Pawan Jury BhilwaraRj
आजादी की लड़ाई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का क्या योगदान रहा था ?
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आजादी की लड़ाई में संघ का सबसे विशिष्ट योगदान था — जो युवा मोहन गांधी , जवाहर लाल गाज़ी , अब्दुल गफ्फार खान जैसे नेताओं की चपेट में नहीं आ रहे है थे उन्हें अपनी और खींचना ताकि उन्हें हथियार विहीन रखकर महात्मा भगत सिंह एवं महात्मा चंद्रशेखर आजाद की राह पर चलने से रोका जा सके.
कांग्रेस के विभाजन के बाद भारत में गरम दल तेजी से युवाओ को अपनी और खींच रहा था और ज्यादा से ज्यादा युवा ब्रिटिश साम्राज्य से अपने तरीके से लड़ने की योजना बना रहे थे। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि आजादी की लड़ाई लड़ने की मंशा रखने वाले युवा क्रन्तिकारी राह पर चले। इन युवाओ को राजनीति से दूर रखने के लिए अंग्रेजो को भारत में ऐसे नेताओ और संगठन की जरूरत थी जो युवाओ को बड़े पैमाने पर अपनी तरफ खींच कर उनकी ऊर्जा और समय बर्बाद कर सके। इसके लिए अंग्रेजो ने निम्नलिखित कदम उठाने शुरू किये :
उन्होंने मोहन गाँधी को समाचार पत्रों में बेतहाशा कवरेज देना शुरू किया म जिससे मोहन गाँधी तेजी से युवाओ को अपनी और खींचने लगे। मोहन ने देश की एक बहुत बड़ी आबादी को चरखा , भजन, अनशन आदि में उलझा लिया।
जो लोग मोहन की चपेट में नहीं आये उन्होंने सावरकर जी के निर्देशन में 1918 में हिन्दू महासभा की स्थापना की। हिन्दू महासभा का एजेंडा था -- १) हिन्दू राष्ट्र की स्थापना , २) हिन्दुओ का शस्त्रीकरण , और ३) चुनावो में भाग लेना। खिलाफत आंदोलन में जब मोहन ने तुर्की की लड़ाई को भारत से लड़ना शुरू किया तो कई हिन्दू कांग्रेस छोड़कर जाने लगे और हिन्दू मुस्लिम हिंसा होने लगी। इससे युवा तेजी से हिन्दू महासभा की और जाने लगे। हिन्दू महसभा हिन्दुओ का शस्त्रीकरण भी चाहती थी और चुनावो में भी भाग लेना चाहती थी। अंग्रेज देश में किसी भी ऐसे संगठन की ताकत नहीं बढ़ने देना चाहते थे , जो राजनीती में भाग ले , और शस्त्र की मांग करें।
अंग्रेजो ने खान अब्दुल गफ्फार खान को एक अराजनैतिक दल गठित करने को कहा ताकि जो मुस्लिम युवा मोहन की चपेट में नहीं आ रहे है उन्हें दूसरे प्रकार के सेवा कार्यो को उलझाया जा सके। खान अब्दुल गफ्फार खान ने 1924 में "खुदाई खिदमतगार" नाम से एक अराजनैतिक संगठन शुरू किया जो कम्बल बांटने , गरीबो को शिक्षा और सेवा देने जैसे चिल्लर काम करता था।
इसी तर्ज पर अंग्रेजो ने जवाहर लाल गाज़ी ( इन्हे नेहरू के नाम से भी जाना जाता है ) को भी आदेश दिए कि वे भी युवाओ का टाइम वेस्ट करने के लिए एक अराजनैतिक संगठन बनाये। जवाहर लाल ने 1925 में "सेवा दल" की स्थापना की।
