Posts for 2018-02

Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Feb 01 2018 19:14:10 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

रिकालिस्ट्स के लिए ,
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विषय - रायबरेली में राजनैतिक सभा , 17 फरवरी 2018 , शनिवार
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श्री मनमोहन जी मिश्रा एवं श्री राम जी निगम एक राजनैतिक पार्टी की स्थापना करने की दिशा में कार्यरत है। इस विषय पर रायबरेली में उन्होंने सभा आयोजित की है।
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इस बारे में अधिक जानकारी के लिए राम जी निगम एवं मनमोहन जी मिश्रा से संपर्क करें।
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राम जी निगम की फेसबुक प्रोफाइल - <https://www.facebook.com/ramji.nigam.92>;
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मन मोहन जी मिश्रा की फेसबुक प्रोफाइल - <https://www.facebook.com/bharatswabhimanimishra>;

जो कार्यकर्त्ता इस मीटिंग में भाग ले सकते है , कृपया वे इसमें हिस्सा लेने का प्रयास करें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Feb 01 2018 19:15:12 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

बजट-2018
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राजा को "प्रजा अधीन" होना चाहिए वर्ना वो प्रजा को लूट लेगा और राज्य का विनाश होगा। प्रजा को लूटने के लिए राजवर्ग कर , उत्कोच एवं दंड का उपयोग करेगा। अन्यायपूर्वक करारोपण से राज्य एवं प्रजा दुर्बल होगी और राजवर्ग प्रजा का उसी तरह से भक्षण कर जाएगा जिस तरह मांसाहारी पशु छोटे जीवो का भक्षण कर जाते है।
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राजा को प्रजा अधीन बनाने से आशय - प्रजा के पास राजा एवं उसके राजकीय अधिकारियो को पद से निष्कासित करने का अधिकार होने से राजा एवं राजवर्ग बराबर प्रजा के अधीन बने रहते है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Feb 01 2018 19:33:43 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

बजट को नजरंदाज करें - इस बात पर ध्यान दें कि जीएसटी का समर्थन एवं वेल्थ टेक्स का विरोध करके सोनिया-मोदी-केजरीवाल एवं कोंग्रेस-बीजेपी-आपा के कार्यकर्ता देश को किस दुश्चक्र में धकेल रहे है।
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कुछ मामूली बदलावों को दरकिनार करते हुए बजट बहुधा पूर्व बजट का कॉपी-पेस्ट संस्करण होता है। अब जीएसटी के कारण, अप्रत्यक्ष करों के संग्रहण में कमी आयी है !! पेट्रोल के कारण एक्साइज/वैट से होने वाली आय में इजाफा हुआ है। सीमा शुल्क के संग्रहण में भी बढ़ोतरी हुयी है , किन्तु सीमा शुल्क से आय तब बढती है, जब आयात बढ़ता है। और आयात बढ़ने से देश पर डॉलर चुकाने का भार बढ़ जाता है।
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तो जबकि अप्रत्यक्ष करो से होने वाली आय में गिरावट हुयी है तो सरकार के पास भरपाई करने के लिए प्रत्यक्ष कर ही बचे है।
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और समस्या आयकर की दरो को लेकर नहीं है। असली समस्या यह है कि -- सोनिया-मोदी-केजरीवाल संयुक्त रूप से जीएसटी के समर्थन एवं वेल्थ टेक्स के विरोध में है।
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तो हमें आयकरो की दरों पर तब्सरा करने की जगह इस विषय पर भार देना चाहिए कि कौन कौन से नेता-पार्टियाँ जीएसटी का समर्थन एवं वेल्थ टेक्स का विरोध कर रहे है। क्योंकि जीएसटी के रहते हुए बजट कैसे भी रचा जाए वह देश को होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं कर सकेगा।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Feb 01 2018 22:17:15 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राजस्थान में उपचुनाव के नतीजे - सत्ताधारी पार्टी ने अपनी सीटें गवाँ दी है । तो यूँ ही नही वे राईट टू रिकॉल का विरोध करते । वजह वास्तविक है ।
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राईट टू रिकॉल पार्टी

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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Feb 07 2018 20:14:47 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राईट टू रिकॉल कानूनो को जन आंदोलन के माध्यम से लागू करवाने के लिए आवश्यक चरणों का विवरण। ( updated )

( old post - published on Friday , March 4, 2016 )
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राईट टू रिकॉल ग्रुप के सभी कार्यकर्ताओं ---- भारत को अमेरिका जितना शक्तिशाली बनाने के लिए हमें कौनसे कार्यो को सफलता पूर्वक करना होगा , और इन कार्यो को पूरा करने के दौरान हमें किन किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा ? और किस तरह से हम रिकालिस्ट्स इन विहंगम कार्यो को पूरा करने के लिए पर्याप्त नागरिक/ कार्यकर्ता /इंजीनियर्स और पर्याप्त धन जुटा सकते है ?
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( इस अध्याय का मूल अंग्रेजी संस्करण इस लिंक पर देखें - <https://web.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153286488891922>; )
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अध्याय, और किये जाने वाले कार्यो कि सूची :
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0. परिचय
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1. पहला काम --- कम से कम 543 रिकालिस्ट्स को लोकसभा, 5000 रिकालिस्ट्स को विधानसभा और लगभग 200,000 रिकालिस्ट्स को स्थानीय निकायो के चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना।
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2. दूसरा काम --- 75 करोड़ नागरिको को राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम आदि क़ानून ड्राफ्ट के बारे में ‘सूचित’ करना ; यह जानकारी अनिवार्य रूप से कार्यकर्ताओं द्वारा ही पहुंचाई जानी चाहिए, पेड मिडिया द्वारा नही ।
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3. तीसरा काम --- 45 करोड़ नागरिको को अपने प्रधानमंत्री को ट्विटर द्वारा आदेश भेजने के लिए राजी करना ।
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4. चौथा काम --- 45 करोड़ नागरिको के संज्ञान में यह बात लेकर आना कि (a) 45 करोड़ नागरिक अपने प्रधानमंत्री को ट्विटर द्वारा आदेश भेज चुके है ; (b) तथा 45 करोड़ नागरिकों को यह भी जानकारी होना कि 45 करोड़ नागरिको द्वारा ट्वीट भेजे जा चुके है । (c) दुसरे शब्दों में राईट टू रिकॉल कानूनों और ट्वीट भेजे जाने कि जानकारी "कॉमन नॉलेज" में लेकर आना !!
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5. पांचवा काम --- ( पहले से चौथे तक चरण पूरे होने के बावजूद यदि सांसद और प्रधानमंत्री राईट टू रिकॉल कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने से मना कर दे तो) -- 45 करोड़ नागरिको को तैयार करना कि वे अपने सांसदों को इस्तीफा देने के लिए आदेश भेजे।
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6. छठा काम --- 45 करोड़ नागरिको को राईट टू रिकॉल पार्टी के उम्मीदवारों को वोट देने के लिए तैयार करना।
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7. सातवाँ काम --- उस परिस्थिति का सामना करना जब राइट टू रिकॉल पार्टी के कार्यकर्ता राईट टू रिकॉल कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने से मना कर दे।
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8. आठवां काम --- सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश द्वारा इन कानूनो को खारिज कर दिए जाने के हालात का सामना करना।
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9. नवां काम --- उस स्थिति से निपटना, जब प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस अधिकारी , रिजर्व बैंक अधिकारी, सार्वजनिक उपक्रमों के अधिकारी आदि राइट टू रिकॉल कानूनो का विरोध करें और इन्हे रोकने के लिए लिए गड़बड़ी फैलाये।
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10. और दसंवा अतिरिक्त काम --- अमेरिका/चीन द्वारा खुले/छिपे हुए सशस्त्र हमलो, आर्थिक और मौद्रिक प्रतिरोधों का सामना करना।
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11. ग्यारवाँ काम --- इन कार्यों को पूरा करने के लिए किस तरह हम लाखों-करोड़ो कार्यकर्ता, नागरिक, इंजीनियर्स और जरुरी कौशल, प्रशिक्षण और योग्यता जुटा सकते है ? और किस तरह हम इन कार्यो को पूरा करने के लिए धन जुटा सकते है।
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12. क्यों मेरे विचार में जहां तक हो सके इनमे से ज्यादातर कार्यो को समानांतर रूप से एक साथ किया जाना चाहिए न कि क्रमिक रूप से।
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13. क्या भारत को ताकतवर बनाने का अन्य कोई शार्ट कट है ? जिससे इस भारी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया से बचा जान सके ?
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14. सारांश
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0. परिचय
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कई कार्यकर्ता मुझसे पूछते है की --- भारत को अमेरिका जितना ताकतवर बनाने के लिए हमें कौन से कार्य करने होंगे ? इस लेख में मैंने उन सभी कार्यो और चरणो को सूचीबद्ध किया है।
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1. पहला काम --- कम से कम 543 रिकालिस्ट्स को लोकसभा, 5000 रिकालिस्ट्स को विधानसभा और लगभग 200,000 रिकालिस्ट्स को स्थानीय निकायो के चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना।
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हम एक जन आंदोलन खड़ा करने पर काम कर रहे है , ताकि वर्तमान या नए सांसदों को राईट टू रिकॉल कानूनो को लागू करने के लिए बाध्य किया जा सके। इसीलिए मेरे विचार में हमें 543 लोकसभा और 5000 विधानसभा उम्मीदवारों की आवश्यकता होगी, जो चुनावो में भाग ले सके। तो चुनाव लड़ना क्यों जरुरी है ? आखिर क्यों रिकालिस्ट्स चुनावो में भाग लिए बिना इन कानूनो को लागू करवाने में असफल रहेंगे ?
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(a) मान लीजिये कि हम रिकालिस्ट्स देश के सभी कार्यकर्ताओ को इन कानूनो के बारे में जानकारियाँ देते है और 2 लाख कार्यकर्ताओ को रिकालिस्ट्स में बदल देते है।
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(b) मान लीजिये कि ये लाखों कार्यकर्ता 70 करोड़ नागरिको को इन कानूनो के बारे में जानकारी दे देते है।
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(c) और मान लीजिये कि उनमे से 45 करोड़ नागरिक अपने सांसदों एवं प्रधानमंत्री को आदेश भेज देते है कि इन कानूनो को गैजेट प्रकाशित किया जाए।
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(d) और 70 करोड़ नागरिको को भी यह जानकारी हो चुकी है कि ट्विटर द्वारा आदेश भेजे जा चुके है।
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(e) और मान लीजिये कि सांसद इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने से इंकार कर देते है।
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तो ऐसी स्थिति में क्या अहिंसा मूर्ती महात्मा ऊधम सिंह जी सांसदों से मुलाक़ात करेंगे ? नही। क्योंकि मतदाताओ ने सांसदों को इस्तीफा देने के ट्विटर नही भेजे है, और सभी सांसदों ने चुनावों से पहले ही इन कानूनो को लागू करने से इंकार कर दिया था। अत: उन पर इन कानूनो को लागू करने और इस्तीफा देने की कोई नैतिक बाध्यता नही है, और इसीलिए ऊधम सिंह जी सांसदों से मुलाक़ात नही करेंगे।
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(f) अब मान लीजिये कि 45 करोड़ मतदाता अपने सांसदों को 'इस्तीफा' देने के लिए ट्विटर द्वारा अादेश भेजते है।
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(g) और यदि राईट टू रिकाल ग्रुप के कार्यकर्ता यह साफ़ कर देते है कि वे चुनावो में 'भाग' नही लेने वाले है। मैं इसे फिर से दोहराता हूँ --- यदि रिकालिस्ट्स यह घोषणा करते है कि वे 'चुनावी प्रक्रियाओ में हिस्सा "नही" लेने वाले है'।
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तब अहिंसा मूर्ती महात्मा ऊधम सिंह जी यह निष्कर्ष निकालेंगे कि , 'सांसदों से मेरी मुलाक़ात का देश को क्या लाभ होगा ? क्योंकि यदि फिर से चुनाव हो भी जाते है, तो भी फिर से वही उम्मीदवार संसद में पहुँच जायेंगे जो कि इन कानूनो के खिलाफ है, क्योंकि इन कानूनो के समर्थक रिकालिस्ट्स ने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है'। कुल मिलाकर ऊधम सिंह जी के पास सांसदों से मिलने के लिए कोई प्रेरणा नही होगी, क्योंकि नए चुनाव होने से भी इन कानूनो के लागू होने की संभावना शून्य रहेगी। अत: ऊधम सिंह जी सांसदों से न मिलने का फैलसा करेंगे।
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तो इस स्थिति में सांसद यही सोचेंगे कि ऊधम सिंह जी उनसे मिलने नही आने वाले है। वे यह भी सोचेंगे कि एक तो ऊधम सिंह जी हमसे मिलने आने वाले नही है , और दूसरे, कोई भी रिकालिस्ट्स चुनाव लड़ने को भी तैयार नही है , इसीलिए राईट टू रिकॉल कानूनो को गैजेट में प्रकाशित न करने से हमे कोई नुकसान नही होने वाला, लेकिन यदि हम इन कानूनो को लागू कर देते है तो हमारे प्रायोजक और धनिक वर्ग हमसे नाराज हो जाएगा। इसीलिए इन कानूनो का विरोध करने में ही मेरा फायदा है। और नुकसान तो कोई है ही नही।
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और इसका मतदाताओ पर भी उल्टा असर होगा। मान लीजिये कि 45 करोड़ नागरिक इन कानूनो को लागू करने के लिए ट्विटर द्वारा आदेश भेज चुके है, लेकिन सांसदों ने इन कानूनो को लागू करने से मना कर दिया है। तब मतदाता इस असमंजस का शिकार हो जाएगा कि, "क्या मुझे सांसद को इस्तीफा देने के लिए ट्विटर भेजना चाहिए कि नही ? क्योंकि कोई भी रिकालिस्ट चुनाव लड़ने को तैयार नही है, अत: मौजूदा सांसद से इस्तीफा मांगने में कोई लाभ नही है। क्योंकि कोई भी रिकालिस्ट इन मुद्दो पर चुनाव लड़ने को तैयार नही है अत: यदि सभी सांसद इस्तीफा दे भी देते है, और फिर से चुनाव होते है तो भी फिर से वे ही उम्मीदवार संसद में पहुंचेंगे जो राईट टू रिकॉल कानूनो का विरोध कर रहे है। अत: बेहतर यही है कि मौजूदा सांसदों को इस्तीफा देने के लिए आदेश न भेजा जाए"।
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और इस कारण शायद कुछ मतदाता (कुछ, न कि सभी) सांसद को इन कानूनो को लागू करवाने का आदेश न भेजने का भी फैसला ले सकते है !!! कई मतदाता यह सोच सकते है कि, "मौजूदा सांसदों ने चुनावो से पहले ही यह बात स्पष्ट कर दी थी कि, वे राईट टू रिकॉल कानूनो को लागू करने वाले नही है। और सांसद जानते है कि मैं उन्हें इस्तीफा देने के लिए नही कह सकता, क्योंकि कोई भी रिकालिस्ट राईट टू रिकॉल कानूनो के समर्थन में चुनाव लड़ने को तैयार नही है। अत: यदि मैं सांसद को ट्विटर द्वारा आदेश भेज भी देता हूँ तो सांसद इन कानूनो को लागू करने से साफ़ इंकार कर देंगे। अत: ये मामला अब यहीं ख़त्म हो चुका है"।
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तब हम रिकालिस्ट्स के सामने प्रश्न यह है कि --- क्या हमारे पास ऐसे रिकालिस्ट्स उपलब्ध है जो कि सांसद बन कर राइट टू रिकॉल कानूनो को लागू करने की मंशा रखते हो ?
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यदि हमारे पास ऐसे उम्मीदवार नहीं है तो राइट टू रिकॉल क़ानून ड्राफ्ट्स बिना शरीर की आत्मा की तरह होंगे , तथा ऐसे अमूर्त विचार का राजनीति और वास्तविक जीवन में कोई महत्त्व नहीं होगा।
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कोई क़ानून ड्राफ्ट सिर्फ तभी अच्छा क़ानून ड्राफ्ट कहा जा सकता है जबकि ऐसा ड्राफ्ट 45 करोड़ नागरिको और 2 लाख कार्यकर्ताओ का समर्थन जुटा सके , और साथ ही यह प्रस्तावित ड्राफ्ट इतना प्रभावी हो कि 543 कार्यकर्ता इन कानूनो को लागू करवाने का उद्देश्य लेकर चुनाव लड़े। ताकि संसद में जाकर इन्हे लागू किया जा सके। अन्यथा ऐसे कानून ड्राफ्ट्स का प्रचार करना सिर्फ समय की बर्बादी है।
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इसलिए हमें पूरे देश में चुनाव लड़ने के लिए 543 लोकसभा उम्मीदवारों और 5000 विधानसभा प्रत्याशियों की आवश्यकता होगी। और बाद में हमें लगभग 2 लाख ऐसे कार्यकर्ताओ की भी जरुरत होगी जो कि स्थानीय निकाय के चुनावो में भाग ले सके।
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इसीलिए चुनावो में भाग लेना बेहद जरुरी है , और जल्दी से जल्दी रिकालिस्ट्स को इस दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए।
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हम चुनाव लड़े बिना आगे नहीं बढ़ सकते। क्योंकि ज्यादातर मतदाता हमारी बात सिर्फ तब ही सुनेंगे जब हमारे पास चुनावो में उररने के लिए पर्याप्त प्रत्याशी हो। वरना हमें मतदाताओ से या सुनने हो मिलेगा कि -- आप लोगो द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट्स बेशक अच्छे हो सकते है। लेकिन यदि आप के ड्राफ्ट्स यदि 543 कार्यकर्ताओ को भी चुनाव लड़ने और सांसद बनने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते तो इन ड्राफ्ट्स की अच्छाई संदेहास्पद है।
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कई बार किसी कार्य को करने की सलाह देने को सिर्फ तब ही गंभीरता से लिया जाता है जब कि ऐसी सलाह देने वाला स्वयं उस सलाह पर अमल करके दिखाए। इस सम्बद्ध में महात्मा बुद्ध के जीवन से जुडी एक लोकप्रिय बोध कथा है।

