> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2017-10-04

Pawan Jury BhilwaraRj

H301.011 ; राइट टू रिकॉल ग्रुप और अन्य पार्टियों, बुद्धिजीवियों आदि के बीच अंतर
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(11.1) हम अधिकांश दलों और बुद्धिजीवियों से पूरी तरह अलग है।
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(11.2) प्रचार के तरीकों में सबसे महत्वपूर्ण अंतर
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(11.3) प्रस्तावित कानूनों के ड्राफ्ट का महत्व
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(11.4) भारत के अधिकतर बुद्धिजीवी विशिष्ट वर्ग के एजेंट हैं
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(11.5) समीक्षा प्रश्न
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(11.6) अभ्यास
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(11.1) हम अधिकांश दलों और बुद्धिजीवियों से पूरी तरह अलग है।
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राइट टू रिकॉल ग्रुप की विचारधारा बनाम सभी दलों के सांसदों और भारत के प्रमुख बुद्धिजीवी लोगों की विचारधारा
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1) खनिज और सरकारी प्लॉटो के स्वामित्व के संबंध में :
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राइट टू रिकॉल ग्रुप इस बात पर बल देता है कि ---- सभी खाने और सरकारी प्लॉट हम भारतीयों के है न कि भारत राज्य के। और इसलिए हम इस बात पर जोर देते हैं कि हम नागरिकों और हमारी सेना को खनिज रॉयल्टी और सरकारी भूखंडों का सारा किराया मिलना चाहिए। और भी सीधे शब्दों में राइट टू रिकॉल ग्रुप पूरी तरह यह मानता है कि नागरिकों को भारत सरकार के प्लॉटों जैसे कि आईआईएमए प्लॉट, जेएनयू प्लॉट, हवाई अड्डा प्लॉट इत्यादि से प्राप्त किराया अवश्य मिलना चाहिए।
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कांग्रेस, बीजेपी, सीपीएम और भारत के सभी बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों ने कहा है कि सभी खान और सरकारी प्लॉट भारत “राज्य” की संपत्ति है और आम भारतीयों का उन पर कोई स्वामित्व व नियंत्रण नहीं होगा। और उन्होंने आईआईएमए, जेएनयू, और हवाई अड्डों के प्लॉटों से प्राप्त किराया भारतीयों को देने से सीधे तौर पर इनकार कर दिया है।
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2) हम लोग लोकतंत्र के पक्षधर है, जबकि सभी वर्तमान पार्टियों के सांसद और भारत के प्रमुख बुद्धिजीवी फासीस्ट वादी है :

'नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' समूह के हम लोग राजनैतिक परिदृश्य में अकेले समूह है, जो इस बात पर जोर देते है कि हम आम लोगों को विधायी शक्तियाँ प्राप्त करनी होगी और हम आम लोगों के पास अधिकारियों / जजों को हटाने और बदलने की शक्तियाँ होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में हम लोग लोकतंत्र वादी है। जबकि सभी वर्तमान दल और भारत के सभी प्रमुख बुद्धिजीवी लोग हम आम नागरिको और मतदाताओं को मूर्ख समझते है, और इस बात पर जोर देते हैं कि हम आम लोगों के पास कानून बनाने की कोई शक्ति नहीं होनी चाहिए और अधिकारियों, पुलिसवालों, न्यायधीशों की नियुक्तियों का कोई अधिकार भी नागरिको के पास नहीं होना चाहिए।
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भारत के अधिकांश बुद्धिजीवियों की मानसिकता फासीस्ट वादी है। और इसलिए वे दृढ़ता से जोर देते है कि प्रशासन के सभी विवेकाधिकार केवल मंत्रियों, आईएएस, आईपीएस अधिकारियों, जजों व बुद्धिजीवियों के पास होने चाहिए। विवेकाधिकार की शक्तियों की बात तो छोड़ ही दीजिए, ये फासीस्ट वादी जनता की आवाज पारदर्शी शिकायत प्रणाली तक का विरोध करते हैं – और नागरिकों को प्रधानमंत्री की वेवसाइट पर शिकायत दर्ज करने की छूट देने का भी विरोध करते है। इस तरह हम उनके फासीस्ट वाद की निंदा करते हैं और वे हमारे लोकतंत्रवाद की निंदा करते है।
