Posts for 2022-06

Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Jun 06 2022 09:47:57 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Right to Recall Party:

राइट टू रिकॉल पार्टी महाराष्ट्र के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रधानमंत्री को लिखित निर्देश भेजा गया

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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Jun 06 2022 09:52:30 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Ashok Jain VotevapsiCm:

आज नागरिक कर्तव्य दिवस 05/06/2022 रविवार, भीलवाड़ा राजस्थान से मैंने मुख्यमंत्री जी से ज्यूरी कोर्ट कानून की मांग करी |

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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Jun 13 2022 18:47:18 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

दिल्ली उपचुनाव में राजेंद्र नगर विधानसभा से वोट वापसी मुख्यमंत्री क़ानून ड्राफ़्ट को गेजेट में प्रकाशित कराने के लिए श्री अजय जी तिवारी राईट टू रिकॉल पार्टी की और से प्रत्याशी है। कृपया इन्हें समर्थन दें।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Jun 16 2022 20:10:29 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

दिल्ली के राजेन्द्र नगर विधानसभा के उपचुनाव में राइट टू रिकॉल पार्टी के प्रत्याशी श्री अजय तिवारी जी को अपना समर्थन दें।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Jun 20 2022 09:43:55 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

कल्पना करें कि यदि कोंग्रेस ने यह कहा होता कि — हम पेंशन प्राप्त करने वाले सैन्य कर्मियों की संख्या में कटौती कर रहे है !! तो क्या मंजर होता ?
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पर RSS के नेता कहने के साथ साथ यह करके भी इसीलिए दिखा पा रहे है, क्योंकि RSS के नेताओ की छवि (Image) राष्ट्रवादीयों के रूप में स्थापित हो चुकी है !!
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पेड मीडिया द्वारा गढ़ी गयी वास्तविक/फ़र्ज़ी छवि आपको इस तरह बढ़त दिलाती है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Jun 23 2022 20:36:33 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Horse trading

Pawan Jury BhilwaraRj:

## [**क्या सत्ता सुख के लिए पार्टियां अपने विचारधारा को ताख पर रख देती हैं?**](<https://hi.quora.com/%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%96-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F>;)

**.**

दरअसल आपके प्रतिनिधि कितनी ईमानदारी बरतेंगे और चुनाव जीतने के बाद कैसे पेश आयेंगे यह कानूनों से तय होता है, विचारधारा से नहीं।

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राजनीती में विचारधारा नाम की कोई चीज नहीं होती है। जो भी होती है, वह क़ानूनधारा होती है। पेड मीडियाकर्मी एवं पेड बुद्धिजीवी राजनीती के सन्दर्भ में विचारधारा की बात बार बार इसीलिए घोटते है, ताकि क़ानूनधारा की चर्चा को टाला जा सके। जहाँ तक राजनेताओ की बात है, मैं उन सभी नेताओ को पहली नजर में फ्रॉड मानता हूँ जो विचारधारा पर बात करने में काफी रुचि दिखाते है, किन्तु यह नहीं बताते कि उनकी विचारधारा को लागू करने के लिए वे कौनसे क़ानून गैजेट में छापेंगे।

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उदाहरण के लिए — बहुत पुरानी बात है, जब 1910 से पहले तक इस तरह का क़ानून था कि अमेरिका में सीनेटरों ( राज्य सभा सदस्य ) को राज्यों के विधायकों द्वारा चुना जाता था। तब अमेरिका में जो विधायक होते थे उनका कुछ वर्गीकरण इस तरह होता था :
* कुछ विधायको की विचारधारा अच्छी होती थी,
* कुछ विधायको की विचारधारा बहुत अच्छी होती थी,
* कुछ विधायको की विचारधारा बुरी होती थी,
* और कुछ की विचारधारा बहुत बुरी होती थी।

किन्तु सभी प्रकार की विचारधाराओं के विधायक राज्यसभा के उम्मीदवारों से घूस खाते थे !! अंततोगत्वा अमेरिका के कार्यकर्ताओ ने समाधान के लिए शासन को मजबूर करके ऐसा कानून लागू करवाया जो कहता था कि — *सीनेटर सीधे नागरिकों द्वारा चुने जाएंगे।*

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**नतीजा : **विधायको के हाथ से राज्यसभा सदस्यों से घूस खाने का अवसर निकल गया !! तो इस प्रकार एक क़ानूनधारा ने सभी प्रकार की विचारधाराओं के विधायको को ईमानदार बनने पर बाध्य कर दिया !!

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अब भारत में आइये :

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भारत में राज्यसभा चुनावों का तमाशा 1951 से शुरू हुआ, और 2003 में राज्यसभा के चुनाव तब खुली नीलामी बन गए जब एनरॉन पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी ने वोटिंग को सार्वजनिक बनाने के लिए 'दल बदल व्हिप' कानून लागू किया, और इसका दायरा राज्य सभा चुनावों तक विस्तृत कर दिया।

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दूसरे शब्दों में, इस कानून ने यह सुनिश्चित कर दिया कि, राजनैतिक दलों के मुखिया अपनी पार्टी के विधायकों को लिखित में आदेश दे सकेंगे कि उन्हें राज्यसभा के किस उम्मीदवार को वोट करना है, और यदि उन्होंने इस आदेश की अवमानना की तो उन्हें पार्टी से बाहर निकाला जा सकेगा !! बताइये !!!

