Posts for 2021-08

Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Aug 21 2021 12:52:48 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री पर वोट वापसी लागू करने का प्रस्तावित क़ानून
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(Vote Vapsi over State Health Minister)
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इस कानून का सार : यह कानून राज्य के स्वास्थ्य मंत्री को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाने के लिए लिखा गया है। इस कानून को विधानसभा से पास करने की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है। #RRP31 , #VvpHealthMin
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मौजूदा व्यवस्था में स्वास्थ्य मंत्री ऐसे कानून छापता है जिससे फार्मा एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको को मुनाफा और आम नागरिको को नुकसान हो। जैसा आपने देखा कि कोरोना काल में विभिन्न राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियो ने औचक लॉकडाउन, अनिवार्य मास्क एवं अनिवार्य टीकाकरण जैसे कई गलत कानूनो की सिफारिश की और नागरिको को आर्थिक-मानसिक-शारीरिक परेशानी का सामना करना पड़ा।
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इस कानून के लागू होने के बाद स्वास्थ्य मंत्री सीधे राज्य के मतदाताओ के नियंत्रण में आ जायेगा। तब यदि स्वास्थ्य मंत्री नागरिको के स्वास्थ्य को नुकसान देने वाले क़ानून लागू करता है तो राज्य के मतदाता वोट वापसी पासबुक का प्रयोग करके उसे किसी भी समय बदल सकेंगे। निकाले जाने का यह भय स्वास्थ्य मंत्री के व्यवहार में परिवर्तन लाएगा और वह जनहित में फैसले लेना शुरू करेगा।
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यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो मुख्यमंत्री को एक खुला निर्देश पत्र (Order via Open Letter) भेजे।
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निर्देश पत्र में यह लिखे : “मुख्यमंत्री जी, स्वास्थ्य मंत्री को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाने के आदेश जारी करें - #VvpHealthMin
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-------क़ानून ड्राफ्ट का प्रारम्भ-------
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टिप्पणियाँ इस क़ानून का हिस्सा नहीं है। नागरिक एवं अधिकारी टिप्पणियों का इस्तेमाल दिशा निर्देशों के लिए कर सकते है।
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(01) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। तब यदि आप अपने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के काम-काज से संतुष्ट नहीं है, और उसे निकालकर किसी अन्य व्यक्ति को स्वास्थ्य मंत्री बनाना चाहते है तो पटवारी कार्यालय में स्वीकृति के रूप में अपनी हाँ दर्ज करवा सकते है। आप अपनी हाँ SMS, ATM या मोबाईल APP से भी दर्ज करवा सकेंगे। आप किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दे सकते है, या इसे रद्द कर सकते है। स्वीकृति की एंट्री वोट वापसी पासबुक में आएगी। यह स्वीकृति आपका वोट नही है। बल्कि यह एक सुझाव है ।
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(02) स्वास्थ्य मंत्री बनने के इच्छुक व्यक्तियों द्वारा आवेदन करना :
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30 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी नागरिक यदि अपने राज्य का स्वास्थ्य मंत्री बनना चाहता है तो वह कलेक्टर के सामने स्वयं या किसी वकील के माध्यम से एक ऐफिडेविट प्रस्तुत कर सकता है। कलेक्टर सांसद के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क‍ लेकर स्वास्थ्य मंत्री पद के लिए उसका आवेदन स्वीकार कर लेगा, और एफिडेविट को स्कैन करके मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा।
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(03) मतदाताओ द्वारा स्वीकृति दर्ज करना :
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(3.1) कोई भी नागरिक किसी भी दिन अपनी वोट वापसी पासबुक या मतदाता पहचान पत्र के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर स्वास्थ्य मंत्री पद के किसी भी प्रत्याशी के समर्थन में अपनी हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर एवं वोट वापसी पासबुक में मतदाता की हाँ को दर्ज करके रसीद देगा। पटवारी मतदाताओं की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम एवं मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी सार्वजनिक करेगा। मतदाता मंत्री पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है।
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(3.2) स्वीकृति ( हाँ ) दर्ज करने के लिए मतदाता 3 रूपये फ़ीस देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी
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(3.3) यदि कोई मतदाता अपनी स्वीकृती रद्द करवाने आता है तो पटवारी एक या अधिक नामों को बिना कोई फ़ीस लिए रद्द कर देगा ।
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(3.4) प्रत्येक सोमवार को महीने की 5 तारीख को, कलेक्टर पिछले महीने के अंतिम दिन तक प्राप्त प्रत्येक प्रत्याशियों को मिली स्वीकृतियों की गिनती प्रकाशित करेगा। पटवारी अपने क्षेत्र की स्वीकृतियो का यह प्रदर्शन प्रत्येक सोमवार को करेगा।
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[ टिपण्णी1 : कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी स्वीकृति SMS, ATM एवं मोबाईल एप द्वारा दर्ज करवा सके।
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रेंज वोटिंग - मुख्यमंत्री ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता किसी प्रत्याशी को -100 से 100 के बीच अंक दे सके। यदि मतदाता सिर्फ हाँ दर्ज करता है तो इसे 100 अंको के बराबर माना जाएगा। यदि मतदाता अपनी स्वीकृति दर्ज नही करता तो इसे शून्य अंक माना जाएगा । किन्तु यदि मतदाता अंक देता है तब उसके द्वारा दिए अंक ही मान्य होंगे। रेंज वोटिंग की ये प्रक्रिया स्वीकृति प्रणाली से बेहतर है, और ऐरो की व्यर्थ असम्भाव्यता प्रमेय ( Arrow’s Useless Impossibility Theorem ) से प्रतिरक्षा प्रदान करती है।]
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(04) स्वास्थ्य मंत्री की नियुक्ति एवं निष्कासन : यदि स्वास्थ्य मंत्री पद के किसी प्रत्याशी को राज्य की मतदाता सूची में दर्ज कुल मतदाताओ (कुल मतदाता, न कि केवल वे जिन्होंने स्वीकृति दर्ज की है) के 25% मतदाताओ की स्वीकृतियां प्राप्त हो जाती है, और यदि यह स्वीकृतियां पदासीन स्वास्थ्य मंत्री से 1% अधिक भी है, तो मुख्यमंत्री मौजूदा स्वास्थ्य मंत्री को निकाल कर सबसे अधिक स्वीकृति पाने वाले व्यक्ति को स्वास्थ्य मंत्री नियुक्त कर सकते है।
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[ टिपण्णी 2 : यदि सबसे अधिक स्वीकृति प्राप्त करने वाला व्यक्ति मौजूदा विधानसभा / विधान परिषद् का सदस्य नहीं है तो अमुक व्यक्ति मंत्री बनने के बाद आगामी 6 माह में होने वाले किसी भी चुनाव या उपचुनाव में विधायक का चुनाव लड़ कर विधायक बन सकता है]
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(05) जनता की आवाज :
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(5.1) यदि कोई मतदाता इस कानून में कोई परिवर्तन चाहता है तो वह कलेक्टर कार्यालय में एक एफिडेविट जमा करवा सकेगा। जिला कलेक्टर 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर एफिडेविट को मतदाता के वोटर आई.डी नंबर के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करके रखेगा।
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(5.2) यदि कोई मतदाता धारा (5.1) के तहत प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर अपना समर्थन दर्ज कराना चाहे तो वह पटवारी कार्यालय में 3 रूपए का शुल्क देकर अपनी हां / ना दर्ज करवा सकता है। पटवारी इसे दर्ज करेगा और हाँ / ना को मतदाता के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर सार्वजनिक करेगा।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Aug 26 2021 21:46:43 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

NWO का फ़र्ज़ी विरोध करने वाले झुंडो ( उदाहरण - बिश्वरूप छोटे गांधी एवं AIM आदि) के लक्षण ।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Aug 28 2021 16:33:49 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

(A) स्वास्थ्य मंत्री पर वोट वापसी आने से क्या बदलाव आएगा ?
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मौजूदा व्यवस्था में हम विधायक को चुनते है, विधायक अपने बहुमत से मुख्यमंत्री का चुनाव करते है, और मुख्यमंत्री अपनी इच्छा से स्वास्थ्य मंत्री को नियुक्त करता है। इस तरह स्वास्थ्य मंत्री की नियुक्ति में राज्य के मतदाताओ की कोई भूमिका नहीं होती।
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स्वास्थ्य मंत्री की नियुक्ति एवं निष्कासन में नागरिको की कोई भूमिका नहीं होने के कारण स्वास्थ्य मंत्री जनहित की अवहेलना करते हुए फार्मा एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको से घूस खाकर उन्हें फायदा पहुँचाने वाले क़ानून बनाता है। यह क़ानून इस स्थिति को किस तरह पलट देगा, इसे हम कुछ उदाहरणों से समझते है :
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(a1) शक्कर, रिफाइंड तेल को दी जा रही सब्सिडी : फार्मा कम्पनियां शक्कर पर दी जा रही सब्सिडी जारी रखना चाहती है, ताकि खांड एवं गुड की तुलना में शक्कर सस्ती रहे और शक्कर का उपभोग बढ़े। शक्कर का उपभोग बढ़ने से दवाइयों की बिक्री बढ़ती है, जिससे फार्मा कम्पनियों का मुनाफा बढ़ता है। इसी तरह से तेल को रिफाइंड करने, चावल को पॉलिश करने के लिए भी सब्सिडी दी जाती है।
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रिफाइंड तेल एवं पॉलिश किये हुए चावल का उपभोग बढ़ने से दवाइयों की बिक्री बढती है। शक्कर, तेल, चावल मिलो के मालिक एवं फार्मा कम्पनियां यह सब्सिडी जारी रखना चाहती है, और इसे जारी रखने के लिए वे स्वास्थ्य मंत्री को चंदो के रूप में घूस एवं सकारात्मक कवरेज के लिए मीडिया कर्मियों को भुगतान करते है।
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इस कानून के आने के बाद स्वास्थ्य मंत्री नागरिको के स्वास्थ्य को नुकसान देने वाले उपरोक्त अनुदानों को बंद कर देगा और इस तरह की व्यवस्था करेगा कि यह सब्सिडी राज्य के नागरिको के खाते में सीधे जमा हो। यदि स्वास्थ्य मंत्री उपरोक्त कदम नहीं उठाता है तो नागरिक वोट वापसी पासबुक का प्रयोग करके स्वास्थ्य मंत्री को बदल देंगे।
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(a2) बाध्यकारी लॉकडाउन एवं वैक्सीनेशन : यह खुली हुयी बात है कि कोरोना संक्रमण को रोकने का लॉकडाउन से कोई सम्बन्ध नहीं था। किन्तु धनिक वर्ग ने कोरोना का इस्तेमाल लॉकडाउन डालने में किया। लॉकडाउन की वजह से छोटे एवं मझौले कारोबारी बाजार से बाहर हो गए और धनिक वर्ग का बाजार में हिस्सा बढ़ गया।
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यदि भारत में वोट वापसी स्वास्थ्य मंत्री का कानून लागू होता तो स्वास्थ्य मंत्री यह अनुशंषा करता कि, लॉकडाउन, वैक्सीनेशन एवं मास्क वैकल्पिक होना चाहिए अनिवार्य नहीं। और चूंकि मतदाताओं का बहुमत लॉकडाउन के खिलाफ था, अत: यदि स्वास्थ्य मंत्री ये सिफारिश नहीं करता तो मतदाता स्वास्थ्य मंत्री को बदल सकते थे।
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सार यह है कि, इस क़ानून के आने से स्वास्थ्य मंत्री सीधे राज्य के मतदाताओं द्वारा नियंत्रित होगा, और इस वजह से स्वास्थ्य मंत्री जनहित में फैसले लेना शुरू करेगा। क्योंकि वोट वापसी आने के बाद वह जान जाएगा कि यदि उसने ‘अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता’ के ढर्रे पर काम किया तो नागरिक बहुमत का प्रयोग करके उसे मंत्री पद से निष्कासित कर देंगे और धनिक वर्ग उसकी रक्षा नहीं कर पायेगा।
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(B) इस कानून को लागू करवाने के लिए आप क्या कदम उठा सकते है ?
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(b1) आने वाली 5 तारीख को अपने राज्य के मुख्यमंत्री को एक खुला आदेश-पत्र भेजे। खुले आदेश पत्र के रूप में आप बुक पोस्ट, लेटर, अंतर्देशीय पत्र, या पोस्टकार्ड भी भेज सकते है। आदेश पत्र में में यह लिखे : मुख्यमंत्री जी, आपके लिए निर्देश है कि स्वास्थ्य मंत्री पर वोट वापसी लागू करें - #VvpHealthMin
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(b2) राजनैतिक दलों पर दबाव बनाने एवं कार्यकर्ताओ का ध्यान आकृष्ट करने के लिए चुनावो में भाग लेना सबसे महत्त्वपूर्ण है। अत: इस क़ानून की मांग आगे बढ़ाने के लिए इस मुद्दे पर अपने क्षेत्र से विधायक, सांसद, पार्षद, सरपंच आदि का चुनाव लड़े, या उन उम्मीदवारों को वोट करें जिन्होंने अपने एजेंडे में इस कानून को शामिल किया है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Aug 29 2021 11:51:26 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

