Posts for 2017-10

Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 01 2017 06:12:22 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सोनिया-मोदी-केजरीवाल और संघ-कोंग्रेस-आपा के कार्यकर्ता हमारी माइंसे निजी क्षेत्र को बेच रहे है -- चूंकि देशी इकाइयां गहरे घाटे में होने के कारण इन्हें खरीदने की हालत में नहीं है अत: ज्यादातर खरीददार विदेशी होंगे।
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सोनिया-मोदी-केजरीवाल और उनके अंधभगतो के मुताबिक़ जीएसटी से अर्थव्यवस्था मजबूत हुयी है और इससे सरकार की आमदनी भी बढ़ गयी है, तो फिर सरकार हमारे खनिज संसाधन किस वजह से बेच रही है ?
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सच्चाई यह है कि अर्थव्यवस्था की हालत लगातार बद से बदतर होती जा रही है। मुद्रा स्फीति के अनुपात में बढ़ते वेतन और अन्य खर्चो का बोझ सरकार पर बढ़ गया है और इसकी पूर्ती के लिए अब वे हमारे खनिज बेच रहे है।
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<http://economictimes.indiatimes.com/news/economy/finance/auction-of-54-mines-to-fetch-rs-1-5-lakh-crore-to-states-kitty/articleshow/60765191.cms>;

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 01 2017 06:33:55 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

क्या संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दशहरे के अपने वार्षिक संबोधन में "बांग्लादेशी घुसपेठियो" को देश से बाहर खदेड़ने के विषय पर कुछ कहा है ?
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मैं किसी भी राजनेता आदि के भाषण वगेरह नहीं सुनता हूँ। अत: मुझे नहीं पता कि उन्होंने अपने लाखों स्वयंसेवको के समक्ष इस मुद्दे को रखा है या नहीं। उल्लेखनीय है कि मोदी साहेब बांग्लादेशी घुसपेठियो को देश से बाहर खदेड़ने का क़ानून बनाने से साफ़ इनकार कर चुके है। अत: इस बारे में पूछे जाने पर संघ के कई कार्यकर्ताओ ने मुझसे कहा था कि संघ इन्हें खदेड़ना चाहता है तथा भागवत बांग्लादेशी घुस्पेठीयों के मुद्दे को अपने वार्षिक संबोधन में अवश्य उठाएंगे, ताकि सरकार पर इन्हें खदेड़ने का दबाव बने।
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यदि आपने भी संघ प्रमुख का संबोधन न सुना है तो इसे सुनने पर अपना समय ख़राब न करे, बल्कि संघ के कार्यकर्ताओ से इस बारे में पूछ ले कि क्या संघ प्रमुख ने इस मुद्दे को संबोधित किया है, और सरकार से मांग की है कि 3 करोड़ मुस्लिम बंगलादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने के लिए तुरंत क़ानून पास किया जाए ?
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Oct 02 2017 09:55:02 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

क्या संघ प्रमुख मोहन भागवत अब बांग्लादेशी घुसपेठियो को "शरणार्थी" साबित करने की कोशिस कर रहे है !!!
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उल्लेखनीय है कि शरणार्थी सरकार की इजाजत से आते है और पंजीकृत होते है। जबकि घुसपेठिये देश की सीमा में चुपचाप अवैध रूप से घुसते है। भारत में 3 करोड़ बांग्लादेशी "घुसपेठिये" है। वे शरणार्थी नहीं है। रोहिंग्या शरणार्थी है, और इनकी संख्या 40 हजार है। इस तरह घुसपेठिये भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। संघ के नेता पिछले 25 सालो से बंगलादेशी घुसपेठियो को "घुसपेठिये" ही संबोधित करते आये है , और इन्हें भारत से खदेड़ना इनका मुख्य मुद्दा रहा है। सत्ता में आने के बाद मेरी जानकारी में यह पहली बार है जब संघ के शीर्ष नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से घुसपेठियो को "शरणार्थी" कह के पुकारा है !!!
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मोदी साहेब बांग्लादेशी घुस्पेठियो को खदेड़ने का क़ानून बनाने से साफ़ इनकार कर चुके है। अब संघ ने भी इस मुद्दे को दफ़न कर दिया है। मैं लगातार यह बात कहता आया हूँ कि संघ=बीजेपी मतलब गंगाधर ही शक्तिमान है, और बीजेपी के सभी फैसले संघ द्वारा ही किये जाते है और संघ के कार्यकर्ता इन फैसलों को अपनी शाखाओं में अनुमोदित करते है। किन्तु संघ के कार्यकर्ता लगातार यह झूठ बोलते है कि गंगाधर शक्तिमान नहीं है, और संघ का बीजेपी से कोई लेना देना नहीं है।
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साफ़ नजर आ रहा है कि 40 हजार रोहिंग्यो के चिल्लर मुद्दे को उठाकर संघ 3 करोड़ बंगलादेशी घुसपेठियो के गंभीर मुद्दे को किनारे कर देना चाहता है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Oct 02 2017 10:32:17 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

301.H.005 ; खनिजों से प्राप्त रॉयल्टी सीधे नागरिको के खाते में जमा करने से गरीबी को सिर्फ 4 महीने में ख़त्म किया जा सकता है।
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अध्याय
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(5.1) मात्र 3 लाइन का यह प्रस्तावित पारदर्शी शिकायत प्रणाली गरीबी को 4 महीने में ही कैसे कम कर सकता है ?
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(5.2) नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी क़ानून-ड्राफ्ट - संक्षेप में :
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(5.3) नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) के क़ानून-ड्राफ्ट की ज्यादा जानकारी
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(5.4) नागरिको को खनिज रॉयल्टी भेजना
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(5.5) राज्य स्तर पर नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी के क़ानून-ड्राफ्ट का प्रारूप
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(5.6) सार्वजनिक भूमि का किराया कितना है ?
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(5.7) खनिज रॉयल्टी कितनी है ?
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(5.8) जमीन का किराया वसूलने करने के प्रभाव
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(5.9) जमीन का किराया न वसूलने का कु-प्रभाव
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(5.10) राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) को वापिस बुलाने/नौकरी से निकालने का तरीका
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(5.11) खनिज रॉयल्टी सीधे नागरिको के खाते में भेजे जाने के लिए प्रस्तावित कानून (DDMRCM) का ड्राफ्ट
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(5.12) कृपया नागरिको और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी प्रस्ताव के कानूनी ड्राफ्ट की अंतिम दो धाराओं पर ध्यान दें
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(5.13) 110 करोड़ नागरिकों को भुगतान भेजने में आनेवाली लागत
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(5.14) क्या इससे सरकारी आय कम नहीं होगी ? नहीं।
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(5.15) पश्चिम में कोई ऐसा कानून नहीं है तो हमें इसकी जरूरत क्यों है
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(5.16) नागरिक और सेना के लिए रोयल्टी (एम.आर.सी.एम) क़ानून-ड्राफ्ट और मानवाधिकार
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(5.17) अभ्यास
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(5.1) मात्र 3 लाइन का यह प्रस्तावित पारदर्शी शिकायत प्रणाली गरीबी को 4 महीने में ही कैसे कम कर सकता है ?
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मान लीजिए आप के पास एक किराये का मकान है जिसे आप ने किराये पर दिया है, तो इसका किराया किसको जाना चाहिए, आपको या सरकार को ? आप कहेंगे कि आप को जाना चाहिए। ऐसे ही आप को यदि पूछा जाए कि यदि एक मकान जिसके दस बराबर के मालिक है, किराये पर दिया गया है, तो किराया किसे जाना चाहिए ? तब आप कहेंगे कि दस मालिकों को बराबर-बराबर किराया जाना चाहिए। इसी तरह यदि कोई बहुत बड़ा प्लाट हो , जिसके 120 करोड़ मालिक है, और वो किराये पर दिया जाता है ,तो उसका किराया सभी 120 करोड़ लोगों में बराबर-बराबर बटना चाहिए। क्या ऐसे प्लाट है जिसके 120 करोड़ मालिक है ? जी हाँ, आईआईएम ए प्लॉट, जेएनयू प्लॉट, सभी यूजीसी प्लॉट, अहमदाबाद एयरपोर्ट प्लॉट, सभी एयरपोर्टों के प्लॉट और हजारों ऐसे भारत सरकार के प्लॉटों से मिलने वाला जमीन का किराया और भारत के सभी खनिजों जैसे कोयला और कच्चे तेल से मिलने वाली सारी रॉयल्टी हम भारत के नागरिकों और हमारी सेनाओं को जानी चाहिए किसी और को नहीं। क्योंकि भारत की संपत्ति के मालिक इसके 120 करोड़ नागरिक है। और यह रॉयल्टी व किराया सीधे ही मिलना चाहिए किसी योजना या स्कीम के जरिए नहीं। इस राशि का एक तिहाई हिस्सा सेना को जाना चाहिए देश की रक्षा के लिए, और बाकी दो तिहाई सभी नागरिकों में बराबर-बराबर बंटना चाहिए। एक अनुमान से, यदि ऐसा जाता है तो हर नागरिक को लगभग 400-500 रुपये महीना मिलेगा, जिससे देश की गरीबी कम हो जायेगी।
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जिस दिन नागरिक प्रधानमंत्री को पारदर्शी शिकायत प्रणाली पर हस्ताक्षर करने को बाध्य करने में सफल हो जाते हैं, उसी दिन मैं पारदर्शी शिकायत प्रणाली क़ानून-ड्राफ्ट की धारा 1 का प्रयोग करके नागरिको को खनिज रॉयल्टी मिलने के शपथपत्र को प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर जमा करवा दूँगा, ताकि नागरिक इस प्रस्ताव पर हाँ या ना दर्ज कर सके। नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) प्रस्ताव क्या है ? इस क़ानून-ड्राफ्ट में एक प्रशासनिक प्रक्रिया को बताया गया है, जिससे राष्ट्रीय स्तर के अधिकारी हर नागरिक को लगभग 500 रूपए (कम या अधिक हो सकता है) प्रति महीने भेज सकेंगे। अब बताएं कि कितने करोड़ नागरिक पूरी तरह से नैतिक इस 500 रूपए प्रति महीने की राशि को नहीं लेना चाहेंगे ? मैं मानता हूँ कि 40 करोड़ से ज्यादा नागरिक अपने हक़ का यह नैतिक रूपया लेना चाहेंगे। और इसलिए पारदर्शी शिकायत प्रणाली यह सुनिश्चित करेगा कि प्रधानमंत्री नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) क़ानून-ड्राफ्ट पर हस्ताक्षर करने को बाध्य होंगे। और जब एक बार नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी क़ानून-ड्राफ्ट पर हस्ताक्षर हो जाते है तो हम आम नागरिकों में से हर एक नागरिक को हर महीने 500 रूपए (कम या ज्यादा हो सकता है) के लगभग मिलेगा। और इस प्रकार गरीबी कम होगी।
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क्या नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी क़ानून-ड्राफ्ट पारित करवाने के लिए जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली क़ानून-ड्राफ्ट का होना जरूरी है ?
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यदि नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) समर्थक वर्ग संसद में बहुमत मिलने तक इंतजार करने और तब नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी लागू करने पर अड़ जाता है तो ऐसी संभावना है कि नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी समर्थको को हमेशा के लिए इंतजार ही करते रहना पड़ेगा, क्योंकि अव्वल तो उन्हें संसद में बहुमत नहीं मिलेगा, और इससे भी बुरा होगा कि यदि उन्हें बहुमत मिल भी जाता है तो इस बात की संभावना है कि उनके अपने ही सांसद बिक जाएंगे और नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) क़ानून-ड्राफ्ट पारित करने से मना कर देंगे।
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उदाहरण के लिए वर्ष 1977 में जनता पार्टी के सांसदों ने चुनाव से पहले वायदा किया था कि वे रॉइट टू रिकॉल कानून लागू करेंगे लेकिन चुन लिए जाने के बाद उन्होंने राइट टू रिकॉल कानून पास करने से मना कर दिया। इसलिए मेरे विचार से, नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी के समर्थक कार्यकर्ताओं को पारदर्शी शिकायत प्रणाली क़ानून-ड्राफ्ट पर जन-आन्दोलन खड़ा करने पर ध्यान देना चाहिए, और पारदर्शी शिकायत प्रणाली क़ानून-ड्राफ्ट पारित करवाना चाहिए, न कि चुनाव में जीत कर बहुमत हासिल करने तक इंतजार करना चाहिए।
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(5.2) नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी क़ानून-ड्राफ्ट - संक्षेप में :
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आईआईएम ए प्लॉट, जेएनयू प्लॉट, सभी यूजीसी प्लॉट, अहमदाबाद एयरपोर्ट प्लॉट, सभी एयरपोर्टों के प्लॉट और हजारों ऐसे भारत सरकार के प्लॉटों से मिलने वाला जमीन का किराया और भारत के सभी खनिजों, कोयला और कच्चे तेल से मिलने वाली सारी रॉयल्टी हम भारत के नागरिकों और हमारी सेनाओं को जानी चाहिए किसी और को नहीं। और यह रॉयल्टी व किराया सीधे ही मिलना चाहिए किसी योजना या स्कीम के जरिए नहीं। उदाहरण के लिए, मान लीजिए भारत सरकार के प्लॉटों से मिलने वाला किराया और खनिज रॉयल्टी दिसम्बर, 2008 में 45 हजार करोड़ रूपया थी। तब हमारे द्वारा प्रस्तावित कानून के मुताबिक 15 हजार करोड़ रूपया सेना को जाएगा और लगभग 500 रूपया प्रत्येक भारतीय नागरिक के पोस्ट-आफिस या बैंक खाते में सीधे ही जमा होगा। यदि हरेक नागरिक महीने में एक या दो बार खाते से पैसा निकालता है तो भी इसके लिए भारत भर में 1,50,000 से ज्यादा क्लर्कों की जरूरत नहीं पड़ेगी। वर्तमान राष्ट्रीयकृत बैकों के पास 6,00,000 से ज्यादा क्लर्क हैं। इसलिए पैसे का वितरण कर पाना संभव है।
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नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) क़ानून-ड्राफ्ट से होने वाले सीधे धन वितरण से हर साल प्रति व्यक्ति को 6000 रूपए से ज्यादा की आय हो सकती है अथवा जमीन या घर की कीमत कम हो सकती है। वह भी प्रति व्यक्ति, न कि प्रति परिवार। और इस तरह नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी क़ानून-ड्राफ्ट गरीबी कम कर देगा, आय बढ़ाएगा और वस्तुओ की मांग बढेगी | वस्तुओ की मांग बढ़ने से उधोग-धंधे और रोजगार बढ़ेगा। स्थानीय उद्योग बढ़ने से इंजिनियरिंग कौशल बढ़ेगा तथा हथियार बनाने के काम में भी सुधार होगा। इस कानून के पारित होने के एक वर्ष के भीतर यदि किसी दंपत्ति को तीसरा बच्चा पैदा होता है तो उसके माता-पिता को 33 प्रतिशत कम किराया मिलेगा। जिनका पहले से ही तीसरा बच्चा है उन पर इस क़ानून का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस तरह यह कानून जनसंख्या पर भी नियंत्रण करेगा।
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(5.3) नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) के क़ानून-ड्राफ्ट की ज्यादा जानकारी
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1. मुख्य अधिकारी पर नागरिकों का नियंत्रण :
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(1.1) कोई भी नागरिक संसद सदस्य के चुनाव में जमा कराये जाने वाली राशि के बराबर पैसे का भुगतान करके अपने आप को राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) उम्मीदवार के रूप में रजिस्टर्ड करवा सकता है।
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(1.2) भारत का कोई भी नागरिक तलाटी के कार्यालय जाकर तीन रूपए का शुल्क जमा करा सकता है और अधिक से अधिक पांच लोगों को राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) पद के लिए अनुमोदित कर सकता है। तलाटी उसे पावती जारी करेगा, जिसमें उसके मतदाता पहचान–पत्र तथा उन व्यक्तियों, जिनको उसने अनुमोदित किया गया है, आदि का उल्लेख होगा।
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(1.3) तलाटी नागरिकों की पसन्द/प्राथमिकता को उसके वोटर आई कार्ड के साथ सरकारी वेबसाईट पर डाल देगा।
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(1.4) कोई नागरिक अपना अनुमोदन/स्वीकृति किसी भी दिन, किसी भी समय रद्द/ कैंसिल कर सकता है।
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(1.5) प्रधानमंत्री का सचिव हरेक उम्मीदवार के अनुमोदन की गिनती को प्रकाशित करेगा।
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(1.6) यदि किसी उम्मीदवार को सभी दर्ज मतदाताओं के 50 प्रतिशत से ज्यादा मतदाताओं (केवल वे मतदाता ही नहीं जिन्होंने अपना अनुमोदन फाइल किया है बल्किा सभी दर्ज मतदाता) का अनुमोदन मिल जाता है तो प्रधानमंत्री मौजूदा राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) को हटा देंगे और उस उम्मीदवार को राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) के रूप में नियुक्त कर देंगे।
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(1.7) यदि किसी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज्यादा का अनुमोदन मिला है और इसे वर्तमान राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी से 2 प्रतिशत ज्यादा अनुमोदन मिल गये है तो प्रधानमंत्री सबसे अधिक अनुमोदन वाले इस व्यक्ति को उस पद के लिए नियुक्त कर देंगे।
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इस तरह राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) पर राइट टू रिकॉल यह सुनिश्चित कर देगा कि राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी काफी कम भ्रष्ट होंगे और किराये का पैसा नागरिकों को विधिवत रूप से मिलेगा। राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) उन प्लॉटो का आवंटन करेंगे जिन्हें भारत के नागरिकों की संपत्ति घोषित किया गया है। वे ऐसा एक कानून बनाकर या राष्ट्रीय जूरी के निर्णय के माध्यम से करेंगे, जो राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) को जमीन का आवंटन करने देने के लिए विशेष तौर से प्राधिकृत करेगा।
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2. किराए की उगाही/किराया जमा करना --
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नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) – सरकारी अधिसूचना की एक धारा में उल्लेख है कि 'भारत के नागरिक यह निर्णय करते है और यह घोषणा करते है कि आईआईएम ए का प्लॉट, गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद का प्लॉट, सभी आईआईएम के प्लॉट, और जेएनयू के प्लॉट भारत के सभी नागरिकों की संयुक्त और समान मालिकाना संपत्ति होगी। ये प्लॉट राज्य अथवा भारत राज्य अथवा भारत संघ अथवा किसी भी निजी/सरकारी निकाय/व्यक्ति की संपत्ति नहीं होगी, बल्कि ये प्लॉट सिर्फ भारत के नागरिकों की संपत्ति होगी। साथ ही, किसी भी निजी कम्पनी अथवा ट्रस्ट के मालिकाना हक के अधीन न आने वाले सभी यूजीसी द्वारा वित्त पोषित विश्व विद्यालयों और महा विद्यालयों के सभी प्लॉट भारत के नागरिकों की संपत्ति घोषित की जाती है। केन्द्रीय सरकार और सरकारी निकायों के सभी प्लॉट भी एतद्द्वारा भारत के नागरिकों की संपत्ति घोषित किए जाते है।
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3. एक अन्य खंड में लिखा है कि निम्नलिखित मंत्रालयों/विभागों के सभी प्लॉट भी राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) के तहत आएंगे ---
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• पर्यटन मंत्रालय
• एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइन्स के मालिकाना हक वाले हवाई अड्डे और सभी भवन
• सभी आईआईएम, यूजीसी के पैसे से चलने वाले सभी कॉलेज और विश्व विद्यालय (विज्ञान और इंजिनियरिंग को छोड़कर)
• उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय
• सूचना और प्रसारण मंत्रालय
• सूचना व प्रौद्योगिकी मंत्रालय
• ग्रामीण विकास मंत्रालय
• लघु उद्योग और कृषि व ग्रामीण उद्योग मंत्रालय
• सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय
• कपड़ा/वस्त्र मंत्रालय
• पर्यटन और संस्कृ्ति मंत्रालय
• शहरी विकास और गरीबी उन्मूृलन मंत्रालय
• युवा मामले और खेल मंत्रालय
• योजना आयोग
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4. आईआईटी, आईआईएससी आदि के बारे में एक अलग सरकारी आदेश, जिसकी मांग हम करते है, उसमें उल्लेख होगा कि सभी आईआईटी, एनआईटी और आईआईएससी, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डी आर डी ओ) के अन्तर्गत आएंगे और रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डी आर डी ओ) के निदेशक इन कॉलेजों के मुख्य अधिकारी होंगे तथा वे इन कॉलेजों मे दैनिक कार्य कलाप सुचारू रूप से चलाने के लिए उप प्रमुखों की नियुक्ति करेंगे। विज्ञान और इंजिनियरिंग पढ़ाने वाले कॉलेज विज्ञान मंत्रालय के अधीन होंगे और ये राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) के अधीन नहीं होंगे। हालांकि इन कॉलेजों के पास जो अतिरिक्त जमीनें है वो राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) के तहत आएँगी।
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5. उपयोग में न आ रही जमीन के बारे में -- राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) जमीन को उपयुक्त प्लॉटो के आकार में इस तरह बांटेगा जिस तरह वह इसे किराया प्राप्ति के लिए सबसे ज्यादा लाभप्रद समझता है। राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) हरेक प्लॉट के लिए बोली लगवाएगा। नीलामी के लिए शर्तें इस प्रकार होंगी :
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• लीज/पट्टा, राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) द्वारा किए गए निर्णय के अनुसार 5, 10, 15, 20 या 25 वर्षों के लिए होगा। यह लीज कभी भी 25 वर्ष से अधिक के लिए नहीं होगी।

• बोली लगाने वाले महीने के किराये के लिए बोली लगाएंगे और बोली लगाने की अवधि का काल अधिकतम लीज अवधि से कम होगा। इसलिए यह बोली मासिक किराए के रूप में होगी। एक व्यक्ति कई बोली लगा सकेगा। लीज की न्यूनतम समय अवधि 12 महीने होगी।

• बोली का वजन मासिक किराए के अनुसार होगा। अर्थात किराया जितना ज्यादा होगा बोली का वजन या प्रभाव भी उतना ही ज्यादा होगा और लीज जितना लम्बा होगा वजन/प्रभाव उतना कम होगा।

• बोली/निविदा खुली होगी।

• राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) बोली के वजन के अनुसार प्लॉट देगा।

• राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) तीन महीने का किराया अग्रिम जमा के रूप में लेगा।
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6. लीज/पट्टे की अवधि के दौरान, राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) किराये में प्रत्येक तीन महीने में बदलाव करेगा। ऐसा प्लॉट के चारो ओर के एक वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र के जमीन के मूल्य में आने वाले प्रतिशत बदलाव के आधार पर और प्लॉट देने के दिन से और किराया दर में संशोधन किए जाने वाले दिन के अनुसार ब्याज दरो में आने वाले प्रतिशत बदलाव के आधार पर किया जाएगा।
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7. लीज का समय बीत जाने के बाद राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) एक नई बोली लगवाएगा जिसमें पहले से ही लीज ले चुके लीज-धारकों को वरीयता मिलगी।
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8. यदि मौजूदा लीज धारक बोली हार जाता है तो वह उस जमीन के सामान को बेच या हटा सकता है। लकिन उसे जमीन खाली करनी ही होगी।
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9. यदि प्लॉट किसी ने लिया हुआ है और उसका उपयोग कर रहा है (उदाहरण – आईआईएम ए प्लॉट) तो राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) उस प्लॉट के चारो ओर एक वर्ग किलोमीटर के प्लॉट का पिछले तीन वर्षों के मध्य विचलन मान मूल्य ( बाजार मूल्य * मुख्य ब्याज दर / 3) का हिसाब लगाकर प्लॉट की कीमत तय करेगा और अगले 10 वर्षों के लिए वार्षिक किराया तय करेगा। किराए में हर तीन साल में संशोधन किया जाएगा। दस वर्षों के बाद खंड 6 में दिए अनुसार नीलामी की जाएगी।
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नागरिकों को किराया भेजना
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10. राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) प्राप्त किराए का 34 प्रतिशत हिस्सा रक्षा मंत्रालय को देगा जो सेना को मजबूत बनाने, हथियार उपलब्ध कराने और सभी नागरिकों को हथियार चलाने की शिक्षा देने के काम के लिए होगा।
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11. राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) पिछले वर्ष राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति दिए गए किराए के दूगने की अधिकतम सीमा की शर्त के साथ पिछले 15 वर्षों से उस राज्य में रह रहे अथवा उस राज्य में जन्में नागरिकों को प्रत्येक महीने जमा किए गए/वसूले गए किराए का 33 प्रतिशत वितरित करेगा।
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12. राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) भारत के नागरिकों को प्रति माह जमा हुए किराए का 33 प्रतिशत हिस्सा वितरित करेगा।
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13. 7 वर्ष से कम उम्र वालों के लिए हिस्सा शून्य , 14 वर्ष से कम उम्र वालों के लिए चौथाई ,18 वर्ष से कम उम्र वालों के लिए आधा होगा और इससे अधिक उम्र वालों को पूरा हिस्सा मिलेगा।
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14. इस कानून के पारित हो जाने के एक साल के बाद हर व्यक्ति को किराया इस प्रकार मिलेगा -

• यह किराया 33 प्रतिशत बढ़ जाएगा यदि उसका कोई बच्चा न हो।
• यह किराया 33 प्रतिशत बढ़ जाएगा यदि उसके एक लड़की हो।
• यह बराबर रहेगा यदि उसके एक बेटा अथवा (एक बेटी, एक बेटा) अथवा दो बेटी हो।
• यह किराया 33 प्रतिशत कम हो जाएगा यदि उसे (दो बेटी, एक बेटा) अथवा (एक बेटी, एक बेटा) अथवा (दो बेटा) अथवा (तीन बेटी) से अधिक हो और इसमें से सबसे छोटा बच्चा कानून पास होने/लागू होने के एक वर्ष के बाद पैदा हुआ हो।
• किराया 66 प्रतिशत घट जाएगा यदि उसे ( तीन बेटी एक बेटा) अथवा (दो बेटी, दो बेटा) अथवा(एक बेटी, दो बेटा) अथवा (तीन बेटा) अथवा (चार बेटी) से अधिक हो और इसमें से सबसे छोटा बच्चा कानून पास होने/लागू होने के एक वर्ष के बाद पैदा हुआ हो।
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15. 60 वर्ष से ऊपर के पुरूषों और 55 वर्ष से ऊपर की महिलाओं को 33 प्रतिशत ज्यादा किराया मिलेगा और यह 75 साल से ऊपर के पुरूष एवं 70 साल से ऊपर की महिलाओं के लिए 66 प्रतिशत ज्यादा मिलेगा।
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(5.4) नागरिको को खनिज रॉयल्टी भेजना
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अभी के अनुसार, खनिज प्लॉ्ट उन्हें दिए जाते है जो अधिकतम रॉयल्टी देता है। यही तरीका आगे भी लागू रहेगा लेकिन बाद में बोली में सुधार के लिए बढ़ी हुई बोली प्राप्त करने के लिए उसे संशोधित किया जा सकेगा। लेकिन एक बदलाव जिसका वायदा नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) समूह करता है वह यह है कि खनिजो से प्राप्त रॉयल्टी आम लोगों और सेना का सीधे दी जाएगी।
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(5.5) राज्य स्तर पर नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी के क़ानून-ड्राफ्ट का प्रारूप :
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पुलिस, न्यायलय, सेना, सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल, राज्य ट्रान्सपोर्ट के बस-अड्डों द्वारा प्रयोग में न लाए जाने वाले राज्य सरकार के प्लॉट और वे प्लॉट जिन्हें खास तौर से कानून से छूट प्राप्त न हो, उनसे किराया वसूला जाएगा। राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) किराया वसूल/जमा करेगा और उसमें से 34 प्रतिशत सेना को 66 प्रतिशत नागरिकों को देगा। जमीन चाहे राज्य या केन्द्र के अधीन हो, किराया एक ही तरह से बांटा जाएगा।
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(5.6) सार्वजनिक भूमि का किराया कितना है ?
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भारत सरकार, केन्द्र और राज्यों के पास काफी उंचे बाजार-मूल्य वाली हजारों प्लॉेटे है। यहॉ एक छोटा सा उदाहरण प्रस्तु्त है :
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प्लॉट का नाम - क्षेत्रफल - कीमत, प्रति वर्ग मीटर - प्लॉट का बाजार मूल्य क्रमश:

• आईआईएम, अहमदाबाद - 100 एकड़, 40,000 रूपया, 1400 करोड़ रूपया
• आईआईएम, लखनऊ - 200 एकड़, 20,000 रूपया, 1600 करोड़ रूपया
• आईआईएम, लखनऊ(नोएडा) - 10 एकड़, 50,000 रूपया, 200 करोड़ रूपया
• आईआईएम, कोलकाता - 135 एकड़, 20,000 रूपया, 1000 करोड़ रूपया
• आईआईएम, इंदौर - 190 एकड़, 15,000 रूपया, 500 करोड़ रूपया
• जेएनयू - 1000 एकड़, 40,000 रूपया, 16000 करोड़ रूपया
• गुजरात विद्यापीठ - 25 एकड़, 40,000 रूपया, 400 करोड़ रूपया
• गुजरात विश्व विद्यालय - 250 एकड़, 35,000 रूपया, 3500 करोड़ रूपया
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कुल - 27,000 करोड़ रूपया
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इनका किराया कितना होगा यदि ये प्लॉट बिल्डरों को दिए जाते हैं ? प्लॉट के बाजार मूल्य के 3 प्रतिशत पर इन 9 प्लॉटों का किराया = 27 हजार करोड * 3/100 = 810 करोड़ रूपए प्रति वर्ष = सात रूपए प्रति नागरिक/वर्ष बनता है। अब यह प्लॉट मुंबई एयरपोर्ट, अहमदाबाद हवाई अड्डा, बंगलौर हवाई अड्डा आदि जैसे प्रमुख प्लॉटों के मूल्यों की तुलना में कहीं नहीं ठहरता। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :
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प्लॉट का नाम - क्षेत्रफल - कीमत, प्रति वर्ग मीटर - अनुमानित बाजार मूल्य
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• अहमदाबाद एयरपोर्ट - 1850 एकड़, 40,000 रूपया, 29,600 करोड़ रूपया
• मुंबई एयरपोर्ट - 1100 एकड़ ,100,000 रूपया, 44,600 करोड़ रूपया
• दिल्ली एयरपोर्ट - 5000 एकड़, 100,000 रूपया, 200,000 करोड़ रूपया
• बंगलौर एयरपोर्ट (नया) - 4050 एकड़, 10,000 रूपया, 32,400 करोड़ रूपया
• बंगलौर एयरपोर्ट (पुराना) - 1000 एकड़, 100,000 रूपया, 40,000 करोड़ रूपया
• कोलकाता एयरपोर्ट - 1500 एकड़, 30,000 रूपया, 18,000 करोड़ रूपया
• चेन्नई एयरपोर्ट - 4800 एकड़, 40,000 रूपया, 76,800 करोड़ रूपया
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कुल -- 440,800 करोड़ रूपया
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(कृपया ध्यान दें कि उपर्युक्त जमीन की कीमतें 2010 के वास्तविक बाजार-मूल्य की तुलना में बहुत ही कम हैं जब यह दूसरा संस्करण/एडिशन लिखा जा रहा था।)
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इनका किराया कितना होगा यदि ये प्लॉट बिल्डरों को दिए जाते हैं ? इन एयरपोर्ट प्लाटों का किराया प्लॉट के बाजार-मूल्यो का 3 प्रतिशत की दर से = 440,800 करोड़ * 3/100 = 13,224 करोड़ प्रति वर्ष = 120 रूपया प्रति नागरिक प्रति वर्ष !!
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सरकार के पास एक अनुमान के अनुसार 50,000 प्लॉट हैं। यदि किराया प्रत्येक प्लॉट से औसतन प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 20 पैसे जितना कम भी हो तो किराया 12000 रूपए प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष से ज्यादा हो जाता है। या तो हम आम लोगों को यह किराया मिलेगा अथवा जमीन की कीमतों में बहुत कमी आएगी । (वास्तव में जमीन की कीमत ही घटेगी) जिससे हम आम लोगों को अपनी कम आय पर घर खरीदना और अपना व्यवसाय शुरू करना आसान हो जाएगा।
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(5.7) खनिज रॉयल्टी कितनी है ?
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खनिज रॉयल्टी का अंदाज लगाना संभव है। लेकिन यह विक्रय मूल्य के उतार चढ़ाव के साथ-साथ बढ़ता-घटता रहता है। जून, 2008 के मूल्यों पर आधारित अनुमान प्रस्तुत है। अनुमान लगाने के लिए निम्न लिखित तरीका प्रयोग में लाया जाएगा जो उस कानून से निकला है जिसका मै प्रस्ताव कर रहा हूँ। मेरे द्वारा प्रस्तावित किए जा रहे इस कानून के अनुसार खनिज और तेल कुएं प्रतियोगी बोली के तरीके का उपयोग करके लीज पर दिए जाएंगे। इसलिए खदान- मालिक जो कीमत लगाएंगे वह न्यूनतम स्तर के होंगे और यह भारत में चल रहे श्रमिक मजदूरी तथा उपकरण की लागत पर निर्भर करेगा। अब इन कानूनों में मैं प्रस्ताव कर रहा हूँ कि सरकार खरीददारों से अन्तर राष्ट्रीय बाजार मूल्य के बराबर कीमत लेगी। दोनो का अंतर ही रॉयल्टी होगा, जिसका 67 प्रतिशत नागरिकों को सीधे ही जाएगा और 33 प्रतिशत सेना को जाएगा। जून, 2008 के मूल्य के आधार पर कच्चे तेल की कीमत की रॉयल्टी के संबंध में मेरा अनुमान निम्नलिखित है :
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कच्चा तेल
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तेल का अंतर राष्ट्रीय मूल्य = 140 यू एस डॉलर प्रति बैरल
भारत में निष्कर्षण (Extraction) मूल्य, सभी प्रकार की लागतों सहित = 25 डॉलर प्रति बैरल
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जून, 2008 में तेल कम्पनियों द्वारा ली जा रही कीमत 55 डॉलर प्रति बैरल थी और वे काफी लाभ कमा रही थीं जो अन्तर राष्ट्रीय बाजार से 150 डॉलर प्रति बैरल की दर से खरीदे जाने के कारण घाटे का सौदा बन गयी। भारतीय तेल कम्पनियां भारतीय तेल शोधक कारखानों (रिफायनरियों) से वर्ष 2000 के शुरूआती दिनों में 25 डॉलर प्रति बैरल कीमत ले रही थीं। इस तथ्य में यह भी बात जुड़ जाती है कि भारतीय तेल कम्पनियों में स्टॉफ की संख्यां बहुत अधिक है और ये अपने कर्मचारियों को काफी ज्यादा वेतन देती हैं। उदाहरण के लिए, तेल और प्राकृतिक गैस (ओ एन जी सी) कम्पनी का क्लर्क लगभग 20,000 रूपए प्रतिमाह वेतन पाता है, जिसमें सभी भत्ते और व्यय शामिल है। जबकि निजी कंपनी का क्लर्क लगभग 8000 रूपए प्रतिमाह पाता है। इन खर्चों को कम किया जा सकता है।
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भारत में उत्पादन = 6,60,000 बैरल प्रति दिन = 6,60,000 * 365 बैरल प्रति वर्ष = 24,09,00,000 बैरल प्रति वर्ष = 24 करोड़ बैरल प्रति वर्ष
जनसंख्या = 110 करोड़
भारत में प्रति व्यक्ति उत्पादन = 0.22 बैरल प्रति भारतीय प्रति वर्ष
प्रति बैरल लाभ = 115 यू एस डॉलर
कुल मुनाफा डॉलर में = 0.22 * 115 डॉलर प्रति भारतीय = 25 डॉलर प्रति भारतीय
डॉलर का मूल्य = 45 रुपया प्रति डॉलर
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कुल मुनाफा रुपये में = 25*45=1125 रुपये प्रति वर्ष प्रति नागरिक
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*यदि कच्चे तेल की कीमत गिरकर 70 अमेरिकी डॉलर हो जाती है तो लाभ कम होकर 495 रुपया प्रति वर्ष प्रति नागरिक हो जाएगी।
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कच्चा लोहा
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उत्पादन = 123 मिलियन टन = 12.3 करोड टन = 0.11 टन प्रति भारतीय नागरिक
मूल्य = 150 डॉलर प्रति टन = 7600 रुपया प्रति टन
खुदाई का खर्चा = 300 रुपया प्रति टन
मुनाफा प्रति टन = 7200 रूपया
मुनाफा प्रति नागरिक = 0.11 * 7200 रूपया = 730 रूपया प्रति वर्ष
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दूसरे शब्दों में, यदि कच्चा तेल, तेल शोधक कारखानों (रिफाइनरी) को अंतरराष्ट्रीरय मूल्य पर दिया जाता है और इसका लाभ प्रत्येक भारतीय को भेजा जाए तो प्रत्येक भारतीय हर वर्ष 1125 रूपया पाएगा। जब तेल की कीमत कम होगी तो इसमें भी कमी आएगी और तेल की कीमत बढ़ने पर यह पैसा ज्यादा मिलेगा। यह तो केवल कच्चे तेल की बात थी। कोयला, प्राकृतिक गैस, ग्रेनाइट, संगमरमर, पत्थर, तांबा, एल्युमुनियम, लौह अयस्क और पानी से मिलने वाली रॉयल्टी मिलाकर यह एक बहुत बड़ी राशि होगी। जब नागरिकों को यह पता चलेगा कि उन्हें खदानो से रायल्टी मिल रही है तो वे खदान माफियाओं पर अंकुश लगाएंगे और इससे ईमानदार लोगों को खदान के व्यावसाय में आने का मौका मिलेगा, फलस्वरूप रॉयल्टी कई गुना बढ़ जाएगी।

मेरे आकलन और अनुमान के अनुसार खनिज रॉयल्टी प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति 4000- 6000 रूपए से ज्यादा तक बढ़ जाएगी।
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इसलिए खनिज रॉयल्टी और जमीन का किराया मिला कर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष लगभग 18 हजार रूपए हो जाएगा। इसमें से 33 प्रतिशत सेना को जाएगा। इस तरह नागरिकों को प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष लगभग 12000 रूपए मिलेगा। यह पैसा किसी टैक्स का नहीं होगा। यह पैसा उन प्लॉटों और खनिजो से आ रहा है जिसके मालिक हम नागरिक हैं। चूंकि यह पैसा किसी टैक्स से नही आ रहा है इसलिए यह कोई “अमीरों पर कर लगाओ और गरीबों को खिलाओ” जैसा प्रस्ताव नहीं है। यह सीधा-सीधा उन खनिजों और प्लॉटों का पैसा है जिसके मालिक हम नागरिक है।
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नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) क़ानून-ड्राफ्ट सभी सुखद परिवर्तनों की जननी है। हम केवल इसी परिवर्तन को लाने के लिए अन्य परिवर्तनों का प्रस्ताव कर रहे हैं। और यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि यह परिवर्तन आने के बाद स्थाई हो जाए। आज के हिसाब से जमीन का किराया और नए एम 3 का सृजन, ये दो प्रमुख कारण है जिसके कारण गरीबी बनी हुयी है। ये क़ानून हम आम लोगों की गरीबी कम करेगा।
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(5.8) जमीन का किराया वसूलने करने के प्रभाव
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एक बार यदि भूमि किराया अधिनियम लागू हो जाता है तो इन दो बातों में से एक बात होगी -

1. या तो हम आम लोगों को लगभग 500 या 1000 रूपया प्रति व्यक्ति हर महीने जमीन का किराया मिलेगा। अथवा
2. जमीन की कीमत घटेगी, क्योंकि सार्वजनिक भूमि का किराया देना होगा और इसीलिए भूमि-संग्रह करना बहुत महंगा पडेगा ।
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दूसरी घटना के होने की संभावना ज्यादा है। अब यदि जमीन की कीमत गिरती है तो घरों की कीमत भी कम होगी जिससे हम आम लोगों का जीवन सुधरेगा। हम आम लोगों मे से कई लोग, जो झुग्गियों में रहते हैं, वे शायद एक शयनकक्ष-हॉल-रसोई (वन-बीएचके) फ्लैटों में जा सकेंगे। और यदि जमीन की कीमत घटती है तो व्यवसायों की संख्या बढ़ेगी (क्योंकि जब रियल एस्टेट की लागत गिरती है तो कारीगरों के लिए व्यावसाय करना आसान हो जाता है) और हम आम लोगों को ज्यादा रोजगार और वेतन मिलेगा। अधिक औद्योगिकीकरण से खनिजों के मूल्य बढ़ेंगे और इसलिए खनिजों की रॉयल्टीे भी बढ़ेगी। इसलिए किसी भी स्थिति में आईआईएम ए प्लॉट, आईआईएम, जेएनयू प्लॉट व हजारों अन्य प्लॉटों और खदानों, जिनके मालिक हम आम लोग है, से किराए के प्रस्ताव से हम आम लोगों को बहुत लाभ होगा। इसलिए जमीन किराया ओर खदान की रॉयल्टी के प्रस्तावों से आय बढ़ेगी और गरीबी कम होगी। गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों को जमीन और घर ज्यादा सस्ती दरों पर उपलब्ध होंगे। इस प्रकार इससे गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों की क्रयशक्ति बढेगी। क्रयशक्ति के बढ़ने से मांग बढ़ेगी और इस प्रकार उद्योग धंधे बढ़ेंगे और हमारी सेना भी मजबूत होगी।
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(5.9) जमीन का किराया न वसूलने का कु-प्रभाव
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सार्वजनिक भूमि पर किराया जमा न करने का प्रभाव खुले अन्याय की तरह है। अमीरों द्वारा गरीबों का शोषण और आर्थिक असमानता अन्यायपूर्ण ढ़ंग से बढ़ेगा। उदाहरण के लिए, दिल्ली एयरपोर्ट पर विचार कीजिए। यह हर साल दो करोड़ यात्रियों को सेवा देता है। इसके पास 6000 करोड़ रूपए प्रतिवर्ष किराया मूल्य की संपत्ति है। अर्थात 6000 रूपया/2 =3000 रूपया प्रति यात्री।
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(5.10) एक उच्च वर्ग के आदमी के बारे में विचार कीजिए जो एक वर्ष में 20 बार दिल्लीै एयरपोर्ट का उपयोग करता है। लेकिन 3000 रूपया प्रति उड़ान की दर से जमीन का किराया उससे न वसूलने के कारण उसकी अमीरी 6,00,000 रूपए बढ़ जाती है। और भारत के प्रत्येक आम आदमी को हर साल साठ रूपए की हानि होती है, क्यों कि आम आदमी को दिल्ली एयरपोर्ट के प्लॉट ,जो कि उसका अपना है, का कोई किराया नहीं मिल रहा। इस प्रकार किराया न वसूलने के कारण आय का अंतर बढ़ जाता है।
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राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) को वापिस बुलाने/नौकरी से निकालने का तरीका
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राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) नाम के अधिकारी के द्वारा किराया वसूलना और लोगों को भेजने का काम किया जाना है। किराए का निर्धारण बाजार मूल्य और ब्याज की दरों के आधार पर मानक गणना द्वारा किया जाएगा। इस क़ानून में राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) के पास कोई विवेकाधीन शक्ति नहीं है। लेकिन उसके पास प्लाट के छोटे टुकडे बनाने के तरीके निर्धारित करने का विवेकाधिकार है। इसलिए राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) को सारा किराया खुद की जेब में पहुंचा देने से कैसे रोका जाएगा ? देखिए, 'नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' के प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट में यह प्रक्रिया रखी गयी है जिससे हम आम नागरिक एन एल आर ओ को बदल सकें। नागरिको द्वारा भ्रष्ट को बदलने का यह तरीका वह मुख्य बात है जो हम आम लोगों को एक ऐसा राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) ढ़ूंढने में सक्षम बनाएगा जो किराया आम लोगों तक भेजने में विश्वास रखता हो।
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(5.11) खनिज रॉयल्टी सीधे नागरिको के खाते में भेजे जाने के लिए प्रस्तावित कानून (DDMRCM) का ड्राफ्ट
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सैक्शन 1 : राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) उम्मीदवार के लिए नागरिकों के अनुमोदन/स्वीकृति दर्ज करना
सैक्शन 2 : राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) को बदलना
सैक्शन 3: भारत सरकार के अधीन प्लॉटों का स्वामित्व/मालिकाना हक
सैक्शन 4 : भारत सरकार के स्वामित्व / मालिकी वाले प्लॉटों के किरायों की वसूली
सैक्शन 5: खनिज रॉयल्टी का कलेक्शन/वसूली
सैक्शन 6: जनता की आवाज़
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नागरिक एवं सेना को खनिज रॉयल्टी का प्रस्तावित ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें ---- www.facebook.com/pawan.jury/posts/811075642344007
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(5.12) कृपया नागरिको और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी प्रस्ताव के कानूनी ड्राफ्ट की अंतिम दो धाराओं पर ध्यान दें
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सैक्शन 6 : जनता की आवाज़ ( पूरा ड्राफ्ट ऊपर दिए गए लिंक में देखें)
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(6.1) [जिला कलेक्टर]
यदि कोई नागरिक इस कानून में कोई बदलाव चाहता है तो वह जिलाधिकारी/डी सी के कार्यालय में जाकर एक एफिडेविट जमा करा सकता है और डी सी या उसका क्लर्क उस एफिडेविट को 20 रूपए प्रति पेज का शुल्क लेकर प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर स्कैन करके डाल देगा ताकि कोई भी नागरिक उस एफिडेविट को बिना लॉग-इन के देख सकें।
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(6.2) [तलाटी अर्थात पटवारी अर्थात लेखपाल (या उसका क्लर्क)]

यदि कोई नागरिक इस कानून या इसकी किसी धारा के विरूद्ध अपना विरोध दर्ज कराना चाहे अथवा वह ऊपर के धारा में प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर हां/नहीं दर्ज कराना चाहे तो वह अपने वोटर आई कार्ड के साथ तलाटी के कार्यालय में आकर 3 रूपए का शुल्क देगा। तलाटी हां-नहीं दर्ज कर लेगा और उसे एक रसीद/पावती देगा। नागरिक द्वारा दर्ज किया गया यह हां/नहीं प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर रखा जाएगा।
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कृपया ऊपर लिखित प्रस्तावित क़ानून-ड्राफ्ट के अंतिम दो खंड पर ध्यांन दीजिए। ये दो खंड जनता की आवाज - पारदर्शी शिकायत प्रणाली के अलावा कुछ नहीं है। मेरे प्रत्येक क़ानून-ड्राफ्ट में इन दो पंक्तियों को दोहराया गया है। यह दोहराव क्यों है ? सांकेतिक मूल्यों को एक ओर छोड़िए, इस दोहराव का राजनैतिक महत्व भी है। यह हो सकता है कि 'नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' कार्यकर्ताओ को सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) विरोधी बुद्धिजीवियों से लड़ाई लड़नी पड़े। तब एम आर सी एम कार्यकर्ता उसे इस कानून का वैसा क़ानून-ड्राफ्ट उपलब्ध कराने की चुनौती दे सकता है, जो वह चाहता है। और तब कार्यकर्ता उनके द्वारा प्रस्तावित प्रक्रिया में 6.1 और 6.2 धाराओं में दर्ज लाइने जोड़ने को कह सकता है। यदि विरोधी पक्ष अंतिम दो लाइनों को जोड़े जाने का विरोध करता है तो उस पर आम आदमी का विरोधी होने का आरोप लगाया जा सकता है। और यदि वह इन दो पंक्तियों के जोड़े जाने को स्वीेकार करता है तब 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली' की इन दो पंक्तियों का उपयोग करके 'नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' (एम आर सी एम) कानून जनता के समर्थन द्वारा लाया जा सकता है।
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दो लाइनों का यह जोड़ दर्शाता है कि 'पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली' की मांग केवल दोहराई गयी सकारात्मक संकल्पना ही नहीं है, बल्कि 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली' एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे किसी भी अन्य कानून में जोड़ा जा सकता है। और यदि एक बार यह कानून 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली' की धाराओं के साथ जोड़कर पारित कर दिया जाता है तो इन दोनो धाराओं को उन सभी 200 कानूनों को लागू करने में उपयोग में लाया जा सकता है जिसका प्रस्ताव मैने किया है। 'जनता की आवाज' की ये दो धाराएं किसी भी क़ानून में लोकतांत्रिक सुधार का रास्ता खोल देता है, और इन दो पंक्तियो का जोड़ा जाना किसी भी अलोकतांत्रिक कानून को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए पर्याप्त है। क्यों कि यदि किसी अलोकतांत्रिक कानून में ये दो पंक्तियां शामिल हैं तो इसे कुछ ही दिनों या कुछ ही सप्ताह में नागरिकों द्वारा नकार दिया जाएगा।
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(5.13) 110 करोड़ नागरिकों को भुगतान भेजने में आनेवाली लागत
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जमीन का किराया और खदान की रॉयल्टी 110 करोड़ आम लोगों तक भेजना कितना आसान/कठिन है ?
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इस काम को यूनिवर्सल बैंकिंग प्रणाली का उपयोग करके किया जा सकता है, जिसमें प्रत्येंक नागरिक के पास केवल और केवल एक ही नागरिक एकाउन्ट, भारतीय स्टेट बैंक ( अथवा किसी सरकारी बैंक या पोस्ट-आफिस) की उसकी अपनी पसंद की शाखा में होगा। राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) द्वारा भेजी गई राशि नागरिक के खाते में जमा की जा सकती है और इससे किसी सप्ताह में ज्यादा से ज्यादा एक बार सौ रूपए के गुणक के रूप में अधिकतम 1000 रूपया प्रति माह निशुल्क निकाला जा सकता है। खाता धारक को फोटो वाली पासबुक और हस्ताक्षरित/अंगुठा लगा चेक लाना होगा जिसे बैंक में कैशियर और कैमरे के सामने प्रस्तु्त करना होगा। इस अत्यन्त सुरक्षित प्रक्रिया से कोई कैशियर प्रति घंटे 30 लोगो को अथवा अपने आठ घंटे की ड्यूटी के दौरान 200 लोगों को और एक महीने में 5000 लोगों को भुगतान कर सकता है।
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इस तरह, 110 करोड़ नागरिकों को प्रति माह एक बार भुगतान करने के लिए भारतीय स्टेट बैंक को 110 करोड़/ 5000 = लगभग 220,000 कैशियर की जरूरत पड़ेगी। साथ ही, जब तक कि कोई बच्चा 14 वर्ष का नहीं हो जाता तब तक उसका भुगतान उसके माता-पिता के खाते में जाएगा और इसलिए क्लर्कों की जरूरी संख्या लगभग 30 प्रतिशत घटकर केवल 160,000 क्लर्क ही रह जाएगी। दूसरे शब्दों में, भारत भर में लगभग 160,000 कैशियरों, लगभग 10000 निरीक्षकों और 10000 अन्या स्टॉफ को काम पर लगाकर प्रतिमाह 110 करोड़ भुगतान भेजना संभव है। और क्यों कि एटीएम का प्रसार काफी हो रहा है, इसलिए इस संख्या में भी कमी लाई जा सकती है। और प्रतिमाह नकद भुगतान की संख्या बढ़ाई जा सकती है।
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धोखाधड़ी करने वालों की संख्यां में कमी लाने के लिए लोग किसी मुहल्ले में कम से कम 10 व्यक्तियों और ज्यादा से ज्यादा 20 व्यक्तियों का एक दल बना सकते हैं। जिसे “आपसी गवाह समूह” का नाम दिया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति 10 के समूह का सदस्य है तो उस पर इस बात का प्रतिबंध होगा कि जब वह पैसा निकालने जाए तो उस समूह में से कम से कम 5 लोग उसके साथ अवश्य जाएं। आम तौर पर सभी 10 लोग एक ही दिन और एक ही समय पैसा निकालने जाएंगे। यदि कोई व्यक्ति ऐसे समूह का सदस्य है तो उस समूह में से सभी को एक ही साथ पैसा मिल जाएगा। और किन्हीं 5 लोगों के अंगुठे का निशान भुगतान रसीद पर ले लिया जाएगा।
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एक दलील जो 'नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' (एम आर सी एम) के विरूद्ध मुझे दी जाती है, वह यह है कि 200,000 क्लर्कों के नेटवर्क का संचालन करना असंभव होगा, और इसलिए क्यों न इस पैसे को शिक्षा, स्वास्थ्य आदि पर खर्च किया जाए। देखिए, 5 से 17 आयुवर्ग के 25 करोड़ बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रति 100 छात्र कम से कम एक शिक्षक की जरुरत होगी। स्कूल में प्रति छात्र कम से कम एक वर्ग-मीटर क्षेत्र की जरूरत होगी। अर्थात 25 करोड़ वर्ग-मीटर क्षेत्र। अस्पतालों में 100 करोड़ नागरिको को सेवा प्रदान करने के लिए हमें प्रति 2000 नागरिकों पर कम से कम एक डॉक्टर की जरूरत होगी। अर्थात 500,000 डॉक्टर ओर लगभग 10,00,000 नर्स। इसके अलावा हमें अस्पताल के लिए हजारों भवनों की जरूरत पड़ेगी। दूसरे शब्दों में 25 करोड़ छात्रों को शिक्षा देने और 100 करोड़ नागरिकों को स्वास्थ्य सेवा देने के लिए हमें 20 से 100 गुना ज्यादा स्टाफ की जरूरत होगी। इसलिए शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की बात मानने के बाद भी मै क्लर्कों की संख्या के आधार पर किराया भेजने की योजना को रद्द करने की जरूरत नहीं समझता। प्रत्येंक महीने 100 करोड़ भुगतान भेजने के लिए आवश्यक क्लेर्कों की संख्या 200,000 से अधिक नहीं है और यह दूसरी वैकल्पिक योजनाओं में लगने वाले स्टाफ से बहुत ही कम है।
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(5.14) क्या इससे सरकारी आय कम नहीं होगी ? नहीं।
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यदि खनिज की सारी रॉयल्टी नागरिकों को जाती है तो सरकार को पैसे की कमी नहीं पड़ेगी। सबसे पहले मेरे प्रस्ताव के अनुसार खनिज रॉयल्टी का 33 प्रतिशत हिस्सा सरकार (सेना) को ही जाएगा, जिसे प्रत्येक आम नागरिक पर, और खनिज रॉयल्टी से उसकी आय पर 33 प्रतिशत आयकर के रूप में देखा जा सकता है। अब यह 33 प्रतिशत हिस्सा तब बढ़ जाएगा जब नागरिकों को 67 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा। कैसे ?
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आज की खनिज रॉयल्टी पर विचार कीजिए। आज एक ग्रेनाइट ब्लॉक जिसका मूल्य बाजार में 100 रूपए है, और जिस पर खनन और परिवहन की लागत 10 रूपए से कम है। उस पर सरकार 5 रूपए या उससे भी कम रॉयल्टी प्राप्त करती है। ये बोलियां इतनी कम क्यों हैं ?

क्योंकि स्थानीय खनन ठेकेदार यह सुनिश्चित करने के लिए अपराधियों को भाड़े पर लेते हैं कि ज्यादा खदान मालिक बोली जमा कराने के लिए कलेक्टर के कार्यालय में ना आ पाए और बोली ना लगा पाए। लकिन ये अपराधी अपना काम करने में इसलिए सफल हो जाते हैं कि उन्हें विधायकों, सांसदों, मंत्रियों, मुख्य्मंत्रियों, प्रधानमंत्री, भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों और जजों के सगे-संबंधी वकीलों का सहयोग प्राप्त होता है। दूसरे शब्दों में, आज अपराधियों के उपयोग से, विधायकों, सांसदों, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री, भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों और जजों के सगे-संबंधी वकील ये सुनिश्चित कर लेते हैं कि उस रॉयल्टी में से अधिकतर हिस्सा उनके हाथों मे आयेगा, जो खदान ऐसे ठेकेदारों और अपराधियों के हाथ में हो जिन पर उनका नियंत्रण है। इसलिए हम कार्यकर्ताओं को आम लोगों को यह सूचना देनी होगी कि आम लोगों को इन मंत्रियो, भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों और जजों के सगे-संबंधी वकीलों के खिलाफ लडाई लड़नी होगी ।
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तब दो प्रश्न उठते है –
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(i) एक आम आदमी इन शक्तिशाली लोगों से कैसे लडाई लड़ सकता है ?
(ii) क्यों एक आम आदमी को अपना जीवन खतरे में डालना चाहिए या अपना समय बरबाद करना चाहिए ?
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'नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' के कानूनी ड्राफ्ट में रिकॉल करने की प्रक्रिया (भ्रष्ट को हटाने का अधिकार) इन दोनों मुख्य प्रश्नों का उत्तर देता है। 'नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' दूसरे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार देता है कि, यदि खनिज की रॉयल्टी नागरिकों को मिल रही हो तो नागरिकों के पास यह सुनिश्चित करने का पर्याप्त कारण है कि वे अपराधी जो खदान के अच्छे ठेकेदारो को रोकते हैं, उन्हें जान से मार दिया जान चाहिए या बन्दी बना लेना चाहिए। और रिकॉल प्रक्रिया (भ्रष्ट तो हटाने का अधिकार) पहले प्रश्न का उत्तर इस प्रकार देता है कि --- पुलिस वालों, जजों, मुख्यमंत्रियों आदि पर प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल का उपयोग करके नागरिक यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि वे ऐसे पुलिस प्रमुखों, जजों, मंत्रियों आदि को बदल दें जो अपराधियों को बढ़ावा देते है, और ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति करें जो आम नागरिको का भला चाहते है। इसलिए एम आर सी एम क़ानून खनिज की रॉयल्टी कई गुना बढ़ा देगा और इससे वह रॉयल्टी भी बढ़ेगी जो सेना को जाती है। इसलिए खनिजों से सरकार की आय का कुल योग इस प्रस्तावित सरकारी आदेश से बढ़ेगा ही घटेगा नहीं।
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इसी प्रकार, सरकारी प्लॉटों के मामले पर विचार कीजिए। आज प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री अनेक सरकारी प्लॉटों को बाजार मूल्य के आंशिक कीमत पर दे देते हैं। प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल ( मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री को बदलने की प्रक्रिया) एक ऐसा साधन उपलब्ध कराता है जिससे नागरिक इसे रोक सकते हैं और एम आर सी एम अर्थात आम लोगों तथा सेना को जमीन का किराया देना नागरिकों को वह कारण उपलब्ध कराता है कि वे इसे रोकें। हर बार मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री जमीन को किराए के लिए बाजार के मूल्ये से कम पर दे देते है। तब नागरिक घाटे का अनुमान करेंगे और जब यह घाटा उनके संयम की सीमा पार कर जाएगा तो वे उसे (मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री) बदलने के लिए 3 रूपए खर्च करेंगे। और इससे भी बेहतर बात यह है कि बदले जाने और उसके बाद के दण्ड का डर मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री पर अंकुश लगाएगा। इससे कुल किराया बढ़ेगा और इस तरह किराए का तिहाई हिस्सा जो सरकार(सेना) को जाएगा, वह भी बढ़ेगा।
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इसलिए 'नागरिक और सेना के लिए रोयल्टी' का प्रस्ताव खनिजों और भूमि किराया से सरकार की कुल आय बढ़ाएगा। इससे आम लोगों की आय भी बढ़ेगी। तब किसको हानि होगी ? अपराधी और ठेकेदार को कम ही हानि होगी। असली घाटा, भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों, मत्रियों, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री, उच्चवर्गीय लोगों को होगा जो कि बड़ी खदानों के मालिको से गठजोड़ बनाये हुए है। और वे लोग जो एम आर सी एम-रिकाल प्रस्ताावों का विरोध करते हैं वे केवल अपराधियों, खनिज ठेकेदारों, भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों, जजों के सगे-संबंधी वकीलों और खदानों के मालिको को ही लाभ पहुंचाएंगे किसी और को नहीं। कई बुद्धिजीवी इनसे वेतन लेते हैं और इसलिए उनके हितों का ध्यान रखते हुए एम.आर.सी.एम-रिकाल क़ानून का जोरदार विरोध करते हैं।
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(5.15) पश्चिम में कोई ऐसा कानून नहीं है तो हमें इसकी जरूरत क्यों है ?
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मैं उन प्रक्रियाओं के लिए अभियान चलाता हूँ जिससे हम आम लोग प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और जजों को हटा सकते हैं। सभी प्रमुख बुद्धिजीवियों ने इस मांग का विरोध किया है और यह दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि यह असंवैधानिक है। इसमें असफल होने के बाद वे कहते हैं – पश्चि़म के देशों में आम लोगों को रॉयल्टी देने की यह प्रक्रिया नहीं है और इसलिए हम लोगों के यहां यह प्रक्रिया क्यों होनी चाहिए ?
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देखिए, अमेरिका में 40 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक आयकर है। और इसका उल्लंघन बहुत कम होता है। और कुछेक लोगों को ही इससे छूट प्राप्त है। अमेरिका में जमीन पर भी लगभग एक 1 प्रतिशत संपत्ति-कर है। और अमेरिका में मृत्यु पर 45 प्रतिशत विरासत कर है। इन करों का उपयोग कल्याणकारी योजनाओं के लिए किया जाता है। और इसका लाभ आम लोगों तक पहुँच ही जाता है। क्योंकि वहाँ पर जूरी प्रणाली होने से भ्रष्टाचार कम है। भारतीय बुद्धिजीवियों ने सम्पत्ति कर ,उच्च आयकर का विरोध किया है और वे उत्तराधिकार-कर के भी बिलकुल खिलाफ हैं। और इस तरह कल्याण कार्यों के लिए आबंटित धन न के बराबर है। इस पर भी भारतीय बुद्धिजीवियों ने जूरी प्रणाली को भी वर्ष 1956 में खत्म कर दिया, इसलिए भ्रष्टाचार बेलगाम हो गया और फंड हड़पे जाने लगे।
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मैने 30 प्रतिशत आयकर, 2 प्रतिशत सम्पत्ति-कर और 35 प्रतिशत विरासत-कर का प्रस्ताव किया है, ताकि सेना से जुड़ी औद्योगिक इकाइयों/कॉम्प्लेक्सों में इंजिनियरिंग शिक्षा और हथियार के निर्माण के लिए आवश्यक सामान्य शिक्षा में सुधार आ सके। मैने भ्रष्टाचार कम करने के लिए जूरी प्रणाली का भी प्रस्ताव किया है, ताकि मिलने वाली सेवाओं में सुधार आए और गरीबी कम हो। लेकिन गरीबी कम करने और गरीबी/भुखमरी से होनेवाली मौतो को कम करने के इस तरीके में वर्षों लगेंगे जबकि हम आम लोगों को खनिज रॉयल्टी सीधे देने से गरीबी और भुखमरी को मात्र चार महीने के भीतर कम किया जाना संभव है।
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(5.16) नागरिक और सेना के लिए रोयल्टी (एम.आर.सी.एम) क़ानून-ड्राफ्ट और मानवाधिकार
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भारत में प्रति वर्ष लगभग एक करोड़ लोगों की मौत हो जाती है। देखिए, मरना तो एक स्वभाविक प्रक्रिया है। लेकिन उन मरने वालों के पास प्रति महीने 100 रूपए का अधिक भोजन और दवाएं होती तो पिछले साल मरने वाले एक करोड़ लोगों में से कम से कम 5-20 लाख लोग 2-10 वर्ष ज्यादा जी सकते थे। भारत में पिछले वर्ष जन्में एक हजार बच्चों में से लगभग 55 की मौत हो गई जबकि यह संख्या चीन में 23 और क्यू्बा में 5 थी। प्रति हजार में से 55 के हिसाब से वर्ष 2007 में यह संख्या 11 लाख हो गई। इसलिए भारत में वर्ष 2007 में इन 11 लाख शिशुओं, जिनकी मौत हुई, उनमें से कम से कम 5 लाख बच्चों को तो बचाया जा सकता था, यदि उनके परिवारों के पास भोजन और दवा पर खर्च करने के लिए कुछ 100 रूपए प्रतिवर्ष अधिक होता। दूसरे शब्दों में, भारत में आज की स्थिति के अनुसार, गरीबी के कारण सबसे ज्यादा मौत होती है और यह मानवाधिकार का सबसे गंभीर उल्लंघन है। एक बार एक अर्थशास्त्री ने कहा था कि बम धमाकों मे होने वाली एक मौत ज्यादा ध्यान खींचती है लेकिन भुखमरी से होने वाली 10 हजार मौतें भी इतना ध्यान नहीं खींच पाती। ऐसा मुख्यत: इसलिए है क्योंकि समाचारपत्र 0.01 प्रतिशत भारतीयों द्वारा लिखा जाता है और केवल सबसे ऊपर की 15 प्रतिशत जनता उन्हें पढ़ती है। एक बम धमाका उन्हें दुख पहूँचा देता है लेकिन भुखमरी उनसे कोसों दूर है। यही कारण है कि बुद्धिजीवियों, गैर सरकारी संगठनों और मीडिया-मालिक और मीडिया-पाठक व्यक्तिगत मुद्दों पर ध्यान देने पर जोर देते हैं, और भुखमरी से होने वाली मौतों पर ध्यान न देने पर जोर देते हैं।
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'नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' (एम आर सी एम) क़ानून-ड्राफ्ट मानवाधिकारों की मांग की दिशा में एक मील का पत्थर है। क्योंंकि यह भोजन और दवाएं खरीदने के लिए पैसे की कमी के कारण होने वाली मौतों की संख्या कम करेगी। दुख की बात है कि सभी बुद्धिजीवियों ने इस मांग का विरोध किया है और मेरे विचार से, कार्यकर्ताओं को इन बुद्धिजीवियों से तो सदैव के लिए किनारे कर ही लेना चाहिए।
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(5.17) अभ्यास
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1. भारत में कच्चे तेल का उत्पादन वर्ष 2008 में कितना था ? यह मानते हुए कि वर्ष 2006 में हुए उत्पादन की लागत से वर्ष 2008 में हुए उत्पादन की लागत में कोई बदलाव नहीं आया, और यदि खरीददारों से 135 डॉलर प्रति बैरल वसूला गया तो आपके आकलन के अनुसार भारतीय नागरिकों को कितना पैसा मिलेगा ? और यदि प्रति बैरल केवल 50 डॉलर ही खरीददारों से वसूला गया तो आपके आकलन के अनुसार भारतीय नागरिकों को कितना पैसा मिलेगा ?