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इस व्यवस्था के आने से कांग्रेस से लेकर बीजेपी, आम आदमी पार्टी, सीपीएम और अन्य भी सभी प्रकार की विचारधाराओं की राजनैतिक पार्टियों के शीर्ष नेताओं ने घूस खाकर राज्य सभा सीटे खुले आम बेचनी शुरू कर दी।

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इस क्रमिक विकास को जारी रखते हुए बेहतर होगा कि हम राज्यसभा सीटों की नीलामी को सार्वजनिक कर विधिवत रूप दें दे। तथा इस क्षेत्र के संसदीय विकास के लिए इसमें एफडीआई की अनुमति भी दी जानी चाहिए, ताकि विदेशी धनिक पारदर्शी तरीके से राज्य सभा की सीटें खरीद सके !! क्या इससे भारत सरकार के खजाने में राजस्व की आवक नहीं बढ़ेगी ?

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तो भारत में राज्य सभा की सीटें बिकती है, क्योंकि हमारी क़ानून धारा ही ऐसी है। अमेरिका में भी कभी विधायक इसी तरह बिकते थे। किन्तु उन्होंने विचारधारा नामक पर बकवास पर बहस चलाकर समय बर्बाद करने की जगह क़ानून बदला, और वहां स्थिति पलट गयी।

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दूसरा उदाहरण आप हॉर्स ट्रेडिंग का देख सकते है। भारत में विधायक सरकार बनाने के लिए इस पार्टी से उस पार्टी में जाने के लिए मोटा पैसा वसूलते है, क्योंकि भारत के नागरिको के पास ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है कि वे विधायको को यह बता सके कि नागरिक किस व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना चाहते है।

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अमेरिका में नागरिक सीधे मुख्यमंत्री को भी चुनते है और नागरिको के पास विधायको को नौकरी से निकालने का अधिकार भी है। तो इन दो कानूनों की वजह से वहां के विधायक ईमानदारी से पेश आते है, चाहे वे किसी भी विचारधारा के हो। जबकि भारत में सभी पार्टियाँ के सभी विधायक टके टके पर बिकने के लिए तैयार रहते है। तो यहाँ भी फर्क क़ानूनधारा की वजह से है, न कि विचारधारा की वजह से !!

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अब आप भारत के किसी भी बुद्धिजीवी से पूछिए कि भारत में विधायक क्यों बिक जाते है तो वे आपको कई प्रकार की बौद्धिक बकवास सुनायेंगे। वे आपको बताएँगे कि इसके लिए भारत की राजनैतिक संस्कृति दोषी है, भारत का लोकतंत्र अभी परिपक्व नहीं है, भारतीय दलों की विचारधारा घटिया है, आदि आदि !!

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क्या कोंग्रेस-बीजेपी-सीपीएम और आम आदमी पार्टी के इस खुले भ्रष्टाचार के लिए भारतीय और उनकी संस्कृति जिम्मेदार है ?

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असल में 1790 से 1910 तक अमेरिका में इसी तरह का कानून था, जो कहता था कि -- राज्यों के विधायक राज्यसभा सांसदों (सीनेटर) को चुनेंगे। और अमेरिका भी इसी समस्या का सामना कर रहा था — ज्यादातर विधायक नोटों के बदले बिक जाते थे !!!

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1910 में अमेरिका के कार्यकर्ताओ ने इस विषय पर आंदोलन चलाया और रिप्रेजेंटेटिव्स / सीनेटर्स ( लोकसभा एवं राज्यसभा सदस्य ) को ऐसा कानून लाने के लिए बाध्य कर दिया जो यह धारित करता था कि, "राज्य सभा सदस्य सीधे नागरिकों द्वारा चुने जाएंगे"।

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चूंकि सभी नेता मौजूदा व्यवस्था से पैसा बना रहे थे अत: अमेरिका का कोई नेता इस कानून को लागू नहीं होने देना चाहता था। पर चूंकि कार्यकर्ताओ का प्रचार व्यापक था अत: नेताओं ने श्रेय लेने के लिए इस कानून का समर्थन करना शुरू किया। लेकिन सिर्फ अंतिम चरण में, जबकि शुरुआत में सभी नेता राज्य सभा उम्मीदवारों को सीधे नागरिकों द्वारा चुने जाने के कानून का विरोध कर रहे थे।

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दूसरे शब्दों में, कांग्रेस, बीजेपी, सीपीएम और आम आदमी पार्टी के विधायक राज्य सभा चुनावों में अपना वोट इसीलिए नहीं बेच देते है क्योंकि भारतीय संस्कृति में दोष है, बल्कि इसका कारण यह है कि भारत में एक कंडम और अलोकतांत्रिक कानून लागू है जो कि यह कहता है कि, "राज्य सभा सांसदों को नागरिक नहीं बल्कि विधायक चुनेंगे"। यही कानून विधायकों को बिक जाने का अवसर मुहैया कराता है, किन्तु इन्ही पार्टियों के नेता और पैड मीडिया एक तरफ इस कानून का समर्थन करते है, और साथ ही भारत में यह झूठ भी फैलाते है कि भारत में भ्रष्टाचार होने का कारण भारतीय संस्कृति है !!

