विधानसभा चुनाव 2018 में वितरित किये गए 24 पेज के पेम्पलेट के अंश : भाग - 1 ( पूरा पीडीऍफ़ कमेन्ट बॉक्स में देखें )
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इस पेम्पलेट के अध्यायों की सूची
00. यह पेम्पलेट इतना लम्बा क्यों है ?
01. राईट टू रिकॉल आन्दोलन का लक्ष्य ?
02. राजपत्र अधिसूचना या गेजेट नोटिफिकेशन क्या है ?
03. अमेरिका की पुलिस एवं अदालतें भारत की तुलना में ज्यादा कार्यकुशल एवं ईमानदार क्यों है ? क्योंकि वहां के
नागरिको के पास राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख, राईट टू रिकॉल जज एवं ज्यूरी सिस्टम प्रक्रियाएं है।
04. राईट टू रिकॉल आन्दोलन 85 वर्ष पुराना होने के बावजूद आज भी पिछड़ा हुआ क्यों है ?
05. राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी का क़ानून ड्राफ्ट
06. अन्य पदों पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं
07. राईट टू रिकॉल प्रधानमंत्री
08. सबसे जरुरी एवं चुनौती पूर्ण काम – उन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित करवाना जिससे भारत की सेना चीन एवं
अमेरिका से युद्ध का सामना करने में आत्मनिर्भर एवं सक्षम हो जाए।
09. दूसरा सबसे जरुरी काम - अदालतों में लंबित सभी 3 करोड़ मुकदमो का निस्तारण 3 वर्ष में करना।
10. तीसरा सबसे जरुरी काम – दीमक की तरह पूरे भारत में फ़ैल रहे 2 करोड़ बांग्लादेशी घुसपेठीयो को देश से बाहर
खदेड़ने के लिए आवश्यक कानूनी ड्राफ्ट्स गेजेट में प्रकाशित करवाना।
11. संविधान के अनुच्छेद 147 में बदलाव करना। इस अनुच्छेद की वजह से भारत की सुप्रीम कोर्ट को ब्रिटेन की प्रिवी
कौंसिल द्वारा दिए गए फैसलों का पालन करना पड़ता है !!!
12. टी सी पी क़ानून लागू करके नागरिको के बहुमत से अहिंसामूर्ती महात्मा सुभाष चन्द्र बोस को भारत का राष्ट्रपिता घोषित करना।
13. आरक्षण - दलितों की सहमती से आरक्षण को कम करना।
14. प्रस्तावित धन वापसी क़ानून नामक खतरे से निपटने के लिए , प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोकने एवं गरीबी कम करने के लिए हमारा प्रस्ताव – एम आर सी एम क़ानून ड्राफ्ट
15. चौथा सबसे चुनौतीपूर्ण एवं जरुरी काम – लगातार सिकुड़ते हिन्दू धर्म को मजबूत बनाने के लिए प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट ।
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00. यह पेम्पलेट इतना लम्बा क्यों है ?
अपने क्षेत्र के उम्मीदवार से पूछे कि वे अपने वादे “कैसे” पूरे करेंगे ?
चुनावो के दौरान यदि कोई प्रत्याशी आपसे वादा करता है कि वह ग़रीबी दूर करेगा या भ्रष्टाचार ख़त्म कर देगा तो आप उससे पूछिए कि वह ऐसा “कैसे” करेगा ? दरअसल विधायक का काम सिर्फ़ क़ानून बनाना है। क़ानून विधानसभा में बनते है। इसीलिए हम उम्मीदवार को चुन कर विधानसभा में भेजते है। तो यदि कोई उम्मीदवार आपसे कहता है कि वह ग़रीबी दूर करेगा , तो आपको उससे पूछना चाहिए कि वह ऐसा कौनसा क़ानून पास करने वाला है जिससे ग़रीबी दूर हो जाएगी ? उससे पूछिए कि वह पुलिस विभाग का भ्रष्टाचार कम करने के लिए कौनसा क़ानून पास करने वाला है ? अपने क्षेत्र के उम्मीदवार से उस क़ानून का लिखित ड्राफ्ट मांगिये। और तब आप देखेंगे कि वे उम्मीदवार जो भी वादे कर रहे है , उन्हें पूरा करने के लिए उनके पास कोई निश्चित योजना नहीं है। यह पेम्पलेट इतना लम्बा इसीलिए है क्योंकि इसमें हमने उन कानूनों के ड्राफ्ट एवं उनके संक्षिप्त विवरण दिए है जिन्हें गेजेट में प्रकाशित करने से किसी समस्या का समाधान होगा। विस्तृत विवरण के लिए कृपया यह लिंक देखें – JuryIndia .org
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01. राईट टू रिकॉल क्या है ? ( और द अन्ना एवं श्री अरविन्द केजरीवाल से हमारा कोई लेना देना नहीं है )
राइट टू रिकॉल का मतलब है वोट वापस लेने का अधिकार होना। राईट टू रिकॉल का अर्थ उन क़ानून प्रक्रियाओ से है जिनके गेजेट में छपने के बाद मतदाता यदि अपने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सुप्रीम कोर्ट जज, हाई कोर्ट जज, लोकपाल, जिला पुलिस प्रमुख, जिला शिक्षा अधिकारी, दूरदर्शन चेयरमेन, विधायक, सांसद आदि को किसी भी दिन बदलना चाहे तो अपने बहुमत का प्रदर्शन करके इन्हें सीधे बदल सकेंगे। यदि मतदाता अपने प्रधानमंत्री या सांसद को हटाकर किसी दुसरे व्यक्ति को लाना चाहते है तो उन्हें अगले 5 वर्ष तक इन्तजार नहीं करना होगा। जिला पुलिस प्रमुख , जिला शिक्षा अधिकारी आदि जैसे अधिकारी भी जिले के मतदाताओं के अनुमोदन से नियुक्त होंगे एवं राईट टू रिकॉल के दायरे में रहेंगे। हम ये कानून भारत में लागू करवाने का अभियान 1999 से चला रहे है। हमने द अन्ना ( The Anna ) एवं श्री अरविन्द केजरीवाल से आग्रह किया था कि वे जनलोकपाल के ड्राफ्ट में राईट टू रिकॉल की धाराएं जोड़े। किन्तु द अन्ना एवं श्री अरविन्द केजरीवाल ने जनलोकपाल को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार नागरिको को देने से इनकार कर दिया। अत: द अन्ना एवं श्री अरविन्द केजरीवाल राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओ के छद्म समर्थक है , एवं उनसे हमारा कोई सरोकार नहीं है।
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02. राजपत्र अधिसूचना या गेजेट नोटिफिकेशन क्या है ?
ज्यादातर राजनेता और राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर आदि इस बार पर काफी जोर देते है कि नागरिको को इस तथ्य के बारे में सूचित नहीं किया जाना चाहिए कि देश की व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए गेजेट में छपी हुयी इबारत की कितनी निर्णायक एवं शक्तिशाली भूमिका होती है। हम रिकालिस्ट्स का सबसे महत्त्वपूर्ण लक्ष्य भारत के नागरिको तक यह बात पहुँचाना है कि – (1) गेजेट नोटिफिकेशन क्या है , और (2) देश की व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए सबसे आसान और सबसे महत्त्वपूर्ण तरीका यह है कि अमुक प्रक्रिया को गेजेट में प्रकाशित किया जाए। और (3) कैसे “क़ानून ड्राफ्ट के नेतृत्व में अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी केन्द्रित और कार्यकर्ता निर्देशित जन आन्दोलन” के माध्यम से नागरिक प्रधानमंत्री को आवश्यक क़ानून ड्राफ्ट लागू करने के लिए बाध्य कर सकते है। और एक बार जब भारत के नागरिक गेजेट नोटिफिकेशन की शक्ति से परिचित हो जायेंगे तो वे जान जायेंगे कि देश में व्याप्त किसी भी समस्या का समाधान कितना आसान है। गेजेट नोटिफिकेशन या राजपत्र अधिसूचना एक पुस्तिका है जिसका प्रकाशन केन्द्रीय एवं राज्य मंत्रियो द्वारा हर महीने या समय समय पर जब आवश्यक हो तब किया जाता है। गेजेट में मंत्रियो द्वारा प्रशासनिक अधिकारियों के लिए आदेश जारी किये जाते । कलेक्टर आदि अधिकारी सिर्फ वही कार्य करते है जो गेजेट में लिखा होता है , अधिकारी को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि अमुक मंत्री ने प्रेस में या पब्लिक रेली के भाषण में क्या कहा था। उदाहरण के लिए यदि कोई मंत्री प्रेस कोंफ्रेंस में, या रेली में या अपने पार्टी के मेनिफेस्टो में यह कहता है कि “प्रत्येक परिवार को 20 लीटर कैरोसिन मिलेगा” , लेकिन यदि मंत्री ने गेजेट में 10 लीटर लिखा है तो कलेक्टर प्रत्येक परिवार को 10 लीटर कैरोसिन ही देगा। क्योंकि कलेक्टर को वही करना होता है जो गेजेट में लिखा गया है , न कि वह करना होता है जो मंत्री अपने भाषण में कह रहा है। क्योंकि यदि कलेक्टर आदि अधिकारी गेजेट की अवहेलना करेंगे तो उनकी नौकरी जा सकती है , उन पर फाइन हो सकता है, पेंशन रुक सकती है और यहाँ तक कि उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है।
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आप देखेंगे कि सभी पार्टियों के नेता घोषणाएं करने एवं भाषण सुनाने में तो बेहद रुचि रखते है, किन्तु वे अपने चुनावी प्रचार के दौरान यह कभी नहीं बताते कि सत्ता में आने के बाद वे कौनसे क़ानून ड्राफ्ट गेजेट में प्रकाशित करने वाले है। यदि आप अधिकारियो को किसी निर्माणधीन इमारत के कारीगरों की तरह देखते है तो गेजेट उस इमारत के निर्माण का ब्लू प्रिंट एवं नक्शा है। जो कार्यकर्ता देश की व्यवस्था में कोई भी बदलाव लाना चाहते है तो उन्हें यह सोचना चाहिए कि गेजेट में क्या छपवाने से यह बदलाव लाया जा सकता है , और तब कार्यकर्ताओ को मंत्रियो से अमुक ड्राफ्ट को गेजेट में तुरंत छपवाने की मांग करनी चाहिए। जब प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट गेजेट में छपेगा , सिर्फ तब ही वास्तविक बदलाव आएगा , अन्यथा नहीं। अत: आप देश की किसी समस्या के समाधान के लिए कम से कम एवं अधिक से अधिक क्या कर सकते है ? आप मंत्रियो से कह सकते है कि अमुक क़ानून ड्राफ्ट को गेजेट में प्रकाशित किया जाये। यदि कोई नेता या कार्यकर्ता देश की किसी समस्या का समाधान करने की बात कर रहा है किन्तु वह अपने श्रोताओं को यह जानकारी नहीं देता कि अमुक समस्या का समाधान करने के लिए वह गेजेट में क्या छपवाने का प्रस्ताव कर रहा है तो यह तय है कि उसकी रुचि समस्या के समाधान में नहीं बल्कि समस्या को उभारकर वोट इकट्ठे करने में है।
और ऐसा वे जानबूझकर करते है। हमारे विचार में मतदाताओं को उम्मीदवारों से यह कहना शुरु करना चाहिए कि , "हमें आपके ओजस्वी भाषणों और आवेशमय नारों में कोई रुचि नहीं है। हमें आप उन कानूनों के ड्राफ्ट दिखाइये जिन्हें जीतने के बाद आप गेजेट में प्रकाशित करने का वादा करते है।"
दिए गए चित्र में राजपत्र अधिसूचना / गेजेट नोटिफिकेशन का एक नमूना दिया गया है :
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यह दुःख का विषय है भारत में बहुत ही कम कार्यकर्ता गेजेट नोटिफिकेशन की शक्ति के बारे में जानते है , और हमारा सबसे पहला लक्ष्य भारत के अधिकतम नागरिको एवं कार्यकर्ताओ तक यह जानकारी पहुँचाना है कि देश को गेजेट चलाता है, और यदि आप देश में कि बदलाव लाना चाहते है तो आपको यह नहीं सोचना चाहिए कि किस पार्टी या नेता को वोट देने से यह समस्या हल होगी , बल्कि यह सोचना चाहिए कि इस समस्या का समाधान करने के लिए हमें गेजेट में क्या छपवाना चाहिए . इस अध्याय का विस्तुत विवरण इस लिंक पर देखें - JuryIndia .org
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03. अमेरिका की पुलिस एवं अदालतें भारत की तुलना में ज्यादा कार्यकुशल एवं ईमानदार क्यों है ?
