> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2017-10-06

Pawan Jury BhilwaraRj

भाग - 1 ; संघ का शीर्ष नेतृत्व हमेशा से ही इस्लाम का छद्म विरोधी, ईसाइयत का प्रबल समर्थक और हिन्दू हितो के प्रति उदासीन रहा है।
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( यह लेख दो वर्ष पूर्व 2015 में लिखा गया था। फेसबुक मानकों के तहत न होने से इसे फेसबुक ने साल भर पहले इनविजिबल कर दिया था। असुरक्षित लिंक्स को हटाकर तथा दो भागो में विभाजित करके इसे re post किया जा रहा है। इस पोस्ट के अगले भाग का लिंक निचे दिया गया है। )
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भूमिका ---- लेख भारत की सबसे गंभीर समस्याओं जैसे सेना का लगातार कमजोर होना, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों/मिशनरीज़ का भारतीय राजनेतिक व्यवस्था में बढ़ता नियंत्रण, हिन्दू धर्म का लगातार सिकुड़ना, मिशनरीज़ द्वारा किये जा रहे धर्मान्तर, गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, महंगाई, शिक्षा, चिकित्सा आदि के समाधान के बारे में है। लेख में उन तथ्यों तथा तर्कों का समावेश है कि किस तरह राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ नामक छद्म हिन्दूवादी संगठन का शीर्ष नेतृत्व लाखो स्वयंसेवको तथा करोड़ो नागरिको को भ्रमित करके भारत में मिशनरीज़ के एजेंडे पर कार्य कर रहा है।
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हमारा एजेंडा भारत की सेना को अमेरिका के बराबर ताकतवर बनाना है, इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमने कई कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किये है। लेख में उठायी गयी समस्याओ के समाधान के लिए हमारे द्वारा प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट्स के लिंक भी दर्ज किये गए है, पाठको से अपेक्षा है कि इन क़ानून ड्राफ्ट्स को पढ़े तथा सहमत होने पर समर्थन देवें। यदि आपके पास इनसे बेहतर क़ानून ड्राफ्ट है, तो हमें उपलब्ध करवाएं, हम उनका भी प्रचार करेंगे।
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भारत की सबसे बड़ी समस्या सेना का कमज़ोर होना है। किसी भी देश की संप्रभुता सेना पर निर्भर करती है। युद्ध एक सतत प्रक्रिया है और शान्ति काल सिर्फ आगामी युद्ध के लिए विश्रांति है। जिस व्यक्ति / संस्था / संगठन / देश के पास संपत्ति तो होगी लेकिन उस संपत्ति की सुरक्षा करने का बूता नही होगा, उसे शक्तिशाली के आक्रमणों का सामना करना पड़ेगा, यह अनुभूत एतिहासिक तथ्य है। सेना मजबूत करने के लिए हमें स्वदेशी आधुनिक हथियारो का उत्पादन करना जरुरी है।
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गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार आदि समस्याओं का निवारण तथा पुलिस प्रशासन, अदालतों को चुस्त बनाए बिना सेना को मजबूत बनाना सम्भव नही है, अत: हम इन सभी समस्याओ के समाधान के लिए भी कानूनी ड्राफ्ट्स प्रस्तावित कर रहे है, जबकि संघ उन सभी कानूनों का विरोध कर रहा है, जिन क़ानूनो का सम्बन्ध भारत की सेना को मजबूत करने तथा धर्मान्तर रोकने से है।
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लेख के अंतिम भाग में बताया गया है कि कैसे हम आम नागरिक किसी सरकार /नेता / पार्टी या संगठन के भरोसे बैठे न रह कर स्वयं देश की सभी समस्याओं के समाधान के अच्छे कानूनों को भारत में लागू करवा सकते है।
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अध्याय -1
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ज्यादातर बीजेपी कार्यकर्ता और आरएसएस के स्वयंसेवक अपना अधिकांश सोशल मिडिया पर मुस्लिम विरोधी सामग्रियों का प्रचार करने में, तथा बचा हुआ वक्त नेहरु खानदान की जड़े खोदने में खपा दे रहे है। ऐसा करके उन्हें लगता है कि वे हिंदुत्व को मजबूत बना रहे है, जबकि संघ के इस एजेंडे पर कार्य करके वो अनजाने में हिंदुत्व और राष्ट्र को गंभीर क्षति पहुंचा रहे है।
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असल में भारत के वास्तविक दुश्मन मिशनरीज़ और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां है। अमेरिका / ब्रिटेन / नेटो इनका प्रतिनिधित्व करते है। आज मिशनरीज़ के पास आधुनिक हथियार है, डॉलर है, तथा पूरे विश्व में ईसाइयत फैलाने का मिशन है। यदि हमने स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देकर व्यापार घाटे को कम नही किया तो हमारी हालत साउथ कोरिया जैसी हो जायेगी या हथियारों के अभाव में ईराक जैसी।
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1) साउथ कोरिया में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने प्रवेश किया था, तब कोरिया में ईसाइयत 3-4% थी । 90 के दशक में कोरिया दिवालिया हुआ और उनकी राष्ट्रीय संपत्तियां MNCs/मिशनरीज़ के हाथो में चली गयी। आज साऊथ कोरिया में ईसाई जनसँख्या का प्रतिशत 30% है ।

2) ईराक में तेल के कुँए लूटने के लिए 2004 में जब अमेरिका ने आक्रमण किया तो ईराक में ईसाई जनसँख्या 5% थी, जो अगले दस वर्ष में बढ़कर 15% हो गयी।
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सऊदी अरब, कोरिया, इंडोनेशिया, ब्राजील, थाईलेंड, जिम्बाब्वे, ग्रीस के बाद अब 120 करोड़ की आबादी का हमारा देश मिशनरीज़ के लिए सबसे आसान और बड़ा शिकार है। जहाँ लूटने के लिए खनिज और धर्मान्तर के लिए करोड़ो "गरीब और हथियार विहीन नागरिक" है।
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मिशनरीज़ किसी भी देश में धर्मान्तर करने के लिए FDI और सेना का इस्तेमाल करती है। FDI के माध्यम से अर्थवय्वस्था को नियंत्रित किया जाता है, और कमाए गए मुनाफे में से कुछ हिस्सा CSR के जरिये मिशनरीज़ प्राप्त करती है। इसी कोष से मिशनरीज़ सूदूर इलाको में स्कूल, अस्पताल और चर्च के माध्यम से धर्मान्तर करती है।
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लेकिन स्थानीय धर्म की रक्षा के प्रति जागरूक कार्यकर्ताओं का ध्यान बंटाने के लिए उन्हें ऐसे संगठन की जरुरत होती है, जो ऐसा भ्रम खड़ा किये रहे कि अमुक संगठन स्थानीय धर्म की रक्षा के प्रति समर्पित है।

किसी संगठन द्वारा ऐसा भ्रम कैसे खड़ा किया जा सकता है ?
