में अवैध आर्थिक विदेशी निवासीयों की जनसँख्या 10% से कम होनी चाहिए ।
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(10.1.1) राष्ट्रीय रजिस्ट्रार हर जिले से यादृच्छिक रूप से ( लॉटरी द्वारा ) 20 मतदाताओं को चुनेगा। मतदाताओ को चुनने के लिए मतदाता सूचियों का इस्तेमाल किया जाएगा।
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(10.1.2) राष्ट्रीय रजिस्ट्रार जिलों की संख्या 10 तक बढ़ा सकता है, और ऊपर दी गयी प्रक्रिया का प्रयोग करके प्रत्येक जिले से 20 मतदाताओं को क्रमरहित तरीके से चुन सकता है। जिलों की संख्या के संबंध में अंतिम निर्णय राष्ट्रीय रजिस्ट्रार का होगा।
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(10.2) आरोपी जूरी सदस्यों को बताएगा कि, क्या वह भारत में पैदा हुआ था या फिर अन्य किस देश में पैदा हुआ था। यदि वह भारत में पैदा हुआ था तो किस शहर या गाँव में पैदा हुआ था, तथा उसकी स्कूली शिक्षा कहाँ हुयी थी। वह अपने माता-पिता, भाई-बहन, सगे संबंधियों इत्यादि के बारे में भी विवरण देगा। यदि वह भारत के बाहर पैदा हुआ था, तो फिर वह भारत में रहने क्यों और कब आया था।
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(10.3) राष्ट्रीय रजिस्ट्रार के अधिकारी भी जूरी सदस्यों को यह जानकारी देंगे कि क्या अमुक व्यक्ति भारत में या भारत के बाहर पैदा हुआ था, और क्या वह एक अवैध आर्थिक विदेशी निवासी है या फिर वह एक प्रताड़ित शरणार्थी है।
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(10.4) यदि 50 से अधिक जूरी सदस्य आरोपी का सार्वजनिक रूप से पॉलीग्राफ टेस्ट, ब्रैनमैपिंग और / या सार्वजनिक नार्को टेस्ट लेने की सलाह देते है, तब ये टेस्ट लिए जायेंगे। प्रत्येक जूरी सदस्य अपना प्रश्न सुझाएगा और प्रत्येक जूरी सदस्य प्रत्येक प्रश्न को 0-100 के बीच अंक देगा। सबसे अधिक अंक प्राप्त करने वाले प्रश्नों को पहले पुछा जायेगा। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार सार्वजनिक नार्को-टेस्ट और ब्रेन-मैपिंग के लिए डॉक्टर का चयन करेगा। किन्तु यदि 67 से अधिक जूरी सदस्य किसी अन्य डॉक्टर को स्वीकृत करते है, तो उसी डॉक्टर को चुना जाएगा, जिसे जूरी सदस्यों ने स्वीकृत किया है। चुने हुए डॉक्टर के पास राष्ट्रीय रजिस्ट्रार द्वारा बताई गयी डिग्रीयां होनी चाहिए ।
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(10.5) सभी पक्षों को सुनने के बाद, प्रत्येक जूरी सदस्य अपनी राय बताएगा कि उसके विचार में आरोपी एक प्रमाणित भारतीय नागरिक है, या अवैध आर्थिक विदेशी निवासी है या फिर वह एक प्रताड़ित शरणार्थी है । प्रत्येक जूरी सदस्य यह भी बतायेगा कि यदि आरोपी एक अवैध आर्थिक विदेशी निवासी है तो भारत में अनुचित तरीके से प्रवेश करने के लिए उसे कितने वर्षों के लिए कारावास होना चाहिए, और कितना जुर्माना उस पर लगाना चाहिए, और यदि आरोपी एक प्रताड़ित शरणार्थी या भारतीय नागरिक है, तो उसे हुयी असुविधा के लिए मुआवजे की राशि कितनी होनी चाहिए। मुआवजे की राशि न्यूनतम 0 से अधिकतम 1,00,000 के मध्य होगी।
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(13) शरणार्थियों का भार पूरे भारत में विभाजित करना :
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राष्ट्रीय रजिस्ट्रार उन जिलो की सूची तैयार करेगा जहाँ शरणार्थियों की जनसँख्या कम है। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार सीमावर्ती जिलो एवं ऐसे जिलो को जहाँ आर्थिक अवसर कम है, सूची में से हटा देगा। शरणार्थियों को उन जिलो में ही निवास करना होगा जिन्हें सूची में दर्ज किया गया है।
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[ टिप्पणी : इस तरह असम, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, उत्तर पूर्व राज्य, मुंबई, गुडगाँव, नॉएडा, आदि इलाको के जिलों के नाम इस सूची में नहीं आयेंगे। क्योंकि ये क्षेत्र पहले ही अपने हिस्से के शरणार्थियों को शरण दे चुके है। सीमावर्ती जिले सुरक्षा की दृष्टी से संवेदनशील होते है, तथा कम आर्थिक अवसरो वाले शहर शरणार्थियों को जीवन यापन के लिए पर्याप्त अवसर नही दे सकेंगे।]
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NRCI के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न :
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(0) NRCI एवं NRC में क्या फर्क है ?
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NRC एक कथित क़ानून है, जिसका ड्राफ्ट अभी तक सामने नहीं आया है। PMP02 के नेता इस कथित ड्राफ्ट विहीन NRC का समर्थन कर रहे है, और PMP01 एवं PMP10 के नेता इस कथित ड्राफ्ट विहीन NRC का विरोध कर रहे है !!
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जबकि NRCI का क़ानून ड्राफ्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है, और इसे तत्काल गेजेट में छापा जा सकता है।
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(a) क्या NRCI फॉर्म भरना अनिवार्य होगा ?
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हाँ। यह प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य होगा। यदि आप NRCI फॉर्म नहीं भरते है तो आपका नाम “सत्यापित नहीं” की सूची में डाला जा सकता है, और बाद में यह संदिग्धों की सूची में भी जा सकता है। यदि आपका नाम संदिग्धों की सूची में आ जाता है तो आपको नागरिको के जूरी मंडल के सामने पेश होना पड़ सकता है।
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(b) यदि मेरे पास वोटर आई डी एवं आधार कार्ड नहीं है तो मेरे पास क्या विकल्प है ?
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तब आप वोटर कार्ड या आधार कार्ड बनवा कर नागरिकता रजिस्टर में अपना नाम जुड़वा सकते है, या लाइसेंस नंबर, मनरेगा कार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड के आधार पर भी NRCI फॉर्म भर सकते है ।
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(c) क्या रिश्तेदारों के वोटर कार्ड नंबर आदि के बारे जानकारी देना अनिवार्य है ?
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आपको उतनी ही जानकारी देनी है, जितनी जानकारी आपके पास है। यदि आपके पास जानकारी नहीं है तो आप NRCI फॉर्म के कॉलम में “जानकारी नहीं है” लिख सकते है। जानकारी नहीं देने पर आप पर कोई मामला नहीं बनाया जाएगा, किन्तु यदि आप जानबूझकर गलत जानकारी देते है, तो जूरी आपको समन भेज सकती है, और दोषी पाए जाने पर आप पर दंड भी लगा सकती है।
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(d) नागरिकता रजिस्टर में आने के लिए मुझे कौनसे कागज दिखाने होंगे ?
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NRCI की प्रक्रिया वोटर आई डी नंबर एवं आधार कार्ड पर आधारित है । अत: आपको NRCI फॉर्म के साथ अपनी वोटर आई डी / आधार कार्ड / राशन कार्ड में से किसी दस्तावेज की फोटो कॉपी देनी होगी। किन्तु आपको अपने रिश्तेदारों आदि के सिर्फ नाम, वोटर आई डी नंबर आदि लिखकर देने है, किन्तु अपने रिश्तेदारों की वोटर आई डी की फोटो कॉपी आदि नहीं देनी होगी।
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(e) यदि मुझे पढना लिखना नहीं आता है तो मैं NRCI फॉर्म कैसे जमा करूँगा ?
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इसके लिए NRCI एजेंट होंगे। NRCI एजेंट को 1 फॉर्म भरने के लिए सरकार 30 रू देगी। अत: वे स्वयं आप तक पहुंचेंगे और आपका फॉर्म भरवाकर पटवारी कार्यालय में दाखिल कर देंगे।
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(f) क्या मुझे अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ेगी ?
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आप नागरिक नहीं हो यह साबित करने का भार राष्ट्रिय रजिस्ट्रार पर होगा, और इस बारे में अंतिम फैसला जूरी करेगी। यदि आपकी नागरिकता के बारे में कोई शिकायत आती है, या कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि आप भारत के नागरिक नहीं है, तो राष्ट्रिय रजिस्ट्रार को नागरिको की जूरी के सामने इसे साबित करना पड़ेगा। जब तक रजिस्ट्रार जूरी के सामने यह साबित नही करता तब तक आपका नाम NRCI में बना रहेगा।
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(g) नागरिकता रजिस्टर में से मेरा नाम हटाने का अंतिम फैसला कौन करेगा ?
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रजिस्ट्रार जूरी के सामने जुटाए गए साक्ष्य रखेगा, और आपको भी अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा। अंतिम फैसला जूरी करेगी, और इसकी अपील हाईकोर्ट एवं जूरी सुप्रीम कोर्ट जूरी में की जा सकेगी।
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(h) NRCI की जरूरत क्यों है ?
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भारत में लगभग 2 करोड़ के लगभग अवैध आर्थिक विदेशी निवासी (illegal economic imigrant) रह रहे है। असम, बंगाल, पूर्वोत्तर के अलावा ये पूरे भारत में फैले हुए है। इनमे से ज्यादातर अवैध विदेशी निवासी पिछले 30 सालों के दौरान भारत में आये है। इस वजह से भारत के संसाधनों पर भार बढ़ रहा है, और ये हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा है। इन अवैध विदेशी निवासीयों में से कई समूह हिंसक अपराधो एवं तस्करी आदि में भी लिप्त है।
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यदि पाकिस्तान एवं चीन इन्हें बंगलादेशी सीमा के माध्यम से हथियार भेजना शुरु कर देते है तो ये अवैध विदेशी निवासी भारत में एक हिंसक गृह युद्ध शुरू कर सकते है। अत: इन्हें चिन्हित करके भारत से बाहर भेजना देश की सुरक्षा के लिए बहुत जरुरी है। CAA एवं असम में किये गए NRC ने इस समस्या का समाधान नहीं किया है, बल्कि इस तरह की धारणा खड़ी कर दी है, कि इस समस्या को सुलझा लिया गया है। अत: INRC को लागू अविलम्ब लागू किया जाना बेहद जरुरी है।
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[ उल्लेखनीय है कि पेड मीडिया के प्रायोजक पेड मीडिया पार्टियों एवं अपने कठपुतली नेताओं का इस्तेमाल करके भारत के एक और विभाजन की जमीन तैयार कर रहे है। यदि यह क़ानून लागू हो जाता है तो पेड मीडिया के प्रायोजको के हाथ से हिन्दू-मुस्लिम सिविल वॉर को ट्रिगर करने का एक स्विच निकल जायेगा। जैसे जैसे ईरान एवं अमेरिका में तनाव बढ़ेगा, वैसे वैसे भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव भी आनुपातिक रूप से बढ़ता चला जायेगा !! ]
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NRCI का पूरा ड्राफ्ट यहाँ देखें - <https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/1067261886980221/>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Feb 27 2020 11:06:54 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

इस एल्बम में नगर परिषद चुनावों के प्रत्याशियों के विवरण एवं चुनाव से सम्बंधित अन्य आवश्यक सूचनाएं रखी जायेगी.