आपने अमेरिका के अपने रिश्तेदार, मित्रों से यह अवश्य सुना होगा कि अमेरिका के पुलिस / कोर्ट में भ्रष्टाचार भारत की तुलना में बहुत कम है। भारत के प्रत्येक अनिवासी भारतीय ने भी इस तथ्य पर पहले दिन से ही ध्यान दिया होगा। उदाहरण के लिए अमेरिका में 9 वर्ष रहकर 1999 में भारत लौट आये सोफ्टवेयर डेवलेपर एवं रिकालिस्ट राहुल चिमनभाई मेहता अपने संस्मरण में बताते है कि - "जब मैं अमेरिका में था तो मुझे ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने पर हवलदारों ने 5 बार रोका था। ट्रैफिक नियम तोड़ने पर हवलदारों ने मुझसे 3 बार जुर्माना लिया और 2 बार मुझे वैसे ही जाने दिया। परन्तु एक बार भी उन्होंने यह संकेत तक नहीं दिया कि घूस लेने में उनकी जरा भी रूचि है। मुझ पर लगाए गए जुर्माने की राशि 1500$ थी , और मैं यह समझ नहीं पा रहा था कि यह पुलिस वाला मुझसे 50$ घूस लेकर मामला यहीं पर रफा दफा करने की कोशिश क्यों नहीं कर रहा है ?" और यह बात आपको भी अजीब लग रही होगी कि आखिर अमेरिका की पुलिस / जज भारत की तरह घूस वसूलने में इतनी माहिर क्यों नहीं है ?
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क्या अमेरिका की पुलिस / जज आदि भारत की पुलिस / जज की तुलना में इतने बेवकूफ है कि वे अपने नागरिकों से घूस वसूलने के तौर तरीके नहीं सोच सकते ? नहीं, वे इतने भी बेवकूफ नहीं है। क्या वे इतने डरपोक है ? नहीं, वे भी घूस वसूलने में उतने ही साहसी है जितने कि भारत के अधिकारी है। तो क्या अमेरिका के पुलिस वाले लालची नहीं है ? नहीं ऐसा भी नहीं है। किसी भी देश में ऐसा नहीं हो सकता कि वहाँ के लाखों व्यक्तियों में सभी संत हो और कोई भी लालची न हो। तो क्या अधिक वेतन प्राप्त करने के कारण वे नागरिको से घूस नही लेते ? अच्छा, मान लीजिये कि यदि हम भारत में अपने अधिकारियों के वेतन इस सप्ताह दोगुने कर दें, तो क्या वे हमें अगले सप्ताह से घूस में 10% की छूट देंगे ? उदाहरण के लिए, वर्ष 2009-2010 में सरकार ने सभी न्यायाधीशों के वेतन तीन गुना कर दिए थे। तो क्या जजों ने अपनी घूस की राशि में अगले दिन 1% की भी छूट दी थी ? मेरा अनुमान है, नहीं दी थी। यदि भारत सरकार का कोई कर्मचारी यह कहता है कि , यदि उसके वेतन को दोगुना कर दिया जाए तो उसे घूस लेने की जरूरत नही होगी, तो आप भी यही कहेंगे कि वह बकवास कर रहा है। क्योंकि उनमें से अधिकतर कभी भी घूस लेना बंद नही करेंगे। इस प्रकार, वेतन अवश्य ही एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, पर भारत और अमेरिका में भ्रष्टाचार के स्तर में बदलाव लाने हेतु यह कोई बड़ा कारक नहीं है। तो वहाँ की पुलिस एवं जजों में भ्रष्टाचार कम होने का और क्या कारण हो सकता है ?
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3.1 क्या संस्कृति इसका कारण है ?
क्या हमारी संस्कृति इसका कारण है ? भारत के बहुत से बुद्धिजीवी (कु-बुद्धिजीवी ?) जिनका बौद्धिक स्तर = IQ level 4 अंको में है, यह कहते है कि भारत में पुलिस वाले इसीलिए भ्रष्ट है, क्योंकि हम भारतीय अनपढ़ है, जागरूक नहीं है, हममें नैतिक सदाचार की कमी है, हमारी राजनीतिक संस्कृति दूषित है आदि आदि। दूसरे शब्दों में , इन बुद्धिजीवियों के अनुसार, हम नागरिक ही भारत की पुलिस एवं जजो के भ्रष्ट होने के लिए जिम्मेदार हैं !!! 4 अंकों के बौद्धिक स्तर वाले इन बुद्धिजीवियों द्वारा "पीड़ितों पर ही आरोप" लगाने वाले इन तर्कों को हम सफ़ेद झूठ कहकर अस्वीकार करते है। यह बात उसी तरह चुभने वाली है जैसे कोई कहे कि "बलात्कार के लिए महिला जिम्मेदार है"। यह तर्क कि "नागरिकों में जागरूकता नहीं है" या "नागरिक असभ्य है" बिलकुल बकवास है। एक अशिक्षित व्यक्ति भी अच्छी तरह जानता है कि भ्रष्टाचार अनैतिक है और यह एक अपराध भी है। और सभी पुलिसवालों, न्यायाधीशों व मंत्रियों को भी यह अच्छी तरह पता है कि भ्रष्टाचार अनैतिक और गैरकानूनी है। यहाँ तक कि जब अमेरिका में 1800 ईस्वी में शिक्षा 5 प्रतिशत से भी कम थी तब भी वहाँ की पुलिस एवं न्यायाधीश इतने भ्रष्ट नहीं थे। तो फिर आखिर अमेरिका की पुलिस में भ्रष्टाचार कम होने का असली कारण क्या है ? इस कारण को समझने के लिए हम पुलिस दल को मोटे तौर पर दो भागो में विभाजित करते है – जूनियर ऑफिसर जैसे हवलदार, उप निरीक्षक , दरोग़ा आदि एवं सीनियर ऑफिसर जैसे जिला पुलिस कमिश्नर।
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3.2 अमेरिकी पुलिस विभाग के जूनियर ऑफिसर भारत की तुलना में कम भ्रष्ट क्यों है ?
अमेरिका में जूनियर पुलिसकर्मी शायद ही कभी घूस मांगते है, क्योंकि अमेरिका में जिला पुलिस कमिश्नर उनको ट्रेप करने के लिए जाल बिछाते हैं !!! हवलदार, पुलिसकर्मी आदि जानते है कि कानून का उल्लंघन करने वाले प्रत्येक 100 से 500 व्यक्तियों में से कोई एक व्यक्ति जिला पुलिस कमिश्नर का आदमी हो सकता है, और यदि वह घूस मांगेगा तो वह पकड़ा जा सकता है, उसकी नौकरी जा सकती है या जेल भी हो सकती है। तो अमेरिका के जूनियर अफसरों द्वारा घूस न लने का मुख्य कारण यह है कि वे जानते है कि यातायात उल्लंघन करने वाले कुछ 200 व्यक्तियों में से कोई एक व्यक्ति कमिश्नर द्वारा उसे ट्रेप करने के लिए बिछाया गया जाल हो सकता है। और उसे नहीं पता कि क़ानून तोड़ने वाले इन 200 व्यक्तियों में से कौन सा व्यक्ति कमिशनर द्वारा बिछाए गए जाल का हिस्सा है। इसलिए वह 200 मामलों में से एक में भी घूस नहीं लेता। और अमेरिका में बहुत से नोडल अधिकारी जैसे जिला शिक्षा अधिकारी, पब्लिक प्रोसिक्यूटर , मुख्यमंत्री , मंत्री , न्यायाधीश आदि भी अपने जूनियर कर्मचारियों को ट्रेप करने के लिए उनके विरुद्ध जाल बिछाते है। समय-समय पर जाल बिछाना सभी जूनियर स्टाफ को घूस लेने से रोक देता है।
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3.3 किन्तु अमेरिका में पुलिस प्रमुख अपने जूनियर अधिकारियों को घूस लेने से रोकने के लिए जाल क्यों बिछाते है ?
अक्सर ऐसा होता है कि एक सवाल के जवाब से 10 और नए वाजिब सवाल खड़े हो जाते है, और इन्हें उत्तरित करना भी जरुरी होता है। तो अब एक नया एवं वाजिब प्रश्न यह है कि आखिर अमेरिका में पुलिस कमिश्नर अपने जूनियर अफसरों को ट्रेप करने के लिए जाल क्यों बिछाता है जबकि भारत में ज्यादातर पुलिस प्रमुख अपने जूनियर अफसरों को नागरिको से घूस इकट्ठी करने के लिए कहते है ? इस अंतर का कारण क्या है ? आखिर अमेरिका का पुलिस कमिश्नर अपने जूनियर अफसरों को घूस इकट्ठी करने का टार्गेट क्यों नहीं देता ? वह कौनसी चीज है जो उसे ऐसा करने से रोक देती है ? इसकी सिर्फ एक वजह है -- अमेरिका के नागरिको के पास अपने जिले के पुलिस प्रमुख को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया मौजूद है। दुसरे शब्दों में अमेरिका के नागरिको के पास पुलिस कमिशनर को रिकॉल करने अर्थात वापिस बुलाने का अधिकार होने के कारण, यदि वे यह मानते है कि पुलिस कमिशनर इमानदारी से कार्य नहीं कर रहा है, तो वे किसी भी दिन उसे हटाकर नए व्यक्ति को कमिशनर की नौकरी दे सकते है।
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मतलब, अमेरिका के किसी जिले में यदि नागरिक जिला पुलिस प्रमुख से संतुष्ट नहीं है और वे उसे नौकरी से निकालना चाहते है तो उन्हें डीआईजी या मुख्यमंत्री या गृह मंत्री के पास जाकर शिकायत करने की आवश्यकता नहीं है !! अमेरिका के नागरिकों को उच्च न्यायालयों के न्यायधीशों के पास जाकर अदालतों में धक्के खाने की भी जरूरत नहीं है। अमेरिका में किसी जिले के नागरिकों को बस यह साबित करने की आवश्यकता है कि जिले के मतदाताओ का बहुमत यह चाहता है कि मौजूदा पुलिस कमिश्नर को नौकरी से निकाल दिया जाए। और यदि किसी जिला पुलिस प्रमुख के विरूद्ध बहुमत साबित हो जाता है तो उसे निकाल दिया जाता है। और तब किसी भी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की इतनी हिम्मत नहीं है कि वह अमुक पुलिस प्रमुख के निलम्बन के निर्णय पर कोई रोक या स्टे का कोई आदेश दे सके। तो इस तरह अमेरिका में पुलिस प्रमुख इस बात का ध्यान रखता है कि यदि पुलिस प्रशासन में भ्रष्टाचार फ़ैल गया , अपराधो में वृद्धि हुयी और नागरिको को गलत वजह से उत्पीडन का सामना करना पड़ा तो नागरिको का बहुमत मुझे नौकरी से निकाल देगा , और इसी वजह से अमेरिका में पुलिस प्रमुख इस बात का निरंतर ध्यान रखता है कि उसके अधीन प्रशासन एवं स्टाफ ईमानदारी से कार्य करे। जबकि भारत में पुलिस प्रमुख की नियुक्ति से लेकर निष्कासन का अधिकार नेताओं के पास होने के कारण पुलिस प्रमुख अपने आला अधिकारियो एवं नेताओं को खुश रखने का लक्ष्य लेकर काम करता है। भारत का पुलिस प्रमुख जानता है कि जब तक उसके आला अधिकारी एवं सत्तासीन नेता उससे खुश है तब तक जनता उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकती।
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और यही वजह है कि ज्यादातर ईमानदार व्यक्ति भी सरकारी पदों पर जाने के साथ ही भ्रष्ट हो जाते है । क्योंकि हमारी व्यवस्था ही इस तरह की है कि एक ईमानदार व्यक्ति को भी यदि नौकरी पर बने रहना है तो उन्हें नेताओं के सही गलत सभी प्रकार के आदेशो का पालन करना पड़ता है . जाहिर है कोई भी व्यक्ति नौकरी नहीं खोना चाहता. अत: वे जनता के हितो को तवज्जो देना छोड़ देते है और अपने नेताओं एवं आला अधिकारियो को खुश रखने के लिए काम करने लगते है ।
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हम भारत में ऐसी प्रक्रिया चाहते है जिससे नागरिक अपने जिले के पुलिस प्रमुख को बदल सके। जैसा कि ऊपर बताया गया है कि देश की किसी भी व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए हमें सबसे पहले उस क़ानून ड्राफ्ट की जरूरत होती है जिसे गेजेट में प्रकाशित करने से यह बदलाव आएगा। हमने इसके लिए “राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख” का क़ानून ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। यह ड्राफ्ट यदि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री गेजेट में प्रकाशित कर दे तो भारत के नागरिको को जिला पुलिस प्रमुख को बदलने की प्रक्रिया मिल जायेगी। यदि यह ड्राफ्ट मुख्यमंत्री द्वारा प्रकाशित किया जाता है तो यह क़ानून अमुक राज्य में लागू होगा , और यदि इसे प्रधानमंत्री लागू करते है तो यह पूरे देश में लागू हो जाएगा। भारत का धनिक वर्ग , सभी बड़ी राजनैतिक पार्टियों के नेता , न्यायाधीश , राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर , नामचीन लेखक , समाचार पत्रों के सम्पादक , आदि हमेशा से यह कहते आये है कि भारतियो के पास अपने जिला पुलिस प्रमुख को बदलने की शक्ति नहीं होनी चाहिए। उनका मानना है कि जिला पुलिस प्रमुख उनके नियन्त्रण से निकल कर यदि आम नागरिको के हाथ में चला गया तो उन्हें भारी क्षति होगी। मौजूदा व्यवस्था इनकी शक्ति को बढ़ाती और नागरिको की शक्ति घटाती है , अत: ये गठजोड़ मौजूदा व्यवस्था को ही कायम रखना चाहता है। यदि आप चाहते है कि आप नागरिको के पास अपने जिला पुलिस प्रमुख को बदलने का अधिकार हो तो अपने क्षेत्र के उम्मीदवार से कहे कि वह अपने एजेंडे में इस क़ानून ड्राफ्ट को शामिल करे ।
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04. राईट टू रिकॉल आन्दोलन 85 वर्ष पुराना होने के बावजूद आज तक असफल एवं पिछड़ा हुआ क्यों रहा है ?