RSS कार्यकर्ताओं का बजट-2020 अभिनेता गोविंदा ने सिर्फ 50 सेकंड में समझाया!!!

Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate:

RSS workers' budget-2021 explained by actor Govinda in just 50 seconds !!!
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I need someone to add a STATIC line at top 20% of the screen - "RSS workers' budget-2021" . Also, pls put link to any online video editor if you know

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Aug 29 2021 12:00:22 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Aug 29 2021 18:08:52 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Pawan Jury BhilwaraRj:

[**क्या मोदी भारत का प्रशासनिक विकास सिंगापुर की तर्ज़ पर करना चाहेंगे?**](<https://hi.quora.com/%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95>;)

[<http://www.newsindiatimes.com/modi-trying-his-best-to-become-indian-version-of-lee-kuan-yew-parag-khanna/>;](<http://www.newsindiatimes.com/modi-trying-his-best-to-become-indian-version-of-lee-kuan-yew-parag-khanna/>;)

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मेरा जवाब है - 100% !! LKY सिंगापुर के विकास पुरुष थे एवं सिंगापुर के कथित विकास के लिए उन्हें ही जिम्मेदार माना जाता है। और मोदी साहेब LKY की नीतियों पर LKY से भी तेज रफ़्तार से चल रहे है। किन्तु LKY की नीतियां क्या थी, और इससे सिंगापुर में क्या बदलाव आया, इस बारे में पेड मीडिया बिलकुल उल्टी तस्वीर पेश करता है।

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Lee Kuan Yew = LKY ने सिंगापुर की काया पलटने के लिए एक बेहद आसान रास्ता चुना — उसने देश ब्रिटिश के हवाले कर दिया !!!

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नतीजा ; 1960 में सिंगापुर में ईसाई आबादी सिर्फ 4% थी , जो अब बढ़कर 20% हो गयी है। इसके अलावा आज सिंगापुर की पूरी अर्थव्यवस्था ब्रिटिश , अमेरिकन और यूरोपियन कम्पनियों के नियंत्रण में है !!

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1920 के आसपास ब्रिटिश साम्राज्य ने अपना प्रभाव बढाने के लिए एक नए तरीके का इस्तेमाल करना शुरू किया। वे ऐसे नेताओं को प्रोत्साहन देने लगे जो बोलते तो ब्रिटिश के खिलाफ थे , लेकिन कार्य सभी ऐसे करते थे जिससे ब्रिटिश को फायदा हो। मोहन गांधी इस कैटेगरी में उनका सबसे बेहतर प्रोडक्ट था। उसकी भाषणबाजी ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ होती थी , अत: इसे सुनकर ब्रिटिश के खिलाफ लोगो में पनप रहा गुस्सा काफूर हो जाता था। लेकिन मोहन इस नौटंकी द्वारा क्रन्तिकारी युवाओं को बड़ी तेजी से नारेबाज एवं निरापद सामाजिक कार्यकर्ताओ में रूपांतरित कर रहा था।

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बाद में पेड मीडिया के माध्यम से इस तकनीक का इस्तेमाल उन नेताओं को उभारने में किया गया, जिनका ब्रिटिश जाहिर तौर पर छद्म विरोध करते थे, एवं अमुक नेता भी इस तरह से प्रदर्शित करता था कि वह ब्रिटिश-विरोधी नजर आये। लेकिन अमुक नेता उन नीतियों का समर्थन करता था, जिससे अमेरिकी-ब्रिटिश उद्योगपतियों को फायदा हो और स्थानीय उद्योग टूटते चले जाए। लेकिन इसे इस तरह रचा जाता था जिससे अवाम को यह लगे कि, अमेरिकी-ब्रिटिश हमारे नेता का प्रतिरोध कर रहे है , लेकिन इस प्रतिरोध के बावजूद हमारा नेता आगे बढ़ता जा रहा है !!!

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सिंगापुर का LKY = ली इसी श्रेणी का नेता था। उसके तेवर देखकर लगता था कि यह आदमी अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के खिलाफ है, और अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक भी कभी कभार उसके प्रति अपना रोष प्रकट करते थे। साथ ही अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक इस तरह का दिखावा करते थे, जिससे अवाम को यह लगे कि अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक 'ली' को तोडना चाहते है। लेकिन अमेरिकी-ब्रिटिश धनिको एवं 'ली' के बीच इस तरह का सुविधापूर्ण गठजोड़ था कि ये दोनों एक दुसरे को फायदा पहुंचाते थे !! और 'ली' ने पश्चिमी धनिकों के पक्ष में इस तरह की नीतियाँ बनायी कि पूरे सिंगापुर में स्थानीय उद्योगों का नाश हो गया !!

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सिंगापुर आज सिर्फ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं कारोबारियों का हेडक्वाटर बन कर रह गया है। सिंगापुर में किसी भी प्रकार की निर्माण इकाइयां नहीं है , हथियारों का निर्माण तो दूर की बात है। सिंगापुर की तुलना यदि इस्राएल से की जाये तो इस्राएल में निर्माण इकाइयों का मजबूत ढांचा मौजूद है , एवं अपने आधुनिक हथियारों का उत्पादन इस्राएल खुद करता है।

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LKY का कहना था कि -- वे सिंगापुर को इस्राएल बनाना चाहते है !!

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मतलब लफ्फाजी करने की एक हद होती है !! इस्राएल इतना शक्तिशाली है कि, भारत अपनी सेना इस्राएल के बने हथियारों पर चला रहा है, और सिंगापुर को बढ़िया क्वालिटी के कैपीसीटर भी बनाने नहीं आते है !!

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1960 के बाद सिंगापुर के इतिहास में मुख्य रूप से ध्यान देने योग्य बात यह है कि — आखिर क्यों मलेशिया व इंडोनेशिया सिंगापुर को आपस में आधा आधा बाँट लेने में सफल नहीं हुए थे ?

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वजह अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक थे। तब इंडोनेशिया एंव मलेशिया के नेताओं पर भी अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का पर्याप्त नियंत्रण था, और वे सिंगापुर को टेकओवर होने देना नहीं चाहते थे।

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बाद में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों एवं जापानियों का कारोबारी नियंत्रण एशिया में बढ़ गया। लेकिन इन सभी देशो में सैन्य विद्रोह और / या कम्युनिस्ट क्रांति की सम्भावना के चलते उन्हें एक सुरक्षित देश की तलाश थी। उन्होंने पहली प्राथमिकता सिंगापुर को दी। हांगकांग उनकी दूसरी पसंद था।

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'ली' ने सब कुछ आउटसोर्स कर लिया था — नीतियों से लेकर निष्पादन तक !! बदले में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने सिंगापुर शहर को उतने अच्छे से प्रबंधित किया, जितना पश्चिम में भी कोई शहर नहीं है।

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**तो इसमें दिक्कत क्या है ?**

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इस तरह के विकास के लिए मोटी कीमत चुकानी पड़ती है। पहला नुकसान यह है कि जब विदेशी पूँजी आती है तो वह स्थानीय धर्म को अपने धर्म से बदल देती है — *कोई दया नहीं , कोई अपवाद नहीं !!*

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भारत के ब्रांडेंड नेताओं के भगत विदेशी निवेश आने की ख़ुशी में सड़को पर इसीलिए नाच रहे है, क्योंकि वे इस कड़वे सत्य पर चर्चा से बचना चाहते है !! 1960 में जब 'ली' ने सत्ता सम्भाली थी तो सिंगापुर में इसाईयत सिर्फ 4% थी, जो कि अब बढ़कर 20% हो गई है !! यह वृद्धि दर भी तब है , जब ईसाई समुदाय में जन्म दर काफी निम्न रहती है। इस सम्बन्ध में और अधिक जानकारी के लिए गूगल करें।

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अगला नुकसान — अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियों ने स्थानीय निर्माण एवं हथियार निर्माण इकाइयों को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया।
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आज सिंगापुर बन्दुक नहीं बनाता , कारतूस नहीं बनाता और यहाँ तक कि वे 1 ग्राम गन पाउडर तक नहीं बनाते !! सिंगापुरियन कारे तो नहीं बनाते , लेकिन वे कारो के टायर तक नहीं बनाते !! वहां सभी प्रकार का बेहतरीन सामान उपलब्ध है — लेकिन यह सभी आयातित है !!