अन्य प्रतिस्पर्धी स्थानीय धर्म ( इस्लाम ) का "छद्म" विरोध करके कार्यकर्ताओं का ध्यान बंटाइये।
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इसके लिए संघ के नेता लगातार इस्लाम विरोधी भड़काऊ बयान देते है, तथा इनकी सोशल मिडिया सेल 24×7 ऐसे पोस्ट्स की रचना करती है, जिनमें मुस्लिमों का विरोध "दृष्टिगोचर" होता है। संघ के समर्थक इस लुगदी साहित्य को चाव से पढ़ते, सुनते है और इन्हें फैलाने में लगे रहते है। इस पूरी कवायद में मुस्लिम धर्म के स्वास्थ्य पर कमोबेश कोई फर्क आये न आये हिन्दू धर्म लगातार कमजोर होता जा रहा है, जिससे भारत में मिशनरीज़ लगातार अपनी स्थिति मजबूत कर रहे है। जहाँ तक इस्लाम का प्रश्न है संघ उन सभी कानूनो का भी विरोध करता है जिनसे भारत में बढ़ते जा रहे ईस्लाम के गैर वाजिब प्रभाव को कम किया जा सकेl
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इसे फिर से पढ़िए --- "जहाँ तक इस्लाम का प्रश्न है संघ उन सभी कानूनो का भी विरोध करता है जिनसे भारत में बढ़ते जा रहे ईस्लाम के गैर वाजिब प्रभाव को कम किया जा सके l"
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ईसाइयत को बढ़ावा देने, ईस्लाम का "सांकेतिक" विरोध करने और हिन्दू धर्म और राष्ट्र को कमजोर बनाने के लिए के लिए मोदी-अंधभक्त और स्वयंसेवक यह सब अनजाने में जबकि संघ का शीर्ष नेतृत्व ऐसा जानबूझ कर कर रहा है।
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नीचे दिए कुछ उदाहरणों से इसे समझा जा सकता है।
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1. धार्मिक और भाषायी आंकड़े
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2011 की जनगणना के सभी आंकड़े 2012 तक उपलब्ध हो चुके थे, लेकिन सोनिया गांधी ने धर्म और भाषा के आंकड़ो को दबा दिया तथा अन्य सभी आंकड़े जारी कर दिए। मोदी साहेब 2014 तक इन आंकड़ो पर चुप्पी साधे बैठे रहे तथा संघ ने भूले से भी कभी इन आंकड़ो को जारी करने की मांग नही की। यह आश्चर्य का विषय है कि जो संगठन हिन्दू हितो का राग अलाप कर सत्ता में पहुंचा उसके लिए इस बात का कोई महत्त्व नही है कि पिछले दशक में हिन्दू जन्संख्याँ में कितनी गिरावट आई है। अब जबकि सत्ता में आये 1 वर्ष बीत चुका है, मोदी साहेब सोनिया बन गए है और आंकड़ो को दबा के बैठे है।
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पूर्वोत्तर में 1991 से 2001 के बीच धार्मिक जनसँख्या वृद्धि दर* का प्रतिशत इस प्रकार था।
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*वृद्धि दर : मान लीजिये कि किसी क्षेत्र में हिन्दू आबादी 1 करोड़ तथा मुस्लिम आबादी भी 1 करोड़ थी, जो कि 10 वर्ष में बढ़कर 110 करोड़ तथा 125 हो गयी, तो कहा जाएगा कि जनसँख्या वृद्धि दर क्रमश: 10% तथा 25% रही।
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1. असम : हिन्दू 15%, मुस्लिम 29%, ईसाई 33%
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2. अरुणाचल प्रदेश : हिन्दू 18%, मुस्लिम 73%, ईसाई 130%
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3. नागालेंड : हिन्दू 25%, मुस्लिम 69%, ईसाई 69%
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4. मणिपुर : हिन्दू (-)5%, मुस्लिम 43%, ईसाई 36%,
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5. मिजोरम : हिन्दू (-)9%, मुस्लिम 122%, ईसाई 31%
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6. मेघालय : हिन्दू 18%, मुस्लिम 61%, ईसाई 42%
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7. त्रिपुरा : हिन्दू 15%, मुस्लिम 29%, ईसाई 142%
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इस समय मिशनरीज़ पूर्वोत्तर इलाके में सक्रीय है, अत: ईसाई वृद्धि दर धर्मान्तर की द्योतक है। चूंकि इस्लाम के पास धर्मान्तर के लिए स्कूल, अस्पताल, दवाइयां तथा पेड मिडिया उपलब्ध नही है, अत: मुस्लिम आबादी में अनपेक्षित बढ़ोत्तरी "बांग्लादेशी घुसपेठ" को दर्शाती है।
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1991 से 2001 तक भारत में बीजेपी, कोंग्रेस, जनता दल और संयुक्त मोर्चे की सरकारे रही । 2001 से 2011 तक की धार्मिक जनसँख्या के आंकड़े अब तक प्रकाशित नही हुए है, तथा इन आंकड़ो को दबाने में संघ सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। चूंकि मोदी साहेब भी अन्य राजनेतिक दलों की तरह एक सियासी दल के मुखिया है, अत: उनसे ऐसा कदम उठाने की उम्मीद करना नादानी है, जो कदम मिशनरीज़ को नुक्सान पहुंचाता हो।
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मूल विषय यह है कि पीएम बदलने से यह धर्मान्तर रुकने वाला नही है, जब तक कि हम सरकारी स्कूलों, अस्पतालों को दुरुस्त करने और गरीबी को कम करने के लिए आवश्यक कानूनों को गेजेट में प्रकाशित नही करे।
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संघ ने न तो आज तक इन आंकड़ो को जारी करने की मांग की, न ही अपने स्वयं सेवको को इस बारे में सूचना दी। संघ की तरफ से मामला रफा दफा है।
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2. गणित विज्ञान
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बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपनी तकनीक के बल पर पूरी दुनिया में कारोबार करती है। यदि किसी देश में गणित-विज्ञान का आधार मजबूत होगा, तो वह देश आने वाले समय में तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर लेगा, फलस्वरूप विदेशी कम्पनियों के व्यापार के अवसर सिकुड़ जायेंगे। अत: ये कम्पनियां विकासशील और पिछड़े हुए देशो में 8 वीं क्लास तक फेल न करने का क़ानून चाहती है, ताकि बच्चे 8 क्लास तक गणित विज्ञान न पढ़े। जाहिर है ये बच्चे हमेशा के लिए गणित विज्ञान को समझने में असफल रहेंगे। यही क़ानून मिशनरीज को भी फायदा देता है। सरकारी स्कूल तबाह होने से पिछड़े इलाको में गरीब तबके के पास मिशनरीज़ स्कूल में जाने के सिवा कोई चारा नहीं बचता, अत: धर्मान्तर के अवसर बढ़ जाते है। गणित विज्ञान का आधार टूटने का दुष्प्रभाव आप फिलिपिन्स में देख सकते है। आज फिलिपिन्स पूरी तरह से ईसाई देश है, तथा उत्पादन के नाम पर वे सिर्फ सनसिल्क शेम्पू ही बनाते है।
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आप इस समय जो यह लेख पढ़ रहे है, इसके लिखने से लेकर पढने तक सब कुछ विज्ञान और गणित के कारण सम्भव हुआ है। आपके फोन, कम्पूटर से लेकर एप्लीकेशन तक सब कुछ विज्ञान-गणित की देन है। हम गणित-विज्ञान में पिछड़ गए इसलिए आपके हाथ में इस समय फोन, कम्पूटर से लेकर एप्लीकेशन तक सब कुछ विदेशी है, और इसिलिये हम हथियार निर्माण में पिछड़ कर परजीवी बने हुए है।