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3) नागरिकों द्वारा संविधान की, की गई व्याख्या अंतिम होगी ; सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा की गई व्याख्या अंतिम नहीं होगी :
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हम लोग भारत में एकमात्र समूह है जो इस बात पर विश्वास करते है कि --- हम भारत के नागरिकों द्वारा की गई भारत के संविधान की व्याख्या ही अंतिम होगी और सुप्रीम-कोर्ट के दो दर्जन जजो द्वारा संविधान की व्याख्या महत्वपूर्ण हो सकती है लेकिन अंतिम नहीं। हम इस बात पर सहमत है कि, सुप्रीम कोर्ट के जजों की व्याख्या मंत्रियों की व्याख्या से ऊपर है और यह नागरिकों के लिए वास्तव में महत्वपूर्ण है कि वे इस बात का ध्यान दें। लेकिन यह अंतिम नहीं है, स्वयं हमारे संविधान में इसकी प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारत एक लोकतंत्र और एक गणतन्त्र होगा जो स्पष्ट रूप से “नागरिक समीक्षा प्रणाली” का समर्थन करता है।

इस प्रणाली में यह उल्लेख है कि नागरिकों द्वारा संविधान की, की गई व्याख्या अंतिम है और यह न्यायिक पुनर्विचार से ऊपर है। यही कारण है की हम निचली अदालत से लेकर उच्चतम न्यायालय तक निर्णायक जूरी प्रणाली पर जोर दे रहे हैं और नागरिक समीक्षा प्रणाली की माँग करते हैं जिसमें नागरिक गण उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों द्वारा दिये गए निर्णयों की संवैधानिक वैधता पर हाँ / नहीं दर्ज कर सकते है। दूसरे शब्दों में, हम संवैधानिक लोकतंत्र पर विश्वास करते है।
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सभी मौजूद पार्टियों के सांसद और भारत के सभी प्रमुख बुद्धिजीवियों ने हमेशा नागरिक समीक्षा प्रणाली का विरोध किया है और निर्णायक 'जूरी' प्रणाली का भी विरोध किया है। उन्होंंने हमेशा जज सिस्टम का और न्यायधीश समीक्षा का समर्थन किया है। जबकि वर्तमान सभी पार्टियां और सभी बुद्धिजीवी इस बात पर जोर देते हैं कि‍ सुप्रीम-कोर्ट के दो दर्जन जजों द्वारा संविधान की, की गई व्याख्या अंतिम होगी और हम आम लोगों की व्याख्या बेकार की बात मानी जाएगी। सभी दल और बुद्धिजीवी इस बात पर जोर देते है कि, हम नागरिकों द्वारा की गई व्याख्या की अनदेखी की जानी चाहिए और सुप्रीम-कोर्ट के जजों द्वारा दिए फैसलों पर हमारी हॉं / नहीं की राय नहीं ली जानी चाहिए। और सभी बुद्धिजीवी इस बात पर जोर देते हैं कि सुप्रीम-कोर्ट द्वारा की गई व्याख्या आम लोगों पर मीडिया, शिक्षा और पुलिस और यदि जरूरत पड़ी तो सेना का प्रयोग करके निर्दयतापूर्वक और कठोरता से थोपी जानी चाहिए। दूसरे शब्दों में, वर्तमान सभी दल और बुद्धिजीवी संवैधानिक न्यायतांत्रिक फासीस्ट वाद पर विश्वास करते हैं।
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4) सरकारी अधिसूचनाओं, सरकारी आदेशों, अध्यादेशों के क़ानून-ड्राफ्ट जनता के समक्ष प्रस्तुत करना जो देश की समस्याओं का समाधान कर सकें :
