Posts for 2020-05

Pawan Jury BhilwaraRj

Fri May 01 2020 18:56:49 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड के प्रस्तावित क़ानून की कुंजी
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(1) यह क़ानून सरकार द्वारा हथियाये जा चुके सभी देवालयों को सरकारी नियन्त्रण से मुक्त करता है।
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(2) यह कानून सभी हिन्दूओ के लिए एक राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड (R.H.B.) नामक ट्रस्ट का गठन करेगा, जिसका प्रमुख हिन्दू संघ प्रधान कहलायेगा। हिन्दू संघ प्रधान वोट वापसी पासबुक के दायरे में होगा, और यदि आप उसके काम-काज से संतुष्ट नहीं है, तो वोट वापसी पासबुक के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर उसे निकालने और किसी अन्य व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त करने के लिए अपनी स्वीकृति दे सकते है। आप अपनी स्वीकृति SMS, ATM या मोबाईल एप से भी दे सकेंगे।
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(3) भारत के निम्नलिखित नागरिक हिन्दू बोर्ड के सदस्य हो सकेंगे :
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(3.1) उन सभी समुदायों, पन्थो, सम्प्रदायों के अनुयायी जो स्वयं को हिन्दू या सनातनी या सनातनी हिन्दू कहते है।
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(3.2) सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि पन्थो के अनुयायी भी यदि इस बोर्ड में जुड़ना चाहते है तो इसकी सदस्यता ले सकेंगे।
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(3.3) यह क़ानून इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी एवं अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है, पर कोई दायित्व या प्रतिबन्ध नहीं लगाता। इन धर्मो के अनुयायी स्पष्ट रूप से इस क़ानून के दायरे से बाहर रहेंगे
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[ टिप्पणी : यह क़ानून किसी भी प्रकार से उन नागरिको पर हिन्दू होने का लेबल नही लगाता जो स्वयं को हिन्दू नहीं कहते या हिन्दू नहीं कहलाना चाहते। उदाहरण के लिए यदि कोई जैन या सिक्ख पंथ का अनुयायी इसमें नामांकित होता है तो भी उसकी कानूनी-धार्मिक-सामाजिक पहचान प्रवृत कानूनों के अनुसार जैन / सिक्ख धर्म के अनुयायी के रूप में बनी रहेगी ]
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(4) प्रधानमंत्री एक अधिसूचना जारी करके राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या का स्वामित्व हिन्दू बोर्ड को सौंपेंगे। इसके अलावा हिन्दू बोर्ड उन सभी देवालयों का भी प्रबंधन करेगा जिन्हें किसी मंदिर के मालिको ने इसे स्वेच्छा से सौंप दिया है।
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(5) यदि एवं जब भारत के सभी मतदाताओ में से 45 करोड़ मतदाता इसी कानून में दी गयी जनमत संग्रह प्रक्रिया का प्रयोग करते हुए निचे दिए 3 मंदिरो के भूखंड बोर्ड को सौंप देते है तो हिन्दू बोर्ड इन मंदिरों की देख रेख करेगा :
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(5.1) कृष्ण जन्म भूमि देवालय, मथुरा
(5.2) काशी विश्वनाथ देवालय, वाराणसी
(5.3) अमरनाथ देवालय, कश्मीर
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(6) प्रधानमंत्री एक राष्ट्रीय सनातन संप्रदाय रजिस्ट्रार नामक अधिकारी की नियुक्ति करेंगे, जो उन सम्प्रदायों को लोकतांत्रिक रूप से प्रबंधित करने में व्यवस्थागत सहयोग करेगा जिनका उद्भव भारतीय उपमहाद्वीप की सनातन संस्कृति है, तथा वे एक पंथ या सम्प्रदाय के रूप में मान्यता प्राप्त धार्मिक ट्रस्ट है। ऐसे धार्मिक सम्प्रदायों में जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, आर्य समाज आदि सभी भारतीय संप्रदाय शामिल है। रजिस्ट्रार का ट्रस्ट की धार्मिक मान्यताओ में कोई दखल नहीं होगा। सिख पंथ भी एक भारतीय संप्रदाय है किन्तु यह पहले से SGPC द्वारा शासित है, अत: सिक्ख पंथ रजिस्ट्रार के दायरे से बाहर रहेगा।
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(7) यदि संघ प्रधान, राष्ट्रिय सनातन रजिस्ट्रार, उनके स्टाफ एवं नागरिको के मध्य कोई आपसी विवाद होता है, या किसी मंदिर धारण करने वाले ट्रस्ट आदि के बीच स्वामित्व का कोई मामला आता है तो मामले का निपटान हिन्दू बोर्ड की सदस्य सूची में दर्ज नागरिको की जूरी करेगी। यदि आपका नाम बोर्ड की मेम्बर लिस्ट में है तो आपको जूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है। जूरी में आकर आपको मामला सुनकर फैसला देना होगा। जूरी का गठन बोर्ड की मेम्बर लिस्ट से लॉटरी द्वारा किया जाएगा। मामले की प्रकृति अनुसार जूरी में 12 से 1500 तक नागरिक हो सकेंगे।
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यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो Pm को एक पोस्टकार्ड / ट्विट भेजे – प्रधानमंत्री जी, कृपया हिन्दू बोर्ड गेजेट में छापे , #HinduBoard
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हिन्दु बोर्ड का पूरा ड्राफ्ट इस लिंक में देखें -- <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/2241776019273955>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun May 03 2020 19:57:38 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राज्य जूरी कोर्ट के प्रस्तावित कानून की कुंजी
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(इस क़ानून को विधानसभा से पास करने की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री हस्ताक्षर करके इसे सीधे गेजेट में प्रकाशित कर सकते है। इस क़ानून में जहाँ पर “राज्य” लिखा है वहां आप अपने राज्य का नाम लिख सकते है।)
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(1) यदि आपका नाम राज्य की वोटर लिस्ट में है तो यह कानून पास होने के बाद आपको निचे दिए अपराधो के मुकदमे सुनने के लिए जूरी ड्यूटी पर बुलाया जा सकता है। जूरी ड्यूटी में आपको आरोपी, पीड़ित, गवाहों व दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा प्रस्तुत सबूत देखकर बहस सुननी होगी और सजा / जुर्माना या रिहाई का फैसला देना होगा। मामले की गंभीरता देखते हुए जूरी मंडल में 15 से 1500 तक सदस्य होंगे :
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(1.1) हत्या, हत्या के प्रयास, मारपीट, हिंसा, जान लेवा धमकी, किसी भी प्रकार की अप्राकृतिक मानव मृत्यु, Sc-St Act के मामले ।
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(1.2) अपहरण, बलात्कार, छेड़छाड़, कार्यस्थल पर उत्पीड़न, महिला का पीछा करना, दहेज़, घरेलू हिंसा, डिवोर्स।
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(1.3) सार्वजनिक प्रसारण जिनमें सभी प्रकार के दृश्य, श्रव्य, इलेक्ट्रोनिक माध्यम जैसे - फ़िल्में, टीवी, समाचार पत्र, पुस्तकें, फेसबुक, यू ट्यूब आदि शामिल है - से सम्बंधित सभी प्रकार के मामले व आपत्तियां।
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(1.4) किरायेदार-मकान मालिक विवाद, 2 करोड़ से कम मूल्य की प्रोपर्टी के विवाद। मृत्यु भोज की शिकायतें ।
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(2) जूरी सदस्यों की आयु 25 से 50 वर्ष के बीच होगी और जूरी का गठन मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा किया जाएगा। प्रत्येक मुकदमे की सुनवाई के लिए अलग से जूरी होगी, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी।
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(3) प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला बंद लिफ़ाफ़े में लिखकर ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर या जज को देंगे। दो तिहाई सदस्यों द्वारा मंजूर निर्णय को जूरी का फैसला माना जाएगा। जूरी द्वारा दिए गए निर्णय को जज द्वारा अनुमोदित किया जाएगा। यदि जज जूरी के फैसले को खारिज या संशोधित करना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है।
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(4) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। जिला स्तर के निम्न 8 अधिकारी इस वोट वापसी पासबुक के दायरे में आयेंगे :
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(1) जिला पुलिस प्रमुख
(2) शिक्षा अधिकारी
(3) चिकित्सा अधिकारी
(4) जिला निदेशक अभियोजन
(5) जूरी प्रशासक
(6) जिला जज
(7) राज्य सूचना आयुक्त
(8) जिला मिलावट रोक अधिकारी
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यदि आप उपरोक्त किसी अधिकारी के काम से संतुष्ट नहीं है और उसे निकालकर अन्य व्यक्ति को लाना चाहते है तो पटवारी कार्यालय में जाकर स्वीकृति के रूप में अपनी हाँ दर्ज करवा सकते है। आप अपनी हाँ SMS, ATM या मोबाईल APP से भी दर्ज करवा सकेंगे। आप किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दे सकते है, या स्वीकृति रद्द कर सकते है।
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यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो CM को एक पोस्टकार्ड / ट्विट भेजे -- मुख्यमंत्री जी, राज्य जूरी कोर्ट गेजेट में छापें - #StateJuryCourt
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पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें - <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/2298624793589077>;

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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue May 05 2020 22:22:25 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

