Posts for 2019-03

Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Mar 01 2019 20:35:57 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

पेम्पलेट छपवाने की प्रक्रिया एवं आवश्यक जानकारी :

ऑफ़ लाइन एक्टिविटी में पेम्पलेट छपवाकर बांटना सबसे अच्छे नतीजे देने वाला कार्य है। जो कार्यकर्ता पेम्पलेट बांटने में सक्षम हो उन्हें अपने क्षेत्र में पेम्पलेट छपवाकर जरुर वितरित करने चाहिए। निचे इस बारे में आवश्यक जानकारी दी गयी है।
.
(1) पेम्पलेट की विषय वस्तु : यदि आप कोई पेम्पलेट बाँटते है तो उसमे अनिवार्य रूप से किसी न किसी क़ानून ड्राफ्ट का विवरण होना चाहिए। क़ानून ड्राफ्ट विहीन पेम्पलेट बाँटना समय, ऊर्जा एवं पैसे की बर्बादी है। अत: कृपया क़ानून ड्राफ्ट विहीन पेम्पलेट बाँट कर अपने संसाधनों को जाया न करे। यदि आप पूरा क़ानून ड्राफ्ट शामिल नहीं कर सकते तो क़ानून ड्राफ्ट की कुंजी शामिल करें। सभी महत्त्वपूर्ण क़ानून ड्राफ्ट्स की कुंजियाँ बना दी गयी है और इनका साइज़ A4 से अधिक नहीं है। अत: यदि आपका पेम्पलेट छोटा है तो भी आप कम से कम एक क़ानून ड्राफ्ट की कुंजी शामिल कर सकते है।
.
पेम्पलेट में अनिवार्य रूप से यह भी इंगित होना चाहिये कि पाठक यदि इस कानून ड्राफ्ट का समर्थन करता है तो उसे क्या कदम उठाने चाहिए। इन कदमो में पोस्टकार्ड भेजना एवं ट्विट करना आदि शामिल है।
.
(2) पेम्पलेट की पृष्ठ संख्या : पृष्ठ संख्या 4 के गुणन में होनी चाहिए। उदाहरण के लिए 4, 8, 12, 16, 20, 24 ....... 32 आदि।
.
(3) पेम्पलेट छपवाने के लिए आपके पास इसका पीडीऍफ़ या डॉक होना चाहिए। इसे आप पहले से बना ले और प्रिंटिंग वाले के पास इसे लेकर जाएँ। निचे 8 पेज एवं 24 पेज के पेम्पलेट के पीडीऍफ़ एवं डॉक का लिंक दिया गया है। इन्हें आप यहाँ से डाउनलोड करके छपवा सकते है।
.
(3.1) 08 पेज का पेम्पलेट

पीडीऍफ़ - <https://www.facebook.com/groups/RtrFiles/permalink/2283861201898400/>;

वर्ड डॉक - <https://www.facebook.com/groups/RtrFiles/permalink/2283861745231679/>;
.
(3.2) 24 पेज का पेम्पलेट

पीडीऍफ़ - <https://www.facebook.com/groups/RtrFiles/permalink/2283860835231770/>;

वर्ड डॉक - <https://www.facebook.com/groups/RtrFiles/permalink/2283857401898780/>;
.
(4) कागज, पेपर साइज, स्टेप्लिंग आदि का चुनाव : हमने चुनाव में जो पेम्पलेट छपवाए है मैं उसका ब्यौरा निचे रख रहा हूँ। आप इसका चयन कर सकते है।
.
(4.1) पेपर क्वालिटी - पेपर क्वालिटी GSM में दर्शायी जाती है। उदाहरण के लिए , 48 GSM, 54 GSM, 58 GSM, 70 GSM आदि। बेहतर है कि आप 54 GSM से ऊपर का ही पेपर काम मे ले। क्योंकि इससे कम GSM के पेपर में स्याही फैलने लगती है, या इसकी व्हाइट नेस कम हो जाती है। जैसे जैसे GSM बढ़ता है पेपर की क्वालिटी इम्प्रूव होती है।
.
हमने विधानसभा चुनाव 2018 में 58 GSM का पेपर काम में लिया था।
.
(4.2) पेपर साइज - पेपर साइज की लम्बाई-चौड़ाई का अनुपात संतुलित होना चाहिए। औसत से ज्यादा लम्बा या चौड़ा पेम्पलेट होने पर इसे बेग या फाइल में रखने में दिक्कत आ सकती है। हमने 9'×11' की पेपर साइज काम में ली थी। आप भी यह साइज या इससे थोड़ा कम ज्यादा साइज इस्तेमाल कर सकते है।
.
(4.3) कटिंग, फिनिशिंग, स्टेपलिंग : पेम्पलेट छपने के बाद प्रिंटर इसकी कटिंग-फिनिशिंग करके देता है, ताकि पेम्पलेट का आकार संतुलित रहे। इसी दौरान स्टेप्लिंग की जाती है।
.
(4.4) स्टेप्लिंग - स्टेप्लिंग दो तरह से होती है। बाहर वाली स्टेप्लिंग का चार्ज कम लगता है और यह जल्दी भी होता है। अन्दर वाली स्टेप्लिंग में लेबर कोस्ट ज्यादा आती है, अत: प्रिंटर इसके लिए थोडा ज्यादा पैसा लेता है। जहाँ तक हो सके अंदर वाली स्टेप्लिंग करवानी चाहिए, क्योंकि अंदर वाली स्टेप्लिंग पेम्पलेट पर ज्यादा लम्बे समय तक टिकी रहती है, और पाठक को इसे पढने में आसानी भी होती है। यदि आपके पास वक्त न हो तो सिर्फ तब ही बाहर वाली स्टेप्लिंग करवाएं।
.
(5) कोटेशन प्राप्त करना : आप दो तीन प्रिंटर के पास जाकर उनसे दिए गए बिन्दुओ पर बातचीत करें और फिर उनसे कोटेशन ले लें। कोटेशन अंदर वाली स्टेप्लिंग एवं बाहर वाली स्टेप्लिंग के प्राप्त कर लें। वक्त न होने से हमने बाहर वाली स्टेप्लिंग ली थी। इसका कोटेशन निम्न है -
.
24 पृष्ठ का पेम्पलेट। कुल संख्या - 1,000 , बाहर वाली स्टेप्लिंग
.
54 GSM - 5,300 / Rs
58 GSM - 6,100
70 GSM - 6,700
.
08 पृष्ठ का पेम्पलेट। कुल संख्या - 1,000 , बाहर वाली स्टेप्लिंग
.
54 GSM - 2,080 / Rs
58 GSM - 2,400
70 GSM - 2,550
.
पेम्पलेट छापने से पहले प्रिंटर को इसकी शीट बनानी होती है। यदि आप ज्यादा पेम्पलेट छपवाते है तो कोस्ट कुछ कम हो जायेगी। क्योंकि प्रिंटर को शीट एक ही बार बनानी होती है। इसके बाद सिर्फ प्रिंटिंग, कागज, कटिंग, स्टेप्लिंग एवं लेबर का ही खर्च होता है।
.
(6) प्रिंटर से रेट वगेरह फायनल करने के बाद आप उसे मेटर दे दीजिये। जो पीडीऍफ़ या डॉक फाइल आप प्रिंटिंग वाले के पास लेकर जायेंगे उसके फोर्मेट में बहुधा प्रिंटिंग प्रेस वाला एडिटिंग नहीं कर पायेगा। क्योंकि प्रिंटिंग वाले कोरल में काम करते है, और उनके फोंट्स वगेरह माइक्रोसोफ्ट ऑफिस से अलग होते है। प्रिंटिंग वाला आपकी फाइल को फिर से अपने फोर्मेट में हूबहू टाइप कर लेगा। अब आप इसमें आवश्यक संशोधन करवा सकते है। उदाहरण के लिए यदि आपको पेम्पलेट में अपना फोन नंबर, पता आदि रखना है, या आप चुनाव लड़ रहे है तो आपको अपना फोटो, चुनाव चिन्ह वगेरह लगाना पड़ेगा, अत: री टाइप होने के बाद आप इसमें वांछित संशोधन करवा सकते है। अमूमन आपको सिर्फ पहले और अंतिम पृष्ठ में एडिटिंग करवानी पड़ेगी। शेष पेज वैसे ही रहेंगे।
.
(7) फर्स्ट प्रूफ चेक करना : जब प्रिंटर पहला प्रूफ निकाले तो इसे आप अनिवार्य रूप से चेक करें। इससे आपको यह आइडिया हो जाएगा कि किस साइज के कैसे फोंट है और इसमें कोई गलती या अनियमितता तो नहीं रह गयी है। इस प्रूफ को ध्यान से पढ़े और सब कुछ ठीक है तो इसे फायनल कर दें। यदि आपने प्रूफ ध्यान से चेक नहीं किया तो इसमें जो गडबड आएगी वह सभी पेम्पलेट में आ जायेगी। इस बात पर ध्यान दें की कम्प्यूटर स्क्रीन पर प्रूफ चेक करने और कागज पर प्रूफ चेक करने में काफी फर्क होता है।
.
(8) जब प्रूफ फायनल हो जाए तो प्रिंटर से कहें कि फायनल पेम्पलेट की सॉफ्ट कोपी का पी डी ऍफ़ आपको मेल कर दें, या इसे पेन ड्राइव में ले लें।
.
------
.
चुनावी प्रत्याशी कृपया ध्यान दें : यदि आप चुनाव लड़ रहे है तो फॉर्म भरने से पहले या फॉर्म भरने के तुरंत बाद यह सब जानकारी जुटा ले और अपना प्रिंटर तय कर लें। क्योंकि चुनाव आयोग वोटिंग से 10-12 दिन पहले ही चिन्ह आवंटित करता है। तो यदि आपकी सारी तैयारी पूरी है तो तो जिस दिन आपको चिन्ह मिलेगा उसी दिन आप जाकर प्रिंटर को अपने चिन्ह की इमेज दे दें। बाकी तयारी पूरी होने के कारण आपके पेम्पलेट अगले दिन ही छप कर तैयार हो जायेंगे और आपको प्रचार करने में ज्यादा वक्त मिलेगा। यदि आपने यह सब पहले से नहीं किया तो चुनाव चिन्ह आवंटित होने के बाद यह सब आपको जल्दबाजी में करना होगा जिससे आपका पैसा भी ज्यादा लगेगा , आपका समय भी बर्बाद होगा और आपसे पेम्पलेट छपवाने में गलतियाँ भी होगी।
.
------

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Mar 01 2019 21:37:30 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

अमेरिका है तो सब कुछ मुमकिन है
.
यह मोदी साहेब और इमरान के अख्तियार में नहीं है कि वे युद्ध के होने या टलने का फैसला कर सके। दोनों ही देश जंग लड़ने के लिए अन्य देशो पर टिके हुए है। जंग होगी या नहीं होगी इसका फैसला अमेरिका-चीन करेंगे। भारत-पाक नहीं।
.
यदि अमेरिका चाहता है कि भारत पाकिस्तान पर हमला करे तो भारत हमला करेगा। यदि भारत इनकार करता है तो अमेरिका कश्मीर में आतंकियों को हथियार भेजकर हर हफ्ते पुलवामा जैसे हमले करवाना शुरू करेगा, और पेड मीडिया को इस तरह का प्रसारण करने को कहेगा कि भारत के लोगो का खून उबलने लगे। नतीजा यह होगा कि भारत के पीएम पर जनता का दबाव बनेगा और उन्हें पाकिस्तान पर हमला बोलना पड़ेगा। यदि पीएम हमला नहीं बोलेगा तो उसकी कुर्सी जाएगी।
.
बड़ी समस्या यह है कि अमेरिका भारत-पाकिस्तान की जंग के बीच में चीन को खींचना चाहता है। अभी ऐसा लगता है कि युद्ध टल गया है,, लेकिन जल्दी ही यह फिर लौट आएगा। इस समय अमेरिका भारत को पाकिस्तान की तरफ धकेल रहा है, और चीन के पीछे हट जाने के कारण पाकिस्तान दबता चला जाएगा। और एक हद तक दबने के बाद चीन और पाकिस्तान को युद्ध में आना पड़ेगा।

यदि युद्ध हुआ और फैलने लगा तो इसका दायरा

पाकिस्तान+चीन+ईरान+उत्तर कोरिया+अफगानिस्तान ( रशिया ) Vs भारत+अमेरिका+फ़्रांस+आस्ट्रेलिया+इस्राएल+साउथ कोरिया+जापान

तक विस्तृत हो सकता है। जंग का मैदान भारत-पाकिस्तान की जमीन होगी। मतलब भारत पाकिस्तान टोटल लोस में रहेंगे। इस युद्ध में अमेरिका को सब तरह से फायदा है और हमें हर लिहाज से नुकसान।
.
तो एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान का रुख इतना नरम क्यों है ?
.
क्योंकि चीन ने पाकिस्तान को हथियारों की मदद देने से मना कर दिया है। यदि जंग शुरू हो जाती है, और चीन या अमेरिका पाकिस्तान को हथियार नही भेजते तो पाकिस्तान हफ्ते दो हफ्ते से ज्यादा युद्ध नहीं खींच पायेगा। दरअसल CPEC का निर्माण पूर्ण होने तक चीन नहीं चाहता कि भारत-पाकिस्तान के बीच जंग हो। और चीन के पीछे हटने के कारण पाकिस्तान खुद ही चित हो गया। यदि चीन पाकिस्तान को युद्ध में जाने के लिए हाँ कर देता है, तो घंटे भर में ही इमरान खान के तेवर बदल जायेंगे।
.
और यदि चीन पाकिस्तान को पूरे पूरे हथियार देना शुरू करता है और अमेरिका हमें हथियार देने से मना कर देता है तो पाकिस्तान वाली दशा भारत की हो जायेगी !! और तब भारत के नेता शांति एवं वार्ता के मोड में आ जायेंगे। यही तथ्य है। हमारे सैनिक साहस एवं बहादुरी का प्रदर्शन कर सकते है किन्तु हथियारों की भरपाई तो हथियार ही करेंगे।
.
इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की भूमिका देखिये -

(1) ट्रम्प ने कहा कि - भारत कुछ बड़ा करने वाला है।

और इसके तीन दिन बाद भारत ने एयर स्ट्राइक की !!