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हम लोग भारत में पहले और एकमात्र समूह हैं जो उन सरकारी अधिसूचनाओ के प्रारूप / क़ानून-ड्राफ्ट दिखलाते हैं जिसकी हम मांग करते हैं। हम लोगों से यह नहीं कहते कि वे हम पर विश्वास करें। हम लोगों से यह अनुरोध करते हैं कि वे हमारी सरकारी अधिसूचनाओं को पढ़ें और खुद निर्णय करें कि क्या ये अधिसूचनाएं ऐसी नहीं हैं जिनका समर्थन किया जाना चाहिए। इस प्रकार से एक नागरिक मतदाता को यह निर्णय करने का पूर्ण अधिकार होगा कि उन्हें हमारा समर्थन करना चाहिए या विरोध। अन्य सभी समूह नीति बनाने के संबंध में वायदे तो करते है, लेकिन हर दल, सांसद और विधायक उस सरकारी आदेश के क़ानून-ड्राफ्ट प्रकाशित करने से मना कर देते है जो अपने वायदों को पूरा करने के लिए वे पारित कर सकेंगे। उनका उत्तर होता है,“पहले आप हमारे पक्ष में मतदान करें और तब हम मंत्री बनने के बाद आपको प्रारूप ( क़ानून-ड्राफ्ट ) दिखलाएंगे। 'अच्छा, प्रत्याशी महोदय, यदि क़ानून-ड्राफ्ट निरर्थक और हम आम जनता के लिए कल्याणकारी न निकला तो ? उत्तर फिर से यही है ,'मुझ पर भरोसा रखिए' !! हम लोग आपको ऐसे अस्पष्ट और घुमा फिरा कर उत्तर नहीं देते।
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5) 'राजनीतिक संस्कृति' की झूठी कहानी / मिथक के संबंध में :
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भारत की समस्याए कानून के उन खराब ड्राफ्टों के कारण है जिन्हें बुद्धिजीवियों और दूसरी पार्टियों के सांसदों ने लागू करवाया है। हम आम लोगों की संस्कृंति में कुछ भी गलत नहीं है। प्रमुख बुद्धिजीवियों ने राजनैतिक संस्कृति की एक झूठी कहानी का दुष्प्रचार किया है। और वे दावा करते हैं कि भारत की समस्याएं हम आम भारतीयों की इस संस्कृति के कारण है, न कि उन गलत कानूनों के कारण जिनका वे समर्थन करते है।
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6) सभी पार्टियों को चुनाव जीतना है, घूस वसूलना है ; हमे केवल उन कानूनों को लागू करवाना है जिनकी हम मांग करते है :
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हमारा पहला लक्ष्य कुछ सरकारी अधिसूचनाओं को लागू करवाना है, चुनावों में जीत हासिल करना नहीं। हम केवल इसलिए चुनाव लड़ते हैं कि हम उन सरकारी आदेशों और कानूनों का प्रचार कर सकें जिनकी हम मांग करते है, और जिनको लागू करवाने का हम वायदा करते है। हम इस बात पर जोर नहीं देते कि मतदाता गण हमें वोट दें – हम सिर्फ इस बात पर जोर देते हैं कि जनता अपने मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री, विधायकों और सांसदों पर दबाव डालें कि वे उन कानूनों को लागू करवाएं जिनका प्रस्ताव हम कर रहे है। और हम जनता से हमें वोट देने के लिए केवल तभी कहते हैं जब वे इस बात से संतुष्ट हों कि अन्य दलों के नेता इन सरकारी आदेशों पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। अन्य सभी पार्टियों का मुख्य लक्ष्य चुनाव जीतना मात्र है और वे प्रशासन में कोई बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है।
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7) कोर्ट में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद में कमी लाने के संबंध में :
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हम लोग एकमात्र समूह हैं जो न्यायालयो में भाई-भतीजावाद के खिलाफ बोलते हैं। अन्य सभी समूहों के नेतागण और बुद्धिजीवी कोर्ट में भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने वाले कानूनों ( जैसे साक्षात्कार प्रणाली और जज प्रणाली ) का समर्थन करके न्यायालयो में भाई-भतीजावाद का समर्थन करते है।
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8) आम जनता के लिए सम्मान के संबंध में :
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आम जनता का हम पूरा–पूरा सम्मान करते है, और इस बात पर जोर देते है कि कानूनी और प्रशासनिक मुद्दों पर जनता की हां / नहीं को दर्ज किया जाना चाहिए और इसे महत्व दिया जाना चाहिए। भारत के सभी दलों के नेताओं और बुद्धिजीवियों के पास हम आम जनता के लिए अपमान के सिवाय और कुछ भी नहीं है। वे हम आम लोगों को 'अपरिपक्व' समझते है ( पढे : मुर्ख, मंदबुद्धि आदि ) । और इसलिए वे इस बात पर जोर देते हैं कि कानूनों, निर्णयों, नियुक्तियों आदि पर हम आम लोगों के हां / नहीं को दर्ज तक नहीं किया जाना चाहिए, महत्व देने की बात तो भूल ही जाइए।
