> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2020-02-29

Pawan Jury BhilwaraRj

जूरी कोर्ट या जूरी न्याय व्यवस्था को समझने के लिए हिंदी भाषा में कौन सी किताबें उपयुक्त रहेंगी?
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जूरी सिस्टम की जानकारी छिपाने में पेड मीडिया के प्रायोजको ने काफी एहतियात बरती है। अत: इस बारे में आपको भारत में कोई पुस्तक लिखी हुई नहीं मिलेगी। और सिर्फ हिन्दी नहीं, बल्कि जूरी सिस्टम पर आपको अंग्रेजी में भी कोई किताब लिखी हुई नहीं मिलेगी। किताब तो जाने दीजिये, आपको भारत की किसी भी प्रकार की किताब में जूरी सिस्टम पर 1 पेज भी लिखा हुआ नहीं मिलेगा !! यहाँ तक कि क़ानून की किताब में भी नहीं।
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जब तक भारत में सोशल मीडिया नहीं था तब तक सूचनाएं सिर्फ पुस्तकों के माध्यम से ही दी जा सकती थी, अत: पेड इतिहासकार, पेड राजनीती शास्त्री, पेड समाज शास्त्री, पेड मीडिया पार्टियों के नेता, पेड पत्रकार आदि यह जानकारी पूरी तरह से छिपाने में सफल रहे। किन्तु सोशल मीडिया आने के बाद विभिन्न छोटे छोटे कार्यकर्ताओ ने इस बारे में जानकारी फैलानी शुरू की। जूरी सिस्टम के बारे में भारत में जितना भी आज तक लिखा गया है, वह छोटे छोटे कार्यकर्ताओं द्वारा ही लिखा गया है। नामचीन व्यक्ति इस जानकारी को या तो छिपाते है या फिर इस बारे में गलत / अधूरी जानकारी देकर नागरिको को भ्रमित करते है।
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(1) जूरी सिस्टम एवं जूरी कोर्ट में अंतर :
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ज्यादातर देखने में आया है कि कई नागरिक जूरी सिस्टम एवं जूरी कोर्ट को मिश्रित कर देते है। किन्तु इन दोनों लफ्जो के अर्थ में अंतर है।
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(1.1) जूरी सिस्टम या जूरी प्रथा या जूरी न्याय : एक प्रकार का सिद्धांत या कोंसेप्ट या लेबल है। कोंसेप्ट होने के कारण जूरी सिस्टम के कई अर्थ निकाले जा सकते है, और इसकी अपनी सुविधा के अनुसार सही या गलत व्याख्या भी की जा सकती है। जूरी सिस्टम पर विचार करने से इस बात की जानकारी नहीं मिलती कि अमुक जूरी कैसे काम करेगी, जूरी सदस्यों का चयन कैसे होगा, वे फैसला कैसे देंगे आदि।
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(1.2) जूरी कोर्ट : जूरी कोर्ट उस ड्राफ्ट का नाम है जिसे गेजेट में छापने से भारत में जूरी कोर्ट की स्थापना होगी। जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट यह बताता है कि, जूरी कौनसे मुकदमो को सुनेगी, कौनसे मुकदमो को नहीं सुनेगी, जूरी मंडल का चयन कैसे होगा, सुनवाई कैसे चलेगी, किन लोगो को जूरी में आने का अधिकार होगा, जूरी मंडल के निर्णयों की सीमा क्या होगी, जूरी के फैसलों की अपील कहाँ हो सकेगी, और जज की इसमें क्या भूमिका होगी आदि आदि।
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कोई भी सिस्टम तब लागू होता है जब इसकी प्रक्रिया को गेजेट में निकाला जाता है। इस प्रक्रिया को ड्राफ्टिंग कहते है। “जूरी कोर्ट” उस ड्राफ्ट नाम है, जिसमें जूरी मंडलों के संचालन की प्रक्रिया दी गयी है। तो जब आप कहते है कि, भारत में जूरी सिस्टम आना चाहिए तो इससे यह मालूम नहीं होता कि आप किस तरह के जूरी सिस्टम की बात कर रहे है। किन्तु जब आप जूरी कोर्ट कहते है तो इसका आशय उस ड्राफ्ट से होता है, जिसमें जूरी के संचालन की प्रक्रिया होती है।
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लोकपाल के उदाहरण से इसे समझते है।