<https://www.ndtv.com/india-news/us-president-donald-trump-says-india-pakistan-standoff-a-very-dangerous-situation-news-agency-afp-1998006>;

(2) पाकिस्तान ने एयर स्ट्राइक की तो ट्रैम्प ने कहा कि - पाकिस्तान उसकी अनुमति* बिना F-16 का प्रयोग न करें !!

<https://economictimes.indiatimes.com/news/defence/pak-cant-use-us-weapons-in-escalating-role-sans-nod-report/videoshow/68186485.cms>;

(3) ट्रम्प ने दिन में कहा कि - भारत-पाक के बीच तनाव के मामले में कुछ अच्छी खबर आने वाली है। हम दोनों पक्षों में समझौता करवा रहे है।

और शाम को पाकिस्तान ने विंग कमांडर अभिमन्यु को बिना किसी शर्त के छोड़ने की घोषणा की !!

<https://www.dnaindia.com/india/report-have-reasonably-decent-news-trump-hopes-india-pak-tension-coming-to-an-end-2724942>;
.
-------
.
(*) लॉकहीड मार्टिन ने F-16 में भर भर के कील स्विच इंस्टॉल किये हुए है, और पाकिस्तान अमेरिका की अनुमति बिना F-16 स्टार्ट भी नहीं कर सकता, इतनी लम्बी उड़ान की बात तो भूल ही जाइए। तो अमेरिका ने पहले पाकिस्तान को F-16 उड़ाने की अनुमति दी और बाद में कहा कि हमसे बिना पूछे आप F-16 का इस्तेमाल न करें !!!
.
-------

तो फिलहाल पिछले 10 दिनों से हम पेड मीडिया द्वारा रचा गया एक हाई वोल्टेज ड्रामा देख रहे है, जो 130+20=150 करोड़ लोगो से यह बात छुपा रहा है कि भारत-पाक के बीच चल रहे इस तनाव का स्टेयरिंग चीन एवं अमेरिका के पास है !! अमेरिका के इशारे पर पेड मीडिया 24*7 घंटे जनता को चाबी दे रहा है ताकि भारत को युद्ध में जाने के लिए तैयार किया जा सके। तो टीवी स्क्रीन पर आप जिन नेताओ को आक्रामक मूड में देख रहे है उनकी आक्रामकता की वजह यह है कि उन्हें अमेरिका की तरफ से हरी झंडी मिल गयी है।
.
और यह खुली हुयी बात है कि इस पूरे मामले में एक बड़ा फेक्टर आगामी लोकसभा चुनाव है। मोदी साहेब का इस पूरे मामले में इतना ही इन्ट्रेस्ट है कि जंग का यह प्रोपेगेंडा उनके लिए वोट बढ़ा रहा है !!! वे जनता में इस तरह का बर्ताव कर रहे है कि ये सब उनका कमाल है !!
.
हमे यह बात समझनी चाहिए कि आयातित हथियार शो पीस होते है, और इनका इस्तेमाल सिर्फ निर्यातक देश की अनुमति से ही किया जा सकता है। और जब युद्ध आता है तो इन हथियारों का इस्तेमाल करने के लिए कीमत चुकानी होती है। यदि आप कीमत नहीं चुकायेंगे तो युद्ध हार जायेंगे।
.
किन्तु नेता और पेड रक्षा विशेषग्य देश के नागरिको को आयातित हथियार दिखाकर यह दिलासा देते रहते है कि हम मुकाबला करने के लिए तैयार है !! पर जब जंग शुरू होती है तो सरकारे अन्दर खाने निर्यातक देशो एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से समझौते करके इसकी कीमत चुकाती है।
.
2003 से पहले तक इराकियों को भी लगता था कि जिस तरह आयातित मोबाईल द्वारा फोन किया जा सकता है, उसी तरह आयातित हथियारो से हम युद्ध का सामना कर सकते है !! और जब उन्हें ये बात समझ आयी तब तक काफी देर हो चुकी थी। कागजी यानी कि संवैधानिक स्वतंत्रता सिर्फ तब तक महसूस होती है जब तक हम जंग में नहीं जाते। और एक बार जैसे ही जंग शुरू हुई कागजो का काम ख़त्म हो जाता है। फिर स्वतंत्रता और संप्रभुता का फैसला हथियार करते है।
.
1965 के हमले के बाद इंदिरा जी ने कई ऐसे प्रोजेक्ट शुरू किये जिससे भारत अपने हथियार स्वयं बनाने में आत्मनिर्भर हो जाए। दुःख का विषय है कि इंदिरा जी द्वारा जूरी सिस्टम गेजेट में न छापने के कारण भारत यह क्षमता जुटाने में नाकाम रहा और सारे प्रोजेक्टों ने वर्षो घिसटने के बावजूद आंशिक सफलता प्राप्त की।
.
और 1991 के बाद से सभी नेता हथियारों के क्षेत्र में हमें अन्य देशो पर निर्भर बनाते चले गए। आज भारत बन्दूको से लेकर, टैंक और लड़ाकू विमान तक लगभग सभी आधुनिक हथियार आयात करता है !! और पाकिस्तान हथियारों के उत्पादन में हमसे भी बदतर हालत में है। सामरिक परमाणु बम और रायफल्स को छोड़ दें तो पाकिस्तान की लगभग पूरी सेना आयातित हथियारों पर चलती है !!
.
समाधान :
.
हमें प्रधानमन्त्री जी से ऐसे कानूनों को गेजेट में छापने की विनती करनी चाहिए जिससे हम भारत में "मेड इन इण्डिया मेड बाय इंडियन्स" नीति के तहत बड़े पैमाने पर आधुनिक हथियारों का उत्पादन कर सके। जूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स आदि कानूनों को लागू करके हम अपनी सेना को आत्मनिर्भर बना सकते है। यदि हम हथियारों के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो जाते है तो हम यह तय कर सकते है कि हमें जंग में जाना है या नहीं। वर्ना चीन को ख़त्म करने के लिए अमेरिका हमें जंग में झोंक देगा !!
.
कुल मिलाकर यदि हमें अपनी स्वतंत्रता बनाये रखनी है तो हथियारों में आत्मनिर्भरता हासिल करनी चाहिए। यदि हम हथियारों का उत्पादन नहीं करते तो युद्ध में झोंक दिए जायेंगे और यदि हम युद्ध टालते है तो इससे भी बड़ी कीमत चुकायेंगे। क्योंकि अमेरिका की गाड़ी रुकने वाली नहीं है।
.
=========

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Mar 03 2019 22:31:21 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सर्जिकल स्ट्राइक 2
.
भारत सरकार का दावा है कि : हमारे विमानों ने बोर्डर क्रोस की और बम गिराए
पाकिस्तान सरकार का कहना है : भारतीय विमानों ने बोर्डर क्रोस की और बम गिराए
.
भारत सरकार का दावा है : हमने जेश ए मोहम्मद के कैम्प पर एयर स्ट्राइक की जिसमें बड़ी संख्या में आतंकी मारे गए

पाकिस्तान सरकार का कहना है : वहां कोई कैम्प नहीं था, और किसी भी व्यक्ति की जान नहीं गयी है !!
.
यदि मोदी साहेब सेटेलाईट तस्वीरे जारी कर दे तो यह साबित हो जाएगा कि बम आतंकी कैम्प पर गिराए गए थे खाली जमीन पर नहीं। और इस तरह पाकिस्तान को एक्सपोज किया जा सकता है !!
.
तो मोदी साहेब इन्हें जारी क्यों नहीं कर रहे है !!
.
----------
.
भारत के मीडिया का वर्जन : भारत के पेड मीडिया को पेमेंट मिलने के बाद उन्होंने इसमें आतंकियों की संख्या अपने मन से जोड़ दी। भारत के पेड मीडिया का वर्जन है कि 350 आतंकी मारे गए। मीडिया की मर्जी है, चाहे जितने जोड़ सकते है। मैं मीडिया के वर्जन में नहीं मानता हूँ, सिर्फ भारत सरकार के वर्जन में ही मानता हूँ।
.
निचे मैंने कुछ नामचीन पेड अंतर्राष्ट्रीय मीडिया समूहों की इस हमले पर प्रतिक्रियाओ के हिन्दी अनुवाद दिए है। साथ ही इनके अंग्रेजी वक्तव्यों का लिंक भी दिया गया है। इन एजेंसियों ने सिर्फ उतना लिखा जितना भारत सरकार ने कहा। वजह साफ़ है , इन्हें आतंकियों की संख्या जोड़ने के लि पेमेंट नही की गयी थी। बहरहाल ये मीडिया समूह चवन्नी अठन्नी में पेमेंट लेते भी नहीं है, और सिर्फ अमेरिका एवं ब्रिटेन के धनिक ही इन्हें मेनुपिलेट कर सकते है।
.
पेड न्यूयार्क टाइम्स - भारतीय एयर स्ट्राइक की प्रभावशीलता एवं लक्ष्य भेदने पर पश्चिमी रक्षा अनुसंधान कर्ताओ ने संदेह व्यक्त किया है !!

आगे वे लिखते है - पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों ने एक बड़े पैमाने के प्रशिक्षण शिविर के अस्तित्व पर सवाल उठाते हुए कहा है कि, पाकिस्तान अब इस तरह के शिविर नहीं चलाता है, और आतंकवादी समूह देश भर में छोटे समूहों में फैले हुए है। भारतीय हवाई हमले के लक्ष्य स्पष्ट नहीं थे, क्योंकि हाल ही में हुए पुलवामा हमले के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बदला लेने की कसम खाई थी, और इस वजह से सीमा पर स्थित आतंकवादी समूहो ने अपनी जगह छोड़ दी थी"
.
पेड गार्जियन - यह अस्पष्ट है, यदि ऑपरेशन को इस तरह की सावधानी से अंजाम दिया गया हो कि भारतीयों के क्रोध को शांत किया जा सके !!

आगे उन्होंने लिखा - यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि क्या भारतीय विमानों द्वारा कुछ महत्वपूर्ण नुकसान पहुँचाया गया था। इस ओपरेशन के लक्ष्य अस्पष्ट थे कि, क्या 14 फरवरी के आत्मघाती विस्फोट से जनित देशव्यापी गुस्से को कम करने के लिए ऑपरेशन को सावधानीपूर्वक संचालित किया गया था।
.
पेड वाशिंगटन पोस्ट - पुलवामा में हमला आम चुनावों से पहले हुआ था, और बताया गया था कि अमेरिका भारत की आत्मरक्षा के अधिकार के संतुलित समर्थन में है !!
.
पेड अल जज़ीरा - इस हमले की उम्मीद की गई थी। लेकिन हर किसी को उम्मीद थी कि यह किसी भी तरह जल्द ही होगा, खासकर अप्रैल में होने वाले आम चुनावों से पहले !!
.
पेड रायटर्स - मारे गए आतंकियों की संख्या के दावों का समर्थन करने के लिए भारत द्वारा फिलहाल कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है !!

लिंक - <https://www.thequint.com/news/india/international-media-on-iaf-air-strikes>;
.
तो हमारे मोदी साहेब ने इस पूरे मामले को इस तरह से संचालित किया है कि, पाकिस्तान समेत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की किरकिरी हुयी है। मतलब हम यह साबित नहीं कर पाए कि हमने आतंकवादी कैम्प पर हमला किया है। और यदि यह सन्देश जाता है कि हमने किसी कैम्प को नहीं बल्कि किसी खाली जमीन को निशाना बनाया तो आतंकियों की संख्या की स्टोरी अपने आप ही उड़ जाती है। लेकिन यदि हम यह साबित कर दें कि वहां पर कैम्प था तो फिर हम कह सकते है कि जो भी आतंकी थे वे मारे गए। लेकिन फिलहाल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह नजर आ रहा है कि भारत के प्रधानमंत्री ने एक ड्रामा रचा है।
.
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को हमें संतुष्ट करने की भले ही जरूरत न हो लेकिन यह बेहद जरुरी है कि हम पाकिस्तान के नागरिको के सामने इमरान खान एवं उनकी सरकार की नीति को एक्सपोज करें। इसके लिए भारत सरकार निम्न कदम उठा सकती है :

(1) भारत ने हमला 26 फरवरी को किया था। तो भारत इस हमले से 2-3 दिन पहले की और उसी जगह की हमले के बाद की सेटेलाईट तस्वीरें प्रकाशित कर सकता है। सेटेलाईट तस्वीरे विश्वसनीय होती है और इन्हें अन्य देशो द्वारा जांचा जा सकता है। इनमे अक्षांश, देशांतर एवं लोकेशन वगेरह सभी होती है। चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, रूस आदि देश इन्हें जांच कर सत्यता की पुष्टि कर सकते है।

ये कुछ प्राइवेट सेटेलाईट द्वारा खिंची गयी तस्वीरे है। इन्हें देखकर आप जान सकते है कि ये कितनी स्पष्ट होती है।

<https://fas.org/category/china/>;
.
चित्र 1: चीन के एक मिलिट्री ट्रेनिंग बेस की सेटेलाईट तस्वीर
चित्र 2 : चीन की SSBN पनडुब्बीयों की ख़ुफ़िया सेटेलाईट तस्वीर
चित्र 3 : रशिया के मिलिट्री बेस की ख़ुफ़िया सेटेलाइट तस्वीर
.
भारत के पास अपने खुद के सेटेलाईट है और यह लोकेशन बोर्डर पर स्थित है। और भारत इनकी रेकी भी कर रहा था और हमला भी करने वाला था। तो जाहिर है सबूत के तौर पर भारत के सेटेलाईट ने कैम्प के चित्र अवश्य निकाले होंगे।

तो भारत सरकार को उस लोकेशन की तस्वीरे सार्वजनिक करनी चाहिए जहाँ के लिए हम दावा कर रहे है कि वहां कैम्प था और हमारे विमानों ने इसे ध्वस्त कर दिया है। और यदि हमने अपने सेटेलाईट से ये तस्वीरें नहीं निकाली है तो हमें अपने सेटेलाईट फिर से अपनी धरती पर बुला लेने चाहिए।
.
क्योंकि यदि ये इतने संवेदनशील क्षेत्र पर नजर नहीं रख रहे है तो ये ऊपर जाया चक्कर लगा रहे है !! यदि भारत के सेटेलाईट ने ये तस्वीरें पहले नहीं निकाली तो इस समय की ताजा तस्वीरें तो भारत दिखा ही सकता है। आखिर हम यहाँ एक ऐसे परिसर की बात कर रहे है जिसमे 350 आतंकी रह नहीं रहे थे, बल्कि ट्रेनिंग ले रहे थे !! मतलब यह परिसर कम से कम 50,000 वर्ग मीटर में फैला हुआ होगा !!

