Pawan Jury BhilwaraRj
Mon Jul 01 2019 19:20:06 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Mon Jul 01 2019 19:20:06 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Mon Jul 01 2019 20:31:57 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
एक देश एक चुनाव
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सबसे पहले मेरा ऐतराज पेड मीडिया द्वारा दिए गए इस लेबल से है -- एक देश एक चुनाव !!!
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बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको ने एक बहुत ही कैची नारा गढ़ा है। मतलब हमेशा की तरह उन्होंने इसके लेबल में ही इतनी चाशनी डाल दी है कि इसे सुनकर राष्ट्रवादी प्रस्ताव का बोध होने लगता है !! किन्तु हमेशा की तरह यह लेबल भी प्रस्तावित प्रक्रिया को गलत तरीके से परिभाषित कर रहा है।
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दरअसल इसे " मतदाताओ के अधिकारों में कटौती का प्रस्ताव " कहा जाना चाहिए। और यह भारत के मतदाताओं की शक्ति एवं अधिकारों में बहुत भयंकर कमी लाएगा है।
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कैसे ?
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शासन प्रणाली में 2 पक्षकार होते है।
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शासक और
जनता
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सभी देशो के बहुधा नेता और सरकारे एंटी-नेशनल होती है, और वे देश को पूरा का पूरा इसीलिए बेच नहीं पाते है क्योंकि उनको एक निश्चित अवधि के बाद जनता की सहमती लेने जाना पड़ता है। तो जहाँ लोकतंत्र नहीं रहा वहां के शासको ने जनता को पीस के रख दिया। जनता की यह सहमती अंकुश का काम करती है और सरकार / नेता पूरी नंगई पर नहीं उतर पाता। जिस देश में नागरिको की सहभागिता घटेगी उस देश में लोक कमजोर होगा, और कुलीनों+धनिकों+नेताओं की शक्ति बढ़ जायेगी। जब उनकी शक्ति बढ़ेगी तो वे देश को कतरा कतरा करके पूरा निगल जायेंगे। यह शर्त सिर्फ भारत पर लागू नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के सभी देशो पर लागू है। जिस देश के शासन में नागरिको सहभागिता बढ़ती है वहां शासन में उतना ज्यादा सुधार आते है।
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नागरिको की सहभागिता से आशय क्या है ?
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नागरिको की सहभागिता से आशय है -- जनता द्वारा अधिकृत और संगठित तरीके से शासन के सामने अपनी मांग / सुझाव / शिकायत रखना, या संवाद करना।
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सभी नेता और सरकारें एक तरफ़ा सम्वाद चाहते है। मतलब वे चाहते है सिर्फ उनके पास कहने के माध्यम और मौके हो। जनता के पास नहीं। नेता रैली में आकर सुनाकर निकल जाता है। टीवी पर आकर स्क्रिप्टेड इंटरव्यू देता है, ( इनमे सभी सवालात वगेरह पहले से तय होते है !! ) स्क्रिप्टेड प्रेस कोंफ्रेस करता है, टीवी पर आकर बहस करता है और चला जाता है, रेडियो पर आकर बोलता है। राष्ट्र के नाम सन्देश देता है इत्यादि। मतलब हर माध्यम से नेता ही बोलता है !! और इस एक तरफ़ा संवाद को विश्वसनीय बनाने और फैलाने के लिए मीडिया का इस्तेमाल किया जाता है।
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तो यदि देश की 90 करोड़ जनता को शासन से संवाद करना हो तो जनता संवाद कैसे करे ?
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धरना-प्रदर्शन करना संवाद करना नहीं है। क्योंकि यह भीड़ की शक्ल में होता है, और सिर्फ 0.001% लोग ही रोड़ पर इस तरह का तमाशा खड़ा करने में सहज महसूस करते है। ट्विटर, फेसबुक आदि तो अनाधिकृत एवं आभासी आइडेंटीटी है और राजनैतिक आई टी सेलो का इस पर वर्चस्व है. वे जिसे चाहे 4 घंटे में पूरे देश में ट्रेंड करवा सकते है !! किन्तु वोटिंग प्रक्रिया संवाद करने का एक अधिकृत तरीका है।
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मतदान में देश के प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार होता है कि अधिकृत तरीके से शासन पर अपनी प्रतिक्रिया दे। और अधिकृत प्रतिक्रिया होने के कारण इसमें वैल्यू होती है। उदाहरण के लिए 2012 में भी अधिकृत तथ्य यही था कि देश की जनता मनमोहन सिंह के साथ है। जबकि पूरा देश और मनमोहन भी जानता था कि देश की जनता शासन के साथ नहीं है। तो जनता को अगले 3 वर्ष तक चुनाव का इन्तजार करना पड़ा। वजह - भारत में ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है कि भारत की जनता 5 वर्ष से पहले अपनी राय अधिकृत रूप से रख सके।
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किन्तु भारत में शासन के 3 स्तर है और इस वजह से प्रत्येक मतदाता के पास 5 वर्ष में 3 बार यह मौका आता है कि वह शासन पर मतदान के रूप में टिप्पणी कर सके। तो औसतन प्रत्येक पार्टी को हर 1-2 साल में किसी न किसी रूप में जनता के बीच जाना पड़ता है। और जनता के बीच यह जाना ही अंकुश का काम करता है। एक देश एक चुनाव मतदाताओ के अधिकारों में इसी कटौती का नाम है !!
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( इसके पक्ष में पेड मीडिया द्वारा खर्चा बचने का तर्क दिया जा रहा है। इस तर्क को काटने के लिए व्यक्ति का आई क्यू लेवल 4 अंको में होना जरुरी है, और मेरा आई क्यू लेवल सिर्फ 3 अंको में है। अत: इस तर्क को समझना एवं इसे काटना मेरी रेंज से बाहर है। )
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बहरहाल, यदि यह नीति लागू हो जाती है तो यह एंटी डेमोक्रेसी स्टेप होगा। और यदि डेमोक्रेसी देश के फेवर में है तो यह एंटी नेशनल स्टेप भी है। इस नीति के आने से पेड मीडिया के प्रयोजको की ताकत कई गुना बढ़ जायेगी। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का प्रस्ताव होने के कारण मुझे नहीं लगता कि देश की कोई भी बड़ी पार्टी इसका विरोध करने का साहस नहीं दिखायेगी।
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निचे नागरिको की सहभागिता के आधार पर अमेरिका एवं भारत के नागरिको की शासन में भूमिका की तुलना रखी गयी है। इसे पढने से आप समझ सके कि हमें किस दिशा में गाड़ी आगे बढ़ानी चाहिए और हमें किस दिशा में धकेला जा रहा है !!
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अमेरिका का मतदाता निम्नलिखित कार्य करता है :
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(01) वह ज्यूरी में बैठकर मुक़दमे सुनता है, और यह तय करता है कि आरोपी को रिहा किया जाना चाहिए या जेल में पहुंचा देना चाहिए। वह यह भी तय करता है कि आरोपी को दी जाने वाली सजा की सीमा क्या होनी चाहीये।
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(02) ज्यूरी के माध्यम से वह फैक्ट्री मालिकों / व्यवसायीयों को सरकारी अधिकारियों और श्रमिको द्वारा उत्पन्न किये जा रहे गैर जरुरी अवरोधों से सुरक्षा प्रदान करता है।
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(03) वह ग्रांड ज्यूरी में बैठकर भी उपरोक्त श्रेणी के कार्य करता है।
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(04) वह सिटी काउंसलर, मेयर, जिला जज, जिला लोक अभियोजक, जिला शिक्षा अधिकारी और जिला पुलिस अधिकारियों को चुनता है।
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(05) यदि इन अधिकारियों में से कोई भ्रस्ट आचरण करता है तो वोट वापसी कानूनों का उपयोग करके उसे पद से हटाता है।
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(06) विधायक, मुख्यमंत्री और राज्यों के मुख्य न्यायधीशों को चुनता है।
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(07) इनमे से किसी अधिकारी के भ्रष्ट हो जाने पर उन्हें रिकॉल करता है।
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(08) लोकसभा, राज्य सभा एवं राष्ट्रपति को चुनता है। ( इन पदो पर रिकॉल प्रक्रियाए नहीं है )
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(09) जिला स्तर पर जनमत संग्रह प्रक्रियाओ में भाग लेकर क़ानून बनाता है।
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(10) राज्य स्तर पर जनमत संग्रह द्वारा क़ानून बनाने का कार्य करता है।
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मतलब अमेरिका में वहां के नागरिक के पास ऐसे कई अधिकृत तरीके है जिससे वे शासन में भागीदारी करता है। अमेरिका के नागरिक वहां की व्यवस्था में भारतीयों की तुलना में ज्यादा सक्रीय भूमिका निभाते है। इसीलिए वे बेहतर स्थिति है।
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भारत में मतदाता सिर्फ 3 काम करता है :
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1. पार्षद / पंचायत सदस्य को चुनता है,
2. विधायक को चुनता है, और
3. सांसद को चुनता है।
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और अब खर्चा बचाने के नाम पर उसे कहा जा रहा है कि इस काम को करने के लिए तुम्हे 5 वर्ष में जो 3 बार अवसर मिलता है अब सिर्फ 1 बार मौका मिलेगा। मतलब मतदाता के संवाद करने की आवृत्तियों की संख्या को घटाया जा रहा है !!! और फिर 5 साल तक मतदाता की हैसियत कोने में पड़े एक फर्नीचर की तरह रहेगी। या फिर वे चाहे तो लोकतंत्र को जिन्दा रखने और अपनी आवाज उठाने के नाम पर वे अनाधिकृत रूप से यानी सडक छाप तरीको का इस्तेमाल करके सड़को पर आकर हंगामा कर सकते है !!!
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Mon Jul 01 2019 20:44:36 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
क्या होगा अगर फेसबुक यूजर से फेसबुक को उपयोग करने के लिए फीस लेना शुरू कर देगा ?
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फेसबुक और इसी तरह की विशालकाय सोशल मिडिया कंपनियां जो कि पेड मिडिया का ही आधुनिक संस्करण है, घाटे में व्यवसाय करती है। इन कम्पनियो का घाटा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रायोजक पूरा करते है। सोशल मीडिया होने के कारण इसका राजनैतिक महत्त्व है, और इसीलिए सूचनाओं पर अपना पूर्ण नियंत्रण रखने के लिए उपभोक्ता को मुफ्त सर्विस दी जाती है। यदि यूजर से भुगतान लिया जाएगा तो यूजर के कानूनी अधिकार खड़े हो जाएंगे।
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राइट्स खड़े होने के बाद फेसबुक उन यूजर्स को ऐसे विवरण अपने प्लेटफॉर्म पर लिखने से रोक नहीं पायेगा, जो फेसबुक के प्रायोजकों के एजेंडे के खिलाफ है। कंटेंट पर नियंत्रण खोने के कारण फेसबुक के प्रायोजक फेसबुक का घाटा पूरा करना बंद कर देंगे, और फेसबुक बंद हो जाएगा !!
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कैसे ?
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फेसबुक किसी भी यूजर को असीमित डेटा अपलोड करने की सुविधा देता है, और इसके लिए कोई भुगतान नहीं लेता। मुफ्त सर्विस होने के कारण फेसबुक एवं यूजर्स के बीच में कोई करार या अनुबंध नहीं है। राइट्स सिर्फ तब पैदा होते है जब दो पक्षकारो के बीच किसी प्रतिफल का आदान प्रदान हुआ हो।
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उदाहरण के लिए : एक उम्मीदवार चुनाव में आकर कोई वादा करता है, और वादे पूरे करने के लिए स्टाम्प पर एक शपथ पत्र भी प्रस्तुत करता है। किन्तु यदि चुनाव जीतने के बाद वह अपने वादे से मुकर जाता है, तो क्या मतदाता द्वारा उम्मीदवार को कोर्ट में घसीटा जा सकता है ? नहीं घसीटा जा सकता !! क्योंकि उम्मीदवार ने जो वादे किये थे उसके एवज में मतदाता ने किसी भी प्रकार का कोई भुगतान नहीं किया है, और न ही किसी प्रतिभूति का त्याग किया है। इस वजह से कानूनी रूप से यह एक शून्य करार है।
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फेसबुक भी यूजर्स को मुफ्त में सेवाएँ देता है किन्तु एवज में कोई मूल्य नहीं लेता। और इस वजह से यूजर्स न तो कोई शर्त रख सकता है, और न ही फेसबुक से किसी प्रकार के कोई नीति गत सवाल कर सकता है।
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अब मान लीजिये कि एक यूजर A से फेसबुक 100 रूपये मासिक लेना शुरू करता है।
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किन्तु तब A फेसबुक से यह प्रश्न कर सकता है कि आपकी संचालन नीति को जाहिर कीजिये !! और जब फेसबुक A से शुल्क लेगा तो उसे पहले अपनी नीति भी बतानी होगी !! A फेसबुक को कोर्ट में लाकर यह सवाल पूछ सकता है कि मेरा अमुक पोस्ट या मेरे अमुक ग्रुप को बेन क्यों किया गया है !! और फेसबुक को इसकी वजह बतानी होगी !! इस वजह से फेसबुक में सेवाएं देने के एवज में वैकल्पिक भुगतान की व्यवस्था नहीं रखी जाती है !!
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और यदि ऐसा हो जाता है तो ज्यादा गंभीर और मौलिक लेखक फेसबुक पर आने लगेंगे और वे ऐसी गंभीर एवं वाजिब सूचनाएं फैलाने में फेसबुक का इस्तेमाल करेंगे जिससे फेसबुक के छिपे हुए हितो को क्षति पहुँचती है !! तो ऐसी 0.1% सामग्री को सेंसर करने के लिए सभी को मुफ्त सर्विस दी जाती है !!
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उदाहरण के लिए : जब चुनाव आते है तो फेसबुक के प्रायोजक किसी पार्टी X से करार करते है, और उन्हें फेसबुक की सहायता से चुनाव जीतने में मदद करते है। ऐसे करार हमेशा कानूनों के रूप में किये जाते है। मतलब प्रायोजक कहेंगे कि यदि आप सत्ता में आने के बाद अमुक अमुक क़ानून छापने को सहमत हो तो हम फेसबुक का इस्तेमाल करके आपको चुनाव जीता देंगे। समझौता होने के बाद प्रायोजक अपने पपेट ( जुकेरबर्ग ) से पार्टी X को फेवर करने को कहेगा।
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तब फेसबुक निम्नलिखित कदम उठाएगा :
(1) फेसबुक उन खातो, पेजों, ग्रुप्स को चिन्हित करेगा जो ऐसी सूचनाएं फैला रहे है जिससे पार्टी X को नुकसान होता है।
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(2) और चुनाव से एन पहले फेसबुक इनमे से कुछ प्रोफाइल्स को डिलीट कर देगा और कुछ पर फिल्टर लगायेगा।
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(3) साथ ही पार्टी X को फेवर करने वाले ग्रुप्स, पेजेज आदि को बूस्ट करेगा और अधिकतम यूजर्स के न्यूज फीड पर ये पोस्ट भेजने लगेगा।
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अब यदि कोई समूह चाहता है कि चुनाव के दौरान उसे सेंसर नहीं किया जाए या उसकी आई डी पर फिल्टर नहीं लगाया जाए तो वह फेसबुक को भुगतान करने को तैयार हो जाएगा और फेसबुक उसे सेंसर करने की क्षमता खो देगा। सिर्फ 0.1% यूजर ही फेसबुक की राजनैतिक ताकत ख़त्म करने के लिए काफी है।
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तो यदि फेसबुक भुगतान लेने की व्यवस्था शुरू करता है तो सिर्फ 0.1% यूजर ही फेसबुक को भुगतान करेंगे। किन्तु इन 0.01% यूजर्स का राजनैतिक महत्त्व इतना ज्यादा है और वक्त के साथ यह इतना बढ़ता जाएगा कि फेसबुक राजनैतिक नतीजो को नियंत्रण करने की क्षमता खो देगा। यदि फेसबुक राजनैतिक नियंत्रण खो देता है तो उसके प्रायोजक घाटा उठाना बंद कर देंगे।
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तो इन 0.01% यूजर्स को कंट्रोल में रखने के लिए फेसबुक शेष सभी 99.99% को मुफ्त सेवाएं देता है। ये 99.99% लोग मनोरंजन प्रधान नागरिक होते है और फेसबुक के प्रायोजक इन्हें फेसबुक पर चाहते है। क्योंकि ये वे मतदाता है जिन्हें प्रभावित करके राजनैतिक नतीजे प्रभावित किये जाते है। मुफ्त सर्विस के एवज में फेसबुक पहले सभी को अपने प्लेटफोर्म पर लाता है। फिर उनमे से मनोरंजन प्रधान नागरिको को डिस्टर्ब किये बिना चुनावों के दौरान राजनैतिक रूप से महत्त्व रखने वाली प्रोफाइल्स को छांट देता देता है, ताकि सूचनाओं को नियंत्रित किया जा सके।
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जैसे जैसे फेसबुक की ताकत बढ़ेगी, इसके प्रयोजको की ताकत बढ़ेगी और भारत के नेताओं से नेगोशिएशन करने की उनकी ताकत में भी इजाफा होगा !! मतलब फेसबुक के प्रायोजक हमारे नेताओं को और भी अच्छे से धमका पायेंगे !! तो यह ऐसा प्लेटफोर्म है जहाँ विदेशियों द्वारा भारत के मतदाताओ को मुफ्त सर्विस देकर लाया जा रहा है, ताकि नेताओं को काबू में रखा जा सके।
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कृपया पाठक इस बिंदु को नोट करें कि यदि फेसबुक वैकल्पिक भुगतान लेने की व्यवस्था भी शुरू कर देता है तो फेसबुक बंद हो जाएगा !! मतलब यह एक गलत धारणा है कि, यदि फेसबुक पैसा लेना शुरू करेगा तो लोग फेसबुक प्लेटफोर्म छोड़ देंगे। यदि ऐसा है तो फेसबुक वैकल्पिक भुगतान की व्यवस्था रख सकता है।
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मतलब जो पैसा देना चाहता है वह पैसा दे सकता है, और फेसबुक उस प्रोफाइल को कोई ग्रीन मार्क या वेरीफाईड प्रोफाइल का सिम्बल दे सकता है। यदि ऐसा होता है तो फेसबुक को एक भी यूजर नहीं गंवाना होगा। किन्तु फेसबुक ऐसा कभी नहीं करेगा। क्योंकि जो लोग फेसबुक को पैसा चुकायेंगे फेसबुक उनके प्रति कानूनी रूप से जवाबदार हो जाएगा।
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Mon Jul 01 2019 21:03:26 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
एक जागरूक नागरिक की परिभाषा क्या है ?
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जागरूक शब्द का कोई ठीक ठीक अर्थ नहीं किया जा सकता। यह काफी फैला हुआ शब्द है, और व्यक्ति अपनी मर्जी से इसकी व्याख्या कर सकता है। जागरूक शब्द का कोई सार्वभौमिक और सटीक अर्थ नहीं है। जागरूक शब्द की जगह मैं जिम्मेदार या सूचित शब्द का इस्तेमाल करता हूँ।
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एक जिम्मेदार नागरिक की परिभाषा क्या है ?
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नागरिक दो प्रकार के होते है :
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एक वे होते है जो अपना नागरिक कर्तव्य पूरा करते है।
दुसरे जो अपना कर्तव्य पूरा नहीं करते।
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नागरिक कर्तव्य क्या है ?
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5 वर्ष में एक बार वोट करने से नागरिक की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती है। भारतीय संविधान के अनुसार प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए आवश्यक निर्देश अपने प्रतिनिधियों यथा प्रधानमंत्री जी एवं मुख्यमंत्री जी को भेजे। जब आप वोट करते है तो यह एक समग्र निर्देश होता है, और सिर्फ यह इंगित करता है कि आप किस पार्टी/ व्यक्ति को सरकार चलाने की सहमती दे रहे है। भारत में ज्यादातर नागरिक यह मानते है कि ( और इसकी वजह फिर से पेड पाठ्यपुस्तके एवं पेड मीडिया है ) वोट करना ही नागरिक कर्तव्य है। जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है।
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जब आप वोट करते है तो उसमे वे निर्देश शामिल नहीं होते कि चुना जाने वाला व्यक्ति सरकार चलाने के दौरान किस तरह के फैसले लेगा, और कौनसे क़ानून गेजेट में छापेगा। यह उसी प्रकार से है कि आप नौकर की नियुक्ति तो कर देते है किन्तु उसे यह निर्देश नहीं देते कि उसे कौनसे कार्यो को वरीयता से पूरा करना है और कौनसे कार्य नहीं करने है। और यदि आप नौकर को कोई कोई निर्देश नहीं भेजते तो आप नौकर के कृत्यों पर शिकायत करने का हक़ भी खो देते है।
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उदाहरण के लिए एक कर्तव्यनिष्ठ नागरिक यदि देखता है कि सरकारी स्कूलों या सरकारी अस्पतालों की दशा बदतर हो रही है और इन्हें सुधारे जाने की जरूरत है तो सबसे पहले वह ये बात पीएम या सीएम को कहेगा। यदि वह पीएम को इस बारे में सूचित नहीं करता या कोई निर्देश नहीं भेजता तो मेरा मानना है कि वह अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहा है, और इसीलिए वह एक जिम्मेदार नागरिक नहीं है।
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नागरिकों का वर्गीकरण :
(1) निष्क्रिय नागरिक
(2) जिम्मेदार नागरिक
(3) गैर जिम्मेदार नागरिक
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(1) निष्क्रिय नागरिक : देश में ऐसे भी कई नागरिक होते है जिन्हें या तो कोई विशेष समस्या नहीं होती या फिर वे इसका समाधान राजनैतिक रूप से नही देखते। अत: उनके लिए इस बात की छूट होती है कि वे पीएम या सीएम को कोई निर्देश नहीं भेजे। उदाहरण के लिए यदि नागरिक A यह देखता है कि शिक्षा एवं चिकित्सा महंगी हो रही है और यदि उसका मानना है कि इस समस्या के समाधान के लिए मुझे और भी ज्यादा पैसा बनाने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि मैं इस समस्या के दायरे से बाहर हो जाऊं। तो मैं कहूँगा कि वह राजनैतिक रूप से निष्क्रिय नागरिक है, जो एक देश व्यापी समस्या का समाधान निजी स्तर पर ढूंढ रहा है।
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दिक्कत तब आती है जब वह पुलिस एवं भ्रष्ट जजों की चपेट में आकर भी यह सोचने लगता है कि थानों एवं अदालतों को सुधारने से आसान यह है कि मैं और भी ज्यादा पैसा बनाऊ ताकि पुलिस एवं जजों को खरीद सकू !!