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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Feb 27 2020 11:37:07 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भीलवाड़ा के नागरिको के लिए सूचना :
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भीलवाड़ा नगर परिषद में परिसीमन के बाद 70 वार्ड हो गए, जिनके चुनाव आगामी अगस्त में होंगे। राईट टू रिकॉल पार्टी सभी 70 सीट पर चुनाव लड़ेगी।
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चुनाव लड़ने वालो संभावित प्रत्याशियों के लिए सूचना :
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15 मार्च, 2020 से पार्टी प्रत्याशियों के नामांकन स्वीकार करना शुरू करेगी। यदि आप चुनाव लड़ना चाहते है तो 15 मार्च को अपना आवेदन भरकर प्रस्तुत कर सकते है।
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आवेदन करने का फॉर्म यहाँ से डाउनलोड करें - <https://www.facebook.com/groups/RtrFiles/permalink/2668418700109313/>;
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फॉर्म भरने में यदि आपको समस्या आ रही है तो पार्टी के किसी भी स्थानीय कार्यकर्ता से संपर्क कर सकते है। वे इसमें आपको सहयोग करेंगे। फॉर्म में सभी जानकारियां देना अनिवार्य नहीं है। जितनी जानकारियां आप देना चाहते है उन्हें भरकर आप फॉर्म सबमिट कर सकते है।
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यह सूचना सार्वजनिक रूप से दी जा रही है ताकि सभी सूचित रहे। इस बारे में यदि आपका कोई प्रश्न है तो कमेन्ट बॉक्स में रख सकते है। इसी एल्बम में पार्षद चुनाव के बारे अन्य सूचनाएं भी रखी जाती रहेगी।
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नगर परिषद् चुनावों का एजेंडा भीलवाड़ा के सभी मतदाताओं को वोट वापसी पासबुक जारी करवाना है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Feb 27 2020 17:04:31 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Feb 28 2020 07:25:05 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Bhavesh Patel:

2007में कौन सोच सकता था कि ये आदमी एक दिन अमेरिका का राष्ट्रपति बनेगा।।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Feb 28 2020 09:42:38 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

दिल्ली जूरी कोर्ट – दिल्ली के थानों एवं अदालतों को सुधारने के लिए प्रस्तावित क़ानून
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(Delhi Jury Court – Proposed Notification to Enact Jury Courts in Delhi)
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इस क़ानून का सार : निचे दिया गया क़ानून दिल्ली राज्य के थानों, अदालतों, स्कूलों, अस्पतालों एवं अन्य सरकारी विभागों का काम काज सुधारने के लिए लिखा गया है। गेजेट में आने के साथ ही यह क़ानून दिल्ली में लागू हो जाएगा। इस कानून को लोकसभा और राज्यसभा से पास करने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अपने हस्ताक्षर करके इस अधिसूचना को सीधे गेजेट में छाप सकते है।
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यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं प्रधानमंत्री जी को एक पोस्टकार्ड भेजिए । पोस्टकार्ड में यह लिखे :
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मुख्यमंत्री जी / मुख्यमंत्री, कृपया प्रस्तावित दिल्ली जूरी कोर्ट क़ानून गेजेट में छापे - #DelhiJuryCourt #VoteVapsiPassbook,

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------क़ानून ड्राफ्ट का प्रारम्भ----------

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[ इस क़ानून में दिल्ली शब्द का आशय है दिल्ली राज्य ]
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भाग (I) नागरिको के लिए निर्देश :
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(01) यदि आपका नाम दिल्ली की वोटर लिस्ट में है तो यह कानून पास होने के बाद आपको जूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है। जूरी ड्यूटी में आपको आरोपी, पीड़ित, गवाहों व दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा प्रस्तुत सबूत देखकर बहस सुननी होगी और सजा / जुर्माना या रिहाई का फैसला देना होगा। जूरी का चयन वोटर लिस्ट में से लॉटरी द्वारा किया जाएगा और मामले की गंभीरता देखते हुए जूरी मंडल में 15 से 1500 तक सदस्य होंगे। यदि आपका नाम लॉटरी में निकल आता है तो आपको निचे दिए अपराधो के मुकदमे सुनने के लिए बुलाया जा सकता है :
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(1.1.) हत्या, हत्या के प्रयास, मारपीट, हिंसा, अप्राकृतिक मानव मृत्यु, दलित उत्पीड़न, Sc-St Act के मामले
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(1.2.) अपहरण, बलात्कार, छेड़छाड़, कार्यस्थल पर उत्पीड़न, दहेज़, घरेलू हिंसा, डिवोर्स, वैवाहिक झगड़े ।
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(1.3) किरायेदार-मकान मालिक विवाद, 2 करोड़ से कम मूल्य की सभी प्रकार की जमीन, प्रोपर्टी, सम्पत्तियों आदि के विवाद । मृत्यु भोज से सम्बंधित शिकायतें एवं आपत्तियां।
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(1.4) सभी प्रकार के सार्वजनिक प्रसारणों से सम्बंधित सभी मामले एवं सम्बंधित सभी आपत्तियां ।
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(02) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर दिल्ली के प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। निम्नलिखित 6 अधिकारी इस वोट वापसी पासबुक के दायरे में आयेंगे।
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(2.1) जिला पुलिस प्रमुख
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(2.2) जिला शिक्षा अधिकारी
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(2.3) जिला चिकित्सा अधिकारी
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(2.4) जिला जज
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(2.5) जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी
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(2.6) राज्य सूचना आयुक्त
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तब यदि आप ऊपर दिए गए किसी अधिकारी के काम-काज से संतुष्ट नहीं है, और उसे निकालकर किसी अन्य व्यक्ति को लाना चाहते है तो पटवारी कार्यालय में जाकर स्वीकृति के रूप में अपनी हाँ दर्ज करवा सकते है। आप अपनी हाँ SMS, ATM या मोबाईल APP से भी दर्ज करवा सकेंगे। आप किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दे सकते है, या अपनी स्वीकृति रद्द कर सकते है। आपकी स्वीकृति की एंट्री वोट वापसी पासबुक में आएगी। यह स्वीकृति आपका वोट नही है। बल्कि यह एक सुझाव है ।
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[ धारा (02) का स्पष्टीकरण : यह धारा दिल्ली के नागरिक को यह अधिकार देती है कि वे महत्त्वपूर्ण विभागों का काम संभाल रहे सरकारी अधिकारीयों के काम काज पर अपनी राय दे सके। नागरिको की यह राय स्वीकृति के रूप में होगी, वोट के रूप में नहीं। नागरिको की ये स्वीकृतियां सुझाव की तरह है। इससे सरकार को सभी विभागों के बारे में जनता का निरंतर फीड बैक मिलेगा और शासन में सुधार आएगा। ]
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(03) यदि आपका नाम दिल्ली की वोटर लिस्ट में है और आप इस क़ानून की किसी धारा में कोई आंशिक या पूर्ण परिवर्तन चाहते है, तो अपने कलेक्टर कार्यालय में इस क़ानून के जनता की आवाज खंड की धारा (34.1) के तहत एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकते है। कलेक्टर 20 रू प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर यह शपथपत्र मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर स्कैन करके रखेगा।
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टिप्पणी : टिप्पणियाँ इस क़ानून का हिस्सा नहीं है। नागरिक व अधिकारी टिप्पणियों का इस्तेमाल दिशा निर्देशों के लिए कर सकते है। टिप्पणियाँ किसी भी अधिकारी , मंत्री या न्यायाधीश पर बाध्यकारी नहीं है ।
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(04) यह कानून आरोपी या पीड़ित की आयु की अवहेलना करते हुए निम्नलिखित मामलो पर लागू होगा :
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4.1. हत्या, हत्या के प्रयास, दुर्घटना या लापरवाही जनित मानव मृत्यु या किसी भी प्रकार की अप्राकृतिक मानव मृत्यु।
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4.2. ऐसे सभी अपराध जिसमे हिंसा, जान लेवा धमकी, दुर्घटना एवं ऐसी लापरवाही जिससे शरीर को क्षति कारित हो, या गंभीर चोट कारित होने की संभावना हो, दलित उत्पीड़न, Sc-St Act के मामले ।
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4.3. अपहरण-बलात्कार-छेड़छाड़-उत्पीड़न , महिला का पीछा करना , दहेज़ , घरेलू हिंसा, डिवोर्स, वैवाहिक झगड़े।
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4.4. सभी प्रकार के सार्वजनिक प्रसारण जिनमें सभी प्रकार के दृश्य, श्रव्य, इलेक्ट्रोनिक आदि माध्यम जिसमें- फ़िल्में, टीवी, समाचार पत्र, पुस्तकें, फेसबुक, यू ट्यूब आदि शामिल है - से सम्बंधित सभी प्रकार के मामले व आपत्तियां।
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4.5. किरायेदार-मकान मालिक विवाद, 2 करोड़ से कम मूल्य की सभी प्रकार की जमीन, प्रोपर्टी, सम्पत्तियों आदि के विवाद । मृत्यु भोज से सम्बंधित शिकायतें एवं आपत्तियां।
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4.6. सभी प्रकार के ऐसे अपराध या नागरिक विवाद जिन्हे प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ने इस सूची में शामिल किया हो।
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4.7. ऐसे अपराध या विवाद जिन्हें नागरिको के बहुमत ने इस क़ानून की धारा (42) द्वारा एवं प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री द्वारा स्वीकृत किया गया हो
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[ धारा 2 का स्पष्टीकरण : इस कानून में शुरूआती तौर पर सिर्फ कुछ सरल स्वभाव के अपराधों को शामिल किया गया है, ताकि विशिष्ट किस्म के बुद्धिजीवियों द्वारा दिए जा रहे इस तर्क को कि - दिल्ली के आम नागरिक ‘ऐसे वाले और वैसे वाले’ अपराधो की प्रकृति समझने की अक्ल नहीं रखते है , अत: उन्हें जूरी में आने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए - नागरिकों द्वारा एक सफ़ेद झूठ के रूप में ख़ारिज किया जा सके। बाद में प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री या मतदाता अन्य अपराधों एवं नागरिक विवादो के अन्य प्रकार भी इसमें जोड़ सकते है।
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इस तरह ये स्थापित किया जा सकेगा कि बुद्धिजीवियों का यह तर्क कि - आम भारतीय नागरिक ‘ऐसे वाले और वैसे वाले’ अपराधो को समझने की अक्ल नहीं रखते है – दिल्ली के अधिकतम मतदाताओं द्वारा एक सफ़ेद झूठ के रूप में ख़ारिज किया जा चुका है। तब गोहत्या, भ्रष्टाचार, भाई भतीजा वाद, चोरी, धोखाधड़ी, चेक बाउंस, कर्ज ना चुकाना, किरायेदार-मकान मालिक विवाद, मजदूर-नियोक्ता विवाद, जमीन विक्रय के दस्तावेजों की जालसाजी आदि जैसे अपराध भी प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री / मतदाताओ द्वारा इस क़ानून में जोडे जा सकेंगे। ]
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(05) जिला सहायक निदेशक अभियोजन (A.D.P.) एवं जिला जूरी प्रशासक को शामिल करते हुए धारा (02) में दिए गए 6 अधिकारी वोट वापसी पासबुक के दायरे में रहेंगे। प्रत्येक नागरिक को राशन कार्ड या गैस डायरी की तरह एक वोट वापसी पासबुक जारी की जायेगी, जिसमें इन सभी अधिकारियों के खाने (कॉलम) होंगे। प्रधानमन्त्री या मुख्यमंत्री चाहे तो अन्य पदों जैसे सभापति, सरपंच आदि जन प्रतिनिधियों या अन्य अधिकारियों के पन्ने भी इसमें जोड़ने के लिए अधिसूचना जारी कर सकते है। कोई भी नागरिक इनमें से किसी अधिकारी को को बदलना चाहता है तो वह इसके लिए अपनी स्वीकृति दर्ज करवा सकेगा। स्वीकृति दर्ज करने और नियुक्ति के प्रावधानों के लिए धारा (31) देखें।