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गणित-विज्ञान एवं इंजनियरिंग की शिक्षा का स्तर वहां अच्छा है। लेकिन वास्तविक निर्माण इकाइयां न होने की वजह से यह शिक्षा सिर्फ पाठ्यक्रम एवं जबानी जमा खर्च तक ही सीमित है। वहां इसकी कोई व्यवहारिक उपयोगिता नहीं। क्योंकि सिर्फ निर्माण इकाइयों की आपसी प्रतिस्पर्धा ही इंजीनियरिंग के स्नातको को अपना हुनर तराशने का अवसर देती है। किताबी ज्ञान सिर्फ आभासी ज्ञान है। एक दुसरे का चमड़ा उधेड़ देने वाली वास्तविक प्रतिस्पर्धा में इंजीनियरिंग के स्नातको की क्षमता उस किशोर के समान है , जिसने ब्रूस ली की सभी फिल्मे दर्जनों बार देखी हो, लेकिन कभी रिंग में न उतरा हो।

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**तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने सिंगापुर को अधिगृहित करने बाद उनकी विज्ञान-गणित एवं इंजीनियरिंग की शिक्षा का कबाड़ा क्यों नहीं कर दिया ?**

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वजह - अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक सिंगापुर को समृद्ध होता दिखाना चाहते थे , वर्ना सिंगापुर के मलेशिया में विलय होने की मांग बढ़ जाती। लेकिन फिलिपिन्स के साथ ऐसी कोई शर्त नहीं थी, अत: अमरीकी-ब्रिटिश धनिकों ने फिलिपिन्स में विज्ञान-गणित की शिक्षा को बर्बाद कर दिया।

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उदाहरण के लिए, गोरो ने अपने ज्यादातर उपनिवेशों में 1885 के बाद पाठ्यक्रम में गणित-विज्ञान को शामिल करना शुरू कर दिया था। भारत में भी तब गणित-विज्ञान की पुस्तकें जोड़ी गयी। मैकाले की अनुशंसा के 50 साल बाद !! क्योंकि गोरो को हथियारों के उत्पादन की जरूरत थी।

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बाद में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गोरो ने भारत में हथियार निर्माण की बड़े पैमाने पर फैक्ट्रियां लगायी। तब गोरो को एक अतिरिक्त सप्लाई लाइन खोलने की जरूरत थी, ताकि इंग्लेंड की सप्लाई लाइन टूट जाए तो भारत से हथियार पहुंचाए जा सके। तो भारत में गणित-विज्ञान का जो बेहतर आधार था उसकी वजह ब्रिटिश थी। लेकिन 1990 में WTO एग्रीमेंट होने के साथ ही अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने भारत में प्रवेश करना शुरू किया, और तब से लगातार हमारे विज्ञान-गणित के पाठ्यक्रम को कमजोर किया जा रहा है।

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वे किस तरह भारत में गणित-विज्ञान का आधार कमजोर कर रहे है, इस बारे में यह जवाब पढ़ें - [Pawan Jury का जवाब - भारत हथियारों की इंजीनियरिंग में अमेरिका को कैसे पछाड़ सकता है?](<https://hi.quora.com/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%B9%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80/answers/128395434>;)

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अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने साउथ कोरिया में 1960 में प्रवेश किया था। तब कोरिया में ईसाई आबादी 4% थी, जो आज बढ़कर 40% हो गयी है !! लेकिन नार्थ कोरिया के साथ संभावित प्रतिरोध से निपटने के लिए अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने साऊथ कोरिया में निर्माण इकाईयो को बनाए रखा , परन्तु हथियार निर्माण इकाइयों को पूरी तरह से खत्म कर दिया था। साउथ कोरिया में भी आज जो निर्माण इकाईया है उन पर तथा उनकी समूची अर्थव्यस्था पर अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का नियंत्रण है।

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साउथ कोरिया को बेचने का काम PCH = Park Chung Hee ने किया था। 'ही' 1963 में सत्ता में आया और अगले दस वर्षो में उसने पूरा दक्षिण कोरिया अमेरिकी-ब्रिटिश के हवाले कर दिया था। रिपेट्रीएशन क्राइसिस की वजह से 1999 तक साउथ कोरिया 2 बार बैंक करप्ट हुआ और अमेरिकी-ब्रिटिश धनिको ने उनकी सारी राष्ट्रिय सम्पतियों एवं सरकारी भूमि का अधिग्रहण कर लिया था।

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तो जैसे ही अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक मलेशिया को ख़त्म करने में सफल होंगे , जो कि वे चाइना को कमजोर करने के बाद ही कर सकेंगे, वैसे ही सिंगापुर को वे फिलिपिन्स में रूपांतिरत कर देंगे। और तब सिंगापुर किसी भी तरह अपनी अर्थव्यवस्था बचा नहीं सकेगा , क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था पर आज भी उनका नियंत्रण नहीं है।

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मोदी साहेब LKY एवं PCH की तर्ज पर ही काम कर रहे है। आप देख सकते है कि, वे बेहद तेजी से भारत की अर्थव्यवस्था अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियों के हवाले कर रहे है। तो अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक भारत पर पूर्ण नियंत्रण बनाने के बाद भारत का इस्तेमाल चीन को तोड़ने में करेंगे। यदि चीन से भारत का युद्ध का होता है, तो भारत का इराकीकरण हो जाएगा और यदि युद्ध टल जाता है तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत को एक विशाल फिलिपिन्स में बदल देगी। एक विशाल फिलिपिन्स में बदल जाने का क्या आशय है, इस बारे में मैंने ऍफ़ डी आई से सम्बंधित अपने कई जवाबो में लिखा है।

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**कैसे अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का नियंत्रण भारत पर बढ़ता जा रहा है ?**

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कम्युनिकेशन यानी संचार के साधनों पर अमेरिकी पूरी तरह से नियंत्रण बना चुके है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया एवं सोशल मीडिया पर उनका 100% नियंत्रण है। हालात यह है कि भारतीय सेना के उच्च अधिकारी अपने सैन्य कम्युनिकेशन के लिए भी व्हाट्स एप का इस्तेमाल कर रहे है। कोमकासा एग्रीमेंट के बाद भारत की सभी सैन्य गतिविधियों के बारे में अमेरिका की सेना को पूर्व सूचना रहती है, और उन्हें अद्यतन सूचनाएं भी मिलती रहती है।

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हमारी सेना में अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच हथियारो का हिस्सा बढ़ता जा रहा है, और हम इनके स्पेयर पार्ट्स के लिए अमेरिकीयों पर निर्भर रहेंगे। जब युद्ध होता है पूरा युद्ध संचार साधनों की गोपनीयता पर निर्भर करता है। हमारे पूरे संचार साधनों पर अमेरिका को हमसे ज्यादा एक्सेस मिला हुआ है। और हम अमेरिकी हथियारों पर अपनी सेना चला रहे है।

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अभी मोदी साहेब ने भारत सरकार की जमीनों को अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों को बेचना शुरु किया है। यह काफी गंभीर विषय है। कृपया इस बात पर ध्यान दें कि सरकार की असीमित शक्ति का स्त्रोत जमीनों का स्वामित्व है। यदि सरकार के पास से जमीन निकल जाए तो सरकार के हाथ से अर्थव्यवस्था का नियंत्रण भी निकल जाएगा। किन्तु जिस गति से PSU बेचे जा रहे है, जल्दी ही भारत सरकार कंगाल हो जायेगी। क्योंकि असली ताकत जमीनों के स्वामित्व से आती है, कागज के नोटों से नहीं। हमारे बैंक भी तेजी से उनके कब्जे में जा रहे है। एक बार जब अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक बैंको, जमीनों, खदानों पर स्वामित्व बना लेंगे तो वे भारत में भारत सरकार से भी ज्यादा ताकतवर हो जायेंगे।

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आप पेड मीडिया में विनिवेश के नाम पर जितनी भी खबरें पढ़ते-देखते है, दरअसल यह जमीनों की बिकवाली है। जब वे कोई PSU बेचते है तो इसमें मुख्य भाग जमीनों का होता है, और इसे अंडर वैल्यू करके दिखाया जाता है। उदाहरण के लिए मान लीजिये कि एक कम्पनी कोई PSU जैसे कोल इण्डिया वगेरह 10,000 करोड़ में खरीदती है तो उन्हें 50,000 करोड़ की जमीन मुफ्त में मिल जाती है। क्योंकि कोल इण्डिया के स्वामित्व में 50 हजार करोड़ की जमीन है।

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इस जमीन को कोल इण्डिया के लेखो में अंडर वैल्यू करके दिखाया जाता है, और इसे मीडिया में रिपोर्ट भी नहीं किया जाता। इस तरह जितनी भी संस्थाएं बेचीं जा रही है, उनके पास किलोमीटरो के हिसाब से जमीन है, और यह सारी जमीन विदेशियों के कब्जे में जा रही है। दुसरे शब्दों में, वे संस्थाएं नहीं, बल्कि जमीने बेच रहे है।

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मैंने लोकसभा चुनावों से पहले एक जवाब में लिखा था कि, जो भी पीएम बनेगा वह भारत की सभी राष्ट्रिय संपत्तियां, सार्वजनिक उपक्रम, खदाने, प्राकृतिक संसाधन, कीमती जमीने और आवश्यक सेवाएं प्रदाय करने वाली सरकारी संस्थाएं विदेशियों को बेच देगा। यह जवाब आप यहाँ पढ़ सकते है - [Pawan Jury का जवाब - अगर २०१९ में मोदी जी फिर प्र.म. बनते हैं तो पाँच सालों मे आगे क्या काम कर सकते है?](<https://hi.quora.com/%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A4%B0-%E0%A5%A8%E0%A5%A6%E0%A5%A7%E0%A5%AF-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%AE/answers/142592952>;)

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जिस स्पीड से अभी मोदी साहेब देश की संपत्तियां बेच रहे है, यह बात बिलकुल ठीक है कि वे LKY एवं PCH की तर्ज पर ही काम कर रहे है। बल्कि मैं कहूँगा कि मोदी साहेब इन दोनों से ज्यादा रफ़्तार से यह बेचान कर रहे है !!

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निचे मैंने कुछ न्यूज लिंक रखे है, जो बताते है कि मोदी साहेब किस रफ़्तार से बढ़ रहे है।

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(1)

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> नीति आयोग ने बेचने के लिए एनटीपीसी, सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, भारत अर्थ मूवर्स और सेल सहित सरकारी कंपनियों की जमीन और इंडस्ट्रियल प्लांट्स जैसी 50 संपत्तियों की पहचान की है। एक अधिकारी ने बताया कि नीति आयोग ने डिपार्टमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट ऐंड पब्लिक ऐसेट मैनेजमेंट (दीपम) को एक लिस्ट भेजी है। उन्होंने कहा, 'हम इन संपत्तियों को बेचने की तैयारी कर रहे हैं।

[assets monetisation: नीति आयोग ने बेचने के लिए बनाई 50 सरकारी संपत्तियों की लिस्ट - niti aayog readies list of over 50 central government's assets for sale | Navbharat Times](<https://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/niti-aayog-readies-list-of-over-50-central-governments-assets-for-sale/articleshow/69690958.cms>;)

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(2)

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> सरकार चुनिंदा सार्वजनिक उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से नीचे लाने की भी योजना बना रही है। अधिकारी ने कहा कि सरकार की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से नीचे लाने के लिए कानून में कुछ संशोधन करने की जरूरत होगी। साथ ही इससे यह भी सुनिश्चित किया जा सकेगा कि ये कंपनियां केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) और नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के नियंत्रण दायरे से बाहर आ सकें।
> अधिकारी ने कहा कि इस तरह का कदम संभव है। इसके लिए कंपनी कानून की धारा 241 में संशोधन करने की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि अगले तीन-चार साल में सरकार की शीर्ष प्राथमिकता निजीकरण की है। उन्होंने कहा, ''इसके लिए हमें प्रधानमंत्री का पूरा समर्थन है।
उस समर्थन के जरिये मुझे पूरा भरोसा है कि जो भी बिक सकता है उसे बेचा जाएगा। जो नहीं बिकने योग्य है उसे भी बेचने का प्रयास किया जाएगा।'' अधिकारी ने यह भी माना कि इस मामले में विभिन्न पक्षों द्वारा अवरोध खड़े किये जायेंगे लेकिन सरकार ने अपना मन बना लिया है।

['जो भी बिक सकता है बेचेगी सरकार, चुनिंदा सार्वजनिक उपक्रमों में हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से नीचे लाएगी' - Lokmat News Hindi | DailyHunt](<https://m.dailyhunt.in/news/india/hindi/lokmat+news+hindi-epaper-lokmhin/jo+bhi+bik+sakata+hai+bechegi+sarakar+chuninda+sarvajanik+upakramo+me+hissedari+51+pratishat+se+niche+laegi-newsid-139313268?s=a&ss=pd>;)