2. मुंबई एयरपोर्ट का भू-क्षेत्रफल कितना है ? प्रति वर्ग-मीटर अनुमानित कीमत कितनी है ? भारत के नागरिकों को कितना धन प्राप्त होगा यदि किराया बाज़ार मूल्य का तीन प्रतिशत प्रतिवर्ष हो ?
3. आपके जिले में सबसे बड़े विश्व विद्यालय का भू-क्षेत्रफल कितना है ? उस भूमि का अनुमानित दाम क्या होगा और उससे भारतीय नागरिकों को प्राप्त प्रति व्यक्ति किराया कितना होगा यदि किराया बाज़ार मूल्य का तीन प्रतिशत प्रति वर्ष हो ?
4. क्या भारतीय बजट में जमीन के किराए को सब्सीडी के रूप में या इसके समतुल्य देखा जाता है ?
5. क्यों भारत के बुद्धिजीवी इस बात पर अड़े है कि हम आम लोगों को खदान की रॉयल्टी सीधे नहीं मिलनी चाहिए बल्कि किसी योजना के माध्यम से ही मिलनी चाहिए ?
6. क्यों भारत के बुद्धिजीवी इस बात पर जोर देते हैं कि आम लोगों को जमीन का किराया का लाभ सीधे नहीं मिलना चाहिए बल्कि किसी योजना के माध्यम से मिलना चाहिए ?
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Oct 02 2017 18:45:00 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

डेरा सच्चा सौदा प्रकरण ; समस्या एवं समाधान
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अध्याय
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1) समस्या यह है कि आबादी के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राम रहीम जी के साथ न्याय नहीं किया गया है ।
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2) वजहें, जो इस बात की पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट है
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3) तर्क ; जिनसे यह स्थापित किया जाता है कि भारत के जज बेहद ईमानदार एवं निष्पक्ष है
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4) डेरा और राजनीति
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5) राम रहीम जी के मुकदमे से सम्बंधित कुछ तथ्य जो अदालत के फैसले को संदिग्ध बनाते है
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6) समाधान
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7) प्रस्तावित जूरी सिस्टम क़ानून का सारांश
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8) भारत में ज्यूरी सिस्टम लाने के लिए आप क्या कर सकते है ?
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समस्या यह है कि करोड़ो डेरा समर्थको एवं लाखों स्वतंत्र कार्यकर्ताओ का मानना है कि श्री राम रहीम जी के मामले में अदालत द्वारा दिया गया फैसला संदिग्ध है।
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हो सकता है श्री राम रहीम जी दोषी हो, और ये भी हो सकता है कि वे निर्दोष हो। किन्तु इतना तो तय है कि देश की आबादी का एक वर्ग इस फैसले से संतुष्ट नहीं है। इसी तरह का असंतोष संत श्री आसाराम जी बापू के मामले में भी देखने को मिला था। आसाराम जी के मामले में भी देश की आबादी का एक वर्ग यह मानता था एवं आज भी मानता है उनके साथ न्याय नहीं किया गया। संत रामपाल जी, जयेंद्र सरस्वती जी एवं नित्यानंद जी से जुड़े हुए मामलो में भी देश की एक बड़ी आबादी की यही धारणा थी।
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इस तरह यहाँ दो वर्ग बन जाते है। पहला वर्ग वह है जो यह मानता है कि श्री राम रहीम जी के साथ कोई अन्याय नहीं हुआ है और वे दोषी है, और उनके दोषी होने का सबसे बड़ा सबूत यह है कि अदालत ने उन्हें दोषी ठहरा दिया है !! अदालत ने उन्हें किस आधार पर दोषी ठहराया है और क्या सबूत बरामद किये गए है, इससे उन्हें कोई लेना देना नहीं है !! जबकि दुसरे वर्ग का मानना है कि, हो सकता है वे दोषी हो या हो सकता है कि दोषी नहीं भी हो। इस वर्ग को अदालत के फैसले पर विश्वास नहीं है, तथा इस अविश्वास की "पर्याप्त एवं वाजिब" वजहें मौजूद है।
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नोट - इस लेख में उन नागरिको के लिए कुछ नहीं है जो यह मानते है कि 2000 के नोटों में चिप लगी हुयी है, और इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि टीवी-अख़बार पर ऐसा बताया गया था, और वे यह भी मानते है कि भारत के जज चाहे पैदाइशी ईमानदार न हो किन्तु नियुक्ति मिलते ही एक प्रकार की जादुई प्रक्रिया द्वारा वे ईमानदार हो जाते है !!! यह लेख सिर्फ उन लोगो के काम का है जो जाया तौर पर न्यायमूर्ति पूजक नहीं है और साथ ही यह भी मानते है कि 2000 के नोटों में ऐसी कोई चिप नहीं है।
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अदालतों पर अविश्वास का कारण एवं इन्हें बहाल करने के उपाय :
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एक पोचा तर्क यह है कि इन सभी संतो की भक्ति के कारण इनके भक्त अदालत पर अंगुली उठा रहे है। संतो और उनके भक्तो की बात को जाने दीजिये। सलमान खान का उदाहरण लीजिये। जब उन्हें छोड़ दिया गया था तब देश की आबादी का एक बड़ा वर्ग इस तरह की आवाजे उठा रहा था कि हमारी अदालते भ्रष्ट है। तो यह खुली हुयी बात है कि भारत का एक वर्ग यह मानता है कि हमारी अदालतें भ्रष्ट है।
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क्यों कार्यकर्ताओ के एक वर्ग का मानना है कि हमारी अदालतें भ्रष्ट है ?
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क्योंकि ऐसी कोई वजह ही नहीं है जो इस बात का इत्मीनान दिलाए कि भारत की अदालतें भ्रष्ट नहीं है। लेकिन ऐसी ढेर सारी वजहें है जो इस बात की पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट न हो ऐसा किसी भी तौर से संभव नहीं है। कुछ वजहें निचे दी गयी है :

१) भारत में जज बनने के लिए साक्षात्कार से गुजरना पड़ता है। साक्षात्कार में अंक देना जजों के हाथ में होता है। तो भाई भतीजावाद एवं घूस ( सेटिंग ) के अवसर यहीं से बन जाते है। इस तरह नियुक्ति से ही भ्रष्टाचार शुरू हो जाता है। जज एवं नेता साक्षात्कार की प्रक्रिया को हटाना नहीं चाहते। यदि साक्षात्कार को हटा दिया जाए तो जजों के भ्रष्ट होने की एक वजह समाप्त हो जायेगी। लेकिन फिलहाल साक्षात्कार है , अत: भ्रष्टाचार है। उल्लेखनीय है कि चीन में जजों की नियुक्ति में साक्षात्कार नहीं है। सिर्फ लिखित परीक्षा के माध्यम से ही जजों की नियुक्ति की जाती है। इस वजह से चीन के जज भारतीय जजों की तुलना में कम भ्रष्ट है।

समाधान - जजों की नियुक्ति प्रक्रिया से साक्षात्कार को हटाया जाना चाहिए।
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२) जजों की नियुक्ति, स्थानांतरण एवं पदोन्नतियां वरिष्ठ जजों के हाथ में होती है। शेषन जज हाई कोर्ट के एवं हाई कोर्ट के जज सुप्रीम कोर्ट के चंगुल में है। यदि हाई कोर्ट का जज भ्रष्ट है तो वह शेषन कोर्ट के सभी जजों पर मनचाहे फैसले करवाने के लिए चाबुक चला सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट के जज भ्र्ष्ट है तो वे पूरी न्यायपालिका को भ्रष्ट बना देते है। और सुप्रीम कोर्ट के जज पूरी तरह से निरंकुश है। यदि सुप्रीम कोर्ट का जज कुर्सी पर रहते हुए घूस खा रहा है तो उसकी शिकायत कहाँ करेंगे आप ? दरअसल शेषन कोर्ट, हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी एक टोली बना ली है। इनके फैसले में किसी का कोई दखल नहीं। जनता को तो भूल ही जाइए, सरकार तक का दखल नहीं !! जब किसी आदमी को यह पता हो कि उसे पकड़ने वाला कोई नहीं है, न ही कोई उससे सवाल पूछने वाला है, तो उसके भ्रष्ट होने की सम्भावना बढ़ जायेगी। यह निरंकुशता भ्रष्टाचार को जन्म देती है।
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उल्लेखनीय है कि जापान में जजों को हर आम चुनाव में नागरिको के अनुमोदन से गुजरना पड़ता है। जब भी चुनाव होते है तो बेलेट पेपर के साथ एक अतिरिक्त प्रश्न रखा जाता है कि क्या आप इस जज को नौकरी से निकालना चाहते है या नहीं। इस तरह से नागरिको के पास विकल्प होता है कि वे भ्रष्ट एवं निकम्मे जज को खारिज कर सके। जज को भय रहता है कि भ्रष्टाचार करने पर जनता मुझे खारिज कर सकती है। इस वजह से उनके भ्रष्टाचार में कमी आती है। किन्तु भारत के जज और नेता यह कतई नहीं चाहते कि नागरिको को जजों के काम काज पर टिप्पणी करने का अवसर दिया जाए।
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अमेरिका में इससे भी बेहतर प्रणाली है। वहां नागरिक जजों को चुनते है और किसी भी समय उन्हें नौकरी से भी निकाल सकते है। वहां के जज जानते है कि यदि वे भ्रष्टाचार करेंगे तो यह छिपेगा नहीं और जनता उन्हें नौकरी से निकाल देगी। इस तरह जनता द्वारा नौकरी से निकाले जाने का भय उन्हें कम भ्रष्ट बना देता है, और वे तमीज से पेश आते है। नागरिको द्वारा बहुमत का प्रयोग करके इस तरह नौकरी से निकालने की प्रक्रिया को राईट टू रिकॉल कहते है।

समाधान - भारत में जजों को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार आम नागरिको को दिया जाना चाहिए। इससे नागरिको का न्यायपालिका में दखल बढेगा और इस अंकुश से भ्रष्टाचार में कमी आएगी।
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३) क्या आप जानते है कि , उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिए अभ्यर्थी को लिखित परीक्षा से भी नहीं गुजरना होता है !! वरिष्ठ जज कोर्ट में प्रेक्टिस करने वाले किसी भी वकील को सीधे हाई कोर्ट में न्यायधीश के पद पर नियुक्ति दे सकते है !! एक तरह से यह नियम घूसखोरी को कानूनी करने के लिए बनाया गया है, जिसका परोक्ष अर्थ यह है कि -- यदि आपके भाई भतीजे वरिष्ठ जज है , यदि आप एक वकील है , और यदि आपके पास घूस देने के लिए मोटी राशि है तो आप सीधे ही हाई कोर्ट के जज बन सकते है !! अनुमान किया जा सकता है कि इस ढंग से जो व्यक्ति जज बनेगा वह कितना भ्रष्ट होगा, और इस तरीके से जो जज किसी को जज बनाएंगे वे कितने ईमानदार होंगे !!

समाधान - "पसंदगी के आधार पर" नियुक्ति देने की प्रक्रिया को ख़त्म किया जाना चाहिए। न्यायधीश जनता द्वारा चुने जाएँ और यदि वे भ्रष्ट आचरण करते है तो उन्हें नौकरी से निकालने का अधिकार जिले / राज्य / देश के मतदाताओं के पास हो।
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४) जब तक संसद दखल कर के इसे पलट न दे तब तक सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट की रुलिंग्स का प्रभाव कानूनों की तरह ही होता है। और, यदि संसद कोई क़ानून बनाती है तो सुप्रीम कोर्ट उसे अवैध भी घोषित कर सकती है। इस तरह कानूनों को वैध / अवैध घोषित करने और क़ानून / संविधान की व्याख्या का अधिकार जजों के पास है। दूसरे शब्दों में , भारत में अंततोगत्वा जज ही यह तय करते है कि कौनसा क़ानून लागू होगा और कौनसा नहीं होगा। क्या संवैधानिक है और क्या असंवैधानिक है यह तय करने का अधिकार भी जजों के पास है !! और ख़ास बात यह है कि जजों पर नागरिको का कोई नियंत्रण नहीं है।

समाधान - कानूनों एवं संविधान की व्याख्या का अधिकार आम नागरिको के पास होना चाहिए। इससे जनता यह निर्धारित कर सकेगी कि कौनसा क़ानून देश हित में है व कौनसा देश विरोधी।
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५) धीमी अदालती प्रकिया भ्रष्टाचार को जन्म देती है। जजों के पास किसी मामले को असीमित समय तक लटका कर रखने की शक्ति है। वे घूस खाकर किसी मुकदमें के फैसले को इच्छित समय तक टालते रह सकते है, तथा घूस मिलने पर किसी मामले में अति न्यायिक सक्रियता दिखा सकते है। भारत की अदालतों में 3 करोड़ मुकदमे लटके हुए है। इनमे कई नेता, अभिनेता, अधिकारी, उद्योगपति आदि शामिल है। वे इनके मामलों की सुनवाई धीमी गति से करते है ताकि लम्बे समय तक आरोपी जजों के पंजे में फंसा रहे। चीन के 2 लाख जजों के मुकाबले भारत में सिर्फ 18 हजार जज होने से अदालती प्रक्रिया धीमी है और इस वजह से जजों में भ्रष्टाचार है।

समाधान - भारत को जजों की संख्या 20 हजार से बढ़ाकर 2 लाख करने की जरुरत है।
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६) जजों को कोई भ्रष्ट कह कर न पुकारे, इसीलिए जजों ने अवमानना का क़ानून बनाया है। यदि आप जज को भ्रष्ट कहेंगे तो जज आपको अदालत की अवमानना के आरोप में जेल पहुंचा देंगे। इस क़ानून के कारण जजों के भ्रष्टाचार की चर्चा नहीं हो पाती और इससे जज निशंक होकर भ्रष्टाचार कर पाते है। एक तरह से जजों ने इस तरह का क़ानून बनाकर पूरे देश को बाध्य कर दिया है कि वे जजों को "ईमानदार एवं फ़रिश्ता" माने !!

समाधान - अवमानना के क़ानून को रद्द किया जाना चाहिए।
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७) जजों का विवेकाधिकार भी भष्टाचार को बढ़ावा देता है। कानूनों को कितना भी विस्तृत रूप से लिखा जाये, तब भी कई बिन्दुओ को तय करने के लिए दंडाधिकारी को अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करना होता है। यह "विवेकाधिकार" भारत के जजों को असीमित शक्ति प्रदान कर देता है। वे घूस खाकर अपने विवेकाधिकार का इस तरह से इस्तेमाल करते है, जिससे घूस देने वाले को लाभ पहुँचाया जा सके।

समाधान - विवेकाधिकार की शक्ति जजों की जगह नागरिको के ज्यूरी मंडल को दी जानी चाहिए।
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तो इस तरह हम समझ सकते है कि हमारी न्यायपालिका में ऐसी पर्याप्त व्यवस्थाएं है जो यह सिद्ध करती है कि ऐसी कोई वजह नहीं है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत के जज देश के अन्य अधिकारियो एवं नेताओ की तुलना में ज्यादा ईमानदार है। बल्कि स्थिति इसके उलट है। दरअसल जजों की नियुक्ति-पदोन्नति की प्रणाली, विवेकाधिकार का प्रयोग एवं अवमानना का क़ानून उन्हें ज्यादा भ्रष्ट होने के सहज अवसर प्रदान करता है। और यही वजह है कि हमारी न्यायपालिका में भारी भ्रष्टाचार है।
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सिर्फ दो कारण है जिससे यह स्थापित किया जा सकता है कि भारत के जज बेहद ईमानदार एवं निष्पक्ष है।

१) अवमानना के क़ानून का भय - यदि आप जजों पर अंगुली उठाएंगे तो वे आपको अवमानना का दोषी ठहरा कर जेल में डाल देंगे !! इस वजह से भारत के सभी "समझदार" एवं "बड़े" आदमी निरंतर यह दोहराते रहते है कि हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है !!!

२) दूसरी बड़ी वजह पेड मिडिया है -- धनिक वर्ग एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भारत में जज सिस्टम को जारी रखना चाहते है, ताकि वे जजों को घूस देकर मनचाहे फैसले निकलवा सके। इस तरह धनिक वर्ग एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक अपने पक्ष में फैसले लेने के लिए जजों के भ्रष्टाचार का लाभ उठाते है। अत: वे जजों की छवि बनाये रखने के लिए मिडिया को भुगतान करते है। मिडिया निरंतर इस तरह की धारणा खड़ी करता है जिससे नागरिको में यह भ्रम फैले कि भारत के "माननीय" जज बेहद ईमानदार है।
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डेरा और राजनीति
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यह एक बहुत ही गलत धारणा है कि धर्म में राजनीति का एवं राजनीति में धर्म का दखल नहीं होना चाहिए। धर्म राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता। वजह ? कोई भी धार्मिक संस्था या धार्मिक गुरु लोगो से जुड़ा होता है तथा उसकी गतिविधियों में धार्मिक जमाव होता है। जहाँ भी लोगो का जमाव होगा वहां दखल करना राजनीति की मजबूरी है। राजनेता ऐसे सभी व्यक्तियों का पीछा करते है जिसके पास लोगो के किसी समूह को प्रभावित करने की क्षमता हो। धार्मिक संस्थाओ के पास यह क्षमता काफी बढ़ी हुयी होती है। अत: राजनेता चाहते है कि अमुक गुरु या संस्था अपने श्रद्धालुओं को उनके पक्ष में वोट करने के लिए प्रेरित करे। कोई गुरु या संस्था राजनीति से अलग रहना चाहे तो भी राजनेता उनका पीछा करते है। धार्मिक गुरुओ के पास इनसे बचने का कोई विकल्प नहीं है। और कभी कभी इसका उल्टा भी देखने में आता है। सभी धार्मिक संस्थाओ को अपने विस्तार के लिए सरकार से मधुर सम्बन्ध बनाये रखना जरुरी होते है। इसीलिए वे बढ़त बनाये रखने और स्वयं को सुरक्षित करने के लिए सत्ता के साथ गठजोड़ बनाते है। कुल मिलाकर धार्मिक संस्थाओ / गुरुओ के पास लोगो का जमाव है और ये लोग वोट करते है। राजनीति में प्रत्येक व्यक्ति एक वोट है। तो धर्म में राजनीति स्थायी तत्व है। इससे बचा नहीं जा सकता।
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मौजूदा स्थिति में राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ , कांग्रेस , अकाली और आम आदमी पार्टी में से कोई भी राजनैतिक दल डेरा के समर्थन में नहीं था / है। अकाली स्थानीय राजनीति और धार्मिक वजहों से तथा संघ राष्ट्रीय राजनीति की वजह से डेरे को गिराना चाहते थे। अपनी राजनैतिक वजहों के चलते कोंग्रेस एवं आम आदमी पार्टी की रुचि भी डेरे को बचाने में नहीं थी। संघ हिन्दू धर्म के अनुयायियों को अपने नीचे "एक" करने के मिशन पर है। संघ के अनुसार विभिन्न सम्प्रदाय एवं गुरु वगैरह हिन्दुओ को विभाजित कर रहे है, और इसकी वजह से हिन्दुओ को "एक" करने का उनका मिशन पिछड़ जाता है !! अत: संघ पिछले 90 वर्ष से विभिन्न सम्प्रदायों एवं गुरुओ को अपने प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है। गोल्डन टेम्पल पर अपना प्रभाव रखने वाले अकाली भी डेरे को अपने प्रतिस्पर्धी के रूप में देखते है। कोंग्रेस को डेरे ने एक लम्बे समय तक राजनैतिक समर्थन दिया था, किन्तु हाल ही में डेरे के बीजेपी की और चले जाने से कोंग्रेस को भी डेरे के गिर जाने से कोई दिक्कत नहीं है। इसके अलावा मिशनरीज द्वारा समर्थित तर्क शील सोसाइटी जैसे संगठन भी डेरे के खिलाफ है। बहरहाल, विभिन्न दलों और संगठनो के अपने हित और उनकी राजनीति है और इसके कई आयाम हो सकते है।
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इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि मिशनरीज एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां डेरे को गिराना चाहती थी। अत: इस बात से कोई फर्क नहीं आता कि संघ / कोंग्रेस / अकाली आदि क्या चाहते थे। भारत में एफडीआई बढ़ने से मिशनरीज की ताकत इतनी बढ़ चुकी है कि बीजेपी / कोंग्रेस / अकाली / आम आदमी पार्टी आदि कोई भी दल मिशनरीज के खिलाफ नहीं जा सकते। अत: इस प्रकरण में संघ / कोंग्रेस / अकाली एवं आम आदमी पार्टी की भूमिका को ज्यादा गंभीरता से लेने से हम मूल विषय से भटक जायेंगे। मिशनरीज एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हिन्दू धर्म को तोड़ने के लिए किस तरह से प्रयास रत है इस विषय पर विवरण इसी विषय पर लिखे एक भिन्न लेख में दिया गया है।
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यहाँ हमें इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि परदे के पीछे जो भी सियासत रही हो , लेकिन निष्पादन जज द्वारा ही किया जाता है। आशय यह कि किसी व्यक्ति को जेल में भेजने की शक्ति सिर्फ जज के पास ही होती है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी इस शक्ति से वंचित है। तो जब किसी व्यक्ति को फंसाना होता है तो "वे" हमेशा जज का ही इस्तेमाल करते है। जब तक जज नहीं चाहेगा तब तक किसी भी व्यक्ति को किसी तरह से जेल में नहीं पहुचायां सकता। और यदि जज किसी व्यक्ति को जेल में भेजना चाहता है तो उसे भी कोई बचा नहीं सकेगा। ऊपर उन कारणों को बताया गया है जो इस बात की पुष्टि करते है कि भारत की अदालतें उतनी ही भ्रष्ट है जितने कि अन्य विभाग।
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राम रहीम जी के मुकदमे से सम्बंधित कुछ तथ्य जो अदालत के फैसले को संदिग्ध बनाते है।
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(a) सन 2002 में वाजपेयी को दो गुमनाम खत प्राप्त हुए ! खतो के बारे में यह दावा किया गया था कि ये पत्र गुरु राम रहीम की साध्वियों द्वारा लिखे गए थे !! और इन खतो में यह दावा किया गया था कि गुरु श्री राम रहीम जी ने 1999 में इन साध्वियों का बलात्कार किया था !! ( मतलब बलात्कार के 2 से 3 वर्ष बाद गुमनाम खत भेजे गए ) !!!
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(b) घटना के 3 साल बाद यानी 2002 में इन गुमनाम खतो के आधार पर वाजपेयी ने सी बी आई जांच के आदेश जारी किये !!!
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(c) इन पत्रों में यह नहीं लिखा गया था कि ये पत्र किसने भेजे है। अत: सी बी आई के आईपीएस अधिकारीयों ने कुछ 20 साध्वियों से बेहद गहन ,संदिग्धार्थक, अनेकार्थक एवं घुमावदार प्रश्न किये। इन बयानों को crpc 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने रिकोर्ड किया गया। और पूछे गए इन अनेकार्थक प्रश्नों के जवाबो को आगे की जांच के लिए "सबूत" के तौर पर मान लिया गया !!!
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(d) 2005 तक सीबीआई ने पीडिताओ से कई बार पूछताछ की। किन्तु हर बार पिड़ीताओ ने बयान दिया कि हमारे साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ !!
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(e) सीबीआई का कहना है कि उन्होंने कथित पीडिताओ को 2002 में ही खोज निकाला था !! किन्तु सीबीआई ने उनके बयान 2006 में दर्ज किये, और 2006 में ही चालान पेश किया।
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(f) CBI ने दोनों पीडिताओ के बयान 2006 में फिर दर्ज किये, और इनमे यह कहा गया कि बलात्कार किया गया था !!
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(g) राम रहीम जी के वकील को दोनों पीडिताओ के बयानों की कॉपी नहीं दी गयी !!
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(h) राम रहीम जी के वकील को पीडिताओ से क्रोस क्वेशचन करने का मौका नहीं दिया गया !!
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(i) पीडिताओ ने अपने बयान बदलने की अनुमति मांगी किन्तु उन्हें बयान बदलने की अनुमति नहीं दी गयी !!
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तकनिकी रूप से मुकदमे का सार यह है कि -- 3 साल बाद प्राप्त हुए गुमनाम पत्रों के आधार पर सीबीआई जांच के आदेश किये गए !! 6 साल बाद सीबीआई ने ख़त लिखने वालो को खोज निकाला और उनके बयान दर्ज किये !! उन्होंने 4 वर्ष तक यह कहा कि "कोई बलात्कार नही हुआ था" !! किन्तु सीबीआई ने इसे नहीं माना !! 2006 में सीबीआई ने दो साध्वियों के बयान दर्ज किये जिनमे कहा गया कि, "बलात्कार हुआ था" !! वकील को इन पीडिताओ से क्रोस क्वेश्चन करने की अनुमति नहीं दी गयी !! पीडीताओ ने अपने बयान बदलने की अनुमति मांगी, किन्तु उन्हें अनुमति नहीं दी गयी !! 11 साल पहले लिए गए इन "बयानों के आधार पर" जज ने घटना के 18 साल बाद राम रहीम जी को दोषी ठहराया !!!
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ध्यान देने वाली बात यह है कि, इस मुकदमे के सम्बन्ध में कोई भी "भौतिक सबूत" बरामद नहीं किये गए। सिर्फ बयानों को आधार पर फैसला दिया गया। जज को यह फैसला करना था कि कौन सच बोल रहा था और कौन झूठ। इस स्थिति में अभियुक्त एवं पीडिताओ का नारको टेस्ट लेकर पता किया जा सकता है कि किसका बयान सच था। किन्तु नारको टेस्ट नहीं लिया गया और जज ने लड़कियों के बयानों को सच मानने का फैसला किया !!!
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सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कि , "लड़की का बयान हर हाल में सच माना जाएगा और लड़की को अपना बयान बदलने की इजाजत नहीं होगी" - मुख्य वजह बनी जिसके कारण सरकार के नियन्त्रण में काम करने वाले सीबीआई के आई पी एस अधिकारी एवं जज श्री राम रहीम जी को जेल में पहुंचा सके।
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सीबीआई के अधिकारियों ने ये बयान मजिस्ट्रेट के सामने कथित crpc की धारा 164 के तहत दर्ज किये थे !! अब यदि बयान देने वाली लड़की अपने बयान को बदलती तो उसे झूठा बयान दर्ज करवाने के मुकदमे का सामना करना पड़ता। इस तरह उन्हें कोर्ट में श्री गुरु राम रहीम के खिलाफ फिर वही बयान देने के लिए बाध्य किया गया !! और फिर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का इस्तेमाल किया गया कि -- लड़की के बयान को अंतिम सत्य एवं अकाट्य सबूत माना जाएगा।
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और फिर हमारे पास ऐसे "शिक्षित" लोगो का जमघट है जो इस प्रक्रिया को "क़ानून का शासन" कह के संबोधित कर रहे है !!!
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इस सम्बन्ध में डेरा प्रमुख की पैरवी करने वाले वकील का साक्षात्कार इस लिंक पर देखें - <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1382470518537847>;
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राम रहीम जी संत नहीं है , वे विलासी है, ऐश्वर्य प्रिय है, उनके पास गुफाएं है, उनके डेरे में स्वीमिंग पूल है, उन्होंने आलिशान महल बना रखा है, उनके पास दो बाज और 5 तीतर है, उनके पास ढेर सारी जमीन है, वे फिल्मे बनाते है, नाचते-गाते है, क्रिकेट खेलते है, कारोबार करते है , रंग बिरंगे कपड़े पहनते है आदि आदि जैसे बकवास आरोपों को पेड मीडिया द्वारा बार बार इसीलिए दोहराया जा रहा है ताकि बलात्कार के मूल मुकदमे पर चर्चा को टाला जा सके।
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यदि इन फर्जी आरोपों पर बहस नहीं चलाई गयी तो जनता का ध्यान बलात्कार के मुकदमे से जुड़े तथ्यों पर चला जाएगा। और तब जनता को यह मालूम होगा कि "सिर्फ बयान" को आधार बनाकर ही राम रहीम जी को दोषी ठहरा दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट की एक रूलिंग ने जज को यह तय करने का अधिकार दे दिया था कि वह यदि चाहे तो पीड़िता के बयान को सच मान सकता है !! और जज को इस बात में "सुविधा" थी कि लड़की के बयान को सच मान लिया जाए !! इस तथ्य को चर्चा से बाहर करने के लिए मीडिया ने ऊपर दिए गए फर्जी आरोपों की झड़ी बनाकर यह धारणा खड़ी करने की कोशिश की है कि श्री राम रहीम जी एक दुर्जन व्यक्ति है।
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समाधान
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हमारे द्वारा सुझाये गए समाधान निम्न है

(a) सभी प्रकार के मुकदमो की सुनवाई नागरिको की ज्यूरी द्वारा हो।
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(b) राईट टू रिकॉल सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, लोअर कोर्ट जज, पुलिस प्रमुख आदि क़ानूनो को गेजेट में प्रकाशित किया जाए।
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(c) SGPC की तरह हिन्दू धर्म एवं सम्प्रदायों के प्रबन्धन को मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय देवालय ट्रस्ट अधिनियम पारित हो। ताकि श्रद्धालु मंदिर / मठ/ आश्रम प्रमुखों को चुन सके और अनियमितता पाने पर पद से हटा सके। ( सबसे महत्त्वपूर्ण )
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(d) मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाये और मौजूदा ट्रस्टियों की रजामंदी से श्रधालुओ को ऐसी प्रक्रिया दी जाए जिस से वे अपने प्रमुख / ट्रस्टियो को बदल सके।
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जूरी सिस्टम क्या है ?

इस व्यवस्था में किसी भी मुक़दमे की सुनवाई के लिए मतदाता सूची में से रेंडमली 12 से 15 नागरिको को समन भेजे जाते है, इन नागरिको के समूह को ज्यूरी कहते है। मुकदमे की सुनवाई इन आम नागरिको द्वारा की जाती है और ये नागरिक ही मुक़दमे में फैसला देते है । हर मुक़दमे के लिए अलग अलग नागरिको की ज्यूरी होती है । ज्यूरी बहुमत से अपना फैसला देती है। हाईकोर्ट ज्यूरी में 50 - 60 जबकि केस विशेष में 1500 नागरिको तक की ज्यूरी सुनवाई कर सकती है, जिनका चयन राज्य की मतदाता सूची से किया जाता है । मुलजिम को जानकारी नही होती कि लाखो नागरिको में से कौन उसके मुकदमे का फैसला करने वाला है । इस प्रकार भ्रष्टाचार शून्य हो जाता है तथा लाखो न्यायधीश होने से फैसलों का निपटारा त्वरित गति से होता है।
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हमारा प्रस्ताव है कि सभी गवाहों और "तथ्यों" को 1500 नागरिको की ज्यूरी के समक्ष पेश किया जाये। इस ज्यूरी मंडल का रेंडम चयन हरियाणा की वोटर लिस्ट में से किया जाएगा एवं इनका आयुवर्ग 30-45 वर्ष के बीच होगा। यह ज्यूरी सबूतों एवं तथ्यों का अन्वेषण करके यह तय करे कि गुरमीत जी को रिहा किया जाना चाहिए या उन्हें कारावास में भेज दिया जाना चाहिए।
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संत श्री आसाराम जी बापू, संत श्री रामपाल जी , श्री श्री रविशंकर महाराज ( पर्यावरण का मामला ) , स्वामी नित्यानंद जी ( शुक्र है कि उनका मुकदमा निपट चुका है। ) आदि के मामलों में भी हमारा यही प्रस्ताव है कि इनके मुकदमो का निपटान ज्यूरी द्वारा किया जाए। जब जयललिता ने कांची के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती जी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया था तब भी हमने यही प्रस्ताव किया था।
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कुल मिलाकर हमें जजों पर कभी भी भरोसा नहीं रहा। और भरोसा करने का कोई कारण भी मौजूद नहीं है।
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यह देखना बेहद दुखद है कि, इन सभी संतो के अनुयायी करोडो रूपये लेकर वकीलों के चक्कर लगा रहे है, ताकि वकील उन्हें जजों से न्याय दिला सके। एक मात्र अपवाद संत श्री रामपाल जी रहे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि देश के 80% से ज्यादा जज भ्रष्ट है !!
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इन अनुयायियों को इस बात का भान नहीं है कि हमारे जज / प्रशासनिक अधिकारी / पुलिस अधिकारी / मंत्री एवं कल्कि पुरुष तृतीय मोदी साहेब समेत संघ के सभी मंत्री अमेरिकी धनिकों की फौलादी पकड़ में है। ये सभी नेता अधिकारी एवं सभी मीडिया कर्मी ( बिकाऊ अर्नव व बिकाऊ सरदेसाई समेत ) अमेरिकी धनिकों की कठपुतलियां मात्र है।
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गुरमीत जी , श्री आसाराम जी बापू, श्री रामपाल जी , श्री श्री रविशंकर महाराज आदि संतो ने अपने असाधारण कार्यो से इस बात को सुनिश्चित किया कि गरीब /दलित / ओबीसी आदि मिशनरीज के आश्रय में चले जाने की जगह हिन्दू धर्म में बने रहे। मैं फिर से दोहराता हूँ -- यदि आज गरीब /दलित / ओबीसी आदि हिन्दू धर्म में बने हुए है तो मंदिर प्रमुखों, प्राचीन राजाओ, संघ के नेताओं, बीजेपी नेताओं का इसमें योगदान शून्य है। इसका असली श्रेय सिर्फ इन तथा इन जैसे अन्य संप्रदाय प्रमुखों की नयी खेप को जाता है। और विडम्बना यह है कि आज उदारवादी / पढ़े लिखे / आधुनिक हिन्दू इन संतो को जेल में भेज दिए जाने का जश्न मना रहे है !!! हिन्दुओ को अपने नीचे "एक" करने की चाहत रखने वाले संघ के ज्यादातर कार्यकर्ता भी इससे खुश है। उनका नजरिया है कि, चलो अच्छा हुआ। यदि ये सभी संत हवालात में भेज दिए जाते है तो हम उनके अनुयायियों को आसानी से संघ में जोड़ लेंगे !! इन्हें यह अहसास ही नहीं है कि, मिशनरीज की ताकत के सामने इनकी कोई हैसियत नहीं है। यदि संत गुरमीत जी , संत श्री आसाराम जी एवं संत रामपाल जैसे लोग कमजोर हो गए तो दलितों / ओ बी सी / गरीबो की एक बड़ी संख्या मिशनरीज की गोद में जा गिरेगी। ऐसे सभी व्यक्ति जो इन संतो को गलत तरीके से 10-20 साल के लिए जेल में भेज दिए जाने का जश्न मना रहे है दरअसल वे जाने-अनजाने मिशनरीज की मदद कर रहे है।
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कानून का सारांश
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हमने देश में जूरी सिस्टम लागू करने के लिए क़ानून ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। इस ड्राफ्ट में प्रक्रिया दी गयी है कि किस तरह ज्यूरी को चुना जाएगा , किस तरह ज्यूरी मामला सुनेगी और फैसला देगी आदि।

हमारे द्वारा प्रस्तवित जूरी सिस्टम क़ानून के ड्राफ्ट के मुख्य बिंदु दिए गए है :

यह कानून पारित होने के बाद हत्या, अपहरण, बलात्कार, मारपीट तथा लापरवाही के कारण होनी वाली मौत आदि जैसे अपराधिक मामलो की सुनवाई करने और सजा सुनाने का अधिकार नागरिको की जूरी के पास रहेगा। इस जूरी मंडल का चयन किसी जिले या किसी राज्य अथवा भारत की मतदाता सूचियों में से क्रम रहित ( रेंडमली ) तरीके से किया जाएगा। जूरी सदस्यों का आयु वर्ग 25 से 55 वर्ष के बीच होगा तथा इस जूरी मंडल में 15 से 1500 तक जूरी सदस्य हो सकेंगे | बाद मे यदि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री चाहे तो अन्य प्रकार के अपराधों को भी इसमें जोड़ सकते है। इस क़ानून के लागू होने के बाद से इन मुकदमो का फैसला आम नागरिको के जूरी मंडल द्वारा किया जाएगा न कि जजों द्वारा |
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[ टिप्पणी : इस कानूनी ड्राफ्ट को लोकसभा और राज्यसभा में साधारण बहुमत से पास करके देश में लागू किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि इस कानून को पारित करने के लिए किसी भी प्रकार के संविधान संशोधन की जरुरत नहीं है। ]
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(1) यह कानून हत्या, अपहरण, बलात्कार, मार-पिटाई, धमकी और अन्य सभी ऐसे अपराधों जिनमे शारीरिक बल या शारीरिक हिंसा का प्रयोग किया गया है, के लिए मजिस्ट्रेट अदालतों, जिला अदालतों और सेशन अदालतों में जूरी सिस्टम की स्थापना करता है |
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(2) इस कानून के पारित होने बाद आप (आप अर्थात भारत में पंजीकृत मतदाता) को जूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है | जूरी ड्यूटी में आपको आरोपी, पीड़ित, गवाहों और दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा प्रस्तुत तथ्य और बहस सुननी होगी और सजा / जुर्माना या रिहाई तय करनी होगी |
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(3) किसी जिले में जूरी सिस्टम का पर्यवेक्षण एवं संचालन “जिला जूरी प्रशासक” द्वारा किया जायेगा | जिला जूरी प्रशासक की नियुक्ति मुख्यमंत्री करेंगे तथा आप ( अर्थात अमुक जिले के मतदाता ) जूरी प्रशासक को इस कानून में “राईट टू रिकॉल जिला जूरी प्रशासक” धाराओं में दी गयी प्रक्रिया का प्रयोग करके बदल सकेंगे |
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(4) “राईट टू रिकॉल जिला जूरी प्रशासक” के चयन के लिए आप अधिकतम 5 उम्मीदवारों को किसी भी दिन अनुमोदित कर सकते है, और किसी भी उम्मीदवार का अनुमोदन किसी भी दिन निरस्त कर सकते है | यदि आप अपना अनुमोदन दर्ज नहीं करना चाहते तो आपको अनुमोदन दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है |
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(5) जिस उम्मीदवार के अनुमोदनों की संख्या सबसे ज्यादा हो और यह अनुमोदनो की यह संख्या जिले में दर्ज सभी मतदाताओं के 35% से अधिक हो , तो ऐसा उम्मीदवार पदासीन जिला जूरी प्रशासक को प्रतिस्थापित करके नया जिला जूरी प्रशासक बनेगा |
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ज्यूरी सिस्टम का पूरा ड्राफ्ट देखने के लिए कृपया यह लिंक देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/822033977974798>;
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भारत में ज्यूरी सिस्टम लाने के लिए आप क्या कर सकते है ?
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यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो अपने प्रधानमंत्री को @pmoindia पर ट्वीट द्वारा निर्देश भेजें कि इसे गेजेट में प्रकाशित किया जाये।
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प्रधानमंत्री को भेजे जाने वाले ट्वीट का प्रारूप :
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@pmoindia I instruct you to print law mentioned in newindia.in/causes/jury-sys sha1-#8d6dca244ad6d964509df3f99e04a6adea1787fb #JurySystem
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कृपया ऊपर दिए गए ट्वीट को कॉपी करे तथा अपने ट्विटर एकाउंट से @pmoindia पर ट्वीट करे।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Oct 03 2017 20:01:29 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भारत की एक विशिष्ट प्रजाति ; जागरूक वर्ग उर्फ़ पेड कु-बुद्धिजीवी
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भारत में कई प्रकार के लोग रहते है। इन्ही लोगो में एक विशिष्ट प्रकार की प्रजाति पायी जाती है। ये प्रजाति देश के लिए बहुत ही हानिकर है, और देश को गड्ढे में धकेलने में अपनी सबसे सक्रीय भूमिका निभाती है। ये लोग देश को राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने भारतीयों को कोसने एवं सार्वजनिक रूप से उनका मोरल डाउन करने की गतिविधियों में लिप्त है। यह लेख इस प्रजाति के लक्षणों एवं उनकी विकृत सोच की पड़ताल करता है।
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लेखन में सुविधा की दृष्टी इस प्रजाति को यहाँ "जागरूक" नागरिक शब्द से सम्बोधित किया गया है। इनके दो प्रकार है - "छोटे जागरूक" एवं "ज्यादा जागरूक"।
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"ज्यादा जागरूक" लोग अमूमन टीवी चैनलों और अखबारों आदि में पाए जाते है। पेशे से ये लोग ज्यादातर आला दर्जे के शिक्षाविद , सामाजिक कार्यकर्ता, स्तंभकार, कलाकार आदि होते है। "छोटे जागरूक" इनका गुटका संस्करण है। ये सामान्य व्यक्ति की तरह ही होते है। लेकिन "ज्यादा जागरूक" लोगो के ज्यादा वर्चुअल सम्पर्क में रहने के कारण इनमे भी "जागरूकता" का संक्रमण हो जाता है। फेसबुक से लेकर गली-नुक्क्ड़ो पर, चाय-पान की दुकानों पर या छोटी मोटी विचार गोष्ठियों में आप इन "छोटे जागरूक" नागरिको को जागरूकता फैलाते मतलब भारतीयों को कोसते हुए देख सकते है।
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आम तौर पर इन्हें बुद्धिजीवी कहा जाता है। वैसे इनका सही संबोधन "पेड कु-बुद्धिजीवी" है। और व्यवहारिक रूप से ये लोग वैचारिक प्रदुषण फैलाकर वातावरण को प्रदूषित करते है।
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लक्षण - 1 :
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ये लोग जब भी किसी विषय पर अपने विचार प्रकट करते है तो अमुक समस्या को घुमा फिरा कर भारत के लोगो के चरित्र से जोड़ देते है। उदाहरण के लिए यदि ये चोरी पर बात करेंगे तो बताएँगे कि भारत के लोग चोट्टे है, इसीलिए चोरियां हो रही है। जब ये गंदगी पर बात करेंगे तो यह स्थापित करने की कोशिश करेंगे कि भारतीय लोग सूअर है, अत: गंदगी फैलाना उनका स्वाभाविक आचरण है। ये लोग दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति तक यह बात पहुँचा देना चाहते है कि --

भारत पिछड़ गया -- क्योंकि भारतीय निकम्मे और आलसी है !
भारत में बलात्कार होते है -- क्योंकि भारतीय लम्पट एवं दुराचारी है !!
वोटिंग पर जब ये बोलेंगे तो यह जरूर कहेंगे कि -- भारतीय बिकाऊ है और नोट लेकर अपने वोट बेचते है !!
भारत को लूटा गया -- क्योंकि भारतीय लोगो में देश प्रेम नहीं है और वे गद्दार है !
महिलाओं की जब बात करेंगे तो कहेंगे कि -- भारतीय पुरुष महिलाओं का उत्पीडन करने के आदि है !
भ्रष्टाचार पर कहेंगे कि -- भारत में भ्रष्टाचार है, क्योंकि आम भारतीय भ्रष्ट है !!

ऐसे करके आप सभी विषयों की सूची बनाते जाइए, ये जब भी मुहँ खोलेंगे तब इनके मुहँ से यही निकलेगा कि सभी समस्याओं की जड़ "आम भारतीय" है।
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भारतीयों को अशिक्षित, उज्जड, जाहिल, गवांर, गंदे, भ्रष्ट, असभ्य, चरित्रहीन , पाखंडी, धूर्त , गद्दार बताना इनका मुख्य शगल होता है। लेकिन भारतीयो को कोसने और उन्हें गाली देने के लिए वे जिस टर्म का इस्तेमाल करते है वह है -- "हम लोग" !!! मतलब वे ऐसा नहीं कहते कि भारतीय लोग जाहिल है, क्योंकि इससे उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ सकता है या स्थिति बिगड़ने पर फौजदारी भी हो सकती है। इसके लिए वे हमेशा "हम लोग" शब्द का इस्तेमाल करते है। मतलब वे कहेंगे कि "हम भारतीय लोग" भ्रष्ट है , जाहिल है , अशिक्षित और असभ्य है आदि। इस तरह वे देश के अन्य जागरूक नागरिको को भी अपने साथ चिपका लेते है, और अन्य लोग भी उनके सुर में सुर मिलाकर कहने लगते है कि, हाँ "हम लोग" भ्रष्ट और चरित्रहीन है !! कौन हम लोग ? हम भारतीय !!! हालांकि वे शुरू से ही यह मानकर चलते है कि, "हम लोग" में वह स्वयं शामिल नहीं है !!! ये खुद को बेहद समझदार मानते है, ईसीलिये शेष भारतीयों को सुधरने के उपदेश देते है।
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लक्षण - 2 :
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तो पहले ये लोग यह स्थापित करते है कि "हम भारतीय" गवांर और असभ्य है। और जब यह स्थापित हो जाता है तो समाधान के रूप में बताते है कि -- हमें सुधर जाना चाहिए !!! हमें ? मतलब हम भारतीयों को !! देश की किसी भी समस्या का समाधान ये लोग इसी बात पर ख़त्म करेंगे कि, जब तक भारतीय सुधरेंगे नहीं तब तक भारत की किसी भी समस्या का इलाज संभव नहीं है। भारत की सभी समस्याओ की जड़ भारतीय है। जागरूकता का स्तर और भी बढ़ने पर ये लोग दिन में एक बार अवश्य कहते है कि -- भारत का कुछ नहीं हो सकता, क्योंकि भारतीय लोग जाहिल है। भारत के लोगो में राष्ट्रीय चरित्र का अभाव है। भारतीय लोगो में देश प्रेम की भावना नहीं है, भारतीयों की सोच अच्छी नहीं है, भारतीय अनैतिक है, भारतीयों के जीवन मूल्य गिरे हुए है आदि आदि।
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क्या भारत के लोग वाकयी जाहिल, असभ्य, गवांर, देशद्रोही और लम्पट है ? क्या भारत के लोगो में राष्ट्रीय चरित्र का अभाव है, क्या भारत के लोगो की सोच घटिया है ?
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नहीं। कदापि नहीं। पूरी दुनिया में कमोबेश एक जैसे लोग पाए जाते है। किन्तु अलग अलग देशो की क़ानून व्यवस्थाएं वहां अलग अलग शासन की रचना करती है। राजनैतिक / सामाजिक समस्याओ का निदान क़ानून व्यवस्थाओ में परिवर्तन करके किया जा सकता है। किन्तु इनकी रुचि प्रशासनिक परिवर्तन में नहीं होती। अत: ये किसी प्रशासनिक समस्या का दोष नागरिको के चरित्र पर थाप देते है।
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दरअसल ये बेहद धूर्त और पाखंडी किस्म के लोग है। प्रशासनिक एवं राजनीतिक समस्या की अनदेखी करने के लिए ये लोग जान बूझकर भारत के आम नागरिको को दोषी ठहराते है। उदाहरण के लिए, इन्हें यह बात मालूम है कि अमेरिका और भारत की पुलिस एक जैसी ही है , लेकिन अमेरिका के नागरिको के पास पुलिस प्रमुख को नौकरी से निकालने का अधिकार होने के कारण वहां की पुलिस में भ्रष्टाचार कम है। इस तरह पुलिस में भ्रष्टाचार होना एक प्रशासनिक / कानूनी वजह है। किन्तु यदि ये लोग कहेंगे कि, भारत के पुलिस प्रशासन में भ्रष्टाचार इसीलिए है क्योंकि भारत के नागरिको के पास पुलिस प्रमुख को नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं है, तो अगले दिन से ही पेड मीडिया इनका प्लग खींच लेगा और इनके स्तम्भ अखबार में प्रकाशित होने बंद हो जायेगे। तो ये लोग इस आशय की बात कहेंगे कि भारत की पुलिस इसीलिए भ्रष्ट है क्योंकि भारत के लोग भ्रष्ट है !!
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इनके द्वारा फैलाए जाने वाले कुछ झूठ और उनका खंडन :
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झूठ - भारत में भ्रष्टाचार है क्योंकि भारत के लोग भ्रष्ट है।
सच - भारत के नागरिको के पास नेताओं, अधिकारियो एवं जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं है। इसीलिए भारत के नागरिक चाह कर भी भ्रष्ट लोगो को नौकरी से निकाल नहीं पाते।

झूठ - भारत के लोग पैसे एवं शराब के बदले अपने वोट बेचते है।
सच - किसी भी चुनाव क्षेत्र में ऐसे लोगो का प्रतिशत सिर्फ 1 से 2% ही होता है। यह सामान्य आंकड़ा है। यह इस बात की ताईद नहीं करता कि भारतीय लोग वोट बेचते है। भारत में चोरियां भी होती है। तो क्या आप यह कहेंगे कि भारत के लोग चोर है ? समाधान - वोट वापिस लेने का क़ानून लागू होने से वोटो की खरीद फरोख्त स्वत: ही पूरी तरह से बंद हो जायेगी।
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झूठ - भारत के लोग गंदगी फैलाते है।
सच - पूरी दुनिया में 2 से 5% लोग गंदगी फैलाते है। किन्तु वहां का क़ानून चुस्त होने के कारण उन पर दंड आता है और वे गंदगी फैलाना बंद कर देते है। जिस देश में दंड नहीं होता वहां इनकी तादाद बढती जाती है। यदि भारत के कानूनों को दुरुस्त किया जाए तो यहाँ भी सफाई रहने लगेगी , और यदि अन्य देशो में से ये क़ानून हटा लिए जाये तो वहां भी लोग गंदगी फैलाने लगेंगे।
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झूठ - भारत के लोगो का चरित्र खराब है और उनकी सोच घटिया है।
सच - ऐसा कहने वाले आला दर्जे के पाखंडी है। और खुद को अलग एवं जागरूक दिखाने के लिए वे ऐसा कहते है।
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झूठ - भारत के लोग अशिक्षित है इसीलिए असभ्य है
सच - भारत में अशिक्षा है , क्योंकि भारत में राइट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का क़ानून नहीं है। वैसे शिक्षा का व्यक्ति के चरित्र एवं सभ्यता से कोई लेना देना नहीं है। दोनों तत्व अलग अलग है।
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झूठ - भारत में लोग जातीय आधार पर वोटिंग करते है।
सच - मानव सामुदायिक प्राणी है। और जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र आदि के रूप में अपने समुदाय बनाता है। यह पूरी दुनिया में आम है। जातीय आधार पर मतदान की समस्या का समाधान इंस्टेंट रन ऑफ़ वोटिंग आने से एक दिन में ही हो जाएगा।
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इस सूची को काफी लम्बा किया जा सकता है। किन्तु इतने में सामान्य बुद्धि वाले मनुष्य को या बात समझ आ जानी चाहिए कि भारत के लोग भी वैसे ही है , जैसे कि अन्य देशो के है। किन्तु भारत के कु-बुद्धिजीवी लगातार भारत के लोगो को अकारण कोसते रहते है।
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भारतीयों को कोसने की वजह ?
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१) भारत का मीडिया बहुरास्ट्रीय कम्पनियों के कब्जे में है। अन्तराष्ट्रीय स्तर पर किसी देश का मोरल डाउन करने के लिए इस तरह की बातों का बेहद महत्त्व है। अत: "ज्यादा जागरूक" यानी ऊँची पांत के श्रेष्ठी वर्ग को ऐसी धारणा फ़ैलाने के लिए भुगतान किया जाता है। इसीलिए आप देखेंगे कि सभी न्यूज चेनल्स पर और अखबार के स्त्मभो में इस आशय की बातों को बार बार दोहराया जाता है कि भारत के लोगो की सोच घटिया है, भारत के लोगो में राष्ट्र प्रेम का अभाव है , भारत के लोगो को गंदगी फैलाने की लत है आदि आदि । यदि वे ऐसी बातें नहीं लिखेंगे तो अखबार एवं चैनल्स उन्हें फुटेज देना बंद कर देंगे।
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२) दूसरी वजह राजनैतिक है और यह ज्यादा गंभीर है। यदि किसी समस्या के वास्तविक प्रशासनिक पहलु पर लिखा जाएगा तो नागरिको तक या जानकारी पहुँच जायेगी कि इसका कारण प्रशासनिक है। तब वे प्रशासनिक सुधार की बात सोचने लगेंगे और इसके समाधान के लिए आवश्यक क़ानून की मांग करेंगे। इससे या बात खुलकर आ जायेगी कि समस्या की जड़ राजनेता और वांछित कानूनों का अभाव है। यह मांग खड़ी होने पर राजनैतिक पार्टियों को अमुक क़ानून लागू करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। यदि ऐसे क़ानून लागू हो गए तो जिनसे भ्रष्टाचार में कमी आये तो आला अधिकारियो, जजों, नेताओं आदि के हाथ से भ्रष्टाचार करने का अवसर निकला जाएगा और उन्हें हानि होगी। इसलिए ये लोग लगातार अपनी खाल बचाने के लिए ऐसे लोगो को आश्रय देते है जो देश की सारी समस्याओ का ठीकरा नागरिको के सिर पर ही फोड़ दे।
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३) समस्या की चर्चा को टाला नहीं जा सकता। और जब समस्या की चर्चा आएगी तो समाधान पर भी बात करनी पड़ेगी। तो एक बारीक चाल यह है कि मामले को शुरू से ही पटरी से उतार दिया जाये। रणनीति यह है कि -- जब समस्या की चर्चा की जाए तो समस्या का कारण अलग दिशा में बता दिया जाए। जब कारण उल्टी दिशा में बता दिया जाएगा तो समाधान भी उल्टा पुल्टा ही हाथ लगेगा। उदाहरण के लिए -- भ्र्ष्टाचार की समस्या का कारण यह बता दो कि भारत के लोग भ्र्ष्ट है और उनकी सोच घटिया है। अब समाधान यह सूझेगा कि, हमें भारतीयों की सोच को सुधारने का काम करना चाहिए। अब सोच सुधारने का कोई इंजेक्शन तो आता नहीं है। तो हर व्यक्ति माइक लेकर दूसरे से कहे कि, तुम अपनी सोच सुधारो। फिर दूसरा तीसरे से और तीसरा फिर से पहले से यही बात कह दे !! बस इस चक्र को असीमित रूप से चलाया जा सकता है !!!
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तो "ज्यादा जागरूक" लोगो की अपनी वजहें है जिस कारण वे भारतीयों को कोसते है। किन्तु आपने देखा होगा कि आपके आस पास गली मौहल्लो और शहरो में भी इस किस्म के "छोटे जागरूक" इफरात में पाए जाते है जिन्हे न तो कोई भारतीयो को कोसने का पैसा दे रहा है और न ही उनके पास ऐसा कोई वाजिब कारण है। फिर भी ये लोग आपके आस पास निरंतर रूप से यह वैचारिक प्रदुषण फैलाते रहते है कि -- भारत के लोगो की सोच घटिया है !! और कमाल की बात यह है कि ये खुद भी भारतीय ही है।
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इनकी वजह "क्राइसिस ऑफ कॉन्शियस" है । यह व्याधि आम तौर पर उन्ही को सताती है जो अपने को बुद्धिजीवी मानते है, और खुद को "बुद्धिजीवी एवं जागरूक" साबित करने के लिए अन्य लोगो को "जाग जाने" का उपदेश देते है। खुद को बुद्धिजीवी एवं जागा हुआ साबित करने का सबसे आसान एवं त्वरित तरीका यह है कि लोगो को जागरूक हो जाने, कुछ करने आदि का उपदेश दिया जाए। उन्हें कोसा जाए। अब किसी को नाम लेकर कोसेंगे तो प्रतिकार का सामना करना पड़ सकता है। तो ये लोग सारे भारतीयों को ही लपेट लेते है।

ये लोग अपनी बौध्दिक खुराक पेड मीडिया से प्राप्त करते है। पेड मीडिया के लगातार संपर्क में रहने के कारण इन्हें यह शुबहा होने लगता है कि भारत की सभी समस्याओ की जड़ यह है कि भारतीयों की सोच घटिया है !! और जागरूक व्यक्ति होने के नाते हमारा यह फर्ज बन जाता है कि हम भारतीयों को यह सूचना देना शुरू करे कि -- हमारी सोच घटिया है।
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इन्हें धूर्त या पाखंडी या कपटी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि ये ऐसा बिना किसी प्रतिफल के कर रहे है। इन्होने पेड मीडिया में सालो तक इस आशय के पाठ्य पढ़े-सुने है और ये लोग इस धारणा के शिकार हो गए है कि हमारे अलावा शेष भारतियो की सोच घटिया है, भारतीयों में राष्ट्रिय चरित्र का अभाव है , आम भारतीय भ्रष्ट है आदि। अब जो भी व्यक्ति इनके इस तरह के वक्तव्य पढता-सुनता है उसे यह अहसास होता है कि उसकी सोच घटिया है और उसमे राष्ट्रिय चरित्र का अभाव है। अत: खुद को जागरूक साबित करने के लिए वह भी इस उपदेश को आगे दोहराने लगता है। इस तरह हम देखते है कि कुछ लोग पूरे देश में एक चेन रिएक्शन खड़ी कर देते है, जिसमे तमाम भारतीय एक दुसरे की सोच को घटिया ठहरा रहे है। ऐसे लोगो एवं इस सोच का प्रतिकार करना जरुरी है।
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समाधान ?
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"ज्यादा जागरूक" लोगो का इलाज सिर्फ जूरी सिस्टम एवं एवं राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष क़ानून को लागू करके ही किया जा सकता है। जूरी सिस्टम आने के बाद अगले दिन से ही ये लोग भारतीयों को कोसना छोड़ देंगे। यदि "छोटे जागरूक" लोग आपके सम्पर्क में आते है और सार्वजनिक रूप से यह उपदेश करते है कि -- हम भारतीयों की सोच घटिया है , तो उनका प्रतिकार करें। उनसे पूछे कि वे किस आधार पर हमें घटिया मानसिकता वाला ठहरा रहे है। इससे उन्हें पुनर्विचार करने का अवसर मिलेगा और वे भारतीयों को गाली देने से बाज आने लगेंगे।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Oct 04 2017 09:36:06 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