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बहरहाल, मैं इन्हें गैर जिम्मेदार नागरिक नहीं कहता, बल्कि राजनैतिक रूप से निष्क्रिय नागरिक कहता हूँ। और मेरा मानना है कि इनकी संख्या बढ़ने या घटने से देश को कोई विशेष नुकसान नहीं होता। वजह इसकी यह है कि सभी देशो में लगभग 97 से 98% नागरिक इसी श्रेणी के होते है, और राजनैतिक विमर्श में हिस्सा नहीं लेते।
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वे राजनैतिक रूप से सिर्फ तब सक्रीय होते है जब छुरी उनके गले तक आ चुकी होती है और राजनैतिक हल के अलावा बचने का कोई मार्ग नहीं होता। तो उस दौर में वे अल्पकाल के लिए सक्रीय होते है और समस्या का समाधान होने पर या थोड़ी अवधि के लिए सक्रियता दिखाकर फिर से पुराने खांचे में लौट आते है। तो राजनैतिक रूप से यह एक विशुद्ध मतदाताओ का वर्ग है, जिन्हें पेड मीडिया एवं नेताओं द्वारा चाबी देकर चुनाव के दिन मतदान केन्द्रों की और धकेला जाता है।
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जब वोट करना होता है तो ये देखते है कि किसे वोट करना चाहिए, जिस व्यक्ति / दल के बारे में इनका मानना होता कि अमुक को वोट देने से व्यवस्था में आवश्यक बदलाव आयेंगे उन्हें वोट कर देते है। सभी देशो में इन निष्क्रिय नागरिको की इतनी ही भूमिका होती है। ऐसा नहीं है कि इनमे देश के प्रति निष्ठा नहीं होती। पर बहुधा यह सामयिक या अल्पकालिक होती है।
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यदि आप इन्हें देश हित में कोई कदम उठाने को कहेंगे और यदि इससे उन्हें कोई ज्यादा नुकसान नहीं हो रहा होगा, तो बहुधा ये लोग वह कदम उठाते है। फर्क इतना है कि आपको इन्हें कहना होता है। यदि आप इनसे नहीं कहेंगे तो ये आगे होकर नहीं उठाएंगे। बस इतना ही फर्क है। अमूमन इनके सोशल मीडिया एकाउंट पर आपको राजनैतिक सामग्री नहीं मिलेगी। कोई मुद्दा ज्यादा ही वायरल हो जाए तो ये उसमे अल्पकालिक रुचि दिखाते है, और फिर से अपनी पारिवारिक-सामाजिक-मनोरंजन प्रधान दुनिया में लौट जाते है।
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(2) जिम्मेदार नागरिक : इस श्रेणी में वो लोग है, जो अपने नागरिक कर्तव्य को पूरा करते है। यदि व्यवस्था में कोई सकारात्मक बदलाव लाने के लिए इनके पास कोई सुझाव, मांग आदि होती है तो ये सीधे अपने प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री को कहते है।
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उदाहरण के लिए, यदि एक जिम्मेदार नागरिक यह मानता है कि WTO एग्रीमेंट रद्द होना चाहिए, या बंगलादेशी घुसपेठिये देश से खदेड़े जाने चाहिए या सरकार को ऐसा अन्य कोई फैसला लेना चाहिए तो वह सबसे पहले यह बात / मांग / सुझाव पीएम या सीएम को भेजेगा। और तब अन्य नागरिको से कहेगा। और यदि अमुक नागरिक ने Pm को कोई मांग या शिकायत भेजी है और मान लीजिये कि फिर भी Pm ने इसके लिए आवश्यक कदम नहीं उठाये है, सिर्फ और सिर्फ तब एक जिम्मेदार नागरिक सार्वजनिक रूप से उस मुद्दे पर Pm की आलोचना करता है।
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एक जिम्मेदार नागरिक सिर्फ आलोचना करने के लिए या अपना टाइम पास करने के लिए किसी मुद्दे पर Pm-Cm को नहीं कोसता। वह चाहता है कि समस्या का समाधान आये। इसीलिए वह Pm को अवश्य कहता है।
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और इस बात से कभी कोई फर्क नहीं आता कि कोई जिम्मेदार नागरिक किस पार्टी का कार्यकर्ता या मतदाता है। क्योंकि एक बार चुनाव ख़त्म होने के बाद जो भी व्यक्ति Pm होता है वह पूरे देश का प्रधानमंत्री एवं प्रतिनिधि होता है। अत: यहाँ पार्टी बाजी का कोई लेना देना नहीं होता।
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उदाहरण के लिए मान लीजिये कि मैं Wto रद्द करना चाहता हूँ और पार्टी A का कार्यकर्ता हूँ। अब यदि पार्टी A का व्यक्ति Pm बन जाता है, तब भी और यदि पार्टी B का व्यक्ति Pm बन जाता है तब भी मेरा यह नागरिक कर्तव्य है कि मैं Pm को सूचित करूँ कि वे Wto एग्रीमेंट रद्द करें। और सिर्फ तब ही मैं इस विषय पर Pm की आलोचना कर सकता हूँ, अन्यथा नहीं। क्योंकि यदि मेरे वोट से पार्टी A का Pm बन जाता है तब भी मेरे द्वारा दिए गए वोट में यह नहीं लिखा हुआ था कि मैं यह वोट Wto एग्रीमेंट रद्द करने को दे रहा हूँ और यदि पार्टी B का व्यक्ति Pm बन जाता है तब भी मुझे यह संवैधानिक अधिकार है कि मैं अपने सेवक को आवश्यक निर्देश भेजूं।
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(3) गैर जिम्मेदार नागरिक : इस श्रेणी में वे नागरिक है जो अपने आस पास के लोगो में व्यवस्था के खिलाफ शिकायत करते है , सुझाव देते है, मांग करते है, किन्तु अपनी शिकायत- सुझाव- मांगे Pm-Cm को कभी नहीं भेजते। मैं इन्हें टाइम वेस्टर यानी नागरिको का समय बर्बाद करने वाले कार्यकर्ता कह कर संबोधित करता हूँ। अमेरिका एवं ब्रिटिश भारत की तुलना में आगे निकल गए उसकी एक सबसे बड़ी वजह यह रही कि पेड मीडिया के प्रायोजक भारत के कार्यकर्ताओ को टाइम बर्बाद करने वाली गतिविधियों में उलझाए रखने में सफल रहे !!
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आपको अपने आस पास राजनैतिक रूप से सक्रीय ऐसे कई नागरिक / कार्यकर्ता मिलेंगे जो विभिन्न राजनैतिक-आर्थिक-धार्मिक मसलो पर वे सोशल मीडिया पर दिन में 10 पोस्ट करते है, धरने-प्रदर्शन आदि करते है किन्तु उनमे से बहुधा Pm-Cm को इस बारे में कभी भी सूचित नहीं करते।
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वे कहते है कि भारत को WTO समझौता रद्द कर देना चाहिए, और वे लोग दिन में 4 बार यह बात कहते है। किन्तु जब मैं उनसे कहता हूँ कि क्या आपने यह बात कहने के लिए Pm को चिट्ठी भेजी है ? तो बहुधा उनके पास कोई जवाब नहीं है। मतलब वे सिर्फ 0 ( zero) के पीछे और 0 और 0 के पीछे फिर 0, 0, ....0 लगाते रहते है किन्तु इसके पहले अंक लगाना भूल जाते है !!
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यही स्थिति उन लोगो की है जो दिन में 56 बार कहते है कि जनसँख्या नियन्त्रण के लिए क़ानून बनना चाहिए, गौ हत्या बंद होनी चाहिए आदि आदि। किन्तु जब मैं उनसे कहता हूँ कि ये क़ानून तो सिर्फ Pm ही बना सकते है, मैं नहीं बना सकता, तो क्या आपने Pm को चिट्ठी लिखकर "टू चाइल्ड पालिसी" क़ानून को गेजेट में छापने के लिए कहा है, तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता।
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दरअसल इनकी स्थिति उस वकील की है जो पान के गल्ले पर मुकदमे से जुड़े सभी सबूत दिखाता है, तर्क करता है, और अपनी बात को सही साबित करने की पूरी कोशिश करता है, किन्तु अदालत में जज के सामने जाते ही खामोश हो जाता है !!!
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इसी श्रेणी में वे लोग भी शामिल है जो राजनैतिक रूप से काफी सक्रीय रहते है और छोटे मोटे संघठन चलाते है। दरअसल उनकी रुचि समस्या के समाधान में नहीं होती, बल्कि समस्या को उभाड़ने में होती है, ताकि नागरिको का ध्यान अपनी और खींच कर अपने संगठन एवं खुद का नाम चमकाया जा सके।
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इसीलिए उनका मानना होता है कि Pm को कुछ भी कहने से पहले लोगो को उनके संगठन से जुड़ जाना चाहिए। फिर वे लोगो को इकट्ठा करके सड़क पर एक मजमा बनाते है, और यह मजमा दिखाकर अन्य नागरिको को भी अपनी और खींचते है। इस तरह वे अपने संगठन को बड़ा करते जाते है। उनका हमेशा कहना होता है कि आप Pm को सीधे चिट्ठी मत भेजो, पहले हमारे संगठन से जुड़ जाओ। मेरा उनसे कहना होता है कि आप संगठन चलाओ, मजमा बनाओ, सोशल मीडिया पर अपने मुद्दे के बारे में लिखो और जो चाहे करो, किन्तु सबसे पहले आपको अपने मुद्दे के बारे में pm को कहना चाहिए। यदि आप यह मांग Pm को नहीं भेज रहे है तो अपना और अन्य लोगो का समय जाया कर रहे है।
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मेरा मानना है कि जिस देश में श्रेणी 2 के नागरिको की संख्या बढती है, उस देश की व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव आते है। श्रेणी 2 के नागरिक देश की संपत्ति है, जबकि श्रेणी 3 के नागरिक देश का दायित्व !! श्रेणी 1 के नागरिको को मैं उदासीन मानकर चलता हूँ ,और उन पर कोई भार नहीं रखता।
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Pm या Cm को कहने के लिए नागरिको को किस माध्यम का इस्तेमाल करना चाहिए ?
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इस बारे में भिन्न भिन्न व्यक्तियों की भिन्न भिन्न राय हो सकती है। किन्तु इस बारे में मेरा मानना है कि नागरिको को Pm को निर्देश भेजने के लिए चिट्ठी या पोस्टकार्ड का ही इस्तेमाल करना चाहिए। आप ट्विट भी कर सकते है, या मेल वगेरह भी कर सकते है। मैं इन तरीको का विरोध नहीं करता। किन्तु मेरा मानना है कि ये सभी तरीके अनाधिकृत है। आप Pm को सूचित करने के लिए किसी भी तरीके का इस्तेमाल करें, किन्तु जब तक आप चिट्ठी नही भेजते तब तक मेरा मानना है कि आपने Pm को कहने के लिए प्रोपर रूट का इस्तेमाल नहीं किया है।
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क्यों नागरिको के लिए Pm को कहने के लिए चिट्ठी भेजना सबसे सही, सटीक एवं व्यवहारिक तरीका है ?
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(a) तरीका ऐसा होना चाहिए जिसे देश के सभी 90 करोड़ नागरिक इस्तेमाल कर सके। पोस्टकार्ड या चिट्ठी भेजना उन व्यक्तियों के लिए भी संभव है जो सुदूर गाँवों में रहते है।
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(b) भारत में आज भी करोड़ो लोग है जो दिन का 50 रुपया कमाने के लिए संघर्ष करते है। इसीलिए यह बेहद सस्ता होना चाहिए। पोस्टकार्ड 50 पैसे में आता है। और देश के प्रत्येक नागरिक बजट में है।
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(c) माध्यम ऐसा होना चाहिए कि यदि Pm इसे सत्यापित करना चाहे तो वे ऐसा कर सके। यदि आप सिर्फ अपना नाम एवं वोटर नंबर लिखकर पोस्टकार्ड भेजते है तब भी Pm इसे सत्यापित कर सकते है। और आप भी साक्ष्य के लिए पोस्टकार्ड भेजने से पहले इसकी फोटो कॉपी करवाकर अपने पास रख सकते है।
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(d) चिट्ठी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि नागरिक को किसी संगठन की जरूरत नहीं है। किसी मीडिया की जरूरत नहीं है। और वह अकेले ही जब समय मिले तब किसी विषय को लेकर Pm को चिट्ठी भेज सकता है।
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क्या Pm को भेजी गयी सभी चिट्ठियां पढ़ी जाती है ?
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Pm को भेजी गयी सभी चिट्ठियां पढ़ी जाती है और इसका रिकॉर्ड भी रखा जाता है। और ज्यादा नागरिको द्वारा मांग किये जाने पर Pm इस पर कार्यवाही भी करते है। एक साक्ष्य निचे दिया गया है। अमुक व्यक्ति ने Pm को चिट्ठी भेजकर आत्महत्या की धमकी दी थी। इसे तुरंत गिरफ्तार किया गया।
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<https://bit.ly/2JnGuue>
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क्या नागरिक को चिट्ठी भेजने का रिकॉर्ड भी रखना चाहिए ?
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हाँ। सही तरीका तो यही है कि जब भी आप Pm-Cm को चिट्ठी भेजे तब इसकी एक फोटोकॉपी सहेज कर रखे। फोटोकॉपी सहेजने का तरीका यह है कि आप My Letters to Pm-Cm नाम से एक रजिस्टर बना सकते है, और जो चिट्ठी आप भेजे उसकी फोटोकॉपी इस रजिस्टर के पेज पर चिपका ले। मैं इस रजिस्टर को "My Citizen Duty Register कहता हूँ। मेरा मानना है कि यदि आप चिट्ठी भेज रहे है किन्तु इसका रिकॉर्ड नहीं रख रहे है तो यह लेटर बॉक्स में चिट्ठी फेंक कर आने के समान है। यदि आप खुद ही अपनी चिट्ठी को गंभीरता से नहीं लेंगे तो अन्य से कैसे उम्मीद कर सकते है कि वे इसे गंभीरता से लेवें !!
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क्या Pm को चिट्ठी भेजने से कुछ होगा ? क्या वे कार्यवाही करेंगे ?
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यह एक गलत सवाल है। Pm को जो उचित लगे वे फैसला कर सकते है। यह उनका विवेकाधिकार है। पर पहले से उनकी तरफ से सोचकर अपने नागरिक कर्तव्य की अवहेलना करना ठीक नहीं है। आपको अपनी सीमाओं एवं संसाधनों में रहकर ही अपनी बात Pm तक पहुंचानी होती है। यदि ज्यादा से ज्यादा नागरिक उन्हें चिट्ठी लिखकर निर्देश भेजने लगेंगे तो वे स्वयं ही इस तरह की किसी प्रक्रिया को लागू करेंगे जिससे नागरिक ज्यादा आसानी से अपनी बात pm तक पहुंचा सके. फिलहाल भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नही है. अत: नागरिको को उपलब्ध व्यवस्थाओ का ही इस्तेमाल करना चाहिए।
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बहरहाल, Pm किसी मांग पर कार्यवाही करें यह इस बात पर निर्भर करता है कि अमुक मांग कितने लोगो के संज्ञान में आई है। उदाहरण के लिए यदि किसी मांग के लिए 10 हजार लोग चिट्ठी भेजते है तो यह Pm पर असर नहीं करता। किन्तु यदि नागरिक भेजी गयी चिट्ठियों का रिकॉर्ड मेंटेन करते है और इस रिकॉर्ड को सोशल मीडिया पर भी रखते है तो यह जानकारी कि चिट्ठियां भेजी गयी है, 10 लाख लोगो को हो जाती है। और अब Pm पर यह बात असर करने लगती है।
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तो सिर्फ चिट्ठी भेजना ही जरुरी नहीं है बल्कि इसका रिकॉर्ड भी रखा जाना चाहिए। क्योंकि राजनीती में कॉमन नोलेज का मूल्य होता है, नॉलेज का नहीं। चिट्ठी भेजना Pm की नॉलेज में डालना है, किन्तु यदि यह बात अन्य नागरिको तक भी जाती है कि चिट्ठी भेजी गयी है, तो यह कॉमन नोलेज बनाने लगता है।
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मेरा नागरिक कर्तव्य :
मैं यदि व्यवस्था में कोई बदलाव चाहता हूँ या जब कोई समस्या देखता हूँ तो इसके समाधान के लिए Pm-Cm को चिट्ठी भेजता हूँ, और उनकी फोटोकॉपी एक रजिस्टर में चिपका कर रख लेता हूँ। मेरा मानना है व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए यह एक न्यूनतम एवं अधिकतम योगदान है जो भारत का प्रत्येक नागरिक कर सकता है। निचे मेरे नागरिक कर्तव्य के रजिस्टर का एक चित्र नमूने के तौर पर दिया गया है।
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मैं Wto एग्रीमेंट के खिलाफ हूँ, और इसीलिए मैंने Pm को इस बारे में चिट्ठी भेजी थी। यह चिट्ठी 22 जनवरी को 2019 को भेजी गयी थी। मैं भारत के नागरिको से विनती करता हूँ कि, यदि वे व्यवस्था में कोई बदलाव चाहते है तो नागरिको में इसकी शिकायत करने से पहले कृपया Pm-Cm को इस बारे में निर्देश भेजे।
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Tue Jul 02 2019 21:58:57 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Dhiraj Batade Ahmednagar LscandidateRrp:
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मी भारताच्या विविध प्रकारच्या समस्यांच्या उपायांसाठी जे पत्र PM आणि CM ला पाठवतो, त्याचे रेकॉर्ड एका रजिस्टर मधे ठेवतो.
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माझ्यामते प्रत्येक भारतीय नागरिकाचे हे कर्तव्य आहे की आवश्यक निर्देश पत्राद्वारे PM आणि CM ला पाठवावेत आणि याचे रेकॉर्ड आपल्या जवळ ठेवण्यासाठी एक रजिस्टर ठेवावे.
Wed Jul 03 2019 21:50:43 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Rahul Mehta Gandhinagar LsCandidate:
वीवीपैट पेपर वोटों की अदला बदली पर वीडियो (see english later)
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23 फ़रवरी 2019 को, mein ne एक पद्दति के बारे के लिखा था जिससे महज 5 से 10 शीर्ष अंदरूनी प्रोग्रामर्स के द्वारा पूरे भारत के अंदर सभी 10 लाख बूथ्स में वीवीपैट के पेपर वोटों को बदला जा सकता है। (पहले कमेंट में लिंक देखे) ।और वोटर्स कभी भी किसी छेड़छाड़ को नोटिस भी नही करेगा। और 7 अप्रैल 2019 को समाचार पत्र में विज्ञापन भी दिया और 9 अप्रैल 2019 को एक वीडियो यूटूब पर बनाया कि कैसे पेपर वोटों की हेरा फेरी हो सकती है ।( लिंक्स कमेंट में देखें)
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ये रहा यूट्यूब का वीडियो हिंदी में --
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vdo on changing paper VVPAT paper votes
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on 23-feb-2019, I had published an ALGORITHM by which paper VVPAT votes can be "changed" (see link-1 in comment) by just 5-10 programmers in all 10 lakh booths across India. And voters will NEVER notice any foul play. And later I published a simpler version. And on 07-april-2019, I gave newspaper advt and then made a youtube vdo on 09-april-2019 explaining how PAPER vote change is done. (see links in comment)
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here is that YT vdo in hindivdo on changing paper VVPAT paper votes
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on 23-feb-2019, I had published an ALGORITHM by which paper VVPAT votes can be "changed" (see link-1 in comment) by just 5-10 programmers in all 10 lakh booths across India. And voters will NEVER notice any foul play. And later I published a simpler version. And on 07-april-2019, I gave newspaper advt and then made a youtube vdo on 09-april-2019 explaining how PAPER vote change is done. (see links in comment)
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here is that YT vdo in hindi
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[<https://www.facebook.com/mehtarahulc/videos/10156119853371922/>](<https://www.facebook.com/mehtarahulc/videos/10156119853371922/>)
Wed Jul 03 2019 22:07:29 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
कनाडा में ज्यूरी व्यवस्था के समय नागरिक को प्रेरित किया जाता है कि न्याय व्यवस्था में अपना योगदान दे जबकि भारत में जजों ने न्याय व्यवस्था में अपना कब्जा किया हुआ है 17 देशों में ज्यूरी सिस्टम हैं।
Rakesh Suri Ghaziabad UpActivist:
कनाडा में ज्यूरी व्यवस्था के समय नागरिक को प्रेरित किया जाता है कि न्याय व्यवस्था में अपना योगदान दे जबकि भारत में जजों ने न्याय व्यवस्था में अपना कब्जा किया हुआ है 17 देशों में ज्यूरी सिस्टम हैं।
Q - Why should I serve on a jury?
A - Jury duty is an important responsibility in our society and an important part of the Canadian justice system. It gives citizens an opportunity to be directly involved in the administration of justice. In a criminal trial, it gives an accused person the chance to be judged by a group of his or her peers. In a civil trial it provides a person who has made a claim against another a chance for his or her claim to be judged by other citizens.
सवाल- मुझे जूरी पर क्यों सेवा करनी चाहिए?
जवाब - जूरी ड्यूटी हमारे समाज में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है और कनाडाई न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह नागरिकों को न्याय के प्रशासन में सीधे शामिल होने का अवसर देता है। एक आपराधिक मुकदमे में, यह एक आरोपी व्यक्ति को उसके साथियों के समूह द्वारा न्याय करने का मौका देता है। एक नागरिक परीक्षण में यह एक ऐसे व्यक्ति को प्रदान करता है जिसने दूसरे नागरिक के साथ न्याय करने का दावा किया है।
Piyush Jain <https://www.legalinfo.org/criminal-law/jury-duty#Whocanbejurer>
इस लिंक से यह जानकारी मुजे मिली
Thu Jul 04 2019 05:06:02 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
3-4 दिन पहले मैंने किसी न्यूज़ लिंक में पढ़ा था कि सरकार ने साउथ ब्लॉक की सुरक्षा का ठेका किसी विदेशी कम्पनी को पकड़ा दिया है । किसी को इस बारे सटीक जानकारी हो तो बताए । कोई न्यूज़ लिंक या किसी अख़बार में छपी ख़बर आदि । ताकि इसे वैरीफ़ाई किया जा सके ।
Fri Jul 05 2019 21:55:50 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Citizen Duty Day !!
Rameshwar Jat Jury BhilwaraRj:
आज नागरिक कर्तव्य दिवस ( Citizen Duty Day ) के उपलक्ष्य पर मैने प्रधानमंत्री जी को रेडो कानून ( जिला लेवल के अधिकारियों को जनता द्वारा निकालने का कानून ) = Right to expel district level officers का गैजेट नोटिफिकेशन जारी करने के लिए डाक द्वारा चिट्टी भेज कर दूसरी बार मांग करी ।
( पहली मांग मेने 5 जून 2019 को की और जब तक यह कानून नही बन जाता मै इस तरह से प्रधानमंत्री जी से मांग करता रहूंगा व लोगो से भी करवाऊंगा । )
अगर देश मे जनता को यह कानून मिल जाता है है हमारी सरकारी स्कूल , सरकारी हॉस्पिटल, हमारी पुलिस व न्यायालय का भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा ।
जो भी देश के जिम्मेदार नागरिक यह चाहते है कि हमारे सरकारी स्कूल व हॉस्पिटल अच्छे हो , पुलिस व न्यायालय का भ्रष्टचार खत्म हो , ज्यूरी सिस्टम द्वारा न्याय हो , उनको प्रधानमंत्री जी से रेडो कानून की चिट्टी भेज कर मांग करनी चाहिए ।
हम हर महीने की 5 तारीख को शाम को 5 बजे नागरिक कर्तव्य दिवस मनाते है ।
Fri Jul 05 2019 22:06:45 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Kistura Ram Choudhary:
आज 5 जुलाई 2019 को मैंने ओर मेरे मित्र सजंय भाई ने PM को 'वोट वापसी पासबुक' जारी करने के लॉ ड्राफ्ट को पीएमओ भेजा।
इस कानून के आने बाद भारत के आम नागरिक सरकारी नौकर जैसे जिला चिकित्सा अधिकारी , जिला शिक्षा अधिकारी , जिला जज , जिला पुलिस प्रमुख , आदि को नौकरी से किसी भी दिन हटा के दुसरे अच्छे व्यक्ति को उस पद पर रख सकेंगे।
Fri Jul 05 2019 22:09:32 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Hanshraj Jat Rrg:
आज 5 जुलाई 2019 शुक्रवार भीलवाड़ा राजस्थान से हंसराज जाट ~ मैनें प्रधानमंत्री जी को चिट्ठी नं.1 भेजी |
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परिचित मित्रों से आग्रह किया कि प्रतिमाह 5 ता. को पत्र भेजें |
Fri Jul 05 2019 22:11:00 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Gopal Dhakad NimbaheraRj:
मैं भारत में मौजूद विभिन्न समस्याओ के समाधान के लिए जो चिट्ठियां Pm एवं Cm को भेजता हूँ, उसके रिकॉर्ड के लिए ये एक रजिस्टर रखता हूँ। मैंने ऐसे 2 रजिस्टर बनाए है, जो कि लगभग एक दूसरे की फोटो कॉपी है। एक रजिस्टर घर पर रहता है , ताकि सुरक्षित रहे। और एक रजिस्टर मैं अन्य नागरिको को पढ़ने के लिए देता हूँ इसलिए अपने साथ रखता हूँ। छाया चित्र देखिए
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मेरे विचार में प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि आवश्यक निर्देश चिट्ठी द्वारा Pm एवं Cm को भेजे एवं इसका रिकॉर्ड अपने पास रखने के लिए एक नोटबुक या रजिस्टर रखें.