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[गोला बारूद फैक्ट्रियों को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाने की तैयारी में मोदी सरकार](<https://www.jansatta.com/national/defence-ministry-likely-to-seek-the-nod-of-cabinet-committee-on-security-ccs-to-set-up-an-empowered-group-of-ministers-egom-to-convert-41-ordnance-factories-into-corporates/1105398/?fbclid=IwAR1MG5K_3OA_RZBBRYIcCcW1xG3ijKezQuWN_LKtZAeYwATeHIAL50AHxKA>;)

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(3)

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> एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई) के चेयरमैन गुरुप्रसाद महापात्रा ने शुक्रवार को कहा कि देश के 6 हवाई अड्डों के निजीकरण के बाद सरकार जल्द इसका दूसरा चरण शुरू करने जा रही है। उन्होंने कहा कि अगले चरण में देश के 20-25 हवाई अड्डों का निजीकरण किया जाएगा।

[अगले चरण में 20-25 हवाई अड्डों का होगा निजीकरण: एएआई चेयरमैन](<https://money.bhaskar.com/news/MON-INDU-COMP-government-to-privatise-20-25-airports-in-next-phase-aai-chairman-1564141817.html?fbclid=IwAR3IvbQxhySlxmIT8fPoD3Bn93gEoQjRGPp1AcSWPCtdT4GHXkbvY2_xNTM>;)

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(4)

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> बैलाडीला के डिपाजिट 13 में 315.813 हेक्टेयर रकबे में लौह अयस्क खनन के लिए वन विभाग ने वर्ष 2015 में पर्यावरण क्लियरेंस दिया है। जिस पर एनएमडीसी और राज्य सरकार की सीएमडीसी को संयुक्त रूप से उत्खनन कार्य करना था। इसके लिए राज्य व केंद्र सरकार के बीच हुए करार के तहत संयुक्त उपक्रम एनसीएल का गठन किया गया था, लेकिन बाद में इसे निजी कंपनी अडानी एंटरप्राइजेस लिमिटेड को 25 साल के लिए लीज हस्तांतरित कर दिया गया। डिपाजिट 13 के 315.813 हेक्टेयर रकबे में 250 मिलियन टन लौह अयस्क होने का पता जांच में लगा है। इस अयस्क में 65 से 70 फीसदी आयरन की मात्रा पायी जाती है

[बस्तर : बैलाडीला की 13 खदान अडानी को बेचने पर पचास हजार आदिवासी विरोध करने के लिए घरों से निकले; आज से अनिश्चितकालीन धरना शुरू](<http://sangharshsamvad.org/tribals-are-protesting-for-bailadila-mine-to-hand-over-to-adani-group-in-chhattisgarh/?fbclid=IwAR0Gn2ScaXAOVqDqp2XSt4BX1OtzPmpBflXDDBdoAcmq0JfYp5V6Al_T22s>;)

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(5)

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> सरकार अब मुनाफा कमाने वाली सरकारी कंपनियों के निजीकरण पर विचार कर सकती है। इससे पहले घाटे में चल रहे सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (CPSE) को ही विनिवेश करने की नीति रही है। एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि सरकार नीति आयोग से ऐसी नॉन-स्ट्रैटिजिक प्रॉफिटेबल कंपनियों की लिस्ट बनाने को कह सकती है, जिनका निजीकरण किया जा सके।

[Business News: प्राइवेट सेक्टर के हाथ बेची जाएंगी मुनाफे में चल रहीं सरकारी कंपनियां! - big shift in disinvestment policy: plan to privatise profitable cpses in works | Navbharat Times](<https://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/big-shift-in-disinvestment-policy-plan-to-privatise-profitable-cpses-in-works/articleshow/69733724.cms?fbclid=IwAR08K24zc0qXB-_nb06olTxj-qX8orU_yvm2qhNqNUSquhwl4oR2RG6KBIs>;)

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मैंने मई 2019 के बाद की ये कुछ ख़बरें रखी है। ज्यादा लिंक डालने से जवाब स्पैम हो जाएगा, अत: मैं उन्हें यहाँ रख नहीं रहा हूँ। और अधिक जानकारी के लिए आप गूगल कर सकते है। पढ़ते पढ़ते थक जायेंगे, पर खबरें ख़त्म नहीं होगी।

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**समाधान ?**

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मैं भारत की सेना एवं अर्थव्यवस्था को अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच कंपनियों के हवाले करने के सख्त खिलाफ हूँ। भारत में ब्रांडेड नेताओं को फोलो करने वाले कार्यकर्ता इस "विकास" की ख़ुशी में छतों से छज्जो पर इसीलिए छलांगे लगा रहे है क्योंकि वे दो तथ्यों से अनजान है :

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* उन्हें नहीं पता कि अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियों पर निर्भरता का क्या परिणाम होता है, और कितने देश इसे भुगत रहे है।
* उन्हें यह जानकारी नहीं है कि अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियां तकनीक के क्षेत्र में इसीलिए आगे निकल गयी क्योंकि उन देशो में बेहतर क़ानून व्यवस्थाएं है।

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मेरा मानना है कि यदि भारत के कार्यकर्ताओ को इन दो तथ्यों के बारे में सटीक जानकारी मिल जाए तो वे उधार की इस समृद्धि का विरोध करना शुरू कर देंगे।

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(1) एफडीआई के साइड इफेक्ट्स जानने के बारे में यह जवाब पढ़ें - [Pawan Jury का जवाब - प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति क्यों दी जाती है? इससे हमें क्या फायदे और नुकसान होंगे?](<https://hi.quora.com/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%B6-FDI-%E0%A4%95%E0%A5%80/answers/124760141>;)

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(2) किन कानूनों की वजह से अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियां अन्य देशो की कम्पनियों की तुलना में आगे निकल गयी इस बारे में कृपया यह जवाब पढ़ें - [Pawan Jury का जवाब - भारत क्यों अमेरिका से पीछे हैं?](<https://hi.quora.com/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%80%E0%A4%9B%E0%A5%87/answers/178397074>;)

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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Aug 30 2021 13:36:14 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Pawan Jury BhilwaraRj:

## [**अर्थशास्त्र क्या है?**](<https://hi.quora.com/%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88>;)

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अर्थशास्त्र में दो चीजे शामिल होती है
1. सरकार द्वारा पैसा इकट्ठा करने के तरीके, और
1. सरकार द्वारा पैसा खर्च करने के तरीके

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सारा अर्थशास्त्र अंततोगत्वा इन दो तरीको का विवरण है। अर्थशास्त्र के सभी विचारो, धारणाओ, नीतियों, सिद्धांतो आदि का अध्ययन इस नतीजे पर पहुँचने के लिए किया जाता है कि, सरकार पैसा किधर से लाएगी और कहाँ खर्च करेगी। ज्यादातर से भी ज्यादातर आर्थिक विशेषग्य अपनी पूरी जिन्दगी अर्थशास्त्र के सिद्धांतो पर ही जुगाली करते है, और इस नतीजे पर स्पष्ट रूप से कभी नहीं पहुंचना चाहते कि, पैसा इकट्ठा करने का तरीका क्या होना चाहिए।

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खंड - अ
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**(1) पैसा इकट्ठा करना : **यहाँ पैसा इकट्ठा करने में 2 मदें शामिल है। आंतरिक लेनदेन करने के लिए सरकार को रुपया चाहिए, और अंतराष्ट्रीय लेन देन के लिए डॉलर।

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**1.1. रुपया :** रूपये लाने के लिए सरकार टेक्स लगाती है। अत: आधा अर्थशास्त्र यह तय करना है कि, किस चीज पर कितना टेक्स लगाना है। बस, ये इतना ही है। सरकार की आर्थिक निति जो भी हो उससे देश की अर्थव्यवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

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सिर्फ एक चीज से फर्क पड़ता है कि — सरकार किस चीज पर कितना टेक्स डाल रही है। और भी स्पष्ट शब्दों कहे तो, सरकार रुपया किधर से इकठ्ठा कर रही है !! क्योंकि रुपया इकट्ठा करने का सरकार के पास एक मात्र सही रास्ता है – टेक्स लगाना

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**1.1.1. टेक्स लगाना एक मात्र सही रास्ता क्यों है ?**

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क्योंकि टेक्स सरकार की आय है। सरकार को निरंतर काम करते रहने के लिए अपने कर्मचारियों को भुगतान करना है, और सालाना खर्चे निकालने है। अत: सरकार को फंक्शन करने के लिए निरंतर पैसा चाहिए। टेक्स डालना इसी तरह का मेथड है। टेक्स का ढांचा यह तय करता है, सरकार अमुक टेक्स से हर महीने / साल कितना रुपया इकट्ठा कर लेगी, ताकि सरकार फंक्शन करती रहे।

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यदि पैसा पूरा नहीं पड़ रहा है तो, सरकार के पास 2 रास्ते है –
* या तो वह टेक्स बढ़ा देगी, या
* खर्चो में कटौती करेगी।

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लेकिन यदि सरकार पैसे की कमी पूरी करने के लिए सरकारी संपत्तियां बेचना शुरू करती है तो अर्थशास्त्र के हिसाब से ऐसा कोई रास्ता नहीं होता है। मतलब प्राचीन काल से लेकर आज तक दुनिया की किसी भी किताब में आपको यह लाइन लिखी हुयी नहीं मिलेगी कि, यदि सरकार के पास पैसा नहीं हो तो उसे अपनी राष्ट्रीय संपत्तियां बेचकर पैसा लाना चाहिए। यह इसी तरह की बात है कि, आप अपने घर की बिजली का बिल जमा करने के लिए घर के बर्तन बेचना शुरू करें।

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**1.1.2. देश की अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका :**

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देश में करोड़ो उपभोक्ता है, लाखो फैक्ट्रियां, लाखों होलसेलर, लाखों रिटेलर, ट्रांसपोर्टर है और ये सभी लोगो कुछ न कुछ बना रहे है, कुछ बेच रहे है, कुछ खरीद रहे है और प्रत्येक दिन करोड़ो लेन देन कर रहे है। लोग प्रवृत नियमो के अधीन रहते हुए सेवाओं / वस्तुओ को बनाते, बेचते, खरीदते, उपभोग करते है, और इससे अर्थव्यवस्था खुद ब खुद चलती रहती है। लोग सरकार से पूछने नहीं जाते कि हम क्या बनाएं, क्या बेचे, क्या खरीदें।

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तो इन सभी लोगो का एवं इनके लेनदेन का सरकार से अब तक कोई सरोकार नहीं है। किन्तु जैसे ही सरकार आकर बताती है कि हम अमुक वस्तु के लेनदेन पर इतना टेक्स लगाने वाले है, बस उसी बिंदु से सरकार का अर्थव्यवस्था से सरोकार शुरू होता है। हम किसी एक प्रोडक्ट जैसे मोबाईल फोन से इसे समझते है। यदि कोई व्यक्ति मोबाइल फोन से सम्बंधित कोई भी विनिमय करता है तो उसे निम्नलिखित सूचनाएं एवं जवाब चाहिए :

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* भारत में मोबाईल फोन बनाने वाले को क्या कोई कर चुकाना होता है ?
उत्तर : हाँ
* मोबाईल पर कौनसा टेक्स है ?
जीएसटी
* मोबाईल के लिए जीएसटी की दर क्या है ?
12%
* टेक्स जमा करने की जिम्मेदारी किसकी है ?
बेचने / बनाने वाले की
* क्या कोई रिटर्न भरने पड़ेंगे ?
हाँ, जितना टेक्स बन रहा है उसके हिसाब से मंथली / त्रेमासिक रिटर्न भरना है।
* मोबाइल एवं इसके पुरजो को इम्पोर्ट करने पर टेक्स कितना है ?
15%
* एक्सपोर्ट पर ड्यूटी कितनी है ?
2%
* मैं एक मोबाइल फोन खरीदता हूँ तो सरकार को टेक्स कितना देना पड़ेगा
12%