हिन्दू महासभा में विभाजन डालने के लिए सिंधिया आदि देशी राजाओ ने 1925 में कांग्रेस के नेता श्री केशव बलिराम हेडगेवार को आरएसएस की स्थापना करने के लिए कहा और उन्हें संचालन के लिए फंडिंग दी। देशी राजाओ और मंदिरो का समर्थन मिलने के कारण आरएसएस तेजी से बढ़ने लगा। आरएसएस के नेता युवाओं को इकट्ठे करके उन्हें व्यायाम कराते , लाठी चलाना, ड्रम-शंख बजाना और भजन गाना आदि सिखाते थे। इस तरह आरएसएस का मुख्य काम ब्रिटिश साम्राज्य से टकराव लेने वाले युवाओ को अराजनैतिक गतिविधियों में उलझाकर उनका टाइम पास करना था , ताकि ब्रिटिश को सेफ पैसेज मिले।
जिस देश में अंग्रेजो की हुकूमत हो, उस देश में वही विचारधारा पनप सकती थी जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजो को लाभ पहुंचा रही हो। अत: गांधी, नेहरु, टैगोर, बिडला, बजाज, साराभाई और सिंधिया समेत वे सभी देशी राजा पनपे जो भीतर से अंग्रेजो को फायदा पहुंचा रहे थे। सावरकर, भगत, आजाद, लालाजी, सुखदेव, बटुकेश्वर, उधम सिंह और सुभाष बाबू जैसे सच्चे क्रांतिकारी महात्माओं को दमन का सामना करना पड़ा और अंग्रेजो ने इनमे से किसी को नही बख्शा।
संघ के की स्थापना 1925 में हुयी और 1947 तक संघ के स्वयंसेवको की संख्या लगभग 8 लाख हो चुकी थी। कोंग्रेस की तरह ही संघ को भी अंग्रेजो का मौन समर्थन हासिल था, क्योंकि दोनों ही संघठन कार्यकर्ताओं का टाइम फिजूल गतिविधियों में खपा कर अंग्रेजो को लाभ पहुंचा रहे थे। अत: कभी संघ को किसी प्रकार के दमन का सामना न करना पड़ा और संघ ने 1947 तक अंग्रेजो के खिलाफ कभी कोई आन्दोलन भी नही किया. कुल मिलाकर ब्रिटिश हुकूमत में संघ फूलता फलता रहा।
1857 की क्रान्ति के बाद अन्य किसी सशस्त्र विद्रोह की आशंका को ख़त्म करने के लिए अंग्रेजो ने आर्म्स एक्ट लागू कर के भारतीय नागरिको के सभी हथियार जब्त कर लिए और हथियार रखने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। अंग्रेज जानते थे की 40 करोड़ की आबादी को 70 हजार अंग्रेज सिर्फ तब तक ही काबू में रख सकते है जब तक कि अवाम हथियार विहीन हो। संघ और गांधी दोनों ही भारतीयों को हथियार विहीन बनाए रखने के अंग्रेजो के एजेंडे पर कार्य कर रहे थे l संघ ने अंग्रेजो को भारत से खदेड़ने के लिए मुहीम चलाने की जगह अंग्रेजो का गांधीनुमा सांकेतिक प्रतिरोध किया और लाखों कार्यकर्ताओं को कम्बल बांटने, गायों को चारा खिलाने, खून इकट्ठा करने, भोजन बांटने, राष्ट्र भक्ति के गीत गाने, ड्रम शंख बजाने, हलके व्यायाम करने, पथ-संचलन करने आदि में व्यस्त कर दिया, बदले में अंग्रेजो ने संघ को फलने फूलने दिया।
नीचे संघ द्वारा प्रकाशित हेडगेवार जी की जीवनी में से कुछ अंश दिए गए है , जिससे आप अंदाजा लगा सकते है कि किस तरह हेडगेवार जी युवाओ को ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ लड़ने से रोक रहे है थे और उनका निःशस्त्रीकरण कर रहे थे :