धनवापसी पासबुक क्या है ? इससे कैसे देश की गरीबी खत्म होगी?
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धन वापसी पासबुक एक प्रस्तावित क़ानून है जो भारत के खनिज एवं प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोकने के लिए लिखा गया है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य खनिजो का राष्ट्रीयकरण करके इसे भारतीय नागरिको की संपत्ति घोषित करना है, ताकि भारत की रीढ़ की हड्डी टूटने से बचाया जा सके। इसका एक स्वत: प्रभाव यह भी होगा कि भुखमरी दूर होगी, और एक सीमा तक गरीबी में भी कमी आएगी।
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( गरीबी दूर करने के लिए धनवापसी के अलावा हमें पुलिस-अदालतें एवं टेक्स के क़ानून दुरुस्त करने के लिए जूरी कोर्ट एवं रिक्त भूमि कर लागू करने की भी जरूरत है, ताकि बड़े पैमाने पर छोटे एवं मझौले स्तर के कारखाने लगने का रास्ता साफ़ हो सके। )
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(1) खनिजो की लूट से क्या आशय है ?
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पिछले 400 वर्षो से खनिज ऐसा क्षेत्र में जिसमें भ्रष्टाचार कम और सीधी लूट ज्यादा है। खनिजो को लूटने वाला वर्ग इतना ज्यादा ताकतवर है कि इस लूट में छोटी मछलियों के आने की कोई गुंजाईश ही नहीं है। यहाँ लड़ाई सीधी शार्को के बीच है। उदारहण के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी खनिज लूटने के धंधे में थी।
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पेड मीडिया के प्रायोजक यानी अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार निर्माता पिछले 400 सालों से यह कारोबार कर रहे है। पहले उन्होंने निर्णायक हथियार बनाए और फिर उन्होंने माइनिंग कंपनियां भी खोली। आज भी खनन के बहुत सारे ऐसे क्षेत्र में जिसमें काफी आधुनिक मशीनरी का इस्तेमाल होता है। और ये मशीने सिर्फ कुछ गिनी चुनी कंपनियों को ही बनानी आती है। माइनिंग से बड़े पैमाने पैसा वही बना सकता है, या खनिज वही लूट सकता है जिसके पास ये मशीनरी हो।
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उदाहरण के लिए, तेल निकालने की तकनीक दुनिया में सिर्फ 25-30 कंपनियों के पास ही है। तो जिस कम्पनी को इन कम्पनियों के मालिक ये मशीनरी देते है, वही कम्पनी खनिज निकाल पाती है। प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध कोयले, कच्चा तेल और स्टील के लिए लड़ा गया। खाड़ी युद्ध भी कच्चे तेल के लिए हुआ था। ब्रिटिश-फ्रांसिस संघर्ष का कारण भी खनिज थे। अभी ईरान पर भी जो युद्ध आने वाला है, वह भी खनिज (तेल) के लिए है।
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डेमोक्रेसी आने से पहले तक पेड मीडिया की प्रायोजक (हथियार निर्माता) किसी देश के खनिज लूटने के लिए सीधे सेना का इस्तेमाल करते थे। डेमोक्रेसी आने के बाद वे पेड मीडिया एवं युद्ध की धमकी देकर पहले पीएम को कंट्रोल करते है और फिर कानूनी रूप से खनिज लूटते है। और जो पीएम खनिज बचाने के लिए जाएगा उसे अंततोगत्वा युद्ध में जाना पड़ेगा। कोई दया नहीं, कोई अपवाद नहीं !! दुसरे शब्दों में, खनिज को लेकर जो संघर्ष होता है, उसका निर्णय युद्ध से ही होता है।
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तो पेड मीडिया के प्रयोजको से सारा टकराव खनिजो की लूट को लेकर ही है। उन्हें खनिज लूटने है सिर्फ इसीलिए वे इतने बड़े मीडिया का खर्चा उठाते है, और उठा पाते है। यदि वे मुफ्त के खनिज नहीं लूट पाएंगे तो पेड मीडिया का घाटा भी नहीं उठा पायेंगे।
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उन्हें खनिज लूटने है इसीलिए वे राजनैतिक पार्टियों का खर्चा उठाते है, और उन्हें स्पोंसर करते है। उन्हें खनिज लूटने है इसीलिए उन्हें पीएम पर कंट्रोल चाहिए, जजों पर कंट्रोल चाहिए, पुलिस पर कंट्रोल चाहिए। उन्हें खनिज लूटने है, इसीलिए वे नागरिको को हथियार विहीन रखना चाहते है, और यह भी चाहते है कि अमुक देश अपने हथियारों का उत्पादन स्वयं न कर पाए। सार यह है कि सारी वैश्विक लड़ाई सिर्फ मुफ्त के खनिज एवं प्राकृतिक संसाधनों को लेकर है।
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स्टेंडर्ड ऑइल का उदाहरण देखिये। यह कम्पनी खनिज लूटने में अग्रणी कम्पनी रही है। ऑइल रिफायनिंग की इस कम्पनी को 1870 में रोकेफेलर ने बनाया था, और 1911 में इसे कई हिस्सों में विभाजित करके भंग कर दिया गया। 1910 तक दुनिया का 70% तेल यही कम्पनी खोद रही थी। आज भी दुनिया का 40% तेल इसी के कब्जे में है। हालांकि अब इस कम्पनी की सभी सबसिडरी कम्पनीयों को ट्रेक करने में आपको 2-3 घंटे गूगल करना पड़ेगा !! अम्बानी की रिफायनिंग स्टेंडर्ड ऑइल की सबसिड़री कम्पनी की मशीनों पर ही चलती है। और इसी तरह से ये कोयला, लोहा, ताम्बा से लेकर सभी महत्त्वपूर्ण खनिज खोदते है। Standard Oil - Wikipedia
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और मझौले स्तर पर मित्तल, वेदांता, टाटा, जिंदल से लेकर अम्बानी, बिरला अडानी तक ऐसे कई कारोबारी है तो खनिजो की लूट के धंधे में है।
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खनिजो की लूट इतने खुले तौर पर और इतनी सफाई से की जाती है, कि पूरे देश को मालूम ही नहीं होता कि किस पैमाने पर खनिज लूटे जा रहे है। पेड मीडिया इस बिंदु को टच ही नहीं करता। ज्यादा से ज्यादा वे स्थानीय स्तर पर हो रहे बजरी, पत्थर आदि चिल्लर किस्म के खनिजो का मुद्दा उठाते रहते है, ताकि बड़ी लूट को चर्चा से बाहर रखा जा सके।
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2019 में आवंटित की गयी कुछ कोयला खदानों का उदाहरण देखिये। निचे दिए गए आंकड़े भारत सरकार की अधिकृत वेबसाईट से लिए गए है — <https://www.mstcecommerce.com/auctionhome/coalblock/index.jsp?fbclid=IwAR3iPfe2uwoHk6FwTHupebNHqG_hJOB1LD5wGpVoZ_2ibkaRYVSMPzUpEzQ>;
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(a) 154 रू प्रति टन
(b) 156 रू प्रति टन
(c) 185 रू टन
(d) 230 रू प्रति टन
(e) 715 रू प्रति टन
(f) 755 रू प्रति टन
(g) 1100 रू प्रति टन
(h) 1230 रू प्रति टन
(i) 1674 रू प्रति टन
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दरों में इस तरह की भिन्नता क्यों ? 154 रुपये से 1674 रुपये !! लगभग 11 बार !!
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(1) एक वैध कारण यह है कि -- कोयले की गुणवत्ता में संभावित भिन्नता है। लेकिन यह एक मात्र कारण नहीं है।
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(2) दूसरा और वास्तविक कारण यह है कि - कई मामलों में गठजोड़ बनाकर नीलामी की शर्तों को इस तरह से ड्राफ्ट किया जाता है ताकि लक्षित कम्पनी को चिल्लर दामों में माइनिंग राइट्स दिए जा सके।
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इस कारण को समझने के लिए सलंग्न तस्वीर देखें — कोयला मंत्रालय की वेबसाईट बताती है कि, कोई भी बोली लगा सकता है, लेकिन साथ में उन्होंने यह शर्त भी जोड़ी है कि अंत में उनके पास स्टील या सीमेंट का संयंत्र होना चाहिए।
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तो प्रत्येक "खुली नीलामी" में इन शर्तों के अलावा भी वे ऐसी कई शर्तें जोड़ते है, जो कहती है कि यदि आपके पास संयंत्र हो तो इसे अमुक खदान से अमुक दूरी पर ही होना चाहिए !! और अमुक संयंत्र को इतनी उतनी क्षमता का होना चाहिए। तो अंत में सिर्फ वे कुछ बड़े खिलाड़ी ही बोली लगा सकेंगे जिन्हें लाभ देने के लिए यह शर्त जोड़ी गयी थी !! तो इस तरह वे कार्टेल बनाते हैं और कीमतों को कम बनाए रखते है। इसके अलावा, माइनिंग ब्लॉक का आकार इतना बड़ा रखा जाता है कि छोटे खिलाड़ी इसमें प्रतिभागी न बन सके।
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यदि हम क़ानून छापकर इस कार्टेल को तोड़ देते है तो ज्यादा प्रतिष्ठान बोली लगाने आयेंगे और हमें सभी खदानों के लिए 1600 रुपये प्रति टन के हिसाब से रॉयल्टी मिलेगी। धनवापसी पासबुक का क़ानून इसी तरह के गठजोड़ एवं कार्टेल बनाने की प्रक्रिया को तोड़ने के लिए लिखा गया है।
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अभी यहाँ से भ्रष्टाचार शुरू हुआ है। अगले स्तर का भ्रष्टाचार और भी व्यापक है। वे जितना खनिज निकालते है, उसका सिर्फ 10-20% ही रॉयल्टी चुकाते है। राइट्स लेने के बाद ज्यादातर खनिज अवैध रूप से निकाल लिया जाता है। इसकी कहीं एंट्री नहीं होती, और इसीलिए उन्हें रॉयल्टी भी नहीं चुकानी पड़ती !! वे सीधे मंत्रियो / जजों आदि को हफ्ता पहुंचा देते है, और मंत्रियो का आदेश आने के बाद कोई खनिज अधिकारी उनकी माइंस को सुपरवाइज करने कभी नहीं जाता !! तो उन्हें जितने इलाके की माइंस मिलती है वे उससे 5 गुना ज्यादा अतिक्रमण करके खनिज निकालते है।
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उदाहरण के लिए जिंदल को 2010 में भीलवाड़ा में माइंस आवंटित हुयी थी। और जिंदल ने सभी नियमों की धज्जियाँ उड़ा कर खनिज निकाले। माइंस से लगे हुए कस्बे (पुर) की हालत यह है कि वहां के नागरिको को कस्बे से पलायन करना पड़ा। लगभग 300-400 मकान जोखिमपूर्ण हद तक क्षतिग्रस्त हो गए और कई परिवारो को अपने मकान छोड़कर अन्य जगहों पर किराए पर रहना पड़ रहा है।
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<https://timesofindia.indiatimes.com/city/jaipur/ngt-takes-jindal-saws-bhilwara-unit-to-task-for-non-compliance/articleshow/60919238.cms?fbclid=IwAR3RH-tgg5vstgf69usarQlIwvSWtq6NqaS2v0jFqcBejXPL1SEN3j3CVeE>;
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पिछले 7 साल से भीलवाड़ा में जिंदल को भगाने का अभियान चल रहा है। बार बार धरने, प्रदर्शन, जुलुस, ज्ञापन वगेरह होते है, किन्तु खनन जारी रहता है। सभी पेड मीडिया पार्टियों के नेता समय समय पर जिंदल के खिलाफ प्रदर्शन का ड्रामा करते रहते है।
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ड्रामा इसीलिए क्योंकि पेड मीडिया पार्टियो के ये सभी नेता खनिजो की इस लूट को रोकने के लिए आवश्यक क़ानून का विरोध करते है। यदि पेड मीडिया पार्टियों के नेता धन वापसी पासबुक क़ानून को गेजेट में छापने की मांग करेंगे तो पहला नुकसान यह होगा कि पेड मीडिया इन्हें कवरेज देना बंद कर देगा, और दूसरा नुकसान यह होगा कि, जिंदल उन्हें चंदा / घूस देना बंद कर देगा। तो ड्राफ्ट विहीन मांग को लेकर जनहित याचिकाओ एवं हवाई विरोध प्रदर्शन के ड्रामें चलते रहते है। और भीलवाड़ा में समाधान को टालने के लिए समस्या उठाने का यह ड्रामा पिछले 7 वर्षो से चल रहा है !!
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और भारत में इस तरह की हजारो ( हाँ, सैकड़ो नहीं हजारो) माइंस है, जहाँ इसी तरह की लूट चल रही है। इस लूट का कोई हिसाब-किताब लेखा जोखा नहीं। औसतन 100 रू के खनिज 20 रू में खोद लिए जाते है। तो यहाँ भ्रष्टाचार नहीं है, सीधी लूट है।
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उदाहरण के लिए जब ब्रिटिश भारत से गए तो टाटा को कई सारे माइनिंग राइट्स फ्री में देकर गए थे, और उनमें से एक माइंस की खबर सामने आने में 70 साल लग गए। टाटा के पास झारखण्ड में 25 पैसे एकड़ के हिसाब से कोयला खोदने के राइट्स है !! मतलब वह साल का 1 रूपया चुकाता है, और मर्जी पड़े जितना कोयला निकालता है। आज तक भारत में एक भी प्रधानमंत्री की हिम्मत नहीं हुई कि वह टाटा को नोटिस भेजकर 25 पैसे की जगह 50 पैसे कर सके !! बाजार भाव की तो बात ही भूल जाइए !! ( बाजार भाव 1500 से 2000 रू टन है )
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सारी निर्माण इकाइयां, कारखाने, औद्योगिक विकास आदि कच्चे माल की सस्ती उपलब्धता पर निर्भर करता है। दुर्भाग्य से भारत में खनिजो की पहले से कमी है। इसी खनिज को लूटने के लिए ब्रिटिश-फ़्रांसिस साम्राज्य भारत में आये। जब भारत आजाद हुआ तो नागरिको ने यह मांग की थी कि भारत के प्राकृतिक संसाधनों को भारत के समस्त नागरिको की संपत्ति घोषित करो। किन्तु जिन लोगो के हाथ में सत्ता आयी थी वे नागरिको की इस संयुक्त संपत्ति को खुद के कब्जे में रखना चाहते थे। अत: उन्होंने इन संसाधनों को सरकारी अधिकार में ले लिया।
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और आज सरकारे जो खनिज एवं प्राकृतिक संसाधन लुटा रही है, वह भारत के समस्त नागरिक की संपत्ति है। यदि हमारे पूर्वजो ने अंग्रेजो से लोहा लेकर उन्हें यहाँ से नहीं भगाया होता तो यह संपत्ति बचती नहीं थी।
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यदि भारत के नागरिक यह क़ानून लाने में सफल नहीं होते है तो जल्दी ही भारत के खनिज एवं प्राकृतिक संसाधन (प्राकृतिक संसाधन में जमीन स्पेक्ट्रम आदि भी शामिल है) लूट लिए जायेंगे। और यदि एक बार हमने प्राकृतिक संसाधन गँवा दिए तो भारत औद्योगिक विकास के लिए हमेशा के लिए परजीवी हो जाएगा। क्योंकि जो देश कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर हो जाता है उसकी रीढ़ हमेशा के लिए टूट जाती है। धनवापसी क़ानून इस लूट को रोक देगा।
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(2) समाधान - प्रस्तावित धनवापसी पासबुक
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इस क़ानून का सार : इस प्रस्तावित क़ानून के गेजेट में छपने के तुरंत बाद भारत सरकार के नियंत्रण में मौजूद सभी खनिज एवं प्राकृतिक संसाधन देश के नागरिको की संपत्ति घोषित हो जायेंगे, और देश के समस्त खनिज+स्पेक्ट्रम+सरकारी भूमि से प्राप्त होने वाली रॉयल्टी एवं किराया 135 करोड़ भारतीयों का संयुक्त खाता नामक बैंक एकाउंट में जमा होगा। इकट्ठा हुयी इस राशि का 65% हिस्सा हर महीने सभी भारतीयों में बराबर बांटा जाएगा और 35% हिस्सा सेना के खाते में जाएगा।
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खनिजो की नीलामी करके पैसा इकठ्ठा करने वाला राष्ट्रिय खनिज रॉयल्टी अधिकारी धन वापसी पासबुक में दायरे में होगा और नागरिक पटवारी कार्यालय में जाकर उसे नौकरी से निकालने के लिए अपनी स्वीकृति दे सकेंगे। यदि खनिज अधिकारी या उसके स्टाफ के खिलाफ घपला करने की या अन्य कोई शिकायत आती है तो सुनवाई करने और दंड देने की शक्ति जज के पास न होकर आम नागरिको की जूरी के पास रहेगी। यह क़ानून देश की सभी खदानों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाता है।
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इस क़ानून को संसद से पास करने की जरूरत नही है। प्रधानमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है।
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(1) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर प्रत्येक मतदाता को एक धनवापसी पासबुक मिलेगी। तब भारत की केंद्र सरकार को होने वाली खनिज रॉयल्टी, स्पेक्ट्रम रॉयल्टी और केंद्र सरकार द्वारा अधिगृहीत जमीनों के किराये से प्राप्त राशि का 65% हिस्सा भारत के नागरिकों में समान रूप से बांटा जायेगा, और हर महीने यह धनराशि सीधे आपके बैंक खाते में जमा होगी। शेष 35% हिस्से का उपयोग सिर्फ सेना में सुधार के लिए खर्च होगा। जब आप राशि प्राप्त करेंगे तो इसकी एंट्री धन वापसी पासबुक में आएगी।
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(2) यह कानून ऐसा कोई वादा नहीं करता कि आपको प्रति महीने 500 रू या 1000 रू या कोई स्थिर राशि प्राप्त होगी। यदि खनिजों / स्पेक्ट्रम का या जमीनों का बाजार मूल्य बढ़ता है तो आमदनी और किराया बढ़ सकता है। लेकिन यदि खनिज आमदनी और किराया घटता है तो नागरिकों को हर महीने मिलने वाली यह राशि भी घटेगी।
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(स्पष्टीकरण : खनिज रॉयल्टी के रूप में मिलने वाली यह राशि सरकार की तरफ से दिया गया अनुदान या सहायता नहीं है। चूंकि, देश के खनिज संसाधनों पर देश के सभी नागरिको का बराबर हक़ है अत: यह राशि सभी भारतीयों को बराबर मिलेगी, और सरकार गरीब-अमीर के आधार पर इसके वितरण पर ऐसा कोई नियम नहीं लगाएगी, जिससे गरीब आदमी को ज्यादा हिस्सा एवं अमीर आदमी कम पैसा मिले। किन्तु यदि प्रधानमंत्री प्रस्तावित टू चाइल्ड पालिसी क़ानून गेजेट में छाप देते है तो टू चाइल्ड पालिसी के ड्राफ्ट में दिए गए निर्देशों के अनुसार संतानों की संख्या के आधार पर नागरिको को प्रति माह प्राप्त होने वाली खनिज रोयल्टी में कटौती / बढ़ोतरी होगी।)
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(3) राष्ट्रीय सम्पत्तियों पर नागरिको के स्वामित्व की घोषणा : भारत के नागरिक देश की सभी खदानों, स्पेक्ट्रम, IIM अहमदाबाद को शामिल करते हुए सभी IIM के भू-खंडो, जेएनयू के भू-खंडो, यूजीसी द्वारा पोषित सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों जिनका स्वामित्व निजी कंपनियों या ट्रस्टो के पास नहीं है, के भू-खंडो को संयुक्त और समान रूप से भारतीय नागरिकों के स्वामित्व की संपत्ति घोषित करते है। अब से ये भू-खंड भारत की राज्य सरकार या भारत की केंद्र सरकार या किसी अन्य सरकारी पक्ष या निजी पक्ष की संपत्ति नहीं है। भारत के सभी अधिकारीयों, प्रधानमंत्री, हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशो से विनती की जाती है कि, भारत के नागरिको के उपरोक्त फैसले के विरुद्ध कोई भी याचिका स्वीकार ना करे।
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निम्नलिखित मंत्रालयों और विभागों के सभी भू-खंड राष्ट्रीय खनिज अधिकारी के क्षेत्राधिकार में आयेंगे :
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(1) विज्ञान-चिकित्सा-गणित-इंजीनियरिंग को छोड़कर IIM, UGC द्वारा पोषित सभी विश्वविद्यालय व महाविद्यालय
(2) एयरपोर्ट, एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइन्स के स्वामित्व वाले सभी भवन
(3) पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय
(4) उपभोक्ता मामलें एवं लोक वितरण मंत्रालय
(5) सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय
(6) लघु उद्योग एवं कृषि एवं ग्राम उद्योग मंत्रालय
(7) कपड़ा उद्योग मंत्रालय
(8) युवा मामलें और खेल मंत्रालय
(9) सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय
(10) मानव संसाधन विकास मंत्रालय
(11) ग्रामीण विकास मंत्रालय
(12) सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय
(13) शहरी विकास एवं गरीबी उपशमन मंत्रालय
(14) राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं नीति आयोग
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(4) राष्ट्रीय खनिज रॉयल्टी अधिकारी का निजी व्यक्तियों, कंपनियों, ट्रस्टों, राज्य सरकारो एवं नगर/ जिला शासन के स्वामित्व वाले भू-खण्डों, सेना, न्यायालयों, जेलों, रेलवे, बस स्टेशनों, कक्षा 12 तक के सरकारी विद्यालयों और कर संग्रहण कार्यालयों द्वारा उपयोग में लिए जा रहे भू-खण्डों पर कोई अधिकार नहीं होगा।
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(5) खनिज रॉयल्टी अधिकारी 1947 से पहले एवं बाद में लीज पर दी गयी सभी लीज शुदा खदानों की लीज का बाजार भाव से पुनर्मूल्यांकन करके तय करेगा कि क्या अमुक खदान की रॉयल्टी राशि बढ़ाई जानी चाहिए या नहीं। देश की अन्य सभी खदानों, कच्चे तेल के कुओ आदि से होने वाली आय भी NMRO प्राप्त करेगा।
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#DhanVapsiPassbook का सारांश समाप्त
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धनवापसी पासबुक का पूरा क़ानून यहाँ देखें -
Facebook.com/pawan.jury/posts/2212549868863237
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu May 07 2020 07:48:58 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