Sat Jul 13 2019 10:42:54 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Sat Jul 13 2019 20:14:39 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड – हिन्दू देवालयों एवं धार्मिक सम्प्रदायों के प्रबंधन के लिए प्रस्तावित संघ
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( Rashtriya Hindu Board - Proposed National Temple & Sect Management Body )
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(इस क़ानून ड्राफ्ट का पीडीऍफ़ एवं अन्य सम्बंधित जानकारी के लिए इस पोस्ट के पहले 3 कमेन्ट देखें। पीडीऍफ़ पेम्पलेट छपवाने और मोबाईल पर पढने के फोर्मेट में है।)
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इस कानून का सार :
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(1) यह कानून हिन्दू नागरिको के लिए एक राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड (R.H.B.) का गठन करता है। इस बोर्ड का प्रमुख हिन्दू संघ प्रधान कहलायेगा। भारत में निवास करने वाला प्रत्येक हिन्दू इस बोर्ड का वोटिंग मेम्बर बन सकेगा। यदि आप हिन्दू बोर्ड के सदस्य है तो आपको एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी ताकि आप हिन्दू संघ प्रधान को चुनने या निष्काषित करने के लिए स्वीकृति दे सके।
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(2) इस क़ानून द्वारा (a) कृष्ण जन्म भूमि, मथुरा , (b) विश्वनाथ देवालय, काशी एवं , (c) अमरनाथ देवालय, कश्मीर के भूखंड हिन्दू बोर्ड के स्वामित्व में हस्तांतरित होने की प्रक्रिया शुरू होगी और बोर्ड को इन भूखंडो पर देवालय निर्माण व इनका प्रबंधन करने का कानूनी अधिकार मिल जायेगा।
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(3) इसके अलावा यदि संघ प्रधान या उसके स्टाफ के खिलाफ कोई शिकायत आती है, तो मामले की सुनवाई करने और दंड देने की शक्ति जजों के पास न होकर बोर्ड मेम्बर्स की नागरिको की जूरी के पास रहेगी।
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(4) यह क़ानून सरकार द्वारा हथियाये जा चुके सभी देवालयों को भी सरकारी नियन्त्रण से मुक्त करता है।
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(5) इस क़ानून में विभिन्न हिन्दू संप्रदाय भी अपनी पहचान बनाये रखते हुए ‘स्वैच्छिक रूप से’ पंजीकृत हो सकेंगे। तथा इन सम्प्रदायों के अनुयायियों को यह अधिकार मिल जायेगा कि वे अपने सम्प्रदाय के ट्रस्टियों एवं ट्रस्ट के अध्यक्ष को बदल सके।
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इस क़ानून को संसद से पास करने की जरूरत नही है। प्रधानमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है। #HinduBoard , #P20180436108 , #RHB
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[ टिप्पणी : इस ड्राफ्ट में 3 भाग है -
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(I) नागरिकों के लिए निर्देश,
(II) नागरिकों और अधिकारियों के लिए निर्देश,
(III) सनातन संस्कृति के विभिन्न सम्प्रदायों के लिए निर्देश।
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टिप्पणियाँ इस क़ानून का हिस्सा नहीं है। अत: इनका पालन बाध्यकारी नहीं है। ]
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भाग (I) : नागरिकों के लिए सामान्य निर्देश
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(1) इस क़ानून के गेजेट में छपने से राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड नामक संस्था का गठन होगा, और इसके प्रत्येक सदस्य को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। इस संस्था के सदस्यों को हिन्दू बोर्ड मेम्बर या हिन्दू संघ सदस्य कहा जाएगा।
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(2) भारत के निम्नलिखित नागरिक इस संघ के सदस्य हो सकेंगे :
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(2.1) उन सभी समुदायों, पन्थो, सम्प्रदायों के अनुयायी जो स्वयं को हिन्दू या सनातनी हिन्दू कहते है।
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(2.2) सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि पन्थो के अनुयायी भी इस संगठन में जुड़ना चाहते है तो इसकी सदस्यता ले सकेंगे।
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(2.2) यह क़ानून इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी एवं अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है, पर कोई दायित्व या प्रतिबन्ध नहीं लगाता। इन धर्मो के अनुयायी स्पष्ट रूप से इस क़ानून के दायरे से बाहर रहेंगे
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[ टिप्पणी : यह क़ानून किसी भी प्रकार से उन नागरिको पर हिन्दू होने का लेबल नही लगाता जो स्वयं को हिन्दू नहीं कहते या हिन्दू नहीं कहलाना चाहते। उदाहरण के लिए यदि कोई जैन या सिक्ख पंथ का अनुयायी इसमें नामांकित होता है तो भी उसकी कानूनी-धार्मिक-सामाजिक पहचान प्रवृत कानूनों के अनुसार जैन / सिक्ख धर्म के अनुयायी के रूप में बनी रहेगी ]
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(3) राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड ( Rashtriy Hindu Board = RHB ) की मुख्य कार्यकारिणी में 1 प्रमुख एवं 4 न्यासियो सहित कुल 5 व्यक्ति होंगे। RHB का प्रमुख हिन्दू संघ प्रधान एवं कार्यकारिणी के शेष 4 सदस्यों को न्यासी कहा जाएगा।
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(4) हिन्दू संघ प्रधान वोट वापसी पासबुक के दायरे में होगा, और यदि आप उसके काम-काज से संतुष्ट नहीं है, तो वोट वापसी पासबुक के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर उसे निकालने और किसी अन्य व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त करने के लिए अपनी स्वीकृति दे सकते है। आप अपनी स्वीकृति SMS, ATM या मोबाईल एप से भी दे सकेंगे।
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(5) प्रधानमंत्री एक अधिसूचना जारी करके राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या का स्वामित्व हिन्दू बोर्ड को सौंपेंगे। इसके अलावा हिन्दू बोर्ड उन सभी देवालयों का प्रबंधन करेगा जिन्हें किसी मंदिर के मालिको ने इसे स्वेच्छा से सौंप दिया है। किन्तु बोर्ड उन देवालयों का अधिग्रहण / प्रबंधन नहीं करेगा जिनकी देख-रेख देवालय के मालिक RHB से नहीं कराना चाहते। सभी प्रकार की मस्जिदे, चर्च, गुरूद्वारे, बौद्ध तीर्थ स्थल एवं जैन तीर्थ स्थल आदि हिन्दू बोर्ड के दायरे से बाहर रहेंगे।
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(6) यदि एवं जब भारत के सभी मतदाताओ में से 45 करोड़ मतदाता धारा 30 में दी गयी प्रक्रिया का प्रयोग करते हुए निचे दिए 4 मंदिरो के भूखंड RHB को सौंप देते है तो हिन्दू बोर्ड इन मंदिरों की देख रेख करेगा :
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1. कृष्ण जन्म भूमि देवालय, मथुरा
2. काशी विश्वनाथ देवालय, वाराणसी
3. अमरनाथ देवालय, कश्मीर
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(7) हिन्दू संघ प्रधान और न्यासी अपने नियंत्रण में मौजूद देवालयो की देखरेख करेंगे और प्राप्त हुए दान को इस तरह खर्च करेंगे कि सनातन संस्कृति का सरंक्षण हो। किन्तु हिन्दू बोर्ड सरकार से किसी भी प्रकार का दान प्राप्त नहीं कर सकेगा ।
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(8) यदि संघ प्रधान या उसके स्टाफ के बीच या नागरिको व हिन्दू बोर्ड के मध्य कोई आपसी विवाद होता है तो मामले का निपटान हिन्दू बोर्ड की सदस्य सूची में दर्ज नागरिको की जूरी करेगी। यदि आपका नाम बोर्ड की मेम्बर लिस्ट में है तो आपको जूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है। जूरी में आकर आपको मामला सुनकर फैसला देना होगा। जूरी का गठन बोर्ड की मेम्बर लिस्ट से लॉटरी द्वारा किया जाएगा। मामले की प्रकृति अनुसार जूरी में 12 से 1500 तक नागरिक हो सकेंगे।
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भाग (II) नागरिकों व अधिकारियों के लिए निर्देश
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(9) प्रधानमंत्री एक राष्ट्रिय हिन्दू बोर्ड ( Rashtriy Hindu Board = RHB ) नामक ट्रस्ट का गठन करेंगे और इसके संचालन के लिए अपनी पसंद से 1 संघ प्रमुख व 4 न्यासियों की प्रारम्भिक नियुक्ति करेंगे। ये सभी 5 सदस्य अनिवार्य रूप से हिन्दू होंगे।
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(10) राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या के अलावा हिन्दू बोर्ड उन सभी देवालयो का भी प्रबंधन करेगा जो किसी ट्रस्ट के मालिको ने उसे स्वेच्छा से सौंप दिया है। यदि अमुक ट्रस्ट चाहे तो सौंपा गया देवालय 5 साल के भीतर वापिस ले सकता है। 5 साल बाद बोर्ड औपचारिक रूप से ट्रस्ट से पूछेगा कि क्या उसे देवालय वापस चाहिए। यदि 65% से ऊपर ट्रस्टी ना में उत्तर करते है, सिर्फ तब और तब ही बोर्ड द्वारा देवालय अधिगृहीत किया जायेगा। लेकिन इसके बाद हिन्दू बोर्ड अमुक ट्रस्ट को देवालय कभी भी वापस नहीं दे सकेगा।
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(11) मथुरा, काशी एवं अमरनाथ देवालय के भूखंड हिन्दू बोर्ड के स्वामित्व में सौंपना
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(11.1) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर इस क़ानून की धारा 30 में दिए गए प्रावधानों का प्रयोग करते हुए प्रधानमन्त्री देश के सभी मतदाताओ के 4 अलग अलग देश व्यापी जनमत संग्रह करवाएंगे, जिसमें यह प्रश्न रखा जाएगा कि क्या (1) कृष्ण जन्म भूमि देवालय, मथुरा (2) विश्वनाथ देवालय, काशी एवं (3) अमरनाथ देवालय, कश्मीर के भूखंड हिन्दू बोर्ड को सौंप दिए जाने चाहिए या नहीं। यदि देश के 45 करोड़ मतदाता इसके लिए अपनी स्वीकृति हाँ के रूप में दे देते है, तो प्रधानमंत्री ये 4 भूखंड हिन्दू बोर्ड को सौंप देंगे।
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(11.2) यह क़ानून उपरोक्त 3 मंदिरों के भूखंडो के अतिरिक्त देश के अन्य किसी भी भूखंड पर - जिस पर मन्दिर, मस्जिद, चर्च होने का दावा हो या स्वामित्व को लेकर विवाद हो के स्वामित्व के निर्धारण हेतु धारा 30 का इस्तेमाल करने पर स्पष्ट रूप से प्रतिबन्ध लगाता है।
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(12) हिन्दू संघ प्रधान एवं हिन्दू बोर्ड के न्यासियों के पद के लिए आवेदन एवं योग्यताएं :
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(12.1) हिन्दू बोर्ड का कोई भी सदस्य जिसकी आयु 30 वर्ष से अधिक हो, वह हिन्दू संघ प्रधान एवं हिन्दू बोर्ड के न्यासी पद के लिए आवेदन कर सकेगा। कोई व्यक्ति बोर्ड के न्यासी के साथ साथ संघ प्रधान के रूप में भी उम्मीदवार हो सकता है।
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(12.2) हिन्दू बोर्ड का कोई भी सदस्य जिसकी आयु 30 वर्ष से अधिक हो तो वह जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय जूरी प्रशासक पद के लिए आवेदन कर सकेगा।
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(13) धारा 12 में दी गयी योग्यता धारण करने वाला कोई भी नागरिक यदि जिला कलेक्टर कार्यालय में स्वयं या किसी वकील के माध्यम से कोई एफिडेविट प्रस्तुत करता है, तो जिला कलेक्टर सांसद के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क लेकर अर्हित पद के लिए उसका आवेदन स्वीकार कर लेगा, तथा इसे प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करके रखेगा।।
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(14) हिन्दू बोर्ड के सदस्यों द्वारा उम्मीदवारों का समर्थन करने के लिए हाँ दर्ज करना
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(14.1) कोई भी बोर्ड मेम्बर किसी भी दिन अपनी वोट वापसी पासबुक के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर संघ प्रधान, बोर्ड के किसी भी न्यासी या जूरी प्रशासक के उम्मीदवारों के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर एवं वोट वापसी पासबुक में मतदाता की हाँ दर्ज करेगा। पटवारी मतदाता की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम व मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है।
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(14.2) स्वीकृति (हाँ) दर्ज करने के लिए मतदाता 3 रूपये फ़ीस देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी
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(14.3) यदि कोई बोर्ड मेम्बर अपनी स्वीकृती रद्द करवाने आता है तो पटवारी बिना कोई फ़ीस लिए स्वीकृति रद्द कर देगा।
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(14.4) प्रत्येक महीने की 5 तारीख को, कलेक्टर पिछले महीने में प्राप्त प्रत्येक प्रत्याशियों को मिली स्वीकृतियों की गिनती प्रकाशित करेगा। पटवारी अपने क्षेत्र की स्वीकृतियो का यह प्रदर्शन प्रत्येक सोमवार को करेगा। स्वीकृतियों का प्रदर्शन 5 तारीख को कैबिनेट सचिव द्वारा भी किया जाएगा।
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[टिप्पणी : कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी हाँ SMS, ATM, मोबाईल एप से दर्ज कर सके।
रेंज वोटिंग - प्रधानमंत्री ऐसा सिस्टम बना सकते है कि बोर्ड मेम्बर किसी प्रत्याशी को -100 से 100 के बीच अंक दे सके। यदि मेम्बर सिर्फ हाँ दर्ज करता है तो इसे 100 अंको के बराबर माना जाएगा। यदि मतदाता अपनी स्वीकृति दर्ज नही करता तो इसे शून्य अंक माना जाएगा । किन्तु यदि मतदाता अंक देता है तब दिए अंक ही मान्य होंगे। रेंज वोटिंग की ये प्रक्रिया स्वीकृति प्रणाली से बेहतर है, और ऐरो की व्यर्थ असम्भाव्यता प्रमेय ( Arrow’s Useless Impossibility Theorem ) से प्रतिरक्षा प्रदान करती है। ]
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(15) हिन्दू संघ प्रधान एवं हिन्दू बोर्ड के न्यासियों की नियुक्ति एवं निष्कासन
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(15.1) हिन्दू संघ प्रधान के लिए : यदि हिन्दू संघ प्रधान पद के किसी उम्मीदवार को 25 करोड़ से अधिक बोर्ड मेम्बर्स की स्वीकृति मिल जाती है और यदि यह स्वीकृतियां पदासीन संघ प्रधान की स्वीकृतियों से 1 करोड़ अधिक भी है, तो प्रधानमन्त्री उसे नए संघ प्रधान के रूप में नियुक्त कर सकते है।
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(15.2) हिन्दू बोर्ड के न्यासी के लिए : यदि हिन्दू बोर्ड न्यासी के किसी उम्मीदवार को 20 करोड़ से अधिक बोर्ड मेम्बर्स की स्वीकृति मिल जाती है और यदि यह स्वीकृतियां पदासीन न्यासी की स्वीकृतियों से 1 करोड़ अधिक भी है, तो प्रधानमन्त्री उसे नए न्यासी के रूप में नियुक्त कर सकते है।
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(15.3) जिला-राज्य-राष्ट्रीय जूरी प्रशासक के लिए : यदि किसी जिले / राज्य की बोर्ड सदस्य सूची में दर्ज सभी हिन्दू मतदाताओं के 35% से अधिक सदस्य किसी प्रत्याशी के पक्ष में हाँ दर्ज कर देते है और यदि यह संख्या पदासीन जूरी प्रशासक से 1% अधिक भी है तो हिन्दू संघ प्रधान अमुक व्यक्ति को क्रमश: जिला / राज्य जूरी प्रशासक के पद पर नियुक्ति कर सकते है। राष्ट्रीय जूरी प्रशासक के लिए पूरे देश के कुल बोर्ड सदस्यों के 35% सदस्यों की स्वीकृतियों की जरूरत होगी।
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(16) हिन्दू बोर्ड के सदस्यों के मतदान अधिकार :
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(16.1) प्रत्येक व्यक्ति जो हिन्दू है और RHB का ड्राफ्ट राजपत्र में छपने की दिनांक पर 18 वर्ष से ऊपर की आयु का है, राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड का मतदाता सदस्य होगा। इस हिन्दू बोर्ड में गैर-हिन्दू मतदाता सदस्य नहीं होंगे। शब्द हिन्दू में हिन्दू, सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि सम्प्रदायों के अनुयायी भी शामिल है, जिन सम्प्रदायों का उद्भव भारतीय उपमहाद्वीप रहा है ।
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(16.2) यदि कोई व्यक्ति स्वयं को गैर-हिन्दू कहता है और बोर्ड का सदस्य नहीं बनता तो उसका अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़ा वर्ग का दर्जा इस क़ानून द्वारा प्रभावित नहीं होगा।
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(16.3) यदि कोई ईसाई या मुस्लिम हिन्दू बनना चाहता है तो जूरी उसकी पहचान की पुष्टि करके अनुमोदन करेगी। जूरी के अनुमोदन के बाद यदि सभी न्यासी भी इसका अनुमोदन करते है तो संघ प्रधान उसका नाम बोर्ड की सदस्य सूची में जोड़ेगा। नाम तब तक नहीं जोड़ा जायेगा जब तक कम से कम 100 बोर्ड मेम्बर्स की जूरी बहुमत द्वारा स्वीकृति नहीं देती।
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(16.4) यदि कोई व्यक्ति हिन्दू धर्म छोड़कर अन्य किसी धर्म में धर्मान्तरित हो जाता है तो उसका मताधिकार निलम्बित कर दिया जाएगा। यदि धर्मान्तरित हुआ अमुक व्यक्ति एक वर्ष के भीतर फिर से हिन्दू धर्म में पुन: धर्मान्तरित नहीं होता है तो उसका नाम बोर्ड की मेम्बर लिस्ट से हटा दिया जाएगा। और यदि वह दो बार किसी अन्य धर्म में परिवर्तित हो जाता है तो दूसरी बार उसका नाम बिना 1 साल इंतज़ार किये हटा दिया जायेगा। विवाद की स्थिति में जूरी का निर्णय अंतिम होगा।
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(16.5) यदि किसी व्यक्ति की माता या पिता में से कोई एक हिन्दू है और वह स्वयं को हिन्दू घोषित करता है तो वह 18 वर्ष की आयु से हिन्दू बोर्ड का मतदाता बन जाएगा।
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(17 ) हिन्दू बोर्ड के नियंत्रण में आने वाले देवालयों का प्रबंधन
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(17.1) संघ प्रधान और न्यासी हिन्दू बोर्ड के संचालन और कर्मचारियों के प्रबंधन लिए जरुरी नियम बनाएंगे। संघ प्रधान के सभी निर्णयों को कम से कम दो न्यासियों के अनुमोदन की ज़रूरत होगी।
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(17.2) RHB किसी भी भारतीय व्यक्ति या गैर व्यक्ति भारतीय इकाई या विदेशी हिन्दू से दान प्राप्त कर सकता है, किन्तु विदेशी इकाई से नहीं । RHB किसी भी व्यवसाय आदि में भी शामिल हो सकता है। जैसे कोई उद्योग, निगम, संस्था आदि।
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(17.3) संघ प्रधान लिखित परीक्षा द्वारा 1000 दिनों की अवधि के लिए पुरोहितों एवं अन्य कर्मचारियों की भर्ती करेगा। संघ प्रधान विशेष कार्यों के लिए बाहरी ठेकेदारों को ठेके दे सकता है।
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(17.4) संघ प्रधान कर्मचारियों के विरुद्ध शिकायतें सुनने के लिए जूरी सिस्टम की स्थापना करेगा। संघ प्रधान राष्ट्रिय जूरी प्रशासक, राज्य जूरी प्रशासको एवं जिला जूरी प्रशासको की भी नियुक्ति करेगा।
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(18) विवादों एवं मामलो का हिन्दू नागरिको की जूरी द्वारा निपटान
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(18.1) जूरी प्रशासक जिले की हिन्दू बोर्ड मेम्बर लिस्ट में से 30 सदस्यीय महाजूरी मंडल की नियुक्ति करेगा। इनमे से हर 10 दिन में 10 सदस्य रिटायर होंगे और नए 10 सदस्यो का चयन मेम्बर लिस्ट में से लॉटरी द्वारा कर लिया जाएगा। यह महाजूरी मंडल निरंतर काम करता रहेगा। महाजूरी सदस्य को प्रति उपस्थिति 500 रू एवं यात्रा व्यय मिलेगा।
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(18.2) यदि संघ प्रधान, न्यासी या बोर्ड के स्टाफ से सम्बंधित कोई भी मामला है तो वादी अपने मामले की शिकायत महाजूरी मंडल के सदस्यों को लिख कर दे सकते है। यदि महाजूरी मंडल मामले को निराधार पाते है तो शिकायत खारिज कर सकते है, अथवा इस मामले की सुनवाई के लिए एक नए जूरी मंडल के गठन का आदेश दे सकते है।
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(18.3) मामले की जटिलता एवं आरोपी की हैसियत के अनुसार महाजूरी मंडल तय करेगा कि 15-1500 के बीच कितने सदस्यों की जूरी बुलानी चाहिए। तब जूरी प्रशासक बोर्ड की मेम्बर लिस्ट में से लॉटरी द्वारा 30 से 55 वर्ष के बीच की आयुवर्ग के सदस्यों का चयन करके एक जूरी मंडल का गठन करेगा और मामला इन्हें सौंप देगा।
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(18.4) अब यह जूरी मंडल दोनों पक्षों, गवाहों आदि को सुनकर फैसला देगा। प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला बंद लिफ़ाफ़े में लिखकर ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर या जज को देंगे। दो तिहाई सदस्यों द्वारा मंजूर किये गये निर्णय को जूरी का फैसला माना जाएगा। किन्तु नारको टेस्ट या नौकरी से निकालने का निर्णय लेने के लिए 75% सदस्यों के अनुमोदन की जरूरत होगी। जज या ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर सभी के सामने जूरी का निर्णय सुनायेंगे। यदि जज जूरी के फैसले को खारिज करना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है। प्रत्येक मामले की सुनवाई के लिए अलग से जूरी होगी, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी। पक्षकार चाहे तो फैसले की अपील उच्च जूरी मंडल में कर सकते है।
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(18.5) जिला जूरी मंडल के निर्णय की अपील राज्य जूरी मंडल में एवं राज्य जूरी मंडल के फैसले की अपील राष्ट्रीय जूरी के सामने की जा सकेगी। प्रवृत कानूनों के अनुसार फैसले की अपील जिला / उच्च / उच्चत्तम न्यायालय में भी की जा सकेगी।
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(18.6) यदि 75% या उससे अधिक जूरी सदस्य आरोपी कर्मचारी को नौकरी से निकालने या जुर्माना लगाने का निर्णय देते है तो संघ प्रधन अमुक कर्मचारी को निकाल सकता है या उससे जुर्माना वसूल सकता है। यदि शिकायतकर्ता को लगता है कि संघ प्रधान ने जूरी सदस्यों के निर्णय का ठीक से पालन नहीं किया है, तो वह हिन्दू बोर्ड के मतदाताओं से मांग कर सकता है कि वे धारा 15 में दी गयी वोट वापसी प्रक्रिया का प्रयोग करके हिन्दू संघ प्रधान को नौकरी से निकालने की सहमती दें। .