"एक बार एक महिला ने महात्मा बुद्ध से कहा कि उनका पुत्र बहुत ज्यादा मिठाई का सेवन करता है , अत: वे उसके पुत्र को ज्यादा मीठा न खाने का उपदेश दें। महात्मा बुद्ध ने उस महिला को एक महीने बाद पुन: आने को कहा। एक मास पश्चात जब महिला फिर से लौटी तो महात्मा बुद्ध ने बालक को अधिक मीठा न खाने के लिए समझाया। बालक पर महात्मा बुद्ध के उपदेश का पर्याप्त असर हुआ और उसने मीठा खाना कम कर दिया। इस प्रकरण के साक्षी महात्मा बुद्ध के एक शिष्य ने यह जिज्ञासा प्रकट की कि , 'आपने महिला को एक महीने का इंतिजार करने को क्यों कहा' ? भगवान बुद्ध ने उत्तर दिया कि, 'एक महीने पहले तक मैं स्वयं मीठा खाने का आदी था, अत: मेरी सीख तब तक श्रोता पर कोई असर नहीं डालेगी जब तक कि मैं स्वयं उस सीख पर अनुसरण न करूँ। इसीलिए जब मैंने खुद इस आदत से छुटकारा पा लिया तब ही मैंने बालक को मीठा न खाने की सलाह दी'।
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कहानी का सबक यह है कि, क़ानून ड्राफ्ट्स को लागू करवाने के लिए कार्यकर्ताओ को चुनाव लड़ने की सलाह देने का तब तक कोई महत्त्व नहीं है , जब तक कि ऐसी सलाह देने वाले खुद चुनावो में भाग न ले।
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हम 70 करोड़ नागरिको को यह नहीं कह सकते कि 'पहले हम राइट टू रिकॉल पार्टी में 1 करोड़ सदस्य बनाएंगे तब हम चुनाव लड़ेंगे'। क्योंकि तब ज्यादातर मतदाता कहेंगे कि 'अगर आपके पास चुनाव लड़ने के लिए 500 कार्यकर्ता भी नहीं है तो, आप किस आधार पर कांग्रेस /बीजेपी /आम आदमी पार्टी का विकल्प बन सकेंगे' ? इसीलिए मेरा कहना यह है कि पहले कार्यकर्ताओ को इन कानूनो के प्रति अपना समर्पण दिखाना चाहिए , तब नागरिको से समर्थन की आशा करनी चाहिए।
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तो इस प्रकार 543 रिकालिस्ट्स को लोकसभा और 5000 रिकालिस्ट्स को विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना 'सबसे पहला' काम है। क्योंकि सबसे पहले कार्यकर्ताओ को इन कानूनो पर अपना भरोसा दिखाना होगा , सिर्फ तब ही मतदाता इन क़ानून ड्राफ्ट्स को पढ़ने, समझने और अपने सांसदों एवं पीएम को ट्विटर द्वारा आदेश भेजने के लिए राजी होंगे।
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इसके अलावा, यदि हम रिकालिस्ट्स के पास 543 लोकसभा उम्मीदवार नहीं होंगे तो वर्तमान सांसदो पर इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने का कभी भी दबाव नहीं बन सकेगा। मौजूदा सांसद इन कानूनो को लागू करने के लिए तब ही राजी होंगे जब वे देखेंगे कि उन्हें बदलने के लिए इन कानूनो के समर्थक चुनावी मैदान में है।
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रिकालिस्ट्स चुनावो में भाग लेने से इंकार क्यों कर रहे है ?
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मैंने राइट टू रिकॉल कानूनो का प्रचार 1998 से शुरू किया , और 2008 से मैंने इसके लिए तेजी से प्रयास शुरू कर दिए थे। 2008 से अब तक मैं अकेला उम्मीदवार हूँ जो कि इन मुद्दो पर चुनाव लड़ रहा हूँ। दो अन्य रिकालिस्ट्स ने चुनावो में भाग लेने की कोशिश की, लेकिन तकनिकी ( सीरियल नंबर, भाग संख्या आदि दर्ज नही करना ) कारणों के चलते उनके आवेदन निरस्त हो गए और वे चुनाव नही लड़ सके। इनके अलावा अब तक किसी भी रिकालिस्ट ने चुनाव लड़ने की गतिविधि को गंभीरता से नहीं लिया।
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क्या कारण हो सकते है कि रिकालिस्ट्स चुनावो में भाग लेने से इंकार कर रहे है ?
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जो भी कारण रहे हो , लेकिन इतना तय है कि कुछ ऐसे कारण मौजूद है जिनके चलते रिकालिस्ट्स चुनावो में भाग लेने से कतरा रहे है।
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जहां तक मैं देखता हूँ , इसके पीछे कोई वास्तविक या भौतिक कारण नहीं है। --- चुनाव लड़ने के लिए बहुत ज्यादा धन की आवश्यकता नहीं होती -- 3000 रू स्थानीय निकाय के लिए, 10000 विधानसभा चुनावो के लिए और 25000 लोकसभा के लिए जमानत राशि के रूप में जमा कराना होता है। कई रिकालिस्ट्स या तो इस राशि के खर्च को वहन कर सकते है या फिर अपने 5-10 परिचितों से इस सम्बन्ध में सहायता ले सकते है। इसके अलावा पेम्फ्लेट आदि की छपाई वगेरह पर लगभग 20000 रू तक का खर्च आता है। इस प्रकार चुनाव लड़ने के लिए लगभग 50000 रू तक की आवश्यकता है, जो कि मेरे अनुमान में कई रिकालिस्ट्स के लिए इस राशि की व्यवस्था करना कोई बड़ी चुनौती नहीं है।
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हालांकि इलेक्शन फॉर्म भरना एक जटिल कार्य है --- एक लम्बा शपथपत्र प्रस्तुत करना, मतदाताओ के हस्ताक्षर, अनुभाग संख्या, क्रम संख्या इकट्ठे करना आदि। और उनके मतदाता पहचान पत्रो की फोटो कॉपी की भी जरुरत हो सकती है। कुल मिलाकर एक चुनावी फॉर्म भरने में लगभग 2-3 दिन लग सकते है , लेकिन यह भी कोई बड़ा प्रतिरोध नही है और इसका प्रबंधन किया जा सकता है।
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कुल मिलाकर मैं ऐसे कोई वास्तविक और वाजिब कारण नही देखता जिसके चलते रिकालिस्ट्स लगातार चुनाव लड़ने से इंकार कर रहे है।
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मेरे विचार में चुनाव न लड़ने का फैसला लेने के पीछे कारण 'मनोवैज्ञानिक' है।
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(a) उन्हें यह भय है कि जब वे चुनाव हार जाएंगे तो लोग उनका मजाक उड़ाएंगे। यह बात ठीक है कि चुनाव हारने वाले उम्मीदवारों को उपहास का सामना करना पड़ता है। लेकिन इसका सामना करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नही है।
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(b) एक अन्य कारण यह हो सकता है कि --- कई रिकालिस्ट्स यह सोचते है कि चुनावो में भाग लेने की लिए सिर्फ 543 रिकालिस्ट्स की जरुरत है अत: इस कार्य को कोई अन्य रिकालिस्ट्स भी कर सकता है, इसीलिए मुझे चुनावो में भाग लेने की आवश्यकता नहीं है।
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(c) इसे बहुत मुश्किल समझना -- चुनाव जितना मुश्किल काम है, लेकिन चुनाव लड़ना कोई मुश्किल कार्य नही।
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(d) कार्यकर्ताओ और समर्थको की संख्या बढ़ने का इंतिजार करना -- राईट टू रिकॉल समर्थको की संख्या तब ही बढ़ेगी जब ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ता चुनावो में हिस्सा लेंगे।
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चुनावो में भाग न लेना राइट टू रिकॉल आंदोलन को कई तरीको से भारी नुकसान पहुंचायेगा। मान लीजिये कि, किसी जिले में 10 योग्य और समर्पित रिकालिस्ट्स है। मान लीजिये कि वे सभी चुनाव लड़ने से इंकार कर देते है। तब मुझे मजबूरन उस कम योग्य उम्मीदवार को टिकेट देना होगा, जो राइट टू रिकॉल कानूनो के प्रति पूर्णतया समर्पित नही है। इससे अमुक उम्मीदवार की ख्याति बढ़ेगी, और अगले चुनावो में भी मुझे उसी व्यक्ति को टिकेट देना होगा, और इससे समर्पित कार्यकर्ताओ को बुरा लगेगा।
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दूसरे शब्दों में, 'सही समय का इंतिजार करना' सिर्फ मुझे उन अयोग्य उम्मीदवारों को टिकेट देने के लिए बाध्य करेगा जो कि कम काबिल है। और एक बार किसी व्यक्ति को समर्थन देने के बाद उससे समर्थन वापिस लेना आसान नही है।
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कुल मिलाकर जैसा कि मैं देखता हूँ ,चुनावो में भाग न लेना राइट टू रिकॉल आंदोलन के बढ़ने में सबसे बड़ी बाधा है। और सबसे निराशाजनक बात यह है कि, ये सभी कारण मनोवैज्ञानिक है, न कि भौतिक। कारण जो भी रहे हो --- चुनाव न लड़ने के फैसले पर टिके रहना हमें सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचायेगा। और यदि 543 लोकसभा में और 5000 रिकालिस्ट्स विधानसभा चुनावो में भाग लेने के लिए तैयार नही हुए तो इन देश में इन कानूनो का लागू होना कभी भी संभव नही हो पायेगा। क्योंकि जब तक बड़ी संख्या में रिकालिस्ट्स चुनाव नही लड़ेंगे, राइट टू रिकॉल कानूनो के समर्थको की संख्या नही बढ़ेगी।
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2. दूसरा काम --- 75 करोड़ नागरिको को टीसीपी , राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम आदि क़ानून ड्राफ्ट के बारे में ‘सूचित’ करना ; यह जानकारी अनिवार्य रूप से कार्यकर्ताओं द्वारा ही पहुंचाई जानी चाहिए, पेड मिडिया द्वारा नही ।
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मेरे विचार में हम रिकालिस्ट्स को दूसरा काम यह करना होगा कि हम भारत के 70 करोड़ नागरिको को राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम , टीसीपी आदि क़ानून ड्राफ्ट्स की जानकारी दें। इसके लिए हमें 70 करोड़ पेम्फ्लेट , करोडो पुस्तिकाएं और करोड़ो डीवीडी का तैयार करके उनका वितरण करना होगा !! या हमें नागरिको को इस बात के लिए तैयार करना होगा कि वे इन पुस्तिकाओं और डीवीडी को दुकानो से ख़रीदकर पढ़ें और देखें। पर्चो की छपाई और डीवीडी के वितरण का अनुमानित व्यय प्रति नागरिक लगभग 400 रू के हिसाब से हमें अनुमानित 28 हजार करोड़ रूपयो की आवश्यकता होगी।
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अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि --- किस तरह हम 70 करोड़ नागरिको को इन पर्चो को पढ़ने और डीवीडी को सुनने के लिए राजी कर पाएंगे ?
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नागरिक इन पर्चो को तब ही पढ़ने में रुचि दिखाएँगे जब ; (a) पेड मिडिया इन कानूनो की प्रशंषा करे (b) कार्यकर्ता अपने परिचित नागरिको को इन्हें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें।
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पेड मिडिया का विकल्प हमारे लिए हमेशा के बंद है। इसीलिए हमारे पास सिर्फ यही तरीका शेष है कि, कार्यकर्ता अपने परिचित नागरिको से इन कानूनी ड्राफ्ट्स को पढ़ने का आग्रह करे। एक कार्यकर्ता लगभग 1000 नागरिको को ड्राफ्ट्स पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकता है, अत: हमें कम से कम 70 करोड़ / 10 / 1000 = 70 हजार कार्यकर्ताओ को आवश्यकता होगी। चूंकि कई नागरिक एक से अधिक कार्यकर्ताओ के संपर्क में आयंगे और सूचनाओ का दोहराव होगा, अत: आकलन में सटीकता बनाये रखने के लिए हमें तीन गुना अधिक कार्यकर्ताओ की गणना करनी चाहिए। इस हिसाब से हमें 70 करोड़ नागरिको को इन कानूनी ड्राफ्ट्स की सूचना पहुंचाँने के लिए कम से कम 2 लाख कार्यकर्ताओ की आवश्यकता होगी।
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क़ानून ड्राफ्ट्स की जानकारी अनिवार्य रूप से कार्यकर्ताओ द्वारा ही पहुंचाई जानी चाहिए न कि पेड मिडिया द्वारा। क्योंकि पेड मिडिया द्वारा सूचित नागरिक एक दायित्व है न कि एक सम्पति, अत: तब कार्यकर्ताओ को नागरिको से जुड़े रहने के लिए हमेशा पेड मिडिया पर निर्भर रहना पड़ेगा। लेकिन यदि नागरिक कार्यकर्ताओ से जुड़े हुए है तो मिडिया को भुगतान किये बिना भी कार्यकर्ता नागरिको से जुड़े हुए रह सकते है। इसीलिए यह बहुत जरूरी है कि, नागरिक यह सूचनाए पेड मिडिया की जगह कार्यकर्ताओ द्वारा प्राप्त करे।
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( कार्यकर्ता कौन है ? और भारत में कितने कार्यकर्ता है ? --- एक कार्यकर्ता वह व्यक्ति है जो भारत को मजबूत बनाने के लिए निस्वार्थ भाव से अपने धन और समय का एक अंश व्यय करने के लिए प्रतिबद्ध है , तथा बदले में उसका प्राथमिक लक्ष्य कोई ख्याति /धन /पद आदि प्राप्त करना नहीं है। मेरे अनुमान में भारत में कई लाख कार्यकर्ता है, लेकिन उनमे से सभी राईट टू रिकॉल कानूनो का प्रचार नहीं करेंगे। लेकिन यदि कुछ 2 लाख कार्यकर्ता भी प्रति सप्ताह 4 घंटे का समय इन कानूनो के प्रचार में देते है, तो कुछ ही सप्ताह में पहला चरण पूरा हो जाएगा।)
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इस समय हम कुछ 500 रिकालिस्ट्स है जो कि पूरे देश में फैले हुए है, और इन कानूनो का प्रचार नागरिको में कर रहे है। इसलिए हम रिकालिस्ट्स को ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओ को रिकालिस्ट्स में बदलने के लिए प्रयास करने चाहिए। तो यदि हम 2 लाख कार्यकर्ताओ को रिकालिस्ट्स में बदलने में असफल रहते है तो क्या होगा ? ऐसी स्थिति में, मेरा अनुमान है कि हम रिकालिस्ट्स खेल से बाहर हो जाएंगे।
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कोई यह प्रश्न पूछ सकता है कि --- मैंने किस आधार पर 2 लाख कार्यकर्ताओ की आवश्यकता बतायी है। असल में यह एक मोटा अनुमान है। मेरा मतलब यह है कि --- निश्चय ही हमें न तो कुछ हजार कार्यकर्ताओ की आवश्यकता है , न ही करोड़ो कार्यकर्ताओ की। जो बात समझना जरुरी है वह यह है कि --- कार्यकर्ताओ की संख्या पर्याप्त रूप से इतनी होनी चाहिए कि , कोई रिकालिस्ट 1% से अधिक रिकालिस्ट्स से परिचित हुए बिना और आपसी संपर्क के अभाव के बावजूद अपना काम जारी रखें और बिना किसी सम्प्रेषण के आंदोलन आगे बढ़ता रहे।
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अध्याय - 1 का सार यह है कि पहला काम यह है कि कार्यकर्ताओ द्वारा 70 करोड़ नागरिको को इन कानून ड्राफ्ट्स के बारे में सूचित किया जाए तथा ऐसा करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रियाओ का पालन किया जाए :
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(1a) लाखो कार्यकर्ताओ तक अपनी पहुँच बनायी जाए।
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(1b) लगभग 2 लाख कार्यकर्ताओ को रिकालिस्ट्स में बदला जाए --- मतलब कार्यकर्ताओ को इस बात के लिए राजी किया जाए कि वे अपने धन से राईट टू रिकॉल आदि कानूनो के पर्चे छपवायें, डीवीडी बनाकर वितरण करें और सभाएं आयोजित करके नागरिको को इन कानूनो के बारे में जानकारी दे।
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(1c) तथा नागरिको को इन ड्राफ्ट्स को पढ़ने के लिए तैयार करें।
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इन सब प्रक्रियाओ में नागरिको को इन ड्राफ्ट्स को पढ़ने के लिए तैयार करना सबसे मुश्किल काम है। और इसीलिए हमें कार्यकर्ताओ की आवश्यकता है , न कि पेड मिडिया की। पेड मिडिया के प्रायोजक कभी भी नागरिको को ड्राफ्ट्स पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं करेंगे। क्योंकि जब कोई नागरिक ड्राफ्ट्स पढ़ने लगता है तो उसका विवेक और विश्लेषण क्षमता बढ़ जाती है। और पेड मिडिया के प्रायोजकों को विवेकी और विश्लेषक नागरिक बिलकुल भी पसंद नहीं है। इसलिए पेड मिडिया कभी भी नागरिको को ड्राफ्ट्स पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं करेगा।
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3. तीसरा काम ---- 45 करोड़ नागरिको को अपने सांसदों एवं पीएम को ट्विटर द्वारा आदेश भेजने के लिए तैयार करना।
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पहला काम है --- कम से कम 543 रिकालिस्ट्स को लोकसभा, 5000 रिकालिस्ट्स को विधानसभा और लगभग 200,000 रिकालिस्ट्स को स्थानीय निकायो के चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना। इस सम्बन्ध में विवरण ऊपर के अध्याय में दिया जा चुका है।
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तीसरा काम है, कम से कम 45 करोड़ नागरिको को अपने प्रधानमंत्री को ट्विटर द्वारा आदेश भेजने के लिए राजी करना। यह काम पहले चरण के साथ साथ ही पूरा किया जाना चाहिए। रिकालिस्ट्स नागरिको को कानूनी ड्राफ्ट्स पढ़ने के साथ ही ट्विटर द्वारा आदेश भेजने का भी आग्रह करें।
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कौनसे आदेश ? ऐसा आदेश नागरिक द्वारा उन कानूनो के सम्बन्ध में भेजा जाना चाहिए, जिन कानूनो का समर्थन नागरिक करता है। दूसरे शब्दों में, हम रिकालिस्ट्स को यह सुनिश्चित करना है कि नागरिक जिन क़ानून ड्राफ्ट्स का समर्थन करते है उन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने के लिए अपने प्रधानमंत्री को ट्विटर द्वारा आदेश भेजे। और हमें 45 करोड़ नागरिको को ऐसे आदेश भेजने के लिए तैयार करना है।
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इसीलिए हमें 2 लाख कार्यकर्ताओ की जरुरत है। क्योंकि 45 करोड़ नागरिको को आदेश भेजने के लिए पेड मिडिया द्वारा प्रेरित नहीं किया जा सकता।
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यह बेहद जरुरी है कि, ऐसे ट्विट में क़ानून ड्राफ्ट का यू आर एल, और /या md5 hash और /या sha1 hash शामिल हो। यह भी बेहद महत्त्वपूर्ण है कि, ऐसे आदेश सिर्फ ट्विटर द्वारा ही भेजे जाए। किसी पोस्ट कार्ड, मेल या फेसबुक /वाट्स एप के माध्यम से नहीं। यदि ट्विटर आदेश में अमुक क़ानून ड्राफ्ट्स का यूआरएल, और /या md5 hash और /या sha2 hash आदि दर्ज नहीं किये जाते है तो भेजे गए ऐसे आदेशो की कोई उपयोगिता नहीं रह जायेगी।
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साथ है यह भी आवश्यक है कि जब नागरिक अपने ऐसा आदेश भेजे तो कार्यकर्ता उसके समीप न हो। मतलब आदेशकर्ता पर 'सामीप्य का प्रभाव' नही होना चाहिए।
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उदाहरण के लिए ,

