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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Oct 01 2020 20:36:40 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Pm को खुला आदेश-पत्र भेजने पर प्रश्न उत्तर श्रुंखला : भाग 1
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(01) मुझे पीएम को खुला आदेश-पत्र क्यों भेजना चाहिए ?
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आपको आदेश-पत्र सिर्फ तब भेजना है जब आप पीएम से कुछ “कहना” चाहते है। यदि आपको सरकार से कोई शिकायत है, या आपके पास कोई सुझाव या मांग है तब ही आपको पीएम को आदेश-पत्र भेजना है, अन्यथा नहीं। जब आप पीएम से कुछ कहना ही नहीं चाहते तो आदेश भेजने का या नहीं भेजने की बात यहीं पर ख़त्म हो जाती है !! आदेश सिर्फ उन्हें भेजना चाहिए जो पीएम से कुछ कहना चाहते है !!
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(02) पीएम तो इलुमिनाटी-बिल गेट्स के हाथो बिका हुआ है, तो उसे चिट्ठियां भेजने से क्या होगा ?
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इलुमिनाटी और बिल गेट्स तो वोट मांगने के लिए हमारे पास नहीं आते है। जो आदमी चुनाव लड़ने आता है, हम उसके सामने ही तो अपनी मांग रखेंगे। जो आदमी चुनाव में ही नहीं आ रहा है, उसे हम कहेंगे भी क्यों और वह सुनेगा भी क्यों !!
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CAA पीएम ने पास किया, धारा 370 ख़त्म करने के कागज पर भी पीएम ने साइन किये, जीएसटी भी पीएम लाया, लॉकडाउन भी पीएम के साइन से लागू हुआ, और अभी कृषि बिल भी पीएम ने साइन करके पास किए है। क्या आप चाहते है कि सारे किसान फ्लाईट पकड़ कर पहले अमेरिका जाए और फिर बिल गेट्स के घर के सामने प्रदर्शन करें !! और पीएम को क्लीन चिट दे दें !! यूं ?
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(03) मेरा मतलब है कि पीएम को लिखित में आदेश भेजने से कुछ फर्क पड़ने वाला नहीं है !!
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वो बात हम भी मानते है कि, पीएम को इक्का दुक्का आदेश पत्र (पोस्टकार्ड, इनलैंड लेटर, बुक पोस्ट आदि) से कोई फर्क नहीं पड़ता, किन्तु जब करोड़ो नागरिक पीएम को लिखित में आदेश भेजेंगे तो पीएम को अमुक मांग मानने के लिए बाध्य किया जा सकता है। तो हम यह कभी नहीं कहते कि, पीएम को चिट्ठी भेजने से पीएम मान ही जाएगा।
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हम कहते है कि जब ज्यादा से ज्यादा नागरिक पीएम को खुला आदेश पत्र भेजेंगे तो पीएम पर दबाव बनना शुरू हो जायेगा। और पीएम पर दबाव इसीलिए बनेगा क्योंकि पीएम एवं उसकी पार्टी को हर 5 साल में 3 बार चुनाव लड़ने के लिए जनता के पास आना पड़ता है।.और तब पीएम को यह फैसला लेना पड़ेगा कि, यदि वह धनिकों को लाभ पहुँचाने के लिए जनता की मांग की अवहेलना करेगा तो वह और उसकी पार्टी चुनाव हार जायेगी।
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(04) आप कितनी भी चिट्ठियां भेजो पीएम इन्हें फाड़ कर फेंक देगा, और मामला रफा दफा हो जाएगा !!
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असल में, चिट्ठी डालने के लिए नागरिको को सड़को पर लगे पोस्ट बॉक्स तक आना होता है। मतलब, जब पीएम के पास किसी महीने में लाखों/करोड़ो चिट्ठियां पहुंचेगी तो इसका मतलब है कि करोड़ो नागरिक एक तय दिन को तय समय पर (5 तारीख को 5 बजे) सड़को पर आ रहे है। और यह संख्या क्रमिक रूप से प्रत्येक महीने एवं उसके अगले महीने निरंतर बढती चली जायेगी। पीएम आदेश पत्र फाड़कर फेंक सकता है, किन्तु आदमियों को फाड़ कर फेंक नहीं सकता। ये चिट्ठियां, वर्चुअल नहीं है, प्रत्येक चिट्ठी के पीछे निम्नलिखित चीजे है :
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(a) सड़क पर खड़ा होकर पीएम से मांग करने वाला नागरिक है।
(b) उसके हाथ में एक My Letters to Pm नामक रजिस्टर है।
(c) इस रजिस्टर में आदेश पत्र की फोटोकॉपी है।
(d) फेसबुक प्रोफाइल पर चिट्ठी एवं रजिस्टर की फोटो है।
(e) लोगो के समूह चित्र है, जो प्रत्येक जिले से आदेश भेज रहे है।
(f) चिठ्ठी डालते हुए वीडियो है।
(g) और प्रत्येक चिट्ठी के साथ एक ट्विट है।
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मतलब जब 1 करोड़ नागरिक खुले आदेश पत्र भेज रहे होंगे तो ऊपर दिए गए प्रत्येक बिन्दु के तहत होने वाली गतिविधीयों की संख्या भी 1 करोड़ होगी, और यदि खुला आदेश भेजने वालो की संख्या 2 करोड़ हो जाती है तो यह 2 करोड़ होगी। हर जिले, तहसील, कस्बे, गाँव में पोस्टकार्ड भी मिलते है, और पोस्ट बॉक्स भी होता है। अत: यहाँ ऐसी कोई व्यवहारिक वजह नहीं है जो इस संख्या को करोड़ो की संख्या तक जाने से रोक सके।
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(05) मेरे विचार में आपको “पहले” लोगो को “जागरूक” करना चाहिए !!
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मैं “जागरूक करने” (aware) की जगह पर “सूचित करने” (Inform) में मानता हूँ, और इसी शब्द का इस्तेमाल करता हूँ। और मैं “पहले” की जगह चीजो को “साथ साथ” करने में मानता हूँ।
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तो हम महीने में 29 दिन तक नागरिको को विभिन्न राजनैतिक-धार्मिक-सामाजिक तथ्यों / समस्याओं के बारे में “सूचित” (आपके शब्दों में “जागरूक”) करते है, और महीने में सिर्फ एक दिन खुला आदेश भेजने को कहते है। इस तरह चिट्ठी डालने में व्यक्ति को महीने में सिर्फ एक दिन के लिए 30 मिनिट से 60 मिनिट तक ही खर्च करना होता है। और शेष 29 दिनों में कोई भी नागरिक जो मर्जी करते रह सकता है। हम किसी को नहीं कहते कि रोज दिन में 4 बार फेसबुक पोस्ट की तरह डब्बे पर जाकर चिट्ठी डालनी है।
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29 दिन तक व्यक्ति नागरिको को सूचित (आपके शब्दों में “जागरूक”) कर रहा है, और सिर्फ एक दिन वह पीएम को अमुक मांग के बारे में सूचित (आपके शब्दों में “जागरूक”) कर रहा है। तो यहाँ दोनों चीजे साथ साथ चल रही है। जबकि आप चाहते है कि, दोनों चीजे साथ साथ नहीं चलनी चाहिये !!
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(06) खुला आदेश पत्र भेजने के लिए कह कर आप कार्यकर्ताओ का टाइम ख़राब कर रहे है !!
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आपके इस प्रश्न का जवाब ऊपर बाले प्रश्न में दिया जा चुका है। चिट्ठी सिर्फ महीने में एक दिन (5 तारीख को 5 बजे) डालनी है। और ऐसा नहीं है कि, नागरिको को टिफिन लेकर सुबह 10 बजे पोस्ट बॉक्स पर जाना है, और शाम 5 बजे तक वहीँ पर खड़े रहना है। चिट्ठी डालने में आने जाने का समय भी जोड़ ले तो 30 से 60 मिनिट अधिकतम लगते है।
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अत: टाइम ख़राब करने वाला आपका ऐतराज यहाँ ठीक प्रतीत नहीं होता। किन्तु फिर भी आप इसे जाया तौर पर फिर से रेखांकित कर रहे है तो यह आपकी मंशा बताता है।
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(07) चिट्ठी भेजने की जगह यदि लोग धरना, प्रदर्शन, जुलुस आदि निकालेंगे तो पीएम पर ज्यादा असर पड़ेगा !!
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हमने कभी नहीं कहा कि नागरिको को धरना, प्रदर्शन, जुलुस जैसी गतिविधियाँ नहीं करनी चाहिए। बस, हम इन गतिविधियों पर ज्यादा भार नहीं देते। हम सिर्फ अनशन आदि नौटंकी के खिलाफ है, लेकिन धरना, प्रदर्शन, जुलुस का विरोध नहीं करते है। जिसे जो करना है कर सकते है। हम इतना ही कहते है कि, नागरिको को खुला आदेश पत्र भेजना चाहिए। शेष जो करना है, करो।
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चिट्ठी भेजने के लिए हम इसीलिए कहते है क्योंकि चिट्ठी भेजने के लिए नागरिक को किसी नेता की जरूरत नहीं होती है। जबकि धरना, प्रदर्शन, जुलुस आदि को आयोजित करने के लिए एक नेता की जरूरत होती है। यह एक बड़ी वजह है कि स्पॉट लाईट में आने के इच्छुक एवं नेता बनने की मानसिकता वाले कार्यकर्ता-नेता पीएम को खुला आदेश पत्र भेजने का विरोध करते है, किन्तु स्वयं के "नेतृत्व" में धरना, प्रदर्शन, जुलुस, मजमे आदि जमाव बनाने में उनकी काफी रुचि होती है !!
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और फिर भी हम यह नहीं कहते है कि सिर्फ चिट्ठी भेजकर रुक जाओ। हम कहते है कि आपकी जो इच्छा हो करो, किन्तु पीएम को खुला आदेश अवश्य भेजो। किन्तु नेता बनने की मानसिकता वाले व्यक्ति हमेशा नागरिको को यह बात विशेष रूप से कहते है कि पीएम को लिखित में खुला आदेश पत्र मत भेजो !! तो वे चिट्ठी भेजेने का विरोध इसीलिए करते है, क्योंकि इससे उनके नेता बनने के अवसर सिकुड़ जाते है।
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(08) पीएम को खुला आदेश पत्र भेजने से अच्छा है कि क्रांति की जाए
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देखिये, मैं अपने जीवन में ऐसे हजारो लोगो से मिला हूँ जिनकी जबान की नोक पर “क्रांति होनी चाहिए” का डाइलोग रखा रहता है। मेरे मोहल्ले में भी 2-3 व्यक्ति है, और मेरी फेसबुक सूची में भी 100 से ज्यादा यूजर है जो “क्रांति की जरूरत” बताते है।
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किन्तु जब भी मैं उनसे पूछता हूँ कि “क्रांति करने का फोर्मेट” क्या है, मतलब -- मुझे किस जगह पर कितनी बजे क्रांति करने के लिए पहुंचना है, और साथ मैं क्या क्या सामान लाना है, तो वे बुरा मान जाते है।
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वे इस बारे में कोई स्पष्ट रूप रेखा नहीं देते। वे हमेशा कहते है कि, आप हमसे जुड़े रहिये, क्रांति का दिन तारीख एवं समय हम “बाद में” बताएँगे !!
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जब मैं कहता हूँ कि नागरिको को चिट्ठी भेजनी है तो मैंने इसका फोर्मेट लिखित में सामने रखा हुआ है कि, कोई भी नागरिक प्रत्येक महीने की 5 तारीख को 5 बजे आदेश-पत्र भेज सकता है। और चिट्ठी वह किसी भी पोस्ट ऑफिस से ले सकता है।
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चिट्ठी भेजने का तरीका कमतर है या बेहतर है, यह एक दीगर विषय है । किन्तु इसकी रूपरेखा स्पष्ट है। किन्तु क्रांति के पैरोकार इसकी रूपरेखा स्पष्ट नहीं करते। अत: नागरिको को क्रांति करने वाले नेताओं के अगले निर्देशों का इंतजार करते रहना होता है ।
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और ठीक है, आपको क्रांति करनी है तो क्रांति कर दो। हमने तो किसी से नहीं कहा कि, क्रांति नहीं करनी चाहिए। लेकिन पीएम को खुला आदेश पत्र भेजने से क्रांति किस तरह फेल हो जाएगी यह बात समझ से बाहर है। दरअसल, नेता बनने की मानसिकता वाले कार्यकर्ता एवं नेता नागरिक आन्दोलन के ऐसे तरीके का इस्तेमाल करने को तरजीह देते है, जिसे संचालित करने के लिए हमेशा नेता एवं उसके क्रमिक निर्देशों की जरूरत पड़े, और उनका चेहरा उभरकर आये।
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इसीलिए वे लोग क्रांति करें या न करें किन्तु पीएम को खुला आदेश पत्र भेजने का विरोध अवश्य करते है।
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अत: हमारा मानना है कि, यदि कोई कार्यकर्ता-नेता धरनों, प्रदर्शन, जुलुस, मजमे, जमाव, क्रांति आदि गतिविधियाँ कर रहा है किन्तु पीएम को खुला आदेश पत्र भेजने से इनकार कर रहा है तो नागरिको को ऐसे व्यक्ति को संदेह की नजरो से देखना शुरू कर देना चाहिए।
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पीएम को लिखित में खुला आदेश पत्र भेजने के तरीके को लेकर यदि आपके पास और कोई प्रश्न / ऐतराज हो तो, इस थ्रेड के कमेन्ट में बॉक्स में जोड़ सकते है। मैं प्रश्नमाला की अगले श्रुंखला में इन्हें शामिल करूँगा।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Oct 05 2020 19:03:47 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