प्रधानमंत्री बुलेट ट्रेन की ब्याज दर पर झूठ बोलकर पूरे देश के नागरिको को भ्रमित कर रहे है ;
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झूठ -- बुलेट ट्रेन के लिए हमें 0.1% की ब्याज दर से पैसा मिला है।
सच -- हमें 6.5% से 7% की ब्याज दर से रूपये चुकाने होंगे !!!
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यह शर्म की बात है कि भारत के चुने हुए प्रधानमन्त्री टीवी / प्रेस में 90 करोड़ नागरिको के सामने यह सफ़ेद झूठ बोल देते है कि बुलेट ट्रेन के लिए हमें सिर्फ 0.1% की ब्याज दर से पैसा चुकाना होगा !! और इससे भी ज्यादा शर्म की बात यह है कि सोनिया गांधी एवं अरविन्द केजरीवाल जैसे विपक्ष में बैठे नेता इसका प्रतिरोध नहीं करते !! और डूब मरने वाली बात यह है कि संघ ( संघ=बीजेपी उर्फ़ गंगाधर=शक्तिमान ) , कोंग्रेस एवं आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता सार्वजनिक रूप से इस झूठ का खंडन नहीं कर रहे है !!!
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मान लीजिये कि ऋण 1974 में लिए गया तथा इसकी ब्याज दर 0.1% थी। लगभग 43 वर्ष पहले।
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1974 में 1 US$ = 8 रू = 300 येन, अत: 1 रू = 37 येन
2017 में 1 US$ = 65 रू = 112 येन, अत: 1 रू = 1.72 येन
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तो अगले 43 साल में येन रूपये के मुकाबले 22 गुना मजबूत हो गया है। हमें ब्याज येन में चुकाना है, रूपये में नहीं।
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तो यदि हम यह मानकर चले कि येन में लिए गए ब्याज की दर 0% है तो रूपये में चुकाई जाने वाली ब्याज की स्वभाविक दर निचे दिए गए फार्मूले में r के मान के बराबर होगी :
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(1 + r)^43 = 37/1.72 = 22
r = 7.4 % लगभग
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दूसरे शब्दों में बुलेट ट्रेन के लिए लिए गए ऋण पर हमें उतना ही ब्याज चुकाना होगा जितना बैंक किसी FD पर चुकाता है। वर्तमान स्थिति में 5 वर्ष के लिए FD पर यह दर 7% से कम है।
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तो ब्याज दर का निर्धारण अगले 50 वर्षो में रूपये एवं येन के भाव से तय होगा !!! एक तरह से यह एक जुआ है, बिजनेस मॉडल नहीं है।
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और सबसे जरुरी बात यह कि यह ब्याज हमें येन में चुकाना होगा, रूपये में नहीं !! और बुलेट ट्रेन से जापानी जो मुनाफा कमाएंगे उसके भी हमें येन चुकाने होंगे !! बुलेट ट्रेन ऐसा कोई उत्पादन नहीं करेगी जिसे निर्यात करके हम डॉलर जुटा सके। भारतीय इसमें रूपये देकर सवार होंगे और रूपये के इस मुनाफे के बदले हमें येन चुकाने होंगे। जितना रुपया गिरेगा उतना हमें दोहरा घाटा होगा। ब्याज की दर भी बढ़ती जाएगी और मुनाफे के बदले येन देने का भार भी बढ़ता जाएगा। ये भारत की जगह जापानियों के विकास का मॉडल ज्यादा नज़र आता है !!!
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कुल मिलाकर भारत में एवं भारतीयों द्वारा निर्मित बुलेट ट्रेन हमारे फायदे की चीज है, लेकिन जापान / चीन की ट्रेने विकास के नाम पर एक मजाक है। और 0.1% की ब्याज दर का प्रोपेगेंडा इस मजाक को और भी निर्मम बना दे रहा है।
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चीन अपनी हाई स्पीड एवं बुलेट ट्रेन्स खुद से बनाता है , और हमें भी वही रास्ता लेना चाहिए। किन्तु सोनिया-मोदी-केजरीवाल और इनके अंध भगत भारत में शताब्दी एवं राजधानी ट्रेनों की संख्या और ट्रेक बढ़ाने का तक का विरोध कर रहे है, भारतीय बुलेट ट्रेनों की बात तो भूल ही जाइये !!
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सोनिया-मोदी-केजरीवाल के अंध भगतो से हम और उम्मीद भी क्या रख सकते है ?
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समाधान - राईट टू रिकॉल रेल मंत्री एवं ज्यूरी सिस्टम लागू करके हम भारत में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का रेलों का स्वदेशी ढांचा खड़ा कर सकते है। लेकिन इससे जापानीयो , अमेरिकनों एवं चीनियों को घाटा हो जायेगा। यही वजह है कि सोनिया-मोदी-केजरीवाल एवं इनके अंध भगत इन कानूनों के धुर विरोधी है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Oct 04 2017 12:50:37 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

निम्नलिखित कदम उठाकर सिर्फ 90 दिनों में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है।
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(1) भू स्वामित्व के सभी आंकड़ों को नेट पर रखा जाये। सभी Put all land ownership records on net
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(2) जीएसटी को तुरंत प्रभाव से वापिस लिया जाए। वाहनों की बिक्री पर जीएसटी जारी रखा जा सकता है। एक्साइज, सेल्स , सेवा आदि करो को भी फिर से लागू करने की आवश्यकता नहीं है।
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(3) 250 वर्ग मीटर की छूट देते हुए भूमि एवं निर्माण पर वेल्थ टेक्स लागू किया जाए। वेल्थ टेक्स में से चुकाया गया आयकर घटा दिया जाएगा।
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(4) खनिजों से प्राप्त रॉयल्टी एवं सरकारी भूमि से प्राप्त किराया सीधे नागरिको के खाते में जमा किया जाए।
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(5) आयकर को फिर से समायोजित किया जाए -- मॉरीशस ट्रीटी एवं "सेज" आदि को दी जा रही राहतों को रद्द किया जाए।
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(6) पुलिस एवं सेना को छोड़ते हुए सभी सरकारी अधिकारियो का वेतन / फोटो आदि जानकारी नेट पर रखी जाए।
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(7) भारत में जनमत संग्रह प्रक्रिया के लिए टीसीपी को गैजेट में प्रकाशित किया जाए।
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इन प्रस्तावों के कानूनी ड्राफ्ट देखने के लिए इस लिंक को क्लिक करें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Oct 04 2017 18:34:31 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

महत्त्व्पूर्ण सूचना :
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रिकालिस्ट राहुल चिमनभाई मेहता वेल्थ टेक्स, ज्यूरी सिस्टम आदि कानूनों का प्रचार करने के उद्देश्य से गुजरात के आगामी विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार है। राहुल भाई दी गयी तीन सीटों में से किन्ही दो सीटों से चुनाव लड़ेंगे - १) नरनपुरा , २) घाटलोडिया, ३) थक्केर बानगर
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राहुल भाई की फेसबुक प्रोफाइल का लिंक - <https://facebook.com/MehtaRahulC>;
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राईट टू रिकॉल पार्टी का रजिस्ट्रेशन लंबित होने के कारण वे निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ेंगे।
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उनका एजेंडा नागरिको को निम्नलिखित सूचनाएं देना है :
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(1) जीएसटी को तुरंत प्रभाव से वापिस लिया जाकर वेल्थ टेक्स को लागू किया जाए । एक्साइज, सेल्स , सेवा आदि करो को भी फिर से लागू करने की आवश्यकता नहीं है।
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(2) राईट टू रिकॉल पीएम, सीएम , सांसद एवं विधायक
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(3) राईट टू रिकॉल जिला पुलिस प्रमुख एवं जिला शिक्षा अधिकारी
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(4) सेशन कोर्ट, हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों को नौकरी से निकालना और इसकी जगह ज्यूरी सिस्टम लेकर आना। जजों की नियुक्ति राइट टू रिकॉल जज प्रक्रियाओ द्वारा।
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(5) खनिजों से प्राप्त रॉयल्टी एवं सरकारी भूमि से प्राप्त किराया सीधे नागरिको के खाते में जमा किया जाए।
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(6) फुटपाथो को बेहतर बनाया जाए, तथा अपवादित दशाओ को छोड़कर सभी तरह की पार्किंग को चार्जेबल किया जाए।
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(7) गुजरात एवं भारत में युनिवर्सल वाटर मीटरिंग का क़ानून लागू किया जाए।
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(8) कुत्तो के हॉस्टल और पिन्जरपोल बनाए जाए।
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इसके अलावा कानून ड्राफ्ट आधारित 200 मांगे और भी है।
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राहुल भाई का लक्ष्य है कि भारत के सभी नागरिको तक यह सूचना पहुंचे कि कोंग्रेस / संघ / आम आदमी पार्टी एवं उनके कार्यकर्ता इन सभी कानूनों का विरोध कर रहे है। तथा सोनिया-मोदी-केजरीवाल भी इन कानूनों के विरोधी है।
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इस पोस्ट को अपनी फेसबुक वाल पर रखकर एवं वह्ट्स एप आदि पर फॉरवर्ड करके आप प्रचार में राहुल भाई की सहायता कर सकते है।
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Oct 04 2017 19:22:23 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

H301.011 ; राइट टू रिकॉल ग्रुप और अन्य पार्टियों, बुद्धिजीवियों आदि के बीच अंतर
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(11.1) हम अधिकांश दलों और बुद्धिजीवियों से पूरी तरह अलग है।
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(11.2) प्रचार के तरीकों में सबसे महत्वपूर्ण अंतर
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(11.3) प्रस्तावित कानूनों के ड्राफ्ट का महत्व
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(11.4) भारत के अधिकतर बुद्धिजीवी विशिष्ट वर्ग के एजेंट हैं
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(11.5) समीक्षा प्रश्न
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(11.6) अभ्यास
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(11.1) हम अधिकांश दलों और बुद्धिजीवियों से पूरी तरह अलग है।
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राइट टू रिकॉल ग्रुप की विचारधारा बनाम सभी दलों के सांसदों और भारत के प्रमुख बुद्धिजीवी लोगों की विचारधारा
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1) खनिज और सरकारी प्लॉटो के स्वामित्व के संबंध में :
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राइट टू रिकॉल ग्रुप इस बात पर बल देता है कि ---- सभी खाने और सरकारी प्लॉट हम भारतीयों के है न कि भारत राज्य के। और इसलिए हम इस बात पर जोर देते हैं कि हम नागरिकों और हमारी सेना को खनिज रॉयल्टी और सरकारी भूखंडों का सारा किराया मिलना चाहिए। और भी सीधे शब्दों में राइट टू रिकॉल ग्रुप पूरी तरह यह मानता है कि नागरिकों को भारत सरकार के प्लॉटों जैसे कि आईआईएमए प्लॉट, जेएनयू प्लॉट, हवाई अड्डा प्लॉट इत्यादि से प्राप्त किराया अवश्य मिलना चाहिए।
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कांग्रेस, बीजेपी, सीपीएम और भारत के सभी बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों ने कहा है कि सभी खान और सरकारी प्लॉट भारत “राज्य” की संपत्ति है और आम भारतीयों का उन पर कोई स्वामित्व व नियंत्रण नहीं होगा। और उन्होंने आईआईएमए, जेएनयू, और हवाई अड्डों के प्लॉटों से प्राप्त किराया भारतीयों को देने से सीधे तौर पर इनकार कर दिया है।
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2) हम लोग लोकतंत्र के पक्षधर है, जबकि सभी वर्तमान पार्टियों के सांसद और भारत के प्रमुख बुद्धिजीवी फासीस्ट वादी है :

'नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' समूह के हम लोग राजनैतिक परिदृश्य में अकेले समूह है, जो इस बात पर जोर देते है कि हम आम लोगों को विधायी शक्तियाँ प्राप्त करनी होगी और हम आम लोगों के पास अधिकारियों / जजों को हटाने और बदलने की शक्तियाँ होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में हम लोग लोकतंत्र वादी है। जबकि सभी वर्तमान दल और भारत के सभी प्रमुख बुद्धिजीवी लोग हम आम नागरिको और मतदाताओं को मूर्ख समझते है, और इस बात पर जोर देते हैं कि हम आम लोगों के पास कानून बनाने की कोई शक्ति नहीं होनी चाहिए और अधिकारियों, पुलिसवालों, न्यायधीशों की नियुक्तियों का कोई अधिकार भी नागरिको के पास नहीं होना चाहिए।
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भारत के अधिकांश बुद्धिजीवियों की मानसिकता फासीस्ट वादी है। और इसलिए वे दृढ़ता से जोर देते है कि प्रशासन के सभी विवेकाधिकार केवल मंत्रियों, आईएएस, आईपीएस अधिकारियों, जजों व बुद्धिजीवियों के पास होने चाहिए। विवेकाधिकार की शक्तियों की बात तो छोड़ ही दीजिए, ये फासीस्ट वादी जनता की आवाज पारदर्शी शिकायत प्रणाली तक का विरोध करते हैं – और नागरिकों को प्रधानमंत्री की वेवसाइट पर शिकायत दर्ज करने की छूट देने का भी विरोध करते है। इस तरह हम उनके फासीस्ट वाद की निंदा करते हैं और वे हमारे लोकतंत्रवाद की निंदा करते है।
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3) नागरिकों द्वारा संविधान की, की गई व्याख्या अंतिम होगी ; सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा की गई व्याख्या अंतिम नहीं होगी :
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हम लोग भारत में एकमात्र समूह है जो इस बात पर विश्वास करते है कि --- हम भारत के नागरिकों द्वारा की गई भारत के संविधान की व्याख्या ही अंतिम होगी और सुप्रीम-कोर्ट के दो दर्जन जजो द्वारा संविधान की व्याख्या महत्वपूर्ण हो सकती है लेकिन अंतिम नहीं। हम इस बात पर सहमत है कि, सुप्रीम कोर्ट के जजों की व्याख्या मंत्रियों की व्याख्या से ऊपर है और यह नागरिकों के लिए वास्तव में महत्वपूर्ण है कि वे इस बात का ध्यान दें। लेकिन यह अंतिम नहीं है, स्वयं हमारे संविधान में इसकी प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारत एक लोकतंत्र और एक गणतन्त्र होगा जो स्पष्ट रूप से “नागरिक समीक्षा प्रणाली” का समर्थन करता है।

इस प्रणाली में यह उल्लेख है कि नागरिकों द्वारा संविधान की, की गई व्याख्या अंतिम है और यह न्यायिक पुनर्विचार से ऊपर है। यही कारण है की हम निचली अदालत से लेकर उच्चतम न्यायालय तक निर्णायक जूरी प्रणाली पर जोर दे रहे हैं और नागरिक समीक्षा प्रणाली की माँग करते हैं जिसमें नागरिक गण उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों द्वारा दिये गए निर्णयों की संवैधानिक वैधता पर हाँ / नहीं दर्ज कर सकते है। दूसरे शब्दों में, हम संवैधानिक लोकतंत्र पर विश्वास करते है।
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सभी मौजूद पार्टियों के सांसद और भारत के सभी प्रमुख बुद्धिजीवियों ने हमेशा नागरिक समीक्षा प्रणाली का विरोध किया है और निर्णायक 'जूरी' प्रणाली का भी विरोध किया है। उन्होंंने हमेशा जज सिस्टम का और न्यायधीश समीक्षा का समर्थन किया है। जबकि वर्तमान सभी पार्टियां और सभी बुद्धिजीवी इस बात पर जोर देते हैं कि‍ सुप्रीम-कोर्ट के दो दर्जन जजों द्वारा संविधान की, की गई व्याख्या अंतिम होगी और हम आम लोगों की व्याख्या बेकार की बात मानी जाएगी। सभी दल और बुद्धिजीवी इस बात पर जोर देते है कि, हम नागरिकों द्वारा की गई व्याख्या की अनदेखी की जानी चाहिए और सुप्रीम-कोर्ट के जजों द्वारा दिए फैसलों पर हमारी हॉं / नहीं की राय नहीं ली जानी चाहिए। और सभी बुद्धिजीवी इस बात पर जोर देते हैं कि सुप्रीम-कोर्ट द्वारा की गई व्याख्या आम लोगों पर मीडिया, शिक्षा और पुलिस और यदि जरूरत पड़ी तो सेना का प्रयोग करके निर्दयतापूर्वक और कठोरता से थोपी जानी चाहिए। दूसरे शब्दों में, वर्तमान सभी दल और बुद्धिजीवी संवैधानिक न्यायतांत्रिक फासीस्ट वाद पर विश्वास करते हैं।
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4) सरकारी अधिसूचनाओं, सरकारी आदेशों, अध्यादेशों के क़ानून-ड्राफ्ट जनता के समक्ष प्रस्तुत करना जो देश की समस्याओं का समाधान कर सकें :
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हम लोग भारत में पहले और एकमात्र समूह हैं जो उन सरकारी अधिसूचनाओ के प्रारूप / क़ानून-ड्राफ्ट दिखलाते हैं जिसकी हम मांग करते हैं। हम लोगों से यह नहीं कहते कि वे हम पर विश्वास करें। हम लोगों से यह अनुरोध करते हैं कि वे हमारी सरकारी अधिसूचनाओं को पढ़ें और खुद निर्णय करें कि क्या ये अधिसूचनाएं ऐसी नहीं हैं जिनका समर्थन किया जाना चाहिए। इस प्रकार से एक नागरिक मतदाता को यह निर्णय करने का पूर्ण अधिकार होगा कि उन्हें हमारा समर्थन करना चाहिए या विरोध। अन्य सभी समूह नीति बनाने के संबंध में वायदे तो करते है, लेकिन हर दल, सांसद और विधायक उस सरकारी आदेश के क़ानून-ड्राफ्ट प्रकाशित करने से मना कर देते है जो अपने वायदों को पूरा करने के लिए वे पारित कर सकेंगे। उनका उत्तर होता है,“पहले आप हमारे पक्ष में मतदान करें और तब हम मंत्री बनने के बाद आपको प्रारूप ( क़ानून-ड्राफ्ट ) दिखलाएंगे। 'अच्छा, प्रत्याशी महोदय, यदि क़ानून-ड्राफ्ट निरर्थक और हम आम जनता के लिए कल्याणकारी न निकला तो ? उत्तर फिर से यही है ,'मुझ पर भरोसा रखिए' !! हम लोग आपको ऐसे अस्पष्ट और घुमा फिरा कर उत्तर नहीं देते।
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5) 'राजनीतिक संस्कृति' की झूठी कहानी / मिथक के संबंध में :
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भारत की समस्याए कानून के उन खराब ड्राफ्टों के कारण है जिन्हें बुद्धिजीवियों और दूसरी पार्टियों के सांसदों ने लागू करवाया है। हम आम लोगों की संस्कृंति में कुछ भी गलत नहीं है। प्रमुख बुद्धिजीवियों ने राजनैतिक संस्कृति की एक झूठी कहानी का दुष्प्रचार किया है। और वे दावा करते हैं कि भारत की समस्याएं हम आम भारतीयों की इस संस्कृति के कारण है, न कि उन गलत कानूनों के कारण जिनका वे समर्थन करते है।
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6) सभी पार्टियों को चुनाव जीतना है, घूस वसूलना है ; हमे केवल उन कानूनों को लागू करवाना है जिनकी हम मांग करते है :
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हमारा पहला लक्ष्य कुछ सरकारी अधिसूचनाओं को लागू करवाना है, चुनावों में जीत हासिल करना नहीं। हम केवल इसलिए चुनाव लड़ते हैं कि हम उन सरकारी आदेशों और कानूनों का प्रचार कर सकें जिनकी हम मांग करते है, और जिनको लागू करवाने का हम वायदा करते है। हम इस बात पर जोर नहीं देते कि मतदाता गण हमें वोट दें – हम सिर्फ इस बात पर जोर देते हैं कि जनता अपने मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री, विधायकों और सांसदों पर दबाव डालें कि वे उन कानूनों को लागू करवाएं जिनका प्रस्ताव हम कर रहे है। और हम जनता से हमें वोट देने के लिए केवल तभी कहते हैं जब वे इस बात से संतुष्ट हों कि अन्य दलों के नेता इन सरकारी आदेशों पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। अन्य सभी पार्टियों का मुख्य लक्ष्य चुनाव जीतना मात्र है और वे प्रशासन में कोई बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है।
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7) कोर्ट में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद में कमी लाने के संबंध में :
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हम लोग एकमात्र समूह हैं जो न्यायालयो में भाई-भतीजावाद के खिलाफ बोलते हैं। अन्य सभी समूहों के नेतागण और बुद्धिजीवी कोर्ट में भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने वाले कानूनों ( जैसे साक्षात्कार प्रणाली और जज प्रणाली ) का समर्थन करके न्यायालयो में भाई-भतीजावाद का समर्थन करते है।
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8) आम जनता के लिए सम्मान के संबंध में :
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आम जनता का हम पूरा–पूरा सम्मान करते है, और इस बात पर जोर देते है कि कानूनी और प्रशासनिक मुद्दों पर जनता की हां / नहीं को दर्ज किया जाना चाहिए और इसे महत्व दिया जाना चाहिए। भारत के सभी दलों के नेताओं और बुद्धिजीवियों के पास हम आम जनता के लिए अपमान के सिवाय और कुछ भी नहीं है। वे हम आम लोगों को 'अपरिपक्व' समझते है ( पढे : मुर्ख, मंदबुद्धि आदि ) । और इसलिए वे इस बात पर जोर देते हैं कि कानूनों, निर्णयों, नियुक्तियों आदि पर हम आम लोगों के हां / नहीं को दर्ज तक नहीं किया जाना चाहिए, महत्व देने की बात तो भूल ही जाइए।
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9) दान के संबंध में :
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हम दान एवं चंदो के खिलाफ है। हमारा मानना है कि कार्यकर्ता हमें समय दें और वे फोटोकॉपी कराने, समाचारपत्र के विज्ञापनों आदि पर खर्च कर सकते है, लेकिन उन्हें दल के नेताओं के पास पैसा बिलकुल नहीं भेजना चाहिए। सभी पार्टियां कार्यकर्ताओं को दान / चन्दा जमा करने के लिए कहती है। और दान देने वाले दान देकर केवल इन पार्टियों को बरबाद ही कर रहे हैं और भारत के राजनैतिक परिदृष्य को और बिगाड़ रहे है।
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10) लगभग 100-120 और अंतर
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और लगभग 120 अंतर है। इतने अधिक अंतर ? हां। इतने अधिक और इससे भी कहीं ज्यादा । हमने प्रशासन में सुधार लाने के लिए लगभग 120 से अधिक सरकारी अधिसूचनाओं का प्रस्ताव किया , और भारत की वर्तमान सभी पार्टियों और सभी बुद्धिजीवियों ने इनमें से प्रत्येक अधिसूचना का विरोध किया है। और इस प्रकार 'नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' समूह और भारत की अन्य सभी पार्टियों के सांसदों तथा सभी बुद्धिजीवियों के बीच लगभग 120 अंतर है।
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11) सभी दलों के स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं के प्रति दृष्टिकोण
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मैं और राईट टू रिकॉल ग्रुप के अन्य सभी स्वंयंसेवक किसी पार्टी के कार्यकर्ताओं, गैर सरकारी संगठनों से कभी नहीं कहते कि वे अपनी पार्टी / गैर सरकारी संगठन को छोड़ दें। बल्किं हम उनसे आग्रह करते है कि 'क्या आप अपने नेताओं को उनके चुनाव घोषणा पत्र में प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री, प्रजा अधीन – मुख्यमंत्री, प्रजा अधीन – उच्चतम न्यायलय के न्यायधीश आदि क़ानून-ड्राफ्ट शामिल करने के लिए कह सकते है ? हमारा लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं को प्रभावित करने, उनके दल के चुनाव घोषणा पत्र में राइट टू रिकॉल ,जनता की आवाज - पारदर्शी शिकायत प्रणाली आदि प्रारूप शामिल करवाकर उन्हें राइट टू रिकॉल ग्रुप के प्रतिरूप / क्लोन में बदलने का है। जबकि सभी वर्तमान पार्टियों के नेतागण कार्यकर्ताओं से दूसरी पार्टियां छोड़ने और उनकी अपनी पार्टी में आ जाने के लिए कहते है।
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(11.2) प्रचार के तरीकों में सबसे महत्वपूर्ण अंतर
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कम से कम 50 या उससे अधिक अंतर मौजूद है। ऊपर उल्लिखित 11वां अंतर, तरीको के साथ-साथ उद्देश्य में मूलभूत अंतर को दर्शाता है। सभी वर्तमान दलों के नेता कार्यकर्ताओं से हमेशा कहते है कि वे दूसरे दलों को छोड़ दें और उनकी अपनी पार्टी में आ जाएं। क्योंकि ये नेता सत्ता के केन्द्र बनना चाहते हैं। जबकि मैं और राइट टू रिकॉल ग्रुप के मेरे अन्य स्वयंसेवी कार्यकर्ता किसी भी पार्टी, गैर सरकारी संगठन के कार्यकर्ताओं को उनकी पार्टियां, गैर सरकारी संगठन छोड़ने को नहीं कहते। इसके बदले हम उनसे अनुरोध करते है “क्या आप अपने नेताओं को मना सकते है कि वे प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री, प्रजा अधीन – मुख्यमंत्री, प्रजा अधीन–उच्चतम न्यायलय के न्यायधीश आदि क़ानून-ड्राफ्ट अपने चुनाव घोषणा पत्र में शामिल कर लें"?
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और मैं खुले आम इस बात पर जोर देता हूं कि मुझे ज्यादा खुशी होगी यदि कार्यकर्ता एक और अलग से प्रतियोगी राइट टू रिकॉल ग्रुप का गठन करें अथवा अपने नेताओं पर दबाव डालना जारी रखें कि वे 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली', राइट टू रिकॉल, नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी ड्राफ्टों को अपने संगंठन के ऐजेंडे में शामिल करें !!
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क्यों ? क्यों मैं किसी आर.टी.आर कार्यकर्ता को एक प्रतियोगी प्रजा अधीन राजा पार्टी का गठन करने के लिए कहता हूँ ? अथवा मैं उनसे यह क्यों कहता हूँ कि, वे राइट टू रिकॉल ड्राफ्टों को अपने संगठन के एजेंडे में शामिल करें ?
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क्योंकि जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली ड्राफ्टों के लिए केवल एक राइट टू रिकॉल ग्रुप द्वारा प्रचार करने के बदले मैं इस बात को ज्यादा पसंद करूंगा कि 1000 राइट टू रिकॉल ग्रुप हों और उनमें से प्रत्येक 'नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी‍' क़ानून-ड्राफ्ट , राइट टू रिकॉल क़ानून-ड्राफ्ट आदि की मांग करे। अब यदि 1000 राइट टू रिकॉल ग्रुप, राइट टू रिकॉल ड्राफ्टों की मांग करते है, और राइट टू रिकॉल ड्राफ्टों के लिए एक अत्यधिक प्रतियोगी राजनीति प्रारंभ कर देते है, तब सभी राइट टू रिकॉल ग्रुप वोटों के बटवारे के चलते चुनाव हार सकते है लेकिन राइट टू रिकॉल क़ानून-ड्राफ्ट के बारे में जानकारी भारत के नागरिकों मे अधिक से अधिक लोगों के बीच फैलेगी।

साथ ही यदि 1000 संगठन राइट टू रिकॉल क़ानून-ड्राफ्ट की मांग कर रहे हों तो विरोधियों के लिए राइट टू रिकॉल क़ानून-ड्राफ्ट की मांग को ठुकराना ज्यादा कठिन होगा। जैसा कि मैं कई बार कह चुका हूँ कि मेरा लक्ष्य चुनाव जीतना नहीं है ----- मेरा लक्ष्य 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली', राइट टू रिकॉल ड्राफ्टों को पारित करवाना है। और इसलिए 1000 राइट टू रिकॉल ग्रुप और संगठन जिनमें से प्रत्येक राइट टू रिकॉल क़ानून-ड्राफ्ट की मांग कर रहा हो, तो वह ज्यादा बेहतर काम करेगा न कि केवल एक राइट टू रिकॉल ग्रुप। और इसलिए मुझे खुशी होगी जब एक सच्चा कार्यकर्ता मेरे समूह का सदस्य न बने लेकिन वह एक और राइट टू रिकॉल ग्रुप गठित करे अथवा अपने संगठन के ऐजेंडे में राइट टू रिकॉल के ड्राफ्टों को शामिल करवाने की कोशिश करे।
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(11.3) प्रस्तावित कानूनों के क़ानून-ड्राफ्ट का महत्व
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मेरा मानना है कि प्रत्येक ईमानदार उम्मीदवार और प्रत्येक ईमानदार राजनैतिक पार्टी को उन सभी सरकारी अधिसूचनाओं और विधानों की घोषणा अवश्य करनी चाहिए जो वे भारत की वर्तमान मौजूदा समस्याओं के समाधान के लिए लागू करवाने का इरादा रखते है। हम लोग यह भी मानते हैं कि प्रत्येक नागरिक को उम्मीदवार से कानूनों के उन प्रारूपों की मांग अवश्य करनी चाहिए जिन्हें पारित कराने का इरादा वह उम्मीदवार रखता है । बिना क़ानून-ड्राफ्ट के प्रस्तावित परिवर्तन देखने में तो सुंदर लगते हैं लेकिन वे उपयोगिता की दृष्टी से बेकार हैं ।
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चुनाव के बाद नागरिक चुनाव घोषणा-पत्र के विवरण , वायदों आदि को कलेक्टर के कार्यालय अथवा कोर्ट में नहीं ले जा सकते और इनमें लिखी गई नीतियों के लाभ की मांग भी नहीं कर सकते । सरकारी कार्यालयों और कोर्ट के भीतर जिस बात का महत्व है, वह सरकारी अधिसूचनाओं का क़ानून-ड्राफ्ट है जिस पर लिखी गई सामग्री पर मंत्रियों ने हस्ताक्षर किया है । यही कारण है कि हमने उन सरकारी अधिसूचनाओं के ड्राफ्टों को पूरा महत्व दिया है जिस पर हस्ताक्षर करवाने की हमारी योजना है । इसीलिए हम राजनीतिक बयानों को जरा भी महत्व नहीं देते, बल्कि क़ानून ड्राफ्ट्स को ही वादो का आधार मानते है।

सरकार में लाखों कर्मचारी होते हैं | उन कर्मचारियों को आदेश या प्रारूप देना होता है, केवल ये कहना पर्याप्त नहीं है कि 'भ्रष्टाचार कम करो' | कोई भी प्रस्ताव उतना ही अच्छा या बुरा है जितना कि उसका क़ानून-ड्राफ्ट , इसीलिए हम कार्यकर्ताओं को कहते हैं कि क़ानून-ड्राफ्ट पर ध्यान केंद्रित करें जिनसे भ्रष्टाचार ,गरीबी आदि देश की ज्वलंत समस्याओं का हल हो सकता है |
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(11.4) भारत के अधिकतर बुद्धिजीवी विशिष्ट वर्ग के एजेंट हैं :
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भारत के बुद्धिजीवी जो समाचार पत्र ,पाठ्यपुस्तकों में लिखते हैं विशिष्ट / उच्च वर्ग के कारिंदे हैं | और इन बुद्धिजीवीयों ने अपने समाचार पत्र के स्तंभों और पाठ्यपुस्तकों द्वारा आज के शिक्षित युवा के दिमाग में इतना जहर भर दिया है , कि अब एक औसत शिक्षित व्यक्ति भी जनसाधारण-विरोधी हो गया है | जितनी अधिक शिक्षा उसके पास है, उतनी अधिक संभावनाएं हैं कि वो उतना अधिक समय उन्हें पढने में लगाता है जो रद्दी ये बुद्धिजीवी लिखते हैं, और उतनी ही अधिक संभावनाएं हैं कि वो ज्यादा जनसाधारण-विरोधी है |
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बुद्धिजीवी लिखते हैं कि भारत का आम आदमी एक बदमिजाज ,सरफिरा ,एक जातिवादी, एक सांप्रदायिक व्यक्ति है, उसमे कोई राष्ट्रिय चरित्र नहीं है ,उसके कोई नैतिक मूल्य नहीं हैं , वह एक चोर और एक बदमाश व्यक्ति है, और वह यौन रूप कुंठित भी है आदि आदि | और शिक्षित लोग ये सब उटपटांग अपनी पाठ्यपुस्तकों और समाचार पत्र स्तंभों में पढ़ते है , और हमेशा के लिए जनसाधारण-विरोधी हो जाते हैं |

एक शिक्षित व्यक्ति को बदलाव के लिए क्या करना चाहिए --- वो एक व्यसन / बुरी आदत चिन्हित करे जो जज, बुद्धिजीवी ,शिक्षित ,मंत्रियों , बाबुओं (भारतीय प्रशासनिक सेवक) ,पुलिस अफसरों आदि में समान हो | सभी जज क़ानून की डिग्री प्राप्त किये हुए होते हैं और 95% से अधिक पूरी तरह से भाई-भतीजेवाद से ग्रसित होते है | सभी पुलिस अफसर (भारतीय पुलिस सेवा) उच्च शिक्षित होते हैं और उनमें से 95% से अधिक हर साल एक करोड़ से अधिक बनाते हैं | इसके बावजूद, ‘जनसाधारण बुरा और विशिष्ट वर्ग अच्छा है’ के कोरस चलते रहते हैं |
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असल में अधिकतर प्रसिद्ध बुद्धिजीवी विशिष्ट वर्ग के प्रतिनिधि हैं | वे इसी तरह प्रसिद्ध बनते हैं --- पहले वे नेता / विशिष्ट वर्ग के वफादार समर्थक बनते हैं और फिर विशिष्ट वर्ग उन पर धन खर्च करता हैं या उनको प्रसिद्ध बनाने के लिए अपनी शक्ति का उपयोग करता हैं | उच्च वर्ग के लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया जैसे जूरी प्रथा, रिकाल आदि प्रक्रियाएं नहीं चाहते और इसीलिए उन्होंने अपने पालतू बुद्धिजीवियों को "जूरी प्रणाली एवं रिकॉल भारत का पतन करेंगे’ ऐसा कहने को कहा है, ताकि जन साधारण के दिमाग में भय डाला जा सके | विद्यार्थियों और पाठकों के मन में भय कैसे पैदा होगा ? सरल है --- भारत के जनसाधारण लोगों को अनियमित ,असभ्य ,हिंसक, सांप्रदायिक, जातिवादी और मूर्ख के रूप में प्रस्तुत करो | इसीलिए पाठ्यपुस्तके , समाचार पत्र स्तंभ निरंतर भारत के जनसाधारण को नीचा दिखाते हैं, और शायद ही कभी इस बात का जिक्र करते हैं कि बाबू ,भारतीय पुलिस सेवक, बुद्धिजीवी आदि भारत के आम नागरिक की तुलना में कहीं अधिक बुरे हैं |
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शिक्षा व्यक्ति को जनसाधारण को नफरत नहीं सिखाती --- वास्तव में यदि कोई इस बात से सूचित है कि कैसे भारतीय न्यायालय , रिजर्व बैंक , पुलिस आदि काम करते हैं तो वह जान जाएगा कि कैसे उच्च वर्ग के लोग, बाबू , जज आदि जनसाधारण को लूटते हैं और वो जनसाधारण के लिए दया महसूस करेगा | ये तथाकथित निरक्षरता इसीलिए है क्योंकि बुद्धिजीवी जनसाधारण को अनपढ़ रखना चाहते हैं ताकि वे आसानी से दबाये और पीटे जा सके | इसीलिए बुद्धिजीवी उन प्रक्रियाओ का विरोध करते हैं जिससे हम जनसाधारण जिला शिक्षा अधिकारी को बदल सकें या बदलने से रोक सकें, क्योंकि ऐसी प्रक्रिया ऐसा जिला शिक्षा अधिकारी लाएगी जो जनसाधारण को शिक्षित करने में रूचि रखता हो |
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अंग्रेजी पाठ्यक्रम ने हमेशा ये सूचित किया था कि भारतीय जनसाधारण निम्न है और उसे "शासित" करने की आवश्यकता है, ताकि भारतीय जनसाधारण को सभ्य किया जा सके | और वर्तमान बुद्धिजीवी भी अपने समाचार पत्र स्तंभ और पाठ्य्पुस्तिकाओ में यही सलाह देते हैं | लेकिन मैं अंग्रेजों को वर्त्तमान स्थिति के लिए दोष नहीं दूँगा | वर्त्तमान बुद्धिजीवी विद्यार्थियों के मन में जनसाधारण-विरोधी दृष्टिकोण पैदा कर रहे हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि विद्यार्थी लोकतांत्रिक सोच के बनें , असल में वे विद्यार्थियों को अल्पजन-तंत्र (कुछ ही लोगो द्वारा निर्णय लेंना) का समर्थक बनाना चाहते हैं |
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ना केवल विचार ,यहाँ तक कि समाचार-पत्र के लेख और पाठ्य पुस्तको के माध्यम से जानकारियाँ भी नियंत्रित की जाती है ताकि जन साधारण को वास्तविक सूचनाये नही मिले और वे सेना विरोधी बने रहे। उदहारण के लिए, मैं बहुत से पढ़े लिखे व्यक्तियों से मिलता हूँ और उनसे पूछता हूँ --- चीन और भारत के परमाणु शक्ति अनुपात के बारें में, जो कि 100:1 है, उच्चतम विस्फोटक परीक्षण के मामले में, जो कि 20:1 है, परमाणु हथियार के मामले में और कुल विस्फोटक शक्ति के मामले में जो कि 100:1 है | उत्तर तो क्या उनके पास इसका कोई सुराग भी नहीं होता | वे वही रट्टा लगाते हैं जो मीडिया और संचार माध्यम कहते हैं -- "न्यूनतम विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता" हमारे पास है !! लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि सबसे बड़े बम का जो हमने परिक्षण किया है, वह 45 किलो टन का है, जबकि चीन ने 4200 किलो टन के बम का परिक्षण किया है !! उन्हें ये इसलिए नहीं पता क्योंकि उन्हें मीडिया वालों ने कभी बताया नहीं | और मीडिया वालों ने इसीलिए उन्हें नहीं बताया क्योंकि उच्चवर्ग के लोगों को शांति-समर्थक, सेना-विरोधी नागरिक चाहिए। लेकिन चीन / भारत के परमाणु शक्ति के बारे में ये सूचना देने से उनका झुकाव सेना को सशक्त बनाने की और होगा | इसीलिए ये महत्त्वपूर्ण और मूल्यवान जानकारी सार्वजनिक स्थानों से हटा दी जाती है |
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(11.5) समीक्षा प्रश्न

1. हमारे राइट टू रिकॉल ग्रुप के दृष्टिकोण से संविधान की, किसके द्वारा की गई व्याख्या अंतिम है ? बुद्धिजीवियों के विचार में संविधान की किसके द्वारा की गई व्याख्या अंतिम है ?
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2. क्या बुद्धिजीवी लोग खनिजों को हम आम लोगों की संपत्ति समझते हैं ? क्या बुद्धिजीवी लोग भारत सरकार के प्लॉटों जैसे दिल्ली हवाई अड्डे और आई आई एम ए प्लॉट को हम आम लोगों की संपत्ति समझते हैं ?
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3. क्या राइट टू रिकॉल ग्रुप “राजनैतिक संस्कृति” के सिद्धांत में विश्वास करता है ?
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(11.6) अभ्यास

1. कृपया राष्ट्रीय पहचान-पत्र प्रणाली लागू कराने के लिए भारतीय संसद में शौरी और अन्य. बी जे पी सांसदों या किसी अन्य सांसद द्वारा प्रस्तुत किए गए कानूनों के क़ानून-ड्राफ्ट प्राप्त करें।

2. कृपया उच्चतम न्यायलय, उच्च न्यायलय और लोअर कोर्ट में भाई –भतीजावाद को कम करने के लिए सीपीएम, बीजेपी, कांग्रेस आदि द्वारा संसद में प्रस्तावित किए गए कानूनों के क़ानून-ड्राफ्ट प्राप्त करें।

3. कृपया प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, विधायकों, सांसदों आदि के रिकॉल के संबंध में कांग्रेस, बीजेपी और सीपीएम के सांसदों द्वारा संसद में प्रस्तावित कानूनों के ड्रॉफ्ट प्राप्त करें।

4. कृपया प्रधानमंत्री, मुख्य्मंत्रियों, विधायकों, सांसदों आदि के रिकॉल के संबंध में जय प्रकाश नारायण द्वारा संसद में प्रस्तावित कानूनों के ड्रॉफ्ट प्राप्त करें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 06 2017 10:49:01 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भाग - 1 ; संघ का शीर्ष नेतृत्व हमेशा से ही इस्लाम का छद्म विरोधी, ईसाइयत का प्रबल समर्थक और हिन्दू हितो के प्रति उदासीन रहा है।
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( यह लेख दो वर्ष पूर्व 2015 में लिखा गया था। फेसबुक मानकों के तहत न होने से इसे फेसबुक ने साल भर पहले इनविजिबल कर दिया था। असुरक्षित लिंक्स को हटाकर तथा दो भागो में विभाजित करके इसे re post किया जा रहा है। इस पोस्ट के अगले भाग का लिंक निचे दिया गया है। )
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भूमिका ---- लेख भारत की सबसे गंभीर समस्याओं जैसे सेना का लगातार कमजोर होना, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों/मिशनरीज़ का भारतीय राजनेतिक व्यवस्था में बढ़ता नियंत्रण, हिन्दू धर्म का लगातार सिकुड़ना, मिशनरीज़ द्वारा किये जा रहे धर्मान्तर, गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, महंगाई, शिक्षा, चिकित्सा आदि के समाधान के बारे में है। लेख में उन तथ्यों तथा तर्कों का समावेश है कि किस तरह राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ नामक छद्म हिन्दूवादी संगठन का शीर्ष नेतृत्व लाखो स्वयंसेवको तथा करोड़ो नागरिको को भ्रमित करके भारत में मिशनरीज़ के एजेंडे पर कार्य कर रहा है।
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हमारा एजेंडा भारत की सेना को अमेरिका के बराबर ताकतवर बनाना है, इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमने कई कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किये है। लेख में उठायी गयी समस्याओ के समाधान के लिए हमारे द्वारा प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट्स के लिंक भी दर्ज किये गए है, पाठको से अपेक्षा है कि इन क़ानून ड्राफ्ट्स को पढ़े तथा सहमत होने पर समर्थन देवें। यदि आपके पास इनसे बेहतर क़ानून ड्राफ्ट है, तो हमें उपलब्ध करवाएं, हम उनका भी प्रचार करेंगे।
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भारत की सबसे बड़ी समस्या सेना का कमज़ोर होना है। किसी भी देश की संप्रभुता सेना पर निर्भर करती है। युद्ध एक सतत प्रक्रिया है और शान्ति काल सिर्फ आगामी युद्ध के लिए विश्रांति है। जिस व्यक्ति / संस्था / संगठन / देश के पास संपत्ति तो होगी लेकिन उस संपत्ति की सुरक्षा करने का बूता नही होगा, उसे शक्तिशाली के आक्रमणों का सामना करना पड़ेगा, यह अनुभूत एतिहासिक तथ्य है। सेना मजबूत करने के लिए हमें स्वदेशी आधुनिक हथियारो का उत्पादन करना जरुरी है।
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गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार आदि समस्याओं का निवारण तथा पुलिस प्रशासन, अदालतों को चुस्त बनाए बिना सेना को मजबूत बनाना सम्भव नही है, अत: हम इन सभी समस्याओ के समाधान के लिए भी कानूनी ड्राफ्ट्स प्रस्तावित कर रहे है, जबकि संघ उन सभी कानूनों का विरोध कर रहा है, जिन क़ानूनो का सम्बन्ध भारत की सेना को मजबूत करने तथा धर्मान्तर रोकने से है।
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लेख के अंतिम भाग में बताया गया है कि कैसे हम आम नागरिक किसी सरकार /नेता / पार्टी या संगठन के भरोसे बैठे न रह कर स्वयं देश की सभी समस्याओं के समाधान के अच्छे कानूनों को भारत में लागू करवा सकते है।
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अध्याय -1
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ज्यादातर बीजेपी कार्यकर्ता और आरएसएस के स्वयंसेवक अपना अधिकांश सोशल मिडिया पर मुस्लिम विरोधी सामग्रियों का प्रचार करने में, तथा बचा हुआ वक्त नेहरु खानदान की जड़े खोदने में खपा दे रहे है। ऐसा करके उन्हें लगता है कि वे हिंदुत्व को मजबूत बना रहे है, जबकि संघ के इस एजेंडे पर कार्य करके वो अनजाने में हिंदुत्व और राष्ट्र को गंभीर क्षति पहुंचा रहे है।
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असल में भारत के वास्तविक दुश्मन मिशनरीज़ और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां है। अमेरिका / ब्रिटेन / नेटो इनका प्रतिनिधित्व करते है। आज मिशनरीज़ के पास आधुनिक हथियार है, डॉलर है, तथा पूरे विश्व में ईसाइयत फैलाने का मिशन है। यदि हमने स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देकर व्यापार घाटे को कम नही किया तो हमारी हालत साउथ कोरिया जैसी हो जायेगी या हथियारों के अभाव में ईराक जैसी।
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1) साउथ कोरिया में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने प्रवेश किया था, तब कोरिया में ईसाइयत 3-4% थी । 90 के दशक में कोरिया दिवालिया हुआ और उनकी राष्ट्रीय संपत्तियां MNCs/मिशनरीज़ के हाथो में चली गयी। आज साऊथ कोरिया में ईसाई जनसँख्या का प्रतिशत 30% है ।

2) ईराक में तेल के कुँए लूटने के लिए 2004 में जब अमेरिका ने आक्रमण किया तो ईराक में ईसाई जनसँख्या 5% थी, जो अगले दस वर्ष में बढ़कर 15% हो गयी।
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सऊदी अरब, कोरिया, इंडोनेशिया, ब्राजील, थाईलेंड, जिम्बाब्वे, ग्रीस के बाद अब 120 करोड़ की आबादी का हमारा देश मिशनरीज़ के लिए सबसे आसान और बड़ा शिकार है। जहाँ लूटने के लिए खनिज और धर्मान्तर के लिए करोड़ो "गरीब और हथियार विहीन नागरिक" है।
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मिशनरीज़ किसी भी देश में धर्मान्तर करने के लिए FDI और सेना का इस्तेमाल करती है। FDI के माध्यम से अर्थवय्वस्था को नियंत्रित किया जाता है, और कमाए गए मुनाफे में से कुछ हिस्सा CSR के जरिये मिशनरीज़ प्राप्त करती है। इसी कोष से मिशनरीज़ सूदूर इलाको में स्कूल, अस्पताल और चर्च के माध्यम से धर्मान्तर करती है।
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लेकिन स्थानीय धर्म की रक्षा के प्रति जागरूक कार्यकर्ताओं का ध्यान बंटाने के लिए उन्हें ऐसे संगठन की जरुरत होती है, जो ऐसा भ्रम खड़ा किये रहे कि अमुक संगठन स्थानीय धर्म की रक्षा के प्रति समर्पित है।

किसी संगठन द्वारा ऐसा भ्रम कैसे खड़ा किया जा सकता है ?
अन्य प्रतिस्पर्धी स्थानीय धर्म ( इस्लाम ) का "छद्म" विरोध करके कार्यकर्ताओं का ध्यान बंटाइये।
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इसके लिए संघ के नेता लगातार इस्लाम विरोधी भड़काऊ बयान देते है, तथा इनकी सोशल मिडिया सेल 24×7 ऐसे पोस्ट्स की रचना करती है, जिनमें मुस्लिमों का विरोध "दृष्टिगोचर" होता है। संघ के समर्थक इस लुगदी साहित्य को चाव से पढ़ते, सुनते है और इन्हें फैलाने में लगे रहते है। इस पूरी कवायद में मुस्लिम धर्म के स्वास्थ्य पर कमोबेश कोई फर्क आये न आये हिन्दू धर्म लगातार कमजोर होता जा रहा है, जिससे भारत में मिशनरीज़ लगातार अपनी स्थिति मजबूत कर रहे है। जहाँ तक इस्लाम का प्रश्न है संघ उन सभी कानूनो का भी विरोध करता है जिनसे भारत में बढ़ते जा रहे ईस्लाम के गैर वाजिब प्रभाव को कम किया जा सकेl
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इसे फिर से पढ़िए --- "जहाँ तक इस्लाम का प्रश्न है संघ उन सभी कानूनो का भी विरोध करता है जिनसे भारत में बढ़ते जा रहे ईस्लाम के गैर वाजिब प्रभाव को कम किया जा सके l"
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ईसाइयत को बढ़ावा देने, ईस्लाम का "सांकेतिक" विरोध करने और हिन्दू धर्म और राष्ट्र को कमजोर बनाने के लिए के लिए मोदी-अंधभक्त और स्वयंसेवक यह सब अनजाने में जबकि संघ का शीर्ष नेतृत्व ऐसा जानबूझ कर कर रहा है।
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नीचे दिए कुछ उदाहरणों से इसे समझा जा सकता है।
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1. धार्मिक और भाषायी आंकड़े
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2011 की जनगणना के सभी आंकड़े 2012 तक उपलब्ध हो चुके थे, लेकिन सोनिया गांधी ने धर्म और भाषा के आंकड़ो को दबा दिया तथा अन्य सभी आंकड़े जारी कर दिए। मोदी साहेब 2014 तक इन आंकड़ो पर चुप्पी साधे बैठे रहे तथा संघ ने भूले से भी कभी इन आंकड़ो को जारी करने की मांग नही की। यह आश्चर्य का विषय है कि जो संगठन हिन्दू हितो का राग अलाप कर सत्ता में पहुंचा उसके लिए इस बात का कोई महत्त्व नही है कि पिछले दशक में हिन्दू जन्संख्याँ में कितनी गिरावट आई है। अब जबकि सत्ता में आये 1 वर्ष बीत चुका है, मोदी साहेब सोनिया बन गए है और आंकड़ो को दबा के बैठे है।
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पूर्वोत्तर में 1991 से 2001 के बीच धार्मिक जनसँख्या वृद्धि दर* का प्रतिशत इस प्रकार था।
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*वृद्धि दर : मान लीजिये कि किसी क्षेत्र में हिन्दू आबादी 1 करोड़ तथा मुस्लिम आबादी भी 1 करोड़ थी, जो कि 10 वर्ष में बढ़कर 110 करोड़ तथा 125 हो गयी, तो कहा जाएगा कि जनसँख्या वृद्धि दर क्रमश: 10% तथा 25% रही।
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1. असम : हिन्दू 15%, मुस्लिम 29%, ईसाई 33%
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2. अरुणाचल प्रदेश : हिन्दू 18%, मुस्लिम 73%, ईसाई 130%
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3. नागालेंड : हिन्दू 25%, मुस्लिम 69%, ईसाई 69%
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4. मणिपुर : हिन्दू (-)5%, मुस्लिम 43%, ईसाई 36%,
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5. मिजोरम : हिन्दू (-)9%, मुस्लिम 122%, ईसाई 31%
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6. मेघालय : हिन्दू 18%, मुस्लिम 61%, ईसाई 42%
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7. त्रिपुरा : हिन्दू 15%, मुस्लिम 29%, ईसाई 142%
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इस समय मिशनरीज़ पूर्वोत्तर इलाके में सक्रीय है, अत: ईसाई वृद्धि दर धर्मान्तर की द्योतक है। चूंकि इस्लाम के पास धर्मान्तर के लिए स्कूल, अस्पताल, दवाइयां तथा पेड मिडिया उपलब्ध नही है, अत: मुस्लिम आबादी में अनपेक्षित बढ़ोत्तरी "बांग्लादेशी घुसपेठ" को दर्शाती है।
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1991 से 2001 तक भारत में बीजेपी, कोंग्रेस, जनता दल और संयुक्त मोर्चे की सरकारे रही । 2001 से 2011 तक की धार्मिक जनसँख्या के आंकड़े अब तक प्रकाशित नही हुए है, तथा इन आंकड़ो को दबाने में संघ सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। चूंकि मोदी साहेब भी अन्य राजनेतिक दलों की तरह एक सियासी दल के मुखिया है, अत: उनसे ऐसा कदम उठाने की उम्मीद करना नादानी है, जो कदम मिशनरीज़ को नुक्सान पहुंचाता हो।
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मूल विषय यह है कि पीएम बदलने से यह धर्मान्तर रुकने वाला नही है, जब तक कि हम सरकारी स्कूलों, अस्पतालों को दुरुस्त करने और गरीबी को कम करने के लिए आवश्यक कानूनों को गेजेट में प्रकाशित नही करे।
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संघ ने न तो आज तक इन आंकड़ो को जारी करने की मांग की, न ही अपने स्वयं सेवको को इस बारे में सूचना दी। संघ की तरफ से मामला रफा दफा है।
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2. गणित विज्ञान
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बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपनी तकनीक के बल पर पूरी दुनिया में कारोबार करती है। यदि किसी देश में गणित-विज्ञान का आधार मजबूत होगा, तो वह देश आने वाले समय में तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर लेगा, फलस्वरूप विदेशी कम्पनियों के व्यापार के अवसर सिकुड़ जायेंगे। अत: ये कम्पनियां विकासशील और पिछड़े हुए देशो में 8 वीं क्लास तक फेल न करने का क़ानून चाहती है, ताकि बच्चे 8 क्लास तक गणित विज्ञान न पढ़े। जाहिर है ये बच्चे हमेशा के लिए गणित विज्ञान को समझने में असफल रहेंगे। यही क़ानून मिशनरीज को भी फायदा देता है। सरकारी स्कूल तबाह होने से पिछड़े इलाको में गरीब तबके के पास मिशनरीज़ स्कूल में जाने के सिवा कोई चारा नहीं बचता, अत: धर्मान्तर के अवसर बढ़ जाते है। गणित विज्ञान का आधार टूटने का दुष्प्रभाव आप फिलिपिन्स में देख सकते है। आज फिलिपिन्स पूरी तरह से ईसाई देश है, तथा उत्पादन के नाम पर वे सिर्फ सनसिल्क शेम्पू ही बनाते है।
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आप इस समय जो यह लेख पढ़ रहे है, इसके लिखने से लेकर पढने तक सब कुछ विज्ञान और गणित के कारण सम्भव हुआ है। आपके फोन, कम्पूटर से लेकर एप्लीकेशन तक सब कुछ विज्ञान-गणित की देन है। हम गणित-विज्ञान में पिछड़ गए इसलिए आपके हाथ में इस समय फोन, कम्पूटर से लेकर एप्लीकेशन तक सब कुछ विदेशी है, और इसिलिये हम हथियार निर्माण में पिछड़ कर परजीवी बने हुए है।
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लेकिन संघ की "शिक्षा नीति" इतिहास और संस्कृति के पुनर्लेखन से शुरू होकर उसी पर ख़त्म हो जाती है। आप संघियो से इस बात पर जी भर कर बहस करा लीजिये कि अकबर महान थे या महाराणा प्रताप, इतिहास में बाबर को प्रमुखता से पढ़ाया जाना चाहिए या पृथ्वीराज चौहान को, किन्तु संघ ने आज तक कभी सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए कभी कोई क़ानून प्रस्तावित नही किया। क्योंकि ऐसा करने से सरकारी स्कूलों का स्तर बेहतर होगा, जिससे गरीबी कम होगी और मिशनरीज़ के लिए धर्मान्तर के अवसर सिकुड़ जायेंगे। अत: सरकारी स्कूलों को बदहाल बनाए रखने के लिए संघ पाठ्यक्रम पर बहस छेड़ बाबर, अकबर, प्रताप और चौहान के इर्द गिर्द घूमता रहता है, और लाखो स्वयंसेवको को भी घुमाता रहता है, इससे सरकारी स्कूलों का ढांचा बदतर होता जाता है मिशनरीज़ को धर्मान्तर में सहायता मिलती है।
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जहाँ तक मोदी सरकार की बात है, मोदी साहेब सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को तोड़ने के लिए मनमोहन से भी तेजी से कार्य कर रहे है। हाल ही में उन्होंने वसुंधरा और आनंदी बेन को सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को एनजीओ के हवाले करने के आदेश दिए है, तथा 8 वीं क्लास तक फेल न करने के क़ानून को हटाने से साफ़ इनकार कर दिया है। उल्लेखनीय है कि RTE के तहत आने वाले सभी स्कूलों में 8 वीं क्लास तक फ़ैल नही किया जा सकता अत: वहां शिक्षा का स्तर गिरता जाएगा, जबकि मिशनरीज़ स्कूल इस योजना से बाहर है अत: उनका स्तर सुधरेगा। वक़्त गुजरने के साथ मिशनरीज स्कूल में छात्रों की संख्या बढती जायेगी, और शिक्षा के एजेंडो को मिशनरीज़ नियंत्रित करेंगे।
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3. चिकित्सा
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जिस तरह सरकारी स्कूलों में आबाबिले मंडराती है, वही स्थिति सरकारी अस्पतालों की है। सरकारी अस्पतालों का ढांचा गिरता जा रहा है और इसकी जगह निजी अस्पताल ले रहे है। जहाँ आपको बदहजमी या अपच की भी शिकायत हो तो डॉक्टर 3 तरह की खून जांच, एक्स रे और सोनोग्राफी लिख देता है। गरीब आदमी के लिए चिकित्सा महँगी वस्तु हो चुकी है। इससे गरीबी फैलती है और मिशनिरिज़ को धर्मान्तर में सहायता मिलती है।
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संघ समर्थित वाजपेयी सरकार ने पेटेंट का क़ानून पास किया जिससे दवाइयों के दाम आसमान छू गए, लेकिन संघ इस क़ानून पर चुप्पी साधे रहा। क्योंकि ये क़ानून बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और मिशनरीज़ को सहायता पहुंचाता है।
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संघ ने आज तक कभी भी देश के सरकारी अस्पतालों को सुधारने के लिए कभी कोई क़ानून प्रस्तावित नही किये, जिससे इलाज महंगा होता जा रहा है और मिशनरीज़ को बढ़त मिल रही है।
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4. मिडिया
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जयेंद्र सरस्वती जी , नित्यानंद जी , आसाराम जी बापू तथा और भी ऐसे कई संतो पर आरोप लगने के बाद मिशनरीज़ संचालित मिडिया ने इन पर जी भर कर कीचड़ उछाला। कौन दोषी है कौन निर्दोष इसका फैसला अदालते करती है, लेकिन इनकी गैर जरुरी मिडिया ट्रायल की गयी तथा हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाया गया । इसी तरह PK, OMG तथा सिंघम-2 जैसे फिल्मो में हिन्दू धर्म, मंदिर, दान, संतो आदि का फूहड़ ढंग से चित्रण किया गया । सभी स्वयंसेवक 24×7 घंटे यह पोपाट मचाते रहते है कि मिडिया बिकाऊ है, लेकिन संघ ने कभी भी मीडिया को दुरुस्त करने के लिए आवश्यक कानूनों पर मुँह नही खोला। संघ की नीति है कि -- मीडिया बिकाऊ है, और इसे ईमानदार बनाने की सबसे अच्छी नीति यह है कि इसे गालियाँ दो। गालियाँ देने से भड़ास तो निकल जाती है लेकिन समस्या का समाधान नहीं आता।
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संघ ने अपने स्वयंसेवको को यह जानकारी नही दी कि मिडिया इसलिए बिकाऊ है, क्योंकि वाजपेयी ने इसे मिशनरीज़ और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बेच दिया था। और तब संघ ने इसका समर्थन किया था । मिडिया में FDI की अनुमति देने से मिडिया हमारे नियंत्रण से बाहर चला गया और आज स्थिति हमारे सामने है।
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संघ ने भारतीय मिडिया को स्वतंत्र बनाने के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए।
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इससे पहले कि मैं अन्य मसलो पर संघ की नीति स्पष्ट करूँ, पहले एक महत्त्वपूर्ण जानकारी रखना चाहता हूँ, जिससे ज्यादातर नागरिक अनभिग्य है। इस जानकारी के अभाव में आप स्थिति की गंभीरता को समझने में नाकाम रहेंगे।
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देश को क़ानून चलाते है, अत: व्यवस्था में किसी भी प्रकार का बदलाव लाने के लिए हमें क़ानून में बदलाव लाना पड़ेगा। यदि क़ानून अच्छे होंगे तो व्यवस्था अच्छी तरह से कार्य करेगी, यदि क़ानून बुरे होंगे तो व्यवस्था बुरे तरीके से कार्य करेगी । किसी भी तरह का बदलाव लाने के लिए सबसे जरुरी वस्तु प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट है। यदि कोई व्यक्ति / नेता /संगठन किसी समस्या के समाधान या बदलाव की बात कर रहा है, किन्तु वह समाधान के लिए ड्राफ्ट देने से इनकार करता है, मतलब वह व्यक्ति / नेता / संगठन मक्कार है, धूर्त है, बदमाश है और धोखेबाज भी है। असल में उसकी रुचि सिर्फ समस्या को उभाड़ कर वोट खींचने या कार्यकर्ताओं को अपने संगठन से चिपकाए रखने में, या माइलेज यानि फुटेज हासिल करने में है, समाधान में नही।
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उदाहरण के लिए कई संघठन देश में आरक्षण को ख़त्म करने के लिए मुहीम चला रहे है, लेकिन उनसे जब आप पूछते है कि "आरक्षण कानूनन लागू है, अत: आरक्षण हटाने के लिए कौनसा नया क़ानून लाने का आप प्रस्ताव कर रहे है ? तो उनका मुहं घोड़े जैसा लटक जाता है। उन्हें यह बात समझ ही नहीं आती कि आरक्षण हटाना है तो इसे हटाने के लिए क़ानून बनाना पड़ेगा। लाल किले पर जाकर "हटा दो" बोलने से ये नहीं हट जाता !!
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पर वे आरक्षण को नारे लगा कर हटाना चाहते है, जो कि सम्भव नही है। इसी तरह मिडिया बिकाऊ है बिकाऊ है, सरकारी स्कूल बेकार है बेकार है, जैसे जुमलो की मुहीम से न तो स्वतंत्र मिडिया की स्थापना हो सकती है, न ही स्कूलों का स्तर सुधर सकता है। इसलिए इस बात को समझना सबसे जरुरी है कि जहाँ भी कोई समस्या है, उसके समाधान के लिए हमें एक प्रस्तावित क़ानून की आवश्यकता है। क़ानून अच्छे या बुरे हो सकते है, लेकिन क़ानून विहीन विमर्श टाइम पास करने के सिवा कुछ नही है। और विभिन्न राजनैतिक दल ध्यान बंटाने के लिए जनता का टाइम पास जान बूझकर करते है।
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5. बांग्लादेशी घुसपेठ
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वाजपेयी ने बांग्ला देशी घुसपेठियो को खदेड़ने का वादा किया था, लेकिन सत्ता में आकर पलट गए, तब संघ ने इस विषय पर 5 साला चुप्पी साध ली। मनमोहन सरकार आने के साथ ही संघ फिर से गीत गाने लगा कि, 'देखो बांग्लादेशी भारत में घुसे जा रहे है, इन्हें कोंग्रेस नहीं रोक रही'। चुनाव प्रचार में मोदी साहेब ने बंगाल में मंच से चेतावनी दी कि, '16 मई को बांग्लादेशियो को जाना पड़ेगा' । जैसा की जुमलो, भासणो और नारों से कभी कोई बदलाव नही आता अत: एक भी बांग्लादेशी घुसपेठिया वापिस बंगाल नही गया। सत्ता में आकर अब संघ फिर से इस मुद्दे पर चुप्पी साध के बैठा है।
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2001 में आडवाणी ने गृहमंत्री रहते हुए संसद में अनुमान व्यक्त किया था कि इस समय लगभग 1 करोड़ अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिये भारत में मौजूद है, जिनकी संख्या अब तक बढ़कर 2 करोड़ होने का अनुमान है l युद्ध के दौरान यदि चीन या पाक यदि इन्हे हथियार पहुंचा देता है, तो पूर्वोत्तर के हथियार विहीन नागरिक गाजर मूली की तरह कट जाएंगे और उन्हें जान बचाने के लिए मध्य भारत की और भागना पड़ेगा l पूर्वोत्तर हमारे हाथ से निकल जाएगा, क्योंकि हम इस प्रकार के नागरिक विद्रोह के लिए तैयार नहीं हैl
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घुसपेठियो को खदेड़ने के लिए पहले हमें उनकी पहचान करनी पड़ेगी, जिसके लिए नेशनल आई डी सिस्टम का क़ानून चाहिए। क्योकि ये दो करोड़ घुसपेठिये पूरे देश में बिखरे हुए है, जिनके पास वोटर आई डी से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक सब कुछ है। केवल जाओ कहने से ये चले जाने वाले होते तो भारत में घुसते भी नहीं थे।
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संघ ने पिछले 25 वर्ष में बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित नही किया।
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6. मंदिर
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भारत के समृद्ध मंदिरों ( खासकर दक्षिण भारत ) को आने वाले विपुल दान का इस्तेमाल मिशनरीज धर्मान्तर में करती है। इसके लिए पहले मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में ले लिया जाता है, तथा मंदिरों के कोष का बटवारा विभिन्न धार्मिक संगठनों तथा कल्याणकारी ट्रस्टो को सेवा करने के लिए दे दिया जाता है। ये अधिकतर ट्रस्ट छद्म नाम से मिशनरीज़ द्वारा संचालित है, अत: मंदिरों के कोष का उपयोग मिशनरीज धर्मान्तर में कर पाती है। 2009 के अपने मेनिफेस्टो में बीजेपी ने वादा किया था कि वे यदि सत्ता में आये तो मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करेंगे, लेकिन 2014 में मोदी साहेब ने इस वादे को अपने मेनिफेस्टो से निकाल दिया। संघ ने खामोशी बरती।
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संघ ने 2012 में मंदिरों के स्वर्ण भंडारों को हडपने के मनमोहन-चिदंबरम-सोनिया के फैसले का सांकेतिक प्रतिरोध किया, किन्तु जब मोदी साहेब ने सत्ता में आकर तिरुपति से 2 टन सोना खींच लिया तब संघ ने उन्हें मौन समर्थन दिया। मोदी साहेब अब अन्य मंदिरों का सोना खींचने के लिए गोल्ड बांड ले आये है, तथा संघ इस फैसले का समर्थन कर रहा है।
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मोदी साहेब ने 'देवालय से पहले शौचालय' के बयान दिए, परेश रावल ने 'हिन्दू मंदिर सबसे गंदे पूजा स्थल है' कहा, आनंदी बेन ने ' मंदिरों को दान न देने' की अपील जारी कि ताकि मंदिरों में आने वाले दान के ढाँचे को तोडा जा सके लेकिन संघ खामोश रहा।
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संघ ने मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिए कभी कोई क़ानून प्रस्तावित नही किया।
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7. न्यायालय
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भारत की अदालतों में 3 करोड़ केस लटके हुए है, तथा हमारी सुस्त अदालतें पूरी तरह से भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार से ग्रस्त है। अदालतों में दशको तक फैसले न आने से उत्पादन इकाइयों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा मुकदमो की चपेट में आने वाले कारखाने लंबित न्याय के कारण बंद हो जाते है। नेताओं ने अदालतों से गठजोड़ बना रखे है, अत: दशको तक आरोपी नेता और जज तारीख पर तारीख खेलते रहते है, जिससे दबंग, भ्रष्ट, निरंकुश और बेईमान नेताओं को शीर्ष पदो पर टिके रहने का अवसर मिलता है। जहाँ तक धनिक वर्ग की बात है, तो उनके पास न्याय खरीदने या मुकदमे को घसीटने के लिए जजों को देने के लिए पर्याप्त पैसा है।
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किसी भी देश के सभी क़ानून रद्दी हो जाते है, यदि उन कानूनों को तोड़ने पर सजा दशको बाद दी जाए। हमारी उच्च तथा उच्चतम न्यायलयो में मिशनरीज़ और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की गहरी घुसपेठ होने से ऐसे फैसले दिए जाते है, जिससे हमारी निर्माण इकाइयों की कमर टूटे, अर्थव्यवस्था गर्त में जाए और हम विदेशी कम्पनियों पर निर्भर बने रहे।
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कैसे भारत की अदालतों को चुस्त और स्वतंत्र बनाया जा सकता है, इस सम्बन्ध में संघ ने आज तक न अपना कभी मुहं खोला है, न ही कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। इस मामले में पूछने पर संघ शून्य में ताकने लगता है।
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8. स्वदेशी
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भारत की दुसरे नंबर की यह सबसे बड़ी समस्या है, जिससे हम जूझ रहे है। यदि हमने इस समस्या को हल नही किया, तो हम निश्चित रूप से शांतिपूर्ण गुलामी और दिवालियेपन की और बढ़ रहे है।
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चूंकि हमारी अदालतों में सालो तक फैसले नही आते, गणित और विज्ञान की शिक्षा को हम शून्य स्तर तक तोड़ चुके है, जमीन की कीमते आसमान छू रही है, वैट, सेल्स टेक्स, एक्साइज तथा प्रदुषण विभाग जैसे दर्जनों विभाग स्थानीय इकाइयों से पैसा खींच रहे है, अत: हमारी स्वदेशी इकाइयां धड़ाधड़ बंद हो रही है, आयात बढ़ता जा रहा है, निर्यात गिर रहा है और विदेशी मुद्रा का क़र्ज़ लगातार बढ़ रहा है।
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संघ अपने स्वयंसेवको से पिछले 25 साल से यह बात छुपाता आ रहा है कि, जिन विदेशी कम्पनियों को हमने व्यापार करने के लिए बुलाया है, उनके द्वारा कमाए गए मुनाफे के बदले जब हमें डॉलर्स का भुगतान करना होगा तो हम दिवालिये हो जायेंगे। हमें अपने खनिज, प्राकृतिक संसाधन और राष्ट्रीय संपत्तियां बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सौंपनी पड़ेगी और पूरा देश नीलाम हो जाएगा।
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तब पूरी आर्थिक, राजनेतिक व्यवस्था पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्ज़ा होगा, और मिशनरीज़ भारत में बड़े पैमाने पर धर्मान्तर कर सकेंगे, जैसा कि उन्होंने दक्षिण कोरिया में किया।
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मिशनरीज की रीढ़ MNCs (FDI) को रोकने के लिए संघ ने कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए। बल्कि अब संघ ने एफडीआई को विकास से जोड़ दिया है !!
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9. भुखमरी और खनन क्षेत्र में भ्रष्टाचार
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देश में व्याप्त सबसे बड़ा भ्रष्टाचार खनन क्षेत्र में है, तथा इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा काले धन का कारोबार होता है। खनिज राष्ट्र की संपत्ति है तथा इसके मालिक हम नागरिक है। यह देश तथा इसके प्राकृतिक संसाधन हमें विरासत में मिले है, अत: खनन से प्राप्त रोयल्टी पर देश के करोड़ो नागरिको का हक है। सरकार हमारी सेवक है, और देश चलाने के लिए हम उसकी नियुक्ति करते है । सरकारों को अपने खर्चे टेक्स से निकालने चाहिए, न कि खनिजो से प्राप्त रोयल्टी से।
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देश की संपत्ति जो भी है, वह प्राकृतिक संसाधन और खनिज है, अत:हमारा प्रस्ताव है कि खनन से प्राप्त रोयल्टी नागरिको के खाते में भेजी जानी चाहिए। इससे नागरिको को उनका हक मिलने लगेगा, जिससे भुखमरी, नक्सलवाद, खनिजो की लूट और भ्रष्टाचार ख़त्म होगा और धर्मान्तर में कमी आएगी।
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संघ ने इस समस्या के समाधान के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए।
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10. सेना
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यह भारत की सबसे बड़ी समस्या नही बल्कि सबसे बड़ा खतरा है, जिसका सामना हम कर रहे है। यदि हमने भारतीय सेना को अमेरिका के बराबर मजबूत नही बनाया तो हमारी आजादी सिर्फ एक युद्ध की गुलाम है। जिस दिन युद्ध हुआ उसी दिन हम ख़त्म।
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यह दुराशा सिर्फ स्वयंसेवको को कल्पित लग सकती है, क्योंकि संघ ने उन्हें यह जानकारी कभी नही दी कि सेना से मतलब हथियार होता है न कि वर्दीधारी रंगरूट। और आयातित हथियारों से उस देश से लड़ाई नही की जा सकती जो देश हमें हथियार निर्यात कर रहा है। यदि हम पर चीन हमला करता है, तो हम सिर्फ तब तक लड़ सकते है जब तक अमेरिका हमे हथियार देता है, चाहे अमेरिका हमसे 10 गुना दाम ही क्यों न वसूल करे। लेकिन यदि अमेरिका खुद हमला कर देता है या पाकिस्तान को अपने हथियार देता है, तो हम किसके हथियारों से लड़ेंगे। यदि ऐसा हुआ तो भारत के हालात ईराक जैसे हो जायेंगे और पूरा भारत ही ईसा हो जाएगा।
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संघ ने भारत की सेना को मजबूत करने के लिए, आधुनिक हथियारों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए और हथियार बंद नागरिक समाज की रचना के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए।
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मैंने ये 10 मुख्य बिन्दु रखे है, जिन्हें विस्तारित करके 100 तक किया जा सकता है। जैसे 2G, कोल ब्लोक घोटालो को रोकने के लिए नागरिको की ज्यूरी द्वारा पब्लिक में नार्को टेस्ट, काले धन की रोकथाम के लिए मोरिशस रूट की समाप्ति, कृषि में रासायनिक खाद और GM फसलो पर बढती निर्भरता के कारण किसानो की आत्महत्या, कृषि क्षेत्र में लगातार दर्ज की जा रही गिरावट, आसमान छूती जमीनों की कीमते, जमीनों में काले धन का निवेश, नक्सल वाद की समस्या, खनिजो की बेतहाशा लूट, अन्यायिक रूप से जमीनों का अधिग्रहण आदि आदि।
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हालांकि संघ ने इन सभी समस्याओं के निस्तारण के लिए भी कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए है, लेकिन मैं अपने विषय को संघ के 'हिन्दुवाद' तक ही सिमित रखूँगा।
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अध्याय - 2
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स्तम्भ का यह भाग इस बारे में है कि किस तरह संघ का शीर्ष खुद के संगठन को बचाने और बढाते रहने के लिए मिशनरीज, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सहायता और हिंदुत्व को नुक्सान पहुचाता है। संघ का शीर्ष नेतृत्व ऐसा जानबूझकर करता आ रहा है, तथा आज भी कर रहा है।
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हमारे सरकारी स्कूलो, अस्पतालो का ढांचा टूट रहा है, गणित विज्ञान जीरो है, अदालते घोंघा चाल से सरक रही है, तकनीक और निर्माण में हम जमा हो चुके है, मोबाइल फोन तक हम आयात कर रहे है युद्धक टैंक और फाइटर प्लेन की तो बात ही छोड़ दीजिये, डॉलर का कर्ज बढ़ता जा रहा है, गरीबी, भुखमरी, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार शाश्वत समस्याएं है, सेना हथियारों के मामले में परजीवी है, हमारा मिडिया विदेशी चला रहे है, मतलब हम हर क्षेत्र में लगातार पिछड़ते जा रहे है, और इसे ढकने के लिए हम मेक इन इण्डिया के नाम से विदेशी कम्पनियों को बुला रहे है। जिनको बुलाना तो हमारे हाथ में है लेकिन भेजना हमारे हाथ में नहीं है।
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ऐसी स्थिति में देश के सबसे बड़े राजनेतिक संगठन की इन समस्याओं के समाधान में रूचि नही हो, ये बात समझ में नही आती। लेकिन तब संदेह गहरा जाता है, जब संघ इन समस्याओं के समाधान के कानूनों का विरोध करने लगे।
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या तो हम यह मान ले कि शिक्षा, चिकित्सा, सेना, अर्थव्यवस्था, स्वदेशी हथियारों का उत्पादन, अदालतें, तकनिकी विकास, घटता निर्यात बढ़ता आयात, भ्रष्टाचार, गरीबी, भुखमरी आदि समस्याएँ पोची समस्याएं है, किन्तु यदि इन मुद्दों का राष्ट्र की समृद्धि से सरोकार है, तो संघ इन समस्याओं के निराकरण पर खामोश ही नही है बल्कि विरोध भी कर रहा है।
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क्यों मैं संघ पर यह आरोप लगा रहा हूँ ?
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1. हम देश के सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पतालो की दशा सुधारने के लिए हमने क़ानून प्रस्तावित किया है -
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/821128631398666>;
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2. अमेरिका में किसी भी मुकदमे का फैसला 10 से 15 दिनों के भीतर आ जाता है, क्योंकि वहां दंड देने की शक्ति नागरिको की ज्यूरी के पास है। हम भारत की अदालतों को सुधारने के लिए ज्यूरी सिस्टम तथा बड़े स्तर के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अपराधी का सार्वजनिक रूप से नार्को टेस्ट करने की मांग कर रहे है, जिसका ड्राफ्ट इस लिंक पर देखा जा सकता है --
<https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1393197910798441>;
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( ज्यूरी सिस्टम में किसी भी मुक़दमे की सुनवाई के लिए मतदाता सूची में से रेंडमली 12 से 15 नागरिको को समन भेजे जाते है, इन नागरिको के समूह को ज्यूरी कहते है , मुकदमे की सुनवाई इन आम नागरिको द्वारा की जाती है और ये नागरिक ही मुक़दमे में फैसला देते है । हर मुक़दमे के लिए अलग अलग नागरिको की ज्यूरी होती है। ज्यूरी बहुमत से अपना फैसला जज को देती है और जज फैसले की व्याख्या करके जजमेंट दे देता है। हाईकोर्ट ज्यूरी में 50 - 60 जबकि केस विशेष में 1500 नागरिको तक की ज्यूरी सुनवाई कर सकती है ।जिनका चयन राज्य की मतदाता सूची से किया जाता है। मुलजिम को जानकारी नही होती कि लाखो नागरिको में से कौन उसके मुकदमे का फैसला करने वाला है। इस प्रकार भ्रष्टाचार शून्य हो जाता है तथा लाखो न्यायधीश होने से फैसलों का निपटारा त्वरित गति से होता है।)
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3. स्वदेशी इकाइयों को बचाने और महत्त्वपूर्ण क्षेत्रो में विदेशी कम्पनियों को व्यापार की अनुमति न देने के लिए हमने इस क़ानून का प्रस्ताव किया है :
<https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/548862728625259>;
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4. गरीबी कम करने और खनिजो की लूट रोकने के लिए हम प्रस्ताव कर रहे है कि खनन से प्राप्त रोयल्टी का दो तिहाई सीधे नागरिको के खाते में तथा एक तिहाई सेना के खाते में भेजा जाए। प्रस्तावित DDMRCM क़ानून का ड्राफ्ट :
<https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/529823220529210>;
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5. स्वतंत्र मिडिया की स्थापना के लिए हम राईट टू रिकाल दूरदर्शन अध्यक्ष के क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करने की मांग कर रहे है।
<https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/546885878822944>;
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इसके अलावा हमने बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने, मोरिशस रूट को समाप्त करने तथा हथियार बंद नागरिक समाज की रचना के लिए भी क़ानून प्रस्तावित किये है।

