Posts for 2018-08

Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Aug 02 2018 17:12:15 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

गुजराती न्यूज चैनल VTV Gujarati TV का EVM पर पोल। यदि आप EVM के खिलाफ है तो "yes" पर वोट करें।
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कृपया PM की इस वेबसाइट पर भी evm के खिलाफ वोट करें --- <https://newindia.in/causes/CancelEVM>;
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पीएम को यह ट्वीट भी करें -- "@PmoIndia #CancelEVM "
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VTV Gujarati News and Beyond:

#Vtvdebate #Vtvpoll #Mahamanthan

શું ચૂંટણીમાં મતદાન EVMને બદલે બેલેટ પેપરથી થવું જોઇએ?

#Balletpaper #Evm #Evmhacking #Election #BJP #INC

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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Aug 02 2018 18:02:43 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

FAQ on newindia. in
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व्यक्तियों के सुझाव आमंत्रित करने वाली प्रधानमन्त्री की अधिकृत वेबसाईट newindia को लेकर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न :
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1) क्या कार्यकर्ताओ को newindia पर अपनी मांग रखनी चाहिए ?
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कार्यकर्ताओ को दो दिशाओं में काम करना होता है -- 1) नागरिको में अपनी मांग का प्रचार करना , और 2) मुख्य नीति नियंता यानि प्रधानमंत्री तक अपनी मांग पहुँचाना। प्रधानमंत्री से आपको अपनी बात कहनी है तो फिलहाल newindia ही एक मात्र सबसे सटीक , सबसे सस्ता और सबसे द्रुत अधिकृत विकल्प है। कोई भी व्यक्ति अपनी मांग का विस्तृत पीडीऍफ़ 5 मिनिट में पीएम तक पहुंचा सकता है। पीएम उस पर ध्यान दे या न दे यह अलग विषय है। किन्तु तब आप कह सकते है, आपने अपनी मांग पीएम को भेज दी है। इसीलिए जो भी कार्यकर्ता नागरिको में अपनी मांग उठा रहे है उन्हें सबसे पहले पीएम को इस बारे में सूचित करना चाहिए।
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2) हम ये मांग फेसबुक और ट्विटर के जरिये भी तो भेज सकते है ?
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फेसबुक / ट्विटर भारत सरकार नहीं चलाती है, न ही भारत सरकार ने यह कहा है कि व्यक्ति कोई सुझाव देना चाहे तो वे फेसबुक / ट्विटर पर भेजे। फेसबुक ट्विटर आदि नागरिको के "आपसी संवाद" के मंच है। इन मंचो पर पीएम भी एक नागरिक की हैसियत से है। पर newindia अधिकृत है। अत: आप पीएम को ट्विट भी करें , उनके फेसबुक पेज पर भी अपनी मांग लिखें , लेकिन यदि आप newindia पर अपनी मांग नहीं रखेंगे तो जब पीएम आपसे पूछ सकते है कि मैंने सुझाव भेजने के लिए newindia बनाया है , और आपने मुझे वहां पर अपनी मांग क्यों नहीं भेजी है। तो जब आपने मुझे कोई मांग ही नहीं भेजी तो मुझसे क्या उम्मीद कर रहे है।
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यदि आप कहेंगे कि मैंने आपके फेसबुक पेज पर यह मांग भेजी थी , तो वे आपसे कह सकते है -- "मैं जुकेरबर्ग नहीं हूँ" !! पीएम कहेंगे कि "newindia पर आये हुए सुझावो की स्क्रूटिनी के लिए मेरे पास सरकारी स्टाफ है , और वह वेबसाईट मेरे नियंत्रण में है। लेकिन फेसबुक मेरे अधीन नहीं आती, इसीलिए वह मेरे शासन का अंग नहीं है। जुकेरबर्ग कारोबारी आदमी है , कल यदि वह अपना कारोबार समेट कर चल देता है तो मैं उसे कैसे रोकूंगा। जिस तरह कोई मामला होता है तो आप थाने में जाकर मुकदमा दर्ज करवाते है किसी परचून कि दूकान पर नहीं , उसी तरह से सरकार ने जिस काम के लिए जो व्यवस्था बनायी है , कृपया उसका इस्तेमाल करेंगे तो आपको और मुझे दोनों को सुविधा रहेगी।"
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3) लेकिन newindia पर सरकार जब चाहे तब किसी भी प्रस्ताव को डिलीट भी तो कर सकती है ? इसका क्या उपाय है ?
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वो तो फेसबुक और ट्विटर भी डिलीट कर सकता है, और आप कुछ नहीं कर सकते। लेकिन यदि newindia पर सरकार आपका प्रस्ताव डिलीट कर देती है तो आप फेसबुक / ट्विटर / व्हाट्स एप आदि का इस्तेमाल करके नागरिको तक यह बात पहुंचा सकते है कि सरकार ने आपके प्रस्ताव को डिलीट किया है। अत: जब आप प्रस्ताव रखें तो उसका स्क्रीन शॉट ले ले। जब वह गायब हो जाता है तो आप newindia पर इस शिकायत का प्रस्ताव अपलोड कर सकते है , तथा साथ ही पीएमओ / वेबसाईट एडमिन आदि के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा सकते है। तब इस मामले की जाँच हो सकती है। जैसे कि जब पुलिस आपकी ऍफ़ आई आर दर्ज नहीं करती तो आप मीडिया में जाते है , या उच्च अधिकारी को शिकायत करते है। इससे सरकार पर दबाव बनेगा और वे लोगो के सामने एक्सपोज होंगे।
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तो जैसे मुकदमो के लिए हमारे पास थाने-अदालते है , विद्युत् के लिए बिजली विभाग है , पानी के लिए जल बोर्ड है , इलेक्शन के लिए चुनाव आयोग है, उसी तरह से पीएम को सुझाव भेजने के लिए सरकारी व्यवस्था अब newindia है।
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4) लेकिन newindia पर कोई भी व्यक्ति फर्जी आई डी बनाकर अपना प्रस्ताव अपलोड कर सकता है।
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इसमें कोई दिक्कत वाली बात नहीं है। फेसबुक , ट्विटर आदि पर भी ऐसा ही है। यदि मांग ठीक है तो यह बात गौण हो जाती है कि यह प्रस्ताव किसने दिया है। तात्कालिक उपाय यह है कि जब आप newindia पर आई डी बनाए एवं अपना प्रस्ताव अपलोड करें तो डिस्क्रिपशन में अपना वोटर आई डी, आधार नम्बर या अपने फेसबुक प्रोफाइल का लिंक डाल सकते है , एवं newindia की आई डी पर अपना रियल फोटो भी लगा सकते है। तो इस तरह जो भी आपका प्रस्ताव देखेगा वह यह जान सकेगा कि आप वास्तविक व्यक्ति है या नहीं।
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और पीएम तो आपकी आई डी को वोटर नम्बर या आधार से वेरीफाई कर सकते है। यदि आप अपनी आई डी मोबाईल OTP से लॉग इन करेंगे तो पीएम को यह सूचना रहती है कि प्रस्तावक वास्तविक व्यक्ति है। उदाहरण के लिए मैंने जब newindia पर अपनी आई डी बनायी तो आधार लिंक्ड मोबाईल नम्बर से लॉग इन किया एवं अपना वास्तविक पता लिखा। तो पीएमओ को यह पता है कि यह प्रस्ताव करने वाला व्यक्ति वास्तविक है। और मेरा मानना है कि किसी भी प्रस्ताव की विश्वसनीयता खुद प्रस्ताव में निहित होती है , प्रस्ताव करने वाले में नहीं। एक वास्तविक और ऊँचा आदमी भी बकवास प्रस्ताव कर सकता है , और एक अनजान व्यक्ति भी अच्छे प्रस्ताव दे सकता है। यदि प्रस्ताव अच्छे और जन हित के है तो लोग उन्हें अपनाएंगे चाहे ये प्रस्ताव किसी भी माध्यम से उन्हें मिले वर्ना वे इन्हें खारिज कर देंगे।
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5) क्या newindia पर रखे गए किसी प्रस्ताव / मांग पर हमें वोट करना चाहिए ?
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यदि कोई कार्यकर्ता कोई मांग पीएम के सम्मुख newindia पर रखता है और आप उस मांग का समर्थन करते है तो आपको इस प्रस्ताव पर वोट करना चाहिए। वोट करने से आपका समर्थन पीएम के सम्मुख दर्ज हो जाएगा। यदि आपने आधार लिंक्ड मोबाईल से OTP द्वारा लॉग इन किया है तो पीएम को यह पता रहेगा कि आप वास्तविक वोटर है। नागरिको को यह सूचना देने के लिए कि आपने इस मांग का समर्थन किया है , आप अपने द्वारा किये गए वोट को अपनी फेसबुक वाल पर शेयर कर सकते है , और इसका स्क्रीन शॉट अपने फेसबुक एल्बम में रख सकते है। इस तरह पीएम एवं नागरिक दोनों को यह मालूम होगा कि आपने इस मांग का समर्थन पीएम के सामने किया है।
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वैसे भी आज भारत में वोट करने के लिए आपके पास सिर्फ दो ही अधिकृत तरीके है -- a) मतदान b) newindia , मतदान तो आप 5 वर्ष में एक बार ही कर सकते है , किन्तु इस बीच यदि आप पीएम से कोई मांग करना चाहते है और आप इंटरनेट का इस्तेमाल करते है तो newindia ही एक मात्र विकल्प है। ईसीलिये यदि आप newindia पर रखे गये किसी प्रस्ताव से सहमत है तो इस पर वोट करें।
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6) क्या newindia पर वोटिंग की कोई वेल्यु है ?
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नहीं। newindia पर की गयी वोटिंग की कोई कानूनी वैल्यू नहीं है। वजह यह है कि newindia पर कोई भी व्यक्ति हजारो फर्जी इमेल द्वारा किसी प्रस्ताव पर हजारो वोट डाल सकता है। ऐसी फर्जी वोटिंग को रोकने की newindia पर कोई व्यवस्था नहीं है। किन्तु newindia पर रखे गए प्रस्ताव पर वोटिंग करने के 4 लाभ है --
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a) प्रधानमंत्री यह जान सकते है कि कितने वोट वास्तविक है , और कितने फर्जी है।
b) वोट करने वाला यह जानता है कि उसने पीएम द्वारा उपलब्ध कराई गयी व्यवस्था पर किसी मांग का समर्थन कर दिया है। और यदि उसने मोबाईल OTP से लॉग इन किया है तो वह यह भी जानता है कि पीएम को पता है कि मैं वास्तविक वोटर हूँ।
c) व्यक्ति अपने वोट का स्क्रीन शॉट अपने फेसबुक प्रोफाइल / ट्विटर पर रख सकता है। जिससे वह यह बात साबित कर सकता है कि उसने अमुक प्रस्ताव को समर्थन दिया है।
d) वोट करने वाला व्यक्ति किसी अपने परिचित अन्य व्यक्ति के सामने यह साबित कर सकता है कि उसने पीएम के सम्मुख अमुक मांग का समर्थन किया है।
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मेरा मानना है कि , यदि ज्यादा से ज्यादा नागरिक newindia का इस्तेमाल करना शुरू करेंगे तो पीएम पर यह दबाव बनेगा कि वे इसमें आवश्यक सुधार लेकर आये। उदाहरण के लिए पीएम यह नियम बना सकते है कि newindia पर प्राथमिक लॉग इन सिर्फ आधार लिंक्ड मोबाईल से ही की जा सकेगी। इससे फर्जी वोटिंग या फर्जी आई डी की समस्या एक ही दिन में ख़त्म हो जायेगी। या पीएम मौजूदा यूजर्स को मेल भेजकर अपनी आई डी को आधार से लिंक करने को कह सकते है। या ऐसा आदेश निकाल सकते है कि कोई भी व्यक्ति पटवारी कार्यालय में जाकर अपना प्रस्ताव newindia पर अपलोड करवा सके। इस तरह इस वेबसाईट को कुछ ही हफ्तों में सुधार कर बहुत ही उपयोगी बनाया जा सकता है। किन्तु यह दबाव बनाने के लिए यह आवश्यक है कि ज्यादा से ज्यादा यूजर्स newindia का इस्तेमाल करना शुरू करें।
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7) newindia का इस्तेमाल करके बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक और प्रधानमन्त्री गलत कानूनों को देश में लागू करवा सकते है और इसका ठीकरा जनता पर फोड़ सकते है।