नागरिक कर्तव्य दिवस - प्रत्येक माह की 5 तारीख़
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आज पीएम एवं सीएम को 2 पोस्टकार्ड भेजे गए :
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(1) मुख्यमंत्री को निर्देश दिया है कि सिक्योर का कम्पनी का अनुबंध समाप्त करके भीलवाड़ा के बिजली बोर्ड का पुन: राष्ट्रीयकरण करें । #ExpelSecure
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(2) पीएम को #JuryCourt गेजेट में छापने के लिए निर्देश भेजा ।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Oct 07 2020 05:46:50 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

पैड मीडिया की ताक़त - “FDI जनित विकास” एक घोटाला है। किंतु वे इसे एक “उपलब्धि” की तरह स्थापित कर देते है।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Oct 10 2020 20:35:47 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

टिप्पणी से प्रश्न : बस यह समझ नही आता मोदी साहब इतने पैसो को खर्च किस प्रकार करते है ?
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उत्तर : प्रत्येक चेनल हर महीने अपनी दर्शक संख्या के अनुपात में लगभग 50 लाख से 5 करोड़ का घाटा बनाता है। NDTV को शामिल करते हुए मुख्यधारा में लगभग 25 चेनल है। इस हिसाब से उनका सकल अनुमानित घाटा 2*25 = 50 करोड़ महिना है !! और लगभग इतना ही घाटा मुख्यधारा के अख़बार बनाते है। मतलब - 50*2 = 100 करोड़ !!
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और लगभग 10 करोड़ महीने का आई टी सेल के प्रोफेशनल्स, स्टाफ आदि के वेतन आदि !! और पेड मीडिया एवं सोशल मीडिया जैसे जैसे विस्तार कर रहा है इसका घाटा उठाने यह खर्चा लगातार बढ़ता जा रहा है !!