भारत में राईट टू रिकॉल का अप्रत्यक्ष उल्लेख सबसे पहले महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने किया था। सत्यार्थ प्रकाश के छठे अध्याय के पहले ही पृष्ठ में महर्षि दयानंद राज धर्म की बुनियाद के बारे में बताते हैं। महर्षि ने इसमें 3 शब्द दिए है - "प्रजा अधीन राजा" और इन 3 शब्दों में उन्होंने अच्छी राजनीति पर 10,000 से अधिक प्रस्तावों का सार दे दिया है। आगे वे इन 3 शब्दों का विस्तार करते है -- "राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए, नहीं तो वह नागरिकों को लूट लेगा और राज्य का विनाश होगा"। उन्होंने ये श्लोक अथर्ववेद से लिए है। और भारत के पुलिस कमिश्नर, मंत्री, जजों आदि और अमेरिका के पुलिस कमिश्नर, मंत्री, जजों आदि के बीच सरसरी तौर पर तुलना करने पर यह बात मालूम होती है कि हमारे ऋषि मुनि कितने सत्यदृष्टा एवं दूरदर्शी थे, जिन्होंने अथर्ववेद लिखे है। और हमारे लिए यह एक विडंबना है कि सत्यार्थ प्रकाश के इन 3 शब्दो का महत्व समझाने के लिए हमें अमेरिका का उदाहरण लेना पड़ रहा है !!!
भारत में राईट टू रिकॉल कानूनों की सीधी मांग सबसे पहले अहिंसामूर्ती महात्मा चंद्रशेखर आजाद द्वारा की गयी थी। 1 जनवरी 1925 को अहिंसामूर्ती महात्मा चंद्रशेखर आज़ाद तथा अहिंसामूर्ती महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल ने HRA = हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन की स्थापना की। यह वही संगठन था जिसमे रहकर अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह तथा उनके सहयोगियों ने पुलिस प्रमुख सैंडर्स के वध की योजना बनायी थी। 1 जनवरी 1925 को जारी हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के घोषणापत्र में कहा गया कि --- In this Republic (that we wish to create) the electors shall have the right to recall their representatives, if so desired, otherwise the democracy shall become a mockery." (source : shahidbhagatsingh .org/index. asp?link=revolutionary ) अर्थात , "जिस गणराज्य की हम स्थापना करना चाहते है, उसमे मतदाताओं के पास यह अधिकार होगा कि वे आवश्यकता होने पर निर्वाचित प्रतिनिधियों को रिकॉल कर सकें। अन्यथा लोकतंत्र एक मजाक बन कर रह जायेगा" !!
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इस प्रकार वर्षों पूर्व 1925 ई. में ही अहिंसामूर्ती महात्मा चंद्रशेखर आज़ाद तथा अहिंसामूर्ती महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल आदि ने यह भांप लिया था कि राइट टू रिकॉल प्रक्रियाओं के बिना प्रजातंत्र में चुने गए जनता के प्रतिनिधि बेलगाम हो जाएंगे। 1925 ई. में राइट टू रिकॉल की यह मांग कोई हवा में नही की गयी थी, बल्कि इसके पीछे वास्तविक जीवन के अनुभव थे। 1919 ई. में भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत पहली एवं 1923 में दूसरी बार चुनाव आयोजित किये गये थे, और उसमे निर्वाचित होने वाले अधिकांश भारतीय प्रतिनिधि चुने लिए जाने के अगले ही दिन भ्रष्ट हो गये। इससे सीख लेकर अहिंसामूर्ती महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल जैसे बुद्धिमान व्यक्तियों ने राइट टू रिकॉल की अनिवार्यता को महसूस किया और वर्षों पूर्व 1925 ई. में इसे अभिव्यक्त किया।
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भारतीय धनिक वर्ग राइट टू रिकॉल कानूनो से अत्यंत घृणा करते है। चूंकि अधिकांश बुद्धिजीवी , पाठ्यपुस्तक लेखक आदि धनिक वर्ग की कृपा पर टिके हुए है, अत: इन सभी बुद्धिजीवियों ने यह सुनिश्चित किया है कि समाचार पत्रों और पाठ्यपुस्तकों में राइट टू रिकॉल पर किसी भी प्रकार की जानकारी बिलकुल नही दी जानी चाहिए।। इस हद तक कि भारत के इन बुद्धिजीवियों ने अपने स्तभों और पाठ्यपुस्तकों में इन तथ्यों को दर्ज करने से भी इनकार कर दिया है कि, अमेरिका के नागरिकों के पास जिला पुलिस प्रमुखों और न्यायधीशों को निकालने की प्रक्रिया है। उन्हें भय है कि भारतीयों को यह जानकारी होने से वे इस दिशा में सोचना प्रारम्भ कर सकते है। इतना ही नहीं राईट टू रिकॉल के इन विरोधियो ने HSRA के ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण दस्तावेज का भी पाठ्यपुस्तक में इसीलिए उल्लेख नहीं किया। आज, शायद ही कोई युवा यह जानता है कि अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह जी राईट टू रिकॉल कानूनों की मांग कर रहे थे !! और यहां तक कि राजनीति शास्त्र के स्नातकोत्तर छात्र भी इस बात से अनभिग्य है कि अमेरिका के नागरिकों के पास पुलिस प्रमुख और न्यायाधीशों के विरूद्ध राइट टू रिकॉल क़ानून प्रक्रियाएं है।
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तो राईट टू रिकॉल=प्रजा अधीन राजा की अवधारणा भारत में बेहद प्राचीन है। इसका प्रादुर्भाव सबसे पहले अथर्ववेद में हुआ ,और महर्षि दयानंद ने इसका पुन: उल्लेख 1860 में अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में किया। और भारत में सबसे पहले इसकी राजनैतिक मांग करने वाले व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि स्वयं अहिंसामूर्ती महात्मा चंद्रशेखर आजाद थे। लेकिन हमारे विचार में यह लगातार असफल इसीलिए रहा क्योंकि राईट टू रिकॉल के क़ानून ड्राफ्ट्स का निरंतर अभाव बना रहा। रिकालिस्ट्स राईट टू रिकॉल का कानूनी ड्राफ्ट मुहैया नहीं करा पाए , और क़ानून ड्राफ्ट के अभाव में राईट टू रिकॉल के समर्थक देश के नागरिको को यह समझाने में नाकाम रहे कि राईट टू रिकॉल की प्रक्रिया - 1) तेजी से काम करती है , 2) सस्ती है , 3) अस्थिरता से रक्षा करती है , 4) मतदाताओं की खरीद फरोख्त को रोकती है , 5) पेड मीडिया की मतदाताओ को भ्रमित करने की ताकत में कमी लाती है , 6) उम्मीदवारों द्वारा मतदाताओं को धमकाने से प्रतिरक्षा प्रदान करती है , 7) पारदर्शिता होने के कारण इस प्रक्रिया में धोखाधड़ी नहीं की जा सकती । क़ानून ड्राफ्ट के अभाव में राईट टू रिकॉल के विरोधी भारतीयों के दिमाग में यह भ्रम डालने में सफल रहे कि राईट टू रिकॉल आने से अस्थिरता आएगी , यह बहुत महंगा पड़ेगा , मतदाता अपना वोट बेच देंगे , रोज चुनाव होने लगेंगे , मतदाताओं को धमकाया जायेगा आदि आदि। किन्तु ड्राफ्ट सामने आने के बाद अब स्थिति पलट गयी है। जैसे जैसे कार्यकर्ता ड्राफ्ट तक पहुँच रहे है वैसे वैसे राईट टू रिकॉल के विरोधियो की नागरिको को भ्रमित करने की शक्ति घटती जा रही है।
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05. शिक्षा में सुधार के लिए प्रस्ताव - राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी
बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में गणित एवं विज्ञान का ढांचा तोडना चाहती है , ताकि भारत में इंजीनियरिंग कौशल पिछड़ी दशा में रहे. विज्ञान एवं गणित का पाठ्यक्रम लगातार कमजोर करना , सरकारी स्कूलों को बदहाल बनाए रखना एवं शिक्षा का निजीकरण करना इसी उद्देश्य के चरण है । जिले में सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए जिला शिक्षा अधिकारी जिम्मेदार है। शिक्षा अधिकारी की नियुक्ति मंत्रियो द्वारा की जाती है, और हमारे मंत्री बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर बुरी तरह से निर्भर करते है। इस वजह से वे शिक्षा अधिकारी को सरकारी स्कूलों बदतर बनाए रखने के निर्देश देते है। इसके अलावा निजीकरण की वजह से मंत्रियो एवं विधायको को सालाना करोडो की आय होती है। इसमें दूसरा बेहद महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकारी स्कूलो एवं सरकारी अस्पतालों के बदतर होने से बड़े पैमाने पर गरीबी फैलती है और मिशनरीज के लिए धर्मान्तर करना आसान हो जाता है। शिक्षा अधिकारी मंत्रीजी को खुश रखने के लिए काम करता है और शिक्षा का स्तर सुधारने की अवहेलना करता है। यदि जिला शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने का अधिकार जिले के अभिभावकों को मिल जाये तो शिक्षा अधिकारी सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने पर ध्यान देना शुरू कर देगा। इसके लिए हमने राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी के क़ानून ड्राफ्ट का प्रस्ताव किया है।
