Mon Jun 01 2020 05:59:20 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
There were violence and looting of stores in the city where I live. Rioters didn't dare to touch the homes of law-abiding citizens.
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Reason ???
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Please watch this short video
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Mon Jun 01 2020 09:27:10 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
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Mon Jun 01 2020 21:58:47 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
जूरी सिस्टम, जज सिस्टम एवं जूरी कोर्ट में क्या अंतर है ? भारत में यह कैसे लागू हो सकता है?
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(1) दुनिया में अदालतें चलाने की दो प्रणालियाँ मौजूद है :
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(i) जज सिस्टम : जज सिस्टम में, दंड देने की शक्ति कुछ लोगो को स्थायी रूप से दे दी जाती है, और इनकी नियुक्ति एवं निष्कासन का अधिकार राजवर्ग के पास होता है। चूंकि जज सिस्टम में गठजोड़ बनाकर फैसलों को प्रभावित करना आसान होता है, अत: बहुधा धनिक वर्ग, रसूखदार एवं शासन में बैठे लोग जज सिस्टम को काफी पंसद करते है।
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(ii) जूरी सिस्टम : जूरी सिस्टम में दंड देने की शक्ति विभिन्न व्यक्तियों में लगातार हस्तांतरित होती रहती है। दंड देने की शक्ति के निरंतर नए लोगो के हाथ में जाने के कारण जूरी सिस्टम में पैसा फेंक कर पहुँच का इस्तेमाल करके न्याय खरीदना काफी मुश्किल हो जाता है। अत: संपत्तिशाली, अभिजन एवं राजवर्ग जूरी सिस्टम से अत्यंत घृणा करता है।
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(1.1) क्या जूरी सिस्टम लागू किया जा सकता है ?
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देखिये, यदि आपको देश में कोई भी प्रक्रिया लागू करनी हो तो उसे गेजेट में छापना होता है। लेकिन जूरी सिस्टम कोई प्रक्रिया नहीं है, जिसे गेजेट में छापा जा सके। यह सिर्फ एक सिद्धांत है। इस सिद्धांत को आधार बनाकर पहले इसकी प्रक्रिया लिखनी होगी। और तब ही इसे लागू किया जा सकता है।
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जूरी सिस्टम का सिद्धांत सिर्फ यह कहता है कि – दंड देने की शक्ति लगातार नए लोगो में हस्तांतरित होगी। बस !! जूरी सिस्टम का मतलब इतना ही है। जूरी सिस्टम का यह ड्राफ्टविहीन सिद्धांत निम्नलिखित सूचनाएं नहीं देता :
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(a) दंड देने की शक्ति किन लोगो या लोगो के किन समूहों में हस्तांतरित होगी ?
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(b) जूरी सदस्यों का चयन एवं जूरी मंडलों का गठन किस तरह होगा ?
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(c) जूरी को कौनसे मुकदमे सुनने का अधिकार होगा, और कौनसे मुकदमो को सुनने का अधिकार नहीं होगा ?
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(d) कौन व्यक्ति जूरी में शामिल होने के लिए अयोग्य होंगे ?
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(e) जूरी द्वारा सुनवाई करने की प्रक्रिया क्या होगी ?
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(f) अंतिम फैसला देने के अधिकार किसे होगा ?
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(g) क्या जूरी मंडल के फैसले के खिलाफ अपील की जा सकेगी ?
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और इसी तरह के सैंकड़ो प्रश्न। अत: जब तक हमारे पास जूरी के संचालन की लिखित प्रक्रिया नहीं हो तब तक इसे गेजेट में नहीं छापा जा सकता है, और इसीलिए इसे लागू भी नहीं किया जा सकता। मतलब प्रधानमंत्री जी, गेजेट में सिर्फ यह तो नहीं लिख सकते कि – जूरी सिस्टम लागू किया जाता है !!
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इसके लिए पहले प्रक्रिया बनानी होती है, ताकि अधिकारी दिए गए निर्देशों का पालन करके अमुक प्रकिया को लागू कर सके। उदाहरण के लिए जब भारत में मताधिकार लागू किये गए तो इसकी प्रक्रिया बनायी गयी कि, वोट कौन दे सकेंगे, कितनी आयु के लोगो को मताधिकार मिलेगा, वोट देने के लिए नागरिक कहाँ जायेंगे, किन किन पदों के लिए वे वोट दे सकेंगे आदि आदि।
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(1.2) जूरी कोर्ट क्या है ?
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जूरी कोर्ट उस प्रस्तावित प्रक्रिया या ड्राफ्ट का नाम है, जिसे गेजेट में छापने से जूरी सिस्टम लागू होगा। जूरी कोर्ट के ड्राफ्ट में 2 खंड एवं 44 धाराएं है, जिसमें जूरी मंडलों के संचालन के विस्तृत नियम एवं निर्देश दिए गए है। पहले खंड में सत्र न्यायालय, उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय में जूरी मंडलों के गठन, संचालन एवं सुनवाई की प्रक्रिया के नियम / निर्देश है, और दुसरा खंड वोट वापसी प्रक्रियाओ के बारे में है।
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तो जूरी कोर्ट एवं जूरी सिस्टम में मुख्य अंतर यह है कि —
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जूरी सिस्टम एक सिद्धांत है, और इसे लागू नहीं किया जा सकता है। जबकि जूरी कोर्ट एक ड्राफ्ट है, जिसे गेजेट में प्रकाशित करने से भारत में जूरी सिस्टम लागू होगा।
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(2) भारत में जूरी कोर्ट कैसे लागू हो सकता है ?
यदि जूरी कोर्ट को गेजेट में प्रकाशित कर दिया जाता है तो भारत में जूरी कोर्ट लागू हो जायेगा। गेजेट छापने की शक्ति सिर्फ 2 व्यक्तियों के पास है :
(i) प्रधानमंत्री
(ii) मुख्यमंत्री
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(2.1) यदि प्रधानमंत्री जूरी कोर्ट गेजेट में छापते है, तो यह पूरे देश में लागू होगा और भारत के प्रत्येक नागरिक को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। यदि पीएम द्वारा इसे लागू किया जाता है तो भारत की तीनो स्तर की अदालतों में जूरी कोर्ट की स्थापना होगी।
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(2.2) यदि मुख्यमंत्री राज्य जूरी कोर्ट गेजेट में छापते है तो जूरी कोर्ट अमुक राज्य में लागू होगा और राज्य के प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। राज्य जूरी कोर्ट यदि गेजेट में आता है तो यह सिर्फ सत्र न्यायालय एवं उच्च न्यायालय में ही लागू होगा और सुप्रीम कोर्ट में जूरी प्रक्रियाएं लागू नहीं होगी।
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(2.3) मुख्यमंत्री चाहे तो अपने राज्य के किसी जिले में भी “जिला जूरी कोर्ट” लागू कर सकते है। यदि मुख्यमंत्री किसी जिले में जिला जूरी कोर्ट लागू करते है, तो अमुक जिले के प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। जिला जूरी कोर्ट यदि गेजेट में आता है तो यह सिर्फ सत्र न्यायालय (शेषन कोर्ट) में ही लागू होगा, उच्च एवं उच्चतम न्यायालयों में नहीं।
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(1) जूरी कोर्ट का प्रस्तावित ड्राफ्ट - <https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/909604579412620/>
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Tue Jun 02 2020 05:05:21 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
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Tue Jun 02 2020 07:39:52 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
और नोटबंदी की तरह अब पैड मीडिया यह साबित करने में लग गया है कि लॉकडाउन एक “ भूल” थी !!!