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यह 100–125 करोड़ महीने का खर्चा है जो पीएम को अपनी कुर्सी पर बने रहने के लिए करना होता है !! और चुनाव में यह खर्चा लगभग 5 से 10 गुना हो जाता है !! जब मनमोहन सिंह जी पीएम थे तो उनको भी यह घाटा उठाना होता था और मोदी साहेब को भी उठाना पड़ता है !!

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तो पीएम बहुरष्ट्रीय कंपनियों एवं टाटा-अम्बानी-अडानी आदि समूहों को अतिरिक्त मुनाफा देने वाले क़ानून छापता है और बदले में इन कम्पनियों के मालिक पेड मीडिया को पेमेंट करते है कि वे पीएम की छवि टिकाए रखने के हिसाब से प्रसारण करें।
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उदाहरण के लिए मोदी साहेब ने टाटा को झारखण्ड में 1 रूपये में कोयला खोदने के राइट्स जारी रखने के आदेश दिए हुए है। यदि मोदी साहेब ये राइट्स केंसिल कर देते है, तो टाटा अतिरिक्त मुनाफा बनाना बंद कर देगा। तब वह पेड मीडिया कर्मियों से कहेगा कि वे मोदी साहेब के कपड़े फाड़ना शुरू करें। और तब पेड मीडिया ऐसी खबरें निकाल निकाल कर दिखाने लगेगा कि, 2 हफ्ते में जनता पीएम के 10,000 पुतले फूंक देगी !!

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मोदी साहेब और आरएसएस की आय का स्त्रोत जीरो है !! फुटकर भ्रष्टाचार एवं गबन द्वारा नियमित रूप से इतने बड़े पैमाने पर पैसा नहीं बनाया जा सकता कि मीडिया का नियमित घाटा उठाया जा सके !! इतना पैसा सिर्फ क़ानून छाप कर ही बनाया जा सकता है !! अत: वे धनिकों को मुनाफा देने वाले क़ानून छापते है, और बदले में धनिक पेड मीडिया का घाटा उठाते है।
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ये जितना ही पेड मीडिया हाउस आप देख रहे है, ये वे शिकारी शिकारी कुत्ते है, जो पीएम को 24*7 घंटे घेर कर रखे हुए है। जितने ज्यादा लोगो को पेड मीडिया अपनी गिरफ्त में ले लेता है पीएम का खर्चा उतना ही बढ़ जाता है।
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दुसरे शब्दों में, पीएम पर जनता का लगभग शून्य दबाव होता है। जनता एवं पीएम के बीच में पेड मीडिया के स्पोंसर्स है। मीडियाकर्मी जनता को अंगेज करके रखते है, और बदले में पेड मीडिया के प्रायोजक पीएम को ब्लेकमेल करते है !!
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समाधान – #JuryCourt गेजेट में छापे बिना इस सर्कस को रोका नहीं जा सकता है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 11 2020 19:30:34 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

क्यों साधारण व्यक्ति द्वारा कही गई गूढ़ बात भी उतनी असरकारक नहीं होती जितनी प्रसिद्ध व्यक्ति द्वारा कही गई साधारण सी बात ?
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(a1) मानव स्वभाव है कि वह हमेशा ख़ास बात सुनना चाहता है !!
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(a2) किन्तु साथ ही व्यक्ति अनजाने में यह शर्त लगाता है कि, वह अमुक ख़ास बात सिर्फ ख़ास व्यक्ति के मुंह से ही सुनेगा, आम व्यक्ति के मुंह से नहीं !!
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व्यक्ति खास व्यक्ति के मुंह से ही ख़ास बात सुनने की शर्त क्यों लगाता है ?
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क्योंकि जब कोई बात कही जाती है तो बात को सुनने से ठीक पहले या सुनने के दौरान व्यक्ति को नहीं पता होता कि अमुक बात ख़ास है या नहीं। तो व्यक्ति को कोई बात सुनने से पहले ही यह तय करना होता है कि अमुक बात ख़ास है या नहीं।
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चूंकि सभी व्यक्ति चाहते है कि उनकी बात को महत्त्वपूर्ण मानकर सुना जाए इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति अपनी बात को ख़ास बात कहकर ही प्रचारित करेगा, और संभावित श्रोता के पास ऐसा कोई तरीका नहीं है कि वह अमुक बात को सुनने से पहले यह पता लगा सके कि, अमुक बात ख़ास है या नहीं।
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अत: वह किसी कथ्य को फिल्टर आउट करने के लिए स्वभाविक रूप से एक बेहद सीधे एवं सरल तरीके का इस्तेमाल करता है – वह तय करता है कि, मैं खास आदमी के मुंह से कोई बात सुनूंगा। व्यक्ति यह मानकर चलता है कि, यदि ख़ास आदमी कोई बात कह रहा है तो उसकी बात भी ख़ास ही होगी।
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(b1) व्यक्ति का स्वभाव है कि वह हमेशा ख़ास बात सुनना चाहता है !!
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(b2) व्यक्ति मानता है कि एक ख़ास आदमी जो भी बात कहेगा वह बात खास ही होगी।
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(b3) चूंकि व्यक्ति ख़ास बात सुनना चाहता है अत: व्यक्ति हमेशा किसी ख़ास आदमी को सुनने के लिए आतुर रहता है। और उसे ख़ास बात की तरह ही ग्रहण करता है !!
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तो जब कोई बात किसी ख़ास व्यक्ति द्वारा कही जाएगी तो उसे श्रोता भी ज्यादा मिलेंगे और प्रथम चरण में ज्यादातर दर्शको पर अमुक बात का तात्कालिक असर भी ज्यादा होगा। हालांकि, यदि कही गयी बात में कोई खासियत नहीं है तो वक्त गुजरने के साथ ही श्रोता यह समझ जाता है कि, कही गयी अमुक बात में कोई तत्व नहीं था। किन्तु कभी कभी समझ जाने की यह प्रक्रिया सालों और दशको ले लेती है।
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(1c) व्यक्ति का स्वभाव है कि वह हमेशा ख़ास बात सुनना चाहता है !! और वह ख़ास बात सिर्फ ख़ास आदमी के मुंह से ही सुनना चाहता है।
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(2c) व्यक्ति यह मानकर चलता है कि मीडिया में जो भी आदमी आता है, वह हमेशा ख़ास होता है।
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(3c) पेड मीडिया किसी व्यक्ति को टीवी / अख़बार में लाता है और इस तरह वह एक आम व्यक्ति को ख़ास व्यक्ति बना देता है।
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(4c) यदि व्यक्ति खास है तब भी, और आम है तब भी – पेड मीडिया उसके मुंह / कलम से एक अतार्किक एवं बकवास बात कहलवाता है।
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चूंकि व्यक्ति मीडिया में आने वाले आम व्यक्ति को ख़ास मानकर चल रहा है, या व्यक्ति जानता है कि अमुक व्यक्ति ने किसी क्षेत्र में असाधारण उपलब्धि हासिल की है, अत: उसके द्वारा कही गयी बात को वह ख़ास मानकर चलता है, और उस पर अमुक बात का ज्यादा असर होता है !!
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इस तरह पेड मीडिया मानव मनोविज्ञान का इस्तेमाल करके परले दर्जे की बकवास बातें और तर्क “खास” व्यक्तियों के माध्यम से जनता के सामने परोसता है, और असूचित नागरिको पर इस बकवास का ख़ास बात की तरह असर होता है।
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दुसरे शब्दों में, यदि आप कोई बकवास बात किसी के गले उतरना चाहते हो तो आपको किसी ख़ास व्यक्ति की जरूरत है। और यदि आप किसी साधारण व्यक्ति को ख़ास बनाना चाहते हो तो आपको पेड मीडिया की आवश्यकता पड़ेगी।
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पेड मीडिया से आप जितना भी ग्रहण करते हो उसमें दो चीजे शामिल होती है :
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(i) घटनाएं
(ii) तर्क एवं विश्लेषण
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पेड मीडिया में बताई गयी घटनाएं ज्यादातर मामलों में सच्ची होती है। और घटनाओं को छोड़कर शेष सभी बकवास होता है। पर आपको इसमें तत्व सिर्फ इसीलिए नजर आ रहा है, क्योंकि पेड मीडिया में आने के कारण आप इसे ख़ास मानते है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 16 2020 20:06:29 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