बांग्लादेशी घुसपेठियो को देश से बाहर खदेड़ने के लिए कानूनी ड्राफ्ट - <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/828952687282927>;
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जब हमने संघ को इन कानूनों का समर्थन करने को कहा तो संघ ने इन कानूनों का समर्थन करने से इनकार कर दिया !! किन्तु जब हमने संघ से इन समस्याओं के समाधान के लिए अपने कानूनी ड्राफ्ट देने के लिए कहा तो संघ ने अपने ड्राफ्ट देने से भी इनकार कर दिया !!! हो सकता है कि हमारे ड्राफ्ट बुरे हो इसलिए हमने संघ से अपने अच्छे ड्राफ्ट देने का जब बार बार आग्रह किया तो संघ ने किसी भी समस्या का कानूनी ड्राफ्ट देने से इनकार कर कर दिया। इस स्थिति में यह स्पष्ट होता है कि मिशनरीज, MNCs और संघ एक ही एजेंडे पर कार्य कर रहे है। चूंकि समस्या का समाधान सिर्फ क़ानून बना कर ही किया जा सकता है अत: मिशनरीज और MNCs कभी नही चाहती कि इन समस्याओं के निराकरण के लिए क़ानून बनाए जाए।
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संघ के इतिहास में झाँकने से संकेत मिलते है कि संघ हमेशा से ही मिशनरीज़ और MNCs के प्रति उदार ही नही बल्कि सहयोगात्मक भी रहा है।
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महात्मा भगत सिंह जी, आजाद, सान्याल, लाजपत राय आदि गरम दल के नेताओं को रोकने के लिए अंग्रेजो ने गांधी का इस्तेमाल किया था। गांधी एक टाइम वेस्टर था, जिसने अंग्रेजो के खिलाफ हिंसक आन्दोलन करने वाले युवाओं को चरखे चलाने, अनशन करने और भजन गाने जैसी फिजूल गतिविधियों में उलझा दिया। इस तरह गांधी अंग्रेजो के नुक्सान की अहिंसा के गीत गाकर कम कर रहे थे, वही दूसरी तरफ पेड मिडिया के माध्यम से अंग्रेज गांधी को भारत में मसीहा की तरह स्थापित कर रहे थे।
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जिस देश में अंग्रेजो की हुकूमत हो, उस देश में वही विचारधारा पनप सकती थी जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजो को लाभ पहुंचा रही हो। अत: गांधी, नेहरु, टैगोर, बिडला, बजाज, साराभाई और सिंधिया समेत वे सभी देशी राजा पनपे जो भीतर से अंग्रेजो को फायदा पहुंचा रहे थे।
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सावरकर, भगत, आजाद, लालाजी, सुखदेव, बटुकेश्वर, उधम सिंह और सुभाष बाबू जैसे सच्चे क्रांतिकारी महात्माओं को दमन का सामना करना पड़ा और अंग्रेजो ने इनमे से किसी को नही बख्शा।
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संघ के की स्थापना 1925 में हुयी और 1947 तक संघ के स्वयंसेवको की संख्या लगभग 8 लाख हो चुकी थी। किन्तु यह बात समझ से बाहर है कि क्यों कभी संघ को किसी प्रकार के दमन का सामना न करना पड़ा, कि क्यों संघ ने 1947 तक अंग्रेजो के खिलाफ कभी कोई आन्दोलन नही किया, कि क्यों ब्रिटिश हुकूमत में संघ फूलता फलता रहा।
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कोंग्रेस की तरह ही संघ को भी अंग्रेजो का मौन समर्थन हासिल था, क्योंकि दोनों ही संघठन कार्यकर्ताओं का टाइम फिजूल गतिविधियों में खपा कर अंग्रेजो को लाभ पहुंचा रहे थे।
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खिलाफत आन्दोलन को गांधी द्वारा समर्थन दिए जाने के कारण हिन्दुओ का गांधी से मोहभंग हुआ और हिन्दू महासभा की ताक़त बढ़ने लगी। हिन्दू महासभा को वीर सावरकर और मदन मोहन मालवीय का समर्थन था और ये हथियारों की मांग कर रहे थे। 1857 की क्रान्ति के बाद अन्य किसी सशस्त्र विद्रोह की आशंका को ख़त्म करने के लिए अंग्रेजो ने आर्म्स एक्ट लागू कर के भारतीय नागरिको के सभी हथियार जब्त कर लिए और हथियार रखने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। अंग्रेज जानते थे की 40 करोड़ की आबादी को 70 हजार अंग्रेज सिर्फ तब तक ही काबू में रख सकते है जब तक कि अवाम हथियार विहीन हो। संघ और गांधी दोनों ही भारतीयों को हथियार विहीन बनाने के अंग्रेजो के एजेंडे पर कार्य कर रहे थे l
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कोंग्रेस पर अंग्रेजो का नियंत्रण था, किन्तु महासभा अंग्रेजो को वास्तविक नुक्सान पहुंचाने के एजेंडे पर कार्य कर रही थी। महासभा के दमन से पहले हिंदूवादी कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट करने के लिए एक छद्म राष्ट्रवादी-हिंदूवादी संगठन की जरुरत थी जो कि खाली स्थान को भर सके। हेडगेवार महासभा में बंगाल प्रकोष्ठ के अध्यक्ष थे। अंग्रेजो ने देशी राजाओं को महासभा के बरअक्स एक संघठन खड़ा करने की अनुमति दी, जो कि महासभा के एजेंडे के खिलाफ कार्य करे।
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1925 में हेडगेवार ने संघ की स्थापना की।
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संघ ने महासभाईयों के एजेंडे के उस एजेंडे को पलट दिया जो अंग्रेजो को नुक्सान पहुंचा सकते थे। महासभा का स्पष्ट रूख 'हिन्दू' था अत: संघ ने इसकी जगह 'राष्ट्र' शब्द चुना। संघ सावरकर के हिन्दूवाद से सहमत नही था, अत: उसने इसे राष्ट्रवाद तक विस्तारित कर दिया। महासभा हथियारों की मांग कर रही थी, अत: संघ ने हथियारों की जगह अपने शस्त्र के रूप में लाठी को चुना। महासभा हिन्दुओ को राजनेतिक रूप से संघठित होकर चुनावों में उतरने का आवाहन कर रही थी, अत: संघ ने स्वयंसेवको को राजनीति से दूर रहने और सेवा कार्य करने का सन्देश दिया।
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संघ ने अंग्रेजो को भारत से खदेड़ने के लिए मुहीम चलाने की जगह अंग्रेजो का गांधीनुमा सांकेतिक प्रतिरोध किया और लाखों कार्यकर्ताओं को कम्बल बांटने, गायों को चारा खिलाने, खून इकट्ठा करने, भोजन बांटने, राष्ट्र भक्ति के गीत गाने, ड्रम शंख बजाने, हलके व्यायाम करने, पथ-संचलन करने आदि में व्यस्त कर दिया, बदले में अंग्रेजो ने संघ को फलने फूलने दिया।
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इस बात को समझने के लिए किसी विशेष बुद्धि की आवश्यकता नही है कि गजनी से लेकर बाबर और अंग्रेज भारत को जीतने में इसी कारण सफल रहे क्योंकि भारत के नागरिको के पास हथियार नही थे तथा भारत के पास आधुनिक हथियारों का अभाव था। यह एक मात्र कारण था जिस कारण भारत गुलाम बना। आखिरकार जब जंग होती है तो सिर्फ हथियार ही आपकी रक्षा करते है। लेकिन संघ का पिछले 90 वर्षो का इतिहास है कि न तो संघ ने भारत की सेना को मजबूत करने के लिए कभी कोई क़ानून प्रस्तावित किये न ही आम नागरिको को हथियार रखने देने की छूट का समर्थन किया।
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यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि, क्या संघ राष्ट्रविरोधी संगठन है ?
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मेरे विचार में संघ पर राष्ट्रविरोधी होने का सीधा आरोप लगाना न्यायपूर्ण नही है। किन्तु यह तथ्यात्मक रूप से सही है कि संघ हिन्दू तथा राष्ट्र हितो की जानबूझ कर अवहेलना कर रहा है । इसका एक मात्र निकटस्थ कारण जो मैं देखता हूँ, वह यह है कि --- "संघ ने राष्ट्रहित की तुलना में अपने अस्तित्व को बनाए रखना चुना है।"
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तब भी और अब भी
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दंड देने का अधिकार ( अदालतें ) और सेना अक्षय शक्ति की स्त्रोत है। गुलाम भारत में अंग्रेजो के पास सेना, अदालते, प्रशासन और पेड मिडिया था। अत: किसी भी संगठन की उत्तरजीविता अंग्रेजो से टकराव टालने पर ही निर्भर थी। यदि आप अंग्रेजो को नुक्सान नही पहुचाएंगे तो आपको भी नुक्सान नही होगा। संघ के शीर्ष नेतृत्व ने टकराव टालने को चुना। यदि आप टकराव मोल लेंगे तो आपको प्रतिरोध और दमन का सामना करना पड़ेगा, जिसमे जान-माल की क्षति होना स्वाभाविक है। आजादी के बाद भारत में काले अंग्रेजो की सरकार बनी, तथा संघ ने अगले कुछ दशको तक नेहरु-गांधी-कांग्रेस की सरकारों से टकराव टालते हुए शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में निवास किया। वाजपेयी सरकार के दौरान भी आज मोदी सरकार के शासन काल में भी संघ ने सरकार से टकराव टालने को चुना है।
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वस्तुत: तब भी और अब भी, मिशनरीज़ और MNCs से टकराव ठानने के लिए जिस साहस की आवश्यकता है, संघ का नेतृत्व उससे तब भी विहीन था और अब भी विहीन है।
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संघ की उत्तरजीविता इस पर निर्भर करती है कि वह मिशनरीज / MNCs, जो कि देश के वास्तविक दुशमन है, के क्रिया कलापों में टांग न अड़ाए। यहाँ टांग अड़ाने से आशय उन क़ानूनो का प्रचार करने, मांग करने और लागू करवाने के प्रयास करने से है, जिन कानूनों के लागू होने से हिन्दू धर्म और राष्ट्र वास्तविक अर्थो में मजबूत हो और मिशनरीज़ / MNCs की पकड़ भारत पर से कमजोर हो जाए। आज मिशनरीज़ के पास स्कूल्स है, अस्पताल है, बहुराष्ट्रीय कम्पनियां है, पेड मिडिया है, अदालतों, प्रशासन पर नियंत्रण है तथा भारत की सेना एवं अर्थव्यवस्था उन पर निर्भर है। अत: संघ इन मुद्दों को हल करने के कानूनों पर खामोश है, और नारो बयानो और भाषणों का गुल-गपाड़ा करने से ये मुद्दे कभी हल हो नही सकते,यह बात मिशनरीज़ और संघ का नेतृत्व दोनों अच्छे से जानते है।
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लेकिन इस बात से भी इनकार नही किया जा सकता कि संघ MNCs / मिशनरीज़ को नुकसान पहुंचाने वाली मुहीम को तोड़ने की गतिविधियों में लिप्त रहा है। इस संदर्भ में एक उदाहरण महात्मा राजिव दिक्षित जी का है।
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राजिव भाई ने 25 वर्षो तक निरंतर गाँव-गाँव शहर-शहर घूम कर विदेशी कम्पनियों के निवेश से आने वाली बर्बादी के बारे में लाखो नागरिको को परिचित करवाया। वे विदेशी कम्पनियों को रोकने के लिए जन-आन्दोलन खड़ा कर रहे थे। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को दिवालिया करने वाले मोरिशस रूट को केंसिल करने का केस हाईकोर्ट में जीत लिया था, जिससे विदेशी कम्पनियों द्वारा जारी लूट पर लगाम लगती।
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चूंकि राजिव भाई सच्चे अर्थो में विदेशी कम्पनियों को फायदा पहुंचाने वाले कानूनों को रद्द करवाने और विदेशीकम्पनियों की घुसपेठ को रोकने के लिए आवश्यक कानूनों की मांग कर रहे थे, अत: संघ ने उनकी मुवमेंट को तोड़ने और विदेशी कम्पनियों को सुरक्षित करने के लिए 'स्वदेशी जागरण मंच' की स्थापना की। स्वदेशी जागरण मंच ने पेड मिडिया और संघ के सहयोग से सभी स्वदेशी में मानने वाले कार्यकर्ताओं को खींच कर उनका इस्तेमाल वोट में किया। बीजेपी जब सत्ता में आयी तो स्वदेशी जागरण मंच के यशवंत सिन्हा वित्त मंत्री बने और उन्होंने अगले ही दिन हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सर्कुलर निकाल कर मोरिशस रूट के जारी रहने पर मुहर लगा दी। इतना ही नहीं उन्होंने सभी क्षेत्रो में विदेशी निवेश को अनुमति दिए जाने का समर्थन किया। स्वदेशी के नारे लगाने वाले करोड़ो अंध-भगत आज भी उसी संघ और बीजेपी से चिपके हुए है, जिन्होंने महात्मा राजीव दिक्षित जी की मूवमेंट तोड़ने की साज़िश रची थी।
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जिन कार्यकर्ताओं ने राजिव भाई के व्याख्यान नहीं सुने है, वे यदि 1992 से 1998 तक के राजिव भाई के व्याख्यान सुने तो पायेंगे कि राजिव भाई ने गांधी परिवार को जितना एक्सपोज़ किया उतना बीजेपी और संघ मिलकर आज तक भी नही कर पाए है, उन्ही खुलासो से सम्बंधित तथ्यों और चित्रों के आधार पर इमेजेज़ और पोस्ट बना बना कर संघ और बीजेपी की सोशल मिडिया सेल ने फेसबुक / वाट्स एप को गाँधी खानदान विरोधी सामग्री से पाट रखा है। संघ इन खुलासो पर 40 साल चुप्पी साधे रहा, तथा जब राजिव भाई ने इन्हें प्रकाशित कर दिया तब संघ और बीजेपी ने इनका राजनेतिक इस्तेमाल करके सत्ता हासिल की। संघ के स्वयंसेवक और मोदी साहेब के अंध-भगत देश के कानूनों को सुधारने की जगह आज भी इन 20 साल पुराने खुलासो को जन जन तक फैलाने में लगे हुए है !!
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यह स्तम्भ संघ के बारे में है, अत: मैं मोदी साहेब को इसमें शरीक नही करूँगा। लेकिन एक कैफियत उनके बारे में यह देनी वाजिब है, कि इन मसलो की निस्बत मोदी साहेब को उतना दोषी नही ठहराया जा सकता। जिस प्रकार कोई परचून का व्यापारी यह मिसाल पेश करे कि उसने लोगो के राशन की फ़िक्र को हल करने के लिए यह कारोबार शुरू किया है न कि मुनाफा कमाने के लिए, तो आप तो आप उसे गंभीरता से नहीं लेंगे, उसी तरह सियासी दलों की बुनियाद हुकूमत हासिल करने और उसे कब्जाए रखने पर टिकी होती है, न कि मुल्क को बचाने के लिए। बहरहाल मोदी साहेब भी एक सियासी दल की नुमाइंदगी करते है और उनसे अपवाद होने की उम्मीद करके हम उंनके साथ ज़्यादती कर रहे है।
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सरकारे / नेता हमेशा से सत्तावादी रहे है, और इसी से उनका वजूद है, लेकिन कार्यकर्ताओं और राष्ट्रवादी समूहों का यह फ़र्ज़ है कि वे जन दबाव द्वारा सरकारों को ऐसे क़ानून लागू करने पर मजबूर करे जिनसे देश की सेना और अर्थव्यवस्था मजबूत हो। मोदी साहेब कल सत्ता में नही थे और कल रहेंगे भी नही, कल मनमोहन थे आज नही है, सरकारे और नेता आने जाने के लिए ही है, किन्तु नागरिक संगठन लगातार मौजूद रहते है, सरकारों पर दबाव डाल कर सही दिशा में बनाए रखने के लिए। और यही पर देश का सबसे बड़ा देशभक्त स्वयंसेवको का संगठन देश को बचाने की जगह खुद को बढाने में लगा हुआ है, जो कि 120 करोड़ नागरिको के भविष्य के लिए घातक साबित होगा।
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अध्याय - 3
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यह भाग इस बारे में है कि संघ किस तरह अपने प्रिय मुद्दों को हल करने की जगह उनका इस्तेमाल अपनी राजनैतिक ताकत बढाने और सत्ता हासिल करने में करता है।

अगला भाग पढ़ने के लिए यह लिंक क्लिक करें - <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1408735749244657>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 06 2017 10:50:55 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भाग - 2 ; संघ का शीर्ष नेतृत्व हमेशा से ही इस्लाम का छद्म विरोधी, ईसाइयत का प्रबल समर्थक और हिन्दू हितो के प्रति उदासीन रहा है।
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( यह लेख दो वर्ष पूर्व 2015 में लिखा गया था। फेसबुक मानकों के तहत न होने से इसे फेसबुक ने साल भर पहले इनविजिबल कर दिया था। असुरक्षित लिंक्स को हटाकर तथा दो भागो में विभाजित करके इसे re post किया जा रहा है। इस पोस्ट के पहला भाग का लिंक - )
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अध्याय - 3
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यह भाग इस बारे में है कि संघ किस तरह अपने प्रिय मुद्दों को हल करने की जगह उनका इस्तेमाल अपनी राजनैतिक ताकत बढाने और सत्ता हासिल करने में करता है।
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मेरे विचार में भारत की कमजोर होती सेना और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का हमारी अर्थव्यवस्था, प्रशासन और राजनैतिक व्यवस्था पर बढ़ता नियंत्रण सबसे गंभीर मुद्दे है। किन्तु यह कहा जा सकता है कि यह मेरा एजेंडा हो सकता है, संघ का नही। इसलिए मैं इस भाग में संघ के उन मुद्दों पर चर्चा करूँगा, जो मुद्दे संघ का अस्तित्व है।
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संघ का गायवाद
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चूंकि पुलिस प्रशासन राज्यों के अधीन है, अत: केन्द्रीय स्तर पर बनाया गया कोई भी क़ानून गौ-हत्या रोकने में सक्षम नही है। 1966 के गौ-आन्दोलन के बाद पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों को छोडकर, समय के साथ सभी राज्यों में धीरे धीरे गौ-हत्या निषेध बिल पास हुए। तो पहली बात तो यह है कि पूर्वोत्तर को छोड़कर सभी राज्यों में गौ-हत्या पहले से निषेध है, लेकिन दूसरी बात यह है कि चूंकि क़ानून बेहद कमजोर और लचीले है, अत: गौ-हत्या जारी है। अब यदि हमें गौ-हत्या रोकनी है तो वर्तमान क़ानूनो की जगह राज्यों में नए मजबूत क़ानून लाने होंगे।
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संघ से जब मैंने सम्पर्क करके कहा कि मैं भारत में गौ-हत्या निषेध करने का समर्थन करता हूँ तथा आपके इस कार्य में सहयोग करना चाहता हूँ, अत: आप मुझे आपका गौ-हत्या निषेध करने का कानूनी ड्राफ्ट दीजिये, ताकि मैं नागरिको में इस क़ानून का प्रचार कर सकूं। तो संघियों ने मुझसे कहा कि हमने ऐसा कोई क़ानून प्रस्तावित नही किया है। तब मैंने उन्हें यह क़ानून दिखाया :
www.facebook.com/pawan.jury/posts/822256167892621
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संघ ने कहा कि हम इस क़ानून का समर्थन नहीं करते। संघ ने न तो मुझे कोई कानूनी ड्राफ्ट दिया न ही मेरे ड्राफ्ट को समर्थन दिया।
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पड़ताल करने पर अनाधिकृत जानकारी मिली कि मोहन भागवत ने बीजेपी शासित सभी मुख्यमंत्रियों को गौ-हत्या निषेध के लिए कठोर क़ानून पास न करने के निर्देश दे रखे है। बीजेपी की इस विरोधाभासी नीति को एक्सपोज़ करने के लिए जब कोंग्रेस के विधायक आकिल आसिफ ने एमपी विधानसभा में गौ-हत्या निषेध बिल पेश किया तो, भागवत ने शिवराज सिंह से कह कर इस बिल को विधान सभा में गिरवा दिया। तारीख थी, 13 जुलाई 2014.
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यह इत्तिफाक है कि देश की सभी गौ-शालाएं संघ और उसके आनुषांगिक संगठनो द्वारा संचालित है, और उनमे करोडो का दान आता है, किन्तु उनकी गणना तथा पंजीयन की कोई व्यवस्था नही है। इत्तेफाक है कि, जब मोदी साहेब ने 2002 में गुजरात की सत्ता संभाली तब मीट का उत्पादन 9 लाख मीट्रिक टन था जो 2012 में बढ़कर 22 लाख मीट्रिक टन हो गया, इत्तिफाक से मनोहर पर्रीकर बैलो की कटवाई को कानूनी बनाए जाने के लिए हाईकोर्ट में केस लड़ रहे है, इत्तिफाक है कि दान से गायो के पलने के कारण गौ-मांस 170 रू किलो में उपलब्ध है जबकि मटन और चिकन के लिए 400 रू चुकाने पड़ते है। इत्तिफाक से मोदी साहेब ने कत्लखानो को दी जा रही सब्सिडी को जारी रखा है, तथा कटवाई में काम आने वाली मशीनों का आयात शुल्क 4% घटा दिया है। ये सुपर पिंक रिवोलुशन है।
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आरएसएस और उसके स्वयंसेवक सोशल मिडिया पर गाय बचाने के नारे लगा कर गौ-हत्या निषेध करना चाहते है। क़ानून बनाने मैं उनकी रुचि नही है। रुचि क्यों नही है, इसे ऊपर दिए विवरण से समझने में कोई कठिनाई नही होनी चाहिए। बहरहाल गाय वोट और नोट का मुनाफा देंने वाला कारोबार है, और इस धंधे को कोंग्रेस और आम आदमी पार्टी नियंत्रित नही करती।
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"मंदिरों का प्रशासन सुधारने के लिए क़ानून बनाने की जगह जिस तरह आनंदी बेन ने अपील जारी की कि, 'कृपया मंदिरों को दान न दे', उसी तर्ज पर गौ-शालाओं का प्रबंधन सुधारने की जगह यदि कल भागवत ऐसी अपील जारी नही करते है कि, 'गौ-शालाओ को दान न दे', तो इसका कारण हितो का टकराव है।"
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संघ का मंदिर वाद
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राम मंदिर मुद्दा जबकि 1949 से ही कोर्ट में लंबित है, 1990 में संघ ने कहा कि हमें वोट देने से हम संसद में मंदिर निर्माण के लिए क़ानून बना देंगे। वाजपेयी के सत्ता में आने पर बहुमत नहीं होने का हवाला दिया गया। अब बहुमत आने पर राज्यसभा में बहुमत नही होने का हवाला दिया जा रहा है। इस सम्बन्ध में राजनाथ का कहना है कि राज्यसभा में बहुमत नही है, शाह कहते है कि 370 सीट चाहिए, संघ कहता है कि अव्वल तो मामला अदालत में है दुसरे बीजेपी को मंदिर बनाने के लिए वक़्त दिया जाना चाहिए, जबकि बीजेपी के केन्द्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने राम मंदिर समर्थको को जोकर साबित करने के लिए यह कह दिया कि अयोध्या में राम मंदिर बन चुका है।
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हमने संघ के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि देश के करोड़ो नागरिक अयोध्या में राम-मंदिर बनाना चाहते है तो हम नेताओं और राज्यसभा में बहुमत के भरोसे क्यों बैठे है ? जबकि संविधान के अनुसार किसी भी विषय पर जनमत संग्रह द्वारा क़ानून बनाया जा सकता है।
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हमने उन्हें तीन लाइन के क़ानून के बारे में बताया
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[कलेक्टर के लिए निर्देश ]
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1) यदि कोई मतदाता कलेक्टर कार्यालय में उपस्थित होकर कोई शपथपत्र प्रस्तुत करता है, तो कलेक्टर 20 रू प्रति पेज की दर से शुल्क लेकर उस शपथपत्र को प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डाल देगा।
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[पटवारी के लिए निर्देश]
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2) यदि कोई मतदाता पटवारी कार्यालय में जाकर ऐसे किसी शपथपत्र पर हाँ या ना दर्ज करता है, तो पटवारी उसे दर्ज करेगा और प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डाल देगा।
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[सभी के लिए निर्देश]
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3) यदि देश के कुल मतदाताओं के 51% मतदाता किसी शपथपत्र पर हाँ दर्ज कर देते है, तो प्रधानमन्त्री ऐसे शपथ पत्र पर कार्यवाही कर सकते है।
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पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें - <https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/529823220529210>;
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यदि इन तीन लाइनों को गेजेट में छाप दिया जाता है, तो अगले ही दिन संघ/ विहिप या कोई भी नागरिक राम मंदिर निर्माण का प्रस्ताव धारा एक के तहत पीएम की वेबसाईट पर दर्ज कर देगा, और धारा दो का उपयोग करके करोड़ो नागरिक इस प्रस्ताव पर हाँ दर्ज कर सकेंगे ।इस तरह जनता के समर्थन से राम मंदिर ही नही, बल्कि मथुरा में कृष्ण तथा काशी में विश्वनाथ मंदिर के निर्माण के प्रस्ताव को भी जनता के बहुमत से पास किया जा सकता है।
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जब हमने संघ को इस क़ानून का समर्थन करने को कहा तो उन्होंने इस क़ानून का विरोध किया। तब हमने संघ से कोई अन्य क़ानून ड्राफ्ट देने को कहा जिस से भारत के करोड़ो नागरिक अपनी बात पीएम के सम्मुख रख सके। संघ ने साफ़ कहा कि हम जनता को ऐसा कोई भी अधिकार देने के खिलाफ है, जिससे आम नागरिको को देश की किसी नीति पर हाँ / नहीं दर्ज करने की शक्ति हासिल हो !!! यदि आपको इस बात पर यकीन न हो तो आप खुद संघ के नेतृत्व से संपर्क करके इस तथ्य की पुष्टि कर सकते है।
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पाठक इस सम्बन्ध में स्वयं फैसला कर सकते है कि संघ क्यों ऐसे निरापद क़ानून का विरोध कर रहा है, जो कि आम नागरिक को अपनी सम्मति रखने का अधिकार देता है।
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मंदिरों के प्रशासन पर संघ की नीति
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धर्म के दो आयाम है, मीमांसा और प्रशासन। मीमांसा में धर्म की व्याख्या, दर्शन, विश्वास, अध्यात्म तथा यम नियम आदि शामिल है, जबकि प्रशासन धर्म की भौतिक संस्थाओं जैसे मंदिर, आश्रम, पूजा स्थल, दान आदि के प्रबंधन से सम्बंधित है। इस सम्बन्ध में हिन्दू धर्म के श्रधालुओं को बहुत कम जानकारी है कि धर्म का प्रशासन ही धर्म को मजबूत बनाता है। यदि किसी धर्म के पूजा स्थलों तथा संस्थाओं का प्रशासनिक संगठन सुव्यवस्थित होगा तो धर्म ज्यादा मजबूती से टिका रहेगा।
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प्रशासनिक दृष्टी से मौजूदा धर्मो में सिक्ख धर्म का प्रशासन सबसे मजबूत है, जबकि हिन्दू धर्म कुप्रबंधन का शिकार है। ईसाई और इस्लाम धर्म का प्रशासन भी हिन्दू धर्म की तुलना में काफी बेहतर है, फलस्वरूप पिछली दो शताब्दियों में इन धर्मो को पूरी दुनिया में विस्तार हुआ जबकि हिन्दू धर्म लगातार सिकुड़ता गया।
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कैसे हिन्दू धर्म के प्रशासन को लोकतांत्रिक और मजबूत बनाया जा सकता है, इसके लिए हमने यह क़ानून प्रस्तावित किया है :
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राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/570764579768407>;
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जब हमने संघ के नेतृत्व से इस क़ानून का समर्थन करने को कहा तो, उन्होंने इनकार कर दिया। हमने संघ से कहा कि भारतीय मंदिरों का प्रशासन टूटा हुआ है, जिससे हिन्दू धर्म कमजोर हो रहा है, अत: आप इस समस्या के समाधान के लिए अपना ड्राफ्ट दीजिये। संघ ने कोई भी ड्राफ्ट देने से मना कर दिया। यह विषय कितना गंभीर है, इसे समझने के लिए मैं आपसे आग्रह करूँगा कि आप ऊपर वर्णित ड्राफ्ट का अध्ययन करें।
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सारांश यह है की :

1. संघ शिक्षा, चिकित्सा के बुनियादी ढाँचे को सुधारने तथा खनिजो की रोयल्टी नागरिको के खाते में भेजने का विरोध कर रहा है, ताकि भारत में गरीबी बढे और मिशनरीज को धर्मान्तर में सहायता मिले।
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2. सुस्त और भ्रष्ट अदालतों को सुधारने, भारत की सेना को मजबूत बनाने तथा स्वदेशी हथियारों के उत्पादन को बढ़ावा देने वाले कानूनों का विरोध कर रहा है।
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3. राम-कृष्ण-विश्वनाथ मंदिर के निर्माण, मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने तथा हिन्दू धर्म के प्रशासन को सुगठित बनाने, गौ-हत्या निषेध के लिए आवश्यक कानूनों का विरोध कर रहा है।
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4. बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने, राष्ट्रीय पहचान पत्र प्रणाली, भारतीय मिडिया को स्वतंत्र बनाने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की घुसपेठ रोकने के लिए आवश्यक कानूनों का विरोध कर रहा है।
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इस प्रकार के हिन्दु राष्ट्रवाद को समझना मेरी सहज बुद्धि से बाहर है, फिर भी करोड़ो नागरिक और लाखों स्वयसेवक इस भ्रम को पाले बैठे है कि संघ हिन्दू तथा राष्ट्रहित में कार्य करता है।
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अध्याय - 4
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यह भाग इस बारे में है कि किस तरह संघ "इस्लाम का छद्म विरोध" करके यह भ्रम खड़ा किये रहता है कि, वह हिन्दू धर्म तथा राष्ट्र हितो के लिए कार्य कर रहा है।
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इस बात को समझने के लिए निम्नलिखित बिन्दुओ पर प्रमुखता से ध्यान देना होगा --1) वास्तविक परिवर्तन सिर्फ और सिर्फ कानूनों में बदलाव करके ही लाये जा सकते है, 2) कार्यकर्ताओं का मूल मुद्दो से ध्यान भटकाने के लिए उनका टाइम अनुपयोगी कार्यो में बरबाद कर देना राजनीति की सबसे चालाक रणनीति है, 3) पेड मीडिया जनता के मानस को नियंत्रित करने और धारणाएँ गढ़ने में मुख्य भूमिका निभाता है।
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देश को क़ानून चलाते है। प्रधानमन्त्री / मुख्यमंत्री / सांसद / विधायक आदि का काम क़ानून बनाना है। जो भी प्रस्ताव क़ानून का रूप लेता है, वही देश में लागू होता है। अन्य सभी गतिविधियाँ जैसे बयान, नारे, भाषण, एलान, मन की बातें, आरोप प्रत्यारोप, आश्वासन, वादे आदि जनता का मनोरंजन करने और उन्हें इन फिजूल कार्यो में व्यस्त रखने के पैंतरे है। हमारे नेता जान बूझकर बयानों की नौटंकी करते रहते है, ताकि जनता का ध्यान कानूनों की और न जा पाए। और संघ इस तमाशे का सबसे बड़ा मदारी है।
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संघ हिन्दू धर्म तथा राष्ट्र को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक सभी कानूनों का विरोध करता है, तथा लगातार इस्लाम को कोसता है। इससे संघ को निम्नलिखित फायदे होते है।
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1. पूरे विश्व में इस्लाम तथा ईसाइयत के बीच टकराव हो रहा है। अत: इस्लाम के खिलाफ नफरत फैलाना मिशनरीज़ और संघ का साझा एजेंडा बन जाता है। उदाहरण के लिए यदि भारत में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत उच्च जन्म दर और अवैध घुसपेठ के कारण बढ़ रहा है तो संघ के नेता बयान देंगे की हिन्दुओ को 10 बच्चे पैदा करने चाहिए, लेकिन यदि आप उनसे इसके समाधान के लिए टू चाइल्ड पालिसी का ड्राफ्ट देने को कहेंगे तो संघी इनकार कर देंगे, यदि आप उन्हें कोई ऐसा क़ानून दिखाएँगे तो उसका विरोध करेंगे। इस स्थिति में मुस्लिम जनसँख्या की वृद्धि दर जारी रहती है और धार्मिक जनसँख्या का असंतुलन बिगड़ता है, जबकि भावुक भक्त सोचते है कि संघ बिगड़ते धार्मिक असंतुलन पर कार्य कर रहा है। वे नहीं समझ पाते कि संघ "सिर्फ बयानबाजी" कर रहा है। समाधान में उनकी कोई रुचि नहीं है।
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2. इस्लाम के खिलाफ जहर उगलने से भावुक और सरल ह्रदय नागरिक समझते है कि संघ हिंदूवादी संगठन है, परन्तु वे यह नही समझ पाते कि संघ "इस्लाम का छद्म विरोधी" है न कि हिन्दुओ का हितेषी। इससे लोगो का सारा ध्यान इस्लाम को कोसने में लगा रहता है, तथा हिन्दू धर्म को कमजोर बनाए रखने के मिशनरीज़ और संघ के साझा एजेंडे पर कार्यकर्ताओं का ध्यान नही जा पाता। मुतमईन होने के लिये आप स्वयं संघ से पूछ सकते है कि पिछले 90 साल में हिन्दू धर्म को मजबूत बनाने के लिए संघ ने कितने क़ानून प्रस्तावित किये। अंडा !!!
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3. मिशनरीज़ / MNCs का मुख्य एजेंडा भारत की सेना को कमजोर बनाए रखना और हमारी अर्थव्यवस्था को अधिगृहित करना है, ताकि पूरे भारत को इसाई बनाया जा सके। अत: संघ इन मुद्दों पर खामोशी बरतता है, जिससे मिशनरीज़ / MNCs लगातार अपना एजेंडा आगे बढ़ाती रहती है। यदि कोई नागरिक आन्दोलन पनपता है तो संघ उसे तोड़ने के लिए काम करके मिशनरीज को सहायता पहुंचाता है।
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4. चूँकि इस्लाम के खिलाफ विष वमन करने से ध्रुवीकरण होता है, अत: इसका फायदा संघ को वोटो के रूप में मिलता है, और अपने राजनैतिक संगठन बीजेपी के सत्ता में आने पर संघी उच्च पदों पर विराजमान होकर सत्ता की मलाई खाते है। खट्टर, फड़नवीस, शिवराज, गडकरी आदि तथा खुद मोदी साहेब संघ से ही आये है, और सत्ता के मझौले स्तर पर कितने संघी कहाँ कहाँ घुसे पड़े है कोई हिसाब नहीं।
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नया उदहारण राम माधव का है, जिन्होंने अन्ना आंदोलन के दौरान अपने स्वयंसेवको को लोकपाल क़ानून का समर्थन करने का आदेश दिया था, क्योंकि भारत में लोकपाल क़ानून मिशनरीज़ / बहुराष्ट्रीय कम्पनियो का एजेंडा है अत: तोहफे के रूप में राम माधव संघ से प्रोमोट होकर पार्टी में ऊँचा पद पा गए है। ये आदमी जो तीन साल से MNCs के एजेंडे लोकपाल के समर्थन में मुहीम चला रहा है को दुनिया भर की पंचायत करने की फुर्सत है लेकिन बिगड़ते धार्मिक संतुलन को रोकने के लिए 'टू चाइल्ड पॉलिसी' का कानून लिखने की फुर्सत नहीं है।
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चूंकि समस्या का समाधान सिर्फ कानूनों से ही हो सकता है, अत: संघी समाधान के कानूनों की बात करने की जगह हिन्दुओ को "एक करने और जगाने" जैसे दार्शनिक जुमलो में उलझा कर रखते है। इस से समस्या का समाधान होने की जगह लाखो कार्यकर्ताओ की ऊर्जा और समय नष्ट हो जाता है, जिससे मिशनरीज़ को बढ़त मिलती है।
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भारत का मिडिया मिशनरीज और MNCs के नियंत्रण में है, तथा सभी राजनेतिक दल तथा नेता सकारात्मक कवरेज के लिए पेड मिडिया पर निर्भर है। चूंकि संघ मिशनरीज़ के एजेंडे पर कार्य करता है, अत: सभी पार्टियों के नेता जनता के सामने संघ को हिंदूवादी की छवी में प्रस्तुत करने के लिए उद्धत रहते है। इससे उन पर मिशनरीज़ की कृपा बनी रहती है।
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जैसा कि सभी जानते है बसपा, सपा तथा कोंग्रेस जैसे दल पूरी तरह मिशिनरीज / MNCs के हाथो बिकी हुयी पार्टियां है, अत: मुलायम और दिग्विजय जैसे नेता संघ पर हिन्दुवादी होने के बराबर आरोप लगाते रहते है। दरअसल ये नेता ऐसे बयान देकर संघ को नुकसान नही दे रहे होते है, बल्कि उसकी हिंदूवादी छवी को स्थापित कर रहे होते है। क्योंकि वे जानते है कि मिशनरीज़ / MNCs द्वारा संचालित पेड मिडिया इन बयानों को उछालेगा, जिससे संघ से चिपके स्वयंसेवक इस नशे में गाफिल बने रहेंगे कि संघ हिंदूवादी संगठन है। इस प्रकार पेड मिडिया लगातार संघ के हिंदूवादी छवी को उसी तरह बनाए रखता है, जिस तरह ब्रिटिश पेड मिडिया के माध्यम से करोड़ो नागरिको में ये भरोसा बनाए रखते थे कि मोहन गांधी आजादी की लड़ाई लड़ रहा है।
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दो शब्द दिग्गजों के बारे में जो संघ को कटघरे में खड़ा करते है।
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1. मोहन उर्फ़ दुरात्मा गांधी : अब यह लगभग खुली हुयी बात है कि मोहन गांधी अंग्रेजो के पार्टनर थे तथा अंग्रेजो के शासन को बचाने के लिए अनशन धरनो का नाटक करके टाइम पास कर रहे थे। संघ ने मोहन की इस नीति के विरोध में कभी कोई अधिकृत स्टेंड नही लिया बल्कि अधिकृत तौर पर संघ आज भी उस नराधम के आदर्श का समर्थक है, जिसने भारत को हथियार विहीन करने में मुख्य भूमिका निभायी और नतीजे में विभाजन के दौरान 20 लाख हिन्दुओ को जान से हाथ धोना पड़ा। लेकिन संघ ने अनाधिकृत रूप से गांधी को मुस्लिम-समर्थक बनाने पर कार्य किया, और ध्रुवीकरण करके वोटो की फसल काटी। आप आज भी संघ से पूछ सकते है कि, क्या वो मोहन के राष्ट्रपिता अलंकरण को बनाए रखने का समर्थन करता है, तो जवाब मिलेगा, हाँ। क्योंकि मोहन और संघ दोनों ही अंग्रेजो के लिए कार्य कर रहे थे।
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2. महात्मा राजिव भाई दिक्षित : इनके बारे में ऊपर विवरण दिया जा चुका है। संघ ने इनके भागीरथ कार्यो का विरोध किया, क्योंकि राजिव भाई ब्रिटेन और अमेरिकी सत्ता के बढ़ते नियंत्रण के खिलाफ कार्य कर रहे थे।
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3. महात्मा वीर सावरकर : भारत में हिन्दू राष्ट्र और प्रखर राष्ट्रवाद के दर्शन को स्थापित करने वाले पहले व्यक्ति, जिन्हें अंग्रेजो ने वैचारिक तौर पर अंग्रेजी शासन के लिए सबसे खतरनाक आँका, तथा उन्हें दो बार काले पानी भेजा। संघ ने उनका विरोध किया और उनके एजेंडे को नुक्सान पहुंचाया। विवरण ऊपर दिया जा चुका है।
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4. अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी : इनके बारे में नागरिको को बहुत कम जानकारी है। उधम सिंह जी ने जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के जिम्मेदार गवर्नर ड्वायर को 1940 में लन्दन जा कर फांसी दी थी। यदि आप उधम सिंह जी को विकृत एवं भटके हुए नौजवान की संज्ञा देते है तो आप संघ के सबसे लम्बे समय तक सरसंघ संचालक रहे माधवराव सदाशिव गोलवलकर है। यह लिखने की आवश्यकता नही कि उधम सिंह जी किसके खिलाफ काम कर रहे थे तथा संघ ने उनकी निंदा क्यों की थी।
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5. महात्मा सुभाष चन्द्र बोस : क्या संघ ने कभी सुभाष बाबू को राष्ट्रपिता का अलंकरण दिए जाने की मांग की ? जब सुभाष बाबू हिन्दुओं को हथियारों का प्रशिक्षण देने, सेना में भर्ती होने की मुहीम चला रहे थे, तो संघ ने उनका विरोध क्यों किया। कारण यह था कि सुभाष बाबू अंग्रेजो के खिलाफ बावर्दी सशस्त्र फ़ौज खड़ी कर रहे थे, न कि टाइम पास करने के लिए निकर और लाठी से लेस समूह की।
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6. देवी इंदिरा गांधी : इंदिरा जी ने आपातकाल लगाया था इसकी हम कड़े शब्दों में निंदा करते है, और संघ भी करता है। आपातकाल के लिए इंदिरा जी को माफ़ नही किया जा सकता, संघ भी नही करना चाहता। हालांकि अगले चुनावो में जनता ने इंदिरा जी को फिर से विराट बहुमत देकर उन्हें माफ़ कर दिया था। किन्तु आपातकाल 2 वर्ष के लिए था, इंदिरा जी ने अपने कार्यकाल के शेष 15 वर्ष में क्या किया, इस बारे में संघ कोई बात नही करना चाहता जबकि इस बारे में भी नागरिको को जानकारी दी जानी चाहिए। इंदिरा जी ने भारत की सेना को मजबूत बनाने के लिए युद्ध स्तर पर गतिविधियाँ प्रारम्भ की थी। उन्होंने रॉ का गठन किया, परमाणु बम का निर्माण किया, लड़ाकू विमान तेजस, अर्जुन टेंक निर्माण के प्रोजेक्ट शुरू किये, सेना की संख्या बढ़ाई, पाकिस्तान के दो टुकड़े किये, FDI को अनुमति नही दी, राजाओं के प्रिवीपर्स केंसिल किये, बेंको का राष्ट्रीयकरण किया, राजधानी और शताब्दी ट्रेने शुरू की, पेटेंट के क़ानून को पास करने से इनकार किया, थोरियम पर शोध को आगे बढ़ाया और खालिस्तान मूवमेंट का निस्तारण किया।
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सेना मजबूत करने के प्रयासों के कारण इंदिरा जी के खिलाफ मिशनरीज़ / MNCs लगातार षड्यंत्र कर रही थी, ऐसे में उनके पास दो ही विकल्प थे, --- 1) वे नियंत्रण बनाए रखने के लिए आपातकाल लगाए, 2) ज्यूरी सिस्टम और राईट टू रिकाल कानूनों को लागू करे। दुर्भाग्य से उन्होंने आपातकाल को चुना जो कि उनकी सबसे बड़ी भूल थी। यदि वे ये क़ानून लागू कर देती तो खालिस्तान की समस्या भी शान्ति पूर्ण तरीके से हल हो जाती और उन्हें ब्लू स्टार जैसे हत्याकांड से अपने हाथ नहीं रंगने पड़ते।
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आपातकाल और ब्लूस्टार को छोड़कर इंदिरा जी ने ऐसे कई फैसले किये जिनसे राष्ट्र मजबूत हुआ। बीजेपी एक राजनेतिक पार्टी है, अत: किसी अन्य राजनेतिक पार्टी के नेता की तारीफ़ करना उन्हें राजनेतिक नुक्सान पहुंचाएगा, किन्तु यदि संघ एक "राष्ट्रवादी" संघठन है तो संघ ने इंदिरा जी के इन फैसलों का हमेशा विरोध क्यों किया। इसकी जगह संघ ने अनाधिकृत रूप से इंदिरा जी को मुस्लिम होने से जोड़ा और उनकी इस छवी को उभाड़कर धुर्विकरण द्वारा वोट खींचे। आज भी संघ की आई टी सेल उनके मुस्लिम परस्त होने की सामग्रियों का सोशल मिडिया पर प्रचार करती है, तथा कुछ भ्रमित हिंदूवादी अफीमची उनके बारे में यह जानकारी जन जन तक फैलाने के कार्य में लगे हुए है जिसने पाकिस्तान के दो टुकड़े किये।
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निष्कर्ष यह है कि जो भी व्यक्ति / संगठन मिशनरीज / MNCs के एजेंडे के खिलाफ कार्य करेगा, संघ उनका विरोध करेगा । यदि ऐसे व्यक्ति को मुस्लिमो से जोड़ा जा सकता है तो संघ उन्हें इस्लाम से जोड़कर वोट खींचेगा और खुद के हिंदूवादी संगठन होने का भ्रम खड़ा करेगा।
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भाग- 5
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यह भाग समाधान के बारे में है कि किस तरह हम अपने देश की गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक क़ानून लागू करवा सकते है।
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1990 तक भारत के राजनेतिक दल और नेता एक हद तक खुदमुख्तार थे, लेकिन WTO एग्रीमेंट के बाद स्थिति बदल गयी। बेहिसाब FDI आने से विदेशी कम्पनियों ने भारत की अर्थ और राजनेतिक व्यवस्था में गहरी घुसपेठ बना ली है। आज सभी राजनेतिक दल मिशनरीज़ और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की गुलामी करने को मजबूर है। सभी नेता और राजनेतिक दल सकारात्मक कवरेज के लिए पेड मिडिया पर निर्भर है तथा पेड मिडिया बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और मिशनरीज़ पर निर्भर है। अत: किसी भी नेता को यदि कुर्सी पर बने रहना है तो उसे मिशनरीज़ और MNCs के एजेंडे पर कार्य करना होता है। संघ जैसे संगठन से देशहित में कार्य करने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन संघ के शीर्ष नेतृत्व ने भी अपने अस्तित्व को बचाने और अपनी ताकत बढाने के लिए मिशनरीज़ / MNCs के एजेंडे पर ही कार्य करने को चुना है।
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यदि हमें भारत को मजबूत बनाना है, जो कि सेना को मजबूत बनाए बिना सम्भव नही है, तो हम आम नागरिको को इसके लिए प्रयास करने होंगे। सिर्फ आम नागरिक ही ऐसा करने में सक्षम है, सरकारों, नेताओ, और अन्य विशाल संगठनो से इसकी उम्मीद करना बेमानी है।
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हम आम नागरिक कैसे देश को विकसित और मजबूत बना सकते है ?
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1. नेता-भक्ति बंद करे --- हमे नेता द्वारा पास किये जा रहे कानूनों पर ध्यान देना चाहिए, यदि वो अच्छे क़ानून बनाता है तो समर्थन करे, और बुरे कानूनों की आलोचना करे । इससे नेता पर अच्छे कानूनों को पास करने का दबाव बना रहता है।
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2. पार्टी की क़ानून धारा से जुड़े न कि विचार धारा से --- विचारधाराएँ लागू नही की जा सकती तथा इनकी व्याख्या करने वाला इन्हें अपनी सुविधानुसार बदलता रहता है। पार्टियाँ नागरिको को भरमाने कानूनों से ध्यान हटाने के लिए विचारधाराओं के गुब्बारे छोड़ती रहती है। नागरिको को चाहिए कि पार्टियों से प्रस्तावित कानूनों की मांग करे।
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3. देश को क़ानून चलाते है --- विचारधारा, उपदेश, भाषण, मन की बातें, प्रवचन, सलाहे आदि दर्शन शास्त्र के विषय है, जबकि नारे, आरोप-प्रत्यारोप आदि वोट खींचने के लटके। लेकिन राजनीति दर्शन और लटको का विषय नही है, राजनीति नीति ( क़ानून ) बनाने का विषय है। अत: राजनीति पर सभी प्रकार के विमर्श, बहस आदि कानूनों को केंद्र में ही रख कर करे।
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4. समस्याओं की जगह समाधान पर ध्यान केन्द्रित करे --- सभी दल समस्याओं को उभारकर मतदाताओं को विरोधी दल के प्रति उकसाते है, इससे मतदाता समझता है, कि अमुक दल समाधान पर कार्य कर रहा है। जबकि वो इस और ध्यान ही नही देते कि, समस्या उठाने वाला दल समाधान के लिए क़ानून प्रस्तावित कर रहा है या नही। नागरिको को समस्या की जगह समाधान पर ध्यान देना चाहिए, और राजनीति में सभी समाधान सिर्फ कानूनी ही हो सकते है, शेष सभी टाइम पास करने के पैंतरे है।
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5. मूल विषयों पर ध्यान बनाए रखे --- देश की सेना तथा अर्थव्यवस्था जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों पर ध्यान दे। आज ज़्यादातर कार्यकर्ता अपने नेता की गुणगान और विरोधी नेताओ को गरियाने में अपनी अधिकाँश ऊर्जा और समय खर्च कर रहे है, इस कारण देश की गंभीर समस्याओं के समाधानों पर कार्य नही हो पा रहा है।
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6. पेड मिडिया द्वारा उठाये गए फिजूल मुद्दों पर ध्यान न दें --- भारत का पेड मिडिया MNCs और मिशनरीज़ के नियंत्रण में है, तथा उनका एजेंडा गलत ख़बरें दिखाना नही बल्कि फ़ालतू खबरे दिखा कर जनता का टाइम पास करना है, ताकि मूल समस्याओं और उनके समाधान पर नागरिको का ध्यान नही जाए।
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7. संगठन से जुड़ने की जगह मुद्दों से जुड़े --- जब आप किसी ऐसे संगठन से जुड़ते है जो क़ानून ड्राफ्ट विहीन सिद्धांत पर कार्य कर रहा है, तो आप उस संगठन के लिए कार्य कर रहे होते है न की मुद्दे के लिए। उस संगठन से अमुक मुद्दे के समाधान का ड्राफ्ट मांगे, यदि वह इनकार करे तो ऐसे संगठन को विषयुक्त भोजन समझ कर त्याग दें।
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संघ की दोहरी नीति का समाधान
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क्योंकि संघ के लाखो स्वयंसेवक देश के प्रति समर्पित है, किन्तु नेतृत्व भ्रष्ट है, इसलिए इसका विरोध करने, या नुक्सान पहुंचाना समाधान नही है। यदि संघ का नेतृत्व राष्ट्रवादी रास्ते पर आ जाता है, तो यह संगठन सबसे तेजी से देश की व्यवस्था में परिवर्तन लाने की ताकत रखता है। 60 लाख समर्पित स्वयंसेवको की फ़ौज और 50 हजार शाखाओं का नेटवर्क देश के अन्य किसी भी संगठन के पास नही है।
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1. यदि आप संघ से जुड़े हुए है तो, संघ से उसके द्वारा उठाये जा रहे मुद्दों जैसे राम-कृष्ण-विश्वनाथ देवालय, गौ रक्षा, बांग्लादेशी घुसपेठ, जनसँख्या का बढ़ता असंतुलन, धर्मान्तर, मंदिरों का प्रशासन आदि विषयों के समाधान के लिए प्रस्तावित ड्राफ्ट देने को कहें।
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2. संघ से देश की सेना, अदालतों, अर्थव्यवस्था, भुखमरी, गरीबी, खनन क्षेत्र में भ्रष्टाचार, पुलिस प्रशासन, पेड मिडिया, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का बढ़ता नियंत्रण, स्वदेशी सरंक्षण, गणित विज्ञान की शिक्षा, सरकारी स्कूलों और चिकित्सालयो का गिरता स्तर आदि महत्त्वपूर्ण विषयों पर अपने कानूनी ड्राफ्ट्स देने को कहें।
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3. यदि लाखो स्वयंसेवको द्वारा ऐसी मांग करने पर भी यदि संघ का नेतृत्व इन मुद्दों के कानूनी ड्राफ्ट नही देता है, तो या तो आप स्वयं इन समस्याओं के समाधान के ड्राफ्ट लिखें या किसी अन्य संगठन द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट लें या ड्राफ्ट के लिए राईट टू रिकाल ग्रुप के किसी कार्यकर्ता से संपर्क करके इन सम्बंधित ड्राफ्ट प्राप्त करे, तथा ये ड्राफ्ट संघ को देकर उनसे इन ड्राफ्ट्स का समर्थन करने को कहे । यदि तब भी संघ का नेतृत्व टाइम पास गतिविधियाँ छोड़ कर ड्राफ्ट आधारित एजेंडे को स्वीकार नही करता है तो आप निम्न में से कोई भी विकल्प अपना सकते है।