भारत ने अपनी प्रेस रिलीज में कहा है कि यह कैम्प घने जंगलो के बीच एक पहाड़ी पर स्थित था। तो यह स्पष्ट है कि पहाड़ी पर होने के कारण तस्वीरें लेने में भी कोई बाधा नहीं है।
.
(2) हम जासूसों द्वारा ली गयी कैम्प की लोकेशन, तस्वीरें, मृतको के जनाजो की चित्र आदि प्रकाशित कर सकते है।
.
भारत ने अपनी प्रेस रिलीज में यह भी कहा कि हमें बेहद विश्वसनीय सूत्रों से पता चला कि वहां पर आतंकी कैम्प संचालित हो रहे है। और इन सबूतों के आधार पर कार्यवाही की।

तो यदि हमारे पास कैम्प की सेटेलाईट तस्वीरें नहीं थी तो जरुर जासूसों द्वारा इन कैम्पों के चित्र खींचे गए होंगे, या अमुक परिसर में रह रहे लोगो के आतंकी होने को सुनिश्चित किया गया होगा। उनकी तस्वीरे, कैम्प की भौगोलिक स्थिति और इस तरह के कई औडियो, वीडियो, चित्रों आदि के ब्यौरे उन्होंने भारत सरकार को भेजें होंगे।
.
और इन सबूतों के आधार पर कार्यवाही की गयी होगी। अब ऐसा तो नहीं होता है कि किसी ने कहा हो कि यहाँ पर एक आतंकी कैम्प चल रहा है, आकर यहाँ बम गिरा दो। पहले सरकार यह सुनिश्चित करती है कि अमुक परिसर आतंकी कैम्प है, और यह यहाँ स्थित है। क्योंकि जब प्लेन जायेंगे तो उन्हें एक्जेक्ट लोकेशन देनी होती है। प्लेन निचे देखकर बमबारी नहीं करते, बल्कि लोकेशन पर गाइडेड बम गिराते है। गाइडेड बम लेसर डॉट का पीछा करता है और टार्गेट को ध्वस्त कर देता है।
.
सरकार ने यह नहीं कहा कि बालाकोट पर बम गिराए गए है। बल्कि सरकार ने यह कहा है कि हमने एक पहाड़ी पर स्थित कैम्प पर बम गिराए है। और जब हमारी सरकार और विमानों को इस स्पॉट की एक्जेक्ट लोकेशन पता है तो हम इसे सार्वजनिक क्यों नहीं कर रहे है !! अब तो यह इन्फोर्मेशन क्लासिफाईड नहीं है। अत: इसे छिपाने का कोई लाभ नहीं है। बल्कि नुकसान ही है।
.
जब हम कह रहे है कि हमने पाकिस्तान को सबूत दे दिए है, तो अब हम उन सभी सबूतों को सार्वजनिक कर देना चाहिए जो हमने इस कैम्प के बारे में पाकिस्तान को दिए है। जब यह सार्वजनिक हो जायेंगे तो पाकिस्तान की जनता के सामने, पाकिस्तान के विपक्ष के सामने और अंतराष्ट्रीय समुदाय के सामने इमरान खान का सफ़ेद झूठ पकड़ा जाएगा और वे सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा होंगे। फिलहाल यह शर्मिंदगी हमें उठानी पड़ रही है।
.
———-
.
तो मुद्दा यहाँ यह नहीं है कि भारत के नागरिक भारत सरकार से सबूत मांग रहे है। बल्कि मुद्दा यह है कि पाकिस्तान के 20 करोड़ नागरिक और पूरा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भारत के प्रधानमंत्री जी को झूठा एवं ड्रामेबाज समझ रहा है !! भारत का कोई नागरिक यदि सबूत मांगे तो उसे गद्दार कह कह कर निपटाया जा सकता है, किन्तु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हम यह नहीं कह सकते कि हम कोई सबूत नहीं दिखाएंगे, और जो हमने कहा वो ही फायनल है !! इससे हम अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में और भी शर्मिंदा एवं और भी कमजोर नजर आते है !!
.
जब उड़ी में या पुलवामा में हमारे जवान मारे जाते है तो हमले के सबूतों की जरूरत नहीं होती। क्योंकि हमारे जवानो के शव चीख चीख कर कह रहे होते है, कि हम पर हमला हुआ है। पूरे देश में शव यात्राएं निकाली जाती है, उनकी तस्वीरों पर हार चढ़ाए जाते है, सोशल मीडिया पर उनके क्षत विक्षत शव वायरल हो जाते है, और पूरा अन्तराष्ट्रीय समुदाय इन्हें देखता है !!!
.
लेकिन जब हम सर्जिकल एवं एयर स्ट्राइक के रूप में इसका बदला लेते है तो हमारे पास मीडिया के ग्राफिक्स होते है जिन्हें स्टूडियो में बैठकर बनाया जाता है, और होती है एक 6 पंक्तियों की प्रेस रिलीज !!
.
जब अमेरिका अपने टावर गिराने का बदला लेता है, तो ईराक एवं अफगानिस्तान के लाखों लोग टीवी पर आकर चीख रहे होते है कि देखो अमेरिकी फौजे हमारी चमड़ी उधेड़ रही है !!! तब पूरी दुनिया सद्दाम को फांसी पर झूलते देखती है !! और इसीलिए अमेरिका से उलझने से पहले कोई देश हज़ार बार सोचता है। वे जानते है कि बदला किस तरह लिया जाता है।
.
कुल मिलाकर मोदी साहेब को इस हमले के वे सबूत सामने रखने चाहिए, जो उन्होंने पाकिस्तान को भेजे है, एवं वे सेटेलाईट तस्वीरें भी जारी करनी चाहिए जो पूरी अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी के सामने यह साबित करे कि, हाँ हमने उनका एक आतंकी कैम्प नष्ट किया है। और तब हमारा कहा जाएगा कि बदला पूरा हुआ। वर्ना मोदी साहेब इलेक्शन तो जीत जायेंगे लेकिन यह हमें अंतराष्ट्रीय समुदाय में आगे भी शर्मिंदा करता रहेगा।
.
------------
.
सर्जिकल स्ट्राइक 2 पर भारत सरकार द्वारा जारी की गयी प्रेस रिलीज सिर्फ अंग्रेजी में जारी की गयी है। हिन्दी में इसे जारी नहीं किया गया !! ( यदि किसी के पास सरकार द्वारा जारी किया गया हिन्दी वर्जन हो तो कृपया कमेन्ट बॉक्स में रखें )

मैंने इस प्रेस रिलीज का हिन्दी अनुवाद किया है जिसे मैं यहाँ रख रहा हूँ , साथ ही निचे मैंने अधिकृत अंग्रेजी वर्जन एवं इसके फुल टेक्स्ट का लिंक भी दिया है।
.
-----------
.
“आज के शुरुआती घंटों में एक खुफिया अभियान के तहत, भारत ने बालाकोट में JeM के सबसे बड़े प्रशिक्षण शिविर पर हमला किया। इस ऑपरेशन में, बहुत बड़ी संख्या में आतंकवादियों, प्रशिक्षकों, वरिष्ठ कमांडरों और जिहादियों के समूहों को, जिन्हें फिदायीन कार्रवाई के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा था, समाप्त कर दिया गया। बालाकोट में यह शिविर जेएमएम के प्रमुख मसूद अजहर के बहनोई मौलाना यूसुफ अजहर (उर्फ उस्ताद घोरी) के नेतृत्व में संचालित थी।

इसलिए इस गैर-सैन्य पूर्वव्यापी कार्रवाई को विशेष रूप से JeM शिविर में लक्षित किया गया था। हमने लक्ष्य का चयन एवं हमला इस तरह से किया कि किसी सिविलियन को इससे नुकसान न पहुंचे। यह शिविर किसी भी नागरिक उपस्थिति से दूर एक पहाड़ी पर घने जंगल में स्थित है। चूंकि कुछ समय पहले ही कार्यवाही हुई है, इसलिए हमें और विवरणों की प्रतीक्षा है।”
.
in an intelligence led operation in the early hours of today, India struck the biggest training camp of JeM in Balakot. In this operation, a very large number of JeM terrorists, trainers, senior commanders and groups of jihadis who were being trained for fidayeen action were eliminated. This facility at Balakot was headed by Maulana Yousuf Azhar (alias Ustad Ghouri), the brother-in-law of Masood Azhar, chief of JeM.

The Government of India is firmly and resolutely committed to taking all necessary measures to fight the menace of terrorism. Hence this non-military preemptive action was specifically targeted at the JeM camp. The selection of the target was also conditioned by our desire to avoid civilian casualties. The facility is located in thick forest on a hilltop far away from any civilian presence. As the strike has taken place only a short while ago, we are awaiting further details.
.
----------
.
बस यह इतना ही है। सरकार के अधिकृत बयान में पहाड़ी की लोकेशन, अक्षांश, देशांतर आदि नही है !! कैम्प परिसर का आकार भी नहीं है !! मारे गए आतंकियों की संख्या भी नहीं है !! सिर्फ यह कहा गया कि बड़ी संख्या में आतंकी मारे गए। बड़ी संख्या का मतलब कुछ भी लगाया जा सकता है। 10 से लेकर 1000 जितना चाहे बोल सकते है। पहाड़ी बालाकोट के किस और स्थित है, पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण कुछ नहीं !! कोई चित्र नहीं !! कोई सेटेलाईट इमेज नहीं !!
.
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की सूचनाओं को अस्पष्ट एवं अधूरी माना जाता है। न तो इनकी पुष्टि की जा सकती है, और न ही गलत साबित किया जा सकता है। शेष सभी डिटेल जो आप पेड मीडिया में देख रहे है, वह सरकार का वर्जन नहीं है। वह पेड मीडिया का वर्जन है, और पेड मीडिया द्वारा पेमेंट लेकर इस पर पेचवर्क किया गया है। आज सप्ताह भर बाद भी सरकार ने और कोई अतिरिक्त ब्यौरे सामने नहीं रखे है !!
.
पाकिस्तान ने अपनी तरफ से उन जगहों की तस्वीरें जारी की जहाँ पर बम गिरने से गड्ढे हुए है। भारत ने उन तस्वीरों पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी कि पाकिस्तान द्वारा जिस जगह की तस्वीरे जारी की गयी है भारत ने वहीँ पर बम गिराए थे या कहीं और गिराए थे !!
.
————

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Mar 04 2019 10:32:15 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Ashok Jain VotevapsiCm:

पाकिस्तान अमेरिका से डरता हैं भारत से नहीं | WHY ?
.
वायु सेना सर्जिकल स्ट्राइक में कितने आतंकी मारे गए यह महत्वपूर्ण नहीं है |
.
30 हो सकते हैं या 300 हो सकते हैं |
.
मुख्य बात जो मोदी जी व संघ के सेवक ( सोनिया/केजरी के सेवक भी ) छुपा रहे हैं |
.
(1) Mirage फाईटर प्लेन फ्रांस से मंगवाते हैं |

(2) SPICE मिशाईले इज़राइल से आयात करते हैं |

(3) मिशाइल चलाने के लिए हमें अमेरिका से परमिशन लेनी पड़ती है !!
.
अमेरिका भारत का यूज करता है पाकिस्तान को मारने के लिए |
.
इसीलिए पाकिस्तान अमेरिका से डरता हैं भारत से नहीं |
.
समाधान :- अमेरिका जैसा ताकतवर बनने के लिए | राईट टू रिकॉल कानून, ज्यूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स, हथियार बंद नागरिक समाज कानून चाहिए |

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Mar 05 2019 18:30:34 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