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लेकिन संघ की "शिक्षा नीति" इतिहास और संस्कृति के पुनर्लेखन से शुरू होकर उसी पर ख़त्म हो जाती है। आप संघियो से इस बात पर जी भर कर बहस करा लीजिये कि अकबर महान थे या महाराणा प्रताप, इतिहास में बाबर को प्रमुखता से पढ़ाया जाना चाहिए या पृथ्वीराज चौहान को, किन्तु संघ ने आज तक कभी सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए कभी कोई क़ानून प्रस्तावित नही किया। क्योंकि ऐसा करने से सरकारी स्कूलों का स्तर बेहतर होगा, जिससे गरीबी कम होगी और मिशनरीज़ के लिए धर्मान्तर के अवसर सिकुड़ जायेंगे। अत: सरकारी स्कूलों को बदहाल बनाए रखने के लिए संघ पाठ्यक्रम पर बहस छेड़ बाबर, अकबर, प्रताप और चौहान के इर्द गिर्द घूमता रहता है, और लाखो स्वयंसेवको को भी घुमाता रहता है, इससे सरकारी स्कूलों का ढांचा बदतर होता जाता है मिशनरीज़ को धर्मान्तर में सहायता मिलती है।
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जहाँ तक मोदी सरकार की बात है, मोदी साहेब सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को तोड़ने के लिए मनमोहन से भी तेजी से कार्य कर रहे है। हाल ही में उन्होंने वसुंधरा और आनंदी बेन को सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को एनजीओ के हवाले करने के आदेश दिए है, तथा 8 वीं क्लास तक फेल न करने के क़ानून को हटाने से साफ़ इनकार कर दिया है। उल्लेखनीय है कि RTE के तहत आने वाले सभी स्कूलों में 8 वीं क्लास तक फ़ैल नही किया जा सकता अत: वहां शिक्षा का स्तर गिरता जाएगा, जबकि मिशनरीज़ स्कूल इस योजना से बाहर है अत: उनका स्तर सुधरेगा। वक़्त गुजरने के साथ मिशनरीज स्कूल में छात्रों की संख्या बढती जायेगी, और शिक्षा के एजेंडो को मिशनरीज़ नियंत्रित करेंगे।
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3. चिकित्सा
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जिस तरह सरकारी स्कूलों में आबाबिले मंडराती है, वही स्थिति सरकारी अस्पतालों की है। सरकारी अस्पतालों का ढांचा गिरता जा रहा है और इसकी जगह निजी अस्पताल ले रहे है। जहाँ आपको बदहजमी या अपच की भी शिकायत हो तो डॉक्टर 3 तरह की खून जांच, एक्स रे और सोनोग्राफी लिख देता है। गरीब आदमी के लिए चिकित्सा महँगी वस्तु हो चुकी है। इससे गरीबी फैलती है और मिशनिरिज़ को धर्मान्तर में सहायता मिलती है।
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संघ समर्थित वाजपेयी सरकार ने पेटेंट का क़ानून पास किया जिससे दवाइयों के दाम आसमान छू गए, लेकिन संघ इस क़ानून पर चुप्पी साधे रहा। क्योंकि ये क़ानून बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और मिशनरीज़ को सहायता पहुंचाता है।
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संघ ने आज तक कभी भी देश के सरकारी अस्पतालों को सुधारने के लिए कभी कोई क़ानून प्रस्तावित नही किये, जिससे इलाज महंगा होता जा रहा है और मिशनरीज़ को बढ़त मिल रही है।
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4. मिडिया
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जयेंद्र सरस्वती जी , नित्यानंद जी , आसाराम जी बापू तथा और भी ऐसे कई संतो पर आरोप लगने के बाद मिशनरीज़ संचालित मिडिया ने इन पर जी भर कर कीचड़ उछाला। कौन दोषी है कौन निर्दोष इसका फैसला अदालते करती है, लेकिन इनकी गैर जरुरी मिडिया ट्रायल की गयी तथा हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाया गया । इसी तरह PK, OMG तथा सिंघम-2 जैसे फिल्मो में हिन्दू धर्म, मंदिर, दान, संतो आदि का फूहड़ ढंग से चित्रण किया गया । सभी स्वयंसेवक 24×7 घंटे यह पोपाट मचाते रहते है कि मिडिया बिकाऊ है, लेकिन संघ ने कभी भी मीडिया को दुरुस्त करने के लिए आवश्यक कानूनों पर मुँह नही खोला। संघ की नीति है कि -- मीडिया बिकाऊ है, और इसे ईमानदार बनाने की सबसे अच्छी नीति यह है कि इसे गालियाँ दो। गालियाँ देने से भड़ास तो निकल जाती है लेकिन समस्या का समाधान नहीं आता।
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संघ ने अपने स्वयंसेवको को यह जानकारी नही दी कि मिडिया इसलिए बिकाऊ है, क्योंकि वाजपेयी ने इसे मिशनरीज़ और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बेच दिया था। और तब संघ ने इसका समर्थन किया था । मिडिया में FDI की अनुमति देने से मिडिया हमारे नियंत्रण से बाहर चला गया और आज स्थिति हमारे सामने है।
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संघ ने भारतीय मिडिया को स्वतंत्र बनाने के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए।
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इससे पहले कि मैं अन्य मसलो पर संघ की नीति स्पष्ट करूँ, पहले एक महत्त्वपूर्ण जानकारी रखना चाहता हूँ, जिससे ज्यादातर नागरिक अनभिग्य है। इस जानकारी के अभाव में आप स्थिति की गंभीरता को समझने में नाकाम रहेंगे।
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देश को क़ानून चलाते है, अत: व्यवस्था में किसी भी प्रकार का बदलाव लाने के लिए हमें क़ानून में बदलाव लाना पड़ेगा। यदि क़ानून अच्छे होंगे तो व्यवस्था अच्छी तरह से कार्य करेगी, यदि क़ानून बुरे होंगे तो व्यवस्था बुरे तरीके से कार्य करेगी । किसी भी तरह का बदलाव लाने के लिए सबसे जरुरी वस्तु प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट है। यदि कोई व्यक्ति / नेता /संगठन किसी समस्या के समाधान या बदलाव की बात कर रहा है, किन्तु वह समाधान के लिए ड्राफ्ट देने से इनकार करता है, मतलब वह व्यक्ति / नेता / संगठन मक्कार है, धूर्त है, बदमाश है और धोखेबाज भी है। असल में उसकी रुचि सिर्फ समस्या को उभाड़ कर वोट खींचने या कार्यकर्ताओं को अपने संगठन से चिपकाए रखने में, या माइलेज यानि फुटेज हासिल करने में है, समाधान में नही।
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उदाहरण के लिए कई संघठन देश में आरक्षण को ख़त्म करने के लिए मुहीम चला रहे है, लेकिन उनसे जब आप पूछते है कि "आरक्षण कानूनन लागू है, अत: आरक्षण हटाने के लिए कौनसा नया क़ानून लाने का आप प्रस्ताव कर रहे है ? तो उनका मुहं घोड़े जैसा लटक जाता है। उन्हें यह बात समझ ही नहीं आती कि आरक्षण हटाना है तो इसे हटाने के लिए क़ानून बनाना पड़ेगा। लाल किले पर जाकर "हटा दो" बोलने से ये नहीं हट जाता !!