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बस इसी तरह से सरकार को एक्साइज ड्यूटी, आयकर, प्रोपर्टी टेक्स, चुंगी आदि के बारे में तय करना होता है।

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अब मान लीजिये कि राजनैतिक पार्टीयां X , Y एवं Z है। X पूंजीवादी विचारधारा में मानती है, Y समाजवादी है, और Z मार्क्सवादी है। लेकिन तीनो के शासनकाल में यदि ऊपर दिए गए सवालों के जवाब समान है तो मोबाईल फोन खरीदने वालो, बनाने वालो और इसका कारोबार करने वालो पर सत्ता परिवर्तन का क्या असर आएगा ? शून्य !! और मोबाईल की अर्थव्यवस्था पर सत्ता परिवर्तन कितना प्रभावित करेगा ? लगभग नगण्य !! यदि अन्य पहलू मोबाईल की इकॉनोमी को प्रभावित कर रहे है तो वे आर्थिक कारण नहीं है । क्योंकि सभी आर्थिक परिवर्तन अल्टीमेटली टेक्स सिस्टम के माध्यम से ही लागू होंगे।

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दुसरे शब्दों में सरकार देश की आर्थिक नीति को कितना भी डिस्कस कर ले, अंत में उसे यह तय करना होता है कि,
1. किस चीज पर टेक्स डालना है, किस पर नहीं डालना है ,
1. किस चीज पर ज्यादा टेक्स डालना है, किस पर कम डालना है
1. टेक्स इकट्ठा करने का सिस्टम क्या बनाना है ,
1. कोई टेक्स चोरी करे तो दंड क्या देना है , आदि ।

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जब सरकार ऊपर दिए सवालों के जवाब तय कर लेती है तो इसे गेजेट में छाप देती है। मतलब, मान लीजिये कि मोबाइल फोन पर इम्पोर्ट ड्यूटी 4% है, और सरकार यह तय करती है इम्पोर्ट ड्यूटी घटाकर 1% करनी है तो वित्त मंत्री गेजेट में यह लाइन छाप देगा। और गेजेट में आने के साथ ही इम्पोर्ट ड्यूटी 1% हो जायेगी।

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अब इस बात का कोई महत्त्व नहीं है कि, कैबिनेट ने यह फैसला करने के लिए 1000 घंटे डिस्कस किया या 500 घंटे। काम की बात यह है कि सरकार ने गेजेट में छापा है कि हम मोबाइल पर अब से 1% ड्यूटी लेंगे। बस !!

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अब मान लीजिये कि, देश में मंदी चल रही है या बेरोजगारी है तो सरकार इस पर कितना भी विचार करे लेकिन अंत में अर्थ मंत्री सिर्फ यह तय कर सकता है कि, मैं किस चीज पर कौनसा टेक्स डाल दूं या ख़त्म कर दूं कि बेरोजगारी की समस्या कम हो।

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लेकिन सिर्फ तय करने या फैसला लेने से कुछ होता है। क्योंकि सरकार ने जो भी तय किया है उसे लागू करने के लिए इसे गेजेट में निकालना पड़ता है। अत: अंत में अर्थ मंत्री को कागज पर वह इबारत लिखनी पड़ती है, जो उसे गेजेट में छापनी है। तो अर्थशास्त्र की सारी डिबेट, सलाह, मशविरे करने के बाद अंत में आपके हाथ में एक या कई कागज होते है जिन्हें गेजेट में छापा जाएगा।

**.**

**1.2. डॉलर : **अंतराष्ट्रीय लेन देन के लिए सरकार को डॉलर चाहिए। यदि सरकार ने इस तरह का टेक्स सिस्टम डाला है कि लोग कम कीमत में सामान बनाकर अन्य देशो में बेच नहीं पा रहे है, तो निर्यात गिरने और आयात बढ़ने लगता है। निर्यात गिरने से सरकार के पास डॉलर की कमी हो जाती है।

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अब सरकार को डॉलर की कमी पूरी करनी है। कृपया इस बात पर ध्यान दें कि, डॉलर टेक्स लगाकर नहीं लाया जा सकता। डॉलर लाने का सिर्फ एक तरीका निर्यात करना है। और निर्यात सिर्फ तब हो सकता है, जब आपके देश में बड़े पैमाने पर फैक्ट्रियां हो और फैक्ट्रियां ऐसी चीजो का उत्पादन करें जो सस्ती भी हो, और बेहतर भी। यदि देश सस्ती और अच्छी चीजो का उत्पादन नहीं कर पा रहा है , तो देश का निर्यात गिरता जाएगा और सरकार पर विदेशी मुद्रा संकट या डॉलर संकट आ जाएगा।

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**1.2.1. डॉलर इकट्ठा करने के तरीके क्या है ?**

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निर्यात के अलावा सरकार किसी भी तरीके से डॉलर नहीं कमा सकती। निर्यात के अलावा सरकार डॉलर जुटाने के लिए जो भी तरीके अपनाती है उन्हें तिकड़मे कहा जाता है। तिकड़म इसीलिए, क्योंकि निर्यात के अलावा डॉलर जुटाने के शेष सभी तरीको में देश को काफी नुकसान उठाना पड़ता है। और इस नुकसान को छुपाने के लिए सरकारें नागरिको से 50 झूठ बोलती है। ( निर्यात के अलावा कुछ फुटकर डॉलर पर्यटन आदि से भी आती है। पर सिर्फ सिटी कंट्री ही इस पर निर्भर हो सकती है।)

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सलंग्न चित्र में भारत के पिछले 10 वर्षो के व्यापार घाटे का चार्ट है । कम्प्लीट लोस !! एक भी वर्ष नहीं जिसमें भारत ने कमाई की हो। हर वर्ष आयात ज्यादा और निर्यात कम। पिछले 30 वर्षो का भी हिसाब किताब ऐसा ही है। मतलब पिछले सभी 30 वर्षो में हर वर्ष निर्यात कम और आयात ज्यादा !! और पिछले 70 वर्षो का भी यही हिसाब है !! अधिक जानकारी के लिए गूगल करें ।

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**1.2.2. सरकार की आर्थिक नीति यानी कि टेक्स प्रणाली का आकलन कैसे करें :**

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पहली बात तो आपको यह अच्छी तरह से समझ लेनी है कि, सरकार की आर्थिक नीति जो कुछ भी हो उसका अंतिम नतीजा टेक्स सिस्टम है। अत: सरकार द्वारा लगाए गए टेक्स सिस्टम को देखें। थोडा लॉजिकल तरीका यह है कि, आप टेक्स क़ानून पढ़े, और यह देखे कि अमुक टेक्स सिस्टम से देश का निर्यात बढेगा या नहीं।

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यदि आप टेक्स सिस्टम नहीं समझना चाहते तो सीधे निर्यात के आंकड़े देख लीजिये। यदि निर्यात गिर रहा है तो समझ लीजिये कि कुल मिलाकर सरकार देश की बैंड बजा रही है। हालांकि, आप यदि पेड मीडिया से नियमित रूप से फीडिंग लेते है, पेड अर्थशास्त्रियों के कॉलम वगेरह पढ़ते है, और उनकी पेड डिबेट देखने के आदि है तो आपको यह नजर नहीं आएगा।

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तो जब सरकार बदतर कर प्रणाली डालती है तो निर्यात गिरने लगता है, और सरकार के सामने डॉलर संकट खड़ा हो जाता है। और अब सरकार डॉलर जुटाने के लिए नयी नयी तिकड़मे लगानी होती है।

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**1.2.3. सरकारें डॉलर इकट्ठा करने के लिए सरकार किन तरीको का इस्तेमाल करती है ?**

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* **कर्जे लेना : **समस्या यह है कि विश्व बैंक एवं आई एम् ऍफ़ कर्जे देने से पहले ऐसी शर्ते लगाते से जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर विदेशियों का नियंत्रण बढ़ जाता है। तो जब हम कर्जा लाते है तो नीतियाँ बनाने की स्वतंत्रता में कटौती कर लेते है !!
* **विदेशी निवेश :** जब कर्जे मिलने बंद हो जाते है, तो वे विदेशियों को भारत में पूँजी लगाने के लिए कहा जाता है। जब विदेशी पूँजी लेकर आते है तो सरकार के पास उतनी मात्र में डॉलर आ जाते है।
समस्या : पूंजीगत विदेशी निवेश एक प्रकार का दायित्व है, और रिपेट्रीएशन क्राइसिस जनरेट करता है। मतलब विदेशी कम्पनी भारत में जितना भी मुनाफा रुपयों में कमाती है, हमें उसके बदले डॉलर देना पड़ता है। इस तरह विदेशी कम्पनी 10 करोड़ डॉलर का निवेश करके कुछ ही वर्षो में मुनाफ कमाकर 20 करोड़ डॉलर कर लेती है, और अब हमें दोगुने डॉलर चुकाने पड़ते है। भारत इस समय इसी शिकंजे में है। मतलब डॉलर लाने का यह तरीका डॉलर संकट को और भी बढ़ा देता है !! रिपेट्रीएशन क्राइसिस ऐसा शब्द है जिससे सभी पेड अर्थशास्त्री अत्यंत घृणा करते है। आप उनके सामने इस शब्द का इस्तेमाल कर देंगे तो आइन्दा वे आपसे अर्थव्यवस्था डिस्कस करने में कभी रुचि नहीं दिखाएँगे।
* **विनिवेश :** जब और विदेशी निवेश आना बंद हो जाता है तो सरकार देश की राष्ट्रिय संपत्तियां विदेशियों को बेचकर डॉलर इकट्ठा करना शुरू कर देती है। राष्ट्रीय संपत्तियां यानी कि आवश्यक सेवाएं देने वाले सार्वजनिक उपक्रम, प्राकृतिक संसाधन, माइंस , खनिज, जमीने आदि।

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तो अर्थशास्त्र की समझ का **सार** इस तरह से है :

सरकार रुपया इकठ्ठा करने के लिए टेक्स लगाती है। अत: अर्थशास्त्र समझने के लिए आपको यह देखना चाहिए कि सरकार का टेक्स का ढांचा किस तरह का है। यदि करो का ढांचा औचित्यपूर्ण नहीं है तो फैक्ट्रिया लगाना कठिन होता जायेगा, लागत बढ़ेगी और उत्पादन गिरने लगेगा। उत्पादन घटने से आयात बढेगा और निर्यात गिरेगा। और जब निर्यात गिरेगा तो सरकार के सामने डॉलर की कमी होगी, और वे फर्स्ट राउंड में कर्जे लेंगे, सेकेण्ड राउंड में विदेशियों को बुलाकर पूँजी लगाने को कहेंगे, थर्ड राउंड में राष्ट्रिय संपत्तियों को बेचना शुरू कर देंगे, और जब सभी राष्ट्रिय संपतियां बिक जायेगी तो टाट उलट देंगे !!

*( कृपया ऊपर दिए गए सार को फिर से पढ़ें )*

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**(1a) आर्थिक विशेषज्ञों की पुस्तकों, लेख, कॉलम, मशविरो आदि के बारे में :**

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सभी अर्थशास्त्री पेड अर्थशास्त्री होते है। जिस पेड अर्थशास्त्री को कोई पुरुस्कार मिल जाता है, वह सर्टिफाइड पेड अर्थशास्त्री हो जाता है। उदाहरण के लिए चूंकि पेड अभिजीत बनर्जी अर्थशास्त्री है, अत: वे पेड अर्थशास्त्री है। और अभिजित बनर्जी को नोबेल भी मिल चुका है, अत: ये सर्टिफाइड पेड इकोनॉमिस्ट है। इनके डबल पेड लगाना चाहिए। मतलब - पेड अभिजित पेड बनर्जी !!