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ओम्बुद्समेन से आशय उस व्यवस्था के बारे में है जिसमें किसी कमेटी के पास सरकारी एवं राजनैतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने का अधिकार होता है। इसे हिन्दी में लोकपाल कहा गया। और जनलोकपाल उस ड्राफ्ट का नाम था जिसमें अरविन्द केजरीवाल ने यह प्रक्रिया दी थी कि लोकपाल की नियुक्ति कैसे होगी, कमेटी में कितने मेंबर होंगे और इसकी जाँच के दायरे में कौन आयेंगे।
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सरकार भी लोकपाल ला रही थी, लेकिन उनका ड्राफ्ट अलग था। इस तरह लोकपाल नामक कांसेप्ट के 2 ड्राफ्ट हो गए थे। एक सरकार का ड्राफ्ट, जिसे सरकारी लोकपाल कहा जाता था, और एक टीम अन्ना का ड्राफ्ट जिसे जनलोकपाल कहा जाता था। और कौनसा ड्राफ्ट गेजेट में आएगा इसे लेकर मतभेद था।
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इसी तरह से जूरी सिस्टम भी एक कोंसेप्ट है, और इसे लागू करने के लिए जो ड्राफ्टिंग है, उसका नाम जूरी कोर्ट है। जूरी सिस्टम को लागू करने के लिए जूरी कोर्ट के ड्राफ्ट को गेजेट में छापना होगा।
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जूरी सिस्टम एवं जूरी कोर्ट का यह अंतर आपको यह समझने में मदद करेगा कि कौन जूरी सिस्टम का छद्म समर्थक, और सच्चा समर्थक है। जूरी सिस्टम के सच्चे समर्थक की पहचान यह है कि उसके पास हमेशा ड्राफ्ट होता है, और वह स्पष्ट रूप से यह कहता है कि मैं इस ड्राफ्ट को गेजेट में छापने की मांग कर रहा हूँ। किन्तु छद्म समर्थक हमेशा ड्राफ्ट विहीन चर्चा में रुचि दिखायेगा। वह ड्राफ्ट की बात कभी नहीं करेगा।
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भारत में जूरी सिस्टम का एक मात्र ड्राफ्ट है, और उसका नाम जूरी कोर्ट है। भारत में आज तक किसी भी बुद्धिजीवी एवं राजनैतिक पार्टी ने जूरी सिस्टम की प्रक्रिया का ड्राफ्ट सामने नहीं रखा है !! अत: जूरी सिस्टम के संचालन को समझने का एक मात्र तरीका यह है कि जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट पढ़ा जाए।
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(2) जूरी सिस्टम एवं जूरी कोर्ट की जानकारी कहाँ से ले सकते है :
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2.1. जूरी सिस्टम पर जानकारी : जूरी सिस्टम पर भारत में जितना भी लिखा गया है वह जूरी कोर्ट के छोटे छोटे कार्यकर्ताओ एवं रिकालिस्ट्स द्वारा लिखा गया है। ये पाठ्य आपको फेसबुक, कोरा आदि सार्वजनिक मंचो पर मिल जायेंगे। इस बारे में कोई नयी जानकारी आपको किसी भी निजी वेबसाईट पर नहीं मिलेगी। जूरी कार्यकर्ता अपने पाठ्य सबसे पहले पब्लिक डोमेन में ही डालते है, और बाद में विभिन्न वेबसाईट एवं ब्लॉग चलाने वाले लोग इन्हें कॉपी करके अपनी वेबसाईट पर रख लेते है। तो अल्टीमेटली आपको ये सब ऐसे ही खोजना पड़ेगा। इसकी बारे में पूरी जानकारी हासिल करने का कोई एक केन्द्रीय स्त्रोत नहीं है, और न ही निकट भविष्य में कोई केन्द्रीय स्त्रोत कभी होने वाला है।
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2.2. जूरी कोर्ट पर जानकारी : जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट सबसे पहले 2008 में पब्लिश किया गया था। इसे 2018 में अपडेट किया गया। इस ड्राफ्ट के 3 वर्जन है।
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(2.2.1) राष्ट्रीय स्तर पर लागू हो सकने वाले ड्राफ्ट का नाम जूरी कोर्ट है, और इस ड्राफ्ट में 42 धाराएं है।
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(2.2.2) राज्य स्तर पर लागू हो सकने वाले ड्राफ्ट का नाम राज्य जूरी कोर्ट है। (34 धाराएं)
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(2.2.3) जिलो के लिए जिला जूरी कोर्ट क़ानून ड्राफ्ट। (34 धाराएं)
