> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2019-07-01

Pawan Jury BhilwaraRj

एक देश एक चुनाव
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सबसे पहले मेरा ऐतराज पेड मीडिया द्वारा दिए गए इस लेबल से है -- एक देश एक चुनाव !!!
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बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको ने एक बहुत ही कैची नारा गढ़ा है। मतलब हमेशा की तरह उन्होंने इसके लेबल में ही इतनी चाशनी डाल दी है कि इसे सुनकर राष्ट्रवादी प्रस्ताव का बोध होने लगता है !! किन्तु हमेशा की तरह यह लेबल भी प्रस्तावित प्रक्रिया को गलत तरीके से परिभाषित कर रहा है।
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दरअसल इसे " मतदाताओ के अधिकारों में कटौती का प्रस्ताव " कहा जाना चाहिए। और यह भारत के मतदाताओं की शक्ति एवं अधिकारों में बहुत भयंकर कमी लाएगा है।
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कैसे ?
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शासन प्रणाली में 2 पक्षकार होते है।
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शासक और
जनता
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सभी देशो के बहुधा नेता और सरकारे एंटी-नेशनल होती है, और वे देश को पूरा का पूरा इसीलिए बेच नहीं पाते है क्योंकि उनको एक निश्चित अवधि के बाद जनता की सहमती लेने जाना पड़ता है। तो जहाँ लोकतंत्र नहीं रहा वहां के शासको ने जनता को पीस के रख दिया। जनता की यह सहमती अंकुश का काम करती है और सरकार / नेता पूरी नंगई पर नहीं उतर पाता। जिस देश में नागरिको की सहभागिता घटेगी उस देश में लोक कमजोर होगा, और कुलीनों+धनिकों+नेताओं की शक्ति बढ़ जायेगी। जब उनकी शक्ति बढ़ेगी तो वे देश को कतरा कतरा करके पूरा निगल जायेंगे। यह शर्त सिर्फ भारत पर लागू नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के सभी देशो पर लागू है। जिस देश के शासन में नागरिको सहभागिता बढ़ती है वहां शासन में उतना ज्यादा सुधार आते है।
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नागरिको की सहभागिता से आशय क्या है ?
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नागरिको की सहभागिता से आशय है -- जनता द्वारा अधिकृत और संगठित तरीके से शासन के सामने अपनी मांग / सुझाव / शिकायत रखना, या संवाद करना।
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सभी नेता और सरकारें एक तरफ़ा सम्वाद चाहते है। मतलब वे चाहते है सिर्फ उनके पास कहने के माध्यम और मौके हो। जनता के पास नहीं। नेता रैली में आकर सुनाकर निकल जाता है। टीवी पर आकर स्क्रिप्टेड इंटरव्यू देता है, ( इनमे सभी सवालात वगेरह पहले से तय होते है !! ) स्क्रिप्टेड प्रेस कोंफ्रेस करता है, टीवी पर आकर बहस करता है और चला जाता है, रेडियो पर आकर बोलता है। राष्ट्र के नाम सन्देश देता है इत्यादि। मतलब हर माध्यम से नेता ही बोलता है !! और इस एक तरफ़ा संवाद को विश्वसनीय बनाने और फैलाने के लिए मीडिया का इस्तेमाल किया जाता है।
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तो यदि देश की 90 करोड़ जनता को शासन से संवाद करना हो तो जनता संवाद कैसे करे ?
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धरना-प्रदर्शन करना संवाद करना नहीं है। क्योंकि यह भीड़ की शक्ल में होता है, और सिर्फ 0.001% लोग ही रोड़ पर इस तरह का तमाशा खड़ा करने में सहज महसूस करते है। ट्विटर, फेसबुक आदि तो अनाधिकृत एवं आभासी आइडेंटीटी है और राजनैतिक आई टी सेलो का इस पर वर्चस्व है. वे जिसे चाहे 4 घंटे में पूरे देश में ट्रेंड करवा सकते है !! किन्तु वोटिंग प्रक्रिया संवाद करने का एक अधिकृत तरीका है।
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मतदान में देश के प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार होता है कि अधिकृत तरीके से शासन पर अपनी प्रतिक्रिया दे। और अधिकृत प्रतिक्रिया होने के कारण इसमें वैल्यू होती है। उदाहरण के लिए 2012 में भी अधिकृत तथ्य यही था कि देश की जनता मनमोहन सिंह के साथ है। जबकि पूरा देश और मनमोहन भी जानता था कि देश की जनता शासन के साथ नहीं है। तो जनता को अगले 3 वर्ष तक चुनाव का इन्तजार करना पड़ा। वजह - भारत में ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है कि भारत की जनता 5 वर्ष से पहले अपनी राय अधिकृत रूप से रख सके।
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किन्तु भारत में शासन के 3 स्तर है और इस वजह से प्रत्येक मतदाता के पास 5 वर्ष में 3 बार यह मौका आता है कि वह शासन पर मतदान के रूप में टिप्पणी कर सके। तो औसतन प्रत्येक पार्टी को हर 1-2 साल में किसी न किसी रूप में जनता के बीच जाना पड़ता है। और जनता के बीच यह जाना ही अंकुश का काम करता है। एक देश एक चुनाव मतदाताओ के अधिकारों में इसी कटौती का नाम है !!