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Wed Jun 03 2020 07:31:18 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
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Thu Jun 04 2020 05:14:47 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
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Thu Jun 04 2020 18:48:24 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
क्यों कुछ लोग भारत में लॉकडाउन / टीकाकरण इत्यादि के लिए बिल गेट्स को दोष देते हैं, और पीएम/ सीएम, सोनिया-मोदी-केजरीवाल को कभी भी दोष नहीं देते?
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बकवास तर्क ? नहीं। एक बहुत चतुर तर्क !!!
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क्योंकि वे लोग चाहते हैं कि सोनिया-मोदी-केजरीवाल एवं अन्य मुख्यमंत्रियों आदि का यही भ्रष्ट राज आगे भी चलता रहे !!!
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आप ऐसे बहुत से शेर्लोक होम्स से मिलेंगे, जिन्होंने बड़ी चतुराई से पता लगा लिया कि भारत में लॉकडाउन के लिए सोनिया-मोदी-केजरीवाल बिलकुल भी जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि इसके लिए बिल गेट्स जिम्मेदार है।
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और सबूत के रूप में, उनके पास एक पब्लिक वीडियो में बिल गेट्स के बयान हैं (कोई स्टिंग ऑपरेशन आदि नहीं ), और इन बयानों के आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि भारत में लॉकडाउन के लिए और लॉकडाउन की वजह हुई सारी तबाही और प्रताड़ना के लिए सोनिया-मोदी-केजरीवाल बिलकुल भी ज़िम्मेदार नहीं हैं।
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और इन लोगों की कोई भी पोस्ट सोनिया-मोदी-केजरीवाल और नीतीश, पटनायक, ठाकरे जैसे आदि मुख्यमंत्रियों को लॉकडाउनो के लिए कभी भी दोषी नहीं ठहराती !!!
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किसी ने भी लॉकडाउन के लिए सोनिया-मोदी-केजरीवाल या अन्य मुख्यमंत्रियों का इस्तीफ़ा नहीं माँगा !!
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ये जानते हुए भी कि सभी लॉकडाउनो के आदेश पर प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्रियों ने साइन किये थे।
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जब आप अन्य पोस्ट्स देखेंगे, ये साफ हो जाएगा, क्यों वे झूठ बोलते हैं कि "सोनिया-मोदी-केजरीवाल लॉकडाउनो के लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि अकेला बिल गेट्स ही इस सबके लिए जिम्मेदार है"
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उनकी वाल पर बाकि अन्य पोस्ट्स में, आप सैंकड़ो ऐसी पोस्ट्स पाएंगे जिसमे वे सोनिया-मोदी-केजरीवाल, नीतीश, नवीन पटनायक, ठाकरे आदि की प्रशंसा कर रहे हैं।
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अन्य शब्दों में, ये लोग किसी पीएम/ सीएम से जुड़े हुए हैं या उनके अंधभगत हैं। और कार्यकर्ताओं और वोटर्स को भटकाना चाहते हैं और चाहते हैं कि वे सोचें भारत में लॉकडाउन के लिए पीएम/ सीएम बिलकुल भी जिम्मेदार नहीं है और वे सिर्फ और सिर्फ अकेले बिल गेट्स को या बिल गेट्स के साथ में WHO को कोसते रहें !!!
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और एक बचकाना तर्क है -- WHO ने 1 बिलियन डॉलर लॉकडाउन की शर्त के साथ दिए। 1 बिलियन डॉलर = 8000 करोड़ रूपये। और सरकारी राजस्व को लॉकडाउन द्वारा हुए नुक्सान का मूल्य लगभग 1 लाख करोड़ रूपये है और अर्थव्यवस्था नुक्सान का मूल्य शायद 10 गुना है। यदि बिल गेट्स अपनी सारी संपत्ति भी दे देता (जिसमे से अधिकतम ना बिक सकने वाले शेयर्स हैं ), तब भी केंद्र और राज्य सरकारों को 2 महीने के लॉकडाउन से हुए राजस्व नुकसान की भरपाई भी नहीं कर सकता था।
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तो इनका केवल एक ही मकसद है -- भारत के वोटर्स को मूर्ख बनाना
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@PmoIndia) को ट्वीट करे --
@PmoIndia #बिलगेट्स_को_बैन_करें #बिलगेट्स_संस्थाए_बैन_करें #कारण_झूठी_कोरोना_दहशत. बिल गेट्स का वीजा रद्द करें, उसकी संस्थाएं रद्द करें और भारत मे गेट्स और उसकी संस्थायों से पैसा लेने वाले NGOs भी बैन करें क्योंकि उसने झूठी कोरोना दहशत फैलाई और यह गैरजरूरी लॉकडाउन का आधार बना।
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My Tweet - <https://twitter.com/PawanJury/status/1263736369563815937>
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Thu Jun 04 2020 18:51:28 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Apple चोरी किए गए फोन को ट्रैक और बंद(disable) कर रहा है।
<https://finance.yahoo.com/video/apple-tracking-iphones-stolen-looting-151621185.html>
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मतलब, 20k से 100k तक के Apple फोन में किल स्विच थे।
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लेकिन कई लोग कहते हैं कि अंग्रेजों ने जो जगुआर युद्धक विमान और फ्रांस ने जो मिराज युद्धक विमान बनाके हमें बेचें हैं, जिसका आर्थिक और सैन्य मूल्य एक आईफोन से 100,000 गुना अधिक है, में किल स्विच नहीं हैं !!!
और वे दावा करते हैं कि राफेल में भी स्विच नहीं होंगे !!!
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और वही लोग कहते हैं कि जब फ्रांसीसी, ब्रिटिश और इजरायली अपने देशों से आयात किए गए कंपोनेंट्स का उपयोग करके भारत में जटिल हथियारों को बनाते हैं, तो वे किल स्विच नहीं डालते।
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हमारे देश में अब आयातित हथियारों के अंध-भक्त भी हैं।
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समाधान: जूरी कोर्ट, वोट वापसी, आदि जैसे कानून ड्राफ्ट भारत की हथियार निर्माण क्षमता में सुधार करेंगे।
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Thu Jun 04 2020 18:53:44 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
अमेरिका में आम नागरिक सरकारी अधिकारी-जज-पुलिस कमिश्नर-नेता को किसी भी दिन नौकरी से निकाल सकते हैं, और उनके पास जूरी में जाकर उन्हें सजा देने का अधिकार भी हैं।
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ये बात अच्छे अच्छे पढ़े-लिखे लोग भी भारत में नहीं जानते।
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लेकिन -- अमेरिका में कोरोना से हर दिन कितने लोग पीड़ित हो रहे हैं, कितने मर रहे हैं ये सबको जबानी रटा हुआ।
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जैसे ही बोलो की भारत में लॉक डाउन करना गलत था / है, ये पढ़े-लिखे लोग तुरंत आकर बताना शुरू कर देते हैं कि
"अमेरिका का हाल देखो" !!
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यह पेड मीडिया की ताकत है !!