कृपया अपनी बात को स्पष्ट कीजिये कि वे ऐसा कैसे करेंगे।
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8) वे अपने संसाधनों एवं आई टी सेल का इस्तेमाल करके करोड़ो फर्जी आई डी बनाकर किसी बुरे क़ानून पर करोड़ो फर्जी समर्थन दिखा देंगे और फिर पीएम कहेंगे कि मैंने यह क़ानून जनता के समर्थन से लागू किया है।

जितने भी लोग newindia के बारे में जानते है वे यह भी जानते है कि newindia पर फर्जी वोटिंग की जा सकती है। पीएम से लेकर नागरिको तक सबको इस बात का पता है। यह खुली हुयी बात है। अत: पीएम यह नहीं कह सकते कि मैंने अमुक क़ानून newindia पर आये समर्थन के आधार पर लागू किया है। और यदि फिर भी वे यह बात कहते है तो देश के नागरिक उनसे यह बात पूछेंगे कि फर्जी वोटिंग को बढ़ावा देने वाली साईट पर आप कोई क़ानून कैसे बना सकते है ? इस तरह पीएम newindia का सहारा लेकर कोई क़ानून नहीं बना सकते। किन्तु यदि वे ऐसा करते है तो उन पर यह दबाव बन जाएगा कि वे newindia में फर्जी वोटिंग रोकने का सुधार लेकर आये।
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9) जब newindia पर फर्जी वोटिंग हो सकती है और इस पर कोई कितना भी वोट करे उससे कोई प्रस्ताव पास नहीं होता तो हम क्यों newindia पर अपनी मांगे रखे और क्यों इस पर वोट करे ?

दो कारण है --

a) क्योंकि पीएम का कहना है कि यदि आपके पास कोई सुझाव है तो मुझे newindia पर भेजिए। तो यदि आप इंटरनेट इस्तेमाल करते है और फेसबुक / ट्विटर / व्हाट्स एप पर अपनी मांगे रख रहे है किन्तु आप newindia पर इसे रखने से इंकार करते है तो आपकी दशा उस वकील जैसी है जो पान के गल्ले और चाय कि थडी पर बड़े जोश में दलीले देता है , किन्तु जज के सामने आते ही खामोश हो जाता है।

b) जैसे जैसे newindia पर प्रस्ताव बढ़ेंगे और वोट करने वालो की संख्या में इजाफा होगा वैसे वैसे पीएम पर इसे सुधारने का दबाव बढेगा। इस तरह सिर्फ इसी तरीके से newindia को सुधारा जा सकता है। जितने ज्यादा यूजर newindia पर जायेंगे उतने ज्यादा नागरिको को यह मालूम होगा कि डिजिटल इण्डिया लांच करने वाले पीएम ने देश के नागरिको को सुझाव रखने के लिए एक दो कौड़ी की घटिया इंटरफेस वाली और फर्जी वोटिंग को बढ़ावा देने वाली साईट बनाकर दी है। यूजर बढ़ने के साथ ही सरकार एक्सपोज होगी और उन्हें फर्जी वोटिंग को रोकने का नियम लाना होगा। वर्ना यही सब इंटरनेट यूजर पीएम की ट्विटर वाल पर जाकर लिखेंगे कि भारत सरकार न्यू इण्डिया पर फर्जी वोटिंग को बढ़ावा क्यों दे रही है ? इस तरह पीएम पूरे जगत के सामने एक्सपोज होने लगेंगे।

और जब पीएम बाध्य होकर newindia के यूजर्स को वेरीफाई करने का नियम लायेंगे तो आज जो नागरिक वोट कर रहे है , वे सभी वेरीफाईड हो जायेंगे। इस तरह यदि आज आपने कोई वोट किया है तो वह आगे चलकर वेरीफाईड होकर वास्तविक वोट की गिनती में आ जाएगा। तो उन प्रस्तावों को तब बढ़त मिल जायेगी जो प्रस्ताव पुराने है और जिन पर वास्तविक नागरिको ने ज्यादा वोट किया है।

उदाहरण के लिए आपने मोबाइल नम्बर लिया तब यह आधार से लिंक नहीं था , किन्तु बाद में इसे सरकार ने आधार से लिंक्ड कर दिया। बस यूजर बढ़ने से इसी तरह से वेरिफिकेशन आने की सम्भावना बढती जायेगी। newindia पर वोट करने के लिए आपको फेसबुक पोस्ट के like कि तरह सिर्फ "vote" पर क्लिक करना होता है, और 2 सेकंड में आपका वोट दर्ज हो जाता है। तो जिस तरह आप फेसबुक / ट्विटर पर दिन भर में दर्जनों क्लिक करते है उसी तरह से एक क्लिक newindia पर रखे गए उन प्रस्तावों पर भी कर दे जिनका आप समर्थन करते है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Aug 04 2018 07:29:46 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Sc / St एक्ट के तहत दर्ज किये गए मुकदमो का निपटान नागरिको की जूरी द्वारा किया जाए। अन्य सभी तरीके शोषण और अलगाव को बढ़ावा देने वाले है।
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भारत में राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख का क़ानून न होने से पुलिस अपने हिसाब से ही चलती है। क़ानून में आप जो मर्जी छापते रहिये , पुलिस को इससे कोई मतलब नहीं। और पुलिस का हिसाब दो तरीको से तय होता है -- 1) किस पार्टी के लिए किस नेताजी का फोन आया है , 2) किस पार्टी के पास ज्यादा पैसा है।

तो वादी / प्रतिवादी में से जिसके पास ज्यादा पैसा है या जिसके राजनैतिक संपर्क ऊँचे है , जांच की दिशा उसी हिसाब से घूम जाती है।
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दूसरी समस्या यह है कि भारत में राईट टू रिकॉल जज का कानून नहीं है और ज्यूरी सिस्टम भी नहीं है। तो जज भी यहाँ अपने हिसाब से चलता है। क़ानून के हिसाब से नहीं। और जज का भी वही हिसाब है जो पुलिस का है। जिस पार्टी के पास ज्यादा पॉवर और पैसा है , फैसला उसके हिसाब से दे दिया जाता है।
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क़ानून में कुछ भी लिख देने से कुछ होता नहीं है। निर्भर इस बात पर करता है कि क़ानून का पालन करवाने वाले अधिकारी ( पुलिस ) और क़ानून तोड़ने पर सजा देने वाला व्यक्ति ( जज ) क्या करना चाहते है। भारत में पुलिस और जज दोनों ही जनता के नियन्त्रण से बाहर है , अत: इस तरह के सभी कानून इनकी शक्ति में इजाफा करते है।
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मेरे द्वारा प्रस्तावित समाधान यह है कि इस तरह के मुकदमो को नागरिको कि ज्यूरी के हवाले किया जाए। 25-55 वर्ष के आयुवर्ग के नागरिको के ज्यूरी इस प्रकार के मुकदमो कि सुनवाई करेगी और फैसला देगी। इसके अलावा पुलिस विभाग को ईमानदार बनाने के लिए राईट टू रिकॉल पुलिस अधिकारी के क़ानून को गेजेट में प्रकाशित किया जाए।
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इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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यदि sc / st एक्ट को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया जाए तो सार्वजनिक भेदभाव के मामलो पर कोई कार्यवाही न होने से इस तरह की घटनाएं बढ़ जायेगी जिससे दलितों और अगड़ो में अलगाव बढेगा। यदि बिना किसी जांच के सिर्फ शिकायत के आधार पर गिरफ्तारी होगी तो भी फर्जी मामलो में और भी इजाफा होगा और दलितों एवं अगड़ो में अलगाव बढ़ेगा। सिर्फ हिन्दू मुस्लिम ही नहीं , "वे" हिन्दू धर्म को दो समुदायों में बाँट कर उनमे वैमनस्य फैलाने के लिए भी काफी मेहनत कर रहे है। जब सरकार कहती है कि -- 'दलितों का 1000 साल से शोषण हो रहा है' , तो दरअसल वे दलितों में प्रतिशोध एवं वैमनस्य की भावना को भड़काना चाहते है। यह सुनकर दलित अच्छा महसूस करते है और उनका वोट बैंक बढ़ता है। वैमनस्य बढाने की उनकी इस नीति के वैतनिक कर्मचारी मीडियाकर्मी है , और ऐसे अवैतनिक कर्मचारियों की शिनाख्त करने के लिए फेसबुक / ट्विटर / व्हाट्स एप देखिये। आपको ज्यादातर वहां ऐसे विवरण दिखाई देंगे तो समाधान पर बात करने की जगह इस वैमनस्य को भड़का रहे है। कोई अगड़ो की तरफ से इस आग में घी डाल रहा है , कोई पिछडो की तरफ से।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Aug 07 2018 11:46:24 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