अ) संघ के नेतृत्व का देश हित में पूरी शक्ति से विरोध करे और उसे एक्सपोज़ करे।
ब) संघ के सरसंघ संचालक की चयन प्रक्रिया के लिए वोटिंग की मांग करे।

*ऐसी चयन प्रक्रिया में संघ के प्रचारक और स्वयंसेवक वोट करके ऐसे सरसंघ संचालक को चुन सकेंगे जो राष्ट्रवादी एजेंडे पर कार्य करे।
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4. राष्ट्रवादी-हिंदूवादी नागरिको को चाहिए कि अपने परिचित स्वयंसेवको से सम्बंधित समस्याओं के ड्राफ्ट देने को कहें, यदि स्वयंसेवक ड्राफ्ट देने से इनकार करते है तो उन्हें अंध-सेवक संबोधित करे और उन्हें एक्सपोज़ करे।
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सनद रहे
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यह उल्लेखनीय नही है कि, बीजेपी, कोंग्रेस, सपा, बसपा, आपा, लेफ्ट, राईट, शिवसेना, नव निर्माण सेना, राजद, बीजद तथा शेष सभी पार्टियाँ और इनके हीरोनुमा नेता चंदो, घूस के लिए और सकारात्मक कवरेज के लिए मिशनरीज़ / MNCs पर निर्भर करते है, अत: मिडिया द्वारा फैलाए हुए इस भ्रम का शिकार होने से बचे कि ये नेता देशहित में कार्य कर रहे है। मोदी से लेकर सोनिया-राहुल और केजरीवाल से लेकर अन्ना-टन्ना तक सभी कुर्सी और पुरूस्कारो के लिए कभी के खुद को दांव पर लगा चुके है। अत: ये सभी बघियार भी देश हित के इन कानूनों का विरोध कर रहे है और यथा शक्ति आगे भी करते रहेंगे।
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सिर्फ आम नागरिक ही देशहित में कार्य कर सकते है। जब कोई आम ख़ास बन जाता है, तो वह भी उतना ही भ्रष्ट हो जाता है, जितना कि अधिकतम हुआ जा सकता है। मान-वृद्धि महंगी वस्तु है।
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कैसे हम आम नागरिक देश में सकारात्मक बदलाव ला सकते है ?
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चरण : 1
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1) कोई भी विषय / समस्या / मुद्दा चुने, जिसका आप समाधान चाहते है।
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2) अमुक समस्या के समाधान के लिए किसी भी संगठन / व्यक्ति / पार्टी से अमुक मुद्दे के समाधान का कानूनी ड्राफ्ट प्राप्त करे।
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3) एक ही विषय पर यदि आप कई ड्राफ्ट जुटा सके तो ज्यादा बेहतर है।
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4) इन ड्राफ्ट्स का अध्ययन करके उनमे से सबसे लोकतांत्रिक और अच्छे ड्राफ्ट को चुने।
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5) यदि आप किसी व्यक्ति / कार्यकर्ता / संगठन / दल से जुड़े हुए है तो उन्हें इस ड्राफ्ट को अपने एजेंडे में शामिल करने को कहें।
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6) यदि अमुक संगठन न तो इसे अपने एजेंडे में शामिल करता है न ही स्वयं कोई ड्राफ्ट देता है, तो उस संगठन को छोड़ दे। यदि वह संगठन क़ानून ड्राफ्ट्स को एजेंडे में शामिल करता है, तो आप ऐसे संगठन से जुड़ने के बारे में फैसला ले सकते है।
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7) अपने ड्राफ्ट्स का नागरिको / कार्यकर्ताओं में मुक्त रूप से प्रचार करे।
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8) अपनी ऊर्जा और समय का एक हिस्सा उन संगठनो को एक्सपोज़ करने में अवश्य लगाए जो देश में अच्छे कानूनों को लागू करने का विरोध कर रहे है, वरना उनकी शक्ति बढ़ती जायेगी, और वे लाखों करोड़ो नागरिको / कार्यकर्ताओं का समय फिजूल गतिविधियों में नष्ट करेंगे, फलस्वरूप राष्ट्रीय ऊर्जा का ह्रास होगा और अच्छे कानूनों का प्रचार करने के लिए कार्यकर्ताओं के पास समय ही नही बचेगा।
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ध्यातव्य है कि, महात्मा भगत सिंह, आजाद और सान्याल जैसे क्रांतिकारी इसीलिए अपने संगठन को नही बढ़ा पाए क्योंकि पूरे देश में जितने भी नौजवान आजादी की लड़ाई में योगदान देना चाहते थे, वे सभी मोहन गांधी के सामने बैठ कर चरखे चला रहे थे। मौजूदा हालात में हिन्दूवाद-राष्ट्रवाद के नाम पर वही तमाशा संघ लाखों कार्यकर्ताओं के साथ कर रहा है।
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चरण : 2 ( सबसे जरुरी )
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1) आप जिस भी क़ानून को देश में लागू कराना चाहते है, उस क़ानून की मांग अपने प्रधानमन्त्री से अवश्य करे। संविधान के अनुसार यह भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपने प्रतिनिधियों को देशहित में आवश्यक आदेश भेजे। प्रतिनिधि ( पढ़े नौकरो ) का एक मात्र कार्य मतदाताओं ( पढ़े मालिकों ) से आदेश प्राप्त करके उनकी पालना करना है। अत: यदि आप प्रतिनिधियों को आदेश नही भेजेंगे तो वे अपनी मर्जी और खुद के फायदे के क़ानून बनायेंगे, आपके और जनता के फायदे के नही।
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प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री को भेजा गया ऐसा आदेश स्पष्ट और अधिकृत होना चाहिए। आदेश को स्पष्ट बनाने के लिए उस क़ानून का ड्राफ्ट या उसका लिंक भेजे, जिस क़ानून को लागू करने की आप मांग कर रहे है, तथा क़ानून ड्राफ्ट के पीडीऍफ़ की sha1 हेश भी लिखें।
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यह क्रिया सबसे महत्वपूर्ण है। आप चाहे अन्य कोई गतिविधि करे या न करे, परन्तु प्रधानमंत्री को ट्विट अवश्य करें।
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प्रधानमंत्री को भेजे जाने वाले ट्वीट का प्रारूप :
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@pmoindia I instruct you to print draft- <https://newindia.in/causes/eiar-2/>; sha1- 760246ad1068aa846f5295f717d6eb8a5f15d7a8 #ExpelBanglaInfiltrators
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कृपया ऊपर दिए गए ट्वीट को कॉपी करे तथा अपने ट्विटर एकाउंट से @pmoindia पर ट्वीट करे।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 06 2017 17:23:07 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

जीएसटी में संभावित बदलाव ; रिटर्न मासिक की जगह त्रेमासिक किये जा सकते है -- मोदी साहेब और संघ के कार्यकर्ताओ द्वारा दिया जा रहा एक और चकमा !!!
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अच्छा और सरल टेक्स सिस्टम -- जीएसटी !! असल में यह बहुत ही ज्यादा सरल और बहुत ही ज्यादा अच्छा है !!! लेकिन ये किसके लिए अच्छा है ?
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पहले मोदी साहेब और संघ के कार्यकर्ताओ ने कारोबारियों को बाध्य किया कि वे जीएसटी रिटर्न हर महीने भरें !!! सोनिया-केजरीवाल एवं उनके अंध भगतो ने भी मासिक रिटर्न भरने के फैसले का समर्थन किया !!
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ठीक है। लेकिन त्रेमासिक रिटर्न भरने की व्यवस्था से एक दूसरी समस्या खड़ी हो जायेगी। जो कि मौजूदा समस्या से ज्यादा बड़ी है। दूसरी समस्या यह है कि -- अब क्रेता को इनपुट क्रेडिट की राशि प्राप्त करने के लिए 90 दिनों से लेकर 120 दिनों और 180 दिनों तक भी इन्तजार करना पड़ेगा !! और सबसे बड़ी समस्या यह है कि यदि विक्रेता ने क्रेता से लिया गया जीएसटी सरकार के खाते में जमा नहीं किया तो क्रेता अगले 90 या 120 या 180 दिनों तक यह जान भी नहीं पायेगा कि उसे इनपुट क्रेडिट नहीं मिलने वाला है, शिकायत दर्ज करने की बात तो भूल ही जाइए। तो इस तरह त्रेमासिक रिटर्न के कारण जीएसटी में मौजूद सबसे भयंकर समस्या "मिसिंग ट्रेडर प्रोब्लम" और भी मारक हो जायेगी !! और इससे छोटे और मझौले कारोबारियों को भारी नुक्सान उठाना पड़ेगा !!
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दुसरे शब्दों में, यदि रिटर्न मासिक आधार पर भरे जाते है तो छोटे / मझौले उत्पादक खतौनी के झंझटो के कारण नुकसान उठाएंगे और यदि रिटर्न त्रेमासिक कर दिए जाते है तो "मिसिंग ट्रेडर प्रोब्लम" विकराल रूप ले लेगी, और छोटे / मझौले उत्पादको को बाजार से बाहर कर देगी !!
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कुल मिलाकर जीएसटी
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समाधान ?
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यदि आप समाधान चाहते है तो आपको जीएसटी से आगे देखना शुरू करना चाहिए। जीएसटी को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसे सुधारा नहीं जा सकता। छोटे / मझौले उत्पादको के लिए जीएसटी एक कत्ल खाना है। किसी भी द्वार से प्रवेश करने से वे मशीन की चपेट में आ ही जायेंगे।
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सोनिया-मोदी-केजरीवाल और उनके अंध भगत भारत में जीएसटी सिर्फ इसीलिए थोपना चाहते है क्योंकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भारत में जीएसटी लाना चाहते है। किन्तु बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको का उद्देश्य जीएसटी से टेक्स जुटाना नहीं है, बल्कि उनका उद्देश्य भारत के छोटे / मझौले उत्पादको को बाजार से बाहर कर देना है !!
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समाधान सिर्फ यह है कि जीएसटी को पूरी तरह से रद्द किया जाये और वेल्थ टेक्स लागू किया जाए।
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अपने प्रधानमन्त्री को या ट्विट करें -

" @PmoIndia print #WealthTax law at mygov.in/comment/101416021 sh1= #1e44aa1f17c5139330e8cf62e29f5eddcbb12122 to reduce land prices, create jobs "
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वेल्थ टेक्स क़ानून का डाफ्ट यहाँ देखें - <https://fb.com/mehtarahulc/posts/10154516735651922>;
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 06 2017 18:04:51 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

एक और तमाशा -- संघ के नेता और गोवा के सीएम पर्रीकर का कहना है कि, वे E-Way बिल का विरोध करेंगे !!! और जीएसटी में E-Way सिस्टम संघ के नेता स्वयं मोदी साहेब के आदेश से संघ के नेता अरुण जेटली ने ही लागू किया है !!!
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मतलब, संघ का एक नेता किसी सिस्टम का समर्थन करता है, और दूसरा नेता इसका विरोध करता है !!!
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कहने की जरुरत नहीं है कि, पर्रीकर ढोंग कर रहे है। क्योंकि वे जानते है कि E-Way बिल के बिना जीएसटी का पूरा ढांचा ही चरमरा जाएगा !!! यदि E-Way बिल में छूट दे दी गयी तो कारोबारी बिना बिल की सप्लाई चेन बना लेंगे जिससे जीएसटी संग्रहण में भारी कमी आएगी।
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और यदि E-Way बिल को जारी रखा गया तो छोटे / मझौले उत्पादको को भारी नुक्सान होगा और वे बाजार से बाहर हो जायेंगे !! इधर कुआँ खोदने के बाद उन्होंने उधर खाई भी खोद के रखी है !!
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यदि कोई विक्रेता 50 हजार से अधिक का सामान एक जगह से दूसरी जगह भेजना चाहता है और यदि बीच की दूरी 10 किमी ( हाँ, सिर्फ 10 किलोमीटर ! ) से अधिक है तो मोदी साहेब के "बेहद सरल और यूजर फ्रेंडी" जीएसटी में प्रावधान है कि आपको सामान भेजने से पहले E-Way बिल जनरेट करना होगा !!!
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तो यदि कोई मिठाई विक्रेता मुंबई जैसे शहर में 600 रू प्रति किलो की 100 किलो मिठाई एक जगह से दूसरी जगह भेजना चाहता है और यदि यह दूरी 11 किमी है तो उसे पहले इसकी सूचना सरकार को देनी होगी !! यह सूचना नेट पर दी जायेगी !! और यदि नेट डाउन है या सरकार ने किसी प्रदर्शन , दंगे आदि के कारण नेट बंद किया हुआ है तो आपको नेटवर्क आने तक इंतिजार करना होगा !!!
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और यदि E-Way बिल में भरे गए विवरण में त्रुटी है तो आपको जुर्माने का सामना करना होगा !! कितना जुर्माना ? यह त्रुटी, सामान, राशि आदि पर निर्भर करता है। इस जुर्माने की गणना खगोलिय गणनाओ से कम पेचीदा नहीं है !! उदाहरण के लिए यदि कोई कारोबारी कपडे एवं मिठाई दोनों का व्यापार करता है , और यदि उसने गलती से मिठाई की जगह कपडे की एंट्री कर दी या E-Way बिल में अन्य किसी प्रकार की त्रुटी कर दी तो उसकी सप्ताह भर की आय जुर्माने की भेंट चढ़ जायेगी !!
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बेहद सरल, बेहद अच्छे एवं बेहद दोस्ताना टेक्स सिस्टम में आपका स्वागत है !!!
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 06 2017 18:36:13 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सितम्बर 2016 की तुलना में अहमदाबाद में नए फ्लेट्स की कीमतों में 20% की गिरावट दर्ज की गयी है , यह गिरावट नोटबंदी से पहले की है और नोटबंदी से पहले शुरू हो गयी थी। तो संघ के कार्यकताओ द्वारा जो प्रोपोगेंडा खड़ा किया गया था कि नोटबंदी से जमीनों की कीमतों में कमी आएगी, पूरी तरह से झूठ था !!
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अब कांग्रेस-संघ और आम आदमी पार्टी के नेता "रेरा" = RERA लेकर आये है जिससे छोटे बिल्डर्स की कमर टूट जायेगी। छोटे बिल्डर्स के लिए हालात को और भी बदतर बनाने के लिए जीएसटी पहले से ही है। और दिसम्बर में E-Way बिल सिस्टम आने से समस्या और भी बढ़ जायेगी।
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जाहिर है इससे बड़े बिल्डर्स का सकल लाभ बढ़ेगा लेकिन छोटे बिल्डर्स ग्राहक गंवाएंगे।
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अधिक विवरण के लिए यह न्यूज पढ़े - <http://www.financialexpress.com/industry/housing-sales-fall-35-in-8-cities-supply-dips-83/883519/>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 06 2017 20:02:17 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

यह पोस्ट "60 साल तक तुम कहाँ थे" प्रश्न पूछने वालो के लिए बनाया गया है। कुछ लोग यह प्रश्न पिछले 3 वर्ष से लगातार पूछ रहे है , और पूरी उम्मीद है कि अगले 60 वर्ष तक यह प्रश्न बराबर पूछते रहेंगे। तो उत्तर देने में दोहराव न हो इसके लिए यह पोस्ट बना दिया गया है। इस विकट प्रश्न के कुछ अमूमन जवाब इस पोस्ट में पहले से लिख दिए गए है। यदि इन जवाबो से प्रश्नकर्ता संतुष्ट हो जाता है तो ठीक है , वर्ना वह अपना प्रश्न कमेंट बॉक्स में रख सकता है। यथोचित जवाब देने का प्रयास किया जाएगा।
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१) "60 साल तक तुम कहाँ थे" ?
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इस प्रश्न का उत्तर देने वाले की आयु कम से कम 60 + 18 = 78 वर्ष होनी चाहिए। 18 वर्ष मतदान की आयु सीमा है। जिसे मतदान का अधिकार नहीं है उसकी राजनैतिक टिप्पणियों का महत्त्व नहीं होता है। और 60 साल का हिसाब आप मांग रहे है। तो इस तरह से यह 78 वर्ष हुआ। जिसकी आयु 78 वर्ष है वही 60 वर्ष का हिसाब दे सकता है। मेरी आयु 78 वर्ष नहीं है। अत: प्रश्न गलत है , और गलत व्यक्ति से पुछा जा रहा है। अपने प्रश्न में सुधार करके आप अपना प्रश्न पुन: कमेंट बॉक्स में पूछ सकते है।
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२) "60 साल तक तुम कहाँ थे" ?
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यह प्रश्न पूछने वाले की आयु कम से कम 60 + 18 = 78 वर्ष होनी चाहिए। यदि आपकी आयु 78 वर्ष से कम है तो आपको जवाब नहीं दिया जाएगा। आप पहले अपनी आयु में से 18 वर्ष घटाए और फिर जितने वर्ष बचे हो उतने वर्ष का हिसाब मांगने के लिए प्रश्न पूछे। क्योंकि आप उस समय का हिसाब नहीं मांग सकते जब आप पैदा भी नहीं हुए थे। और खासकर उस समय का जब जवाब देने वाला भी पैदा नहीं हुआ था। किन्तु यदि आप बीजेपी या कांग्रेस या संघ के कार्यकर्ता है तो अवश्य ही आपसे क्रमश: 55 साल एवं 60 साल का हिसाब माँगा जाएगा।
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( कांग्रेस या बीजेपी या संघ या मार्क्सवादियों के नेताओ से या इनके कार्यकर्ताओ से पिछले 60 साल का हिसाब अवश्य माँगा जा सकता है। क्योंकि ये पार्टियां 60 साल से सक्रीय राजनीती में है , और इनके कार्यकर्ता इन पार्टियों से जुड़े हुए है अत: वे इनके 60 साल के कर्मो के प्रति जवाब देने के लिए बाध्य है। )
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जन संघ की स्थापना 1952 में हुयी थी और यदि आप संघ या बीजेपी के कार्यकर्ता है या उनका समर्थन करते है तो आपसे यह पुछा जायेगा कि विपक्ष में रहते हुए आपने भ्र्ष्टाचार कम करने, अदलातो, स्कूलों, अस्पतालों को सुधारने, 2 करोड़ बांगलादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने एवं धार्मिक अंसतुलन को ठीक करने हेतु जनसँख्या नियंत्रण के लिए किन किन कानूनों के ड्राफ्ट दिए, जनता में उनका प्रचार किया और सरकार पर उन्हें लागू करने का दबाव बनाया। और आपसे यह भी पुछा जाएगा कि जब जब आप सत्ता में रहे तो आपने इन समस्याओ के समाधान के लिए कितने और कौनसे क़ानून पास किये। और आपसे अभी के 3 साल का हिसाब भी पुछा जायेगा, कि पिछले तीन साल में किस वजह से आप 2 करोड़ बांग्लादेशी घुसपेठियो को देश से बाहर खदेड़ने और टू चाइल्ड पॉलिसी क़ानून को पास करने का विरोध कर रहे है।
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३) "60 साल तक तुम कहाँ थे" ?
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क्या आपने कभी अपने बुजुर्गो एवं वरिष्ठजनो से ये सवाल किया है ? वे आपको बताएँगे कि वे तब से कांग्रेस को वोट कर रहे है जब आप पैदा भी नहीं हुए थे !!! क्योंकि बीजेपी की स्थापना 1985 में हुयी थी। और उसके पहले देश में कांग्रेस का एक छत्र शासन था, दूसरी बड़ी पार्टी मार्क्सवादी थी, और फिर क्षेत्रीय पार्टियां थी। बीजेपी की तब कोई हैसियत नहीं थी। आप चाहे तो 1985 से 1995 के बीच बीजेपी का वोट प्रतिशत देख सकते है। यह बेहद कम था। और 1985 से पहले तो यह प्रतिशत था ही नहीं। क्योंकि बीजेपी ही नहीं थी !! और जनसंघ को 2-5 सीट से ज्यादा नहीं मिलती थी। तो यह सवाल पूछने वाले सज्जनो को इतनी बात समझनी चाहिए कि 1985 से पहले तक जो लोग जीवित थे और वोट करते थे वे कम से कम बीजेपी को तो नहीं कर सकते थे। तो आप ऐसे व्यक्ति से यह सवाल नहीं पूछ सकते जो 1985 के बाद मतदाता बना है।

ये सवाल आप उनसे करिये जो 1985 से पहले के मतदाता है। और बेहतर होगा कि शुरुआत अपने घर से करें। अपने पिताजी, माताज़ी, ताऊजी, फूफाजी, नानाजी, नानीजी आदि से पूछे कि आप लोग 60 साल से क्या कर रहे थे ? मुझे पूरी उम्मीद है कि आपको बेहद सटीक एवं झन्नाटेदार जवाब मिलेगा।

मुझे अपने पुरखो से यह सवाल पूछने की जरूरत इसीलिए नहीं है क्योंकि मैं यह सवाल किसी से नहीं करता कि तुम 60 साल तक कहाँ थे, या 20 साल तक कहाँ थे या तब क्या कर रहे थे ? मैं मौजूदा हालात पर ही टिप्पणी करता हूँ कर अभी के लिए ही पूछता हूँ कि आज तुम किस नीति या क़ानून का समर्थन कर रहे हो। और मैं इस बात को भी समझता हूँ कि जैसे आज के लोगो ने बीजेपी को पूर्ण बहुमत दिया है वैसे ही तब के नागरिको ने कांग्रेस को बहुमत दिया था। तो मैं किसी के वोट या उसकी मेधा पर सवाल खड़े नहीं करता , और न ही उनसे उन मदो का हिसाब मांगता हूँ जिससे उनका कोई लेना देना नहीं है।
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इस तरह अलग अलग पहलुओं से जवाबो की सूची काफी लम्बी की जा सकती है। किन्तु सामान्य तौर पर इतना पर्याप्त है। शेष किसी को पूछना हो कि, "तुम 60 साल तक कहाँ थे" तो कमेंट बॉक्स में अपना प्रश्न रख सकता है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 06 2017 20:27:29 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

निरंतर व्यस्तताओं के कारण राईट टू रिकॉल पार्टी का रजिस्ट्रेशन लगातार लंबित हो रहा है। जो कार्यकर्ता पार्टी बना सकते है उन्हें अपने स्तर पर पार्टी बनाने के प्रयास करने चाहिए। वैसे भी हमें कई सारी पार्टियां चाहिए। एक पार्टी से काम नहीं चलेगा। इसीलिए मेरा आग्रह है कि जो जो कार्यकर्ता राज्य या राष्ट्रिय स्तर पर अपनी पार्टी बनाने में सक्षम है, वे अपने अपने क्षेत्र में राजनैतिक पार्टियां बनाने की कोशिस करें।
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राईट टू रिकॉल कानूनों के प्रचार के लिए चुनाव लड़ना सबसे महत्त्वपूर्ण है। बिना चुनाव लड़े राजनैतिक पार्टियों को ये कानून लाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा। अत: कार्यकर्ताओ को चाहिए कि वे चुनावी गतिविधियों पर अपना ध्यान केंद्रित करें। यदि राजनैतिक पार्टी का विकल्प नहीं है तो निर्दलीय चुनाव लड़ने का प्रयास करें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 06 2017 21:15:44 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भोपाल , मध्य प्रदेश के कार्यकर्ताओ -- कृपया 22 सितम्बर 2016 का भोपाल संस्करण का दिव्य भास्कर प्राप्त करने का प्रयास करें। यदि उपलब्ध हो तो एक से ज्यादा प्रतियां प्राप्त करें।
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भोपाल संस्करण में दिव्य भास्कर ने सर्जिकल स्ट्राइक से 6 दिन पहले ही मुख्य पृष्ठ पर सर्जिकल स्ट्राइक की खबर लगा दी थी। अब इस खबर के ई-पेपर का लिंक भास्कर ने हटा दिया है। दिव्य भास्कर के archive में भी यह उपलब्ध नहीं है .
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मुख्य पृष्ठ पर छपी हेडिंग --- "Sharif turns cry baby , Indian troops crossed LOC and killed 20 Jihadiis" on 21-sep-2016.
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लिंक जिसे अब हटा दिया गया है -- <http://epaper.dbpost.com/epaper_images//MPCG//epaperimages//22092016//21dbpost%20main%20editon-pg1-0ll.jpg>;
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यदि आप प्राप्त कर सके तो इस अखबार की प्रतियां प्राप्त करें। तथा हो सके तो 25 , 26 एवं 28 , 29 सितम्बर की प्रतियां भी प्राप्त करें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 08 2017 18:38:46 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

जो भी कार्यकर्ता राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम कानूनों के प्रचार के लिए चुनाव लड़ना चाहते है वे इस पोस्ट पर कमेन्ट करें। कृपया सिर्फ एक ही कमेन्ट करें। तथा कमेन्ट में अपने फेसबुक पोस्ट का वह लिंक रखे जिसमे यह दर्शाया गया हो कि आप किस विधानसभा / लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहते है।
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Oct 09 2017 13:17:01 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

एंटी-हिन्दू फैसला -- "पर्यावरण का बहाना" बनाकर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में आतिशबाजी बेचने पर बेन लगाया है, और मोदी साहेब ने संसद में इस फैसले को रद्द करने का प्रस्ताव रखने से इनकार कर दिया है !!
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फैसले के अनुसार, पटाखे चलाने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। सिर्फ बेचने पर है। इससे कई लोग ब्लेक में इसे खरीदेंगे और बेचेंगे। कई लोग पटाखे हरियाणा से लेकर आयेंगे और इस परिवहन के कारण दुर्घटनाओं की दर में इजाफा हो जाएगा।
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इस विषय में दो पहलू है -- १) दिल्ली , २) शेष भारत
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दिल्ली में पहले से ही प्रदुषण है, लेकिन इसकी वजह आतिशबाजी नहीं है। यदि सरकार तकनिकी अध्ययन कराए तो यह बात निकलकर सामने आ जायेगी। दरअसल दिल्ली में प्रत्येक आदमी एक रोकेट पर सवार है और उनके साइलेंसर हर समय धुंवा उगलते रहते है। वाहन निर्माता एवं तेल कंपनियों ने सरकारों को घूस देकर वाहन लेना बहुत सुलभ कर दिया हैं , जिससे बैंको और वाहन निर्माता कंपनियों ने पूरे सड़को को "गैर जरुरी निजी वाहनों" से पाट दिया है। इसकी वजह से ट्रेफिक जाम और भी ज्यादा है, और इस वजह से गाड़ियाँ और भी ज्यादा धुंवा उगलती है। ये दिन पर चलने वाले करोड़ो फटाके है जो दिल्ली को प्रदूषित कर रहे है।
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तेल और वाहन निर्माता कम्पनिया सरकारों को सार्वजनिक परिवहन प्रणाली और फुटपाथ तोड़ने का भी पैसा खिलाती है। इस तरह नागरिक निजी वाहन लेने के लिए बाध्य होते है और इससे प्रदुषण बढ़ जाता है। प्रदुषण का हवाला देकर आतिशबाजी बेन का समर्थन करने वाले एक भी आदमी को आप सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में सुधार की चिंता करते नहीं देखेंगे। उनके हिसाब से उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं। इन्हें सिर्फ आतिशबाजी से ही दर्द होता है। और ख़ास तौर पर जब यह आतिशबाजी किसी हिन्दू उत्सव से जुडी हुयी हो !!! वे जल प्रदुषण की भी फ़िक्र करेंगे लेकिन उनकी फ़िक्र में वे औद्योगिक इकाइयां कभी शामिल नहीं होती जो जहरीला पानी नदियों में बहा रहे है !! लेकिन गणपति या माताजी की मूर्तियों के विसर्जन से उन्हें अपच की शिकायत हो जाती है !!!
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वे होली पर जल विहीन होली की वकालत करेंगे लेकिन यदि आप उनसे पूछेंगे कि आखिर आप भारत में "युनिवर्सल मीटरिंग क़ानून" का समर्थन क्यों नहीं कर रहे, तो उनका मुहं घोड़े जैसा लटक जाता है। वे जब अपनी रौ में आयेंगे तो आपको यह भी समझाने से गुरेज नहीं करेंगे कि, अंतिम संस्कार से प्रदुषण फैलता है !! हाँ आपने सही पढ़ा है। एनजीटी इसकी सिफारिश कर चुका है कि हिन्दू धर्म में अंतिम संस्कार की प्रथा से लकड़ी की हानि हो रही है और प्रदुषण फ़ैल रहा है !! यहाँ तक की इन्हें गरबा भी साइलेंट चाहिए। सूची लम्बी है। दरअसल सारी कसरत "धार्मिक जमाव" को तोड़ने की है। धार्मिक जमाव में क्षरण आने से कैसे किसी धर्म के पैर उखड़ जाते है, इस विषय पर मैं अलग से विवरण लिखूंगा।
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ध्यान देने योग्य बात यह है कि -- दिल्ली प्रारम्भ है। पर्यावरण के नाम पर यह फार्मूला पूरे देश में थोपा जा रहा है। आज दिल्ली की बारी है। कल आपका और मेरा शहर होगा। मैं आपको नजीर देता हूँ। उदयपुर जैसे हरे भरे शहर में अभी दशहरे पर नगर निगम ने "धूम्र विहीन" रावण का दहन कर दिया !! उनके अनुसार रावण दहन से धूम्र प्रदुषण होता है !!! और सभी शहरो में पेड मीडिया की खुराक पर पलने वाले आपको ऐसे कई बुद्धिजीवी मिलेंगे जो इस बकवास का समर्थन ही नहीं करते बल्कि इसे प्रोत्साहित भी करते है !!
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१) दिल्ली में सरकार ऐसा तकनिकी अध्ययन करवाए जिससे यह मालूम हो कि आतिशबाजी से प्रदुषण की मात्रा बढ़ने और इसके टिके रहने की प्रभावी दर क्या है, तथा यह वाहनों द्वारा फैलाए जा रहे प्रदुषण की तुलना में कितना एवं किस अवधि तक असर रखता है।
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२) उपभोक्ता के लिए आतिशबाजी खरीद की एक न्यूनतम सीमा तय की जाये , और यदि कोई व्यक्ति इस सीमा से अधिक आतिशबाजी खरीदता है तो उस पर बढ़ी हुयी दर से टेक्स वसूला जाए। इससे आतिशबाजी बनी रहेगी किन्तु सीमा से अधिक आतिशबाजी करने वाले हतोत्साहित होंगे।
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३) आतिशबाजी में विस्फोट के लिए जिन तत्वों का इस्तेमाल होता है उनमें से ज्यादातर तत्व ठोस होते है और कुछ ही घंटो में जमीन पर आ जाते है। जो रसायन हवा में लम्बे समय तक बने रहते है उनमें शामिल विषेले रसायनों को चिन्हित करके उनका प्रयोग आतिशबाजी में करने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
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४) दिल्ली का ढांचा हर तरीके से बदतर हुआ जा रहा है और इसमें सुधार लाने के लिए दिल्ली में जनमत संग्रह प्रक्रिया के टीसीपी क़ानून की बेहद जरूरत है। इससे दिल्ली वासी खुद से ही यह तय कर सकेंगे कि उन्हें दिवाली पर आतिशबाजी चाहिए या नहीं चाहिए। और यदि चाहिए तो किस सीमा तक और किन विनियमों के तहत चाहिए।
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( जागरूक वर्ग के विशिष्ट बुद्धिजीवियों का लक्षण है कि वे दिल्ली वासियों को ऐसा कोई भी अधिकार देने की पैरवी कभी नहीं करेंगे, जिससे वे खुद अपने शहर के नियम तय कर सके। हिप्पोक्रेसी एट हिज बेस्ट !! )
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पीएम को ट्विट करें कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा जाए। @pmoindia पर यह ट्विट भेजे :
"@PmoIndia #CancelScjOrdertToBanCrackers SCjs' judgment to ban firecracckers is wrong. Pls ask Parliament to print law to cancel it."
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मेरे द्वारा भेजा गया ट्वीट - <https://twitter.com/PawanJury/status/917367566506409984>;
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Oct 09 2017 17:58:11 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

दिल्ली के निवासियों से आग्रह है कि वे आतिशबाजी पर बेन की उपेक्षा करें और हरियाणा आदि से "सुरक्षित" भड़ाके खरीद कर लाये और उन्हें चलाये। आप अमूमन दिवाली पर जितनी राशि की आतिशबाजी करते है यदि संभव हो तो उससे दुगनी राशि की आतिशबाजी करे। किन्तु ध्यान देने योग्य बात यह है कि सिर्फ "सुरक्षित" आतिशबाजी ही खरीदें। सुतली बम, मिर्ची बम , रॉकेट जैसे भड़ाको की अवहेलना करे और अनार, चकरी, फुलझड़ी जैसी आतिशबाजी को तरजीह दें।
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सुप्रीम कोर्ट के जजों की अभी इतनी औकात नहीं हुयी है कि वे दिल्ली के 3 करोड़ लोगो के खिलाफ जा सके। अत: उन्होंने सिर्फ आतिशबाजी बेचने पर प्रतिबन्ध लगाया है , आतिशबाजी करने पर नहीं। तो यदि दिल्ली में आपको सहज रूप से आतिशबाजी उपलब्ध न हो तो हरियाणा / यूपी से खरीद लाए और आतिशबाजी करें।
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साथ ही हमें सरकार पर दबाव बना कर राईट टू रिकॉल सुप्रीम कोर्ट जज के क़ानून को लागू करवाने का प्रयास करना चाहिए, ताकि भाई भतीजे वादी और भ्रष्ट जजों को जमीन पर उतारा जा सके।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Oct 10 2017 10:51:33 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

संघ के नेता और मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने 3 एंटी हिन्दू ट्वीट किये थे, जिन्हें अब उन्होंने डिलीट कर दिया हैं !!!
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मैंने इन ट्वीट्स को सेव कर लिया था। ट्वीट डिलीट किये गए ट्वीट के लिंक और विवरण --
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( 1 )
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<https://twitter.com/drharshvardhan/status/917358020304060416>;
" Welcome decision by the SC on ban of firecrakers sales in NCR. Comes as a huge support for my #GreenDiwali initiative for our environment "
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हिन्दी अनुवाद -- "बहुत ख़ुशी की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने एनसीआर में दीवाली पर आतिशबाजी बेचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। इस फैसले से मेरे #GreenDiwali मिशन को भारी समर्थन मिलेगा" !
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( 2 )
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<https://twitter.com/drharshvardhan/status/917358448748126213>;
" And of course, we must spare a thought for poor birds and animals who spend a terrible evening scared by all the fire & noise #GreenDiwali "
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हिंदी अनुवाद - "और हाँ, हमें उन निरीह पक्षियों एवं जानवरो की फ़िक्र भी करनी चाहिए जो आग और धुएं के कारण दिवाली की शाम काफी सदमे में बिताते है, #GreenDiwali !
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( 3 )
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<https://twitter.com/drharshvardhan/status/917358573604048896>;
" Instead of spending thousands on crackers, lets buy food & sweets and share it with poor/underprivileged, make it an awesome #GreenDiwali "
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हिंदी अनुवाद - आतिशबाजी पर हजारो रूपये फूंकने की जगह हमें उन पैसो से मिठाइयाँ व भोजन खरीद कर गरीबों में बाँट देनी चाहिए। तभी सच्चे अर्थो में दिवाली होगी, #GreenDiwali !
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ये तीनो ट्वीट अब गायब है !!
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शर्म की बात है कि एक मंत्री ट्वीट करता है और फिर उन्हें मिटा देता है !! यहाँ तक कि मेरे जैसे छोटे और पार्ट टाइम एक्टिविस्ट को भी इतनी समझ होती है कि -- यदि मैंने कुछ गलत लिखा है तो, या तो मुझे इसके लिए खेद प्रकट करना चाहिए या फिर इसे सम्पादित करके ठीक करना चाहिए। किन्तु रिकॉर्ड को मिटा देना किसी तरीके से सही बात नहीं है।
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दरअसल डॉक्टर हर्षवर्धन को आतिशबाजी से कोई समस्या नहीं है। लेकिन उन्हें दिवाली पर की जाने वाली आतिशबाजी से ख़ास एलर्जी है। पिछले वर्ष भी डॉक्टर साहेब विगत कई वर्षो से दिवाली पर आतिशबाजी न करने की मुहीम चला रहे है । लेकिन बीजेपी के चुनाव जीतने पर यही हर्षवर्धन कार्यकर्ताओ से कहते है कि -- आतिशबाजी करो !! लिंक निचे देखें -
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हर्षवर्धन ने दीपावली पर आतिशबाजी न करने की अपील की - <http://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/health-minister-harsh-vardhan-advocates-for-a-silent-diwali-in-capital/articleshow/44843427.cms?intenttarget=no>;
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हर्षवर्धन यह समझाते हुए कि किस तरह सिर्फ दीपावली पर आतिशबाजी करने से स्वास्थ्य को नुक्सान होता है : <https://www.youtube.com/watch?v=ON8rNRPL2rQ>;
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और चुनाव जीतने पर यही हर्षवर्धन खुद खड़े होकर आतिशबाजी करवा रहे है - <https://www.youtube.com/watch?v=MMkXD76OidE>;
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दरअसल संघ के नेताओ का ही नहीं बल्कि संघ के कार्याकर्ताओ का भी चरित्र इसी तरह का है। वे ऊपरी तौर पर हिन्दुवाद के नारे लगाते है लेकिन असल में हिन्दू धर्म की जड़े खोदने के कदमो का हमेशा समर्थन करते है। संघ के कार्यकर्ताओ ने सिर्फ हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाने वाली फिल्म "ओह माय गॉड" का समर्थन ही नहीं किया बल्कि उसमे अभिनय करने वाले परेश रावल को संसद में पहुंचाने में भी दौड़ धूप की। और जबकि संघ के सभी कार्यकर्ता इस बात से परिचित है कि परेश रावल हिन्दू नहीं बल्कि "क्रिप्टो क्रिश्चियन" है। इसी तरह संघ के कार्यकर्ताओ की हार्दिक इच्छा अक्षय कुमार को भी सांसद बनाने की थी। लेकिन अक्षय कुमार अपनी कनाडा की नागरिकता छोड़ना नहीं चाहते थे अत: बात बनी नहीं। उल्लेखनीय है कि, अक्षय कुमार भी "क्रिप्टो क्रिश्चियन" और हिन्दू विरोधी है।
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जब जल्लिकट्ट को बेन किया गया था तो हम रिकालिस्ट्स ने पीएम को सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर को रद्द करने का प्रस्ताव संसद से पास करने के लिए ट्वीट भेजे थे। क्या आपन जानते है कितने संघ के कार्यकर्ताओ ने पीएम को ऐसे निर्देश भेजने के लिए ट्वीट किये या पत्र लिखे ? शून्य , जीरो !!
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कुल मिलाकर हिंदूवादीयो को इस बात पर फिर से गौर करना चाहिए कि संघ के नेता और कार्यकर्ता हिन्दुवाद के मुद्दे पर कहाँ खड़े है।
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वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Oct 10 2017 16:21:00 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

फरवरी 2002 में 59 व्यक्तियों को मारने और 60 से ज्यादा को घायल करने के 11 दोषियों को फांसी से राहत देते हुए गुजरात हाईकोर्ट जज ने उनकी सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया है !!!
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कृपया अधिक जानकारी के लिए गूगल करें।
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फैसला एकदम अप्रत्याशित और गलत सन्देश देने वाला है। इन दोषियों का सार्वजनिक नारको टेस्ट लिया जाना चाहिए ताकि इन्हें सहयोग देने वाले मुख्य आरोपियों को पकड़ा जा सके। तथा फिर इन्हें फांसी दे देनी चाहिए। लेकिन जज ने इनका नारको टेस्ट लेने से मना कर दिया और उलटे इनकी सजा भी कम कर दी !!!
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समाधान - राइट टू रिकॉल जज और ज्यूरी सिस्टम।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Oct 11 2017 22:19:11 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

1) दीपावली की आतिशबाजी पर प्रतिबंध का मोदी साहेब और कोर्ट ने मिली भगत से लिया है !!
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2) मोदी साहेब ने रमन सिंह को आदेश दिए है कि वे छत्तीसगढ़ में रात 10 बजे से आतिशबाजी को प्रतिबंधित करें और तेज धमाकों वाले पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाएं !!
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3) महाराष्ट्र हाई कोर्ट ने आवासीय इलाको मे पटाखे बेचने वालों के लाइसेंस केंसिल कर दिए है , और अनुज्ञाधारी इलाको में पटाखे बेचने की उनकी सीमा को आधा कर दिया है !!
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4) दीवाली का आतिशबाजी से क्या सम्बन्ध है , और कैसे आतिशबाजी विहीन दिवाली हिन्दू धर्म का क्षरण कर देगी ?
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1)
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प्रदूषण बोर्ड केंद्र सरकार यानी मोदी साहेब उर्फ़ कल्कि पुरुष तृतीय के नियंत्रण में काम करता है। और इसी बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में जाकर यह मांग की थी कि दिवाली के दौरान आतिशबाजी पर प्रतिबन्ध लगाया जाए !!!
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दूसरे शब्दों में, मोदी साहेब खुद यह चाहते थे कि दिवाली पर आतिशबाजी प्रतिबंधित की जाए !! और इसीलिए मोदी साहेब ने सुप्रीम कोर्ट के इस एंटी-हिन्दू फैसले को संसद में रद्द करने से मना कर दिया !!!
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यह भी साफ़ है कि संघ के सभी कार्यकर्ता मोदी साहेब और सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का समर्थन कर रहे है।
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2)
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छत्तीसग़ढ में कोर्ट ने आतिशबाजी पर प्रतिबन्ध लगाने के कोई आदेश जारी नहीं किये है। किन्तु संघ के नेता और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने उच्च डेसीबल वाले पटाखों को पूर्णरूप से प्रतिबंधित कर दिया है , और रात 10 बजे बाद किसी भी प्रकार की आतिशबाजी पर बेन लगा दिया है। साथ ही उन्होंने यह भी आदेश जारी किये है कि राज्य भर में आतिशबाजी न करने का सरकारी अभियान चलाया जाए और इस अभियान में विशेष रूप से स्कूली बच्चो को शामिल किया जाए। यदि आप देख पा रहे तो देख सकते है कि आने वाली पीढ़ी दिवाली पर आतिशबाजी नहीं करने वाली है। वे उन्हें अभी से संक्रमित कर दे रहे है !!

लिंक - <http://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/chhattisgarh-govt-bans-use-of-firecrackers-with-high-decibels/articleshow/61021553.cms>;
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3)
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महाराष्ट्र हाई कोर्ट के आदेश से अब आवासीय इलाको में आतशबाजी नहीं बेची जायेगी। जिन्हे लाइसेंस दिए गए थे उनके लाइसेंस रद्द कर दिए है और अनुज्ञाधारी धारी विक्रेताओं की सीमा को भी घटा कर आधा कर दिया है। इन दोनों हरकतों से आतिशबाजी में काफी गिरावट आएगी।

लिंक - <http://www.timesnownews.com/india/video/mumbai-maharashtra-bombay-high-court-firecrackers-diwali-delhi-national-capital-region/104483>;
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ये लोग अगले 10 सालों में दीपावली से आतिशबाजी को गायब कर देंगे। यह तय है। कुछ काम क़ानून करेगा और बचा हुआ काम हमारे पेड बुद्धिजीवियों के उपदेश कर देंगे। और यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है। ऐसे सभी उत्सव कतार में है जिनमे धार्मिक जमाव होता है।
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4)
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दरअसल इस पूरी कवायद में एक पैटर्न है, जिसकी ज्यादातर लोग अनदेखी कर रहे है। एक एक करके लगातार ऐसे कदम उठाये जा रहे है, जिससे हिन्दू धर्म के "धार्मिक जमाव" में कमी आये। शायद आपको यह अजीब लगे, किन्तु यह सच है कि दीपावली को लक्ष्मी पूजन , होली को होलिका दहन एवं जन्माष्टमी को भोग लगाने मात्र से टिका कर नहीं रखा जा सकता !! यदि आतिशबाजी, रंग गुलाल एवं दही हांडी आदि जैसे मनोरंजन के तत्वो को गायब कर दिया गया तो इन उत्सवों में नागरिको का उत्साह कम होता चला जायेगा और ये उत्सव सांकेतिक स्तर पर ही रह जाएंगे !!! ऐसा होने से "धार्मिक जमाव" में कमी आ जाएगी। और शान्ति काल में किसी भी धर्म को टिकाये रखने के लिए धार्मिक जमाव एवं परोपकार की निर्णायक भूमिका होती है। युद्धकाल में यह फैसला हथियार करते है।
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हिन्दू धर्म का प्रशासन पहले से ही बिगड़ा हुआ है और यह और भी बदतर होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में सिर्फ धार्मिक जमाव ही है जो हिंदू धर्म को आक्सीजन दे रहा है। यदि धार्मिक जमाव में कमी आयी तो हिन्दू धर्म का बचा खुचा आधार भी उखड़ जाएगा और मिशनरीज तेजी से हिन्दू धर्म के अनुयायियों को टेक ओवर कर लेगी।
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अध्यात्म ऊँचा भाव है। किन्तु उत्सवों में आमोद प्रमोद एवं मनोरंजन का तत्व होने से ज्यादातर नागरिक एवं विशेष तौर पर बच्चे / युवा आदि धार्मिक आयोजनों में भाग लेते है। कालांतर में यह आमोद प्रमोद उन्हें अध्यात्म से जोड़ लेता है और वे धार्मिक बने रहते है। उदाहरण के लिए दीपावली का मुख्य "आकर्षण" लक्ष्मी पूजन नहीं है। बल्कि यह आतिशबाजी, नए कपडे एवं मिठाई है। बच्चे मंदिर में प्रसाद लेने जाते है, मूर्ती के दर्शन करने नहीं। लेकिन प्रसाद के निमित्त जाने से ही उनमे धर्म के प्रति जुड़ाव आता है। यदि आप दीपावली को सिर्फ लक्ष्मी पूजन से जोड़ देंगे तो 80% युवाओ एवं बच्चो की रुचि इसमें से खत्म हो जायेगी और आने वाले समय में वे दिवाली मनाना छोड़ देंगे। और यदि मनाएंगे भी तो सांकेतिक रूप से।
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दही हांड़ी प्रतियोगिता, रंग खेलना, महाशिवरात्रि, गणपति स्थापना , दुर्गा पूजा, कुम्भ आदि धार्मिक आयोजनों में जमाव इसीलिए देखने को मिलता है क्योंकि इनमें मनोरंजन का तत्व प्रधान है। रक्षाबंधन एवं राम नवमी में यह तत्व नहीं है इसीलिए इन उत्सवों में जमाव देखने को नहीं मिलता।
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कैसे "धार्मिक जमाव" किसी धर्म को टिकाये रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इस विषय पर मैं जल्दी ही विस्तृत विवरण रखूँगा।
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कृपया प्रधानमंत्री को ट्वीट करें कि सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर केंसिल किया जाए। @PmoIndia पर यह ट्वीट भेजें :

@PmoIndia #CancelScjOrderToBanCrackers SCjs' judgment to ban firecracckers is wrong. Ask Loksabha to print money bill law law to cancel it "
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विशेष टिप्पणी - संघ के सभी कार्यकर्ताओ ने सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर केंसिल करने के लिए पीएम को ट्वीट भेजने से साफ़ मना कर दिया है, और वे अंदरखाने नागरिको को ट्वीट करने से मना कर रहे है। सबूत के लिए आप उनकी वॉल देख सकते है। वहां आपको ऐसा कोई ट्वीट नहीं मिलेगा। वे पूरे देश में दीवाली पर आतिशबाजी को बेन किये जाने का समर्थन कर रहे है, और इसे प्रदुषण से जोड़ दे रहे है !!
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Oct 12 2017 08:17:18 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 15 2017 18:27:03 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

1) सुप्रीम कोर्ट का कहना है ; जो भी हो , हम दिल्ली में पटाके नहीं बेचने देंगे।
2) रोहिंग्यो को देश से बाहर करने पर सुप्रीम कोर्ट की रोक।
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1) सुप्रीम कोर्ट जज एके सीकरी का कहना है -- कुछ लोग हमारे आदेश को साम्प्रदायिक रंग दे रहे है। लेकिन हम दिल्ली में पटाके नहीं बेचने देंगे !!
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<http://epaper.bhaskar.com/detail/1295846/10141573451/0/map/tabs-1/10-14-2017/158/1/image/>;
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क्या सीकरी के पास कोई इंडिकेटर है जिससे उसे यह मालूम हो जाता है कि इस फैसले का विरोध करने वाले लोग "कुछ" है या "ज्यादा" !! मतलब जो मन में आये वो आदेश दो और नागरिको के मत की जैसी मन में आये वैसी व्याख्या करो !! क्या इस जज में इतनी हिम्मत है कि वह दिल्ली में आतिशबाजी बेन पर "जनमत संग्रह" करवाने की अनुमति दे सके ? भूल जाइए !!
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एके सीकरी जब से जज बना है तब से ही यह जनमत संग्रह प्रक्रियाओ का विरोधी है। इसका मानना है कि भारत के आम मतदाताओ को किसी भी विषय पर अपनी सहमती / असहमति दर्ज करवाने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए !! और फिर न्यायमूर्ति पूजक हम आम नागरिको से यह उम्मीद भी करते है कि हम उन्हें "माननीय" कह के संबोधित करे !!
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मेरे विचार में यह फासीवाद बयान है , और भारत के मतदाताओ की अवहेलना करके उनका अपमान करता है। इस आदमी की इतना अपमानजनक बयान देने की हैसियत इसीलिए हुयी क्योंकि यह जानता है कि भारत के नागरिको के पास उसे नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं है।
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अब दीपावली पर आतिशबाजी के बेन का विरोध करने वाले नागरिको को फैसला करना है कि क्या वे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश को नौकरी निकालने का अधिकार चाहते है या नहीं। राईट टू रिकॉल सुप्रीम कोर्ट न्यायधीश का क़ानून आने के अगले 24 घंटे में जज आसमान से उतर कर जमीन पर आ जाएंगे और तमीज से पेश आने लगेंगे।
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2)
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सुप्रीम कोर्ट ने रोहिंग्यो को देश से बाहर निकालने की कार्यवाही को अगली सुनवाई तक रोक दिया है।
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<http://indiatoday.intoday.in/story/rohingya-muslims-refugee-crisis-myanmar-india-supreme-court-security-humanitarian-values/1/1067983.html>;
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अगली सुनवाई 11 नवम्बर को होगी , और उसकी अगली सुनवायी कब होगी वो पता नहीं। सुप्रीम कोर्ट इस मामले को मर्जी पड़े उतने समय तक घसीट सकती है, और चाहे तो रोहिंग्यो को देश से बाहर खदेड़ने पर रोक भी लगा सकती है !!!
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वजह फिर से वही है - सुप्रीम कोर्ट के जज जानते है कि जनता उनका कुछ भी उखाड़ने में सक्षम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के पास सेना है , पुलिस है , सरकारी मशीनरी है और अंतिम फैसला देने की शक्ति है। जबकि भारत के आम नागरिको के पास न तो उन्हें चुनने का अधिकार है और न ही उन्हें नौकरी से निकालने का अधिकार है।
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अब रोहिंग्यो को देश से बाहर खदेड़ने की मांग कर रहे नागरिको को यह तय करना है कि वे सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशो को नौकरी से निकालने का अधिकार चाहते है या नहीं।
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मेरा प्रस्ताव है कि, भारत में मौजूदा सभी जजों को नौकरी से निकाला जाए। कोई अपवाद नहीं। और फिर भारत में जजों के चुनाव हो। बर्खास्त किये गए जज इन चुनावों में अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर सकेंगे। जिन्हें जनता चुने उसकी नौकरी रहेगी, शेष की जाएगी। और जनता के पास यह भी अधिकार होगा कि भ्रष्ट आचरण करने पर नागरिक अपना बहुमत सिद्ध करके इन्हें नौकरी से निकाल सके। इस तरह जो न्यायधीश आयेंगे वे जनता के प्रति जवाबदेह होंगे और प्रजा हितो के लिए काम करेंगे।
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इसके साथ ही भारत में ज्यूरी सिस्टम लागू किया जाए। ज्यूरी सिस्टम आने से क़ानून एवं संविधान की व्याख्या करने का अधिकार आम नागरिको के पास आ जायेगा और वे बहुमत से किसी भी मामले में फैसला कर सकेंगे। ज्यूरी सिस्टम आने से जजों की भूमिका एवं उनकी असीमित शक्तियाँ बेहद कम हो जायेगी।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Oct 16 2017 19:33:00 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सूरत में जैन ( दिगम्बर ) आचार्य शान्ति सागर जी पर बलात्कार का आरोप लगा है। पेड भास्कर के अनुसार आचार्य ने डॉक्टर्स के सामने कहा था कि - "सब कुछ लड़की की सहमति से हुआ, मुझे फँसाया जा रहा है"
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<https://timesofindia.indiatimes.com/city/surat/jain-muni-shantisagar-maharaj-held-for-raping-19-year-old/articleshow/61087316.cms>;
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<http://epaper.bhaskar.com/detail/1297800/10161561153/0/map/tabs-1/10-16-2017/158/1/image/>;
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पीड़िता की आयु 19 वर्ष है। अत: सहमति से बनाये गए सम्बन्धो पर बलात्कार का मामला नहीं बनता। किन्तु लड़की का आरोप है कि बलात्कार किया गया है।
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मेरा प्रस्ताव है कि - सूरत की मतदाता सूचियों में से 25-55 आयु वर्ग के 50 नागरिको की ज्यूरी का चयन किया जाए और यह ज्यूरी इस मुकदमे की सुनवाई करे। यदि ज्यूरी चाहे तो दो तिहाई बहुमत से नार्को टेस्ट लेने का भी फैसला कर सकती है।
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जज सिस्टम में यह कभी भी साबित नहीं हो पायेगा कि यह "हनी ट्रेप" था या बलात्कार।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Oct 16 2017 19:41:16 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

रोहिंग्यो को देश से बाहर भेजने का समर्थन कर रहे कार्यकर्ताओ को यह तय करना चाहिए कि, यदि सुप्रीम कोर्ट मामले को लटका कर रख देता है या इन्हे देश से बाहर भेजने पर रोक लगा देता है, और मोदी साहेब सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश को नौकरी से निकालने का प्रस्ताव संसद में रखने से मना कर देते है तो उनके पास क्या विकल्प है ?
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क्या वे मोदी साहेब को ट्वीट करके यह मांग करेंगे कि "राईट टू रिकॉल सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायाधीश" के क़ानून को गैजेट में प्रकाशित किया जाए, ताकि भारत के आम नागरिक इस जज को नौकरी से निकाल सके ?
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या सुप्रीम कोर्ट के कहने से वे रोहिंग्यो को देश में रखने के लिए राजी है ?
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Oct 17 2017 18:41:24 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