झारखंड उपचुनाव में बेरमो विधानसभा क्षेत्र से 'सुजीत कुमार जी बरनवाल' ने राईट टू रिकॉल पार्टी की और नामांकन दाखिल किया है।
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सुजीत कुमार जी का मुद्दा है -- जिला शिक्षा अधिकारी को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाना। ताकि अभिभावक अपने जिले के भ्रष्ट जिला शिक्षा अधिकारी को निष्काषित करके कार्यकुशल एवं ईमानदार व्यक्ति को शिक्षा अधिकारी की नौकरी देने के लिए अपनी स्वीकृति दर्ज करवा सके।
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सुजीत कुमार जी बेरमो विधानसभा क्षेत्र से एक मात्र प्रत्याशी है जो मतदाताओं को वोट वापस लेने का अधिकार दिलाने के लिए चुनावी मैदान में है। अन्य सभी दलों के प्रत्याशी नागरिको को वोट वापसी की शक्ति देने के खिलाफ है !!
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प्रोफाइल - <https://www.facebook.com/sujitkumar.barnwal.370>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Oct 17 2020 19:20:52 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भीलवाड़ा पार्षद चुनाव ; वार्ड नंबर 12 से योगेश कुमार जी भाम्बी राईट टू रिकॉल पार्टी से प्रत्याशी है।
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पश्चिम में वोट वापसी क़ानून एवं जूरी प्रक्रियाएं होना सबसे बड़ी वजह रही कि अमेरिका एवं ब्रिटेन भारत जैसे देशो से आगे, काफी आगे निकल गए। जूरी मंडल ने वहां के छोटे-मझौले कारखाना मालिको एवं कारोबारियों की जज-पुलिस-नेताओं के भ्रष्टाचार से रक्षा की और वे तकनिकी रूप से उन्नत विशालकाय कम्पनियां खड़ी करने में सफल हो पाए।
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भारत की सभी स्थापित पार्टियां एवं उनके नेता भारतीयों को वोट वापस लेने की शक्ति देने के खिलाफ है। वार्ड नं 12 से योगश जी एक मात्र प्रत्याशी है, जो मतदाताओं को वोट वापसी पासबुक जारी करवाने के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे है।
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यदि आप वोट वापसी पासबुक चाहते है तो योगेश जी का समर्थन करें।
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#VoteVapsiPassboook , #BhilwaraJuryCourt
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फेसबुक प्रोफाइल -- <https://www.facebook.com/profile.php?id=100006744066249>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Oct 19 2020 20:51:31 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

बेरमो विधानसभा (झारखण्ड) से सुजीत कुमार जी बरनवाल का नामांकन स्वीकृत हो गया है। सुजीत कुमार जी राईट टू रिकॉल पार्टी की और से प्रत्याशी है।
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मुद्दा - जिला जूरी कोर्ट गेजेट में छपवाकर बेरमो के नागरिको को वोट वापसी पासबुक जारी करवाना।
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प्रोफाइल लिंक - <https://www.facebook.com/sujitkumar.barnwal.370>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Oct 20 2020 19:13:29 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

ShivrajJat AsindRj AssemblyCandidate:

#चुनाव

आने वाले पंचायत समिति और जिला परिषद के चुनाव में ज्यादा से ज्यादा भाग लेकर लोगों तक #वोट_वापसी_पासबुक की जानकारी पहुंचाने के लिए हर एक आदमी को उमिदवारी करने के लिए तैयार होना चाहिए। जिससे कि लोगों तक वोट वापस लेने के अधिकार की जानकारी पहुंचा सके। और इसके लिए अपने किसी भी पार्टी से खड़े होने वाले उम्मीदवार से वोट वापस लेने का अधिकार की मांग कर सकें। उम्मीदवारी करके कभी यह न सोचे कि हमारी जीत होगी या नहीं जब तक हम लोगों तक यह जानकारी नहीं पहुंचाएंगे। तब तक लोगों तक यह जानकारी पहुंचाना बहुत मुश्किल है। जितने लोगों तक यह जानकारी जाएगी तभी जाकर यह वोट वापसी पासबुक लागू हो सकती है।
#रिकालिस्ट
शिवराज जाट