NHDMT = राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट
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प्रधानमंत्री महोदय , कृपया NHDMT5 के प्रस्तावित क़ानून को गैजेट में प्रकाशित करें। इस प्रस्तावित क़ानून के अनुसार NHDMT हिन्दू देवालयों का प्रबंधन करेगा तथा NHDMT के ट्रस्टियों को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार हिन्दू नागरिको के पास होगा। sha1 - 3c8c9e5abe91172ca8d5c38f0b3d5f3f12fd159b , #NHDMT5 .
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कृपया यहाँ भी वोट करें -- <https://newindia.in/NHDMT5>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Aug 07 2018 19:36:38 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

NHDMT = राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट
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#TempleLaw5
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प्रधानमंत्री महोदय , कृपया NHDMT – National Hindu Devalaya Management Trust के प्रस्तावित क़ानून को गैजेट में प्रकाशित करें। इस प्रस्तावित क़ानून के अनुसार NHDMT हिन्दू देवालयों का प्रबंधन करेगा तथा NHDMT के ट्रस्टियों को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार हिन्दू नागरिको के पास होगा। sha1 - 10a93fbb2f5f0853ed5a12783aa3621828cac50d , #TempleLaw5 .
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1) इस कानून को अपना समर्थन देने के लिए यहाँ वोट करें -- <https://newindia.in/TempleLaw5>;
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2) कृपया यहाँ भी वोट करें -- <https://www.change.org/p/pmoindia-TempleLaw5>;
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3) कृपया पीएम को यह ट्विट भेजे - @PmoIndia <http://newindia.in/TempleLaw5>; #TempleLaw5
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4) मेरे द्वारा किया गया ट्विट -- <https://twitter.com/PawanJury/status/1027822526989103105>;
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5) कॉपी करने के लिए हिंदी ड्राफ्ट यहाँ देखे - <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1740849649366597>;
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6) for english text please see at - <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1740869622697933>;
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7) इस प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट की हिन्दी कुंजी - <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1636576076460622>;
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8) english Kunji aka summary of this law - <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1741940735924155>;
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9) proof I support this law on newindia -- <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1745097418941820>;
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10) ड्राफ्ट का पीडीऍफ़ - <https://www.facebook.com/groups/LawDrafts/permalink/1946259449007098/>;
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11) वितरण के लिए इस क़ानून ड्राफ्ट का पेम्पलेट --
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Aug 09 2018 05:58:20 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

पी एम की अधिकृत वेबसाइट Newindia. In के एडमिन ने मेरा एक प्रस्ताव डिलिट कर दिया है !!
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“राष्ट्रीय हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट” शीर्षक से अपलोड किया गया यह प्रस्ताव मंदिरो के प्रशासन को मज़बूत बनाने और इन्हें सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के विषय पर था ।
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प्रस्ताव का लिंक — newindia.in/NHDMT5
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Newindia पर यह व्यवस्था है कि एक बार प्रस्ताव अपलोड करने के बाद प्रस्ताव अपलोड करने वाला इसे किसी भी तरह डिलिट नही कर सकता । इसे सिर्फ़ newindia का एडमिन ही डिलिट कर सकता है ।
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इस लिंक को क्लिक करने पर newindia यह सूचना तक नही देता कि इस प्रस्ताव को डिलिट किया गया है , यह सिर्फ़ 404 एरर दिखाता है । Newindia पर मेरी आइ डी आधार लिंक्ड़ मोबाइल नम्बर से वेरिफ़ायड़ है । मुझे newindia के एडमिन ने इस सम्बंध में न तो कोई मेल भेजा है और न ही कोई SMS !!!
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हालाँकि newindia मुझे वो मेल लगातार भेज रहा है जिनमें यह बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री का अगला भाषण कब और कहाँ शुरू होने वाला है और मुझे यह भाषण क्यों ‘मिस’ नही करना चाहिए !!!
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मैंने newindia एडमिन को मेल भेज दी है । देखते है , आगे वे क्या क़दम उठाते है ।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Aug 09 2018 20:42:52 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

प्रधानमंत्री महोदय , कृपया NHDMT – National Hindu Devalaya Management Trust के प्रस्तावित क़ानून को गैजेट में प्रकाशित करें। इस प्रस्तावित क़ानून के अनुसार NHDMT हिन्दू देवालयों का प्रबंधन करेगा तथा NHDMT के ट्रस्टियों को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार हिन्दू नागरिको के पास होगा। sha1 - 10a93fbb2f5f0853ed5a12783aa3621828cac50d , #TempleLaw5 .
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कृपया यहाँ भी वोट करे - newindia.in/TempleLaw5
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Aug 10 2018 08:10:02 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

TempleLaw5
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NHDMT = राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट

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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Aug 10 2018 08:55:32 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

मैंने हिन्दू धर्म के प्रशासन को मजबूत बनाने और मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिए एक प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट NHDMT5 शीर्षक से newindia पर अपलोड किया था। किन्तु इस प्रस्ताव को 24 घंटे के भीतर ही newindia के एडमिन द्वारा डिलीट कर दिया गया। न तो एडमिन ने मुझे इस बारे में कोई सूचना दी और न ही कोई कारण बताया। मैंने उन्हें इमेल भी भेजा , किन्तु उन्होंने मुझे इसका कोई जवाब नहीं दिया। यह प्रधानमंत्री की अधिकृत वेबसाईट है और सीधे मोदी साहेब के अधीन काम करती है।
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बहरहाल , मैंने इस क़ानून ड्राफ्ट को TempleLaw5 शीर्षक से दुबारा अपलोड कर दिया है। इसका विवरण इस लिंक पर देखा जा सकता है -- <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1745117645606464>;
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दुबारा अपलोड किये गए प्रस्ताव का लिंक -- <https://newindia.in/TempleLaw5>;
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newindia के एडमिन द्वारा डिलीट कर दिए गए प्रस्ताव का लिंक - <https://newindia.in/NHDMT5>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Aug 11 2018 13:17:16 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

newindia.in के इस लिंक <https://newindia.in/global-timeline/?cat=vote>; पर आप देख सकते है कि TempleLaw5 ड्राफट पर किन किन लोगों ने वोट किया हैं
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Rakesh Suri Ghaziabad UpActivist:

newindia.in वेबसाइड के इस लिंक <https://newindia.in/global-timeline/?cat=vote>; में जाकर देखें | इसमें आपको दिखाई देगा कि TempleLaw5 ड्राफट पर किन किन लोगों ने वोट किया हैं



मैने इसलिंक की विडियों बनायी है इस लिंक मे दिखाई दे रहा है कि किन किन यूजर ने TempleLaw5 मुददे पर वोट किया है और किस समय किया है



नीचे देखें निम्‍न लोगों ने इस मुददे पर वोट किया तारीख और समय के साथ

Rahul Mehta

August 11, 2018, 10:00 am



Khatri Akshatkumar Mukulbhai

August 11, 2018, 12:50 am

Kistura ram

August 10, 2018, 11:28 pm



Santosh Yadav

August 10, 2018, 9:17 pm



Kushagra Yadav Rrg

August 10, 2018, 7:00 pm



Ishwar choudhary

August 10, 2018, 5:10 pm



Goraksha Chitale

August 10, 2018, 5:11 pm



Manoj Singh

August 10, 2018, 5:10 pm



Swapnesh Vyas

August 10, 2018, 5:10 pm



Ishwar choudhary

August 10, 2018, 5:08 pm



manoj solanki

August 10, 2018, 4:21 pm



Ashok Jain Rrg

August 10, 2018, 4:03 pm



Pawan Jury

August 10, 2018, 11:18 am



Dhiraj batade

August 10, 2018, 10:53 am



Manas Bhatnagar

August 10, 2018, 10:37 am



BITTOO SURYAVANSHI

August 10, 2018, 6:58 am



VISHAL DHOKALE

August 10, 2018, 6:32 am



varun saini

August 10, 2018, 1:28 am





Rakesh suri

9560354335

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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Aug 13 2018 10:32:01 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

वीडियो में संघ के नेता अमित शाह कह रहे है --- "कान खोलकर सुन लो , बीजेपी कभी रिजर्वेशन को हटाने वाली नहीं है। इतना ही नहीं , जो कोई रिजर्वेशन हटाने कि कोशिश करेगा उसे बीजेपी हटाने भी नहीं देगी" !!
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सवर्ण वोट खींचने के लिए 90 के दशक में संघ के नेताओं ने इस तरह का प्रचार करना शुरू किया की, यदि बीजेपी को बहुमत मिला तो वे रिजर्वेशन ख़त्म कर देंगे। लेकिन अब संघ के नेता यह जान चुके है कि इस्लामी कट्टरपंथियों के भय से ग्रस्त अगड़ी हिन्दू जातियों के मतदाताओ के पास संघ को वोट करने के सिवा कोई चारा नहीं बचा है। अत: मोदी साहेब एवं अमित शाह समेत संघ के सभी नेता पिछड़ी जातियों के वोट खींचने के लिए खुलकर रिजर्वेशन के समर्थन में आ गए है। और दूसरी तरफ सवर्ण मतदाताओ को भी बीजेपी से चिपकाए रखने के लिए बीजेपी के शीर्ष नेता मोहन भागवत रिजर्वेशन के खिलाफ बयान देते रहेंगे !!
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Ritesh Singh:

लो सवर्ण मोदी भक्तों कान की रूई निकाल कर सुन लो ..