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Thu Jun 04 2020 19:07:09 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
कोरोना के संक्रमण को रोकने का लॉकडाउन से उतना ही सम्बन्ध था जितना चरखे चलाने का आजादी की लड़ाई से था !!
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तब भी अपने कॉमन सेन्स को ताक में रखकर पेड मीडिया पर निर्भर नागरिक यह शिद्दत से मानते थे कि चरखा चलाने से आजादी आएगी, और आज भी मीडिया की चपेट में चल रहे कार्यकर्ता यह मानते है कि लॉकडाउन कोरोना को रोकने के लिए लगाया गया था !!
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नोट बंदी की तरह ही लॉकडाउन भी एक भूल नहीं थी !! वे शुरू से यह जानते थे कि, लॉकडाउन का कोरोना को रोकने से उतना ही सम्बन्ध है, जितना कालेधन का नोटबंदी से है !!
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[ है गैब ए गैब जिसको समझते है हम शहूद,
है ख़्वाब में हनोज जो जागे है ख़्वाब में !!
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गैब - छिपा, शहूद - प्रकट , हनोज - अभी ]
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Sat Jun 06 2020 09:38:59 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
(1) 2015 में जब मोदी साहेब ने आधार कार्ड लागू किया तो आधार कार्ड के फॉर्म में यह घोषणा जोड़ने साफ़ इनकार कर दिया था कि -- मैं घोषणा करता हूँ कि, मैं भारत का नागरिक हूँ।
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इस घोषणा को न जोड़ने के कारण सभी बांगलादेशी अवैध निवासी एवं रोहिंग्ये कानूनी रूप से आधार कार्ड बनवा पाए !!
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(2) मोदी साहेब ने असम के NRC में इस तरह की धाराए जोड़ने से साफ़ मना कर दिया था जो NRC से बाहर रहे बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, अफगानिस्तानी अवैध निवासियों को देश से बाहर भेजना सुनिश्चित करें।
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और अब बीजेपी=संघ की आईटी सेल नागरिको को इस बारे में "जागरूक" कर रही है कि, बांग्लादेशी-रोहिंग्ये उनका रोजगार खा रहे है !!
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और अब आगे बीजेपी=संघ के नेता-कार्यकर्ता इन्तजार कर रहे है जब असम के सीमावर्ती.इलाको में बसे इनके समूहों को हथियार (AK-47, हथगोले, रोकेट लांचर आदि) आने लगेंगे और ये लोग बड़े पैमाने पर हिन्दू नागरिको का कत्ले आम करेंगे। और तब बीजेपी=संघ के नेता-कार्यकर्ता नागरिको से कहेंगे कि -- देखो बंगलादेशी-रोहिंग्ये-मुस्लिम देश को तोड़ रहे है, हिन्दुओ को मार रहे है, और तुम्हे बचना है तो हमें वोट दो !!
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समस्या जितनी ज्यादा फैलेगी, वोट भी उतने ही बढ़ेंगे।
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समाधान :
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(1) देश व्यापी NRCI गेजेट में छापा जाए। इस प्रस्तावित क़ानून में इन्हें देश से बाहर खदेड़ने की प्रक्रिया है।
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NRCI ; प्रस्तावित भारतीय राष्ट्रिय नागरिकता रजिस्टर अधिनियम [February 26] -
facebook.com/pawan.jury/posts/2694929377291948
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(2) "सज्जन नागरिको को बंदूक रखने का अधिकार देने के क़ानून पर "जनमत संग्रह" लाया जाए। वर्ना जब इन्हें हथियार आयेंगे तो ये भारत में बहुत बड़े पैमाने पर हत्याएं करेंगे और आप पुलिस को फोन लगाते रहेंगे !!
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जनमत संग्रह ; सज्जन नागरिको के लिए बंदूक रखने का अधिकार -
facebook.com/pawan.jury/posts/2790516097733275
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[ लॉकडाउन खुलने के साथ ही शाहीन बाग़ 2.0 शुरू हो सकता है। तयारी जारी है]
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Sun Jun 07 2020 20:48:47 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
वास्तविक समस्या कोरोना नहीं, लोकडाउन था।
जैसे कोरोना से संक्रमण के और मृत्यु के आंकड़े प्रकाशित किए जाते हैं वैसे ही लोकडाउन से प्रभावित लोगों के आंकड़े प्रकाशित किये जाने चाहिए।
जैसे घर घर जाकर कोरोना का सर्वे किया गया, वैसे ही घर घर जाकर लोकडाउन का सर्वे किया जाना चाहिए और परिणामों को सभी प्रमुख अखबारों में प्रकाशित किया जाना चाहिए।
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सरकारी पैसा पैनिक फैलाने में खर्च कर दिया गया | इक्कठा किये दान का स्कौर भी बताना चाहिए था |
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समाधान : नेताओं को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाकर नागरिकों को वोट वापसी पासबुक जारी करने के लिए मांग करनी चाहिए |
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Sun Jun 07 2020 20:50:03 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
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Sun Jun 07 2020 21:18:57 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Muneesh Sharma:
Body of person died from So-called COVID19 thrown into the pit by the health officials of Puducherry...
This is the most shameful act ever seen in our country India only because our govt is not resisting against the international agenda and conspiracy....
I appeal to the govt to stop this Nonsense practice of fake testing and tagging other deaths as COVID19 as we have seen so many time recently including ICMR guidelines dated 10 may...
Don't behave like this with your own citizens.... Plz....
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Mon Jun 08 2020 07:00:26 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
जूरी कोर्ट क़ानून गेजेट में छापे बिना इस तरह की गुंडा गर्दी को रोका नही जा सकता ।
Dinu Netam:
क्या कसूर था टी आई साहब इनका जो इनकी ऐसी धुनाई कर दी गई ....एक लाठी मार कर के ही समझा देते इनको ..........उरला थाना प्रभारी की की दबंगई
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Tue Jun 09 2020 11:01:00 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
(1) राईट टू रिकॉल एवं वोट वापसी पासबुक में क्या अंतर है ?
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राईट टू रिकॉल एक प्रक्रिया ड्राफ्ट विहीन सिद्धांत है, और ड्राफ्ट विहीन होने के कारण इस पर बहस तो की जा सकती है, किन्तु इसे लागू नहीं किया जा सकता। जबकि वोट वापसी पासबुक एक प्रक्रिया है, जिसे लागू किया जा सकता है।
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राईट टू रिकॉल सिर्फ और सिर्फ चुने हुए प्रतिनिधियों जैसे सांसद / विधायक / सरपंच / पार्षद पर लागू होता है, जबकि वोट वापसी पासबुक सरकारी अधिकारियों जैसे एसपी, जज, शिक्षा अधिकारी, चिक्तिसा अधिकारी, दूरदर्शन चेयरमेन एवं अप्रत्यक्ष रूप से चुने हुए प्रतिनिधियों जैसे पीएम, सीएम एवं मंत्रियो पर लागू होता है।
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(2) क्या राईट टू रिकॉल अस्थिरता ला सकता है ?