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भाग (III) : सनातन संस्कृति के विभिन्न सम्प्रदायों का प्रबंधन
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(19) प्रधानमंत्री एक राष्ट्रीय सनातन संप्रदाय रजिस्ट्रार ( National Sanatan Sect Registrar ) नामक अधिकारी की नियुक्ति करेंगे, जो उन सम्प्रदायों एवं उनके अनुयायियों की सदस्य सूची बनाने एवं उन्हें लोकतांत्रिक रूप से प्रबंधित करने में व्यवस्थागत सहयोग करेगा जिनका उद्भव भारतीय उपमहाद्वीप की सनातन संस्कृति है, तथा वे एक पंथ या सम्प्रदाय के रूप में मान्यता प्राप्त धार्मिक ट्रस्ट है। ऐसे धार्मिक सम्प्रदायों में जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, आर्य समाज आदि सभी भारतीय धर्म तथा संप्रदाय शामिल है। सिख पंथ भी एक भारतीय संप्रदाय है किन्तु यह पहले से SGPC द्वारा शासित है, अत: सिक्ख पंथ रजिस्ट्रार के दायरे से बाहर रहेगा। इसके अलावा इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी एवं अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है, भी सम्प्रदाय रजिस्ट्रार के दायरे से बाहर रहेंगे।
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(20) सम्प्रदाय रजिस्ट्रार वोट वापसी पासबुक के अधीन होगा और उसके आवेदन व निष्कासन की प्रक्रिया धारा 13,14, एवं 15 में हिन्दू बोर्ड के न्यासी के लिए दी गयी प्रक्रिया के समान ही होगी। सम्प्रदाय रजिस्ट्रार जिला रजिस्ट्रारो की नियुक्ति करेगा, एवं जिला रजिस्ट्रार जिला जूरी प्रशासक के समान ही वोट वापसी प्रक्रियाओ के अधीन होंगे।
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(21) वे सभी धार्मिक ट्रस्ट जिनका किसी देव स्थान या देवालय पर स्वामित्व है, उन्हें जिला सम्प्रदाय रजिस्ट्रार में अपने ट्रस्ट का पंजीयन कराना होगा। ऐसे देवालय जो किन्ही व्यक्तियों के निजी स्वामित्व है, रजिस्ट्रार के क्षेत्राधिकार में नहीं आयेंगे ।
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(22) धार्मिक ट्रस्टो के पंजीयन की प्रक्रिया
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(22.1) जिला रजिस्ट्रार प्रत्येक ट्रस्ट से शुल्क के रूप में 1000 रूपये प्रति वर्ष लेगा। रजिस्ट्रार प्रत्येक ट्रस्टी से भी 1000 रूपये प्रति ट्रस्ट के हिसाब से जितने ट्रस्टों का वह ट्रस्टी है वार्षिक शुल्क लेगा।
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(22.2) अध्यक्ष तथा ट्रस्टी ट्रस्ट के स्वामित्व में जितनी संपत्ति है उसके ब्यौरे की सूची जिला रजिस्ट्रार को देंगे। इस सूची में ट्रस्ट के स्वामित्व वाली भूमि, इमारतें, नकदी, शेयर, बांड, सोना, चांदी, फर्नीचर, किसी को दिया या किसी से लिया गया कर्ज, संपत्ति, कोई अन्य मूल्यवान प्रतिभूति आदि एवं इनका बाजार मूल्य शामिल है। कोई भी ट्रस्टी यह सूची रजिस्ट्रार को दे सकता है, एवं सभी ट्रस्टी अलग अलग भी यह सूची दे सकते है। सूची मे विचलन होने पर जूरी इसका निपटान करेगी।
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(22.3) जिला रजिस्ट्रार अपने जिले के प्रत्येक ट्रस्ट का नाम, क्रम संख्या, ट्रस्ट विलेख, सभी ट्रस्टियों के नाम, ट्रस्ट की संपत्तियां (मय बाजार मूल्य) आदि की पूरी अद्यतन जानकारी ट्रस्ट के लिए बनायी गयी जिला वेबसाइट पर रखेगा। यह सूचना राष्ट्रीय रजिस्ट्रार द्वारा बनायी गयी ट्रस्ट की राष्ट्रीय वेबसाइट पर भी रखी जायेगी।
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(23) ट्रस्ट के स्वामित्व से सम्बंधित विवादों को स्वीकार करना
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(23.1) यदि किसी व्यक्ति का नाम गलती से ट्रस्टियों की सूची में शामिल हो गया है तो वह जिला रजिस्ट्रार के सामने प्रस्तुत होकर अपना नाम सूची से हटवा सकता है। नाम हटाने के लिए उसके द्वारा दी गयी अर्जी इंटरनेट पर रखी जायेगी तथा 3 महीने के भीतर वह अपनी अर्जी वापिस नहीं लेता है तो उसका नाम सूची में से हटा दिया जायेगा।
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(23.2) यदि कोई व्यक्ति दावा करता है की वह किसी ट्रस्ट का ट्रस्टी है, किन्तु उसके नाम का उल्लेख ट्रस्टी के तौर पर नही हुआ है, तो इस कानून के पारित होने के 90 दिनों के अंदर वह जिला रजिस्ट्रार के सामने अपना दावा पेश कर सकता है। जितने ट्रस्टों के लिए ऐसा दावा प्रस्तुत किया गया उनका 5000 रू प्रति ट्रस्ट की दर से शुल्क लेकर जिला रजिस्ट्रार दावे स्वीकार कर लेगा और इसे वेबसाईट पर सार्वजनिक करेगा। 90 दिन बीतने के बाद शुल्क हर 1 माह की देरी पर 1000 रू की दर से बढ़ेगा। किन्तु यह कानून पास होने के 10 साल बाद कोई दावा स्वीकार नहीं होगा।
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(23.3) यदि दावा प्राप्त करने के 30 दिनों के अंदर सभी ट्रस्टी जिला रजिस्ट्रार के कार्यालय में स्वयं आकर अमुक ट्रस्टी का दावा स्वीकार कर लेते है तो दावाकर्ता का नाम ट्रस्टी के तौर पर दर्ज कर लिया जायेगा। यदि किसी ट्रस्टी ने इसे स्वीकार नही किया तो उसका मत ‘नहीं’ में माना जायेगा। ऐसी स्थिति में जूरी मंडल द्वारा मामले का निस्तारण करने के लिए जिला रजिस्ट्रार जिस जिले में ट्रस्ट है उसी जिले के जूरी प्रशासक से जूरी का गठन करने को कहेगा।
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(24) स्वामित्व से सम्बंधित विवादों का जूरी मंडल द्वारा निपटान
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(24.1) धारा 18 में दिए अनुसार महाजूरी मंडल मामले पर निर्णय करने के लिए एक जूरी का गठन करेगा। जूरी का आकार ट्रस्ट की संपत्ति पर निर्भर करेगा। 1 करोड़ तक की संपत्ति वाले ट्रस्ट के लिए जूरी में कम से कम 12 सदस्य होंगे और प्रत्येक 1 करोड़ की वृद्धि पर 1 जूरी सदस्य बढ़ा दिया जाएगा। किन्तु जूरी सदस्यों की संख्या 1500 से अधिक नहीं होगी।
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(24.2) जूरी सदस्य उस व्यक्ति का पक्ष सुनेंगे जो ट्रस्टी होने का दावा कर रहा है। साथ हीं वे उन ट्रस्टियों को भी सुनेंगे जो उस व्यक्ति के खिलाफ बोलना चाहते है। यह सुनवाई कम से कम 67% जूरी सदस्यों की उपस्थिति में होगी। जब 50% जूरी सदस्य दोनों पक्षों से समाप्त करने को कहेंगे, तो सुनवाई अगले 2 दिनों में समाप्त हो जाएगी। लेकिन 2 दिनों के बाद, यदि 50% से अधिक जूरी सदस्य इसे जारी रखने का निर्णय लेते हैं, तो सुनवाई जारी रहेगी।
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(24.3) यदि ट्रस्ट की संपत्ति का राष्ट्रीय रजिस्ट्रार द्वारा हिसाब किया गया मूल्य 200 करोड़ से अधिक है, तथा 50% से अधिक जूरी सदस्यों ने किसी खास गवाह या ट्रस्टी का सार्वजनिक रूप से नार्को टेस्ट कराये जाने की मांग की है, तो जिला रजिस्ट्रार फोरेंसिक विशेषज्ञ का प्रबंध करेगा तथा अमुक व्यक्ति का सार्वजनिक रूप से नारको टेस्ट करायेगा।
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(24.4) सुनवाई के बाद प्रत्येक जूरी सदस्य घोषणा करेगा कि व्यक्ति ट्रस्टी है या नही। यदि बहुमत में जूरी सदस्य इस बात से सहमत है कि दावा करने वाला व्यक्ति ट्रस्टी है तो जिला रजिस्ट्रार उसके नाम की घोषणा ट्रस्टी के रूप में कर देंगे।
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(24.5) जूरी मिथ्या दावा करने वाले पर या उसके दावे का समर्थन / विरोध करने वालो पर आार्थिक दंड लगा सकती है। फाइन के तौर पर 15000 से कम की कोई भी रकम + जिस व्यक्ति को झूठ बोलने का दोषी पाया गया, उसकी कुल संपत्ति का 1-5% के बीच का कोई भी भाग होगा। फाइन लगाने से एक दिन पहले उन्हें जूरी इसकी पूर्व सूचना देगी।
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(24.6) हारने वाला पक्ष 15000 रू जमा कराकर जिला कलेक्टर के यहाँ अपील कर सकता है। जिला कलेक्टर राज्य के किन्ही 3 जिलों को लॉटरी से चुनेगा। हारने वाला पक्ष उन जिलों के रजिस्ट्रार के सामने अपनी अपील दायर कर सकता है। प्रत्येक जिले का जिला रजिस्ट्रार 10,000 रू की एक और जमाराशि प्राप्त करने के बाद, इस मामले में फैसला देने वाली जूरी के आकार की ही एक जूरी का गठन करेगा। इन 3 मे से 2 जूरी मंडलों द्वारा दिया गया निर्णय अंतिम निर्णय माना जायेगा।
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(25) ट्रस्टो के मतदाता सदस्यों की सूची बनाना तथा उन्हें सार्वजनिक करना
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(25.1) यह कानून पास होने के 6 माह के भीतर मंदिरो का स्वामित्व रखने वाले ट्रस्टो के अध्यक्ष एवं प्रत्येक ट्रस्टी ट्रस्ट के सभी मतदाता सदस्यों की सूची प्रस्तुत करेंगे। ट्रस्टी जिला रजिस्ट्रार कार्यालय में स्वयं आकर इस सूची पर हस्ताक्षर करेंगे। सूची के पहले 1000 मतदाता सदस्यों के लिए जिला रजिस्ट्रार प्रति सदस्य 50 रू, तथा उससे आगे की संख्या पर 20 रू प्रति सदस्य का शुल्क लेगा। दो या दो से अधिक या सभी ट्रस्टी मिलकर सम्मिलित रूप से एक या अलग-अलग सूची भी दे सकते हैं। जिला रजिस्ट्रार प्रस्तुत की गयी प्रत्येक सूची पर शुल्क लगायेगा। सूची देते समय ट्रस्टी को प्रत्येक मतदाता सदस्य के मत का मान भी बताना होगा या ट्रस्टी को यह कहना होगा कि "सभी मतदाता सदस्यों के मतों का मान समान है”।
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(25.2) ट्रस्टियों द्वारा प्रस्तुत की गयी प्रत्येक सूची को जिला रजिस्ट्रार जिला वेबसाइट पर रखेगा। यदि एक ही सूची प्रस्तुत की गयी है, एवं यह सूची सभी ट्रस्टियों द्वारा स्वीकृत है, तो जिला रजिस्ट्रार कोई अतिरिक्त सूची तैयार नही करेगा। यदि विभिन्न ट्रस्टियों द्वारा प्रस्तुत की गयी सूचियों में मतदाता सदस्य और / अथवा उनके मतों के मानों में भिन्नता हो तो जिला रजिस्ट्रार प्रत्येक ट्रस्ट के लिए निचे बताये अनुसार अलग-अलग सूची तैयार करेगा :
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(25.2.1) समान मतदाता सूची, जिसमे वे सारे नाम शामिल होंगे जो सभी सूचियों में समान रूप से हों।
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(25.2.2) संयुक्त सूची, जिसमें उन सभी सदस्यों के नाम होंगे जिनके मतों का मान भिन्न हो।
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(25.2.3) मतदाता सदस्य जो आधे से अधिक ट्रस्टियों की सूची में शामिल हो तथा जिनके मत का मूल्य शून्य न हो।
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(25.3) यदि कोई मतदाता सदस्य दावा करता है कि वह एक मतदाता सदस्य नहीं है, तो वह जिला रजिस्ट्रार को 'नॉट मेंबर' की अर्जी पर हस्ताक्षर करके दे सकता है। उसकी अर्जी वेबसाइट पर रखी जायेगी, तथा 30 दिनों के बाद ट्रस्ट की मतदाता सूची से उसका नाम हटाकर उसके मत का मान अन्य सभी सदस्यों में आनुपातिक रूप से बाँट दिया जायेगा।
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(25.4) यदि कोई व्यक्ति दावा करता है कि वह ट्रस्ट का मतदाता सदस्य है, किन्तु उसका नाम मतदाता सदस्यों की सूची में नही है, अथवा सूची में उसके मत का मान कम है, तो वह जिला रजिस्ट्रार द्वारा वेबसाइट पर ट्रस्ट के मतदाता सदस्यों की सूची रखे जाने के 90 दिनों के अंदर अपनी शिकायत जिला रजिस्ट्रार को दर्ज करा सकता है। जिला रजिस्ट्रार यह शिकायत जिला वेबसाइट पर रखेगा। 90 दिन का समय बीत जाने पर यदि व्यक्ति शिकायत दर्ज करता है तो 100 रूपये प्रति माह की दर से अतिरिक्त शुल्क लगेगा। किन्तु 10 वर्ष बीत जाने पर सदस्यता का कोई दावा स्वीकार नही किया जायेगा।
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(25.5.1) जिला रजिस्ट्रार ट्रस्ट पर निम्न शुल्क लगाएगा। यह शुल्क सदस्यों पर लागू होगा न कि प्रति सूची के आधार पर :
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(25.5.2) 10 से कम मतदाता सदस्य- 500 रूपये प्रति मतदाता सदस्य प्रति वर्ष
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(25.5.3) 10-99 मतदाता सदस्य- 5000 रूपये + 50 रूपये प्रति मतदाता सदस्य प्रति वर्ष
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(25.5.4) 100-1000 मतदाता सदस्य- 10,000 रूपये + 20 रूपये प्रति मतदाता सदस्य प्रति वर्ष
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(25.5.5) जूरी द्वारा मतदाता सदस्यों के दावों का निपटान
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(26.1) प्रत्येक ट्रस्टी जूरी सदस्यों के सामने सदस्यों के नाम की सूची उनके मतों के मान के साथ रखेगा। जिला रजिस्ट्रार भी अपनी राय तथा जानकारी के आधार पर सूची देगा। कोई अन्य व्यक्ति भी अपनी तरफ से ऐसी सूची प्रस्तुत कर सकता है।
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(26.2) प्रत्येक जूरी सदस्य प्रत्येक सूची को 0-100 के मध्य अंक देगा। यदि किसी सूची को जूरी सदस्य ने कोई अंक नही दिया तो उसे शून्य अंक मान लिया जायेगा। जिस सूची को सर्वाधिक अंक मिलेंगे उसे अंतिम सूची माना जायेगा।
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(26.3) सूची को अंतिम रूप देने के बाद प्रत्येक जूरी सदस्य 0 रूपये से लेकर ट्रस्ट की कुल संपत्ति के 1% तक की शुल्क रकम बताएगा। जिला रजिस्ट्रार जूरी सदस्यों द्वारा दिए गए शुल्क आंकड़ों के बीच के मूल्य को शुल्क के रूप में लेकर शुल्क का 50% सूची बनाने वाले व्यक्ति को देगा और शुल्क का 50% जूरी सदस्यों के वेतन के लिए कोष में जायेगा ।
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(26.4) यदि कोई व्यक्ति मतदाता सदस्यों की सूची से संतुष्ट नही है तो वे जिला रजिस्ट्रार से अनुरोध कर सकते है कि वे 3 जिलों का लॉटरी द्वारा चयन कर उन जिलों के जिला रजिस्ट्रारो को जूरी ट्रायल कराने की अर्जी भेजें। प्रथम जिले मंक जिस आकार की जूरी का गठन किया गया था उसी आकार की जूरी का गठन प्रत्येक जिला रजिस्ट्रार 30 दिनों के अंदर करेगा।
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(26.5) पहली सुनवाई में प्रस्तुत सूची पर प्रत्येक जूरी सदस्य पूर्व सूचियों को 0-100 अंक देगा। इस अपील में कोई नई सूची प्रस्तुत नहीं की जायेगी। तीनों जूरी मंडलों के द्वारा अधिकतम अंक प्राप्त करने वाली सूची ही अंतिम सूची मानी जाएगी।
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(26.6) यदि जूरी सदस्यों को लगता है कि शिकायत व्यर्थ की गयी थी तो वे 0 से लेकर शिकायतकर्ता की कुल संपत्ति का 1% तक फाइन लगा सकते है। जिस जिले में प्रथम सुनवाई हुई थी उसका जिला रजिस्ट्रार यह फाइन प्राप्त करेगा।
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(26.7) सूची को अंतिम रूप देने के बाद प्रत्येक जूरी सदस्य 0 रूपये से लेकर ट्रस्ट की कुल संपत्ति के 2% तक की शुल्क रकम बताएगा। जिला रजिस्ट्रार जूरी सदस्यों द्वारा दिए गए शुल्क आंकड़ों के बीच का मूल्य शुल्क के रूप में लेगा।
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(27) मतदाता सूचियों को अंतिम रूप देने के बाद ट्रस्ट के अध्यक्ष तथा ट्रस्टियों में बदलाव की प्रक्रिया
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(27.1) धारा 14 में दी गयी प्रक्रिया के अनुरूप किसी ट्रस्ट के मतदाता सदस्य वोट वापसी पासबुक का प्रयोग करके अपने ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं ट्रस्टी को बदल सकेंगे।
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[ टिपण्णी : राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड की वोट वापसी पासबुक में एक सेक्शन ट्रस्टो का भी होगा। यदि आप किसी ट्रस्ट के मतदाता सदस्य है तो अपने ट्रस्ट के ट्रस्टियों एवं अध्यक्ष को बदलने के लिए किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दर्ज कर सकते है। ]
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(27.2) यदि किसी ट्रस्ट का मतदाता सदस्य अमुक ट्रस्ट का अध्यक्ष या ट्रस्टी बनना चाहता है तो जिला रजिस्ट्रार कार्यालय में ट्रस्ट की कुल संपत्ति का 1% के बराबर रकम का शुल्क जो कि कम से कम 2000 रूपये तथा अधिकतम 2000 रूपये हो सकता है, चुकाकर अपना नाम दर्ज करवा सकता है।
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(27.3) स्वीकृति दर्ज अथवा रद्द करने के लिए शुल्क इस तरह होगा ; 50 रू + ट्रस्ट की कुल संपत्ति का 0.0001% तथा अधिकतम 1000 रूपये। शुल्क के सम्बन्ध में जिला रजिस्ट्रार का निर्णय अंतिम होगा।
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(27.4) अध्यक्ष की नियुक्ति : यदि किसी अध्यक्ष पद के प्रत्याशी को कुल स्वीकृतियों की 50% से अधिक स्वीकृतियां मिल जाती है और यदि ये स्वीकृतियां पदासीन अध्यक्ष की स्वीकृतियों से 10% अधिक भी हो तो जिला रजिस्ट्रार उसे ट्रस्ट का नया अध्यक्ष नियुक्त करेगा। यहाँ मतदाता सदस्यों के मतों के मान को भी ध्यान में रखा जायेगा।
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(27.5) ट्रस्टी की नियुक्ति : यदि किसी ट्रस्टी पद के प्रत्याशी को 50% से अधिक मतदाता सदस्यों की स्वीकृति प्राप्त हो जाये और यदि यह स्वीकृतियां न्यूनतम स्वीकृति प्राप्त ट्रस्टी से 5% अधिक भी हो तो रजिस्ट्रार अमुक न्यूनतम स्वीकृति वाले ट्रस्टी को हटा कर उसकी जगह इस प्रत्याशी को ट्रस्टी बना देगा।
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(28) ट्रस्ट में नए मतदाता सदस्यों का प्रवेश तथा निष्कासन
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(28.1) यदि कोई मतदाता सदस्य किसी अन्य धर्म में परिवर्तन कर लेता है या किसी ऐसे संप्रदाय में शामिल हो जाता है जो कि परंपरागत रूप से अथवा ट्रस्ट के दस्तावेजों के अनुसार अलग संप्रदाय माना जाता हो, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है। किन्तु यदि इस विषय में ट्रस्ट के संविधान में विपरीत प्रावधान है तो उसकी सदस्यता जारी रहेगी। कोई भी मतदाता सदस्य अपने मताधिकार को अपने जीते जी किसी को हस्तांतरित नहीं कर सकेगा।
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(28.2) यदि किसी मतदाता सदस्य की मृत्यु हो जाती है अथवा वह धर्म या संप्रदाय परिवर्तन कर लेता है तो उसकी संताने मतदाता सदस्य बन जायेगी व उसके मत का मान समानुपातिक रूप से संतानों में बराबर बंटेगा। संताने नही होने पर है तो सदस्यता का हस्तांतरण पोते पोतियों में एवं पोते पोती न होने पर उसके भाई अथवा भाई के बच्चों को हो जाएगा। यदि वे भी नहीं है तो सदस्यता अगले नजदीकी रिश्तेदार को मिल जाएगी, जैसा कि जूरी ने तय किया हो।
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(28.3) ट्रस्ट सभी ट्रस्टियों के अनुमोदन के बाद तथा 75% से अधिक मतदाता सदस्यों के अनुमति से निम्नलिखित में से कोई
एक या एक से अधिक प्रावधान ट्रस्ट के विलेख में जोड़ सकता है, किन्तु एक बार यदि ये प्रावधान किसी ट्रस्ट के दस्तावेजों में आ गए तो फिर ये कभी हटाये नही जा सकेंगे।
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(28.3.1) मतदाता सदस्य आजीवन के लिए मतदाता सदस्य होगा।
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(28.3.2) मतदाता सदस्य की संताने मतदाता सदस्य होंगी तथा उसके मत का मान संतानों में बराबर बंटेगा।
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(28.3.3) किसी अन्य धार्मिक ट्रस्ट की मतदाता सदस्यता लेने से व्यक्ति अमुक ट्रस्ट में मतदाता सदस्य नही रह जाएगा।
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(28.3.4) महिलाओ को यदि मतदाता सदस्य बनाया जा सकता है।
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(28.3.5) ट्रस्ट में सभी मतदाता सदस्यों के मतों का मान एवं वजन बराबर होगा।
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(28.4) यदि मतदाता सदस्य स्वेच्छा सदस्यता त्याग देता है तो उसके बच्चों को मतदाता सदस्यता मिल जाएगी। किन्तु पुन: मतदाता सदस्य बनने के लिए उसे फिर से नए सदस्य के तौर पर जुड़ने के लिए तय की गयी प्रक्रिया से गुजरना होगा।
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(29) किसी ट्रस्ट के विभाजन या विलय के लिए ट्रस्ट के सभी ट्रस्टीयों एवं 75% मतदाता सदस्यों की सहमती आवश्यक होगी।
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(30) जनता की आवाज
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(30.1) यदि भारत का कोई भी मतदाता इस कानून में कोई परिवर्तन चाहता है तो वह कलेक्टर कार्यालय में एक एफिडेविट जमा करवा सकेगा। जिला कलेक्टर 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर एफिडेविट को मतदाता के वोटर आई.डी नंबर के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करके रखेगा।
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(30.2) यदि भारत का कोई भी मतदाता धारा 30.1 के तहत प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर अपना समर्थन दर्ज कराना चाहे तो वह पटवारी कार्यालय में 3 रूपए का शुल्क देकर अपनी हां / ना दर्ज करवा सकता है। पटवारी इसे दर्ज करेगा और हाँ / ना को मतदाता के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा।
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Sat Jul 13 2019 21:02:45 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
नागरिक कर्तव्य
Ashok Jain VotevapsiCm:
मैं भारत में मौजूद विभिन्न समस्याओ के समाधान के लिए जो चिट्ठियां PM एवं CM को भेजता हूँ, उसका रिकॉर्ड एक रजिस्टर में रखता हूँ । मेरे पास अभी 1 रजिस्टर है, और 1 ऐसा ही ओर बनाने वाला हुँ । एक रजिस्टर घर पर रहेगा , ताकि सुरक्षित रहे। एवं एक रजिस्टर मैं अन्य नागरिको को पढ़ने के लिए दूंगा एवं अपने साथ रखूँगा ।
रजिस्टर के छाया चित्र :
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मेरे विचार में प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि आवश्यक निर्देश चिट्ठी द्वारा PM एवं CM को भेजे एवं इसका रिकॉर्ड अपने पास रखने के लिए एक नोटबुक या रजिस्टर रखें. |
Sun Jul 14 2019 08:29:22 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Sun Jul 14 2019 08:48:01 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Sun Jul 14 2019 08:49:58 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Sun Jul 14 2019 08:50:36 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Rameshwar Jat Jury BhilwaraRj:
4 साल पहले ही आशंका व्यक्त कर दी थी कि भगवान करे मेरे भारत के साथ ऐसा ना हो ।
भारत विकास के जिस रास्ते पर जा रहा है उसी रास्ते पर यूनान दिवालिया हो चुका है । यूनान की सारी सम्पतिया बिक चुकी है और विदेशी कर्ज को उतारने के लिए नया कर्ज लेना पड़ता है ।
भारत भी विकास के लिए उसी रास्ते पर अग्रसर हो चला है जिसका नतीजा धीरे धीरे अब आने लग गया है ।
सरकार ने लोगो को राष्ट्रवाद व हिंदूवाद के मुद्दों में उलझा कर रख रखा है ताकि देश के जिम्मेदार लोग सरकार पर सवाल ना खड़े करे ।
आज भारत की सरकारी कम्पनिया ( बीएसएनएल, एयर इंडिया, भेल, सेल, रेल, कोल,....आदि ) बिक रही है , विकास के नाम पर विदेशी निवेश बढ़ रहा है नतीजन देश पर कर्जा लगातार बढ़ता ही जा रहा है ।
Sun Jul 14 2019 14:57:52 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Dhiraj Batade Ahmednagar LscandidateRrp:
#धनवापसी_पासबुक - खनिज रॉयल्टी सरळ नागरिकांच्या खात्यात पाठवण्याचा प्रस्ताव
( DhanVapsi Passbook - Directly Deposit Mineral Royalty in Citizens Account )
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या कायद्याचा सार : हा कायदा देशाची खनिज लूट थांबवण्यासाठी लिहिला गेला आहे. हा कायदा लागू झाल्याच्या त्वरीत नंतर भारत सरकारच्या नियंत्रणात असलेले सर्व खनिज आणि नैसर्गिक संसाधने देशाच्या नागरिकांची संपत्ती घोषित होईल, आणि 30 दिवसाच्या आत प्रत्येक मतदाराला एक धनवापसी पासबुक मिळेल. तेव्हा देशाची सर्व खनिज+स्पेक्ट्रम+सरकारी जागा यातून मिळणारी रॉयल्टी आणि भाडे "135 कोटी भारतीयांचे संयुक्त खातं" नावाच्या बँक अकाऊंट मधे जमा होईल. गोळा झालेल्या या रकमेचा 65% हिस्सा सर्व भारतीयांमधे समान वाटला जाईल आणि 35% हिस्सा सेनेच्या खात्यात जाईल. प्रत्येक भारतीयाच्या हिस्स्यात आलेल्या रकमेची एन्ट्री धनवापसी पासबुक मधे येईल.