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9) दान के संबंध में :
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हम दान एवं चंदो के खिलाफ है। हमारा मानना है कि कार्यकर्ता हमें समय दें और वे फोटोकॉपी कराने, समाचारपत्र के विज्ञापनों आदि पर खर्च कर सकते है, लेकिन उन्हें दल के नेताओं के पास पैसा बिलकुल नहीं भेजना चाहिए। सभी पार्टियां कार्यकर्ताओं को दान / चन्दा जमा करने के लिए कहती है। और दान देने वाले दान देकर केवल इन पार्टियों को बरबाद ही कर रहे हैं और भारत के राजनैतिक परिदृष्य को और बिगाड़ रहे है।
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10) लगभग 100-120 और अंतर
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और लगभग 120 अंतर है। इतने अधिक अंतर ? हां। इतने अधिक और इससे भी कहीं ज्यादा । हमने प्रशासन में सुधार लाने के लिए लगभग 120 से अधिक सरकारी अधिसूचनाओं का प्रस्ताव किया , और भारत की वर्तमान सभी पार्टियों और सभी बुद्धिजीवियों ने इनमें से प्रत्येक अधिसूचना का विरोध किया है। और इस प्रकार 'नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' समूह और भारत की अन्य सभी पार्टियों के सांसदों तथा सभी बुद्धिजीवियों के बीच लगभग 120 अंतर है।
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11) सभी दलों के स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं के प्रति दृष्टिकोण
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मैं और राईट टू रिकॉल ग्रुप के अन्य सभी स्वंयंसेवक किसी पार्टी के कार्यकर्ताओं, गैर सरकारी संगठनों से कभी नहीं कहते कि वे अपनी पार्टी / गैर सरकारी संगठन को छोड़ दें। बल्किं हम उनसे आग्रह करते है कि 'क्या आप अपने नेताओं को उनके चुनाव घोषणा पत्र में प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री, प्रजा अधीन – मुख्यमंत्री, प्रजा अधीन – उच्चतम न्यायलय के न्यायधीश आदि क़ानून-ड्राफ्ट शामिल करने के लिए कह सकते है ? हमारा लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं को प्रभावित करने, उनके दल के चुनाव घोषणा पत्र में राइट टू रिकॉल ,जनता की आवाज - पारदर्शी शिकायत प्रणाली आदि प्रारूप शामिल करवाकर उन्हें राइट टू रिकॉल ग्रुप के प्रतिरूप / क्लोन में बदलने का है। जबकि सभी वर्तमान पार्टियों के नेतागण कार्यकर्ताओं से दूसरी पार्टियां छोड़ने और उनकी अपनी पार्टी में आ जाने के लिए कहते है।
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(11.2) प्रचार के तरीकों में सबसे महत्वपूर्ण अंतर
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कम से कम 50 या उससे अधिक अंतर मौजूद है। ऊपर उल्लिखित 11वां अंतर, तरीको के साथ-साथ उद्देश्य में मूलभूत अंतर को दर्शाता है। सभी वर्तमान दलों के नेता कार्यकर्ताओं से हमेशा कहते है कि वे दूसरे दलों को छोड़ दें और उनकी अपनी पार्टी में आ जाएं। क्योंकि ये नेता सत्ता के केन्द्र बनना चाहते हैं। जबकि मैं और राइट टू रिकॉल ग्रुप के मेरे अन्य स्वयंसेवी कार्यकर्ता किसी भी पार्टी, गैर सरकारी संगठन के कार्यकर्ताओं को उनकी पार्टियां, गैर सरकारी संगठन छोड़ने को नहीं कहते। इसके बदले हम उनसे अनुरोध करते है “क्या आप अपने नेताओं को मना सकते है कि वे प्रजा अधीन – प्रधानमंत्री, प्रजा अधीन – मुख्यमंत्री, प्रजा अधीन–उच्चतम न्यायलय के न्यायधीश आदि क़ानून-ड्राफ्ट अपने चुनाव घोषणा पत्र में शामिल कर लें"?