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जब भी कोई अर्थशास्त्री कुछ अभिव्यक्त करता है तो यह उसकी अपनी राय नहीं होती। बल्कि यह वह राय होती है, जिसके लिए उसे भुगतान किया गया है। चूंकि आर्थिक विशेषग्यों एवं अर्थशास्त्रीयों को भुगतान धनिक वर्ग द्वारा किया जाता है, अत: सभी पेड अर्थशास्त्री ऐसी कर प्रणाली का समर्थन करते है जिससे धनिक वर्ग को अतिरिक्त मुनाफा हो।

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इसके अलावा पेड आर्थिक विशेषज्ञों का मुख्य धंधा नागरिको का समय चूसना और उन्हें अर्थशास्त्र के नाम पर फालतू की बहस में अंगेज करके रखना है। मूलत: ये लोग टाइम वेस्टर है, जो अर्थशास्त्र के नाम पर नागरिको का बड़े पैमाने पर समय बर्बाद करने के लिए कच्चा माल उपलब्ध करवाते है । अत: मेरा मानना है कि, जब भी अर्थशास्त्र पर विचार किया जाए तो "अर्थशास्त्री" वह व्यक्ति है जिसे कभी नहीं सुना जाना चाहिए।

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**(1a.1)** यदि कोई पेड अर्थशास्त्री या पेड आर्थिक विशेषग्य आर्थिक नीतियों पर बहस चला रहा है या आर्थिक नीतियों पर मशविरे प्रसारित कर रहा है तो उसे एक्सपोज करने के लिए आप उससे निचे दिए गए तरीके से पेश आ सकते है :

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1. यदि कोई पेड अर्थशास्त्री कहता है कि – भारत की अर्थव्यस्था बुरे दौर से गुजर रही है तो उससे पूछिए कि, क्या आप मुझे वह इबारत लिखकर दे सकते है जिसे गेजेट में छापने से अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा ?
1. यदि कोई पेड अर्थशास्त्री कहता है कि – भारत में बेरोजगारी बढ़ रही है तो उससे पूछिए कि, क्या आप मुझे वह इबारत लिखकर दे सकते है जिसे गेजेट में छापने से बेरोजगारी में कमी आएगी ?

( पेड रविश कुमार को भी आर्थिक मंदी, बेरोजगारी आदि पर बहस करने का काफी शौक है, और वे अपने स्टूडियो में चंगुओ-मंगुओ को बिठाकर बहुत सीरियस बहस करते रहते है। आप चाहे तो उन्हें मेल करके पूछ सकते है कि, हमने बेरोजगारी पर आपके सभी एपिसोड देख लिए है, फिर भी बेरोजगारी कम नहीं हो रही है !! अत: आपके पेड आर्थिक विशेषज्ञों को फुर्सत मिले तो उनसे कहो कि हमें वो इबारत उपलब्ध करवाए जिसे गेजेट में छापने से बेरोजगारी कम की जा सकती है !!)
1. यदि अर्थशास्त्री कहता है कि – जीएसटी की वजह से मंदी आ गयी है तो उससे पूछिए कि, क्या आप बता सकते है कि जीएसटी की कौनसी धाराएं मंदी के लिए जिम्मेदार है, और क्या आप मुझे वे धाराएं लिखकर दे सकते है जिन्हें अमुक धाराओं से बदला जा सकता है ?
1. आर्थिक विशेषग्य से पूछिए की, क्या वह ऐसी इबारत लिखकर दे सकता है, जिसे गेजेट में छापने से भारत का निर्यात बढेगा ?
1. यदि कोई आर्थिक विशेषग्य गिरती हुयी जीडीपी पर डायलॉग मार रहा है तो उससे कहिये कि जीडीपी क्यों गिर रही वो बात मुझे पता है, लेकिन जीडीपी को बढ़ाना कैसे है वो मुझे पता नहीं है । तो क्या आप लिखकर दे सकते है कि, जीडीपी बढाने के लिए सरकार को गेजेट में क्या छापना चाहिए ?

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आप देखेंगे कि, वे आपको पूरी जिन्दगी लटकाए रखेंगे लेकिन उपरोक्त प्रश्नों के जवाब नहीं देंगे। वे टीवी पर आकर पंचायत करेंगे, अखबारों में दुनिया भर के मशविरे देंगे, 500 पेज की पुस्तकें लिखेंगे, और न जाने किस किस तरह के विश्लेषण करेंगे, लेकिन वे कभी भी आपको एक पेज भी लिखकर नहीं देंगे कि अमुक टेक्स क़ानून की अमुक गड़बड़ी है और इसे दूर करने के लिए यह इबारत गेजेट में छापी जानी चाहिए।

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**(1a.2) पेड आर्थिक विशेषग्य कभी भी स्पष्ट एवं लिखित में सुझाव क्यों नहीं देते ?**

इनके सारे मशवरे और सलाहे अस्पष्ट एवं जबानी होती है। अस्पष्ट और जबानी इसीलिए क्योंकि यदि ये लिखित में ड्राफ्टेड स्टेंड ले लेंगे तो पैसा मिलने पर आइन्दा इधर से उधर पाला नहीं बदल सकेंगे। तो वे बात ही ऐसी कहते है जिसका या तो कोई अर्थ नहीं होता, या उसका जो भी अर्थ निकालना हो वह निकाला जा सके !!

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उदाहरण के लिए, अभी पेड अभिजित पेड बनर्जी ने पेड मीडिया में आकर यह डायलॉग मारा था कि भारत की अर्थव्यवस्था ढह रही है। अब आप इस आदमी को ट्विट करके पूछिए कि इसे बचाने के लिए गेजेट में क्या छापना है वह लिखकर दे सकते है क्या ? तो यह आदमी आपको कोई जवाब नहीं देगा !! मतलब यह अगले 2–4 महीने में हजार पेज की एक किताब और लिख देगा कि कैसे भारत की अर्थव्यवस्था गिर रही है, लेकिन यह नहीं बतायेगा कि, इसे ठीक करने के लिए टेक्स सिस्टम में भारत को क्या बदलाव करना चाहिये !! और बात सिर्फ भारत की नहीं है, इस आदमी ने अपनी पूरी जिन्दगी में कभी 1 पेज भी टेक्स सिस्टम पर लिखकर नहीं दिया है !!

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इनकी दशा उस आर्किटेक्चर की है जो साईट पर खड़ा होकर घंटो तक यह भाषण देता है कि इमारत ऐसी होनी चाहिए वैसी होनी चाहिए, इतनी ऊँची, उतनी चौड़ी होनी चाहिए, इसका डिजाइन भूकम्परोधी होना चाहिए आदि आदि । लेकिन जैसे ही आप कहते हो कि क्या आप आपके द्वारा सुझाई गई इमारत का नक्षा बनाकर दे सकते हो तो वह फरार हो जाता है !!

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और फिर जब आप इमारत बना देते है तो यह आदमी लोगो को बताता है कि देखो अमुक इमारत का अमुक पिल्लर छोटा है, और इस वजह से इमारत जल्दी ही गिर जाएगी। पर जब आप इससे कहेंगे कि ठीक है मैं इस पिल्लर को गिरा कर फिर से बना देता हूँ, लेकिन आप नक्षा बनाकर दे दीजिये कि इस पिल्लर का साइज़ क्या लेना है, और कहाँ से उठाना है तो यह आदमी हवा में ऊँगली घुमाकर बतायेगा कि पिल्लर कैसा होना चाहिए, और फिर से फरार हो जायेगा। पर यह आपको नक्षा बनाकर कभी नहीं देगा !!

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यही वजह है कि मैं इन्हें सुनता, पढ़ता नहीं हूँ। मैं इनसे सीधे कहता हूँ कि तुम अर्थव्यवस्था की जिस भी समस्या को एड्रेस कर रहे हो, यदि उसका समाधान करने के लिए जो पेज गेजेट में छापने है वह तुम्हारे पास है तो मुझे दो। मैं अमुक पेज पीएम को भी भेज दूंगा और अन्य नागरिको को भी इस बारे में सूचित करूँगा कि वे अमुक इबारत को गेजेट में छापने के लिए पीएम से कहें। और यदि तुम्हारे पास समाधान के लिए 4 पेज लिखने की फुर्सत नहीं है तो मेरे पास भी अर्थशास्त्र के नाम पर तुम्हारी बकवास सुनने का वक्त नहीं है !!

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और मुझे आज तक ऐसा कोई भी अर्थशास्त्री नहीं मिला जिसने मुझे एक भी पेज लिखित में दिया हो कि उसकी विशेषग्य सलाह एक अनुसार अर्थव्यस्था को ठीक करने के लिए सरकार को गेजेट में क्या छापना चाहिए !! इन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि टेक्स सिस्टम कैसा होना चाहिए इसकी इबारत लिखना अर्थशास्त्रियों का काम नहीं है !! बताइए !!!

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इन फुरसतियों पर इतना लम्बा इसीलिए लिखा गया है, क्योंकि ये लोग सही अर्थशास्त्र को समझने में समझने में नागरिको की सबसे बड़ी बाधा है !! अत: जब तक आप इन्हें सुनने-पढने में अपना समय जाया करते रहेंगे तब तक ये आपको अंगेज करके रखेंगे और आपको टेक्स सिस्टम तक पहुँचने नहीं देंगे !! और जब तक आप टेक्स सिस्टम तक नहीं पहुँचते तब तक आप अर्थशास्त्र नहीं समझ सकते।

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**(1c) भारत की कर प्रणाली सुधारने के लिए मेरा प्रस्ताव :**

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मेरा मानना है कि भारत में 2015 तक एक बदतर कर प्रणाली थी। इसी बदतर कर प्रणाली की वजह से भारत तकनीकी वस्तुओ का उत्पादन करने में पिछड़ता चला गया । उत्पादन गिरने से भारत का निर्यात हमेशा कम एवं आयात अधिक रहा। 1990 तक हम जैसे-तैसे कर्जे लेकर काम चलाते रहे। जब कर्जे मिलने बंद हो गए तो हमने देश चलाने के लिए सोना गिरवी रखा। 91 में WTO और IMF की शर्ते मान कर हमने सेकेण्ड राउंड में प्रवेश किया, और एफडीआई के माध्यम से पूंजीगत निवेश मांगकर डॉलर लेने शुरू किये। विदेशी निवेश ने हम पर डॉलर पुनर्भरण= रिपेट्रीएशन क्राइसिस का भार डालना शुरू किया और हम पर डॉलर संकट के दुष्चक्र में फंस गए।

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फिर हमने थर्ड राउंड में प्रवेश किया, और अपनी राष्ट्रिय संपत्तियां बेचनी शुरू की। जितनी मनमोहन सिंह जी से बिकी उन्होंने बेच दी। अब मोदी साहेब बेच रहे है। जब तक निर्यात नहीं बढाते तब तक यह दुश्चक्र रुकने वाला नहीं है।

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अब इस बेचान को कवर करने के लिए पेड मीडिया के स्पोंसर्स ग्लोबलाइजेशन, उदारीकरण, विदेशी निवेश, ग्रोथ रेट, विकास दर, जीडीपी, पीपीपी मोड, प्राइवेटाईजेशन, भूमंडलीकरण, इन्वेस्टमेंट, डिस इन्वेस्टमेंट, टिस इन्वेस्टमेंट, ट्रिलियन डॉलर इकॉनोमी, जिलियन डॉलर इकॉनोमी, आर्थिक विकास, आर्थिक शक्ति, डिजिटल इन्डिया, मेक इन इण्डिया और न जाने कैसी कैसी टर्म्स की खोज करते रहते है !!