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पर वे आरक्षण को नारे लगा कर हटाना चाहते है, जो कि सम्भव नही है। इसी तरह मिडिया बिकाऊ है बिकाऊ है, सरकारी स्कूल बेकार है बेकार है, जैसे जुमलो की मुहीम से न तो स्वतंत्र मिडिया की स्थापना हो सकती है, न ही स्कूलों का स्तर सुधर सकता है। इसलिए इस बात को समझना सबसे जरुरी है कि जहाँ भी कोई समस्या है, उसके समाधान के लिए हमें एक प्रस्तावित क़ानून की आवश्यकता है। क़ानून अच्छे या बुरे हो सकते है, लेकिन क़ानून विहीन विमर्श टाइम पास करने के सिवा कुछ नही है। और विभिन्न राजनैतिक दल ध्यान बंटाने के लिए जनता का टाइम पास जान बूझकर करते है।
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5. बांग्लादेशी घुसपेठ
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वाजपेयी ने बांग्ला देशी घुसपेठियो को खदेड़ने का वादा किया था, लेकिन सत्ता में आकर पलट गए, तब संघ ने इस विषय पर 5 साला चुप्पी साध ली। मनमोहन सरकार आने के साथ ही संघ फिर से गीत गाने लगा कि, 'देखो बांग्लादेशी भारत में घुसे जा रहे है, इन्हें कोंग्रेस नहीं रोक रही'। चुनाव प्रचार में मोदी साहेब ने बंगाल में मंच से चेतावनी दी कि, '16 मई को बांग्लादेशियो को जाना पड़ेगा' । जैसा की जुमलो, भासणो और नारों से कभी कोई बदलाव नही आता अत: एक भी बांग्लादेशी घुसपेठिया वापिस बंगाल नही गया। सत्ता में आकर अब संघ फिर से इस मुद्दे पर चुप्पी साध के बैठा है।
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2001 में आडवाणी ने गृहमंत्री रहते हुए संसद में अनुमान व्यक्त किया था कि इस समय लगभग 1 करोड़ अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिये भारत में मौजूद है, जिनकी संख्या अब तक बढ़कर 2 करोड़ होने का अनुमान है l युद्ध के दौरान यदि चीन या पाक यदि इन्हे हथियार पहुंचा देता है, तो पूर्वोत्तर के हथियार विहीन नागरिक गाजर मूली की तरह कट जाएंगे और उन्हें जान बचाने के लिए मध्य भारत की और भागना पड़ेगा l पूर्वोत्तर हमारे हाथ से निकल जाएगा, क्योंकि हम इस प्रकार के नागरिक विद्रोह के लिए तैयार नहीं हैl
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घुसपेठियो को खदेड़ने के लिए पहले हमें उनकी पहचान करनी पड़ेगी, जिसके लिए नेशनल आई डी सिस्टम का क़ानून चाहिए। क्योकि ये दो करोड़ घुसपेठिये पूरे देश में बिखरे हुए है, जिनके पास वोटर आई डी से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक सब कुछ है। केवल जाओ कहने से ये चले जाने वाले होते तो भारत में घुसते भी नहीं थे।
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संघ ने पिछले 25 वर्ष में बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित नही किया।
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6. मंदिर
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भारत के समृद्ध मंदिरों ( खासकर दक्षिण भारत ) को आने वाले विपुल दान का इस्तेमाल मिशनरीज धर्मान्तर में करती है। इसके लिए पहले मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में ले लिया जाता है, तथा मंदिरों के कोष का बटवारा विभिन्न धार्मिक संगठनों तथा कल्याणकारी ट्रस्टो को सेवा करने के लिए दे दिया जाता है। ये अधिकतर ट्रस्ट छद्म नाम से मिशनरीज़ द्वारा संचालित है, अत: मंदिरों के कोष का उपयोग मिशनरीज धर्मान्तर में कर पाती है। 2009 के अपने मेनिफेस्टो में बीजेपी ने वादा किया था कि वे यदि सत्ता में आये तो मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करेंगे, लेकिन 2014 में मोदी साहेब ने इस वादे को अपने मेनिफेस्टो से निकाल दिया। संघ ने खामोशी बरती।
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संघ ने 2012 में मंदिरों के स्वर्ण भंडारों को हडपने के मनमोहन-चिदंबरम-सोनिया के फैसले का सांकेतिक प्रतिरोध किया, किन्तु जब मोदी साहेब ने सत्ता में आकर तिरुपति से 2 टन सोना खींच लिया तब संघ ने उन्हें मौन समर्थन दिया। मोदी साहेब अब अन्य मंदिरों का सोना खींचने के लिए गोल्ड बांड ले आये है, तथा संघ इस फैसले का समर्थन कर रहा है।
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मोदी साहेब ने 'देवालय से पहले शौचालय' के बयान दिए, परेश रावल ने 'हिन्दू मंदिर सबसे गंदे पूजा स्थल है' कहा, आनंदी बेन ने ' मंदिरों को दान न देने' की अपील जारी कि ताकि मंदिरों में आने वाले दान के ढाँचे को तोडा जा सके लेकिन संघ खामोश रहा।
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संघ ने मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिए कभी कोई क़ानून प्रस्तावित नही किया।
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7. न्यायालय
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भारत की अदालतों में 3 करोड़ केस लटके हुए है, तथा हमारी सुस्त अदालतें पूरी तरह से भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार से ग्रस्त है। अदालतों में दशको तक फैसले न आने से उत्पादन इकाइयों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा मुकदमो की चपेट में आने वाले कारखाने लंबित न्याय के कारण बंद हो जाते है। नेताओं ने अदालतों से गठजोड़ बना रखे है, अत: दशको तक आरोपी नेता और जज तारीख पर तारीख खेलते रहते है, जिससे दबंग, भ्रष्ट, निरंकुश और बेईमान नेताओं को शीर्ष पदो पर टिके रहने का अवसर मिलता है। जहाँ तक धनिक वर्ग की बात है, तो उनके पास न्याय खरीदने या मुकदमे को घसीटने के लिए जजों को देने के लिए पर्याप्त पैसा है।
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किसी भी देश के सभी क़ानून रद्दी हो जाते है, यदि उन कानूनों को तोड़ने पर सजा दशको बाद दी जाए। हमारी उच्च तथा उच्चतम न्यायलयो में मिशनरीज़ और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की गहरी घुसपेठ होने से ऐसे फैसले दिए जाते है, जिससे हमारी निर्माण इकाइयों की कमर टूटे, अर्थव्यवस्था गर्त में जाए और हम विदेशी कम्पनियों पर निर्भर बने रहे।
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कैसे भारत की अदालतों को चुस्त और स्वतंत्र बनाया जा सकता है, इस सम्बन्ध में संघ ने आज तक न अपना कभी मुहं खोला है, न ही कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। इस मामले में पूछने पर संघ शून्य में ताकने लगता है।
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8. स्वदेशी
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भारत की दुसरे नंबर की यह सबसे बड़ी समस्या है, जिससे हम जूझ रहे है। यदि हमने इस समस्या को हल नही किया, तो हम निश्चित रूप से शांतिपूर्ण गुलामी और दिवालियेपन की और बढ़ रहे है।
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चूंकि हमारी अदालतों में सालो तक फैसले नही आते, गणित और विज्ञान की शिक्षा को हम शून्य स्तर तक तोड़ चुके है, जमीन की कीमते आसमान छू रही है, वैट, सेल्स टेक्स, एक्साइज तथा प्रदुषण विभाग जैसे दर्जनों विभाग स्थानीय इकाइयों से पैसा खींच रहे है, अत: हमारी स्वदेशी इकाइयां धड़ाधड़ बंद हो रही है, आयात बढ़ता जा रहा है, निर्यात गिर रहा है और विदेशी मुद्रा का क़र्ज़ लगातार बढ़ रहा है।