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(06) जूरी कोर्ट की स्थापना :

मुख्यमंत्री प्रत्येक जिले में 1 जिला जूरी प्रशासक की नियुक्ति करेंगे। यदि नागरिक उनके काम से संतुष्ट नही है तो धारा (31) के तहत जूरी प्रशासको को बदलने की स्वीकृति दे सकते है।
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[ टिप्पणी : जिला जूरी प्रशासक वह अधिकारी होगा जो मुकदमो के लिए जूरी मंडलों का गठन करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि जूरी कोर्ट सुचारू रूप से काम करें। जिला जूरी प्रशासक को वोट वापसी पासबुक के अधीन किया गया है, ताकि नागरिक यदि यह पाते है कि वह ठीक से काम नहीं कर रहा है, तो वे जूरी प्रशासक को बदलने के लिए अपनी स्वीकृति दे सकें। यदि जूरी प्रशासक को वोट वापसी पासबुक के अधीन नहीं किया गया तो जूरी प्रशासक के निकम्मे एवं पक्षपाती होने की सम्भावना बढ़ जायेगी और जूरी कोर्ट सुचारू ढंग से काम नहीं कर सकेगी। ]
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(07) जूरी कोर्ट का निलंबन :
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(7.1) किसी राज्य में दर्ज सभी मतदाताओं की 50% से अधिक स्वीकृतियां मिलने पर मुख्यमंत्री ऊपर दी गयी सभी धाराओं को निलंबित कर सकते है और किसी एक या अधिक जिलों में अपनी पसंद का जिला जूरी प्रशासक 5 वर्षों के लिए नियुक्त कर सकते है। मुख्यमंत्री अमुक जिले के किसी मामले को क्रमरहित तरीके से चुने हुए किसी अन्य जिले में भी भेज सकते है।
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(7.2) भारत के सभी मतदाताओं के 51% मतदाताओ की स्वीकृति लेकर प्रधानमंत्री एक या अधिक जिलों या राज्यों में ऊपर बतायी सभी धाराओं को निलंबित कर सकते है और अमुक जिलों में अपने विवेक से जूरी प्रशासको को 5 वर्षों के लिए नियुक्त कर सकते है। प्रधानमंत्री किसी मामले को पड़ोसी राज्य के क्रम रहित तरीके से चुने हुए जिले में भी भेज सकते है।
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(08) जूरी ड्यूटी में नागरिको के चयन सम्बन्धी नियम :
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सभी प्रकार के जूरी मंडलो एवं महाजूरी मंडलों का गठन करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन किया जाएगा :
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(8.1) मतदाता सूची ही जूरी ड्यूटी की सूची होगी, और जूरी का गठन मतदाता सूची से ही किया जाएगा।
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(8.2) जूरी सदस्यों की आयु 25 से 50 वर्ष के बीच होगी। व्यक्ति की उम्र वही मानी जायेगी जो वोटर लिस्ट में दर्ज है।
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(8.3) सभी श्रेणी के सरकारी कर्मचारी स्पष्ट रूप से जूरी ड्यूटी के दायरे से बाहर रहेंगे।
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(8.4) जो नागरिक जूरी ड्यूटी कर चुके है, उन्हें अगले 10 वर्ष तक जूरी में नहीं बुलाया जायेगा।
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(8.5) यदि किसी मान्यता प्राप्त चिकित्सक को जूरी ड्यूटी पर बुलाया जाता है तो डॉक्टर जूरी ड्यूटी पर न आने के लिए सूचना दे सकता है। जूरी सदस्य डॉक्टर पर जूरी ड्यूटी न करने के एवज में कोई आर्थिक दंड नहीं लगायेंगे।
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(8.6) यदि निजी क्षेत्र के कर्मचारी को जूरी ड्यूटी पर बुलाया गया है तो नियोक्ता उसे आवश्यक दिवसों के लिए अवैतनिक अवकाश प्रदान करेगा। नियोक्ता अवकाश के दिनों का वेतन कर्मचारी के वेतन में से काट सकता है।
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(09) जिला महाजूरी मंडल = डिस्ट्रिक्ट ग्रेंड ज्यूरी का गठन :
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(9.1) प्रथम महाजूरी मंडल का गठन : जिला जूरी प्रशासक एक सार्वजनिक बैठक में मतदाता सूची में से 25 वर्ष से 50 वर्ष की आयु के मध्य के 50 मतदाताओं का चुनाव लॉटरी द्वारा करेगा। इन सदस्यों का साक्षात्कार लेने के बाद जूरी प्रशासक किन्ही 20 सदस्यों को निकाल सकता है। इस तरह 30 महाजूरी सदस्य शेष रह जायेंगे।
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(9.2) अनुगामी महाजूरी मंडल : प्रथम महा जूरी मंडल में से जिला जूरी प्रशासक पहले 10 महाजूरी सदस्यों को हर 10 दिन में सेवानिवृत्त करेगा। पहले महीने के बाद प्रत्येक महाजूरी सदस्य का कार्यकाल 3 महीने का होगा, अत: 10 महाजूरी सदस्य हर महीने सेवानिवृत्त होंगे, और 10 नए चुने जाएंगे। नये 10 सदस्य चुनने के लिए जूरी प्रशासक जिला/ राज्य /भारत की मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा 20 सदस्य चुनेगा और साक्षात्कार द्वारा इनमें से किन्ही 10 की छंटनी कर देगा।
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(10) क्रमरहित तरीके (लॉटरी) से मतदाताओं को चुनने का तरीका :
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(10.1) जूरी प्रशासक किसी अंक को क्रमरहित विधि से चुनने के लिए किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का प्रयोग नहीं करेगा। यदि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ने किसी प्रक्रिया का विवरण नहीं दिया है तो वह नीचे बताये तरीके का प्रयोग करेगा :
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(10.2) मान लीजिये जूरी प्रशासक को 1 और 4 अंको वाली संख्या जैसे ABCD के मध्य की कोई संख्या चुननी है । तब वह हर अंक के लिए 4 दौर के लिए पांसे फेकेगा। पहले दौर में यदि उसे ऐसा अंक चुनना है जो 0 से 5 के मध्य का है, तब वह केवल 1 पांसे का इस्तेमाल करेगा और यदि उसे ऐसा अंक चुनना है जो 0-9 के मध्य है, तब वह 2 पांसों का प्रयोग करेगा।
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(10.3) चुनी गयी संख्या उस संख्या से 1 कम होगी जो एक अकेला पांसा फेकने पर आएगी, और दो पांसे फेकने की स्थिति में यह 2 से कम होगी। यदि पांसे फेकने पर आई संख्या जरुरत की सबसे बड़ी संख्या से बड़ी है तो वह पांसे दोबारा फेकेगा।
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(10.3.1) मान लीजिये जूरी प्रशासक को एक किताब जिसमे 3693 पेज है, में से एक पेज का चयन करना है। तब जूरी प्रशासक 4 दौर ( राउंड ) के पासें फेंकेगा। पहले दौर में वह एक ही पांसे का प्रयोग करेगा, क्योंकि उसे 0-3 के बीच की संख्या का चयन करना है। यदि पांसा 5 या 6 दर्शाता हैं तो वह पांसा दोबारा फेकेगा। यदि पांसा 3 दर्शाता है तो चुनी हुई संख्या 3-1=2 होगी। अब जूरी प्रशासक दूसरे दौर में चला जायेगा। इस दौर में उसे 0-6 के बीच की एक संख्या चुननी है, इसलिए वह दो पांसे फेकेगा। यदि उनका जोड़ 8 से अधिक हो जाता है तो वह पांसे दुबारा फेकेगा। यदि जोड़ का मान 6 आया तो चुनी हुई संख्या 6-2=4 होगी। इसी प्रकार मान लीजिये चार दौरों में पांसा 3, 5, 10 और 2 दर्शाता है। तब जूरी प्रशासक (3-1) , (5-2) , (10-2) और (2-1) अर्थात पेज संख्या 2381 चुनेगा।
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(10.3.2) जूरी प्रशासक सभी मतदाताओं की सूची तैयार कर सकता है और क्रमरहित तरीके से किन्ही दो बड़ी प्रधान संख्याओ को चुन सकता है। मान लीजिये सूची में N मतदाता है। तब वह N/2 और 2N के बीच दो प्रधान संख्या जिन्हें ‘n और m’ मान लेते है, चुन सकता है। चुने हुए मतदाता हो सकते है - ( n mod N ) , ( n +m ) mod N , ( n+2m ) mod N से (n+ ( k-1 )*m ) mod N , जहाँ k का आशय चुने जाने वाले व्यक्तियों की संख्या है।
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(11) महाजूरी सदस्य प्रत्येक शनिवार और रविवार पर बैठक करेंगे। यदि 15 से अधिक महाजूरी सदस्य सहमति देते है तो वे अन्य दिन भी मिल सकते है। ये संख्या 15 से ऊपर तब भी होनी चाहिए, जब 30 से कम महाजूरी सदस्य उपस्थित हों। यदि बैठक होती है तो आरंभ सुबह 11 बजे से और समाप्त शाम 5 बजे तक हो जानी चाहिए। महाजूरी सदस्य को प्रति उपस्थिती प्रतिदिन 500 रु. एवं साथ में यात्रा खर्च भी मिलेगा। मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री महंगाई दर के अनुसार या यात्रा दूरी जैसी स्थितियों में मुआवजा राशि बदल सकते है। ये राशि उसका कार्यकाल समाप्त होने के 30 दिनों बाद दी जाएगी।
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(12) यदि कोई महाजूरी सदस्य बैठक में अनुपस्थित रहता है तो उसे दैनिक भुगतान नहीं मिलेगा। साथ ही वह भुगतान की जाने वाली राशि की तिगुनी राशी से भी वंचित हो सकता है, तथा उसकी संपत्ति का अधिकतम 0.05% तक और उसकी वार्षिक आय का 1% तक का जुर्माना उस पर लगाया जा सकता है। महाजूरी सदस्य 30 दिनों के बाद जुर्माना राशि तय करेंगे।
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(13) जिला महाजूरी मंडल द्वारा मुकदमो को स्वीकार करना :
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(13.1) यदि किसी व्यक्ति, कंपनी या किसी संस्था का किसी और व्यक्ति या संस्था पर कोई आरोप है और यह आरोप यदि धारा (4) या उसके आधार पर जारी किये गए किसी गेजेट नोटीफिकेशन के अंतर्गत है, तो वे महाजूरी मंडल के सदस्यों को लिखित में सूचित कर सकते है, अथवा धारा (34.1) के अंतर्गत अपनी शिकायत प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर अपलोड कर सकते है। अभियोग करने वाले अपनी तरफ से कानूनी सीमा के अन्दर समाधान के रूप में अभियुक्त की संपत्ति जप्त करना, आर्थिक क्षतिपूर्ति लेना, अभियुक्त को कुछ वर्षों या महीनो तक कारावास या मृत्युदंड का सुझाव दे सकते है।
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(13.2) यदि महाजूरी मंडल के 15 से अधिक सदस्य यदि किसी गवाह, शिकायतकर्ता या अभियुक्त को बुलावा देते है तो वे उनके समक्ष हाजिर हो सकते है। वे किसी वकील या विशेषज्ञ को बोलने की अनुमति दे सकते है या नहीं भी दे सकते है।
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(13.3) यदि महाजूरी मंडल के 15 से अधिक सदस्य किसी मामले को विचार योग्य मानते हैं तो मामले के विचार के लिए जिला जूरी प्रशासक 15 से 1500 नागरिकों की जूरी बुलाएगा जिनकी उम्र 25 से 50 वर्ष की आयु के बीच होगी । यदि 15 से अधिक महा जूरी मंडल के सदस्य कहते हैं कि मामला विचार योग्य नहीं है तो मामले को निरस्त कर दिया जाएगा।
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(13.4) यदि महाजूरी मंडल के अधिकांश सदस्य मानते है कि शिकायत बिलकुल आधारहीन और मनगड़ंत है तो वे मामले की सुनवाई में हुई समय की बर्बादी के लिए 5000 रूपये प्रति घंटे अधिकतम की दर से जुर्माना लगा सकते है। महाजूरी मंडल का प्रत्येक सदस्य जुर्माने की राशि प्रस्तावित करेगा और सबके द्वारा प्रस्तावित जुर्माने की मध्यराशि (median) जुर्माने की राशि मानी जाएगी। महाजूरी मंडल के सदस्य ये भी तय करेंगे कि झूठे आरोप की क्षतिपूर्ति के रूप में अभियुक्त को जुर्माने की राशि में से कितनी राशि दी जाएगी। झूठा आरोप होने की स्थिति में अभियुक्त अपने समय , सम्मान और अन्य नुकसान के लिए अधिकतम क्षतिपूर्ति पाने हेतु अलग से एक मामला दायर कर सकते है।
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(14) किसी मामले के लिए आवश्यक जूरी सदस्यों की संख्या का निर्धारण :
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महाजूरी मंडल का प्रत्येक सदस्य मामले के विचार के लिए वांछित जूरी की संख्या प्रस्तावित करेगा और जिला जूरी प्रशासक सारे सदस्यों द्वारा प्रस्तावित संख्या के माध्य को वांछित जूरी संख्या के रूप मे निर्धारित करेगा। यदि महाजूरी मंडल के सदस्यों की संख्या सम है तो जिला जूरी प्रशासक उच्चतर मध्य संख्या को वांछित जूरी संख्या के रूप मे निर्धारित करेंगे। जूरी सदस्यों की संख्या के संबध में महाजूरी मंडल का फैसला अंतिम होगा। महाजूरी सदस्यों के लिए दिशा निर्देश :
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(14.1) यदि अभियुक्त के पास अधिक आर्थिक या राजनैतिक हैसियत है तो जूरी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जा सकती है।
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(14.2) यदि अपराध जघन्य है तो जूरी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। उदाहरण के लिए यदि मामला 100,000 रूपए या उससे कम धन राशि की चोरी का है तो जूरी सदस्यों की संख्या 15 हो सकती है। पर यदि चुराई धन राशि इससे अधिक है तो जूरी सदस्यों की संख्या ज्यादा होगी। यदि मामला हत्या का है तो जूरी सदस्यों की संख्या 50 या 100 या उससे भी अधिक हो सकती है।