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और मैं खुले आम इस बात पर जोर देता हूं कि मुझे ज्यादा खुशी होगी यदि कार्यकर्ता एक और अलग से प्रतियोगी राइट टू रिकॉल ग्रुप का गठन करें अथवा अपने नेताओं पर दबाव डालना जारी रखें कि वे 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली', राइट टू रिकॉल, नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी ड्राफ्टों को अपने संगंठन के ऐजेंडे में शामिल करें !!
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क्यों ? क्यों मैं किसी आर.टी.आर कार्यकर्ता को एक प्रतियोगी प्रजा अधीन राजा पार्टी का गठन करने के लिए कहता हूँ ? अथवा मैं उनसे यह क्यों कहता हूँ कि, वे राइट टू रिकॉल ड्राफ्टों को अपने संगठन के एजेंडे में शामिल करें ?
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क्योंकि जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली ड्राफ्टों के लिए केवल एक राइट टू रिकॉल ग्रुप द्वारा प्रचार करने के बदले मैं इस बात को ज्यादा पसंद करूंगा कि 1000 राइट टू रिकॉल ग्रुप हों और उनमें से प्रत्येक 'नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी‍' क़ानून-ड्राफ्ट , राइट टू रिकॉल क़ानून-ड्राफ्ट आदि की मांग करे। अब यदि 1000 राइट टू रिकॉल ग्रुप, राइट टू रिकॉल ड्राफ्टों की मांग करते है, और राइट टू रिकॉल ड्राफ्टों के लिए एक अत्यधिक प्रतियोगी राजनीति प्रारंभ कर देते है, तब सभी राइट टू रिकॉल ग्रुप वोटों के बटवारे के चलते चुनाव हार सकते है लेकिन राइट टू रिकॉल क़ानून-ड्राफ्ट के बारे में जानकारी भारत के नागरिकों मे अधिक से अधिक लोगों के बीच फैलेगी।

साथ ही यदि 1000 संगठन राइट टू रिकॉल क़ानून-ड्राफ्ट की मांग कर रहे हों तो विरोधियों के लिए राइट टू रिकॉल क़ानून-ड्राफ्ट की मांग को ठुकराना ज्यादा कठिन होगा। जैसा कि मैं कई बार कह चुका हूँ कि मेरा लक्ष्य चुनाव जीतना नहीं है ----- मेरा लक्ष्य 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली', राइट टू रिकॉल ड्राफ्टों को पारित करवाना है। और इसलिए 1000 राइट टू रिकॉल ग्रुप और संगठन जिनमें से प्रत्येक राइट टू रिकॉल क़ानून-ड्राफ्ट की मांग कर रहा हो, तो वह ज्यादा बेहतर काम करेगा न कि केवल एक राइट टू रिकॉल ग्रुप। और इसलिए मुझे खुशी होगी जब एक सच्चा कार्यकर्ता मेरे समूह का सदस्य न बने लेकिन वह एक और राइट टू रिकॉल ग्रुप गठित करे अथवा अपने संगठन के ऐजेंडे में राइट टू रिकॉल के ड्राफ्टों को शामिल करवाने की कोशिश करे।
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(11.3) प्रस्तावित कानूनों के क़ानून-ड्राफ्ट का महत्व
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मेरा मानना है कि प्रत्येक ईमानदार उम्मीदवार और प्रत्येक ईमानदार राजनैतिक पार्टी को उन सभी सरकारी अधिसूचनाओं और विधानों की घोषणा अवश्य करनी चाहिए जो वे भारत की वर्तमान मौजूदा समस्याओं के समाधान के लिए लागू करवाने का इरादा रखते है। हम लोग यह भी मानते हैं कि प्रत्येक नागरिक को उम्मीदवार से कानूनों के उन प्रारूपों की मांग अवश्य करनी चाहिए जिन्हें पारित कराने का इरादा वह उम्मीदवार रखता है । बिना क़ानून-ड्राफ्ट के प्रस्तावित परिवर्तन देखने में तो सुंदर लगते हैं लेकिन वे उपयोगिता की दृष्टी से बेकार हैं ।