धनवापसी पासबुक के प्रस्तावित कानून की कुंजी
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यह क़ानून देश के खनिजो की लूट रोकने के लिए लिखा गया है। इस क़ानून के गेजेट में छपने के तुरंत बाद भारत सरकार के नियंत्रण में मौजूद सभी खनिज एवं प्राकृतिक संसाधन देश के नागरिको की संपत्ति घोषित हो जायेंगे। यह क़ानून देश की सभी खदानों की “बिक्री पर प्रतिबंध” भी लगाता है। इस क़ानून को लोकसभा से पास करने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री हस्ताक्षर करके इसे सीधे गेजेट में प्रकाशित कर सकते है।
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(1) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर प्रत्येक मतदाता को एक धनवापसी पासबुक मिलेगी। तब भारत की केंद्र सरकार को होने वाली खनिज रॉयल्टी, स्पेक्ट्रम रॉयल्टी और केंद्र सरकार द्वारा अधिगृहीत जमीनों के किराये से प्राप्त राशि का 65% हिस्सा भारत के नागरिकों में समान रूप से बांटा जायेगा, और हर महीने यह धनराशि सीधे आपके बैंक खाते में जमा होगी। शेष 35% हिस्से का उपयोग सिर्फ सेना में सुधार के लिए खर्च होगा। जब आप राशि प्राप्त करेंगे तो इसकी एंट्री धन वापसी पासबुक में आएगी।
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(2) यह कानून ऐसा कोई वादा नहीं करता कि आपको प्रति महीने 500 रू या 1000 रू या कोई स्थिर राशि प्राप्त होगी। यदि खनिजों / स्पेक्ट्रम का या जमीनों का बाजार मूल्य बढ़ता है तो आमदनी और किराया बढ़ सकता है। लेकिन यदि खनिज आमदनी और किराया घटता है तो नागरिकों को हर महीने मिलने वाली यह राशि भी घटेगी।
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(3) खनिजो की नीलामी करके पैसा इकठ्ठा करने वाला राष्ट्रिय खनिज रॉयल्टी अधिकारी धन वापसी पासबुक में दायरे में होगा और नागरिक पटवारी कार्यालय में जाकर उसे नौकरी से निकालने के लिए अपनी स्वीकृति दे सकेंगे। यदि खनिज अधिकारी या उसके स्टाफ के खिलाफ घपला करने की या अन्य कोई शिकायत आती है तो सुनवाई करने और दंड देने की शक्ति जज के पास न होकर आम नागरिको की जूरी के पास रहेगी।
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(4) यह कानून सिर्फ केंद्र सरकार के अधीन आने वाली खदानो, स्पेक्ट्रम और जमीनों पर लागू होगा। किन्तु केंद्र सरकार के अधीन जल संसाधन इस क़ानून के दायरे से बाहर रहेगें। यह कानून राज्य, नगरपालिकाओं, जिले, तहसील, ग्राम पंचायतों के अधिकार में आने वाली खदानों और जमीनों पर भी लागू नहीं होगा। सेना, न्यायालयों, जेलों, रेलवे, बस स्टेशनों, कक्षा 12 तक के सरकारी विद्यालयों और कर संग्रहण कार्यालयों द्वारा उपयोग में लिए जा रहे भू-खण्ड भी इस कानून के दायरे से बाहर रहेंगे।
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यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो PM को एक पोस्टकार्ड / ट्विट भेजे – प्रधानमंत्री जी, धनवापसी पासबुक कानून गेजेट में छापें - #DhanVapsiPassbook
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पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें - <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/2212549868863237>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon May 11 2020 20:08:32 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