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5.1 राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी RTR DEO (District Education Officer) के क़ानून ड्राफ्ट का सारांश :
1. जरुरी योग्यताएं पूरी करने वाला भारत का कोई भी नागरिक आवश्यक जमानत राशि जमा करके शिक्षा अधिकारी
पद के लिए उम्मीदवारी कर सकेगा।
2. पटवारी कार्यालय में उपस्थित होकर जिले का कोई भी अभिभावक अपने पसंद के अधिकतम 5 उम्मीदवारों को
अनुमोदित कर सकेगा। पटवारी 3 रूपये शुल्क लेकर उसके अनुमोदन को दर्ज करेगा और बदले में एक रसीद देगा।
( बाद में ऐसा सिस्टम बनाया जा सकता है कि अभिभावक अपना अनुमोदन SMS एवं ATM से भी दर्ज करवा सके।)
3. पटवारी अनुमोदनो को अभिभावक के वोटर आई डी नंबर के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर रखेगा।
4. अभिभावक पटवारी कार्यालय में जाकर किसी भी दिन अपना अनुमोदन बदल सकेंगे। ( इससे उम्मीदवार मतदाताओं
को खरीद नहीं सकेंगे )
5. यदि किसी उम्मीदवार को कुल अभिभावकों के 35% अनुमोदन मिल जाते है ( जिले में दर्ज सभी मतदाताओं का 35%
न कि उन अभिभावकों का 35% जिन्होंने अनुमोदन दर्ज किया है ) और यह अनुमोदन यदि पदासीन शिक्षा अधिकारी
से 2% अधिक भी है तो अमुक उम्मीदवार नया शिक्षा अधिकारी नियुक्त हो जाएगा।
6. कोई व्यक्ति किसी राज्य में अधिकतम 5 जिलो का शिक्षा अधिकारी बन सकता है, और ऐसी स्थिति में उसका वेतन भी
5 गुना होगा।
धारा 5 अस्थिरता के प्रति प्रतिरक्षा प्रदान करती है , क्योंकि बहुत सारे अभिभावक रोज अपना अनुमोदन नहीं बदलेंगे और बहुत कम अभिभावको के अनुमोदन बदलने से शिक्षा अधिकारी को बदला नहीं जा सकेगा। धारा 4 की वजह से उम्मीदवार अभिभावकों का अनुमोदन पैसे देकर खरीद नहीं सकेंगे , क्योंकि पैसे लेने के बाद अभिभावक अगले ही दिन अपना अनुमोदन बदल भी सकता है , और उम्मीदवार अभिभावको को रोज रोज पैसे नहीं दे सकता। धारा 5 के होने से उम्मीदवार अभिभावको को धमका भी नहीं सकेंगे। क्योंकि किसी जिले में 10 लाख तक मतदाता होते है, और उम्मीदवार को शिक्षा अधिकारी बनने के लिए कम से कम 3.5 लाख मतदाताओं को धमकाना पड़ेगा। लेकिन किसी भी उम्मीदवार के लिए इतने गुंडे पालना मुमकिन नहीं है कि वे 3.5 लाख मतदाताओं को रोज धमका सके।
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5.2 राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी कानून से शिक्षा में सुधार कैसे आएगा ?
भारत में लगभग 700 जिला शिक्षा अधिकारी हैं । सभी बुद्धिमान, काबिल तथा कार्यकुशल है। मान लीजिए कि इनमे से 10-15 शिक्षा अधिकारी ऐसे होंगे जो भ्रष्टाचार में रूचि नहीं रखते है एवं वाकयी व्यवस्था में सुधार लाना चाहते है। उपरोक्त राइट टू रिकॉल -जिला शिक्षा अधिकारी प्रक्रिया में एक खण्ड कहता है कि यदि कोई शिक्षा अधिकारी मुख्यमंत्री द्वारा नियुक्त होता है तो वह केवल एक ही जिले का जिला शिक्षा अधिकारी हो सकता है। लेकिन यदि नागरिकों ने उसे जिला शिक्षा अधिकारी बनाया है तो वह राज्य में 5 जिलों और पूरे भारत में 10 जिलों का भी जिला शिक्षा अधिकारी बन सकता है और वह इन सभी जिलों का वेतन प्राप्त करेगा। अर्थात यदि कोई व्यक्ति 4 जिलों का जिला शिक्षा अधिकारी है और उसे नागरिकों ने नियुक्त किया है तो उसका वेतन 4 गुना होगा। सरकार के लिए भी यह ज्यादा सस्ता पड़ेगा , क्योंकि सिर्फ वेतन ही चार गुना बढ़ेगा लेकिन चिकित्सा लाभ और आजीवन मिलने वाले लाभ 4 गुना नहीं बढ़ेंगे।
इसलिए वर्तमान 700 जिला शिक्षा अधिकारियों में से मान लीजिए 5-15 अधिकारी भ्रष्ट नहीं है। यदि एक बार रॉइट टू रिकॉल लागू हो जाता है तो उन्हें सीधी तरक्की और पदोन्नति का अवसर मिल जायेगा। वे अपने जिले के स्कूलों में अच्छे बदलाव लेकर आएँगे। वे बीच के अधिकारियों को घूस लेने से रोकेंगे। इस बात का ध्यान रखेंगे कि ठेकेदार सही वस्तुएँ जैसे ब्लैकबोर्ड , कुर्सियां आदि स्कूलों को सप्लाई करें। वे ध्यान रखेंगे कि शिक्षक स्कूल में हाजिर रहें, आदि। अब मान लीजिए इन सभी मामलों में मुख्यमंत्री इन अधिकारियों का तबादला कर देते है। तब लगभग 7-15 ऐसे मामलों में से, कम से कम 2-3 मामलों में माता-पिता अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी कानून का उपयोग करके उस तबादला किए गए अधिकारी को वापस ले आएंगे।
इस तरह भारत के 700 जिलों में से 2-5 जिलों में शिक्षा की स्थिति में सुधार आएगा।
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तो शेष जिलों का क्या होगा ? मान लीजिए आप 'A' जिले में रहते है, तथा 'A' जिले का जिला शिक्षा अधिकारी भ्रष्ट और नाकाबिल है। मान लीजिए पास में ही पांच अन्य जिले B, C, D, D और E है और केवल E जिले में ही अच्छा जिला शिक्षा अधिकारी है। तो जिला A के नागरिकों के पास विकल्प होगा कि वे अपने जिले के जिला शिक्षा अधिकारी को हटा सकते है और E जिले के जिला शिक्षा अधिकारी को दोहरा कार्यभार दे सकते है। इसी विकल्प और अधिकार के कारण कि "अब नागरिक राईट टू रिकॉल - जिला शिक्षा अधिकारी का उपयोग करके मुझे हटा सकते हैं और मेरे पद पर E जिले के जिला शिक्षा अधिकारी को ला सकते हैं", अन्य जिलो के जिला शिक्षा अधिकारीयों के मन में एक भय पैदा होगा। अत: या तो वे अगले 2-3 महीनों में सुधर जाएंगे या तो नागरिक उन्हें राइट टू रिकॉल-जिला शिक्षा अधिकारी का प्रयोग करके हटा देंगे। इस तरह इस कानून के गैजेट में प्रकाशित होने के 8-10 महीनों में ही सभी 700 जिला शिक्षा अधिकारी या तो सुधर जाएंगे या निकाल दिए जाएंगे।
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10-20 महीनों के अंदर ही "जल्दी अमीर बनने" और "भाड़ में जाए जनता" की मानसिकता वाले अधिकारी प्रशासन से हटना शुरू होंगे और दुबारा इन प्रशासनिक पदों पर नहीं आ पाएंगे। इससे वास्तव में सेवा करने की इच्छा वाले लोगों को आने का ज्यादा मौका मिलेगा और भ्रष्टाचारी लोग ईमानदार लोगो के काम में कम बाधा डाल सकेंगे। वर्तमान सिस्टम में एक कमी यह है कि यदि कोई ईमानदार व्यक्ति 2 लोगों का काम करता है तो भी उसे 2 व्यक्तियों के बराबर वेतन नहीं मिलता, जबकि व्यापार में ऐसा होना आम बात है। ये बातें ईमानदार लोगों को सरकारी नौकरी में आने से हतोत्साहित करती है। पर इस प्रस्तावित राइट टू रिकॉल प्रक्रिया में अधिकारीयों को एक से अधिक पद मिल सकता है तथा उसके अनुसार वे अधिक वेतन पा सकते है। इससे शासन में ईमानदार और समर्पित व्यक्तियों को आने का ज्यादा मौका मिलेगा।
राईट टू रिकॉल पुलिस अधिकारी का ड्राफ्ट भी ठीक इसी तरह काम करेगा और राईट टू रिकॉल पुलिस अधिकारी क़ानून के लागू होने के बाद कुछ 6 महीने के भीतर ही पुलिस के भ्रष्टाचार में 80% तक की गिरावट आ जायेगी.