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(14.3) यदि कोई व्यक्ति अतीत में एकाधिक अपराधों का अभियुक्त रहा है, और महाजूरी मंडल के सदस्य ज्यादातर मामलों को विचार योग्य मानते है तो वे जूरी सदस्यों की संख्या बढ़ा सकते है।
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(14.4) यदि मामला ज्यादा पैसों का है तो जूरी सदस्यों की संख्या ज्यादा हो सकती है। न्यूनतम संख्या 15 होगी और हर 1 करोड़ की राशि के लिए 1 अतिरिक्त सदस्य जोड़ा जाएगा। किन्तु जूरी का आकार 1500 से अधिक नहीं होगा।
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(15) जूरी सदस्यों का चयन :
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(15.1) जूरी प्रशासक मतदाता सूची से लॉटरी द्वारा वांछित जूरी संख्या से दुगनी संख्या में नागरिकों को चुनकर उन्हें बुलावा भेजेगा। उनमे से किसी भी पक्षकार के रिश्तेदार, पडोसी, सहकर्मी आदि को जूरी सदस्यों में शामिल नहीं किया जाएगा। जिले में पिछले 10 वर्षों में किसी सरकारी पद पर रहे नागरिक भी जूरी से बाहर रहेंगे। शेष लोगों में से बिना किसी इंटरव्यू के जूरी प्रशासक लाटरी द्वारा आवश्यक संख्या के जूरी सदस्य चुनेगा। किसी व्यक्ति को जूरी में शामिल नहीं करने का निर्णय जूरी प्रशासक द्वारा लिया जाएगा और उसे सिर्फ महाजूरी मंडल के बहुमत द्वारा बदला जा सकेगा।
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(15.2) जिला जूरी प्रशासक जूरी सदस्यों को प्रत्येक जूरी सदस्य की शिक्षागत योग्यता, पेशा और संपत्ति अथवा आय के बारे में सूचित करेगा। जिन जूरी सदस्यों के पास कम जानकारी है या तर्क या गणित में कम दक्षता है वे उन जूरी सदस्यों से सहायता ले सकते है, जिनके पास ज्यादा जानकारी है या जो तर्क या गणित में ज्यादा दक्ष हैं।
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(15.3) जिला जूरी प्रशासक जिला मुख्य न्यायधीश से मामले की सुनवाई में जूरी सदस्यों को आवश्यक सलाह देने और मामले के संचालन के लिए एक या अधिकतम 3 न्यायधीशों की नियुक्ती करने के लिए कहेगा। न्यायधीशों के संख्या के बारे मे जिला मुख्य न्यायधीश का निर्णय अंतिम होगा। जिला जूरी प्रशासक एक ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर को नियुक्त करेंगे और ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर मामले पर विचार करने की प्रक्रिया एवं जूरी ट्रायल का संचालन करेगा।
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(16) जूरी मंडल द्वारा मुकदमो की सुनवाई करना : सुनवाई सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक चलेगी। मामले की सुनवाई सिर्फ तभी शुरू होगी जब चुने गए समस्त जूरी सदस्यों में से (चुने गए समस्त जूरी सदस्यों में से, ना कि सिर्फ उपस्थित जूरी सदस्यों के) 75% सुनवाई शुरू करने को राजी हों।
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(17) ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर शिकायत कर्ता को एक घंटे तक बोलने की अनुमति देगा तथा इस दौरान उन्हें कोई नहीं रोकेगा। इसके बाद अभियुक्त एक से डेढ़ घंटे तक अपना पक्ष रखेगा। इस तरह एक के बाद एक दोनों पक्ष बोलेंगे। भोजन विराम दोपहर 1 बजे से 2 बजे के बीच शुरू होगा और 1 घंटे तक रहेगा। इसी तरह सुनवाई लगातार प्रत्येक दिन चलेगी। जूरी सदस्यों के बहुमत द्वारा किसी भी पक्ष के बोलने की अवधि को बदला जा सकेगा। इस क़ानून में सभी जगह जूरी का बहुमत या अधिकांश का अर्थ चुने गए समस्त जूरी सदस्यों के बहुमत से है ना कि सिर्फ उपस्थित जूरी सदस्यों के बहुमत से।
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(18) मामले की सुनवाई न्यूनतम 2 दिन तक चलेगी । तीसरे दिन या उसके बाद यदि जूरी सदस्यों का बहुमत कहता है कि हमने दोनों पक्षों को पर्याप्त सुन लिया है, तो सुनवाई एक दिन और चलेगी। यदि अगले दिन बहुमत कहता है कि उन्हें और सुनना है तो सुनवाई तब तक चलती रहेगी जब तक जूरी का बहुमत सुनवाई ख़त्म करने को नही कहता। अंतिम दिन दोनों पक्ष 1-1 घंटे तक अपना पक्ष रखेंगे। इसके बाद जूरी सदस्य 2 घंटे तक आपस में विचार मंथन करेंगे। यदि 2 घंटे बाद जूरी सदस्य ये निर्णय लेते है की उन्हें और विचार मंथन की आवश्यकता नहीं है, तो जूरी अपना फैसला सार्वजनिक करेगी।
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(19) जुर्माने का निर्धारण : प्रत्येक जूरी सदस्य जुर्माने की राशि प्रस्तावित करेगा, जो कि प्रवृत क़ानूनी सीमा के अन्दर हो। यदि किसी सदस्य द्वारा प्रस्तावित जुर्माना राशि कानूनी सीमा से अधिक है तो जुर्माने की अधिकतम कानूनी सीमा को प्रस्तावित जुर्माने की राशि माना जाएगा। ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर सभी प्रस्तावित जुर्माना राशीयों को घटते क्रम में रखेगा। अर्थात सबसे अधिक प्रस्तावित राशि को सबसे ऊपर और सबसे अंत में सबसे कम जुर्माने की राशि को रखा जायेगा।
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ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर दो तिहाई जूरी सदस्यों द्वारा मंजूर जुर्माने की राशि को जुर्माने की राशि मानेंगे। उदाहरण के लिए, यदि जूरी सदस्यो की संख्या 100 हैं तो घटते क्रम में 67 क्रमांक पर प्रस्तावित जुर्माने की राशि को जुर्माने की राशि माना जाएगा। अर्थात, यदि 100 में से 34 जूरी सदस्यों ने शून्य जुर्माना प्रस्तावित किया है तो जुर्माने की राशि को शून्य माना जाएगा।
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(20) कारावासीय दंड : ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर जूरी सदस्यों द्वारा प्रस्तावित कारावास की अवधि को घटते क्रम में सजाएगा। अर्थात सबसे अधिक दंड सबसे पहले और सबसे कम को अंत में रखा जायेगा। यदि किसी सदस्य द्वारा बतायी कारावास की अवधि कानूनी सीमा से अधिक है तो ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर उस मामले में कानून द्वारा प्रस्तावित सर्वाधिक कारावास अवधि को प्रस्तावित कारावास की अवधि के रूप में दर्ज करेंगे, और 2/3 जूरी सदस्यो द्वारा मंजूर कारावास की अवधि को सम्मिलित रूप से तय की गयी कारावास की अवधि माना जाएगा।
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अर्थात, यदि एक तिहाई जूरी सदस्य कारावास की अवधि शून्य प्रस्तावित करते हैं तो अभियुक्त को निरपराध घोषित कर दिया जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि जूरी सदस्यों की संख्या 100 है तो घटते क्रम में 67 क्रम संख्या वाली प्रस्तावित कारावास की अवधि को कारावास की सम्मिलित अवधि के रूप में माना जाएगा और यदि 34 जूरी सदस्य कारावास की अवधि शून्य प्रस्तावित करते हैं तो कारावास नहीं होगा।
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(21) मृत्यु दंड एवं सार्वजनिक नारको टेस्ट के मामले में 75% से अधिक जूरी सदस्यों की मंजूरी आवश्यक होगी। इस तरह के मामलों में एक अन्य जूरी मंडल द्वारा मामले पर पुनर्विचार किया जाएगा। दूसरी बार में आयी जूरी ही ये निर्णय करेगी कि मृत्युदंड होगा या नहीं। मृत्यु दंड पर पुनर्विचार के लिए आयी जूरी भी मृत्यु दंड को 75% सदस्यों द्वारा अनुमोदित करेगी।
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(22) जूरी मंडल जो भी अंतिम फैसला देंगे उसे ट्रायल के पदासीन जज द्वारा अनुमोदित किया जाएगा। यदि जज चाहे तो जूरी के फैसले में संशोधन कर सकता है, या फैसले को पूरी तरह से पलट सकता है। जज जब भी अपना फैसला लिखेगा तब वह सबसे पहले जूरी के फैसले को उद्धत करेगा। सरकारी दस्तावेजो, बुलेटिन एवं अन्य सभी जगह जहाँ पर भी फैसले को दर्ज / उद्धत किया जाएगा, वहां पर अनिवार्य रूप से सबसे पहले जूरी द्वारा दिए गए फैसले का जिक्र किया जाएगा।
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(23) यदि किसी अन्य समाधान की मांग की गयी है तो जूरी सदस्य दोनों पक्षों को अधिकतम 5 या उससे कम वैकल्पिक प्रस्ताव दाखिल करने को कहेंगे। इसके अलावा जूरी की अनुमति से कोई भी व्यक्ति समाधान के लिए अपना प्रस्ताव जूरी के सामने रख सकता है। प्रत्येक जूरी सदस्य प्रत्येक वैकल्पिक प्रस्ताव को 0 में से 100 के बीच अंक देगा। यदि किसी प्रस्ताव को किसी जूरी सदस्य ने कोई भी अंक नहीं दिया हैं तो उस प्रस्ताव के लिए उनके द्वारा दिया गया अंक शून्य माना जाएगा। जिस वैकल्पिक समाधान प्रस्ताव को सबसे ज्यादा अंक मिलेंगे उस प्रस्ताव को जूरी द्वारा मंजूर किया गया प्रस्ताव माना जाएगा।
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(24) अनुपस्थिति या देर से आने पर जूरी सदस्यों पर जुर्माना - यदि कोई जूरी सदस्य या कोई भी पक्ष सुनवाई में अनुपस्थित रहता हैं या विलम्ब से आते हैं तो तीन महीने बाद महा जूरी मंडल जुर्माने की राशी तय करेगा, जो कि उनकी संपत्ति का 0.1% अथवा वार्षिक आय का 1% हो सकता है। जुर्माने के निर्धारण में महाजूरी मंडल का फैसला अंतिम होगा।
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(25) यदि 50% से ज्यादा जूरी सदस्य मानते हैं कि शिकायत बिलकुल निराधार एवं मनगड़ंत है तो प्रत्येक जूरी सदस्य अधिकतम 1000 रूपए प्रति जूरी सदस्य तक का जुर्माना लगा सकता है। प्रत्येक जूरी सदस्य जुर्माने की राशि प्रस्तावित करेगा और जिला जूरी प्रशासक प्रस्तावित राशियों के मध्य मान को जुर्माने की राशि मानेगा। किन्तु जुर्माने की उच्चतम सीमा वह राशि होगी जो कि शिकायतकर्ता की संपत्ति की 2% या वार्षिक आय की 10% में से उच्च है।
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जुर्माने की इस राशि में से अभियुक्त को जो राशि दी जायेगी उसकी गणना इस प्रकार होगी - अभियुक्त द्वारा पिछले वर्ष भरे गए आयकर रिटर्न के अनुसार उसकी प्रतिदिन आय का निर्धारण किया जाएगा। तथा जितने दिन सुनवाई चली और अभियुक्त को जितने दिन का नुकसान हुआ उस हिसाब से उसे मुआवजा दिया जाएगा। अभियुक्त ज्यादा मुआवजे के लिए अलग से मामला दायर कर सकता है।
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(26) जटिल मामलों में यदि कोई तकनिकी या कानूनी विशेषज्ञ कोई जानकारी देने के इच्छुक हैं तो कोई भी पक्षकार या ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर उनकी मदद ले सकते है। जूरी प्रशासक उनकी दैनिक भुगतान राशि तय करेंगे, जो उनकी दैनिक आय से अधिक नहीं होगी। जूरी सदस्यों को भत्तों के रूप में जिला महाजूरी मंडल के सदस्यों के समान धनराशी दी जायेगी।
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(27) यदि किसी जिले में तहसील स्तर के न्यायालय है तो जूरी प्रशासक तहसील स्तर पर भी महाजूरी मंडल का गठन कर सकता। तहसील का महाजूरी मंडल तहसील के अंतर्गत मामलों की सुनवाई करेगा। जिला जूरी प्रशासक तहसील अदालतों के लिए तहसील जूरी प्रशासक की नियुक्ति करेंगे और जूरी कोर्ट की कार्यवाही ऊपर दी गयी धाराओं के अनुरूप ही होगी।
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[ टिपण्णी : यदि वादी गण को लगता है कि जिला जज ने अनुचित फैसला दिया है तो वे इस क़ानून के वोट वापसी खंड की धारा (31) का इस्तेमाल करके जिले के नागरिको से विनती कर सकते है कि नागरिक जिला जज को नौकरी से निकालने की स्वीकृति दें। या वे इस क़ानून के जनता की आवाज खंड की धारा (34.1) के तहत राज्य के नागरिको के समक्ष पुनर्विचार (Riview) का एक शपथपत्र दाखिल कर सकता है। ]
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(28) इसी क़ानून की धारा (04) में वर्णित मामलो या धारा (04) के तहत जारी की गयी राजपत्र अधिसूचना द्वारा निर्धारित मामलों में जूरी मंडल के 2/3 से अधिक बहुमत द्वारा दी गयी सहमती बिना किसी भी नागरिक को किसी भी सरकारी अधिकारी द्वारा न तो दण्डित किया जा सकेगा, और न ही जुर्माना लगाया सकेगा।