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खनिजांचा लिलाव करून पैसे जमा करणारा राष्ट्रीय खनिज रॉयल्टी अधिकारी धनवापसी पासबुक च्या कक्षेत असेल आणि नागरिक तलाठी कार्यालयात जाऊन त्याला नोकरीवरून काढण्यासाठी आपली स्वीकृती देऊ शकतील. जर खनिज अधिकारी वा त्याच्या स्टाफ विरुद्ध घोटाळा करण्याची वा इतर एखादी तक्रार आली तर सुनावणी करने आणि दंड देण्याचा अधिकार जज जवळ नसून सामान्य नागरिकांच्या ज्युरी जवळ राहील. हा कायदा देशातील सर्व खाणींच्या विक्रीवर प्रतिबंध लावत आहे. या कायद्याला सौंसदेद्वारे पास करण्याची गरज नाहीये. पंतप्रधान याला सरळ गॅजेट/राजपत्रात छापू शकतात.
#P20180436101 , #DhanVspsi Passbook
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टीप : या ड्राफ्ट चे दोन भाग आहेत - (1) नागरिकांसाठी सामान्य निर्देश, (2) नागरिक आणि अधिकाऱ्यांसाठी निर्देश. टिप्पण्या या कायद्याचा हिस्सा नाहीये. नागरिक व अधिकारी या टिप्पण्यांचा वापर दिशा निर्देशांसाठी करू शकतात.
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भाग -1 : सर्व नागरिकांसाठी सामान्य निर्देश
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1. हा कायदा गॅजेट मधे छापल्यानंतर 30 दिवसाच्या आत प्रत्येक मतदाराला एक धनवापसी पासबुक मिळेल.
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2. ) हा कायदा लागू झाल्यानंतर भारताच्या केंद्र सरकार ला होणारे खनिज उत्पन्न, स्पेक्ट्रम उत्पन्न आणि केंद्र सरकार द्वारे अधिग्रहित जमिनींच्या भाड्याचा जवळजवळ 65% हिस्सा भारताच्या नागरिकांमधे समान रूपात वाटला जाइल. आणि दर महिन्याला या रकमेला तुमच्या बँक खात्यात सरळ जमा केले जाईल. उर्वरित 35% हिस्स्याचा उपयोग फक्त सेनेच्या सुधार साठी खर्च होईल. जेव्हा तुम्ही रक्कम प्राप्त करता तर याची एन्ट्री धनवापसी पासबुक मधे येईल.
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3. हा कायदा असे कोणतेही वचन देत नाही की तुम्हाला दर महिने 500 रु वा 1000 रु वा एखादी स्थिर रक्कम प्राप्त होईल. जर खनिज/स्पेक्ट्रम वा जमिनींचे बाजार भाव वाढले तर उत्पन्न आणि भाडे वाढु शकते. परंतु खनिज उत्पन्न आणि भाडे घटले तर सर्व नागरिकांना दर महिन्याला मिळणारे पैसे सुद्धा कमी होतील.
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4. राष्ट्रीय भूमी भाडे अधिकारी ( NMRO - National Mineral Royalty Officer ) जवळ उत्पन्न आणि भाडे ठरवणे, गोळा करने आणि तुम्ही सर्व नागरिकांच्या बँक खात्यात जमा करण्या हेतु आवश्यक कर्मचारी असतील. NMRO ची नियुक्ती पंतप्रधान करतील, परंतु जर ही रक्कम तुम्हाला वेळेवर मिळत नाहीये किंवा इतर कोणत्याही कारणास्तव तुम्ही NMRO ला नोकरीवरून काढून इतर व्यक्तीला आणू इच्छिता तर तुम्ही धनवापसी पासबुक सोबत तलाठी कार्यालयात जाऊन आपली स्वीकृती नोंदवू शकताल. तुम्ही तुमची स्वीकृती SMS, ATM वा मोबाईल अँप ने सुद्धा देऊ शकतात.
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5. तुम्ही तलाठी कार्यालयात जाऊन आपली स्वीकृती कोणत्याही दिवशी रद्द करू शकता, आणि राष्ट्रीय खनिज अधिकारी च्या कोणत्याही इतर उमेदवार ला कोणत्याही दिवशी स्वीकृत करू शकतात. जेव्हा तुम्ही एखाद्या उमेदवार साठी हा नोंदवताल वा आपली स्वीकृती रद्द करताल तर तलाठी याची एन्ट्री तुमच्या धनवापसी पासबुक मधे करेल.
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6. हा कायदा लागू झाल्यानंतर जर खनिज रॉयल्टी अधिकारी वा त्यांच्या स्टाफ मधून कोणी गबन-घोळ-हलगर्जीपणा भ्रष्टाचार केला वा इतर एखाद्या प्रकरणात कोणतीही तक्रार आली आणि जर तुमचे नाव वोटर लिस्ट मधे आहे तर तुम्हाला ज्युरी ड्युटी साठी बोलवले जाऊ शकते. ज्युरी ड्युटीत तुम्हाला आरोपी, पीडित, साक्षीदार आणि दोन्ही पक्षाच्या वकिलांद्वारे प्रस्तुत तथ्य-पुरावे वगैरे पाहून वादविवाद ऐकावा लागेल आणि शिक्षा/आर्थिक दंड वा सुटकेचा निर्णय द्यावा लागेल.
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7. राष्ट्रीय खनिज अधिकारी संपूर्ण भारतात सर्व खाणी, स्पेक्ट्रम, सरकारी जागेचे लिलाव आयोजित करेल. तो केंद्र सरकारचे स्वामित्व असणाऱ्या जागेंची रूपरेषा तयार करेल आणि या सर्व जागेवर किती काळची लीज हे सुद्धा ठरवेल. परंतु खनिज अधिकारी जवळ जल संसाधनांवर कोणताही अधिकार नसेल.
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8. राष्ट्रीय खनिज अधिकारी प्रत्येक व्यक्ती वा कंपनी ज्याच्या जवळ खाणी, स्पेक्ट्रम, सरकारी जमिनी वगैरे लीज वर आहेत, कडुन रॉयल्टी आणि भाडे दर महिने गोळा करेल आणि जमा झालेल्या रकमेला भारताच्या सर्व प्रौढ नागरिकांच्या बँक खात्यात दर महिने जमा करेल. सर्व नागरिकांना जवळजवळ समान रक्कम मिळेल परंतु ही रक्कम व्यक्तीचे वय, त्यांचे मुलं वा त्याच्या मुलींची संख्या, अपंगत्व वगैरे च्या आधारावर कमी जास्त होऊ शकते. वितरण अनुपात ची माहिती पुढील धारांमध्ये दिली गेली आहे.
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9. काही प्रकरणात कोणत्याही एका राज्ज्यात निवास करत असलेल्या नागरिकांना अमुक राज्ज्याच्या खनिज आणि जमिनीच्या प्राप्त रकमेतून अधिक पैसे मिळू शकतात, परंतु हे सर्व नागरिकांना मिळत असलेल्या रकमेपेक्षा दुप्पट असु शकत नाही. आणि अशा क्षेत्रांत ज्यांची सीमा शत्रु देशांना लागुन आहे वा सुदूर क्षेत्रात निवास करणाऱ्या नागरिकांना सुद्धा वाटल्या जाणाऱ्या रकमेत अतिरिक्त पैसे मिळू शकतात. परंतु वरील अपवादांना सोडून सर्व नागरिकांना समान हिस्सा मिळेल.
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10. हा कायदा फक्त केंद्र सरकार च्या अधीन येणाऱ्या खनिज खाणी, स्पेक्ट्रम आणि जमिनींवर लागू होईल. परंतु केंद्र सरकारच्या आधीन जल संसाधने या कायदा कक्षेच्या बाहेर रहातील. हा कायदा राज्य, नगरपालिका, जिल्हे, तालुके, ग्रामपंचायत च्या अधिकारात येणाऱ्या खाणी आणि जमिनींवर सुद्धा लागू होणार नाही. मुख्यमंत्री, महापौर आणि सरपंच आपल्या राज्य/शहर/जिल्हे/तालुके/गाव च्या स्वामित्व मधे येणाऱ्या खनिज खाणी आणि जमिनीतून प्राप्त रकमेला आपल्या राज्य/शहर/जिल्हे/तालुके/गावं च्या नागरिकांमधे वाटण्याचा असाच कायदा लागू करू शकतात वा त्यांना असे करण्याची गरज नाहीये. हा कायदा पाणी वा पाणीच्या वितरणातून मिळणाऱ्या रकमेवर लागू नसेल.
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भाग - 2 : नागरिक आणि अधिकारींसाठी निर्देश
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राष्ट्रीय संपत्तीवर नागरिकांच्या स्वामित्व ची घोषणा : भारताचे नागरिक देशाच्या सर्व खाणी, स्पेक्ट्रम, IIM अहमदाबाद समेत सर्व IIM चे भू-खंड , जेएनयू चे भु-खंड, युजीसी द्वारे पोषित सर्व विश्वविद्यालय आणि महाविद्यालय ज्यांचे स्वामित्व खाजगी कंपन्या वा ट्रस्ट जवळ नाहीये च्या भु-खंडांना संयुक्त आणि समान रूपाने भारतीय नागरिकांच्या स्वामित्व ची संपत्ती घोषित करत आहेत. आतापासून हे भू-खंड भारताचे राज्य सरकार वा भारताची केंद्र सरकार वा एखादे इतर सरकारी पक्ष वा खाजगी पक्ष यांची संपत्ती नाहीये. भारताच्या सर्व अधिकारी, न्यायाधीश, पंतप्रधान, हायकोर्ट आणि सुप्रीम कोर्ट च्या सर्व न्यायधीशांना विनंती केली जात आहे की भारतीय नागरिकांच्या या निर्णया विरोधात कोणत्याही याचिकेला स्वीकार न करावे.
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12. राष्ट्रीय खनिज रॉयल्टी अधिकारी चे भूखंडावर क्षेत्राधिकार
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12.1 खालील मंत्रालय आणि विभागांचे सर्व भूखंड राष्ट्रीय खनिज अधिकारी च्या अधिकार क्षेत्रात येतील.
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(1) विज्ञान, चिकित्सा, गणित आणि इंजिनियरिंग शिक्षणाचे कार्य करत असलेल्या संस्थांना सोडून आय.आय.एम, युजीसी द्वारे पोषित सर्व विश्वविद्यालय आणि महाविद्यालय
(2) विमानतळ, एयर इंडिया आणि इंडियन एयरलाईन्स चे स्वामित्व असणारे सर्व भवन
(3) पर्यटन व संस्कृती मंत्रालय
(4) सूचना व प्रसारण मंत्रालय
(5) उपभोक्ता खटले व लोक वितरण मंत्रालय
(6) मानव संसाधन विकास मंत्रालय
(7) सूचना प्रोद्योगीक मंत्रालय
(8) ग्रामीण विकास मंत्रालय
(9) लघुउद्योग व कृषी व ग्राम उद्योग मंत्रालय
(10) सामाजिक न्याय व सशक्तीकरण मंत्रालय
(11) कापड उद्योग मंत्रालय
(12) शहरी विकास व गरिबी सहाय्य मंत्रालय
(13) युवा खटले व खेळ मंत्रालय
(14) राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
(15) नीती आयोग
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(12.2) हा कायदा देशाच्या सर्व खाणी आणि सरकारी भूमीच्या विक्रीवर प्रतिबंध लावत आहे.
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(12.3) राष्ट्रीय भूमी भाडे अधिकारी चा खासगी व्यक्ती वा कंपन्या वा ट्रस्ट वा राज्य सरकार वा शहर वा जिल्ह्याचे स्वामित्व असणाऱ्या भू-खंडांवर कसल्याही प्रकारचा अधिकार असणार नाही. त्याच्या जवळ सेना, न्यायालय, कारागृह, रेल्वे, बस स्टँड, इयत्ता 12वी पर्यंतचे सरकारी विद्यालय आणि कर संग्रहन कार्यालय द्वारे उपयोग केले जाणारे भू-खंडांवर सुद्धा कसल्याही प्रकारचा अधिकार असणार नाही.
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(12.4) सर्व चिकित्सा विद्यालय, आयआयटी, एनआयटी, इंजिनियरिंग महाविद्यालय, आयआयएससी, विज्ञान आणि गणित इ. विद्यालय यांना आरोग्य मंत्रालय वा संरक्षण मंत्रालय वा विज्ञान मंत्रालय जसे पंतप्रधान ठरवेल, चे अंग बनवले जाईल. संबंधित मंत्री या विद्यालयांमधे दर दिवस च्या संचालन हेतु अध्यक्ष नियुक्त करतील. सर्व महाविद्यालय ज्यामध्ये चिकित्सा, विज्ञान, गणित आणि इंजिनियरिंग च्या शिक्षणाचे कार्य होत आहे, ते भू-खंड खनिज अधिकारी च्या अधिकार क्षेत्रात येणार नाहीत.
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13. भारत सरकार चे स्वामित्व असणाऱ्या भू-खंडाने भाडे गोळा करने
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(13.1) अनपुयोगी भूमी साठी -- खनिज रॉयल्टी अधिकारी आपल्या समज ने अमुक भूमी ने उचित माप च्या भू-खंडात विभाजित करेल. खनिज अधिकारी प्रत्येक भू-खंडा साठी लिलाव करेल. लिलाव साठी खालील नियम असतील.
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(13.1.1) लीज 5,10,15,20 किंवा 25 वर्षाची असेल. भाडे अधिकारी यापैकी एखादी वेळ ठरवेल. परंतु लीज 25 वर्षा पेक्षा जास्त असू शकत नाही.
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(13.1.2) बोली लावणारे मासिक भाडे आणि लीज च्या वेळे साठी बोली लावतील जी की अधिकतर लीज वेळेपेक्षा कमी असू शकते. बोली चे स्वरूप मासिक भाडे, लीज महिन्याच्या अनुसार असेल. एक व्यक्ती एका पेक्षा अधिक बोली/निविदा लावू शकतो. कमीत कमी लीज ची वेळ 12 महिने असायला हवी.
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(13.1.3) निविदेचा भार मासिक भाडे/लॉग(मासिक लीज) नुसार होईल. अर्थात जितके जास्त भाडे तितका जास्त भार आणि जितकी लांब लीज तितका कमी भार.
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(13.1.4) निविदा सार्वजनिक राहतील आणि सर्व निविदा सर्वांना दिसतील.
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(13.1.5) भाडे अधिकारी निविदांच्या भार नुसार भू-खंड देइल. [ मासिक_भाडे/लॉग (मासिक_लीज) ]
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(13.1.6) भाडे अधिकारी जमा रकमेच्या रूपात 6 महिन्याचे भाडे वा या समान रक्कम घेईल.
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(13.1.7) अमुक भाडोत्री कोणत्याही दिवशी जागा सोडण्यासाठी आणि दिले जात असलेले भाडे बंद करण्यासाठी स्वतंत्र राहील.
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(13.2) लीज काळ दरम्यान अमुक भू-खंड च्या आसपास च्या 1 वर्ग किमी क्षेत्रामधे जमिनीच्या भावात टक्केवारी बदल आणि ज्या दिवसापासून अमुक भू-खंड लीज वर दिला गेला आहे, तेंव्हापासून त्या दिवसापर्यंत जेव्हा भाड्यात संशोधन झाले आहे, आणि प्रचलित प्रभावी व्याज दरात टक्केवारी बदल च्या आधारे खनिज रॉयल्टी अधिकारी प्रत्येक 3 वर्षात भाड्यात संशोधन करेल.
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(13.3) लीज ची वेळ समाप्त झाल्यानंतर भाडे अधिकारी एक नवीन लिलाव करेल, त्यामधे वर्तमान लीज धारक ला खालील अतिरिक्त लाभ मिळतील.
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(13.3.1) त्याचा निविदा भार 1.1 ते 1.5 च्या पटीत होईल, जो की यावर अवलंबून असेल की त्याने किती वर्ष भाडे भरले आहे.
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(13.3.2) लिलाव समाप्त झाल्यानंतर तो 3 महिन्याच्या आत आपली बोली वाढवू शकतो.
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(13.3.3) कार्यरत लीज धारक ला 20 ते 50% पर्यंतचे नवीन लीज धारक द्वारे चुकवले जात असलेले 6 महिन्याचे आगाऊ भाडे मिळेल जे निर्भर असेल की किती महिन्यांसाठी त्या कार्यरत लीज धारक ने जमीन घेऊन ठेवली आहे.
(13.3.4) परंतु जर कार्यरत लीज धारक लिलाव हुकतो, तेंव्हा तो त्या भूमीवर निर्मित संपत्ती ला हटवू शकतो वा विकू शकतो, पण त्याला ती जमीन खाली करावी लागेल.
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(13.4) जर कार्यरत लीज धारक आधीच लीज वर असलेल्या भूखंडावर बोली लावतो तर त्याला 25% अधिक ( 25%* लीज महिन्यांत/ 300 ) च्या सोबत अधिकतर 50% पर्यंतचे बोनस प्राप्त होईल. अर्थात त्याच्या बोलीचा भार 1.25 ने 1.50 च्या पटीत वाढेल. परंतु हे यापेक्षा अधिक नसणार.
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(13.5) जर अमुक भू-खंड लीज वर आहे, तेव्हा खनिज अधिकारी भू-खंडाच्या आसपास च्या 1 किमी च्या क्षेत्रात मागील 3 वर्षाच्या जमीन विक्री च्या मूल्य चे मध्यांतर काढेल आणि भू-खंडा ची किंमत ठरवेल आणि पुढील 10 वर्षासाठी (बाजार मूल्य* प्रधान व्याज दर/3) च्या रूपात वार्षिक भाडे निर्धारित करेल. भाडे प्रत्येक 3 वर्षात संशोधित होईल. 10 वर्षानंतर अशा भूखंडावर धारा 13.1 मधे सांगितले गेलेले नियम लागू होतील.
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(13.6) खनिज रॉयल्टी अधिकारी गोळा झालेल्या रकमेपैकी 35% हिस्सा संरक्षण मंत्री ला सेनेला मजबूत करने आणि शस्र उपलब्ध करने आणि सर्व नागरिकांना शस्र चालवण्याचे शिक्षण देण्यासाठी देईल.
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14. भूखंडातून प्राप्त भाडे आणि खनिज रॉयल्टी चे नागरिकांमध्ये वाटप
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(14.1) खनिज रॉयल्टी अधिकारी गोळा झाल्या पैकी 35% दर महिने त्या नागरिकांना पाठवेल जे मागील 10 वर्षापासून अमुक राज्ज्यात निवास करत आहेत, परंतु ही रक्कम मागील वर्षी भारताच्या नागरिकांना प्राप्त रकमेच्या दुपटीहुन अधिक नसणार. खनिज रॉयल्टी अधिकारी उर्वरित भाडे दर महिन्याला भारताच्या नागरिकांना पाठवेल.