X किले का गेट तोड़ने के लिए Y का इस्तेमाल ऊंट की तरह कर रहा है - यह कहावत कैसे चलन में आई ?
.
गुजराती में एक कहावत है : Z के किले का गेट तोड़ने के लिए X ऊंट के रूप में Y का इस्तेमाल करता है। और यही कहावत यहाँ घटित हो रही है जब हम कहते है कि, "अमेरिका ने भारत का किला तोड़ने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल ऊंट की तरह किया, और अब अमेरिका भारत का इस्तेमाल पाकिस्तान एवं चीन को तोड़ने के लिए कर रहा है !!
.
यह कहावत कैसे अस्तित्व में आयी ?
.
सैकड़ों साल पहले, आक्रमणकारी किले के दरवाजे तोड़ने के लिए हाथियों का इस्तेमाल करते थे। हाथी के सिर पर एक कवच लगाया जाता, और हाथी दौड़ता हुआ जाकर अपने सर से दरवाजे पर टक्कर मारता। और दरवाजा टूट जाता था।
.
फिर किले वालो ने दरवाजे पर लोहे के 2 फीट लंबे भाले लगाने शुरू कर दिए। अब यदि हाथी दरवाजे को टक्कर मारता तो भाले हाथी के शरीर में घुस जाते और हाथी मर जाता।
.
फिर आक्रमणकारियों ने नई तरकीब निकाली। उन्होंने हाथी और दरवाजे के बीच ऊंट को रखना शुरू किया। ऊँट को रस्सियों से बांध कर रखा जाता और यह हाथी के साथ चलता था। अब हाथी ऊंट के शरीर को धक्का मारता जिससे भाले ऊंट के शरीर में घुस जाते। हाथी द्वारा लगाया गया बल दरवाजे को तोड़ देता, लेकिन हाथी को कुछ न होता था।
.
फिर किले वालो ने नयी युक्ति लगायी। जब हाथी किले की और आता तो वे एसिड और आग के गोले फेंकना शुरू कर देते। इससे हाथी और महावत आगे नहीं बढ़ पाते थे।
.
फिर आक्रमणकारीयों ने इसका तोड़ निकाला।
.
उन्होंने ऊंट को "प्रशिक्षित" करना शुरू किया। ऊंट को कई दिनों तक भूखा रखकर शराब पिलायी जाती। और फिर एक गत्ते से बने दरवाजे पर हमला करने के लिए उकसाया जाता। जब ऊंट दरवाजे से टकराता तो गत्ते का दरवाजा टूट जाता, और इसके एवज में ऊंट को खाना दिया जाता। चूंकि दरवाजा गत्ते से बना होता था, इसीलिए ऊंट को कोई चोट नही आती थी।
.
ऊंट के साथ बार बार ऐसा किया जाता था ताकि ऊंट को इसका अभ्यास हो जाए। ऊंट को भूखा रखा जाता, शराब पिलायी जाती और जब वह गत्ते का दरवाजा तोड़ देता तो उसे खाना दिया जाता। इस तरह ऊंट के दिमाग में यह बात बैठ जाती थी कि दरवाजे से टकराने से उसे कुछ नहीं होता है, बल्कि खाना मिलता है।
.
और जब युद्ध होता था तो इस प्रकार सधाए गए कई भूखे प्यासे ऊंटों को किले के दरवाजे पर छोड़ दिया जाता था। ऊंट यह सोचकर किले के दरवाजे से जाकर टकराते थे कि उसे कोई चोट नहीं पहुंचेगी। लेकिन युद्ध के दिन दरवाजे से टकराकर ऊंट मर जाता।
.
तो इस तरह आक्रमणकारी किले के दरवाजे तोड़ने के लिए ऊंट का इस्तेमाल करते थे। और इसी कारण से ये कहावत चलन में आई कि - "कैसे किसी दरवाजे को तोड़ने के लिए किसी का इस्तेमाल ऊंट की तरह किया जाता है"।
.
यह कहावत तब लागू होती है जब A, C को चोट पहुँचाने के लिए B का इस्तेमाल करता है। इस प्रक्रिया में B को सब तरफ से मुफ्त में नुकसान होता है किन्तु B अह मानकर किले के दरवाजो पर जाकर सिर्फ दे मारता है क्योंकि उसे यह विश्वास दिला दिया जाता है कि उसे लाभ होगा।
.
----------

इसका एक उदाहरण कारगिल युद्ध है। 1997 में वाजपेयी सरकार ने अमेरिका और रूस की इच्छा के खिलाफ जाकर पोखरण -2 किया। और फिर बीमा एवं मीडिया में भी एफडीआई की अनुमति देने से इनकार किया। कुछ राष्ट्रवादियो द्वारा वाजपेयी पर WTO छोड़ने और भारत से अमेरिकी कंपनियों को हटाने का भी दबाव डाला जा रहा था।
.
तब भारत को सबक सिखाने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को उंचाई पर काम आने वाले हथियारों की मदद देना शुरू किया। अमेरिकियों ने पाकिस्तान से वादा किया था कि, यदि वे कारगिल पर चढ़ायी करते है तो उन्हें अमेरिका काफी मदद देगा। अमेरिका ने भारत के गृह मंत्रालय एवं रक्षा विभाग में भी सेंध लगायी और, उस सेटेलाईट को बंद करवाना सुनिश्चित किया जो कारगिल के इलाके पर सर्विलांस रखता था।
.
कारगिल युद्ध के दौरान भारत लगातार हार रहा था। जीतने का कोई संकेत नजर नहीं था। भारत के 400 से अधिक सैनिक शहीद हो चुके थे और हम 4 लड़ाकू विमान खो चुके थे। और अंत में, वाजपेयी ने अमेरिका की सभी शर्तें मानी - परमाणु परीक्षण कार्यक्रम बंद कर दिया गया, बीमा, बैंकिंग और मीडिया में एफडीआई की अनुमति दी गयी। तब अमेरिका ने पाकिस्तान को आदेश दिया कि वे अपनी सेना कारगिल से हटा लें। लेकिन पाकिस्तान नहीं माना। और तब अमेरिका ने फ्रांस से भारत को लेजर गाइडेड बम देने को कहा। और फिर लेजर गाइडेड बम का इस्तेमाल करते हुए, भारत ने 2-3 सप्ताह के भीतर ही जीत हासिल कर ली !!
.
कुल मिलाकर, अमेरिका ने भारत का किला तोड़ने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल ऊंट की तरह किया था !!
.
और अब अमेरिका चीन एवं पाकिस्तान का किला तोड़ने के लिए भारत को ऊंट की तरह इस्तेमाल कर रहा है।
.
=======

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Mar 05 2019 20:06:38 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

2007 में इस्राएल द्वारा सीरिया के परमाणु प्रोग्राम को धवस्त करने के लिए हमला किया गया था. सीरिया के पास रूस से खरीदा हुआ एक बेहद एडवांस रडार था। लेकिन 2007 में जब 7 इस्राएली विमान परमाणु रिएक्टर पर हमला करने के लिए सीरिया में घुसे तो इस रडार ने काम करना बंद कर दिया, और जब इस्राएली विमान रिएक्टर को तबाह करके चले गए तो यह फिर से काम करने लगा !!
.
इस्राएल ने बड़ी मात्रा में पैसा देकर रडार बनाने वाली कम्पनी से इसका किल कोड खरीद लिया था। और जब उनके प्लेन सीरिया में घुसे तो उन्होंने कोड की सहायता से रडार को जाम कर दिया।
.
भारत के 80% हथियार आयातित है, और इसमें किल स्विच लगे हुए है !!
.
जिस ठिकाने पर इस्राएल ने बम बरसाए थे उसके चित्र भी जारी किये गए थे :

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Mar 05 2019 22:02:16 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सोशल मीडिया के दवाब के कारण, रिटायर्ड मेजर जनरल सईद अता हुसैन अप्रत्यक्ष रूप से ये मान रहे हैं कि सभी जटिल विनाशकारी हथियारों में किल स्विच मौजूद होते हैं। भले ही उन्होंने ये सीधे ना कहा हो कि "भारत के आयातित हथियारों में किल स्विच होता है"
.
उनका ट्वीट है --- "There is always an element of control the originator retains over all lethal military eqpt. Jordan is as much a partner of the US and not a state which is its adversary now.
.
उनके ट्वीट की लिंक--- <https://twitter.com/atahasnain53/status/1101151788374347783>;
.
---
.
अभी तक, मेन इन यूनिफार्म आयातित हथियारों में किल स्विच और खासकर भारत द्वारा आयात किये गए हथियारों में किल स्विच्स की मौजूदगी पर खामोश थे। ऐसा पहली बार हुआ है कि एक सीनियर रिटायर्ड मिलिटरी अफसर ने आयातित हथियारों में किल स्विच की मौजूदगी को सार्वजानिक रूप से स्वीकारा है। भले ही उन्होंने भारत के आयातित हथियारों या फ्रांस से आयत होने वाले रफाल विमानों के विषय में ये साफ़ ना किया हो।
.
ये सब सोशल मीडिया की वजह से है।अभी तक, शीर्ष सेना अधिकारी और शीर्ष राजनेता सभी किल स्विच की मौजूदगी को एक राज रखना चाहते है। लेकिन जैसे जैसे इसके बारे में जानकरी बढ़ रही है सोशल मीडिया के कारण, तो अब ये लोग इसका श्रेय स्वयं लेना चाहते हैं।
.
आज भारत की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारन है -- शीर्ष सेना अधिकारीयों और शीर्ष राजनेताओं का आयातित हथियारों में किल स्विच होने की बात पर क्रूर ख़ामोशी
========

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Mar 05 2019 22:10:16 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

ड्रोन और मिसाइलों के खिलाफ साधारण बंदूकों की शक्ति - अफगानिस्तान युद्ध से सबक :
.
अमेरिका ने लाखों अफगानियों को मार डाला, लेकिन अमेरिका के सिर्फ कुछ हजार सैनिक मरे। तो अनुपात पूरी तरह से अमेरिका के पक्ष में रहा। अमेरिका से अफ़ग़ानिस्तान लड़ पाया क्योंकि चीन ने अफ़ग़ानिस्तान को बंदूकें और एंटी-ड्रोन्स मिसाइल्स सप्लाई की थी।
.
लेकिन बंदूकों का एक बड़ा हिस्सा अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर रहने वाले स्थानिक अफगानियों ने बनाया था। आम तौर पर खैबर-पास कॉपी कही जाने वाली राइफल्स दरअसल AK -47 की कॉपी है, जिसे अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर रहने वाले अनपढ़ अफगानी क्राफ्ट्समैन बनाते है।
.
सदियों से अफ़ग़ानिस्तान में ये रिवाज है कि प्रत्येक अफगान को हथियार धारण करना चाहिए, और 1880 तक लगभग सभी अफगानी युवा बंदूक चलाना सीख चुके थे।
.
और बंदूक का प्रयोग करके ही वे रूस और अमेरिका को देश छोड़ने के लिए विवश कर सके।
.
तो भले ही आज के दौर में ड्रोन्स, मिसाइल्स और लड़ाकू विमानों ने कितनी भी प्रगति कर ली हो, पर आज भी युद्ध में बंदूकों का महत्त्व कम नही हुआ है।
.
तो इसलिए हमारा ये प्रस्ताव कि "प्रत्येक व्यस्क नागरिक को हथियार रखने का अधिकार हो", बहुत ज्यादा राजनैतिक और राष्ट्रीय मूल्य रखता है।
.
========

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Mar 06 2019 14:06:07 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

अमेरिका की पेड रायटर्स ने उस बालकोट स्थित जेश के केम्प की सेटेलाइट इमेज जारी की है । कैम्प की चारों इमारतें एकदम सही सलामत है !!!

रायटर्स का कहना है कि लगता है या तो निशाना चूक गया था, या फिर हमले में कमज़ोर बम गिराए गए !!!

भारत सरकार को अब अपनी सेटेलाइट तस्वीरें जारी करनी चाहिए , ताकि पैड रायटर्स को पूरी दुनिया के सामने एक्सपोज़ किया जा सके
.
=====

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Mar 06 2019 18:54:53 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

आयातित हथियारों में किल स्विच क्या होते हैं, और इसके हमें क्या नुकसान हैं ?
.
जब हम किसी जटिल हथियार का आयात करते है तो निर्माता कम्पनी इसमें कुछ ऐसे बेक डोर रखती है, जिससे वे हथियारों के उपयोग पर अपना नियंत्रण बना कर रख सके। किल स्विच इसी नियंत्रण का एक अंग है।
.
हथियार खरीदते समय आयातक देश को कई प्रकार के लीगल एग्रीमेंट साइन करने पड़ते है। यदि कोई देश इस एग्रीमेंट को तोड़ता है तो निर्यातक देश किल स्विच को एक्टिवेट कर देते है, और हथियार काम करना बंद कर देता है।
.
लड़ाकू विमान, एयरक्राफ्ट कैरियर, मिसाइले, रडार, लेसर गाईडेड बम, हेलिकोप्टर, युद्ध पोत से लेकर पनडुब्बियों तक सभी प्रकार के आधुनिक जटिल हथियारों एवं रक्षा उपकरणों में अनिवार्य रूप से किल स्विच होते है।
.
———
.
इनके उपयोग पर निर्बन्धन लगाने वाले एग्रिमेंट को End Use Monitoring कहा जाता है। सभी प्रकार के आयातित हथियारों को खरीदते समय इस तरह का एग्रीमेंट करना होता है।

उदाहरण के लिए भारत द्वारा अमेरिका से ख़रीदे गए हथियारों पर लागू होने वाले एंड यूज मोनिटरिंग एग्रीमेंट की कुछ शर्तें देखिये :
.
(1) यदि अमेरिका के अधिकारी इन हथियारों का भौतिक अवलोकन करना चाहते है तो भारत इनकार नहीं कर सकता। भारत को अमेरिकी अधिकारियो को विशिष्ट वीजा एवं अनुमति वगेरह देनी होगी, ताकि वे आकर हथियारो का भौतिक सत्यापन कर सकें !!