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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Oct 21 2020 19:58:00 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राईट टू रिकॉल क़ानून प्रक्रियाओं के बारे में महत्त्वपूर्ण सूचना :
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(A) राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं 2 प्रकार की है।
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(1) नकारात्मक प्रक्रिया : इस प्रक्रिया में मतदाता किसी अधिकारी या नेता को सिर्फ "निकालने" के लिए अपनी सहमती दे सकता है, बदलने के लिए नहीं। सिर्फ नकारने की प्रक्रिया होने के कारण इसे नकारात्मक रिकॉल कहते है। नकारत्मक रिकॉल की प्रक्रिया से शासन में अस्थिरता आती है और प्रशासन और भी बदतर हो जाता है।
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उदाहरण :
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(1a) RSS की हरियाणा सरकार राईट टू रिकॉल सरपंच नामक जो क़ानून लागू कर रही है उसमें जब रिकॉल पोल होगा तो मौजूदा सरपंच निकाल दिया जाएगा और सरपंच की कुर्सी खाली हो जाएगी। और सरपंच की कुर्सी तब तक खाली रहेगी जब तक अमुक पंचायत में नए सरपंच के चुनाव नहीं होते !! सिर्फ नकारने की प्रक्रिया होने के कारण RSS का यह क़ानून प्रशासन में अस्थिरता लाएगा।
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(1b) RSS के सांसद वरुण गांधी जी ने राईट टू रिकॉल का जो क़ानून प्रस्तावित किया है उसमें भी सिर्फ नकारने की प्रक्रिया है। मतलब यदि मतदाता सांसद को रिकॉल करते है तो सांसद निकाल दिया जाएगा और नए चुनाव होने तक अमुक संसदीय क्षेत्र में सांसद की कुर्सी खाली रहेगी !!
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(2) सकारात्मक प्रक्रिया : राईट टू रिकॉल की सकारात्मक प्रक्रियाओ में मतदाताओ के पास यह विकल्प भी होता है कि वे अमुक अधिकारी को निकाल कर किस व्यक्ति को अमुक पद पर लाना चाहते है। मतलब कोई अधिकारी या नेता सिर्फ तब ही ‘बदला’ जाता है, जब नागरिको का बहुमत किसी अन्य व्यक्ति को अमुक पद पर नियुक्त करने की स्वीकृति दें। निकालने की जगह 'बदलने’ की प्रक्रिया होने के कारण कुर्सी किसी भी समय खाली नहीं रहती और अस्थिरता नहीं आती।
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उदाहरण : राईट टू रिकॉल पार्टी द्वारा प्रस्तावित सभी प्रक्रियाएं सकारात्मक है। हमारे द्वारा प्रस्तावित सभी कानूनों में मतदाता के पास अधिकारी / नेता को बदलने का विकल्प है। मतलब नागरिको के बहुमत को पहले यह बताना होता है कि वे किस व्यक्ति को अमुक पद पर नियुक्त करना चाहते है। और जब नए अधिकारी / नेता की नियुक्ति होने के बाद ही पदासीन अधिकारी / नेता को निष्कासित किया जाता है। अत: कुर्सी एक मिनिट के लिए भी खाली नहीं रहती।
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टिप्पणी : यदि कोई व्यक्ति राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओं की बात कर रहा है, तो कृपया सबसे पहले अमुक राईट टू रिकॉल क़ानून का ड्राफ्ट देखें। ताकि आप यह जान सके कि अमुक राईट टू रिकॉल में सिर्फ नकारात्मक प्रक्रिया है, या सकारात्मक !! वरना नागरिक इस भ्रम के शिकार हो सकते है कि आप अस्थिरता लाने वाले RSS के नकारात्मक राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओं के भी समर्थक है !!
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(B) वोट वापसी प्रक्रियाएं
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वोट वापसी की सभी प्रक्रियाएं सकारात्मक होती है। वोट वापसी प्रक्रियाएं नकारात्मक कभी भी नहीं होती।
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वोट वापसी प्रक्रियाओं में प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलती है, और पासबुक में मतदाता के पास यह विकल्प रहता है कि वे पदासीन अधिकारी / नेता को किस अधिकारी / नेता से बदलना चाहते है।
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टिप्पणी : यदि कोई व्यक्ति वोट वापसी पासबुक वाली प्रक्रियाओं का समर्थन कर रहा है, तो इसका आशय है कि वह सिर्फ सकारात्मक प्रक्रियाओं का समर्थन कर रहा है। क्योंकि भारत में (और पूरी दुनिया में भी) वोट वापसी पासबुक वाली सभी प्रस्तावित प्रक्रियाएं सकारात्मक है। राईट टू रिकॉल पार्टी द्वारा प्रस्तावित सभी वोट वापसी प्रक्रियाओं में पासबुक का प्रावधान है, और ये सभी सकारात्मक प्रक्रियाएं है।
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(C) 1919 से 2015 तक भारत में राईट टू रिकॉल की सिर्फ सकारात्मक प्रक्रियाएं मौजूद थी। और ये सभी प्रक्रियाएं राईट टू रिकॉल पार्टी द्वारा प्रस्तावित की गयी थी। 16 साल के सघन प्रचार के बाद जब राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं जनता में लोकप्रिय हो गयी तो 'राईट टू रिकॉल आन्दोलन एवं राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओं' को बदनाम करने के लिए 2015 में RSS ने सांसद पद पर एक नकारात्मक क़ानून लाने का प्रस्ताव किया, जो कि अभी संसद में लंबित है।
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फिर RSS फिर इससे भी आगे बढ़ा। अब 2020 में उन्होंने राईट टू रिकॉल सरपंच नाम से एक और बेहद नकारात्मक प्रक्रिया वाला क़ानून लाने का फैसला किया है। यह क़ानून बेहद खतरनाक है, और इसके निम्नलिखित परिणाम आयेंगे :
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(i) गाँवों में सांप्रदायिक जातीय वैमनस्य एवं अलगाव बढेगा।
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(ii) पंचायत स्तर पर राजनैतिक लड़ाई-झगड़ो, मारपीट आदि में इजाफा होगा।
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(iii) आपसी भाईचारा एवं सौहार्द बिगड़ेगा।
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(iv) सत्ताधारी विधायक अपने विरोधी सरपंचो को निष्कासित करके पंचायतो पर कब्ज़ा कर लेंगे।
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(v) सरपंचो पर सत्ताधारी विधायको की पकड़ मजबूत होगी।
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(vi) रिकॉल होने पर पंचायतो में सरपंचो की कुर्सियां खाली हो जाएगी और अस्थिरता आएगी।
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RSS उपरोक्त बुरे बदलाव लाने की जिम्मेदारी राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओं के समर्थको एवं कार्यकर्ताओ पर डालना चाहता है। अत: उन्होंने इस क़ानून का नाम भी 'राईट टू रिकॉल सरपंच' रखा है !!
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Oct 24 2020 19:02:48 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भीलवाड़ा पार्षद चुनाव ; वार्ड नंबर 69 से महावीर प्रसाद जी कुमावत राईट टू रिकॉल पार्टी से प्रत्याशी है।
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पश्चिम में वोट वापसी क़ानून एवं जूरी प्रक्रियाएं होना सबसे बड़ी वजह रही कि अमेरिका एवं ब्रिटेन भारत जैसे देशो से आगे, काफी आगे निकल गए। जूरी मंडल ने वहां के छोटे-मझौले कारखाना मालिको एवं कारोबारियों की जज-पुलिस-नेताओं के भ्रष्टाचार से रक्षा की और वे तकनिकी रूप से उन्नत विशालकाय कम्पनियां खड़ी करने में सफल हो पाए।
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भारत की सभी स्थापित पार्टियां एवं उनके नेता भारतीयों को वोट वापस लेने की शक्ति देने के खिलाफ है। वार्ड नं 69 से महावीर जी एक मात्र प्रत्याशी है, जो मतदाताओं को वोट वापसी पासबुक जारी करवाने के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे है।
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यदि आप वोट वापसी पासबुक चाहते है तो महावीर प्रसाद जी कुमावत का समर्थन करें।
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#VoteVapsiPassboook , #BhilwaraJuryCourt
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फेसबुक प्रोफाइल -- <https://www.facebook.com/mahaveer.kumawat.71404>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 25 2020 17:47:59 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भीलवाड़ा पार्षद चुनाव ; वार्ड नंबर 7 से धर्मेन्द्र कुमार जी शर्मा राईट टू रिकॉल पार्टी से प्रत्याशी है।
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पश्चिम में वोट वापसी क़ानून एवं जूरी प्रक्रियाएं होना सबसे बड़ी वजह रही कि अमेरिका एवं ब्रिटेन भारत जैसे देशो से आगे, काफी आगे निकल गए। जूरी मंडल ने वहां के छोटे-मझौले कारखाना मालिको एवं कारोबारियों की जज-पुलिस-नेताओं के भ्रष्टाचार से रक्षा की और वे तकनिकी रूप से उन्नत विशालकाय कम्पनियां खड़ी करने में सफल हो पाए।
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भारत की सभी स्थापित पार्टियां एवं उनके नेता भारतीयों को वोट वापस लेने की शक्ति देने के खिलाफ है। वार्ड नं 7 से धर्मेन्द्र जी एक मात्र प्रत्याशी है, जो मतदाताओं को वोट वापसी पासबुक जारी करवाने के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे है।
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यदि आप वोट वापसी पासबुक चाहते है तो धर्मेन्द्र कुमार जी शर्मा का समर्थन करें।
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#VoteVapsiPassboook , #BhilwaraJuryCourt
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 25 2020 19:23:33 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