(2a) मान लीजिये कि कोई कार्यकर्ता किसी नागरिक को इस लिंक में दर्ज सुप्रीम कोर्ट जज पर राईट टू रिकॉल क़ानून के बारे में बताता है -- <https://newindia.in/causes/RtrScCj-2/>;
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(2b) मान लीजिये कि मतदाता यह मानता है कि यह क़ानून के लागू होने से भारत की व्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पडेगा।
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(2c) तब हम रिकालिस्ट्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि मतदाता अपने प्रधानमंत्री को ट्विटर द्वारा जो आदेश भेजे उसमे यह यू आर एल या अन्य कोई यू आर एल जिसमे यह क़ानून दर्ज किया गया हो, या /और md5 hash या /और sha1 hash लिंक शामिल हो।
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(2d) और इसी तरीके से हम रिकालिस्ट्स को देश के 45 करोड़ नागरिको को ट्विटर द्वारा आदेश भेजने के लिए प्रेरित करना होगा।
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अब मान लीजिये कि , हम रिकालिस्ट्स से 2 लाख कार्यकर्ताओ को रिकालिस्ट्स में बदल दिया, तथा 2 लाख रिकालिस्ट्स ने 70 करोड़ नागरिको को इन कानूनो की जानकारी भी दे दी, लेकिन यदि 45 करोड़ नागरिको ने प्रधानमंत्री को एसएमएस द्वारा आदेश भेजने से इंकार कर दिया तो क्या होगा ?
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तब मेरे विचार में हम रिकालिस्ट्स खेल से बाहर हो जाएंगे। तब हमें या तो अपना अभियान छोड़ देना होगा या तब तक इन्तजार करना होगा, जब तक कि कम से कम 45 करोड़ नागरिक अपने प्रधानमंत्री को ट्विटर द्वारा आदेश न भेजे। क्योंकि आदेशो के अभाव में हम सांसदों के सामने बहुमत साबित करने में नाकाम रहेंगे अत: सांसद इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने से मना कर दे तो उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
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4. चौथा काम ---- 45 करोड़ नागरिको तक यह जानकारी पहुंचाना कि 45 करोड़ नागरिक प्रधानमंत्री को एसएमएस द्वारा आदेश भेज चुके है।
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मान लीजिये कि 70 करोड़ नागरिको को राइट टू रिकॉल कानूनो की जानकारी हो जाती है , तथा उनमे से कम से कम 45 करोड़ नागरिक प्रधानमंत्री को ट्विटर द्वारा आदेश भी भेज देते है।
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तब हम रिकालिस्ट्स के लिए चौथा काम है कि ---- (a) हम 45 करोड़ नागरिको को यह मानने के लिए तैयार करे कि 45 करोड़ नागरिक प्रधानमंत्री को ट्विटर द्वारा आदेश भेज चुके है। (b) हम 45 करोड़ नागरिको को यह मानने के लिए तैयार करे कि प्रत्येक सांसद / विधायक, मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री को यह जानकारी है कि 45 करोड़ नागरिको द्वारा प्रधानमंत्री को ट्विटर द्वारा आदेश भेजा जा चुका है।
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कुल मिलाकर हमें प्रस्तावित ड्राफ्ट्स और ट्विटर द्वारा आदेश भेजने की जानकारी को "कॉमन नॉलेज" में लेकर आना होगा। कॉमन नॉलेज के बारे में अधिक जानकारी के लिए कृपया गूगल करे तथा इस विषय पर विकिपीडिया पेज पढ़े।
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यह जरुरी है कि मतदाताओ को अपने प्रधानमंत्री को ट्विट भेज कर कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने या इस्तीफा देने के आदेश देने के लिए राजी किया जाए।
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तो किस तरह हम 45 करोड़ नागरिको को यह मानने के लिए तैयार कर सकते है कि प्रत्येक सांसद /विधायक, मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री को यह जानकारी है कि 45 करोड़ नागरिको द्वारा अपने सांसदों एवं प्रधानमंत्री को ट्विटर द्वारा आदेश भेजे जा चुके है ?
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फेसबुक पर करीब 10 करोड़ मतदाता जुड़े हुए है।
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हमें फेसबुक /ट्विटर पर उपस्थित 10 करोड़ मतदाताओ को निम्नलिखित कदम उठाने के लिए राजी करना होगा :
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(3a) हमें 5 करोड़ मतदाताओ को अपने फेसबुक /ट्विटर अकाउंट पर राईट टू रिकॉल क़ानून ड्राफ्ट्स के यूआरएल, md5 hashes , sha1 hashes आदि अपनी वॉल पर रखने को राजी करना होगा।
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(3b) इसके अलावा हमें 5 करोड़ नागरिको को राजी करना होगा कि वे अपने फेसबुक /ट्विटर अकाउंट पर @HIS_MP_NAME और @PMO लिखें।
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(3c) हमें इन 5 करोड़ मतदाताओ को कानून ड्राफ्ट्स के पोस्ट्स को शेयर करने के लिए तैयार करना होगा।
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(3d) हमें 5 करोड़ नागरिको को राजी करना होगा कि वे अपने फेसबुक एकाउंट पर एक नोट रखे, जिस नोट में उन आदेशो की सूची हो जो उन्होंने अपने सांसदों को एसएमएस द्वारा भेजे है।
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(3e) हमें 5 करोड़ मतदाताओ को राजी करना होगा कि वे प्रधानमंत्री को भेजे गए आदेशो की सूची का नोट अपने डिटेल्स कॉलम में और इस नोट की इमेज अपने फेसबुक अकाउंट के प्रोफाइल पर रखें।
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(3f) यदि किसी कार्यकर्ता का फेसबुक पर एकाउंट है , किन्तु वह ऊपर दिए गए कदमो को उठाने इंकार कर देता है, तो मेरे विचार में वह राईट टू रिकॉल कानूनो का विरोधी अथवा छद्म समर्थक है। मैं सभी रिकालिस्ट्स से आग्रह करूंगा कि राइट टू रिकॉल के ऐसे छद्म समर्थको पर अपना समय नष्ट न करे। लेकिन यदि कोई मतदाता यह नहीं जानता कि फेसबुक का इस्तेमाल कैसे किया जाए, तो यह शर्त उस पर लागू नहीं होती।
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अब यदि फेसबुक /ट्विटर पर उपस्थित 5 करोड़ मतदाता उपर दिए गए कदमो का पालन करते है तो हम 5 करोड़ मतदाताओ को यह विश्वास दिला सकते है कि 5 करोड़ नागरिको द्वारा प्रधानमंत्री को आदेश भेजे जा चुके है। कैसे ? हम किसी मतदाता को कह सकते है कि वह फेसबुक की मित्र सूची में से अपने किसी ऐसे मित्र की प्रोफाइल चेक करे जो कि वास्तविक जीवन में भी उसका मित्र है। यदि अमुक मित्र की प्रोफाइल की डिटेल में वह नोट दर्ज है जिसमे उन आदेशो की सूची है जो आदेश उन्होंने प्रधानमंत्री को भेजे है , तथा अमुक आदेशो में उन कानूनो ड्राफ्ट्स के यूआरएल लिंक दिए हुए है तो यह व्यक्ति आसानी से यह जान जाएगा कि उसके मित्र ने प्रधानमंत्री को इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने के आदेश भेजे है। बाद में फेसबुक पर ऐसा एप बनाया जा सकता है जो इन सभी नोट्स को संयुंक्त कर दे।
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इस प्रकार, फेसबुक पर उपस्थित प्रत्येक मतदाता यह जान जाएगा कि उसकी मित्र सूची में कितने लोग राइट टू रिकॉल कानून ड्राफ्ट्स का समर्थन करते है। इससे उसे पूरे देश के मतदाताओ का अनुमान लगाने के लिए एक अच्छा अवसर मिलेगा। फेसबुक पर कोई यूजर इस तरह अपनी मित्रता सूची के आधार पर यह अनुमान लगा सकता है कि 45 करोड़ नागरिक अपने प्रधानमंत्री द्वारा आदेश भेज चुके है या नहीं।
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इस समय लगभग 10 करोड़ मतदाता फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे है। हम इन मतदाताओ को अपनी फेसबुक मित्रता सूची में से अपने 100 वास्तविक मित्रो की प्रोफाइल चेक करने को कह सकते है। जिससे वे जान सके कि कितने लोग राईट टू रिकॉल कानूनो का समर्थन कर रहे है।
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लेकिन यदि 2 लाख कार्यकर्ता नागरिको से क़ानून ड्राफ्ट्स के लिंक्स का ऐसा नोट बनाने के लिए कहने से इंकार कर देते है तो हम खेल से बाहर हो जाएंगे !!
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तो क्या होगा अगर 2 लाख रिकालिस्ट्स 5 करोड़ नागरिको को अपने फेसबुक /ट्विटर प्रोफाइल पर भेजे गए आदेशो के क़ानून ड्राफ्ट्स के लिंक रखने को कहते है ; किन्तु 5 करोड़ नागरिक अपने फेसबुक /ट्विटर प्रोफाइल पर इन आदेशो के यूआरएल, md5 hash , shah1 hash आदि का नोट रखने से इंकार कर देते है ? तो हमें यह समझना चाहिए कि मामला ख़त्म हो चुका है। तब हमें या तो इन कानूनो को लागू करवाने का प्रयास छोड़ना होगा या फिर तब तक प्रयास करने होंगे जब तक 45 करोड़ नागरिक इन कानूनो का समर्थन दर्शाने के लिए तैयार न हो जाए।
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किन्तु यदि तमाम दुश्वारियों के बावजूद यदि हम 5 करोड़ नागरिको को अपने फेसबुक /ट्विटर प्रोफाइल पर वह नोट रखने के लिए तैयार कर लेते है जिसमे उन क़ानूनो के लिंक दर्ज किये गए है जिनका समर्थन अमुक नागरिक करता है तो हम फेसबुक का इस्तेमाल करने वाले प्रत्येक नागरिक को यह दर्शाने में कामयाब हो सकते है कि पूरे देश में कितने नागरिक इन कानूनो का समर्थन कर रहे है।
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जो नागरिक फेसबुक पर नहीं है , उनके लिए हमें ऐसी ऑफ़लाइन एप्लीकेशन बनानी होगी जो यह दर्शा सके कि उनके आस पास के कितने नागरिक अमुक कानूनो का समर्थन कर रहे है।
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जब तक की ऐसी कोई एप्लीकेशन प्रचलन में नहीं आ जाती तब तक हमें प्रत्येक नॉन फेसबुक यूजर मतदाता के लिए एक प्रतिनिधि नागरिक की आवश्यकता होगी जो कि फेसबुक का नियमित इस्तेमाल करता हो। किसी मतदाता का यह प्रतिनिधि नागरिक अमुक मतदाता का फेसबुक एकाउंट बनाकर उन चरणो का पालन कर सकेगा जो चरण ऊपर बताये गए है। इस तरीके से ये क़ानून ड्राफ्ट्स कॉमन नॉलेज में आयेंगे और इनके समर्थको की संख्या बढ़ेगी। इससे उन लोगो की संख्या भी कॉमन नॉलेज में आ जायेगी जो राईट टू रिकॉल कानूनो का विरोध कर रहे है।
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यदि 45 करोड़ नागरिको के संज्ञान में यह बात आ जाती है कि, 45 करोड़ नागरिको द्वारा प्रधानमंत्री को आदेश भेजे जा चुके है तब हम चौथे चरण में प्रवेश कर सकते है।
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5. पांचवा काम --- 45 करोड़ नागरिको को तैयार करना की, वे अपने सांसदों को इस्तीफा देने के लिए ट्विटर द्वारा आदेश भेजे ।
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इस चरण के पालन की आवश्यकता सिर्फ तब होगी जबकि पहले से चौथे चरण के कार्य पूरे कर लिए जाने के बावजूद सांसद राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम कानूनो को लागू करने से इंकार कर दे।
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यदि --- (a) यदि हमारे पास लोकसभा चुनावो में भाग लेने के लिए 543 प्रत्याशी है, तथा (b) 45 करोड़ नागरिक इस बात को मानते है कि 45 करोड़ नागरिको द्वारा अपने प्रधानमंत्री को राइट टू रिकॉल कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने के लिए ट्विटर द्वारा आदेश भेजे जा चुके है तब --- हम रिकालिस्ट्स के पास नागरिको से यह अपील जारी करने का नैतिक अधिकार होगा कि उन्हें अपने सांसदों को इस्तीफा देने के लिए एसएमएस द्वारा आदेश भेजने चाहिए। इस स्थिति में कुछ प्रबुद्ध लोगो की यह सलाह हो सकती है कि हमें अगले चुनावो तक इंतिजार करना चाहिए। किन्तु इस बारे में मेरा कहना है अगले चुनावो का इंतिजार करने में समय बर्बाद करने की कोई तुक नहीं है। समय ही पैसा है, समय ही जीवन है। यदि हम इंतिजार करते रहे तो देश को इस दौरान बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए यदि 45 करोड़ नागरिको द्वारा एसएमएस / ट्वीट करने के बावजूद यदि सांसद इन कानूनो को लागू करने से इंकार कर देते है तो हमें नागरिको को राजी करना होगा कि वे अपने सांसदों को इस्तीफा देने के आदेश भेजे।
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यह कदम बेहद महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद उतना विकट नहीं है। क्योंकि कई मतदाता यह तय कर सकते है कि 'हमें अगले चुनावो तक इंतिजार करना चाहिए'। इस दौरान नागरिक राइट टू रिकॉल ग्रुप के प्रत्याशियों का मूल्यांकन कर सकेंगे तथा साथ ही वर्तमान सांसदों पर राइट टू रिकॉल कानूनो को लागू करवाने का दबाव भी बना सकेंगे।
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इसीलिए यदि 45 करोड़ नागरिक अपने सांसदों को इस्तीफा देने के लिए आदेश भेजने के लिए राजी हो जाते है तो ठीक है, वरना हमें अगले लोकसभा चुनावो तक इंतिजार करना होगा
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यदि 45 करोड़ नागरिको द्वारा आदेश भेजे जाने के बावजूद यदि सांसद इस्तीफा देने के लिये राजी नहीं होते है तो क्या होगा ? तब अहिंसामूर्ती महात्मा ऊधम सिंह जी सांसदों से मिलकर उन्हें इस्तीफा देने के लिए राजी कर लेंगे।
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6. छठा काम --- 45 करोड़ नागरिको को लोकसभा-विधानसभा चुनावो में राईट टू रिकॉल पार्टी के उम्मीदवारों को वोट देने के लिए राजी करना।
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लोकसभा-विधानसभा चुनावो में हमें 45 करोड़ या कम से कम 25 करोड़ मतदाताओ को इस बात पर राजी करना होगा कि वे राईट टू रिकॉल पार्टी के उम्मीदवारों को वोट करे।
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यदि 45 करोड़ मतदाता प्रस्तावित राईट टू रिकॉल कानून ड्राफ्ट्स का समर्थन करते है, और अपने सांसदों को इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने के आदेश भेज चुके है तो उन्हें इन कानूनो के समर्थन में वोट करने के लिए तैयार करना कोई मुश्किल कार्य नहीं है।
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7. सातवां काम --- उस स्थिति से निपटना जबकि चुनकर आये राइट टू रिकॉल पार्टी के सांसद इन कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने से इंकार कर दे, या प्रधानमंत्री राज्य सभा में बहुमत नहीं होने का हवाला देने का नाटक करें।
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मान लीजिये कि, राइट टू रिकॉल / ज्यूरी कानून ड्राफ्ट्स के मुद्दे पर चुन कर आये सांसद इन कानूनो को लागू करने से इंकार कर देते है तो हम रिकालिस्ट्स और नागरिको के पास क्या विकल्प बचा रहेगा ?
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यह कोई गंभीर समस्या नहीं है। क्योंकि तब अहिंसामूर्ति महात्मा ऊधम सिंह जी स्थिति को नियंत्रण में लेकर आसानी से मामला सुलझा लेंगे।
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अत: तब राईट टू रिकॉल / ज्यूरी आदि क़ानून लोकसभा से पास हो जाएंगे। लेकिन यदि सांसद राज्य सभा में बहुमत नहीं होने का हवाला देते है तो यह सिर्फ बहाना होगा, क्योंकी राईट टू रिकॉल ग्रुप द्वारा प्रस्तावित अधिकतर कानून ड्राफ्ट्स को राज्य सभा से पास करने की आवश्यकता नहीं है।
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8. आठवाँ काम --- राईट टू रिकॉल कानूनो को रोकने के लिये सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश द्वारा अड़ंगा लगाने की स्थिति का सामना करना।
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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश को राईट टू रिकॉल सुप्रीम कोर्ट जज की अधिसूचना को जारी करके नागरिको द्वारा नौकरी से निकाला जा सकता है। यदि मुख्य न्यायधीश इस राजपत्र अधिसूचना को रद्द कर देते है तो फिर अहिंसामूर्ती महात्मा ऊधम सिंह जी मुख्य न्यायधीश से मुलाक़ात करके उन्हें समझा देंगे।
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इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश द्वारा इन कानूनो में अड़ंगा लगाना कोई विशेष समस्या नहीं है।
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9. नवां काम --- उस स्थिति से निपटना, जब प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस अधिकारी , रिजर्व बैंक अधिकारी, सार्वजनिक उपक्रमों के अधिकारी आदि राइट टू रिकॉल कानूनो का विरोध करें और इन्हे रोकने के लिए लिए गड़बड़ी फैलाये।
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यदि एक बार राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम प्रक्रियाएं लागू हो जाती है तो सरकारी कर्मचारियों को घूस से होने वाली आय घटकर लगभग शून्य तक आ जायेगी , तथा टीसीपी के आने से सरकारी कर्मचारियों के वेतन में लगभग एक तिहाई से एक चौथाई की कमी आएगी। इसलिए पूरी संभावना है कि ज्यादातर प्रशासनिक अधिकारी और कर्मचारी इन क़ानूनो के निष्पादन में बाधा उत्पन्न करें।
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कार्यकर्ता इस परिस्थिति से कैसे निपट सकते है ?
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मेरे विचार में इस समस्या के हल के लिए कार्यकर्ताओ को एक समानांतर प्रशासन खड़ा करने के फार्मूले पर काम नहीं करना चाहिए। ऐसे समानांतर प्रशासन को मैं 'एक्टिविस्टोक्रेसी' कहता हूँ। इस समस्या का वाजिब समाधान सरकारी प्रशासन को सुधारना है, न कि एक समानांतर सरकार खड़ी करने का प्रयास करना। कार्यकर्ता प्रशासन में जो भी बदलाव लाना चाहते है उन्हें उन बदलावों को लिए राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम /टीसीपी आदि प्रक्रियाओ का उपयोग करना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि कोई पुलिस प्रमुख /शिक्षा अधिकारी ठीक से काम नहीं कर रहा है तो राइट टू रिकॉल प्रक्रियाओ का इस्तेमाल करके उन्हें बदला जा सकता है, या कनिष्ठ कर्मचारियों के विवादों का निपटारा नागरिको की ज्यूरी द्वारा किया जा सकता है। आत्मरक्षा जैसी आपातकालीन अवस्थाओ को छोड़ कर मैं कार्यकर्ताओ द्वारा किसी भी प्रकार की सीधी कार्यवाही का समर्थन नहीं करता।
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मौजूदा स्थिति में लगभग 700 जिलो में 20 हजार जिलाधीश स्तर के प्रशासनिक अधिकारी जैसे ; शिक्षा अधिकारी, पुलिस प्रमुख, तहसीलदार, भू अभिलेख अधिकारी आदि कार्यरत है। इसके अतिरिक्त वे अधिकारी भी महत्त्वपूर्ण है, जो सरकारी एकाउंट्स, रेकॉर्ड्स, बैंक आदि के विवरणों का प्रबंधन करते है।
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यदि ये सभी अधिकारी व्यवस्था में गड़बड़ी फैलाना तय करते है तो हमारे पास क्या उपाय है ?
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तब कार्यकर्ताओ /नागरिको को चाहिए कि वे राइट टू रिकॉल प्रक्रियाओ का प्रयोग करके इन्हे नौकरी से निकाल दे। राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओ के तहत चुनकर आये और लिखित परीक्षा द्वारा हम ज्यादा बेहतर और कुशल लोगो की भर्ती कर सकते है।
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इस सम्बन्ध में, सभी कार्यकर्ताओ को एक बात में याद दिलाना चाहूंगा कि ---- चंग़ेज़ खान ने इंजीनियर्स की जान कभी नहीं ली थी !! तथा शब्द 'इंजीनियर्स' में सभी प्रकार के तकनीशियन तथा वैज्ञानिक शामिल है। मेरे विचार में इस शब्द में डॉक्टर्स को भी शामिल किया जाना चाहिए। और मैं यहाँ किसी को भी मार देने की बात नहीं कर रहा हूँ। मेरा कहना है कि ऐसे व्यक्तियों को प्रशासन से बाहर कर देना चाहिए, जो गड़बड़ी फैलाने का कार्य करे।
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इंजीनियर्स, डॉक्टर्स, वैज्ञानिकों के अतिरिक्त हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि रेकॉर्ड्स रखने वाले अधिकारी बने रहे और किसी प्रकार की गड़बड़ी न फैलाये। क्योंकि आज की दुनिया में किसी भी देश में रेकॉर्ड्स रखने वाले अधिकारी सबसे महत्त्वपूर्ण बन गए है। अभिलेखो में गड़बड़ी कर के किसी देश को युद्ध से भी ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा सकता है।
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भूमि स्वामित्व के सभी अभिलेखो को सार्वजनिक करके और सभी क्रय-विक्रय व्यवहारों को सार्वजनिक करने से इस समस्या को आंशिक रूप से हल किया जा सकता है। इसके बाद हमे सभी बैको में खातों के बेलेंस को सार्वजनिक करना होगा, ( सिर्फ बेलेंस को, खातों के सभी लेनदेन के व्यवहारों को नहीं )। यह प्रस्ताव विचलित करने वाला लग सकता है , किन्तु अधिकारियों के असहयोग के चलते बैंकिग घोटालो और अस्थिरता से बचने के लिए यह व्यवस्था बनाना आवश्यक है। इसके अलावा, मैंने 'ओपन बिटकॉइन' व्यवस्था का प्रस्ताव किया है, जिसे लागू करने से सभी लेनदेन के व्यवहार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होंगे , ताकि जो कोई इनके रिकॉर्ड्स रखना चाहता है वह ऐसा कर सकेगा -- इस प्रकार प्रत्येक लेनदेन को दो जगह दर्ज किया जाएगा। एक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होगा और एक गोपनीय रहेगा। नकदी के लेनदेन में नकली नोटों के चलन की समस्या के समाधान के लिए मेरा प्रस्ताव है कि आरोपी का ज्यूरी द्वारा सार्वजनिक रूप से नार्को टेस्ट किया जाए।
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यदि कोई सरकारी कर्मचारी गड़बड़ी फैलाने का दोषी है तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाना चाहिए। किन्तु ऐसा फैसला नागरिको की ज्यूरी द्वारा किया जाना चाहिए , न कि कार्यकर्ताओ द्वारा। कार्यकर्ता ज्यूरी सदस्यों को इस सम्बन्ध में सलाह-मशविरा दे सकते है , किन्तु अंतिम फैसला नागरिको की ज्यूरी द्वारा ही किया जाना चाहिए। नागरिको की ज्यूरी को यह भी अधिकार दिया जाना चाहिए कि यदि वे आवश्यक समझते है तो कर्मचारियों का सार्वजनिक रूप से नार्को टेस्ट ले सके।
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सार्वजनिक रूप से नार्को टेस्ट लिए जाने का प्रावधान काफी हद तक यह सुनिश्चित कर देगा कि अधिकारी किसी प्रकार की गड़बड़ फैलाने का प्रयास नही करेंगे।
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अब प्रश्न यह है कि --- (a) यदि 20 हजार कलेक्टर और उसके स्तर के प्रशासनिक अधिकारी यदि यह घोषणा कर देते है कि, वे राईट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम प्रक्रियाओ के अधीन कार्य करने के लिए तैयार नहीं है, और अपना इस्तीफा दे देते है तो क्या हमारे पास ऐसे 20 हजार लोग है जो इनकी जगह ले सके ? (b) यदि तहसीलदार के स्तर के 2 लाख कर्मचारी यदि अपना इस्तीफा दे देते है तो, क्या हमारे पास उनकी जगह लेने के लिए 2 लाख व्यक्ति है ?
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उत्तर --- वर्तमान व्यवस्था में कार्यरत ज्यादातर इंजीनियर्स और तकनीशियन जैसे विशेषज्ञ अपने पद पर बने रहना पसंद करेंगे। यदि आवश्यकता महसूस हो तो उनका वेतन बढ़ाया जा सकता है।
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जहां तक सामान्यज्ञो का प्रश्न है, उन्हें राइट टू रिकॉल कानून प्रक्रियाओ का इस्तेमाल करके बदला जा सकता है। यदि कोई अधिकारी इस्तीफा देता है , तब भी कुछ ही दिनों के भीतर योग्य उम्मीदवार को अमुक पद ओर नियुक्त किया जा सकेगा।
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ज्यादतर संभावना है कि लगभग 90% सरकारी कर्मचारी राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम के अधीन व्यवस्था में काम करने के लिए राजी हो जायेगे। घूस खाने के अवसर बेहद सिकुड़ जाने और वेतन में 50% तक की कटौती होने के बावजूद वे त्यागपत्र नहीं देंगे। समस्या दूसरी तरफ से आ सकती है ---- चूंकि भारत के नागरिक वर्तमान कर्मचारियों के भ्रष्ट आचरण और दुर्व्यहार से इतने क्षुब्द है कि वे टीसीपी क़ानून का प्रयोग करके बड़े पैमाने पर कर्मचारियों /अधिकारियों को नौकरी से निकाल सकते है। चूंकि ऐसे स्थिति में व्यवस्था में कोई विचलन पैदा नहीं होगा, अत: कार्यकर्ता इस प्रकार के बड़े पैमाने पर किये जा रहे बदलावों को नही रोक सकेंगे।
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राष्ट्रीय पहचान प्रणाली , सार्वजनिक अपराध अभिलेख, सार्वजनिक भूमि अभिलेख , ओपन बिटकॉइन आधारित राइट टू रिकॉल की नयी व्यवस्था यह सुनिश्चित करेगी कि सरकारी प्रशासन के संचालन के लिए कम से कम स्टाफ की आवश्यकता हो।
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कुल मिलाकर भूमि स्वामित्व के सभी लेखो को सार्वजनिक करके , आरोपियों का सार्वजनिक नार्को टेस्ट करके तथा राईट टू रिकॉल-ज्यूरी सिस्टम का उपयोग करके हम सरकारी कर्मचारियों की गड़बड़ियों की रोकथाम के उपाय कर सकते है।
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सिर्फ डॉक्टर्स, इंजीनियर्स और अभिलेखो को रखने वाले अधिकारियों को बदलने को लेकर समस्या का सामना करना पड़ सकता है। इनके अतिरिक्त शेष को निकाला जा सकता है या बदला जा सकता है। उदाहरण के लिए 25 सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों, 750 हाई कोर्ट न्यायधीशों और 17000 निचली अदालतों के न्यायधीशों को एक दिन में ही नौकरी से निकाल कर ज्यूरी सदस्यों की नियुक्ति की जा सकती है। इन जजो की कमी नागरिको को बिलकुल भी महसूस नही होगी , और ऐसा करने से अदालते ज्यादा तेजी और ईमानदारी से कार्य करेंगी।
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वैसे बेहतर तो यही होगा कि राईट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम क़ानून प्रक्रियाएं लागू होने के बाद केंद्रित/राज्य और स्थानीय प्रशासन में पदासीन प्रत्येक अधिकारी को बदल दिया जाए। दूसरे शब्दों में, इंजीनियर्स एवं अभिलेख रखने वालो को छोड़कर उन सभी को बदल दिया जाना चाहिए जिन्हे बदला जा सकता है।
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10. दसवां अतिरिक्त कार्य --- अमेरिका /चीन द्वारा उत्पन्न किये गए छुपे और खुले आर्थिक-सैन्य हमलो का सामना करना।
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“यह इस आंदोलन का सबसे मुश्किल और चुनौतीपूर्ण कार्य है। जब भी कोई देश अपनी सेना और आर्थिक प्रशासन को मजबूत बनाने के लिए व्यवस्था में बदलाव लाने की कोशिश करता है , पूरी दुनिया के धनिक संगठित होकर उस देश को तोड़ने का प्रयास करते है”।
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उदाहरण 1 - जब 1650 ईस्वी में इंग्लैंड ने राजा की शक्तियों को कम करके संसद की सर्वोच्चता की स्थापना करने का प्रयास किया तो यूरोपीय देशो के सभी राजाओ ने संगठित होकर इंग्लैंड की संसद को परास्त करने के प्रयास किये। वे ऐसा करने में असफल रहे , क्योंकि तब इंग्लैड की सेना काफी ताकतवर थी और इंग्लिश चैनल ने अन्य देशो की सेनाओ का इंग्लैंड तक पहुँचना काफी मुश्किल बना दिया था।
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उदाहरण 2 - जब अमेरिका ने राजतंत्र का खात्मा कर के राज्यों के मुखियाओं के चुनकर आने की व्यवस्था लागू कि तो यूरोप के कई राजा ब्रिटेन को सैन्य सहायता की पेशकश कर रहे थे। लेकिन वो इसलिए असफल रहे क्योंकि अमेरिका की सेना उस समय काफी मजबूत थी और बीच में फैले हुए समंदर ने ब्रिटेन की बड़ी सैन्य इकाई को अमेरिका तक पहुंचना कठिन बना दिया था।
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उदाहरण 3 - जब रूस ने 1916 में साम्यवाद का आश्रय लिया तो कई यूरोपोय देश रूस को नष्ट करने के लिए संगठित हो गए थे।
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उदाहरण 4 - जब सद्दाम ने क्रूड ऑयल और गोल्ड/ सिल्वर के विनिमय के लिए नयी अंतराष्ट्रीय मुद्रा को चलन में लाने का प्रयास किया तो अमेरिका ने सद्दाम पर हमला कर उसे ख़त्म कर दिया। और गद्दाफी के साथ भी ऐसा ही हुआ था।
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उदाहरण 5 - जब भारत ने अमेरिका की मर्जी के खिलाफ पोकरण-2 किया और अमेरिका की बीमा कम्पनियो को भारत में व्यापार करने की अनुमति नहीं दी तो अमेरिका ने पाकिस्तान को धन और हथियार उपलब्ध कराए ताकि पाकिस्तान कारगिल पर हमला कर सके। नतीजे में भारत और पाकिस्तान दोनों की हार हुयी और अमेरिका बिना कोई गोली चलाये युद्ध जीत गया।
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इसलिए भारत के कार्यकर्ता जब भी सांसदों पर दबाव बनाकर राइट टू रिकॉल/ ज्यूरी सिस्टम आदि कानूनो को लागू करने की मांग करेंगे तो इसकी प्रबल सम्भावना है ( नही भी है ) कि अमेरिका /चीन भारत में गड़बड़ी फैलाने के लिए पाकिस्तान /बांग्लादेश आदि को हमले के लिए हथियार दे या कसाब जैसे हमले करने के लिए प्रोत्साहित करे। सबसे बदतर स्थिति यह हो सकती है कि अमेरिका या चीन हम पर सीधा हमला कर दे। जैसे कि अमेरिका ने ईराक और लीबिया आदि पर किया था। इसके अलावा अमेरिका /चीन भारत को आंतरिक नुकसान पहुंचाने के लिए नक्सलवादियो और इस्लामिस्ट आतंकवादी समूहों को भी सहायता पहुंचा सकते है। वे भारत की आर्थिक स्थिति को अस्थिर करने के लिए पाकिस्तान के माध्यम से बड़ी मात्रा में नकली नोटों की खेप आदि भी भेज सकते है।
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समाधान ?
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1. राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम , एमआरसीएम आदि के लागू होने से नक्सलियों की समस्या समाप्त हो जायेगी। इससे अमेरिका /चीन द्वारा भारत को तबाह करने का एक रास्ता बंद हो जाएगा।
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2. हथियार बंद नागरिक समाज की रचना यानी कि प्रत्येक नागरिक को बन्दुक देकर हम अमेरिका /चीन द्वारा किये जाने वाले संभावित हमले से होने वाले हमले से होने वाले नुकसान को काफी कम कर सकते है।
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3. राष्ट्रीय पहचान प्रणाली और सार्वजनिक नार्को टेस्ट के क़ानून से हम देश में रह रहे अवैध बांग्लादेशियो को देश से बाहर खदेड़ सकते है।
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4. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के तर्ज पर हिन्दू सम्प्रदायों के लिए क़ानून पास किया जा सकता है। इससे हिन्दू धर्म सिक्ख धर्म की तरह ताकतवर हो जाएगा, और भारत के अंदर मौजूद इस्लामिक आतंकवाद संगठनो द्वारा नुक्सान पहुंचाने की सम्भावन कम हो जायेगी। इतना होने से स्थानीय हिन्दू स्थानीय मुस्लिमो से उसी तरह निपट लेंगे जिस तरह 1700 ईस्वी में सिक्खो ने मुस्लिंमो का प्रतिरोध किया था।
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नकली नोटों की समस्या से निपटने के लिए हम 1000, 500 और 100 के नोटों को वापिस ले सकते है। इसके अलावा नकदी के लेनदेन को हतोत्साहित करने की लिए ओपन बिट कॉइन प्रचलन में लाना , बिक्री कर/ उत्पाद शुल्क/ वेट/ जीएसटी हटाकर सम्पति कर (संपत्ति कर में से आयकर को घटाते हुए) लागू करना, भूमि लेनदेन में बैंकिंग व्यवहार को अनिवार्य बनाना और नकदी की जगह चेक से भुगतान करने पर अतिरिक्त इंसेंटिव देने जैसे कानूनो को लागू किया जा सकता है। सार्वजनिक नार्को टेस्ट का क़ानून भी नकली नोटों के तस्करो में काफी कमी ले आएगा।
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6. ज्यूरी सिस्टम /राइट टू रिकॉल कानूनो के आने से भारत के स्थानीय उद्योगो की तकनिकी क्षमता बढ़ेगी , जिससे भारत हथियारों का उत्पादन करने में समर्थ हो जाएगा।
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अंतिम बिंदु के अलावा अन्य सभी उपायो को सिर्फ कुछ ही हफ्तों या महीनो में लागू किया जा सकता है। लेकिन पांचवे कदम के निष्पादन में कुछ समय लगेगा -- लगभग 2 वर्ष। इस दौरान यदि अमेरिका / चीन पाकिस्तान को मदद मुहैया कराते है तो पाकिस्तान हमें भारी नुकसान पहुंचा सकता है। अमेरिका के प्रतिरोध से निपटने के लिए हमें अमेरिका को धमकाना पड़ेगा कि , यदि अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद की तो भारत अफ्रीकन-अमेरिकन को यह समझाने का प्रयास करेगा कि उन्हें अमेरिका से अलग देश बनाने की मांग करने का आंदोलन करना चाहिए। यह तरीका महंगा है , किन्तु सम्भव है और कारगर भी है। इस बारे में विस्तृत विवरण मैंने अपने इस वीडियो में दर्ज किया है कि ; यदि भारत ज्यूरी सिस्टम /राइट टू रिकॉल कानूनो को लागू करता है और अमरीका भारत पर हमला करता है तो बचाव में हम क्या कदम उठा सकते है ---- <https://www.youtube.com/watch?v=NIYkn9UUH3g>;
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और यह एक मुख्य कारण है , जिसकी वजह से कांग्रेस , बीजेपी और आम आदमी पार्टी के नेता बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के खिलाफ अपना सर उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते --- अमेरिका उन्हें धमकाता है कि , यदि उन्होंने भारत के प्रशासन को सुधारने के लिए राइट टू रिकॉल / ज्यूरी सिस्टम कानूनो को लागू करने का प्रयास किया तो वे पाकिस्तान को भारत पर हमला करने के लिए हथियारों की मदद देंगे। और जैसे जैसे भारत में राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम कानूनो के लागू होने की संभावना बढ़ती जाएगी हमले का खतरा भी बढ़ता जाएगा।
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इसीलिए जिन कार्यकर्ताओ की रुचि भारत के कानूनो को सुधारने की है उन्हें निश्चित रूप से इस संभावित चुनौती से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए कि ; अमेरिका /चीन भारत पर हमला करने के लिए पाकिस्तान को हथियारों की भारी मदद देगा। और कार्यकर्ताओ को उन वास्तविक सम्भावनाओ पर विचार करना चाहिए जिससे 2 से 3 वर्षा तक युद्धरत स्थिति से निपटा जा सके। यदि हमारी तैयारी अच्छी हुयी तो सम्भावना है कि अमेरिका /चीन भारत पर हमले का विचार स्थगित कर दे। आखिरकार ऐसे हमलो की कीमत हमलावरों को भी चुकानी होती है। अत: जब वे देखेंगे कि हमला करने से होने वाले नुकसान की संभावना ज्यादा है, तो वे इसका विचार त्याग देंगे।
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तो क्या राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम कानूनो की इतनी अहमियत है कि हम दुनिया भर से इतने झगड़े मोल ले ? देखिये, यदि हम देश में राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम कानूनो को नहीं ला पाते है तो भारत का फिर से "गुलाम बन जाना 100% तय" है। भारत पूरी तरह से पेड मिडिया के प्रायोजकों के नियंत्रण में होगा , हम तकनीक के क्षेत्र में बुरी तरह से परजीवी बने रहेंगे और हमारी आधारभूत शिक्षा में गणित-विज्ञान का ढांचा पूरी तरह से टूट जाएगा। भारत हर समय किसी सैन्य हमले के अप्रत्यक्ष भय से ग्रस्त रहेगा -- यह भय अप्रकट प्रकार का होगा, न कि प्रकट। यदि भारत राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम कानूनो को लागू करवाने में असफल रहता है तो भारत के एक विशाल फिलीपींस या उससे भी बदतर देश के रूप में रूपांतरित हो जाने की गारण्टी है।
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इसीलिए मेरे विचार में, राइट टू रिकॉल/ज्यूरी सिस्टम कानूनो की भारत के लिए बहुत अहमियत है। इतनी अहमियत कि, पाकिस्तान को तो जाने दीजिये, यदि अमेरिका /चीन भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ दे तब भी हमें इन कानूनो को लागू करवाने का जोखिम अवश्य उठाना चाहिए।
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11. ग्यारवाँ काम --- इन कार्यों को पूरा करने के लिए किस तरह हम लाखों-करोड़ो कार्यकर्ता, नागरिक, इंजीनियर्स और जरुरी कौशल, प्रशिक्षण और योग्यता जुटा सकते है ? और किस तरह हम इन कार्यो को पूरा करने के लिए धन जुटा सकते है ?
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किसी देश में नागरिको को मैं मोटे तौर पर निम्न श्रेणियों में विभाजित करता हूँ :
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1. सामान्य प्रशासन और रिकॉर्ड रखने वाले अधिकारी
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2. सैनिक /पुलिस
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3. इंजीनियर्स, वैज्ञानिक, हुनरमंद तकनीशियन , डॉक्टर्स आदि
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4. निजी क्षेत्र के इंजीनियर्स, वैज्ञानिक, हुनरमंद तकनीशियन , डॉक्टर्स आदि
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5. श्रमिक
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6. निवेशक - जिन्होंने श्रम, अक्ल, भाग्य या विरासत से या सही/गलत तरीको से अपार दौलत जमा की है और उन्हें व्यवसाय में निवेश किया है।
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7. कार्यकर्ता
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8. अन्य नागरिक
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क्या राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम आधारित व्यवस्था भारत के हथियारों के उत्पादन की क्षमता के स्तर को अमेरिका के समकक्ष स्तर तक ले जा पाएगी ? क्योंकि इस आंदोलन का अंतिम उद्देश्य सांसदों पर दबाव बनाकर सिर्फ राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम कानूनो को लागू करवाना भर नहीं है। असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी की इन कानूनो के आने के बाद भारत कितने बेहतर स्वदेशी हथियारों के उत्पादन में सक्षम हो पाता है।
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हथियारों के निर्माण के लिए आला दर्जे के इंजीनियर्स /वैज्ञानिक , समर्पित मंत्री , निवेशक और नागरिक चाहिए, जो कि भारत में इस कार्य को व्यवहारिक रूप से अंजाम दे सके। तो क्या हम ज्यूरी सिस्टम/ राइट टू रिकॉल प्रक्रियाओ के आने के बाद हमें अमेरिका जितने बेहतर इंजीनियर्स/ वैज्ञानिक उपलब्ध होंगे ? और क्या भारत के नागरिक इन्हे इस कार्य को करने के लिए पर्याप्त करो का भुगतान करके इन्हें यह काम करने देंगे ?
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मेरा जवाब है - हाँ
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पूरी दुनिया में बौद्धिकता का वितरण समान है। प्रत्येक देश में उतने ही काबिल और इंटेलिजेंट लोग है जितने कि अमेरिका में -- न कम न ज्यादा। आखिरकार अमेरिका खुद पूरी दुनिया के नागरिको का समुच्चय है।
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लेकिन बौद्धिकता के इस समान वितरण के बावजूद उत्पादकता का स्तर सभी देशो में असमान है।
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इस उत्पादकता में इस विभिन्नता का सबसे बड़ा कारक कानून व्यवस्थाएं है , न कि आनुवंशिकी या संस्कृति। अन्य पहलुओ का भी उत्पादकता पर कुछ प्रभाव पड़ता है , लेकिन यह प्रभाव मामूली है। निर्णायक भूमिका बेहतर क़ानूनो की है।
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इंजीनियर्स /वैज्ञानिकों की उत्पादकता इस पर निर्भर करती है कि इन्हें (a) झूठे श्रम मामलो (b) सरकारी अधिकारियों (c) प्रतिद्वंदियों (d) पारिवारिक सदस्यों और (e) नागरिको द्वारा किस मात्रा में पीड़ित किया जाता है।
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उत्पीड़न जितना कम होगा उत्पादकता भी उतनी ही बढ़ेगी।
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दूसरा कारण है -- जिस मात्रा में वे संपत्ति का सृजन करते है , उसमे से संपत्ति का कितना भाग वे समाज /सरकार में सुरक्षा के लिए वितरित करते है और कितना खुद के पास रखते है। धन का जितना भाग वे स्वयं के पास रखेंगे उसी अनुपात में वे नए आविष्कारो में अपने धन का निवेश कर सकेंगे।
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इसके अलावा विकास और उन्नति को प्रभावित करने वाले अन्य दसियों पहलू भी है , लेकिन वे सभी पहलू लागू क़ानून ड्राफ्ट्स द्वारा निर्धारित होते है। उदाहरण के लिए ज्यूरी सिस्टम झूठे मुकदमो द्वारा किये जा रहे उत्पीड़न की सम्भावनाओ को बेहद कमजोर कर देता है , जबकि जज सिस्टम में यह उत्पीड़न बढ़ता जाता है। इसी तरह राइट टू रिकॉल , जनमत संग्रह उत्पीड़न को घटाते है, जबकि वैट/जीएसटी जैसे कर उत्पीड़न को बढ़ा देते है। संपत्ति कर से उत्पीड़न घटता है जबकि अन्य प्रतिगामी कर उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति को घटाकर उद्योगो के विकास को नुक्सान पहुंचाते है। फ्लेट या समान करो से भी उद्योगिक विकास के अवसरों में वृद्धि होती है जबकि अनुगामी कर सिर्फ एक भ्रम है और प्रतिगामी करो को छिपाने के लिए ही लगाया जाता है।
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स्किल/ कौशल /हुनर के विकास का उत्पीड़न, बेहतर कराधान और प्रतिस्पर्धा से सीधा सम्बन्ध है। प्रतिस्पर्धा जितनी अधिक और उत्पीड़न जितना कम होगा , उतना ही नए उद्यमी प्रोत्साहित होंगे। इससे कर्मचारियों, इंजीनियर्स /वैज्ञानिकों पर अपने कौशल को बढ़ाने का दबाव बनेगा अत: कौशल का स्तर क्रमिक रूप से सुधरता जाएगा। स्किल का विकास विद्यालयों और महाविद्यालयों के कक्षा कक्षों में नही होता, बल्कि यह प्रतिस्पर्धी कारखानो में पनपती है।
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निवेशको की निगाह ज्यादा मुनाफे पर टिकी होती है। क्योंकि कम बुरी कर प्रणाली एवं न्यूनतम उत्पीड़न से उनका मुनाफा बढ़ता है अत: वे ऐसी परिस्थिति में निवेश करने के लिए उद्यत हो जाते है। यदि निवेशक खेल में शामिल नही होते है तो जमीन की कीमते गिर जायेगी, श्रम सस्ता हो जाएगा और उत्पादों पर मुनाफे की दरें बढ़ जायेगी। ऐसी परिस्थिति में निवेशक खुद को बाजार में आने से रोक नहीं पाएंगे। कुल मिलाकर यदि एक बार कर प्रणाली और शासन व्यवस्था को ठीक कर दिया जाता है तो यह निवेशकों को आना सुनिश्चित कर देता है।
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क्या राईट टू रिकॉल/ज्यूरी सिस्टम आधारित क़ानून व्यवस्था हमें प्रतिबद्ध मंत्री उपलब्ध करवा सकेगी ? हाँ। क्योंकि राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम मंत्री एवं अधिकारियों के सभी स्तरों अपर भ्रष्टाचार में कमी ले आएगा। अत: समर्पित और ईमानदार प्रतिनिधियों को मंत्री स्तर तक पहुँचने में कम बाधाओ का सामना करना पड़ेगा।
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सार यह है कि -- राइट टू रिकॉल /ज्यूरी सिस्टम कानूनी ड्राफ्ट्स यह सुनिश्चित करेंगे कि हम कुशल इंजीनियर्स /विज्ञानिक, उत्साही निवेशक और समर्पित मंत्री जुटा सके। और इतना करने से हम अमेरिका के स्तर तक पहुँचने की ताकत खड़ी कर सकते है। और यदि हमारे कानूनी-ड्राफ्ट्स अमेरिका से बेहतर हुए तो हम कुछ ही वर्षो में अमेरिका का अधिग्रहण भी कर सकेंगे।
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12. निर्भरता
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मेरे नजरिये में चुनाव लड़ना सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है। जब तक कम से कम 543 प्रत्याशी लोकसभा और 5000 प्रत्याशी विधानसभा चुनावो में लड़ने के लिए तैयार नही होंगे तब तक ज्यादातर कार्यकर्ता हम रिकालिस्ट्स को गंभीरता से नही लेंगे। और इसीलिए वे हमारे द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट पढ़ने की भी जहमत नहीं उठाएंगे। ऐसे स्थिति में इन कानूनो के समर्थको की संख्या बढ़ने की उम्मीद भी बेहद कम होगी।
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(यह अध्याय अपूर्ण है)
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लेकिन जब हम पहले चरण पर कार्य कर रहे है तब भी हमे नवें और दसवें चरण के कार्यो को अपने ध्यान में रखना होगा। असली सफलता राइट टू रिकॉल/ज्यूरी सिस्टम कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करवाना नहीं है, बल्कि सफलता प्राप्त करने के लिए हमें इन कानूनो को लागू करवाकर खुद को खेल में बनाये रखना होगा ताकि हम आंतरिक और बाह्य हमलो से बचते हुए अपने तकनिकी कौशल को अमेरिका के समकक्ष बना सके।
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13. क्या भारत को ताकतवर बनाने का अन्य कोई शार्ट कट है ? जिससे इस भारी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया से बचा जान सके ?
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राइट टू रिकॉल की मेरी योजना में करने को काफी काम पूरे किये जाने है। इसके निष्पादन के लिए मौजूदा रिकालिस्ट्स को लाखो कार्यकर्ताओ तक पहुँचना होगा और उनमे से कम से कम 2 लाख कार्यकर्ताओ को रिकालिस्ट्स में परिवर्तित करना होगा। और इन रिकालिस्ट्स को 75 करोड़ नागरिको तक इन कानूनो की जानकारी पहुंचानी होगी ताकि नागरिक इन कानूनी ड्राफ्ट्स को पढ़ने के लिए तैयार हो। और इसके साथ ही उन्हें चुनावो में भी भाग लेना होगा। इसके अलावा हमें अपने कौशल से होने वाले संभावित हमलो से बचने के लिए भी तैयार रहना होगा। जाहिर है यह सब करने के लिए काफी कुछ लगेगा।
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क्या कोई अन्य रास्ता है जिसका अनुसरण करके हम आसानी से भारत को बेहतर देश बना सके ?
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मेरे विचार में --- नहीं
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भारत को बेहतर जगह बनाने के लिए अन्य लोग कई तरह के दीगर समाधान भी सुझाते है, लेकिन दुर्भाग्य से वे सभी भारत पर विदेशीयों के बढ़ते हुए नियंत्रण की अनदेखी कर रहे है। साथ ही वे इस बात को भी समझने में समर्थ नहीं है कि अंतिम रूप से सबकुछ सैन्य क्षमता पर निर्भर करता है। और वे इस तथ्य की भी अनदेखी कर रहे है कि , भारत और चीन तथा भारत और अमेरिका के बीच सैन्य अनुपात दिन के दिन बिगड़ता जा रहा है।
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अनिवार्य रूप से , अन्य रास्तो का प्रस्ताव कर रहे ये रणनीतिकार दीर्घकालीन खतरों की उपेक्षा कर रहे है , और उनके पास भारत की सेना को मजबूत और 'आत्मनिर्भर' बनाने का कोई खाका नहीं है।
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इसके अलावा ये सभी प्रस्तावक इस तथ्य की भी उपेक्षा कर रहे है कि उन्हें कोई भी बदलाव लाने के लिए दो तिहाई मौजूदा सांसदों का समर्थन चाहिए होगा या उन्हें 2 लाख कार्यकर्ताओ और 45 करोड़ नागरिको के समर्थन की जरुरत होगी। उनमे से ज्यादातर के प्रस्ताव सांसदों द्वारा खारिज कर दिए जाएंगे और 2 लाख कार्यकर्ताओ एवं 45 करोड़ नागरिको तक पहुंचने की उनके पास कोई योजना नहीं है। उनकी योजनाएं बेहद आसान दिखाई देती है , क्योंकि उनके सभी प्रस्ताव और योजनाएं अधूरी है !! उन्हें इस बात का भी कोई अंदाजा नहीं है कि यह काम किस हद तक चुनौतीपूर्ण है और इसका पैमाने का आकार क्या है।
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सामान्य समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि, ऐसे किसी भी राजनैतिक प्रस्ताव को मूर्त रूप देने के लिए उन्हें 2 लाख कार्यकर्ताओ और 45 करोड़ नागरिको के समर्थन की आवश्यकता होगी, जो प्रस्ताव धनिक वर्ग के हितो के खिलाफ है। और इसीलिए हमारे पास कोई शार्ट कट नहीं है। यह जरुरी है कि 2 लाख कार्यकर्ता ऐसे प्रस्तावों का समर्थन करें।
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तो इस प्रकार हम पर कई सारे और बहुत बड़े कार्यों को पूरा करने की जिम्मेदारी है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Feb 13 2018 10:01:05 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