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जब सुभाष बाबू ब्रिटिश के खिलाफ बाहरी आक्रमण द्वारा विद्रोह की योजना बना रहे थे तो बालाजी हुद्दार और डॉक्टर वी आर संजगिरी सुभाष बाबू का सन्देश लेकर डॉ हेडगेवार के पास पहुंचे। उन्होंने डॉ हेडगेवार को सुभाष बाबू का सन्देश दिया। सुभाष बाबू की योजना थी कि ब्रिटिश के खिलाफ एक देशव्यापी विद्रोह किया जाए तथा उन देशो का भी बाहरी आक्रमण में सहयोग लिया जाए जो ब्रिटिश के खिलाफ है। डॉ हेडगेवार ने जवाब दिया कि, — “यह बात सही है कि देश में विद्रोह होने के हालात है। पर सबसे बड़ा सवाल है कि, आपकी तैयारी कितनी है ? इस योजना पर अमल शुरू करने के लिए हमें कम से कम 50% तैयारी की जरुरत है। इस समय सुभाष बाबू की कमांड में कितने लोग है ? जब तक हम खुद तैयार नहीं होते तब तक अन्य देशो से सहायता लेने से कोई लाभ नहीं होगा'”।
अनुशीलन समिती के उग्र नेता त्रिलोकीनाथ चक्रवर्ती भी ब्रिटिश राज के खिलाफ राष्ट्रव्यापी विद्रोह की तैयारी कर रहे थे। एक बार चक्रवर्ती खुद नागपुर आये और विद्रोह की योजना के बारे में डॉ हेडगेवार से मिले। लेकिन डॉ हेडगेवार का साफ़ तौर पर मानना था कि लोगो को जगाना और संगठन को मजबूत बनाये बिना सफलता सम्भव नहीं है और इसके लिए अभी और तैयारी करने की जरुरत थी।
(संदर्भ : Dr Hedgewar : The Epoch Maker, A biography. page : 76, Publisher : RSS, लिंक -- <http://goo.gl/LA1RSC> )
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श्यामा प्रसाद मुकर्जी सीधे बंगाल से आये थे, और उनके पास बंगाल में हिन्दुओ की दुर्दशा से सम्बंधित बुरी खबरे थी। हिन्दुओ की सम्पत्ति को लूटा गया था और उनकी स्त्रियों के साथ मुस्लिम आतताई ज्यादती कर रहे थे। हिन्दू विधवाओं की दशा और भी बदतर थी। मुकर्जी की आवाज में गहरी पीड़ा और गुस्सा भरा हुआ था। उनका कहना था कि बंगाल में हिन्दुओ के एक सशस्त्र दस्ते (मार्शल ग्रुप) को संगठित करने की तत्काल जरुरत है, वरना बंगाल में हिन्दू नहीं बचेंगे। मुकर्जी यह कह रहे थे तो उनकी आवाज भर्रायी हुयी थी। यह सुनकर डॉ हेडगेवार गहराई से विचार करने लगे। तब उन्होंने कहा की — “हमें नहीं भूलना चाहिए कि वहाँ एक मुस्लिम सरकार है। वे हिन्दूओ के सशस्त्र दस्ते को वहां टिकने नहीं देंगे। और ब्रिटिश भी उनका ही समर्थन कर रहे है। उनके लिए हिंदुत्व का उत्कर्ष एक बुरे सपने की तरह है। तब वे तुम्हारी योजना को कैसे सफल होने देंगे” ? यह सुनकर मुकर्जी ने कहा कि, फिर आपके हिसाब से हिन्दुओ कौनसा रास्ता बचा है ?
तब डॉ हेडगेवार ने अपनी गहरी सोच को प्रकट करते हुए बड़े ही सधे हुए अंदाज में कहा कि, —“बात चाहे पंजाब की हो या बंगाल की, हिन्दुओ की दुर्दशा का कारण है कि वे संगठित नहीं है। जब तक हिन्दू संगठित नहीं होते तब तक उनकी दशा ऐसी ही रहेगी। हमें सभी हिन्दुओ को राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत करना होगा, हमें उन्हें एक दूसरे से प्यार करना सिखाना होगा ताकि वे एक दूसरे से संयुक्त होकर पूरे देश को उठ खड़े होने में मदद करे। सिर्फ और सिर्फ इसी तरीके से हिन्दू एक राष्ट्र के रूप में फिर से उठ खड़े हो सकेंगे। और संघ बिलकुल इसी नीति पर काम कर रहा है”
डॉ मुकर्जी हेडगेवार जी के इन अद्भुत विचारों से बेहद प्रभावित हुए और जल्दी ही बंगाल में उन्होंने शाखा लगानी शुरू कर दी !!!