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इन्ही शब्दों के लेबल बनाकर उन्होंने कई प्रकार के फ्लेवर की चुइंगमें पेड मीडिया के बाजार में उतार रखी है। देश की आर्थिक नीतियों पर बहस करने वाले करने वाले कार्यकर्ता कई दशको से इन्हें चबा रहे है। विदेशी निवेश की चिंगम थूकते है, तो विनेवेश की मुहं में डाल लेते है, और विनिवेश की चुइंगम सिर्फ तभी थूकते है, जब इन्हें पीपीपी मोड की चुइंगम दे दी जाए !!

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इस पूरी जाजम को हटाकर आप देखेंगे तो आपको एक चीज साफ़ साफ़ नजर आएगी – भारत का निर्यात गिरता जा रहा है, गिरता जा रहा है, और गिरता जा रहा है। चूंकि निर्यात गिरता जा रहा है अत: डॉलर लाने और विदेशी पूँजी खींचने के लिए सरकार भारत के विभिन्न क्षेत्र विदेशियों को सौंपती जा रही है, सौंपती जा रही है। और विदेशी निवेश आने से हम पर डॉलर पुनर्भुगतान (रिपेट्रीएशन) का बोझ और भी बढ़ रहा है, और फिर इसे कवर करने के लिए हम संपत्तियां बेच रहे है। जब बेचने को कुछ बचेगा नहीं तो हम जमा हो जायेंगे !!

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और मोदी साहेब के आने के बाद भी भारत का निर्यात नहीं बढ़ा। बल्कि इस वर्ष में यह घाटा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है -- [India's trade deficit reaches a record high of $176 billion in 2018-19](<https://www.business-standard.com/article/economy-policy/exports-climb-but-trade-deficit-hits-a-record-high-of-176-bn-in-fy19-119041501203_1.html>;)

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तो भारत में 2015 तक एक बदतर कर प्रणाली थी, जिसे मोदी साहेब ने बदतरीन कर प्रणाली से बदल दिया है !! जीएसटी बदतरीन है। यह उतना बदतर है कि इससे बदतर टेक्स सिस्टम डिजाइन ही नहीं किया जा सकता। जीएसटी लागू करने के लिए मनमोहन सिंह जी ने काफी प्रयास किये थे। लेकिन मनमोहन सिंह जी को विरोध के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा। और सत्ता में आने के बाद मोदी साहेब ने इसे लागू किया !!

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जीएसटी के स्पोंसर्स बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक है, और किस तरह जीएसटी अगले कुछ ही वर्षो में भारत की लाखों छोटी-मझौली फैक्ट्रियो को बंद करके सारा कारोबार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथो में पहुंचा देगा इस बारे में मैंने इस जवाब में विस्तार से बताया है - [Pawan Jury का जवाब - जी एस टी और वेल्थ टैक्स में कौन सा बेहतर है और क्यों ?](<https://hi.quora.com/%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%8F%E0%A4%B8-%E0%A4%9F%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%A5-%E0%A4%9F%E0%A5%88%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82/answers/128970957>;)

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टेक्स सिस्टम सुधारने के लिए मेरा प्रस्ताव जीएसटी को हटाकर रिक्त भूमि कर लागू करने का है। रिक्त भूमि कर से हमें इतना पैसा आ जायेगा कि जीएसटी की जरूरत नहीं रह जायेगी। चूंकि मैं अर्थशास्त्री या आर्थिक विशेषग्य नहीं हूँ, अत: मैंने लिखित में वह इबारत दी है, जिसे गेजेट में छापने से देश में रिक्त भूमि कर लागू होगा।

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मेरा मानना है कि रिक्त भूमि कर आने से भारत में बहुत बड़े पैमाने पर स्थानीय स्तर पर कारखाने लगने शुरू होंगे और सिर्फ 3-4 साल के भीतर ही भारत का निर्यात आयात की तुलना में बढ़ जाएगा। और यदि हम अपना निर्यात बढ़ाने कामयाब हो जाते है तो बेरोजगारी, महंगाई, आदि जैसी चिल्लर समस्याएं निर्यात बढ़ने की प्रक्रिया के दौरान ही हल हो जायेगी।

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पुराने जवाबो में रिक्त भूमिकर को वेल्थ टेक्स लिखा गया है। अब वेल्थ टेक्स को अपडेट करके इसका नाम बदल दिया गया है। मतलब रिक्त भूमि कर वेल्थ टेक्स का ही अपडेटेड वर्जन है। रिक्त भूमि कर का क़ानून ड्राफ्ट यहाँ देख सकते है --

[सेना को आत्मनिर्भर बनाना पर Pawan Jury की पोस्ट](<https://hi.quora.com/q/yrynvvvmeuzljuvz/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4-%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%AE%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A4%B0>;)

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खंड – ब
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**(2) पैसा खर्च करना :**

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पैसा इकठ्ठा करने के बाद अर्थशास्त्र का दूसरा हिस्सा है – पैसा खर्च करना।

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सरकार जो भी पैसा इकट्ठा करेगी, उसे कहाँ और किस जगह पर खर्च करेगी इसका एक सालाना ब्यौरा बनाती है। इस ब्यौरे को बजट कहते है। वैसे अर्थशास्त्र के बेहतर या बदतर होने को मुख्य रूप से टेक्स सिस्टम ही प्रभावित करता है। मतलब जब भी आप अर्थव्यवस्था का अध्ययन करें तो बजट पर पर न्यूनतम भार दें या इसकी अवहेलना करें। क्योंकि उत्पादकता, बेरोजगारी, महंगाई, निर्यात, तकनिकी निर्माण आदि महत्त्वपूर्ण पहलूओ को टेक्स सिस्टम प्रभावित करता है, बजट नहीं। बजट में सिर्फ सरकार का फुटकर भ्रष्टाचार, और निकम्मापन दृष्टिगत होता है।

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**2.1. सरकारें बजट किस तरह बनाती है ?**

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इसकी एक मद में केन्द्रीय / राज्य कर्मचारियों के वेतन और सरकार के स्थायी खर्चे शामिल होते है, और इस मद में लगभग कोई बड़ा नीतिगत बदलाव नहीं आता। स्थायी खर्चो को निकालने के बाद जिस राशि को खर्च किया जाना है उसे खर्च करने के लिए सरकारें अपने सामने यह आदर्श रखती है कि - पैसा इस तरह खर्च किया जाए कि खुद की एवं अपने आदमियों की जेब में ज्यादा से ज्यादा पैसा पहुँचाया जा सके। और अमूमन इसके लिए वे ज्यादा से ज्यादा योजनाएं बनाते है !!

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**2.2. योजनाएं क्या है ?**

योजनाएं दो प्रकार की होती है :

• बिना बजट की योजनाएं

• बजट वाली योजनाएं

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**2.2.1. बिना बजट की योजनाएं :** बिना बजट की योजनाओ में निष्पादन के लिए कोई बजट नहीं बनाया जाता। और जब योजना में कोई बजट ही नहीं है तो हेराफेरी करने का अवसर भी नहीं होता। उदाहरण के लिए, जनधन योजना केवल एक नोटिफिकेशन था। सरकार ने एक नोटिफिकेशन निकाला और योजना लागू हो गयी। अमूमन, सरकारें काफी बिजी होती है और इस तरह के काम करती ही नहीं है, जिससे नोट या वोट नहीं बनाए जा सके। किन्तु जनधन योजना नोटबंदी नामक घोटाले की तैयारी थी। अत: इसे निकालने का कष्ट उठाना पड़ा !!

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**2.2.2. बजट वाली योजनाएं :** बजट वाली सभी योजनाएं घोटाले है। घोटाला नहीं करना हो तो बजट वाली कोई योजना चलाने की जरूरत ही नहीं है। सिर्फ क़ानून छापकर ही सरकार अपने सभी लक्ष्य हासिल कर सकती है। किन्तु यदि आपको पैसा बनाना है, तो आपको योजनाएं चाहिए। दरअसल, प्रशासन इस तरह काम करता है कि बड़े पैमाने पर घोटाले करना, और फिर आसानी से बच निकलना उतना आसान नहीं होता। तो नेताओं ने कानूनी रूप से घोटाले करने का एक मेकेनिज्म डेवलप किया। सभी योजनाएं घोटालो के इसी मैकेनिज्म को बनाने के लिए चलायी जाती है।

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मैकेनिज्म यह है कि किसी लक्ष्य को हासिल करने का समर्पण दिखाने के लिए अमुक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अलग से एक स्कीम बनाओ, और करोड़ो अरबों रुपया इस स्कीम के नाम पर एलोट कर दो। इस बजट को खर्च करने का जिम्मा फिर किसी मंत्री को दे दो। अब मंत्री इस राशि को खर्च करने का पूरा नया खाका इस तरह तैयार कर लेगा कि पैसा बनाया जा सके !!

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कुछ उदाहरणों से समझते है कि योजनाओ एवं कानूनों में क्या अंतर है, और कौन सा उपाय बेहतर तरीके से समस्या को सुलझाता है ?

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**2.2.2a. रिक्त भूमि कर Vs आवास एवं रोजगार योजनाएं**

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जमीने महंगी है, इसीलिए दूकान और कारखाने लगाने की लागत बढ़ जाती है तथा कई लोग महंगी जमीन होने के कारण इससे पूरी तरह से वंचित हो जाते है। जमीन की लागत ज्यादा जबकि मकान बनाने में खर्च कम आता है। जिन जिन ने अपना घर बनाया है वे आपको बताएँगे कि उन्होंने अपने जीवन में जितना बचाया उसमे से अधिकाँश घर बनाने में ही लग गया। महंगाई एवं गरीबी का कारण भी जमीन की ऊँची कीमते है।

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जमीनों की कीमते आसमान इसीलिए छू रही है क्योंकि भारत में किसी भी व्यक्ति को असीमित भूमि खरीदने की "करमुक्त" छूट है। इस वजह से जमीन खरीदना एक अच्छा निवेश बन गया है। अत: भ्रष्ट जज, भ्रष्ट अधिकारी, भ्रष्ट नेता एवं धनिक वर्ग अपने धन का निवेश जमीनों के "संचय" में करते है। क्रय शक्ति अधिक होने के कारण एक बेहद छोटे वर्ग ने देश की जमीनों का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में ले लिया है, और समस्या यह है कि, ये वर्ग इन जमीनों का इस्तेमाल उत्पादकता बढाने में भी नहीं करता। वे बस रुपया कमाते है और जमीने खरीद कर पटक देते है।

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यदि भारत में 1% सालाना की दर से रिक्त भूमि कर लागू कर दिया जाता है तो शहरी क्षेत्रो में जमीनों की कीमतों में लगभग पांच से दस गुना तक की कमी आ जायेगी। जमीनों की कीमतें गिरने से कारखाने लगाना, दुकान करना एवं घर बनाना सस्ता हो जाएगा। यदि शहरी क्षेत्रो में जमीनों की कीमतें 5 गुना भी कम हो जाती है तो जमीन खरीदकर घर बनाना एवं कारखाना लगाना करोड़ो लोगो के दायरे में आ जाएगा। फिर सरकार को इन्हें आवास दिलाने का वादा करने की जरूरत नहीं है। सरकार बस जमीन सस्ती करने का क़ानून छाप दे।

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( मैंने अपने किसी जवाब में वास्तविक आंकड़ो की गणना करके यह बताया है कि, यदि रिक्त भूमि कर डाल दिया जाता है तो सिर्फ गोदरेज की ही इतनी अनुत्पादक भूमि बाजार में आ जायेगी कि, लगभग 6 लाख लोगो को फ्लेट मिल जायेंगे !! वो भी खुद के पैसो से ख़रीदे हुए फ्लेट !! सरकार को इसमें कोई रुपया / अनुदान नहीं देना है।)

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लेकिन इसमें दिक्कत यह है कि, यदि किराए पर रहने वाले लोग खुद ही घर बनाने लगेंगे तो आवास योजना चलाने के अवसर सिकुड़ जायेंगे !!