1946 में श्री वल्ल्भ भाई पटेल ने भारत का प्रधानमंत्री बनने से इंकार क्यों कर दिया था ?
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तब ब्रिटिश जवाहर लाल गाज़ी को भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे एवं उन्होंने अपनी इस मर्जी के बारे में भारत के धनिक वर्ग - टाटा, बिरला, गोदरेज, बजाज, साराभाई आदि - को सूचित कर दिया था। भारत के इस विशिष्ट वर्ग ने पटेल को जवाहर लाल के पक्ष में दौड़ से बाहर हो जाने के लिए राजी किया, एवं जवाहर लाल गाज़ी देश के प्रधानमंत्री बने। भारतीय धनिक वर्ग एवं ब्रिटिशर्स द्वारा इस मामले में महादुरात्मा गांधी को भी दरकिनार कर दिया गया था।
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पिछले 70 सालों से हम यह कथा सुनते आये है कि -- जवाहर लाल को पीएम बनाने का फैसला महादुरात्मा गांधी ने किया था ; बकवास
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यदि ऐसा था तो पटेल ने महादुरात्मा गांधी को क्यों नहीं कहा कि -- तू अपने चरखी-डंडे के साथ भाड़ में जा, पर मैं जवाहर लाल को पीएम नहीं बनने दूंगा। "सम्मान या आदर करना" अच्छी बात है , लेकिन ऐसे मसलो पर ऐसी औपचारिकताएं निर्णायक बिंदु नहीं होती। राजनीती के शीर्ष स्तर पर सम्मान वगेरह का निर्वाह एक सीमा तक ही किया जाता है, सीमातीत नहीं। क्योंकि दांव पर पूरा देश उसकी अवाम होती है।
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पटेल को तब कोंग्रेस के 80% से ज्यादा कार्यकर्ताओ का समर्थन हासिल था। लेकिन तब की कोंग्रेस एवं मीडिया भी भारतीय धनिक वर्ग द्वारा प्रायोजित था। और सच्चाई यह है कि श्री वल्ल्भ भाई पटेल मीडिया, ब्रिटिशर्स एवं भारतीय धनिकों के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
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भारत के धनिक वर्ग ने ब्रिटिशर्स के आदेशो का पालन किया, क्योंकि उनकी औद्योगिक मशीनों के स्पेयर पार्ट्स ब्रिटेन से आते थे। यदि ब्रिटिश स्पेयर पार्ट्स भेजने बंद कर देते तो उनकी फेक्ट्रियां कुछ ही हफ्तों में बंद हो जाती।
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श्री वल्लभ भाई पटेल जवाहर लाल गाज़ी के मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर थे , किन्तु वे राष्ट्रपिता सुभाष चन्द्र बोस के समकक्ष नहीं थे। यदि इस परिस्थिति का सामना राष्ट्रपिता बोस से होता तो वे महादुरात्मा गांधी, मीडियाकर्मी, ब्रिटिश एवं भारतीय धनिकों को निश्चित रूप से खारिज करते करते हुए कोंग्रेस कार्यकर्ताओ की सहायता से आगे बढ़ जाते। लेकिन सरदार पटेल का ऐसा कोई इतिहास नहीं रहा जब उन्होंने ब्रिटिश एवं भारतीय धनिकों के खिलाफ किसी निर्णायक बिंदु पर लोहा लिया हो।
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तो ब्रिटिश 1946 में भी इतने ताकतवर थे। तब भी जब वे भारत को "आजादी देने" का निर्णय ले चुके थे और भारत का अपना खुद का प्रधानमंत्री बनना तय हो चुका था। इसके बावजूद न सिर्फ उन्होंने यह तय किया कि भारत का प्रधानमंत्री कौन होगा, बल्कि वे दौड़ में शामिल दुसरे नंबर के दावेदार को भी खामोश रहने पर विवश कर सके, और साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि इस पूरी तिकड़म के बारे में जनता को जानकारी न हो !!! यह भारत की सबसे बड़ी कमजोरी थी।
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ब्रिटिशर्स की इसीलिए चली क्योंकि तब भारत के धनिक वर्ग की इकाइयों में स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति ब्रिटिश द्वारा की जाती थी। लेकिन यह कमजोरी भारत के धनिक वर्ग की थी, भारत की नहीं। क्या भारत ने आजादी के बाद विदेश से आयात होने वाले स्पेयर पार्ट्स पर प्रतिबन्ध लगाया ताकि भारत के इंजीनियर्स इन्हें भारत में बनाने की काबिलियत जुटा सके ? लेकिन , इस प्रक्रिया में नए एवं वास्तविक कौशल वाले इंजीनियर्स भारत की अर्थव्यवस्था पर अपनी पकड बना लेते और भारतीय धनिक वर्ग अपने विशिष्ट होने का रुतबा खो देता। आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक - तीनो तौर से।
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यही वजह थी कि, 1949 में सत्ता पर नियन्त्रण हासिल करते ही अपने "पहले" आदेश में चेयरमेन माओ ने यूरोपियन मशीनों को नष्ट करने का फैसला जारी किया था !!! न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। यूरोप पर अपनी निर्भरता ख़त्म करने के लिए चीन ने अपनी यूरोपीय मशीनों को आग के हवाले कर दिया। और इस फैसले ने चीन को अपनी खुद की मशीने बनाने के लिए बाध्य किया। चीन में निर्माण इकाइयों की कार्य क्षमता बढ़ने लगी एवं इंजीनियरिंग का व्यावहारिक विकास शुरू हुआ। हालांकि उन्हें अपने प्राथमिक दौर में उत्पादन की गुणवत्ता एवं क्षमता को लेकर काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनकी मशीने यूरोपीय मशीनों की तुलना में काफी पिछड़ी हुयी थी।
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तो श्री वल्लभ भाई पटेल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नहीं बन सके, क्योंकि भारत के मंत्रियो / धनिक वर्ग की रुचि भारत की यूरोपीय मशीनों पर निर्भरता ख़त्म करने में बिलकुल भी नहीं थी, वे सिर्फ अपने निहित स्वार्थ देख रहे थे। और तब के कार्यकर्ता भी इस तथ्य को समझने को नाकाम रहे कि ब्रिटिश किस तरह से अपनी मशीनों पर भारत की निर्भरता के चलते भारत के शीर्ष राजनेताओ को नियंत्रित कर रहे है।
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और आज मोदी साहेब FDI का समर्थन करके इसी स्थिति को और भी बदतर से बदतरीन बनाने में जुटे हुए है !!!
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उस समय कार्यकर्ताओ को जवाहर लाल गाज़ी सरदार पटेल से कमतर नजर आ रहे थे क्योंकि तब पेड मीडिया मौजूदा दौर की अपेक्षा उतना प्रभावी एवं ताकतवर नहीं था। सिर्फ 2% नागरिक ही तब समाचार पत्र पढ़ते थे और टीवी तो था ही नहीं। यदि आज के हालात को उस परिस्थति पर लागू करे तो निश्चित ही ब्रिटिश अपने टीवी चेनल्स एवं समाचार पत्रों के माध्यम से भारतीय जन मानस पर यह धारणा आरोपित करने में कामयाब रहते की जवाहर लाल गाज़ी श्री वल्लभ भाई पटेल से बेहतर प्रधानमन्त्री साबित होंगे। और इसी तरह आज के दौर में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक अपने मीडिया का प्रयोग करते हुए भारतीय नागरिको को यह विश्वास दिलाने में कामयाब है कि मोदी साहेब शेर प्रधानमंत्री है।
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दुसरे शब्दों में, जब मोदी साहेब सरदार पटेल को दरकिनार किये जाने का हवाला देते है तो जानबूझकर घटनाक्रम के महत्त्वपूर्ण हिस्सों को छुपा लेते है। मोदी साहेब इस बात का उल्लेख करने से इनकार कर देते है कि तब ऐसा क्यों हुआ था। तब जवाहर लाल गाज़ी प्रधानमंत्री नहीं बने थे, और न ही कोंग्रेस उनके धन पर निर्भर थी। तो ऐसी स्थिति में यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है कि - किस वजह से मह्दुरात्मा गाँधी ने जवाहर लाल गाजी का समर्थन किया ? लेकिन मोदी साहेब इस प्रश्न की जानबूझकर अवहेलना कर देते है। और मोदी साहेब इस तथ्य को भी छुपा ले जाते है कि तब संघ अपने खर्चे के लिए भारतीय राजाओं एवं भूमिपतियों पर निर्भर था और संघ के प्रायोजक राजा / भूमिपति संघ के नेतृत्व को वही आदेश दे रहे थे जो आदेश उन्हें ब्रिटिश से मिल रहे थे। और मोदी साहेब इस घटनाक्रम के इस सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य पर भी चुप रहते है कि , ब्रिटिश मशीनों पर निर्भरता ने तब भारत को एक कमजोर प्रधानमंत्री दिया। और आज मोदी साहेब एफडीआई का समर्थन करके इस निर्भरता को कई गुना बढ़ा रहे है। और यह निर्भरता वे बेहद तेजी से बढ़ा रहे है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Feb 15 2018 20:03:37 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