@PmoIndia को ट्विट करें कि , अनिवार्य टीकाकरण अधिनियम 1892 को रद्द करें।
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यदि आप अनिवार्य टीकाकरण क़ानून का विरोध करते है तो प्रधानमंत्री को यह ट्विट करें -
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@PMOIndia , #अनिवार्य_टीकाकरण_अधिनियम_1892_रद्द_करें , #RepealCompulsoryVaccinationAct1892

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इससे अनिवार्य टीकाकरण का फर्जी विरोध करने वाले फर्जी कार्यकर्ता एक्सपोज हो जायेंगे। क्योंकि अनिवार्य टीकाकरण का फर्जी विरोध करने वाले फर्जी कार्यकर्ता ट्विट नहीं भेजने वाले है।
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मेरा ट्वीट - <https://twitter.com/PawanJury/status/1259937707062636548>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon May 11 2020 20:42:22 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Covid19 & Lockdown
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हमें 2 स्थितियों से निपटना है -
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(i) Covid19
(ii) लॉकडाउन
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और ये दोनों अलग अलग चीजे है। पेड मीडिया ने इन्हें बहुत ही सफाई से आपस में गड्ड मड्ड कर दिया है !! असल में कोरोना से जाने वाली जानों की रोकथाम का घरबंदी से उतना ही सम्बन्ध है, जितना नोटबंदी का काले धन की रोकथाम से था !!
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(1) कोरोना वायरस से जितनी जानें जाने वाली है, उतनी जाने ही वाली है. लॉकडाउन जारी रहने से इसमें कोई कमी नहीं आएगी।
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(2) लेकिन यदि लॉकडाउन जारी रहता है तो लॉकडाउन भी जानें लेगा, और कोरोना भी जानें लेगा। तो इस तरह हमें दोहरा नुकसान होने वाला है।
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तो कोरोना पर आपको इधर उधर से जितना भी ज्ञान मिल रहा है, उस ज्ञान से यह निष्कर्ष निकालने का प्रयास करें कि लॉकडाउन जारी रहना चाहिए या नहीं।
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और यदि आपको लगता है कि लॉकडाउन हटाकर डी क्राउडिंग लागू करना चाहिए, तो पीएम को लॉकडाउन खोलने के लिए ट्विट करें। क्योंकि यदि आपको लगता है कि लॉकडाउन हटना चाहिए और फिर भी आप पीएम को ट्विट नहीं करते है तो .... तो फिर आगे कहने को कुछ रह नहीं जाता !!
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#लॉकडाउन_समाप्त_करें
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue May 12 2020 11:29:01 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

प्रधानमंत्री एवं मंत्रियो पर वोट वापसी लागू करने का प्रस्ताव
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(Vote Vapasi over Pm and Central ministers)
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इस कानून का सार : यह कानून प्रधानमंत्री एवं केन्द्रीय मंत्रियो को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाने के लिए लिखा गया है। इस कानून को लोकसभा से पास करने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है। #P20180436109
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यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो प्रधानमंत्री को एक पोस्टकार्ड भेजे। पोस्टकार्ड में यह लिखे :
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“प्रधानमंत्री जी, कृपया प्रधानमंत्री एवं केन्द्रीय मंत्रियो को वोट वापसी पासबुक के दायरे में लाने के आदेश जारी करें - #VoteVapasiPM , #VoteVapasiMinister
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====क़ानून ड्राफ्ट का प्रारम्भ====
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टिप्पणियाँ इस क़ानून का हिस्सा नहीं है। नागरिक एवं अधिकारी टिप्पणियों का इस्तेमाल दिशा निर्देशों के लिए कर सकते है।
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(01) यह कानून गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, वित्त मंत्री एवं नाभिकीय ऊर्जा मंत्री पर लागू नहीं होगा।
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(02) इस कानून में "मंत्री" शब्द से आशय है, धारा (1) दिए गए 5 मंत्रालयों के अतिरिक्त केंद्र सरकार के अधीन आने वाले सभी मंत्रालयों के केन्द्रीय मंत्री।
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(03) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर राज्य के प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। निम्नलिखित जनप्रतिनिधि इस वोट वापसी पासबुक के दायरे में आयेंगे :
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3.1. प्रधानमंत्री
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3.2. धारा (1) में बताये गए 5 मंत्रियो को छोड़ते हुए केन्द्रीय सरकार अधीन सभी केन्द्रीय मंत्री
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तब यदि आप प्रधानमंत्री या किसी केन्द्रीय मंत्री के काम-काज से संतुष्ट नहीं है, और उसे निकालकर किसी अन्य व्यक्ति को लाना चाहते है तो पटवारी कार्यालय में जाकर स्वीकृति के रूप में अपनी हाँ दर्ज करवा सकते है। आप अपनी हाँ SMS, ATM या मोबाईल APP से भी दर्ज करवा सकेंगे। आप किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दे सकते है, या अपनी स्वीकृति रद्द कर सकते है। आपकी स्वीकृति की एंट्री वोट वापसी पासबुक में आएगी। यह स्वीकृति आपका वोट नही है। बल्कि यह एक सुझाव है।