ऑटो रिक्शा, शॉप्स आदि पर लगाने के लिए सामान्य बैनर फोर्मेट। साइज़ - 2*2
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यदि आपको इसका पीडीऍफ़ एवं docx फाइल चाहिए तो कमेंट में पूछें।
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इस एल्बम में अन्य साइज के बेनर फोर्मेट भी रखे जायेंगे।
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#JuryCourt , #JilaJuryCourt , #VoteVapsiPassbook

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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Oct 26 2020 17:08:10 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भीलवाड़ा पार्षद चुनाव ; वार्ड नंबर 16 से अंकित टाक राईट टू रिकॉल पार्टी से प्रत्याशी है।
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पश्चिम में वोट वापसी क़ानून एवं जूरी प्रक्रियाएं होना सबसे बड़ी वजह रही कि अमेरिका एवं ब्रिटेन भारत जैसे देशो से आगे, काफी आगे निकल गए। जूरी मंडल ने वहां के छोटे-मझौले कारखाना मालिको एवं कारोबारियों की जज-पुलिस-नेताओं के भ्रष्टाचार से रक्षा की और वे तकनिकी रूप से उन्नत विशालकाय कम्पनियां खड़ी करने में सफल हो पाए।
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भारत की सभी स्थापित पार्टियां एवं उनके नेता भारतीयों को वोट वापस लेने की शक्ति देने के खिलाफ है। वार्ड नं 16 से अंकित जी एक मात्र प्रत्याशी है, जो मतदाताओं को वोट वापसी पासबुक जारी करवाने के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे है।
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यदि आप वोट वापसी पासबुक चाहते है तो अंकित जी टाक का समर्थन करें।
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#VoteVapsiPassboook , #BhilwaraJuryCourt
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फेसबुक प्रोफाइल - <https://www.facebook.com/ankittak1989>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Oct 26 2020 18:23:56 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

जूरी सिस्टम में 2 तरह की प्रक्रियाएं हो सकती है :
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(1) आम नागरिको की जूरी : एक तरीका वह है जिसमें किसी भी आदमी को पकड़ कर जूरी में शामिल कर लिया जाता है। इस प्रकार की जूरी ज्यादा प्रभावी ढंग से काम नहीं करती।
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(2) विवेकशील नागरिको की जूरी : इस प्रक्रिया में पहले लोटरी से मतदाताओं को चुना जाता है, और फिर अमुक नागरिको में से विवेकशील एवं सूचित नागरिको को छांट कर जूरी का गठन किया जाता है।
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राईट टू रिकॉल पार्टी द्वारा प्रस्तावित "जूरी कोर्ट" नामक ड्राफ्ट में विवेकशील नागरिको की जूरी बनाने का प्रावधान है। अत: प्रस्तावित जूरी कोर्ट की जूरी ज्यादा प्रभावी ढंग से काम करेगी।
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जूरी कोर्ट की धारा में प्रावधान है कि - जूरी बनाने के लिए पहले लोटरी से 30 नागरिको का चयन किया जाएगा और फिर इनमें से ग्रैंड जूरी किन्ही 12 विवेकशील नागरिको को छांट कर जूरी का गठन करेगी।
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तो प्रस्तावित जूरी कोर्ट में जो प्रक्रिया है उसमें जूरी का गठन विवेकशील एवं सूचित नागरिको द्वारा किया जाता है।
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जिला जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट यहाँ देखें - facebook.com/pawan.jury/posts/3173085952809619
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Oct 27 2020 17:25:48 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भीलवाड़ा पार्षद चुनाव ; वार्ड नंबर 65 से शकुन्तला जी शर्मा राईट टू रिकॉल पार्टी से प्रत्याशी है।
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पश्चिम में वोट वापसी क़ानून एवं जूरी प्रक्रियाएं होना सबसे बड़ी वजह रही कि अमेरिका एवं ब्रिटेन भारत जैसे देशो से आगे, काफी आगे निकल गए। जूरी मंडल ने वहां के छोटे-मझौले कारखाना मालिको एवं कारोबारियों की जज-पुलिस-नेताओं के भ्रष्टाचार से रक्षा की और वे तकनिकी रूप से उन्नत विशालकाय कम्पनियां खड़ी करने में सफल हो पाए।
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भारत की सभी स्थापित पार्टियां एवं उनके नेता भारतीयों को वोट वापस लेने की शक्ति देने के खिलाफ है। वार्ड नं 65 से शकुन्तला जी एक मात्र प्रत्याशी है, जो मतदाताओं को वोट वापसी पासबुक जारी करवाने के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है।
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यदि आप वोट वापसी पासबुक चाहते है तो शकुन्तला जी शर्मा का समर्थन करें।
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#VoteVapsiPassboook , #BhilwaraJuryCourt
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Oct 27 2020 18:23:35 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