१. केंद्रीय मंत्री श्री रवि शंकर प्रसाद ने स्वीकार किया है कि मोदी साहेब के साथ फोटो में नजर आ रहा व्यक्ति नीरव मोदी है। प्रसाद का स्पष्टीकरण है कि, नीरव मोदी दावोस अपने खर्चे पर गए थे सरकारी खर्चे पर नहीं !!!
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२. घोटाला कांग्रेस के शासनकाल में शुरू हुआ और तब चिदंबरम से लेकर सोनिया एवं मनमोहन ने नीरव से पैसा खाया था। लेकिन देश छोड़ने की एवज में नीरव ने मोदी साहेब को घूस दी। घूस लेने के बाद ही मोदी साहेब ने नीरव मोदी को देश से निकालने का इंतजाम किया।
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३. मोदी-सोनिया-केजरीवाल एवं इनके सभी अंधभगत अब पंजाब नेशनल बैंक के दोषी अधिकारियो का सार्वजनिक नार्को टेस्ट लेने का विरोध कर रहे है। उन्हें भय है कि नार्को टेस्ट होने से जनता के सामने यह बात खुल जायेगी कि इन 11 हजार करोड़ में से नीरव मोदी के हाथ कितना लगा है और कितना पैसा सोनिया-मोदी-केजरीवाल की जेब में गया है।
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४. यह बात दिन प्रति दिन साफ होती जा रही है कि मोदी साहेब भी उतने ही भ्रष्ट है जितनी सोनिया जी है। "न खाऊंगा और न खाने दूंगा" जैसे डायलॉग वे सिर्फ अपने अंधभगतो का नशा गाढ़ा करने के लिए दोहराते रहते है।
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सोनिया-मोदी-केजरीवाल की नीति एक जैसी है -- पहले बैंको में जमकर घोटाले करके पैसा इकट्ठा करो जिससे बैंक घाटा बनाने लगे। और फिर घाटे का हवाला देकर ये बैंक घूस खाकर विदेशियों को बेच दो।
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समाधान - ज्यूरी सिस्टम, नार्को टेस्ट इन पब्लिक एवं राइट टू रिकॉल प्रक्रियाएं है। किन्तु सोनिया-मोदी-केजरीवाल समेत कांग्रेस-संघ-आपा के सभी कार्यकर्ता इन कानूनों का विरोध कर रहे है। बीजेपी के शीर्ष नेता मोहन भागवत इन कानूनों के विशेष विरोधी है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Feb 18 2018 09:56:28 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

नीरव मोदी ने जो घपला किया है उसमे से ज्यादातर हिस्से का गबन वर्ष 2017-18 में किया गया था -- सीबीआई। सीबीआई का कहना है कि लगभग 5000 करोड़ के लेटर ऑफ़ अंडरटेकिंग मोदी साहेब के सत्ता में आने बाद जारी किये गए। मतलब कोंग्रेस ने जो गड्ढे खोदे थे मोदी साहेब उन्हें बड़े मनोयोग से और भी गहरा कर रहे है।
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<http://indianexpress.com/article/india/pnb-11400-crore-scam-most-of-nirav-modis-fraud-lous-issued-or-renewed-in-2017-18-says-cbi-5067109/>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Feb 18 2018 10:22:20 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

पिछले 4 वर्षो में बैंको द्वारा 60,000 करोड़ के 8,000 फौजदारी मुकदमे दर्ज किये गए। इनमे कितने मामलो में आरोपियों को सजा हुयी है ? लगभग शून्य !!
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मनमोहन जी के जमाने में सौदा सीधे तरीके से तय किया जाता था -- बैंक चेयरमेन, वित्त सचिव, वित्त मंत्री, प्रधानमंत्री, सुपर प्रधानमंत्री ( सोनिया जी ) एवं जज को घूस दो , और बैंक से मोटा पैसा उठाकर खा जाओ। और इसमें से कुछ खुरचन कोंग्रेस के कार्यकर्ताओ को भी देनी होती थी।
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इस समीकरण में से अब सुपर प्रधानमंत्री नदारद है। शेष गठजोड़ वैसे ही काम कर रहा है जैसे कि कोंग्रेस के जमाने में काम करता था। इसमें से जो हफ्ता पहले कोंग्रेस के कार्यकर्ता वसूलते थे उस पर अब संघ के कार्यकर्ताओ ने कब्जा कर लिया है। एक बदलाव और यह हुआ है कि मोदी साहेब इन घोटालो से जो पैसा खींच रहे है उसमे से एक बड़ा टुकड़ा वे पेड अर्नब गोस्वामी, पेड सरदेसाई , पेड सुधीर तिहाडी एवं पेड रजत शर्मा के सामने डाल देते है। और टुकड़े मिल जाने के बाद वे मोदी साहेब पर घूसखोरी का आरोप नहीं लगाते।
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एक और तब्दीली यह आई है कि, कोंग्रेस के कार्यकर्ता बेधड़क घूस खाते थे और सभी आरोपो को चुपचाप पचा जाते थे। पर संघ के कार्यकर्ताओं ने इसमें एक नया पैंतरा और जोड़ा -- वे अपना हफ्ता वसूलने से पहले एवं बाद में भी नियमित रूप से दिन में दो बार "भारत माता की जय" एवं "वन्दे मातरम" के पुकारे लगाते है। कोंग्रेस के कार्यकर्ताओ ये कभी नहीं सूझा।
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तो अब हमारे पास जो प्रधानमंत्री है उनकी छवि ज्यादा बेहतर है।
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समाधान - जो कार्यकर्ता भारत की व्यवस्था में सुधार लाना चाहते है उन्हें सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि सोनिया-मोदी-केजरीवाल के भरोसे व्यवस्था सिर्फ बदतर ही हो सकती है बेहतर नहीं। कार्यकर्ताओ को उन कानूनों को लागू करवाने के लिए प्रयास करने चाहिए जिससे वास्तविक रूप से व्यवस्था में सुधार आये। कौनसे क़ानून ? हमारा प्रस्ताव है कि राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम एवं सार्वजनिक नारको टेस्ट के क़ानून लाकर व्यवस्था को कुछ ही महीनो में पूरी तरह से दुरुस्त किया जा सकता है। ये क़ानून यदि आ जाते है तो सोनिया-मोदी-केजरीवाल जैसे नेता भी रातों रात तमीजदार हो जायेंगे।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Feb 18 2018 10:46:42 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