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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Aug 15 2018 08:32:56 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

आजादी की लड़ाई में हम किस बिंदु पर निर्णायक मार खा गए और कैसे पिछले 71 सालो से हम यह मार लगातार खाते जा रहे है ? और समाधान ?
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राजनैतिक विमर्श में "आजादी" लफ्ज के कोई मायने नहीं होते। यह सिर्फ एक नारा / लेबल है। इसीलिए "आजादी" शब्द को केंद्र में रखकर की गयी सारी बहस निरर्थक है। सटीक ढंग से कहे तो, दरअसल स्वतंत्रता सेनानी "वोट देने का अधिकार" पाने की लड़ाई लड़ रहे थे , और जो स्वतंत्रता सेनानी यह बात समझ चुके थे कि "वोट देने का अधिकार" हासिल करने से कोई निर्णायक बदलाव नहीं आएगा, उन्होंने अपनी लड़ाई को "वोट वापिस भी ले लेने के अधिकार" तक विस्तृत कर दिया था।
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1947 से पहले तक जो भी भारत के शासक थे वे भारतीयों से पूछकर नहीं बने थे। तो लड़ाई इस बात को लेकर थी कि भारत पर वही व्यक्ति शासन करेंगे जिन्हें भारतीय नागरिक चुनेंगे। और उस समय भारतीयों के पास प्रतिनिधियों को चुनने की आजादी नहीं थी। लेकिन महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल , महात्मा चंद्रशेखर आजाद , महात्मा भगत सिंह जैसे क्रन्तिकारी यह बात जान चुके थे कि सिर्फ वोट देने का अधिकार मिलने से कुछ होने वाला नहीं है। इसीलिए उन्होंने 1925 में प्रकाशित अपने मेनिफेस्टो में यह मांग रखी कि -- "हम जिस गणराज्य कि स्थापना करना चाहते है उसमे भारतीयों के पास अपने प्रतिनिधियों को वापिस बुलाने ( रिकॉल करने ) का अधिकार भी होगा"।
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वजह यह थी कि 1919 को भारत में हुए पहले चुनाव में चुने गए कोंग्रेस के उम्मीदवार जीतने के अगले ही दिन अंग्रेजो की हाँ में हाँ मिलाने लगे थे। अत: क्रांतिकारियों ने इस बात को नोट कर लिया था कि अच्छे आदमी को चुनने से कुछ नहीं होगा , उसे "अच्छा बनाए रखने के लिए" यह जरुरी है कि उसके सिर पर निरंतर तलवार लटकती रहे। उन्हें राईट टू रिकॉल कानूनों में यह लोकतान्त्रिक तलवार नजर आयी।
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महादुरात्मा गांधी और जवाहर लाल गाज़ी ने देश वासियों को यह कभी नहीं बताया कि "अग्रेजो भारत छोड़ो" के बाद कौन लोग किस तरह से देश चलाएंगे। कोंग्रेस के इन नेताओं की सारी लड़ाई इस बात को लेकर थी कि जब अंग्रेज जाए तो कमान इन्हें सौंप जाए। पेड मीडिया ने अवाम को नारे बाजी में इतना उलझा दिया था कि कार्यकर्ताओ का ध्यान इस बात से हट गया कि अंग्रेजो के जाने के बाद हमें जो शासन व्यवस्था चाहिए उसकी ड्राफ्टिंग पर ध्यान देना चाहिए। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजो ने संविधान एवं कानूनों की जो ड्राफ्टिंग अपने चमचो को छापने के लिए कहा उन्होंने वही लागू किये।
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यदि उस समय कार्यकर्ताओ ने ड्राफ्टिंग पर ध्यान दिया होता तो हमें यह सर्कस देखने को नहीं मिलता , जो सर्कस आज देखने को मिल रहा है। आज भी हालात बदले नहीं है , आजादी को लानत भेजने वाले , इसे झूठी और आधी अधूरी आजादी बताने वाले कार्यकर्ता आज भी यह बात समझने को राजी नहीं है कि हमें टूटी फूटी आजादी मिली क्योंकि 1946-47 के निर्णायक समय में कार्यकर्ताओं ने ड्राफ्टिंग पर ध्यान देने से इनकार कर दिया था। वे या तो "आजादी आजादी" के नारे लगा रहे थे, या फिर इस भ्रम के शिकार थे कि अंग्रेजो के जाने से सब कुछ स्वत: ठीक हो जाएगा। और जो कार्यकर्ता प्रक्रिया एवं ड्राफ्टिंग का महत्त्व समझते थे उनकी संख्या कम होने से उन्हें अनसुना कर दिया गया।
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समाधान - आज आजादी पर लानत भेजने वाले कार्यकर्ताओं को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि किन कानूनों को देश में लागू करवाकर उनके हिसाब से देश में सही मायनों में आजादी लायी जा सकती है। जहां तक मेरी बात है , मैं आज से 90 वर्ष पहले क्रान्तिकारियो द्वारा कही गयी इस बात से सहमत हूँ कि -- "राईट टू रिकॉल कानूनों के अभाव में स्वराज्य एक मजाक बन कर रह जाएगा।"
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स्वतंत्रता आन्दोलन "लोकतंत्र" कि स्थापना को लेकर था। लोकतंत्र में लोक के पास निम्न 4 अधिकार अनिवार्य रूप से होते है -- 1) चुनने का अधिकार , 2) रिकॉल करने का अधिकार , 3) दंड देने का अधिकार , 4) हथियार रखने का अधिकार। 1947 में हमें सिर्फ चुनने का अधिकार दिया गया है। शेष 3 अधिकार आज भी नदारद है। जबकि अमेरिका के नागरिको के पास ये चारो अधिकार उसी समय आ गए थे जब उन्हें 1776 में आजादी मिली थी।
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राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम और हथियार बंद नागरिक समाज कि रचना के कानून लागू करवाने से भारत के नागरिको को ये तीनो अधिकार मिल जायेंगे। इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट देखने के लिए यह लिंक देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Aug 16 2018 19:04:03 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

पोकरण-2 के परिक्षण का आदेश देना वाजपेयी जी का सबसे साहसिक और सबसे महत्त्वपूर्ण फैसला था। वे अपने इस फैसले के लिए हमेशा याद किये जाते रहेंगे।
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ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Aug 21 2018 10:22:32 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

नोटा दबाने से बेहतर है कार्यकर्ताओ को ऐसी छोटी पार्टियों या निर्दलीय उम्मीदवारों को समर्थन देना चाहिए जिन्होंने समाधान के लिए कानूनी ड्राफ्ट्स का प्रस्ताव किया है।
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नोटा के वोटो को चुनाव आयोग कैसे देखता है ?
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मान लीजिये कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में 100 मतदाता है। यदि 97 मतदाता नोटा दबाते है और उम्मीदवार X को 1 एवं Y को 2 वोट मिलते है तो उम्मीदवार Y विजयी घोषित किया जाएगा। क्योंकि चुनाव आयोग नोटा के वोटो को "निरस्त" वोटो में गिनता है।
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चुनाव आयोग का नोटा के पक्ष में यह तर्क है कि , नोटा के कारण राजनैतिक पार्टियों पर "अच्छे उम्मीदवार" उतारने का दबाव पड़ेगा। यह बिलकुल बेसिर पैर का तर्क है। क्योंकि चुनाव आयोग नोटा के वोटो को रद्द मानकर चलता है। तो जीत हार का फैसला इसी आधार पर होगा कि किस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिले है।
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तकनीकी रूप से नोटा दबाने वाला व्यक्ति यह कहता है कि मैं किसी को चुनना नहीं चाहता। लेकिन तथ्य यह है कि तब भी वे लोग चुन लिए जायेंगे जिन्हें आप चुने हुए नहीं देखना चाहते। नोटा इस परिस्थिति में कोई भी बदलाव लेकर नहीं आता। और न ही नोटा की संख्या बढ़ने से किसी राजनैतिक पार्टी को कोई फर्क आता है। दबाव बनना तो दूर की बात है।
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राईट टू रिकॉल इससे कहीं ज्यादा ताकतवर व्यवस्था है। राईट टू रिकॉल में मतदाताओ के पास यह विकल्प रहता है कि वह चुन कर आये बदतर व्यक्ति को किसी भी समय नौकरी से निकाल सकते है। पद चले जाने का यह भय जनप्रतिनिधि के व्यवहार में परिवर्तन लाता है और वह अपना काम काज सुधारने लगता है। मेरे जैसे व्यक्ति के लिए यह एक रहस्य भरा प्रश्न है कि नोटा का समर्थन करने वाले कार्यकर्ता जब यह मानते है कि सारे उम्मीदवार बुरे है अत: हम नोटा दबायेंगे तो वह कौनसी चीज है जो उन्हें राईट टू रिकॉल कानूनों का समर्थन करने से रोकती है !! क्योंकि राईट टू रिकॉल क़ानून नोटा का प्रचार करने वाले इन मतदाताओं को यह अधिकार देता है कि वे उन बुरे उम्मीदवारों को नौकरी से निकाल कर किसी अच्छे उम्मीदवार को चुन सके। वो भी किसी भी समय। 5 साल इन्तजार किये बिना !!
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तो नोटा का समर्थन करने वाले कार्यकर्ताओ से मेरा आग्रह है कि वे राईट टू रिकॉल कानूनों का समर्थन करें। क्योंकि सिर्फ राईट टू रिकॉल क़ानून ही इस सर्कस से छुटकारा दिला सकता है। यदि आपको कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है तो आप नोटा को वोट करें लेकिन साथ ही नागरिको में राईट टू रिकॉल कानूनों का भी प्रचार करें। क्योंकि नोटा बुरे उम्मीदवारों को आपका शासक बनने से रोकने में सक्षम नहीं है।
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मेरा मानना है कि नोटा के समर्थक कार्यकर्ताओ में से जो कार्यकर्ता चुनाव में खड़े हो सकते है उन्हें खुद चुनाव में खड़े होकर मतदाताओं को विकल्प देना चाहिए। यदि वे चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे है तो उन्हें किसी ऐसे निर्दलीय उम्मीदवार या छोटी पार्टी के उम्मीदवार को वोट करना चाहिये जिसने समाधान के लिए लिखित कानूनी ड्राफ्ट दिए है। इससे नए एवं अच्छे उम्मीदवारों को हौंसला बढेगा, और आने वाले चुनावों में ज्यादा उम्मीदवार चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित होंगे।
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बहरहाल , यदि आपके क्षेत्र में ऐसा कोई उम्मीदवार नहीं है जिसने समाधान के कानूनी ड्राफ्ट दिए है तो नोटा दबाना ही एकमात्र विकल्प हो सकता है। लेकिन इस बात पर ध्यान देना जरुरी है कि नोटा बुरे उम्मीदवार को चुनाव जीतने से नहीं रोकता और न ही अच्छे उम्मीदवार को बढ़ावा देता है। यदि आप अच्छे उम्मीदवारो को मैदान में लाना चाहते है तो या तो खुद चुनाव लड़े या फिर उन नन्हे उम्मीदवारों को वोट करे जो आपकी नजर में बड़ी पार्टियों की तुलना में कम बुरे है। और इस बात को समझ लेना सबसे जरुरी है कि हर स्थिति में राईट टू रिकॉल अंतिम इलाज है। क्योंकि राईट टू रिकॉल ही अच्छे उम्मीदवार को चुन लिए जाने के बाद बुरा बनने से रोकता है।
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मेरे द्वारा प्रस्तावित राईट टू रिकॉल कानूनों के ड्राफ्ट देखने के लिए इस लिंक पर जाए ---- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Aug 22 2018 08:34:06 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