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( इसके पक्ष में पेड मीडिया द्वारा खर्चा बचने का तर्क दिया जा रहा है। इस तर्क को काटने के लिए व्यक्ति का आई क्यू लेवल 4 अंको में होना जरुरी है, और मेरा आई क्यू लेवल सिर्फ 3 अंको में है। अत: इस तर्क को समझना एवं इसे काटना मेरी रेंज से बाहर है। )
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बहरहाल, यदि यह नीति लागू हो जाती है तो यह एंटी डेमोक्रेसी स्टेप होगा। और यदि डेमोक्रेसी देश के फेवर में है तो यह एंटी नेशनल स्टेप भी है। इस नीति के आने से पेड मीडिया के प्रयोजको की ताकत कई गुना बढ़ जायेगी। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का प्रस्ताव होने के कारण मुझे नहीं लगता कि देश की कोई भी बड़ी पार्टी इसका विरोध करने का साहस नहीं दिखायेगी।
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निचे नागरिको की सहभागिता के आधार पर अमेरिका एवं भारत के नागरिको की शासन में भूमिका की तुलना रखी गयी है। इसे पढने से आप समझ सके कि हमें किस दिशा में गाड़ी आगे बढ़ानी चाहिए और हमें किस दिशा में धकेला जा रहा है !!
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अमेरिका का मतदाता निम्नलिखित कार्य करता है :
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(01) वह ज्यूरी में बैठकर मुक़दमे सुनता है, और यह तय करता है कि आरोपी को रिहा किया जाना चाहिए या जेल में पहुंचा देना चाहिए। वह यह भी तय करता है कि आरोपी को दी जाने वाली सजा की सीमा क्या होनी चाहीये।
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(02) ज्यूरी के माध्यम से वह फैक्ट्री मालिकों / व्यवसायीयों को सरकारी अधिकारियों और श्रमिको द्वारा उत्पन्न किये जा रहे गैर जरुरी अवरोधों से सुरक्षा प्रदान करता है।
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(03) वह ग्रांड ज्यूरी में बैठकर भी उपरोक्त श्रेणी के कार्य करता है।
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(04) वह सिटी काउंसलर, मेयर, जिला जज, जिला लोक अभियोजक, जिला शिक्षा अधिकारी और जिला पुलिस अधिकारियों को चुनता है।
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(05) यदि इन अधिकारियों में से कोई भ्रस्ट आचरण करता है तो वोट वापसी कानूनों का उपयोग करके उसे पद से हटाता है।
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(06) विधायक, मुख्यमंत्री और राज्यों के मुख्य न्यायधीशों को चुनता है।
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(07) इनमे से किसी अधिकारी के भ्रष्ट हो जाने पर उन्हें रिकॉल करता है।
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(08) लोकसभा, राज्य सभा एवं राष्ट्रपति को चुनता है। ( इन पदो पर रिकॉल प्रक्रियाए नहीं है )
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(09) जिला स्तर पर जनमत संग्रह प्रक्रियाओ में भाग लेकर क़ानून बनाता है।
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(10) राज्य स्तर पर जनमत संग्रह द्वारा क़ानून बनाने का कार्य करता है।
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मतलब अमेरिका में वहां के नागरिक के पास ऐसे कई अधिकृत तरीके है जिससे वे शासन में भागीदारी करता है। अमेरिका के नागरिक वहां की व्यवस्था में भारतीयों की तुलना में ज्यादा सक्रीय भूमिका निभाते है। इसीलिए वे बेहतर स्थिति है।
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भारत में मतदाता सिर्फ 3 काम करता है :
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1. पार्षद / पंचायत सदस्य को चुनता है,
2. विधायक को चुनता है, और
3. सांसद को चुनता है।
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और अब खर्चा बचाने के नाम पर उसे कहा जा रहा है कि इस काम को करने के लिए तुम्हे 5 वर्ष में जो 3 बार अवसर मिलता है अब सिर्फ 1 बार मौका मिलेगा। मतलब मतदाता के संवाद करने की आवृत्तियों की संख्या को घटाया जा रहा है !!! और फिर 5 साल तक मतदाता की हैसियत कोने में पड़े एक फर्नीचर की तरह रहेगी। या फिर वे चाहे तो लोकतंत्र को जिन्दा रखने और अपनी आवाज उठाने के नाम पर वे अनाधिकृत रूप से यानी सडक छाप तरीको का इस्तेमाल करके सड़को पर आकर हंगामा कर सकते है !!!
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