रूस ने एंड्रॉयड को अनौपचारिक रूप से बेन कर दिया है और स्मार्टफोन्स के लिए स्वदेशी ऑपरेटिंग सिस्टम को बढ़ावा दे रहा है।
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जो भी देश अपने आप को किसी अन्य देश पर पूरी तरह से निर्भर नहीं कर देना चाहता वह ऐसा ही करेगा। वह गूगल, एंड्रॉयड, फेसबुक, व्हाट्स एप एवं जीमेल को बेन कर देगा और इनके विकल्प के रूप में स्वदेशी प्लेटफॉर्म विकसित करेगा।
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लेकिन यहाँ भारत में हमारे पास सोनिया-मोदी-केजरीवाल जैसे नगीने है जो पूरे देश को फेसबुक, एंड्रॉयड एवं गूगल की गिरफ्त में दे देना चाहते है !!
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दुर्भाग्य से ये ही लोग भारत के शीर्ष नीति नियंता है। और भी बड़ी त्रासदी यह है कि इनके अंध भगत 24*7 घंटे इस मुद्दे पर भी इनका समर्थन करते है।
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न्यूज लिंक -- <https://www.forbes.com/sites/ewanspence/2016/11/29/jolla-sailfish-os-russia-certification/#e3637f12a988>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Feb 18 2018 12:20:49 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

कल्कि पुरुष मोदी साहेब और अरविन्द गांधी "ऐसे" कपड़े क्यों पहनते है ?
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वे ऐसी वेशभूषा का चयन "अविश्वास का निलंबन" सिध्दांत को सक्रीय करने की नियत से करते है। कृपया "suspension of disbelief" पर गूगल करे एवं इसका विकी पेज भी देखें।
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स्टंट फिल्मो में पटकथा लेखक एवं निर्देशक जो दृश्य रचते है उनमें घटनाओ को काफी तेज एवं रहस्यमयी तरीके से घटते दिखाया जाता है, ताकि दर्शक का ध्यान दृश्यों एवं घटनाओ के इस भम्भड में गुम हो जाए और उसका दिमाग यह आकलन नहीं कर पाए कि अमुक दृश्य या घटनाक्रम कितना व्यवहारिक एवं युक्तियुक्त था।
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और परिधानो का चयन दर्शक के दृश्य में डूब जाने और वास्तविकता से कट जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दर्शक का ध्यान कुछ क्षणों के लिए वस्त्रो का आकलन करने में लग जाता है और इससे दर्शक के दिमाग को उपलब्ध उस समय में कमी आती है जिसका उपयोग दिमाग अभिनेता द्वारा अदा किये गए संवाद या हरकत की व्यावहारिकता एवं युक्ति संगतता का आकलन करने में करता है।
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तो ये दोनों महानुभाव किसी कम्पनी / बैंक आदि के सामान्य अधिकारियों द्वारा आम तौर पर पहने जाने वाले औपचारिक वस्त्र पहन सकते है, किन्तु अपनी अत्यियुक्त एवं छद्म छवि पर निर्भरता के चलते वे इस छवि को टिकाये रखने के लिए बाध्य है। अत: वे अपने वस्त्रो का चयन बेहद सतर्कता से करते है।
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भारतीय राजनीती में इस फैंसी ड्रेस कम्पटीशन के आदि प्रणेता महादुरात्मा गांधी थे। वे जानते थे कि अहिंसा के नाम पर जो उपदेश वे लोगो को पिलाना चाह रहे है यदि वह सामान्य वस्त्र पहनकर दिया गया तो वह लोगो के हाजमे के खिलाफ पड़ेगा, और यहाँ तक कि पिटने की नौबत भी आ सकती है। अस्तु उन्होंने फ़क़ीरनुमा वस्त्रो का चयन किया, ताकि उनके डायलॉग सुनने वाले लोग उनके भक्त हो कर उनके उपदेशो का व्यवहारिक आकलन करने का प्रयास न करे।
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गुजराती तब इस्लामिस्ट अपराधियों से जूझ रहे थे और गोधरा कांड हो जाने से लोग ऐसे व्यक्ति को हाथों हाथ लेने को तैयार थे जिसकी छवि सुपरमैन नुमा हो। इसी छवि को पुष्ट करने के लिए कल्कि पुरुष मोदी साहेब ने भड़कीले परिधानों का इस्तेमाल करना शुरू किया।
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अरविन्द गांधी अपने आप को "स्थापित व्यवस्था के खिलाफ लड़ाके" के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे , और चूंकि मौजूदा व्यवस्था भ्रष्ट है और वे भ्रष्टाचार के खिलाफ है अत: वे जानबूझकर ऐसे महंगे पेण्ट-शर्ट खरीद कर पहनने लगे जो दिखने में बहुत ही सस्ते नजर आये। ( बहुत ही सस्ते नजर आने वाले कपडे चुनने के लिए आपको बेहद महंगे डिजायनर की जरुरत होती है, और इसके ऊँचे दाम चुकाने होते है !!)
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कुल मिलाकर वे सामान्य कामकाजी अधिकारियो या उद्योगपतियों की तरह कपडे नहीं पहनते। बल्कि वे अपने श्रोताओ एवं दर्शको का ध्यान भंग करने और उन्हें "अविश्वास के निलंबन" की चपेट में लेने के लिए अपने वस्त्रो का चयन बहुत सावधानी से करते है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Feb 18 2018 18:32:48 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राईट टू रिकॉल कानूनों के प्रचार में इच्छुक नवीन कार्यकर्ताओं के लिए :
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राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम क़ानून लागू करने के लिए कार्यकर्ता जो कदम उठा सकते है उसकी कई श्रेणियां है। उनकी उपयोगिता एवं प्रभाव बढ़ने के अनुसार उन्हें यहाँ घटते हुए क्रम में दिया गया है। समय एवं संसाधनों की अनुकूलता के अनुसार कार्यकर्ता निम्न गतिविधियां कर सकते है।
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ऑफलाइन गतिविधियाँ ;
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१) इन कानूनों को लागू करवाने एवं इनका प्रचार करने के लिए एक राजनैतिक पार्टी का गठन करें।
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२) यदि आपके पास पार्टी बनाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं है तो निर्दलीय चुनाव लड़े या किसी ऐसी पार्टी से चुनाव लड़े जो इन कानूनों के प्रति प्रतिबद्ध है।
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३) कार्यकर्ताओ से अंशदान इकट्ठा करके इन कानूनों के प्रचार के बारे में समाचार पत्रों में विज्ञापन दें।
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४) पेम्पलेट छपवाकर अपने शहर / कस्बे में वितरित करें।
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५) बैनर बनाकर अपने विधानसभा क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर लगाए।
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६) स्थानीय स्तर पर इन कानूनों की जानकारी देने के लिए छोटी छोटी नागरिक सभाएं / गार्डन मीटिंग्स आदि आयोजित करें।
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७) अन्य इस प्रकार की ऐसी कोई भी गतिविधि जो इन कानूनों का प्रचार करें।
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ऑनलाइन गतिविधियाँ ;
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१) अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर "क़ानून ड्राफ्ट जिनका मैं समर्थन करता हूँ" शीर्षक से एक एल्बम बनाएं एवं इस एल्बम में उन कानूनों के ड्राफ्ट रखें जिनका आप समर्थन करते है।
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२) अपने फेसबुक कवर पेज के डिसक्रिप्शन में अमुक एल्बम का लिंक रखें, तथा कवर पिक्चर पर स्पष्ट शब्दों में यह लिखें कि मैं जिन कानूनों का समर्थन करता हूँ उनके ड्राफ्ट देखने के लिए इस पिक्चर को क्लिक करके इसका डिस्क्रिप्शन देखें।
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३) जिन कानूनों का आप समर्थन करते है उन्हें mygov पर अपलोड करें।
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४) @pmoindia पर ट्विट करके इन कानूनों की मांग करें।
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जैसा कि सूची में दर्शाया गया है पार्टी बनाना एवं चुनाव लड़ना सबसे महत्त्वपूर्ण एवं सबसे उपयोगी गतिविधि है लेकिन इन कानूनों की मांग का ट्विट करना सबसे अपरिहार्य है। किया गया ट्विट यह दर्शाता है कि आप इन कानूनों के समर्थक है , जबकि शेष गतिविधियाँ आपको समर्थक से आगे बढ़ाकर इनका प्रचारक बना देती है। तो यदि आप चाहते है कि ये क़ानून देश में लागू हो तो "कम से कम" ट्विट तो अवश्य करें। जैसे जैसे कार्यकर्ता अन्य गतिविधियों को बढ़ाएंगे वैसे वैसे ट्विट करने वाले नागरिको की संख्या में इजाफा होता जाएगा।
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कार्यकर्ता ऊपर दी गई गतिविधियों में से कोई एक गतिविधि कर सकते है या एक से अधिक कर सकते है , क्रमिक रूप से कर सकते है या एक साथ एक से अधिक गतिविधियों में भाग ले सकते है। जिस कार्यकर्ता के पास जैसे संसाधन एवं समय की उपलब्धता हो वह वैसा कर सकता है। किसी गतिविधि के लिए यदि आपको प्रचार सामग्री का फोर्मेट या अन्य सहयोग चाहिए तो किसी भी रिकालिस्ट से आप सम्पर्क कर सकते है।
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पुनश्च - राईट टू रिकॉल ग्रुप एक अपंजीकृत एवं अनौपचारिक संगठन है, अत: इस संगठन के पास सदस्य जोड़ने की कोई प्रक्रिया नहीं है। जैसे ही आप ऊपर दी गयी किसी / किन्ही गतिविधियो को आगे बढाते है वैसे ही आप राईट टू रिकॉल ग्रुप से स्वत: ही जुड़ जाते है।
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"वेल्थ टेक्स पार्टी"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Feb 18 2018 19:06:29 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

एनपीए ( बैंको का डूब खाता ) क्यों लगातार बढ़ रहा है , और क्यों यह निरंतर बढ़ता रहेगा ?
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भारत / चीन एवं भारत / अमेरिका के बीच स्थित उत्पादन की गुणवत्ता का अनुपात दिन प्रति दिन बिगड़ रहा है। इससे भारतीय उत्पादकों की बिक्री देश में और देश से बाहर भी लगातार सिकुड़ रही है। इससे आने वाले समय में और भी निर्माण इकाइयां बंद होगी जिससे निकट भविष्य में एनपीए में और भी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी।
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समाधान ?
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हम सिर्फ भविष्य में होने वाले एनपीए में कमी ला सकते है। जो लोन दिए जा चुके है उन मामलो में हम घूस देने एवं लेने वाले आरोपियों का सार्वजनिक नार्को टेस्ट लेकर उनकी सम्पत्ति कुर्क करके कुछ वसूली कर सकते है। लेकिन इससे इतनी बड़ी रकम की भरपाई नहीं होगी। तो उपाय यही है कि नए नोट छापकर घाटा पूरा किया जाए।
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स्थायी समाधान के लिए हमारा प्रस्ताव narrow banking है। अधिक विवरण के लिए कृपया " narrow banking" पर गूगल करें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Feb 21 2018 17:29:37 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

स्वामी रामदेव पर बने वृतचित्र से उपजे विवाद का समाधान ;
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अपनी जीवनी पर बने वृतचित्र में स्वामी रामदेव ने "जानबूझकर" हिन्दुओ के बीच जातिगत वैमनस्य को बढाने के लिए यह "झूठे तथ्य" गढ़े कि बचपन में उनका शोषण ब्राह्मणों द्वारा किया गया था। पतंजली का कारोबार जैसे जैसे बढेगा वे और भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं मिशनरीज पर निर्भर होते चले जायेंगे अत: इस तरह की घटिया हरकते वे आगे भी करते रहेंगे। यदि वे हिन्दू-विरोधी हरकतें करने से इनकार करते है तो वे बाजार से बाहर हो जायेंगे।
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"खुद के बारे में व्यक्ति यदि झूठ गढ़ता है तो उसे रोका नहीं जा सकता। इसके अलावा झूठ बोलने की आजादी के अधिकार की रक्षा करना भी जरुरी है , वरना "स्थापित झूठो" को सत्य से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकेगा।
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समाधान - स्वामी रामदेव पर मुकदमा कायम करके इस मामले का निपटान 500 नागरिको की ज्यूरी द्वारा किया जाना चाहिए। यदि ज्यूरी बहुमत से तय करे तो स्वामी रामदेव को सोडियम पेंथानोल का इंजेक्शन लगाकर उनका "सार्वजनिक नारको टेस्ट" लिया जाना चाहिए। यदि मुझे ज्यूरी में आने का अवसर मिलता है तो तथ्यों के झूठा साबित होने और जानबूझकर जातिगत वैमनस्य बढाने का आरोप साबित होने पर मैं स्वामी रामदेव को 15 दिवस का साधारण कारावास और उनकी संपत्ति के 1% के बराबर आर्थिक जुर्माना लगाने के पक्ष में वोट करूँगा। साथ ही इस वृतचित्र को प्रतिबंधित किया जाएगा। मेरे विचार में आपत्तिजनक दृश्यों को हटाकर इसे प्रसारण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, बल्कि पूरे वृतचित्र को ही प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। बाद में यदि स्वामी रामदेव चाहे तो अपनी नयी जीवनी पर नयी पटकथा लिखवाकर इसे फिर से शूट कर सकते है।
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"वेल्थ टेक्स पार्टी"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Feb 22 2018 21:46:51 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भारत , श्रीलंका एवं बांग्लादेश के मुकाबले पाकिस्तान ज्यादा बेहतर तेज गेंदबाज क्यों पैदा कर पाता है ?
अमेरिका में इंजीनियरिंग भारत के मुकाबले ज्यादा उन्नत क्यों है ?
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सन्दर्भ ; भारत ने अब तक सिर्फ बल्लेबाज एवं स्पिनर ही पैदा किये है, जबकि हम अब तक एक अदद तेज गेंदबाज़ भी देने में नाकाम रहे है !! अमेंरीका कम्प्यूटर से लेकर लड़ाकू जहाज तक खुद से बनाता है जबकि हम एक बेहतर स्मार्टफोन बनाने के लिए भी जूझ रहे है !! क्यों ?
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तेज गेंदबाजी की मारक क्षमता गति एवं स्विंग पर निर्भर है। गेंद को स्विंग कराने के लिए गेंद की सीम का एक हिस्सा चमकीला एवं दूसरा हिस्सा खुरदरा होना जरुरी है। इसीलिए खेल के दौरान खिलाड़ी गेंद के एक हिस्से को चमकीला एवं प्लेन बनाये रखने के लिए पसीना लगाकर उसे लगातार घिसते रहते है। दूसरे हिस्से को नहीं घिसने से वह खुरदरा हो जाता है और गेंदबाज को बेहतर स्विंग मिलता है। इसीलिए क्रिकेट लेदर बॉल से खेला जाता है। लेकिन लेदर गेंद महंगी ( लगभग 1000 रू ) होने से इसका नियमित रूप से इस्तेमाल करना भारत एवं पाकिस्तान दोनों ही देशो के सामान्य वर्ग के बच्चों / किशोरों के बस के बाहर है। दूसरी समस्या मैदानो को लेकर है। मैदान में घास होने से गेंद की उम्र बढ़ जाती है , अन्यथा घास विहीन मैदान में एक मैच के दौरान ही गेंद के चीथड़े हो जाते है। निदान - दोनों देशो के बच्चे / किशोर अपने शुरूआती दौर में अन्य किस्म की गेंदों का इस्तेमाल करते है।
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लेदर गेंद के महंगा होने से भारत एवं पकिस्तान में प्राथमिक स्तर पर ज्यादातर क्रिकेट हॉकी / टेनिस की गेंद से खेला जाता है। लेकिन कुछ 90 के दशक में पाकिस्तान में गली-मुहल्लों-मैदानों में बच्चो द्वारा खेले जाने वाले खेल में एक नए तरीके का चलन आया। वे टेनिस गेंद के आधे हिस्से पर टेप लगाकर खेलने लगे !! टेनिस गेंद पर रोएं होते है जिससे वह खुरदरी होती है। आधे हिस्से पर चिकना टेप लगाने से उसका आधा हिस्सा चिकना एवं आधा खुरदरा हो जाता है, जिससे टेनिस गेंद लेदर गेंद की तरह व्यवहार करने लगती है। गेंद को धीरे फेंकने से वह स्विंग नहीं होती, स्विंग कराने के लिए उसे तेज फेंकना होता है। लेकिन हॉकी या टेनिस की सामान्य गेंद को कितना भी तेज फेंकने से वह स्विंग नहीं हो सकती, अत: बल्लेबाज सीधी गेंद को पीट देता है।
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किन्तु टेप की हुयी टेनिस गेंद को यदि तेज फेंका जाए तो वह स्विंग होती है , और बल्लेबाज के लिए खेलना मुश्किल हो जाता है। तो टेप की हुयी गेंद में स्विंग का अवसर होने के कारण वहां के बच्चे इसे स्विंग कराने की कोशिश करते है। और इस प्रक्रिया में उन्हें गेंद को तेज फेंकना होता है और इस तरह फेंकना होता है , कि गेंद की स्थिति ऐसी रहे कि हवा से होने वाले घर्षण से लीनियर इफेक्ट पैदा हो। तो वहाँ के बच्चे यह प्रयास लगातार करते रहते है और इस प्रयास में ही उन्हें गति एवं स्विंग का अभ्यास हो जाता है , और जब लेदर गेंद उनके हाथ में आती है तो वो इसे आसानी फेंक पाते है। गेंदबाजी में स्विंग का यह अवसर एवं तेज गेंद फेंकने का यह अभ्यास कुछ किशोरों / बच्चो को तेज गेंदबाज बनने की और धकेल देता है और उनके पास तेज गेंदबाजी के लिए पर्याप्त मानव संसाधन आ जाता है।
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भारत में इसके उलट होता है। भारत में गली-मोहल्लो-मैदानों में जो प्राथमिक स्तर पर जो क्रिकेट खेला जाता है , उसमे बच्चे "सिर्फ बैटिंग" करने की नियत से आते है। गेंदबाज गेंद फेंकने की सिर्फ रस्म पूरी करता है, क्योंकि वह गेंद फेंकने नहीं बल्कि बेटिंग करने आया है। तो जब किसी मैदान में 12 खिलाड़ी क्रिकेट खेल रहे होते है वे सभी बेटिंग करने के लिए आये हुए होते है। और इसीलिए बेटिंग कराने के लिए जब उन्हें गेंद फेंकनी होती है तो वे दौड़ नहीं लगाते बल्कि स्पिन गेंद फेंकते है। तो जो बल्लेबाज नहीं बन पाते वे स्पिनर बन जाते है। और फिर जो कुछ बचे रहे तो वे मध्यम तेज गति के गेंदबाज बनने के लिए विवश हो जाते है। इस वजह से भारत ने हमेशा सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज एवं स्पिनर पैदा किये है, तेज गेंदबाज नहीं। और फिर टीम में ऐसे दो खिलाड़ियों को शामिल किया जाता है जिनका कद औसत से अधिक हो, तथा वे तेज दौड़ कर कम से कम पिच पर गेंद फेंक सके !! क्योंकि नयी गेंद टर्न नहीं होती , अत: गेंद को पुरानी करने के लिए तेज गेंदबाजों की जरूरत होती है।
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इस तरह भारत में क्रिकेटरों के उपलब्ध रॉ मेटेरियल ( मानविक संसाधन ) में से गेंदबाज निकलने के अवसर शुरू में ही सिकुड़ जाते है। क्योंकि रॉ मेटेरियल का अधिकांश बल्लेबाजी एवं स्पिन गेंदबाजी खींच लेती है, जबकि पाकिस्तान के रॉ मेटेरियल में से एक बड़ा हिस्सा तेज गेंदबाजी की और मुड़ जाता है।
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भारतीय क्रिकेट जगत में यह प्रश्न हमेशा से तैरता रहा है कि -- भारत में तेज गेंदबाज क्यों नहीं होते। यह विवरण इसका माकूल जवाब देता है कि, आखिर क्यों भारत पिछले 50 वर्षो में अंतराष्ट्रीय स्तर का एक भी तेज गेंदबाज पैदा नहीं कर सका , जबकि उन्ही परिस्थितियों के बावजूद पाकिस्तान ने आला दर्जे के तेज गेंदबाज दिए है।
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तो जब हम किसी क्षेत्र में अंतराष्ट्रीय स्तर पर जाना चाहते है तो हमें पहले उसकी बुनियाद डालनी पड़ती है। ऐसा कोई स्विच नहीं है जिससे किसी क्षेत्र में हम चुटकी बजाकर विश्वस्तरीय स्थिति हासिल कर सके। चाहे वह क्रिकेट ही क्यों न हो। पूरे देश के लाखों खिलाड़ी गली-मुहल्लों-मैदानों में जो क्रिकेट खेलते है, वहीं से गुणवत्ता प्राप्त करने की दिशा तय होती है। यदि स्थिति तकनिकी विकास को लेकर है, जिसका विवरण अगले कॉलम में दिया गया है।
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भारत अमेरिका के मुकाबले तकनिकी उत्पादन में इतना पिछड़ा हुआ क्यों है ?
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तकनिकी उत्पादन के लिए हमें भारत में ढेर सारी छोटी छोटी उत्पादन इकाइयाँ चाहिए। ढेर सारी छोटी इकाईया क्यों ? कुछ बड़ी इकाईया क्यों नहीं ? क्योंकि कोई भी विशिष्ट उत्पाद कई प्रकार के पार्ट्स को मिलाकर बनाया जाता है। सभी पार्ट्स यदि उच्च गुणवत्ता वाले होंगे तो ही उत्पाद बेहतर बनेगा। एक भी पुर्जा कमतर होने से उत्पाद अपनी गुणवत्ता खो देगा। उदाहरण के लिए एक मोबाईल फोन डिस्प्ले स्क्रीन, बेटरी, माइक्रोफोन, सेमी कंडकटर चिप, स्पीकर आदि जैसे कई पुरजो को जोड़कर बनाया जाता है। डिस्प्ले स्क्रीन बनाने की सैंकड़ो कम्पनियां हो सकती है। उनमे आपसी प्रतिस्पर्धा होने से कोई दो-चार कम्पनी सबसे बेहतर डिस्प्ले बना पायेगी। इसी तरह से सभी पुरजो के साथ होता है। मोबाइल बनाने वाली कम्पनी इन कम्पनियो से ये पुर्जे खरीदती है और इन्हें फिट करके एक डिजाइन तैयार करती है। हवाई जहाज से लेकर कारो तक और कंप्यूटर तक इसी तरह प्रोडक्ट तैयार किया जाता है। दुनिया में ऐसी कोई कम्पनी नहीं जो अपने जटिल प्रोडक्ट के सभी पुर्जो का उत्पादन स्वयं करती हो। यदि वह ऐसा करेगी तो उसकी गुणवत्ता गिर जायेगी।
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तो देश में ढेर सारी इकाइयां होने के लिए हमें ढेर सारे इंजीनियर्स चाहिए। ढेर सारे इंजीनियर्स होने के लिए हमें ऐसे छात्र चाहिए जो विज्ञान-गणित विषय में माहिर हो। अच्छे तकनिकी उत्पाद बनाने के लिए हमें जो श्रुंखला चाहिए वह कुछ ऐसी है -- बच्चे ( मानविक संसाधन ) ---> प्राथमिक स्तर पर गणित-विज्ञान की बेहतर शिक्षा ---> छोटी इकाइयों के लिए सस्ती जमीन की उपलब्धता ---> उत्पादन को प्रोत्साहित करने वाली कर प्रणाली ---> लागत घटाने एवं छोटी इकाइयों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनाये रखने के लिए भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन ---> औद्योगिक मामलो को निपटाने के लिए त्वरित, निष्पक्ष एवं ईमानदार अदालतें। यदि देश का मानविक संसाधन इस प्रक्रिया से गुजरेगा तो अंतिम रूप में हमारे पास लाखों कार्यशील निर्माण इकाइयाँ एवं इंजीनियर्स उपलब्ध होंगे जो कि जटिल प्रौद्योगिकीय उत्पादों के निर्माण के लिए वांछित जमीन तैयार करेंगे।
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भारत में प्रौद्योगिकीय निर्माण में सबसे बड़ी बाधा मिशनरीज एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियां है, और वे भारत के हुक्मरानो के माध्यम से इंजीनियरिंग कौशल के विकास में अड़ंगे लगाते है। वे ऐसा कैसे करते है ?
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१) इंजीनियरिंग कौशल का प्राथमिक चरण मानविक संसाधन ( बच्चे / किशोर ) है। तो वे यह सुनिश्चित करते है कि इनमे से ज्यादातर बच्चे मनोरंजन क्षेत्र की चपेट में आकर गणित-विज्ञान की शिक्षा से दूर हो जाए।