उदाहरण के लिए अभी जो रफाल लिए जा रहे है, उन्हें लेने के बाद फ़्रांस कभी भी भारत आकर इन्हें देख सकता है। तो हमने जहाँ भी ये विमान तैनात किये हुए है, या तो वहां ले जाकर उन्हें दिखाने पड़ेंगे या सभी रफाल किसी एक जगह पर इकट्ठे करने पड़ेंगे ताकि फ्रेंच अधिकारी इनका भौतिक निरीक्षण कर सकें। इस तरह आयातित विमानों से लैस वायुसेना की हरकत हर समय निर्यातको की नजर में रहती है।
.
(2) यदि भारत इन हथियारों में कोई बदलाव करना चाहता है तो उसके लिए पहले अमेरिका से अनुमति लेनी होती है।

उदाहरण के लिए भारत यदि रफाल विमान के रडार पैनल को बदलना चाहता है, या कोई ऐसा बदलाव करना चाहता है जिससे अमुक विमान से फ्रेंच मिसाइलो के अलावा अन्य मिसाईल भी फायर की जा सके, तो पहले फ्रेंच अधिकारियो से इसकी अनुमति लेनी होती है। जाहिर है, वे इस तरह की अनुमति नही देंगे।
.
(3) हथियारों का मेन्टेनेंस सिर्फ अमेरिकी कम्पनी ही करेगी, और स्पेयर पार्ट्स भी निर्यातक कम्पनी से ही लेने होते है।
भारत जब तक रफाल इस्तेमाल करेगा तब तक फ्रेंच कम्पनी ही इसका मैन्टेनेंस करेगी। किसी अन्य कम्पनी से या खुद से न तो इसका मेन्टेनेंस कर सकते है और न ही इसके स्पेयर पार्ट्स बदल सकते है। और इसके लिए हमें हमेशा डॉलर चुकाने होंगे !!
.
(4) इनका कब कहाँ इस्तेमाल कर सकते है, उसके बारे में भी पहले अनुमति लेनी होती है।

उदाहरण के लिए अभी पाकिस्तान के पास F-16 है, तो पाकिस्तान यदि भारत पर स्ट्राइक करना चाहता है तो उसे पहले अमेरिका से पूछना पड़ता है। यदि वह भारत पर चाइनीज एयरक्राफ्ट यूज करना चाहता है तो उसे चीन से पूछना पड़ेगा।
.
लिंक - <https://goo.gl/gZTvBM>;
.
इसके अलावा अन्य शर्तें एग्रीमेंट के सैंकड़ो पृष्ठों में फैली हुयी है, और सरकारें बहुधा इन पर क्लासिफाइड का लेबल चिपका कर सार्वजनिक करने से मना कर देती है। पर इससे आप यह अंदाजा लगा सकते है कि आयातक हथियारों के उपयोग पर निर्यातक देश का कितना कठोर नियंत्रण होता है।

ये कुछ कानूनी टर्म्स है।
.
किन्तु प्रश्न है कि यदि कोई देश हथियार खरीदने के बाद इन शर्तों का पालन न करे तो निर्यातक देश क्या क्या उखाड़ लेगा ?
.
इसके लिए वे दो तरह के तरीके इस्तेमाल करते है :

• स्पेयर पार्ट्स
• किल स्विच
.
(1) स्पेयर पार्ट्स : लड़ाकू विमान जैसे हथियारों को इस तरह से डिजाईन किया जाता है कि प्रत्येक कुछ हजार घंटो की उड़ान के बाद कुछ विशिष्ट स्पेयर पार्ट्स को बदलने की जरूरत होती है। और निर्माता कम्पनी इन पार्ट्स की सप्लाई सीमित मात्रा में देती है।
.
यूँ समझिये कि जिस तरह कार में 5 हज़ार किलोमीटर के बाद इंजन ऑयल चेंज होता है, उसी तरह प्लेन में भी कई तरह के रेगुलर मेन्टेनेंस होते है। तो निर्यातक कम्पनी 1000–2000 उड़ान घंटो के ही स्पेयर पार्ट्स देती है, ताकि कम्पनी को यह जानकारी रहे कि विमान कब कितना उड़ रहा है !!
.
उदाहरण के लिए, मान लीजिये कि भारत फ्रेंच सरकार से कहता है कि हमें इतने अमुक स्पेयर पार्ट की जरूरत है, तो फ्रेंच कहेंगे कि अभी पिछले महीने तो आपको इसके दो डब्बे भेजे है। और महीने में जितना प्लेन आप उड़ाते हो उस हिसाब से अभी 1 महीने आपका काम और चल जायेगा। तो भारत कहेगा कि नहीं अभी हमें युद्धाभ्यास करना है, उसके लिए हमें अतिरिक्त उड़ाने भरनी होगी। तो फ्रेंच यह सुनिश्चित करेंगे कि अमुक स्पेयर पार्ट्स युद्धाभ्यास के लिए ही माँगा जा रहा है, या भारत ने रफाल का इस्तेमाल बोर्डर पर गश्त करने के लिए करना शुरू कर दिया है। और जब फ्रेंच संतुष्ट हो जायेंगे तो हमें स्पेयर पार्ट्स भेज देंगे।
.
यह पढने सुनने में अजीब लगता है, लेकिन इस बात पर ध्यान दें कि हम यहाँ किसी मोपेड की नही बल्कि फाइटर प्लेन की बात कर रहे है। दुनिया में सिर्फ 6 देशो को ही यह चमत्कार बनाना आता है। तो जब वे इस तरह का शक्तिशाली हथियार बेचते है तो हर कोण से यह सुनिश्चित करते है कि हथियार पर हमारा 100% नियंत्रण रहे।
.
(2) किल स्विच : कभी कभी किसी देश को हथियार का उपयोग करने से तत्काल रोकना होता है, और हो सकता है, अपनी राजनैतिक मजबूरी के कारण नेता निर्यातक देश की शर्तें मानने से इनकार कर दे।
.
उदाहरण के लिए अभी भारत ने पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक की तो पाक ने पूर्व घोषणा कर दी थी कि वह भारत को जवाब देगा। और यदि अमेरिका नहीं चाहता कि पाक F-16 का इस्तेमाल करे , तो अमेरिका पाकिस्तान के F-16 का किल स्विच एक्टिवेट कर देगा। और इसके एक्टिवेट होने के बाद प्लेन स्टार्ट ही नहीं होगा, या उसका एक पंखा घूमेगा दूसरा नही घूमेगा, या उसका रडार काम करना बंद कर देगा आदि आदि !!
.
और इस मदद के एवज में अमेरिका भारत से अपनी कोई शर्त मनवा लेगा। जैसे अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनी भारत से SBI बैंक के कुछ हिस्से खरीद लेगी, या अमेरिका भारत से कहेगा कि आप अपनी सेना के लिए जो 6 लाख राइफल खरीदने वाले हो वो हमसे खरीदो, या फिर वे जीएसटी जैसा कोई क़ानून डालने को कहेंगे। या किसी ट्रेन ट्रेक का सौदा वगेरह !!
.
तो जब किसी हथियार पर आकस्मिक बलात नियंत्रण हासिल करना होता है तो किल स्विच इस्तेमाल किये जाते है।
.
2.1. किसी उपकरण में किल स्विच कहाँ होते है ?
.
किसी भी इलेक्ट्रोनिक उपकरण में चिप्स एवं पीसीबी होते है, और ये चिप्स ही उपकरण का दिमाग है। कोई भी इलेक्ट्रोनिक उपकरण कैसे फंक्शन करेगा, इस फंक्शन का प्रोग्राम कॉड इन चिप्स में होता है। टीवी, मोबाईल, कैमरे, कम्प्यूटर से लेकर आप जितनी भी चीजे इस्तेमाल कर रहे है, उनमे चिप्स है। किसी फाइटर प्लेन या पनडुब्बी में उनके अलग अलग फंक्शन को कंट्रोल करने के लिए 5,000 या उससे भी ज्यादा तक सेमी कंडक्टर चिप्स और माइक्रो प्रोसेसर्स हो सकते है।
.
जब इनमे प्रोग्राम कॉड डाला जाता है, तो प्रोग्राम में एक अतिरिक्त कोड जोड़ दिया जाता है। मान लीजिये इसमें यह कमांड डाली गयी है कि चिप को यदि यह सन्देश मिले तो चिप खुद को स्विच ऑफ़ कर देगी, या पूरे सर्किट को उड़ा देगी। अब यदि प्लेन को रेडियो फ्रीक्वेंसी से कमांड भेजी जाए तो उसमे पहले से मौजूद प्रोग्राम कमांड का पालन करेगा और सिस्टम को बंद कर देगा। इस कोड के बारे में सिर्फ निर्माता को ही पता रहता है।
.
उदाहरण के लिए जब आपका फोन खो जाता है और आप कम्पनी को रिक्वेस्ट भेजते है तो कम्पनी उसे कमांड भेजती है और फोन लॉक या स्विच ऑफ हो जाता है। तो कम्पनी ऐसा इसीलिए कर पाती है क्योंकि कम्पनी ने उसमे इस तरह कि कमांड का कॉड डालकर रखा हुआ है। किन्तु फोन कम्पनी ने यह कॉड आपको नहीं दिया हुआ है। इसीलिए इस फंक्शन को वे ही कंट्रोल कर सकते है, आप नहीं कर सकते। और जब कम्पनी इस कमांड का इस्तेमाल करके आपका फोन बंद करेगी तो इसे आप तब तक स्विच ऑन नहीं कर पायेंगे जब तक कम्पनी इसकी अनुमति न दें।
.
अब ध्यान देने वाली बात यह है कि , इस तरह की कमांड देने के लिए इंटरनेट की जरूरत नहीं होती है। जिस तरह टीवी रिमोट काम करता है उसी तरीके से रेडियो फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल करके बिना किसी इंटरनेट के इन्हें कमांड दी जा सकती है। सभी हथियारों में फंक्शन के लिए सोफ्टवेयर एवं संचार के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल होता है।
.
इसके अलावा किल स्विच सोफ्टवेयर के अतिरिक्त हार्ड वेयर ट्रोजन के रूप में भी हो सकता है।
.
2.2. क्या किल स्विच को ट्रेस किया जा सकता है ?
.
यदि ट्रोजन हार्ड वेयर के रूप में है तो जिसने यह ट्रोजन रखा है वह भी अब इसे नहीं पकड सकता। सोफ्टवेयर या प्रोग्राम कॉड के रूप में होने पर सिर्फ उस व्यक्ति को पता रहता है, जिसने यह ट्रोजन चिप या पीसीबी में रखा है। हार्डवेयर ट्रोजन सेमी कंडक्टर चिप बनाते हुए ही रख दिए जाते है। और एक बार रखने के बाद यह पता लगाना मुमकिन नहीं है कि इसमें कोई ट्रोजन है, और अगर है तो किस तरह का ट्रोजन है। इसे रिवर्स इंजीनियरिंग द्वारा भी नहीं पकड़ा जा सकता।
.
2.3. किल स्विच पर निर्यातक देश का लीगल स्टेंड क्या है ?
.
जब कोई कम्पनी लड़ाकू विमान या ऐसा ही को जटिल हथियार बेचती है तो एग्रीमेंट में यह दर्ज करती है कि,
यदि इस हथियार में कोई किल स्विच या बेक डोर है तो हम इसकी कोई गारंटी नही लेते। किन्तु हमने अपने पूरे प्रयासों द्वारा यह सुनिश्चित किया है कि इसमें इस तरह का कोई किल स्विच नहीं है।
.
और वजह इसकी यह है कि लड़ाकू विमान जैसी मशीन में सैंकड़ो कम्पनियों के पुर्जे लगे रहते है। कंट्रोल पेनल किसी कम्पनी का होता है, कूलिंग सिस्टम किसी कम्पनी का होता है, आदि। तो निर्यातक कम्पनियां इंजन और कंट्रोल पैनल जैसे जटिल पार्ट्स खुद बनाती है और इनमे किल स्विच या बैक डोर रख देती है। और फिर बोल देती है कि हमें न पता यदि किसी ने ट्रोजन रखा है !!
.
2.4. किल स्विच एवं End Use Monitoring से सम्बंधित कुछ घटनाएं जो सार्वजनिक हो गयी :
.
(A) हाल ही मैं अमेरिकी प्रशासन ने पाकिस्तान को सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी थी कि वे अमेरिका से पूछे बिना भारत पर F-16 का इस्तेमाल कर करे। हालांकि यह खुली हुयी बात है कि, अमेरिका ने पहले पाकिस्तान को भारत पर F-16 से हमला करने की अनुमति दी और जब F-16 गिरा दिया गया और बात खुल गयी तो बाद में भारत की जनता को मामू बनाने के लिए सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया, कि पाकिस्तान ने हमसे बिना पूछे F-16 उड़ाया।

<https://goo.gl/Hsfg1t>;
.
(B) सीरिया के पास रूस से खरीदा हुआ एक बेहद एडवांस रडार था। लेकिन 2007 में जब 7 इस्राएली विमान परमाणु रिएक्टर पर हमला करने के लिए सीरिया में घुसे तो इस रडार ने काम करना बंद कर दिया, और जब इस्राएली विमान रिएक्टर को तबाह करके चले गए तो यह फिर से काम करने लगा !!
हथियार निर्माता कम्पनियो ने भी स्वीकार किया कि सेमी कंडक्टर चिप्स एवं माइक्रोप्रोसेसर में यदि ट्रोजन है तो इससे रडार को जाम किया जा सकता है। माना जाता है कि इस्राएल ने बड़ी मात्रा में पैसा देकर रडार बनाने वाली कम्पनी से इसका किल कोड खरीद लिया था। और जब उनके प्लेन सीरिया में घुसे तो उन्होंने कोड की सहायता से रडार को जाम कर दिया।

<https://en.wikipedia.org/wiki/Operation_Outside_the_Box>;
.
(C) अमेरिकी-फ्रांसीसी हथियार बनाने वाली कम्पनीयों का कहना है कि, वे अपने माइक्रो प्रोसेसर्स में किल स्विच एवं बेक डोर रखते है ताकि इसे दूर से एक्सेस किया जा सके। अपने पक्ष में उनका तर्क है कि यह एक सुरक्षा चक्र है, ताकि यदि भविष्य में ये हथियार किसी शत्रु के हाथों में आ जाए, तो हम सर्किट को निष्क्रिय करके हथियार को बेकार कर सके।

<https://goo.gl/djFJ3E>;
.
(D) बोईंग अपने विमानों को हवा में ही अपडेट कर सकता है, और उन्होंने अपने विमानों में ऐसे बेक डोर रखे है। पिछले वर्ष इस बेक डोर का मालूम होने पर रेडियो फ्रीक्वेंसी द्वारा प्लेन को हैक किया गया था। हमारे प्रधानमन्त्री जी बोईंग में ही उड़ते है, और इस विशेष विमान में विशेष तौर पर ट्रोजन रखे गए है। यदि ट्रोजन एक्टिवेट कर दिया जाए तो इंजन बंद हो जायेगा और पेड मीडिया में खबर आएगी कि किसी तकनिकी खराबी की वजह से प्लेन क्रेश हो गया है !! तो जब तक हमारे पीएम हवा में रहते है वह बोईंग के हवाले रहते है !!