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किन्तु निम्नलिखित दशाओं में जूरी मंडल की सहमती आवश्यक नहीं होगी - यदि ऐसे आदेश को उच्च या उच्चतम न्यायालय ने अनुमोदित किया हो, अथवा ऐसे आदेश को इस क़ानून के जनता की आवाज खंड की धारा (34) के प्रावधानों का प्रयोग करते हुए जिले / राज्य / देश के मतदाताओ के बहुमत ने अनुमोदित किया हो। कोई भी सरकारी अधिकारी किसी भी नागरिक को ज्यूरी मंडल के 2/3 से अधिक बहुमत द्वारा दी गयी सहमती बिना या महाजूरी मंडल के साधारण बहुमत द्वारा दी गयी सहमती बिना या धारा (34) के प्रावधानों के तहत दर्शाए गए जिला / राज्य / देश के नागरिको के बहुमत बिना 48 घंटो से अधिक समय तक कारावास में नहीं रखेगा।
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(29) अधिकारियों के लिए आवेदन व योग्यताएं :
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(29.1) जिला पुलिस प्रमुख : यदि 32 वर्ष से अधिक आयु का कोई भारतीय नागरिक जो पिछले 3000 दिनों में 2400 से अधिक दिनों के लिए दिल्ली पुलिस प्रमुख नहीं रहा हो, तथा जिसने 5 वर्षों तक सेना में काम किया हो, या पुलिस विभाग में एक भी दिन काम किया हो, या सरकारी कर्मचारी के रूप में 10 वर्षों तक काम किया हो या उसने राज्य / संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित प्रशासनिक सेवाओ की लिखित परीक्षा पास की हो, या उसने विधायक / सांसद / पार्षद या जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीता हो, तो ऐसा व्यक्ति दिल्ली पुलिस प्रमुख के प्रत्याशी के रूप में आवेदन कर सकेगा।
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(29.2) जिला जज, जिला जूरी प्रशासक एवं सहायक निदेशक अभियोजन : भारत का कोई भी नागरिक जिसकी आयु 32 वर्ष से अधिक हो एवं उसे LLB की शिक्षा पूर्ण किये हुए 8 वर्ष हो चुके हो या वह सहायक लोक अभियोजक (APP = Assistance Public Prosecutor) के रूप में 3 वर्ष तक सेवाएं दे चुका हो तो वह जिला जज, जिला जूरी प्रशासक एवं सहायक निदेशक अभियोजन (ADP = Additional Director of Prosecution) पद के लिए आवेदन कर सकेगा।
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(29.3) जिला चिकित्सा अधिकारी : 32 वर्ष से अधिक आयु का भारतीय नागरिक जिसे ऐलोपेथी, आयुर्वेद, होम्योपेथ, यूनानी या भारत सरकार द्वारा स्वीकार की गयी इसके समकक्ष किसी अन्य चिकित्सा विज्ञान का मान्यता प्राप्त चिकित्सक होने के लिए वांछित डिग्री प्राप्त किये हुए 5 वर्ष हो चुके हो तो वह जिला चिकित्सा अधिकारी के लिए आवेदन कर सकेगा।
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(29.4) जिला शिक्षा अधिकारी राज्य सूचना आयुक्त एवं जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी : भारत का कोई भी नागरिक जिसकी आयु 32 वर्ष से अधिक हो तो वह जिला शिक्षा अधिकारी एवं जिला मिलावट रोकथाम अधिकारी पद के लिए आवेदन कर सकेगा।
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(30) धारा (29) में दी गयी योग्यता धारण करने वाला कोई भी नागरिक यदि जिला कलेक्टर कार्यालय में स्वयं या किसी वकील के माध्यम से कोई एफिडेविट प्रस्तुत करता है, तो जिला कलेक्टर सांसद के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क‍ लेकर अर्हित पद के लिए उसका आवेदन स्वीकार कर लेगा, तथा इसे सीएम की वेबसाईट पर स्कैन करके रखेगा।
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(31) मतदाता द्वारा स्वीकृति दर्ज करना :
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(31.1) कोई भी नागरिक किसी भी दिन अपनी वोट वापसी पासबुक या वोटर आई डी के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर किसी भी प्रत्याशी के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर एवं वोट वापसी पासबुक में मतदाता की हाँ दर्ज करेगा। पटवारी मतदाताओं की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम व मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिला वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृति दे सकता है।
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(31.2) स्वीकृति (हाँ) दर्ज करने के लिए मतदाता 3 रूपये फ़ीस देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी।
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(31.3) यदि मतदाता सहमती रद्द करवाने आता है तो पटवारी एक या अधिक नामों को बिना कोई फ़ीस लिए रद्द कर देगा
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(31.4) प्रत्येक महीने की 5 तारीख को कलेक्टर पिछले महीने में प्राप्त प्रत्येक प्रत्याशियों को मिली स्वीकृतियों की गिनती प्रकाशित करेगा। पटवारी अपने क्षेत्र की स्वीकृतियों का यह प्रदर्शन प्रत्येक सोमवार को करेगा।
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[ टिप्पणी : कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी हाँ SMS, ATM, मोबाईल एप से दर्ज कर सके।
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रेंज वोटिंग - प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता किसी प्रत्याशी को -100 से 100 के बीच अंक दे सके। यदि मतदाता सिर्फ हाँ दर्ज करता है तो इसे 100 अंको के बराबर माना जाएगा। यदि मतदाता अपनी स्वीकृति दर्ज नही करता तो इसे शून्य अंक माना जाएगा । किन्तु यदि मतदाता अंक देता है तब उसके द्वारा दिए अंक ही मान्य होंगे। रेंज वोटिंग की ये प्रक्रिया स्वीकृति प्रणाली से बेहतर है, और ऐरो की व्यर्थ असम्भाव्यता प्रमेय (Arrow’s Useless Impossibility Theorem) से प्रतिरक्षा प्रदान करती है। ]
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(32) अधिकारियों की नियुक्ति एवं निष्कासन :
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(32.1) पुलिस प्रमुख : यदि दिल्ली पुलिस प्रमुख का कोई उम्मीदवार राज्य की मतदाता सूची में दर्ज कुल मतदाताओं के 50% से अधिक मतदाताओं की स्वीकृति प्राप्त कर लेता है तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अमुक प्रत्याशी को पुलिस प्रमुख बनाने के लिए प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख सकते है। पुलिस प्रमुख की नियुक्ति का अंतिम फैसला प्रधानमंत्री करेंगे।
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(32.2) जूरी प्रशासक, मिलावट रोक अधिकारी, चिकित्सा अधिकारी एवं जिला सहायक निदेशक अभियोजन : यदि जिले की मतदाता सूची में दर्ज सभी मतदाताओं के 35% से अधिक मतदाता किसी प्रत्याशी के पक्ष में हाँ दर्ज कर देते है, और यदि ये स्वीकृतियां पदासीन अधिकारी से 1% अधिक भी है तो मुख्यमंत्री अमुक प्रत्याशी को जूरी प्रशासक या सहायक निदेशक अभियोजन की नौकरी दे सकते है ।
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(32.3) जिला जज : यदि जिले की मतदाता सूची में दर्ज सभी मतदाताओं के 35% से अधिक मतदाता किसी प्रत्याशी के पक्ष में हाँ दर्ज कर देते है और यदि ये स्वीकृतियां पदासीन जिला जज से 1% अधिक भी है तो मुख्यमंत्री उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश को चिट्ठी लिख सकते है। जिला जज की नियुक्ति का अंतिम निर्णय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश करेंगे।
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(32.4) राज्य सूचना आयुक्त : यदि राज्य की मतदाता सूची में दर्ज सभी मतदाताओं के 35% से अधिक मतदाता किसी प्रत्याशी के पक्ष में हाँ दर्ज कर देते है और यदि ये स्वीकृतियां पदासीन सूचना आयुक्त से 1% अधिक भी है तो मुख्यमंत्री उसकी नियुक्ति के लिए पीएम को चिट्ठी लिख सकते है।
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(32.5) जिला शिक्षा अधिकारी : जिला शिक्षा अधिकारी को अभिभावक एवं आम नागरिक दोनों अपनी स्वीकृतियां दे सकेंगे। 35% अभिभावकों की सहमती से मुख्यमंत्री जिला शिक्षा अधिकारी की नियुक्ति कर सकते है, और यदि आम नागरिक शिक्षा अधिकारी के किसी प्रत्याशी को 50% से अधिक स्वीकृतियां दे देते है तो नागरिको की मंशा को उच्च माना जायेगा।
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(32.5.1) इस क़ानून में अभिभावक शब्द का अर्थ होगा - 0 से 18 वर्ष आयुवर्ग के बच्चो के पिता या उनकी माता, जो उस जिले का मतदाता भी हो। जब तक अभिभावको की सूची नहीं बनती, प्रत्येक मतदाता जो 23 और 45 वर्ष के बीच है, इस क़ानून के लिए अभिभावक माना जायेगा।
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(32.5.2) मतदाताओ या अभिभावकों की स्वीकृतियों से नियुक्त हुआ शिक्षा अधिकारी एक से अधिक जिलो का भी शिक्षा अधिकारी बन सकता है। वह किसी राज्य में अधिक से अधिक 5 जिलों का, और भारत भर में अधिक से अधिक 20 जिलों का शिक्षा अधिकारी बन सकता है। कोई व्यक्ति अपने जीवन काल में किसी जिले का शिक्षा अधिकारी 8 वर्षों से अधिक समय के लिए नहीं रह सकता है। यदि वह एक से अधिक जिलो का शिक्षा अधिकारी है तो उसे उन सभी जिलों के शिक्षा अधिकारी के पद का वेतन, भत्ता, बोनस आदि मिलेगा।
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(33) जिला पुलिस प्रमुख के लिए गुप्त स्वीकृति की अतिरिक्त प्रक्रिया :
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(33.1) मुख्यमंत्री एवं राज्य के सभी मतदाता राज्य चुनाव आयुक्त से विनती करते है कि, जब भी राज्य में कोई आम चुनाव, जिला पंचायत चुनाव, ग्राम पंचायत चुनाव, स्थानीय निकाय चुनाव, सांसद का चुनाव, विधायक का चुनाव या अन्य कोई भी चुनाव करवाया जाएगा तो इन चुनावों के साथ राज्य चुनाव आयुक्त दिल्ली पुलिस प्रमुख के चुनाव के लिए भी मतदान कक्ष में एक अलग से मतपत्र पेटी रखेगा, ताकि दिल्ली के मतदाता यह तय कर सके कि वे मौजूदा पुलिस प्रमुख की नौकरी चालू रखना चाहते है या किसी अन्य व्यक्ति को यह नौकरी देना चाहते है।
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(33.2) यदि कोई उम्मीदवार राज्य की मतदाता सूची में दर्ज सभी मतदाताओं (सभी, न कि केवल वे जिन्होंने गुप्त स्वीकृतियों के लिए मतदान किया है) के 50% से अधिक गुप्त स्वीकृतियां प्राप्त कर लेता है तो मुख्यमंत्री त्यागपत्र दे सकते है, या 50% से अधिक गुप्त स्वीकृतियां प्राप्त करने वाले व्यक्ति को अगले 4 वर्ष के लिए पुलिस प्रमुख नियुक्त करने के लिए प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख सकते है। दिल्ली पुलिस प्रमुख की नियुक्ति का अंतिम फैसला प्रधानमंत्री करेंगे।
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(33.3) यदि कोई व्यक्ति पिछले 3000 दिनों में 2400 से अधिक दिनों के लिए पुलिस प्रमुख रह चुका हो तो प्रधानमंत्री उसे अगले 600 दिनों के लिए पुलिस प्रमुख के पद पर रहने की अनुमति नहीं देंगे। किन्तु यदि पुलिस प्रमुख गुप्त स्वीकृति की प्रक्रिया में जिले के 50% से अधिक स्वीकृतियां प्राप्त कर लेता है तो प्रधानमंत्री उसे पद पर बनाए रख सकते है।
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(33.4) राज्य के सभी मतदाताओं के 50% से अधिक मतदाताओं की स्पष्ट स्वीकृति लेकर प्रधानमंत्री दिल्ली पुलिस प्रमुख के लिए नागरिको द्वारा स्वीकृत करने की इस प्रक्रिया एवं उसके स्टाफ पर ज्यूरी ट्रायल को 4 वर्षों के लिए हटाकर अपनी पसंद का पुलिस प्रमुख नियुक्त कर सकते है।
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(34) जनता की आवाज :
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(34.1) यदि कोई मतदाता इस कानून में कोई परिवर्तन चाहता है या किसी मांग, सुझाव आदि के रूप में अर्जी देना चाहता है तो वह कलेक्टर कार्यालय में एक एफिडेविट जमा करवा सकेगा। जिला कलेक्टर 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर एफिडेविट को मतदाता के वोटर आई.डी नंबर के साथ मुख्यमंत्री / प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करके रखेगा।
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(34.2) यदि कोई मतदाता धारा (34.1) के तहत प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर अपना समर्थन दर्ज कराना चाहे तो वह पटवारी कार्यालय में 3 रूपए का शुल्क देकर अपनी हां / ना दर्ज करवा सकता है। पटवारी इसे दर्ज करेगा और हाँ / ना को मतदाता के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ मुख्यमंत्री / प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल देगा।
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------क़ानून ड्राफ्ट का समापन------
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इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करवाने के लिए आप क्या सहयोग कर सकते है ?