(संदर्भ : Dr Hedgewar : The Epoch Maker, A biography. page : 78, Publisher : RSS, लिंक -- <http://goo.gl/LA1RSC> )
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"सतारा के ख्यात न्यायविद दादा साहेब करिंदर की मृत्यु के बाद उनके पुत्र विट्ठलराव करिंदर ने डॉ हेडगेवार जी को 100 रूपये के साथ यह सन्देश भेजा था कि दादा साहेब की इच्छा थी कि इन रुपयों से एक शील्ड खरीदकर उस स्वयसेवक को इनाम के रूप में दी जाए जो तीरंदाजी में सबसे कुशल हो। डॉ साहेब ने जवाब भेजा कि, संघ में तीरंदाजी नहीं सिखायी जाती। हमने इसके प्रशिक्षण के बारे में विचार किया था लेकिन इसे लागू करना संभव नहीं हो सका। ऐसी स्थिति में आपकी राशि का इस्तेमाल अमुक मद में नहीं किया जा सकता। यह राशि यहां हमारे पास जमा रहेगी। आगे हम इसका उपयोग आपकी सलाह के अनुसार करेंगे'।
बाद में विट्ठल राव के निर्देशानुसार इस राशि का उपयोग सांगली में संघ कार्यालय के लिए भूमि खरीदने के लिए किया गया था"।
(संदर्भ : Dr Hedgewar : The Epoch Maker, A biography. page : 66, Publisher : RSS, लिंक -- <http://goo.gl/LA1RSC> )
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और इस तरह महात्मा सुभाष चन्द्र बोस ने खुद को संघ की चपेट में आने से बचा लिया था।
जब डॉ केशव बलिराम हेडगेवार 1928 में कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सालाना अधिवेशन में भाग लेने कलकत्ता गए थे तो उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस से मुलाक़ात की थी। सुभाष बाबू तब कलकत्ते के मेयर थे, और उन्होंने मुलाकात के लिए सिर्फ 10 मिनिट का समय दिया था। लेकिन जब इन दोनों हस्तियों ने बातचीत शुरू की तो जैसे घड़ी की सुइयाँ ठहर गयी। उनके बीच में घंटो तक विचारों का आदान प्रदान होता रहा। डॉक्टर साहेब के ठोस और बेबाक जवाबो ने सुभाष बाबू की सभी जिज्ञासाओं को शांत किया और उन्हें गहराई तक प्रभावित किया। और अंत में डॉक्टर साहेब ने सुभाष बाबू से संघ से जुड़ने और इसके लिए सक्रीय रूप से काम करने का आग्रह किया।
सुभाष बाबू ने जवाब दिया कि, डॉक्टर साहेब आपने जो भी कहा उससे मैं पूर्णत सहमत हूँ। इसमें कोई संदेह नहीं कि सिर्फ आप ही है जिसके पास भारत को स्वतंत्र कराने के लिए सबसे प्रभावशाली तरीका है। लेकिन मैं इस कार्य को राजनैतिक रूप से करने में पूरी तरह से जुटा हुआ हूँ, अत: अन्य किसी वैकल्पिक दिशा में कार्य करने की स्थिति में नहीं हूँ। इसीलिए मेहरबानी करके आप मुझे तो माफ़ ही कीजिये"।
सन्दर्भ - Dr Hedgewar : The Epoch Maker, A biography. page : 46, Publisher : RSS
<http://www.rss.org/…/334_12_29_2>...