जीएसटी में 5 गंभीर समस्याएं है, जो कि वेल्थ टेक्स में नहीं है :
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१) यह "रिग्रेसिव टेक्स" है - रिग्रेसिव टेक्स का ढांचा इस तरह होता है कि गरीब तबके को सबसे ज्यादा और अमीर वर्ग को सबसे कम टेक्स चुकाना होता है। रिग्रेसिव टेक्स गरीब व्यक्ति को और भी गरीब एवं अमीर व्यक्ति को और भी अमीर बनाता है।
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२) इसमें "मिसिंग ट्रेडर प्रॉब्लम" है - यदि कारोबारी B कारोबारी A से सामान खरीदेगा तो B उसे खरीद पर 28% जीएसटी ( या जो भी दर हो ) चुकाएगा। A यह जीएसटी सरकार में जमा कर देगा और B को इसका इनपुट क्रेडिट मिल जाएगा। लेकिन यदि A यह राशि सरकार में जमा नहीं करता है और धंधा बंद कर देता है तो B को यह राशि सरकार के खाते में फिर से जमा करनी होगी !! अत: इस परिस्थिति से बचने के लिए कारोबारी छोटी इकाइयों से माल लेने से कतराएंगे और वे बड़ी कंपनियों को तरजीह देंगे। इस वजह से छोटे कारोबारी बाजार से बाहर हो जाएंगे और बड़ी कंपनियों का बिजनेस बढ़ेगा।
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३) इसमें "डबल टेक्सेशन ऑन स्मॉल ट्रेडर" प्रॉब्लम है - कम्पोजिट ट्रेडर यदि जीएसटी में पंजीकृत कारोबारी को माल बेचता है तो जीएसटी में पंजीकृत कारोबारी को इनपुट क्रेडिट नहीं मिलेगा। मतलब जीएसटी में पंजीकृत कारोबारी पर डबल जीएसटी आ जाएगा और उसका माल महंगा हो जाएगा। इस वजह से जीएसटी में पंजीकृत ट्रेडर कम्पोजिट कारोबारी से माल नहीं लेंगे। इससे कम्पोजिट ट्रेडर का धंधा सिकुड़ेगा और वे बाजार से बाहर हो जाएंगे। यदि कम्पोजिट ट्रेडर फुल जीएसटी में जाता है तो वह "मिसिंग ट्रेडर प्रॉबल्म" का शिकार हो जाएगा।
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४) यह छोटे कारोबारी की लागत बढ़ाता है - बड़ी कम्पनियो के पास अलग से एकाउंट्स डिपार्टमेंट होता है अत: उन्हें बिल, रिटर्न वगैरह भरने में किसी अतिरिक्त लागत का सामना नहीं करना पडेगा। किन्तु छोटे कारोबारी धंधा भी करते है और टेक्स रिटर्न आदि भी खुद ही भरते है। जीएसटी में प्रति माह रिटर्न फ़ाइल करने होंगे। अब वे खुद इसे करेंगे तो उनके कार्य घंटे कम हो जाएंगे और इसके अलावा कई कारोबारी इन सब पचड़ो को समझते नहीं है। वे इसमें उलझ कर अपनी कार्य क्षमता गँवा देंगे। यदि वे इसके लिए स्टाफ रखते है तो उनकी अतिरिक्त लागत बढ़ जायगी और उन्हें नुकसान होगा। यदि रिटर्न फ़ाइल करने की अवधि को मासिक से बदल कर त्रे मासिक कर दिया जाता है तो मिसिंग ट्रेडर प्रॉब्लम तीन गुना तक बढ़ जायेगी !!
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५) e-way बिल - e-way बिल सिस्टम बहुत ही अव्यवहारिक है, किन्तु यदि इसे लागू नहीं किया गया तो जीएसटी काम ही नहीं कर पायेगा और एक समानांतर आपूर्ति श्रृंखला खड़ी हो जायेगी। और यदि इसे लागू किया गया तो छोटे और मझोले कारोबारियों को बड़े पैमाने पर आर्थिक दंड का सामना करना पड़ेगा और उनके माल की लागत बढ़ जायेगी !!
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कुल मिलाकर जीएसटी में दरो को लेकर कोई समस्या ही नहीं है। दर 10% रखो या 20% , इससे ऊपर दी गयी समस्याओ का समाधान नही होता। अंततोगत्वा टेक्स तो अंतिम उपभोक्ता यानी कि पब्लिक को ही चुकाना होता है, तो दर के कम ज्यादा होने से कारोबारी को कोई विशेष नुक्सान नहीं है। किन्तु पेड मीडिया, पेड अर्थशास्त्रियों एवं राजनैतिक पार्टियों ने जीएसटी दरो को ही मुख्य समस्या के रूप में उछाला है और ऊपर दी गयी बुनियादी एवं खतरनाक समस्याओ को परिदृश्य से गायब कर दिया है। और अब पूरा देश और कारोबारी जीएसटी की दरो को लेकर बहस कर रहे है !!
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तो जीएसटी में बुनियादी गड़बड़ियाँ है। इन्हें सुधारा नहीं जा सकता। जिन जिन देशो में जीएसटी लागू है वहां पर छोटे कारोबारी बाजार से बाहर हो गए और बड़ी इकाइयों ने बाजार पर कब्ज़ा कर लिया। इसे डिजाइन ही इस तरह से किया गया है। समाधान वेल्थ टेक्स है। वेल्थ टेक्स ज्यादा कमाने वाले पर ज्यादा और कम कमाने वाले पर कम टेक्स लगाता है। इसका रिटर्न भी साल में एक दफा भरना पड़ता है, और यह एक प्रोग्रेसिव टेक्स है। सबसे बड़ी बात यह कि जीएसटी जितना रुपया इकठ्ठा करेगा, उससे कहीं ज्यादा रुपया वेल्थ टेक्स से जमा होगा। इससे सरकार की आय बढ़ेगी व हम अपनी सेना का बजट बढ़ा सकेंगे।
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अकेले वेल्थ टेक्स में भारत की पूरी इकोनोमी को दुरुस्त करने की ताकत है। इससे जमीनों की कीमते कम हो जायेगी, जिससे निर्माण इकाईया लगाना एवं कारोबार करना आसान हो जाएगा। आवास की समस्या हल होगी। जीडीपी में तेजी से उछाल आएगा, स्व रोजगार में वृद्धि होगी, गरीबी कम होगी एवं सबसे महत्त्वपूर्ण -- भ्रष्टाचार में कमी आएगी।
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समस्या यह है कि भारत का धनिक वर्ग एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जीएसटी एवं नोटबंदी लाने के एवज में सरकारों को अपना मीडिया और चुनाव लड़ने के लिए नकदी देती है। इसी मीडिया एवं नकदी के बल पर वे चुनाव लड़ते है और उनके प्रचार अभियान की चपेट में आकर जनता उन्हें वोट करती है। इस तरह से धनिक वर्ग एवं नेताओं में सौदा यह ठहरा हुआ है कि -- "तुम हमें इच्छित क़ानून दो , बदले में हम तुम्हे वोट दिलवाएंगे" !! इसका विपरीत भी समझ सकते है -- हम तुम्हे वोट दिलवाएंगे और बदले में तुम उन्ही कानूनों को लागू करोगे जो हम चाहते है !!
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पार्टी और नेता कोई भी हो। इस हम्माम में सभी नंगे है। राष्ट्रवादियो से लेकर छद्म सेकुलर और वामपंथियों से लेकर समाजवादियो तक !!
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तो आपको यह बात समझ लेनी चाहिए कि सिर्फ वोट देने से आपका काम नहीं चलेगा। आपके पास और भी ताकत होनी चाहिए। यदि आपके पास अपने नेताओं को नौकरी से निकालने का अधिकार हो तो यह एक अतिरिक्त ताकत होगी। तब चुनाव जीतने के बाद यदि नेता प्रजा-विरोधी क़ानून लागू करता है तो नागरिक उन्हें 5 साल से पहले ही नौकरी से निकाल सकते है।
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या फिर आपके पास राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष का क़ानून होना चाहिए। इस क़ानून के आने से दूरदर्शन इतना शक्तिशाली हो जाएगा कि निजी न्यूज चेनल्स के दर्शको की संख्या नाटकीय रूपस गिर जायेगी। इस तरह मुख्य धारा का मीडिया नागरिको के नियन्त्रण में आ जायेगा और धनिक वर्ग की सौदेबाजी करने की ताकत घट जायेगी। यह ताकत घटने से वे नेताओं को चुनाव जीतवाने की क्षमता खो देंगे और नेता उनके चंगुल से आजाद हो जायेंगे।
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हमने वेल्थ टेक्स का कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। इसे फिर से अद्यतन किया जा रहा है। जल्दी ही हम इसका परिवर्धित एवं अपडेटेड संस्करण उपलब्ध करवाएंगे। राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष एवं राईट टू रिकॉल पीएम का ड्राफ्ट इस लिंक पर देखा जा सकता है - <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Oct 18 2017 19:33:20 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

उत्सवों में भागीदारी कम होने से धार्मिक जमाव टूटेगा और हिन्दू धर्म के विघटन में तेजी आएगी।
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हिन्दू धर्म का क्षरण उतनी तेजी से क्यों नहीं हो रहा है, जितनी तेजी से होना चाहिये ? हिन्दू धर्म का प्रशासन बेहद कमजोर है और इसे दुरुस्त नहीं किया गया तो अगले 50 वर्षो में इसके अनुयायियों की संख्या लगभग आधी रह जायेगी। यह शान्ति काल की स्थिति है। यदि इस दौरान भारत को युद्ध का सामना करना पड़ जाता है तो अगले 50 वर्षो में हिन्दू धर्म पूरी तरह से लुप्त होने की कगार पर जा सकता है।
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१) ईसाई धर्म लगातार विस्तार कर रहा है , क्योंकि उनके पास "ज्यूरी सिस्टम" है।
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२) इस्लाम ने भी लगातार विस्तार किया है क्योंकि उनके पास हर सप्ताह "एकत्र" होने की प्रक्रिया है।
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३) सिक्ख धर्म अब तक टिका हुआ है क्योंकि उनके पास गुरुद्वारा प्रमुख को चुनने की प्रक्रिया है।
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हिन्दू धर्म के प्रशासन में इनमे से कुछ भी नहीं है, और न ही ऐसी कोई प्रक्रिया है जो इनकी कमी को पूरा करे। इसीलिए वह लगातार जमीन एवं अनुयायी खो रहा है। लेकिन फिर भी इसके विघटन की दर धीमी है। एक बड़ी वजह यह है कि हिन्दू धर्म को अब तक किसी ताकतवर प्रतिस्पर्धी का सामना नहीं करना पड़ा और इस वजह से विघटन की दर धीमी रही। किन्तु अब एफडीआई के माध्यम से मिशनरीज की घुसपेठ भारत में तेजी से बढ़ रही है।
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हिन्दू धर्म के प्रशासन को मजबूत बनाने के लिए हमें "राष्ट्रीय हिन्दू देवालय अधिनियम" की जरूरत है। इस प्रस्तावित क़ानून के आने से हिन्दू धर्म इतना शक्तिशाली हो जाएगा कि वह अन्य धर्मो को अधिगृहित करने लगेगा।
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हिन्दू धर्म का प्रशासन पहले से उतना बदतर है जितना कि हुआ जा सकता है। अत: इसके प्रशासन को तोड़ने के लिए प्रतिस्पर्धी को कुछ ज्यादा नहीं करना है। तो प्रतिस्पर्धी धर्म को हिन्दू धर्म के किन तत्वों को शिथिल करने की जरुरत है ?

१) उत्सवो पर धार्मिक जमाव , २) मंदिर
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हिन्दू धर्म में साल भर बेतहाशा त्यौहार आते है और इनमें से ज्यादातर त्योहारों में अध्यात्म के साथ साथ मनोरंजन का तत्व भी शामिल है। मनोरंजन का तत्व होने से सभी तबके के सभी आयु वर्ग के लोग इन उत्सवो में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते है। इस कवायद से उत्सवो पर भारी संख्या में धार्मिक जमाव देखने को मिलता है और धर्म के प्रति जुड़ाव बना रहता है।
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उदाहरण के लिए , दिवाली पर आतिशबाजी, मिठाई और नए कपडे का चलन बच्चो एवं युवाओ को आकर्षित करता है जबकि गृहणियां साफ़ सफाई रंग रोगन में व्यस्त हो जाती है। बुजुर्गो एवं वरिष्ठ जनों के लिए इसमें लक्ष्मी पूजा। फिर धनिकों के लिए जुआ भी है। सामुदायिकता बढ़ाने के लिए अगले दिन "राम राम"। कुल मिलाकर दिवाली सभी आयु वर्ग के लोगो को खींच लेती है, और लोग इसमें उत्साह के साथ भाग लेते है। किन्तु यहाँ मुख्य तत्व मनोरंजन है जो दीवाली को हिट बनाता है।
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इसी तरह होली पर होलिका दहन उत्साह बनाये नहीं रख सकता। रंग, गुलाल खेलना और ढपली पर फाग गाना वह तत्त्व है जो लोगो की भागीदारी बढाता है। फिर जन्माष्टमी पर मनोरंजन के लिए दही हांड़ी प्रतियोगिता एवं झांकियां है। दुर्गा पूजा एवं गणपति स्थापना पर 9 दिनों तक नाच-गान। और पूजा तो खैर है ही। तो हिन्दू धर्म के ज्यादातर उत्सवो में मनोरंजन के तत्व डाले गए है, ताकि इनमे नागरिको का उत्साह बना रहे। विभिन्न उत्सवो जैसे दुर्गा पूजा / महाशिवरात्रि / कुम्भ आदि पर मेले इस धार्मिक जमाव में और भी वृद्धि कर देते है। प्रतिस्पर्धी धर्म जब उत्सवो पर ऐसा धार्मिक जमाव एवं उत्साह देखते है तो उन्हें पीड़ा होती है।
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तो यदि प्रतिस्पर्धी धर्म भारत में हिन्दू धर्म को और भी कमजोर करना चाहते है तो उन्हें हिन्दू धर्म के त्योहारों को तोड़ना होगा। "वे" ऐसा कैसे कर रहे है ?

१) प्रदुषण का हवाला देकर वे आतिशबाजी का विरोध करते है और अन्य लोगो को भी दिवाली पर आतिशबाजी का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित करते है !!
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२) अगले दौर में वे यह तर्क लेकर आयेंगे कि, देश में बिजली की कमी है और कई गरीब लोगो तक बिजली नहीं पहुँच रही है , किन्तु दिवाली पर हम महज सजावट के लिए इतनी बिजली बर्बाद कर दे रहे है, अत: इस पर भी रोक आनी चाहिए !!
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३) फिर वे इस तरह का अभियान लायेंगे कि देश में घी-तेल की कमी है , और दिवाली पर दीपक जलाने से तेल की घी-तेल की हानि हो रही है। ज्यादा से ज्यादा एक-दो दीपक जलाए और बाकी तेल-घी किसी गरीब को दान कर दें !!!
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४) फिर वे होली पर आयेंगे और होली को पानी की बर्बादी से जोड़ देंगे। लोगो को समझायेंगे कि होली खेलने में करोडो गेलन पानी व्यर्थ हो रहा है और इस बर्बादी के कारण लोग प्यासे मर रहे है !!!
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५) जन्माष्टमी पर वे दही हांडी की उंचाई घटाने की मुहीम छेड़ देंगे। वे लोगो को समझाएंगे कि जन्माष्टमी पर चुपचाप घर पर पंजरी बना कर खा ले। दही हांडी जैसे उत्सवो में हिस्सा न ले। क्योंकि इससे चोट आती है।
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६) गरबा पर वे आपको बताएँगे की इससे किस प्रकार का जानलेवा ध्वनी प्रदुषण होता है। यदि फिर भी लोग इकट्ठे होने से न माने तो उन्हें साइलेंट गरबा करने की सलाह देंगे। साइलेंट गरबा में प्रत्येक खिलाडी कान में हेडफोन से गाना सुनता रहता है और नाचता रहता है। इस तरह पंडाल पूरी तरह से साइलेंट रहता है। यह सन्नाटा है , लेकिन वे इसे "शांति" बताते है।
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७) शिवरात्रि आने पर वे आपको बतायंगे की शिवलिंग पर दूध चढाने की जगह यह दूध किसी बच्चे को पिला दो। इससे व्यक्ति के पास शिवरात्रि पर मंदिर जाने की वजह खत्म हो जायेगी और धार्मिक जमाव एवं मेला टूटेगा।
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८) अंतिम संस्कार का वे यह कह कर विरोध करेंगे कि इससे लकड़ी की हानि हो रही है और प्रदुषण हो रहा है !! अत: शव को बिजली से जला दो।
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ये छोटे में लिखा है। उनके दिमाग काफी उर्वर है। वे सभी त्योहारों में ऐसे ढेर सारे बिंदु खोजकर ला सकते है, जिससे उत्सवो को सुट्ट किया जा सके। यहां तक कि वे करणी माता मंदिर ( चूहों वाली माता ) में प्रसाद, नारियल, ध्वजा, धूपबत्ती आदि चढाने पर भी रोक लगा चुके है। वजह - इससे मंदिर में प्रदुषण होता है !!
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किन्तु , यदि आप हिन्दू धर्म की परम्पराओं में मानते है और इन्हें जारी रखना चाहते है तो दिवाली पर आतिशबाजी करें , होली पर रंग खेले, शिवरात्रि पर मेले में भाग ले , साइलेंट गरबा का विरोध करे और उन लोगो का भी विरोध करे जो "पर्यावरण के नाम पर" हिन्दू त्योहारों की परम्पराओं पर रोक लगाना चाहते है। यह हर तरीके से साबित है कि दिवाली पर आतिशबाजी का प्रदुषण से कोई लेना देना नहीं है। आतशबाजी से सिर्फ एक दिन प्रदुषण होता है और उस एक दिन भी आतिशबाजी का प्रदुषण में हिस्सा सिर्फ 6% है !!! और यह प्रदुषण में अगले 8 घंटे में वातावरण से पूरी तरह से तिरोहित हो जाता है।
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कुल मिलाकर सयानो की बातों में न आये और दिवाली पर खुद भी आतिशबाजी करें, और दुसरो को भी प्रेरित करे। लेकिन आतिशबाजी करते समय अपनी सुरक्षा का ध्यान रखे। सूती कपडे पहने और यदि उपलब्ध हो तो प्लेन ग्लास का चश्मा लगा ले। अनार, फुलझड़ी , चकरी आदि सुरक्षित पटाके चलाये और मिर्ची बम, रोकेट आदि पटाको की अवहेलना करे। तथा बच्चो को अपने पर्यवेक्षण में आतिशबाजी करवाएं।
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आतिशबाजी युक्त दिवाली की शुभकामनाएं।
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( पुनश्च - सनद रहे कि अंतिम एवं निर्णायक समाधान "राष्ट्रीय हिन्दू देवालय अधिनियम" के लागू होने से ही होगा। यदि हिन्दू धर्म की संस्थाओ / मंदिरो / मठो / आश्रमों आदि के प्रशासन को दुरुस्त नहीं किया गया तो हिन्दू धर्म इन सभी उत्सवो एवं इनमे होने वाले धार्मिक जमाव के बल पर मिशनरीज के सामने टिक नहीं सकेगा। )
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Oct 19 2017 19:53:37 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

दिवाली पर प्रदूषण बढ़ जाता है क्योंकि ज्यादातर लोग खरीददारी करने के लिए वाहन लेकर निकलते है। माल की खपत ज्यादा होने से से ट्रको का परिवहन भी बढ़ता है और और इस वजह से भी प्रदुषण बढ़ जाता है।
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आतिशबाजी से होने वाला प्रदुषण वातावरण में सिर्फ 1 घंटे के लिए ही टिका रह सकता है। अत: मध्यरात्रि तक आतिशबाजी का सारा प्रदुषण गायब हो जाता है।
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दूसरे शब्दों में , प्रदुषण आतिशबाजी के कारण नहीं है। प्रदुषण की असली वजह ट्रेफिक है।
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पिछले साल दिवाली के अगले दिन सुबह 5 बजे दिल्ली और लाहौर में प्रदुषण का स्तर एक समान था !!! क्यों ? क्योंकि दोनों इलाको में किसान फूस जला रहे थे। फूस जलाने से भी भारी प्रदुषण होता है।
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कुल मिलाकर प्रदुषण की सबसे बड़ी वजह ट्रेफिक है , और दूसरा कारण फूस है। मतलब मोदी साहेब के आदेश पर केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन प्रदुषण के लिए आतिशबाजी को जिम्मेदार ठहरा कर नागरिको को भ्रमित कर रहे है। और शर्म की बात है कि संघ=बीजेपी ( गंगाधर = शक्तिमान ) के कार्यकर्ता आतिशबाजी पर बेन का समर्थन कर रहे है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Oct 19 2017 20:12:41 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

संघ के नेता और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फडणवीस स्कूली बच्चो को पर्यावरण की रक्षा करने की शपथ दिलवा रहे है !!!
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उन्होंने बच्चो को यह संकल्प दिलाया है कि वे दिवाली पर आतिशबाजी न करे !!!
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साफ़ है कि संघ के नेता दिवाली की आतिशबाजी पर बेन का समर्थन करते है। इससे यह सिद्ध होता है कि संघ के नेता कर उनके कार्यकर्ता छद्म हिंदूवादी है।
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<https://twitter.com/CMOMaharashtra/status/917731023751909383>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Oct 19 2017 21:24:37 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

मेरे राजनैतिक विश्वास
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[ 1 ] जजों के बारे में :
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मेरा मानना है कि भारत की सुप्रीम कोर्ट के जजों में से 80% पूरी तरह से भ्रष्ट है, भाई भतीजा वादी है और उन्होंने देशी-विदेशी धनिको के साथ कुटिल गठजोड़ बना रखे है। जो उन्हें पैसा देता है वे उसके हिसाब से काम करते है। शेष 20% भी किसी काम के नही है। क्योंकि वे भारत की अदालतों में किसी भी प्रकार का सुधार लाने के लिए कोई फ़िक्र मोल लेना नहीं चाहते। वे अपनी नौकरी करते है और आँखें मूँद कर पड़े रहते है।
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मेरा यह भी विश्वास है कि भारत की हाई कोर्ट जजों में से भी 80% पूरी तरह से भ्रष्ट है, भाई भतीजा वादी है और उन्होंने देशी-विदेशी धनिको के साथ कुटिल गठजोड़ बना रखे है। साथ ही ये पदोन्नति के भूखे भी है। जो उन्हें पैसा देता है या इन्हे पदोन्नति का चुग्गा डाल देता है , वे उसके हिसाब से फैसले दे देते है। शेष 20% भी किसी काम के नही है। क्योंकि वे भारत की अदालतों में किसी भी प्रकार का सुधार लाने के लिए कोई कदम उठाना नहीं चाहते।
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मैं यह भी विश्वास करता हूँ कि सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट की तरह ही भारत की निचली अदालतों के जजों में से भी 70% पूरी तरह से भ्रष्ट है, भाई भतीजा वादी है और उन्होंने देशी धनिको के साथ कुटिल गठजोड़ बना रखे है। वे पदोन्नति के भूखे तो है ही साथ ही वे अच्छी जगह पोस्टिंग पाने के लिए भी लालायित रहते है। इस वजह से वे हाई कोर्ट / सुप्रीम कोर्ट जजों को खुश रखने के नजरिये से फैसले देते है। और जो भी उन्हें पैसा देता है उसके लिए तो खैर काम करते ही है। शेष 30% भी किसी काम के नही है। क्योंकि वे भारत की अदालतों में किसी भी प्रकार का सुधार लाने के लिए कोई लोड लेना नहीं चाहते। वे अपनी नौकरी करते है और खामोश रहते है।
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कुछ लोग मेरे इस विश्वास से इत्तिफ़ाक नहीं रखते। उनका मानना है कि भारत का सबसे ज्यादा भ्रष्ट महकमा न्यायपालिका ही है , और सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट के तो सारे ही जज भ्रष्ट है। एक भी अपवाद नहीं है। किन्तु यह उनका मानना है। मुझे लगता है कि 80% जज ही भ्रष्ट है, और शेष 20% निकम्मे है, भ्रष्ट नहीं है।
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मैंने अपना यह रुख ट्विटर पर भी रखा है।
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a) #iBelieve , #AboutJudges , #Over80percentSupremeJudgesAreCorruptNepoticNexused and rest are useless
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ट्विटर लिंक - <https://twitter.com/PawanJury/status/921120243619004416>;
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b) #iBelieve , #Over80percentSupremeJudgesAreCorruptNepoticNexused and rest are useless. same is my belief abt high/lower judges. 80% corrupt

ट्विटर लिंक - <https://twitter.com/PawanJury/status/921123395160256513>;
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यदि आप भी मानते है कि सुप्रीम कोर्ट में 80% से ज्यादा जज भ्रष्ट है, तो निचे दी गयी हेश टैग को अपने ट्विटर अकाउंट से ट्वीट करें।

#Over80percentSupremeJudgesAreCorruptNepoticNexused
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समाधान - सुप्रीम कोर्ट , हाई कोर्ट एवं निचली अदालतों के सभी जजों को नौकरी से निकाल कर देश में ज्यूरी सिस्टम लागू किया जाए, तथा नए जजों की नियुक्तियां राईट टू रिकॉल जज कानूनों द्वारा की जाए।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 20 2017 18:14:50 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

आतिशबाजी युक्त दिवाली ( 19 अक्टूबर 2017 )

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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 20 2017 18:39:51 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

[ टू चाइल्ड पॉलीसी के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट का अपडेटेड संस्करण ]
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यह प्रस्तावित क़ानून दो से अधिक संतान धारण करने वाले अभिभावकों पर कुछ दंडात्मक प्रावधान लगाता है। परन्तु ( और यह परन्तु बेहद महत्त्वपूर्ण है ) जिन अभिभावकों के 1 या 2 या 3 पुत्रियाँ है किन्तु कोई भी पुत्र नहीं है, उन्हें इस क़ानून के अनुसार कुछ अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिलेंगे, एवं उन्हें किसी भी प्रकार के आर्थिक दंड का सामना नहीं करना होगा। जिनके 4 पुत्रियाँ है उनको प्राप्त होने वाले अतिरिक्त आर्थिक लाभ रोक दिए जायेंगे, किन्तु उन्हें किसी आर्थिक दंड का सामना नहीं करना पड़ेगा। किन्तु यदि किसी व्यक्ति के दो पुत्र या एक पुत्री एक पुत्र है और फिर भी वे एक संतान और पैदा करते है तो उन्हें कुछ आर्थिक दंड का सामना करना पड़ेगा। किन्तु यदि किसी व्यक्ति के 4 पुत्र या एक पुत्र और कुछ पुत्रियाँ है तथा वह 2 और पुत्र या दो और पुत्रियों को जन्म देता है तो उसे कारावास की सजा हो सकती है या उसकी नसबंदी की जा सकती है।
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तो इस तरह यह "दो बच्चों का क़ानून" पुत्रियों को कुछ अतिरिक्त छूट प्रदान करते है।
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इसके अलावा आदिवासी ( अनुसूचित जनजाति ) में शिशु मृत्यु दर अधिक है , अत: ये क़ानून उन्हें एक अतिरिक्त संतान की छूट प्रदान करता है। किन्तु जनजाति के अलावा शेष सभी पर समान रूप से क़ानून लागू होगा।
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इस क़ानून की मुख्य धारा (5.2) है।
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टू चाइल्ड पालिसी का कानून ड्राफ्ट
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[ टिप्पणी : इस कानून ड्राफ्ट को लोकसभा में साधारण बहुमत द्वारा पारित करके देश में लागू किया जा सकता है। चूंकि इसे धन विधेयक के रूप में पारित किया जा सकता है, अत: इस क़ानून को राज्यसभा से पास करने की जरूरत नहीं है | यह क़ानून ड्राफ्ट भारतीय संविधान के किसी भी मौजूदा प्रावधान का उलंघन नहीं करता, अत: इसके लिए किसी प्रकार के संवैधानिक संशोधन की ज़रूरत भी नहीं है | यदि किसी सरकार के पास लोकसभा में साधारण बहुमत हो तो इसे लोकसभा से पास करके देश में लागू किया जा सकता है।
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जो नागरिक इस कानून ड्राफ्ट को भारत में लागू करवाना चाहते हैं वे @PmoIndia पर #TwoChildLaw , के साथ mygov .in पर अपलोड किये गए इस ड्राफ्ट के पीडीएफ का लिंक और इस पीडीएफ का sha1 हैश लिखकर पीएम को ट्वीट कर सकते है।
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इस ड्राफ्ट के दो भाग है -
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भाग -1 : नागरिको के लिए सामान्य निर्देश
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भाग - 2 : अधिकारीयों और नागरिकों के लिए निर्देश और टिप्पणियाँ
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इस क़ानून के महत्वपूर्ण खंड है - (5.2.1) से (5.2.10) , (7) ]
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भाग -1 : नागरिको के लिए सामान्य निर्देश
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(1) टिप्पणी : इस खंड में इस क़ानून ड्राफ्ट का सारांश दिया गया है। इस खंड में दिए गए निर्देश किसी भी पक्षकार पर बाध्यकारी नहीं है।
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(1.1) यह कानून लागू होने के एक साल बाद जिन नागरिको के संतानों की संख्या 2 से अधिक है तथा इसमें से 1 संतान का जन्म यह कानून लागू होने के एक साल बाद हुआ है , उन्हें सरकार से प्राप्त होने वाले अनुदानों एवं अन्य आर्थिक सहायताओ में 33% की कटौती कर दी जायेगी। और यदि उनकी संतानो की संख्या 3 से अधिक है तथा एक संतान का जन्म यह कानून लागू होने के एक साल बाद हुआ है तो कटौती 66% होगी।
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(1.2 ) यह कानून लागू होने के एक साल बाद, जिनकी 4 से अधिक संताने है और 1 संतान का जन्म यह कानून लागू होने के एक साल बाद हुआ है तो उन्हें 2 साल तक के कारावास और जुर्माने का सामना करना पड़ेगा। जिनकी 5 से अधिक संताने है और साथ में 2 संतानो का जन्म यह कानून लागू होने के एक साल बाद पैदा हुआ है तो उन्हें 2 और सालो के कारावास और जुर्माने का सामना करना पड़ेगा।|
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(1.3) जुर्माने और सजा का निर्णय जूरी सदस्य करेंगे। इस जूरी मंडल का चयन ज़िले / राज्य या भारत की मतदाता सूची में से क्रम रहित तरीके से किया जाएगा। जूरी सदस्यों का आयु वर्ग 25-55 वर्ष के मध्य होगा तथा इस जूरी मंडल में 12-1500 तक नागरिक हो सकेंगे।
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(1.4) हमारे समाज में बहुधा पुत्र प्राप्ति के लिए स्वाभाविक झुकाव एवं पुत्रियों के प्रति उदासीनता देखने में आती है। तो, यदि किसी दंपत्ति के दो बेटियां हैं तो इस कानून में सजा आदि तय करने के उद्देश्य से उन्हें एक संतान ही माना जायेगा। आदिवासियों में संतानो की मृत्यु दर अधिक है। अत: आदिवासियों को एक संतान "अधिक" रखने की अतिरिक्त छूट दी गयी है। यह छूट सिर्फ आदिवासियों को प्राप्त होगी, अनुसूचित जातियों या अन्य पिछड़ा वर्ग या अल्पसंख्यको को यह विशेषाधिकार नहीं मिलेगा।
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(1.5) जुड़वा, विकलांग संतानों और अन्य दुर्लभ जटिल मामलों के बारे में स्पष्टीकरण खंड 6 में दिया गया है।
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(1.6) प्रत्येक व्यक्ति, पुरुष या स्त्री, के लिए संतानों को अलग-अलग गिना जायेगा। तो उन मामलों में जब किसी को पूर्व विवाह से संताने थी या विवाह के अलावा संताने थी , संतान संख्या पति और पत्नी के लिए अलग अलग हो सकती है। किसी विवाद की स्थिति में वास्तविक जैविक पिता या माता को ही पिता या माता माना जाएगा। जूरी सदस्य किसी विवाद का निर्णय करने के लिए डीएनए टेस्ट के आदेश दे सकते है।
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भाग-2 : अधिकारीयों और नागरिकों के लिए निर्देश और टिप्पणियाँ
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(2) टिप्पणियाँ: इस ड्राफ्ट में दी गयी टिप्पणियाँ कार्यकर्ताओं, जूरी सदस्यों और नागरिको के लिए सामान्य निर्देश है और ये किसी पर भी बाध्यकारी नही है।
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(3) प्रधानमंत्री एक "राष्ट्रीय जनसँख्या नियंत्रण अधिकारी" को नियुक्त करेंगे जिसे भारत के नागरिक इसी क़ानून में दी गयी "राईट टू रिकॉल राष्ट्रीय जनसँख्या नियंत्रण अधिकारी" प्रक्रिया का प्रयोग करके बदल सकेंगे। राष्ट्रीय जनसँख्या नियंत्रण अधिकारी स्टाफ के लिए केंद्र या राज्य सरकार से पदासीन कर्मचारियों को ले सकेगा , सरकारी विभागों में उपलब्ध आंकड़ो / सेवाओ का उपयोग कर सकेगा या वह अस्थायी आधार पर अधिक कर्मचारियों की भर्ती भी कर सकता है।
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(3.1) कर्मचारियों और आंकड़ो / सेवाओ का उपयोग करके राष्ट्रीय जनसँख्या नियंत्रण अधिकारी भारत में सभी नागरिकों और उनके माता-पिता और संतानों की सूची तैयार करेगा।
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(3.2) राष्ट्रीय जनसँख्या नियंत्रण अधिकारी समाचार पत्रों और टीवी / रेडियो द्वारा सभी नागरिकों को इस जनसँख्या नियंत्रण कानून के बारे में सूचना भी जारी करेगा।
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(4) यदि किसी व्यक्ति, पुरुष या स्त्री, के पास बाद में दिए खंडो में बतायी गयी संतानों की संख्या से अधिक संताने है, तो खनिज आमदनी भुगतान में कटौती, आर्थिक सहायता में कटौती, जुर्माना और कारावास लागू हो सकते है। आदिवासियों के लिए संतानों की संख्या अन्य के लिए निर्धारित संतानों की संख्या से एक संतान अधिक हो सकती है। सिर्फ आदिवासियों को ही यह छूट मिलेगी। अनुसूचित जातियों ,या अन्य पिछड़ा वर्ग या अल्पसंख्यको को यह विशेषाधिकार नहीं मिलेगा।
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(4.1) यह कानून लागू होने के 5 साल बाद सजा की अवधि बढ़ जायेगी। 5 साल बाद सजाओं की जानकारी बाद के खंडों में दी गयी है।
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(5) भुगतान और आर्थिक सहायता में कटौती, जुर्माना और कारावास नीचे के खंडो में दिए गए है। खंड 7 में इसका सारांश है।
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(5.1) यह कानून लागू होने के 1 साल बाद यदि किसी व्यक्ति के कोई संतान पैदा नहीं हुई है , तो सजा या भुगतान और आर्थिक सहायता में कटौती नहीं होगी। लेकिन भुगतान में वृद्धि हो सकती है।
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(5.2) लागू हो सकने वाले अतिरिक्त भुगतान, जुर्माना और सजा निम्नलिखित है :
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कृपया ध्यान दे : निम्नलिखित खंडों में, D का अर्थ है सिर्फ एक पुत्री और S का अर्थ है सिर्फ एक पुत्र। DD का अर्थ है दो पुत्रियाँ और DS का अर्थ है पहली संतान पुत्री है और दूसरी संतान पुत्र है। DDS का अर्थ है पहली संतान पुत्री है, दूसरी पुत्री है और तीसरी पुत्र है। दूसरे शब्दों में इस खंड में संतानों के पैदा होने का क्रम बताया गया है ना कि सिर्फ कुल संख्या। तो DSD का अर्थ है पहली संतान पुत्री, दूसरी पुत्र और तीसरी पुत्री है। और इस तरह SDD, DSD, DDS अलग अलग क्रम को दर्शाता है।
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(5.2.1) निसंतान - यदि किसी व्यक्ति की आयु 18 से 23 वर्ष के मध्य है तब उसे प्राप्त होने वाली खनिज रोयल्टी व सरकारी जमीनों के किराये से प्राप्त होने वाली राशि में 33% की अधिक वृद्धि हो जायेगी। 23 वर्ष की आयु के बाद निसंतान होने पर कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं मिलेगा।
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(5.2.1.1) टिप्पणी : सिर्फ ऊपर दिए गए खंड के लिए ही आयु सीमा मान्य है, निचे दिए गए सभी खंडो के लिए आयु सीमा मान्य नहीं है।
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(5.2.2) S - कोई सजा नहीं और ना ही रोयल्टी का अतिरिक्त भुगतान।
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(5.2.3) D या DD या DDD - कोई सजा नहीं और खनिज रोयल्टी एवं सरकारी जमीन से आने वाले किराये में 33% की अतिरिक्त वृद्धि।
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(5.2.4) DDDD - कोई सजा नहीं और खनिज आमदनी और सरकारी जमीन से आने वाले किराये में 66% की अतिरिक्त वृद्धि।
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(5.2.5) SS, SD, DS, DDS, DDDS, DDDDS, DDDDD - कोई सजा नहीं और आमदनी का कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं |
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(5.2.6) एक संतान, पुत्र या पुत्री खंड (5.2.5) के बाद - खनिज आमदनी में 33% कटौती 10 साल के लिए , ना कारावास और ना जुर्माना।
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(5.2.7) एक संतान, पुत्र या पुत्री खंड (5.2.6) के बाद - खनिज आमदनी में 66% कटौती 10 साल के लिए , ना कारावास और ना जुर्माना।
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(5.2.8) एक संतान, पुत्र या पुत्री खंड (5.2.7) के बाद - खंड (5.2.7) की सजा और साथ में 10 साल के लिए आय का 10% जुर्माना ( न्यूनतम रु 1000 प्रति महिना और अधिकतम रु 10000 प्रति महिना ), ना कारावास।
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(5.2.9) एक संतान, पुत्र या पुत्री खंड (5.2.8) के बाद - खंड (5.2.8) की सजा और साथ में 2 साल तक के लिए कारावास।
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(5.2.10) प्रत्येक संतान के लिए खंड (5.2.9) के बाद - खंड (5.2.9) की सजा और साथ में प्रति संतान के लिए 2 अधिक साल के लिए कारावास और बाध्यकारी नसबंदी।
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(5.3) कानून लागू होने के 5 साल बाद, अधिक संतान उत्पत्ति पर होने वाली सजा इस प्रकार है -
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(5.3.1) खंड (5.2.1) से (5.2.5) तक के मामलों में संतान संख्या के लिए - कोई सजा नहीं।
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(5.3.2) खंड (5.2.6) में संतान संख्या के लिए, खंड (5.2.7) में दी गयी सजा मिलेगी, और खंड (5.2.7) में संतान संख्या के लिए, खंड (5.2.8) में दी गयी सजा मिलेगी और सभी खंडो के लिए इसी प्रकार से सजा मिलेगी। दूसरे शब्दों में, खंड (5.2.5) के बाद सभी खंडो के लिए सजा "एक स्तर आगे" हो जाएगी।
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(5.4) जुर्माना संग्रहित करने में नियम - जुर्माना प्रत्येक माता-पिता पर 1000 रू प्रति महीना न्यूनतम तथा 10000 रू प्रति महीना अधिकतम होगा। लेकिन संग्रहित जुर्माना मासिक आय के 10% से अधिक नहीं होगा। तो यदि व्यक्ति की आय 10000 रू से कम है तब उसकी आय का 10% जुर्माना ही लिया जायेगा और शेष राशि "लंबित जुर्माना" के रूप में रखी जाएगी। लंबित जुर्माने पर प्रचलित दर के अनुसार ब्याज देय होगा। "लंबित जुर्माना" के मामले में, अवधि 10 साल के बाद भी बढाई जा सकती है, जब तक कि सारा लंबित जुर्माना ब्याज सहित संग्रहित नहीं हो जाता। अमुक व्यक्ति चाहे तो लंबित जुर्माना शीघ्र अति शीघ्र अदा कर सकता है। और राशियाँ 1000 रू और 10,000 रू महंगाई दर के अनुसार प्रति वर्ष बढाई जा सकती है।
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(5.5) अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष प्रावधान - धारा (5.4) के प्रावधान लागू करते समय जिस एक संतान ( पुत्र या पुत्री ) की छूट दी जायेगी उसका चयन एवं संतानों की गणना इस तरीके से की जायेगी जिससे जुर्माने की राशि में अधिकतम कटौती हो। लेकिन अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति जिन्होंने सरकारी नौकरी या निजी नौकरी या सरकारी या निजी कॉलेज में दाखिला लेने के लिए आरक्षण का लाभ लिया है, इस विशेषाधिकार से वंचित रहेंगे। और अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति जिनकी संपत्ति रु 1 करोड़ से अधिक या सालाना आय 5 लाख रू है उन्हें भी इसका लाभ नहीं मिलेगा। ये छूटें सिर्फ अनुसूचित जनजाति के लिए है।
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(6) कुछ जटिल और विशेष परिस्थितियां
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(6.1) इस कानून के पारित होने से पूर्व ( या पारित होने के 1 वर्ष के अन्दर) जन्मी संतानों के कारण कोई भी जुर्माना या सजा नहीं होगी।
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(6.2) यदि अंत में जन्मी संताने जुडवा हैं तो उनको एक संतान ही गिना जाएगा। लेकिन यदि जुडवा संतानों के बाद कोई संतान जन्म लेती है तो जुडवा बच्चों को दो अलग संतानों के रूप में गिना जाएगा।
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(6.3) गोद ली गयी संतानों को गिना नहीं जाएगा।
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(6.4) दिव्यांग संतानों को गिना जाएगा। माता-पिता को दिव्यांग संतानों के लिए 66% अधिक खनिज रोयल्टी दी जाएगी।
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(6.5) यदि जन्मित संतान पुत्र या पुत्री नहीं है तो ऊपर लिखे नियमो को लागू करते समय उस संतान को पुत्री के रूप में गिना जाएगा।
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7) यह खंड धारा 5 के समान ही है। लेकिन पाठन में सुविधा के लिए इसे टेबल के रूप में रखा गया है। टेबल देखने के लिए पीडीऍफ़ डाऊनलोड करें।
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(J) जुर्माने एवं सजा निर्धारण के लिए जूरी ट्रायल के प्रावधान ( jury trial )
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(J.1) जब भी कभी राष्ट्रीय जनसख्या नियंत्रण अधिकारी ( या उनके कर्मचारी ) किसी नागरिक को खनिज रोयल्टी एवं सब्सिडी के रूप में मिलने वाली धन राशि को कम करने का निर्णय करेंगे या किसी तरह की सजा देना या जुर्माना लगाना चाहेंगे तो मामले के विचार के लिए राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी 25 से 55 तक की उम्र के नागरिकों को रैंडमली चुनेंगे और एक जूरी मंडल का गठन करेंगे। और जब भी कोई नागरिक किसी राष्ट्रिय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी के कर्मचारिओं के विरुद्ध कोई शिकायत दर्ज कराना चाहेंगे तब भी राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी वेसे ही एक जूरी मंडल का गठन करेंगे। ये खंड जूरी मंडल के गठन से सम्बंधित व्यवस्थाएं देता है।
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(J.2) राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी प्रत्येक जिले के लिए एक जूरी प्रशासक को नियुक्त करेंगे जिन्हें जिला जूरी प्रशासक कहा जाएगा। प्रत्येक राज्य के लिए भी एक जूरी प्रशासक को नियुक्त करेंगे जिन्हें राज्य जूरी प्रशासक कहा जाएगा और पुरे देश के लिए एक जूरी प्रशासक को नियुक्त करेंगे जिसे राष्ट्रिय जूरी प्रशासक कहा जाएगा।
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(J.3) अधिक संतानों के मामले या जनसंख्या नियंत्रण अधिकारियों के प्रति शिकायत के विषय में मामलों के लिए जूरी ट्रायल :
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(J.3.1) अधिक संतान धारण करने वाले आरोपी नागरिक और राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी के बीच मामला उस जिला न्यायालय में दर्ज किया जाएगा जिस जिले का आरोपी निवासी है। यदि जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी के विरुद्ध कोई शिकायत है तो उस जिले के न्यायालय में मामले को दर्ज किया जाएगा जिस जिले में अधिकारी नियुक्त हैं। यदि कोई नागरिक या राष्ट्रिय जनसँख्या नियंत्रण अधिकारी मामले को उसी राज्य के किसी दुसरे जिले में स्थानांतरण करना चाहते हैं तो वे राज्य जूरी प्रशासक या राज्य उच्च न्यायालय की अनुमति से ऐसा कर सकते हैं। और इनमे से कोई भी पक्ष यदि मामले को राज्य से बाहर अन्य किसी राज्य के किसी जिले में स्थानान्तरित करना चाहते हैं तो वे राष्ट्रिय जूरी प्रशासक या सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति से ऐसा कर सकते हैं। .
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(J.3.2) जिले में दर्ज हुए किसी भी मामले के लिए जिला जूरी प्रशासक जिले के विज्ञान ,इन्जिनीयरिंग ,गणित ,चिकित्सा शास्त्र के स्नातकों की सूचि में से 3 से 10 स्नातक चुनेगें जो की इस मामले में सहायता करने के इच्छुक हो। चुने हुए स्नातकों की उम्र 25 में से 55 के मध्य होनी चाहिए ,और उन्हें 5 वर्ष का कार्य अनुभव होना चाहिए।
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(J.3.3) जिला जूरी प्रशासक भारत की मतदाता सूची में से रैंडमली 25 से 55 वर्ष के नागरिकों को चुनेंगे। जूरी मंडल के लिए वे नागरिक पात्र होंगे जो पिछले 10 वर्षों के दौरान किसी जूरी मंडल में ज्यूरी सदस्य न बने हो तथा उनके ऊपर कोई आरोप सिद्ध न हुआ हो।
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(J.3.4) जूरी सदस्यों की संख्या का निर्धारण
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(a) किसी अधिकारी के विरुद्ध हुई शिकायत के मामले में जूरी सदस्यों की संख्या न्यूनतम 12 और अधिकतम 1500 होगी। आरोपी अधिकारी के पद की वरिष्ठता के अनुसार श्रेणी-4 ,श्रेणी-3 ,श्रेणी-2 और श्रेणी-1 के लिए जूरी सदस्य संख्या 12 ,50 ,200 या 500 हो सकती है। यदि अधिकारी बहुत ही वरिष्ठ हैं तो सदस्यों की संख्या 500 से अधिक हो कर अधिकतम 1500 तक हो सकेगी।
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(b) अधिक संतानों के कारण नागरिक पर दर्ज मामले के लिए नागरिक की वार्षिक आय और संपत्ति के पांचवे हिस्से में से जो अधिक है , वो राशि यदि 5 लाख से अधिक है तो जूरी सदस्यों की संख्या 12 होगी और इस राशि में प्रत्येक 5 लाख की वृद्धि के साथ जूरी मंडल में 1 सदस्य बढाया जाएगा। वार्षिक आय की गणना के लिए नागरिक की पिछले 3 वर्षों की वार्षिक आय के औसत को वार्षिक आय माना जाएगा।
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(c) जूरी सदस्यों की अधिकतम संख्या 1500 होगी।
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(J.3.5) जूरी सदस्यो को चुनने का क्षेत्र - जूरी सदस्य उन जिलों से चुने जाएंगे जहां के न्यायालय वीडियो कांफ्रेंस द्वारा उस जिला न्यायालय से जुड़े हों जहां मुकदमे की सुनवाई चलेगी। यदि कोई भी जिला न्यायालय उस जिले के न्यायालय से वीडियो कांफ्रेंस द्वारा नही जुडा हुआ है जहां सुनवाई चल रही है, तो सारे जूरी सदस्य उस जिले से ही चुने जाएंगे। सुनवाई उस भाषा में होगी जिस भाषा को ज्यूरी सदस्य भली भाँती समझते है।
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(J.3.6) जूरी सदस्य दोनों पक्षों को एक एक घंटे तक सुनेंगे। जब 65% से ज्यादा जूरी सदस्य कहेंगे कि वे काफी सुन चुके हैं, तब सुनवाई समाप्त होगी।
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(J.3.7) जुर्माने और निर्दोषता का निर्णयन
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(J.3.7.1) किसी अधिकारी के विरुद्ध दर्ज शिकायत के मामले के लिए - यदि 75% से अधिक जूरी सदस्य ये घोषणा करते हैं कि आरोपी अधिकारी को निलंबित कर देना चाहिए तो राष्ट्रिय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी उनको निलंबित कर सकते हैं या ऐसा नहीं भी कर सकते हैं। यदि 75% से अधिक जूरी सदस्य किसी जुर्माने की राशि पर सहमत हो जाते हैं तो राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी आरोपी अधिकारी से जुर्माना ले सकते हैं या नहीं भी ले सकते हैं। यदि शिकायत कर्ता को ये लगता है कि राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी ने जूरी सदस्यों के निर्णय को लागू नही किया है तो वो भारत के नागरिकों से ये आग्रह कर सकते हैं कि राष्ट्रिय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी को राइट टू रिकॉल राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी की धाराओं का प्रयोग कर नौकरी से निकाल दिया जाए।
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(J.3.7.2) अधिक संतान होने के कारण हुए मामले के लिए - आरोपी नागरिक को देय सरकारी अनुदानों में कटौती , जुर्माने और कारावास आदि पर 75% जूरी सदस्यों द्वारा लिए गये निर्णय को अंतिम निर्णय माना जाएगा।
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(J.3.8) जिला जूरी मंडल के निर्णय के विरुद्ध राज्य उच्च न्यायालय के जज या जूरी मंडल के समक्ष और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के जज या जूरी मंडल के समक्ष अपील की जा सकेगी।
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(RTR) राईट टू रिकॉल राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी के लिए प्रावधान
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(RTR.1) यदि भारत का कोई मतदाता राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी बनना चाहता है, तो वह व्यक्तिगत रूप से अपने जिला कलेक्टर कार्यालय में उपस्थित हो सकता है। जिला कलेक्टर उससे सांसद के चुनाव में जमा होने वाली राशि के बराबर का आवेदन शुल्क लेकर राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी पद के लिए उसकी उम्मीदवारी स्वीकार करेगा और उसे एक विशिष्ट एक सीरियल नंबर जारी करेगा।
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(RTR.2) कोई भी मतदाता पटवारी कार्यालय में 3 रू शुल्क देकर अधिकतम 5 उम्मीदवारों को राष्ट्रीय रजिस्ट्रार पद के लिए अनुमोदित कर सकता है | पटवारी उसके अनुमोदनो को कंप्यूटर में डालेगा और उस व्यक्ति का मतदाता पहचान पत्र संख्या, समय / दिनांक और उसके द्वारा अनुमोदित व्यक्तियों के नामो को दर्ज करके एक रसीद देगा। पटवारी नागरिक द्वारा अनुमोदित व्यक्तियों के नाम प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर नागरिक के मतदाता पहचान पत्र संख्या के साथ रखेगा।
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(RTR.3) यदि कोई मतदाता अपना अनुमोदन निरस्त करने आता है तो पटवारी उसके एक या अधिक अनुमोदन बिना कोई शुल्क लिए निरस्त कर देगा।
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(RTR.4) यदि किसी उम्मीदवार को 43 करोड़ से अधिक मतदाताओं का अनुमोदन प्राप्त है और यह अनुमोदन यदि पदासीन राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी के अनुमोदनों से 1 करोड़ अधिक भी है, तो प्रधानमंत्री सबसे अधिक अनुमोदन पाने वाले व्यक्ति को नए राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी के रूप में नियुक्त कर सकते हैं, या उन्हें ऐसा करने की जरुरत नहीं है। इस सम्बन्ध में प्रधानमंत्री का निर्णय अंतिम होगा।
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(RTR.5) यदि पदासीन राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण अधिकारी के पास 35 करोड़ से कम अनुमोदन है तो प्रधानमंत्री उसे बदल सकते है।
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(RTR.6) प्रधानमन्त्री एक ऐसा सिस्टम बना सकते है जिससे नागरिक अपने अनुमोदन एस.एम.एस या एटीएम या मोबाइल फ़ोन एप्प के माध्यम से दर्ज / रद्द करवा सके।
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(RTR.7) टिप्पणी : भविष्य में प्रधानमंत्री ऐसा सिस्टम बना सकते है, जहाँ मतदाता किसी उम्मीदवार को (-100 से 100) तक के अंक दे सके। इस तरह मतदाता के पास विकल्प होगा कि वह स्वीकृती या अस्वीकृती के साथ अंक भी दे सके। यदि मतदाता ने अंक नहीं दिए है और सिर्फ स्वीकृति / अस्वीकृति दी है तो अस्वीकृति का अर्थ शून्य अंक तथा स्वीकृति का अर्थ 100 अंक होगा। यदि किसी उम्मीदवार को मिले सकारात्मक अंक सभी दर्ज मतदाताओं के 33% से अधिक है तो उसके नकारात्मक अंको को ख़ारिज कर दिया जाएगा। जिस उम्मीदवार के पास अधिकतम अंक होंगे और जिसके पास संभावित अधिकतम अंको के 51% से अधिक भी अंक होंगे उसे राष्ट्रीय रजिस्ट्रार के पद पर नियुक्त किया जा सकेगा।
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(CV) जनता की आवाज (Citizens’ Voice)
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(CV.1 ) यदि देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाला कोई भी नागरिक मतदाता इस कानून की किसी धारा में बदलाव चाहता हो अथवा वह इस कानून से सम्बन्धित कोई शिकायत दर्ज करना चाहता हो तो ऐसा नागरिक मतदाता जिला कलेक्टर के कार्यालय में उपस्थित होकर एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकता है। जिला कलेक्टर या उसका क्लर्क इस शपथपत्र को 30 रूपए प्रति पृष्ठ का शुल्क लेकर दर्ज करेगा तथा एक सीरियल नंबर जारी करके इस शपथपत्र को स्कैन करके अमुक मतदाता के छाया चित्र (फोटो) एवं अन्य विवरण के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा।
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(CV.2 ) किसी पटवारी कार्यालय के कार्यक्षेत्र में निवास करने वाला कोई भी नागरिक मतदाता यदि इस विधेयक अथवा इसकी किसी धारा पर अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहता हो अथवा ऊपर दिए खण्ड (CV.1 ) के तहत प्रस्तुत किसी भी शपथपत्र पर अपनी हां / नहीं दर्ज कराना चाहता हो, तो वह अपना मतदाता पहचान पत्र लेकर तलाटी के कार्यालय जाएगा और उपलब्ध आवेदन पर शपथपत्र का सीरियल नंबर दर्ज करके अपनी हाँ / नही दर्ज करेगा। पटवारी 3 रूपए का शुल्क लेकर इस हाँ / नहीं को दर्ज करके एक रसीद जारी करेगा। मतदाता द्वारा दर्ज की गयी हाँ / नहीं को प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर मतदाता के नाम, मतदाता पहचान संख्या, दिनांक एवं अन्य विवरणों के साथ रखा जाएगा। हाँ / नही की गिनती प्रधानमंत्री या किसी अधिकारी या अन्य पर बाध्यकारी नहीं होगी।
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===== टू चाइल्ड पालिसी के प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट का समापन ====

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Oct 21 2017 09:27:43 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

2003 में दिल्ली नगर निगम एवं स्वास्थ्य मंत्रालय नागरिको को आतिशबाजी करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था !!! वजह ? उन्होंने पाया कि घनघोर आतिशबाजी डेंगू के मच्छरों का नाश कर देती है। और इस लिहाज से आतिशबाजी जरुरी है। आतिशबाजी का धुंवा वातावरण की नमी सोख लेता है और धुंवे के कारण मच्छरों की एक बड़ी आबादी नष्ट हो जाती है तथा नए मच्छरों के पनपने के अवसर भी समाप्त हो जाते है।
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इंडियन एक्सप्रेस का यह आर्टिकल पढ़ें - <http://www.thehindu.com/2003/10/16/stories/2003101610250400.htm>;
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2006 में टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ने विभिन्न स्वास्थ्य विशेषज्ञों के हवाले से रिपोर्ट किया कि दिवाली की आतिशबाजी मच्छरों से निपटने के लिए सबसे प्रभावी उपाय है।

टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का लिंक -- <https://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/Cracker-cure/articleshow/2181064.cms>;
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इस विषय पर गूगल करने पर आपको और भी जानकारी मिलेगी।
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उल्लेखनीय है कि पटाखों से जो धुंवा और गर्मी पैदा होती है वह मच्छरों के लिए तो हानिकारक है लेकिन इंसान के लिए नहीं। क्योंकि आतिशबाजी का धुंवा वातावरण में सिर्फ 2 घंटे ही टिका रह सकता है। तो 6 बजे से आतिशबाजी शुरू होती है और 11 बजे तक चलती रहती है। इन पांच घंटो में मच्छर मर जाते है और 2 बजे तक प्रदूषण का स्तर फिर से वही हो जाता है जैसा कि आतिशबाजी से पहले था !!!
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पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता लेकिन संकेत कुछ ऐसे मिल रहे है कि दिल्ली में पिछले 15 सालो जो आतिशबाजी के खिलाफ प्रचार चलाया जा रहा है उसकी वजह से डेंगू एवं अन्य मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया है, और अगर ऐसा है तो इन अतिरिक्त मौतों के लिए जिम्मेदार वे लोग है जो दिवाली की आतिशबाजी के खिलाफ प्रचार अभियान चला रहे है !!!
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हमें किसी विश्वनीय संस्था द्वारा इस बारे तकनिकी अध्ययन करवाए जाने की जरूरत है, ताकि यह बात निकलकर आ सके कि आतिशबाजी लाभदायक है या हानिकारक।
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यदि मच्छरों पर दिवाली की आतिशबाजी का प्रतिकूल प्रभाव स्पष्ट हो जाता है तो सरकार को देश व्यापी प्रचार अभियान चलाना चाहिए जिससे नागरिक दिवाली पर आतिशबाजी करने को प्रोत्साहित हो।
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Oct 21 2017 11:12:25 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

आने वाले सोमवार से यदि राजस्थान सरकार का कोई अधिकारी या कर्मचारी कोई घोटाला करता है या अन्य किसी भी प्रकार का कोई अपराध करता है तो सरकार की अनुमति लिए बिना -

१) मीडिया न तो इस बारे में रिपोर्ट कर सकेगा , और न ही अधिकारी का नाम छाप सकेगा !!
२) कोई भी कार्यकर्ता या नागरिक इन अधिकारियो के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं करा सकेंगे !!
३) यदि पीड़ित पक्ष अदालत जाता है और जज शिकायत दर्ज करने के आदेश देता है तब भी सरकार की अनुमति के बिना शिकायत दर्ज नहीं की जा सकेगी !!
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राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इस क़ानून को विधानसभा से पास करने की तैयारी में है। सोमवार को यह बिल प्रस्तुत होगा।
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यह बिल पास होने के बाद सरकार के भ्रष्टाचार, निकम्मेपन, लापरवाही एवं घोटालो पर सरकार की अनुमति बिना बात करना गैर कानूनी हो जाएगा !!! प्रभाव -- भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग एवं चर्चा बंद हो जायेगी और इस तरह एक ही झटके में राजस्थान सरकार एवं उसके सभी अधिकारी ईमानदार हो जाएंगे। अब से आपको अखबारों एवं टीवी पर इस तरह की ख़बरें पढ़ने को नहीं मिलेगी कि अमुक अधिकारी को घूस लेते पकड़ा गया है या अमुक अधिकारी ने अमुक ठेके में इतना घोटाला कर दिया है !!!
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न्यूज लिंक -- <http://indianexpress.com/article/india/rajasthan-vasundhara-raje-govt-law-no-probe-against-judges-officers-without-sanction-4899562/>;
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आज से 800 साल पहले जब ब्रिटेन में राजकीय अधिकारियो का दमन बढ़ गया था तो कार्यकर्ताओ ने राजा को बाध्य कर दिया था कि वे राजकीय अधिकारियो के खिलाफ सुनवाई करने एवं उन्हें दण्डित करने की शक्ति नागरिको को दे। यह प्रपत्र मैग्नाकार्टा के नाम से जाना जाता है। बाद में नागरिक अधिकारों में वृद्धि हुयी और क्रमिक रूप से ज्यूरी सिस्टम मजबूत होता गया। इससे नागरिक मजबूत हुए और राजकीय वर्ग अनुशासित। नतीजा - ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति हुयी और वे ज्यादा बेहतर हथियार बनाने लगे। बेहतर हथियारों के बल पर उन्होंने अगले 200 वर्ष में अधिकांश दुनिया पर कब्ज़ा कर लिया।
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आजाद होने के साथ ही अमेरिका के नागरिको के पास मुकदमो की सुनवाई करने और दंड देने की शक्ति आयी जिससे उन्होंने तकनीकी / औद्योगिक रूप से और भी तेजी से विकास किया और वे भी बेहतर हथियारों का उत्पादन करने में कामयाब रहे। आज अमेरिका के पास दुनिया की सबसे ताकतवर सेना है।
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और तब दुनिया का सबसे पुराना एवं सबसे ज्यादा प्रभावी वह सिद्धांत सक्रिय हो जाता है जो यह कहता है कि - यदि देश A की व्यवस्था देश B के मुकाबले में ज्यादा कुशल होगी तो A ज्यादा बेहतर हथियारों का उत्पादन करेगा और देश B का आर्थिक-सामरिक-भौगोलिक रूप से अधिग्रहण कर लेगा !!
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मेरा बिंदु यह है कि -- जब किसी देश में नागरिक अधिकारों में कटौती आएगी तो नागरिक कमजोर होंगे और देश कमजोर जाएगा। सरकार के अधिकारों में वृद्धि एवं नागरिको के अधिकारों में कटौती देश को तोड़ कर रख देती है। इससे सिर्फ सरकार ही पनपती है , देश नहीं पनपता। और सरकार में बैठे लोग देश नहीं है।
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तो हमारे पास आज 800 साल बाद भी ऐसे नेता है जो विभिन्न क़ानून बनाकर नागरिको को कमजोर एवं सरकार में बैठे लोगो को शक्तिशाली बना रहे है !! और खुद को मजबूत बनाने के लिए उन्हें देश को कमजोर बनाने से भी गुरेज नहीं है। देश एवं इसके नागरिक चाहे तो उनकी तरफ से भाड़ में जा सकते है !!
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इस क़ानून के आने से नागरिको पर दमन बढ़ेगा उनके अधिकारों का और भी हनन होगा, अधिकारी और भी ज्यादा उद्दंड एवं भ्र्ष्ट हो जाएंगे एवं सरकार की जवाबदेहिता घट जायेगी।
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समाधान - राईट टू रिकॉल मुख्यमंत्री एवं ज्यूरी सिस्टम क़ानून को गैजेट में प्रकाशित किया जाए। इन कानूनों के आने से मुख्यमंत्री एवं सरकारी अधिकारी सीधे नागरिको के प्रति जवाबदेह हो जाएंगे। यदि कोई अधिकारी, नेता गड़बड़ी करता है तो नागरिक ज्यूरी मंडल के आगे शिकायत दर्ज करवा सकेंगे और नागरिको का ज्यूरी मंडल इसकी सुनवाई करके उन्हें दण्डित करेगा। #JurySysIndia , #RtrCm , #WealthTaxGroup
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Oct 21 2017 17:59:55 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

आतिशबाजी से हुआ प्रदुषण सिर्फ 3 घंटे के अंदर वातावरण से पूरी तरह गायब हो जाता है !!! ऐसा दिल्ली के रोहिणी स्टेशन पर लगे प्रदूषण मापक सिस्टम के आंकड़ों से सिद्ध होता है।
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<http://www.financialexpress.com/india-news/firecrackers-ban-delhi-ncr-not-just-diwali-whats-sc-plan-periods/889207/>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 22 2017 05:28:46 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Kg Kadam:

खबर अब तक आपको भी पता चल गयी होगी कि राजस्थान सरकार इस दिवाली पर भ्रष्ट अफसरों, कर्मचारियों को शानदार तोहफा देने जा रही है, कल यानी सोमवार को सरकार विधानसभा सत्र में एक ऐसा बिल ला रही है, जिसके मंजुर होने के बाद, मिडिया, मैं, आप.. या कोई भी व्यक्ति इन भ्रष्ट अधिकारियों, कर्मचारियों के खिलाफ ना तो रिपोर्टिंग कर सकेगें ना उनका नाम छाप सकेगें, अब आप इनके विरूद्ध कहीं शिकायत भी दर्ज नही करा सकते, यानी अब सरकार की लापरवाही, भ्रष्टाचार पर बात करना भी अपराध माना जायेगा, अखबारों में भ्रष्टाचार की खबरें आना बंद हो जायेगी और एकाएक राजस्थान सरकार और उसके सिंघवी जैसे अफसर भी ईमानदार हो जायेगें हां, दुष्कर्म,चोरी, हत्या, और परेशान जनता, किसानों की खबरें आती रहेगी, उन से सरकार को कोई फर्क नही पड़ता.. जिससे पड़ता था उसकी व्यवस्था वसुंधरा जी ने कर दी,
ये होती है तानाशाही, लोकतंत्र के नाम पर लोगो के ही अधिकारों की हत्या, दोष हमारा भी है, हम सिर्फ वोट तक सिमट कर रह जाते है, कभी कांग्रेस कभी भाजपा.. इससे परेशान हुए तो वो, और उससे परेशान हुए तो ये.... यही करते आये है हम,
दरअसल अब हमें सरकारें नही, सिस्टम को बदलने की जरूरत है, ऐसे कानूनों की मांग उठानी चाहिए जिससे इन भ्रष्ट सरकारों के बजाय जनता का भला हो सके,..
इसके लिए लोग जुट रहे है, चिगांरी लग चुकी है, मगर थोड़ा साथ सबका जरूरी है,
प्रदुषण मिटाने के लिए कई लोग गड्डे खोद खोद कर पेड़ पौधे लगा रहे है.. हम कभी एक लौटा पानी भर भी डाल दे, तो पौधे मुर्झायेंगे नहीं बस... इतना सा सहयोग प्रदुषित वातावरण को बदल सकता है.. खैर
तो मित्रो, यह बिल कल ही राजस्थान की लाडली और यशस्वी मुख्य मंत्री द्वारा पेश किया जायेगा और मात्र टेबलों की थपथपाहट से पारित भी हो जायेगा...
राजस्थान के जागरूक और समझदार लोगो के दिलों में ये थपथपाहट, छटपटाहट के रूप में सदैव गुंजती रहेगी..
क्या यही लोकतंत्र है..??
क्या कहेगें आप ?