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1. कृपया " मुख्यमंत्री कार्यालय " के पते पर पोस्टकार्ड लिखकर इस क़ानून की मांग करें। यह कानून प्रधानमंत्री जी द्वारा भी छापा जा सकता है। अत: पीएम को भी चिट्ठी लिखे।पोस्टकार्ड में यह लिखे :
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“ मुख्यमंत्री जी, कृपया प्रस्तावित दिल्ली जूरी कोर्ट क़ानून को गेजेट में छापें --- #DelhiJuryCourt , #VoteVapsiPassbook ,
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2. ऊपर दी गयी इबारत उसी तरफ लिखे जिस तरफ पता लिखा जाता है। पोस्टकार्ड भेजने से पहले पोस्टकार्ड की एक फोटो कॉपी करवा ले। यदि आपको पोस्टकार्ड नहीं मिल रहा है तो अंतर्देशीय पत्र ( inland letter ) भी भेज सकते है।
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3. "मुख्यमंत्री / प्रधानमन्त्री जी से मेरी मांग" नाम से एक रजिस्टर बनाएं। लेटर बॉक्स में डालने से पहले पोस्टकार्ड की जो फोटो कॉपी आपने करवाई है उसे अपने रजिस्टर के पन्ने पर चिपका देवें। फिर जब भी आप पीएम या सीएम को किसी मांग की चिट्ठी भेजें तब इसकी फोटो कॉपी रजिस्टर के पन्नो पर चिपकाते रहे। इस तरह आपके पास भेजी गयी चिट्ठियों का रिकॉर्ड रहेगा।
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4. आप किसी भी दिन यह चिट्ठी भेज सकते है। किन्तु इस क़ानून ड्राफ्ट के लेखको का मानना है कि सभी नागरिको को यह चिठ्ठी महीने की एक निश्चित तारीख को और एक तय वक्त पर ही भेजनी चाहिए।
तय तारीख व तय वक्त पर ही क्यों ?
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4.1. यदि चिट्ठियां एक ही दिन भेजी जाती है तो इसका ज्यादा प्रभाव होगा, और प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री कार्यालय को इन्हें गिनने में भी आसानी होगी। चूंकि नागरिक कर्तव्य दिवस 5 तारीख को पड़ता है अत: पूरे देश में सभी शहरो के लिए चिट्ठी भेजने के लिए महीने की 5 तारीख तय की गयी है। तो यदि आप Pm को ये चिट्ठी भेजते है तो सिर्फ 5 तारीख को ही भेजें।
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4.2. शाम 5 बजे इसलिए ताकि पोस्ट ऑफिस के स्टाफ को इससे अतिरिक्त परेशानी न हो। अमूमन 3 से 5 बजे के बीच लेटर बॉक्स खाली कर लिए जाते है, अब मान लीजिये यदि किसी शहर से 100-200 नागरिक चिट्ठी डालते है तो उन्हें लेटर बॉक्स खाली मिलेगा, वर्ना भरे हुए लेटर बॉक्स में इतनी चिट्ठियां आ नहीं पाएगी जिससे पोस्ट ऑफिस व नागरिको को असुविधा होगी। और इसके बाद पोस्ट मेन 6 बजे पोस्ट बॉक्स खाली कर सकता है, क्योंकि जल्दी ही वे जान जायेंगे कि पीएम को निर्देश भेजने वाले जिम्मेदार नागरिक 5-6 के बीच ही चिट्ठियां डालते है। इससे उन्हें इनकी छंटनी करने में अपना अतिरिक्त वक्त नहीं लगाना पड़ेगा। अत: यदि आप यह चिट्ठी भेजते है तो कृपया 5 बजे से 6 बजे के बीच ही लेटर बॉक्स में डाले। यदि आप 5 तारीख को चिट्ठी नहीं भेज पाते है तो फिर अगले महीने की 5 तारीख को भेजे।
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5. यदि आप फेसबुक पर है तो प्रधानमंत्री जी से मेरी मांग नाम से एक एल्बम बनाकर रजिस्टर पर चिपकाए गए पेज की फोटो इस एल्बम में रखें। यदि आप ट्विटर पर है तो मुख्यमंत्री जी एवं प्रधानमंत्री जी को रजिस्टर के पेज की फोटो के साथ यह ट्विट करें :
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" @Pmoindia , कृपया यह क़ानून गेजेट में छापें - #DelhiJuryCourt , #VoteVapsiPassbook
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6. "अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी" से प्रेरित यह एक विकेन्द्रित जन आन्दोलन है। (34) धाराओं का यह ड्राफ्ट ही इस आन्दोलन का नेता है। यदि आप भी यह मांग आगे बढ़ाना चाहते है तो अपने स्तर पर जो भी आप कर सकते है करें। यह कॉपी लेफ्ट प्रपत्र है, और आप इस बुकलेट को अपने स्तर पर छपवाकर नागरिको में बाँट सकते है। इस आन्दोलन के कार्यकर्ता धरने, प्रदर्शन, जाम, मजमे, जुलूस जैसे उन कदमों से बहुधा परहेज करते है जिससे नागरिको को परेशानी होकर समय-श्रम-धन की हानि होती हो। अपनी मांग को स्पष्ट रूप से लिखकर चिट्ठी भेजने से नागरिक अपनी कोई भी मांग Pm तक पहुंचा सकते है। इसके लिए नागरिको को न तो किसी नेता की जरूरत है और न ही मीडिया की।
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7. आप इस ड्राफ्ट के पर्चे छपवाकर नागरिको में भी बाँट सकते है। पर्चे छपवाने के लिए इसका पीडीऍफ़ एवं इस क़ानून ड्राफ्ट का मोबाईल वर्जन डाउनलोड करने के लिए कमेन्ट बोक्स कमेन्ट देखें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Feb 28 2020 17:33:10 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

क्या दिल्ली हिंसा का दोषी कपिल मिश्रा है या कोई और? आपका इस बारे में क्या कहना है?
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सोशल मीडिया एवं पेड मीडिया की फीडिंग के आधार पर इस तरह के जटिल मामले में कोई निर्णायक राय नहीं बनायी जा सकती है। मेरा मानना है कि, पूरी घटना स्क्रिप्टेड थी और पेड मीडिया के प्रायोजको के निर्देश पर पेड मीडिया पार्टियों द्वारा इसे जानबूझकर प्लांट किया गया था। कौनसी पार्टियाँ के कौनसे नेताओ की इसमें किस हद तक भूमिका है, इसका पता लगाने के लिए हमें फेयर ट्रायल की जरूरत है। नागरिको की जूरी बुलाये बिना फेयर ट्रायल होना मुमकिन नहीं है।
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अत: मेरा सुझाव है कि, दिल्ली में हुयी हिंसा के आरोपियों का जूरी ट्रायल हो और यदि जूरी सदस्यों का बहुमत अनुमति देता है तो आरोपियों का सार्वजनिक नारको टेस्ट हो। जूरी ट्रायल एवं सार्वजानिक नार्को टेस्ट द्वारा इस साजिश के सभी किरदार सामने आ जायेंगे।
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प्रस्तावित जूरी कोर्ट दिल्ली नामक क़ानून की धारा 4.4 कहती है कि -
"सभी प्रकार के सार्वजनिक प्रसारण एवं अभिव्यक्तियाँ जिनमें सभी प्रकार के दृश्य, श्रव्य, इलेक्ट्रोनिक आदि माध्यम जैसे - फ़िल्में, टीवी, समाचार पत्र, पुस्तकें, फेसबुक, यू ट्यूब आदि शामिल है -से सम्बंधित सभी प्रकार की शिकायतें एवं आपत्तियां जूरी मंडल के दायरे में आएगी।"
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इसके अलावा हिंसा, मृत्यु, गंभीर चोट कारित करना आदि मामले भी धारा 4.1. के तहत जूरी के दायरे में आते है।
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अत: इन दोनों धाराओं के तहत दिल्ली हिंसा के सभी गिरफ्तार आरोपियों पर मामला दर्ज करके जूरी ट्रायल किया जा सकता है।
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(1) जूरी मंडल का गठन :
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(1.1) जूरी सदस्यों का चयन दिल्ली राज्य की मतदाता सूचियों से लॉटरी द्वारा किया जाएगा
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(1.2) जूरी सदस्यों का आयु वर्ग 25 से 55 वर्ष के बीच होगा
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(1.3) जूरी का आकार 50 से 150 सदस्य होगा
प्रत्येक जूरी सदस्य को प्रति उपस्थिति 600 रू एवं यात्रा भत्ता मिलेगा।
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(2) मामले की सुनवाई :
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(2.1) सुनवाई सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक चलेगी। भोजन विराम दोपहर 1 बजे से 2 बजे के बीच शुरू होगा और 1 घंटे तक रहेगा। इसी तरह सुनवाई लगातार प्रत्येक दिन चलेगी।
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(2.2) मामले की सुनवाई न्यूनतम 2 दिन तक चलेगी। तीसरे दिन या उसके बाद यदि जूरी सदस्यों का बहुमत कहता है कि हमने दोनों पक्षों को पर्याप्त सुन लिया है, तो सुनवाई एक दिन और चलेगी। यदि अगले दिन बहुमत कहता है कि उन्हें और सुनना है तो सुनवाई तब तक चलती रहेगी जब तक जूरी का बहुमत सुनवाई ख़त्म करने को नही कहता।
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(2.3) सुनवाई 3 जजों की बेंच की उपस्थिति में होगी। जूरी मंडल एवं जज साथ में मामला सुनेंगे।
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(2.4) सार्वजनिक नारको टेस्ट के मामले में 75% से अधिक जूरी सदस्यों की मंजूरी आवश्यक होगी।
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(3) फैसला :
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अंतिम दिन दोनों पक्ष 1-1 घंटे तक अपना पक्ष रखेंगे। इसके बाद जूरी सदस्य 2 घंटे तक आपस में विचार मंथन करेंगे। यदि 2 घंटे बाद जूरी सदस्य ये निर्णय लेते है की उन्हें और विचार मंथन की आवश्यकता नहीं है, तो जूरी अपना फैसला सार्वजनिक करेगी। जिन धाराओं के तरह आरोपी दोषी पाए गए है उनमें निर्धारित सजाओं के अनुरूप जूरी सदस्य कारावास या आर्थिक दंड का फैसला देंगे।
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(3.1) प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला बंद लिफ़ाफ़े में ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर को सौपेंगा। बहुमत द्वारा अनुमोदित निर्णय को जूरी का फैसला फैसला माना जाएगा।
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(3.2) जूरी मंडल जो भी अंतिम फैसला देंगे उसे ट्रायल के पदासीन जज द्वारा अनुमोदित किया जाएगा। यदि जज चाहे तो जूरी के फैसले में संशोधन कर सकता है, या फैसले को पूरी तरह से पलट सकता है।
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(3.3) जज जब भी अपना फैसला लिखेगा तब वह सबसे पहले जूरी के फैसले को उद्धत करेगा। सरकारी दस्तावेजो, बुलेटिन एवं अन्य सभी जगह जहाँ पर भी फैसले को दर्ज / उद्धत किया जाएगा , वहां पर अनिवार्य रूप से सबसे पहले जूरी द्वारा दिए गए फैसले का जिक्र किया जाएगा।
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ऊपर दी गयी प्रक्रिया को गेजेट में छापकर पीएम दिल्ली हिंसा का षड्यंत्र रचने वालो का जूरी ट्रायल एवं सार्वजानिक नार्को टेस्ट* का आदेश जारी कर सकते है।
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[ कृपया ध्यान दें कि यहाँ आशय सार्वजनिक नार्को टेस्ट से है, सिर्फ नारको टेस्ट से नहीं ]
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(4) जूरी ट्रायल को लेकर पेड मीडिया का स्टेंड :
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पेड मीडिया के प्रायोजक भारत में जूरी ट्रायल एवं सार्वजानिक नारको टेस्ट का कानून लाने के सख्त खिलाफ है। अत: भारत की सभी पेड मीडिया पार्टियाँ एवं उनके नेता भी दिल्ली में हुयी हिंसा के आरोपियों का जूरी ट्रायल करने के खिलाफ है !!
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(4.1) PMP01* एवं PMP03 के नेताओ एवं कार्यकर्ताओ का कहना है कि -- दंगो की साजिश PMP02 ने रची थी। लेकिन जब PMP01 एवं PMP03 के नेताओं से पुछा जा रहा है कि PMP02 के नेता कपिल मिश्रा का जूरी ट्रायल एवं नार्को टेस्ट होना चाहिए या नहीं, तो वे इनकार कर रहे है !! उनका कहना है कि सुनवाई तो जज ही करेगा, चाहे जो जाए।
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(4.2) इसी तरह PMP02 के नेताओ एवं कार्यकर्ताओ का आरोप है कि – दंगो की साजिश PMP03 के नेता ताहिर हुसैन ने की है। लेकिन जब आप उनसे पूछेंगे कि ताहिर का सार्वजनिक रूप से नार्को टेस्ट लिया जाना चाहिए कि या नहीं, तो PMP02 के नेता भी मना कर रहे है !! उनका भी यही कहना है कि सुनवाई तो जज ही करेगा !!