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और इसी दुष्प्रचार के चलते कतिपय कार्यकर्ताओ के दिमाग में यह कचरा इतना घर कर गया है कि उन्हें आप बहुधा यह कहते पाएंगे कि— 'भारत में भ्रष्टाचार इसीलिए है क्योंकि भारतीय और उनकी संस्कृति भ्रष्ट है'।

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तो अमेरिका के कार्यकर्ताओ ने अपने देश की इस समस्या को हल कर लिया, लेकिन भारत इसका समाधान क्यों नहीं कर पाया ?

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क्योंकि भारत के कार्यकर्ताओ ने समस्या के समाधान के लिए कानून धारा पर बल देने की जगह विचारधारा, राजनैतिक संस्कृति जैसी बौद्धिक बकवास पर बहस चलाने को तरजीह दी। और फिर उन्होंने इस बात का भी प्रचार किया कि, "देश की किसी भी समस्या का समाधान सिर्फ नेता-भक्ति / पार्टी भक्ति से ही किया जा सकता है। ड्राफ्ट्स वगैरह पर चर्चा करना भी समय की बर्बादी है" !!! और जब उनसे पुछा जाता है कि, आपके अमुक नेता / पार्टी के पास ऐसा क्या है ? तो उनके पास फिर से यही बकवास तर्क होता है — मेरा नेता / पार्टी की विचारधारा अच्छी है !!

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कुल मिलाकर आपके क़ानून अच्छे है तो नेता तमीज से पेश आयेंगे, और यदि क़ानून बुरे है तो नेताओ से ईमानदारी की उम्मीद करके आप उनके साथ ज्यादती कर रहे है !!

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किन्तु पेड मीडियाकर्मी एवं पेड बुद्धिजीवी कार्यकर्ताओ का समय चूसने एवं उन्हें समाधान से दूर धकेलने के लिए विचारधारा नाम की बकवास पर बहस चलाते रहते है। यदि कोई व्यक्ति राजनीती के संदर्भ में विचारधारा शब्द का इस्तेमाल करता है तो आपको उससे तुरन्त कहना चाहिए कि मुझे आपकी विचारधारा में कतई रुचि नहीं है।

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उनसे पूछिए कि - आप अपनी विचारधारा को लागू करने के लिए कौनसे क़ानून गेजेट में छापने वाले है। यदि वे आपको क़ानून ड्राफ्ट नहीं देते तो समझ जाइए कि अब उनके पास आपको देने के लिए सिर्फ एक चीज है -- भाषण / डायलोग / बयान / उपदेश !! और भाषणों के इसी बौद्धिक प्रदुषण को विचारधारा के नाम से परोसा जाता है।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Jun 23 2022 20:37:41 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Pawan Jury BhilwaraRj:

## [**राजनीति में हॉर्स ट्रेडिंग क्या होती है उदाहरण सहित बताइए ?**](<https://hi.quora.com/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A5%89%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B8-%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97>;)

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जनता प्रतिनिधियों को चुनती है, और चुन लिए जाने के बाद प्रतिनिधि अपने मतदाताओ से बिना पूछे बाजार में खड़े होकर कहते है कि — "जो भी ज्यादा पैसा देगा हम उस पार्टी की सरकार बनाने के लिए ठप्पा लगा देंगे" !!

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सांसदों / विधायको / पार्षदों की इस नीलामी को राजनीति में हॉर्स ट्रेडिंग कहा जाता है।

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**उदाहरण : **मान लीजिये कि, आप पार्टी X से त्रस्त है और उसे रोकने के लिए पार्टी Y के विधायक को वोट देते है। और चुनाव जीतने के बाद यदि आपका विधायक पार्टी X या Z से पैसा लेकर उनकी सरकार बनवा देता, तो यह हॉर्स ट्रेडिंग है। इस टर्म में विधायक / सांसद / पार्षद खुद को नीलाम करने के लिए सभी विकल्प खोल देते है।

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[ हॉर्स ट्रेडिंग के दो पहलू है। इसमें कॉमेडी भी है और ट्रेजेडी भी है। पेड मीडियाकर्मी एवं बुद्धिजीवी वर्ग इसे तमाशा, रोमांच, कूटनीति ( कई बार कुत्तानिति भी ) और कॉमेडी के नजरिये से पेश करके नागरिको का मनोरंजन करते है।

मेरे विचार में हॉर्स ट्रेडिंग एक गंभीर समस्या है। यदि आप भारत के मतदाता है, और हॉर्स ट्रेडिंग की इस कॉमेडी को ट्रेजेडी की तरह देखते है तो यह जवाब आपके काम का है। हालांकि महाराष्ट्र के तमाशे को पेड मीडिया जिस तरह चटखारे लेकर परोस रहा है उस हिसाब से यह नीरस जवाब आपका जायका खराब कर सकता है। ]

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## ***टिप्पणी : **भारत में ऐसे कई क़ानून है जो हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा देते है। उनमे से मैंने कुछ मुख्य बिन्दुओ को यहाँ शामिल किया है। साथ में उस पासबुक के बारे में भी जानकारी दी है, जिसके आने से हॉर्स ट्रेडिंग की समस्या को काफी हद तक घटाया जा सकता है। हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा देने वाले अन्य कानूनों के बारे में अन्य किसी जवाब में लिखूंगा।*

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**भारत में एक बार चुनाव जीतने के बाद विधायक खुद को बेच क्यों देते है ?**

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**(1)** क्योंकि भारत में ऐसा करना कानूनी है।