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(04) प्रधानमंत्री एवं मंत्री बनने के इच्छुक व्यक्तियों द्वारा आवेदन करना :
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30 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक यदि प्रधानमंत्री या केन्द्रीय मंत्री बनना चाहता है तो वह कलेक्टर के सामने स्वयं या किसी वकील के माध्यम से ऐफिडेविट प्रस्तुत कर सकता है। जिला कलेक्टर सांसद के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क‍ लेकर अर्हित पद के लिए उसका आवेदन स्वीकार कर लेगा, और एफिडेविट को स्कैन करके प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा।
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(05) मतदाताओ द्वारा स्वीकृति दर्ज करना :
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(5.1) कोई भी नागरिक किसी भी दिन अपनी वोट वापसी पासबुक या मतदाता पहचान पत्र के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर किसी भी प्रत्याशी के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर एवं वोट वापसी पासबुक में मतदाता की हाँ को दर्ज करके रसीद देगा। पटवारी मतदाताओं की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम एवं मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है।
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(5.2) स्वीकृति ( हाँ ) दर्ज करने के लिए मतदाता 3 रूपये फ़ीस देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी
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(5.3) यदि कोई मतदाता अपनी स्वीकृती रद्द करवाने आता है तो पटवारी एक या अधिक नामों को बिना कोई फ़ीस लिए रद्द कर देगा ।
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(5.4) प्रत्येक सोमवार को महीने की 5 तारीख को, कलेक्टर पिछले महीने के अंतिम दिन तक प्राप्त प्रत्येक प्रत्याशियों को मिली स्वीकृतियों की गिनती प्रकाशित करेगा। पटवारी अपने क्षेत्र की स्वीकृतियो का यह प्रदर्शन प्रत्येक सोमवार को करेगा।
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[ टिपण्णी : कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी स्वीकृति SMS, ATM एवं मोबाईल एप द्वारा दर्ज करवा सके।
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रेंज वोटिंग - प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता किसी प्रत्याशी को -100 से 100 के बीच अंक दे सके। यदि मतदाता सिर्फ हाँ दर्ज करता है तो इसे 100 अंको के बराबर माना जाएगा। यदि मतदाता अपनी स्वीकृति दर्ज नही करता तो इसे शून्य अंक माना जाएगा । किन्तु यदि मतदाता अंक देता है तब उसके द्वारा दिए अंक ही मान्य होंगे। रेंज वोटिंग की ये प्रक्रिया स्वीकृति प्रणाली से बेहतर है, और ऐरो की व्यर्थ असम्भाव्यता प्रमेय ( Arrow’s Useless Impossibility Theorem ) से प्रतिरक्षा प्रदान करती है।]
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(06) प्रधानमंत्री की नियुक्ति एवं निष्कासन :
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पदासीन प्रधानमंत्री निचे दी गयी दोनों परिस्थितियों में से अपनी पसंद के अनुसार उच्च संख्या को चुन सकते है –
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(6.1) नागरिको द्वारा दी गयी स्वीकृतियों की संख्या, अथवा
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(6.2) प्रधानमंत्री का समर्थन करने वाले लोकसभा सांसदों को चुनाव में प्राप्त हुए मतों का कुल योग।
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(6.3.) यदि किसी प्रत्याशी की स्वीकृतियों की संख्या पदासीन प्रधानमंत्री की स्वीकृतियों या प्रधानमंत्री का समर्थन करने वाले सांसदों को प्राप्त मतों की कुल संख्या से 1 करोड़ अधिक हो जाती है तो पदासीन प्रधानमंत्री अपना पद त्याग सकते हैं या उन्हें ऐसा करने की जरुरत नहीं है, और सांसदों से सबसे अधिक अनुमोदन प्राप्त करने वाले व्यक्ति को नया प्रधानमंत्री नियुक्त करने के लिए कह सकते है या उन्हें ऐसा करने की जरुरत नहीं है। अथवा सांसद सबसे अधिक स्वीकृतियां प्राप्त करने वाले व्यक्ति को नया प्रधानमंत्री चुन सकते है या उन्हें ऐसा करने की जरुरत नहीं है।
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[ स्पष्टीकरण : मान लीजिये कि, X मौजूदा पीएम है, और उसे लोकसभा में 300 सांसदों का समर्थन प्राप्त है। मान लीजिये कि, इन 300 सांसदों को लोकसभा चुनाव में कुल 33 करोड़ मत प्राप्त हुए थे, और X को नागरिको से सीधे प्राप्त होने वाली स्वीकृतियो की संख्या 30 करोड़ है।
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(i) मान लीजिये कि Y पीएम का एक प्रत्याशी है और उसे 32 करोड़ नागरिक स्वीकृतियां दे देते है तो भी X पीएम बना रहेगा, क्योंकि X को जिन सांसदों का समर्थन प्राप्त है, उनके मतों का कुल योग 33 करोड़ है। किन्तु यदि Y को 34 करोड़ स्वीकृतियां मिल जाती है तो X अपना इस्तीफा दे सकता है, या नहीं भी दे सकता है।
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(ii) अब मान लीजिये कि, Y को 34 करोड़ स्वीकृतियां मिल जाती है, किन्तु यदि X प्रधानमंत्री के रूप में संतोषप्रद काम कर रहा है, अत: X की स्वीकृतियां बढ़कर 35 करोड़ हो जाती है, तो भी X पीएम बना रहेगा। ]
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(07) केन्द्रीय मंत्रीयों की नियुक्ति एवं निष्कासन : यदि किसी मंत्रालय के मंत्री पद के किसी प्रत्याशी को 30 करोड़ से अधिक स्वीकृतियां प्राप्त हो जाती है, और यदि यह स्वीकृतियां अमुक मंत्रालय के पदासीन मंत्री से 1 करोड़ अधिक भी है, तो प्रधानमंत्री मौजूदा मंत्री को निकाल कर सबसे अधिक स्वीकृति पाने वाले व्यक्ति को अमुक मंत्रालय में मंत्री नियुक्त कर सकते है, या नहीं भी कर सकते है। मंत्री की नियुक्ति के बारे में अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री का ही होगा।
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(08) जनता की आवाज :
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(8.1) यदि कोई मतदाता इस कानून में कोई परिवर्तन चाहता है तो वह कलेक्टर कार्यालय में एक एफिडेविट जमा करवा सकेगा। जिला कलेक्टर 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर एफिडेविट को मतदाता के वोटर आई.डी नंबर के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करके रखेगा।
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(8.2) यदि कोई मतदाता धारा (8.1) के तहत प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर अपना समर्थन दर्ज कराना चाहे तो वह पटवारी कार्यालय में 3 रूपए का शुल्क देकर अपनी हां / ना दर्ज करवा सकता है। पटवारी इसे दर्ज करेगा और हाँ / ना को मतदाता के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल देगा।
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======ड्राफ्ट का समापन=====
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun May 17 2020 07:08:23 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा है कि कोरोना आर्थिक संकट से उबरने के लिए केंद्र सरकार को देशभर के धार्मिक ट्रस्टों के पास पड़ा सोना अपने कब्जे में ले लेना चाहिए। क्या आप इस सुझाव से सहमत है?
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(1) मंदिरों के पास जो संपत्ति है, वह उन्हें श्रधालुओ द्वारा दान में मिली है। मंदिर देश या सरकार की संपत्ति नहीं होती है। मंदिर हिन्दू समुदाय की संपत्ति है। मंदिरों को चलाने के लिए सरकार अपने कोष से कोई व्यय नहीं करती। एक चवन्नी भी नहीं।
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तो जब कोई राजनेता कहता है कि मंदिरों की जमीन एवं संपत्ति का अधिग्रहण कर लेना चाहिए तो मैं इसे अधिग्रहण नहीं कहता। मैं इसे लूट कहता हूँ। यह लूट है !! सीधी लूट !!! और मुझे यह कहने में कोई परहेज नहीं कि ऐसा प्रस्ताव देने वाले राजनेता गजनीयों की तर्ज पर व्यवहार कर रहे है !!
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कोई व्यक्ति यदि सरकार को दान देना चाहेगा तो वह प्रधानमन्त्री राहत कोष में सीधे दान भेज सकता है। जाहिर है, जब व्यक्ति किसी मंदिर को दान देना चाहता है तो उसकी मंशा मंदिर को दान देने की होती है, सरकार को नहीं !! और सरकार जब यह दान हस्तगत कर लेती है, तो यह गैर कानूनी भी है, और अनैतिक भी है !!
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वैसे भी भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है, और सरकार को यह हक़ किसी भी तरह से नहीं है कि वे किसी धार्मिक संस्था की संपत्ति का हरण करें। यदि सरकार को पैसा चाहिए तो सरकार टेक्स लगा सकती है, दान की अपील जारी कर सकती है, किन्तु हमारी संपत्ति का बलात अधिग्रहण नही कर सकती।
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बहरहाल, पेड मीडिया के प्रायोजक चाहते है कि सभी संपत्ति शाली मंदिरों को लूट लिया जाना चाहिए। और चूंकि चुनाव जीतने एवं अपनी छवि बनाए रखने के लिए हमारे सभी नेता पेड मीडिया पर बुरी तरह से निर्भर करते है अत: भारत की मुख्यधारा की सभी पार्टियों के सभी नेता मंदिरों को लूट लिए जाने के समर्थन में है।
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जब मोदी साहेब मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने भी कई मंदिरों की सम्पतियों का अधिग्रहण किया। कोंग्रेस, सपा, बसपा और आम आदमी पार्टी के नेता भी हमेशा से मंदिरों की संपत्ति का अधिग्रहण किये जाने के समर्थक रहे है, और उन्होंने मंदिरों की संपत्ति लूटने का कोई मौका नहीं गंवाया है !! और आने वाले समय में भी मुख्यधारा में नजर आने वाली पार्टियों के सभी नेता मंदिरों की संपत्ति लूट लेने के प्रयास करते रहेंगे। कोरोना हो या ना हो, मंदिरों की संपत्ति वे छोड़ने वाले नहीं है। वे कोई न कोई बहाना निकालकर मंदिरों को लूटने की योजना सामने रखते रहेंगे।
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(2) यह एक तथ्य है कि मंदिरों में आने वाले दान को ट्रस्टियों द्वारा सही दिशा में खर्च नहीं किया जाता है। मंदिर अपनी संपत्ति का ज्यादातर इस्तेमाल तड़क भड़क, ऐशो आराम एवं अनुत्पादक मदों में करते है। इस समस्या का समाधान हिन्दू बोर्ड की स्थापना है। यदि राष्ट्रिय हिन्दू बोर्ड के प्रस्तावित क़ानून को गेजेट में प्रकाशित कर दिया जाता है तो मंदिरों में -
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(i) वारिसान / उत्तराधिकार परम्परा का अंत हो जाएगा
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(ii) हिन्दू श्रधालुओ को यह अधिकार मिलेगा कि वे ट्रस्टियों को बदल सके
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(iii) सभी मंदिर सरकारी नियंत्रण से मुक्त होकर सीधे श्रधालुओ के नियंत्रण में आ जायेंगे
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उपरोक्त बदलाव आने से ट्रस्टी प्राप्त होने वाले दान को परोपकार के कार्यो में खर्च करने लगेंगे, और दान का उपयोग विलासिता में करने की प्रवृति में कमी आएगी। सिक्ख धर्म में गुरुद्वारों का प्रबंधन इसी तरीके से किया जाता है। गुरूद्वारे SGPC एक्ट द्वारा शाषित होते है, और आम सिक्ख श्रधालुओ को अपने ग्रंथियों (ट्रस्टियों) को चुनने का अधिकार प्राप्त है। और यह एक बड़ी वजह है कि, गुरुद्वारों में प्राप्त दान का इस्तेमाल बेहतर तरीके से किया जाता है।
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हिन्दू कार्यकर्ताओ को यह बात समझनी चाहिए कि, यदि उन्होंने हिन्दू मंदिरों का प्रशासन सुधारने के लिए आवश्यक क़ानून लागू करवाने के लिए प्रयास शुरू नही किये तो पेड मीडिया के प्रायोजक किसी न किसी बहाने से राजनेताओ का इस्तेमाल करके भारत के ज्यादातर मंदिरों को लूट लेंगे। और एक बार यदि मंदिर उजाड़ हो गए तो हिन्दू धर्म का क्षरण बेहद तेजी से होना शुरू होगा।
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किस तरह पेड मीडिया के प्रायोजक मंदिरों को ध्वस्त करने की नीति पर काम कर रहे है, और किस क़ानून को गेजेट में छापकर इस प्रक्रिया को रोका जा सकता है, इस बारे में विस्तृत विवरण मैंने इस जवाब में दिया है – <https://www.facebook.com/groups/JuryCourt/permalink/894058847633860/>;
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#HinduBoard
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri May 22 2020 07:15:24 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भारत और अमेरिका के बीच तालाबंदी का अंतर

(1) अमेरिका में कोई जबरदस्ती चिकित्सा नहीं की गई।

(1.1) अमेरिका में किसी भी तरह की जबरदस्ती टेस्टिंग नहीं की गई। अगर कोई नागरिक टेस्टिंग के लिए मना करता है तो उसे घर में रहने का ऑर्डर दिया गया, और अगर वह आर्डर नहीं मानता तो उस पर कानूनी कार्रवाई की गई। लेकिन किसी प्रकार की जबरदस्ती की टेस्टिंग नहीं हुई।
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(1.2) अमेरिका में अस्पताल में जाकर इलाज कराना कानूनन बाध्य नहीं था। अगर उसे corona पॉजिटिव पाया जाता है तो वह या तो हॉस्पिटल में जा सकता है या घर रह सकता है। पर भारत में कानून छापे गए हैं उसमें या तो मरीज को खुद उठकर अस्पताल जाना होगा, या पुलिस उसे खींचकर लेकर जाएगी, या फिर निजी अस्पतालों में उसका इलाज होगा जहां उसे ₹10000 तक देना पड़ सकता है।
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(1.3) अमेरिका में मरीज को जबरदस्ती औषधि नहीं दी गई जबकि भारत में पुलिस द्वारा जबरदस्ती मरीजों को दवाई लेने के लिए बाध्य किया गया। और दवा लेने पर इनकार करने पर मरीज के खिलाफ मुकदमें दर्ज किये गए। और हाइड्रो क्लोरो क्वीन उन मरीजो को भी दी गयी जिनमे करोना के लक्षण नहीं थे !!!
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(2) भारत के तुलना में अमेरिका में लॉक डाउन नहीं के बराबर था।
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(2.1) लॉक डाउन के सारे दिनों में शहर की मेट्रो एवं बसें चालू थी। अमेरिका की मेट्रो ट्रेन मात्र 1 दिन के लिए बंद थी वह भी रखरखाव इत्यादि के लिए, और उस दिन भी शहर के अंदर की सारी बसें चालू थी।
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(2.2) शहर के अंदर की सारी बसें और ट्रेनें चालू थी पर उनकी फ्रीक्वेंसी यानी बारंबारता कम थी यानी कम ट्रेनें और बसें चल रही थी।
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(2.3) अमेरिका के अंदर की सारी फ्लाइट है चालू थी यानी आप हवाई जहाज से पूरे अमेरिका में कहीं भी आ जा सकते थे।
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(2.4) निजी वाहन पर कोई भी रोक-टोक नहीं थी पर उसमें 3 लोग से ज्यादा नहीं आ जा सकते थे पर अगर वह एक घर की कार है यानी उस में बैठने वाले सारे सदस्य एक ही परिवार के हैं तो अधिक लोग भी जा सकते थे।
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(2.5) अमेरिका में mask पहनने की कोई जबरदस्ती नहीं थी जहां पर सोशल डिस्टेंसिंग रख पाना कठिन हो जाता है वहीं पर मास्क पहनने की जबरदस्ती की गई थी। मतलब, किसी भी प्रकार के पार्क या सड़क पर चलने के लिए या गलियों में आपको mask की आवश्यकता नहीं थी।
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(2.6) अमेरिका में ऐसा कोई भी कानून नहीं बनाया गया था कि आपको कोई एप इंस्टॉल करना जरुरी हो। और उसी के द्वारा आप फ्लाइट या अन्य तरह की यात्रा कर सकते हैं। भारत में आरोग्य सेतु को आवश्यक किया गया।
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(2.7) आवश्यक सेवाएं जैसे खाना शराब, गाड़ियों की मरम्मत और हर तरह की मरम्मत तो एक भी दिन के लिए बंद नहीं किया गया था। आवश्यक दुकानों के बाहर शुरुआती दिनों में कुछ लाइने लगी थी पर धीरे-धीरे वह भी समाप्त हो गई। दुकानों के अंदर ज्यादा ग्राहकों को एक समय में आने से रोका गया था।
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(2.8) होटलों से होम डिलीवरी 1 दिन के लिए भी बंद नहीं थी आप कभी भी होम डिलीवरी मंगा सकते थे। बहुत सारे होटल जो बंद थे उसका कारण यह था ग्राहकों की कमी, जिसकी वजह से उन्हें बंद रखना पड़ रहा था।
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तात्पर्य यह है कि, भारत जैसी तालाबंदी यूएसए में नहीं थी। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत की जनता को मूर्ख बनाने के लिए और उन्हें इस बात का विश्वास दिलाने के लिए कि अमेरिका में भी लॉक डाउन है यह सारी चीजें की गई पर धरातल पर अगर देखें तो अमेरिका में कोई भी तालाबंदी यानी लॉक डाउन नहीं था।
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इन ख़बरों को विदेशी निजी हुई मीडिया द्वारा छुपाना समझ में आता है पर भारत सरकार द्वारा प्रायोजित दूरदर्शन ने भी इस प्रकार की कोई समाचार नहीं दिए। इस प्रकार यह समझा जा सकता है कि सारी पार्टियां सारी पार्टियां या संगठन आरएसएस आप अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी हर कोई एक समान विचार रखता है उनके में जनता के प्रति कोई आदर भाव उनके कष्ट के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है सारी पार्टियां एक तरह का ही व्यवहार कर रही है।
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समाधान - दूरदर्शन अध्यक्ष पर वोट वापसी पासबुक एवं जूरी कोर्ट
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri May 22 2020 07:40:53 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