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बिलकुल ला सकता है। राईट टू रिकॉल की ड्राफ्टिंग इस तरह की जा सकती है कि, इससे राजनैतिक अस्थिरता आ सकती है। और ब्रिटेन के सांसदो ने यह करके भी दिखाया है। उन्होंने 2015 में राईट टू रिकॉल की ऐसी प्रक्रिया लागू की जिसमें सिर्फ 10% मतदाताओं के समर्थन से पदासीन सांसद को हटाया जा सकता है !! सांसद / विधायक कितना भी ईमानदार हो किन्तु 10% मतदाता हमेशा ही उसके खिलाफ रहते ही है। अत: इस तरह का राईट टू रिकॉल अस्थिरता लाता है।
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(3) क्या राईट टू रिकॉल खतरनाक हो सकता है ?
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हाँ, बिलकुल हो सकता है। बीजेपी के सांसद श्री वरुण गांधी 2016 में राईट टू रिकॉल की ऐसी प्रक्रिया लिखने में कामयाब रहे जिसमें रिकॉल यदि असफल हो जाता है तो रिकॉल का आवेदन करने वाले को जेल हो सकती है !! और वे यह चाहते भी है कि, इसे लागू कर दिया जाए।
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(4) क्या राईट टू रिकॉल में रोज चुनाव हो सकते है ?
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हाँ, हो सकते है। राईट टू रिकॉल सिद्धांत के अंतर्गत ऐसी प्रक्रिया लिखी जा सकती है, जिससे हर हफ्ते सांसद / विधायक का रिकॉल होगा, और हर महीने चुनाव होते रहेंगे।
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(5) राईट टू रिकॉल एवं वोट वापसी पासबुक में से कौनसा अच्छा है ?
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(5.1) देखिये राईट टू राईट टू रिकॉल तो सिर्फ एक सिद्धांत है। कोई भी चीज देश में लागू करनी हो तो पहले इसे गेजेट में छापना होता है, और राईट टू रिकॉल कोई प्रक्रिया नहीं है जिसे गेजेट में छापा जा सके। मतलब गेजेट में पीएम क्या लिखेगा -- राईट टू रिकॉल लागू किया जाता है !! यूं ? ऐसे नहीं होता है !! और जब लफ्ज “राईट टू रिकॉल” लागू ही नहीं किया जा सकता तो क्या अच्छा और क्या बुरा !! अलबत्ता कोई आदमी इसकी प्रक्रिया सामने रखता है तब ही हम कह सकते है कि, यह प्रकिया अच्छी है या बुरी। लेकिन लफ्ज “राईट टू रिकॉल” कोई प्रक्रिया नहीं है, इस पर कोई राय व्यक्त की जाए।
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मेरे विचार में, जब कोई व्यक्ति कहता है कि – “राईट टू रिकॉल अच्छा है” तो यह गलत बयान नहीं होता। क्योंकि हमें नहीं पता कि वह राईट टू रिकॉल की कौनसी प्रकिया पढ़कर आया है।
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और इसी तरह से जब कोई व्यक्ति कहता है कि, -- “राईट टू रिकॉल बुरा है” , तो यह भी एक गलत बयान नहीं होता। क्योंकि हमें नहीं पता कि वह कौनसी प्रक्रिया पढ़कर आया है !!
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(5.2) जहाँ तक वोट वापसी पासबुक की बात है वोट वापसी पासबुक में वह प्रक्रिया दी गयी है, जिसका इस्तेमाल करके आप अधिकारियों, प्रतिनिधियों को बदलने के लिए अपनी स्वीकृति दर्ज करवा सकेंगे। यहाँ रिकॉल से कोई लेना देना नहीं है। रिकॉल में वोटिंग होती है, लेकिन वोट वापसी पासबुक में वोटिंग का कोई सिस्टम नहीं नहीं है। सिर्फ स्वीकृति देने का सिस्टम है। वोट वापसी पासबुक अच्छी है या बुरी है, इसका फैसला करने के लिए आप वोट वापसी पासबुक पढ़ सकते है।
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यदि आपको वोट वापसी पासबुक चाहिए तो पीएम / सीएम से मांग कर सकते है, कि वे वोट वापसी पासबुक जारी करें। यदि आपको वोट वापसी पासबुक नहीं चाहिए तो आपको इसकी मांग करने की जरूरत नहीं है। मतलब.... मस्त रहिए स्वस्थ रहिये !!
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अतिरिक्त : जैसे जैसे वोट वापसी पासबुक की मांग आगे बढ़ेगी, वैसे वैसे पेड मीडिया के प्रायोजको की कुलबुलाहट बढ़ेगी। और वोट वापसी पासबुक की मांग को डायवर्ट करने के लिए वे राईट टू रिकॉल पर बहस आगे बढ़ाएंगे। और वे जब भी इस मुद्दे को डिस्कस करेंगे तो हमेशा बहस को “राईट टू रिकॉल” नामक लफ्ज़ के इर्द गिर्द रखेंगे, ताकि प्रक्रिया पर विमर्श को टाला जा सके।
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हमारी मांग वोट वापसी पासबुक की है, राईट टू रिकॉल की नहीं !!
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Tue Jun 09 2020 12:35:33 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
जूरी कोर्ट एवं वोट वापसी पासबुक में क्या अंतर है ?
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जूरी कोर्ट 44 धाराओं का एक ड्राफ्ट है जिसकी धारा संख्या (2) कहती है कि --
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"इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। तब यदि आप इस पासबुक के दायरे में किये गए किसी अधिकारी के काम-काज से संतुष्ट नहीं है तो उसे निकालने के लिए पटवारी कार्यालय में जाकर अपनी स्वीकृति दर्ज करवा सकते है। आप अपनी हाँ SMS, ATM या मोबाईल APP से भी दर्ज करवा सकेंगे। आप किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दे सकते है, या अपनी स्वीकृति रद्द कर सकते है। आपकी स्वीकृति की एंट्री वोट वापसी पासबुक में आएगी। यह स्वीकृति आपका वोट नही है। बल्कि यह एक सुझाव है।"
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मतलब, जब भी जूरी कोर्ट कानून गेजेट में आएगा तब आपको एक वोट वापसी पासबुक मिल जाएगी। आपको यह पासबुक चाहिए तो आप जूरी कोर्ट को गेजेट में छापने की मांग कर सकते है।
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अब मान लीजिये कि, कल अख़बार में यह छपता है कि "जूरी कोर्ट का क़ानून पास हो गया है"
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किन्तु यदि अगले 30 दिन में आपको वोट वापसी पासबुक नहीं मिलती है तो इसका मतलब है कि उन्होंने जब जूरी कोर्ट गेजेट में छापा तो इसके ड्राफ्ट के साथ छेड़छाड़ करके धारा नम्बर 2 को हटा दिया है !!
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दुसरे शब्दों में, उन्होंने अखबार में तो यह छाप दिया कि -- "राशन कार्ड का कानून लागू हो गया है" , किन्तु उन्होंने आपको राशन कार्ड नहीं दिए है !! और जब आपके पास राशन कार्ड नहीं है तो आपको दूकान से राशन भी नहीं मिलेगा !!