नोटा , राईट टू रिजेक्ट एवं राईट टू रिकॉल ;
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1) नोटा - नोटा उम्मीदवारों को खारिज करने की प्रक्रिया नहीं है। नोटा में दिए गए वोट निरस्त माने जाते है। मान लीजिये किसी निर्वाचन क्षेत्र में 100 वोट गिरे है , और उनमे से 90 वोट नोटा को मिले , तो चुनाव आयोग 90 वोटो को invalid मान कर रद्द कर देता है, और सिर्फ 10 वोट ही वैध माने जायेंगे। इन 10 वोटो में जिस उम्मीदवार को अधिक वोट मिले है वो उम्मीदवार जीत जायेगा। इस तरह नोटा उम्मीदवार को ख़ारिज नहीं करता, बल्कि आपके वोट को मतों की गिनती से बाहर कर देता है। इस तरह नोटा व्यवस्था किसी भी तरह का बदलाव लाने में सक्षम नहीं है।
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2) राईट टू रिजेक्ट - यह भी एक कमतर और अनुपयोगी प्रस्ताव है। राईट टू रिजेक्ट में सभी उम्मीदवारों को खारिज कर दिया जाता है। यदि रिजेक्ट करने वाले मतदाताओ का बहुमत है तो फिर से चुनाव कराये जाते है। इस तरफ राईट टू रिजेक्ट उम्मीदवारों को खारिज करने की व्यवस्था है। अब मान लीजिये कि अगले चुनाव में जो जो उम्मीदवार मैदान में है जनता उनमे से किसी "योग्य एवं ईमानदार" व्यक्ति को चुन लेती है। लेकिन चुनाव जीतने के अगले दिन ही यह उम्मीदवार भ्रष्ट हो जाएगा। अब मतदाता के पास इसे 5 साल झेलने के अलावा कोई इलाज नहीं है। 5 साल बाद मतदाता फिर किसी दूसरे उम्मीदवार को चुनेंगे और भगवान से मनाएंगे कि ये उम्मीदवार भ्रष्ट न हो जाए। किन्तु चुनाव जीतने के अगले दिन ही यह भी बिक जाएगा। बस यही चक्र चलता रहेगा। राईट टू रिजेक्ट इस चक्र को रोकने सक्षम नहीं है।
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3) राईट टू रिकॉल - यह सबसे ताकतवर प्रस्ताव है। यदि मतदाता किसी उम्मीदवार को चुनते है , और यह उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद बिक जाता है तो मतदाता बहुमत का प्रदर्शन करके इसे पद से निष्काषित कर सकते है। इस तरह राईट टू रिकॉल चुनाव जीतने वाले व्यक्ति को निरंतर ईमानदार बनाए रखता है। यदि उम्मीदवार बिक जाता है , तो जनता उसे नौकरी से निकाल बाहर करेगी।
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क्या मतदाताओ को नोटा का प्रयोग करना चाहिए ?
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मेरे विचार में , जो कार्यकर्ता आगामी चुनावों में नोटा दबाने के पक्ष में है उन्हें खुद चुनाव "लड़ने" (*) की कोशिश करनी चाहिए। यदि वे चुनाव "लड़ने" की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे है तो उन्हें अपने विधानसभा क्षेत्र में अन्य कार्यकर्ताओ को चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। साथ ही यह भी जरुरी है कि वे अपने एजेंडे में राईट टू रिकॉल के ड्राफ्ट शामिल करे। क्योंकि वास्तविक बदलाव राईट टू रिकॉल कानूनों के आने से आएगा।
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नोटा के समर्थको को राईट टू रिकॉल के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को समर्थन क्यों देना चाहिए ?
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क्योंकि यदि राईट टू टू रिकॉल क़ानून होता तो इन मतदाताओं को नोटा का रुख करने की जरुरत नहीं होती। वे राईट टू रिकॉल का प्रयोग करके मौजूदा प्रतिनिधि को किसी अन्य प्रतिनिधि से बदल सकते थे। 5 साल इन्तजार किये बिना।
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(*) चुनाव लड़ने से अभिप्राय चुनाव जीतने से नहीं है। चुनाव जीतने के लिए विराट संसाधनों की जरुरत होती है , किन्तु 5-6 कार्यकर्ताओ के सहयोग एवं 30-40 हजार रूपये में काफी अच्छे से चुनाव लड़ा जा सकता है। जितने ज्यादा उम्मीदवार राईट टू रिकॉल मुद्दों के ऊपर चुनाव में उतरेंगे उतने ज्यादा नागरिको तक इन कानूनों की जानकारी पहुंचेगी। अत: कार्यकर्ताओ को प्रचार करने के लिए चुनाव लड़ना चाहिए , जीतने के लिए नहीं।
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प्रस्तावित राईट टू रिकॉल कानूनों के ड्राफ्ट देखने के लिए इस लिंक पर जाए ---- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Aug 22 2018 09:07:00 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

नोटा के समर्थन कर रहे कार्यकर्ता नोटा का समर्थन करने पर विवश क्यों हुए है ?
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क्योंकि उनके पास राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं नहीं है। यदि मतदाताओ के पास राईट टू रिकॉल होता था तो ये मतदाता मौजूदा प्रतिनिधि को 5 साल इंतज़ार किये बिना ही बदल सकते थे। तब उन्हें नोटा की और रुख करने की जरूरत न होती। नोटा के समर्थको से मेरा आग्रह है कि जिस मुद्दे पर उनका मोहभंग सभी पार्टियों से हो चुका है , उन मुद्दों पर स्वयं चुनाव लड़ने का प्रयास करे , या अपने क्षेत्र में अन्य छोटे कार्यकर्ताओ को इन मुद्दों पर चुनाव लड़ने को प्रेरित करे।
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साथ ही इस बात पर भी विशेष ध्यान रखे कि सिर्फ उसी उम्मीदवार का समर्थन करें जिसने अपने एजेंडे में राईट टू रिकॉल के "ड्राफ्ट" शामिल किये है। क्योंकि राईट टू रिकॉल के अभाव में अमुक उम्मीदवार भी चुनाव जीतने के अगले दिन ही पलट जाएगा और फिर आप अगले 5 साल तक अगले चुनाव में फिर से नोटा दबाने का इंताजर करते रहेंगे !!
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प्रस्तावित राईट टू रिकॉल कानूनों के ड्राफ्ट देखने के लिए इस लिंक पर जाए ---- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Aug 22 2018 09:51:33 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