कृपया प्रधानमंत्री जी को ट्वीट भेजें कि तत्काल प्रभाव से बिल गेट्स और उसकी संस्थायों और बिल गेट्स या उसकी संस्थायों से पैसा लेने वाले सभी एनजीओ को भारत मे बैन करें। कारण है कोरोना की झूठी दहशत फैलाकर लोगों को लॉकडाउन के लिए विश्वास दिलाया गया और पूरी अर्थव्यवस्था और बहुत सारी जान माल का नुकसान झेलना पड़ा।
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ट्वीट्स--
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@PmoIndia #बिलगेट्स_को_बैन_करें #बिलगेट्स_संस्थाए_बैन_करें #कारण_झूठी_कोरोना_दहशत. बिल गेट्स का वीजा रद्द करें, उसकी संस्थाएं रद्द करें और भारत मे गेट्स और उसकी संस्थायों से पैसा लेने वाले NGOs भी बैन करें क्योंकि उसने झूठी कोरोना दहशत फैलाई और यह गैरजरूरी लॉकडाउन का आधार बना।
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@PmoIndia #BanBillGates #BanBillFoundation #ReasonFakeCoronaScare . Pls cancel Bill Gates' visa. Ban his Foundations. Ban NGOs in India taking money from Gates / his Foundations. Because he created fake corona scare and basis for unneeded lockdown
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इटली की संसद ने बिल गेट्स को ग्रिफ्तार करने की मांग की - <https://www.rt.com/news/488912-italy-parliament-bill-gates-coronavirus/?fbclid=IwAR0-1OQLVddZYBFTVqXyLJ44f4luNVr8hfayXYnAasRahtvikKt3OmGfT-s>;
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मेरा ट्विट - <https://twitter.com/PawanJury/status/1263736369563815937>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri May 22 2020 08:50:19 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

@PmoIndia को ट्विट करके विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) छोड़ने को कहें। WHO ने इटली एवं ब्रिटेन के कोरोना मृतको की उम्र, अन्य सहायक गंभीर बीमारियों, शराब-धूम्रपान की आदतों के आंकड़ो को छिपाया ताकि नागरिको में भय फैलाकर उन्हें लॉकडाउन के लिए तैयार किया जा सके। इसीलिए हमें WHO छोड़ देना चाहिए।
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प्रधानमन्त्री को यह ट्विट भेजें - @PmoIndia #LeaveWHO #FakeCoronaScare Print law in parliament that India leaves WHO. WHO created fake corona scare in India by hiding AGE, co-illnesses, and alcoholism data of those who died in Italy, UK etc. #PmoIndia_IndiaLeavesWHO
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मेरा ट्विट - <https://twitter.com/PawanJury/status/1263752196170166273>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat May 23 2020 18:30:08 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun May 24 2020 19:44:30 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