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क्या आपने कभी राशन कार्ड का क़ानून पढ़ा है ? नहीं !! लेकिन आपने राशन कार्ड का इस्तेमाल किया है। तो राशन कार्ड, वोटर कार्ड, पैन कार्ड के क़ानून में कुछ भी लिखा हो उससे कोई मतलब नहीं. कुल मिलाकर यदि आपको सरकार ने यह कार्ड ही नहीं दिया तो क़ानून सिर्फ कागज में ही रहेगा, और आप इसका इस्तेमाल न कर पायेंगे।
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इसी तरह यदि आपके पास वोट वापसी पासबुक नहीं आएगी तो आप किसी अधिकारी को बदलने के लिए अपनी स्वीकृति दर्ज नहीं कर सकेंगे। चाहे वे गेजेट में कुछ भी छापे लेकिन, अंतिम नतीजा यह होना चाहिए कि मतदाता को वोट वापसी पासबुक जारी हो।
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वोट वापसी पासबुक का नमूना देखने के लिए आप अपने शहर या राज्य के कार्यकर्ताओ से संपर्क करें. वे आपको इसका छपा हुआ नमूना उपलब्ध करवा देंगे.
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तो यदि आपको वोट वापसी पासबुक चाहिए तो पीएम / सीएम से यह मांग करें -- मुख्यमंत्री जी, कृपया जूरी कोर्ट गेजेट में छाप कर हमें वोट वापसी पासबुक जारी करें !!
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यदि आपकी मांग इस तरीके से स्पष्ट होगी तो पेड मीडिया "राईट टू रिकॉल" जैसे ड्राफ्ट विहीन सिद्धांतो पर बहस चलाकर आपको न तो इसमें खींच सकेगा और न ही जूरी कोर्ट / वोट वापसी पासबुक की मांग को तोड़ सकेगा।
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और यदि आपको वोट वापसी पासबुक नहीं चाहिए तो आपकी इच्छा !! आप चाहे तो अपना वोटर कार्ड और राशन कार्ड भी सरकार को जमा करवा सकते है। किसमें चाहिए !!
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#JuryCourt , #VoteVapsiPassbook
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Wed Jun 10 2020 07:41:46 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
(1) वोट वापसी एवं वोट वापसी पासबुक में अंतर है ?
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लफ्ज "वोट वापसी" एक प्रक्रिया विहीन सिद्धांत है। प्रक्रिया विहीन होने के कारण यह एक अस्पष्ट घोषणा है, अत: इसे लागू नहीं किया जा सकता है। जबकि वोट वापसी पासबुक एक प्रक्रिया है जिसे लागू किया जा सकता है। यदि जूरी कोर्ट क़ानून गेजेट में छाप दिया जाता है तो प्रत्येक नागरिक को वोट वापसी पासबुक जारी हो जायेगी।
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(2) अगर प्रक्रियाओं की ही बात है तो राइट टू रिकॉल इन प्रक्रियाओं के साथ यह क्यों नहीं कहा जा सकता इन प्रक्रियाओं को वोट वापसी पासबुक में लिखा गया है ?
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(2.1) नहीं। वोट वापसी पासबुक एवं राईट टू रिकॉल में बहुत बड़ा एवं बुनियादी अंतर है। अंतर यह है कि, पिछले 95 वर्षो में पेड मीडिया, नेताओं एवं कार्यकर्ताओ द्वारा जब भी भारत में राईट टू रिकॉल की बात की गयी है तब इसका आशय यह रहा है कि चुने हुए प्रतिनिधियों को रिकॉल करने की बात की जा रही है। संविधान निर्माण के दौरान हुयी बहस में भी उनका यही बिंदु था। 1974 में जब राईट टू रिकॉल का बिल पेश किया गया तब भी यह सिर्फ चुने हुए लोगो के लिए था, 1977 में जनता पार्टी के मेनिफेस्टो में भी यह चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए था, और वरुण गांधी ने 2015 में जो ड्राफ्ट रखा वह भी सांसद एवं विधायक के लिए ही था। और राजस्थान / मध्य प्रदेश में जो रिकॉल लागू किया गया वह भी चुने हुए प्रतिनिधियों जैसे सरपचं / पार्षद / सभापति के लिए था।
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दुसरे शब्दों में, पिछले 95 वर्षो में (हमें छोड़कर) जितने भी लोगो ने इस लफ्ज का उच्चारण किया है सदा से रिकॉल से उनका आशय "चुने हुए प्रतिनिधियों" से रहा है !! और आगे भी पेड मीडिया जब भी इस लफ्ज का उच्चारण करेगा तब वे इसे सिर्फ सांसद एवं विधायक से ही जोड़ेंगे। तो जब हम राईट टू रिकॉल कहते है और एसपी को इसके दायरे में लाने की बात करते है तो हम एक स्थापित एवं सर्वमान्य अर्थ का विस्तार करने की कोशिश कर रहे होते है। पेड मीडिया यह विस्तार नहीं चाहता, अत: हमारे द्वारा उद्भोदित "राईट टू रिकॉल एसपी" में से एसपी को गायब कर देता है और सिर्फ "राईट टू रिकॉल" का उच्चारण करता है ताकि बहस को "चुने हुए" प्रतिनिधियों के इर्द गिर्द लथेड़ा जा सके। इसीलिए हमें सटीक शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि पेड मीडिया "हमारे द्वारा कहे गए शब्द को न तो संकुचित कर सके और न ही नागरिको को इसका गलत अर्थ बता सके।
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(2.2) पेड मीडिया की रणनीति है कि, हम जितना ही राईट टू रिकॉल शब्द का प्रसार करेंगे वे प्रथम चरण में इस शब्द पर बहस करना शुरू करेंगे और बहस को सिर्फ "चुने हुए प्रतिनिधियों" के इर्द गिर्द रखेंगे।
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यदि हमारी मांग आगे बढती रही तो सेकेण्ड राउंड में वे विधायक एवं सांसद पर यह कानून लायेंगे। चूंकि विधायक एवं सांसद के पास न तो कार्यकारी शक्तियां होती है और न विधायी, अत: MLA / MP पर रिकॉल आने से कोई बदलाव नहीं आएगा। और इस तरह हमारे 20-30 साल खपा कर वे क़ानून पास करके इस मांग को तोड़ देंगे।
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(3) अगर बदनाम करने की बात ही है तो वोट वापसी पासबुक को भी पैड मीडिया बदनाम कर सकती है ?