बहिष्कार ब्रिगेड के लिए ; (भाग -1)
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समस्या के वास्तविक समाधान से नागरिको का ध्यान बंटाने के लिए उन्हें उल्टे-पुल्टे समाधान की दिशा में धकेल देना राजनीती की सबसे बारीक चाल है। "बहिष्कार नीति" भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है।
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क्या मीडिया का बहिष्कार किया जा सकता है ?
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नहीं। ऐसा करना मुमकिन नहीं है !!
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(1) खबरिया चेनल एवं समाचार पत्र : ये नागरिको तक कई तरह की ऐसी महत्त्वपूर्ण सूचनाएं पहुंचाते है,जिनके बिना नागरिको का काम नहीं चल सकता। यदि आप इनसे एकदम किनारा कर लेते है तो आप कई आवश्यक घटनाओं / तथ्यों से वंचित हो जायेंगे !!
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(2) मनोरंजन चेनल : व्यक्ति को मनोरंजन चाहिए। और जब भी वह मनोरंजन के किसी भी माध्यम (फ़िल्में, धारावारिक आदि) के संपर्क में आएगा पेड मीडिया बड़ी सफाई से उनके दिमाग में गलत धारणाएं उतार देगा।
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(3) साहित्य : गल्प एवं विज्ञान फंतासी को छोड़कर "ज्ञान देने वाला" मुख्यधारा का सभी साहित्य पेड होता है। ये किताबें 'सन्देश देने वाले' साहित्य के नाम पर आपके दिमाग में इतना महीन कचरा भरती है कि, इसे साफ़ करने में एक उम्र लग जाती है।
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(4) पाठ्यपुस्तकें : छात्रों को इन्हें पढ़ना होता है, फिर याद करना होता है, और परीक्षा में पास होकर यह सिद्ध करना होता है कि उन्हें अमुक पाठ याद हो गया है। क्योंकि प्रश्न पत्र में उन प्रश्नों को अवश्य पूछा जाता है जो पाठ्य वे छात्रों के दिमाग में डालना चाहते है।
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कुल मिलाकर, पेड मीडिया का बहिष्कार करना मुमकिन नहीं है। यदि आपको समाज में रहना है तो पेड मीडिया से आप छुटकारा नहीं पा सकते। अत: पेड मीडिया का "बहिष्कार" इसका कभी भी समाधान नहीं है। और इसीलिए पेड मीडिया के प्रायोजक अपरिपक्व कार्यकर्ताओ को "मीडिया का बहिष्कार" करने के धंधे पर लगाए रखते है।
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समाधान : एक निष्पक्ष पेड मीडिया खड़ा करके ही निजी कम्पनियों द्वारा संचालित पेड मीडिया की ताकत कम की जा सकती है। चूंकि मीडिया घाटे का धंधा है अत: निजी कम्पनियों को टक्कर देने वाला मीडिया खड़ा करने के लिए विशाल संसाधनों की जरूरत होगी। इतने संसाधन सिर्फ सरकार द्वारा ही जुटाए जा सकते है, और सिर्फ सरकार ही इतने बड़े मीडिया का निरंतर घाटा उठा सकती है।
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किन्तु यहाँ समस्या यह है कि - जब सरकार के नियंत्रण में मीडिया रहेगा तो प्राइवेट मीडिया+सरकार+सरकारी मीडिया आपस में गठजोड़ बना लेंगे और ये तीनो मिलकर नागरिको से सही सूचनाएं छिपाने लगेंगे। जैसा कि आज हम भारत में देख रहे है !!
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इस समस्या का समाधान जूरी कोर्ट से किया जा सकता है। वोट वापसी पासबुक के दायरे में आने के बाद दूरदर्शन पर नागरिको का नियंत्रण आ जाएगा, और पीएम दूरदर्शन अध्यक्ष पर नियंत्रण खो देगा।
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जैसे जैसे दूरदर्शन ताकतवर होगा वैसे वैसे दूरदर्शन निजी मीडिया को एक्सपोज करना शुरू करेगा, और निजी मीडिया की ताकत घटने लगेगी।
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अधिक जानकारी के लिए जूरी कोर्ट की धारा (37.5) , (38) , (39) , (40.6) एवं धारा (43) देखें।
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जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट यहाँ देखें - <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/2297657633685793>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Oct 28 2020 16:15:48 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

हल्दीराम (जिसमें अब विदेशी कम्पनी हिस्सेदारी ले चुकी है) , बीकाजी एवं फास्ट फ़ूड के कारोबार से जुडी ऐसी ही बड़ी कम्पनियों को अतिरिक्त मुनाफा देने के लिए मोदी साहेब द्वारा छापा गया क़ानून कहता है कि -- अब कचौरी बनाने वाले प्रत्येक दुकानदार को बीएससी केमेस्ट्री पास युवक को नौकरी पर रखना होगा !!
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<https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/bikaner/news/kachori-makers-will-have-to-hire-a-youth-pass-bsc-chemistry-to-get-a-food-license-127850875.html>;
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और भी ऐसे ही कई नियम जिन्हें पूरा करना किसी भी छोटे कारोबारी के लिए मुमकिन नहीं है। तो फर्स्ट राउंड में फ़ूड इंस्पेक्टर इनसे हफ्ता वसूलना शुरू करेंगे और सेकेण्ड राउंड में जब बड़ी कंपनियों से उन्हें मोटा पैसा और ऑर्डर आएगा तो वे दुकाने सील करना शुरू कर देंगे। छोटे कारोबारियों के बाजार से बाहर होने से बड़ी कंपनियों का हिस्सा बाजार में बढ़ जाएगा।
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जाहिर है, बड़ी कंपनियों ने मोदी साहेब को इसके लिए ऊँचे दिए है, और बिहार चुनाव में बीजेपी द्वारा किया गया चुनावी खर्चा अब कचौरी-पकौड़ी-भुजिया बनाने वाले छोटे कारोबारी चुकायेंगे !!
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कोंग्रेस एवं आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेता एवं उनके कार्यकर्ता भी इस क़ानून के समर्थन में है !! क्योंकि उनकी आई टी सेल एवं मीडिया कवरेज का पैसा भी यही एवं इसी तरह की कम्पनियां चुकाती है !!
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पेड दैनिक भास्कर ने रिपोर्ट किया है कि, "अब 1 नवंबर, 2020 से फूड लाइसेंस उन्हें जिले का चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी नहीं दे सकेगा। फूड लाइसेंस के लिए उन्हें फूड सेफ्टी एंड स्टेंडर्ड आथोरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) नई दिल्ली का दरवाजा खटखटाना होगा। इसके साथ ही पापड़, भुजिया, रसगुल्ला, कचौरी, नमकीन व मिठाई के व्यापार को प्रोपराइटर एक्ट में शामिल करने से कई ऐसी शर्तें इसमें जुड़ गई हैं।
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एक कचौरी बनाने वाले को भी फूड लाइसेंस लेने के लिए दुकान में बीएससी केमेस्ट्री पास युवक को तकनीकी इंचार्ज रखना होगा, सालाना लाइसेंस फीस 100 रुपए की जगह 7500 हजार रुपए देनी होगी। ऐसे ही नियम घरों में पापड़-बड़ी बनाने वाले, रसगुल्ला का छोटा व्यापार करने वाले हर व्यापारी पर लागू होंगे।"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Oct 31 2020 18:20:17 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