क्या सरकार के द्वारा रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में एफडीआई की सीमा 49% से 74% करना राष्ट्रहित में है?
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डिफेन्स में 74% FDI का मतलब है कि हम अपना देश अधिकृत रूप से गंवाने के कगार पर आ चुके है। ज्यादातर सम्भावना है कि, अगले 3-4 वर्ष में यह सीमा 100% बढ़ा दी जायेगी और तब हम घोषित रूप से एक परजीवी / गुलाम देश होंगे।
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(1) 1990 तक भारत में परमिट राज था। हथियारों के निर्माण में न तो निजी कम्पनियों को मुक्त रूप से उत्पादन करने की छूट थी, और न ही विदेशी कम्पनियों को। किन्तु WTO समझौते के बाद जब लाइसेंस राज ख़त्म किया गया तो राष्ट्रिय सुरक्षा का विषय होने के कारण हथियारों के उत्पादन में विदेशी निवेश पर प्रतिबन्ध जारी रखा गया। कारगिल युद्ध में भारत को अमेरिका से हथियारों की मदद चाहिए थी, और तब भारत को हथियार निर्माताओ की काफी शर्तें माननी पड़ी। हथियारो के निर्माण में विदेशी निवेश को खोलना इसमें से एक था।
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(1.1) 2001 में हमें डिफेन्स में 26% एफडीआई की अनुमति देने के लिए बाध्य होना पड़ा।
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(1.2) 2015 में वे फिर से यह सीमा 49% तक बढ़वाने में कामयाब हुए।
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(1.3) 2020 में कोरोना की हड़बोंग में उन्होंने अब इसे 74% तक बढ़वा लिया है।
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(2) पेड मीडिया द्वारा ऍफ़डीआई के समर्थन में दिए गए गलत तर्क :
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(2.1) डिफेन्स में एफडीआई से भारत में टेक्नोलोजी ट्रांसफर होगा !!
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जटिल तकनीक के मामले में टेक्नोलोजी ट्रांसफर सिर्फ एक थ्योरी है, और व्यवहारिक रूप से जटिल निर्माण की तकनीक ट्रांसफर की ही नहीं जा सकती। और हथियारों के निर्माण में टेक्नोलोजी ट्रांसफर की बात करना एक निर्मम मजाक है। दुनिया के किसी देश ने आज किसी भी देश को हथियारों की तकनीक का हस्तांतरण नहीं किया है, और न ही किया जा सकता है। इस बारे में विस्तृत विवरण के लिए यह जवाब पढ़ें - विश्व स्तरीय अंतरिक्ष और मिसाइल प्रोग्राम होने के बावजूद भी भारत तेजस के लिए जेट इंजन क्यों नहीं बना पाया?
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(2.2) भारत पहले से ही विदेशियों से हथियार आयात कर रहा है, अत: विदेशी भारत में आकर हथियार बनाते है तो हमें कोई नुकसान नहीं !!
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पहली बात तो यह है कि, यह तर्क देने वाले इस बिंदु को जानबुझकर गायब कर देते है कि, किन कानूनों को गेजेट में छापने से भारत स्वदेशी तकनीक आधारित जटिल हथियारो का निर्माण कर सकता है। तो पहले वे भारत में हथियार निर्माण संभव बनाने के लिए आवश्यक कानूनों का विरोध करते है, जिससे हमें हथियार आयात करने पड़ते है, और फिर वे कहते है कि भारत को हथियार आयात करने पड़ रहे है, अत: हमें विदेशियों को बुलाकर भारत में हथियार बनाने के कारखाने लगाने के लिए कहना चाहिए !!
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इससे हमें निम्न तरह के नुकसान होंगे
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(2.2.1) जब तक विदेशी निवेश की सीमा 49% थी तब तक विदेशी किसी हथियार कम्पनी पर अपना स्वामित्व नहीं ले सकते थे। 74% स्टेक के बाद अब हथियार निर्माण कम्पनियों पर विदेशियों का स्वामित्व निर्णायक जाएगा। अत: अब अमेरिकी-ब्रिटिश-फ्रेंच कम्पनियां भारत में बड़े पैमाने पर हथियार निर्माण के कारखाने लगाएगी।
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(2.2.2) जब विदेशी भारत में आकर हथियार बनायेंगे तो नेताओं को धमका कर / उन्हें ब्राइब / म्राइब देकर सरकारी हथियार कम्पनियों का बचा खुचा बेस भी तोड़ देंगे। इससे हम हथियारों के निर्माण में विदेशियों पर और भी निर्भर हो जायेंगे । हथियार निर्माण की सरकारी कम्पनियों को अब धीरे धीरे या तो बंद कर दिया जाएगा या विदेशी इनका अधिग्रहण कर लेंगे।
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(2.2.3) पेड मीडिया पूरी तरह से हथियार कम्पनियों के नियंत्रण में काम करता है। अत: हथियार कंपनियों के भारत में सीधे घुस आने के बाद मीडिया की शक्ति विस्फोटक रूप से बढ़ेगी, जिससे भारत के नेताओ की निर्भरता अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों पर और भी बुरी तरह से बढ़ जायेगी।
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(2.2.4) हथियार कम्पनियों का मुख्य धंधा खनिज लूटना है। अत: अब वे भारत के नेताओं से ऐसे क़ानून छपवाएंगे जिससे वे लगभग मुफ्त में भारत के मिनरल्स लूट सके। तो अभी भारत के प्राकृतिक संसाधन की बहुत बड़े पैमाने पर लूट होने वाली है। और यह लूट पूरी तरह से कानूनी होगी।
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(2.2.5) ये कम्पनियां जितना मुनाफा बनाएगी उसके बदले हमें डॉलर चुकाने होंगे। पहले हम हथियार लेने के लिए सीधे डॉलर चुका रहे थे, और अब रिपेट्रीएशन के रूप में डॉलर चुकायेंगे। मतलब ऍफ़डीआई डॉलर संकट में कोई कमी नहीं लाता, बल्कि इसमें इजाफा ही करता है।
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(3) यह अमेरिका की चीन के साथ युद्ध की तैयारी है। युद्ध कब होगा मुझे नहीं पता। लेकिन जैसे जैसे अमेरिका भारत का अधिग्रहण करता जाएगा वैसे वैसे युद्ध करीब आता जाएगा। और इस मामले में डिफेंस में एफडीआई निर्णायक है। दरअसल, अमेरिका भारत पर इतना कंट्रोल ले चुका है कि वह चीन का किला तोड़ने के लिए अब भारत का इस्तेमाल एक ऊंट की तरह कर सकता है। भारत और चीन के बीच इस युद्ध में चीन ख़त्म हो जाएगा और भारत आधे से अधिक बर्बाद होगा, और चीन के ख़त्म होने के बाद अमेरिका भारत को एक विशाल फिलिपिन्स में बदल देगा।
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तो अगले कुछ वर्षो में निम्नलिखित में से कोई एक या एक से अधिक परिस्थितियों के घटने की सम्भावनाए प्रबल है :
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(3.1) यदि पहले चरण में भारत एवं चीन का युद्ध शुरू होता है तो भारत के ज्यादातर नागरिक चीन के खिलाफ युद्ध का समर्थन नहीं करेंगे, अत: ज्यादातर सम्भावना है कि अमेरिका भारत के नेताओं का इस्तेमाल करके पाकिस्तान पर हमला करने के हालात खड़े करेगा। भारत की जनता पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में जाने के लिए आसानी से तैयार हो जाएगी। उदाहरण के लिए अमेरिका से चाबी मिलने के बाद भारत POK, गिलगित-बाल्टिस्तान पर हमला कर सकता है।
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पहले भारत पाकिस्तान का युद्ध शुरू होगा, और फिर अपना निवेश बचाने के लिए चीन को बीच में आना पड़ेगा। फर्स्ट राउंड में अमेरिका भारत को सिर्फ सीमित मात्रा में हथियारो की मदद भेजेगा, और जब भारत पिटने लगेगा तो अमेरिका भारत की तरफ से युद्ध की कमान संभाल लेगा, एवं बड़े पैमाने पर हथियार भेजना शुरू कर देगा। और भारत के नागरिक सोचेंगे कि अमेरिका हमें "बचाने" आया है !!
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(3.2) यदि पाकिस्तान के राजनेता युद्ध को टालने की कोशिश करते है (जो कि वे कर सकते है) तो अमेरिका पाकिस्तान के जनरलों को डॉलर एवं हथियार भेजेगा और कश्मीर पर हमला करने को कहेगा। इस तरह भारत एवं पाकिस्तान का युद्ध शुरू होगा। बाद में अमेरिका भारत को डबल हथियार भेजेगा और भारत की सेना पाकिस्तान में अंदर तक घुस जाएगी। जैसे ही भारत की सेना POK में घुसेगी, CPEC को बचाने के लिए चीन को बीच में आना पड़ेगा।
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(3.3) यदि चीन पाकिस्तान की सेना को भारत पर हमला करने से रोकने में सफल हो जाता है तो अमेरिका आतंकी समूहों एवं इंटर्नल इंसरजेंसी का सहारा लेगा। अमेरिका कश्मीर में हथियार भेजकर गुह युद्ध शुरु करेगा। साथ ही अमेरिका असम में भी हथियार भेजेगा। इन दोनों हिस्सों में यदि हथियार आने शुरू हो जाते है तो हिन्दुओ का बड़े पैमाने पर कत्ले आम होगा और लाखो नागरिको को पलायन करना पड़ सकता है।
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और तब भारत में State Vs इस्लामिस्ट का एक गृह युद्ध शुरू हो सकता है, जिसमें बड़ी संख्या में मुस्लिमों का कत्ले आम हो सकता है। इससे भारतीय मुस्लिमो बचाने के लिए ईरान, तुर्की, पाकिस्तान, अफगानिस्तान साथ में आ सकते है, और भारत में कट्टरपंथी इस्लामिक समूहों को बड़े पैमाने पर हथियार भेजना शुरू कर देंगे। तब यह जंग भारतीय हिन्दू Vs एशियाई महाद्वीप के मुस्लिम के बीच बन जायेगी। तब अमेरिका भारत को हथियारों की मदद करना शुरु करेगा और जंग शुरू हो जाएगी।
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और इस तरह के दर्जनों पहलू हो सकते है जिनका इस्तेमाल करके अमेरिका भारत, पाकिस्तान, चीन, ईरान, अफगानिस्तान के बीच जंग शुरू कर सकता है। हमारी समस्या यह है कि भारत के पास इससे बचने का कोई उपाय नहीं है। सब कुछ तय करने वाला अमेरिका है। या तय करने वाला है चीन। यदि ये देश भारत को जंग का मैदान बनाना तय करते है तो भारत क्या चाहता है, यह महत्वहीन है। भारत की इच्छा महत्त्वहीन इसलिए है क्योंकि भारत जंग लड़ने और खुद को जंग से बचाने के लिए अमेरिकी हथियारों पर बुरी तरह से निर्भर है।
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(4) तो युद्ध कब होगा ?
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इसका जवाब मेरे पास नहीं है। किसी के पास नहीं है। इतिहास हमें यही बताता है कि इसी तरह की बातें चलती रहती है, और अचानक किसी भी समय किसी न किसी वजह से युद्ध शुरू हो जाता है। हम बस इतना देख सकते है कि युद्ध की तैयारी कहाँ हो रही है । और यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है, कि अमेरिका चीन के खिलाफ युद्ध की तैयारी कर रहा है। और जब तक अमेरिका भारत की सेना, जमीन एवं संसाधनों का इस्तेमाल न करें, तब तक अमेरिका किसी भी स्थिति में चीन से लड़ नहीं सकता। चीन को तोड़ने के लिए उसे भारत चाहिए ही चाहिए।
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यदि भारत के नागरिक सरकार पर दबाव बनाकर ऍफ़डीआई को रूकवाने में कामयाब हो जाते है, तो अमेरिकी-ब्रिटिश हथियार कंपनियों द्वारा भारत का अधिग्रहण करने की प्रक्रिया रूक जाएगी, और युद्ध कुछ समय के लिए टल जाएगा। सिर्फ कुछ समय के लिए !!
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युद्ध पूरी तरह से इसीलिए नहीं टलेगा, क्योंकि भारत के सेना विदेशी हथियारों पर निर्भर है। अत: तब अमेरिका पाकिस्तान का इस्तेमाल करके जंग शुरू करेगा। यदि पाकिस्तान को पूरे पूरे अमेरिकी हथियार (मिलिट्री ड्रोन, फाइटर प्लेन, लेसर गाइडेड मिसाइले, लेसर गाईडेड बम, आदि) मिल जाते है, तो पाकिस्तान भारत के काफी अंदर तक घुस आएगा।
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यदि अमेरिका ऐसा नहीं करता है, या नहीं कर पाता है, तो वक्त के साथ चीन की सेना मजबूत होती जायेगी, और फिर चीन भारत के साथ ठीक वही करेगा जो की आज अमेरिका भारत के साथ कर रहा है। मतलब चीन भारत का आर्थिक एवं सैन्य रूप से अधिग्रहण कर लेगा।
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असल में, इन सभी स्थितियों में या इस तरह की किसी भी स्थिति में भारत की स्थिति खुद को बचाने के लिए इधर उधर भागने वाले की रहेगी। और हथियारों की लिस्ट लेकर जाने के लिए हमारे पास सिर्फ 2 ठिकाने है – रूस एवं अमेरिका !!
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रूस अब हमसे काफी दूर हो चुका है, और कोई वजह नहीं कि वह भारत को बचाने के लिए या तो अमेरिका या तो चीन से दुश्मनी मोल ले। क्योंकि भारत की स्थिति एक तरबूज की है, जिसे काटने और काटकर बांटने के लिए चीन एवं अमेरिका चाकू लेकर खड़े है। अभी ऍफ़डीआई के माध्यम से दोनों देश थोड़ी थोड़ी फांके ले रहे है।
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यदि ऐसे ही चलता रहा तो धीरे धीरे अमेरिका एवं चीन भारत को आधा आधा बिना किसी जंग के ही बाँट लेंगे। और यदि जंग हो जाती है, भारत किसके हिस्से में जायेगा इसका फैसला जंग करेगी। मतलब यह उसी तरह की लड़ाई है, जो ब्रिटिश एवं फ्रांसिस आज से 220 साल पहले भारत में लड़ रहे है। ब्रिटिश के पास फ़्रांस से बेहतर हथियार थे अत: तब भारत ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हिस्से में चला गया था।
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(5) भारत में आपको ऐसे कई बुद्धिजीवी मिलेंगे जो इसे समस्या के रूप में देखते ही नहीं है कि, भारत की सेना विदेशियों के हथियारों पर निर्भर है !! घूम फिर कर वे अपनी बहस को इस बिंदु के इर्द गिर्द रखते है कि, भारत की सेना “पर्याप्त” रूप से मजबूत है। अमेरिका हमारा मित्र देश है, अत: वह चीन को ख़त्म करने के बाद भारत को ख़त्म नहीं करेगा। अब भारत का कभी युद्ध नहीं होगा, अत: आपको भय फैलाने की जरूरत नहीं है। और यदि भारत को युद्ध का सामना करना पड़ता भी है तो भारत की सेना पर्याप्त रूप से मजबूत है !! आदि आदि
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दुसरे शब्दों में, वे भारत की सेना को विदेशियों के हथियारों पर निर्भर बनाए रखना चाहते है, ताकि अमेरिका भारत की जमीन एवं संसाधनों का इस्तेमाल चीन को तोड़ने में कर सके। दरअसल, ये बुद्धिजीवी युद्ध की चर्चा को टाल कर भारत को युद्ध की तरफ धकेल रहे है। और वे ऐसा इसीलिए कर रहे है, क्योंकि पेड मीडिया ने उन्हें ऐसा करने के लिए चाबी दी है।
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मेरे विचार में, भारत के प्रत्येक नागरिक को अब इस बारे में स्टेंड लेना चाहिए कि क्या वह अमेरिका को चीन के खिलाफ अपनी सेना एवं जमीन का इस्तेमाल करने देना चाहता है या नहीं। और यदि आप भारत की जमीन का इस्तेमाल चीन के खिलाफ करने देना चाहते है, तो आपको यह बात समझ लेनी चाहिए कि, यह फैसला पेड मीडिया का है, आपका नही। क्योंकि पेड मीडिया के प्रायोजक इस युद्ध की तैयारी पिछले 10 वर्षो से कर रहे है। भारत में ऍफ़डीआई उनकी इसी तैयारी का हिस्सा है।
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(6) समाधान : मेरा प्रस्ताव जूरी कोर्ट एवं रिक्त भूमि कर का है। यदि ये दोनों क़ानून गेजेट में छाप दिए जाते है तो भारत अगले 5-6 वर्ष में स्वदेशी तकनीक आधारित इतने ताकतवर हथियार बना सकता है, कि हम चीन एवं अमेरिका की सेना का मुकाबला कर सके। यदि एक बार हम खुद के हथियार बनाने की क्षमता जुटा लेते है, तो युद्ध को टाला जा सकता है।
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यदि हम स्वदेशी हथियारों का उत्पादन करने में असफल रहते है तो चीन से युद्ध टल जाने पर भी अमेरिका भारत का पूरी तरह से अधिग्रहण कर लेगा।
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#JuryCourt , #EmptyLandTax
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri May 29 2020 11:06:44 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