आगामी चुनावो में "संभावित फ्रोड उम्मीदवार" की पहचान कैसे करे ?
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राजनीति में स्टेंड न लेना सबसे बारीक चाल है। धूर्त एवं मक्कार उम्मीदवार ऐसे मुद्दों पर कभी "स्पष्ट" स्टेंड नहीं लेता जिससे उसे वोटो की हानि हो सकती है। इसीलिए वह किसी मुद्दे पर उसके रुख की "स्पष्ट प्रक्रिया" यानी ड्राफ्ट कभी भी सामने नहीं रखता है।
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उदाहरण के लिए -- मान लीजिये कि एक उम्मीदवार X चुनावों में प्रत्याशी है। अब यदि वह आरक्षण पर क्लियर स्टेंड लेता है कि यदि मैं सत्ता में आया तो अमुक क़ानून पास करके आरक्षण ख़त्म कर दूंगा , तो वह आरक्षण के समर्थको के वोट गँवा देगा। और यदि वह चुनाव से पहले आरक्षण बढाने का वादा करता है तो आरक्षण विरोधी उसके खिलाफ वोट कर देंगे। ऐसे स्थिति में यह फ्रोड उमीदवार अव्वल तो कोई क्लियर स्टेंड नहीं लेगा। वह अपने टोले के नेताओं को इस मुद्दे पर विरोधाभासी बयान देने को कहेगा। इस तरह वह चुप रहकर या विरोधाभासी बयान देकर दोनों पक्षों को मूर्ख बनाएगा और दोनों पक्षों के वोट ले उड़ेगा।
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और यदि उसे लगता है कि अमुक मुद्दे पर बहुमत किसी एक तरफ झुक रहा है और "क्लियर स्टेंड" लेने में फायदा है तो भी वह सिर्फ जबानी स्टेंड लेगा , मतलब सिर्फ घोषणा करेगा। लेकिन वह उस मुद्दे को हल करने के लिए चुनाव पूर्व लिखित क़ानूनी ड्राफ्ट कभी नहीं देगा। क्योंकि लिखित ड्राफ्ट देने से वह बाद में कोई बहाने नहीं बना सकेगा, और यदि वह पलट जाता है तो साफ़ तौर पर एक्सपोज हो जाएगा। उदाहरण के लिए ऐसा उम्मीदवार यह तो कहेगा कि हम राम मंदिर का निर्माण करेंगे या गौ हत्या बंद करेंगे , किन्तु यदि आप इस आदमी से पूछेंगे कि -- "आप किस क़ानून को लागू करके राम मंदिर का निर्माण करेंगे एवं गौ हत्या रोकेंगे" , तो यह उम्मीदवार कोई जवाब नहीं देगा। यह उम्मीदवार चुनाव से पहले ऐसा क़ानून ड्राफ्ट कभी नहीं रखेगा जिसे पास करके मंदिर निर्माण किया जा सकता है, या गौ हत्या रोकी जा सकती है । और चुनाव जीतने के बाद वह आपको अगले 5 साल तक तकनिकी और गैर तकनिकी अनगिनत बहाने गिनाते रहेगा।
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इसी तरह से यदि कोई उम्मीदवार यह कहता है कि मैं देश में पुलिस व्यवस्था सुधार दूंगा या न्यायपालिका का भ्रष्टाचार ख़त्म कर दूंगा तो उनसे इसके क़ानून ड्राफ्ट मांगे। यदि वह इसके लिए आपको लिखित कानूनी ड्राफ्ट नहीं देता है तो यह मानकर चले कि वह आपको बेवकूफ बनाने का इरादा बनाकर बैठा है।
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मेरा बिंदु यह है कि -- जो भी उम्मीदवार चुनाव से पहले उन कानूनों के ड्राफ्ट सार्वजनिक नहीं करता जिन मुद्दों को वह उठा रहा है , तो ज्यादातर से भी ज्यादातर सम्भावना है कि वह प्रथम दृष्टया फ्रोड उम्मीदवार है और उसकी मंशा सिर्फ वोट बटोरने की है। ऐसे उम्मीदवारों पर आप दबाव बनाए कि वे उन कानूनों के ड्राफ्ट सार्वजनिक करे जिन्हें वे जीतने के बाद लागू करने वाले है। यदि उम्मीदवार आपकी पहुँच में नहीं है तो उनके समर्थक कार्यकर्ताओ से ड्राफ्ट मांगे। यदि फिर भी अमुक उम्मीदवार ड्राफ्ट नहीं देता है तो ऐसे उम्मीदवार की अवहेलना न करे बल्कि नागरिको को यह सूचना भी दें कि अमुक उम्मीदवार मुद्दे उठाकर मतदाताओं को बेवकूफ बनाने का इरादा बनाकर बैठा है, और उलटे सीधे बयान चलाकर सिर्फ वोट इकट्ठे करना चाहता है।
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फ्रोड कार्यकर्ताओ की पहचान कैसे करे ?
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फ्रोड कार्यकर्ता हमेशा "संभावित फ्रोड उम्मीदवारों" का समर्थन करते है। उनका हमेशा से यही स्टेंड रहता है कि आप मेरे नेता पर विश्वास करो। उसे वोट दे दो बस। बाद में जो होगा देखेंगे।
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समाधान ?
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यदि आपके विधानसभा क्षेत्र में किसी भी उम्मीदवार ने चुनाव पूर्व कोई कानूनी ड्राफ्ट नहीं दिए है मतलब सभी उम्मीदवार पर्याप्त रूप से चालाक है तो आप खुद चुनाव लड़ने की कोशिश करे या ऐसे छोटे उम्मीदवार का प्रचार करे जिसने चुनाव से पहले लिखित कानूनी ड्राफ्ट दिए हो। साथ ही अपने एजेंडे में राईट टू रिकॉल कानूनों को भी शामिल करे , वर्ना अच्छा उम्मीदवार भी जीतने के अगले दिन ही भ्रष्ट हो जाएगा। सिर्फ राईट टू रिकॉल ही "संभावित फ्रोड उम्मीदवार" को चुनाव जीतने के बाद फ्रोड होने से रोक सकता है।
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प्रस्तावित राईट टू रिकॉल कानूनों के ड्राफ्ट देखने के लिए इस लिंक पर जाए ---- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Aug 26 2018 06:56:51 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

श्री लाल कृष्ण आडवाणी को अपनी वसीयत में यह जोड़ देना चाहिए कि — उनकी अस्थियों को लेकर कोई तमाशा न खड़ा किया जाए !!
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सम्मान अपनी जगह है , किंतु अस्थि कलशों के इस भौंडे प्रदर्शन ने वाजपेयी जी के अवसान का मखौल बना दिया है । बीजेपी के शीर्ष नेताओ को ऐसा करने से बचना चाहिए था ।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Aug 26 2018 20:09:26 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

यदि आदिवासियों में कैंसर जैसा रोग बड़े पैमाने पर फैलता है तो लाभार्थी मिशनरीज है। तब मिशनरीज ऐसे आदिवासी इलाको में जाकर मुफ्त दवाइयाँ एवं चिकित्सा मुहैया कराने के लिए अपना ढांचा स्थापित कर सकेगी और नतीजे में बड़े पैमाने में धर्मांतरण होंगे। लेकिन मिशनरीज को क्रेडिट सिर्फ कैंसर की चिकित्सा का ही मिलेगा , कैंसर फैलाने का नहीं।
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प्रोजेक्ट के शीर्ष अधिकारियों , कम्पनी के संचालको एवं प्रोजेक्ट एप्रूव करने वाले नेताजी का जूरी द्वारा सार्वजनिक नार्को टेस्ट किये बिना किसी भी प्रकार की जांच सिर्फ लीपा पोती करके सच्चाई छिपाने का काम करेगी , सच्चाई सामने लाने का नहीं।
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Kistura Ram Choudhary:

देख लो काले अग्रेजो के काले कारनामे
यह लोग जन्ता को केसर करवाकर मार रहे है
ओर इन काले अग्रेजो कि नपुंसकता देखो
कम्पनी खुले आम दादा गिरी कर रही है यह खामोश है
आखिर एक कम्पनी को यह सजा नहीं दिलवा सकते
क्यो??
क्या रिजन है
यह डर क्यो रहे है उल्टे कम्पनी से ही
कुछ तो दाल मे काला है
शायद इन लोगो ने इस डिल मे बड़ी गुस्स खाई होगी
इसलिए कम्पनी कहीं खुलासा ना कर दे इसी डर मे यह आत्म समर्पण किए हुए है

समाधान--अब एसे मे आम जन्ता के पास एक ही रास्ता बचता है वो है कोर्ट से न्याय कि याचिका
पर कोर्ट मे तो इन नेताओ से बड़े भ्रष्ट जज बेठे होते है
तो कन्फर्म है उधर भी इन केसंर पिड़ितो को न्याय नहीं मिल सकता
एसे मे यदी आम जन्ता को यदी न्याय चाहिए तो देश मे भ्रष्ट जज सिस्टम कि जगह जुरी सिस्टम लागु करवाए
अपने प्रतिनीधी पर दबाव बनाकर
यदी यह केस जुरी मे जाता है तो इस कम्पनी, ओर गुस्स खाने वाले नेता दोनो पर कड़ी कार्रवाई होगी
ओर इन पर कड़ी कार्रवाई देखकर भविष्य मे ओर कोई एसा अमानवीय कार्य नहीं करेगा

जुरी सिस्टम कि अधिक जानकारी के लिए मेरी क्वर पिक्चर पर क्लिक करे

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Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Aug 27 2018 15:44:12 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Rtr meeting held at Bangalore on 26th August.

Padmaja Paati:

Update on the 26 Aug RTR meeting:
It was a fruitful meeting.The main topic discussed was Jury System . Both Amit Swain and Madhusudhan Rathi spoke insightfully on Jury System .

.I was pleasantly surprised to see such young people putting such extensive effort in researching the pro's and cons of the system and articulating it really methodically too.
It was wonderful knowing them .
We plan to conduct such meetings on a regular basis at more convenient and formal venues in the future.
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Pls watch out this space for event announcements.

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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Aug 28 2018 09:24:29 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत का कहना है -- बैलेट पर लौटना मतलब बूथ केप्चरिंग !!
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यदि देश के नागरिको के पास चुनाव आयुक्त को लात मारकर नौकरी से निकालने का अधिकार मतलब राईट टू रिकॉल होता तो रावत नागरिको को इस तरह मूर्ख बनाने का प्रयास न करते।
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दरअसल रावत यह बात छुपा रहे है कि -- बैलेट बॉक्स का एक बूथ लूटना आसान है , किन्तु इससे "बड़े पैमाने" पर धांधली नहीं की जा सकती। जबकि ईवीएम से "बहुत बड़े पैमाने" पर चुपचाप धांधली की जा सकती है।

१. जब बेलेट बॉक्स ( बूथ ) लूटे जाते है तो यह छुपता नही है । घटना सामने आती है , और अमुक बूथ के चुनाव रद्द कर दिए जाते है । जबकि ईवीएम हेक की जाती है तो कभी भी मालूम नही हो सकता कि मत बदल दिए गए है ।
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२. तकनीकी के कारण बूथ केपचरिंग अब आसान नही रह गयी है । तब की बात और थी । संवेदन शील बूथो पर CCTV लगा देने से बूथ केपचरिंग की सम्भावना नगण्य हो जाती है । जबकि ईवीएम मेनपुलेशन को रोकने का कोई उपाय नही है । और मेनिपुलेशन को कभी साबित भी नही किया जा सकता !!
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३) एक बूथ लूटने के लिए १५-२० हथियार बंद गुंडो की ज़रूरत होती है । यदि १००० बूथ लूटने हो तो १५-२० हज़ार गुंडो की ज़रूरत होगी । जो कि अव्यवहारिक है । जबकि २० तकनीकी एक्सपर्ट मिलकर हज़ारों बूथ की ई वी एम् को मेनिपुलेट कर सकते है । और समस्या यह है कि जनता को कभी भी मालूम नही हो सकता कि ईवीएम के साथ छेड़खानी कर दी गयी है ।
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इस तरह ईवीएम में “बड़े पैमाने” पर चुपचाप वोट बदले जा सकते है , बेलेट बॉक्स में नही । "बड़े पैमाने" पर छेड़खानी मह्त्त्व्पूर्ण विषय है । छेड़खानी नही ।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Aug 28 2018 10:01:10 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