<https://goo.gl/wUCtws>;
.
(E) 2010 में ईरान के न्यूक्लियर रिएक्टर का सेंट्रीफ्यूज अचानक 10 गुना रफ़्तार से घूमने लगा और जल कर ख़ाक हो गया। ईरान के इस सिस्टम में सीमेन्स ने एक बेक डोर रखा था। अंतराष्ट्रीय न्यूज एजेंसियों एवं रिसर्चरों द्वारा यह माना जाता है कि अमेरिका एवं इस्राएल ने संयुक्त रूप से एक ऑपरेशन चलाया और इस बेकडोर से स्टक्सनेट ( Stuxnet ) वॉयरस भेज कर ईरान के न्यूक्लियर सेंट्रीफ्यूज को तबाह कर दिया।

<https://goo.gl/g8cfnb>;
.
(F) इण्डिया टुडे ने 2016 के एक अंक में यह खबर प्रकाशित की थी कि कारगिल युद्ध के दौरान हमारी मिसाइलो के टाइमर्स ने अचानक काम करना बंद कर दिया था। भारत की इन मिसाइलो में कट्रोल पेनल एवं टाइमर्स रूस द्वारा दिए गए थे। टाइमर्स बेकार हो जाने के कारण हम अपनी मिसाइले फायर नहीं कर सकते थे। इसीलिए हमें अपने सैनिको को पर्वत पर चढ़कर छोटी फ़तेह करने के निर्देश देने पड़े।
.
(G) अर्जेंटीना ने फ़्रांस ने एक्सोसेट ( exocet ) नामक बेहद आधुनिक मिसाइले खरीदी थी। अर्जेंटिना और ब्रिटेन के बीच 1984 में जब फाकलेंड युद्ध शुरू हुआ तो अर्जेंटिना के पास 6 एक्सोसेट मिसाइले थी। अर्जेंटीना ने एक्सोसेट मिसाइले छोड़कर ब्रिटेन के दो युद्ध पोत डुबो दिए थे। बाद में अमेरिका एवं ब्रिटेन के सभी अखबारों ने यह खबर प्रकाशित की, कि थेचर ने फ़्रांस के राष्ट्रपति से कहा था कि वे उन्हें एक्सोसेट मिसाईल के किल कोड उपलब्ध कराएं , ताकि अर्जेंटीना की मिसाइलो को निष्क्रिय किया जा सके।

किल कोड दिए गए थे या नहीं ये बात कभी सामने नहीं आयी , किन्तु थेचर ने इनका इस्तेमाल नहीं किया था। थेचर ने तब फ़्रांस को इस बात पर भी राजी कर लिया था कि वे अब अर्जेंटीना को एक्सोसेट मिसाइले नहीं बेचेंगे। और फ़्रांस ने तब युद्ध के दौरान अर्जेंटीना को एक भी एक्सोसेट मिसाईल नहीं भेजी।

<https://goo.gl/m1FVLa>;
.
(H) लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन द्वारा सप्ताह भर पहले किया गया ट्विट। आर्मी अफसर अनुमान इस तरह की सूचनाएं नहीं देते। क्योंकि इससे उनके प्रमोशन में रोड़े आ जाते है। और भी कई वजहें है। किन्तु जैसे जैसे सोशल मीडिया के माध्यम से यह जानकारी फैल रही है, वैसे वैसे उन लोगो पर इस विषय पर बोलने का दबाव बन रहा है।

<https://goo.gl/igFT6q>;

"There is alwags an element of control the originator retains over all lethal military eqpt. Jordan is as much a partner of the US and not a state which is its adversary now"
.
इन विवरणों से आप किल स्विच के बारे में जानकारी कर सकते है। अधिक जानकारी के लिए कृपया गूगल करें। आम तौर पर इस तरह की ख़बरें बाहर नहीं आती है, और सब कुछ जनता से सीक्रेट रखा जाता है। कभी कभी कुछ खबरें छन कर सार्वजनिक हो जाती है। किन्तु यह ख़बरें ऐसी नहीं है कि, कोई सरकार सामने आकर कहे कि हमारे पास जो हथियार है उसके बटन विदेशियों के पास है, और उनकी अनुमति बिना हम इन्हें हिला भी नहीं सकते !! यदि ऐसा हुआ तो नेताजी की इज्जत एकदम से उतर जायेगी और वे देश के सामने दहाड़ कर वोट इकट्ठे नहीं कर पाएंगे।
.
भारत के कितने हथियार आयातित है ?
.
भारत अपने 80% हथियार आयात करता है। लड़ाकू विमान से लेकर टैंक, सर्विलांस सिस्टम, रडार और पनडुब्बी से लेकर एयर क्राफ्ट कैरियर तक। और जो कुछ हथियार भारत खुद से बनाता है उनके सभी जटिल पुर्जे भी आयात करता है। उदाहरण के लिए तेजस एवं अर्जुन को स्वदेशी कहा जाता है किन्तु इंजन समेत इनके 40% महत्तवपूर्ण पुर्जे आयातित है। इन सभी जटिल पुरजो में किल स्विच होते है।
.
तो एयर स्ट्राइक की असली कहानी क्या है ?
.
भारत और पाकिस्तान दोनों ही देश विदेशियों के हथियारों पर अपनी सेना चलाते है। यदि भारत को पाकिस्तान पर स्ट्राइक करनी हो तो भी अमेरिका को पूछना होता है, और यदि पाकिस्तान भारत पर स्ट्राइक करना चाहता है तो उसे भी चीन एवं अमेरिका से अनुमति लेनी होती है। दोनों की सेनाओं के बटन अमेरिका एवं चीन के पास है। तो आप समझ सकते है कि मोदी साहेब इतने जोश में क्यों नजर आ रहे है !!

आज भारत के 95% नागरिक इस डरावने तथ्य से अनभिग्य है, और वे मानते है कि पाकिस्तान पर हमला करने का फैसला भारत खुद लेता है !!

और यह सब इसीलिए लिखना पड़ता है क्योंकि जब तक भारत के नागरिको तक यह जानकारी नहीं पहुंचेगी तब तक वे पेड मीडिया द्वारा चटायी जा रही अफीम में गाफिल बने रहेंगे, और अपने पीएम से सेना को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आवश्यक कानूनों की मांग नहीं करेंगे। तो यह समस्या इसीलिए है क्योंकि भारत के ज्यादातर नागरिको को यह पता ही नहीं है कि समस्या क्या है !!
.
तो यदि पेड रविश कुमार यदि मोदी साहेब के विरोधी है तो वे यह क्यों नहीं कहते कि :

भारत ने जिस लेसर गाइडेड बम का इस्तेमाल किया उस बम का इस्तेमाल करने की अनुमति हमें इस्राएल+अमेरिका से लेनी पड़ी थी, और इस वजह से हमने इतने दिनों बाद स्ट्राइक की !! पेड रविश कुमार यह क्यों नहीं बताते कि इन बमों को जिन विमानों पर माउंट किया गया था वे विमान फ़्रांस के थे और हमें इसके लिए फ़्रांस से अनुमति लेनी पड़ी थी !! और यदि ये देश हमें अनुमति न देते तो हम यह स्ट्राइक न कर सकते थे !!
.
और यदि मुख्य धारा की सभी राजनैतिक पार्टियों के मास्टर एक ही नहीं है तो जो पार्टिया रफाल के मामले में इसकी कीमत जैसा चिल्लर मुद्दा उठा रही है वे, क्यों नहीं प्रेस कोंफ्रेंस करके कहते कि रफाल में सबसे बड़ा घोटाला यह है कि इसमें भर भर के किल स्विच लगे हुए है, और एंड यूज मोनिटरिंग एग्रीमेंट के कारण हम फ़्रांस को पूछे बिना ये प्लेन हिला भी नहीं पायेंगे !!
.
और भारत की सेना में अपने प्लेन इंस्टाल करने के लिए फ्रांस भारत को यह प्लेन मुफ्त में भी दे सकता है !! क्योंकि जब हमें इन प्लेन्स की जरूरत होगी तो फ़्रांस हमसे 10 गुना कीमत वसूल लेगा, या वह मोती कीमत में इसके किल कोड चीन को बेच देगा !! बहरहाल, जब हाथी ही बेच दिया तो अब अंकुश का क्या झगड़ा !!
.
समाधान ?
.
यदि राईट टू रिकॉल पीएम का क़ानून गेजेट में छाप दिया जाता है, तो हम आम नागरिक पीएम को वेल्थ टेक्स, जूरी सिस्टम और Woic क़ानून गेजेट में छापने के लिए बाध्य कर सकते है। इन कानूनों के गेजेट में आने से 5-6 वर्ष में भारत अपने स्वदेशी फाइटर प्लेन बनाने की क्षमता जुटा लेगा। इन प्रस्तावित कानूनों के ड्राफ्ट देखने के लिए यह लिंक देखें - <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
.
और भारत के कार्यकर्ताओ को यह बात नोट कर लेनी चाहिए कि सोनिया-मोदी-केजरीवाल और इनके सभी अंध भगत इन सभी कानूनों का विरोध कर रहे है। उनका कहना है कि या तो हमें हथियार आयात करने चाहिए या फिर अमेरिकी कम्पनियों को भारत बुलाकर हथियारों की फैक्ट्रियाँ लगाने को कहना चाहिए। तो यदि आप भारत को हथियारों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना चाहते है, तो सोनिया-मोदी-केजरीवाल विकल्प नहीं है।
.
========

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Mar 08 2019 20:48:59 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

#ReleaseSatelliteImagesAirStrike
.
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय वायु सेना की प्रतिष्ठा बचाने के लिए कृपया इस अर्जी को वोट करें - Newindia.in/Causes/ReleaseSatelliteImagesAirStrike
.
प्रधानमंत्री जी को यह ट्विट भी करें - @pmoindia , रायटर्स को एक्सपोज करने और वायुसेना की प्रतिष्ठा बचाने के लिए जैश के ध्वस्त कैम्प की सेटेलाईट तस्वीरें जारी करें , Newindia.in/Causes/ReleaseSatelliteImagesAirStrike , #ReleaseSatelliteImagesAirStrike
.
------
.
माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी साहेब , विदेशी समाचार एजेंसी रायटर्स ने सेटेलाईट इमेज जारी करके यह दावा किया है कि भारतीय वायु सेना द्वारा बालाकोट में जैश-ए-मुहम्मद के जिस कैम्प पर बम गिराए गए थे, वह कैम्प पूरी तरह से सुरक्षित है और उसे कोई नुकसान नहीं हुआ है। रायटर्स अमेरिका का काफी बड़ा अंतराष्ट्रीय मीडिया हाउस है और इस तरह की रिपोर्टिंग से अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारतीय वायु सेना का पराक्रम धूमिल हो रहा है।
.
आपसे आग्रह है कि भारतीय वायु सेना की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए निम्नलिखित में से कोई एक या सभी कदम उठाये :
(1) एक प्रेस रिलीज जारी करें जिसमे यह लिखा हो कि, रायटर्स द्वारा जारी की गयी तस्वीरें उस कैम्प की नहीं है, जिस पर वायु सेना ने बम गिराए थे।
.
(2) और यदि हमारी वायु सेना ने इसी कैम्प को नष्ट किया है तो इस आशय की प्रेस रिलीज जारी करें कि रायटर्स समूह ने जो सेटेलाईट तस्वीरे जारी की है वे फर्जी है। और हमने इस कैम्प को नष्ट कर दिया है।
.
(3) कृपया भारत सरकार की और से अमुक कैम्प की स्ट्राइक के पहले एवं बाद की तस्वीरें जारी करें जिससे यह स्पष्ट हो कि, वायु सेना को "सही लक्ष्य" दिया गया था और उन्होंने इसे ध्वस्त कर दिया है।
.
(4) कृपया इस आशय की प्रेस रिलीज भी जारी करे कि भारतीय पेड मीडिया आतंकीयों की संख्या अपनी मर्जी से न जोड़े। हो सकता है कि वायु सेना के हमले में 1000 आतंकी मारे गए हो, किन्तु मीडिया जानबूझकर संख्या कम दिखा रहा हो !! अत: कृपया मीडिया से कहे कि वे वायु सेना के ओपरेशन में मनगड़ंत तथ्य न जोड़े।
.
(5) कृपया इस आशय की प्रेस रिलीज भी जारी करे कि पाकिस्तान की सरकार द्वारा जिस खाली मैदान की तस्वीरें जारी की गयी है, वे तस्वीरें भी फर्जी है। इससे पाकिस्तान के की सरकार वहां की जनता के सामने एक्सपोज होगी और हमारी इस बात में वजन आएगा कि पाकिस्तान की सरकार झूठी है।
.
(6) यदि आप सेटेलाईट इमेजेस जारी नहीं करना चाहते तो कृपया उस कैम्प की अक्षांश , देशांतर, बालकोट से दूरी, दिशा निर्दिष्ट करने वाली भौतिक लोकेशन सार्वजनिक करें, जिस पर वायुसेना द्वारा बम गिराए गए थे। अब यह लोकेशन क्लासिफाईड श्रेणी की नहीं है, क्योंकि इस लक्ष्य को ध्वस्त किया जा चुका है। इस लोकेशन के सामने आने से यह सिद्ध किया जा सकेगा कि रायटर्स एवं पाकिस्तान द्वारा जारी तस्वीरें अलग लोकेशन की है और इसीलिए फर्जी है।
.
प्रधानमंत्री जी, कृपया उपरोक्त में से कोई 1 या 2 या सभी कदम उठाये, ताकि अंतराष्ट्रीय स्तर पर हमारी वायुसेना की छवि धूमिल न हो। उल्लेखनीय है कि रायटर्स के अलावा न्यूयार्क टाइम्स, गार्जियन, वाशिंगटन पोस्ट आदि समाचार पत्रों ने भी भारत के दावे को झुठला दिया है, और इस आशय की ख़बरें प्रकाशित की है कि भारत द्वारा किये गए हमले में कैम्प को कोई नुकसान नहीं हुआ और चुनावों में फायदा लेने के लिए जान बूझकर खाली मैदान पर बम गिराए गए !!