अंतरधर्मी विवाहों में महिलाओं को सरंक्षण
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(Protection of women in Inter Religious Marriages)
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भारत में अनेक धर्मो का पालन करने वाले नागरिक रहते है, और भारत में विविध धर्मो के लिए भिन्न भिन्न विवाह अधिनियम लागू है। इनमें कुछ धर्मो के विवाह अधिनियम महिलाओं को मजबूत सरंक्षण प्रदान करते है जबकि कुछ धर्मो के विवाह अधिनियम में महिलाओं को पर्याप्त सरंक्षण नहीं है, और इस वजह से उन महिलाओं की स्थिति विवाह के बाद कमजोर हो जाती है, जिन्होंने किसी अन्य धर्म के युवक से विवाह किया है और अमुक युवक के धर्म का विवाह अधिनियम महिलाओं को पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता।
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यह कानून अंतरधर्मी विवाह करने वाली उन महिलाओं को विवाह के उपरान्त अपने वैवाहिक विवादों के निस्तारण के लिए अपने जन्मना धर्म का क़ानून चुनने की शक्ति देकर उन्हें सरंक्षण प्रदान करता है, जिन्होंने अंतरधर्मी विवाह किया है। इस क़ानून को प्रधानमंत्री संसद साधारण बहुमत द्वारा पास करके गेजेट में छाप सकते है।
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यदि आप इस कानून का समर्थन करते है तो प्रधानमंत्री जी को एक पोस्टकार्ड भेजे। पोस्टकार्ड में यह लिखे : प्रधानमंत्री जी, अंतरधर्मी विवाहों में महिला को विवाहोपरांत मेरिज एक्ट चुनने की स्वतंत्रता दें #MarriedWomenProtection
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---क़ानून ड्राफ्ट का प्रारंभ---
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(01) वैवाहिक विवादों की दशा में विवादों का निपटान किस धर्म के वैवाहिक क़ानून के तहत किया जाएगा इसका फैसला लेने का अंतिम अधिकार विवाहित महिला के पास होगा। महिला विवाह के उपरान्त किसी भी समय यह फैसला कर सकेगी कि, उसके विवाह का निस्तारण निचे दिए गए किस क़ानून के तहत किया जाना चाहिए :
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(1.1) उस धर्म के वैवाहिक क़ानून के तहत जिस धर्म में विवाहित महिला ने जन्म लिया था
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(1.2) उस वैवाहिक क़ानून के तहत जिसके तहत दम्पत्ति ने विवाह किया था
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(02) यदि कोई विवाह अदालत में स्पेशल मेरिज एक्ट के तहत हुआ है, तो यह कानून लागू नहीं होगा और सभी वैवाहिक विवादों का निपटान स्पेशल मेरिज एक्ट के तहत ही किया जाएगा।
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(03) यह क़ानून सिर्फ वैवाहिक विवादों जैसे गुजारा भत्ता, भरण पोषण, घरेलू हिंसा, दहेज़, विवाह विच्छेद, संतानों का विभाजन, बहु विवाह आदि पर लागू होगा, किन्तु विरासत या वारिसान के दावे इस क़ानून के दायरे से बाहर रहेंगे।
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स्पष्टीकरण 1 : मान लीजिये कि A एक जन्मना हिन्दू महिला है, जो B नामक मुस्लिम युवक से विवाहित है। वैवाहिक विवाद होने की स्थिति में A यदि मामले का निपटान हिन्दू मेरिज एक्ट के तहत चाहती है तो मामला हिन्दू मेरिज एक्ट के तहत सुना जाएगा। यदि A विवाह के दौरान या विवाह के पूर्व या विवाह के उपरान्त मुस्लिम धर्म में धर्मान्तरित हो चुकी है, तब भी यदि A चाहती है कि उसके विवाह पर हिन्दू एक्ट लागू किया जाए तो A एवं B के सभी वैवाहिक विवाद हिन्दू मेरिज एक्ट के तहत ही सुने जायेंगे।
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A द्वारा हिन्दू मेरिज एक्ट लागू कर दिए जाने पर मुस्लिम युवक ट्रिपल तलाक के माध्यम से जन्मना हिन्दू महिला को तलाक नहीं दे सकेगा, और तलाक हिन्दू मेरिज एक्ट के तहत अदालत के आदेश के अनुसार ही होगा।
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स्पष्टीकरण 2 : मान लीजिये कि A एक हिन्दू धर्मावलम्बी महिला, B नामक मुस्लिम धर्मावलम्बी युवक से विवाहित है। यदि A विवाह के बाद यह घोषणा करती है कि, उसके विवाह पर हिन्दू मेरिज एक्ट लागू होगा तो A एवं B के विवाह पर हिन्दू मेरिज एक्ट लागू हो जाएगा, और चूंकि हिन्दू मेरिज एक्ट में बहु विवाह की अनुमति नहीं है अत: B यदि A को डिवोर्स दिए बिना दूसरी शादी करता है तो B को हिन्दू मेरिज एक्ट के तहत आपराधिक मुकदमें का सामना करना पड़ सकता है।
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किन्तु यदि A ने यह घोषणा नहीं की है कि उसके विवाह पर हिन्दू मेरिज एक्ट लागू होगा तो B मुस्लिम एक्ट के तहत दूसरी/ तीसरी/ चौथी शादी कर सकता है, और ये विवाह मान्य होंगे। यदि B द्वारा की गयी इन अतिरिक्त शादीयों के बाद A हिन्दू मेरिज एक्ट लागू कर देती है तब भी युवक B द्वारा किये गए ये अतिरिक्त विवाह रद्द नहीं होंगे, और मान्य बने रहेंगे।
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स्पष्टीकरण 3 : मान लीजिये कि A एक जन्मना मुस्लिम महिला, B नामक हिन्दू युवक से विधि पूर्वक विवाहित है। यदि A एवं B में कोई वैवाहिक विवाद होता है और A इसका निपटान मुस्लिम मेरिज एक्ट के तहत चाहती है तो वह ऐसा कर सकती है।
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(04) अंतरधर्मी विवाह करने वाली महिला विवाह के दौरान या विवाह के बाद किसी भी समय अदालत में यह अर्जी दे सकती है कि उसके विवाह पर कौनसा मेरिज एक्ट लागू होगा। यदि महिला ने ऐसी कोई घोषणा नहीं की है तो जब भी कोई वैवाहिक मामला दायर होगा तो महिला यह प्रतिवेदन प्रस्तुत कर सकेगी कि वह धारा (01) में दिए गए प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए किस मेरिज एक्ट के तहत मामले का निस्तारण चाहती है।
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(05) यदि विवाहित महिला ने ऐसे अधिनियम के तहत मामला सुने जाने की याचिका दी है, जो उसका जन्मना धर्मं नहीं है, तो महिला भविष्य में किसी भी समय फिर से अपने जन्मना धर्म के क़ानून को चुन सकती है। किन्तु यदि एक बार महिला ने किसी विवाद के निस्तारण के लिए अपने जन्मना धर्मं के क़ानून को चुन लिया है तो फिर भविष्य में महिला के सभी वैवाहिक विवादों का निस्तारण उसके जन्मना धर्म के कानून के तहत ही किया जाएगा।
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(06) इस क़ानून के लागू होने की दिनांक से पहले संपन्न हुए सभी विवाह इस क़ानून के दायरे में आयेंगे, और सभी अंतरधर्मी विवाहों पर यह क़ानून लागू होगा।
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(07) यदि पहले से मौजूद किसी अन्य प्रवृत्त क़ानून की कोई धारा इस क़ानून में दिए गए किसी प्रावधान का उलंघन करती है, तो इस कानून के गेजेट में प्रकाशित होने के साथ ही अन्य प्रवृत क़ानून की ऐसी समस्त विपरीत आशय दर्शाने वाली धाराएं विधि शून्य मानकर निस्स्त की जाती है।
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(08) महिला एवं बाल विकास मंत्री भारत के समस्त विवाहित व्यक्तियों के निम्लिखित आंकड़े इस तरह सार्वजनिक करेगा कि कोई भी व्यक्ति इन्हें बिना Log in के देख सके :
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1. नागरिक का पूरा नाम
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2. नागरिक की पहचान संख्या जैसे - मतदाता संख्या / ड्राइविंग लाइसेंस / पेन कार्ड / पासपोर्ट नं (किन्तु आधार कार्ड का विवरण सार्वजनिक नहीं किया जाएगा)
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3. माता / पिता का नाम एवं उनकी पहचान संख्या
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4. वैवाहिक स्थिति – अविवाहित / विवाहित / यदि विवाह विच्छेद हो चुका है
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5. विवाह / विवाह विच्छेद की दिनांक
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6. जीवन साथी / समस्त पूर्व जीवन साथीयों के नाम एवं उनकी पहचान पत्र संख्या
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7. क्या महिला जीवन साथी ने अपने जन्मना धर्म को मेरिज एक्ट के रूप में चुना है – हाँ / ना
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8. महिला जीवन साथी द्वारा चुना गया मेरिज एक्ट
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--------कानून ड्राफ्ट का समापन------

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