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(4.3) इस बारे में आपको सोशल मीडिया पर भी विभिन्न बुद्धिजीवियों के अलग अलग स्टेंड/ राय / विचार आदि देखने को मिलेंगे। लेकिन घूम फिर कर सभी बुद्धिजीवी यही बात कहेंगे कि – सुनवाई तो जज ही करेगा, और जूरी ट्रायल किसी भी सूरत में नहीं होना चाहिए !!
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(*) PMP - पेड मीडिया पार्टी, PMP01 – कोंग्रेस, PMP02 – संघ=बीजेपी, PMP03 – आम आदमी पार्टी, PMP10 – AIMIM )
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(5) जरुरी बात : निचे दिया गया हिस्सा बुद्धिजीवियों के लिए नहीं है। बुद्धिजीवी वर्ग इस हिस्से की स्पष्ट रूप से अवहेलना करें। किन्तु यदि आप दिल्ली के निवासी है और पिछले हफ्ते भर में निचे दी गयी परिस्थिति से गुजरे है तो यह भाग आपके काम का है :
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(5.1) यदि इन दंगो में आपकी संपत्ति चपेट में आई है, और यह घाटा सहना आपके बूते से बाहर है,
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(5.2) यदि हिंसा शुरू होने के बाद आप दहशत में थे, और निरंतर पुलिस के आने को मना रहे थे,
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(5.3) यदि आपने यह नोट किया कि, हिंसा इसीलिए हुयी क्योंकि पुलिस हर जगह मौजूद नहीं थी,
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(5.4) यदि आपने इस हिंसा में अपने परिवार के किसी सदस्य को खो दिया है
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(5.5) यदि आपने नोटिस किया कि दंगाई आम नागरिको की तुलना में बेहद कम संख्या में थे, किन्तु हथियारबंद होने के कारण वे डोमिनेट कर रहे थे,
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(5.6) यदि आपने खुद को उपरोक्त परिस्थिति में पाया था तो आपको यह बात समझने की कोशिश करनी चाहिए कि हथियारबंद नागरिक समाज की रचना क्यों जरुरी है।
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इस बात पर विचार करें कि यदि दिल्ली में दंगाईयो को 1000 AK-47 पहुँचा दी जाती है, तो आप इससे कैसे निपटेंगे !! और इस बात पर भी ध्यान दें कि यदि “वे” 1000 AK-47 भेजना तय करते है तो क्या अब उन्हें ऐसे 1000 लोग दिल्ली में मिल जायेंगे।
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मेरा मानना है कि आज से 6 साल पहले ऐसे 1000 लोग दिल्ली में मौजूद नहीं थे। लेकिन पेड मीडिया ने अपने कठपुतली नेताओं की सहायता से अब स्थिति बदल दी है !! पेड मीडिया पार्टियों ने ये हालात बनाने में वाकयी काफी मेहनत की है !! अभी तो यह शुरुआत है। और क्या होगा जब अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक दिल्ली-मुंबई-हैदराबाद जैसे शहरो में कट्टरपंथियों को बड़े पैमाने पर हथियार (AK-47) भेजने लगेंगे !! मैं अपने कई जवाबो में लिख चुका हूँ कि अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक भारत में दशको तक चलने वाले हिन्दू-मुस्लिम सिविल वॉर की जमीन तैयार कर रहे है। अभी यह शुरूआत है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Feb 29 2020 17:06:52 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

जूरी कोर्ट या जूरी न्याय व्यवस्था को समझने के लिए हिंदी भाषा में कौन सी किताबें उपयुक्त रहेंगी?
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जूरी सिस्टम की जानकारी छिपाने में पेड मीडिया के प्रायोजको ने काफी एहतियात बरती है। अत: इस बारे में आपको भारत में कोई पुस्तक लिखी हुई नहीं मिलेगी। और सिर्फ हिन्दी नहीं, बल्कि जूरी सिस्टम पर आपको अंग्रेजी में भी कोई किताब लिखी हुई नहीं मिलेगी। किताब तो जाने दीजिये, आपको भारत की किसी भी प्रकार की किताब में जूरी सिस्टम पर 1 पेज भी लिखा हुआ नहीं मिलेगा !! यहाँ तक कि क़ानून की किताब में भी नहीं।
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जब तक भारत में सोशल मीडिया नहीं था तब तक सूचनाएं सिर्फ पुस्तकों के माध्यम से ही दी जा सकती थी, अत: पेड इतिहासकार, पेड राजनीती शास्त्री, पेड समाज शास्त्री, पेड मीडिया पार्टियों के नेता, पेड पत्रकार आदि यह जानकारी पूरी तरह से छिपाने में सफल रहे। किन्तु सोशल मीडिया आने के बाद विभिन्न छोटे छोटे कार्यकर्ताओ ने इस बारे में जानकारी फैलानी शुरू की। जूरी सिस्टम के बारे में भारत में जितना भी आज तक लिखा गया है, वह छोटे छोटे कार्यकर्ताओं द्वारा ही लिखा गया है। नामचीन व्यक्ति इस जानकारी को या तो छिपाते है या फिर इस बारे में गलत / अधूरी जानकारी देकर नागरिको को भ्रमित करते है।
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(1) जूरी सिस्टम एवं जूरी कोर्ट में अंतर :
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ज्यादातर देखने में आया है कि कई नागरिक जूरी सिस्टम एवं जूरी कोर्ट को मिश्रित कर देते है। किन्तु इन दोनों लफ्जो के अर्थ में अंतर है।
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(1.1) जूरी सिस्टम या जूरी प्रथा या जूरी न्याय : एक प्रकार का सिद्धांत या कोंसेप्ट या लेबल है। कोंसेप्ट होने के कारण जूरी सिस्टम के कई अर्थ निकाले जा सकते है, और इसकी अपनी सुविधा के अनुसार सही या गलत व्याख्या भी की जा सकती है। जूरी सिस्टम पर विचार करने से इस बात की जानकारी नहीं मिलती कि अमुक जूरी कैसे काम करेगी, जूरी सदस्यों का चयन कैसे होगा, वे फैसला कैसे देंगे आदि।
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(1.2) जूरी कोर्ट : जूरी कोर्ट उस ड्राफ्ट का नाम है जिसे गेजेट में छापने से भारत में जूरी कोर्ट की स्थापना होगी। जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट यह बताता है कि, जूरी कौनसे मुकदमो को सुनेगी, कौनसे मुकदमो को नहीं सुनेगी, जूरी मंडल का चयन कैसे होगा, सुनवाई कैसे चलेगी, किन लोगो को जूरी में आने का अधिकार होगा, जूरी मंडल के निर्णयों की सीमा क्या होगी, जूरी के फैसलों की अपील कहाँ हो सकेगी, और जज की इसमें क्या भूमिका होगी आदि आदि।
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कोई भी सिस्टम तब लागू होता है जब इसकी प्रक्रिया को गेजेट में निकाला जाता है। इस प्रक्रिया को ड्राफ्टिंग कहते है। “जूरी कोर्ट” उस ड्राफ्ट नाम है, जिसमें जूरी मंडलों के संचालन की प्रक्रिया दी गयी है। तो जब आप कहते है कि, भारत में जूरी सिस्टम आना चाहिए तो इससे यह मालूम नहीं होता कि आप किस तरह के जूरी सिस्टम की बात कर रहे है। किन्तु जब आप जूरी कोर्ट कहते है तो इसका आशय उस ड्राफ्ट से होता है, जिसमें जूरी के संचालन की प्रक्रिया होती है।
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लोकपाल के उदाहरण से इसे समझते है।
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ओम्बुद्समेन से आशय उस व्यवस्था के बारे में है जिसमें किसी कमेटी के पास सरकारी एवं राजनैतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने का अधिकार होता है। इसे हिन्दी में लोकपाल कहा गया। और जनलोकपाल उस ड्राफ्ट का नाम था जिसमें अरविन्द केजरीवाल ने यह प्रक्रिया दी थी कि लोकपाल की नियुक्ति कैसे होगी, कमेटी में कितने मेंबर होंगे और इसकी जाँच के दायरे में कौन आयेंगे।
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सरकार भी लोकपाल ला रही थी, लेकिन उनका ड्राफ्ट अलग था। इस तरह लोकपाल नामक कांसेप्ट के 2 ड्राफ्ट हो गए थे। एक सरकार का ड्राफ्ट, जिसे सरकारी लोकपाल कहा जाता था, और एक टीम अन्ना का ड्राफ्ट जिसे जनलोकपाल कहा जाता था। और कौनसा ड्राफ्ट गेजेट में आएगा इसे लेकर मतभेद था।
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इसी तरह से जूरी सिस्टम भी एक कोंसेप्ट है, और इसे लागू करने के लिए जो ड्राफ्टिंग है, उसका नाम जूरी कोर्ट है। जूरी सिस्टम को लागू करने के लिए जूरी कोर्ट के ड्राफ्ट को गेजेट में छापना होगा।
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जूरी सिस्टम एवं जूरी कोर्ट का यह अंतर आपको यह समझने में मदद करेगा कि कौन जूरी सिस्टम का छद्म समर्थक, और सच्चा समर्थक है। जूरी सिस्टम के सच्चे समर्थक की पहचान यह है कि उसके पास हमेशा ड्राफ्ट होता है, और वह स्पष्ट रूप से यह कहता है कि मैं इस ड्राफ्ट को गेजेट में छापने की मांग कर रहा हूँ। किन्तु छद्म समर्थक हमेशा ड्राफ्ट विहीन चर्चा में रुचि दिखायेगा। वह ड्राफ्ट की बात कभी नहीं करेगा।
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भारत में जूरी सिस्टम का एक मात्र ड्राफ्ट है, और उसका नाम जूरी कोर्ट है। भारत में आज तक किसी भी बुद्धिजीवी एवं राजनैतिक पार्टी ने जूरी सिस्टम की प्रक्रिया का ड्राफ्ट सामने नहीं रखा है !! अत: जूरी सिस्टम के संचालन को समझने का एक मात्र तरीका यह है कि जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट पढ़ा जाए।
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(2) जूरी सिस्टम एवं जूरी कोर्ट की जानकारी कहाँ से ले सकते है :
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2.1. जूरी सिस्टम पर जानकारी : जूरी सिस्टम पर भारत में जितना भी लिखा गया है वह जूरी कोर्ट के छोटे छोटे कार्यकर्ताओ एवं रिकालिस्ट्स द्वारा लिखा गया है। ये पाठ्य आपको फेसबुक, कोरा आदि सार्वजनिक मंचो पर मिल जायेंगे। इस बारे में कोई नयी जानकारी आपको किसी भी निजी वेबसाईट पर नहीं मिलेगी। जूरी कार्यकर्ता अपने पाठ्य सबसे पहले पब्लिक डोमेन में ही डालते है, और बाद में विभिन्न वेबसाईट एवं ब्लॉग चलाने वाले लोग इन्हें कॉपी करके अपनी वेबसाईट पर रख लेते है। तो अल्टीमेटली आपको ये सब ऐसे ही खोजना पड़ेगा। इसकी बारे में पूरी जानकारी हासिल करने का कोई एक केन्द्रीय स्त्रोत नहीं है, और न ही निकट भविष्य में कोई केन्द्रीय स्त्रोत कभी होने वाला है।
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2.2. जूरी कोर्ट पर जानकारी : जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट सबसे पहले 2008 में पब्लिश किया गया था। इसे 2018 में अपडेट किया गया। इस ड्राफ्ट के 3 वर्जन है।
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(2.2.1) राष्ट्रीय स्तर पर लागू हो सकने वाले ड्राफ्ट का नाम जूरी कोर्ट है, और इस ड्राफ्ट में 42 धाराएं है।
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(2.2.2) राज्य स्तर पर लागू हो सकने वाले ड्राफ्ट का नाम राज्य जूरी कोर्ट है। (34 धाराएं)
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(2.2.3) जिलो के लिए जिला जूरी कोर्ट क़ानून ड्राफ्ट। (34 धाराएं)
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ये ड्राफ्ट तो आपको इन्टरनेट के किसी भी मंच पर #JuryCourt लिखकर सर्च करने से आसानी से मिल जायेंगे। कोरा पर यह ड्राफ्ट आप जूरी कोर्ट नामक मंच पर देख सकते है। जूरी सिस्टम एवं जूरी कोर्ट की जानकारी नागरिको को देने के लिए आप भी क्षेत्रीय भाषाओ में इस बारे में लिखते रह सकते है। क्योंकि पेड मीडिया इस बारे में कोई जानकारी नहीं देगा, और जब भी देगा तो आधी अधूरी एवं भ्रमित करने वाली जानकारी ही देगा।
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(3) पेड मीडिया में जूरी सिस्टम
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1972 से 2015 तक उन्होंने इस लफ्ज को बिलकुल गायब रखा। किन्तु जब कार्यकर्ताओ ने इसके बारे में नागरिको को जानकारी देना शरू की और जानकारी फैलने लगी तो पेड मीडिया में यह लफ्ज आने लगा। फीचर फिल्म रुस्तम द्वारा उन्होंने इसकी शुरुआत की थी। "रुस्तम" जूरी सिस्टम के बारे में भ्रमित करने वाली कई सूचनाएं देती है।
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जैसे जैसे जूरी कोर्ट की मांग आगे बढ़ेगी वैसे वैसे पेड मीडिया पर टिके हुए नेताओं एवं बुद्धिजीवियों पर इस विषय पर खामोश रहना मुश्किल होता जाएगा। अत: तब पेड मीडिया के प्रायोजक इस बारे में नागरिको को गलत एवं आधी अधूरी सूचनाएं देना शुरू करेंगे, और इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखेंगे कि, जूरी सिस्टम के बारे में नकारत्मक बातें पाठको के दिमाग में डाली जाए। और ऐसा करने के लिए वे ड्राफ्ट विहीन चर्चा करेंगे, लेकिन इसका ड्राफ्ट कभी सामने नहीं रखेंगे।
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(i) उदाहरण के लिए अभी अरुणाचल प्रदेश के वरिष्ठ IPS IGP धालीवाल ने दावा किया है कि वे जूरी सिस्टम का समर्थन करते है !!!