ऐसे में आपकी रहस्यमयी ख़ामोशी के कारण भारत का पक्ष कमजोर हो रहा है। और सबसे बदतर यह कि कई लोगो को यह कहने का अवसर मिल रहा है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है, और इस वजह से भारत के प्रधानमंत्री खामोश बने हुए है।
.
-------
.
रायटर्स द्वारा जारी की गयी बालाकोट में स्थित जैश के कैम्प की सेटेलाईट तस्वीरों का लिंक - <https://goo.gl/B8cD7B>;
.
-------

Read full post →



Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Mar 10 2019 06:25:22 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

संघ नेता वाजपेयी द्वारा बनाये और सोनिया-मोदी-केजरीवाल और कांग्रेस-संघ-आप कार्यकर्ताओं द्वारा समर्थित कानून के कारण जम्मू बस स्टैंड पर ग्रेनेड फेकने वाले को अधिकतम 3 वर्ष तक की सजा होगी।
.
वह व्यक्ति जिसने मार्च -2019 में जम्मू में ग्रेनेड फेंका था जिसमे कई घायल हुए और कुछ की मौत हो गयी थी, केवल 15 वर्ष, 11 महीने और 20 दिन का है, तो वह अभी तक 16 वर्ष का नहीं है।
.
तो वर्ष 2001 में श्री वाजपेयी द्वारा छपा गया और वर्ष 2016 में श्री मोदीजी द्वारा संशोधित जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के अनुसार, उसे अधिकतम सजा केवल 3 वर्ष ही होगी !!
.
और उसका नाम पब्लिक में जारी नहीं किया जायेगा।
.
तो अब आप जान लीजिये, कि क्यों मैं वाजपेयी से घृणा करता हूँ।
.
और अब आप तय करें कि आप वाजपेयी का सम्मान करेंगे या नफ़रत करेंगे।
.
इस कानून को छापने वाले अन्य मंत्री थे- अरुण जेटली और अरुण शौरी
.
और मोदीजी ने अपने पूरे राजनैतिक कैरियर में कभी भी 2001 में बने जुवेनाइल जस्टिस कानून का विरोध नहीं किया और सोनिया-मोदी-केजरीवाल और कांग्रेस-संघ-आप कार्यकर्ताओं ने भी सदा ही इसका पूर्ण समर्थन किया है।
.
और इसीलिए मैं सोनिया-मोदी-केजरीवाल और कांग्रेस-संघ-आप कार्यकर्ताओं से नफ़रत करता हूँ। कृपया तय करें कि आप सोनिया-मोदी-केजरीवाल से प्रेम करते हैं या नफरत !!!
==========

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Mar 10 2019 08:55:34 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Rahul Arya Ballari Karnataka:

If only the Rafale files were held as securely as Modiji's degree !!! 😁😀😜

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Mar 10 2019 17:30:34 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Fekubook:

युवा, जुझारू, सक्रियता, नम्रता और विवेक से भरे हुए और इसी धरती के संतान श्रीमान #SharadTripathi जी से बहुत प्रभावित हुए हैं मोदी जी 😂🤣😂🤣

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Mar 10 2019 20:32:20 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

नमस्कार , Ankit Singh
.
यह स्तम्भ आपके प्रश्न तथा टिप्पणियों के लिए बनाया गया है।
.
सभी के लिए
.
यह पोस्ट सिर्फ़ ankit singh के प्रश्न और टिप्पणियों के लिए है। अन्य के प्रश्न और टिप्पणियाँ डिलीट कर दी जायेगी।
.
------------
.
प्रश्नकर्ता से निम्नलिखित नियमों के पालन की अपेक्षा की जाती है :
.
(1) हिन्दी भाषा के लिए हिन्दी लिपि और अंग्रेजी भाषा के लिए अंग्रेजी लिपि का प्रयोग करें। रोमन भाषा का प्रयोग नहीं करे ।
.
(2) दो पेराग्राफ के बीच '.' चिन्ह का प्रयोग करे ।
.
(3) लेखन में अनावश्यक चिन्हों जैसे '.......', '!!!!!!!', '//////', '####', '„„„„„„', '??????' आदि का तथा अनावश्यक 'केपिटल लेटर्स' का प्रयोग नहीं करें ।
.
(4) एक बार में एक ही कमेन्ट करे । यदि आपने दो कमेन्ट एक साथ किये है तो,
अ) पहले कमेन्ट को एडिट करें
ब) दुसरे कमेन्ट को कोपी करके पहले वाले कमेन्ट में पेस्ट करे
स) फिर दुसरे कमेन्ट को डिलीट कर दें ।
.
(5) कमेन्ट क्रमिक/सिलसिलेवार ढंग से करे, अक्रमिक रूप से नही ।
.
क्रमिक कमेन्ट क्या है ?
.
मान लीजिये कि -
अ) आपने 'पहला' कमेन्ट किया है,
ब) मैंने 'दूसरा' कमेन्ट किया है,
स) आपने 'तीसरा' कमेन्ट किया है,
द) आपने चौथा कमेन्ट किया है ।
तो यहाँ पहला, दूसरा और तीसरा क्रमिक जबकि चौथा कमेन्ट अक्रमिक है । अक्रमिक कमेन्ट को बिन्दु 4 में बताये तरीके से संपादित कर पिछले कमेन्ट में जोड़ दें ।
.
(6) अपने प्रश्नों तथा टिप्पणियों को डिलीट नहीं करे । ताकि अन्य कार्यकर्ता भी इन्हें पढ़ सके ।
.
(7) कृपया मेरी फेसबुक प्रोफाइल के एल्बम में जाए और मेरे द्वारा प्रस्तावित कानूनों के लिए बनाए गए विभिन्न एल्बम देखें. इन एलबम्स में से कुछ एल्बम में ड्राफ्ट रखे है. इन्हें पढ़े.
.
(8) अन्य विषयों पर मेरे पोस्ट देखने के लिए सम्बंधित एल्बम देखें और इंडेक्स पोस्ट तक स्क्रोल करें. इंडेक्स पोस्ट में आपको पोस्ट्स की सूचियाँ मिलेगी.
.
(9) इस स्तम्भ का लिंक देखने के लिए एल्बम में जाकर 'आपसी संवाद स्तम्भ' या 'two person conversation thread' शीर्षक से एल्बम देखें और फीड व्यू क्लिक करें। इस स्तम्भ का लिंक वहां दर्ज किया गया है ।
.
(10) हम देश में व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवश्यक जूरी सिस्टम/राईट टू रिकाल कानूनों का मुक्त रूप से प्रचार करते है ताकि करोड़ो नागरिको की सहमति से इन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित कराया जा सके । आप से अपेक्षा की जाती है कि प्रश्न/कमेंट्स पठनीय भाषा में रखें ।
.
(11) कृपया कमेंट्स के लिए liner कमेंट्स बॉक्स का प्रयोग करें। "reply caption" का इस्तेमाल न करें।
.
==========

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Mar 10 2019 21:26:36 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

एयर स्ट्राइक पर मोदी साहेब ने कुछ तथ्यों पर खामोशी अख्तियार करके रखी है और इस वजह से एक तरफ पेड मीडिया धुंध फैला पा रहा है, और दूसरी तरफ भारतीय वायु सेना की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है !!
.
भारतीय विदेश मंत्रालय का अधिकृत पक्ष : "हमने कल रात बालाकोट में जैश ए मुहम्मद के सबसे बड़े आतंकी कैम्प पर एयर स्ट्राइक की।"
.
भारत सरकार का यह वर्जन एकदम ठीक और अधिकृत है। ( हालांकि यह विवरण अस्पष्ट है। अस्पष्टता का विवरण मैंने निचे दिया है )
.
विपक्षी दल ने आतंकियों की संख्या पूछी, जिसकी प्रतिक्रिया में वायुसेना ने कहा : "हमारा काम आतंकियों की संख्या गिनना नहीं है। हमें जो निशाना दिया गया उसे हमने ध्वस्त कर दिया।"

वायु सेना का यह बयान भी एकदम ठीक एवं युक्तियुक्त है। वायुसेना को केंद्र सरकार से जो लोकेशन "दी" गयी थी, वायु सेना ने उस लोकेशन पर धमाके कर दिए। सेना का काम सरकार के निर्देशों का पालन करना है, उन्हें यह नहीं कहा जाता कि आप यह भी पता लगाकर आना कि हमले में कितने आतंकी मारे गए।
.
पाकिस्तान सरकार का अधिकृत बयान : "भारतीय वायुसेना ने बालाकोट में धमाके किये।" ( पाकिस्तान के बयान में से शब्द "जैश ए मोहम्मद का कैम्प" गायब है !! )

तो यहाँ भारतीय वायु सेना द्वारा बालाकोट में धमाके किये जाने की पुष्टि स्वयं पाकिस्तान सरकार कर रही है। अत: यह बात यहीं पर साफ़ हो जाती है कि वायुसेना ने बालाकोट में धमाके किये है।
.
अंतर्राष्ट्रीय पेड मीडिया का वर्जन : हमले के अगले दिन पेड रायटर्स, पेड वाशिंगटन, पेड गार्जियन, पेड अल जजीरा को शामिल करते हुए दुनिया भर के सभी मीडिया हाउस ने यह रिपोर्ट किया कि - "भारत सरकार ने पाकिस्तान के बालाकोट में धमाके किये है। किन्तु क्या यह धमाके जैश के कैम्प पर किये गए है, इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है। भारत सरकार ने वायुसेना द्वारा किये गए हमले की लोकेशन और अन्य विवरण जारी नहीं किये है। हम और विवरणों की प्रतीक्षा कर रहे है।"
.
तो अंतर्राष्ट्रीय पेड मीडिया , भारत सरकार एवं पाकिस्तान सरकार इस बात पर सहमत है कि भारत के विमानों ने बालाकोट में धमाके किये।
.
---------
.
लेकिन इस बिंदु को लेकर अस्पष्टता है कि, बम बालाकोट में किस जगह गिराए गए।

(1) पाकिस्तान ने एक खाली मैदान की तस्वीरें जारी करके कहा कि, ये उस जगह की तस्वीरें है जहाँ बम गिराए गए थे।

पाकिस्तान की तस्वीरों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। क्योंकि पाकिस्तान द्वारा जारी की गयी तस्वीरें वेरिफायेबल नहीं है। इन तस्वीरों का कोई महत्त्व नही। हो सकता है पाकिस्तान ने बालाकोट के आस पास किसी मैदान पर खुद ही 4 बम गिराकर खड्डे कर दिए हो, और भारत का दावा कमजोर करने के लिए तस्वीरें जारी कर दी हो।

(2) और 2-3 दिन बाद दुनिया भर की सभी अंतर्राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों ने यह रिपोर्ट करना शुरू किया कि :

"भारतीय वायु सेना द्वारा किये गए धमाके बालाकोट से कुछ हटकर एक खाली मैदान पर किये गए थे, और इनका उद्देश्य केवल भारतीयों के लोगो का गुस्सा शांत करना था।"

पेड मीडिया ने यह भी रिपोर्ट किया कि : "स्ट्राइक चुनावी उद्देश्यों को लेकर की गयी थी, एवं स्ट्राइक के दौरान यह सावधानी रखी गयी कि कोई जन हानि न हो।"

मैं दुनिया के किसी पेड मीडिया हाउस का विश्वास नहीं करता। इनको जो जितना पैसा देता है, ये उस हिसाब से ख़बरें छापते रहते है। तो ये सभी मीडिया हॉउस भी पेड है, और हमें इन पर विश्वास नहीं करना चाहिए। मैं मीडिया द्वारा रिपोर्ट की गयी सिर्फ उस खबर पर भरोसा करता हूँ जिसे स्वतंत्र स्त्रोत द्वारा वेरीफाई किया जा सके।