क्या भारत की ईवीएम के साथ छेड़खानी की जा सकती है ?
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evm इंटरनेट से कनेक्ट नहीं होता अत: इसे सुदूर बैठ कर मैनिपुलेट नहीं किया जा सकता। किन्तु evm एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है अत: इसे टीवी / ए सी आदि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की तरह रिमोट से कमांड देकर ऑपरेट किया जा सकता है। किन्तु जिस तरह अमुक टीवी को अमुक रिमोट से ही कमांड दी जा सकती है , अन्य रिमोट से नहीं , उसी तरह से इवीएम को भी रिमोट से वही व्यक्ति ओपरेट कर सकता है जिसे इवीएम में रिसीवर रखने का मौका मिला हो।
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इवीएम में रिसीवर इंस्टाल करने का मौका किसे मिल सकता है ?
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1) वे इंजिनियर जो चुनाव आयोग के लिए इवीएम का निर्माण करते है , उनके पास इसके लिए पर्याप्त मौका होता है।
2) जिस कम्पनी के पास इवीएम के ट्रांसपोर्टेशन का ठेका है।
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इवीएम बेंगलोर में बनती है और इन्हें ट्रको पर लाद कर देश भर के राज्यों में भेजा जाता है। चुनाव आयोग इस लदान के लिए निजी ट्रांसपोर्टर का इस्तेमाल करता है। अत: 3-4 दिन तक इवीएम ट्रांसपोर्टर के हवाले रहती है। मतलब , यदि X चुनाव आयोग एवं अमुक कम्पनी से मिली भगत बना लेता है तो इवीएम में बड़े पैमाने पर छेड़खानी की जा सकती है। और इसे कभी भी पकड़ा नहीं जा सकता। क्योंकि मेनिपुलेशन की जांच चुनाव आयोग ही करता है !!
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उल्लेखनीय है कि चुनाव आयोग खुद यह बात बात मानता है कि यदि किसी इलेक्ट्रोनिक इंजिनियर को 10 मिनिट के लिए इवीएम दे दिया जाए तो वह इसे रिमोट द्वारा ओपरेट कर सकता है। लेकिन चुनाव आयोग का दावा है कि चुनाव आयोग के सभी कर्मचारी एवं ट्रांसपोर्टर इतने ईमानदार है कि वे यह ऐसी छेड़खानी कभी नहीं करते। तो जब भी चुनाव आयोग इवीएम हेक करने की चुनौती देता है तब वह इवीएम किसी को छूने नहीं देता। और इवीएम को वही मेनिपुलेट कर सकता है जिसे इवीएम छूने का मौका मिला हो !!
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2009 में इंजिनियर हरि प्रसाद ने एक इवीएम जुटाई और इसके वोट्स को रिमोट से बदल कर दिखाया था। इसका वीडियो यू ट्यूब पर देखा जा सकता है। चुनाव आयोग ने बिना अनुमति इवीएम छूने के जुर्म में उन पर चोरी का मुकदमा डाल कर जेल पहुंचा दिया।
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कुल मिलाकर इवीएम को सिर्फ चुनाव आयोग ही मनिपुलेट कर सकता है। यदि भारतीय चुनाव आयोग के सभी अधिकारी ईमानदार है तो इवीएम के साथ छेड़खानी नहीं होगी , और यदि वे भ्रष्ट है तो इवीएम को मेनुपुलेट किया जा सकता है।
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तो इस हिसाब से जब बीजेपी सत्ता में रहेगी तो विपक्ष के लिए चुनाव आयोग भ्रष्ट रहेगा और इवीएम को मेनिपुलेट किया जा सकेगा . बीजेपी लेकिन कोंग्रेस के सत्ता में आते ही कोंग्रेस के लिए चुनाव आयोग ईमानदार एवं बीजेपी के लिए भ्रष्ट हो जाएगा। बीजेपी एवं कांग्रेस के अंध भगत भी अपने नेताओ का रुख देखकर इसी तरह से अपना स्टेंड बदलते रहते है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Aug 29 2018 19:10:48 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

मैंने अब तक किन किन राजनैतिक पार्टीयों को वोट किया है एवं आने वाले चुनाव में मैं किस पार्टी को वोट करने वाला हूँ।
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मैंने 1992 में आरएसएस=बीजेपी की शाखा में जाना शुरू किया था, और 1998 में मैंने पहली बार संघ के पक्ष में वोट दिया। तब से 2014 के आम चुनावो तक प्रत्येक चुनाव में मैंने बीजेपी=संघ के पक्ष में मतदान किया है।
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यह तय है कि मैं आगामी चुनाव में संघ को किसी भी सूरत में वोट नही देने वाला हूँ। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को मैंने कभी वोट नहीं किया और भविष्य में भी करने वाला नहीं हूँ। बल्कि मैं ज्यादा से ज्यादा नागरिको को यह सूचना देने का प्रयास भी करूँगा कि उन्हें भी इन पार्टियों को वोट क्यों नहीं करना चाहिए।
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मैं अगले चुनाव में किसी ऐसे उम्मीदवार के पक्ष में वोट करूँगा जो राईट टू रिकॉल एवं ज्यूरी सिस्टम की प्रक्रियाओं के कानूनी ड्राफ्ट्स को अपने एजेंडे में शामिल करेगा। तथा ऐसे उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार भी करूँगा। यदि मेरे क्षेत्र में ऐसा कोई भी उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ता है तो मैं इन क़ानून ड्राफ्ट्स के प्रचार के लिए स्वयं चुनाव लडूंगा।
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पवन कुमार शर्मा
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Aug 29 2018 19:12:12 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

मैंने अब तक किन किन राजनैतिक पार्टीयों को वोट किया है एवं आने वाले चुनाव में मैं किस पार्टी को वोट करने वाला हूँ -------<https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1776175319167363>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Aug 29 2018 23:47:56 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

नोटा -- मोदी साहेब का मास्टर स्ट्रोक
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मोदी साहेब ने पिछले 4 वर्षो से लगातार "कोंग्रेस विरोध" केन्द्रित प्रचार अभियान क्यों चला के रखा है ? और कैसे इस वजह से "नोटा" मोदी साहेब का फिर से पीएम बनना सुनिश्चित करेगा।
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मोदी साहेब यह बात जानते है कि जिस तरह से वे शासन कर रहे है और आगे भी करने वाले है उसके कारण जल्दी ही अफीम न पीने वाले मतदाता उनसे दूर छिटक जायेंगे। यह मतदाता कहीं कोंग्रेस की झोली में न जा गिरे , इसीलिए नोटा है। नोटा का प्रचार कोंग्रेस नहीं बल्कि बीजेपी=संघ की आई टी सेल ही कर रही है !!
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कैसे "नोटा" संघ को फायदा पहुंचाएगा।
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जो वोटर संघ के शासन से खुश है वे दायें बाएं देखे बिना फिर से फूल का बटन दबाने वाले है , अत: उन्हें नोटा या किसी अन्य पार्टी से कोई मतलब नहीं है। अब मान लीजिये कि किसी लोकसभा क्षेत्र में जिन लोगो ने पिछले चुनाव में संघ को वोट किया है उनमे से कुछ 50 हजार मतदाता संघ से नाराज है। अब चूंकि वे संघ के वोटर है और उन्होंने पिछले चुनाव में संघ को वोट किया था अत: वे पहले यह बात सोचेंगे कि इस बार हम संघ को वोट नहीं करेंगे। तो इस तरह पहले दौर में संघ अमुक लोकसभा क्षेत्र में 50 हजार वोट गंवाती है।
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लेकिन अब दूसरे दौर में मोदी साहेब यह सुनिश्चित करना चाहते है कि ये 50 हजार वोट कहीं कोंग्रेस के खाते में न चले जाए !! क्योंकि यदि ये वोटर कोंग्रेस की तरफ लौटते है तो संघ को दोहरा नुकसान होगा। तब एक तरफ संघ के 50 हजार वोट कम हो जायेंगे , और दूसरी तरफ कोंग्रेस की तरफ 50 हजार वोट जुड़ जायेंगे। यदि ऐसा होता है तो संघ=बीजेपी कोंग्रेस के मुकाबले में 1 लाख वोटो से पिछड़ जायेगी !! कैसे ?
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मान लीजिये कि अमुक लोक सभा क्षेत्र में कुल 5 लाख मतदाता वोटिंग करते है , जिसमे से संघ को 2,70,000 वोट , कोंग्रेस को 2,00,000 वोट और अन्य को 30,000 वोट प्राप्त होते है। अब यदि संघ से नाराज 50 हजार वोटर संघ से निकल कर कोंग्रेस की तरफ चले जाते है तो संघ के वोट घटकर 2,20,000 रह जायेंगे लेकिन कोंग्रेस के वोट बढ़कर 2,50,000 हो जायेंगे। इस तरह यह लोकसभा संघ की जगह कोंग्रेस 30 हजार वोटो से जीत जायेगी।
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किन्तु संघ के यह 50,000 वोटर यदि नोटा दबाते है तो संघ के 50 हजार वोट कम तो होंगे , लेकिन ये वोट कोंग्रेस के खाते में नहीं जुड़ पायेंगे। तो 50 हजार वोट नोटा की तरफ चले जाने की वजह से बीजेपी के वोट 2,70,000 से घटकर 2,20,000 रह जायेंगे किन्तु तब भी कोंग्रेस के वोट 2,00,000 ही रहेंगे। इस तरह 50,000 वोट नोटा की तरफ जाने से संघ 20,000 वोट से सीट जीत जायेगी।
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मोदी साहेब जानते है कि जो वोटर 2014 के चुनावों में संघ को वोट देकर गया है और यदि वह संघ का कोर वोटर नहीं है तो वह संघ से छिटक सकता है। किन्तु वे यह नहीं चाहते कि यह वोट कोंग्रेस की तरफ जाये। अत: उन्होंने अपनी आई टी सेल को सोशल मीडिया पर नोटा का अभियान चलाने का आदेश दिया है। इस तरह मोदी साहेब नुकसान तो उठाएंगे किन्तु इस नुकसान से प्रतिद्वंदी=कोंग्रेस को फायदा न होने देंगे। और इसी वजह से वे फायदे में रहेंगे और सत्ता में वापसी करेंगे।
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कुल मिलाकर नोटा अपने आप में कोई उम्मीदवार नहीं है, इसीलिए चुनाव आयोग नोटा के वोटो को रद्द की श्रेणी में गिनता है। अत: मोदी साहेब चाहते है कि जो वोटर उनसे नाराज है वह वोट करने ही न जाए या नोटा दबा दे।
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यही वजह है कि मोदी साहेब ने सत्ता में आने के बावजूद अपने प्रवक्ताओ , आई टी सेल , नेताओं को कोंग्रेस विरोध केन्द्रित प्रचार अभियान चलाने को कहा। ताकि मतदाताओं में मोदी साहेब के प्रतिद्वंदी = कोंग्रेस के प्रति इस तरह का भाव बन जाए कि यदि वोटर संघ से नाराज भी हो जाये तो वह कोंग्रेस को वोट न करे। मतलब वह वोट ही न करे , यानी कि नोटा दबा दे। मोदी साहेब 4 साल शासन करने के बावजूद पिछले 60 साल की बातें दोहराकर नेहरु को इसीलिए प्रासंगिक बनाए रखना चाहते है, ताकि 2019 का चुनाव भी इस मुद्दे पर लड़ा जा सके कि कोंग्रेस ने 60 साल तक देश को किस तरह से लूटा। और जब कोंग्रेस के 60 साल की चर्चा होगी तो संघ से नाराज वोटर कोंग्रेस को वोट देने की जगह नोटा दबा देगा।
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बीजेपी=संघ से नाराज कार्यकर्ताओ को क्या कदम उठाना चाहिए ?
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नोटा के समर्थको से मेरा आग्रह है कि जिस मुद्दे पर उनका मोहभंग सभी पार्टियों से हो चुका है , उन मुद्दों पर स्वयं चुनाव लड़ने का प्रयास करे , या अपने क्षेत्र में अन्य छोटे कार्यकर्ताओ को इन मुद्दों पर चुनाव लड़ने को प्रेरित करे। क्योंकि तकनीकी रूप से नोटा दबाने वाला व्यक्ति यह कहता है कि मैं किसी को चुनना नहीं चाहता। लेकिन तथ्य यह है कि तब भी वे लोग चुन लिए जायेंगे जिन्हें आप चुने हुए नहीं देखना चाहते। नोटा इस परिस्थिति में कोई भी बदलाव लेकर नहीं आता।
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साथ ही इस बात पर भी विशेष ध्यान रखे कि सिर्फ उसी उम्मीदवार का समर्थन करें जिसने अपने एजेंडे में राईट टू रिकॉल के "ड्राफ्ट" शामिल किये है। क्योंकि राईट टू रिकॉल के अभाव में अमुक उम्मीदवार भी चुनाव जीतने के अगले दिन ही पलट जाएगा और फिर आप अगले 5 साल तक अगले चुनाव में फिर से नोटा दबाने का इंताजर करते रहेंगे !!
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प्रस्तावित राईट टू रिकॉल कानूनों के ड्राफ्ट देखने के लिए इस लिंक पर जाए ---- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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(*) कोर वोटर -- कोर वोटरो की स्थिति भीष्म पितामह जैसी होती है। जिस तरह वे हस्तिनापुर की गद्दी से खुद को बाँध कर रखे हुए थे उसी तरह ये लोग खुद को किसी न किसी पार्टी से बांध कर पेटी में ताले लगाकर चाबी समन्दर में फेंक देते है। फिर पार्टी जो भी करे ये हर स्थिति में पार्टी के साथ खड़े रहते है। और हद तो यह है कि इसे ये अपनी उपलब्धि भी मानते है। दरअसल ये किसी नेता के अंधभगतो से भिन्न है। ये उनसे भी आगे की चीज है। नेता जब गच्चा दे देता है या जनता के सामने एक्सपोज हो जाता है तो अंधभगतो की भक्ति काफूर हो जाती है। किन्तु कोर वोटर सभी प्रकार की विपदाए , आंधी, पानी सहते हुए पार्टी के साथ टिके रहते है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Aug 30 2018 20:45:08 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