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(14.2) हा कायदा पास झाल्याच्या 1 वर्षांनंतर नागरिकांना ला प्राप्त होणारे भाडे याप्रकारे बदलेन.
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(14.2.1) जर त्याला (0 मुलगा), (0 मुलगा,1 मुलगी), (0 मुलगा, 2 मुली) आहेत, तर भाडे 33% अधिक मिळेल आणि जर त्याचे वय 60 वर्षं आहे तर भाडे 66% अधिक मिळेल.
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(14.2.2) जर त्याला (1मुलगा , 0 मुली), (1 मुलगा, 1मुलगी ), (1 मुलगा, 2 मुली) आहेत, तर भाडे 15% अधिक मिळेल आणि जर त्याचे वय 60 वर्षं आहे तर त्याला भाडे 33% अधिक मिळेल.
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(14.2.3) जर त्याला (2 मुलं, 0 मुली), (2 मुलं, 1 मुलगी) आहे, तर भाड्यात काहीही बदल होणार नाही - न वाढेल न कमी होईल.
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(14.2.4) जर त्याला (2 मुलं, 2 मुली) वा (3 मुलं, 1 मुलगी) आहे, तर भाडे 33% कमी मिळेल.
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(14.2.5) जर त्याच्या कडे वर दिल्यापैकी सर्व नियमांपेक्षा अधिक मुलं आहेत, तर त्याला भाडे 66% कमी मिळेल.
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(14.3) 60 वर्षाच्या वरील पुरुषांना आणि 55 वर्षाच्या वरील महिलांना मिळणारे भाडे 33% अधिक असेल आणि 75 वर्षाच्या वरील पुरुषांना आणि 70 वर्षाच्या वरील महिलांना मिळणारे भाडे 66% अधिक असेल.
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(14.4) 7 वर्षापेक्षा कमी वयाच्या मुलांना कोणतेही भाडे मिळणार नाही. 7 वर्ष ते 14 वर्षाच्या मधील बालकांना मिळणारे भाडे सामान्य भाड्याचे एक तृतीयांश(33%) असेल आणि 14 वर्षं ते 18 वर्षांच्या मधील मुलांना मिळणारे भाडे सामान्य भाड्याचे दोन तृतीयांश(66%) असेल. 14 वर्षापेक्षा कमी वयाच्या मुलांना मिळणारे भाडे त्याच्या आईला दिले जाणार, जो पर्यंत की ज्युरी खनिज रॉयल्टी अधिकारी ला त्या मुलाचे वडील वा कोणी इतर संबंधी ला देण्याचा आदेश देत नाही वा जर आई जिवंत नाहीये.
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(14.5) पुढे, जर ज्युरी ला आढळले की पति एक वा त्याहून अधिक मुलांची देखरेख चांगली करत नाहीये, तर ज्युरी खनिज अधिकारी ला निर्देश देऊ शकते की पिता ला मिळणाऱ्या भाड्याचा अर्धा भाग आईला दिला जावा. अशा स्थितीत खनिज रॉयल्टी अधिकारी अर्धा भाग पिता ला देईल आणि अर्धा भाग आईला.
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15. खनिज रॉयल्टी गोळा करने
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(15.1) खनिज रॉयल्टी अधिकारी 1947 च्या आधी व नंतर लीज वर दिलेल्या सर्व कार्यात्मक लीज खाणींचे लीज चे बाजार भावाने पुनरमूल्यांकन करून ठरवेल की अमुक कार्यात्मक खाणी ची रॉयल्टी रक्कम वाढवली पाहिजे की नाही. देशातील इतर सर्व खाणी, कच्च्या तेलाच्या विहिरी वगैरे यातून होणारे उत्पन्न सुद्धा NMRO प्राप्त करेल.
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(15.2) खनिज रॉयल्टी अधिकारी प्राप्त होणारी खनिज रॉयल्टी व भूमी भाडे सेने मधे, राज्य आणि भारतात निवास करत असलेल्या नागरिकांमधे त्याच समान कपात मधे वाटली जाईल जसे भूमी भाडे वितरण च्या संबंधित खंडात वर्णिले आहे.
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16. खनिज रॉयल्टी अधिकारी व त्याच्या कर्मचारी च्या तक्रारींचे ज्युरी द्वारे समाधान
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(16.1) खनिज रॉयल्टी अधिकारी प्रत्येक जिल्ह्यासाठी एक जिल्हा ज्युरी प्रशासक, प्रत्येक राज्य साठी एक राज्य ज्युरी प्रशासक आणि भारतासाठी एक राष्ट्रीय ज्युरी प्रशासक नियुक्त करेल.
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[ टीप : जिल्हा, राज्य आणि राष्ट्रीय ज्युरी प्रशासक धनवापसी पासबुक च्या कक्षेत असतील आणि या पासबुक मधे दिलेल्या "वोट वापसी" सेक्शन चा उपयोग करून मतदार वरीलपैकी कोणत्याही अधिकाऱ्याला नोकरीवरून काढून एखाद्या दुसऱ्या व्यक्ती ला आणण्यासाठी आपली स्वीकृती देऊ शकतील. याची प्रक्रिया याच कायद्याची धारा 19 मधे दिली गेली आहे.
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(16.2) जिल्हा ज्युरी प्रशासक जिल्ह्याच्या मतदार यादीतून 30 सदस्यीय महाज्युरी मंडळाची नियुक्ती करेल. यातून प्रत्येक 10 दिवसाला 10 सदस्य रिटायर होतील आणि 10 नवीन सदस्यांची निवड मतदार यादीतून लॉटरी द्वारे केली जाईल. ही महाज्युरी मंडळ सतत कार्यरत राहील. महाज्युरी सदस्याला दर उपस्थिती 500 व प्रवास खर्च मिळेल.
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(16.3) जर खनिज रॉयल्टी अधिकारी वा त्याच्या स्टाफ संबंधित एखादा खटला आला तर आरोपी आपल्या खटल्याची लेखी तक्रार महाज्युरी मंडळाच्या सदस्यांना देऊ शकतात. जर महाज्युरी मंडळाला हा खटला असंवेदनशील वाटला तर ते तक्रार रद्द करू शकतात वा या खटल्याच्या सुनावणी साठी 30 ते 55 वर्ष वयातल्या नागरिकांची एक नवीन ज्युरी मंडळाची रचना करण्याचे आदेश देऊ शकतात. ज्युरी मंडळाच्या रचनेत खालील नियमांचे पालन केले जाईल.
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(16.3.1) वादविवाद ची त्या जिल्ह्यात नोंद होईल जेथे प्रॉपर्टी स्थित आहे वा नागरिक रहात आहे. जर नागरिक वा लीज धारक वा अधिकारी ठिकाण चा बदल त्या राज्ज्यात स्थित एखाद्या इतर जिल्ह्यात इच्छितो तर ते राज्य ज्युरी प्रशासक वा राज्ज्याच्या हाईकोर्ट कडून आदेश प्राप्त करू शकतात. आणि जर पक्षकार खटल्याला राज्ज्याबाहेर एखाद्या इतर जिल्ह्यात इच्छितो तेव्हा ते राज्य ज्युरी प्रशासक वा सुप्रीम कोर्ट कडून आदेश प्राप्त करू शकतात.
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(16.3.2) जिल्ह्यात प्रत्येक विवादासाठी जिल्हा ज्युरी प्रशासक रँडमली (क्रमरहीत) 3 ते 10 गणित, विज्ञान वा इंजिनियरिंग मधे पदवीधर यांची निवड, प्रकरणात मदत देण्यासाठी तयार पदवीधर यांच्या यादीने करेल. निवडलेले इंजिनियर यांचे वय 30 ते 55 वर्षाच्या मधे असले पाहिजे आणि त्यांच्या जवळ 5 वर्षाच्या कामाचा अनुभव असला पाहिजे.
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(16.3.3) जिल्हा ज्युरी प्रशासक भारताच्या मतदार यादीतून रँडमली(क्रमरहीत) 3 वर्षं आणि 55 वर्षा मधले मतदार निवडेल. निवडला गेलेला व्यक्ती मागील 10 वर्षांत कोणत्याही ज्युरी मधे प्रस्तुत नसलेला असावा आणि मागे कोणत्याही गुन्ह्यात दोषी नसलेला पाहिजे.
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(16.3.4) ज्युरी सदस्यांची संख्या कमीत कमी 12 ते 50, 200, 500 आणि अधिकतर 1500 असू शकेल. तथा ज्युरी चा आकार आरोपी कर्मचारी चे पद आणि प्रतिष्ठा यावर अवलंबून असेल.
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(16.3.5) जर विवादाची रक्कम रु.10 लाखाहून कमी आहे तर ज्युरी चा आकार कमी असेल, आणि प्रति 10 लाख रुपयांसाठी एक ज्युरी सदस्य वाढवला जाईल.
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(16.3.6) जर तक्रार पैशासोबत एखाद्या अधिकारी विरोधात सुद्धा तक्रार आहे तर ज्युरी चा आकार वर सांगितले गेलेल्या बिंदू (4) वा (5) यातून जी पण अधिक आहे, त्यानुसार होईल.
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(16.3.7) ज्युरी सदस्य त्या जिल्ह्यातून निवडले जातील तिथले जिल्हा न्यायालय व्हिडीओ कॉन्फरन्स द्वारे सुनावणी करणाऱ्या जिल्हा न्यायालयाशी जुडलेली असतील. जर अमुक जिल्हा व्हिडीओ कॉन्फरन्स द्वारे एखाद्या इतर जिल्ह्याशी जुडलेला नाहीये, तर सर्व ज्युरी सदस्य त्या जिल्ह्यातले असतील जेथे प्रकरणाची नोंद झाली आहे.
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(13.3.8) ज्युरी सदस्य प्रत्येक पक्षाला 1-1 तास ऐकतील. 65% पेक्षा अधिक ज्युरी सदस्य बोलले की त्यांनी पुरेसे ऎकलं आहे, सुनावणी समाप्त होईल.
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(16.3.9) जर 75% पेक्षा अधिक ज्युरी सदस्यांनी सांगितले की अमुक कर्मचारी ज्याच्या विरोधात तक्रार आहे, ला नोकरीवरून काढले पाहिजे तर खनिज रॉयल्टी अधिकारी त्याला काढू शकतो वा त्याला असे करण्याची गरज नाहीये. जर 75% पेक्षा अधिक ज्युरी सदस्य आर्थिक दंड लावण्यास सहमत होतात तर खनिज अधिकारी आरोपी कडून लावलेला आर्थिक दंड घेऊ शकतो वा त्याला असे करण्याची गरज नाहीये. जर अमुक तक्रार दाराला वाटले की खनिज रॉयल्टी अधिकारी ने ज्युरी सदस्यांच्या निर्णयाचे योग्य प्रकारे पालन केले नाही तर तो भारताच्या नागरिकांना मागणी करू शकतो की त्यांनी धारा 20 मध्ये दिलेल्या वोट वापसी प्रक्रियेचा प्रयोग करून त्याला नोकरीवरून काढण्याची सहमती द्यावी.
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(16.3.10) जिल्हा न्यायालयाच्या ज्युरी सदस्याच्या निर्णयाविरोधात याचना हायकोर्ट चे ज्युरी सदस्य वा न्यायधीशांसमोर केली जाऊ शकते.
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17. खनिज रॉयल्टी अधिकारी आणि ज्युरी प्रशासक द्वारे अर्ज करण्याच्या योग्यता
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(17.1) राष्ट्रीय खनिज रॉयल्टी अधिकारी आणि राष्ट्रीय ज्युरी प्रशासक साठी : भारताचा कोणताही नागरिक ज्याचे वय 35 वर्षाहून जास्त आहे तो राष्ट्रीय खनिज अधिकारी वा राष्ट्रीय ज्युरी प्रशासक पदासाठी अर्ज करू शकतो.
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(17.2) ज्युरी प्रशासक साठी : भारताचा कोणताही नागरिक ज्याचे वय 30 वर्षाहून जास्त आहे तो जिल्हा आणि राज्य ज्युरी प्रशासक पदासाठी अर्ज करू शकतो.
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18. धारा 17 मध्ये दिलेली योग्यता असणारा कोणताही नागरिक जर जिल्हा कलेक्टर कार्यालयात स्वतः वा एखाद्या वकिलाच्या माध्यमाने एखादे एफिडेविट प्रस्तुत करतो, तर जिल्हा कलेक्टर त्याच्या कडुन खासदारकी च्या निवडणुकीला जमा केल्या जाणाऱ्या रकमेच्या समान आवेदन शुल्क घेऊन त्या पदासाठी त्याची उमेदवारी स्वीकार करेल आणि त्याला एक विशिष्ट सिरीयल नंबर जारी करेल.
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19. मतदार द्वारे उमेदवारांना समर्थन करण्यासाठी हा नोंदणी
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(19.1) कोणताही नागरिक कोणत्याही दिवशी आपले धनवापसी पासबुक सोबत घेऊन तलाठी कार्यालयात जाऊन राष्ट्रीय खनिज रॉयल्टी अधिकारी, जिल्हा ज्युरी प्रशासक, राज्य आणि राष्ट्रीय ज्युरी प्रशासक च्या उमेदवारांच्या समर्थनात हा नोंदवू शकेल. तलाठी आपल्या कम्प्युटर आणि धनवापसी पासबुक मध्ये मतदाराच्या हा ची नोंद करेल. तलाठी मतदारांच्या हा ला उमेदवारांचे नाव व मतदाराची ओळख-पत्र संख्या सोबत जिल्ह्याच्या वेबसाईटवर सुद्धा ठेवेल. मतदार एखाद्या पदाच्या उमेदवारांपैकी आपल्या पसंतीच्या अधिकतर 5 व्यक्तींना स्वीकृत करू शकेल.
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(19.2) स्वीकृती (हा) नोंदण्यासाठी मतदार 3 रुपये फी देईल. BPL कार्ड धारकासाठी फी 1 रुपये असेल.
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(19.3) जर एखादा मतदार आपली स्वीकृती रद्द करण्यासाठी येतो तर तलाठी त्याचे एक वा अधिक नाव कुठलेही शुल्क न घेता रद्द करेल.
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(19.4) प्रत्येक महिन्याच्या 5 तारखेला, कलेक्टर मागील महिन्यात प्राप्त प्रत्येक उमेदवार ला मिळालेल्या स्वीकृतींची बेरीज प्रकाशित करेल. तलाठी आपल्या क्षेत्रातील स्वीकृतींचे हे प्रदर्शन प्रत्येक सोमवारी करेल. राष्ट्रीय खनिज अधिकारी आणि राष्ट्रीय ज्युरी प्रशासकाच्या स्वीकृतींचे प्रदर्शन 5 तारखेला कॅबिनेट सचिव द्वारे सुद्धा केले जाईल.
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[ टीप : कलेक्टर अशी सिस्टीम बनवू शकतो मतदारांना आपली हा SMS, ATM, मोबाईल अँप ने नोंदवता येईल.
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रेंज वोटिंग - पंतप्रधान वा मुख्यमंत्री अशी सिस्टीम बनवू शकतात की मतदार एखाद्या उमेदवार ला - 100 ते 100 च्या मधला अंक देऊ शकतील. जर मतदार फक्त हा नोंदवत आहे तर त्याला 100 अंका समान मानले जाईल. जर मतदार आपली स्वीकृती नोंदवत नाही तर याला शून्य अंक मानले जाईल. परंतु जर मतदार अंक देत आहे तर त्याने दिलेले अंकच मान्य असतील. रेंज वोटिंग ची ही प्रक्रिया स्वीकृती प्रणाली पेक्षा उत्तम आहे, आणि ऐरो ची व्यर्थ असमभाव्यता प्रमेय ( Arrow's Useless Impossibility Theorem ) पासून प्रतिरक्षा प्रदान करते.]
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20. राष्ट्रीय खनिज अधिकारी व ज्युरी प्रशासक ची नियुक्ती आणि निष्कासन
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(20.1) राष्ट्रीय खनिज अधिकारी व राष्ट्रीय ज्युरी प्रशासक साठी : जर एखाद्या उमेदवार ला देशाच्या मतदार यादीत प्रविष्ट सर्व मतदारां ( सर्व मतदार, न की फक्त ते ज्यांनी स्वीकृती नोंदवली आहे ) च्या 35% हुन जास्त स्वीकृती प्राप्त झाल्या, आणि जर ह्या स्वीकृती पदासीन अधिकारी पेक्षा 1% जास्त सुद्धा आहेत, तर पंतप्रधान वर्तमान अधिकाऱ्याला काढून सगळ्यात जास्त स्वीकृती मिळालेल्या उमेदवार ची नियुक्ती संबंधित पदावर करू शकतात, वा आपला राजीनामा देऊ शकतात. नियुक्ती बाबत अंतिम निर्णय पंतप्रधान यांचाच असेल.
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(20.2) राज्य ज्युरी प्रशासका साठी : जर राज्य च्या मतदार यादीत प्रविष्ट सर्व मतदारांच्या 35% हुन जास्त मतदार एखाद्या उमेदवार साठी हा नोंदवतात आणि स्वीकृतींची संख्या पदासीन अधिकारी पेक्षा 1% जास्त सुद्धा आहे तर राष्ट्रीय खनिज अधिकारी अमुक व्यक्ती ला राज्य ज्युरी प्रशासक च्या पदावर नियुक्त करू शकतात.
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(20.3) जिल्हा ज्युरी प्रशासका साठी : जर जिल्ह्याच्या मतदार यादीत प्रविष्ट सर्व मतदारांच्या 35% हुन जास्त मतदार एखाद्या उमेदवार साठी हा नोंदवतात आणि स्वीकृतींची संख्या पदासीन अधिकारी पेक्षा 1% जास्त सुद्धा आहे तर राष्ट्रीय खनिज अधिकारी अमुक व्यक्ती ला जिल्हा ज्युरी प्रशासक च्या पदावर नियुक्त करू शकतात.
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21. जनतेचा आवाज
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(21.1) जर एखादा नागरिक या कायद्यात कोणताही बदल इच्छितो तर असा नागरिक मतदार जिल्हा कलेक्टर च्या कार्यालयात उपस्थित होऊन एक शपथपत्र प्रस्तुत करु शकतो. जिल्हा कलेक्टर या शपथपत्राला 20 रू प्रती पानाचे शुल्क घेऊन या शपथपत्राला स्कॅन करून अमुक मतदाराच्या वोटर आय.डी सोबत पंतप्रधान च्या वेबसाइटवर ठेवेल.
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(21.2) जर एखादा मतदार धारा 21.1 च्या आधारे प्रस्तुत एखाद्या शपथपत्रावर आपले समर्थन नोंदवू इच्छितो तर तो तलाठी कार्यालयात 3 रुपये शुल्क देऊन आपली हा/नाही नोंदवू शकतो. तलाठी याची नोंद करेल आणि हा/नाही ला मतदार च्या वोटर आय.डी नंबर सोबत पंतप्रधान च्या वेबसाईटवर टाकेल.
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[ टीप : हा कायदा लागू झाल्याचा 4 वर्षानंतर जर व्यवस्थेमध्ये सकारात्मक आणि निर्णायक येत आहेत तर कोणताही नागरिक या कायद्याची धारा 15 च्या आधारे एक शपथपत्र प्रस्तुत करू शकतो, ज्यामध्ये त्या कार्यकर्त्यांना सांत्वन च्या रुपात उचित प्रतिफळ देण्याचा प्रस्ताव असेल, ज्यांनी हा कायदा लागू करण्यासाठी प्रयत्न केले आहेत. जर एखादा कार्यकर्ता त्यावेळी जिवंत नाहीये तर प्रतिफळ त्याच्या नोमोनि ला दिले जाईल. हे प्रतिफळ एखादे स्मृती चिन्ह/ प्रशस्तीपत्र वगैरे वा इतर कोणत्याही रुपात असू शकते. जर राज्य चे 51% नागरिक या शपथपत्रावर हा नोंदवतात तर पंतप्रधान/मुख्यमंत्री यांना लागू करण्याचे आदेश जारी करू शकतात, वा नाही पण करू शकत.]
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-----------धनवापसी कायदा ड्राफ्ट ची समाप्ती -----------
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का आपल्याला या कायद्याची गरज आहे ?
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कच्चा माल म्हणजे खाणी आणि जमीन हीच सगळ्या जगाची खरी संपत्ती आहे. सगळ्या निर्माण कंपन्या, कारखाने, औद्योगिक विकास वगैरे कच्च्या मालाच्या स्वस्त उपलब्धतेवर अवलंबून असतो. दुर्भाग्याने भारतात आधीच खनिजांची कमतरता आहे. हेच खनिज लुटण्यासाठी ब्रिटिश-फ्रान्सिस साम्राज्य भारतात आले. त्यांना त्यांचे कारखाने चालवण्यासाठी कच्चा माल म्हणजे खनिज ची गरज होती. इंग्रजांनी भारताच्या खनिजाचे असिमीत अधिग्रहीन केले आणि 500 वर्ष याला फुकट लुटले.
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भारत स्वतंत्र झाल्यानंतर नसगरिकांनी ही मागणी केली होती की भारताच्या नैसर्गिक संसाधनांना भारताच्या समस्त नागरिकांची संपत्ती घोषित करा. परंतु ज्या लोकांच्या हातात सत्ता आली होती ते नागरिकांच्या या संयुक्त संपत्तीला आपल्या ताब्यात ठेऊ इच्छित होते. अंतः त्यांनी ही संसाधने आपल्या अधिकारात ठेवले. आणि मग स्वातंत्र्यानंतर जो पण पक्ष सत्तेत आला त्याने उद्योगपतींकडून घूस खाऊन कवडीमोल भावात खाणी खोदण्याचे लायसेन्स दिले. वाळू, दगड, तांब, जस्ता, लोह पासून ते सोनं, चांदी, हिरे प्रयत्न सर्व प्रकारचे खनिज मनसोक्तपणे विकले जात आहेत. जो पण पक्ष सत्तेत येतो सगळ्यात आधी हे पहातो की कोणकोणती संसाधने विदेशींना विकून माल कमावला जाऊ शकतो. ही लूट ते विनेवेश आणि खासगीकरण च्या नावावर चालवतेत.
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आणि आता बहुराष्ट्रीय कंपन्या आल्यानंतर 10 पट होत आहे. विदेशी धनिक आपल्या नेत्यांना निवडणूक लढण्यासाठी देणगी देतेत आणि बदल्यात किमती खाणी खोदण्याचे अधिकार कायदेशीर स्वरूपात घेतेत. आज सरकार जी नैसर्गिक संसाधने विकत आहे, ती भारताच्या समस्त नागरिकांची संपत्ती आहे. जर आपल्या पूर्वजांनी इंग्रजांना इथून पळवले नसते तर आज ही संपत्ती शिल्लक राहिली नसती. परंतु इंग्रज गेल्या नंतर सुद्धा ही लूट चालूच आहे !! इंग्रजांनी असिमीत स्वरूपात याला फुकट लुटले, आणि आज ही लूट फुकटभवात कायदेशीर चालू आहे. सरकार ला कोणताही अधिकार नाहीये की त्यांनी आपली संपत्ती आपल्याला न विचारता विकावी.
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हा कायदा भारताचे सर्व नैसर्गिक संसाधने देशाच्या 135 कोटी नागरिकांची संपत्ती घोषणा करतो. हा कायदा आल्यानंतर भारताच्या नैसर्गिक संसाधनांची ही लूट बंद होईल. खनिज रॉयल्टी आणि सरकारी जागेचे भाडे यातून जी रक्कम जमा होईल त्याचा 65% हिस्सा 135 कोटी भारतीयांमधे समान वाटला जाईल आणि ही रक्कम दर महिन्याला प्रत्येक भारतीयाच्या खात्यात जमा होईल. उर्वरित 35% हिस्सा सेनेला मजबूत करण्यासाठी खर्च केला जाईल.