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5.3. गेजेट में प्रकाशित करने के लिए राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का सम्पूर्ण कानूनी ड्राफ्ट
राईट टू रिकॉल कानूनों की मांग हवाई नहीं है , बल्कि हमने वह पूरी प्रक्रिया दी है कि जिले के अभिभावक शिक्षा अधिकारी को कैसे अनुमोदित करेंगे , कैसे उनकी नियुक्ति होगी, भ्रष्ट आचरण करने एवं अकार्यकुशलता दिखाने पर कब और कैसे इन्हें अभिभावकों द्वारा बदला जाएगा आदि। अगले पृष्ठ पर राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का पूर्ण ड्राफ्ट दिया गया है जिसे गेजेट में प्रकाशित करने से जिले के अभिभावकों को शिक्षा अधिकारी को बदलने का अधिकार मिल जाएगा। इस ड्राफ्ट का पीडीऍफ़ जो भारत सरकार को भेजा गया है यहाँ देखें – newindia .in/RtrDeo3
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========== ड्राफ्ट का प्रारम्भ=======
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सैक्शन 1 : राइट-टू-रिकॉल-शिक्षा अधिकारी
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1.1. माता/पिता शब्द का अर्थ होगा – 0 से 18 आयुवर्ग के बच्चो के लिए उसका पिता अथवा उसकी माता, जो उस जिले का दर्ज मतदाता भी हो। जब तक माता-पिता की सूची नहीं बनती, हर पंजीकृत मतदाता जो 23 और 45 वर्ष के बीच में है, उसे इस राजपत्र अधिसूचना के लिए माता-पिता माना जायेगा।
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जिला कलेक्टर शब्द का अर्थ होगा – इस सरकारी आदेश का पालन करने के लिए जिला कलेक्टर अथवा उसके द्वारा नियुक्त कोई अधिकारी।
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जिला शिक्षा अधिकारी का मतलब उस पूरे जिले के शिक्षा सम्बन्धी निर्णय करने वाला और शिक्षा सम्बन्धी व्यवस्था बनाए रखने वाला।
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1.2. [ जिला कलेक्टर के लिए निर्देश ]
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यदि भारत का कोई नागरिक जिला शिक्षा अधिकारी बनना चाहता है, और वह जिला कलेक्टर के पास स्वयं उपस्थित होकर या किसी वकील के माध्यम से इस सम्बन्ध में कोई ऐफिडेविट प्रस्तुत करता है तो जिला कलक्टर, सांसद के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क लेकर 'जिला शिक्षा अधिकारी' पद के लिए उसका आवेदन-पत्र स्वीकार कर लेगा।
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1.3. [ पटवारी के लिए निर्देश ]
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यदि कोई व्यक्ति पटवारी कार्यालय में स्वयं उपस्थित होकर 3 रूपए का शुल्क जमा करवा कर अधिक से अधिक 5 व्यक्तियों को जिला शिक्षा अधिकारी पद के लिए अनुमोदित करता है तो, तलाटी उसके अनुमोदनों को कम्प्यूटर में दर्ज कर लेगा और उसे एक रसीद देगा, जिसमें उसकी मतदान पहचान-पत्र संख्या, तारीख, दिन और उसके द्वारा अनुमोदित किए गए व्यक्तियों के नाम होंगे।
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1.4. [ पटवारी के लिए निर्देश ]
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पटवारी माता/पिता के अनुमोदन को अनुमोदित व्यक्ति के नाम तथा अनुमोदक के मतदाता पहचान-पत्र और नाम के साथ जिले की वेबसाईट पर रखेगा।
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1.5. [ पटवारी के लिए निर्देश ]
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यदि कोई नागरिक मतदाता अपना अनुमोदन रद्द करवाने के लिए आता है तो पटवारी एक या अधिक नामों को बिना कोई शुल्क लिए रद्द कर देगा।
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1.6. [ जिला कलेक्टर के लिए निर्देश ]
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प्रत्येक महीने की 5 तारीख को कलेक्टर या उसके द्वारा नियुक्त किया गया अधिकारी पिछले महीने के अंतिम दिन तक प्रत्येक उम्मीदवार को प्राप्त अनुमोदनों की गिनती प्रकाशित करेगा।
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1.7. [ मुख्यमंत्री के लिए निर्देश ]
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यदि कोई उम्मीदवार किसी जिले में सभी माता-पिता (सभी, न कि केवल उनका जिन्होंने अपना अनुमोदन दर्ज करवाया है) के 35 प्रतिशत से अधिक माता-पिता का अनुमोदन प्राप्त कर लेता है, और वो प्राप्त अनुमोदन वर्तमान जिला शिक्षा अधिकारी के अनुमोदनों से 5% अधिक है, तो मुख्यमंत्री उसे 'जिला शिक्षा अधिकारी' की नौकरी दे सकता है।
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1.8. [मुख्यमंत्री, जिला शिक्षा अधिकारी के लिए निर्देश]
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कोई भी व्यक्ति माता-पिता का अनुमोदन प्राप्त करके जिला शिक्षा अधिकारी बन सकता है। वह एक से अधिक जिलो का भी जिला शिक्षा अधिकारी बन सकता है। वह किसी राज्य में अधिक से अधिक 5 जिलों का, और भारत भर में अधिक से अधिक 20 जिलों का जिला शिक्षा अधिकारी बन सकता है। कोई व्यक्ति अपने जीवन काल में किसी जिले का जिला शिक्षा अधिकारी 8 वर्षों से अधिक समय के लिए नहीं रह सकता है। यदि वह एक से अधिक जिले का जिला शिक्षा अधिकारी है तो उसे उन सभी जिलों के जिला शिक्षा अधिकारी के पद का वेतन, भत्ता, बोनस आदि मिलेगा।
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1.9. [ मुख्यमंत्री के लिए निर्देश ]
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जब तक किसी जिला शिक्षा अधिकारी को 34 प्रतिशत से अधिक माता-पिता का अनुमोदन प्राप्त है तब तक मुख्यमंत्री को उसे बदलने की जरूरत नहीं है। लेकिन यदि किसी जिला शिक्षा अधिकारी का अनुमोदन 34 प्रतिशत से नीचे चला जाता है तो मुख्यमंत्री उसे हटाकर अपनी पसंद के किसी अधिकारी को जिला शिक्षा अधिकारी बना सकते है।
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सैक्शन 2 : जिला शिक्षा अधिकारी के कार्य
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2.1. [ जिला शिक्षा अधिकारी के लिए निर्देश ]
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जिला शिक्षा अधिकारी वर्तमान और बाद के संशोधित कानूनों के अनुसार कक्षा 1 से कक्षा 12 वीं वाले विद्यालयों और जिले के परीक्षा केन्द्रों का प्रशासन संभालेगा। जिला शिक्षा अधिकारी शैक्षिक गतिविधियों के विधिवत संचालन के लिए नागरिकों, सांसदों, विधायकों और जिला पंचायत सदस्यों द्वारा बनाए गए कानूनों के अनुसार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और जिला पंचायत प्रमुख से धन प्राप्त करेगा।
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2.2 [ जिला शिक्षा अधिकारी के लिए निर्देश ]
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जिला शिक्षा अधिकारी निम्नलिखित विषयों की शिक्षा का प्रशासन कार्य देखेगा -- गणित, विज्ञान, भौतिकी, रसायन, जीव विज्ञान, अंग्रेजी, हिन्दी, स्थानीय भाषा, सेना का इतिहास, कानून एवं प्रशासनिक ढ़ांचा, कानून का इतिहास एवं प्रशासनिक ढ़ांचा, सैन्य प्रशिक्षण और हथियार चलाने की शिक्षा। वह सांसदों, विधायकों आदि द्वारा बनाए गए कानूनों के अनुसार शिक्षा देगा।
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2.3. [ जिला शिक्षा अधिकारी के लिए निर्देश ]
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जिला शिक्षा अधिकारी संस्कृत और सामाजिक विज्ञान की शिक्षा जारी रखेगा। लेकिन यदि 51 प्रतिशत से अधिक मतदाता इस पाठ्यक्रम को जारी न रखने की मांग करते है तो जिला शिक्षा अधिकारी उसे अनिवार्य पाठ्यक्रम से हटा सकता है।
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2.4. [ जिला शिक्षा अधिकारी के लिए निर्देश ]
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जिला शिक्षा अधिकारी किसी भी नागरिक को 100 रूपए का शुल्क लेकर “रजिस्टर्ड निजी शिक्षक” बनने की अनुमति दे सकता है।
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2.5. [ जिला शिक्षा अधिकारी के लिए निर्देश ]
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जिला शिक्षा अधिकारी किसी भी माता-पिता को पटवारी के कार्यालय में जाकर नए शिक्षक का नाम दर्ज करने पर उन्हें अपने बच्चे के शिक्षक को बदलने की अनुमति दे सकता है।
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2.6. [ जिला शिक्षा अधिकारी के लिए निर्देश ]
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जिला शिक्षा अधिकारी कक्षा 1 से कक्षा 12 तक के छात्रों के लिए प्रत्येक माह गणित में 1-4 परीक्षा आयोजित करवा सकता है। इसके अलावा वह विज्ञान, कानून और अन्य विषयों में परीक्षाएं करवाएगा। ये परीक्षाएं कम्यूटरीकृत परीक्षाएं हो सकती है। प्रत्येक वर्ष/प्रत्येक तिमाही के लिए उन प्रश्नों की सूची, जो परीक्षा में आ सकते है , में 10,000 से लेकर 100,000 प्रश्न होंगे, और इन्हें परीक्षा पूर्व प्रकाशित किया जाएगा। परीक्षाओं में इस सूची में से 30-100 प्रश्न हो सकते है।
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2.7. [ जिला शिक्षा अधिकारी के लिए निर्देश ]
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जिला शिक्षा अधिकारी उपलब्ध धनराशि में से छात्र और उसके शिक्षक को परीक्षा में किए गए प्रदर्शन के आधार पर पुरस्कार दे सकते है। शिक्षक को इन भुगतानों के अलावा सरकार से कोई और वेतन नहीं मिलेगा।
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सैक्शन 3 : जनता की आवाज
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3.1. [ जिला कलेक्टर के लिए निर्देश ]
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यदि कोई भी नागरिक इस कानून में परिवर्तन चाहता है तो वह जिला कलेक्टर कार्यालय में जाकर एक ऐफिडेविट प्रस्तुत कर सकता है, और जिला कलेक्टर या उसका क्लर्क इस ऐफिडेविट को 20 रूपए प्रति पृष्ठ का शुल्क लेकर नागरिक के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर स्कैन करके डाल देगा, ताकि कोई भी व्यक्ति उस एफिडेविट को बिना लॉग-इन के देख सके।
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3.2. [ पटवारी के लिए निर्देश ]
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यदि कोई गरीब मतदाता, दलित मतदाता, महिला मतदाता, वरिष्ठ नागरिक मतदाता या कोई भी अन्य नागरिक मतदाता इस कानून अथवा इसकी किसी धारा पर अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहता हो अथवा उपर के खण्ड में प्रस्तुत किसी भी शपथपत्र पर हां/नहीं दर्ज कराना चाहता हो तो वह अपना मतदाता पहचान पत्र लेकर तलाटी के कार्यालय में जाकर 3 रूपए का शुल्क जमा कराएगा। तलाटी हां/नहीं दर्ज कर लेगा और उसे इसकी रसीद देगा। इस हां/नहीं को नागरिक के वोटर आई.डी. नंबर के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल दिया जाएगा।