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राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस जानते थे कि संघ युवाओं को गैर राजनैतिक, सामाजिक सेवा कार्यों में खपा कर ब्रिटिश राज के खिलाफ उठ रहे क्रांतिकारियों के आंदोलन को तोड़ रहा है, और इससे सिर्फ अंग्रेजो को ही लाभ होगा। इसीलिए उन्होंने बड़ी सफाई से हेडगेवार जी को टरका दिया। लेकिन मधुकर दत्तात्रेय देवरस -जो कि आगे चलकर 1974 में संघ के तीसरे सर संघसंचालक बने - और अन्य लाखों युवा इतने परिपक्व नहीं थे कि वे इस बात को समझ पाते। उल्लेखनीय है कि देवरस महात्मा भगत सिंह से प्रेरित होकर अंग्रेजो पर इसी तरह का हमला करने की योजना बना रहे थे। लेकिन एन वक्त पर हेडगेवार जी ने उन्हें और उनके साथियो को समझा बुझा कर भगत सिंह जी के रास्ते को छोड़ने और संघ के 'महान और ऊँचे आदर्शो' के लिए काम करने के लिए राजी कर लिया था।
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जब हेडगेवार सुभाष बाबू से मिले तो वे परिपक्व हो चुके थे। यदि वे नवयुवक होते तो सम्भावना थी कि हेडगेवार उन्हें उषा काल में आकर व्यायाम करने, लाठी चलाना सीखने, कम्बल बांटने, ध्वज वंदना करने, पथ संचलन निकालने और नारे लगाने जैसे संघ की 'महान गतिविधियों' में लगा देते। मुझे नहीं पता तब आजाद हिन्द फ़ौज खड़ी करने जैसा 'साधारण' कार्य कौन करता। लेकिन इतना तय है कि तब शायद भारत को आजादी के लिए और भी लम्बा इन्तजार करना पड़ता।
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"जब हम कॉलेज में पढ़ रहे थे तो भगत सिंह जी के क्रांतिकारी विचारों से बहुत प्रभावित थे। हमारे दिमाग में अक्सर बार बार यह ख्याल आता कि हमे भी भगत सिंह जी की तरह या ऐसा ही कुछ बहादुरी का काम करना चाहिए। चूंकि संघ में राजनीति और क्रांतिकारी विचारों पर विमर्श नहीं किया जाता था इसीलिए हम और अन्य हमारे जैसे युवा संघ के कार्यकलापों में कम रुचि लेते थे। जब भगत सिंह जी और उनके साथियों को फांसी की सजा दी गयी तो हमारा दिल साहस से भर उठा और हमने भी कुछ इसी तरह की कार्यवाही करने की शपथ ली। हम इतने उत्तेजित थे कि हमने घर छोड़ने का भी फैसला कर लिया था। लेकिन 'डॉक्टर साहेब' ( हेडगेवार जी ) को सूचित किये बिना ऐसा कुछ भी करना दृष्टता होती इसीलिए हमने अपनी योजना के बारे में 'डॉक्टर साहेब' को बताने का निर्णय किया। इस सम्बन्ध में जब हमने उन्हें सूचित किया तो 'डॉक्टर साहेब' ने मुझे और मेरे साथियों को बुलाया।
हम साहस और उत्साह से भरे हुए 'डॉक्टर साहेब' से मिलने गए और उन्हें अपनी योजना के बारे में बताया। हमारी योजना सुनकर 'डॉक्टर साहेब' ने हमें समझाया कि यह बहुत ही बेवकूफी भरा फैसला है, और ऐसा करके तुम संघ के ऊँचे और महान लक्ष्य की उपेक्षा कर रहे हो। डॉक्टर साहेब' हमें 7 दिनों तक संघ के महान लक्ष्यों के बारे समझाते रहे। हमारी सभा रात को भी 10 बजे से 3 बजे तक चलती थी, जिसमें 'डॉक्टर साहेब' बराबर हमें इस बारे में उपदेश करते थे। 'डॉक्टर साहेब' द्वारा दिए गए "ब्रिलिएन्ट आइडियाज़" और उनके चमत्कारिक नेतृत्व ने जीवन के बारे में मेरी और हमारे अन्य साथियों की विचारधारा को पूरी तरह से बदलकर रख दिया था। बस उसी दिन से मैंने अपने दिमाग से इस तरह के "फितूर" को निकाल फेंका और मैं संघ के लक्ष्यों के लिए पूरी तरह समर्पित हो गया"।
---- बालासाहेब देवरस, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीसरे सरसंघ संचालक, (1973 - 1994)
सन्दर्भ -- पृष्ठ संख्या : 137, <https://books.google.co.in/books…>,
मूल उद्वरण -- स्मृति कण : परम पूज्य डॉ हेडगेवार जी के जीवन की विभिन्न घटनाओं का संकलन, सम्पादक : एच वी पिंगले, प्रकाशक : आरएसएस प्रकाशक विभाग, संस्करण : 1962.