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चुनाव के बाद नागरिक चुनाव घोषणा-पत्र के विवरण , वायदों आदि को कलेक्टर के कार्यालय अथवा कोर्ट में नहीं ले जा सकते और इनमें लिखी गई नीतियों के लाभ की मांग भी नहीं कर सकते । सरकारी कार्यालयों और कोर्ट के भीतर जिस बात का महत्व है, वह सरकारी अधिसूचनाओं का क़ानून-ड्राफ्ट है जिस पर लिखी गई सामग्री पर मंत्रियों ने हस्ताक्षर किया है । यही कारण है कि हमने उन सरकारी अधिसूचनाओं के ड्राफ्टों को पूरा महत्व दिया है जिस पर हस्ताक्षर करवाने की हमारी योजना है । इसीलिए हम राजनीतिक बयानों को जरा भी महत्व नहीं देते, बल्कि क़ानून ड्राफ्ट्स को ही वादो का आधार मानते है।

सरकार में लाखों कर्मचारी होते हैं | उन कर्मचारियों को आदेश या प्रारूप देना होता है, केवल ये कहना पर्याप्त नहीं है कि 'भ्रष्टाचार कम करो' | कोई भी प्रस्ताव उतना ही अच्छा या बुरा है जितना कि उसका क़ानून-ड्राफ्ट , इसीलिए हम कार्यकर्ताओं को कहते हैं कि क़ानून-ड्राफ्ट पर ध्यान केंद्रित करें जिनसे भ्रष्टाचार ,गरीबी आदि देश की ज्वलंत समस्याओं का हल हो सकता है |
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(11.4) भारत के अधिकतर बुद्धिजीवी विशिष्ट वर्ग के एजेंट हैं :
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भारत के बुद्धिजीवी जो समाचार पत्र ,पाठ्यपुस्तकों में लिखते हैं विशिष्ट / उच्च वर्ग के कारिंदे हैं | और इन बुद्धिजीवीयों ने अपने समाचार पत्र के स्तंभों और पाठ्यपुस्तकों द्वारा आज के शिक्षित युवा के दिमाग में इतना जहर भर दिया है , कि अब एक औसत शिक्षित व्यक्ति भी जनसाधारण-विरोधी हो गया है | जितनी अधिक शिक्षा उसके पास है, उतनी अधिक संभावनाएं हैं कि वो उतना अधिक समय उन्हें पढने में लगाता है जो रद्दी ये बुद्धिजीवी लिखते हैं, और उतनी ही अधिक संभावनाएं हैं कि वो ज्यादा जनसाधारण-विरोधी है |
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बुद्धिजीवी लिखते हैं कि भारत का आम आदमी एक बदमिजाज ,सरफिरा ,एक जातिवादी, एक सांप्रदायिक व्यक्ति है, उसमे कोई राष्ट्रिय चरित्र नहीं है ,उसके कोई नैतिक मूल्य नहीं हैं , वह एक चोर और एक बदमाश व्यक्ति है, और वह यौन रूप कुंठित भी है आदि आदि | और शिक्षित लोग ये सब उटपटांग अपनी पाठ्यपुस्तकों और समाचार पत्र स्तंभों में पढ़ते है , और हमेशा के लिए जनसाधारण-विरोधी हो जाते हैं |

एक शिक्षित व्यक्ति को बदलाव के लिए क्या करना चाहिए --- वो एक व्यसन / बुरी आदत चिन्हित करे जो जज, बुद्धिजीवी ,शिक्षित ,मंत्रियों , बाबुओं (भारतीय प्रशासनिक सेवक) ,पुलिस अफसरों आदि में समान हो | सभी जज क़ानून की डिग्री प्राप्त किये हुए होते हैं और 95% से अधिक पूरी तरह से भाई-भतीजेवाद से ग्रसित होते है | सभी पुलिस अफसर (भारतीय पुलिस सेवा) उच्च शिक्षित होते हैं और उनमें से 95% से अधिक हर साल एक करोड़ से अधिक बनाते हैं | इसके बावजूद, ‘जनसाधारण बुरा और विशिष्ट वर्ग अच्छा है’ के कोरस चलते रहते हैं |