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3.3. [ सभी के लिए के लिए निर्देश ]
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यह प्रक्रिया कोई रेफेरेनडम (जनमत-संग्रह) नहीं है। नागरिको द्वारा दर्ज की गयी हाँ या ना अधिकारीयों , मंत्रीयों, जजो, सांसदो, विधायको, आदि पर अनिवार्य रूप से बाध्य नहीं है। लेकिन यदि भारत के 40 करोड़ नागरिक मतदाता, किसी शपथपत्र पर हाँ दर्ज कर देते है, तो प्रधानमंत्री उस शपथपत्र पर कार्यवाही कर भी सकते है या ऐसा करना उनके लिए जरूरी नहीं है, या प्रधानमंत्री इस्तीफा दे सकते है या उन्हें ऐसा करने की जरूरत नही है। प्रधानमन्त्री का निर्णय अंतिम होगा।
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=====ड्राफ्ट की समाप्ति=====
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06. अन्य पदों पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं
शिक्षा अधिकारी एवं पुलिस प्रमुख के अलावा हमने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री , सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट एवं जिला जजों को शामिल करते हुए लगभग 30-50 पदों पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाए प्रस्तावित की है। भारत में लगभग 700 जिले है, अत: जिला स्वास्थ्य अधिकारी जो कि सरकारी अस्पतालों के रखरखाव एवं प्रबंधन के लिए उत्तरदायी होता है , जिला रसद अधिकारी आदि समेत केंद्र, राज्य एवं जिला स्तर के लगभग 30 हजार अधिकारी, नेता, जज आदि राईट टू रिकॉल के दायरे में आ जायेंगे। राईट टू रिकॉल लागू होने के 24 घंटे के अंदर इन अधिकारियो में से लगभग 15 हजार अधिकारी तुरंत सुधर जायेंगे , और जब पहले महीने में नागरिको द्वारा कुछ 5-7 अधिकारियों को रिकॉल किया जाएगा तो शेष अधिकारी भी अपना काम काज सुधार लेंगे। आशय यह कि राईट टू रिकॉल क़ानून आने के बाद नागरिको को 30 हजार अधिकारियो में से 50 अधिकारियो को भी नौकरी से नहीं निकालना पड़ेगा। सिर्फ 5-7 भ्रष्ट अधिकारियो को बदलने से ही शेष अधिकारीयों के रवैये में बदलाव आने लगेगा। इस तरह राईट टू रिकॉल प्रशासन में कोई अस्थिरता नहीं लाएगा। सिर्फ 4-5 अधिकारियों को नौकरी से निकालना अन्य अधिकारियों के लिए चेतावनी की तरह काम करेगा और शेष अधिकारी अपनी नौकरी बनाए रखने के लिए तुरंत सुधरना शुरू कर देंगे। इस तरह राईट टू रिकॉल के होने मात्र से अधिकारियो के व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है , और बहुधा उन्हें कभी रिकॉल करने की जरूरत नहीं पड़ती।
07. राईट टू रिकॉल प्रधानमंत्री के लिए प्रस्तावित प्रक्रिया का सारांश
इस प्रक्रिया के गेजेट में प्रकाशित होने से आम नागरिको को यह अधिकार मिला जाएगा कि यदि पीएम भ्रष्ट हो जाता है या जनहित के फैसले नहीं लेता तो नागरिक 5 वर्षों तक इंतजार किए बिना अपने प्रधानमंत्री को बदल सकेंगे।
1. भारत का कोई भी नागरिक जो प्रधानमंत्री बनना चाहता है , कलेक्टर के सामने उम्मीदवारी का शपथपत्र प्रस्तुत कर सकेगा।
2. भारत का कोई भी मतदाता पटवारी कार्यालय में उपस्थित होकर 3 रू शुल्क का भुगतान करके अपनी पसंद के अधिक
से अधिक 5 व्यक्तियों को प्रधानमंत्री के पद के लिए अनुमोदित कर सकता है। पटवारी उसे उसके वोटर आईडी,
दिनांक, समय, और जिन व्यक्तियों को उसने अनुमोदित किया है, उनके नाम दर्ज करके रसीद देगा।
3. पटवारी मतदाताओ की प्राथमिकता को सरकारी वेबसाइट पर उनके मतदाता पहचान-पत्र संख्या के साथ रख देगा।
4. मतदाता अपना अनुमोदन 3 रू शुल्क देकर किसी भी दिन बदल सकता है।
5. प्रत्येक महीने की पहली तारीख को मुख्य सचिव उम्मीदवारों के अनुमोदन की गिनती प्रकाशित करेगा।
6. प्रधानमंत्री के अनुमोदनो की संख्या उसे माना जाएगा जो निम्नलिखित दो में से उच्चतर हो –
a) मतदाताओं की संख्या, जिन्होंने उसका अनुमोदन किया है।
b) प्रधानमंत्री का समर्थन करने वाले सांसदों द्वारा प्राप्त किए गए कुल मतों का योग
7. यदि किसी प्रत्याशी के अनुमोदनों की संख्या पदासीन प्रधानमंत्री के अनुमोदनों की संख्या से 1 करोड़ अधिक हो जाती
है तो पदासीन प्रधानमंत्री इस्तीफा दे सकता है और सांसद सबसे अधिक अनुमोदन प्राप्त उम्मीदवार को प्रधानमंत्री
नियुक्त कर सकते है।
आपने देखा होगा कि हमारे नेता दो तरह से पेश आते है – 1) चुनाव जीतने से पहले एवं , 2) चुनाव जीतने के बाद । चुनाव जीतने के साथ ही नेताओं का रवैया बदल जाने की मुख्य वजह यह है कि नागरिको के पास यह अधिकार नहीं है कि वे 5 वर्ष से पहले पीएम को बदल सके। राईट टू रिकॉल पीएम एवं सीएम का क़ानून गेजेट में आने से इनमे इस भय का संचार होगा कि यदि हमने प्रशासनिक सुधार के लिए त्वरित फैसले नहीं लिए तो जनता हमें 5 वर्ष से पूर्व ही अपदस्थ कर सकती है। और इस वजह से नेताओ के व्यवहार एवं काम काज में तुरंत सुधार आने लगेगा।
राईट टू रिकॉल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इस क़ानून के आने के बाद नागरिको को किसी अधिकारी या नेता को रिकॉल करने की जरूरत नहीं होती , क्योंकि वे जानते है कि अब यदि मैंने अपने काम काज में पर्याप्त सुधार नहीं किया तो जनता बहुमत का प्रयोग करके मुझे नौकरी से निकाल सकती है । इस तरह राईट टू रिकॉल बिना अस्थिरता लाये मौजूदा नेताओं एवं अधिकारियो को ईमानदार बना देता है ।
08. सबसे बड़ी चुनौती -- भारत की सेना को चीन / अमेरिका से होने वाले संभावित युद्ध में टिके रहने के लिए तैयार
करना
इस बात की ज्यादातर से ज्यादा सम्भावना है कि अमीरका या चीन भारत पर अप्रत्यक्ष या सीधा हमला कर सकते है। राईट टू रिकॉल मूवमेंट के सभी कार्यकर्ताओ का मानना है कि सबसे बड़े जिस खतरे की हम लगातार अनदेखी कर रहे है , वह भारत की सेना का निरंतर कमजोर होना है। आयातित हथियारों पर निर्भर सेना कभी भी आत्मनिर्भर नहीं होती , क्योंकि युद्ध के दौरान हथियारों की आपूर्ति के लिए अन्य देशो पर निर्भर होना पड़ता है। राईट टू रिकॉल आन्दोलन का मुख्य लक्ष्य भारत की सेना को अमेरिका के बराबर ताकतवर बनाना है, और इसके लिए हमें ऐसा प्रशासन चाहिए जिससे हम “मेड इन इन्डिया मेड बाय इन्डियन” नीति के तहत बड़े पैमाने पर आधुनिक स्वदेशी हथियारों का उत्पादन करने में सक्षम हो सके। हमारे द्वारा सभी क़ानून इसी आदर्श को सामने रखकर लिखे गए है कि इससे भारत में स्वदेशी हथियारों के निर्माण की गुणवत्ता में इजाफा हो। अमेरिका ने यह बात साफ़ कर दी है कि वह ईरान के तेल के कुँए हडपना चाहता है। तो ज्यादातर सम्भावना है कि चीन , पाकिस्तान , बांग्लादेश , सऊदी अरेबिया और इरान अमेरिका के हमले से बचने के लिए एक वलय की रचना करे। जब अमेरिका पाकिस्तान को भारत पर हमला करने के लिए उकसायेगा तो भारत अपने आप को बचाने के लिए युद्ध में अमेरिका का साथ देने के लिए बाध्य हो जायेगा। और भारत-चीन के युद्ध से भारत जब जर्जर हो जाएगा तो अमेरिका का अगला कदम भारत पर हमला करना होगा। इसके सैंकड़ो पहलू हो सकते है। किन्तु एक बात तय है कि युद्ध निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है , और किसी भी सभ्यता को किसी भी समय युद्ध का सामना करना पड़ सकता है , अत: हम युद्ध में हार जाने का जोखिम नहीं उठा सकते। सेना मजबूत बनने के लिए हमें स्वदेशी आधुनिक हथियारों की निर्माण इकाइयां स्थापित करना जरुरी है। विदेशियों द्वारा दिए गए हथियारों या विदेशियों द्वारा भारत में आकर बनाए गए हथियारों द्वारा युद्ध नहीं लड़ा जा सकता।
स्वदेशी आधुनिक हथियारों का उत्पादन बढाने के लिए हमें राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम , वेल्थ टेक्स , एम आर सी एम जैसे कानूनों की तत्काल जरूरत है।
सेना को मजबूत बनाने और स्थानीय निर्माण बढाने के लिए हमारे द्वारा प्रस्तावित प्रस्ताव निम्नलिखित है :
1. एम आर सी एम : खनिज से प्राप्त रोयल्टी एवं सरकारी भूमि से प्राप्त किराये को दो भागो में इस तरह विभाजित किया
जाए कि – इसका 1/3 हिस्सा सीधे सेना को एवं 2/3 सीधे भारत के सभी नागरिको को मिले। इससे सेना के बजट में
वृद्धि होगी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा चलाई जा रही खनिजो की लूट पर लगाम लगेगी। खनन की लूट कम होने
से कच्चे माल की कीमतें गिरेगी एवं निर्माण इकाइयों की लागत में कमी आएगी। सम्पूर्ण ड्राफ्ट एवं विवरण देखने के
लिए लिंक में दी गयी पुस्तक का अध्याय 5 देखें – JuryIndia .org
2. वेल्थ टेक्स लागू करना : सबसे जरुरी एवं मुख्य कदम देश में वेल्थ टेक्स एवं जूरी सिस्टम लागू करना है। वेल्थ टेक्स
एवं जूरी सिस्टम लागू किये बिना हम किसी भी तरह भारत में बड़े पैमाने पर निर्माण इकाइयां लगाने में सफल नहीं
हो पायेंगे। हमने वेल्थ टेक्स का जो प्रस्ताव किया है उसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को 25 वर्ग मीटर अकृषि भूमि एवं 5
एकड़ कृषि भूमि की छूट होगी तथा इससे अधिक भूखंड होने पर भूस्वामी को 1% सालाना की दर से कर चुकाना
होगा। इस ड्राफ्ट का पूरा विवरण अध्याय 25 में दिया गया है।
3. हथियारबंद नागरिक समाज की रचना : नागरिको के लिए बन्दुक एवं एक निश्चित मात्रा में कारतूस रखना अनिवार्य
होगा। ड्राफ्ट एवं अन्य विवरण के लिए अध्याय 29 देखें।
4. सैनिको की संख्या 12,00,000 से बढाकर 40,00,000 करना।
5. सैनको का वेतन बढाकर दो गुना करना।
6. सभी भारतीयों को सैन्य शिक्षा देना : हथियार रखना क्यों अनिवार्य है एवं इससे देश एवं खुद की किस तरह रक्षा
होती है , से सम्बंधित शिक्षा को 10th क्लास के पाठ्यक्रम से शुरू करना। इसके अलावा व्यस्को के लिए हथियार
प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना। जैसे जैसे भारत के नागरिको को हथियारों के महत्त्व के बारे में जानकारी मिलेगी वैसे वैसे
वे उन नेताओं का विरोध करना शुरू कर देंगे जो भारत की सेना को कमजोर बनाये रखने एवं नागरिको को हथियार
विहीन रखने का समर्थन करते है।
7. 500,000 इंजिनियर एवं 10,00,000 कारीगरों को नियुक्त करना ताकि बन्दुक से लेकर टेंक , लड़ाकू विमान,
मिसाइल एवं परमाणु हथियारों तक का उत्पादन बढ़ाया जा सके। हमें स्वदेश निर्मित हथियार चाहिए , आयातित
या विदेशियों के बनाए हथियारों में किल स्विच होने के कारण युद्ध के समय वे हमारे किसी काम नहीं आयेंगे।
8. IITs एवं IISc जैसे प्रोद्योगिकीय शिक्षा संस्थान DRDO के अधीन करना। इन संस्थानों से जो कोई व्यक्ति प्रशिक्षण