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यदि कोई कृत्य कानूनी है तो मैं इसे गलत नहीं ठहराता। तब मेरा स्टेंड होता है कि हमें क़ानून बदल देना चाहिए। हालांकि कई लोग गलत क़ानून के मुद्दे को चर्चा से बाहर करने के लिए हॉर्स ट्रेडिंग के विषय को नैतिकता-मोरलटी आदि से जोड़ देते है, ताकि समाधान से ध्यान हटाया जा सके। मैं राजनीती के सन्दर्भ में नैतिकता वगेरह में नहीं मानता हूँ। अत: इस शब्द पर लिखकर आपका व मेरा समय जाया नहीं करना चाहता।

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**(2) **क्योंकि एक बार वोट देने के बाद भारत के मतदाताओ के पास अपना वोट वापिस लेने का कोई रास्ता नहीं है।

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अमेरिका में मतदाताओ के पास अपने विधायको का वोट वापिस लेने की प्रक्रिया है। यह व्यवस्था अंकुश की तरह काम करती है, और नेता जनता के प्रति निरंतर जवाबदेह बने रहते है। भारत में चुनाव जीतने के साथ ही विधायक अपने मतदाताओ को डाक में बिठा देता है, और उनकी तरफ पलट कर नहीं देखता। जैसा कि आप पिछले कई वर्षो से भारत के विभिन्न राज्यों में देखते आये है और अभी विधायकों का यह रवैया आप महाराष्ट्र में देख रहे है।

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**(3)** क्योंकि भारत में ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है, जिससे भारत के मतदाता अपने विधायको को यह बता सके कि वे किस व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना चाहते है।

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उपरोक्त प्रक्रिया न होने की वजह से मतदाता अपना वोट विधायक को दे देते है, और फिर विधायक मुख्यमंत्री के प्रत्याशी से पैसा लेकर अपना वोट बेच देता है !! अमेरिका में मुख्यमंत्री सीधे मतदाताओ द्वारा चुना जाता है, और मतदाता यदि उसके काम से संतुष्ट नहीं है तो अपना वोट वापसी लेकर उसे समय से पहले निकाल भी सकते है। अत: वहां खुद को बेचने की नौबत नहीं आती।

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समाधान ?

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इसका समाधान प्रस्तावित **वोट वापसी पासबुक** है।

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यह पासबुक हॉर्स ट्रेडिंग की समस्या को काफी हद तक कम कर देगी।

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प्रस्तावित वोट वापसी पासबुक 4*5.5 इंच की है और इसमें कुल 28 पेज है।

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पेज 1 ( सलंग्न चित्र देखें )

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पेज 2 : इस पेज पर धारक की पूरी डिटेल रहेगी।

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पेज 3 : निम्नलिखित 11 अधिकारी एवं जन प्रतिनिधि इस पासबुक के दायरे में आयेंगे : ( सलंग्न चित्र देखें )

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पेज 5 ; वोट वापसी पासबुक इस्तेमाल करने का तरीका -

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पेज 17 : मुख्यमंत्री को स्वीकृति देना ( सलंग्न चित्र देखें )

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**कृपया ध्यान दें :** मुख्यमंत्री को दी गयी आपकी स्वीकृति वोट नहीं है, बल्कि विधायको के लिए एक "सुझाव" है। अत: यदि राज्य के नागरिको का बहुमत किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने के लिए हाँ दर्ज कर भी देता है, तो मुक्यमंत्री को बदलने के लिए नए चुनाव नहीं होंगे। लेकिन विधायक चाहे तो विधानसभा में प्रस्ताव लाकर सबसे ज्यादा स्वीकृति पाने वाले व्यक्ति को सीएम बना सकते है। इस बारे में अंतिम फैसला विधायको का ही होगा।

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## *टिप्पणी 2 : जूरी कोर्ट क़ानून ड्राफ्ट में विधायक एवं सांसद वोट वापसी के दायरे में होंगे। विधायको एवं सांसदों की वोट वापसी के लिए मैंने अलग से क़ानून प्रस्तावित किया है। किन्तु उसे गेजेट में छापने के लिए "लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम" में संशोधन लाना होगा। अत: जूरी कोर्ट कानून यदि गैजेट में छापने से भी सांसद एवं विधायक इस पासबुक के दायरे में नहीं आएंगे।*

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**इस प्रक्रिया के आने से क्या परिवर्तन आएगा ?**

