Pawan Jury BhilwaraRj
नोटा -- मोदी साहेब का मास्टर स्ट्रोक
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मोदी साहेब ने पिछले 4 वर्षो से लगातार "कोंग्रेस विरोध" केन्द्रित प्रचार अभियान क्यों चला के रखा है ? और कैसे इस वजह से "नोटा" मोदी साहेब का फिर से पीएम बनना सुनिश्चित करेगा।
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मोदी साहेब यह बात जानते है कि जिस तरह से वे शासन कर रहे है और आगे भी करने वाले है उसके कारण जल्दी ही अफीम न पीने वाले मतदाता उनसे दूर छिटक जायेंगे। यह मतदाता कहीं कोंग्रेस की झोली में न जा गिरे , इसीलिए नोटा है। नोटा का प्रचार कोंग्रेस नहीं बल्कि बीजेपी=संघ की आई टी सेल ही कर रही है !!
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कैसे "नोटा" संघ को फायदा पहुंचाएगा।
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जो वोटर संघ के शासन से खुश है वे दायें बाएं देखे बिना फिर से फूल का बटन दबाने वाले है , अत: उन्हें नोटा या किसी अन्य पार्टी से कोई मतलब नहीं है। अब मान लीजिये कि किसी लोकसभा क्षेत्र में जिन लोगो ने पिछले चुनाव में संघ को वोट किया है उनमे से कुछ 50 हजार मतदाता संघ से नाराज है। अब चूंकि वे संघ के वोटर है और उन्होंने पिछले चुनाव में संघ को वोट किया था अत: वे पहले यह बात सोचेंगे कि इस बार हम संघ को वोट नहीं करेंगे। तो इस तरह पहले दौर में संघ अमुक लोकसभा क्षेत्र में 50 हजार वोट गंवाती है।
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लेकिन अब दूसरे दौर में मोदी साहेब यह सुनिश्चित करना चाहते है कि ये 50 हजार वोट कहीं कोंग्रेस के खाते में न चले जाए !! क्योंकि यदि ये वोटर कोंग्रेस की तरफ लौटते है तो संघ को दोहरा नुकसान होगा। तब एक तरफ संघ के 50 हजार वोट कम हो जायेंगे , और दूसरी तरफ कोंग्रेस की तरफ 50 हजार वोट जुड़ जायेंगे। यदि ऐसा होता है तो संघ=बीजेपी कोंग्रेस के मुकाबले में 1 लाख वोटो से पिछड़ जायेगी !! कैसे ?
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मान लीजिये कि अमुक लोक सभा क्षेत्र में कुल 5 लाख मतदाता वोटिंग करते है , जिसमे से संघ को 2,70,000 वोट , कोंग्रेस को 2,00,000 वोट और अन्य को 30,000 वोट प्राप्त होते है। अब यदि संघ से नाराज 50 हजार वोटर संघ से निकल कर कोंग्रेस की तरफ चले जाते है तो संघ के वोट घटकर 2,20,000 रह जायेंगे लेकिन कोंग्रेस के वोट बढ़कर 2,50,000 हो जायेंगे। इस तरह यह लोकसभा संघ की जगह कोंग्रेस 30 हजार वोटो से जीत जायेगी।
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किन्तु संघ के यह 50,000 वोटर यदि नोटा दबाते है तो संघ के 50 हजार वोट कम तो होंगे , लेकिन ये वोट कोंग्रेस के खाते में नहीं जुड़ पायेंगे। तो 50 हजार वोट नोटा की तरफ चले जाने की वजह से बीजेपी के वोट 2,70,000 से घटकर 2,20,000 रह जायेंगे किन्तु तब भी कोंग्रेस के वोट 2,00,000 ही रहेंगे। इस तरह 50,000 वोट नोटा की तरफ जाने से संघ 20,000 वोट से सीट जीत जायेगी।
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मोदी साहेब जानते है कि जो वोटर 2014 के चुनावों में संघ को वोट देकर गया है और यदि वह संघ का कोर वोटर नहीं है तो वह संघ से छिटक सकता है। किन्तु वे यह नहीं चाहते कि यह वोट कोंग्रेस की तरफ जाये। अत: उन्होंने अपनी आई टी सेल को सोशल मीडिया पर नोटा का अभियान चलाने का आदेश दिया है। इस तरह मोदी साहेब नुकसान तो उठाएंगे किन्तु इस नुकसान से प्रतिद्वंदी=कोंग्रेस को फायदा न होने देंगे। और इसी वजह से वे फायदे में रहेंगे और सत्ता में वापसी करेंगे।