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संघ अपने स्वयंसेवको से पिछले 25 साल से यह बात छुपाता आ रहा है कि, जिन विदेशी कम्पनियों को हमने व्यापार करने के लिए बुलाया है, उनके द्वारा कमाए गए मुनाफे के बदले जब हमें डॉलर्स का भुगतान करना होगा तो हम दिवालिये हो जायेंगे। हमें अपने खनिज, प्राकृतिक संसाधन और राष्ट्रीय संपत्तियां बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सौंपनी पड़ेगी और पूरा देश नीलाम हो जाएगा।
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तब पूरी आर्थिक, राजनेतिक व्यवस्था पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्ज़ा होगा, और मिशनरीज़ भारत में बड़े पैमाने पर धर्मान्तर कर सकेंगे, जैसा कि उन्होंने दक्षिण कोरिया में किया।
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मिशनरीज की रीढ़ MNCs (FDI) को रोकने के लिए संघ ने कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए। बल्कि अब संघ ने एफडीआई को विकास से जोड़ दिया है !!
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9. भुखमरी और खनन क्षेत्र में भ्रष्टाचार
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देश में व्याप्त सबसे बड़ा भ्रष्टाचार खनन क्षेत्र में है, तथा इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा काले धन का कारोबार होता है। खनिज राष्ट्र की संपत्ति है तथा इसके मालिक हम नागरिक है। यह देश तथा इसके प्राकृतिक संसाधन हमें विरासत में मिले है, अत: खनन से प्राप्त रोयल्टी पर देश के करोड़ो नागरिको का हक है। सरकार हमारी सेवक है, और देश चलाने के लिए हम उसकी नियुक्ति करते है । सरकारों को अपने खर्चे टेक्स से निकालने चाहिए, न कि खनिजो से प्राप्त रोयल्टी से।
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देश की संपत्ति जो भी है, वह प्राकृतिक संसाधन और खनिज है, अत:हमारा प्रस्ताव है कि खनन से प्राप्त रोयल्टी नागरिको के खाते में भेजी जानी चाहिए। इससे नागरिको को उनका हक मिलने लगेगा, जिससे भुखमरी, नक्सलवाद, खनिजो की लूट और भ्रष्टाचार ख़त्म होगा और धर्मान्तर में कमी आएगी।
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संघ ने इस समस्या के समाधान के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए।
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10. सेना
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यह भारत की सबसे बड़ी समस्या नही बल्कि सबसे बड़ा खतरा है, जिसका सामना हम कर रहे है। यदि हमने भारतीय सेना को अमेरिका के बराबर मजबूत नही बनाया तो हमारी आजादी सिर्फ एक युद्ध की गुलाम है। जिस दिन युद्ध हुआ उसी दिन हम ख़त्म।
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यह दुराशा सिर्फ स्वयंसेवको को कल्पित लग सकती है, क्योंकि संघ ने उन्हें यह जानकारी कभी नही दी कि सेना से मतलब हथियार होता है न कि वर्दीधारी रंगरूट। और आयातित हथियारों से उस देश से लड़ाई नही की जा सकती जो देश हमें हथियार निर्यात कर रहा है। यदि हम पर चीन हमला करता है, तो हम सिर्फ तब तक लड़ सकते है जब तक अमेरिका हमे हथियार देता है, चाहे अमेरिका हमसे 10 गुना दाम ही क्यों न वसूल करे। लेकिन यदि अमेरिका खुद हमला कर देता है या पाकिस्तान को अपने हथियार देता है, तो हम किसके हथियारों से लड़ेंगे। यदि ऐसा हुआ तो भारत के हालात ईराक जैसे हो जायेंगे और पूरा भारत ही ईसा हो जाएगा।
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संघ ने भारत की सेना को मजबूत करने के लिए, आधुनिक हथियारों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए और हथियार बंद नागरिक समाज की रचना के लिए कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए।
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मैंने ये 10 मुख्य बिन्दु रखे है, जिन्हें विस्तारित करके 100 तक किया जा सकता है। जैसे 2G, कोल ब्लोक घोटालो को रोकने के लिए नागरिको की ज्यूरी द्वारा पब्लिक में नार्को टेस्ट, काले धन की रोकथाम के लिए मोरिशस रूट की समाप्ति, कृषि में रासायनिक खाद और GM फसलो पर बढती निर्भरता के कारण किसानो की आत्महत्या, कृषि क्षेत्र में लगातार दर्ज की जा रही गिरावट, आसमान छूती जमीनों की कीमते, जमीनों में काले धन का निवेश, नक्सल वाद की समस्या, खनिजो की बेतहाशा लूट, अन्यायिक रूप से जमीनों का अधिग्रहण आदि आदि।
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हालांकि संघ ने इन सभी समस्याओं के निस्तारण के लिए भी कभी कोई कानूनी ड्राफ्ट नही दिए है, लेकिन मैं अपने विषय को संघ के 'हिन्दुवाद' तक ही सिमित रखूँगा।
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अध्याय - 2
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स्तम्भ का यह भाग इस बारे में है कि किस तरह संघ का शीर्ष खुद के संगठन को बचाने और बढाते रहने के लिए मिशनरीज, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सहायता और हिंदुत्व को नुक्सान पहुचाता है। संघ का शीर्ष नेतृत्व ऐसा जानबूझकर करता आ रहा है, तथा आज भी कर रहा है।
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हमारे सरकारी स्कूलो, अस्पतालो का ढांचा टूट रहा है, गणित विज्ञान जीरो है, अदालते घोंघा चाल से सरक रही है, तकनीक और निर्माण में हम जमा हो चुके है, मोबाइल फोन तक हम आयात कर रहे है युद्धक टैंक और फाइटर प्लेन की तो बात ही छोड़ दीजिये, डॉलर का कर्ज बढ़ता जा रहा है, गरीबी, भुखमरी, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार शाश्वत समस्याएं है, सेना हथियारों के मामले में परजीवी है, हमारा मिडिया विदेशी चला रहे है, मतलब हम हर क्षेत्र में लगातार पिछड़ते जा रहे है, और इसे ढकने के लिए हम मेक इन इण्डिया के नाम से विदेशी कम्पनियों को बुला रहे है। जिनको बुलाना तो हमारे हाथ में है लेकिन भेजना हमारे हाथ में नहीं है।
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ऐसी स्थिति में देश के सबसे बड़े राजनेतिक संगठन की इन समस्याओं के समाधान में रूचि नही हो, ये बात समझ में नही आती। लेकिन तब संदेह गहरा जाता है, जब संघ इन समस्याओं के समाधान के कानूनों का विरोध करने लगे।
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या तो हम यह मान ले कि शिक्षा, चिकित्सा, सेना, अर्थव्यवस्था, स्वदेशी हथियारों का उत्पादन, अदालतें, तकनिकी विकास, घटता निर्यात बढ़ता आयात, भ्रष्टाचार, गरीबी, भुखमरी आदि समस्याएँ पोची समस्याएं है, किन्तु यदि इन मुद्दों का राष्ट्र की समृद्धि से सरोकार है, तो संघ इन समस्याओं के निराकरण पर खामोश ही नही है बल्कि विरोध भी कर रहा है।
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क्यों मैं संघ पर यह आरोप लगा रहा हूँ ?