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(ii) और इससे कुछ ही हफ्ते पहले सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी ने भी कुछ इसी तरह से जूरी सिस्टम का समर्थक होने का दावा किया था !!
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दरअसल, ये दोनों महाशय मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा लोगों का चयन करने को नहीं कह रहे है। बल्कि उनका प्रस्ताव है कि कुछ "अच्छे और बुद्धिमान" लोगों की सूची बनायी जानी चाहिए और फिर इसमें से जूरी का चयन किया जाना चाहिए।
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लेकिन बार बार पूछने पर भी ये लोग यह नहीं बता रहे है कि, "अच्छे और बुद्धिमान" व्यक्ति का निर्धारण कैसे होगा, या उनकी योग्यताएं क्या होगी। मतलब इन्हें जूरी सिस्टम का समर्थन करने में तो इंटरेस्ट है, किन्तु इसका ड्राफ्ट देने में इंटरेस्ट नहीं है !!
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इन्होने इसके लिए कोई प्रक्रिया या ड्राफ्ट नहीं दिया है। आगे भी जूरी कोर्ट की जानकारी आगे बढ़ने के साथ पेड मीडिया में नजर आने वाले इस तरह के कई लोग जूरी सिस्टम पर बोलना शुरू करेंगे। लेकिन आप देखेंगे कि पेड मीडिया में नजर आने वाला कोई भी व्यक्ति जूरी सिस्टम का ड्राफ्ट कभी सामने नहीं रखेगा। वे सिर्फ इसकी मौखिक चर्चा करेंगे ताकि जूरी सिस्टम के बारे में गलत धारणाएं फैलायी जा सके।
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डीआईजी धालीवाल की ड्राफ्ट विहीन बकवास आप यहाँ पढ़ सकते है - Infirmities and delays in criminal justice system strengthen the case for jury trials
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सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी का ड्राफ्ट विहीन मशविरा यहाँ देखें : <https://youtu.be/YPBUpqp415o?t=22>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Feb 29 2020 20:37:59 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

यदि पीएम जूरी कोर्ट का प्रस्तावित कानून गेजेट में छाप देता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट इसे असंवैधानिक बता कर रद्द कर देता है, तो क्या किया जा सकता है ?
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जूरी कोर्ट के प्रस्तावित क़ानून की कोई भी धारा भारतीय संविधान के किसी भी अनुच्छेद एवं भारत में लागू किसी भी क़ानून की किसी भी धारा का उलंघन नहीं करती है। यहाँ तक कि पीएम को जूरी कोर्ट गेजेट में निकालने के लिए लोकसभा की अनुमति लेने की भी जरूरत नहीं है। पीएम इस पर हस्तक्षर करके सीधे गेजेट में छाप सकता है। किन्तु यह तकनिकी बिंदु है, व्यवहारिक नहीं।
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व्यवहारिक बिंदु यह है कि यदि पीएम जूरी कोर्ट गेजेट में छापता है तो सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों के पास इस क़ानून को खारिज करने की विवेकाधीन शक्ति है। और इसीलिए यह तय है कि कोई न कोई बहाना बनाकर सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज इसमें अडंगा जरुर लगायेंगे।
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और तब पीएम निम्नलिखित में से कोई या क्रमिक रूप से सभी कदम उठा सकता है :
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(i) पीएम गेजेट में सुप्रीम कोर्ट जज पर वोट वापसी की प्रक्रिया छापेगा। वोट वापसी आने के बाद भारत के नागरिक अमुक सुप्रीम कोर्ट जज को नौकरी से निकाल कर किसी ऐसे व्यक्ति को यह नौकरी दे देंगे जो जूरी कोर्ट क़ानून में अडंगा नहीं लगाए।
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(ii) यदि सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्ट जज वोट वापसी का क़ानून भी ख़ारिज कर देता है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज के खिलाफ संसद में महाभियोग लाएगा। पीएम महाभियोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को नौकरी से निकालकर अपने किसी भी वफादार को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है।
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(iii) यदि महाभियोग गिर जाता है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-भतीजो आदि के खिलाफ सीबीआई लगाकर उलटे सीधे मुकदमे कायम करेगा और उन्हें जेल में डाल देगा। पीएम इसके लिए लोकसभा के प्रस्ताव का इस्तेमाल करेगा। ज्ञातव्य है कि लोकसभा को यह शक्ति है कि वह देश के किसी भी व्यक्ति को बिना कोई मुकदमा चलाये जेल में डाल सकती है। और इसकी अपील अदालत में नहीं की जा सकती।
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(iv) पीएम गेजेट में जनमत संग्रह की प्रक्रिया छापेगा, और देश के सामने यह प्रश्न रखेगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज को नौकरी से निकाल दिया जाना चाहिए। यदि 51% मतदाता जनमत संग्रह में “हाँ” दर्ज कर देते है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को निकाल देगा। जनमत संग्रह में यदि कोई प्रस्ताव पास हो जाता है तो फिर उसे लोकसभा या राज्यसभा द्वारा रोका नहीं जा सकता।
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(v) यदि जनमत संग्रह के पास होने के बावजूद सांसद इसमें अडंगा करते है तो पीएम सांसदों पर वोट वापसी का क़ानून छापेगा ताकि नागरिक जूरी कोर्ट का विरोध कर रहे सांसदों को निकाल कर नए सांसद भेज सके।
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(vi) यदि सांसद वोट वापसी के दायरे में आने से इनकार करते है तो पीएम लोकसभा भंग करके नए चुनावो की घोषणा करेगा। नए चुनावों में वे सभी सांसद हार जायेंगे जो जूरी कोर्ट के विरोध में थे, और वे प्रत्याशी जीत कर संसद में जायेंगे जो जूरी कोर्ट के समर्थन में है।
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ये सब सीधे तरीके है। इसके अलावा पीएम टेढ़े तरीको का इस्तेमाल करके भी सुप्रीम कोर्ट जज को काबू कर सकता है :
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पीएम इमरजेंसी का प्रस्ताव पास करेगा, और सुप्रीम कोर्ट बंद करवा देगा। आपातकाल लगाने के बाद पीएम जीतने मर्जी उतने क़ानून छाप सकता है और सुप्रीम कोर्ट इन कानूनों का रिव्यू नहीं कर सकता। आपातकाल लगाने के बाद पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को उसके रिश्तेदारों के एनकाउन्टर वगेरह करने की धमकी भी दे सकता है। पीएम के पास सेना और मिलिट्री होती है।
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अत: यदि पीएम बल प्रयोग करने पर आये तो सुप्रीम कोर्ट जज को 2 मिनिट में ठिकाने कर सकता है। हालांकि मेरे विचार में पीएम को आपातकाल लगाकर इस तरह की हिंसात्मक कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है, और न ही उसे इस दिशा में कदम उठाना चाहिए। ऐसे कई सीधे और कानूनी तरीके मौजूद है जिनका इस्तेमाल करके पीएम लोकतान्त्रिक तरीके से सुप्रीम कोर्ट जज को चित कर सकता है।
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यदि पीएम लोकतान्त्रिक तरीके से यह स्थापित कर देता है कि, सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्ट जज नागरिको के बहुमत की मंशा के खिलाफ जा रहा है तो अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी(*) सक्रीय होकर सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज से मुलाक़ात करने को तत्पर हो जायेंगे। और इससे पहले कि अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी सुप्रीम कोर्ट जज से मुलाक़ात करें सुप्रीम कोर्ट जज या तो इस्तीफा दे देगा या फिर जूरी कोर्ट में अडंगा लगाना बंद कर देगा।
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तो मेरे विचार में सही तरीका यह है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज जूरी कोर्ट क़ानून में अडंगा लगाते है तो पीएम इस स्थिति को लोकतान्त्रिक तरीके से निपटाए, बल प्रयोग से नहीं।
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(*) अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी लोकतंत्र के रक्षक है। जब सत्ता में बैठा कोई व्यक्ति स्पष्ट बहुमत के खिलाफ जाता है तो जिन भी लोगो में अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी का अंश है वे लोकतन्त्र की पुनर्स्थापना के लिए आवश्यक कदम उठाते है। यहाँ इस बात पर ध्यान देना जरुरी है कि अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी अपने विवेक से सही गलत का फैसला नहीं करते। वे बस लोकतान्त्रिक मूल्यों का पालन करते है।
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अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह जी, अहिंसामूर्ती महात्मा मदन लाल जी धींगरा, अहिंसामूर्ती महात्मा चंद्रशेखर आजाद आदि उधम सिंह जी के ही प्रकार थे, और गोरो द्वारा लोकतंत्र की अवहेलना किये जाने के कारण वे अपने अपने तरीके से विभिन्न परिस्थितियों में गोरो से मुलाक़ात करते रहते थे।
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काम की बात : लोकतान्त्रिक तरीके से पीएम सिर्फ तभी आगे बढ़ पायेगा जब कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग जूरी कोर्ट क़ानून का समर्थन करें। यदि देश के नागरिको को जूरी कोर्ट के क़ानून के बारे में कोई जानकारी नहीं है, और न ही कार्यकर्ताओ में इस क़ानून का समर्थन मौजूद है, तो पीएम को जनता का समर्थन नहीं मिलेगा, और पीएम सुप्रीम कोर्ट जज के आगे टिक नहीं पायेगा।
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वजह यह है कि सुप्रीम कोर्ट जज को पेड मीडिया के प्रायोजको का समर्थन प्राप्त है। अत: जब सुप्रीम कोर्ट जज जूरी कोर्ट को ख़ारिज करेगा तो देश के सभी मीडिया हाउस, सभी पेड मीडिया पार्टियाँ एवं उनके नेता, सभी सांसद, सभी पेड बुद्धिजीवी, सभी पेड संविधान विशेषग्य, सभी पेड कलाकार आदि सुप्रीम कोर्ट जज के पक्ष में एवं जूरी कोर्ट केविरोध में खड़े हो जायेंगे।
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आम असूचित नागरिक पेड मीडिया द्वारा संचालित इस गिरोह की चपेट में आकर पीएम के कदम का विरोध करना शुरू कर देंगे, या कम से कम पीएम का समर्थन नहीं करेंगे। ऐसी स्थिति में पीएम इस गिरोह से निपट नहीं सकता। पीएम इस गैंग से सिर्फ तब निपट सकता है जब पीएम को कम से कम 8 से 10 लाख ऐसे कार्यकर्ताओ का समर्थन हासिल हो, जो जूरी कोर्ट के ड्राफ्ट के समर्थन में है, और पेड मीडिया की गिरफ्त से बाहर है।
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सार यह है कि, जूरी कोर्ट जैसा क़ानून पीएम के चाहने भर से रातों रात देश में लागू नहीं किया जा सकता। इसका सिर्फ एक रूट यह है कि बिना पेड मीडिया की सहायता के भारत में कम से कम 10 लाख कार्यकर्ताओ को जूरी कोर्ट क़ानून का समर्थन करने के लिए तैयार किया जाए। और 10 लाख कार्यकर्ताओं तक पहुँचने के लिए कम से कम 10 करोड़ नागरिको तक जूरी कोर्ट ड्राफ्ट की जानकारी पहुंचानी होगी। वो भी पेड मीडिया के बिना। जाहिर है, यह काफी दुरूह एवं लम्बी प्रक्रिया है। यह काम तब और भी चुनौतीपूर्ण बन जाता है, जब पेड मीडिया के प्रायोजक जूरी ट्रायल के बारे में गलत एवं अधूरी सूचनाएं देकर लोगो को लगातार भ्रमित करते रहने वाले है।
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जूरी कोर्ट जैसे क़ानून को गेजेट में छपवाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तृत विवरण मैंने इस जवाब में दिया है। इसे पढ़े -- <https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/860322414340837/>;
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मेरा मानना है कि, जूरी ट्रायल मानव जाति द्वारा खोजा गया एक मात्र लंगर है जो सरकार को संविधान एवं इसके सिद्धांतो का पालन करने के लिए सफलतापूर्वक बाध्य कर सकता है - थॉमस जेफरसन ( अमेरिकी स्वतंत्रता के घोषणा पत्र के लेखक )
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