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(3.1) बदनाम करने की तो बात बहुत आगे की है। असल में, वे इस लफ्ज का कभी उच्चारण भी नहीं करेंगे। चूंकि राईट टू रिकॉल 250 साल पुराना युनिवर्सल लेबल है, अत: जब वे राईट टू रिकॉल लफ्ज का उच्चारण करते है तो उन्हें हमारा जिक्र नहीं करना पड़ता। लेकिन वोट वापसी पासबुक राईट टू रिकॉल पार्टी का प्रस्ताव है, अत: यदि वे इस लफ्ज का जिक्र कर देते है तो उन्हें हमारा जिक्र भी साथ में करना पड़ेगा।
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यह उसी तरह की बात है कि आप यदि "जनलोकपाल" का जिक्र करते है तो अन्ना+केजरीवाल+इण्डिया अंगेस्ट करप्शन के कार्यकर्ताओ को अनसुना नहीं कर सकते। तो यदि वे वोट वापसी पासबुक का जिक्र करते है तो उन्हें राईट टू रिकॉल पार्टी एवं इसके कार्यकर्ताओ का जिक्र करना पड़ेगा, और इस तरह उनसे यह शब्द सुनने वाले कार्यकर्ता हमें ढूंढेगे और हम तक पहुँच जायेंगे। इस तरह जैसे ही पेड मीडिया जूरी कोर्ट, हिन्दुबोर्ड, वोट वापसी पासबुक, रेडो, रेगो शब्दों का इस्तेमाल करेगा वे हमारे ट्रेप में फंस जायेंगे।
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यदि हम राईट टू रिकॉल लफ्ज का इस्तेमाल करते है तो यह लड़ाई मेघनाद Vs लक्ष्मण की बन जाती है। जिसमें मेघनाद अदृश्य था और छिप कर लक्ष्मण पर वार कर रहा था। लक्ष्मण जब तीर चलाता था तो अदृश्य होने के कारण तीर मेघनाद तक नहीं जाते थे।
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तो पिछले 8 वर्षो में पेड मीडिया में बैठे जितने भी लोगो को हमने राईट टू रिकॉल बोलने के लिए बाध्य किया है, उनमे से किसी ने भी हमारा जिक्र नहीं किया। उल्टे उनसे यह शब्द सुनने वाले जब हमारे संपर्क में आते है तो हमें ही टीम अन्ना का समझने लगते है !! तो अभी वे हमारा जिक्र किए बिना ही राईट टू रिकॉल की मूवमेंट को तोड़ने के लिए भ्रम फैला पा रहे है। मतलब, जब भी पेड मीडिया "राईट टू रिकॉल" बोलता है तो हमें टोटल लोस ही होता है। क्योंकि वे सिर्फ राईट टू रिकॉल बोलते है, और प्रक्रिया को किनारे कर देते है। और यदि प्रक्रिया के बारे में बोलते है तो सिर्फ इसे "चुने हुए जनप्रतिनिधियों" तक सीमित रखते है।
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(3.2) वोट वापसी पासबुक को वे आसानी से बदनाम इसीलिए नहीं कर सकते है, क्योंकि वोट वापसी पासबुक "प्रक्रिया बताने वाली एक भौतिक वस्तु" है। जैसे ही पेड मीडिया वोट वापसी पासबुक का नाम लेगा वैसे ही आदमी के दिमाग में सबसे पहले यह आयेगा कि मुझे यह पासबुक देखनी है। और इस तरह वह पासबुक तक पहुंचेगा। राईट टू रिकॉल एक सिद्धांत है, अत: आदमी इंटरनेट पर एक आर्टिकल पढ़कर ही इसकी बहस में खुद को शामिल कर लेता है।
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लेकिन वोट वापसी पासबुक पर यदि कोई व्यक्ति बहस करना चाहता है तो वह तब तक इसके बारे में नहीं बोलेगा, जब तक उसने यह पासबुक नहीं देखी हो।
इसी में एक अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि, वोट वापसी पासबुक युनिवर्सल है। अत: सभी नागरिको एवं कार्यकर्ताओ के पास भी यही पासबुक है और नागरिको के हाथ में भी यही पासबुक है। तो पेड मीडिया टीवी -अखबार में यह नहीं चला सकता है, वोट वापसी पासबुक के आने रोज चुनाव होंगे। तब नागरिक खुद ही अपनी पासबुक में इस बात को देख सकते है कि वोट वापसी पासबुक में तो चुनाव का सिस्टम ही नहीं है।
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असल में, पासबुक एक प्रक्रिया है। और जैसे ही पेड मीडिया पासबुक पर बात करेगा, वह ड्राफ्ट की डिबेट में फंस जाएगा। और जैसे ही वे ड्राफ्ट की डिबेट में आयेंगे चित हो जायेंगे। अभी हम ड्राफ्ट की बात आगे बढ़ा रहे है, किन्तु वे ड्राफ्ट पर चर्चा किये बिना नागरिको को लेबल की बहस में खींच कर राईट टू रिकॉल के बारे में भ्रम फैला पा रहे है। और "राईट टू रिकॉल" या "वोट वापसी" सिर्फ एक लेबल ही है। किन्तु पासबुक प्रक्रिया है।
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(4) प्रक्रियाएं जरूरी हैं न की नाम ? आपका क्या विचार है ?
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राजनीति जन सामान्य पर चलती है। जन सामान्य या जनता में से 90% नागरिक राजनीति को गहराई से नहीं देखते। वे इसे सिर्फ हेडर या शीर्षकों से समझते है। अखबार पढने वाले पाठको में से 80% पाठक अखबार की सिर्फ हेड लाइंस पढ़ते है, और इनमे से कुछ उप शीर्षक पढ़ते है। और चूंकि हेडलाइन पढने वाले ये 80% मतदाता भी है, अत: राजनीती में नाम एवं प्रक्रिया दोनों महत्त्वपूर्ण है। प्रक्रिया इसीलिए महत्त्वपूर्ण है, ताकि सकारात्मक सुधार लाये जा सके, और प्रक्रिया का शीर्षक इसीलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि हमें इसे उन 80% लोगो तक पहुंचाना है जो प्रक्रिया नहीं पढेंगे, और सिर्फ शीर्षक एवं मीडिया-सोशल मीडिया में उड़ती तैरती बातों के आधार पर अपनी राय बनायेंगे।
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जब आप भारत के प्रत्येक नागरिक को जूरी कोर्ट का एक छपा हुआ पेम्पलेट एवं एक वोट वापसी पासबुक देते हो तो पूरे ड्राफ्ट को हद से हद 10% नागरिक पढेंगे। और राजनीती को गंभीरता से लेने वाले कार्यकर्ताओ को एक बेहतर प्रक्रिया की तलाश होती है, अत: इनके लिए ड्राफ्ट महत्त्वपूर्ण है। किन्तु शेष 80% पूरा ड्राफ्ट नहीं पढेंगे। वे जूरी कोर्ट के पेम्पलेट का टाईटल और सब टाइटल पढेंगे, एक बार सभी पेज सरसरी निगाह से पलटेंगे और ड्राफ्ट को टेबल या काउन्टर पर रख देंगे। बस उन्हें जितना समझना होता है वे इतने में ही समझते है। इससे ज्यादा समय एवं दिमाग वे लगाते नहीं। और यहीं पर पासबुक की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि जब वे पासबुक देखते है, तो इसकी रीडरशिप 100% है।
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और एक बार उन्होंने इसे देख लिया तो पेड मीडिया उन्हें कभी भी भ्रमित नहीं कर पायेगा। क्योंकि वोट वापसी पासबुक के बारे में जो भी जानकारी है वह सिर्फ इस पासबुक में है। इस पासबुक से बाहर कुछ नहीं है। तो पेड मीडिया इस बारे में दुनिया भर के उदाहरण लाकर कोई मनगड़ंत "विश्लेष्ण" नहीं कर सकता।
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सार यह है कि :
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(1) जब जब भी आप "राईट टू रिकॉल" का उच्चारण करते है तो यह "हमारे ड्राफ्ट" की मांग आगे नहीं बढ़ाता।
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(2) जब भी आप "वोट वापसी" का उच्चारण करते है तो यह "हमारे ड्राफ्ट" की मांग आगे नहीं बढ़ाता।
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(3) जब भी आप "जूरी सिस्टम" का उच्चारण करते है तो यह "हमारे ड्राफ्ट" की मांग आगे नहीं बढ़ाता।
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(5) लेकिन जब भी आप "जूरी कोर्ट" एवं वोट वापसी पासबुक" का जिक्र करते है तो यह "हमारे ड्राफ्ट" की मांग आगे बढाता है।
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(6) इसी तरह जब भी आप "हिन्दू बोर्ड" , "रेडो" एवं "रेगो" का जिक्र करते है तो यह "हमारे ड्राफ्ट" की मांग आगे बढाता है।
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#JuryCourt , #VoteVapsiPassbook , #HinduBoard
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#Rego , #Redo , #GauNiti
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Sat Jun 13 2020 11:44:40 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
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Sat Jun 13 2020 16:03:36 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
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Sat Jun 13 2020 18:33:28 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
समाधान : सुप्रीम कोर्ट के जजों को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाने के लिए जूरी कोर्ट क़ानून गेजेट में छापा जाए। ताकि हम भारत के आम नागरिक आवश्यकता होने पर भ्रष्ट जजों को लात मारकर नौकरी से निकाल सके ।
#JuryCourt , #VoteVapsiPassbook
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Sat Jun 13 2020 18:41:57 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Is it true ? It seems some paid media houses over reporting it. More details needed.