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1. हम देश के सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पतालो की दशा सुधारने के लिए हमने क़ानून प्रस्तावित किया है -
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/821128631398666>;
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2. अमेरिका में किसी भी मुकदमे का फैसला 10 से 15 दिनों के भीतर आ जाता है, क्योंकि वहां दंड देने की शक्ति नागरिको की ज्यूरी के पास है। हम भारत की अदालतों को सुधारने के लिए ज्यूरी सिस्टम तथा बड़े स्तर के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अपराधी का सार्वजनिक रूप से नार्को टेस्ट करने की मांग कर रहे है, जिसका ड्राफ्ट इस लिंक पर देखा जा सकता है --
<https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1393197910798441>;
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( ज्यूरी सिस्टम में किसी भी मुक़दमे की सुनवाई के लिए मतदाता सूची में से रेंडमली 12 से 15 नागरिको को समन भेजे जाते है, इन नागरिको के समूह को ज्यूरी कहते है , मुकदमे की सुनवाई इन आम नागरिको द्वारा की जाती है और ये नागरिक ही मुक़दमे में फैसला देते है । हर मुक़दमे के लिए अलग अलग नागरिको की ज्यूरी होती है। ज्यूरी बहुमत से अपना फैसला जज को देती है और जज फैसले की व्याख्या करके जजमेंट दे देता है। हाईकोर्ट ज्यूरी में 50 - 60 जबकि केस विशेष में 1500 नागरिको तक की ज्यूरी सुनवाई कर सकती है ।जिनका चयन राज्य की मतदाता सूची से किया जाता है। मुलजिम को जानकारी नही होती कि लाखो नागरिको में से कौन उसके मुकदमे का फैसला करने वाला है। इस प्रकार भ्रष्टाचार शून्य हो जाता है तथा लाखो न्यायधीश होने से फैसलों का निपटारा त्वरित गति से होता है।)
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3. स्वदेशी इकाइयों को बचाने और महत्त्वपूर्ण क्षेत्रो में विदेशी कम्पनियों को व्यापार की अनुमति न देने के लिए हमने इस क़ानून का प्रस्ताव किया है :
<https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/548862728625259>;
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4. गरीबी कम करने और खनिजो की लूट रोकने के लिए हम प्रस्ताव कर रहे है कि खनन से प्राप्त रोयल्टी का दो तिहाई सीधे नागरिको के खाते में तथा एक तिहाई सेना के खाते में भेजा जाए। प्रस्तावित DDMRCM क़ानून का ड्राफ्ट :
<https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/529823220529210>;
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5. स्वतंत्र मिडिया की स्थापना के लिए हम राईट टू रिकाल दूरदर्शन अध्यक्ष के क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करने की मांग कर रहे है।
<https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/546885878822944>;
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इसके अलावा हमने बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने, मोरिशस रूट को समाप्त करने तथा हथियार बंद नागरिक समाज की रचना के लिए भी क़ानून प्रस्तावित किये है।

बांग्लादेशी घुसपेठियो को देश से बाहर खदेड़ने के लिए कानूनी ड्राफ्ट - <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/828952687282927>;
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जब हमने संघ को इन कानूनों का समर्थन करने को कहा तो संघ ने इन कानूनों का समर्थन करने से इनकार कर दिया !! किन्तु जब हमने संघ से इन समस्याओं के समाधान के लिए अपने कानूनी ड्राफ्ट देने के लिए कहा तो संघ ने अपने ड्राफ्ट देने से भी इनकार कर दिया !!! हो सकता है कि हमारे ड्राफ्ट बुरे हो इसलिए हमने संघ से अपने अच्छे ड्राफ्ट देने का जब बार बार आग्रह किया तो संघ ने किसी भी समस्या का कानूनी ड्राफ्ट देने से इनकार कर कर दिया। इस स्थिति में यह स्पष्ट होता है कि मिशनरीज, MNCs और संघ एक ही एजेंडे पर कार्य कर रहे है। चूंकि समस्या का समाधान सिर्फ क़ानून बना कर ही किया जा सकता है अत: मिशनरीज और MNCs कभी नही चाहती कि इन समस्याओं के निराकरण के लिए क़ानून बनाए जाए।
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संघ के इतिहास में झाँकने से संकेत मिलते है कि संघ हमेशा से ही मिशनरीज़ और MNCs के प्रति उदार ही नही बल्कि सहयोगात्मक भी रहा है।
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महात्मा भगत सिंह जी, आजाद, सान्याल, लाजपत राय आदि गरम दल के नेताओं को रोकने के लिए अंग्रेजो ने गांधी का इस्तेमाल किया था। गांधी एक टाइम वेस्टर था, जिसने अंग्रेजो के खिलाफ हिंसक आन्दोलन करने वाले युवाओं को चरखे चलाने, अनशन करने और भजन गाने जैसी फिजूल गतिविधियों में उलझा दिया। इस तरह गांधी अंग्रेजो के नुक्सान की अहिंसा के गीत गाकर कम कर रहे थे, वही दूसरी तरफ पेड मिडिया के माध्यम से अंग्रेज गांधी को भारत में मसीहा की तरह स्थापित कर रहे थे।