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जर आपण भारतीय नागरिक हा कायदा आणण्यात यशस्वी झालो नाही तर लवकरच बहुराष्ट्रीय कंपन्या भारताच्या सर्व नैसर्गिक संपत्तीचे अधिग्रहण करून भारताला कंगाल करून टाकतील. आणि जर आपण एकदा का आपले नैसर्गिक संसाधने गमावली तर भारत औद्योगिक विकासासाठी कायमस्वरूपी परजीवी होईल. कारण की जो देश कच्च्या मालासाठी आयात वर अवलंबून असतो त्याचा कणा कायमस्वरूपी तुटून पडतो.
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Sun Jul 14 2019 15:07:36 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Old news ( January, 2019 )
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उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिखकर देशभर के मदरसे बंद करने की बात कही है.
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रिजवी ने कहा - " मदरसों में छात्रों को निशाना बनाते हुए आंतकी संगठन ISIS की विचारधारा को फैलाया जा रहा है. यदि इसे रोका नहीं गया तो देशभर के आधे से ज्यादा मुसलमान ISIS की विचारधारा के समर्थक हो जाएंगे."
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खत में रिजवी ने कहा है -- " पूरी दुनिया में देखा गया है कि कोई भी मिशन चलाने के लिए बच्चों को निशाना बनाया जाता है और इस वक्त ISIS एक खतरनाक आतंकी संगठन है, जो धीरे-धीरे पूरी दुनिया में मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में पकड़ बना रहा है."
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Sun Jul 14 2019 19:23:37 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Sun Jul 14 2019 19:38:15 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
अखंड भारत परिषद्:
Sun Jul 14 2019 19:50:18 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Fri Jul 19 2019 10:52:55 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Fri Jul 19 2019 16:16:35 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Sat Jul 20 2019 18:48:50 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Sun Jul 21 2019 17:55:00 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
भारत के सबसे बड़े हिन्दी अखबार "दैनिक भास्कर" में यह सूचना कल यानी 20 जुलाई 2019 को प्रकाशित की गयी है। पेड कॉलमिस्ट जय प्रकाश चौकसे ने लिखा कि — सुकरात को मृत्यु दंड देने का फैसला आधा दर्जन जजों ने दिया था !!
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जबकि सच्चाई यह है कि सुकरात को मृत्यु दंड नागरिको की जूरी ने दिया था !!! एथेंस के 500 आम नागरिको ने सुकरात का मुकदमा सुना और उनमे से 380 नागरिको ने वोट किया कि सुकरात जो अपराध कर रहा है उसके लिए उसे मृत्यु दंड दे दिया जाना चाहिए। जूरी सुकरात को मारना नहीं चाहती थी , अत: उन्होंने ट्रायल से पहले सुकरात को एथेंस छोड़कर चले जाने को कहा , पर सुकरात ने एथेंस छोड़ कर जाने से मना कर दिया।
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सजा सुनाने के बाद भी कारागार के दरवाजे खुले रखे गए, ताकि यदि वह जाना चाहता है चला जाए। सुकरात फिर भी नहीं गया। अंत में मजबूरी में उसे जहर का प्याला पिलाया गया, जिससे उसकी मौत हो गयी।
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ऐसा नहीं है कि पेड जयप्रकाश चौकसे को इस बारे में जानकारी नहीं है। किन्तु फिर भी उन्होंने जान बुझकर इस बात को छिपाया, क्योंकि वे अपने पाठको को जूरी सिस्टम की जानकारी नहीं देना चाहते थे। यदि वे इस तथ्य को उद्घाटित करते तो पाठक के दिमाग में यह जायज प्रश्न खड़ा होता कि आखिर सुकरात ऐसा क्या कर रहा था कि उसके देश के 500 में से 380 लोग उसे मार दिए जाने पर सहमत थे। और फिर भी वे उसे मारना नहीं चाहते थे। किन्तु सुकरात शहीद होने पर तुला हुआ था और उसने देश छोड़कर जाने से मना कर दिया। अतत: उसे जहर पिलाना पड़ा।
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इसके अलावा पेड जय प्रकाश चौकसे यह बात भी लिखते रहते है कि राईट टू रिकॉल आने से रोज चुनाव होंगे। लेकिन वे किस पद पर राईट टू रिकॉल की बार कर रहे है और अमुक राईट टू रिकॉल की क्या प्रक्रिया होगी इस बारे में वे कोई खुलासा नहीं करते !! वे अपने पाठको तक बस ये जानकारी पहुँचाना चाहते है कि राईट टू रिकॉल में रोज चुनाव होते है !! हालांकि अमेरिका में जिला पुलिस प्रमुख को शामिल करते हुए दर्जन भर पदों पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं मौजूद है, किन्तु वहां पर रोज चुनाव नहीं होते। दरअसल अमेरिका में लगभग 20 से 30 साल में भी कभी रिकॉल इलेक्शन नहीं होता।
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भारत में राईट टू रिकॉल के ड्राफ्ट सिर्फ राईट टू रिकॉल ग्रुप ने प्रस्तावित किये है। और राईट टू रिकॉल ग्रुप के प्रस्तावित ड्राफ्ट में तो चुनाव होने का सिस्टम ही नहीं है। मतलब जब किसी अधिकारी को निकाला जाएगा तब भी चुनाव नहीं होंगे !! और राईट टू रिकॉल ग्रुप के अलावा अब तक भारत में किसी भी व्यक्ति/संस्था/पार्टी/संगठन ने राईट टू रिकॉल के ड्राफ्ट सामने नहीं रखे है। तो ये रोज चुनाव की थ्योरी वे कहाँ से लाते है सिर्फ उनके स्पोंसर जानते है !!
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एक अपवाद वरुण गाँधी जी का है। किन्तु उन्होंने सिर्फ एक पद पर यानी राईट टू रिकॉल सांसद का ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। वैसे भी सांसद पर राईट टू रिकॉल होना न होना बराबर है, और इससे कोई फर्क नहीं आएगा। सांसद के पास नीति बनाने का निर्णायक अधिकार नहीं होता है, और व्हिप क़ानून के कारण वह अपनी पार्टी द्वारा पेश किये गए बिल पर ठप्पा लगाने के लिए बाध्य है। अत: राईट टू रिकॉल के लिहाज से सांसद एक चिल्लर पद पर है। एक सांसद के रूप में उसके पास कोई शक्तियाँ नहीं है।
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इसके अलावा भी पेड दैनिक भास्कर काफी तेज अखबार है। आपको याद होगा कि 27 सितम्बर 2016 को भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी। लेकिन पेड दैनिक भास्कर के एडिटर ने इस स्ट्राइक की खबर 23 सितम्बर 2016 को ही दे दी थी !!! इस तरह पेड दैनिक भास्कर के पाठको को इस स्ट्राइक की एडवांस खबर थी। पेड भास्कर ने यह भी बता दिया था कि रात को बोर्डर क्रोस करके भारत के सैनिको ने 30 आतंकियों को मार गिराया था और सुरक्षित रूप से वापिस लौट आये थे। और जब सेना ने 27 सितम्बर को प्रेस कोंफ्रेंस की तो दैनिक भास्कर के पाठको के लिए यह खबर पुरानी हो चुकी थी !!!
तारीख़ - 22-sep-2016 , दिव्य भास्कर , भोपाल , पेज - 1
मुख्य ख़बर — Sharif truns cry baby , Indian troops crossed LoC and killed 20 Jihadiis on 21-sep-2016
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और यही घटना 28 सितम्बर -2016 को घटी । छपने के 6 दिन बाद ।
इ-पेपर का लिंक जिसे पेड दैनिक भास्कर ने अब हटा दिया है -<http://epaper.dbpost.com/epaper_>...
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पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि अन्य समाचार पत्र कमतर है। सभी समाचार पत्र एवं टीवी चेनल लगभग इसी स्तर के है और इसी तरह की विश्वसनीय ख़बरों का प्रकाशन करते है। हालांकि मैं टीवी-अख़बार आदि का पाठक नहीं हूँ, अत: इस तरह की विश्वसनीय किन्तु मनोरंजक सूचनाओं से वंचित बना रहता हूँ।
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बहरहाल, मीडिया के लिए सही नाम पेड मीडिया है। मीडिया 200 साल पहले भी पेड मीडिया था और आज भी पेड मीडिया है। पेड मीडिया ने खुद के बारे सबसे बड़ा झूठ यह फैलाया है कि वह लोकतंत्र का चौथा खम्बा है, और उसका काम ख़बरें देना है।
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असल में मीडिया कम्पनियां भी अन्य व्यावसायिक कम्पनियों की तरह ही मुनाफा बनाने वाली कम्पनियां है। उनका ख़बरें दिखाने से कोई लेना देना नहीं है। जिस खबर को दिखाने के लिए इन्हें पैसा मिलता है, उस खबर का प्रसारण किया जाता है। जब खबर छिपाने के लिए पैसा मिलता है तो खबरें छिपा दी जाती है। वैसे पेड मीडिया की ज्यादातर कमाई खबरों को छिपाने से होती है। इस तरह मीडिया खबरें छिपाने का कारोबार है।
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समाधान ?
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पेड मीडिया को अन पेड नहीं बनाया जा सकता। किसी न किसी को तो इसके लिए पैसा देना ही पड़ेगा। तो मेरा प्रस्ताव इसे सिटिजन पेड मीडिया बनाने का है। इसके लिए मैंने दूरदर्शन चेयरमेन पर वोट वापसी एवं उसके स्टाफ पर जूरी प्रक्रियाओं का प्रस्ताव किया है। इस क़ानून को यदि गेजेट में छाप दिया जाए तो दूरदर्शन अपना प्रसारण तेजी से सुधारने लगेगा। और यह इतना बेहतर हो जाएगा कि प्राइवेट चेनल अपने दर्शक खोने लगेंगे। अभी डीडी अध्यक्ष निजी चैनलों से घूस खाकर दूरदर्शन के प्रसारण को घटिया बनाए रखता है।
इसके अलावा फिलहाल दूरदर्शन अध्यक्ष की नियुक्ति का अधिकार पीएम के पास है। जब वह पीएम के कंट्रोल में है तो ऐसी खबरें कभी नहीं दिखायेगा जिससे सरकार को हानि हो। मेरे द्वारा प्रस्तावित प्रक्रिया के आने से दूरदर्शन अध्यक्ष एवं उसका स्टाफ नागरिको के प्रत्यक्ष नियन्त्रण में आ जाएगा। मेरे द्वारा प्रस्तावित प्रक्रिया "रिगो" का ड्राफ्ट यहाँ देखा जा सकता है - <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/2174155309369360>
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एक जरुरी बात — पेड मीडिया की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यदि देश के 100 करोड़ नागरिको को इस बात का अच्छी तरह से विश्वास हो जाए कि मीडिया बिका हुआ है तब भी इसकी ताकत में 1% की भी गिरावट नहीं आती। मतलब पेड मीडिया को एक्सपोज करने से कोई फायदा नहीं होता है। और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
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इसीलिए पेड मीडिया को कोसने वाले कार्यकर्ताओ को इस बात पर ध्यान देना शुरू करना चाहिए कि कौनसे क़ानून गेजेट में छापने से पेड मीडिया को सुधारा जा सकता है। यदि आप समाधान नही दे रहे है तो आप सिर्फ समस्या की जानकारी फैलाने का काम कर रहे है। और समस्याओ को उठाने से राजनैतिक परिदृश्य में कोई बदलाव नहीं आता। क्योंकि जब आप समस्या उठाते है तो राजनेता उसका जो समाधान लायेंगे वह समस्या को और भी बदतर बना देता है।
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Tue Jul 23 2019 20:01:34 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
संघ के मंत्री पियूष गोयल कलमा पढ़ते हुए !! देखने लायक वीडियो है। अवधि : सिर्फ 30 सेकेण्ड
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Tue Jul 23 2019 22:11:11 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Wed Jul 24 2019 20:00:07 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Sun Jul 28 2019 13:01:22 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Mon Jul 29 2019 21:21:11 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
Mon Jul 29 2019 21:44:07 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
क्या मोदी सरकार ने RTI को कमजोर कर दिया है?
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छोटे छोटे कार्यकर्ताओ के प्रयासों से जब इस क़ानून की मांग खड़ी हुयी तो 2005 में कोंग्रेस सरकार ने इस क़ानून को लूला लंगड़ा बनाकर पास किया था। और अब मोदी साहेब इसे पूरी तरह से अपाहिज बनाने की दिशा में काम कर रहे है !!
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क़ानून दो तरह के होते है :
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(a) वे जो सरकार की शक्ति में इजाफा करते है
(b) एक वे जिनसे जनता की शक्ति में वृद्धि होती है।
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डेमोक्रेसी का मतलब जनता को अधिकार देने से है। जब जनता के अधिकारों में वृद्धि होती है तो सरकार एवं नेताओं पर अंकुश आता है। तो व्यवहारिक पहलू यह है कि बेहद दुर्लभ अपवाद को छोड़ दें तो लगभग सभी देशो की राजनैतिक पार्टियाँ एवं नेता लोकतंत्र के जबरदस्त खिलाफ होते है।
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चूंकि सत्ता में आने के लिए उन्हें वोट लेने होते है इसीलिए नेता डेमोक्रेटिक होने का अभिनय करते है, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनका दिमाग इस दिशा में तेजी से काम करने लगता है कि कौनसे क़ानून छापने से मेरी ताकत में और भी इजाफा होगा। और जब भी कोई क़ानून सरकार की ताकत में इजाफा करेगा तो वह जनता के अधिकारों में कटौती अवश्य करेगा।
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चूंकि RTI श्रेणी (b) के अंतर्गत आता है अत: यदि सरकार ( चाहे वह मोदी सरकार ही क्यों न हो ) RTI को कमजोर कर रही है तो यह स्वाभाविक है। जैसे जैसे किसी सरकार की सीटों की संख्या बढती है, वैसे वैसे सरकार / नेता इस तरह के क़ानून छापना शुरु करते है, जिससे उसकी शक्ति में और वृद्धि हो। तो इसमें कोई नयी बात नहीं है।
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स्मृति ईरानी और मोदी साहेब की डिग्री के विवादों में आने के बाद से ही RTI मोदी साहेब के रडार में था। तब मैंने कहीं लिखा था कि ज्यादातर सम्भावना है कि जल्द ही मोदी साहेब RTI का कुछ इंतजाम कर देंगे। 300 सीट आने के बाद अब इस तरह के क़ानून छापने में उन्हें समस्या पेश नहीं आएगी।
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सरकारें हर महीने ऐसे दर्जनों क़ानून गेजेट में छापती है जिनसे जनता के अधिकारों में कटौती होकर सरकार की शक्ति में इजाफा होता है। किन्तु पेड मीडिया इन्हें कवरेज नहीं देता इसीलिए ये नोटिफिकेशन कभी चर्चा में नहीं आते।
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पर क़ानून RTI का संशोधन इतनी चर्चा में क्यों है ?
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दरअसल RTI का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर कई छोटे छोटे कार्यकर्ताओ द्वारा किया जाता है, और इस वजह से देश के एक बड़े समूह का इससे जुड़ाव है। इस वजह से इस क़ानून का संशोधन चर्चा में आ गया है। वर्ना पेड मीडिया की कृपा से बहुधा ऐसे मामले चर्चा में नही आ पाते।
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मोदी साहेब ने RTI में क्या बदलाव किया है ?
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कोंग्रेस के RTI में सरकार "अपने आदमी" को 5 साल के लिए सूचना आयुक्त नियुक्त करती थी। और मोदी साहेब के RTI में जब सरकार "अपने आदमी" की नियुक्ति करेगी तो यह भी तय करेगी कि इसे कितने टाइम के लिए आयुक्त बनाना है। यदि आयुक्त सरकार के कहने में चलेगा तो नौकरी चालू रहेगी और कार्यकाल में वृद्धि की जायेगी , और यदि आयुक्त सरकार को हानि पहुचाने वाली सूचनाएं लोगो को देने में रुचि दिखाता है तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाएगा। बस कोंग्रेस एवं बीजेपी के RTI में इतना ही अंतर है।
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( सैक्शन - A )
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मेरा प्रस्ताव है कि RTI एक्ट में निम्नलिखित 5 धाराएं जोड़ी जानी चाहिए :
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==RTI में जोड़े जाने वाले ड्राफ्ट का प्रारम्भ==
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(1) केन्द्रीय सूचना आयुक्त के लिए आवेदन एवं योग्यता :
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(1.1) 42 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक केन्द्रीय सूचना आयुक्त के लिए एवं 38 वर्ष से अधिक आयु का कोई कोई भी नागरिक किसी राज्य के लिए राज्य सूचना आयुक्त के लिए आवेदन कर सकेगा।
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(1.2) धारा 1.1.में दी गयी योग्यता धारण वाला कोई भी नागरिक यदि जिला कलेक्टर के सामने स्वयं या किसी वकील के माध्यम से ऐफिडेविट प्रस्तुत करता है, तो जिला कलेक्टर सांसद के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क लेकर अर्हित पद के लिए उसका आवेदन स्वीकार कर लेगा, तथा उसे एक विशिष्ट सीरियल नम्बर जारी करेगा।
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(2) मतदाता द्वारा किसी प्रत्याशी के लिए स्वीकृति दर्ज करना :
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(2.1) कोई भी नागरिक किसी भी दिन मतदाता पहचान पत्र के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर पुलिस प्रमुख, शिक्षा अधिकारी, चिकित्सा अधिकारी, जिला जज, जूरी प्रशासक के प्रत्याशियों के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर में मतदाता की हाँ को दर्ज करके रसीद देगा। पटवारी मतदाताओं की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम एवं मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है।
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(2.2) स्वीकृति ( हाँ ) दर्ज करने के लिए मतदाता 3 रूपये फ़ीस देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी
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(2.3) प्रत्येक सोमवार को महीने की 5 तारीख को, कलेक्टर पिछले महीने के अंतिम दिन तक प्राप्त प्रत्येक प्रत्याशियों को मिली स्वीकृतियों की गिनती प्रकाशित करेगा। पटवारी अपने क्षेत्र की स्वीकृतियो का यह प्रदर्शन प्रत्येक सोमवार को करेगा। स्वीकृतियों का प्रदर्शन हर महीने की 10 तारीख को कैबिनेट सचिव द्वारा भी किया जाएगा।
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[ टिपण्णी : कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी स्वीकृति SMS, ATM एवं मोबाईल एप द्वारा दर्ज करवा सके। ]
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(3) सूचना आयुक्त की नियुक्ति :
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(3.1) केन्द्रीय सूचना आयुक्त : यदि किसी उम्मीदवार को देश की मतदाता सूची में दर्ज सभी मतदाताओं ( सभी मतदाता, न कि केवल वे जिन्होंने स्वीकृति दर्ज की है ) की 35% से अधिक स्वीकृतियां प्राप्त हो जाती है, और यदि यह स्वीकृतियां पदासीन सूचना आयुक्त से 1% अधिक भी है, तो प्रधानमंत्री मौजूदा आयुक्त को निकाल कर सबसे अधिक स्वीकृति पाने वाले उम्मीदवार को केन्द्रीय सूचना आयुक्त की नौकरी दे सकते है, या नहीं भी दे सकते है। या पीएम अपना इस्तीफा दे सकते है, या नहीं भी दे सकते है। नागरिको की अधिकतम स्वीकृति प्राप्त करने वाले व्यक्ति को सूचना आयुक्त बनाना है या नहीं इस बारे में अंतिम फैसला प्रधानमन्त्री ही करेंगे।
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(3.2) राज्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति : यदि किसी उम्मीदवार को किसी राज्य की मतदाता सूची में दर्ज सभी मतदाताओं ( सभी मतदाता, न कि केवल वे जिन्होंने स्वीकृति दर्ज की है ) की 35% से अधिक स्वीकृतियां प्राप्त हो जाती है, और यदि यह स्वीकृतियां पदासीन राज्य सूचना आयुक्त से 1% अधिक भी है, तो मुख्यमंत्री मौजूदा आयुक्त को निकाल कर सबसे अधिक स्वीकृति पाने वाले उम्मीदवार को राज्य सूचना आयुक्त की नौकरी दे सकते है, या नहीं भी दे सकते है। या मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा दे सकते है, या नहीं भी दे सकते है। नागरिको की अधिकतम स्वीकृति प्राप्त करने वाले व्यक्ति को राज्य सूचना आयुक्त बनाना है या नहीं इस बारे में अंतिम फैसला मुख्यमंत्री ही करेंगे।
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(4) सूचना आयुक्त के झगड़ो का जूरी द्वारा निपटान :
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[ टिप्पणी : प्रधानमंत्री जूरी मंडल के गठन एवं संचालन के लिए आवश्यक विस्तृत प्रक्रियाएं गेजेट में प्रकाशित करेंगे, जिन्हें इस क़ानून में जोड़ा जायेगा। प्रधानमंत्री के अलावा कोई अन्य मतदाता भी इसी क़ानून की धारा 6.1 का प्रयोग करते हुए ऐसी आवश्यक प्रक्रियाएं जोड़ने का शपथपत्र दे सकता है। ]
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(4.1) जूरी प्रशासक दिल्ली राज्य की मतदाता सूची में से 30 सदस्यीय महाजूरी मंडल की नियुक्ति करेगा। इनमे से हर 10 दिन में 10 सदस्य सेवानिवृत होंगे और नए 10 सदस्यो का चयन मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा कर लिया जाएगा। यह महा जूरी मंडल निरंतर काम करता रहेगा। महाजूरी सदस्य को प्रति उपस्थिति 500 रू एवं यात्रा व्यय मिलेगा। राज्यों के जूरी प्रशासक ऐसे महाजूरी मंडल की स्थापना प्रत्येक राज्य की राजधानी में करेंगे।
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(4.2). यदि केन्द्रीय सूचना आयुक्त या उनके स्टाफ से सम्बंधित कोई भी मामला है तो वादी अपने मामले की शिकायत दिल्ली के महाजूरी मंडल के सदस्यों को राज्य सूचना आयुक्त के बारे में शिकायत अमुक राज्य की राजधानी के महाजुरी मंडल को लिख कर दे सकते है। यदि महाजूरी मंडल मामले को निराधार पाते है तो शिकायत खारिज कर सकते है, अथवा इस मामले की सुनवाई के लिए एक नए जूरी मंडल के गठन का आदेश दे सकते है।
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(4.3) मामले की जटिलता एवं आरोपी की हैसियत के अनुसार महाजूरी मंडल तय करेगा कि 15-1500 के बीच में कितने सदस्यों की जूरी बुलाई जानी चाहिए। तब जूरी प्रशासक मतदाता सूची से लॉटरी द्वारा सदस्यों का चयन करते हुए जूरी मंडल का गठन करेगा और मामला इन्हें सौंप देगा।
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(4.4) अब यह जूरी मंडल दोनों पक्षों, गवाहों आदि को सुनकर फैसला देगा। प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला बंद लिफ़ाफ़े में लिखकर ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर या जज को देंगे। दो तिहाई सदस्यों द्वारा मंजूर किये गये निर्णय को जूरी का फैसला माना जाएगा। किन्तु नौकरी से निकालने एवं नारको टेस्ट का फैसला लेने के लिए 75% सदस्यों के अनुमोदन की जरूरत होगी। जज या ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर सभी के सामने जूरी का निर्णय सुनायेंगे। यदि जज जूरी द्वारा दिए गए फैसले को खारिज करना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है। अंतिम फैसला देने का अधिकार जज के पास ही रहेगा। प्रत्येक मामले की सुनवाई के लिए अलग से जूरी मंडल होगा, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी। पक्षकार चाहे तो फैसले की अपील हाई कोर्ट में कर सकते है।
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(5) सूचना मांगने वाले की सुरक्षा के लिए प्रावधान :
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(5.1) केन्द्रीय सूचना आयुक्त एवं प्रत्येक राज्य सूचना आयुक्त एक वेबसाईट बनाएगा, और इसे अद्यतन बनाए रखेगा। यदि कोई नागरिक धारा 6.1 के तहत कोई सूचना मांगता है और इसके लिए 100 रू का शुल्क जमा करता है तो सूचना आयुक्त मांगे गए सभी पृष्ठों को स्कैन करके इसका पीडीऍफ़ इस वेबसाईट पर रखेगा। अब ये सूचनाएं सार्वजनिक होगी और कोई भी व्यक्ति इन्हें बिना शुल्क दिए पढ़ सकता है।
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(5.2) धारा (6.1) के तहत जितनी भी सूचनाएं मांगी जायेगी यदि वे सूचनाएं RTI एक्ट के दायरे में है तो सूचना आयुक्त उन्हें अनिवार्य रूप से तब भी वेबसाईट पर रखेगा जबकि आवेदन करने वाले की मृत्यु हो जाए या आवेदन करने वाला व्यक्ति इस तरह की अर्जी दे कि उसे अब यह सूचनाएं नहीं चाहिए।
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(5.3) धारा (6.1) के तहत वेबसाईट से ली गयी सूचनाओं को अदालतों आदि में अधिकृत दस्तावेज के रूप में स्वीकार नहीं किया जायेगा। इसके लिए आवेदक को इसकी सत्यापित कॉपी सम्बंधित विभाग से लेनी होगी। यदि सम्बंधित विभाग में वेबसाईट पर रखे गए किसी प्रप्रत्र की सत्यापित कॉपी लेने के लिए आवेदन किया जाता है तो सम्बंधित विभाग अगले 48 घंटे में इसकी सत्यापित कॉपी जारी करेगा।
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(6) जनता की आवाज :
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(6.1) यदि कोई मतदाता इस कानून की किसी धारा में कोई आंशिक या पूर्ण परिवर्तन चाहता है या इस क़ानून से सम्बंधित कोई अर्जी देना चाहता है तो वह कलेक्टर कार्यालय में एक एफिडेविट जमा करवा सकेगा। जिला कलेक्टर 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर एफिडेविट को मतदाता के वोटर आई.डी नंबर के साथ मुख्यमंत्री / प्रधानमन्त्री की वेबसाइट पर स्कैन करके रखेगा।
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(6.2) यदि कोई मतदाता धारा 6.1 के तहत प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर अपना समर्थन दर्ज कराना चाहे तो वह पटवारी कार्यालय में 3 रूपए का शुल्क देकर अपनी हां / ना दर्ज करवा सकता है। पटवारी इसे दर्ज करेगा और हाँ / ना को मतदाता के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ मुख्यमंत्री / प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल देगा।
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==RTI में जोड़े जाने वाले ड्राफ्ट का समापन==
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( सेक्शन - B )
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कोंग्रेस सरकार ने किस तरह एक लूला लंगड़ा RTI क़ानून पास किया था ?