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Sat Jun 13 2020 20:49:43 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Bihar: One dead, two injured in firing in Sitamarhi near India-Nepal border, confirms Sashastra Seema Bal IG of Bihar sector. Locals allege it was caused due to firing from Nepal side.
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Mon Jun 15 2020 10:39:03 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
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Thu Jun 18 2020 19:57:40 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
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Sun Jun 21 2020 08:49:10 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
मुख्यमंत्री एवं राज्य स्तर के मंत्रियो पर वोट वापसी लागू करने का प्रस्ताव
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(Vote Vapsi over Cm and ministers)
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इस कानून का सार : यह कानून मुख्यमंत्री एवं मुख्यमंत्री के अधीन मंत्रियो को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाने के लिए लिखा गया है। इस कानून को विधानसभा से पास करने की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है। #P20180436116
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यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो मुख्यमंत्री को एक पोस्टकार्ड भेजे। पोस्टकार्ड में यह लिखे :
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“मुख्यमंत्रीजी, कृपया मुख्यमंत्री एवं मंत्रियो को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाने के आदेश जारी करें – #VoteVapasiCM
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====क़ानून ड्राफ्ट का प्रारम्भ====
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टिप्पणियाँ इस क़ानून का हिस्सा नहीं है। नागरिक एवं अधिकारी टिप्पणियों का इस्तेमाल दिशा निर्देशों के लिए कर सकते है।
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(01) यह कानून राज्य के गृह मंत्री एवं वित्त मंत्री पर लागू नहीं होगा।
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(02) इस कानून में मंत्री शब्द से आशय है, राज्य के गृह एवं वित्त मंत्री के अतिरिक्त राज्य सरकार एवं मुख्यमंत्री के अधीन आने वाले सभी मंत्रालयों के मंत्री।
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(03) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर राज्य के प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। निम्नलिखित जनप्रतिनिधि इस वोट वापसी पासबुक के दायरे में आयेंगे :
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3.1. मुख्यमंत्री
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3.2. धारा (1) में बताये गए 2 मंत्रियो को छोड़ते हुए राज्य सरकार के अधीन सभी मंत्रालयों के मंत्री।
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तब यदि आप मुख्यमंत्री या किसी मंत्री के काम-काज से संतुष्ट नहीं है, और उसे निकालकर किसी अन्य व्यक्ति को लाना चाहते है तो पटवारी कार्यालय में जाकर स्वीकृति के रूप में अपनी हाँ दर्ज करवा सकते है। आप अपनी हाँ SMS, ATM या मोबाईल APP से भी दर्ज करवा सकेंगे। आप किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दे सकते है, या अपनी स्वीकृति रद्द कर सकते है। आपकी स्वीकृति की एंट्री वोट वापसी पासबुक में आएगी। यह स्वीकृति आपका वोट नही है। बल्कि यह एक सुझाव है।
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(04) मुख्यमंत्री एवं मंत्री बनने के इच्छुक व्यक्तियों द्वारा आवेदन करना :
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30 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक यदि मुख्यमंत्री या मंत्री बनना चाहता है तो वह कलेक्टर के सामने स्वयं या किसी वकील के माध्यम से ऐफिडेविट प्रस्तुत कर सकता है। जिला कलेक्टर विधायक के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क लेकर अर्हित पद के लिए उसका आवेदन स्वीकार कर लेगा, और एफिडेविट को स्कैन करके मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा।
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(05) मतदाताओ द्वारा स्वीकृति दर्ज करना :
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(5.1) कोई भी नागरिक किसी भी दिन अपनी वोट वापसी पासबुक या मतदाता पहचान पत्र के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर किसी भी प्रत्याशी के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर एवं वोट वापसी पासबुक में मतदाता की हाँ को दर्ज करके रसीद देगा। पटवारी मतदाताओं की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम एवं मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है।
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(5.2) स्वीकृति ( हाँ ) दर्ज करने के लिए मतदाता 3 रूपये फ़ीस देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी
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(5.3) यदि कोई मतदाता अपनी स्वीकृती रद्द करवाने आता है तो पटवारी एक या अधिक नामों को बिना कोई फ़ीस लिए रद्द कर देगा।
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(5.4) प्रत्येक सोमवार को महीने की 5 तारीख को, कलेक्टर पिछले महीने के अंतिम दिन तक प्राप्त प्रत्येक प्रत्याशियों को मिली स्वीकृतियों की गिनती प्रकाशित करेगा। पटवारी अपने क्षेत्र की स्वीकृतियो का यह प्रदर्शन प्रत्येक सोमवार को करेगा।
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[ टिपण्णी : कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी स्वीकृति SMS, ATM एवं मोबाईल एप द्वारा दर्ज करवा सके।
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रेंज वोटिंग - मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता किसी प्रत्याशी को -100 से 100 के बीच अंक दे सके। यदि मतदाता सिर्फ हाँ दर्ज करता है तो इसे 100 अंको के बराबर माना जाएगा। यदि मतदाता अपनी स्वीकृति दर्ज नही करता तो इसे शून्य अंक माना जाएगा । किन्तु यदि मतदाता अंक देता है तब उसके द्वारा दिए अंक ही मान्य होंगे। रेंज वोटिंग की ये प्रक्रिया स्वीकृति प्रणाली से बेहतर है, और ऐरो की व्यर्थ असम्भाव्यता प्रमेय ( Arrow’s Useless Impossibility Theorem ) से प्रतिरक्षा प्रदान करती है।]
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(06) मुख्यमंत्री की नियुक्ति एवं निष्कासन :
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पदासीन मुख्यमंत्री निचे दी गयी दोनों परिस्थितियों में से अपनी पसंद के अनुसार उच्च संख्या को चुन सकते है –
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(6.1) नागरिको द्वारा दी गयी स्वीकृतियों की संख्या, अथवा
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(6.2) मुख्यमंत्री का समर्थन करने वाले विधानसभा विधायको को चुनाव में प्राप्त हुए मतों का कुल योग।
