> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2020-06-10

Pawan Jury BhilwaraRj

(1) वोट वापसी एवं वोट वापसी पासबुक में अंतर है ?
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लफ्ज "वोट वापसी" एक प्रक्रिया विहीन सिद्धांत है। प्रक्रिया विहीन होने के कारण यह एक अस्पष्ट घोषणा है, अत: इसे लागू नहीं किया जा सकता है। जबकि वोट वापसी पासबुक एक प्रक्रिया है जिसे लागू किया जा सकता है। यदि जूरी कोर्ट क़ानून गेजेट में छाप दिया जाता है तो प्रत्येक नागरिक को वोट वापसी पासबुक जारी हो जायेगी।
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(2) अगर प्रक्रियाओं की ही बात है तो राइट टू रिकॉल इन प्रक्रियाओं के साथ यह क्यों नहीं कहा जा सकता इन प्रक्रियाओं को वोट वापसी पासबुक में लिखा गया है ?
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(2.1) नहीं। वोट वापसी पासबुक एवं राईट टू रिकॉल में बहुत बड़ा एवं बुनियादी अंतर है। अंतर यह है कि, पिछले 95 वर्षो में पेड मीडिया, नेताओं एवं कार्यकर्ताओ द्वारा जब भी भारत में राईट टू रिकॉल की बात की गयी है तब इसका आशय यह रहा है कि चुने हुए प्रतिनिधियों को रिकॉल करने की बात की जा रही है। संविधान निर्माण के दौरान हुयी बहस में भी उनका यही बिंदु था। 1974 में जब राईट टू रिकॉल का बिल पेश किया गया तब भी यह सिर्फ चुने हुए लोगो के लिए था, 1977 में जनता पार्टी के मेनिफेस्टो में भी यह चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए था, और वरुण गांधी ने 2015 में जो ड्राफ्ट रखा वह भी सांसद एवं विधायक के लिए ही था। और राजस्थान / मध्य प्रदेश में जो रिकॉल लागू किया गया वह भी चुने हुए प्रतिनिधियों जैसे सरपचं / पार्षद / सभापति के लिए था।
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दुसरे शब्दों में, पिछले 95 वर्षो में (हमें छोड़कर) जितने भी लोगो ने इस लफ्ज का उच्चारण किया है सदा से रिकॉल से उनका आशय "चुने हुए प्रतिनिधियों" से रहा है !! और आगे भी पेड मीडिया जब भी इस लफ्ज का उच्चारण करेगा तब वे इसे सिर्फ सांसद एवं विधायक से ही जोड़ेंगे। तो जब हम राईट टू रिकॉल कहते है और एसपी को इसके दायरे में लाने की बात करते है तो हम एक स्थापित एवं सर्वमान्य अर्थ का विस्तार करने की कोशिश कर रहे होते है। पेड मीडिया यह विस्तार नहीं चाहता, अत: हमारे द्वारा उद्भोदित "राईट टू रिकॉल एसपी" में से एसपी को गायब कर देता है और सिर्फ "राईट टू रिकॉल" का उच्चारण करता है ताकि बहस को "चुने हुए" प्रतिनिधियों के इर्द गिर्द लथेड़ा जा सके। इसीलिए हमें सटीक शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि पेड मीडिया "हमारे द्वारा कहे गए शब्द को न तो संकुचित कर सके और न ही नागरिको को इसका गलत अर्थ बता सके।
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(2.2) पेड मीडिया की रणनीति है कि, हम जितना ही राईट टू रिकॉल शब्द का प्रसार करेंगे वे प्रथम चरण में इस शब्द पर बहस करना शुरू करेंगे और बहस को सिर्फ "चुने हुए प्रतिनिधियों" के इर्द गिर्द रखेंगे।
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यदि हमारी मांग आगे बढती रही तो सेकेण्ड राउंड में वे विधायक एवं सांसद पर यह कानून लायेंगे। चूंकि विधायक एवं सांसद के पास न तो कार्यकारी शक्तियां होती है और न विधायी, अत: MLA / MP पर रिकॉल आने से कोई बदलाव नहीं आएगा। और इस तरह हमारे 20-30 साल खपा कर वे क़ानून पास करके इस मांग को तोड़ देंगे।
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(3) अगर बदनाम करने की बात ही है तो वोट वापसी पासबुक को भी पैड मीडिया बदनाम कर सकती है ?