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देखिये RTI में आप सरकार के गलत फैसलों एवं भ्रष्टाचार खिलाफ अधिकृत दस्तावेज जुटा सकते है। इस तरह यह क़ानून सूचनाओं को नियंत्रित करने की सरकार की शक्ति में कमी लाता है। अभी सूचनाओं का एक मात्र स्त्रोत पेड मीडिया है। तो पेड मीडिया के स्पोंसर यह तय करते है कि जनता को कौनसी सूचना देनी है और कौनसी नहीं देनी है। RTI Act इसमें सुराख की तरह है। और स्वतंत्र कार्यकर्ता इस सुराख का इस्तेमाल करके काफी सारी ऐसी सूचनाएं निकाल सकते थे जिससे सरकार मुश्किल में आ सकती थी।
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नेता चाहते है कि कौनसी सूचना देनी है और कौनसी नहीं देनी है इसको तय करने का अधिकार जिस इंसान के पास होगा उस इंसान की नियुक्ति और बर्खास्तगी के डोरे हमारे पास रहने चाहिए। अत: उन्होंने RTI में यह प्रावधान जोड़ा कि सूचना आयुक्त की नियुक्ति सरकार करेगी। जब कोंग्रेस इसकी नियुक्ति करेगी तो वह कोंग्रेस का आदमी होगा, और जब बीजेपी नियुक्ति करेगी तो वह बीजेपी का आदमी होगा। तो देश की सभी पार्टियाँ इस बात पर सहमत थी कि सूचना आयुक्त की नियुक्ति सरकार ही करेगी और वह सरकार के अलावा अन्य किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होगा !!
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कारगिल युद्ध के बाद से भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भारत के पेड मीडिया पर नियंत्रण बनाना शुरू किया और तब से भारत की सभी बड़ी पॉलिटिकल पार्टियों के स्पोंसर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक है। इसमें तीसरा आयाम यह है कि, यदि सूचना आयुक्त की नियुक्ति का अधिकार सरकार के पास रहेगा तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सरकार में कौन है। क्योंकि दोनों ही सूरतो में ऐसी सूचनाएं बाहर नहीं आएगी जिससे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको को नुकसान होता है।
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इस समय सूचना आयुक्त नेताओं के प्रति जवाबदेह है, और इसीलिए अब तक आपने RTI के तहत जितनी भी सूचनाएं बाहर आती देखी है वह चिल्लर किस्म की है। यदि सूचना आयुक्त को जनता के प्रति जवाबदेह बना दिया जाए तो सिर्फ 1 साल में यह क़ानून इतनी महत्त्वपूर्ण सूचनाएं पब्लिक में लाकर डाल देगा कि राजनीति की धारा में ही बदलाव आ जाएगा। आज जो भी सूचनाएं कार्यकर्ताओ द्वारा मांगी जाती है और यदि ये सूचनाएं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ है तो RTI के दायरे में होने के बावजूद सूचना आयुक्त ये सूचनाएं देने से इनकार कर देता है। मान लीजिये यदि कुल 100 सूचनाएं मांगी गयी है तो इनमे 99% सूचनाएं चिल्लर किस्म की होती है, और इसीलिए ये दे दी जाती है। शेष 1% सूचनाएं बेहद महत्त्वपूर्ण होती है, किन्तु सूचना आयुक्त ये 1% सूचनाएं कभी नहीं देता !!!
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( सेक्शन - C )
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कोंग्रेस=बीजेपी Vs मेरे प्रस्ताव में अंतर :
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कोंग्रेस एवं बीजेपी के स्पोंसर एक ही है, (बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक) अत: शेष जवाब में मैंने कोंग्रेस=बीजेपी के RTI को MNC's RTI कहकर संबोधित किया है।
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(1) MNC's RTI में सूचना आयुक्त की नियुक्ति पीएम करते है और मेरे प्रस्ताव में भी सूचना आयुक्त की नियुक्ति का अंतिम एवं निर्णायक अधिकार पीएम के पास ही रहेगा। किन्तु मेरे द्वारा प्रस्तावित धाराओं को यदि MNC's RTI act में जोड़ दिया जाता है तो भारत के करोड़ो नागरिक यह बता सकेंगे कि वे मौजूदा आयुक्त के काम काज से संतुष्ट है या नहीं है। या वे किस व्यक्ति को आयुक्त बनाना चाहते है।
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कृपया इस बात को नोट करें कि अंतिम फैसला पीएम के पास ही होगा और वे अपनी पसंद के आदमी को ही इस पद पर नियुक्त करेंगे। लेकिन मेरे द्वारा प्रस्तावित धाराएं जोड़ देने से आम नागरिको को यह अधिकार होगा कि वे अपनी पसंद बता सके।
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मोदी साहेब एवं सोनिया जी के सभी भक्त इस प्रस्ताव का विरोध करते है। उनका स्टेंड है कि नागरिको की किसी भी सूरत में यह अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए कि वे यह बताए कि कौन सूचना आयुक्त होना चाहिए और कौन नहीं।
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(2) MNC's RTI में सूचना आयुक्त या उसके स्टाफ के खिलाफ यदि कोई शिकायत आती है तो उसका फैसला भ्रष्ट जज करता है। मेरे प्रस्ताव में है कि मामले को सुनने के लिए आम नागरिको की जूरी आएगी। जूरी मंडल जज के साथ सबुत / तथ्यों को देखेगी, दोनों पक्षों की बहस सुनेगी और अपना फैसला जज को बताएगी। किन्तु अंतिम फैसला देने का अधिकार जज के पास ही रहेगा और जज ही फैसला देगा।
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कृपया इस बात को नोट करें कि मेरे प्रस्ताव में अंतिम फैसला देने का अधिकार जूरी को नहीं दिया गया है। अंतिम फैसला जज के पास ही रहेगा। किन्तु मोदी साहेब एवं सोनिया जी के भक्तो का स्टेंड है कि नागरिको को सबूत देखने एवं बहस सुनने का अधिकार भी नहीं दिया जाना चाहिए !!
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(3) MNC's RTI अब तक लगभग 100 से ऊपर जाने ले चुका है। जिसमे से 50 से ज्यादा तो रिकॉर्ड में दर्ज है। यदि मेरे द्वारा सुझाई गयी धारा 5 MNC's RTI एक्ट में जोड़ दी जाती है तो एक भी आदमी की जान नहीं जायेगी। क्योंकि आवेदक धारा 6.1 के तहत ऐसी जानकारियां मागं सकता है। और फिर यदि आवेदक को मार भी दिया जाता है तो अमुक जानकारी पब्लिक में आ जायेगी। और इसी वजह से कोई अफसर / नेता अमुक आवेदक की जान नहीं लेगा।
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(4) MNC's RTI में यदि इस क़ानून में कोई बदलाव करना हो तो इसका सुझाव सिर्फ सरकार ही दे सकती है और सरकार ही इसमें कोई बदलाव कर सकती है। मेरे द्वारा प्रस्तावित धारा (6.1) के आने से आपके और मेरे जैसा कोई आम नागरिक भी इस एक्ट में कोई संशोधन करने का सुझाव दे सकता है। और यदि देश के 51% नागरिक किसी बदलाव के लिए स्वीकृति दर्ज कर देते है तो पीएम इसमें बदलाव कर सकते है।
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पाठक कृपया इस बात को नोट करें कि यहाँ भी फैसले का अंतिम अधिकार प्रधानमंत्री के पास ही रहेगा। किन्तु मोदी साहेब एवं सोनिया जी के भक्तो को यह भी गवारा नहीं है। उनका स्टेंड है कि आम नागरिको को इस तरह की राय प्रदर्शित करने का कोई अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए !!!
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( सेक्शन - D )
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जब सभी प्रकार के फैसले करने का अंतिम अधिकार प्रधानमंत्री के पास ही है तो ये धाराएं जोड़ने से क्या बदलाव आएगा ?
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(1) अभी यदि किसी आदमी को सूचना आयुक्त बनना हो तो उसके पास सिर्फ दो रास्ते है - या तो सरकार के चमचे बनो, या बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको की चमचागिरी करो। यह बात लिखने की जरूरत नहीं है कि सभी कृपा नियुक्तियां चमचो को ही दी जाती है। चूंकि चमचा ओछा शब्द है अत: पेड राजनीति विज्ञान के प्रोफेसरों द्वारा चमचागिरी के एवज में कृपा नियुक्तियां एवं प्रसाद पर्यंत नामक ज्यादा संभ्रांत शब्दों का आविष्कार किया गया !!!
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मेरे द्वारा प्रस्तावित धारा (1) के आने के बाद कोई भी काबिल एवं योग्य व्यक्ति बिना सरकार की चमचागिरी किये सूचना आयुक्त के पद के लिए आवेदन कर सकेगा। और यदि उसे 45 करोड़ नागरिको की स्वीकृति मिल जाती है तो दो चीजे होगी -- या तो पीएम उसे सूचना आयुक्त की नौकरी दे देंगे और फिर नहीं देंगे। यदि पीएम नागरिको के बहुमत द्वारा दिए गए आदेश की अवहेलना करते है तो यह बात स्थापित हो जायेगी कि अमुक पीएम जनता के बहुमत की राय को अहमियत नहीं देता है। फलत: पीएम एवं उसकी पार्टी के उम्मीदवार आगामी चुनाव हार जायेंगे !!! जाहिर है, किसी भी पीएम की इतनी हैसियत नहीं है कि वह स्थापित एवं अधिकृत बहुमत की अवहेलना कर सके। तो पीएम अमुक व्यक्ति को सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त कर देंगे।
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और अब यह सूचना आयुक्त जनता के समर्थन से नियुक्त होने के कारण पीएम की चमचागिरी नहीं करेगा। दुसरे शब्दों में, उसका कोई राजनैतिक आका नहीं है। अत: वह इस तरह के कदम उठाना शुरू करेगा कि सूचना मांगने वाले को तेजी से और जल्दी सूचनाएं मिले। ज्यादातर सम्भावना है कि वह खुद से ही सार्वजनिक महत्त्व की महत्त्वपूर्ण सूचनाओं को वेबसाईट पर निरंतर अपडेट करता रहेगा, ताकि सूचनाएं खोजने वाले व्यक्ति को समय और श्रम नहीं करना पड़े। क्योंकि उसे पता है कि मैं जितना निष्पक्ष एवं बेहतर काम करूँगा मेरी स्वीकृतियां उतनी बढ़ेगी और मेरी नौकरी चालू रहेगी।
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तो यदि जनता के समर्थन से यदि सूचना आयुक्त नौकरी पा जाता है, और तब आप उससे कोई ऐसी सूचना मांगते है जो सरकार के किसी महत्त्वपूर्ण भ्रष्टाचार को उजागर करती है, और आपको वह सूचना मिनिट से पहले मिल जायेगी। क्योंकि उसे पीएम का भय नहीं है।
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(2) यदि जनता के समर्थन से नियुक्त होने के बावजूद यदि वह पद पाते ही पीएम की चमचागिरी करना शुरू कर देता है, और सरकार के खिलाफ मांगी गयी सूचनाओं में अडंगे लगाता है तो उसका मामला नागरिको की जूरी सुनेगी। MNC's RTI में सबूत देखने और बहस सुनने का अधिकार सिर्फ जज के पास है। अत: जनता को मालूम नहीं हो पाता कि कौन सही था और कौन गलत। तो भ्रष्ट जज पैसा खाकर तारीखे देते रहते है, या फिर आरोपी को दोष मुक्त कर देते है !! जूरी के सामने मामला आने से यह बात जनता के सामने अधिकृत रूप से स्थापित हो जायेगी कि सूचना आयुक्त ईमानदारी से अपना काम नहीं कर रहा है।
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(3) 2011 के आस पास कई कार्यकर्ताओ ने इस बात को उठाना शुरु किया था कि RTI act में सरकारी निकायों की जो परिभाषा दी गयी हिया उसके अनुसार राजनैतिक पार्टियां RTI के दायरे में आनी चाहिए। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां यह बिलकुल नहीं चाहती थी कि उनकी फ़ैन्चाइज ( मुख्य धारा की सभी राजनैतिक पार्टियाँ) के हिसाब किताब RTI के दायरे में आये। तो उन्होंने कोंग्रेस सरकार को एक संशोधन लाने का आदेश दिया। निदान कोंग्रेस, बीजेपी, आम आदमी पार्टी आदि ने आपसी सहमती से इसमें एक संशोधन जोड़ा और राजनैतिक पार्टियों को RTI के दायरे से बाहर कर दिया !!!
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यदि मेरे द्वारा प्रस्तावित धाराएं RTI एक्ट में जोड़ दी जाती है तो कोई भी नागरिक धारा (6.1) का इस्तेमाल करते हुए राजनैतिक पार्टियो को मिलने वाले चंदे को इसके दायरे में लाने के लिए शपथपत्र दे सकता है। और यदि 45 करोड़ नागरिक इस पर हाँ दर्ज कर देते है तो पीएम पर यह दबाव बनेगा कि वह इस धारा को जोड़े। यदि पीएम बहुमत की अवहेलना करता है तो वे अगला चुनाव हार जायेंगे और वो पार्टी चुनाव जीतेगी जो इस धारा को जोड़ने का वादा करें।
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और फिर हम यह अधिकृत रूप से जान पायेंगे कि जो पार्टियाँ देश चलाती है हमारी उन पार्टियों को कौन कौन विदेशी कम्पनियां पाल रही है। उल्लेखनीय है कि अभी के लोकसभा चुनाव में बीजेपी=संघ को 1050 करोड़ विदेशियों से चंदे के रूप में मिले है और कोंग्रेस को विदेशियों से मिली यह राशि लगभग 150 करोड़ है। मतलब ऍफ़डीआई सिर्फ अन्य क्षेत्रो में ही नहीं है। हमारी राजनैतिक पार्टियाँ लीगली विदेशियों से चंदा लेती है। और ये विदेशी कम्पनियां कौन है हमें हमारे नेता बताना नहीं चाहते। मेरे द्वारा प्रस्तावित धाराएं RTI एक्ट में जोड़ देने से यह स्थिति पलट जायेगी।
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पेड मीडियाकर्मी , पेड बुद्धिजीवी एवं मुख्यधारा की सभी राजनैतिक पार्टियो के सभी नेता मेरे द्वारा सुझाए गए ड्राफ्ट के सख्त खिलाफ है, और वे इस पर बात भी करना पसंद नहीं करते। जैसे ही यह बात कही जाती है कि सूचना आयुक्त तो जनता का आदमी है, और इसीलिए जनता की भी इस पर राय ली जानी चाहिए, तो उन्हें चींटियाँ काटने लगती है।
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इसीलिए पेड मीडियाकर्मी सिर्फ ऐसे ही प्रस्तावों पर चर्चा करना चाहते है जिसमे नियुक्ति और बर्खास्तगी का अधिकार सरकार के पास रहे। क्योंकि उनके हिसाब से भारत के लोग जाहिल, अशिक्षित, अपरिपक्व, अजागरूक, मूर्ख और भ्रष्ट है !!! और इसीलिए भारत के आम नागरिको को अपनी राय दर्ज करवाने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए !! बहरहाल इनमे से कौनसा RTI एक्ट बेहतर है और आपको कौनसा RTI चाहिए, यह आप तय कर सकते है।
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Wed Jul 31 2019 22:05:55 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)
हाल ही में ट्रिपल तलाक का जो क़ानून पास किया गया है, उसे पेड मीडिया द्वारा एवं सरकार द्वारा गलत तरह से रिपोट किया जा रहा है। उन्होंने एक गलत लेबल "ट्रिपल तलाक" का इस्तेमाल किया और पूरे देश को झांसा दे दिया। दरअसल यह बिल सिर्फ तलाक के बिद्दत के बारे में है न कि ट्रिपल तलाक के बारे में !!
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मुस्लिम शौहर अपनी बीबियों को मुख्यतया दो तरीके से तलाक देते है।
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(1) तलाक-ए-एहसान एवं तलाक-ए-हसन --- लगभग 99% मामलो में इस प्रक्रिया का प्रयोग किया जाता है। पुरुष एक बार तलाक कहता है और उसे दूसरी बार तलाक कहने के लिए अगले 30 दिनों तक इन्तजार करना होता है। दूसरी बार तलाक कहने के बाद शौहर को फिर से अगले 30 दिनों तक इन्तजार करना होता है , और 30 दिन गुजरने के बाद तीसरी बार तलाक कहा जाता है। मोदी साहेब द्वारा लाया गया क़ानून इस प्रकार दिए गए तलाक पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाता।
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(2) तलाक-ए-बिद्दत --- इस प्रकार से तलाक। 0.5% से भी कम मामलो में दिया जाता है। इस तरीके में शौहर सिर्फ दो सेकण्ड में तलाक-तलाक-तलाक फोन पर या आमने सामने कहता है, या व्हाट्स एप पर लिख कर भेज देता है। और तलाक हो जाता है।
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मोदी साहेब एवं संघ के सांसदों ने लोकसभा से जो क़ानून पास किया है वह सिर्फ तलाक-ए-बिद्दत पर रोक लगाता है, तलाक ए हसन पर नहीं। तो अब से इन 0.5% मामलों में शौहर को 60 दिनों तक इन्तजार करना होगा !! बस इतना ही है।
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होने वाला नुकसान :
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मोदी साहेब, संघ के कार्यकर्ता और पेड मीडिया यह बात नागरिको के दिमाग में डालने में कामयाब रहे है कि ट्रिपल तलाक बेन किया जा चुका है। तो अब जब कोई हिन्दू युवती किसी मुस्लिम से विवाह करेगी तो उसके परिवार वालो, मित्रो एवं स्वयं उसके अवचेतन में यह बात रहेगी कि अब ट्रिपल तलाक बेन हो चुका है, और युवक द्वारा उसे किसी भी समय तलाक दे देने की सम्भावना नहीं है !! किन्तु युवक अब भी तलाक-ए-एहसान का प्रयोग करके तीन बार तलाक बोलकर तलाक देकर निकल सकेगा !!
उल्लेखनीय है कि आज जब कोई हिन्दू युवती मुस्लिम युवक से शादी करती है तो उसके परिवार वाले उसे ज्यादातर इस बिंदु पर ही कन्विंस करने की कोशिश करते है कि इस्लाम में शादी एक कोंट्रेक्ट है और युवक कभी भी तीन तलाक बोलकर उसे छोड़ सकता है। यह वजह अब भी मौजूद रहेगी, किन्तु अब ज्यादातर युवतियां जब मुस्लिम युवको से शादी करेगी तो उनके दिमाग में यह गलत धारणा होगी कि वे ट्रिपल तलाक से सेफ है !!!
इकबाल का एक शेर है -
बड़ी बारीक है वाइज़ की चाले,
लरज़ जाता है आवाज़े अजाँ से !!
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समाधान :
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(1) प्रस्तावित क़ानून - यदि कोई हिन्दू युवती ( या मुस्लिम युवती ) किसी मुस्लिम युवक ( या हिन्दू युवक ) से विवाह करती है , तो चाहे वह विवाह के पूर्व या विवाह के पश्चात धर्मांतरण करे या न करे, दोनों ही परिस्थितियों में यदि युवती यह मंशा जाहिर करती है कि उसके वैवाहिक जीवन पर उसका जन्मना धर्म लागू होगा , तो वैवाहिक विवादों का निपटान युवती के जन्मना धर्म के क़ानून के अनुसार ही किया जाएगा। यह क़ानून लव जिहाद की समस्या को कुछ ही महीनो में जड़ से खत्म कर देगा।
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(2) इसके अलावा, सरकार को मुस्लिम महिलाओ को इस बात की सूचना देने के लिए अभियान चलाना चाहिए कि यदि वे चाहे तो निकाह के दौरान निकाहनामे में वे अपनी मर्जी से तलाक की शर्तें आदि तय कर सकती है। और उन्हें यह भी सूचित किया जाना चाहिए कि मुस्लिम युवतियां/युवक यदि चाहे तो अपना निकाह "स्पेशल मैरिज एक्ट" के तहत दर्ज करवा सकते है। ऐसे स्थिति में मामले का निपटान स्पेशल मरीज एक्ट के तहत होगा, न कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार। तो उस तरह मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव की कोई जरूरत नहीं रह जायेगी।
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और यह सारा सर्कस टू चाइल्ड पालिसी एवं बंगलादेशी घुसपेठ को चर्चा से बाहर रखने के लिए चलाया गया है। तो कार्यकर्ताओं को इन दो मुद्दों पर ज्यादा भार देना चाहिए।
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