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(6.3.) यदि किसी प्रत्याशी की स्वीकृतियों की संख्या पदासीन मुख्यमंत्री की स्वीकृतियों या मुख्यमंत्री का समर्थन करने वाले विधायको को प्राप्त मतों की कुल संख्या से 10 लाख अधिक हो जाती है तो पदासीन मुख्यमंत्री अपना पद त्याग सकते हैं या उन्हें ऐसा करने की जरुरत नहीं है, और विधायको से सबसे अधिक अनुमोदन प्राप्त करने वाले व्यक्ति को नया मुख्यमंत्री नियुक्त करने के लिए कह सकते है या उन्हें ऐसा करने की जरुरत नहीं है। अथवा विधायक सबसे अधिक स्वीकृतियां प्राप्त करने वाले व्यक्ति को नया मुख्यमंत्री चुन सकते है या उन्हें ऐसा करने की जरुरत नहीं है।
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[ स्पष्टीकरण : मान लीजिये कि, 3 करोड़ आबादी एवं 200 विधानसभा सीटो के राज्य में X मौजूदा सीएम है, और उसे विधानसभा में 120 विधायको का समर्थन प्राप्त है। मान लीजिये कि, इन 120 विधायको को चुनाव में कुल 1 करोड़ मत प्राप्त हुए थे, और X को नागरिको से सीधे प्राप्त होने वाली स्वीकृतियो की संख्या 80 लाख है।
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(i) मान लीजिये, Y सीएम का एक प्रत्याशी है और उसे 90 लाख नागरिक स्वीकृतियां दे देते है तो भी X सीएम बना रहेगा, क्योंकि X को जिन विधायको का समर्थन प्राप्त है, उनके मतों का योग 1 करोड़ है। किन्तु यदि Y को 1.10 करोड़ स्वीकृतियां मिल जाती है तो X अपना इस्तीफा दे सकता है, या नहीं भी दे सकता है।
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(ii) अब मान लीजिये, Y को 1.10 करोड़ स्वीकृतियां मिल जाती है, किन्तु यदि X सीएम के रूप में संतोषप्रद काम कर रहा है, अत: X की स्वीकृतियां बढ़कर यदि 1.15 करोड़ हो जाती है, तो भी X सीएम बना रहेगा। ]
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(07) यदि किसी मंत्रालय के मंत्री पद के किसी प्रत्याशी को राज्य की मतदाता सूची में दर्ज कुल मतदाताओ की 30% से अधिक स्वीकृतियां प्राप्त हो जाती है, और यदि यह स्वीकृतियां अमुक मंत्रालय के पदासीन मंत्री से 2% अधिक भी है, तो मुख्यमंत्री मौजूदा मंत्री को निकाल कर सबसे अधिक स्वीकृति पाने वाले व्यक्ति को अमुक मंत्रालय में मंत्री नियुक्त कर सकते है, या नहीं भी कर सकते है। मंत्री की नियुक्ति के बारे में अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री का ही होगा।
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(08) जनता की आवाज :
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(8.1) यदि कोई मतदाता इस कानून में कोई परिवर्तन चाहता है तो वह कलेक्टर कार्यालय में एक एफिडेविट जमा करवा सकेगा। जिला कलेक्टर 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर एफिडेविट को मतदाता के वोटर आई.डी नंबर के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करके रखेगा।
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(8.2) यदि कोई मतदाता धारा 8.1 के तहत प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर अपना समर्थन दर्ज कराना चाहे तो वह पटवारी कार्यालय में 3 रूपए का शुल्क देकर अपनी हां / ना दर्ज करवा सकता है। पटवारी इसे दर्ज करेगा और हाँ / ना को मतदाता के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर सार्वजनिक करेगा।
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======ड्राफ्ट का समापन=====
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Sun Jun 28 2020 18:28:03 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
स्थानीय निकाय चुनाव ( पार्षद इलेक्शन) के लिए प्रत्याशी द्वारा भरे जाने वाले नामांकन पत्र (Nomination Form) का पीडीऍफ़ यहाँ से डाउनलोड करें - <https://www.facebook.com/groups/RtrFiles/permalink/2668418700109313/>
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यदि आप मोबाइल पर उपरोक्त लिंक से पीडीऍफ़ डाउनलोड नहीं कर पा रहे है तो इस लिंक से डाउनलोड कर सकते है -
<https://tinyurl>. com/ParshadNominationForm
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भीलवाड़ा जिले के सभी कार्यकर्ताओ के लिए सूचना :
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यदि आप भीलवाड़ा जूरी कोर्ट एवं वोट वापसी पासबुक के समर्थन में अपने वार्ड से संभावित प्रत्याशी है तो निम्नलिखित कदम उठाए :
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(1) ऊपर दिए गए लिंक से पीडीऍफ़ डाउनलोड करें एवं नोमिनेशन फॉर्म भरें।
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(2) "My Files" नाम से एक फेसबुक ग्रुप बनाए और अपने भरे हुए फॉर्म का पीडीऍफ़ / स्कैन इमेज इस ग्रुप में अपलोड करें।
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(3) "भीलवाड़ा पार्षद चुनाव" नाम से एक फेसबुक एल्बम बनाए , और इस एल्बम में यह घोषणा करें कि आप किस वार्ड से संभावित प्रत्याशी है।
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(4) यदि आपको फॉर्म भरने में असुविधा हो रही है तो भीलवाड़ा के स्थानीय कार्यकर्ताओ से संपर्क करें। वे इसमें आपको सहयोग करेंगे।
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#BhilwaraJuryCourt , #VoteVapsiPassbook , #RightToRecallParty
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Sun Jun 28 2020 21:24:00 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
सूचना : राईट टू रिकॉल पार्टी का घोषणापत्र अपडेट किया गया है। इसमें (21) अध्याय है। घोषणापत्र अभी अपूर्ण है, और शेष अध्याय लिखे जाने है। शीघ्र ही शेष अध्याय लिखकर इसमें जोड़ दिए जायेंगे।
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पीडीऍफ़ डाउनलोड करने के लिए इस लिंक पर जाएँ - <https://www.facebook.com/groups/RtrFiles/permalink/2668519813432535/>
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यदि आप मोबाइल पर इस डाउनलोड नहीं कर पा रहे है तो इस लिंक से इसे डाउनलोड करें -
<https://tinyurl> .com/ManifestoRrp (लिंक में से स्पेस हटा दें)
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यह पीडीऍफ़ कम्प्यूटर वर्जन में उपलब्ध है। आगे इसके अध्यायों को फेसबुक के 'नोट्स सेक्शन' में रखा जाएगा ताकि पाठक इसे मोबाईल पर भी पढ़ सके।
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#RightToRecallParty , #ManifestoRrp ,
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Tue Jun 30 2020 07:26:31 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Kushagra Yadav Salonup:
इस चर्चा में यह समझाया गया कि किन कारणों से भारत के आम नागरिक माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, फेसबुक, एप्पल जैसी कम्पनिया भारत के अंदर नहीं खड़ी कर पाते। और किस तरह से जूरी कोर्ट, वोट वापसी पासबुक, और रिक्त भूमि कर कानून भारत में ऐसी इंडस्ट्री खड़ी करने में सहायक होंगे जिनसे भारत के लोग भारत में विश्वस्तरीय उत्पाद बना पाएंगे।
इस वीडियो को youtube पर देखें: <https://www.youtube.com/watch?v=pstmsYnMEFQ>
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Tue Jun 30 2020 09:50:10 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
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