पेड मीडिया के प्रायोजको की कोशिश रहेगी कि लॉकडाउन को जितना हो सके उतना लम्बा खींचा जाए। और सभी पेड मीडिया पार्टियों को पेड मीडिया के प्रायोजको के निर्देशों पर ही काम करना होता है। कोंग्रेस सरकारों को भी और बीजेपी=संघ सरकार को भी। और आम आदमी पार्टी भी अपवाद नहीं है।
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छोटी कारोबारी एक तनी हुयी रस्सी पर धंधा करते है। मतलब उनके पास कोई व्यवथित सेटअप नहीं होता। एक तरह की सेटिंग / जुगाड़ / उधार / अवसर / कोम्बिनेशन पर सीमित पूँजी में उनका धंधा चल रहा होता है। एक बार यदि उन्हें रस्सी से उतार दिया तो उनमे से कुछ फिर से रस्सी पर नहीं चढ़ पायेंगे।
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लॉकडाउन अपनी जगह है, किन्तु औचक लॉकडाउन इसीलिए किया गया था, ताकि छोटे कारोबारियों को जाया तौर पर ज्यादा नुकसान पहुँचाया जा सके। यदि 5 दिन पहले भी सूचना दे दी जाती तो हजारो कारोबारी "जाया" नुकसान से बच सकते थे।
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उदाहरण के लिए आइसक्रीम का कारोबार करने वाले एक परिचित ने 20 मार्च को 4 लाख रू का माल मंगवाया और 22 मार्च को लॉकडाउन हो गया। माल खराब न हो इसीलिए उन्हें कोल्ड स्टोरेज को चालू रखना पड़ा, और 2 महीने में 47,000 का बिल आ गया। और अब इस माल में से लगभग 2 लाख का माल एक्सपायर हो गया है। और कम्पनी एवं ग्राहक दोनों इसे लेने से इनकार कर रहे है !!
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कई कारखाने ऐसे है, जो शुरू होने के बाद कभी बंद नहीं हुए। ये कारखाने 24*7 काम करते है। कई इकाइयों में तो कम्प्लीट शटडाउन का मेकेनिज्म ही नहीं होता है। मतलब वहां पर दरवाजे, शटर आदि नहीं होते। हर समय काम शुरू रहता है।
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उदारहण के लिए एक प्रोसेस हाउस दिन भर में लाखों मीटर कपड़ा प्रोसेस करता है। दिन भर में कई ट्रक माल आता है, और प्रोसेस होकर जाता है। यदि आप इसे बंद करना चाहते है तो आपको पूरा हफ्ता लग सकता है। यदि आप औचक रूप से इसे बंद करके चले जायेंगे तो 2 महीने में आपका सारा कपड़ा चूहे काट देंगे। (क्योंकि कपडे को शेड के निचे खुले में रखा जाता है।)
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इसी तरह कई मशीनरी ऐसी होती है, जो एक निश्चित अवधि तक बंद रहने के बाद जाम हो जाती है। और उन्हें फिर से शुरू करने में काफी मशक्कत होगी। मेरे एक परिचित के साथ यही समस्या हुयी। उनके कारखानों में चाइनीज मशीने है, और अब उन्हें शुरू करवाने के लिए उन्हें चीन से चीफ इंजीनियर को बुलाना पड़ेगा !!
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और इसी तरह के कई झमेले, जिनका सामना छोटी इकाइयों को करना है। और इन्हें सोल्व करने के दौरान काफी छोटे कारखानों को पूँजी की आवश्यकता होगी, और वे इसे अब मेनेज नहीं कर पायेंगे।
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बड़ी इकाइयों के पास काफी अतिरिक्त पूँजी होती है, और इसके अलावा उन्हें बैंक वगेरह से लोन मिल जायेंगे। छोटे कारोबारी को पहली बात को लोन नहीं मिलेगा, और जिन्हे मिलेगा उसमें से कमीशन के एवज में एक बड़ा हिस्सा घूस में चला जाएगा।
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दुसरे शब्दों में रस्सी से उतार दिए गए कारोबारियों का एक वर्ग अब कारोबार खो देगा, और नयी पूँजी के साथ बाजार में प्रवेश करने वाले विदेशियों का हिस्सा बाजार में बढ़ जाएगा।
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और औचक लॉकडाउन का प्रभाव उसी तरह का है, जैसे कोई व्यक्ति चलती मशीन में सरिया डाल कर उसे रोक दे। घुमते पहिये में सरिया फंसाने से मशीन तो बंद हो जाती है, लेकिन इसे अब बटन दबाकर फिर से चालू नहीं किया जा सकता। और नोटबंदी की तर्ज पर औचक लॉकडाउन जानबूझकर किया गया था, ताकि नुकसान को बढ़ाया जा सके !!
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बहरहाल, लॉकडाउन जितना ज्यादा लम्बा खिचेंगा स्थानीय इकाइयां उतनी ही ज्यादा तबाह होगी।
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अब भारत में नागरिको के 2 वर्ग है :
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(1) पहला वर्ग उन लोगो का है जो लॉकडाउन के समर्थक है,
(2) दूसरा वर्ग लॉकडाउन का विरोधी है।
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जो नागरिक लॉकडाउन के विरोधी है, उन्हें पीएम को लॉकडाउन खोलने के लिए ट्विट / पोस्टकार्ड भेजना शुरू करना चाहिए। यदि वे लॉकडाउन का विरोध करते है, किन्तु पीएम को लॉकडाउन ख़त्म करने के लिए नहीं कह रहे है, तो मेरा मानना है कि ये ही वे लोग है, जो लॉकडाउन को जारी रखने के लिए जिम्मेदार है !!
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जैसे जैसे पीएम को ट्विट / पोस्टकार्ड भेजने वालो की संख्या बढ़ेगी वैसे वैसे लॉकडाउन एवं लॉकडाउन खुलने के बाद लगाईं गए प्रतिबंधो की को हटाये जाने की सम्भावनाए बढती जायेगी।
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तो यदि आप लॉकडाउन ख़त्म करने के लिए पीएम को ट्विट / पोस्टकार्ड भेजने को राजी नहीं है तो, कोरोना के बारे में जितना भी ज्ञान आप ले रहे या बाँट रहे है उसके कोई मायने नहीं है। क्योंकि जानें कोरोना की वजह से नहीं जा रही है, बल्कि लॉकडाउन की वजह से जा रही है।
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लॉकडाउन समर्थको का काम हालांकि पेड मीडिया 24*7 कर रहा है, फिर भी मैं उनसे आग्रह करूंगा कि वे अपनी तरफ से पीएम को लॉकडाउन चालू रखने का ट्विट भेजें। इससे उनके आस के नागरिक इस तथ्य को साफ़ तौर देख सकेंगे कि, लॉकडाउन जारी रखवाने के लिए कौन लोग जिम्मेदार है। और लॉकडाउन के समर्थको को यह बात छिपानी भी नहीं चाहिए कि वे भारत में लॉकडाउन को तब तक जारी रखना चाहते है, जब तक पेड मीडिया के प्रायोजक ऐसा चाहते है।
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जो नागरिक लॉकडाउन के समर्थक है
(1) @PmoIndia पर इन दोनों में से कोई एक ट्विट करें :

#लॉकडाउन_समाप्त_करें , #EndLockDown
#लॉकडाउन_चालू_रखें , #ContiniueEndLockDown
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(2) अपने फेसबुक कवर पेज पर इन दोनों ट्वीट का चित्र लगाएं
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(3) आपके आस पास जो भी व्यक्ति कह रहे है कि, कोरोना भारत में जानलेवा नहीं है, उनसे पूछे कि क्या उन्होंने पीएम को ट्विट भेजा है, और नहीं भेजा है तो उन्हें पीएम को ट्विट / पोस्टकार्ड भेजने को कहें।
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और एक बात पर ध्यान दें कि -- मुद्दा कोरोना नहीं है, बल्कि लॉकडाउन है। अत: जो भी कार्यकर्ता कोरोना पर बहस कर रहा है, लेकिन पीएम को लॉकडाउन के बारे ट्विट भेजने को राजी नहीं है, ऐसे टाइम वेस्टर को अनसुना करें।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun May 31 2020 06:49:04 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

मेरी मान्यता है कि, अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी एवं अहिंसामूर्ती महात्मा मदन लाल ढींगरा पूरी तरह अहिंसक व्यक्ति थे। पेड मीडिया एवं पेड इतिहासकारो ने उन्हें एक हिंसक व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है !!
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नागरिक अधिकारों में वृद्धि करने वाला कोई भी जन आंदोलन अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी जैसे अहिंसक व्यक्तियों की भूमिका बिना अपना लक्ष्य नहीं प्राप्त कर सकता है। यदि आंदोलन के कार्यकर्ताओ ने अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी की अहिंसक निति पर चलने से परहेज करते है तो गृह युद्ध के हालात बनेंगे और यह काफी हिंसक होगा।
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यह ट्वीट करें :
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(1)
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#मेरा_विश्वास , है कि अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी पूरी तरह एक अहिंसक व्यक्ति थे। पेड मीडिया एवं पेड इतिहासकारो ने उन्हें एक हिंसक व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है !! #महात्मा_उधम_सिंह_जी_अहिंसामूर्ती_थे
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#iBelieve #MyCorePoliticalBeliefs #UdhamSinghWasNonViolent #AhimsamurtiMahatmaUdhamSinghWasNonViolent Ahmisamurti Mahatma Udham Singh was 100% non violent and 100% ethical activist.
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<https://twitter.com/PawanJury/status/1266980683181961217>;
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(2)
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#मेरा_विश्वास , है कि अहिंसामूर्ती महात्मा मदन लाल धींगरा जी पूरी तरह एक अहिंसक व्यक्ति थे। पेड मीडिया एवं पेड इतिहासकारो ने उन्हें एक हिंसक व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है !! #महात्मा_मदन_लाल_जी_धींगरा_अहिंसामूर्ती_थे
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#iBelieve #MyCorePoliticalBeliefs #MadanlalDhingaraWasNonViolent #AhimsamurtiMahatmaMadanlalDhingaraWasNonViolent Ahmisamurti Mahatma Madanlal Dhingra was 100% non violent and 100% ethical activist.
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<https://twitter.com/PawanJury/status/1266980723183046657>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun May 31 2020 07:31:31 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

प्रधानमंत्री को लॉकडाउन ख़त्म करने के लिए पोस्टकार्ड भी भेजा गया. यदि आप भी लॉकडाउन ख़त्म करना चाहते है तो पीएम को पोस्टकार्ड लिखे एवं ट्विट भी करें -- #EndLockdown

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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun May 31 2020 20:52:49 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Bhoj Sahab:

दुनिया का सब से ताक़तवर अध्यक्ष ट्रम्प, कोरोना केस का टॉप अमेरिका। दुनिया का सब से कमज़ोर अध्यक्ष किम जांग, जिस के देश में कोरोना का एक भी केस नहीं। ये हाल है दुनिया के बौद्धिक स्तर का। इस से अच्छा मर जाओ सब कोरोना से।

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