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 22 2017 07:20:11 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राजकीय अधिकारियो को कार्यवाही से बचाने वाले बिल के बचाव में गृह मंत्री कटारिया की दलील है कि -- किसी लोकसेवक पर मुकदमा दर्ज होते ही मीडिया इसे बड़ी खबर बता कर झूठा सच्चा प्रसारण कर देता है। इससे अधिकारी की प्रतिष्ठा गिरती है !!!
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यह बात ठीक है कि मीडिया झूठी सच्ची ख़बरों का प्रसारण करके किसी भी व्यक्ति की छवि खराब कर देता है, और पूरा देश इससे पीड़ित है। लेकिन इसके समाधान के लिए उन्हें मीडिया की मुश्के कसने के लिए बिल लाना चाहिए था। लेकिन मीडिया को ठीक करने का बिल लाने की जगह वे सिर्फ सरकारी आदमियों को बचाने के लिए बिल ले आये। मतलब वे यह मानते है कि, उनकी नजर में सिर्फ लोकसेवक की ही प्रतिष्ठा होती है शेष नागरिको की नहीं !!

इन लोगो को राईट टू रिकॉल क़ानून के बिना किसी भी हालत में सुधारा नहीं जा सकता। राईट टू रिकॉल मुख्यमंत्री का क़ानून आने के 24 घंटे में इनका नशा उतर जाएगा और ये जनता को भेड़ बकरों में गिनना बंद कर देंगे।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Oct 23 2017 19:19:12 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

#AbolishPresidentPosition - राष्ट्रपति पद को तुरंत प्रभाव से समाप्त किया जाए। अब से राष्ट्रपति की सभी शक्तियां प्रधानमंत्री के पास ही होगी।
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कृपया @PmoIndia पर ट्वीट करें कि राष्ट्रपति पद को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया जाए। संसद एवं प्रधानमंत्री देश की सर्वोच्च संस्था होगी, और उनके आदेश ही सर्वोपरि होंगे। इन आदेशों को राष्ट्रपति के अनुमोदन की जरूरत नहीं होगी। अगला प्रधानमंत्री भारत के नागरिको के सामने शपथ लेगा राष्ट्रपति के सामने नहीं।
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साथ ही आम चुनाव के नतीजों के बाद प्रत्येक सांसद रिटर्निग ऑफिसर के सामने यह घोषणा करेगा कि वह पीएम एवं स्पीकर के लिए किस व्यक्ति को अनुमोदित करता है। इस घोषणा को तत्काल प्रभाव से चुनाव आयोग अपनी वेबसाइट पर सार्वजानिक रूप से रखेगा। जिस व्यक्ति को सर्वाधिक सांसदों ने अनुमोदित कर दिया है वे तुरंत प्रभाव से प्रधानमंत्री एवं स्पीकर नियुक्त हुए माने जाएंगे। तुरंत प्रभाव से।
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और यदि कोई अधिकारी इस तरह अनुमोदित पीएम को प्रधानमंत्री की तरह मान्यता नहीं देता है या उनके आदेशों की अवहेलना करता है या राष्ट्रपति का पद ख़त्म किये जाने के बावजूद राष्ट्रपति के आदेशों को तवज्जो को देता है, तो ऐसे अधिकारी को तत्काल प्रभाव से 15 वर्ष के कारावास से दण्डित किया जाएगा। कोई विलम्ब नहीं एवं कोई अपवाद नहीं।
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जब तक राष्ट्रपति पद समाप्त नहीं किया जाता तब तक भारत का प्रधानमंत्री वास्तविक रूप से एक प्यादे से ज्यादा कुछ नहीं है।
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कृपया निचे दिए गए ट्वीट्स करें -
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@PmoIndia #AbolishPresidentPosition abolish Prez position; PM will be final; next PM shall take oath before people of India- NOT Prez .
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@PmoIndia #AbolishPresidentPosition next PM will take oath before people - NOT Prez . If officer disobeys PM, imprisonment for 15 yr.
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मेरे द्वारा किये गए ट्वीट्स के लिंक - <https://twitter.com/PawanJury/status/922541356039290880>; , <https://twitter.com/PawanJury/status/922541414445019138>;
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#WealthTaxGroup
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Oct 24 2017 19:16:58 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सितम्बर 2016 के मुकाबले सितम्बर 2017 में बिजली की खपत में सिर्फ 4.6% की वृद्धि हुयी। आप कुछ समझ सकते है कि "विकास" दर किधर जा रही है।
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सितम्बर 2012 के मुकाबले सितम्बर 2013 में बिजली की खपत में 12% की वृद्धि दर्ज की गयी थी !!
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स्त्रोत
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( लिंक में दी गयी तालिका में सिर्फ अचिवमेंट कॉलम को देखें, लक्ष्य के आंकड़ों को नहीं। )

पेज नंबर - 4 देखें <http://www.cea.nic.in/reports/monthly/executivesummary/2017/exe_summary-09.pdf>;
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पेज नंबर - 3 देखें <http://www.cea.nic.in/reports/monthly/executivesummary/2013/exe_summary-09.pdf>;
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तो आखिर हम ऐसी स्थिति में 7% या 6% या यहां तक कि 5% की भी विकास दर कैसे हासिल कर सकते है जबकि बिजली के उपभोग में वृद्धि दर सिर्फ 4.6% है !!! ऐसा सिर्फ तब संभव है जब हम ऐसी महंगी वस्तुओ जैसे सेलफोन्स, एलसीडी या चिप्स आदि का उत्पादन कर रहे हो जिनमे बिजली की खपत कम होती हो। लेकिन हम ऐसी चीजों का उत्पादन नहीं करते। हम दोयम दर्जे की वस्तुओ का उत्पादन करते है , और उनमे विद्युत् का ज्यादा उपभोग होता है। तो क्या बिजली की खपत में सिर्फ 4.6% की वृद्धि के बावजूद क्या हम 7% या 6% या यहां तक कि 5% की भी विकास दर हासिल कर सकते है ?
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मुझे लगता है विकास दर के आंकड़ों के साथ हेराफेरी की गयी है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Oct 25 2017 18:43:01 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

#Over95percentPoliticalScienceProfessorsAreBikaau , #95_फीसदी_से_अधिक_राजनीति_विज्ञान_के_प्रोफ़ेसर_बिकाऊ_है
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#Over95percentHistoriansAreBikaau , #95_फीसदी_से_अधिक_इतिहास_के_प्रोफ़ेसर_बिकाऊ_है
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#Over95percentEconomistsAreBikaau , #95_फीसदी_से_अधिक_अर्थशास्त्र_के_प्रोफ़ेसर_बिकाऊ_है
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मेरे विचार में , भारत में जितने भी अर्थशास्त्री, इतिहासकार एवं राजनीती विज्ञान के प्रोफ़ेसर, विशेषग्य आदि है उनमे से 95% से ज्यादा लोग बिकाऊ है। और शेष 5% निकम्मे है व देश की व्यवस्था सुधारने में उनकी कोई रुचि नहीं है।
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@PMOIndia #MyPoliticalBelief #Over95percentEconomistsAreBikaau #Over95percentSociologyProfessorsAreBikau #Over95percentHistoriansAreBikaau

मेरा ट्विट - <https://twitter.com/PawanJury/status/923249632720781312>;
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नीचे दिए गए विकल्पों में से अपना विकल्प चुने एवं इन विषयों के प्रोफेसरों के बारे में आपका जो भी आकलन है कृपया उसे अपने ट्विटर एकाउंट पर रखें।
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(a) #Over95percentPoliticalScienceProfessorsAreBikaau
(b) #Between80to95percentPoliticalScienceProfessorsAreBikaau
(c) #Between60to80percentPoliticalScienceProfessorsAreBikaau
(d) #Between40to60percentPoliticalScienceProfessorsAreBikaau
(e) #Between20to40percentPoliticalScienceProfessorsAreBikaau
(f) #Below20percentPoliticalScienceProfessorsAreBikaau
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कृपया अपने ट्विट में हेशटेग का इस्तेमाल करे।
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इतिहासकारो के बारे में आप क्या सोचते इससे कोई विशेष फर्क नहीं आता। क्योंकि मेरे विचार में इतिहास एक अर्थहीन सब्जेक्ट है।
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किन्तु यदि आप सोचते है कि भारत के 40% से ज्यादा राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर बिकाऊ नहीं है बल्कि ईमानदार है , तो कृपया समाचार पत्रों में विज्ञापन दें एवं अपने फेसबुक /ट्विटर पर इन प्रोफेसरों से सार्वजनिक अपील करें कि वे अपनी राजनैतिक पार्टी बनाए एवं चुनाव लड़ें।
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और यदि आपको लगता है कि राजनीति विज्ञान के 40% से ज्यादा प्रोफ़ेसर ईमानदार है तो मान कर चलिए कि राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम क़ानून किसी काम के नहीं है ,अत: इन कानूनों के प्रचार में अपना समय नष्ट न करे। इसकी जगह आपको राजनीति विज्ञान के प्रोफेसरों को चुनाव लड़ने के लिए राजी करना चाहिए।
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#वेल्थ_टेक्स_ग्रुप
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 27 2017 06:16:39 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

इस वीडियो में 3:40 से 4:55 से बीच का हिस्सा सुने।
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वक्ता का कहना है कि -- "मैग्नाकार्टा ( जूरी सिस्टम ) ने अंग्रेजो को अपने मुल्क के प्रति वफादार बना दिया और वहां कम गद्दार पैदा होने लगे !! गद्दार एक ख़ास कल्चर में पैदा होता है। जहां फर्द और रियासत का मुफाद घुल-मिल जाता है वहां गद्दार पैदा नहीं होते" !!!
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वैसे वफ़ादारी / गद्दारी आदि मानवीय गुण है, एवं इन्हें मापा नही जा सकता। यह शुद्ध प्रशासनिक तत्व नहीं है। लेकिन जूरी सिस्टम शासको / बदमाशो द्वारा नागरिको पर किये जा रहे दमन में कमी ले आता है और उन्हें न्याय देता है। ज्यूरी सिस्टम उद्यमशील व्यक्ति के हितो की रक्षा करके उसे आगे बढ़ने के समान अवसर भी देता है। त्वरित न्याय एवं स्वतंत्रता मिलने से अवाम शासन को अपने रक्षक एवं खैर ख्वाह के रूप में देखने लगता है, जिससे नागरिक अपेक्षाकृत ज्यादा वतन परस्त हो जाते है।
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तो जिन लोगो को "लगता" है कि भारत जयचंद एवं मीर जाफर पैदा करता रहा है, तो उन्हें इस बात को समझना चाहिए कि प्रशासनिक प्रक्रियाओ में सुधार करके इस प्रवृति पर काफी हद तक रोक लगायी जा सकती है। ज्यूरी सिस्टम का प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट यहाँ देखें - <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/829456537232542>;
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वीडियो में शेष बातें वही है जो अवाम को कोसने और समाधान को दरकिनार करने के लिए "वहां के और यहाँ के" पेड इतिहासकार एवं राजनीति विज्ञान के पेड विशेषग्य बोलते रहते है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 27 2017 18:07:32 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

[ राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट ( NHDMT ) का अपडेटेड संस्करण ]
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हिन्दू मंदिरों के प्रशासन को सुदृढ़ बनाने के लिए हम यहाँ शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी ( SGPC ) जैसा एक ढांचा प्रस्तावित कर रहे हैं। प्रत्येक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध आदि इस ट्रस्ट के जन्म से सदस्य होंगे, जब तक कि वे स्वयं अपनी सदस्यता नहीं छोड़ देते। इन सदस्यों को अध्यक्ष एवं ट्रस्टियो को चुनने एवं किसी भी दिन बदलने का अधिकार भी होगा। मुस्लिम तथा क्रिश्चियन इस ट्रस्ट के सदस्य नहीं बन सकेंगे।
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शुरू में राष्ट्रीय हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट ( NHDMT ) 4 मंदिरों की देख-रेख करेगा -- कश्मीर का अमरनाथ देवालय, राम जन्म भूमि देवालय, कृष्ण जन्म भूमि देवालय तथा काशी विश्वनाथ देवालय। आगे चलकर यदि सम्बंधित संप्रदाय स्वेच्छा से अपने मंदिर सुपुर्द करते है तो यह अन्य मंदिरों की देख-रेख भी कर सकता है।
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इस ड्राफ्ट की पीडीऍफ़ फाइल, sha1 हैश एवं मूल अंग्रेजी संस्करण का लिंक कमेंट बॉक्स में देखें। यदि आप इस कानूनी ड्राफ्ट का समर्थन करते है तो कृपया अपने पीएम को ट्विट करके कहें कि इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित किया जाए।
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प्रधानमंत्री को भेजे जाने वाले ट्वीट का प्रारूप :
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@pmoindia I insturct you to print - <https://newindia.in/causes/nhdmt/>; , sha1- 5aa04b00713192b0e78263a7f31af3c334c838b5 #NHDMT
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( कृपया ऊपर दिए गए ट्वीट को कॉपी करे तथा अपने ट्विटर एकाउंट से @pmoindia पर ट्वीट करे। )
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राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (NHDMT)
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[ टिप्पणी: यह कानूनी ड्राफ्ट प्रधानमंत्री द्वारा राजपत्र अधिसूचना के रूप में छापा जा सकता है। इसे देश में लागू करने के लिए लोकसभा या राज्यसभा से अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं है।
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इस ड्राफ्ट के तीन भाग है -
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भाग - 1 : नागरिकों के लिए सामान्य निर्देश
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भाग - 2 : कानूनी ड्राफ्ट का सारांश
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भाग - 3 : अधिकारियों और नागरिकों के लिए निर्देश और टिप्पणियाँ
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इस क़ानून के महत्वपूर्ण खंड है - (3), (5), (10.2), (10.3 ), (10.8), (11.3.2), (11.3.4), (12.1), (12.5), (14.2) ]
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भाग-1 : नागरिकों के लिए सामान्य निर्देश
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(1) यह कानून सिर्फ हिंदुओं के लिए लागू होगा। इस कानून में "हिन्दू" शब्द उन सभी समुदाय के अनुयायीयों को शामिल करता है जो स्वयं को हिन्दू कहते है। यह कानून किसी भी प्रकार से उन नागरिकों पर हिन्दू का लेबल लगाने का प्रयास नहीं करता, जो स्वयं को हिन्दू नहीं कहते या हिन्दू नही कहलाना चाहते। और ये कानून इस्लाम, ईसाई, पारसी और अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है , के अनुयायीयों पर कोई भी प्रतिबंध या दायित्व नहीं लगाता है। यदि सिक्ख, जैन और बौद्ध आदि धर्मो के धर्मावलम्बी इस कानून में नामांकित होना चाहते है तो वे स्वैच्छिक रूप से नामांकित हो सकते है।
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(2) प्रधानमंत्री एक ट्रस्ट गठित करेंगे जो राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट तथा संक्षेप में NHMDT कहलायेगा। NHMDT सिर्फ उन्ही देवालयों का प्रबंधन करेगा जिन्हें संसद ने NHMDT को सौपा है, या जब किसी हिन्दू मंदिर के मालिकों ने अपना देवालय NHMDT को सौपा है। NHMDT उन देवालयों का अधिग्रहण या प्रबंधन नहीं करेगा जिनका प्रबंधन देवालय के मालिक NHMDT द्वारा करवाना नहीं चाहते। NHMDT मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारो या बौध तीर्थ स्थलो या जैन तीर्थ स्थलो का प्रबंधन भी नहीं करेगा।
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(3) यदि एवं जब भारत के मतदाता जनमत संग्रह या ऐसी कोई प्रक्रिया जो 45 करोड़ से अधिक मतदाताओं की मंशा सिद्ध करें, के माध्यम से प्रस्तावित (a) राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या (b) कृष्णा जन्म भूमि देवालय, मथुरा (c) काशी विश्वनाथ देवालय, वाराणसी (d) अमरनाथ देवालय, कश्मीर के भू-खंड NHMDT को सौंप देते है तो NHMDT इन 4 देवालयों का प्रबंधन करेगा।
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(4) प्रधानमंत्री प्रथम अध्यक्ष और 4 ट्रस्टियों को नियुक्त करेगा।
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(5) आप ( आप अर्थात मतदाता ) अध्यक्ष और ट्रस्टियों को "राईट टू रिकॉल NHMDT अध्यक्ष" और ट्रस्टियों पर राईट टू रिकॉल प्रक्रिया जिन्हें बाद के खंडो में विस्तार से दिया गया है, के द्वारा बदल सकते है। ट्रस्टियों एवं अध्यक्ष का आजीवन कार्यकाल 1000 दिवस होगा।
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(6) NHMDT अध्यक्ष और ट्रस्टी देवालय प्रबंधन के लिए अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की भर्ती करेंगे। कर्मचारियों के बीच यदि कोई विवाद होता है या हिन्दुओं व कर्मचारियों के बीच कोई विवाद होता है, तो विवाद के निपटान के लिए जिला या राज्य या भारत की मतदाता सूची में से क्रमरहित तरीके से चुने गए 12 से 1500 हिन्दुओं की जूरी जिनकी आयु 30 वर्ष से 55 वर्ष के मध्य होगी ,बुलाई जा सकती है। जूरी सदस्य दोनों पक्षों को सुनेंगे और अपना निर्णय देंगे। यदि आपका नाम इस जूरी ड्यूटी में चुना गया है, तब आपको जूरी सदस्य के रूप में प्रस्तुत होना पड़ेगा और मामले का फ़ैसला करना होगा।
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भाग-2 : कानूनी ड्राफ्ट का सारांश
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(7) टिप्पणी : NHMDT के गठन के लिए इस राजपत्र अधिसूचना को प्रकाशित किया जाएगा। यह क़ानून प्रवृत होने के बाद NHMDT 4 मुख्य हिन्दू देवालयो का प्रबंधन करेगा। प्रबंधन का यह ढांचा लोकतान्त्रिक एवं SGPC के सदृश होगा। देवालय प्रबंधन की यह व्यवस्था उन सभी देवालयों पर भी लागू होगी जिन देवालयों के मालिकों ने अपना देवालय NHMDT को सुपुर्द कर दिया है।
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भाग-3 : अधिकारियों और नागरिकों के लिए निर्देश और टिप्पणियाँ
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(8) टिप्पणी : टिप्पणीयां इस कानूनी ड्राफ्ट का वास्तविक हिस्सा नहीं है। कार्यकर्ता और नागरिक ड्राफ्ट को समझने हेतु इसका उपयोग कर सकते है। जूरी सदस्य इन टिप्पणीयों का उपयोग निर्णय देने के लिए कर सकते है। किन्तु टिप्पणीयां किसी पर भी बाध्यकारी नहीं है।
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(9) प्रारंभिक नियुक्ति : प्रधानमंत्री राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट का गठन करेंगे एवं अपनी पसंद से किसी भी हिन्दू को कार्यरत अध्यक्ष व अन्य 4 हिन्दुओं को ट्रस्टी चुनेंगे।
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(10) राईट टू रिकॉल NHDMT अध्यक्ष
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(10.1) यदि कोई भारतीय हिन्दू नागरिक जिसकी आयु 30 वर्ष से अधिक है एवं वह अध्यक्ष बनना चाहता है तो वह जिला कलेक्टर के सामने प्रस्तुत हो सकता है। कलेक्टर सांसद के चुनाव में जमा होने वाली राशि के बराबर आवेदन शुल्क लेकर उसे एक सीरियल नंबर जारी करेगा और उस व्यक्ति का नाम प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर रखेगा। पदासीन अध्यक्ष स्वयं को भी एक उम्मीदवार के रूप में पंजीकृत करवा सकता है।
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(10.2) यदि कोई हिन्दू मतदाता स्वयं पटवारी कार्यालय आता है एवं 3 रू शुल्क देकर अधिकतम 5 उम्मीदवारों को अध्यक्ष पद के लिए अनुमोदित करता है तो पटवारी उसके अनुमोदनो को कंप्यूटर में डालेगा और उस व्यक्ति की मतदाता पहचान पत्र संख्या, समय / दिनांक और उसके अनुमोदित व्यक्तियों के विवरण की एक रसीद देगा। बीपीएल कार्ड धारकों के लिए शुल्क रु.1 होगा।
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(10.3) यदि कोई मतदाता अपने अनुमोदनों को निरस्त करने आता है तो पटवारी बिना कोई शुल्क लिए उसके एक या उससे अधिक अनुमोदन निरस्त कर देगा।
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(10.4) कलेक्टर मतदाता को एस.एम.एस. फीडबैक भेजने वाला एक सिस्टम बना सकता है। कलेक्टर मतदाता के फिंगर प्रिंट और फोटो लेकर बदले में रसीद देने वाला सिस्टम भी बना सकता है।
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(10.5) प्रधानमन्त्री नागरिको को ऐसी सुविधा दे सकते है जिससे वे एस.एम.एस या एटीएम या मोबाइल फ़ोन एप्प या इन्टरनेट के माध्यम से अनुमोदन दर्ज करवा सके।
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(10.6) पटवारी नागरिक द्वारा दर्ज किये गए अनुमोदनों को उनकी पसंद के क्रम में ज़िले की वेबसाइट पर नागरिक के मतदाता पहचान पत्र संख्या के साथ रखेगा।
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(10.7) प्रत्येक सोमवार को कलेक्टर प्रत्येक उम्मीदवार के अनुमोदनो की गिनती जारी करेंगे।
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(10.8) यदि अध्यक्ष पद में किसी उम्मीदवार के पास 25 करोड़ से अधिक हिन्दू मतदाताओं का अनुमोदन है, और यह अनुमोदन पदासीन अध्यक्ष के अनुमोदनों से 1 करोड़ अधिक भी है, तब प्रधानमंत्री उसे नए अध्यक्ष के रूप में नियुक्त कर सकते हैं।
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(10.9) यदि कोई 30 वर्षीय भारतीय हिन्दू नागरिक ट्रस्टी बनना चाहता है तो वह कलेक्टर के सामने अपना आवेदन प्रस्तुत कर सकता है। कलेक्टर सांसद चुनाव में जमा होने वाली राशि के बराबर आवेदन शुल्क लेकर उसे एक सीरियल नंबर जारी करेगा और उस व्यक्ति का नाम प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर रखेगा। नागरिक ट्रस्टी पद के लिये अधिकतम 10 उम्मीदवारों को अनुमोदित कर सकते है और अपने अनुमोदनो को किसी भी दिन निरस्त कर सकते है।
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(10.10) यदि किसी उम्मीदवार के पास 20 करोड़ से अधिक हिन्दू मतदाताओं का अनुमोदन है और यह सबसे कम अनुमोदित ट्रस्टी के अनुमोदनों से 1 करोड़ अधिक है तो प्रधानमंत्री उसे नए ट्रस्टी के रूप में नियुक्त कर सकते है , और न्यूनतम अनुमोदन पाने वाले ट्रस्टी को हटा सकते है।
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(10.11) कोई व्यक्ति ट्रस्टी के साथ अध्यक्ष के रूप में भी उम्मीदवार बन सकता है।
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(10.12) यदि कोई व्यक्ति 1000 दिनों के लिए ट्रस्टी या अध्यक्ष के रूप में सेवाए दे चुका है तो प्रधानमंत्री उसे सबसे अधिक अनुमोदनों वाले व्यक्ति से प्रतिस्थापित करेंगे।
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(11) ट्रस्ट और ट्रस्ट के नियंत्रण में आने वाले देवालयों का प्रबंधन करना
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(11.1) अध्यक्ष और ट्रस्टी ट्रस्ट संचालन और कर्मचारियों के प्रबंधन लिए जरुरी नियम बनाएंगे। अध्यक्ष के सभी निर्णयों को कम से कम दो ट्रस्टियों के अनुमोदन की ज़रूरत होगी।
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(11.2) अध्यक्ष लिखित परीक्षा द्वारा 1000 दिनों की अवधि के लिए पुरोहितों एवं अन्य कर्मचारियों की भर्ती करेगा। अध्यक्ष विशेष कार्यों के लिए बाहरी ठेकेदारों को ठेके दे सकता है।
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(11.2.1) अध्यक्ष कर्मचारियों के विरुद्ध शिकायतें सुनने के लिए जूरी सिस्टम की स्थापना करेगा। अध्यक्ष जूरी सिस्टम का ड्राफ्ट तैयार करेगा और इसे प्रशासित करेगा। अध्यक्ष जूरी सिस्टम के संचालन हेतु अधिकारीयों को भी नियुक्त करेगा।
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(11.3) टिप्पणी :
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(11.3.1) जूरी सिस्टम में एक राष्ट्रीय जूरी प्रशासक तथा अन्य राज्यो / जिलो में राज्य / जिला जूरी प्रशासक शामिल होंगे।
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(11.3.2) प्रत्येक जूरी प्रशासक क्रम रहित ( रेंडमली ) तरीके से 30 से 55 वर्ष के मध्य की आयु के 45 हिन्दू मतदाताओं को 3 महीने की अवधि के लिए चुनकर महा जूरी मंडल ( ग्रेंड ज्यूरी ) का गठन करेगा।
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(11.3.3) प्रत्येक शिकायत पर विचार करके महा-जूरी सदस्य यह तय करेंगे कि शिकायत बर्खास्त करनी चाहिए या जूरी को भेजी जानी चाहिए।
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(11.3.4) यदि महा-जूरी सदस्य जूरी ट्रायल का निर्णय करते है तो महा-जूरी सदस्य जूरी का आकर तय करेंगे। ज्यूरी का आकार 12 से 1500 सदस्यों के बीच हो सकता है। महा-जूरी सदस्य यह भी तय करेंगे कि मामले के लिए जूरी जिला स्तर पर होनी चाहिए या राज्य स्तर पर या राष्ट्रीय स्तर पर।
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(11.3.5) जूरी मंडल में हिन्दू जूरी सदस्यों का चयन जिला / राज्य / राष्ट्र ( जो भी लागू हो ) की मतदाता सूची में से रेंडमली किया जाएगा। जूरी सदस्य तय करेंगे कि कर्मचारी पर जुर्माना लगाना है या नहीं अथवा उसे निष्काषित करना चाहिए या नहीं।
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(11.3.6) जिला जूरी मंडल के निर्णय की अपील राज्य जूरी मंडल के सामने की जा सकती है, एवं राज्य जूरी मंडल के फैसले की अपील राष्ट्रीय जूरी मंडल के सामने की जा सकेगी। किसी भी जूरी मंडल के फैसले की अपील जिला / उच्च / उच्चत्तम न्यायालय ( जो भी लागू हो ) में की जा सकेगी।
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(11.3.7) अध्यक्ष ऊपर दिए गए निर्देशों का प्रयोग करते हुए प्रस्तावित जूरी सिस्टम का ड्राफ्ट सार्वजनिक करेगा। यदि मतदाता पाते है कि प्रस्तावित जूरी सिस्टम बहुत कमजोर है, तो मतदाता अध्यक्ष को बदल सकते है या अध्यक्ष से ड्राफ्ट में संशोधन की मांग कर सकते है।
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(12) राष्ट्रीय देवालय
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(12.1) इस खंड में मतदाता का आशय सभी धर्मों के भारत के सभी मतदाताओं से है। राष्ट्रीय जनमत संग्रह या किसी अन्य ऐसी प्रक्रिया द्वारा जो 45 करोड़ से अधिक मतदाताओं की मंशा को सिद्ध करें, का उपयोग करके प्रधानमंत्री इन 4 भू-खंडो को अधिगृहित करेंगे -- (a) राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या (b) कृष्णा जन्म भूमि देवालय, मथुरा (c) काशी विश्वनाथ देवालय, वाराणसी (d) अमरनाथ देवालय, कश्मीर।
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(12.2) प्रधानमंत्री ये भू-खंड NHDMT को सौंप देंगे।
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(12.3) NHDMT इन 4 देवालयों का प्रबंधन करेगा।
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(12.4) NHDMT उन सभी देवालयो का प्रबंधन भी करेगा जो किसी संप्रदाय ने उसे सौंप दिया है। यदि अमुक सम्प्रदाय चाहे तो सौंपे गए देवालय को 5 साल के भीतर वापस ले सकता है। 5 साल बाद, ट्रस्ट औपचारिक रूप से संप्रदाय से पूछेगा कि क्या उसे देवालय वापस चाहिए। यदि सम्प्रदाय के 65% से ऊपर संप्रदाय मालिक "ना" में उत्तर करते है सिर्फ तब और तब ही NHDMT द्वारा देवालय अधिग्रहत किया जायेगा। लेकिन इसके बाद NHDMT संप्रदाय को देवालय वापस नहीं दे सकेगा।
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(13) मतदान अधिकार
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(13.1) प्रत्येक व्यक्ति जो हिन्दू है और NHDMT ड्राफ्ट राजपत्र में छपने की दिनांक पर 18 वर्ष से ऊपर की आयु का है मतदाता सदस्य होगा। NHDMT में गैर-मतदाता सदस्य नहीं होंगे। शब्द "हिन्दू" में हिन्दू , सिक्ख , जैन और बौद्ध के सभी संप्रदाय शामिल है।
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(13.2) यदि कोई व्यक्ति स्वयं को गैर-हिन्दू कहता है तो उसका अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़ा वर्ग का दर्जा इस कानून द्वारा प्रभावित नहीं होगा। यदि अन्य कानून इस दर्जे को प्रभावित करते है, तब ये प्रभावित हो सकता है।
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(13.3) यदि कोई व्यक्ति इस्लाम या ईसाई में धर्मान्तरित हो जाता है तो उसका मताधिकार निलम्बित कर दिया जाएगा। यदि धर्मान्तरित हुआ अमुक व्यक्ति एक वर्ष के भीतर फिर से हिन्दू धर्म में पुन: धर्मान्तरित नहीं हो जाता है तो उसका नाम मतदाता सूची में से हटा दिया जाएगा। और यदि वह दो बार किसी अन्य धर्म में परिवर्तित हो जाता है तो दूसरी बार उसका नाम सदस्य सूची में से बिना 1 साल इंतज़ार किये हटा दिया जायेगा। किसी विवाद की स्थिति में जूरी का निर्णय अंतिम होगा।
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(13.4) यदि कोई ईसाई या मुस्लिम धर्मावलम्बी हिन्दू बनना चाहता है तो जूरी मंडल उसकी पहचान की पुष्टि करके अनुमोदित करेगी। जूरी मंडल के अनुमोदन के बाद यदि सभी ट्रस्टी भी इसका अनुमोदन करते है तो अध्यक्ष उसका नाम मतदाता सूची में जोड़ेगा। नाम तब तक नहीं जोड़ा जायेगा जब तक कम से कम 100 हिन्दू मतदाताओ का जूरी मंडल स्वीकृति नहीं देता।
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(13.5) यदि किसी व्यक्ति की माता हिन्दू या पिता हिन्दू है और वह स्वयं को हिन्दू घोषित करता है तो वह 18 वर्ष की आयु से मतदाता बन जाएगा।
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(14) दान, आय और कर
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(14.1) NHDMT ट्रस्ट किसी भी व्यक्ति या गैर व्यक्ति इकाई या विदेशी इकाई से दान प्राप्त कर सकता है। NHDMT ट्रस्ट किसी भी व्यवसाय गतिविधि में भी शामिल हो सकता है, जैसे कोई उद्योग, निगम या संस्था आदि।
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(14.2) प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या अन्य सरकारी एजेंसी NHDMT ट्रस्ट पर लागू होने वाले आयकर, संपत्ति कर, वस्तु एवं सेवा कर और सभी अन्य कर वसूल सकते है।
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(15) टिप्पणी : राज्य के मुख्यमंत्री "राज्य हिन्दू देवालय प्रबंधन ट्रस्ट (RHDMT)" कानून ड्राफ्ट को राज्यों में लागू कर सकते है। ऐसे ड्राफ्ट NHDMT के समान हो सकते है। लेकिन राज्यों के RHDMT के सदस्य वे हिन्दू हो सकते है जो अमुक राज्य में 2 साल से अधिक अवधि से निवास कर रहे हो या अमुक राज्य के वे मूल निवासी हो। तो इस तरह किसी हिन्दू के पास विकल्प होगा कि वह किस राज्य के RHDMT का सदस्य होना चाहता है। लेकिन वह दोनो का सदस्य नहीं हो सकेगा। और यदि वह सदस्यता बदलता है तो नयी सदस्यता 6 महीने बाद प्रभावशाली होगी।
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(CV) जनता की आवाज (Citizens’ Voice):
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(CV.1 ) यदि देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाला कोई भी नागरिक मतदाता इस विधेयक के किसी अनुच्छेद में बदलाव चाहता हो अथवा वह इस विधेयक से सम्बन्धित कोई शिकायत दर्ज करना चाहता हो तो ऐसा नागरिक मतदाता जिला कलेक्टर के कार्यालय में उपस्थित होकर एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकता है। जिला कलेक्टर या उसका क्लर्क इस शपथपत्र को 30 रूपए प्रति पृष्ठ का शुल्क लेकर दर्ज करेगा तथा एक सीरियल नंबर जारी करके इस शपथपत्र को स्कैन करके अमुक मतदाता के छाया चित्र एवं अन्य विवरण के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा।
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(CV.2 ) किसी पटवारी कार्यालय के कार्यक्षेत्र में निवास करने वाला कोई भी नागरिक मतदाता यदि इस विधेयक अथवा इसके किसी अनुच्छेद पर अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहता हो अथवा ऊपर दिए खण्ड (CV.1 ) के तहत प्रस्तुत किसी भी शपथपत्र पर अपनी हां / नहीं दर्ज कराना चाहता हो, तो वह अपना मतदाता पहचान पत्र लेकर पटवारी कार्यालय में जाएगा और उपलब्ध आवेदन पर शपथपत्र का सीरियल नंबर दर्ज करके अपनी हाँ / नही दर्ज करेगा। पटवारी 3 रूपए का शुल्क लेकर इस हाँ / नहीं को दर्ज करके एक रसीद जारी करेगा । मतदाता द्वारा दर्ज की गयी हाँ / नहीं को प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर मतदाता के नाम, मतदाता पहचान संख्या, दिनांक एवं अन्य विवरणों के साथ रखा जाएगा।
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====== NHDMT ड्राफ्ट का समापन =====

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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Oct 27 2017 18:54:33 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

नमस्कार Chetan Vyas Rrg ,
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यह स्तम्भ आपके प्रश्न तथा टिप्पणियों के लिए बनाया गया है।
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सभी के लिए
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यह पोस्ट सिर्फ़ chetan vyas के प्रश्न और टिप्पणियों के लिए है। अन्य के प्रश्न और टिप्पणियाँ डिलीट कर दी जायेगी।
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प्रश्नकर्ता से निम्नलिखित नियमों के पालन की अपेक्षा की जाती है :
.
(1) हिन्दी भाषा के लिए हिन्दी लिपि और अंग्रेजी भाषा के लिए अंग्रेजी लिपि का प्रयोग करें। रोमन भाषा का प्रयोग नहीं करे ।
.
(2) दो पेराग्राफ के बीच '.' चिन्ह का प्रयोग करे ।
.
(3) लेखन में अनावश्यक चिन्हों जैसे '.......', '!!!!!!!', '//////', '####', '„„„„„„', '??????' आदि का तथा अनावश्यक 'केपिटल लेटर्स' का प्रयोग नहीं करें ।
.
(4) एक बार में एक ही कमेन्ट करे । यदि आपने दो कमेन्ट एक साथ किये है तो,
अ) पहले कमेन्ट को एडिट करें
ब) दुसरे कमेन्ट को कोपी करके पहले वाले कमेन्ट में पेस्ट करे
स) फिर दुसरे कमेन्ट को डिलीट कर दें ।
.
(5) कमेन्ट क्रमिक/सिलसिलेवार ढंग से करे, अक्रमिक रूप से नही ।
.
क्रमिक कमेन्ट क्या है ?
.
मान लीजिये कि -
अ) आपने 'पहला' कमेन्ट किया है,
ब) मैंने 'दूसरा' कमेन्ट किया है,
स) आपने 'तीसरा' कमेन्ट किया है,
द) आपने चौथा कमेन्ट किया है ।
तो यहाँ पहला, दूसरा और तीसरा क्रमिक जबकि चौथा कमेन्ट अक्रमिक है । अक्रमिक कमेन्ट को बिन्दु 4 में बताये तरीके से संपादित कर पिछले कमेन्ट में जोड़ दें ।
.
(6) अपने प्रश्नों तथा टिप्पणियों को डिलीट नहीं करे । ताकि अन्य कार्यकर्ता भी इन्हें पढ़ सके ।
.
(7) कृपया मेरी फेसबुक प्रोफाइल पर नोट्स (Notes) सेक्शन में जाए तथा ' नागरिको को चाहिए कि वे अपने पीएम को ट्विटर पर आदेश भेजे' स्तम्भ को पढ़े। यह हमारे अभियान का केंद्र बिन्दु है ।
.
(8) नोट्स सेक्शन में ही 'विशेष आलेख-01' शीर्षक से दर्ज स्तम्भ में राईट टू रिकाल ग्रुप द्वारा प्रस्तावित कुछ मुख्य कानूनी ड्राफ्ट्स की सूची तथा उनके लिंक देखे जा सकते है ।
.
(9) इस स्तम्भ का लिंक देखने के लिए नोट्स सेक्शन में जाकर 'आपसी संवाद स्तम्भ' या 'two person conversation thread' शीर्षक से रखे गए स्तम्भ को देखें । इस स्तम्भ का लिंक वहां दर्ज किया गया है ।
.
(10) हम देश में व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवश्यक जूरी सिस्टम/राईट टू रिकाल कानूनों का मुक्त रूप से प्रचार करते है ताकि करोड़ो नागरिको की सहमति से इन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित कराया जा सके । आप से अपेक्षा की जाती है कि प्रश्न/कमेंट्स पठनीय भाषा में रखें ।
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(11) कृपया कमेंट्स के लिए liner कमेंट्स बॉक्स का प्रयोग करें। "reply caption" का इस्तेमाल न करें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Oct 28 2017 07:30:33 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सुप्रीम कोर्ट ने भस्म आरती के दौरान शिवलिंग को पूरी तरह ढक देने के आदेश दिए है !!! नियमित रूप से की जाने वाली महाकाल की इस पूजा में मुर्दे की भस्म चढ़ती है। अब यह भस्म महाकाल को छू नहीं सकेगी। दूसरे शब्दों में , सुप्रीम कोर्ट ने महाकाल को भस्म आरती से वंचित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के जज चाहते है हम इस बात पर विश्वास कर ले कि, भस्म से शिवलिंग का क्षरण हो रहा है !!!
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समाधान ?
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१) राईट टू रिकॉल सुप्रीम कोर्ट जज एवं ज्यूरी सिस्टम लागू होने से भ्रष्ट जजों को नौकरी से निकालने एवं दंड देने की शक्ति नागरिको के हाथो में आ जायेगी।

२) राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधन अधिनियम के आने से कोर्ट मंदिरों के प्रशासन में दखल नहीं कर सकेगा और मंदिर सीधे श्रधालुओ के नियन्त्रण में होंगे।
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न्यूज लिंक -- <http://www.livehindustan.com/national/story-mahakal-bhasm-aarti-performed-at-ujjain-mahakaleshwar-temple-after-supreme-court-decision-in-madhya-pradesh-1615628.html>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 29 2017 07:18:39 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

नमस्कार tushar chodhary,
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यह स्तम्भ आपके प्रश्न तथा टिप्पणियों के लिए बनाया गया है।
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सभी के लिए
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यह पोस्ट सिर्फ़ tushar chaodhary के प्रश्न और टिप्पणियों के लिए है। अन्य के प्रश्न और टिप्पणियाँ डिलीट कर दी जायेगी।
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प्रश्नकर्ता से निम्नलिखित नियमों के पालन की अपेक्षा की जाती है :
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(1) हिन्दी भाषा के लिए हिन्दी लिपि और अंग्रेजी भाषा के लिए अंग्रेजी लिपि का प्रयोग करें। रोमन भाषा का प्रयोग नहीं करे ।
.
(2) दो पेराग्राफ के बीच '.' चिन्ह का प्रयोग करे ।
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(3) लेखन में अनावश्यक चिन्हों जैसे '.......', '!!!!!!!', '//////', '####', '„„„„„„', '??????' आदि का तथा अनावश्यक 'केपिटल लेटर्स' का प्रयोग नहीं करें ।
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(4) एक बार में एक ही कमेन्ट करे । यदि आपने दो कमेन्ट एक साथ किये है तो,
अ) पहले कमेन्ट को एडिट करें
ब) दुसरे कमेन्ट को कोपी करके पहले वाले कमेन्ट में पेस्ट करे
स) फिर दुसरे कमेन्ट को डिलीट कर दें ।
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(5) कमेन्ट क्रमिक/सिलसिलेवार ढंग से करे, अक्रमिक रूप से नही ।
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क्रमिक कमेन्ट क्या है ?
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मान लीजिये कि -
अ) आपने 'पहला' कमेन्ट किया है,
ब) मैंने 'दूसरा' कमेन्ट किया है,
स) आपने 'तीसरा' कमेन्ट किया है,
द) आपने चौथा कमेन्ट किया है ।
तो यहाँ पहला, दूसरा और तीसरा क्रमिक जबकि चौथा कमेन्ट अक्रमिक है । अक्रमिक कमेन्ट को बिन्दु 4 में बताये तरीके से संपादित कर पिछले कमेन्ट में जोड़ दें ।
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(6) अपने प्रश्नों तथा टिप्पणियों को डिलीट नहीं करे । ताकि अन्य कार्यकर्ता भी इन्हें पढ़ सके ।
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(7) कृपया मेरी फेसबुक प्रोफाइल पर नोट्स (Notes) सेक्शन में जाए तथा ' नागरिको को चाहिए कि वे अपने पीएम को ट्विटर पर आदेश भेजे' स्तम्भ को पढ़े। यह हमारे अभियान का केंद्र बिन्दु है ।
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(8) नोट्स सेक्शन में ही 'विशेष आलेख-01' शीर्षक से दर्ज स्तम्भ में राईट टू रिकाल ग्रुप द्वारा प्रस्तावित कुछ मुख्य कानूनी ड्राफ्ट्स की सूची तथा उनके लिंक देखे जा सकते है ।
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(9) इस स्तम्भ का लिंक देखने के लिए नोट्स सेक्शन में जाकर 'आपसी संवाद स्तम्भ' या 'two person conversation thread' शीर्षक से रखे गए स्तम्भ को देखें । इस स्तम्भ का लिंक वहां दर्ज किया गया है ।
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(10) हम देश में व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवश्यक जूरी सिस्टम/राईट टू रिकाल कानूनों का मुक्त रूप से प्रचार करते है ताकि करोड़ो नागरिको की सहमति से इन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित कराया जा सके । आप से अपेक्षा की जाती है कि प्रश्न/कमेंट्स पठनीय भाषा में रखें ।
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(11) कृपया कमेंट्स के लिए liner कमेंट्स बॉक्स का प्रयोग करें। "reply caption" का इस्तेमाल न करें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 29 2017 08:33:39 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

डेरा सच्चा सौदा के स्थापित ढाँचे को तोड़ने के लिए मोदी साहेब , हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर एवं हाई कोर्ट जजो ने डेरे के खातों को बेवजह फ्रिज करके रखा हुआ है। संघ, कांग्रेस एवं आम आदमी पार्टी के सभी कार्यकर्ता भी इस फैसले का समर्थन कर रहे है।
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दिए गए वीडियो में व्यक्ति का कहना है कि खाते फ्रिज हो जाने के कारण डेरे द्वारा संचालित हॉस्पिटल स्टाफ को दो महीनो से वेतन नहीं मिला है !! बावजूद इसके वे हजारो मरीजों की चिकित्सा कर रहे है !! इन महाशय के सम्बन्धी को डेंगू हुआ था , जिन्हे यहाँ भर्ती किया गया , और अब मरीज की हालत में सुधार है।
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Sanju Girdhar Girdhar:

ज़रूर देखे यहाँ है डेंगू का इलाज ...........

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 29 2017 14:16:16 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

एनजीटी ने श्री श्री रविशंकर की संस्था द्वारा निर्मित तीन मंजिला इमारत को गिराने के आदेश दिये है। एनजीटी ने कोलकाता में श्री श्री रविशंकर की उन तमाम इमारतों को भी गिराने के आदेश दिए है जो पर्यावरण का उल्लंघन करती है।
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एनजीटी में बैठे भ्रष्ट जज "चयनात्मक कार्यवाही" करने के लिए कुख्यात है, और हिन्दू संत , मंदिरो एवं उनके आश्रम किस किस तरह से पर्यावरण का उलंघ्घन कर रहे है इस पर एनजीटी विशेष नजर रखता है।
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<http://indiatoday.intoday.in/story/ngt-orders-demolition-of-building-owned-by-sri-sri-ravi-shankar-kolkata/1/1077209.html>;
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श्री श्री ने विश्व सांस्कृतिक समारोह किया था तब भी एनजीटी ने उन पर आरोप लगाया था कि इस आयोजन से यमुना का पारिस्थितकी तंत्र गड़बड़ा गया है। इसके एवज में एनजीटी ने उन पर 5 करोड़ का जुर्माना लगाया था, और समारोह में भी ढेर सारे अड़ंगे लगाये थे।
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एनजीटी इससे पहले देशनोक की करणी माता मंदिर में अगबत्ती, चुनरी, ध्वजा, श्रृंगार सामग्री, नारियल आदि चढाने पर रोक लगा चुका है। एन जी टी का मानना है कि इससे मंदिर में प्रदुषण होता है।
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एनजीटी शवदाह पर रोक लगाने के लिए भी प्रयासरत है। एनजीटी का कहना है कि , हिन्दुओ में अंतिम संस्कार के लिए शवो को लकड़ी से जलाने के कारण भारत में प्रदुषण फ़ैल रहा है व इससे पारिस्थितकी तंत्र की हानि हो रही है। एनजीटी अंतिम संस्कार के लिए बिजली का प्रयोग किये जाने का क़ानून चाहता है।
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एन जी टी के कर्मो की सूची बेहद लम्बी है। ये संस्था हिन्दू धर्म को तोड़ने के कारोबार में अग्रणी है। दरअसल एनजीटी को जज चलाते है। मतलब जब तक आप भ्रष्ट और मिशनरीज के एजेंट नहीं है तब तक आप एनजीटी में नहीं आ सकते। जो जज रिटायर हो जाते है उन्हें सुप्रीम कोर्ट से एनजीटी में भेज दिया जाता है।
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समाधान - भारत में ज्यूरी सिस्टम एवं राईट टू रिकॉल जज के क़ानून को लागू किया जाए और देश के सभी ( सभी - लोअर कोर्ट, हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट ) जजों को नौकरी से निकाला जाए। इन कानूनों के आने के बाद ये जज बनने के लिए आवेदन कर सकते है। जो चुने जायेगे उनकी नौकरी चलेगी, शेष की नहीं।
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एनजीटी अध्यक्ष की नियुक्ति भी नागरिको की सहमती से होनी चाहिए। राईट टू रिकॉल एनजीटी अध्यक्ष का क़ानून आने से नागरिको को अध्यक्ष को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार मिल जाएगा। पर्यावरण से सम्बंधित मामलो की सुनवाई नागरिको की ज्यूरी करेगी। यदि ज्यूरी मानती है कि पर्यावरण का उल्लंघन हुआ है तो आर्थिक दंड लगा सकती है वर्ना आरोपी को बरी कर सकती है।
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Oct 29 2017 17:48:01 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

कैसे मिशनरीज हिन्दू धर्म को विघटित कर रही है, और कैसे इसे रोका जा सकता है ?
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अध्याय
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(1) मिशनरीज की कार्य शैली
(2) प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव
(3) धार्मिक व्यवस्था में आने वाले बदलाव
(4) मंदिरों पर प्रहार
(5) मठ, आश्रम , डेरे एवं विभिन्न सम्प्रदाय
(6) समाधान
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(1) मिशनरीज की कार्य शैली
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वे धर्मान्तर के लिए सेवा कार्यो का इस्तेमाल करते है। स्कूलो एवं अस्पतालो का संचालन उनकी मुख्य गतिविधि है। धर्मान्तर मुख्यतया दो तरीको से किया जा सकता है -- a ) बल प्रयोग द्वारा , b) सेवा कार्यो द्वारा। सेवा कार्यो के माध्यम से बेहद आसानी से अहिंसक रूप से धर्मांतरण किया जा सकता है। शांति के साथ। और ऐसा धर्मांतरण पूरी तरह से कानूनी एवं स्वैछिक होता है। सेवा कार्यो के लिए विराट संसाधनों की जरूरत होती है। मिशनरीज को ये संसाधन बहुराष्ट्रीय कम्पनियो से प्राप्त होते है। CSR ( corporate social responsibility ) के रूप में। इस तरह किसी देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मजबूत होने से मिशनरीज भी ताकतवर होती चली जाती है।
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अमीर एवं मध्य वर्ग का धर्मांतरण सेवा कार्यो द्वारा नहीं किया जा सकता। वे खुद का खर्चा स्वयं उठा लेते है। किन्तु यदि किसी इलाके में गरीबी है तो स्कूल एवं अस्पताल सबसे बुनियादी आवश्यकताएं है। जिस संस्था के पास स्कूलों / अस्पतालों पर नियंत्रण होगा उस क्षेत्र के गरीब तबके के लोगो का समुदाय अमुक संस्था से जुड़ जायेगा। तीसरा बिंदु गरीबो को खाना खिलाना है। इसके अलावा वे धर्म को तोड़ने के लिए नेताओं, जजों , कलाकारों, अभिनेताओं , पत्रकारों, संपादको, स्तम्भकारो आदि का भी इस्तेमाल करते है। शान्ति पूर्वक धर्मान्तर करने का यह मॉडल बेहद सफल है और मिशनरीज फिलिपिन्स एवं साउथ कोरिया में इसे सफलतापूर्वक निष्पादित कर चुकी है। भारत में यह मॉडल तेजी से लागू हो रहा है।
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कृपया पूर्वोत्तर राज्यों की धार्मिक जनसँख्या वृद्धि दर पर गूगल करें। पिछले 30 साल में मिशनरीज पूर्वोत्तर के ज्यादातर इलाके को धर्मांतरित कर चुके है। उनका अगला निशाना पंजाब और हरियाणा है। राम रहीम जी के डेरे को उखाड़ देने के बाद पंजाब एवं हरियाणा में मिशनरीज के लिए कोई बाधा नहीं रही है। अत: पंजाब एवं हरियाणा में अब मिशनरीज बेहद तेजी से धर्मांतरण कर सकेगी।
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भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियो ने 1991 में आना शुरू किया था ( एफडीआई के माध्यम से )। 2002 से इस गति में और भी तेजी आयी। तब से सभी क्षेत्रो में लगातार उनकी आवक बढ़ रही है। जब किसी देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियो एवं मिशनरीज का नियंत्रण बढ़ेगा तो अंततोगत्वा आपको अमुक देश की प्रशासनिक व्यवस्था एवं धार्मिक व्यवस्था में निम्नलिखित बदलाव देखने को मिलेंगे :
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(2) प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव :
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सरकारी स्कूलों एवं अस्पतालों का तेजी से निजीकरण होगा एवं सरकारी स्कूलों / अस्पतालों की दशा बदतर होती चली जायेगी।

स्कूलों / अस्पतालों का निजीकरण गरीब और समृद्ध के बीच छंटनी कर देता है। निजीकरण इसीलिए किया जाता है ताकि मध्य वर्ग को विकल्प दिया जा सके। यदि बिना निजीकरण किये सरकारी स्कूलों / अस्पतालों को बदतर कर दिया गया तो मध्यवर्ग के पास विकल्प नहीं बचेगा और वे आंदोलन कर देंगे। जब सरकारी स्कूलों / अस्पतालों को बदतर किया जाता है तो मध्यवर्ग निजी स्कूलों / अस्पतालों में शिफ्ट हो जाता है और गरीबों के हिस्से में बदहाल सरकारी स्कूल अस्पताल रह जाते है। सुदूर ग्रामीण इलाकों में , आदिवासी क्षेत्र में , सीमावर्ती क्षेत्र में, रिमोट एरिया में , गरीब एवं पिछड़े हुए इलाको आदि में निवास करने वाला वर्ग सरकारी स्कूलों / अस्पतालों के बदहाल होने एवं निजी स्कूलों / अस्पतालों के महंगा होने से शिक्षा / चिकित्सा से वंचित हो जाता है या उन्हें इसके ऊँचे दाम चुकाने होते है।
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ऐसी स्थिति में मिशनरीज के लिए इन इलाको में जाकर अस्पताल एवं स्कूल खोलने का रास्ता तैयार हो जाता है। वे वहां जाकर अस्पताल / स्कूल एवं चर्च चलाते है। इस संचालन द्वारा पादरी वगेरह स्थानीय समुदाय में अपनी पकड़ बना लेते है। वंचित तबके की मिशनरीज के प्रति सहानुभूति बढ़ जाती है और वे इनके प्रति सह्रदय हो जाते है। अब यदि आप ऐसे किसी इलाके में जाएंगे तो आप इनकी प्रशंशा ही करेंगे। क्योंकि आप पाएंगे कि चर्च असहाय तबके को दवाइयाँ / शिक्षा दे रहा है और उन्हें खाना खिला रहा है। किन्तु इस एस्टाब्लिशमेंट के बाद वहां बेहद तेजी से धर्मांतरण होते है। वे पूरे के पूरे इलाके / गांव / कबीले / क्षेत्र को धर्मांतरित कर देते है।
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तो उन्हें अपने स्कूल एवं अस्पताल खोलने के लिए एक रिक्त स्थान चाहिए। सरकारी स्कूल एवं अस्पतालों के होते हुए यह रिक्त स्थान मिलना मुमकिन नहीं है। अत: जिस भी देश में मिशनरीज अपना प्रभाव बना लेती है वहां के राजनेताओ को प्रलोभित करके या दबाव में लाकर ऐसे कानूनों को लागू करने के लिए बाध्य करती है जिससे सरकारी स्कूलों एवं अस्पतालों की दशा बदतर होती चली जाए और निजी क्षेत्र में भी इसके ऊँचे दाम चुकाने पड़े।
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क्या भारत में आप यह देख पा रहे है कि क्रमिक रूप से दवाइयाँ / चिकित्सा / शिक्षा आदि लगातार महंगी होती जा रही है ?

यदि आपकी आयु 30 वर्ष से कम है तो अपने वरिष्ठजनो से बात करके यह मालूम करे कि सन 2002 से पहले तक सरकारी स्कूलों / अस्पतालों का अनुपात निजी स्कूलों / अस्पतालों के मुकाबले में क्या था, एवं इनमे पढाई / चिकित्सा का स्तर कैसा था।

पता लगाइये कि पिछले 15 सालो में विभिन्न राज्यों एवं केंद्र की सरकारों ने सरकारी शिक्षा / चिकित्सा तोड़ने के लिए किन किन कानूनों को पास किया है और इन्हे बेहतर बनाने के लिए आवश्यक किन किन कानूनों को लागू करने की अवहेलना की है ?
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काम की बात -- यदि किसी देश में मिशनरीज जायेगी तो शिक्षा / चिकित्सा महंगी होगी , सरकारी स्कूलों / अस्पतालों का हाल बदतर होगा। यदि किसी देश में लगातार सत्ता परिवर्तन के बावजूद सरकारी स्कूलों / अस्पतालों की अवस्था में सुधार नहीं आ रहा है और यह दोनों सेवाएं निजी क्षेत्र पर टिकी हुयी है तो आपके दिमाग में संदेह के बादल तुरंत घुमड़ने चाहिए।
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अन्य व्यवस्थागत बदलाव - बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं मिशनरीज का प्रभाव बढ़ने के साथ ही "स्वदेशी स्थानीय छोटी एवं मझौली निर्माण इकाइयों" की संख्या मं कमी आएगी। स्वरोजगार घटेगा एवं नौकरी पेशा लोगो की संख्या में वृद्धि होगी। प्राथमिक तौर पर बेरोजगारी / महंगाई घटेगी लेकिन दूसरे चरण में बेरोजगारी एवं महंगाई बढ़ेगी। जमीनों के दाम बढ़ेंगे। गैर सरकारी संगठनों की संख्या एवं उनकी गतिविधियां बढ़ेगी। कृषि का दायरा लगातार सिकुड़ेगा , शहरीकरण बढ़ेगा। आयात लगातार बढ़ेगा एवं निर्यात गिरेगा। आरक्षण जैसे मुद्दों पर जातिगत अलगाव बढेगा। लेकिन विभिन्न व्यवस्थागत बदलावों के अंतिम नतीजे में गरीबी बढ़ेगी एवं श्रम सस्ता होगा। क्योंकि गरीबी न होने से धर्मांतरण करना बेहद मुश्किल हो जाता है। इस लेख में इन गैर धार्मिक बिन्दुओ पर विवरण नहीं रखा गया है। सिर्फ उन मुख्य बिन्दुओ को ही शामिल किया गया है जिनका सीधा सम्बन्ध धर्मांतरण से है।
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धर्म की प्रकृति एवं इसकी आवश्यकता ?
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धर्म दुनिया में सबसे पुरानी संस्था है। सभी सभ्यताओं में धर्म एक अनिवार्य तत्व रहा है। यदि किसी सभ्यता में प्रचलित धर्म कमजोर हो जायेगा तो अन्य ताकतवर धर्म उनके अनुयायियों को अपनी तरफ खींच लेगा, या फिर नए किसी धर्म का उदय होगा। किन्तु धर्म आदि काल से हर समय रहा है और बना हुआ है। वजह ?
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धर्म के दो आयाम है : १) मीमांसा २) परोपकार
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मीमांसा - धर्म क्या कहता है, धार्मिक ग्रंथो में क्या लिखा है, धर्म का उपदेश, उत्सव , धार्मिक शिक्षाएं, धर्म-अधर्म, पाप एवं पुण्य , कर्म फल , जन्नत-जहन्नुम , सृष्टि क्या है , किसने इसे रचा है , सत्य क्या है, इसका मालिक कौन है , माया , शैतान एवं फ़रिश्ते , इल्म, धर्म का तत्व और दर्शन क्या है आदि आदि तरह के विषयो पर विचार एवं उपदेश करना धर्म की मीमांसा है।
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धर्म की मीमांसा व्यक्ति को मानसिक / आध्यात्मिक खुराक मुहैया कराती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में आर्थिक / मानसिक / शारीरिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, और परिस्थितियों के विकट होने पर उसे मानसिक सम्बल की जरूरत होती है। धार्मिक उपदेश ऐसे समय में उसे सहारा देते है। इस तरह टूटे हुए व्यक्ति के लिए धर्म एक प्रकार से मनोचिकित्सक का काम करता है। यह जिज्ञासुओ की ज्ञान की भूख का शमन भी करता है। इसके अतिरिक्त जब व्यक्ति लौकिक जगत में सफल हो जाते है तो अपना परलोक सुधारने और अपने पापो का प्रायश्चित करने के लिए भी धर्म कार्यो की शरण ले लेते है। मानव सामजिक प्राणी है। धर्म सबसे आदि समाज है। धार्मिक उत्सव मानवो को सामुदायिक आमोद प्रमोद एवं मनोरंजन प्रदान करते है और एक समुदाय के रूप में उनमे प्रेरणा का संचार होता है। इस तरह धर्म विभिन्न वर्ग एवं श्रेणी के मनुष्यो को उनकी आवश्यकता के अनुसार पूर्ती देता है।
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परोपकार - यह धर्म का वह निर्णायक तत्व है जो धर्म को टिकाये रखता है और उसे मजबूती प्रदान करता है। यदि किसी धर्म की धार्मिक संस्थाएं परोपकार के कार्य करती रहेगी तो ऊपर दी गयी मीमांसा करने के अवसर बने रहेंगे। यदि परोपकार घट जायेगा तो जिस धर्म की धार्मिक संस्थाएं ज्यादा परोपकार कर रही है वह धर्म अमुक धर्म के वंचित तबके को अपनी और खींच लेगा। ऐतिहासिक रूप से यह सिद्ध है कि, जिस धर्म की धार्मिक संस्थाओ ने परोपकार के कार्य किये उनका विस्तार होता गया और जिन्होंने अपनी शक्ति सिर्फ मीमांसा पर जाया कि वे सिकुड़ते चले गए। परोपकार कार्यो के अभाव में सिर्फ एक शर्त पर ही धर्म टिका रह सकता है -- यदि उसे किसी प्रतिद्वंदी धर्म का सामना नहीं करना पड़े। जिस धर्म की धार्मिक संस्थाओ का प्रशासन बेहतर होता है उन धर्मो में परोपकार के कार्यो में वृद्धि होती है। अत: मजबूत प्रशासन वाला धर्म कमजोर प्रशासन वाले धर्म के अनुयायीओ पर कब्ज़ा कर लेता है।
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मीमांसा की दृष्टी से सारे धर्म उपदेशक, पीर फ़क़ीर, पादरी, संत, स्वामी, महर्षि आदि कवि और कहानी कार है। और इनके मुखारविंद से निकली गयी कहानियों और कविताओं से धर्म के टिके रहने या नष्ट हो जाने का कोई लेना देना नहीं है। ये लोग समय समय पर आते है और अपने प्रवचन देकर चले जाते है।
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किन्तु इन कथित धर्म गुरुओ में से ही कभी कभी कोई उपदेशक श्रद्धालुओं पर अपना प्रभाव छोड़ कर दान खींचता है और इस दान से ऐसी व्यवस्था कायम कर देता है जिससे अमुक धर्म में परोपकार के कार्यो में तेजी आ जाती है। कुछ इससे भी आगे बढ़ जाते है और ऐसी व्यवस्था रच देते है जिससे उनके मर जाने के बाद भी अमुक संस्था / धर्म में दान आता रहता है और परोपकार के कार्य होते रहते है। ऐसे लोग सही अर्थो में धर्म को मजबूत बना देते है।
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तो इस तरह धार्मिक संस्थाएं एवं धर्म समाज में परोपकार के कार्य करने व व्यक्तियों को मनोवैज्ञानिक आश्रय देने का कार्य करते है।
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(3) धार्मिक व्यवस्था में आने वाले बदलाव :
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महत्त्व्पूर्ण बात - आवश्यक इकाइयों जैसे अस्पताल / स्कूल आदि का सरकारी ढांचा टूटने के बाद अगली एवं अंतिम बाधा धार्मिक संस्थाएं होती है। किसी धर्म के अनुयायियों को बड़े पैमाने पर धर्मांतरित तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक स्थानीय धर्म की संस्थाओ को कमजोर न किया जाए। जिस तरह खाना उसे ही खिलाया जा सकता है जो भूखा हो और आप पर आश्रित हो उसी तरह से धर्मांतरण के लिए भी पहले स्थानीय धर्म की संस्थाओ को तोडना होता है। यदि स्थानीय धार्मिक संस्थाओ का क्षरण नहीं किया गया तो अनुयायी अपने धर्म से चिपके रहेंगे और धर्मांतरण नहीं हो पायेगा।
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दूसरा पहलु यह है कि धर्म एक आदि संगठन है। सरकारों एवं शासको के उदय होने से काफी पहले भी धार्मिक संस्थाएं समाज को प्रबंधित करती थी। जब राजा / प्रशासन किसी मानविक-सामाजिक कल्याण के विषय को प्रबंधित नहीं करता तो धार्मिक संस्थाऐं इसकी क्षति पूर्ती करती रही है। उदाहरण के लिए सरकार यदि किसी व्यक्ति को वस्त्र या भोजन नहीं देती तो परोपकार करने वाले धार्मिक संस्थान इसकी आपूर्ति कर देते है। इस तरह से किसी भी देश का कोई शासन / राजा धार्मिक संस्थाओ की कमी को पूरा नहीं कर सकता। किन्तु धार्मिक संस्थाएं उन कल्याणकारी कार्यो की पूर्ती करती है जिसकी शासन / राजा द्वारा अवहेलना की गयी है।
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कैसे स्थानीय धार्मिक संस्थाएं मिशनरीज का रास्ता रोक देती है ?