क्रिकेट का असीमित प्रसारण एवं ख़बरों में इसे मुख्य रूप से कवरेज देना इसी निति का हिस्सा है। वे चाहते है कि बच्चे क्रिकेट देखें , क्रिकेट खेले, इनके खिलाड़ियों को अपना आदर्श बनाए एवं सबसे बढ़कर वे अपना "कैरियर" क्रिकेट में बनाने की सोचें। कई प्रतिभाशाली बच्चे इस प्रचार के कारण क्रिकेट की चपेट में आ जाते है और पढाई में दिए जाने वाला अपना कीमती समय मैदानों की धूल फांकने में बिता देते है। यूँ समझे कि दो प्रतिभाशाली छात्र सचिन एवं कलाम थे। कलाम ने विज्ञान-गणित पढ़कर देश की उत्पादकता बढाई जबकि सचिन को बल्ला थमा दिया गया। नतीजतन सचिन की प्रतिभा कलाकारी में बदल गयी। वे दो दशक तक जनता का "मनोरंजन" करते रहे ,और देश की एक समूची पीढ़ी को मैदानों में जाकर पसीना बहाने का मसाला पकड़ा गए। आजकल यह दायित्व विराट कोहली निभा रहे है। इसीलिए सचिन जैसे व्यक्तियों को बेहिसाब मीडिया कवरेज के साथ ही भारत रत्न भी दिया जाता है। इससे वे यह स्थापित करते है कि आप करतब दिखाकर भी भारत रत्न के हकदार हो सकते है। बच्चो पर इसका प्रर्याप्त प्रभाव पड़ता है और एक बड़ा तबका खेलकूद खासकर क्रिकेट की भेंट चढ़ जाता है। इस तरह इंजीनियरिंग कौशल के लिए उपलब्ध मानविक संशाधन में कमी आ जाती है।
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गीत , संगीत , नृत्य दूसरा सीगा है, जहाँ वे बच्चो को खींचते है। टीवी पर बच्चो के गाने-बजाने एवं नाचने वाले कार्यक्रमो का निरंतर प्रसारण किया जाता है। बच्चे इन कार्यक्रमों में आकर करतब दिखाते है, तालियाँ बटोरते है एवं पुरुस्कार ग्रहण करते है। इन टीवी सीरियलों को देखते हुए माता-पिता जल्दी ही अपने बच्चे में भी कोई न कोई करतब ढूंढ निकालते है। इस तरह बच्चो का एक बड़ा हिस्सा अपने आप को तबला बजाने एवं सा रे गा मा पा के सुर साधने में खपा देता है। इस तरह हम इंजीनियरिंग कौशल के संसाधनों का एक और हिस्सा प्राथमिक स्तर पर ही खो देते है। विषय क्रिकेट या कला के खिलाफ नहीं है। किन्तु यह नयी प्रवृति है कि पूरी पीढ़ी को अनुत्पादक एवं कमतर क्षेत्रो में धकेलने के लिए मीडिया द्वारा काफी पैसा खर्च किया जा रहा है। जो कि वाकयी खतरनाक है।
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२) वे प्राथमिक शिक्षा का ढांचा इस तरह रच रहे है जिससे ज्यादातर छात्र गणित-विज्ञान की जगह आर्ट्स यानी कला विषय में खप जाएँ।
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वे भारत में ऐसा क़ानून लेकर आये जिसमे 8वीं कक्षा तक बच्चो को फेल नहीं किया जाता। गणित-विज्ञान दुरूह विषय है और अतिरिक्त प्रयास से ही समझ आता है। किन्तु फ़ैल होने का भय निकल जाने से बच्चे गणित-विज्ञान नहीं पढ़ते और सिर्फ अक्षर ज्ञान तक ही सीमित रह जाते है। 8वी कक्षा तक गणित-विज्ञान नहीं पढने के कारण भविष्य में भी वे इन विषयों को नहीं समझ पाते और अंतत इतिहास, राजनीती विज्ञान, अर्थशास्त्र एवं साहित्य जैसे कमतर एवं समय काटने वाले अनुत्पादक विषयों की और गिरते है। इस तरह हम इंजीनियरिंग के विकास के लिए उपलब्ध मानविक संसाधन का एक बड़ा हिस्सा फिर से खो देते है। और यही प्रतिभाशाली छात्र कला क्षेत्र में जाकर आगे बेरोजगारी की भीड़ बनाते है।
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साथ ही उन्होंने सरकारी स्कूलों का ढांचा पूरी तरह तोड़ दिया है और प्राथमिक शिक्षा को निरंतर निजी क्षेत्र के हवाले किया जा रहा है। सरकारी स्कूलों के बदहाल हो जाने के कारण वंचित तबके का एक बड़ा हिस्सा विज्ञान-गणित की शिक्षा से वंचित होकर इंजीनियरिंग कौशल की दौड़ से बाहर हो जाता है।
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३) वे उच्च शिक्षा में भी राजनीति विज्ञान , इतिहास एवं अर्थशास्त्र जैसे अनुत्पादक विषयों को विज्ञान-गणित से ज्यादा प्रोत्साहित करते है।
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प्रशासनिक सेवाओं एवं एमबीए में चयनित छात्रों को मीडिया में पर्याप्त प्रचार दिया जाता है जबकि आईआईटी में चयनित छात्रों को मीडिया द्वारा प्रोत्साहित नहीं किया जाता। इस वजह से प्रतिभाशाली छात्र इन परीक्षाओ को पास करने की और दौड़ लगाते है। उन्हें यह सूचना नहीं होती कि प्रशासनिक सेवाए एवं एमबीए आदि अनुत्पादक सेवाएं है और देश के विकास में इनका कोई वास्तविक योगदान नहीं होता है। और एक दृष्टिकोण से यह भी सच है कि कमतर श्रेणी के छात्र ही प्रशासनिक सेवाओं का आश्रय लेते है।
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४) वे ऐसे क़ानून बनाते है जिससे निर्माण इकाईया लगाना जटिल एवं खर्चीला हो जाए।
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जमीनों का महंगा होना सबसे बड़ी बाधा है। भारत में हर कोई जानता है कि जमीनों की सर्किल रेट और बाजार मूल्य में बड़ा अंतर है। और जमीनों पर कोई टेक्स न होने के कारण समृद्ध वर्ग अपना अधिकाँश निवेश जमीनों में करता है। उनकी क्रय शक्ति अधिक होने कारण जमीने लगातार महंगी हो रही है जिससे कम पूँजी से व्यापार करना मुश्किल एवं महंगा हो जाता है। जमीनों के महंगी होने के कारण इकाइयां लगाने की लागत बढ़ जाती है और भूमिहीन या कम पूँजी वाले संभावित व्यक्ति इकाइयां लगाने के अवसर गवां देते है। इसके अलावा जीएसटी, वैट, एक्साइज जैसे प्रतिगामी कर छोटी इकाइयों के लिए व्यापार करना कठिन बनाते है जबकि बड़ी इकाईयों को गैर वाजिब लाभ पहुंचाते है। इस प्रकार के अन्याय पूर्ण कर ढांचे की वजह से छोटी इकाईया बाजार से बाहर हो जाती है एवं बड़ी इकाइयाँ उनके बाजार पर कब्ज़ा कर लेती है। तो इस स्तर पर हम इंजीनियरिग के विकास के अवसर फिर से गवां देते है।
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५) भ्रष्टाचार निर्माण इकाइयों की लागत बढ़ाता जाता है और अंतत वे दम तोड़ देती है।
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फैक्ट्री वगेरह लगाने के लिए जमीन लेना होती है एवं उसका व्यावसायिक अंतरण कराना होता है। मेरे निजी अनुभव में ऐसे कई मामले है जब इस अंतरण के लिए व्यक्ति को कम से कम 1-2 वर्ष तक पंचायत एवं तहसील के चक्कर लगाने होते है। और तब भी घूस में बड़ी राशि दिए बिना कभी काम नहीं होता। इससे योजना की लागत बढ़ जाती है। इस लागत को आगे चलकर बिजली अधिकारी, प्रदुषण बोर्ड अघिकारी, कर अधिकारी आदि की घूस और भी बढ़ा देती है। यह सभी पैसा लागत में जुड़ता जाता है। लागत बढ़ने से पूँजी कम हो जाती है या माल महंगा महंगा हो जाता है। और अंत में घाटा खाकर निर्माण इकाई बंद हो जाती है।
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६) सुस्त एवं भ्रष्ट अदालतें बड़ी इकाइयों से घूस खाकर छोटी इकाईयों को बाजार से बाहर कर देती है।
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भारत की न्यायपालिका जितनी सुस्त है उतनी ही भ्रष्ट है। श्रम एवं अन्य विवादो से सम्बंधित मामले एक बार अदालतों में जाने के बाद वर्षो तक अटके रहते है, जिससे फैक्ट्रिया लम्बे समय तक बंद पड़ी रहती है। अंतत वे बंद हो जाती है। इसके अलावा बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के मालिक उच्चतम एवं उच्च न्यायलय के जजों के साथ अच्छे गठजोड़ बनाकर रखते है। इस वजह से फैसले हमेशा से बड़ी कम्पनियो के पक्ष में आते है और छोटी इकाइयां नुकसान उठाकर बाजार से बाहर हो जाती है।
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७) राज नेताओ का भ्रष्टाचार
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ऊपर दी गयी सभी समस्याओ की जड़ में राज नेताओं का भ्रष्टाचार है। क्योंकि उन्होंने ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से घूस खाकर ये क़ानून बनाए और ये व्यवस्था रची है।
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तो इस तरह हमारे प्रशासनिक, कानूनी एवं शैक्षिक ढांचे में यह व्यवस्था है कि हमारे इंजीनियरिंग कौशल के विकास के अवसर सिकुड़ते जाते है। ऐसे में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपनी तकनीक के बल पर भारत में आकर अपने उच्च तकनिकी उत्पादों के कारण बचा खुचा बाजार भी समेट लेती है।
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अमेरिका में किस तरह की व्यवस्था है कि अमेरिकी कम्पनियां लगभग सभी क्षेत्रो में तकनिकी रूप से उत्कृष्ट उत्पादन करती है ?
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१) शिक्षा व्यवस्था - अमेरिका में कुछ 200 साल पहले राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी प्रक्रियाएं लागू की गयी थी। इस क़ानून के आने से जिले के अभिभावकों को अपने जिले के शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने का अधिकार मिल गया। नौकरी से निकाले जाने के भय ने शिक्षा अधिकारियो अनुशासित एवं गंभीर बनाया। इसके अलावा गणित-विज्ञान विषयों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करने के लिए वहां "सात्य प्रणाली" जैसी व्यवस्था लागू हुयी। सात्य प्रणाली ने ज्यादातर छात्रों को विज्ञान-गणित की और धकेला एवं प्राथमिक स्तर पर ही गणित-विज्ञान में मारक प्रतिस्पर्धा होने से उनकी गणितीय क्षमता का स्तर बढ़ता गया।
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२) अमेरिका के बच्चे किशोर इस बात से सूचित है कि गीत, संगीत, वाद्य, अभिनय, खेल आदि मनोरंजन क्षेत्र से जुड़े पेशे सुरक्षित कैरियर नहीं दे पाते और वास्तविक सफलता हासिल करने के लिए उन्हें उत्पादक बनना होगा। यह सूचना उन्हें विज्ञान-गणित की पुस्तको की और धकेलती है और वे अनुत्पादक विषयों की चपेट में आने से बच जाते है। इसके अलावा वहां के समाज में मनोरंजन जगत के पेशो को अपेक्षाकृत कम सम्मानजनक माना जाता है।
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३) अमेरिका में जीएसटी जैसे प्रतिगामी कर का प्रभावी न होना भी एक बड़ी वजह है । वेल्थ टेक्स प्रोग्रेसिव कर है एवं गरीब एवं अमीर पर समान रूप से कर लगाता है। जबकि जीएसटी जैसे प्रतिगामी कर बड़ी एवं समृद्ध इकाइयों को फायदा एवं छोटी इकाइयों को नुक्सान पहुंचाते है।
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४) अमेरिका में स्थानीय प्रशासन में भ्रष्टाचार बेहद कम है। वजह राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं है। वहां के नागरिको के पास मुख्यमंत्री को शामिल करते हुए पुलिस प्रमुख, मेयर, सीनेटर , पब्लिक प्रोसिक्यूटर आदि को नौकरी से निकालने की प्रक्रियाएं मौजूद है। भ्रष्टाचार करने पर नागरिको द्वारा नौकरी से निकाले जाने का भय उन्हें ईमानदार एवं अनुशाषित बना देता है और उनके द्वारा की जाने वाली संभावित घूसखोरी में कमी आती है। इससे निर्माण इकाइयों की लागत में इजाफा नहीं होता और स्थापना एवं संचालन भी तीव्र होता है।
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५) अमेरिका की बेहतर तकनिकी उत्पादन क्षमता के सबसे बड़ी वजह उनकी अदालते है। और उनकी अदालतें इसीलिए बेहतर काम करती है क्योंकि वहां मुकदमो की सुनवाई नागरिको की ज्यूरी द्वारा की जाती है। प्रत्येक मुकदमे के लिए अलग से ज्यूरी होती है , अत: फैसला हफ्ते दो हफ्ते में आ जाता है। त्वरित दंड मिलने से अपराधियों में क़ानून का डर मौजूद रहता है और प्रत्येक प्रकार के शोषण, अत्याचार, घूसखोरी, धोखाधड़ी, गुंडा गिर्दी आदि में कमी आती है। इसके अलावा अमेरिकी नागरिको के पास जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार भी होने से वहां के जज घूस खाकर फैसले नहीं देते, और तमीज से पेश आते है।
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तो आप समझ सकते है कि कोई जुगाडू तरकीब भिडाकर तकनिक में आत्मनिर्भर नहीं हुआ जा सकता। इसके लिए हमें पूरे देश की व्यवस्था को इस तरह से रचना होता है कि हम इंजीनियरिंग कौशल का विकास कर सके। जब हमारे पास ऐसी क़ानून व्यवस्थाएं होगी जो इंजीनियरिंग कौशल को बढ़ावा दें तब पूरे देश के संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करके हम तकनिकी क्षेत्र में आत्म निर्भर हो सकते है। हमारा मानना है कि यदि भारत में वेल्थ टेक्स, ज्यूरी सिस्टम एवं राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं लागू कर दी जाती है तो भारत सिर्फ 5 वर्षो के भीतर फोन से लेकर हवाई जहाज तक का उत्पादन स्वदेशी तकनीक से कर सकता है। इतने तकनिकी विकास के बाद अंतत हम भारत में भारतीयों द्वारा निर्मित पूर्णतया स्वदेशी हथियारों का उत्पादन करने के सक्षम हो जायेंगे, जो कि तकनिकी विकास का अंतिम लक्ष्य एवं चरम बिंदु है। और हमारे ये स्वदेशी हथियार ( made in india, made by indians ) अमेरिकियों से ज्यादा बेहतर होंगे। लेकिन दुर्भाग्य का विषय है कि हमारे तमाम राजनेता उन सभी कानूनों का विरोध करते है जिससे भारत में स्वदेशी तकनीक पर आधारित स्वदेशी हथियारों का उत्पादन संभव हो सके। इसकी जगह वे विदेशी कम्पनियों को भारत में आकर व्यापार करने के लिए आमंत्रित करते है, जो कि एक आत्मघाती कदम है।
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भारत में निर्माण इकाइयों को बेहतर बनाने के लिए हमने जिन क़ानूनो का प्रस्ताव किया है उनके ड्राफ्ट्स देखने के लिए यह लिंक देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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यदि आप भारत को तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना चाहते है तो इन कानूनों का समर्थन करें एवं अपने पीएम को ट्वीट करके इन कानूनों को गैजेट में प्रकाशित करने की मांग करें। साथ ही ऐसे लोगो को विरोध अवश्य करें जो उन सभी कानूनों का विरोध करते है जिससे भारत में इंजीनियरिंग के विकास का ढांचा मजबूत हो।
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"वेल्थ टेक्स पार्टी"
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Feb 25 2018 10:06:24 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