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(3.1) बदनाम करने की तो बात बहुत आगे की है। असल में, वे इस लफ्ज का कभी उच्चारण भी नहीं करेंगे। चूंकि राईट टू रिकॉल 250 साल पुराना युनिवर्सल लेबल है, अत: जब वे राईट टू रिकॉल लफ्ज का उच्चारण करते है तो उन्हें हमारा जिक्र नहीं करना पड़ता। लेकिन वोट वापसी पासबुक राईट टू रिकॉल पार्टी का प्रस्ताव है, अत: यदि वे इस लफ्ज का जिक्र कर देते है तो उन्हें हमारा जिक्र भी साथ में करना पड़ेगा।
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यह उसी तरह की बात है कि आप यदि "जनलोकपाल" का जिक्र करते है तो अन्ना+केजरीवाल+इण्डिया अंगेस्ट करप्शन के कार्यकर्ताओ को अनसुना नहीं कर सकते। तो यदि वे वोट वापसी पासबुक का जिक्र करते है तो उन्हें राईट टू रिकॉल पार्टी एवं इसके कार्यकर्ताओ का जिक्र करना पड़ेगा, और इस तरह उनसे यह शब्द सुनने वाले कार्यकर्ता हमें ढूंढेगे और हम तक पहुँच जायेंगे। इस तरह जैसे ही पेड मीडिया जूरी कोर्ट, हिन्दुबोर्ड, वोट वापसी पासबुक, रेडो, रेगो शब्दों का इस्तेमाल करेगा वे हमारे ट्रेप में फंस जायेंगे।
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यदि हम राईट टू रिकॉल लफ्ज का इस्तेमाल करते है तो यह लड़ाई मेघनाद Vs लक्ष्मण की बन जाती है। जिसमें मेघनाद अदृश्य था और छिप कर लक्ष्मण पर वार कर रहा था। लक्ष्मण जब तीर चलाता था तो अदृश्य होने के कारण तीर मेघनाद तक नहीं जाते थे।
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तो पिछले 8 वर्षो में पेड मीडिया में बैठे जितने भी लोगो को हमने राईट टू रिकॉल बोलने के लिए बाध्य किया है, उनमे से किसी ने भी हमारा जिक्र नहीं किया। उल्टे उनसे यह शब्द सुनने वाले जब हमारे संपर्क में आते है तो हमें ही टीम अन्ना का समझने लगते है !! तो अभी वे हमारा जिक्र किए बिना ही राईट टू रिकॉल की मूवमेंट को तोड़ने के लिए भ्रम फैला पा रहे है। मतलब, जब भी पेड मीडिया "राईट टू रिकॉल" बोलता है तो हमें टोटल लोस ही होता है। क्योंकि वे सिर्फ राईट टू रिकॉल बोलते है, और प्रक्रिया को किनारे कर देते है। और यदि प्रक्रिया के बारे में बोलते है तो सिर्फ इसे "चुने हुए जनप्रतिनिधियों" तक सीमित रखते है।
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(3.2) वोट वापसी पासबुक को वे आसानी से बदनाम इसीलिए नहीं कर सकते है, क्योंकि वोट वापसी पासबुक "प्रक्रिया बताने वाली एक भौतिक वस्तु" है। जैसे ही पेड मीडिया वोट वापसी पासबुक का नाम लेगा वैसे ही आदमी के दिमाग में सबसे पहले यह आयेगा कि मुझे यह पासबुक देखनी है। और इस तरह वह पासबुक तक पहुंचेगा। राईट टू रिकॉल एक सिद्धांत है, अत: आदमी इंटरनेट पर एक आर्टिकल पढ़कर ही इसकी बहस में खुद को शामिल कर लेता है।
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लेकिन वोट वापसी पासबुक पर यदि कोई व्यक्ति बहस करना चाहता है तो वह तब तक इसके बारे में नहीं बोलेगा, जब तक उसने यह पासबुक नहीं देखी हो।
इसी में एक अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि, वोट वापसी पासबुक युनिवर्सल है। अत: सभी नागरिको एवं कार्यकर्ताओ के पास भी यही पासबुक है और नागरिको के हाथ में भी यही पासबुक है। तो पेड मीडिया टीवी -अखबार में यह नहीं चला सकता है, वोट वापसी पासबुक के आने रोज चुनाव होंगे। तब नागरिक खुद ही अपनी पासबुक में इस बात को देख सकते है कि वोट वापसी पासबुक में तो चुनाव का सिस्टम ही नहीं है।
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असल में, पासबुक एक प्रक्रिया है। और जैसे ही पेड मीडिया पासबुक पर बात करेगा, वह ड्राफ्ट की डिबेट में फंस जाएगा। और जैसे ही वे ड्राफ्ट की डिबेट में आयेंगे चित हो जायेंगे। अभी हम ड्राफ्ट की बात आगे बढ़ा रहे है, किन्तु वे ड्राफ्ट पर चर्चा किये बिना नागरिको को लेबल की बहस में खींच कर राईट टू रिकॉल के बारे में भ्रम फैला पा रहे है। और "राईट टू रिकॉल" या "वोट वापसी" सिर्फ एक लेबल ही है। किन्तु पासबुक प्रक्रिया है।
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(4) प्रक्रियाएं जरूरी हैं न की नाम ? आपका क्या विचार है ?