हिन्दू धर्म के संदर्भ में धार्मिक संस्थाओ के दो वर्ग है -- १) मंदिर , २) मठ, आश्रम , डेरे एवं विभिन्न सम्प्रदाय
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मंदिर क्या करते है ?
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बुनियादी रूप से ये सभी मंदिर दान प्राप्त करते है, और प्राप्त हुए इस दान से वे स्कूल चलाते है, अस्पताल चलाते है , दवाइयों का वितरण करते है, गरीबो को खाना खिलाते है , वस्त्र बांटते है , कथाएं आयोजित करवाते है , धार्मिक आयोजन करते है और इसी प्रकार की अन्य धार्मिक / परोपकारी गतिविधियां करते है। चूंकि मंदिर इस तरह की गतिविधियां करते है, इसीलिए श्रद्धालु इन्हे दान देते है। जब तक किसी धर्म की संस्थाएं परोपकार के कार्य करती रहेगी तब तक अन्य धर्म को अपनी जड़े जमाने का अवसर नहीं मिलेगा।
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किन्तु ! किन्तु भारत के ज्यादातर मंदिर दान का उपयोग परोपकार कार्यो और धर्म को मजबूत बनाने वाली गतिविधियों में नहीं करते है !! बल्कि वे दान का संग्रहण करने लगते है !! और यह हिन्दू धर्म को समेट कर रख देने की अकेली वजह बन रहा है।
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हिन्दू मंदिरो की तुलना गुरुद्वारों एवं चर्च से करे। पता लगाए कि क्या मंदिर उतने परोपकार के काम कर रहे है जितने कि गुरूद्वारे करते है। ज्यादातर गुरुद्वारों में लंगर चलते है। किन्तु कितने मंदिर प्राप्त दान में से खाना / दवाइयाँ बांटना / स्कूल / अस्पताल चलाना आदि गतिविधियां करते है ? आप पाएंगे कि मंदिरो की तुलना में गुरुद्वारों में दान से प्राप्त राशि का ज्यादा सदुपयोग किया जाता है। अकूत दान प्राप्त करने के बावजूद मंदिर परोपकार के कार्यो में पिछड़े हुए है। वजह ?
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वजह यह है कि -- मंदिर प्रमुख की नियुक्ति में विरासत व्यवस्था का पालन किया जाता है। और दान का इस्तेमाल कैसे किया जायेगा यह तय करने का अधिकार सिर्फ मंदिर प्रमुखों / ट्रस्टियो के पास होता है। इन्हे ये स्वामित्व विरासत से मिलता है और आगे भी इनके वारिसान को स्थानांतरित होना होता है। सैकड़ो सालो से यही परम्परा है। इस वजह से वे दान से प्राप्त राशि के एक बड़े हिस्से का इस्तेमाल तड़क-भड़क , विलासिता एवं ऐश्वर्य के प्रदर्शन मंर करते है। एक हिस्से का ट्रस्टी गबन कर लेते है और एक हिस्से का मंदिर के नाम से संग्रहण कर लेते है। और फिर भी कुछ बचता है तो निमित्त के लिए इनका इस्तेमाल परोपकार के कार्यो में करते है !!! श्रद्धालुओं या दान देने वालो के पास ऐसा कोई तरीका नहीं है कि वे इन्हे रोक सके या दान से प्राप्त राशि के उपयोग के बारे में निर्देश दे सके।

यह भी उल्लेखनीय है कि सभी मंदिरो में यह हाल नहीं है। कुछ मंदिर दान से प्राप्त संपत्ति का सदुपयोग भी करते है। लेकिन ऐसे मंदिरो की संख्या लगातार गिरती चली गयी और तेजी से गिरती चली जा रही है।
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सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पेड मीडिया ने मंदिरों के इस दोषपूर्ण प्रशासन को उछाला और जनता के मानस में यह स्थापित किया कि हिन्दू मंदिर भ्रष्टाचार के केंद्र है। फिर उन्होंने सरकार में बैठे नेताओं को घूस देकर मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लेना शुरू कर दिया। आज भारत के अधिकतर बड़े मंदिर सरकार अधिगृहित कर चुकी है। इस अधिग्रहण के बाद मंदिर पूरी तरह उनके कब्जे में है और वे बहुत ही सधे और धीमे तरीके से मंदिरों को तोड़ रहे है।
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विरासत व्यवस्था होने और श्रद्धालुओं का दखल न होने के कारण पुजारियों को मंदिरो पर पूर्ण स्वामित्व मिला और इसका सबसे मारक दुष्प्रभाव यह आया कि वे प्राप्त दान का उपयोग परोपकार के कार्यो में करने की जगह इसका संग्रहण करने लगे, तथा श्रधालुओ का मंदिर प्रशासन पर कोई नियंत्रण न होने के कारण मंदिरो में "सार्वजनिक" रूप से छुआछूत और भेदभाव पनपा। इससे दलितो एवं पिछड़े हुए तबके का मंदिरो से मोहभंग हो गया। दान का दुरूपयोग एवं भेदभाव के कारण मंदिर दानदाता व गरीबों का समर्थन खोने लगे। ऊंच नीच एवं भेदभाव ने दलितों / पिछड़ो को मंदिरो से दूर किया।
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सिक्खो में विरासत परम्परा न होने और गुरुद्वारों का प्रबंधन SGPC एक्ट द्वारा होने के कारण प्राप्त दान का ज्यादातर उपयोग परोपकार के कार्यो में हुआ और आज भी होता है। SGPC एक्ट आने से पहले भी सिक्खो में गुरुद्वारों में विरासत परम्परा नहीं थी और श्रद्धालुओं के पास अपने गुरुद्वारों के ग्रंथि को चुनने का अधिकार था। आजीवन स्वामित्व न होने के कारण और चुनाव प्रक्रिया की वजह से गुरुद्वारों ने दान से प्राप्त सम्पति का ज्यादातर इस्तेमाल परोपकार के कार्यो में किया। ब्रिटिश ने जब सिक्खो के धार्मिक प्रबंधन को तोड़ने का प्रयास किया तो सिक्खो ने आंदोलन करके ब्रिटिश शासन को SGPC एक्ट लागू करने के लिए बाध्य कर दिया था। इसी तरह मस्जिदों एवं चर्च में भी विरासत व्यवस्था नहीं होने से वे ज्यादा परोपकार के कार्य कर पाए, और उनके धर्म का विस्तार हुआ। 1970 से SGPC एक्ट का प्रबंधन कमजोर होने लगा और यह लगातार कमजोर होता जा रहा है।
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पता लगाइये - 1925 में लागू SGPC एक्ट में क्या प्रशासनिक कमियां थी और 70 के दशक से गुरुद्वारा प्रबंधन में क्या बदलाव आये जिससे दलित सिक्ख गुरुद्वारों से दूर होते चले गए ?
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(4) मंदिरों पर प्रहार :
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महत्त्वपूर्ण बात - यदि मंदिरों में दान आता रहेगा और वे छिटपुट परोपकार के कार्य करते रहेंगे तब भी मंदिरों द्वारा किये जाने वाले इन परोपकार के कार्यो में एकदम से तेजी आ जायेगी जब मिशनरीज अपनी गतिविधियाँ बढाने लगेगी। स्कूलों / अस्पतालों / दवाइयों / खाने की समस्या आने पर मंदिर इन गतिविधियों को संचालित करने लगेंगे और मिशनरीज के अवसर ख़त्म हो जायेंगे। इसीलिए मिशनरीज के लिए यह जरुरी है कि इनके ढाँचे को बेहद कमजोर कर दिया जाए। विरासत परम्परा होने के कारण मंदिरों का प्रशासन पहले से ही बदतर था / है । अत: इसे तोड़ने के लिए किसी प्रकार के अतिरिक्त प्रयासों की आवश्यकता नहीं है। यदि मिशनरीज को भारत में अपनी जगह बनानी है तो उसे सिर्फ दो काम करने है :

अ ) उन्हें यह सुनिश्चित करना है कि मंदिरों के प्रशासन में किसी तरह का सुधार न आये। यदि ऐसे क़ानून लागू कर दिए जाते है जिनसे मंदिरों का प्रबंधन सुधरे, तो अंततोगत्वा दान में तेजी आएगी एवं परोपकार के कार्यो में इजाफा होने लगेगा। अत: यथास्थिति मिशनरीज के अनुकूल है।

पता लगाइए कि पिछले 20 वर्षो में किसी भी राज्य सरकार ने या केंद्र सरकार ने ऐसे कितने कानूनों को पास किया है जिससे मंदिरों का प्रशासन सुगठित हो ?
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ब ) उन्हें यह सुनिश्चित करना है कि हिन्दूओ का धार्मिक जमाव* टूटे एवं मन्दिरों में आने वाले दान में कमी आये।
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(*) धार्मिक जमाव - विभिन्न धार्मिक उत्सवो जैसे डांडिया-गणपति-माताजी स्थापना आदि में श्रद्धालु बड़ी संख्या में इकठ्ठे होते है, कथाओं एवं प्रवचनों का आयोजन किया जाता है, धार्मिक मेलो जैसे कुम्भ आदि में बड़ी संख्या में लोग भाग लेते है, धार्मिक जुलुस, धार्मिक यात्राएं आदि तथा ऐसी सभी गतिविधियाँ धार्मिक जमाव की श्रेणी में शामिल है। उत्सवो एवं त्योहारों पर मंदिरागामी लोगो की संख्या में इजाफा होना भी धार्मिक जमाव है। धार्मिक जमाव की किसी धर्म को टिकाये रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह समुदाय के जुड़ाव में सीमेंट में काम करता है। उदाहरण के लिए इस्लाम को ताकत धार्मिक जमाव से ही आती है। ( जुम्मे को एक निश्चित समय पर नमाज अदा करने के लिए एकत्र होना धार्मिक जमाव है )
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धार्मिक जमाव तोड़ने एवं दानदाताओं को हतोत्साहित करने के लिए वे मीडिया का एवं नेताओं / अभिनेताओ / कलाकारो / लेखको का इस्तेमाल करते है। नेताओं को ऐसे बयान एवं उपदेश देने के लिए प्रेरित / प्रलोभित / बाध्य किया जाता है जिससे धार्मिक जमाव में कमी आये। अभिनेताओं से वे ऐसा फिल्मो के माध्यम से एवं लेखको / कलाकारो से वे ऐसा उनकी कृतियों के माध्यम से करवाते है। जहां ये दोनों वर्ग असफल रहते है वहां वे जजों का इस्तेमाल करते है। इसे फिर से पढ़िए -- जहां नेता / अभिनेता / कलाकार / लेखक आदि असफल रहते है वहां वे जजों का इस्तेमाल करते है। जो व्यक्ति इनके एजेंडे पर अमल करता है उसे मीडिया में सकारात्मक कवरेज दिया जाता है। जिससे उसके प्रशंषको / समर्थको की संख्या बढती है और उनका कैरियर चमक उठता है।
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वे धार्मिक जमाव एवं दान को किस तर्क से हतोत्साहित करते है ?

वे इसके लिए "विज्ञान एवं तर्क" का सहारा लेते है। यहाँ यह समझना जरुरी है कि विज्ञान एवं तर्क का आस्था एवं विश्वास से कोई लेना देना नहीं है। धर्म आस्था है। और यह अध्यात्म से , परलोक से , मानसिक शान्ति से, मान्यता से एवं मनोविज्ञान से जुड़ा हुआ है। जबकि विज्ञान का सरोकार भौतिक जगत से व तर्क का सरोकार व्यवहारिकता व लाभ / हानि से होता है। यदि आप धर्म को व्यवहारिकता एवं वैज्ञानिक कसौटी पर कसेंगे तो दुनिया के सारे धर्म उड़ जायेंगे। किसी भी धर्म को विज्ञान एवं तर्क पर नहीं परखा जा सकता। लेकिन श्रधालुओ को चकमा देने के लिए वे ऐसा ही करते है।
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आपको ओह माय गॉड , पीके, सिंघ्म रिटर्न जैसी फिल्मे देखने को मिलेगी जिनमे तर्क के आधार पर यह स्थापित किया जायेगा कि मंदिरों में दान देना पैसे का दुरूपयोग करना है !! और इसके लिए वे वाजिब तर्क भी देंगे। वे आपको बताएँगे कि शिवलिंग पर चढ़ाया जाने वाला दूध बर्बाद हो रहा है। यह "तर्क" युवाओ को महाशिवरात्रि पर मंदिर जाने से रोक देगा और धार्मिक जमाव में कमी आएगी।

फिल्में मूर्ती पूजा करने वाले को बेवकूफ बताएगी एवं मंदिर जाने वालो के लिए कहेगी कि - जो डर गया वह मंदिर गया। इससे युवा मंदिर जाने को अवैज्ञानिक एवं दकियानूसी मानने लगेंगे और मंदिरो के धार्मिक जमाव में कमी आएगी। इन फिल्मो में सभी साधुओ / संतो आदि का चरित्र अय्य्याश एंव लम्पट बताया जाएगा। इन्हे बार बार टीवी पर दिखाया जाएगा एवं विभिन्न नेता इनका प्रमोशन करेंगे। समाज में समग्र तस्वीर इस तरह की बनेगी जिससे अगली पीढ़ी में मन्दिरगामी श्रद्धालुओं की संख्या में कमी आये। मंदिर गामी श्रद्धालुओं की संख्या में कमी आने से धार्मिक जमाव कम होगा और अंतत: दान में कमी आएगी। दान में कमी आने से मंदिर पंगु हो जायेंगे।
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धार्मिक उत्सवों को नीरस बनाने एवं इनमे जमाव कम करने के लिए विभिन्न नेता / अभिनेता वगैरह इस तरह के "तार्किक" सन्देश देंगे -- जल विहीन होली खेलकर हमें पानी बचाना चाहिए !! दिवाली पर की जाने वाली आतिशबाजी से प्रदूषण होता है !! जन्माष्टमी पर दही हांडी प्रतियोगिता से प्रतिभागियों की जान को खतरा है !! गणेश चतुर्थी पर ध्वनि प्रदुषण होता है , अत इसे शोर मुक्त होना चाहिए !! जल्लीकटू से बैलो का उत्पीड़न होता है !! तथा विभिन्न मीडिया समूहों में इन संदेशो को प्रमुखता से बार बार प्रसारित किया जाएगा। जो कलाकार / नेता ऐसी बातों को प्रोत्साहित करेंगे उन्हें मीडिया में सकारात्मक कवरेज दिया जाएगा। इसी क्रम में "साइलेंट गरबा" एवं दशहरे पर "धूम्रविहीन आतिशबाजी" नयी प्रवृतियां है।
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कुल मिलाकर नेता / अभिनेता / कलाकार / समाज एवं धर्म सुधारक आदि हिन्दू धर्म की व्यवस्था में मौजूद दोषों को दुरुस्त करने के लिए आवश्यक प्रशासनिक सुधारों की कभी भी बात नहीं करेंगे बल्कि वे इन दोषों की आड़ लेंगे और फिर इस प्रकार के सन्देश देंगे जिससे पूरी धार्मिक व्यवस्था पर आघात आये।
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(5) मठ, आश्रम , डेरे एवं विभिन्न सम्प्रदाय :
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भारत के मंदिरों का प्रशासन कमजोर होने के कारण विभिन्न सम्प्रदायों एवं गुरुओ आदि का उद्भव हुआ। उन्होंने धर्म से सम्बंधित उन गतिविधियों की पूर्ती करने का प्रयास किया जिन्हें मंदिर नहीं कर रहे थे। किन्तु भारत में इन्हें प्रबंधित करने का कोई क़ानून न होने के कारण मंदिरों स इतर इन विभिन्न धार्मिक संस्थाओ ने भी दान से प्राप्त होने वाली संपत्ति का उतना बेहतर उपयोग नहीं किया। लेकिन फिर भी यह तथ्य है कि मंदिरो की तुलना में इनका प्रदर्शन काफी बेहतर है और इन्होने हिन्दू धर्म को विघटित होने से काफी हद तक बचाये रखा।
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राम रहीम गुरमीत जी , श्री आसाराम जी बापू, कबीर पंथी श्री रामपाल जी , श्री श्री रविशंकर महाराज आदि संतो ने अपने असाधारण कार्यो से इस बात को सुनिश्चित किया कि गरीब / दलित / ओबीसी आदि मिशनरीज के आश्रय में चले जाने की जगह हिन्दू धर्म में बने रहे। यदि आज गरीब / दलित / ओबीसी आदि हिन्दू धर्म में बने हुए है तो मंदिर प्रमुखों, प्राचीन राजाओ, संघ के नेताओं, बीजेपी नेताओं का इसमें योगदान शून्य है। इसका असली श्रेय सिर्फ इन तथा इन जैसे अन्य संप्रदाय प्रमुखों की नयी खेप को जाता है। यदि संत गुरमीत जी , संत श्री आसाराम जी एवं संत रामपाल जैसे लोग कमजोर हो गए तो दलितों / ओ बी सी / गरीबो की एक बड़ी संख्या मिशनरीज की गोद में जा गिरेगी। ऐसे सभी व्यक्ति को इन संतो को 10-20 साल के लिए जेल में भेजने का जश्न मना रहे है दरअसल वे जाने / अनजाने मिशनरीज की मदद कर रहे है।
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विभिन्न आश्रम / सम्प्रदाय / डेरे आदि मंदिरो की कमी को पूरी कर रहे है। अत: मिशनरीज इन संस्थाओ को भी बाधा के रूप में देखती है। तो आप देखेंगे कि पिछले कुछ वर्षो ने मीडिया में झूठे-सच्चे आरोपों का बहाना बनाकर हिन्दू संतो के खिलाफ लगातार मीडिया ट्रायल की जा रही है , और पूरे देश में इस तरह की धारणा गढ़ी जा रही है कि सभी आश्रम / डेरे / संप्रदाय भ्रष्टाचार एवं ऐयाशी के केंद्र है। और जब भी वे किसी धार्मिक संस्था या गुरु को निशाना बनाते है तो हमेशा ही भ्रष्ट जजों का इस्तेमाल करते है।
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(6) समाधान ?
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हिन्दू धर्म पर यह हमला किसी एक दिशा से नहीं हो रहा है, इसीलिए किसी एक क़ानून द्वारा इसका समाधान नहीं किया जा सकता। इसके लिए हमें एक से अधिक क़ानून चाहिए। नीचे उन प्रस्तावित कानूनों के विवरण दिए गए है जिन्हे लागू करवा के इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।
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(१) हिन्दू मंदिरों के प्रशासन को सुदृढ़ बनाने के लिए हम यहाँ शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी ( SGPC ) जैसा एक ढांचा प्रस्तावित कर रहे हैं। प्रत्येक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध आदि इस ट्रस्ट के जन्म से सदस्य होंगे, जब तक कि वे स्वयं अपनी सदस्यता नहीं छोड़ देते। इन सदस्यों को अध्यक्ष एवं ट्रस्टियो को चुनने एवं किसी भी दिन बदलने का अधिकार भी होगा। मुस्लिम तथा क्रिश्चियन इस ट्रस्ट के सदस्य नहीं बन सकेंगे।
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शुरू में राष्ट्रीय हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट ( NHDMT ) 4 मंदिरों की देख-रेख करेगा -- कश्मीर का अमरनाथ देवालय, राम जन्म भूमि देवालय, कृष्ण जन्म भूमि देवालय तथा काशी विश्वनाथ देवालय। आगे चलकर यदि सम्बंधित संप्रदाय स्वेच्छा से अपने मंदिर सुपुर्द करते है तो यह अन्य मंदिरों की देख-रेख भी कर सकता है। इस क़ानून के आने से मंदिरों का प्रशासन मजबूत होगा और हिन्दू धर्म की संस्थाओ पर हिन्दू श्रधालुओ का नियंत्रण हो जाएगा।

राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट ( NHDMT ) के लिए प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट - <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/838551942989668>;
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(२) दूसरा क़ानून हमें विभिन्न सम्प्रदायों, आश्रमों , मठो आदि को प्रबंधित करने के लिए चाहिए। यह क़ानून उन ट्रस्टों के लिए लागू होगा जो कि हिन्दूओं, बौद्धों, अथवा जैनों के धार्मिक जगह के मालिक हों या उन पर मालिकाना हक़ रखने की इच्छा प्रकट करते हैं। किन्तु यह सिक्ख, इस्लाम, क्रिश्चियन या पारसी धर्म की संस्थाओ पर लागू नहीं होगा। इस अधिनियम में सभी भारतीय धर्म तथा संप्रदाय आते हैं, जैसे- जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, आर्य समाज आदि। सिख पंथ भी एक भारतीय संप्रदाय है लेकिन यह पहले से ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (SGPC) अधिनियम द्वारा शासित है, इसलिए सिक्ख पंथ को इस अधिनियम से बाहर रखा गया है। यह क़ानून विभिन्न सम्प्रदायों पर बाध्यकारी नहीं होगा। जो संप्रदाय, डेरे, आश्रम एवं इनके प्रमुख इस अधिनियम के अंतर्गत आना चाहते है वे इसमें आ सकते है।

'भारतीय संप्रदाय देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/834846793300225>;
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ऊपर दिए गए दोनों क़ानून हिन्दू धर्म की संस्थाओ को इतना प्रभावी बना देंगे कि वह इस्लाम, ईसाई आदि धर्मो का मुकाबला कर सके, तथा एक सीमा के बाद ये क़ानून हिन्दू धर्म को फिर से विस्तार करने में सक्षम कर देंगे।
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(३) तीसरा क़ानून मीडिया से संबधित है। दूरदर्शन के पास बेहद विशाल संसाधन और संपत्तियां है। और कोई कारण नहीं कि दूरदर्शन अन्य निजी चैनल्स से अच्छा प्रदर्शन न कर सके। किन्तु दूरदर्शन अध्यक्ष निजी चैनल्स से घूस खाता है और अकार्यकुशल तरीके से कार्य करता है। राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष क़ानून आने से दूरदर्शन की कार्यकुशलता में वृद्धि होगी। राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष यह सुनिश्चित करेगा कि देश के सभी नागरिको तक सभी महत्व्पूर्ण जानकारी पहुंचे। इससे सभी निजी चैनल मिलकर भी किसी खबर को छुपा नहीं पाएंगे, क्योंकि दूरदर्शन उन खबरों का प्रसारण कर देगा और निजी चैनल एक्सपोज़ हो जाएंगे। बीबीसी इसी तरह से कार्य करता है। बीबीसी ब्रिटिश सरकार का चैनल है, तथा न्यूज के साथ साथ एक्शन, कॉमेडी आदि श्रेणियों के ढेर सारे गुणवत्ता प्रधान शालीन कार्यक्रमों का प्रसारण करता है।
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दूरदर्शन की गुणवत्ता बढ़ने से मिशनरीज द्वारा संचालित निजी चेनल्स की पकड़ कमजोर हो जायेगी और वे दर्शक खोने लगेंगे। इससे इन चेनल्स द्वारा हिन्दू धर्म के खिलाफ अभियान चलाने की क्षमता गिर जायेगी।

राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/546885878822944>;
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मीडिया को ठीक करने के लिए इसके अलावा राईट टू रिकॉल सेंसर बोर्ड चेयरमेन एवं सूचना प्रसारण मंत्री की भी जरूरत है। इस कानूनों के आने से हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाने वाली एवं हिन्दू परम्पराओं का विद्रूप चित्रण करने वाली फूहड़ फिल्मों का प्रसारण बाधित हो जाएगा।
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(५) भारत की सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट एवं लोअर कोर्ट सबसे अधिक भ्रष्ट महकमा है। भारत के 80% से ज्यादा जज भाई भतीजा वादी है और उन्होंने देशी-विदेशी धनिको के साथ कुटिल गठजोड़ बना रखे है। जो उन्हें पैसा देता है वे उसके हिसाब से काम करते है। शेष 20% भी किसी काम के नही है। क्योंकि वे भारत की अदालतों में किसी भी प्रकार का सुधार लाने के लिए कोई फ़िक्र मोल लेना नहीं चाहते। वे अपनी नौकरी करते है और आँखें मूँद कर पड़े रहते है।
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हमारी अदालते पूरी तरह से निरंकुश है और उनके पास असीम शक्ति है। धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करने से नेताओ को अपने वोट गवाने पड़ सकते है। अत: वे हिन्दू धर्म को तोड़ने के लिए बहुधा जजों का इस्तेमाल करते है। मिशनरीज की भारत की अदालतों में गहरी घुसपैठ है। जब तक जजों की नकेल नहीं कसी जाती तब तक ऊपर दिए गए कोई भी क़ानून काम नहीं कर पायेंगे। इसके लिए हमें राईट टू रिकॉल जज एवं ज्यूरी सिस्टम की जरूरत है।
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यह कानून पारित होने के बाद हत्या, अपहरण, बलात्कार, मारपीट तथा लापरवाही के कारण होनी वाली मौत आदि जैसे अपराधिक मामलो की सुनवाई करने और सजा सुनाने का अधिकार नागरिको की जूरी के पास रहेगा। इस जूरी मंडल का चयन किसी जिले या किसी राज्य अथवा भारत की मतदाता सूचियों में से क्रम रहित ( रेंडमली ) तरीके से किया जाएगा। जूरी सदस्यों का आयु वर्ग 25 से 55 वर्ष के बीच होगा तथा इस जूरी मंडल में 15 से 1500 तक जूरी सदस्य हो सकेंगे। इस क़ानून के लागू होने के बाद से इन मुकदमो का फैसला आम नागरिको के जूरी मंडल द्वारा किया जाएगा न कि जजों द्वारा |

जूरी सिस्टम का प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/829456537232542>;
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इन कानूनों को लागू करवाने में आप क्या सहयोग कर सकते है ?

a) इन कानूनों के ड्राफ्ट के लिंक को क्लिक करके इन्हें पढ़े और तय करे कि क्या आप इन कानूनों को समर्थन करते है। यदि आप इनका विरोध करते है तो वैकल्पिक क़ानून ड्राफ्ट मुहैया कराये जिससे हिन्दू धर्म को विघटित होने से बचाया जा सके।
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b) यदि आप इन कानूनों का समर्थन करते है तो @pmoindia पर ट्विट भेज कर प्रधानमंत्री से मांग करे कि इन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित किया जाए। ट्विट का नमूना निचे दिया गया है।
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c) नागरिको तक इन कानूनों की जानकारी पहुंचाए एवं उन्हें भी पीएम को ट्विट करने को कहें।
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प्रधानमंत्री को भेजे जाने वाले ट्वीट का प्रारूप :
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@pmoindia I insturct you to print - <https://newindia.in/causes/nhdmt/>; , sha1- 5aa04b00713192b0e78263a7f31af3c334c838b5 #NHDMT
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( कृपया ऊपर दिए गए ट्वीट को कॉपी करे तथा अपने ट्विटर एकाउंट से @pmoindia पर ट्वीट करे। )
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#WealthTaxGroup
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Oct 31 2017 15:42:04 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Evm पर रोक क्यों लगनी चाहिये ? Evm पर रोक कैसे लगवायी जा सकती है ? और VVPAT क्यों व्यर्थ है ?
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वितरित करने के लिए ईवीएम के चार पेज के पेम्पलेट की विषय वस्तु। इसका मूल अंग्रेजी संस्करण एवं पीडीऍफ़ का लिंक कमेन्ट बॉक्स में देखें।
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Evm पर रोक क्यों लगनी चाहिये ? Evm पर रोक कैसे लगवायी जा सकती है ? और VVPAT क्यों व्यर्थ है ?
लेखक : राहुल चिमनभाई मेहता, बी टेक कंप्यूटर साइंस , आई आई टी दिल्ली ; एम एस , न्यू जर्सी अमेरिका
<https://facebook.com/MehtaRahulC>;
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मेरे विचार में , भारत के प्रत्येक मतदाता को अब यह तय करना चाहिए कि वे मतदान में Evm का प्रयोग चाहते है या मतपत्र का। इस पेम्पलेट में मैंने यह स्पष्ट किया है कि कैसे सिर्फ 100 कर्मचारियों एवं रिमोट की सहायता से लाखों Evm के करोडो वोटो को बदला जा सकता है। यदि आप चाहते है कि Evm को हटाकर भारत में फिर से मतपत्र शुरू किये जाए तो कृपया निम्नलिखित कदम उठाए :
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(1) अपने ट्विटर एकाउंट से यह ट्विट कीजिये - “ @PmoIndia #CancelEvm #BringBallotPaperBack “
(2) ट्विट के इस लिंक को EVM के यू ट्यूब लिंक्स के साथ अपने फेसबुक एकाउंट पर रखें , अपने मित्रो को EVM की अविश्वसनीयता के बारे में बताये एवं उन्हें भी ट्विट करने को कहे।
(3) अपनी मतदाता संख्या एवं नाम लिखकर "प्रधानमंत्री कार्यालय, दिल्ली" तथा "मुख्य चुनाव आयुक्त, दिल्ली" को पोस्टकार्ड भेजे। पोस्टकार्ड में #CancelEvm #BringBallotPaperBack” लिखे।
(4) Evm के बारे में पेम्पलेट बाँटें एवं इसके पीडीऍफ़ का फेसबुक / व्हाट्स एप पर प्रचार करे।
(5) कैसे Evm को हैक किया जा सकता है , इस बारे में समाचार पत्रों में विज्ञापन दें।
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तो क्या करोड़ो नगारिको के ट्विट करने एवं पोस्टकार्ड भेजने से Evm पर रोक लगाई जा सकती है ? मैं इसकी गारंटी नहीं दे सकता। दुःख की बात है कि सत्ता करोड़ो नागरिको की आवाज की भी आसानी से अवहेलना कर देती है। लेकिन कभी कभी इसे सुना भी जाता है। उदाहरण के लिए करोड़ो कारोबारियों ने अक्टूबर 2016 में RCM = Reverse Charge Mechanism के खिलाफ आवाज उठायी और अप्रेल 2018 में सरकार ने Gst में से RCM वापिस ले लिया। तो कभी कभी जनता की आवाज बदलाव ले आती है।
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(1) VVPAT अर्थहीन क्यों है ?

(1.1) चुनाव आयोग ने यह बात साफ़ तौर पर कही है कि वे VVPAT की पर्चियों को नहीं गिनेंगे !! सिवाय इसके कि कोई हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज इन पर्चियों की गिनती का आदेश दे। और हाई / सुप्रीम कोर्ट के किसी भी जज ने अब तक VVPAT पर्चियों को गिनने के आदेश नहीं दिए है। और न ही VVPAT की गिनती के लिए कोई फैसला दिया है।
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(1.2) इसके अलावा , जजों का ऐसा भी कोई आदेश नहीं है जो यह कहता हो कि, यदि VVPAT उपलब्ध न हो तो मतपत्रो का प्रयोग किया जाए। और चुनाव आयोग ने स्पष्ट शब्दों में यह कहा है कि, यदि VVPAT उपलब्ध नहीं है तो हम बिना VVPAT की Evm मशीनों का इस्तेमाल करेंगे !! आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्यों के चुनाव लोकसभा के साथ ही होंगे। इस तरह कुछ विधानसभा चुनावो को शामिल करते हुए 2019 के लोकसभा चुनावों में लगभग 16 लाख बूथों पर एक साथ मतदान होगा। इसके लिए 16 लाख Evm की जरूरत होगी। यदि चुनाव आयोग के पास 16 लाख VVPAT नहीं हुए तो क्या होगा ? ऐसी स्थिती में आयोग का कहना है कि वे बिना VVPAT की साधारण Evm मशीनों का इस्तेमाल करेंगे। और यदि VVPAT का इस्तेमाल किया भी जाता है तो चुनाव आयोग VVPAT पर्चियां गिनने को तैयार नहीं है !!

तो मेरे विचार में VVPAT पूरी तरह से बेकार है। और मेरा आपसे आग्रह है कि VVPAT के भुलावे में न आए।
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(2) कैसे शीर्ष व्यक्ति सिर्फ 200 लोगो के स्टाफ की सहायता से लाखों Evm के करोड़ो वोटो को बदल सकते है ?
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आपसे आग्रह है कि कृपया नीचे दिए गए यू ट्यूब वीडियो देखें। इनमे दर्शाया गया है कि कैसे EVM को हैक किया जा सकता है।
(1) <http://tinyurl>;. com/EvmIndia - वीडियो की अवधि 7 मिनिट, भाषा - अंग्रेजी
(2) <http://tinyurl>;. com/EvmIndia1 - अवधि 7 मिनिट, भाषा - अंग्रेजी , सबटाईटल - हिन्दी
(3) <http://tinyurl>;. com/EvmIndia3 - अवधि 2 मिनिट, मूक वीडियो
(4) <http://tinyurl>;. com/EvmIndia2 - अवधि 7 मिनिट, अंग्रेजी
(5) <http://tinyurl>;. com/EvmIndia4 - मेरा वीडियो , अवधि 55 मिनिट, हिन्दी
(6) <http://tinyurl>;. com/EvmIndia5 - अवधि 5 मिनिट, हिन्दी
(7) <http://tinyurl>;. com/EvmIndia6 - अवधि 7 मिनिट, हिंदी
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प्रथम तीन वीडियो बेहद महत्त्वपूर्ण है। कुछ अंग्रेजी में है किन्तु ग्राफिक्स होने के कारण इन्हें बिना किसी आवाज के भी समझा जा सकता है।
इन वीडियो में बताया गया है कि कैसे शक्तिशाली लोग सिर्फ 100 लोगो की सहायता से 12 लाख Evm के करोड़ो वोटो को बदल सकते है। मेरा आपसे निवेदन है कि इन वीडियो को फिर से देखे एवं निचे दी गयी तालिका का अवलोकन करे। निचे दिए गए विवरण आप स्पष्ट रूप से तब ही समझ सकेंगे जब आप ऊपर दिए गए प्रथम तीन वीडियो देखें।

(1) सभी 12 लाख EVM का निर्माण बेंगलोर स्थित BEL ( या हैदराबाद स्थित ECIL ) कम्पनी ने किया है। ये दोनों सरकारी कम्पनियां है।
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(2) 2009 में एक जिले में लगभग 1700 EVM थी। एक Evm की उम्र 10-12 वर्ष है। तो प्रत्येक 5 वर्ष में कुछ 700 Evm को कबाड़ में फेंकना होगा। और प्रत्येक 5 साल में बूथ की संख्या लगभग 300 से बढ़ जाती है। अत: प्रत्येक जिले में कलेक्टर को हर 5 वर्ष में 1000 Evm की जरुरत पड़ेगी।
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(3) अब मान लीजिये अहमदाबाद (या मुंबई या दिल्ली) कलेक्टर कहता है कि उसे 1000 Evm चाहिए।
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(4) तब बैंगलोर में BEL प्रमुख बैंगलोर से अहमदाबाद 1000 Evm लादकर एक ट्रक में भेजने का निर्णय करेगा।
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(5) Evm पहुँचाने का काम टेंडर के आधार पर निजी कंपनियों को दिया जाता है। अब मान लीजिये कि अहमदाबाद से मुंबई तक ट्रक भेजने का खर्चा रु. 30,000 है। तो एक ईमानदार ट्रक मालिक रु. 35000 या रु. 40000 तक का टेंडर भरेगा । लेकिन यदि कोई व्यक्ति Evm के साथ छेड़छाड़ करना चाहता है तो वह रु. 25000 का टेंडर भरेगा और कॉन्ट्रैक्ट प्राप्त कर लेगा।
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(6) अब अगले 3-4 दिनों के लिए ये 1000 Evm टेंडर मालिक के आदमीयों के पास है !!
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(7) एक Evm को खोलकर उसके ओरिजनल डिस्प्ले को ऐसे डुप्लीकेट डिस्प्ले से बदलने में मात्र 10 मिनट लगते है। इस डुप्लीकेट डिस्प्ले को रिमोट द्वारा ऑपरेट किया जा सकता है। तो 2 आदमी 2 दिनों में, सभी 1000 Evm को खोलकर उनका डिस्प्ले बदल सकते है। डिस्प्ले की जगह कोई बैलट यूनिट की केबल भी बदल सकता है और वह केबल लगा सकता है जो रिमोट कंट्रोल से उम्मीदवार के वोटो को बदल देती हो। छेड़छाड़ के ऐसे अनेक तरीके है।
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(8) नये डुप्लीकेट डिस्प्ले ऐसे हो सकते है जो रिमोट कण्ट्रोल से 1 कि.मी. से 2 कि.मी. दूर तक के सिग्नल पकड़ सकते है। अब ऑपरेटर रिमोट द्वारा ऐसा सिग्नल भेज सकता है जिससे Evm ऑपरेटर के पसंदीदा उम्मीदवार के मतों में 15% मतों का इजाफा कर दे। तो रिमोट से कमांड मिलने पर Evm सभी अन्य प्रत्याशियों के 15% वोटों को कम कर सकेगी और ये सभी वोट ऑपरेटर द्वारा चिन्हित उम्मीदवार को ट्रांसफर कर सकेगी। ख़ास बात यह है कि इस प्रक्रिया में कुल मतों का योग वही रहेगा।
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(9) तो बदले हुए डुप्लीकेट डिस्प्ले वाली ये सभी Evm चुनाव से महीनो और सालों पहले कलेक्टर कार्यालय में पहुँच जायेंगी।
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(10) अब मान लो, लोकसभा की वोटिंग समाप्त हो चुकी है और सभी 1500 से 2000 Evm कलेक्टर कार्यालय में रखी है।
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(11) अब 1 कि.मी. से 2 कि.मी. दूर रिमोट कण्ट्रोल से ऑपरेटर सभी Evm को अपने पसंदीदा उम्मीदवार के वोट बढ़ाने की कमांड भेज सकते है। और सिर्फ एक सेकंड के अन्दर सभी 1500 से 2000 Evm सभी अन्य प्रत्याशियों के 15% से 20% वोटों को कम कर देगी और उन सभी वोटों को ओपरेटर द्वारा चिन्हित उम्मीदवार के वोटों में जोड़ देगी !!
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तो अब कितने व्यक्ति चाहिए लाखों EVM के सर्किट बदलने के लिए ?

(12) एक ट्रक में Evm के सर्किट बदलने के लिए 2 लोगों की जरुरत है और 2 लोग ट्रक चलाने के लिए चाहिए। एक ट्रक 8 दिन में किसी जिले को 1000 Evm पंहुचा सकता है और वापस आ सकता है। तो एक ट्रक और 4 लोग एक साल में लगभग 30 जिलों में प्रत्येक जिले को 1000 Evm पहुंचा सकते है और एक ट्रक और 4 लोग 4-5 साल में 100 से ऊपर जिलों में 1000 Evm पहुंचा सकते हैं !!
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(13) तो कुछ 800 से 1000 Evm 543 जिलों में पहुंचाने के लिए और इस प्रकार सर्किट बदलने के लिए 5 से 20 ट्रक और मात्र 20 से 80 लोग चाहिए !!
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(14) वोटिंग के बाद, जब सभी 1500 से 2000 EVM एक कलेक्टर के कार्यालय में होंगी। इन सभी 2000 EVM को सिग्नल भेजने और इनमे वोट बदलने के लिए अब एक वैन की जरुरत है। एक वैन कलेक्टर कार्यालय में रखी 2000 Evm को सिगनल भेज सकती है, और फिर अगले कलेक्टर कार्यालय पर जा सकती है। तो एक वैन एक दिन में 3-4 कलेक्टर कार्यालयों को कवर कर सकती हैं । लोकसभा चुनाव लगभग 40 दिनों तक चलते है तो सभी 543 कलेक्टर कार्यालयों को कवर करने के लिए लगभग 15 वैन काफी है।
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(15) इसलिए ऊपर बैठे ताकतवर लोग केवल 100 लोगों का उपयोग करके लाखों Evm के सर्किटो को बदल सकते है और करोड़ों वोटों की अदला बदली कर सकते है।
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(16) बीजेपी या कांग्रेस भारत में ये काम करने की ताकत नहीं रखते। ये काम करवाने की क्षमता केवल CIA के पास है। CIA ये सब इसलिए करेगी ताकि भारत के राजनेता FDI और डॉलर पुनर्भरण ( repatriation ) कानूनों का विरोध ना करें। FDI और डॉलर पुनर्भरण ऐसे दो औजार है जिससे मल्टीनेशनल कंपनियाँ भारत की अर्थव्यवस्था के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रो को एक के बाद एक अधिगृहित कर रही है !!
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दी गयी तालिका में बताये चित्रों को पहले वाले विडियो से लिया गया है और उस वीडियो में हैकिंग दर्शाने के लिए पूना के कलेक्टर कार्यालय से गैर कानूनी तरीके से प्राप्त असली Evm का इस्तेमाल हुआ है। इस वीडियो में हैकर्स ने असली डिस्प्ले को बदलकर एक डुप्लीकेट डिस्प्ले सर्किट जिसे रिमोट कण्ट्रोल से संचालित करके वोटों को बदल सकते है, लगाया है !!
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वीडियो में दर्शाया गया है कि कैसे डिस्प्ले बदल कर Evm के वोटो को बड़े पैमाने पर बदला जा सकता है। इसके अलावा अन्य तरीके भी है - 1) केबल यूनिट को उस केबल से बदल दिया जाए जिसे रिमोट द्वारा संचालित करके उम्मीदवार की संख्या बदली जा सके। 2) जिस BEL में Evm का निर्माण किया जाता है , यदि वहां के अधिकारी एवं इंजीनियर्स भ्रष्ट है तो वे सर्किट में ऐसे कई पॉइंट इंस्टाल कर सकते है जिससे रिमोट द्वारा उम्मीदवार के वोट बदले जा सके। (3) Evm की CPU चिप अमेरिका में निर्मित है और चिप चुनाव से महीनो और सालों पहले आ जाती है, जबकि उम्मीदवार की संख्या चुनाव से कुछ 20 दिन पहले दी जाती है; लेकिन फिर इस तरीके का प्रयोग करके अन्य उम्मीदवारों के मतों में कटौती करके इन मतों को अपने पसंदीदा उम्मीदवार को ट्रांसफर किया जा सकता है।
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तालिका
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कॉलम - १) 1. Evm को खोलना , 2. Evm खोला ,

Evm को खोलकर इसके ओरिजिनल डिस्प्ले को उस डुप्लीकेट डिस्प्ले से बदल दिया गया जिसके वोटो को रिमोट द्वारा बदला जा सके।
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कॉलम - २) 3. ओरिजिनल डिस्प्ले हटाया गया , 4. ओरिजिनल डिस्प्ले हटाया गया

बूथ पर ऐसा करना संभव नहीं है। किन्तु जिसकी पहुँच हो वह इन्हें तब बदल सकता है जब हजारो Evm को ट्रको में लादकर बेंगलोर से अहमदाबाद ले जाया जा रहा हो !!
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कॉलम - ३) 5. ओरिजिनल डिस्प्ले हटाया गया , 6. रिमोट वाला डिस्प्ले लगाया गया

जब Evm सील्ड हो तब भी रिमोट से इसे सिग्नल भेजा जा सकता है।
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कॉलम - ४) 7. रिमोट वाला डिस्प्ले लगाया गया , 8. Evm को फिर से पैक किया गया

अब Evm को 1 किमी दूर से भी सिग्नल भेजे जा सकते है !! और सिर्फ एक सिग्नल से हजारो Evm के वोट बदले जा सकते है !!
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तो ऐसे अनेको तरीके हैं जिसके द्वारा केवल 100-200 लोगों की मदद से लाखों Evm में करोड़ों वोटों को बदला जा सकता हैं । पेपर बैलट में यदि किसी को बूथ कैप्चरिंग करनी है तो उसे प्रति बूथ 2-3 गुंडे चाहिए। भारत में लोकसभा चुनावों में 12 लाख बूथ होते है। तो 10% बूथों में छेड़छाड़ करने के लिए भी किसी को 2 लाख से 3 लाख गुंडे चाहिए। किसी के पास गुंडों का इतना बड़ा स्टाफ नही है और आजकल उम्मीदवारों के पोलिंग एजेंटों के पास कैमरा वाले फोन रहते है और बूथ में CCTV कैमरा भी लगा दिया जाये तो इस तरह की बूथ कैप्चरिंग को देखा भी जा सकता है और रोका भी जा सकता है।
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(3) विदेशों में Evm
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अमेरिका में प्रत्येक जिला यह तय करता है कि Evm का उपयोग होना चाहिए या नहीं। तो अमेरिका में लगभग 65% जिलों ने बैलट पेपर इस्तेमाल करने का फैसला किया और शेष 35% जिले अभी तक Evm का इस्तेमाल करते है। जर्मनी में Evm का इस्तेमाल होता था और फिर इसे बंद कर दिया गया। आयरलैंड में Evm लगाई जाने के लिए तैयार थी किन्तु अंतिम समय पर वोटर्स के विरोध के चलते Evm को निरस्त कर बैलट पेपर को वापस लाना पड़ा था। इंग्लैंड, जापान, फ्रांस और बहुत से देशों में Evm प्रोजेक्ट को रद्द करना पड़ा क्योंकि वोटर्स ने Evm पर आपत्ति जाहिर की। कुछ देश जैसे भारत, पकिस्तान, बांग्लादेश, बोस्तवाना आदि Evm का इस्तेमाल करते है। जर्मनी में हैकर्स को Evm दी गयी और उन्होंने दिखा दिया कि Evm को कैसे हैक किया जा सकता है । भारत में चुनाव आयोग हैकर्स को Evm छूने भी नहीं देता !! और फिर चुनाव आयोग ये घोषणा कर देता है कि हैकर्स Evm को हैक नहीं कर सकते !!!
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(4) कैसे हम कार्यकर्ता Evm रद्द करा सकते हैं ?
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1) अपने ट्विटर एकाउंट से यह ट्विट कीजिये - “ @PmoIndia #CancelEvm #BringBallotPaperBack “
(2) अपने ट्विट के इस लिंक को Evm के यू ट्यूब लिंक्स के साथ अपने फेसबुक एकाउंट पर रखें , अपने मित्रो को EVM की अविश्वसनीयता के बारे में बताये एवं उन्हें भी ट्विट करने को कहे।
(3) अपनी मतदाता संख्या एवं नाम लिखकर "प्रधानमंत्री कार्यालय, दिल्ली" तथा "मुख्य चुनाव आयुक्त, दिल्ली" को पोस्टकार्ड भेजे। पोस्टकार्ड में #CancelEvm #BringBallotPaperBack” लिखे।
(4) Evm के बारे में पेम्पलेट बाँटें एवं इसके पीडीऍफ़ का फेसबुक / व्हाट्स एप पर प्रचार करे।
(5) कैसे Evm को हैक किया जा सकता है , इस बारे में समाचार पत्रों में विज्ञापन दें।

तो क्या करोड़ो नगारिको के ट्विट करने एवं पोस्टकार्ड भेजने से Evm पर रोक लगाई जा सकती है ? मैं इसकी गारंटी नहीं दे सकता। दुःख की बात है कि सत्ता करोड़ो नागरिको की आवाज की भी आसानी से अवहेलना कर देती है। लेकिन कभी कभी इसे सुना भी जाता है। उदाहरण के लिए करोड़ो कारोबारियों ने अक्टूबर 2016 में RCM = Reverse Charge Mechanism के खिलाफ आवाज उठायी और अप्रेल 2018 में सरकार ने Gst में से RCM वापिस ले लिया। तो कभी कभी जनता की आवाज बदलाव ले आती है।
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मेरे (लेखक) बारे में - मैं राहुल चिमनभाई मेहता। मैंने अपना B.Tech. कंप्यूटर साइंस में IIT दिल्ली से 1990 में पूरा किया। उसके बाद मैंने अपना MS यानि Master of Science कंप्यूटर साइंस में 1992 में New Jersey State University अमेरिका से किया। 1999 तक मैंने अमेरिका में hardware/software engineer के रूप में कार्य किया। 1999 में, मैं भारत लौट आया और तब से भारत में ही हूँ। अमेरिका में hardware/software engineer के रूप में कार्य करने के साथ ही मैंने वहां के कानूनी व प्रशासनिक सिस्टम का भी अध्ययन किया। मेरा निष्कर्ष है कि, अमेरिका भारत से और दुनिया के शेष देशों से इसीलिए आगे निकल गया है क्योंकि वहां के कानून ड्राफ्ट ज्यादा बेहतर है।

इनमे सबसे महत्वपूर्ण है -- (a) जिला पुलिस प्रमुख, जिला जजों, जिला शिक्षा अधिकारी, जिला सरकारी वकील, महापौर, मुख्यमंत्री, हाई कोर्ट मुख्य जज आदि बड़े से छोटे पदों पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाए (b) जूरी सिस्टम (3) जनमत संग्रह (4) मल्टी-इलेक्शन (5) उनके पास संपत्ति कर (वेल्थ टैक्स) है और थोडा सेल्स टैक्स है, लेकिन एक्साइज, सर्विस टैक्स, ओक्ट्रोई, Cst, Vat और Gst जैसे टैक्स नहीं है !! मैं 1999 से ही भारत में इन 5 कानूनों को लाने के लिए काम कर रहा हूँ। मैंने इन कानून ड्राफ्ट्स का प्रचार करने के लिए 4 चुनाव भी लड़ें है। मई-2014 गांधीनगर लोकसभा चुनाव में मुझे 9600 वोट प्राप्त हुए थे और इन कानूनी-ड्राफ्ट्स का प्रचार करने के लिए मैं फिर से दिसम्बर-2017 का गुजरात विधानसभा चुनाव घटलोडिया और ठक्कर बापानगर क्षेत्रों से लडूँगा। और अप्रैल 2019 में, मैं फिर अहमदाबाद (पूर्व) और गांधीनगर क्षेत्रों से चुनाव लडूँगा। मैंने Evm के विरुद्ध अपना अभियान प्रचार 1989 में शुरू किया था, जब मैं IIT में 4th year में था और तब Evm प्रस्तावित हुई थी !! मैंने Evm के विरुद्ध अखबार में दो विज्ञापन जुलाई-2009 और अक्टूबर-2012 में दिए थे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यह लिंक देखें- <https://facebook.com/MehtaRahulC>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Oct 31 2017 18:38:29 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

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टी सी पी - पारदर्शी शिकायत प्रणाली का अपडेटेड वर्जन
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यदि आप चाहते है कि आप अपनी कोई मांग / शिकायत / सुझाव / प्रस्ताव आदि प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर पारदर्शी और अधिकृत तरीके से रख सके, तो प्रधानमंत्री को यह ट्विट भेजे :
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@PmoIndia #TcpIndia voters can upload complain at DC office; <https://newindia.in/causes/tcp/>; , sha1 - 9440fe14561d9ed21e1312a6a3768dcdc29438c8
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=====टी सी पी ड्राफ्ट का प्रारम्भ=====
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[ टिप्पणी : इस कानून की महत्वपूर्ण धाराएं है - (1a), (1c), (2a), (2b), (3)
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यह कानून ड्राफ्ट भारतीय राजपत्र में छापकर प्रधानमंत्री द्वारा सीधे लागू किया जा सकता है। इसके लिए लोकसभा या राज्यसभा से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। ]
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भाग - I : नागरिकों के लिए सामान्य निर्देश
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1 (1a) यह कानून लागू होने के बाद, आप ( "आप" अर्थात - भारत का कोई भी पंजीकृत मतदाता ) अपने ज़िला कलेक्टर कार्यालय में जाकर अपना कोई भी एफिडेविट क्लर्क को जमा करवा सकते है।
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(1b) यह एफिडेविट कोई शिकायत या आरटीआई आवेदन या आपके द्वारा प्रस्तावित कानून या अन्य कोई याचनात्मक समाधान हो सकता है।
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(1c) क्लर्क आपके एफिडेविट को स्कैन करके प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर इस तरह अपलोड करेगा कि पूरी दुनिया में जो कोई भी व्यक्ति इसे देखना चाहे वह इसे देख सके।
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(1d) क्लर्क आपके एफिडेविट का सीरियल नंबर भी जारी करेगा। इस एफिडेविट को फ़ाइल करने के लिए आप 20 रु.प्रति पेज की दर से शुल्क अदा करेंगे।
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2 (2a) आप ( अर्थात पंजीकृत मतदाता ) किसी भी कार्य दिवस पर अपने तलाटी ( तलाटी = पटवारी = ग्रामीण अधिकारी ) कार्यालय जा सकते है, और उसे एफिडेविट नंबर ( धारा -1 में किसी के द्वारा दर्ज किया गया एफिडेविट ) का उल्लेख करके अमुक एफिडेविट पर हाँ / ना दर्ज करवा सकते है।
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(2b) आप किसी एफिडेविट पर दर्ज की गयी अपनी हाँ / ना को किसी भी दिन कितनी भी बार बदल भी सकते है।
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(2c) किसी एफिडेविट पर हाँ / नहीं दर्ज करने या उसे बदलने के लिए आपको शुल्क देना होगा। बीपीएल कार्ड धारकों के लिए यह शुल्क 1 रु. तथा अन्य नागरिको के लिए यह 3 रु. होगा।
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(3) सभी के लिए महत्वपूर्ण जानकारी : किसी एफिडेविट पर दर्ज की करायी गयी हाँ / ना की यह गिनती प्रधानमंत्री या किसी मंत्री या किसी अधिकारी या किसी अदालत पर बाध्यकारी नहीं होगी। फिर भी, यदि भारत के 45 करोड़ से अधिक मतदाता किसी एफिडेविट पर हाँ दर्ज करवा देते है तो प्रधानमंत्री एफिडेविट में दर्ज किये गए कार्यों की पालना के लिए आवश्यक निर्देश जारी कर सकते है, या उन्हें ऐसा करने की जरूरत नही है। या प्रधानमंत्री चाहे तो अपना इस्तीफ़ा भी दे सकते है या उन्हें ऐसा करने की जरूरत नही है। इस सम्बन्ध में प्रधानमंत्री का निर्णय अंतिम होगा।
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(4) धारा -1 में एफिडेविट देने के लिए कलेक्टर आपसे आपका मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड लाने के लिए कह सकता है और आपसे शून्य से लेकर पांच गवाह तक, जो कि आपको निजी रूप से जानते हो, लाने के लिए भी कह सकता है। क्लर्क आपकी फोटो और फिंगरप्रिंट भी ले सकता है। यदि आप एक बार एफिडेविट फ़ाइल कर देते है तो बाद में आप उसे हटा नहीं सकेंगे। अदालत के आदेश को छोड़कर किसी भी अधिकारी को आपके एफिडेविट को हटाने की अनुमति नहीं होगी। और साथ ही आपको इस बारे में भी सूचित किया जाता है कि -- कोई अदालत आपको एफिडेविट में अनुचित जानकारी देने के लिए या किसी भी अनुचित मानहानिकारक ( या निन्दात्मक ) कथन के लिए सजा दे सकती है।
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(5) आपको भारत भर में दर्ज सभी एफिडेविटो पर हाँ / ना दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है। ये आपकी पसंद पर निर्भर है कि आप किस एफिडेविट पर विचार करना चाहते और किस एफिडेविट को नकारना चाहते है। जिस भी एफिडेविट पर आप हाँ / ना दर्ज करना चाहते है, उन पर अपनी राय दर्ज करवा सकते है। किसी भी एफिडेविट पर हाँ / ना दर्ज करने पर आपको कोई भी सजा नहीं होगी, तब भी जबकि अमुक एफिडेविट में कोई अनुचित या निन्दात्मक कथन है।
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(6) आप अपना मोबाइल नंबर मतदाता सूची का रखरखाव करने वाले क्लर्क को दर्ज करवा सकते है। अमुक फ़ोन नंबर आपके नाम पर या आपके नजदीकी पारिवारिक सदस्य के नाम पर होना चाहिए। यदि आप अपना मोबाईल नंबर दर्ज करवाते है तो जब भी आप कोई एफिडेविट फ़ाइल करेंगे या किसी एफिडेविट पर हाँ / ना दर्ज करेंगे तो आपको फीडबैक के लिए एक एस एम एस प्राप्त होगा। यह एस एम एस उसी तरह का होगा जैसा एटीएम आदि से नकदी निकालने पर खाताधारक को प्राप्त होता है। और यदि कोई अन्य व्यक्ति छल द्वारा आपके नाम पर एफिडेविट फ़ाइल करने का प्रयास कर रहा है या आपके नाम से हाँ / ना दर्ज करवा रहा है तब भी आपको ऐसा एस एम एस प्राप्त होगा। इस स्थिति में आप पुलिस में शिकायत कर सकते है।
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(7) आपको वोटर कार्ड जैसा एक मैगनेटिक कार्ड ( एटीएम कार्ड के समान ) भी दिया जा सकता है, और तलाटी कार्यालय के पास एटीएम जैसी मशीन भी लगवायी जा सकती है, ताकि आप मशीन में किसी एफिडेविट का नंबर डाल कर उस पर अपनी हाँ / ना दर्ज कर सके। उपलब्ध होने पर आप इस सुविधा का उपयोग कर सकते है। इस सिस्टम में प्रत्येक हाँ / ना दर्ज करने या बदलने पर आपको 1 रू शुल्क चुकाना होगा।
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(8) कलेक्टर एक ऐसा सिस्टम बना सकते है जिससे आप अपनी हाँ / ना एस एम एस या किसी एप्प के माध्यम से दर्ज कर सकते है। यदि आप किसी एफिडेविट पर हाँ / ना एस एम एस या एप्प के माध्यम से दर्ज करते है तो इसके लिए शुल्क का निर्धारण कलेक्टर करेगा।
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भाग-II: अधिकारीयों के लिए निर्देश
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(9) टिप्पणी : टिप्पणीयां इस कानूनी ड्राफ्ट का वास्तविक हिस्सा नहीं है। कार्यकर्ता और नागरिक ड्राफ्ट को समझने हेतु इसका उपयोग कर सकते है। किन्तु ये टिप्पणीयां किसी पर भी बाध्यकारी नहीं है।
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(10) नेशनल इन्फार्मेटिक्स सेंटर (NIC) के प्रभारी सचिव को आदेश जारी किये जाते है कि वे ऐसी आवश्यक वेबसाइट आदि की रचना करे जिससे कलेक्टर, पटवारी आदि ऊपर दी गयी धाराओं में दर्ज प्रक्रिया को लागू कर सके।
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(11) मुख्यमंत्री, मेयर, जिला / तहसील / ग्राम सरपंचों के लिए टिप्पणी : आप इस कानून में वांछित बदलाव करके ( जैसे प्रधानमंत्री शब्द को मुख्यमंत्री या मेयर आदि से बदलकर और अन्य आवश्यक परिवर्तन करके ) पारित कर सकते है, एवं राज्य / नगर / जिला / तहसील / ग्राम स्तर पर ऐसा टी सी पी क़ानून लागू कर सकते है।
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=========टीसीपी क़ानून ड्राफ्ट की समाप्ति========

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