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1. अभी आप यह बता नहीं पाते कि आपके राज्य का मुख्यमंत्री कौन होगा। और इसी वजह से विधायको को मुख्यमंत्री बनाने का एक तरफा एवं निर्णायक अधिकार मिल जाता है। और वे इसका फैसला एवज में मिलने वाले पैसे से करते है। यदि महाराष्ट्र के नागरिको के पास यह पासबुक होती तो वे पटवारी कार्यालय में जाकर या SMS द्वारा यह बता सकते थे कि वे किसे मुख्यमंत्री बनाना चाहते है। असल में महाराष्ट्र के नागरिको ने अपने वोट विधायको को दिए और अब वे विधायक यह वोट बेच कर पैसा बना रहे है !!
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यदि सबसे ज्यादा स्वीकृतियां डेविड फड़नवीस को मिल जाती है तो शिवसेना नागरिको की राय की अवहेलना नहीं कर सकेगी। यदि वे तब भी डेविड फड़नवीस को समर्थन नहीं देते है तो शिव सेना के ज्यादातर विधायक / सांसद / पार्षद अगले चुनाव हार जायेंगे। क्योंकि यह स्थापित हो चुका होगा कि शिवसेना जनता की राय को भेड़ बकरो की गिनती में रखती है। और ठीक यही स्थिति बीजेपी / कांग्रेस / एनसीपी के साथ होगी। तो इस तरह वे अपनी विधायकी को नीलाम नहीं कर पायेंगे।
1. दूसरा फायदा यह होगा कि यदि साल दो साल बाद महाराष्ट्र के नागरिक देखते है कि सीएम एकदम निकम्मेपन से काम कर रहा है तो वे अपनी स्वीकृति किसी अन्य प्रत्याशी को देना शुरू कर सकते है। और तब सीएम अपने उन फैसलों के बारे में पेड मीडिया में मुहं फाड़ कर यह नहीं बोल सकेगा कि — जनता मेरे साथ है !! , जिन फैसलों से राज्य के नागरिको का बहुमत क्षुब्ध है।
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यदि यह स्थापित हो चुका होगा कि महाराष्ट्र के नागरिको का बहुमत पदासीन सीएम को बदलना चाहता है। अत: विधायक जनमत के आधार पर सीएम को बदल सकते है। तब विधायक खुद मुख्तार नहीं रह जाएंगे। अभी वे पैसा इसीलिए ले पाते है, क्योंकि मतदाताओ के पास उन्हें निर्देश भेजने की कोई प्रक्रिया नहीं है।
1. इससे मुख्यमंत्री पर नागरिको का अंकुश आ जाएगा और वह निरंतर अच्छा प्रदर्शन करने की कोशिश करेगा। क्योंकि अब वह जानता है कि नागरिक अपनी स्वीकृति रद्द करके मुझे निकालने का निर्देश दे सकते है। तो इस तरह नागरिको को सीएम को निकालने की जरूरत नहीं पड़ेगी। दुसरे शब्दों में यह इतनी ताकतवर प्रक्रिया है कि जैसे ही महाराष्ट्र के करोड़ो नागरिको की जेब में यह पासबुक जायेगी वैसे ही नेता जिम्मेदारी एवं कर्मठता से पेश आना शुरू कर देंगे !!
1. सबसे महत्त्वपूर्ण बदलाव यह आएगा कि चुनाव निपट जाने के बाद मतदाता स्वतंत्र रूप से यह बता सकते है कि मुख्यमंत्री कौन होना चाहिए। हो सकता है महाराष्ट्र के ज्यादातर मतदाता बीजेपी की सरकार में डेविड फड़नवीस की जगह बीजेपी के किसी अन्य नेता को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हो। और यह भी हो सकता है कि बीजेपी के काफी मतदाता डेविड फड़नवीस से नाराज थे और इस वजह से उन्होंने शिव सेना / कांग्रेस / एनसीपी को वोट कर दिया था। अब यदि चुनाव के बाद उन्हें मौका मिलता है तो शायद वे बीजेपी के किसी नेता X को मुख्यमंत्री बनाने के लिए स्वीकृति दें दें। इस तरह जब मतदाता किसी मुख्यमंत्री को सीधे स्वीकृति देंगे तो यह ज्यादा स्पष्ट सुझाव होगा।

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कृपया इस बात पर ध्यान दें कि यदि महाराष्ट्र के नागरिक मुख्यमंत्री के लिए कोई स्वीकृति नहीं देते है या फिर किसी भी प्रत्याशी को निर्णायक ( 35 से 40% ) स्वीकृतियां नहीं मिलती है तो विधायक अपने विवेक से किसी को भी मुख्यमंत्री बना सकते है। मतलब विधायकों को कोई फैसला लेने के लिए मतदाताओं की स्वीकृतियों का इन्तजार करने की जरूरत नहीं है। वोट वापसी पासबुक की स्वीकृतियां मतदाता के लिए वैकल्पिक है। यदि उसे लगेगा कि विधायक गलत लाइन ले रहे है तो वे अपनी स्वीकृतियां देना शुरू करेंगे या फिर नहीं देंगे। विधायकों को मतदाताओं की स्वीकृतियों पर सिर्फ तब ध्यान देना है जब ये स्वीकृतियां निर्णायक और स्पष्ट हो।

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**अन्य बदलाव : **इसी तरह के बदलाव उन 11 पदों पर भी आएंगे जिन्हे इस वोट वापसी पासबुक के दायरे में लिया गया है। उदाहरण के लिए तब यदि आपके जिले का एसपी ठीक काम नहीं कर रहा है तो आपको सरकार बदलने, या फिर राजधानी में जाकर होम मिनिस्टर से बाथ्ये आने की जरूरत नहीं है। न ही आपको सड़को पर उतर कर कोई मजमा लगाना होगा।

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आप पटवारी कार्यालय में जाकर या SMS द्वारा मौजूदा एसपी को निकालने एवं किसी अन्य को इस पद लाने के लिए स्वीकृति दे सकते है। और इससे मुख्यमंत्री को यह फीड बेक मिलती रहेगी कि नागरिक अपने जिले की पुलिस व्यवस्था से संतुष्ट है या नहीं। और फिर मुख्यमंत्री अमुक व्यक्ति को एसपी बनाने का फैसला ले भी सकते है या नहीं भी ले सकते है। अंतिम फैसला मुख्यमंत्री ही करेंगे। आपकी स्वीकृति एक सुझाव की तरह होगी।

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**अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न :**

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(1) क्या इससे सरकार का खर्चा नहीं बढेगा ?