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जिस देश में अंग्रेजो की हुकूमत हो, उस देश में वही विचारधारा पनप सकती थी जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजो को लाभ पहुंचा रही हो। अत: गांधी, नेहरु, टैगोर, बिडला, बजाज, साराभाई और सिंधिया समेत वे सभी देशी राजा पनपे जो भीतर से अंग्रेजो को फायदा पहुंचा रहे थे।
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सावरकर, भगत, आजाद, लालाजी, सुखदेव, बटुकेश्वर, उधम सिंह और सुभाष बाबू जैसे सच्चे क्रांतिकारी महात्माओं को दमन का सामना करना पड़ा और अंग्रेजो ने इनमे से किसी को नही बख्शा।
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संघ के की स्थापना 1925 में हुयी और 1947 तक संघ के स्वयंसेवको की संख्या लगभग 8 लाख हो चुकी थी। किन्तु यह बात समझ से बाहर है कि क्यों कभी संघ को किसी प्रकार के दमन का सामना न करना पड़ा, कि क्यों संघ ने 1947 तक अंग्रेजो के खिलाफ कभी कोई आन्दोलन नही किया, कि क्यों ब्रिटिश हुकूमत में संघ फूलता फलता रहा।
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कोंग्रेस की तरह ही संघ को भी अंग्रेजो का मौन समर्थन हासिल था, क्योंकि दोनों ही संघठन कार्यकर्ताओं का टाइम फिजूल गतिविधियों में खपा कर अंग्रेजो को लाभ पहुंचा रहे थे।
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खिलाफत आन्दोलन को गांधी द्वारा समर्थन दिए जाने के कारण हिन्दुओ का गांधी से मोहभंग हुआ और हिन्दू महासभा की ताक़त बढ़ने लगी। हिन्दू महासभा को वीर सावरकर और मदन मोहन मालवीय का समर्थन था और ये हथियारों की मांग कर रहे थे। 1857 की क्रान्ति के बाद अन्य किसी सशस्त्र विद्रोह की आशंका को ख़त्म करने के लिए अंग्रेजो ने आर्म्स एक्ट लागू कर के भारतीय नागरिको के सभी हथियार जब्त कर लिए और हथियार रखने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। अंग्रेज जानते थे की 40 करोड़ की आबादी को 70 हजार अंग्रेज सिर्फ तब तक ही काबू में रख सकते है जब तक कि अवाम हथियार विहीन हो। संघ और गांधी दोनों ही भारतीयों को हथियार विहीन बनाने के अंग्रेजो के एजेंडे पर कार्य कर रहे थे l
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कोंग्रेस पर अंग्रेजो का नियंत्रण था, किन्तु महासभा अंग्रेजो को वास्तविक नुक्सान पहुंचाने के एजेंडे पर कार्य कर रही थी। महासभा के दमन से पहले हिंदूवादी कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट करने के लिए एक छद्म राष्ट्रवादी-हिंदूवादी संगठन की जरुरत थी जो कि खाली स्थान को भर सके। हेडगेवार महासभा में बंगाल प्रकोष्ठ के अध्यक्ष थे। अंग्रेजो ने देशी राजाओं को महासभा के बरअक्स एक संघठन खड़ा करने की अनुमति दी, जो कि महासभा के एजेंडे के खिलाफ कार्य करे।
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1925 में हेडगेवार ने संघ की स्थापना की।
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संघ ने महासभाईयों के एजेंडे के उस एजेंडे को पलट दिया जो अंग्रेजो को नुक्सान पहुंचा सकते थे। महासभा का स्पष्ट रूख 'हिन्दू' था अत: संघ ने इसकी जगह 'राष्ट्र' शब्द चुना। संघ सावरकर के हिन्दूवाद से सहमत नही था, अत: उसने इसे राष्ट्रवाद तक विस्तारित कर दिया। महासभा हथियारों की मांग कर रही थी, अत: संघ ने हथियारों की जगह अपने शस्त्र के रूप में लाठी को चुना। महासभा हिन्दुओ को राजनेतिक रूप से संघठित होकर चुनावों में उतरने का आवाहन कर रही थी, अत: संघ ने स्वयंसेवको को राजनीति से दूर रहने और सेवा कार्य करने का सन्देश दिया।
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संघ ने अंग्रेजो को भारत से खदेड़ने के लिए मुहीम चलाने की जगह अंग्रेजो का गांधीनुमा सांकेतिक प्रतिरोध किया और लाखों कार्यकर्ताओं को कम्बल बांटने, गायों को चारा खिलाने, खून इकट्ठा करने, भोजन बांटने, राष्ट्र भक्ति के गीत गाने, ड्रम शंख बजाने, हलके व्यायाम करने, पथ-संचलन करने आदि में व्यस्त कर दिया, बदले में अंग्रेजो ने संघ को फलने फूलने दिया।
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इस बात को समझने के लिए किसी विशेष बुद्धि की आवश्यकता नही है कि गजनी से लेकर बाबर और अंग्रेज भारत को जीतने में इसी कारण सफल रहे क्योंकि भारत के नागरिको के पास हथियार नही थे तथा भारत के पास आधुनिक हथियारों का अभाव था। यह एक मात्र कारण था जिस कारण भारत गुलाम बना। आखिरकार जब जंग होती है तो सिर्फ हथियार ही आपकी रक्षा करते है। लेकिन संघ का पिछले 90 वर्षो का इतिहास है कि न तो संघ ने भारत की सेना को मजबूत करने के लिए कभी कोई क़ानून प्रस्तावित किये न ही आम नागरिको को हथियार रखने देने की छूट का समर्थन किया।
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यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि, क्या संघ राष्ट्रविरोधी संगठन है ?