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राजनीति जन सामान्य पर चलती है। जन सामान्य या जनता में से 90% नागरिक राजनीति को गहराई से नहीं देखते। वे इसे सिर्फ हेडर या शीर्षकों से समझते है। अखबार पढने वाले पाठको में से 80% पाठक अखबार की सिर्फ हेड लाइंस पढ़ते है, और इनमे से कुछ उप शीर्षक पढ़ते है। और चूंकि हेडलाइन पढने वाले ये 80% मतदाता भी है, अत: राजनीती में नाम एवं प्रक्रिया दोनों महत्त्वपूर्ण है। प्रक्रिया इसीलिए महत्त्वपूर्ण है, ताकि सकारात्मक सुधार लाये जा सके, और प्रक्रिया का शीर्षक इसीलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि हमें इसे उन 80% लोगो तक पहुंचाना है जो प्रक्रिया नहीं पढेंगे, और सिर्फ शीर्षक एवं मीडिया-सोशल मीडिया में उड़ती तैरती बातों के आधार पर अपनी राय बनायेंगे।
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जब आप भारत के प्रत्येक नागरिक को जूरी कोर्ट का एक छपा हुआ पेम्पलेट एवं एक वोट वापसी पासबुक देते हो तो पूरे ड्राफ्ट को हद से हद 10% नागरिक पढेंगे। और राजनीती को गंभीरता से लेने वाले कार्यकर्ताओ को एक बेहतर प्रक्रिया की तलाश होती है, अत: इनके लिए ड्राफ्ट महत्त्वपूर्ण है। किन्तु शेष 80% पूरा ड्राफ्ट नहीं पढेंगे। वे जूरी कोर्ट के पेम्पलेट का टाईटल और सब टाइटल पढेंगे, एक बार सभी पेज सरसरी निगाह से पलटेंगे और ड्राफ्ट को टेबल या काउन्टर पर रख देंगे। बस उन्हें जितना समझना होता है वे इतने में ही समझते है। इससे ज्यादा समय एवं दिमाग वे लगाते नहीं। और यहीं पर पासबुक की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि जब वे पासबुक देखते है, तो इसकी रीडरशिप 100% है।
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और एक बार उन्होंने इसे देख लिया तो पेड मीडिया उन्हें कभी भी भ्रमित नहीं कर पायेगा। क्योंकि वोट वापसी पासबुक के बारे में जो भी जानकारी है वह सिर्फ इस पासबुक में है। इस पासबुक से बाहर कुछ नहीं है। तो पेड मीडिया इस बारे में दुनिया भर के उदाहरण लाकर कोई मनगड़ंत "विश्लेष्ण" नहीं कर सकता।
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सार यह है कि :
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(1) जब जब भी आप "राईट टू रिकॉल" का उच्चारण करते है तो यह "हमारे ड्राफ्ट" की मांग आगे नहीं बढ़ाता।
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(2) जब भी आप "वोट वापसी" का उच्चारण करते है तो यह "हमारे ड्राफ्ट" की मांग आगे नहीं बढ़ाता।
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(3) जब भी आप "जूरी सिस्टम" का उच्चारण करते है तो यह "हमारे ड्राफ्ट" की मांग आगे नहीं बढ़ाता।
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(5) लेकिन जब भी आप "जूरी कोर्ट" एवं वोट वापसी पासबुक" का जिक्र करते है तो यह "हमारे ड्राफ्ट" की मांग आगे बढाता है।
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(6) इसी तरह जब भी आप "हिन्दू बोर्ड" , "रेडो" एवं "रेगो" का जिक्र करते है तो यह "हमारे ड्राफ्ट" की मांग आगे बढाता है।
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#JuryCourt , #VoteVapsiPassbook , #HinduBoard
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#Rego , #Redo , #GauNiti
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