लेगा उसे 15 वर्ष तक DRDO एवं इसके अधीन उत्पादन / शोध संस्थानों में काम करना होगा।
9. परमाणु कार्यक्रम फिर से शुरू करना : चीन के बराबर परमाणु क्षमता बढाने के लिए परमाणु परिक्षण एवं परमाणु
हथियारों का निर्माण करना : चीन ने 23 ग्राउंड टेस्ट एवं 22 वातावरणीय परिक्षण किये है, जबकि हमने सिर्फ 4
ग्राउंड टेस्ट किये है और एक भी वातावरणीय परिक्षण नहीं किया है। चीन का सबसे शक्तिशाली परिक्षण 4500 किलो
टन का था जबकि हमने अब तक 45 किलो टन से बड़ा परिक्षण नहीं किया है !! इसके अलावा चीन के पास भारत के
मुकाबले कम से कम 20 गुना ज्यादा परमाणु हथियार है। हमें कम से कम 3000 किलो टन के 10 वातावरणीय
परिक्षण करने की जरूरत है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के टेक्टिकल परमाणु बम सेना द्वारा इस्तेमाल किये जाने के
लिए तैयार है , जबकि हमने अब तक इनका उत्पादन भी शुरू नहीं किया है। अत: हमें अपना परमाणु कार्यक्रम फिर से
शुरू करने की जरूरत है।
10) कच्चे माल के अतिरिक्त सभी वस्तुओ पर 300% आयात शुल्क लगाना : स्वदेशी हथियारों के उत्पादन के लिए यह
जरुरी है कि हम स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर प्रोद्योगिकीय निर्माण इकाइयां लगवाने के लिए निर्मित वस्तुओ का
आयात महंगा करें एवं सिर्फ कच्चा माल आयात होने दे। सम्पूर्ण रूप से स्थानीय उदारीकरण करने पर भारत के
इंजीनियर एवं कारोबारी निर्माण इकाइयों का जोखिम उठाने के लिए तत्पर हो जायेंगे और 300% आयात शुल्क
उन्हें सुरक्षा देगा। जब भारत की निर्माण इकाइयाँ गुणवत्ता में विदेशियों का मुकाबला करने लगे तब हम आयात
शुल्क घटा सकते है। यदि इसमे WTO बाधा बनता है तो हमें संसद में प्रस्ताव पास करके WTO समझौते से बाहर
हो जाना चाहिए।
उपरोक्त कदम उठाने से सेना की ताकत में सुधार आएगा। सेना की ताकत बढने से अमेरिका / चीन द्वारा भारत पर हमला करने की सम्भावना घट जाएगी , और यदि फिर भी हमला होता है तो युद्ध में टिके रहने की हमारी क्षमता बढ़ने से हम अच्छे से मुकाबला कर पायेंगे।
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09. दूसरा सबसे जरुरी एवं चुनौती पूर्ण काम : अदालतों में लटके 3 करोड़ मुकदमो का निपटारा सिर्फ 3 वर्ष के
भीतर करना और यह भी सुनिश्चित करना कि सभी फैसले निष्पक्ष हो :
भारत की सुस्त अदालतों में व्याप्त भाई भतीजा वाद एवं भ्रष्टाचार देश की सबसे बड़ी और सबसे खतरनाक समस्या है। हम देश में कोई भी क़ानून बना दें लेकिन अदालतें न सुधारें तो व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आएगा , क्योंकि हमारी अदालते दर्ज हुए मामलो को वर्षो तक लटका कर क़ानूनो के भय को अप्रभावी कर देती है। लेकिन भारत की कोई भी राजनैतिक पार्टी अदालतों के इस जानलेवा भ्रष्टाचार एवं भाई भतीजावाद के मुद्दे को छूने को तैयार नहीं है। भारत के नेता , बुद्धिजीवी , संपादक , पत्रकार आदि का लगातार यह बात दोहराते रहते है कि हमें भारत की सुस्त अदालतो एवं जजों के भ्रष्टाचार पर कोई चर्चा नहीं करनी चाहिये !! अदालतों का भ्रष्टाचार सुधारना एवं जजों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए हमने विभिन्न क़ानून ड्राफ्ट्स का प्रस्ताव किया है। इसका सारांश निचे दिया गया है -
1. सुप्रीम कोर्ट जज , हाई कोर्ट जज , एवं जिला जजो पर राईट टू रिकॉल जज क़ानून प्रक्रियाएं
2. साक्षत्कार का समापन - निचली अदालतों में जजों की नियुक्ति सिर्फ लिखित परीक्षा द्वारा की जायेगी। साक्षात्कार
सिर्फ भाई भतीजा वाद एवं भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है।
3. निचली अदालतों में नियुक्ति के लिए आयोजित परीक्षा में गणित का पाठ्यक्रम भी शामिल किया जाए , ताकि
तर्कशक्ति विहीन व्यक्तयों के क़ानून की किताबें रट कर जज बनने की सम्भावना में कमी आये।
4. निचली अदालतों में मुकदमो की सुनवाई के लिए ज्यूरी सिस्टम - ज्यूरी सिस्टम हमारा सबसे मुख्य प्रस्ताव है।
जूरी सिस्टम ऐसा क़ानून है जो लागू होने के 24 घंटो के भीतर व्यवस्था में नाटकीय ढंग से सुधार ले आएगा। इसका विवरण
आगे दिया गया है। ।
5. अपील के लिए हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में जूरी सिस्टम।
6. 1 लाख नयी निचली अदालतों की स्थापना , एवं जजों की संख्या बढ़ाकर 200,000 करना।
7. कक्षा 6 से क़ानून की शिक्षा को पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करना।
8. व्यस्को को क़ानून की मुफ्त शिक्षा।
9. जजों को शामिल करते हुए सभी सरकारी अधिकारियों एवं उनके बेहद घनिष्ठ रक्त संबंधियों ( माता-पिता-पुत्र-भाई
आदि ) की सम्पत्ति की सार्वजनिक घोषणा। इस घोषणा में उनके सभी बैंक खातो , लॉकर , जमीन आदि शामिल है।
सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि अमुक अधिकारी कितने ट्रस्टो एवं कम्पनियों में है और इन ट्रस्टो एवं कम्पनियों के पास
कितनी जमीन है। यदि किसी सरकारी अधिकारी या जज को यह घोषणा करने में दिक्कत है तो उसे इस क़ानून के तहत
बाध्य नहीं किया जाएगा किन्तु तब वह नौकरी से इस्तीफा दे सकता है।
10. सभी जजों एवं सरकारी अधिकारियो एवं उनके घनिष्ठ रक्त संबंधियों की नागरिकता का ब्यौरा सार्वजनिक करना।
11. मुकदमो के पक्षकारो को मुकदमे की अद्यतन जानकारी की सूचना ईमेल एवं SMS से देना।
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9.1 जूरी सिस्टम क्या है और कैसे यह अदालतों में सुधार ले आएगा ?
भारत में 110 करोड़ नागरिक है, और हमें 20 से 50 लाख फौजदारी मामले हर साल निपटाने है। अब प्रश्न है कि मुकदमो की सुनवाई एवं फैसले देने वाले लोगो का चयन कैसे किया जाए। इसके लिए मोटे तौर पर दो तरीके है -
1. जूरी सिस्टम : किसी मुकदमे की सुनवाई के लिए 25-55 आयुवर्ग के 12-15 नागरिको का चयन जिले की मतदाता सूचियों में से रेंडमली किया जाता है। 12-15 नागरिको का यह समूह ज्यूरी मंडल कहलाता है। नागरिको की यह जूरी मुकदमे की सुनवाई करती है , सबूत देखती है , बयान सुनती है और मुकदमे का फैसला देती है। प्रत्येक मुकदमे के लिए अलग जूरी होती है , और मुकदमे का फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाती है। उदाहरण के लिए 1958 से पहले तक भारत में एक कमजोर जूरी सिस्टम था और मुकदमो की सुनवाई अक्रमत ढंग से चुने गए 12 नागरिको के जूरी मंडल द्वारा की जाती थी , एवं इनके द्वारा ही दंड सुनाया जाता था। बाद में नानावटी मामले का बहाना लेकर श्री जवाहर लाल ने जूरी सिस्टम रद्द कर दिया। हालांकि श्री जवाहर लाल जूरी सिस्टम को ख़त्म करने का मन 1956 में ही बना चुके थे।
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2. जज सिस्टम : करोडो नागरिको के ऊपर सरकार कुछ 200-2000 व्यक्तियों को 20-35 वर्षो के लिए नियुक्त करती है , जिन्हें जज कहकर पुकारा जाता है। नियुक्त किये गए इन मुट्ठी भर व्यक्तियों के समूह को देश के सभी मामलो में दंड देने या रिहा करने की स्थायी शक्ति दे दी जाती है। उदाहरण के लिए भारत में सभी मामलो में दंड देने की शक्ति कुछ 18,000 जजों के पास है।
जज सिस्टम एवं जूरी सिस्टम में बुनियादी अंतर आगे तालिका में दिया गया है :
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जज सिस्टम Vs जूरी सिस्टम
जज सिस्टम में - कुछ 20,000 - 30,000 लोगो का समूह किसी एक वर्ष में दर्ज किये 20-25 लाख मामलों की सुनवाई करता है।
जूरी सिस्टम में - प्रत्येक मामला भिन्न व्यक्तियों के जूरी मंडल को भेजा जाता है। जूरी सदस्यों का चयन जिले /राज्य / देश की मतदाता सूचीयों में से रेंडमली किया जाता है। इस तरह 20-25 लाख मामलों का निपटारा कुछ 3 करोड़ नागरिको द्वारा किया जाता है।
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जज सिस्टम में - ज्यादातर मामले एक ही व्यक्ति के पास जाते है। एक जज अपने सेवा काल में लगभग 5,000 से 20,000 मामलो में फैसला देता है।
जूरी सिस्टम में -प्रत्येक मुकदमे के लिए अलग से जूरी मंडल होता है। जो नागरिक किसी मामले में फैसला दे चुका है , उसे अगले 5 वर्ष तक किसी अन्य मामले में जूरी सदस्य नहीं बनाया जाता।
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जज सिस्टम में - यदि किसी जिले में 5,000 मामले प्रति वर्ष एवं 5 वर्ष में 25,000 मामले दर्ज होते है तो जज सिस्टम में इन सभी मामलो का फैसला कुछ 25-50 जजों द्वारा दिया जाएगा।
जूरी सिस्टम में - ये मामले लगभग 300,000 से 400,000 भिन्न भिन्न नागरिको द्वारा सुने जायेंगे।
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फैसले देने की शक्ति लगातार नए लोगो के हाथो में जाते रहने से जूरी सिस्टम में गठजोड़ बनने , भाई भतीजा वाद एवं भ्रष्टाचार की सम्भावना बेहद कम हो जाती है। जज की तुलना में वकील के लिए सभी जूरी सदस्यों से गठजोड़ बनाना काफी मुश्किल है। जज सिस्टम में वकील आसानी से जज से गठजोड़ बना लेते है और यह गठजोड़ निरंतर जारी रहता है।
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जज सिस्टम में - जज आम तौर पर किसी अदालत में 3-4 वर्ष टिके रहता है। पर्याप्त समय होने के कारण अपराधियों एवं वकीलों द्वारा जज से गठजोड़ बना लेना काफी आसान हो जाता है। और यह गठजोड़ लगातार बना रहता है।
जूरी सिस्टम में - जूरी सदस्यों का चयन जिले के 10 लाख या देश भर के 100 करोड़ नागरिको में से रेंडमली किया जाता है, और कोई नागरिक अगले 5 वर्ष तक दुबारा किसी मुकदमे की सुनवाई नहीं करता। सिर्फ एक मुकदमा सुनने की वजह से 99% मामलो में फैसला 7-15 दिन में आ जाता है। दुनिया में किसी भी वकील के लिए यह निहायत ही दुष्कर काम है कि वह इन 12 सदस्यों में से किन्ही 4 लोगो के रिश्तेदारों को भी खोज निकाले , और यह काम तब और भी मुश्किल हो जाता है, जब वकील को यह काम सिर्फ हफ्ते भर में करना हो।
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जज सिस्टम - कई अदालतों में जज आपस में भी गठजोड़ बनाकर रखते है। जज "A" जज "B" के रिश्तेदार वकील के पक्ष में फैसला सुना देगा और जब जरूरत होगी तो जज "B" जज"A" का काम निकाल देगा। यह भाई भतीजा वाद का परिष्कृत रूप यानी Cross-Nepotism है।
जूरी सिस्टम - ज्यूरी सदस्य अस्थायी होते है और सिर्फ हफ्ते दो हफ्ते के लिए जूरी मंडल में आते है। 5 लाख से 100 करोड़ लोगो के बीच में से रेंडमली चुने गये किसी जूरी मंडल "A" के 12 सदस्यों की रिश्तेदारी जूरी मंडल "B" से होने की सम्भावना होना और इसे हफ्ते भर में ढूंढ निकालना गणितीय रूप से असम्भव है।
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कैसे जज सिस्टम संगठित एवं पेशेवर अपराधियो को पनपने का अच्छा अवसर प्रदान करता है ?