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असल में अधिकतर प्रसिद्ध बुद्धिजीवी विशिष्ट वर्ग के प्रतिनिधि हैं | वे इसी तरह प्रसिद्ध बनते हैं --- पहले वे नेता / विशिष्ट वर्ग के वफादार समर्थक बनते हैं और फिर विशिष्ट वर्ग उन पर धन खर्च करता हैं या उनको प्रसिद्ध बनाने के लिए अपनी शक्ति का उपयोग करता हैं | उच्च वर्ग के लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया जैसे जूरी प्रथा, रिकाल आदि प्रक्रियाएं नहीं चाहते और इसीलिए उन्होंने अपने पालतू बुद्धिजीवियों को "जूरी प्रणाली एवं रिकॉल भारत का पतन करेंगे’ ऐसा कहने को कहा है, ताकि जन साधारण के दिमाग में भय डाला जा सके | विद्यार्थियों और पाठकों के मन में भय कैसे पैदा होगा ? सरल है --- भारत के जनसाधारण लोगों को अनियमित ,असभ्य ,हिंसक, सांप्रदायिक, जातिवादी और मूर्ख के रूप में प्रस्तुत करो | इसीलिए पाठ्यपुस्तके , समाचार पत्र स्तंभ निरंतर भारत के जनसाधारण को नीचा दिखाते हैं, और शायद ही कभी इस बात का जिक्र करते हैं कि बाबू ,भारतीय पुलिस सेवक, बुद्धिजीवी आदि भारत के आम नागरिक की तुलना में कहीं अधिक बुरे हैं |
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शिक्षा व्यक्ति को जनसाधारण को नफरत नहीं सिखाती --- वास्तव में यदि कोई इस बात से सूचित है कि कैसे भारतीय न्यायालय , रिजर्व बैंक , पुलिस आदि काम करते हैं तो वह जान जाएगा कि कैसे उच्च वर्ग के लोग, बाबू , जज आदि जनसाधारण को लूटते हैं और वो जनसाधारण के लिए दया महसूस करेगा | ये तथाकथित निरक्षरता इसीलिए है क्योंकि बुद्धिजीवी जनसाधारण को अनपढ़ रखना चाहते हैं ताकि वे आसानी से दबाये और पीटे जा सके | इसीलिए बुद्धिजीवी उन प्रक्रियाओ का विरोध करते हैं जिससे हम जनसाधारण जिला शिक्षा अधिकारी को बदल सकें या बदलने से रोक सकें, क्योंकि ऐसी प्रक्रिया ऐसा जिला शिक्षा अधिकारी लाएगी जो जनसाधारण को शिक्षित करने में रूचि रखता हो |
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अंग्रेजी पाठ्यक्रम ने हमेशा ये सूचित किया था कि भारतीय जनसाधारण निम्न है और उसे "शासित" करने की आवश्यकता है, ताकि भारतीय जनसाधारण को सभ्य किया जा सके | और वर्तमान बुद्धिजीवी भी अपने समाचार पत्र स्तंभ और पाठ्य्पुस्तिकाओ में यही सलाह देते हैं | लेकिन मैं अंग्रेजों को वर्त्तमान स्थिति के लिए दोष नहीं दूँगा | वर्त्तमान बुद्धिजीवी विद्यार्थियों के मन में जनसाधारण-विरोधी दृष्टिकोण पैदा कर रहे हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि विद्यार्थी लोकतांत्रिक सोच के बनें , असल में वे विद्यार्थियों को अल्पजन-तंत्र (कुछ ही लोगो द्वारा निर्णय लेंना) का समर्थक बनाना चाहते हैं |