ब्रांडेड यानी जीतने वाले बदतर उम्मीदवार को वोट न देकर हारने वाले नॉन ब्रांडेड यानी अच्छे उम्मीदवार को वोट देने से बुरे उम्मीदवारों की ताकत घटती है और अच्छे उम्मीदवारों का हौंसला बढ़ता है। यह एक बेहद साधारण बात है , किन्तु ज्यादातर मतदाता एक अजीब वजह से अच्छे किन्तु मामूली उम्मीदवारों को वोट देने से कतराते है -- उन्हें लगता है कि छोटे उम्मीदवार को वोट देने से उनका वोट खराब हो जाएगा !! वे अपना वोट खराब नहीं करना चाहते और किसी ब्रांडेड किन्तु बदतर उम्मीदवार को अपना वोट दे देते है।
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अच्छे उम्मीदवार से आशय -- ऐसा उम्मीदवार जिसने चुनाव पूर्व उन सभी कानूनों के ड्राफ्ट दिए हो जिनके लागू होने से समस्याओ का समाधान होगा।
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मेरे विचार में जो भी उमीदवार चुनाव से पहले समस्याओ के समाधान के लिए क़ानून ड्राफ्ट नहीं देता वह प्रथम दृष्टया एक फ्रोड उम्मीदवार है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Aug 31 2018 08:20:04 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राजनैतिक समस्याओ के समाधान में रुचि रखने वाले रिकालिस्ट्स को ऐसे किसी भी राजनैतिक कार्यकर्ता को गम्भीरता से 'नही' लेना चाहिए जो किसी भी राजनैतिक पार्टी का “खुला” समर्थक नही है।
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खुले समर्थन से आशय ; अमुक कार्यकर्ता को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि --

१) अगले चुनाव में वह किस पार्टी को वोट करने वाला है , या
२) किस पार्टी को वोट नहीं करने वाला है , या
३) उसने पिछले चुनाव में किस पार्टी को वोट किया था
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इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए कि किसी पार्टी का समर्थन करने का मतलब उसे "वोट करने" से है। यदि कोई व्यक्ति निरंतर किसी पार्टी X को कोसता है किन्तु वोट उसी पार्टी को देता है , तो यह मानकर चलना चाहिए कि अमुक व्यक्ति पार्टी X का ही समर्थक है। क्योंकि राजनीति में वोट करना ही एकमात्र तरीका है जिसके माध्यम से मतदाता किसी पार्टी के प्रति समर्थन या विरोध प्रदर्शित करता है।

यदि अमुक कार्यकर्ता ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि वह किस पार्टी को वोट करेगा तो उसे यह बात भी स्पष्ट करनी चाहिए , कि उसने अब तक यह तय नहीं किया है। कार्यकर्ता यदि चाहे तो अपना स्टेण्ड किसी भी समय बदल सकता है। किन्तु जब वह अपना स्टेण्ड बदले तो उसे यह बात भी सार्वजनिक रूप से लिखनी चाहिए।
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कार्यकर्ताओ को अपने फेसबुक प्रोफाइल पर "मेरा वोटिंग स्टेण्ड" या "मैं जिस राजनैतिक पार्टी का वोटर हूँ" नाम से एक एल्बम बनाना चाहिए, तथा अपना वोटिंग स्टेण्ड इस एल्बम में अपडेट करते रहना चाहिए।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Aug 31 2018 08:31:33 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राजनैतिक समस्याओ के समाधान में रुचि रखने वाले रिकालिस्ट्स को ऐसे किसी भी राजनैतिक कार्यकर्ता को गम्भीरता से 'नही' लेना चाहिए जो किसी भी राजनैतिक पार्टी का “खुला” समर्थक नही है -------<https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1777964288988466>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Aug 31 2018 19:43:58 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

50, 000 स्नातक , 28,000 स्नातकोत्तर और 3700 पीएचडी होल्डर्स ने शहर में इस ऑफिस से उस ऑफिस में दस्तावेज पहुँचाने की नौकरी के लिए आवेदन किया है। उत्तर प्रदेश की टेलीकोम विंग की इन रिक्तियों की संख्या 62 एवं न्यूनतम योग्यता है -- अभ्यर्थी को 5 वीं पास एवं साइकिल चलाना आना चाहिए।
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बेरोजगारी का आलम यह है कि , आवेदनकर्ताओं में एमबीए एवं बी टेक भी शामिल है !!
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Aug 31 2018 21:44:13 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

मिशनरीज़ द्वारा संचालित स्कूलों और अनाथालयों में धर्मन्तरण जारी है —
<https://goo.gl/HcicCw>;
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Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Aug 31 2018 23:08:48 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

पहली बार जातीय जनगणना !!
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न्यूज लिंक -- <https://goo.gl/ZdPFEL>;
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1931 की जनगणना के अनुसार ओबीसी की आबादी 52% है . वीपी सिंह आबादी के अनुपात में ओबीसी को 52% आरक्षण देना चाहते थे किन्तु सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ओबीसी को 27% आरक्षण दिया गया। तब से आज तक जातीय जनगणना नहीं की गयी है। बीजेपी के नेता जातीय जनगणना का यह कहकर विरोध करते आये है कि इससे जातीय आधारित राजनीती को बढ़ावा मिलेगा। बहरहाल , मोदी साहेब ने 2021 की जनगणना में ओबीसी के आंकड़े जुटाने का आदेश दिया है। यदि यह आंकड़े सामने आते है तो देश में जातीय आधारित राजनीति का एक नया अध्याय शुरू होगा !! जाति के आधार पर राजनीति करने के मामले में मोदी साहेब अपने सभी पूर्ववर्तियों को पछाड़ देने का संकल्प लिए हुए है !!!
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आरक्षण आबादी के अनुपात में दिया जाता है। क्यों न देश की सभी जातियों की जनगणना की जाए और जिस जाति की जितनी आबादी है , उस जाति को उसी अनुपात में आरक्षण दे दिया जाए। उदाहरण के लिए यदि राजपूत कुल आबादी का 10% है तो उन्हें 10% एवं पटेल यदि 7% है तो उन्हें 7% आरक्षण दिया जा सकेगा। इस तरह 100% आबादी को जातिय आधार पर 100% दिया जा सकता है। इससे झगडे की वजह ही समाप्त हो जायेगी। सभी को आरक्षण। प्रत्येक जाति का कोटा तय हो जाएगा है , और कोई किसी के कोटे में हस्तक्षेप न कर सकेगा।
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यह हमारा प्रस्ताव नहीं है। किन्तु यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो हम इसका विरोध नहीं करते।
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