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अत: सरकार जमीन सस्ता करने का क़ानून नहीं छापती, बल्कि प्रधानमंत्री आवास योजना, मुख्यमंत्री आवास योजना आदि के नाम पर कई हजार करोड़ का बजट बनाती है। सरकार यह घोषणा करती है कि हम 10 लाख लोगो को मकान देंगे। और फिर कई हजार करोड़ के इस बजट को खर्च करने के दौरान मंत्री / नेता / सांसद / विधायक / अफसर / पार्टी के कार्यकर्ता आदि हर स्तर पर पैसा बनाते है !!

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**उदाहरण के लिए,** सबसे पहले तो वे इसमें से 100-200 करोड़ इस योजना के बारे में लोगो को जागरूक करने क

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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Aug 30 2021 20:18:02 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

एक उदाहरण : किस तरह यू ट्यूब आपकी न्यूज फीड के माध्यम से राजनैतिक एजेंडो को नियंत्रित करता है ?
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मैं Right to Recall Group चैनल का सब्सक्राइबर हूँ। यू ट्यूब बहुधा न्यूज फीड में मुझे RRG के वीडियो नहीं भेजता या काफी कम भेजता है। कल यू ट्यूब ने मुझे एक पॉप अप नोटिफिकेशन भेजा, जिसमें यू ट्यूब मुझे सूचित कर रहा है कि -- हम आगे से आपको इस चैनल के वीडियो की न्यूज फीड नहीं भेजेंगे !! !! और यदि आप इस चेनल के वीडियो देखना चाहते है हमें सूचित करें।
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पॉप अप नोटिफिकेशन में दिए गए विकल्प भी सामान्य पाठक के हिसाब से सरल अंग्रेजी में नहीं थे।
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उन्होंने लिखा - We won’t recommend videos this channel to you again
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और विकल्प दिए (a) more info , (b) undo
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इसे सरल अंग्रेजी में इस तरह लिखा जा सकता था, ताकि पाठक के पास Yes / No का विकल्प रहे -
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Want to continue this channel’s videos in your news feed
(a) Yes , (b) No
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सलंग्न : स्क्रीन शॉट
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Aug 31 2021 22:28:26 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

क्या स्वास्थ्य मंत्री एवं मिलावट रोक अधिकारी पर वोट वापसी आये बिना आप अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर पायेंगे ?
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नहीं !! ज्यादातर मामलो में आप ऐसा नहीं कर पायेंगे !!!
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यदि आप स्वस्थ रहना चाहते है तो आपकी सबसे बड़ी बाधा फार्मा के क्षेत्र में काम करने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियां है। यदि आप बीमार बने रहते है तो ज्यादा दवाइयां बिकती है और फार्मा कम्पनियों का मुनाफा बढ़ता है। तो आपको बीमार बनाने के लिए वे स्वास्थ्य मंत्री का इस्तेमाल करते है। और यदि स्वास्थ्य मंत्री आपको बीमार बनाए रखना चाहता है तो स्वास्थ्य मंत्री के पास इतनी ताकत है कि आप उससे पार नहीं पा पायेंगे।
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कुछ उदाहरण :
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(1) नारियल पीना स्वास्थ्यवर्धक है, किन्तु स्वास्थ्य मंत्री यह सुनिश्चित कर सकता है कि जब भी आप नारियल पानी पिए तो उसमें सल्फर भी हो !! और इस तरह आने वाले समय में आप नियमित रूप से नारियल पानी पीने की वजह से स्वास्थ्य खोने लगेंगे !! और इसी तरह केलो एवं अन्य फलों आदि को पकाने में टोक्सिन का इस्तेमाल बढ़ता चला जाएगा।
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(2) बाजार में जितना भी पैकेज्ड एवं प्रोसेस्ड फ़ूड उपलब्ध है उनमें अनुमति से अधिक टोक्सिन एवं प्रिजर्वेटिव डाले जा रहे है। तो आप जब भी कोई पैकेज्ड फ़ूड खाते है, स्वास्थ्य मंत्री आपके शरीर में ये हानिकारक रसायन भेज देता है। स्वास्थ्य मंत्री गैजेट का इस्तेमाल करके यह सुनिश्चित कर सकता है इस जहर में आगे और भी इजाफा हो।
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(3) स्वास्थ्य मंत्री यदि शक्कर पर सब्सिडी रद्द करने की अनुशंसा कर देता है तो शक्कर गुड़ एवं सल्फर रहित खांड की तुलना में महंगी हो जायेगी जिससे खांड एवं गुड़ का उपभोग बढेगा। किन्तु स्वास्थ्य मंत्री ने शक्कर रिफाइंड ऑइल एवं चावल की पोलिशिंग पर अनुदान जारी रखकर यह सुनिश्चित किया कि जब भी आप इनका सेवन करे तो आपके शरीर में जहरीले रसायन जाए।
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(4) लगभग सभी खाद्य पदार्थो में मिलावट है, और स्वास्थ्य मंत्री के निर्देश पर जिला मिलावट रोक अधिकारी त्योहारों के दौरान हफ्ता वसूलने एवं नागरिको में भय फैलाकर उन्हें ब्रांडेड पैकेज्ड फ़ूड की तरफ धकेलने के लिए कुछ लोगो की धर पकड़ करके मामले को निपटा देता है, ताकि मिलावट का धंधा जारी रहे।
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(5) स्वास्थ्य मंत्री ने वैक्सीन लेने के बाद हुई मौतों के आंकड़ो को वर्गीकृत करके जारी नहीं किया। आंकड़ो के अभाव में यह स्थापित नहीं किया सकता कि
द्वितीय लहर वैक्सीन जनित थी, और ज्यादातर संभावना है कि कोरोना की तुलना में वैक्सीन ने ज्यादा लोगो को बीमार किया / और मारा है। इस तरह स्वास्थ्य मंत्री सुनिश्चित कर सकता है कि जब आप किसी रोग का उपचार लें तो अमुक उपचार रोग से भी अधिक हानिकर हो।
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(6) लॉकडाउन की वजह से अन्य गंभीर बीमारियों से ग्रसित लाखों लोगो को उपचार नहीं मिला और उनकी मृत्यु हुयी। असल में लॉकडाउन ने कोरोना की तुलना में ज्यादा लोगो को आर्थिक-मानसिक-शारीरिक रूप से बीमार बनाया। यदि स्वास्थ्य मंत्री लॉकडाउन न डालने की अनुशंषा करता तो लॉकडाउन से बचा जा सकता था।
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(7) अमेरिका ने 2001 में क़ानून बनाया कि यदि किसी वस्तु में यदि कम से कम 95% ऑर्गेनिक उत्पादों का इस्तेमाल हुआ है तो ही विक्रेता अमुक पैकेट पर ऑर्गेनिक का लेबल लगा सकता है। और यदि किसी उत्पाद को बनाने में 100% ऑर्गेनिक वस्तुओ का प्रयोग हुआ है तो विक्रेता उस पर "100% ऑर्गेनिक" लिख सकता है।
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उन्होंने उन रसायनो को सूचीबद्ध किया हुआ है जिनका इस्तेमाल ऑर्गेनिक उत्पादों में नहीं किया जा सकता। और इसका उलंघन करने पर आर्थिक दंड के साथ लाइसेंस निरस्तीकरण तक का प्रावधान है। इससे ऑर्गेनिक में इन-ऑर्गेनिक की मिलावट करने वालो के लिए कारोबार का रास्ता बंद हो जाता है।
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अमेरिका में जब यह क़ानून आया तो भारत ने भी इस तरह का कानून बनाया, किन्तु यह सिर्फ कागजो तक सीमित है। स्वास्थ्य मंत्री ने यह सुनिश्चित किया है कि इस तरह के क़ानून को धरातल पर लागू न किया जाए ताकि आर्गेनिक में इन-ऑर्गेनिक की मिलावट जारी रहे। और इस वजह से जब भारत से कोई ऑर्गेनिक उत्पाद एक्सपोर्ट करते हो तो आपको अमेरिकन एजेंसी द्वारा जारी किये गए ऑर्गेनिक प्रमाण पत्र की जरूरत होती है।
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सार यह है कि, स्वास्थ्य मंत्री के पास ऐसे दर्जनों तरीके है जिनके माध्यम से वह आपके एवं आपके परिवारिक सदस्यों के स्वास्थ्य को लगातार तोड़ रहा है, और आने वाले समय में वह आपके स्वास्थ्य को और भी तेजी से तोड़ेगा।
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ऊपर दी गयी सभी समस्याएं आपको स्वास्थ्य मंत्री ने दी है। और उसने ऐसा इसीलिए किया है क्योंकि वही मंत्री बनने एवं मंत्री बने रहने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों द्वारा संचालित पेड मिडिया पर बुरी तरह से निर्भर है। स्वास्थ्य मंत्री को मंत्री बनाने एवं मंत्री बनाए रखने में आपकी यानि आम नागरिको की कोई भूमिका नहीं है। और यह एक मात्र वजह है कि स्वास्थ्य मंत्री बहुराष्ट्रीय कम्पनियो को मुनाफा देने वाले कानून छापता है।
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स्वास्थ्य मंत्री पर वोट वापसी क़ानून आने से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिक स्वास्थ्य मंत्री को नियंत्रित करने के क्षमता खो देंगे और वह सीधे नागरिको द्वारा नियंत्रित होगा। और तब स्वास्थ्य मंत्री ऐसे क़ानून छापना शुरू करेगा जिससे आपके स्वास्थ्य में सुधार आये। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो नागरिक वोट वापसी पासबुक का प्रयोग करके उसे बदल देंगे।
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स्वास्थ्य मंत्री पर वोट वापसी लागू करवाने के लिए आप क्या कदम उठा सकते है ?
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(i) आने वाली 5 तारीख को अपने राज्य के मुख्यमंत्री को एक खुला आदेश-पत्र भेजे। खुले आदेश पत्र के रूप में आप बुक पोस्ट, लेटर, अंतर्देशीय पत्र, या पोस्टकार्ड भी भेज सकते है।
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आदेश पत्र में में यह लिखे : मुख्यमंत्री जी, आपके लिए निर्देश है कि स्वास्थ्य मंत्री पर वोट वापसी लागू करें - #VvpHealthMin
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(ii) राजनैतिक दलों पर दबाव बनाने एवं कार्यकर्ताओ का ध्यान आकृष्ट करने के लिए चुनावो में भाग लेना सबसे महत्त्वपूर्ण है। अत: इस क़ानून की मांग आगे बढ़ाने के लिए इस मुद्दे पर अपने क्षेत्र से विधायक, सांसद, पार्षद, सरपंच आदि का चुनाव लड़े, या उन उम्मीदवारों को वोट करें जिन्होंने अपने एजेंडे में इस कानून को शामिल किया है।
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