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ना केवल विचार ,यहाँ तक कि समाचार-पत्र के लेख और पाठ्य पुस्तको के माध्यम से जानकारियाँ भी नियंत्रित की जाती है ताकि जन साधारण को वास्तविक सूचनाये नही मिले और वे सेना विरोधी बने रहे। उदहारण के लिए, मैं बहुत से पढ़े लिखे व्यक्तियों से मिलता हूँ और उनसे पूछता हूँ --- चीन और भारत के परमाणु शक्ति अनुपात के बारें में, जो कि 100:1 है, उच्चतम विस्फोटक परीक्षण के मामले में, जो कि 20:1 है, परमाणु हथियार के मामले में और कुल विस्फोटक शक्ति के मामले में जो कि 100:1 है | उत्तर तो क्या उनके पास इसका कोई सुराग भी नहीं होता | वे वही रट्टा लगाते हैं जो मीडिया और संचार माध्यम कहते हैं -- "न्यूनतम विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता" हमारे पास है !! लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि सबसे बड़े बम का जो हमने परिक्षण किया है, वह 45 किलो टन का है, जबकि चीन ने 4200 किलो टन के बम का परिक्षण किया है !! उन्हें ये इसलिए नहीं पता क्योंकि उन्हें मीडिया वालों ने कभी बताया नहीं | और मीडिया वालों ने इसीलिए उन्हें नहीं बताया क्योंकि उच्चवर्ग के लोगों को शांति-समर्थक, सेना-विरोधी नागरिक चाहिए। लेकिन चीन / भारत के परमाणु शक्ति के बारे में ये सूचना देने से उनका झुकाव सेना को सशक्त बनाने की और होगा | इसीलिए ये महत्त्वपूर्ण और मूल्यवान जानकारी सार्वजनिक स्थानों से हटा दी जाती है |
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(11.5) समीक्षा प्रश्न

1. हमारे राइट टू रिकॉल ग्रुप के दृष्टिकोण से संविधान की, किसके द्वारा की गई व्याख्या अंतिम है ? बुद्धिजीवियों के विचार में संविधान की किसके द्वारा की गई व्याख्या अंतिम है ?
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2. क्या बुद्धिजीवी लोग खनिजों को हम आम लोगों की संपत्ति समझते हैं ? क्या बुद्धिजीवी लोग भारत सरकार के प्लॉटों जैसे दिल्ली हवाई अड्डे और आई आई एम ए प्लॉट को हम आम लोगों की संपत्ति समझते हैं ?
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3. क्या राइट टू रिकॉल ग्रुप “राजनैतिक संस्कृति” के सिद्धांत में विश्वास करता है ?
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(11.6) अभ्यास

1. कृपया राष्ट्रीय पहचान-पत्र प्रणाली लागू कराने के लिए भारतीय संसद में शौरी और अन्य. बी जे पी सांसदों या किसी अन्य सांसद द्वारा प्रस्तुत किए गए कानूनों के क़ानून-ड्राफ्ट प्राप्त करें।

2. कृपया उच्चतम न्यायलय, उच्च न्यायलय और लोअर कोर्ट में भाई –भतीजावाद को कम करने के लिए सीपीएम, बीजेपी, कांग्रेस आदि द्वारा संसद में प्रस्तावित किए गए कानूनों के क़ानून-ड्राफ्ट प्राप्त करें।

3. कृपया प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, विधायकों, सांसदों आदि के रिकॉल के संबंध में कांग्रेस, बीजेपी और सीपीएम के सांसदों द्वारा संसद में प्रस्तावित कानूनों के ड्रॉफ्ट प्राप्त करें।

4. कृपया प्रधानमंत्री, मुख्य्मंत्रियों, विधायकों, सांसदों आदि के रिकॉल के संबंध में जय प्रकाश नारायण द्वारा संसद में प्रस्तावित कानूनों के ड्रॉफ्ट प्राप्त करें।
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