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नहीं। प्रत्येक नागरिक स्वीकृति दर्ज करने के लिए 3 रू भुगतान करेगा। यदि वह SMS भेजता है तो शुल्क 50 पैसे होगा। तो सरकार पर इससे कोई भार नहीं आता। यदि थोडा बहुत बजट बढ़ता है तो सरकार स्वीकृति शुल्क बढाकर 5 रूपये कर सकती है। किन्तु मेरे प्रस्ताव में इसके लिए नागरिको को भुगतान करना होगा, यह मुफ्त कभी नहीं होगा।

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(2) अतिरिक्त स्टाफ की कितनी जरूरत होगी ?

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यह पूरी प्रक्रिया 2 कार्यालय से चलेगी। पटवारी कार्यालय एवं जिला कलेक्टर कार्यालय। गाँव एवं कस्बों का सारा प्रशासन पटवारी कार्यालय पर टिका होता है, और भारत में पटवार खानों की स्थिति ठीक नहीं है। कई जगहों पर तो पटवारी के पद खाली पड़े है और उन पर अतिरिक्त भार है। मैंने जूरी पंचायत नाम से एक अलग से क़ानून प्रस्तावित किया है जिसकी पहली धारा में यह प्रावधान है कि
* राज्य में पटवारी के सभी रिक्त पदों को भरा जाएगा,
* सभी पटवारी कार्यालयों में पटवारी का स्टाफ 3 व्यक्तियों का होगा एवं
* सभी पटवारखाने 10 से 5 तक खुले रहेंगे। मतलब तब भी, जब पटवारी फील्ड में हो।

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पटवार खानों को सुधारने वैसे भी हमें जरूरत है, क्योंकि गाँवों में पटवार खानों की अनियमितता के कारण नागरिको को काफी समस्या का सामना करना पड़ता है, अत: पटवार खाने हमें वैसे भी सुधारने है। पटवार खाने सुचारू होने से हमें इस प्रक्रिया के लिए किसी अतिरिक्त स्टाफ की जरूरत नहीं है। पटवारी यदि उपलब्ध नहीं है तो उसका क्लर्क स्वीकृति दर्ज कर सकता है।

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कलेक्टर कार्यालय को भी अतिरिक्त स्टाफ की जरूरत नहीं है। क्योंकि कलेक्ट्री में सिर्फ जिले के सभी पटवार खानों की डेटा एंट्री आएगी। और यह एंट्री भी रोज नहीं आएगी, बल्कि सिर्फ प्रति सोमवार को आएगी। यदि कलेक्टर SMS वाला सिस्टम बना देता है तो पटवारी एवं कलेक्टर कार्यालय का भार वैसे भी काफी कम हो जाएगा।

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सार रूप में यह सिस्टम मौजूदा व्यवस्था में ही काम करता रहेगा। इसके लिए अलग से किसी विभाग या इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं है। जहाँ तक पासबुक की बात है। इसकी कीमत प्रति पासबुक लगभग 2 से 3 रू आएगी, जो कि नगण्य है।

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(3) क्या इससे रोज चुनाव नहीं होंगे ?

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वोट वापसी पासबुक का चुनावों से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। यह नागरिको को सुझाव देने की एक अधिकृत प्रक्रिया है। इसमें चुनाव आयोग का कोई सरोकार नहीं है। जैसे आज भारत में चुनाव होते है वैसे ही चुनाव होते रहेंगे, और नागरिको की स्वीकृति सिर्फ परामर्श की तरह होगी। मुख्यमंत्री या विधायक नागरिको के बहुमत का परामर्श मान भी सकते है और नहीं भी मान सकते है। अंतिम फैसला विधायको एवं सीएम का ही होगा। अत: यह व्यवस्था मौजूदा सिस्टम से न तो कोई छेड़खानी करती है, और न ही विधायको, सांसदों एवं सीएम के अधिकारों में कोई कटौती करती है।

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(4) क्या इसमें जालसाजी नहीं होगी ?

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यह विकेन्द्रित, दोहरा सत्यापित एवं ऑफलाइन सिस्टम है। अत: जालसाजी की नहीं जा सकती।

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* विकेन्द्रित :** **विकेंद्रीकृत से मतलब है कि स्वीकृतियो का डेटा सीधे किसी सेंटर पॉइंट पर नहीं जा रहा है। सभी डेटा पटवारखानों के पास है। और कलेक्टर प्रत्येक पटवार खाने के डेटा को संयोजित करके जिले का डेटा प्रदर्शित करेगा। यदि जालसाजी करनी है तो पटवार खाने के स्तर पर करनी होगी और पटवारी तुरंत पकड़ में आ जाएगा। अत: पटवारी अपने डेटा को सुरक्षित बना कर रखेगा।
* दोहरा सत्यापन : जब डेटा की प्रतिलिपि पब्लिक डोमेन में रहती है तो इसका दोहरा सत्यापन किया जा सकता। यहाँ जब भी स्वीकृति दी जा रही है, तब उसकी एंट्री तुरंत दो जगह जा रही है। एक मतदाता की पासबुक में, और दूसरी पटवारी कार्यालय में। प्रत्येक डेटा 2 जगह होने से छेड़छाड़ नही हो सकती।
* ऑफ़लाइन : यदि मतदाता SMS करेगा तो उसके पास फीडबेक मेसेज आएगा। किन्तु यह इंटरनेट से नहीं चलेगा, बल्कि कम्प्यूटर पर ओपरेट होगा। अत: डेटा खोने की या जालसाजी की सम्भावना लगभग शून्य है।