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ये ड्राफ्ट तो आपको इन्टरनेट के किसी भी मंच पर #JuryCourt लिखकर सर्च करने से आसानी से मिल जायेंगे। कोरा पर यह ड्राफ्ट आप जूरी कोर्ट नामक मंच पर देख सकते है। जूरी सिस्टम एवं जूरी कोर्ट की जानकारी नागरिको को देने के लिए आप भी क्षेत्रीय भाषाओ में इस बारे में लिखते रह सकते है। क्योंकि पेड मीडिया इस बारे में कोई जानकारी नहीं देगा, और जब भी देगा तो आधी अधूरी एवं भ्रमित करने वाली जानकारी ही देगा।
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(3) पेड मीडिया में जूरी सिस्टम
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1972 से 2015 तक उन्होंने इस लफ्ज को बिलकुल गायब रखा। किन्तु जब कार्यकर्ताओ ने इसके बारे में नागरिको को जानकारी देना शरू की और जानकारी फैलने लगी तो पेड मीडिया में यह लफ्ज आने लगा। फीचर फिल्म रुस्तम द्वारा उन्होंने इसकी शुरुआत की थी। "रुस्तम" जूरी सिस्टम के बारे में भ्रमित करने वाली कई सूचनाएं देती है।
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जैसे जैसे जूरी कोर्ट की मांग आगे बढ़ेगी वैसे वैसे पेड मीडिया पर टिके हुए नेताओं एवं बुद्धिजीवियों पर इस विषय पर खामोश रहना मुश्किल होता जाएगा। अत: तब पेड मीडिया के प्रायोजक इस बारे में नागरिको को गलत एवं आधी अधूरी सूचनाएं देना शुरू करेंगे, और इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखेंगे कि, जूरी सिस्टम के बारे में नकारत्मक बातें पाठको के दिमाग में डाली जाए। और ऐसा करने के लिए वे ड्राफ्ट विहीन चर्चा करेंगे, लेकिन इसका ड्राफ्ट कभी सामने नहीं रखेंगे।
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(i) उदाहरण के लिए अभी अरुणाचल प्रदेश के वरिष्ठ IPS IGP धालीवाल ने दावा किया है कि वे जूरी सिस्टम का समर्थन करते है !!!
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(ii) और इससे कुछ ही हफ्ते पहले सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी ने भी कुछ इसी तरह से जूरी सिस्टम का समर्थक होने का दावा किया था !!
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दरअसल, ये दोनों महाशय मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा लोगों का चयन करने को नहीं कह रहे है। बल्कि उनका प्रस्ताव है कि कुछ "अच्छे और बुद्धिमान" लोगों की सूची बनायी जानी चाहिए और फिर इसमें से जूरी का चयन किया जाना चाहिए।
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लेकिन बार बार पूछने पर भी ये लोग यह नहीं बता रहे है कि, "अच्छे और बुद्धिमान" व्यक्ति का निर्धारण कैसे होगा, या उनकी योग्यताएं क्या होगी। मतलब इन्हें जूरी सिस्टम का समर्थन करने में तो इंटरेस्ट है, किन्तु इसका ड्राफ्ट देने में इंटरेस्ट नहीं है !!
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इन्होने इसके लिए कोई प्रक्रिया या ड्राफ्ट नहीं दिया है। आगे भी जूरी कोर्ट की जानकारी आगे बढ़ने के साथ पेड मीडिया में नजर आने वाले इस तरह के कई लोग जूरी सिस्टम पर बोलना शुरू करेंगे। लेकिन आप देखेंगे कि पेड मीडिया में नजर आने वाला कोई भी व्यक्ति जूरी सिस्टम का ड्राफ्ट कभी सामने नहीं रखेगा। वे सिर्फ इसकी मौखिक चर्चा करेंगे ताकि जूरी सिस्टम के बारे में गलत धारणाएं फैलायी जा सके।
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डीआईजी धालीवाल की ड्राफ्ट विहीन बकवास आप यहाँ पढ़ सकते है - Infirmities and delays in criminal justice system strengthen the case for jury trials
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सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी का ड्राफ्ट विहीन मशविरा यहाँ देखें : <https://youtu.be/YPBUpqp415o?t=22>;
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