इस लेख में पढ़ें कि किस तरह रामदेव जी अपनी आत्मकथा पर आधारित धारावारिक में जानबूझकर ऐसे झूठे एवं मनगढंत प्रसंग डाले है जिससे हिन्दुओ की विभिन्न जातियों के बीच घृणा एवं वैमनस्य पनपे। खुद उनके गांव में मौजूद बुजुर्गो एवं उनके रिश्तेदारों ने रामदेव की इन कपोल कल्पित बातों का खंडन किया है। रामदेव जी अपने व्यवसाय को चमकाने एवं ख्याति लाभ के लिए मिशनरीज पर पूरी तरह निर्भर हो चुके है , अत: पूरी संभावनाएं है कि इस तरह की गलीज़ हरकतें आगे भी करते रहेंगे। हिन्दू समाज में जातिगत द्वेष बढ़ाने वाले इस धारावारिक का विमोचन संघ के नेता अमित शाह ने किया है।
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Sunil Verma:

🚩 *बाबा रामदेव की खुल गई पोल, अपने को अवतार सिद्ध करने के लिए बनाई झूठी सीरियल*

February 22, 2018
<http://azaadbharat.org>;

<https://youtu.be/1BXJnzNwS6k>;

🚩बाबा रामदेव की अभी हाल ही में टीवी सीरियल रिलीज हुई है लेकिन हिन्दू संगठन, ब्राह्मण, अहीर, यादव उनसे काफी नाराज होकर तरह तरह का विरोध कर रहे हैं, यहाँ तक बोल दिया है कि स्वदेशी के नाम पर बाबा रामदेव विदेशी शक्तियों से मिलकर हिन्दुओं को जाति में बांटने के लिये यह सीरियल बनाई गई है यहाँ कई हिंदुओं ने तो प्रण लिया है कि जब तक सीरियल बेन नही होगी तब तक हम पतंजलि का सामान नही खरीदेंगे ।
<https://youtu.be/-32fg-T80oE>;

🚩रामदेव एक पाखंड कथा

🚩रामदेव (राम किशन )के जीवन पर बनी एक टीवी सीरियल रामदेव एक संघर्ष झूठ का पुलिंदा है जिसमें सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए रामदेव ने न सिर्फ ब्राह्मणों पर निशाना साधा है बल्कि यादवों के कुल को भी कलंकित किया है। रामदेव के गांव में दौरा करके डॉ ईश्वर सिंह यादव ने सच्चाई जानने की कोशिश तो आश्चर्यजनक सत्य सामने आया कि सीरियल में रामदेव सिर्फ झूठ बोल रहे हैं और पाखंड कर रहे हैं, जबकि सच्चाई कुछ और है।

<https://youtu.be/nB_kX0nffyM>;

🚩दिनांक 18 फरवरी 2018 के दिन इस षडयंत्र की सत्यता जानने के लिए अहीरवाल के भाईचारे के हिमाती व समाजसेवियों का एक दल रामदेव की जन्मभूमि व पैतृक गाँव “अली सैदपुर” गया और लोगों से मिलकर सच्चाई जानने हेतु तफ्तीश की। इस दल में आर्य समाज के सन्यासी 88 वर्षीय स्वामी हरीश मुनि जी खवासपुर , प्रख्यात समाजसेवी राधेश्याम गोमला जी, फौजी रामफूल राव जी बास पदम का, नौजवान पियूष अहीर जी बुडीन शामिल थे। जो हैरतअंगेज सच्चाई सामने आई वो आप के समक्ष पेश है —

🚩1. सबसे पहले गाँव का निरिक्षण किया और पाया कि गाँव खुशहाल है, हाँ गाँव में खेती-लायक पानी की जरुर कमी है। गाँव अहीरवाल क्षेत्र यानि अहीर बाहुल्य क्षेत्र का हिस्सा है। रामदेव के दादा पूसा जी गाँव में “बोहरा जी” यानी “धनाढ्य” कहलाते थे और उनके बुजुर्ग किसी दौर में गाँव की कुल खेतिहर ज़मीन के करीब चौथाई हिस्से के मालिक थे। यानि रामदेव का परिवार पैतृक रूप से बड़े बिस्वेदार/जमींदार थे और इनके परिवार का बहुत सम्मान था।

🚩2. गाँव में रामदेव के परिवार के ही बुजुर्ग जगदीश आर्य जी ने अपने पिता राव उमराव सिंह जी की याद में एक बहुत ही शानदार धर्मशाला सन 1972 में बनवाई थी जिससे रामदेव के परिवार की खुशहाली का पता चलता है।

🚩3. एक ग्रामीण के मुताबिक किसी दौर में इनका कुटुम्ब इतना बड़ा था कि परिवार में घर के बाहर जूती ही जूतियाँ दिखाई देती थी , यानी इस परिवार के पास बहुत बड़ा संख्या बल था और ऐसे बड़े और धनाढ्य परिवार को गाँव में कोई दबा नहीं सकता।

🚩4. रामदेव ने 8वी. कक्षा तक पढाई यहीं रहकर करी और फिर इनके बड़े जगदीश जी आर्य ने इनका दाखिला गुरुकुल खानपुर(अहीरवाल) में करवा दिया जहाँ इनके गुरु थे आचार्य प्रद्युम्न ,जखराना वाले, जो समस्त हिन्द में संस्कृत व्याकरण के सबसे बड़े विद्वान् थे और जाति से राव साहब यानि यादव थे और आचार्य जी आज भी पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में ही रहते हैं । तो इसका मतलब गुरुकुल में भी इनके साथ कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ।

🚩5. खानपुर गुरुकुल के बाद रामदेव की शिक्षा कालवा गुरुकुल में हुई जहाँ शिक्षक आचार्य बलदेवजी थे जो खुद एक पिछड़े कृषक समुदाय से आते थे ,इसलिए कालवा गुरुकुल में भी रामदेव पर किसी भी प्रकार के भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं थी।

🚩6. शिक्षा के बाद इनके मुख्य रूप से दो साथी थे, आचार्य बालकृष्ण जो ब्राह्मण हैं और आजतक इनके साथ हैं तथा दूसरे आचार्य कर्मवीर।

🚩7. गाँव में इनके अग्रज देवदत्त जी मिले जो CRPF से रिटायर्ड हैं और इनका मकान गाँव का सबसे आलिशान महलनुमा मकान है और खेती के लिए इनके पास एक ट्यूबवेल भी है , यानि हर तरह से सम्पन्न। जब उनसे चर्चा हुई तो वे बोले कि सीरियल में काफी बातें सत्य से परे हैं।

🚩8. गाँव में कभी एक मंगतू ब्राह्मण का परिवार था जिसकों यहाँ यादवों ने करीब 30 बीघा ज़मीन दान देकर बसाया था जिसके एक पुत्र हुआ मांगू ब्राह्मण जिसके सिर्फ एक पुत्री थी जिसके पति निरंजनलाल को यहाँ बसाया गया ,जिसकी संतानें आज भी गाँव में हैं और बड़े सरल स्वभाव का परिवार है। ब्राह्मणों में कोई भी “गोरधन महाराज” नाम का व्यक्ति कभी पैदा ही नहीं हुआ ,यानी सारा टीवी सीरियल सिर्फ एक कपोल-गाथा है। कभी जिस ब्राह्मण परिवार को अहीरों ने बसाया हो वो कैसे अपने सहारा देने वालों पर कोई भेदभाव/ज़ुल्म कर सकता है या जो यादवों पर कभी आश्रित रहा हो वो कभी इतनी हिमाकत कर सकता है?

🚩9. गाँव के कई यादव बुजुर्गों जिनकी आयु 80-90 वर्ष रही होगी उनसे मिले , उन्होंने बताया कि उनके जीवन-काल में कभी भी गाँव में कृष्ण-लीला/रामलीला आदि का मंचन नहीं हुआ। रामदेव का जन्म तो 1973 में हुआ ,फिर टीवी सीरियल में ये कृष्ण-लीला का मंचन एक कोरा झूठ साबित होता है।

🚩10. गाँव के बुजुर्गों और रामदेव के भाई व् कुटुम्ब के लोगों ने बताया कि रामदेव का परिवार तो इतना सबल था कि किसकी हिम्मत थी कि उनको गाँव से बाहर निकालते ? टीवी सीरियल के इस झूठ का भी पर्दाफाश हुआ।

🚩11. रामदेव के बड़े भाई देवदत्त ने खुद बताया कि उनको कभी पंचायत के सामने बाँध कर कोई भी किसी तरह की सामाजिक सज़ा नहीं दी गयी और न ही उनके माँ-बाप को।

🚩12. जब हमने रामदेव के बड़े भाई देवदत्त से पूछा कि रामदेव ने टीवी सीरियल में झूठ क्यों दर्शाया तो वो बोले कि “बिना तडके वाली दाल” कौन खायेगा ? इसमें “तड़का” नहीं होगा तो फिर कौन देखेगा ? यानी सिर्फ टीवी सीरियल की पब्लिसिटी के लिए झूठ का सहारा लिया जाएगा और यादवों के स्वाभिमान से खिलवाड़ किया गया। गाँव के कुछ लोग ये बोले कि इस सीरियल से गाँव और समाज की बदनामी हुई है और अब कौन यादव हमारे गाँव में अपने बच्चों का रिश्ता करेगा ?

🚩13. गाँव में आज करीब 300 घरों की बस्ती है और 40 साल पहले शायद इससे भी कम घर होंगे। बुजुर्गों ने बताया कि उनके जीवन-काल में कभी भी गाँव में कोई हाट-बाज़ार नहीं लगा। आज भी बस एक-आध ही छोटी सी कोई दुकान हैं। फिर टीवी सीरियल में ये दिखाया गया कि रामदेव और उनकी माता का दुकानदारों ने सामान देने से इंकार कर दिया और कृष्ण-मुकुट नहीं खरीदने दिया ,ये कौन से युग में हुआ ? इस कोरे झूठ का भी पर्दाफाश हुआ।

🚩14. आज गाँव में गिनती के ट्यूबवेल हैं और एक रामदेव के बड़े भाई के पास है। अखबार में छपी ये खबर भी गलत साबित हुई कि अगर उनके मटके से पानी ज़मीन पर छलक जाता था तो पहले उस रस्ते को धोया जाता था। खुद उनके भाई और परिवार ने इस झूठ का खंडन किया। जिस गाँव में करीब 80-90 % यादव परिवार हों और खेडा भी यादवों का ही बसाया गया हो ,तो गाँव के सब रास्तों पर यादवों की ही सबसे ज्यादा आवाजाही रहती है ,फिर ऐसा कैसे हो सकता था ? इस झूठ का भी ग्रामीणों ने पर्दाफाश किया।

🚩15. गाँव में ग्रामीणों और इनके कुटम्ब के लोगों से मिलने पर ये सच्चाई ज्ञात हुई —
🚩(i) गाँव में कोई कृष्ण-मूर्ति या मंदिर नहीं है अपितु एक ठाकुर द्वारा हैं जहाँ गाँव की समस्त जातियाँ बड़े प्रेम से पूजा-अर्चना करती हैं।

🚩(ii) गाँव में किसी भी तरह की जातिगत दुर्भावना नहीं है बल्कि सब जातियां बड़ी समरसता से रहती हैं।

🚩(iii) गाँव बिछवालिया गोत्र के राव साहबों का ठिकाना है यहाँ के ब्राह्मण/कुम्हारों/स्वामी आदि जातियों में बहुत भाईचारा है और ब्याह-शादी आदि पर्वों को सब आपस में एक दूसरे के साथ मनाते हैं । यहाँ के यादव सरदार इतने दानवीर हैं कि अभी हाल ही में एक गरीब कुम्हार की बेटी की शादी में समस्त ग्रामीणों ने खूब दान दिया और गाँव की बेटी को बड़े प्रेम और ठाट-बाट से विदा किया। यानी गाँव खुशहाल है और भाईचारे की मिसाल है। ये ही हाल आस-पास के यादवों के गांवों का है क्योंकि ये अहीरवाल यानी अहीर बाहुल्य क्षेत्र का ही हिस्सा है

🚩अहीरवाल पर यादव राजवंश का राज रहा है। सामंत/ज़मींदार भी यादव थे और आज भी ये यादव राजकुल मौजूद है। अहीरवाल क्षेत्र का बहुत ऐतिहासिक क्षत्रिय इतिहास रहा है। यहाँ के लोग देश व राष्ट्र-रक्षा के लिए तैमुर के खिलाफ लड़े, नादिरशाह के खिलाफ लड़े, अंग्रेजों के खिलाफ नसीबपुर में एक बहुत ही बहादुराना लडाई लड़ी। आधुनिक इतिहास में रेजांगला में वीरता की सबसे बड़ी शौर्यगाथा लिखी, हाजीपीर, जैसलमेर मोर्चा, टाइगर हिल आदि हर लडाई में यहाँ के यदुवंशी मौजूद थे। यहाँ घर-घर में फौजी हैं और ये यादवों का पुश्तैनी कार्य भी रहा है। सैद अलीपुर गाँव में भी बहुत फौजी है, खुद रामदेव के परिवार के कप्तान रोहताश सिंह साहब भी सेना में थे। यानी जिस कौम का इतना शानदार जंगी-इतिहास रहा हो उस पर कोई कैसे ज़ुल्म कर सकता है?

🚩इस टीवी सीरियल के ज़रिये अहीरवाल के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करने की कोशिश है और सिर्फ व्यवसायिक फायदे के लिए विभिन्न वर्गों में विष फ़ैलाने की कोशिश है। रामदेव का परिवार बड़ा बिस्वेदार और धनाढ्य रहा है ,लेकिन झूठी सहानभूति के लिए कपोल-गाथा गढ़ी गयी। जिस परिवार ने गाँव में 1972 में बड़ी धर्मशाला का निर्माण किया, बड़ी ज़मीनों के मालिक हैं वो परिवार कभी तिरस्कार का कैसे भागी रहा होगा ? जिस यादव कौम का शानदार जंगी-इतिहास रहा हो, जिसने अहीरवाल पर राज़ किया हो वो कैसे इस कपोल-गाथा का हिस्सा हो सकती है?

🚩आज रामदेव के पास इज्ज़त, पैसा,नाम,सम्मान आदि सब कुछ है, फिर ये कैसे झूठ का भागीदार हो गया ? सन्यासी का पहला धर्म है कि सत्य की स्थापना करे और असत्य का खण्डन , फिर ये सन्यास-धर्म से कैसे विमुख हो गया ? खुद को एक अवतार घोषित करने के लोभ में रामदेव ने यादव जैसी मर्द कौम की गरिमा को ही दाँव पर लगा दिया है जिसका हर यदुवंशी को पुरजोर विरोध करना चाहिए। - डॉक्टर ईश्वर सिंह यादव

🚩जनता ने बताया कि बाबा रामदेव से अनुरोध है समय रहते चेत जाएं। नहीं तो जहर उगलती काल्पनिक व मार्मिक कहानियां बनानी हमें भी आती हैं।

🚩अब इतने विरोध के बाद देखते हैं कि स्वदेशी के नाम से प्रोडक्ट बेचकर जातिवाद पर हिन्दुओं को विभाजित करने वाली टीवी सीरियल पर बेन लगती है या नही।

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Feb 25 2018 19:43:29 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

ज्यादातर से भी ज्यादा संभावनाएं है कि श्रीदेवी की असमय मृत्यु उन "दवाइयों" की वजह से हुयी हो जिनका सेवन वे जवान एवं छरहरा दिखने के लिए करती थी। अन्यथा, जिस स्तर का स्वास्थ्य प्रबंधन एवं सुविधाएँ उन्हें उपलब्ध थी, उन्हें ध्यान में रखते हुए 54 वर्ष की आयु में ऐसा हादसा होना दूर की बात है।
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स्वस्थ रहने के लिए इतना काफी है कि व्यक्ति प्रकृति की अवहेलना न करते हुए नियमित व्यायाम करे और संतुलित आहार ले।
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यह घटना उन लोगो के लिए एक सबक है जो अपने "लुक" को मारक बनाने एवं खेलो में अपना प्रदर्शन सुधारने के लिए विभिन्न प्रकार के ड्रग लेते है। साथ ही यह उन अभिभावकों के लिए भी एक चेतावनी है जो अपने बच्चो को ग्लेमर वर्ल्ड या पदक जिताऊ खेलो में अपनी जगह बनाने के लिए प्रेरित करते है, या अपने बच्चो के गिर्द ऐसा माहौल रचते है जिससे बच्चे खेलो में पदक लाने या ग्लेमर की दुनिया में नाम कमाने की कोशिश करें ( उदाहरण के लिए फिल्म, मॉडलिंग एवं खेल )
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"सामान्य खेल" एवं "पदक जिताऊ खेल" बिलकुल अलग तरह की चीजे है। बिना कोई स्टेरॉयड लिए सप्ताह में 5 दिन एक घंटा प्रतिदिन सामान्य ढंग से खेलना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। लेकिन स्टेरॉयड लेकर खेल में पदक जीतने के लिए जोर लगाने से प्रति 1000 में से 999 किशोरों का अकादमिक कैरियर एवं साथ ही मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य भी तबाह हो जाता है। इस बचे हुए 1 व्यक्ति को पेड मीडिया द्वारा हीरो की तरह प्रस्तुत किया जाता है, ताकि इसे देखकर लाखो किशोर भी इस अंध दौड़ की और आकर्षित होकर अपनी जिन्दगी तबाह करें। यहाँ तक कि आज हाई स्कूल स्तर तक की प्रतियोगिताओं में भी बच्चे पदक जीतने के लिए स्टेरॉयड का सेवन करने लगे है। और यदि एक बच्चा ड्रग लेता है तो अन्य प्रतिस्पर्धियो के पास सिर्फ दो रास्ते बचते है -- या तो वे हार मान ले, या फिर वे भी ड्रग लेना शुरू करें।
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सौन्दर्य निखारने एवं खेलकूद की क्षमता बढ़ाने का धंधा अच्छा मुनाफा देने वाला है , किन्तु इससे 10 गुना बड़ा कारोबार उन दवाईयों एवं थेरेपियो का है जो इन सौन्दर्य निखारने एवं क्षमता बढाने वाले नुस्खो को लेने से उपजे साइड इफेक्ट्स को काबू करने में प्रयुक्त होती है !!
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अफ़सोस की बात है कि मोदी साहेब को शामिल करते हुए हमारे सभी राजनैतिक दलों के शीर्ष नेता इस तरह के माहौल को प्रोत्साहित करते है जिससे युवा और ख़ास तौर से युवतियां ग्लेमर वर्ल्ड ( फ़िल्में एवं मॉडलिंग ) एवं पदक जीतने वाले खेलो में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले।
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गलीज फिल्म दंगल का निर्माण इसी आशय से किया गया था। गलीज फिल्म "दंगल" किशोरों को ड्रग लेने एवं मांस खाने के लिए प्रेरित करती है। किन्तु इस मूल उद्देश्य को महिला सशक्तिकरण की चाशनी में डुबो कर परोसा गया। ठीक उसी तरह जैसे अरविन्द केजरीवाल का मूल उद्देश्य कुर्सी लपकना था, किन्तु उन्होंने इसके लिए भ्रष्टाचार एवं जनलोकपाल के कवर का इस्तेमाल किया। दंगल भी महिला सशक्तिकरण की आड़ में स्पोर्ट्स ड्रग एवं मांसाहार को प्रोत्साहित करती है।
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प्रस्तावित समाधान -- स्कूल जाने वाले सभी बच्चो को ऐसी सूची दी जानी चाहिए जिसमे यह विवरण हो कि पिछले 20 वर्षो में स्कूलों से पास होने वाले छात्रों में से कितने छात्रों ने फ़िल्में, मॉडलिंग, खेलकूद, औषध विज्ञान, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रो में अपना कैरियर बनाने की कोशिश की एवं वे सभी छात्र आज किस परिस्थिति में कैसा जीवन यापन कर रहे है। यह जानकारी बच्चो को खुद से यह समझाने में सहायता करेगी कि उन्हें फिल्मो एवं खेलकूद में अपने आप को खपाने की जगह गणित-विज्ञान पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
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