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मेरे विचार में संघ पर राष्ट्रविरोधी होने का सीधा आरोप लगाना न्यायपूर्ण नही है। किन्तु यह तथ्यात्मक रूप से सही है कि संघ हिन्दू तथा राष्ट्र हितो की जानबूझ कर अवहेलना कर रहा है । इसका एक मात्र निकटस्थ कारण जो मैं देखता हूँ, वह यह है कि --- "संघ ने राष्ट्रहित की तुलना में अपने अस्तित्व को बनाए रखना चुना है।"
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तब भी और अब भी
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दंड देने का अधिकार ( अदालतें ) और सेना अक्षय शक्ति की स्त्रोत है। गुलाम भारत में अंग्रेजो के पास सेना, अदालते, प्रशासन और पेड मिडिया था। अत: किसी भी संगठन की उत्तरजीविता अंग्रेजो से टकराव टालने पर ही निर्भर थी। यदि आप अंग्रेजो को नुक्सान नही पहुचाएंगे तो आपको भी नुक्सान नही होगा। संघ के शीर्ष नेतृत्व ने टकराव टालने को चुना। यदि आप टकराव मोल लेंगे तो आपको प्रतिरोध और दमन का सामना करना पड़ेगा, जिसमे जान-माल की क्षति होना स्वाभाविक है। आजादी के बाद भारत में काले अंग्रेजो की सरकार बनी, तथा संघ ने अगले कुछ दशको तक नेहरु-गांधी-कांग्रेस की सरकारों से टकराव टालते हुए शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में निवास किया। वाजपेयी सरकार के दौरान भी आज मोदी सरकार के शासन काल में भी संघ ने सरकार से टकराव टालने को चुना है।
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वस्तुत: तब भी और अब भी, मिशनरीज़ और MNCs से टकराव ठानने के लिए जिस साहस की आवश्यकता है, संघ का नेतृत्व उससे तब भी विहीन था और अब भी विहीन है।
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संघ की उत्तरजीविता इस पर निर्भर करती है कि वह मिशनरीज / MNCs, जो कि देश के वास्तविक दुशमन है, के क्रिया कलापों में टांग न अड़ाए। यहाँ टांग अड़ाने से आशय उन क़ानूनो का प्रचार करने, मांग करने और लागू करवाने के प्रयास करने से है, जिन कानूनों के लागू होने से हिन्दू धर्म और राष्ट्र वास्तविक अर्थो में मजबूत हो और मिशनरीज़ / MNCs की पकड़ भारत पर से कमजोर हो जाए। आज मिशनरीज़ के पास स्कूल्स है, अस्पताल है, बहुराष्ट्रीय कम्पनियां है, पेड मिडिया है, अदालतों, प्रशासन पर नियंत्रण है तथा भारत की सेना एवं अर्थव्यवस्था उन पर निर्भर है। अत: संघ इन मुद्दों को हल करने के कानूनों पर खामोश है, और नारो बयानो और भाषणों का गुल-गपाड़ा करने से ये मुद्दे कभी हल हो नही सकते,यह बात मिशनरीज़ और संघ का नेतृत्व दोनों अच्छे से जानते है।
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लेकिन इस बात से भी इनकार नही किया जा सकता कि संघ MNCs / मिशनरीज़ को नुकसान पहुंचाने वाली मुहीम को तोड़ने की गतिविधियों में लिप्त रहा है। इस संदर्भ में एक उदाहरण महात्मा राजिव दिक्षित जी का है।
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राजिव भाई ने 25 वर्षो तक निरंतर गाँव-गाँव शहर-शहर घूम कर विदेशी कम्पनियों के निवेश से आने वाली बर्बादी के बारे में लाखो नागरिको को परिचित करवाया। वे विदेशी कम्पनियों को रोकने के लिए जन-आन्दोलन खड़ा कर रहे थे। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को दिवालिया करने वाले मोरिशस रूट को केंसिल करने का केस हाईकोर्ट में जीत लिया था, जिससे विदेशी कम्पनियों द्वारा जारी लूट पर लगाम लगती।
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चूंकि राजिव भाई सच्चे अर्थो में विदेशी कम्पनियों को फायदा पहुंचाने वाले कानूनों को रद्द करवाने और विदेशीकम्पनियों की घुसपेठ को रोकने के लिए आवश्यक कानूनों की मांग कर रहे थे, अत: संघ ने उनकी मुवमेंट को तोड़ने और विदेशी कम्पनियों को सुरक्षित करने के लिए 'स्वदेशी जागरण मंच' की स्थापना की। स्वदेशी जागरण मंच ने पेड मिडिया और संघ के सहयोग से सभी स्वदेशी में मानने वाले कार्यकर्ताओं को खींच कर उनका इस्तेमाल वोट में किया। बीजेपी जब सत्ता में आयी तो स्वदेशी जागरण मंच के यशवंत सिन्हा वित्त मंत्री बने और उन्होंने अगले ही दिन हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सर्कुलर निकाल कर मोरिशस रूट के जारी रहने पर मुहर लगा दी। इतना ही नहीं उन्होंने सभी क्षेत्रो में विदेशी निवेश को अनुमति दिए जाने का समर्थन किया। स्वदेशी के नारे लगाने वाले करोड़ो अंध-भगत आज भी उसी संघ और बीजेपी से चिपके हुए है, जिन्होंने महात्मा राजीव दिक्षित जी की मूवमेंट तोड़ने की साज़िश रची थी।
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जिन कार्यकर्ताओं ने राजिव भाई के व्याख्यान नहीं सुने है, वे यदि 1992 से 1998 तक के राजिव भाई के व्याख्यान सुने तो पायेंगे कि राजिव भाई ने गांधी परिवार को जितना एक्सपोज़ किया उतना बीजेपी और संघ मिलकर आज तक भी नही कर पाए है, उन्ही खुलासो से सम्बंधित तथ्यों और चित्रों के आधार पर इमेजेज़ और पोस्ट बना बना कर संघ और बीजेपी की सोशल मिडिया सेल ने फेसबुक / वाट्स एप को गाँधी खानदान विरोधी सामग्री से पाट रखा है। संघ इन खुलासो पर 40 साल चुप्पी साधे रहा, तथा जब राजिव भाई ने इन्हें प्रकाशित कर दिया तब संघ और बीजेपी ने इनका राजनेतिक इस्तेमाल करके सत्ता हासिल की। संघ के स्वयंसेवक और मोदी साहेब के अंध-भगत देश के कानूनों को सुधारने की जगह आज भी इन 20 साल पुराने खुलासो को जन जन तक फैलाने में लगे हुए है !!
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यह स्तम्भ संघ के बारे में है, अत: मैं मोदी साहेब को इसमें शरीक नही करूँगा। लेकिन एक कैफियत उनके बारे में यह देनी वाजिब है, कि इन मसलो की निस्बत मोदी साहेब को उतना दोषी नही ठहराया जा सकता। जिस प्रकार कोई परचून का व्यापारी यह मिसाल पेश करे कि उसने लोगो के राशन की फ़िक्र को हल करने के लिए यह कारोबार शुरू किया है न कि मुनाफा कमाने के लिए, तो आप तो आप उसे गंभीरता से नहीं लेंगे, उसी तरह सियासी दलों की बुनियाद हुकूमत हासिल करने और उसे कब्जाए रखने पर टिकी होती है, न कि मुल्क को बचाने के लिए। बहरहाल मोदी साहेब भी एक सियासी दल की नुमाइंदगी करते है और उनसे अपवाद होने की उम्मीद करके हम उंनके साथ ज़्यादती कर रहे है।
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सरकारे / नेता हमेशा से सत्तावादी रहे है, और इसी से उनका वजूद है, लेकिन कार्यकर्ताओं और राष्ट्रवादी समूहों का यह फ़र्ज़ है कि वे जन दबाव द्वारा सरकारों को ऐसे क़ानून लागू करने पर मजबूर करे जिनसे देश की सेना और अर्थव्यवस्था मजबूत हो। मोदी साहेब कल सत्ता में नही थे और कल रहेंगे भी नही, कल मनमोहन थे आज नही है, सरकारे और नेता आने जाने के लिए ही है, किन्तु नागरिक संगठन लगातार मौजूद रहते है, सरकारों पर दबाव डाल कर सही दिशा में बनाए रखने के लिए। और यही पर देश का सबसे बड़ा देशभक्त स्वयंसेवको का संगठन देश को बचाने की जगह खुद को बढाने में लगा हुआ है, जो कि 120 करोड़ नागरिको के भविष्य के लिए घातक साबित होगा।
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अध्याय - 3
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यह भाग इस बारे में है कि संघ किस तरह अपने प्रिय मुद्दों को हल करने की जगह उनका इस्तेमाल अपनी राजनैतिक ताकत बढाने और सत्ता हासिल करने में करता है।

अगला भाग पढ़ने के लिए यह लिंक क्लिक करें - <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1408735749244657>;
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