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कुल मिलाकर नोटा अपने आप में कोई उम्मीदवार नहीं है, इसीलिए चुनाव आयोग नोटा के वोटो को रद्द की श्रेणी में गिनता है। अत: मोदी साहेब चाहते है कि जो वोटर उनसे नाराज है वह वोट करने ही न जाए या नोटा दबा दे।
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यही वजह है कि मोदी साहेब ने सत्ता में आने के बावजूद अपने प्रवक्ताओ , आई टी सेल , नेताओं को कोंग्रेस विरोध केन्द्रित प्रचार अभियान चलाने को कहा। ताकि मतदाताओं में मोदी साहेब के प्रतिद्वंदी = कोंग्रेस के प्रति इस तरह का भाव बन जाए कि यदि वोटर संघ से नाराज भी हो जाये तो वह कोंग्रेस को वोट न करे। मतलब वह वोट ही न करे , यानी कि नोटा दबा दे। मोदी साहेब 4 साल शासन करने के बावजूद पिछले 60 साल की बातें दोहराकर नेहरु को इसीलिए प्रासंगिक बनाए रखना चाहते है, ताकि 2019 का चुनाव भी इस मुद्दे पर लड़ा जा सके कि कोंग्रेस ने 60 साल तक देश को किस तरह से लूटा। और जब कोंग्रेस के 60 साल की चर्चा होगी तो संघ से नाराज वोटर कोंग्रेस को वोट देने की जगह नोटा दबा देगा।
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बीजेपी=संघ से नाराज कार्यकर्ताओ को क्या कदम उठाना चाहिए ?
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नोटा के समर्थको से मेरा आग्रह है कि जिस मुद्दे पर उनका मोहभंग सभी पार्टियों से हो चुका है , उन मुद्दों पर स्वयं चुनाव लड़ने का प्रयास करे , या अपने क्षेत्र में अन्य छोटे कार्यकर्ताओ को इन मुद्दों पर चुनाव लड़ने को प्रेरित करे। क्योंकि तकनीकी रूप से नोटा दबाने वाला व्यक्ति यह कहता है कि मैं किसी को चुनना नहीं चाहता। लेकिन तथ्य यह है कि तब भी वे लोग चुन लिए जायेंगे जिन्हें आप चुने हुए नहीं देखना चाहते। नोटा इस परिस्थिति में कोई भी बदलाव लेकर नहीं आता।
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साथ ही इस बात पर भी विशेष ध्यान रखे कि सिर्फ उसी उम्मीदवार का समर्थन करें जिसने अपने एजेंडे में राईट टू रिकॉल के "ड्राफ्ट" शामिल किये है। क्योंकि राईट टू रिकॉल के अभाव में अमुक उम्मीदवार भी चुनाव जीतने के अगले दिन ही पलट जाएगा और फिर आप अगले 5 साल तक अगले चुनाव में फिर से नोटा दबाने का इंताजर करते रहेंगे !!
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प्रस्तावित राईट टू रिकॉल कानूनों के ड्राफ्ट देखने के लिए इस लिंक पर जाए ---- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>
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(*) कोर वोटर -- कोर वोटरो की स्थिति भीष्म पितामह जैसी होती है। जिस तरह वे हस्तिनापुर की गद्दी से खुद को बाँध कर रखे हुए थे उसी तरह ये लोग खुद को किसी न किसी पार्टी से बांध कर पेटी में ताले लगाकर चाबी समन्दर में फेंक देते है। फिर पार्टी जो भी करे ये हर स्थिति में पार्टी के साथ खड़े रहते है। और हद तो यह है कि इसे ये अपनी उपलब्धि भी मानते है। दरअसल ये किसी नेता के अंधभगतो से भिन्न है। ये उनसे भी आगे की चीज है। नेता जब गच्चा दे देता है या जनता के सामने एक्सपोज हो जाता है तो अंधभगतो की भक्ति काफूर हो जाती है। किन्तु कोर वोटर सभी प्रकार की विपदाए , आंधी, पानी सहते हुए पार्टी के साथ टिके रहते है।
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