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इस सिस्टम में जब डेटा के साथ यदि छेड़खानी होती है तो आसानी से पकड़ में आ जायेगी और यह भी आसानी से मालूम हो जाएगा कि गड़बड़ कहाँ की गयी है। जब सिस्टम इस तरह का हो कि जालसाजी को पकड़ने की सम्भावना अधिकतम हो तो जोखिम बढ़ जाता है और जालसाजी करने वाले जोखिम उठाने से बचते है। क्योंकि वे जानते है कि यह छिप नहीं पायेगा।

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(5) यदि मतदाता sms करता है तो sms में क्या लिखकर भेजेगा ?

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मान लीजिये रोशन पार्टी X का विधायक है और मुख्यमंत्री की दावेदारी करना चाहता है। तो वह किसी भी समय ( किसी भी समय यानी किसी भी समय। चाहे चुनाव चल रहे हो या नहीं चल रहे हो, या चुनाव आने वाले हो या चुनाव हो चुके हो ) कलेक्टर कार्यालय में जाकर एक शपथपत्र देगा। कलेक्टर रूपये 25 हजार लेगा और रोशन को एक सीरियल नंबर जारी कर देगा।

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यह सीरियल नंबर CM/02/RN पेज नं 17 की तालिका में पंक्ति 2 में देखा जा सकता है। ( सलंग्न चित्र देखें ) अब यदि आपको रोशन को स्वीकृति देनी है तो आप सीरियल नंबर टाइप करके YES लिखेंगे, और SMS भेज देंगे। यदि आपने सीरियल नंबर सही टाइप किया है तो आपको फीडबेक sms आएगा और आपकी स्वीकृति दर्ज हो जायेगी। यदि आप इसे रद्द करना चाहते है तो YES की जगह पर CANCEL लिखकर भेजेंगे।

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(6) यह वोट वापसी पासबुक कैसे जारी होगी ?

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आपको यह पासबुक सिर्फ दो आदमी जारी कर सकते है। आपके राज्य के मुख्यमंत्री एवं प्रधानमंत्री।

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जूरी कोर्ट के प्रस्तावित क़ानून की धारा नं (2) कहती है कि -
> इस क़ानून के गेजेट में आने के 30 दिनों के भीतर राज्य के प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी।

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तो यदि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री जूरी कोर्ट क़ानून गेजेट में छाप देते है तो आपको यह पासबुक जारी हो जाएगी।

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जूरी कोर्ट क़ानून के 3 वर्जन है। तीनो क़ानून अलग अलग है, और इनके दायरे भी अलग है।

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1. **जूरी कोर्ट :** जूरी कोर्ट नामक क़ानून सिर्फ पीएम गेजेट में छाप सकते है। सीएम यह क़ानून गेजेट में नहीं छाप सकते। पीएम यदि इसे छापते है तो यह क़ानून पूरे देश में लागू होगा और भारत के प्रत्येक नागरिक को वोट वापसी पासबुक मिलेगी।
1. **जिला जूरी कोर्ट :** यह क़ानून मुख्यमंत्री अपने राज्य के किसी एक जिले में या एक से अधिक जिलो में लागू कर सकते है, और तब सिर्फ अमुक जिले के नागरिको को यह पासबुक मिलेगी। राज्य के शेष जिले के मतदाताओ को यह पासबुक नहीं मिलेगी। उदाहरण के लिए यदि राजस्थान के सीएम गेजेट में भीलवाड़ा जूरी कोर्ट का क़ानून छापते है तो सिर्फ भीलवाड़ा में ही यह क़ानून लागू होगा। मैंने भारत के सभी जिलो के लिए यह पासबुक लिखी है। जिस जिले के कार्यकर्ता चाहे वे अपने जिले के लिए मुख्यमंत्री से यह पासबुक जारी करने की मांग कर सकते है।
1. **राज्य जूरी कोर्ट : **यह क़ानून यदि गेजेट में आता है तो पूरे राज्य में लागू होगा और राज्य के प्रत्येक नागरिक को यह पासबुक मिलेगी। मैंने सभी राज्यों के लिए पासबुक लिखी है। अत: जिस भी राज्य के नागरिक यह पासबुक चाहते है अपने सीएम से इसकी मांग कर सकते है।

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मैंने इस जवाब में महाराष्ट्र राज्य के मतदाताओ के लिए लिखी गयी पासबुक के नमूने के चित्रों का इस्तेमाल किया है। महाराष्ट्र के लिए लिखे गए क़ानून का नाम "महाराष्ट्र जूरी कोर्ट" है। यदि महाराष्ट्र जूरी कोर्ट क़ानून गेजेट में आता है तो यह पासबुक महाराष्ट्र राज्य के समस्त मतदाताओ को जारी होगी। अन्य राज्यों के मतदाताओ को यह पासबुक नहीं मिलेगी।

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(7) वोट वापसी पासबुक पाने के लिए आम नागरिक क्या कदम उठा सकता है ?