तो इस तरह संघ ने 1947 तक भारत के 8 लाख युवाओं को 'बचा' लिया था। नियति ने महात्मा भगत सिंह, महात्मा चन्द्र शेखर आजाद, महात्मा उधम सिंह जी आदि क्रांतिकारियों को हेडगेवार जी से मिलने का अवसर नहीं दिया। वरना वे इन्हें भी बचा लेते !!
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भारतीय त्योहारों की प्रथा में मनाये जाने वाले उत्सव दशहरे पर संघ भी शस्त्रों की सांकेतिक पूजा किया करता था। एक दफा ऐसा हुआ कि पंजाब का एक कारोबारी बहुत ही अच्छी तरह से डिजाइन किये हुए खंजर और तलवारे बेचने के लिए वर्धा आया। एक स्थानीय स्वयंसेवक ने सोचा कि हमें पूजा में कम से कम एक तो असली खंजर तो रखना ही चाहिए। उसने खंजर का दाम पूछा और खरीदने की अनुमति लेने के लिए बड़े ही उत्साह में संघ संचालक के घर पहुंचा। दैवयोग से डॉ हेडगेवार भी वही पर बैठे थे और उनकी उपस्थिति में ही इस विषय पर विचार विमर्श शुरू हो गया। डॉक्टर साहेब ने प्रश्न उठाया - 'जबकि हमारे पास पर्याप्त मात्रा में बेहतर हथियार और युद्ध सामग्री थी आखिर क्यों फिर भी हमारा देश गुलाम हो गया' ? डॉक्टर साहेब ने बोलना जारी रखा और खुद ही जवाब दिया कि, 'आप इस परिस्थिति का किसी भी कोण से आकलन करे, आपको जवाब एक ही मिलेगा कि, हमें हर व्यक्ति के दिल को मातृभूमि के प्रति समर्पण से ओतप्रोत करने की जरूरत है। जब देश इस भावना से सुरभित हो जाएगा तो हमें हथियारों की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी और बिना एक पल भी गवाएं हम विदेशी सत्ता से आजाद हो जाएंगे'। उन्होंने आगे यह भी जोड़ा कि, “जब पांडव अज्ञातवास में थे तो उन्होंने अपने शस्त्रों को शमी वृक्ष में छुपा दिया था। इसीलिए हमें हथियारों की चिंता नहीं करनी चाहिए। हमें एकाग्रचित्त होकर अपने आंदोलन को देश भर में फैलाने और अपने संगठन को मजबूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए"
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संदर्भ : Dr Hedgewar : The Epoch Maker, A biography. page : 46, Publisher : RSS, लिंक -- <http://goo.gl/LA1RSC>
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बताइये !!!