जज सिस्टम और संगठित अपराध Vs जूरी सिस्टम और संघठित अपराध
यदि किसी गैंग एवं उसके सरगना के खिलाफ 4-5 वर्ष के दौरान 1000 मुकदमे दर्ज होते है तो जज सिस्टम में ये सभी मुकदमे 5-10 जजों के पास जायेंगे।
जूरी सिस्टम में प्रत्येक मामला 12-15 नागरिको के अलग अलग जूरी मंडल के पास जाएगा। और जूरी मंडल के इन 15*1000 = 15,000 सदस्यों का चयन करोडो नागरिको में से रेंडमली किया जाता है।
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तो जज सिस्टम में गवाहों को तोड़ने , उन्हें धमकाने , जांच प्रभावित करने और रिहा होने के लिए माफिया सरगना को सिर्फ 5-10 जजों से गठजोड़ बनाना है , ताकि जज उसके मामलो की सुनवाई की रफ़्तार धीमी कर दे।
लेकिन जूरी सिस्टम में मुकदमे को लंबित रखना बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि एक जूरी मंडल के पास सिर्फ एक ही मामला होता है। और उन्हें नियमित रूप से सुबह 11 बजे से सायं 4 बजे तक मामले की सुनवाई करनी होती है। जूरी में अगली तारीख का मतलब होता है अगला दिन !! और इसी छोटे अंतराल में सरगना को लगभग 12,000 जूरी सदस्यों से गठजोड़ बनाना होगा।
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दुसरे शब्दों में , भारत की अदालतों में देश भर के मुकदमो की सुनवाई करने और दंड देने का अधिकार स्थायी रूप से मुट्ठी भर लोगो के पास होने के कारण अपराधियों के लिए गठजोड़ बनाना बेहद आसान है। आज 3 करोड़ मुकदमो के माध्यम से भारत के 20-25 करोड़ लोगो की टाँगे अदालतों में फंसी हुयी है। इस तरह हमारी सुस्त अदालतो ने देश की उत्पादकता की गति को तोड़ कर रख दिया है। पश्चिम क्यों भारत से आगे और बहुत आगे निकल गया , इसका सबसे महत्त्वपूर्ण कारण वहां पर ज्यूरी सिस्टम का होना है। जूरी सिस्टम में मुकदमो के फैसले हफ्ते दो हफ्ते में आ जाते है , और अपराधी यह बात जानते है कि यदि उन्होंने अपराध किया है तो उन्हें जल्द जेल भेज दिया जाएगा। त्वरित एवं निष्पक्ष दंड मिलना एक मात्र तत्व है जो अपराध को नियंत्रित करता है। अपराध कम होने एवं मामलो का त्वरित निपटान होने से देश की उत्पादकता बढ़ जाती है। तो राईट टू रिकॉल के अलावा जूरी सिस्टम मुख्य वजह रही कि अमेरिका-ब्रिटेन आदि देश अन्य देशो से आगे काफी आगे निकल गए। जूरी सिस्टम के पूरे ड्राफ्ट का पीडीऍफ़ इस लिंक से डाउनलोड करें – newindia. in/JurySys3 , यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो कृपया पीएम को पोस्टकार्ड लिखे एवं @pmoindia पर ट्विट भी करे कि उपरोक्त लिंक में दर्ज क़ानून ड्राफ्ट को गेजेट में प्रकाशित किया जाए।
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10. तीसरा सबसे जरुरी काम : देश भर में फैले 2 करोड़ बांग्लादेशी घुसपेठियो की पहचान करना एवं उन्हें देश से
खदेड़ना
बांग्लादेशी घुसपेठिये उत्तर पूर्व भारत से पूरे देश में दीमक की तरह फ़ैल रहे है। असम के 4 बोडो जिलो में बांग्लादेशी घुसपेठियों ने लगभग 50,000 भारतीयों को खदेड़ कर उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया है। पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाको में अब कई तहसीलों में बांग्लादेशी घुसपेठियो का बहुमत है। हालात इतने बदतर कैसे हुए --
(1) 1991 से पश्चिम बंगाल में कई एनजीओ को सऊदी अरब से अनुदान आने लगे, और ये एनजीओ घुसपेठियों का फर्जी राशन कार्ड , वोटर कार्ड आदि बनाने के लिए तहसीलदार को प्रति व्यक्ति 5,000 से 10,000 रू तक चुकाने लगे, और यह पैसा ऊपर मुख्यमंत्री तक जाने लगा।
(2) बेरोजगारी एवं भुखमरी के कारण बांग्लादेशी घुसपेठिये सस्ते श्रम में काम करने को राजी हो जाते थे ,
(3) बांग्लादेशी घुसपेठिये बोर्डर से कैरोसिन , डीजल एवं गायों की तस्करी करने में भी काम आने लगे ; अत: स्थानीय नेताओं एवं अधिकारियो ने उनका इस्तेमाल इस काम में करके करोड़ो रूपये बनाना शुरू कर दिया। इस तरह बांग्लादेशी घुसपेठिये स्थानीय नेताओं एवं अधिकारियो के लिए काम के लोग बन गए और उन्होंने इन्हें और भी तेजी से बुलाकर भारत में बसाना शुरु किया।
(4) भारत के सभी कु-बुद्धिजीवियों का दावा है कि भाषा एवं कद काठी में साम्य होने के कारण अब उनकी पहचान करना असम्भव है अत: इस मुद्दे पर बात करके समय ख़राब करने की जगह हमें इसे भूल जाना चाहिए !!
इन कु-बुद्धिजीवियों को हमारा कहना है - "तुम अपनी बौद्धिकता के साथ दफा हो जाओ। हमें तुम्हारी बुद्धिजीविता की कोई जरूरत नहीं है"
तो हम साधारण नागरिक इन कु-बुद्धिजीवियों एवं राजनैतिक पार्टियों पर निर्भर हुए बिना सरकारी मशीनरी का उपयोग करके कैसे इन 2 करोड़ बांग्लादेशियों को देश से बाहर खदेड़ सकते है ? यदि भारत के नागरिक प्रधानमंत्री को निचे दी गयी प्रक्रियाएं गेजेट में प्रकाशित करने के लिए बाध्य कर देते है तो सिर्फ 6 माह में सभी 2 करोड़ बांग्लादेशी घुसपेठियो को देश से बाहर खदेड़ा जा सकता है। हमें इस बात को गंभीरता से लेने की जरूरत है कि इन घुसपेठियो का गठजोड़ बांग्लादेश के इस्लामिक कट्टरपंथियों एवं नक्सलवादियो से है। यदि हमारा युद्ध चीन या पाकिस्तान से होता है तो वे लोग इन्हें हथियार पहुंचा कर देश को एक भीषण आंतरिक गृह युद्ध की और धकेल सकते है। भारतीय नागरिक हथियार विहीन है, अत: यदि ऐसे हालात बन जाते है तो करोड़ो नागरिको को उत्तर पूर्व से अपनी जमीन , सम्पत्ति आदि छोड़ कर उसी तरह से मध्य भारत की और पलायन करना पड़ेगा जिस तरह 90 के दशक में कश्मीरी पंडितो को करना पड़ा था। और इस पूरे घटनाक्रम के दौरान हम उत्तर पूर्व का पूरा इलाका गँवा देंगे। तो इस तरह ये घुसपेठिये एक टाइम बम की तरह है जो किसी भी समय फट सकता है। यदि हम इन्हें तत्काल नहीं खदेड़ देते है तो हम सुरक्षा की दृष्टी से एक बड़ा एवं निश्चित जोखिम उठा रहे है।
बांग्लादेशी घुसपेठियों को खदेड़ने के लिए जिस प्रक्रिया का हमने प्रस्ताव किया है , उसका सारांश निम्नलिखित है :
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1. जिला पुलिस प्रमुख फोन बिल के आधार पर एवं टेलीकोम कम्पनियों से समन्वय बनाकर उन लोगो को चिन्हित करेगा
जो सामान्यतया बांग्लादेश फोन करते रहते है। संदेह के आधार पर पुलिस प्रमुख इनके नाम एवं छाया चित्र वेबसाईट
पर प्रकाशित कर सकेगा।
2. तब पुलिस प्रमुख बांग्लदेशी घुसपेठिये की पहचान के सबूत जुटाने के लिए 100,000 रू तक की इनामी राशि घोषित
करेगा। यदि बांग्लादेश में रहने वाला उसका कोई रिश्तेदार ब्लड सेम्पल देने को तैयार हो जाता है तो पुलिस प्रमुख
डीएनए पुष्टि के लिए कार्यवाही करेगा। नागरिको की जूरी ब्लड सेम्पल की जांच , सार्वजनिक नारको टेस्ट एवं लाइ
डिक्टेटर टेस्ट के नतीजो के आधार पर यह तय करेगी कि अमुक व्यक्ति घुसपेठिया है या भारत का नागरिक।
3. नागरिको को पीएम पर दबाव बनाना होगा कि वे राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख का ड्राफ्ट गेजेट में प्रकाशित करे।
क्योंकि जब तक पुलिस प्रमुख को नौकरी से निकलाने का अधिकार नागरिको के पास नहीं होगा तब तक पुलिस प्रमुख
घुसपेठियों को खदेड़ने के काम को गंभीरता से नहीं लेगा। उल्टे वह घुसपेठियो को चिन्हित करेगा और उनसे घूस वसूल
करके उन्हें भारत में ही रहने के लिए छोड़ देगा
4. गेजेट में इस तरह की अधिसूचना प्रकाशित करवाना कि यदि व्यक्ति
घुसपेठिया साबित हो जाता है तो उसे जेल भेजा जा सके।
5. मौजूदा क़ानून कहता है कि , यदि कोई गैर भारतीय नागरिक पासपोर्ट के लिए आवेदन करता है तो यह कारावास से दंडनीय अपराध है। हमें यह प्रावधान राशन कार्ड , वोटर कार्ड एवं आधार कार्ड में भी जोड़े जाने की जरूरत है।
यदि हम 6 महीने के भीतर 5000 घुसपेठियों को भी जेल पहुंचा देते है तो 95% घुसपेठिये देश छोड़कर भाग जायेंगे और वापिस लौट कर नहीं आयेंगे। कृपया इस बारे में विस्तृत विवरण एवं ड्राफ्ट अध्याय 31 से 34 में देखें।
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11. संविधान के अनुच्छेद 147 में बदलाव करना : क्योंकि यह अनुच्छेद ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट को भारत के संविधान में संशोधन करने की शक्ति देता है !!
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 147 कहता है कि , जब सुप्रीम कोर्ट के जज संविधान की व्याख्या करेंगे तो भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 एवं इस अधिनियम में ब्रिटीश संसद द्वारा लाये गए किसी भी संशोधन को आधार में रखेंगे। तो इस तरह अनुच्छेद 147 ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947’ को एवं ब्रिटिश संसद द्वारा आज भी इसमें लाये गए किसी भी संशोधन को भारत के संविधान का हिस्सा बना देता है। हमें इस अनुच्छेद में यह लिखने की जरूरत है कि - "सुप्रीम कोर्ट के जज जब भी संविधान की व्य्खाया करेंगे तो सिर्फ और सिर्फ भारत के नागरिको की इच्छा को आधार में रखेंगे"। उल्लेखनीय है कि जब अंग्रेजो ने भारत को आजादी दी तो ब्रिटिश संसद में ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947’ पास किया था। वे भारत में अपने मन मुताबिक़ संविधान चाहते थे , अत: उन्होंने संविधान निर्माताओ को भारतीय संविधान में अनुच्छेद 147 रखने को कहा। इस तरह भारतीय संविधान का अनुच्छेद 147 भारतीय संविधान को ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947’ से लिंक कर देता है। दरअसल भारतीय संविधान भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की कार्बन कोपी है। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 एक ब्रिटिश अधिनियम है , और ब्रिटिश संसद यदि आज भी इसमें कोई संशोधन लाती है तो वह भारतीय संविधान का आधार बन जाता है।
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12. महात्मा सुभाष चन्द्र बोस को राष्ट्रपिता घोषित करने एवं राष्ट्र गान को बदलने जैसे विषयों के लिए नागरिको के बहुमत का प्रयोग करना :
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