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1. आपको अपने मुख्यमंत्री / प्रधानमन्त्री को इस बारे में सन्देश भेजना चाहिए। यदि आप पीएम / सीएम से मांग नहीं करते तो उनसे शिकायत भी नही कर सकते। मांग करने के कई तरीके हो सकते है। आप अपनी सुविधा एवं संसाधनों के लिहाज से कोई भी तरीका तय कर सकते है। यदि आप मुझसे पूछते है तो मेरा सुझाव है कि आप पीएम / सीएम को एक पोस्टकार्ड लिख सकते है। पोस्टकार्ड में निचे दी गयी इबारत लिखें :
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*मुख्यमंत्री , कृपया जूरी कोर्ट क़ानून गेजेट में छापकर हमे
वोट वापसी पासबुक जारी करे - #JuryCourt
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*यदि ज्यादा से ज्यादा नागरिक पीएम / सीएम से इसकी मांग करते है तो मेरे विचार में इस क़ानून के लागू होने की सम्भावना बढ़ जायेगी।
1. यदि ज्यादा नागरिको तक इस क़ानून की जानकारी पहुंचेगी तो ज्यादा नागरिक इन कानूनों की मांग करेंगे। अत: आप पीएम / सीएम को मांग भेजने के अलावा अन्य नागरिको को भी जूरी कोर्ट के प्रस्तावित क़ानून एवं वोट वापसी पासबुक के बारे में सूचित कर सकते है। सूचित करने के लिए आप विभिन्न तरीको का इस्तेमाल अपने विवेक एवं सुविधा से कर सकते है।

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तो मेरे विचार में यदि भारत के कार्यकर्ता यदि वोट वापसी पासबुक जारी करवाने में सफल हो जाते है तो हॉर्स ट्रेडिंग का सर्कस रोका जा सकता है। वर्ना 70 साल से तमाशा तो चल ही रहा है। कयास लगाते रहिये कि कब कौन बिकेगा, किसकी सरकार बनेगी, और सरकार कितने समय तक चलेगी !!

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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Jun 23 2022 21:45:49 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

अग्निपथ स्कीम :
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(1) इस स्कीम के तहत प्रति वर्ष लगभग उतने ही सैनिक भर्ती किए जाएँगे जितने कि अभी किए जाते है। लेकिन इनमे से कम से कम 75% को 4 वर्षों में रिटायर कर दिया जाएगा। इस तरह 4 वर्ष बाद सेना के आकार में कमी आना शुरू हो जाएगी, और यह निरंतर जारी रहेगी।
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इसके लिए वे ‘Up to 25%’ प्रावधान का इस्तेमाल करेंगे। यानी किसी वर्ष 20% स्थायी करेंगे किसी वर्ष 15% को। हवाला होगा - मापदंडों पर इतने ही खरे उतरे। अनुमान है कि, वे कुछ ही वर्षों में सेना का आकार 25% तक घटा देंगे। मतलब 12 लाख की सेना को 8 लाख पर लाकर पटक देंगे। और इस दौरान वे लगातार यह भी कहते रहेंगे कि — हम सेना का आकार नही घटाएँगे !!
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सेना का आकार कम करने के पथ पर चलना आसान नही है। सरकार के लिए इसीलिए यह अग्निपथ है।
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(2) 15 वर्षों बाद सेना में जितने भी सैनिक होंगे उनमें से सिर्फ़ 25% को ही पेंशन देनी होगी। इस तरह यह योजना अंत में कुल सैनिकों में से 75% सेनिको की पेंशन बंद करती है।
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जो 75% सैनिक रिटायर हो जाएँगे उन्हें पेंशन नही मिलेगी। अतः ये सामान्य वीर नही है। ये अग्निवीर है। दूसरे शब्दों में सरकार ने पेंशन बंद करने के एवज़ में अग्निवीर का टाइटल दे दिया है !!
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(3) सैनिकों की संख्या में कमी, वेतन में कमी और पेंशन में कमी से जो पैसा बचेगा यह पैसा विदेशी हथियार कम्पनियों की जेब में चला जाएगा, और ख़रीद-फ़रोख़्त की इस मद में से एक बड़ा हिस्सा नेता / अधिकारी/ मंत्री आदि खा जाएँगे।
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समाधान :
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(1) हमें सेना का आकार बढ़ाने की ज़रूरत है। कम से कम हमें इसे चीन के बराबर यानी की दुगना करना ही चाहिए।
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(2) स्वदेशी हथियारों के उत्पादन के लिए #Woic क़ानून गेजेट में छापा जाए और रक्षा में FDI पर रोक लगाई जाए।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Jun 28 2022 21:03:28 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

उदयपुर हत्याकांड ;
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वजह - पुलिस एवं अदालतो का भ्रष्टाचार
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समाधान - जूरी कोर्ट एवं वोट वापसी एस.पी का क़ानून लाने के अलावा इस समस्या का कोई इलाज नही है।
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यह अभी शुरुआत है । यदि #JuryCourt गेजेट में नही छापा गया तो हमें साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने वाली इस तरह की घटनाओं की शृंखला देखने को मिल सकती है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Jun 28 2022 22:06:57 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

इस तरह की सैंकड़ों घटनाएँ रोज़ होती है। पर भारत में यदि आप पुलिस की शिकायत भी आपको पुलिस में ही करनी पड़ती है !!
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Solution- #JuryCourt
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ताकि पुलिस के ख़िलाफ़ शिकायत की सुनवाई नागरिकों की जूरी करे। जूरी कोर्ट छपने के अगले ही दिन भारत की पुलिस क़ानून के दायरे में काम करना शुरू कर देगी।

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