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परम पूज्य हेडगेवार जी ने स्वयंसेवक को यह नहीं बताया कि जंग में निर्णायक बढ़त सिर्फ हथियारों से ही मिलती है। जिस पक्ष के पास जितने बेहतर हथियार होंगे जीतने की सम्भावना भी उतनी ही बढ़ जायेगी। 1857 में सैनिक विद्रोह इसीलिए असफल रहा क्योंकि भारतीय सैनिकों के पास हथियार खत्म हो गए थे। और तब भारत को बन्दुके और कारतूस बनाने नहीं आते थे। मुग़ल भी भारत पर इसीलिए कब्ज़ा कर पाये क्योंकि उनके पास बेहतर तोपखाना था। सिर्फ 80 हजार अंग्रेज 40 करोड़ भारतीयों को इसीलिए गुलाम बनाकर रख पाये क्योंकि जहां अंग्र्जो के पास बन्दुके थी पर भारतीयों के पास तलवारे आदि सामान्य अस्त्र भी नहीं थे।
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1857 की क्रान्ति के बाद अंग्रेज घबरा गए थे और अगले सशस्त्र विद्रोह की सम्भावना को ख़त्म करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने 1860 में आर्म्स एक्ट बनाया और सभी भारतीयों के हथियार खींच लिए। लोग चोरी चुपके फिर से हथियार न जुटा ले इसके लिए वायसराय का काम महादुरात्मा गांधी ने सम्भाल लिया था। वे पूरे देश में घूम घूम कर लोगो को यह समझा रहे थे की 'चाकू, तलवार, बन्दुके आदि रखना अच्छी बात नहीं है'। महादुरात्मा गांधी का मानना था कि हथियार सिर्फ अंग्रेजो को ही रखने चाहिए भारतीयों को नहीं। और अंग्रेजो को तो अवश्य ही रखने चाहिए।
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हेडगेवार भी युवाओं को हथियार न रखने का यह सन्देश अपने तरीके से दे रहे थे। जो कोई भी हेडगेवार जी के पास ब्रिटिश साम्राज्य पर हमला करने की रोजना लेकर आता था वे उसे संघ के महान उद्देश्य को पूरा करने में लगा देते थे !! और यह उद्देश्य था — संगठन को मजबूत बनाना , हिन्दुओ को संगठित करना , हिन्दुओ को एक करना , उनमे एकता लाना , हिन्दुओ को जगाना , उनमे राष्ट्रीय भावना डालना आदि आदि . आप नोट करेंगे कि आज भी आप संघ के सामने कोई भी समस्या रखे वे उसका कारण आज भी यही बताते है कि हिन्दू सोया हुआ है इसीलिए यह समस्या है, और इसका इलाज यह है कि हिन्दुओ को जगा कर उन्हें एक किया जाए !!! इस प्रकार भारतीयों को हथियार विहीन बनाये रखने की नीति पर वायसराय के अलावा महादुरात्मा गांधी और हेडगेवार जी भी काम कर रहे थे। बस उनके तरीके अलग थे . जो नागरिक इन उपदेशों की लपेट में आ गए वे हथियार विहीन रहे और विभाजन के दौरान 20 लाख हिन्दुओ को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। लेकिन सिक्खो और मुस्लिम धर्मावलम्बियों ने 'जागने जगाने और संघठित' होने जैसी बकवास पर ध्यान नहीं देकर खुद को हथियारबंद करने को तवज्जो दी और इसीलिए 1947 के दंगो के दौरान उन्हें अपेक्षाकृत कम जन हानि हुयी।
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ज्ञातव्य है कि सिक्खो ने 'कृपाण दा मोर्चा' आन्दोलन करके अंग्रेजो पर दबाव बनाकर तलवार रखने का अधिकार ले लिया था। बाद में सभी वर्गों के लोगो को इसकी अनुमति दे दी गयी। धार्मिक रीति होने के कारण जो सिक्ख 'सोये' हुए थे मतलब जागे हुए नहीं थे वे भी अपने साथ हथियार रखते थे जबकि उल जलूल सिद्धांतो के चक्कर में आकर 'जागे हुए' हिन्दू भी हथियार विहीन थे या लाठियां लेकर घूम रहे थे।
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इसी कारण से राष्ट्रपिता अहिंसा मूर्ती महात्मा सुभाष चन्द्र बोस ने हेडगेवार जी का संघ में कार्य करने का प्रस्ताव खारिज कर दिया था। वे बात तो टेढ़े तरीके से समझने के आदि नहीं थे। वे इस सीधी बात को समझते थे कि अंग्रेजो के पास हथियार है और भारतीय हथियार विहीन है, इसीलिए इन्हे खदड़ने के लिए हमें अंग्रेजो से ज्यादा सशस्त्र ताकत जुटानी होगी। महात्मा भगत सिंह जी, महात्मा चन्द्रशेखर आजाद, उधम सिंह ही आदि भी इसी बात में मानते थे। लेकिन संघ का शीर्ष नेतृत्व इन्हे न जाने क्यों भटके हुए नौजवान और अंध राष्ट्रवादी कहता था और युवाओं को इन क्रांतिकारियों का अनुसरण न करने के लिए प्रेरित करता था।
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