उदाहरण के लिए यदि मीडिया रिपोर्ट करता है कि कुतुबमीनार गिर गया है, तो इसे वेरीफाई किया जा सकता है। लेकिन ज्यादातर पेड मीडिया ऐसे मामले पर झूठ नहीं बोलता जिसे स्वतंत्र स्त्रोत द्वारा वेरीफाई किया जा सके। यदि पेड मीडिया वैरिफायेबल फेक्ट के साथ छेड़छाड़ करेगा तो एक्सपोज हो जाएगा। इसीलिए पेड मीडिया झूठ परोसने के लिए अनवैरिफायेबल तथ्यों का प्रसारण करता है। आम नागरिक इस महत्तवपूर्ण अंतर को समझ नहीं पाता एवं पेड मीडिया की चपेट में आ जाता है।
.
-------
.
रायटर्स द्वारा जैश के कैम्प की सेटेलाईट तस्वीरें जारी करना
.
इस पूरे मामले में निर्णायक मोड़ तब आया, जब रायटर्स ने बालाकोट स्थित जैश के कैम्प की सेटेलाईट तस्वीरें जारी कर दी !! उल्लेखनीय है कि सेटेलाईट तस्वीरें स्वतंत्र स्त्रोत द्वारा वेरिफाई की जा सकती है।

सेटेलाईट तस्वीरों में अक्षांश, देशांतर, दिशा, आकार स्थिति आदि सभी कुछ होते है। इन अक्षांश एवं देशान्तरो को चिन्हित करके कोई भी देश या निजी सेटेलाईट एजेंसी इनकी पुष्टि कर सकती है।

इसे इस तरह से समझे कि जैश ए मुहम्मद यह दावा करता है कि उसने पोकरण स्थित भारत के एक मिलिट्री कैम्प को उड़ा दिया है। अब यदि भारत सरकार इसकी पुष्टि कर देती है कि हाँ इस मिलिट्री कैम्प को उड़ा दिया गया है, तो यह दावा क्रॉस वेरीफाई हो जाएगा। क्रोस वेरीफाई होने के बाद इसे कोई चुनौती नहीं देगा। और यदि कोई चुनौती देता भी है तो उसे प्रथम दृष्टया खारिज कर दिया जाएगा।

किन्तु यदि भारत सरकार जैश के दावे को ख़ारिज कर देती है, और जैश यह नही बताता कि पोकरण में जिस मिलिट्री कैम्प को उन्होंने निशाना बनाया है उसके अक्षांश, देशांतर, दिशा निर्देश और स्थिति क्या है, तो अब यह एक अस्पष्ट दावा है। मतलब इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती कि, मिलिट्री कैम्प वाकई जैश द्वारा उड़ा दिया गया है या नहीं।

किन्तु यदि जैश इसकी दिशा, स्थिति, अक्षांश एवं देशान्तर आदि जारी कर देता है, तो दुनिया भर में कोई भी देश या निजी सेटेलाईट एजेंसी अपने सेटेलाईट से अमुक अक्षांश एवं देशांतर की तस्वीरें निकाल कर इसकी पुष्टि कर सकता है।

मैं इसे और भी स्पष्ट करता हूँ - मान लीजिये कि पाकिस्तान यह दावा करता है कि उन्होंने ताजमहल उड़ा दिया है, और भारत इसे खारिज कर देता है। तो अमेरिका या रूस किसका दावा मानेगा ? क्या वे अपने राजदूत से कहेंगे कि आगरा जाओ और तस्वीरें निकाल कर भेजो !! नहीं। वे ताजमहल के अक्षांश एवं देशांतर पर सेटेलाईट ले जाकर तस्वीरें चेक करेंगे, और उन्हें मालूम हो जायेगा कि ताजमहल गिरा दिया गया है, या वहीँ खड़ा है।
.
उदाहरण के लिए, उड़ी में भारत के 22 जवान शहीद हुए। जैश ने इस हमले की जिम्मदारी ली और भारत ने भी पुष्टि की कि हाँ इस हमले में हमारे 22 जवान शहीद हुए है।

फिर हमारे 44 जवान शहीद हुए , जैश ने हमले की जिम्मेदारी ली और भारत सरकार ने पुष्टि की कि , हाँ इस हमले में हमारे 44 जवान शहीद हुए है।

पुष्टि किये गए इन तथ्यों का जैश के लिए महत्त्व इसीलिए होता है, क्योंकि यदि शहीद हुए जवानो की पुष्टि ढंग से नहीं हो पायी तो जिसने भी इस हमले के लिए एडवांस पेमेंट की थी ( इसके लिए फंडिंग सऊदी अरब या अमेरिका की और से आती है ) वे अब बाकी का भुगतान नही करेंगे। अमूमन पेमेंट शहीद हुए जवानो की संख्या के आधार पर की जाती है। शहीद हुए जवानो की संख्या जितनी बढ़ेगी पेमेंट भी उतना ही मिलेगा, और अगले हमले के लिए तैयारी अच्छी बनेगी।
.
मतलब सिर्फ हमला ही काफी नहीं होता है। इतना बड़ा कैम्प चलाने के लिए जिन संसाधनों की जरूरत होती है उसके लिए हमले की जिम्मेदारी भी लेनी होती है, और शहीदों की संख्या के रूप से संख्या भी दिखानी होती है। फिर जितना ये तस्वीरें सर्कुलेट होगी जैश को उतने ज्यादा युवाओं के रूप में रिक्रूटमेंट भी मिलेंगे। मतलब, इन संगठनो को भी कम्पीटीशन फेस करना पड़ता है। जो ज्यादा सफल होगा, उसे उतनी ज्यादा पहचान और फंडिंग मिलेगी।
.
-------
.
भारतीय सरकार ने अपनी प्रेस रिलीज में बालाकोट और जैश ए मुहम्मद के कैम्प का नाम लिया है। कृपया भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान देखें :

" in an intelligence led operation in the early hours of today, India struck the biggest training camp of JeM in Balakot."

" आज के शुरुआती घंटों में एक खुफिया अभियान के तहत, भारत ने बालाकोट में जैश ए मुहम्मद के सबसे बड़े प्रशिक्षण शिविर पर हमला किया।"

और रायटर्स ने कुछ 4 दिन पहले बालाकोट स्थित जैश ए मुहम्मद के कैम्प की ताजा तस्वीरें जारी करके कहा है कि :

"बालाकोट में जैश ए मुहम्मद का कैम्प सुरक्षित रूप से चल रहा है !!! "

और रायटर्स ने यह भी लिखा कि :

" या तो भारतीय वायुसेना का निशाना पूरी तरह से चूक गया है, या फिर जानबूझकर बेहद कमजोर बम गिराए गए ताकि जनहानि भी न हो और नागरिको का गुस्सा भी शांत हो जाए !!! "

और फिर सभी देशो की न्यूज एजेंसियों ने इसे रिपोर्ट करना शुरू किया कि भारत ने एयर स्ट्राइक में किसी कैम्प को नहीं उड़ाया है पर चुनावों के कारण इस तरह का स्टेज बनाया है ताकि नागरिको को यह अहसास दिलाया जा सके कि पुलवामा का बदला ले लिया गया है।
.
मतलब पेड मीडिया द्वारा भारत में जो ड्रामा चलाया जा रहा है वह घर की बात घर तक है। लेकिन यदि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय वायुसेना पर ऊँगली उठायी जाने लगती है, तो यह शर्मिंदगी का विषय है।
.
अब पेड रायटर्स द्वारा सेटेलाईट इमेज जैसा वैरिफायेबल तथ्य जारी करने के बाद, मेरा मानना है कि भारत सरकार को इसके खंडन के लिए अवश्य कदम उठाना चाहिए। यदि भारत कोई कदम नहीं उठाता तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की वायुसेना की प्रतिष्ठा धूमिल होगी, जो कि अच्छी बात नहीं है।
.
पेड रायटर्स द्वारा सेटेलाईट इमेजेस जारी करने के बाद मैंने प्रधानमन्त्री को एक अर्जी भेजी थी। इसमें मैंने मोदी साहेब को यथासंभव निम्नलिखित कदम उठाने की विनती की थी। अर्जी का पीडीऍफ़ आप प्रधानमंत्री जी की इस अधिकृत वेबसाईट के इस लिंक को क्लिक करके देख सकते है। पीडीऍफ़ का टेक्स्ट मैंने निचे दिया है : Newindia.in/Causes/ReleaseSatelliteImagesAirStrike
.
#ReleaseSatelliteImagesAirStrike

माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी साहेब , विदेशी समाचार एजेंसी रायटर्स ने सेटेलाईट इमेज जारी करके यह दावा किया है कि भारतीय वायु सेना द्वारा बालाकोट में जैश-ए-मुहम्मद के जिस कैम्प पर बम गिराए गए थे, वह कैम्प पूरी तरह से सुरक्षित है और उसे कोई नुकसान नहीं हुआ है। रायटर्स अमेरिका का काफी बड़ा अंतराष्ट्रीय मीडिया समूह है, और इस तरह की रिपोर्टिंग से अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारतीय वायु सेना का पराक्रम धूमिल हो रहा है।
.
आपसे आग्रह है कि भारतीय वायु सेना की प्रतिष्ठा कायम रखने के लिए उस लोकेशन के अक्षांश, देशांतर, दिशा निर्देश एवं स्थिति जारी करें जिस लोकेशन पर आपने वायु सेना को बम गिराने के आदेश दिए थे।
.
क्या सच्चाई कभी सामने आएगी ?

अमूमन इस तरह की चीजे छिपती नहीं है। जब रॉ, आई बी या वायु सेना के शीर्ष अधिकारी रिटायर्ड होंगे तो ओपरेशन के लिए दी गयी लोकेशन का खुलासा कर देंगे, या फिर 2024 के आस पास जब सत्ता परिवर्तन होगा तो इस सच्चाई के सामने आने की संभावनाएं बढ़ जायेगी। हम सिर्फ उम्मीद कर सकते है, कि इस विषय पर भारत सरकार स्पष्टीकरण जारी करे। वैसे मुझे उम्मीद न के बराबर है।
.
-------
.

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sun Mar 10 2019 21:34:17 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

रिकालिस्ट्स के लिए जरुरी सूचना :
.
चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा हो चुकी है. सभी कार्यकर्ताओ से आग्रह है कि वे तुरंत इलेक्शन फॉर्म भरें. फार्म भरने के कोई पैसे न लग रहे है, और न ही फॉर्म भरने का मतलब यह है कि आपको चुनाव लड़ना ही है. लेकिन इलेक्शन फॉर्म भरना बहुत जरुरी एक्टिविटी है. अत: सभी कार्यकर्ताओ से मेरा आग्रह है कि इलेक्शन फॉर्म भरकर अपने एल्बम में रखें.
.

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Mar 16 2019 10:44:12 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राईट टू रिकॉल पीएम का क़ानून न होने की वजह से नेता चुनावों से पहले इस बात को तवज्जो नहीं देते कि उनका स्टेंड सही है या गलत. वे जानते है एक बार चुनाव जीतने के बाद वे अपना स्टेंड बदल भी लेते है तो उन्हें कोई नुकसान नहीं है.
.
तो चुनावों में नेता लम्बे चौड़े वादे करके नागरिको को इसीलिए भ्रमित कर पाते है क्योंकि देश में नागरिको के पास वोट वापिस लेने का अधिकार नहीं है.
.
इस वीडियो में आप इसकी तस्दीक कर सकते है.
.

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Mar 16 2019 19:12:40 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भारत में इस समय कोई भी पार्टी या उम्मीदवार नहीं है जो राईट टू रिकॉल, जूरी सिस्टम कानूनों का समर्थन करता हो। मोदी साहेब चुनाव जीतेंगे तब भी ऍफ़ डी आई आएगी और राहुल गांधी जीतेंगे तब भी ऍफ़ डी आई आएगी। मेरे नजरिये में यदि भारत में ऍफ़ डी आई आती रही और जूरी सिस्टम / राईट टू रिकॉल क़ानून न आये तो भारत या तो फिलिपिन्स बन जाएगा या इसका इराकीकरण हो जायेगा।
.
तो मेरा सभी छोटे छोटे कार्यकर्ताओं से आग्रह है कि वे सबसे पहले यह फैसला करें कि उन्हें भारत में जूरी सिस्टम, राईट टू रिकॉल, वेल्थ टेक्स चाहिए या नहीं। यदि उन्हें ये क़ानून नहीं चाहिए तो वे मोदी साहेब, राहुल गांधी या अरविन्द केजरीवाल तीनो में से किसी भी वोट दें मेरे लिए एक ही बात है।

लेकिन यदि वे देश में राईट टू रिकॉल, जूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स क़ानून चाहते है तो उन्हें खुद चुनाव लड़ना शुरू करना चाहिए। जब तक छोटे छोटे कार्यकर्ता जूरी सिस्टम, राईट टू रिकॉल कानूनों के मुद्दे पर चुनाव लड़ना शुरू नहीं करेंगे तब तक इन कानूनों की मांग आगे नहीं बढ़ेगी।
.
=========

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Mar 16 2019 19:39:07 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

बीजेपी-कोंग्रेस-आपा के उन समर्थको के लिए जो कहते है कि हथियारों का आयात करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरुरी है !!
.
=======

Kapil Bishnoi:

For the andh-bhakts of AAP/BJP(RSS)/Congress who say importing weapons for national security is OK.
.
And oppose laws like #JurySys3 #RtrDeo3 that will improve our weapon manufacturing capabilities.

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Mar 16 2019 19:45:46 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

सोनीया-मोदी-केजरीवाल जूरी सिस्टम एवं वेल्थ टेक्स कानूनों का लगातार विरोध कर रहे है और इस वजह से भारत में स्थानीय उत्पादन इकाईयां निरंतर पिछडती जा रही है। और इस वजह से चीन से हमारा आयात निरंतर बढ़ रहा है !!

<https://economictimes.indiatimes.com/news/economy/foreign-trade/imports-of-chinese-auto-parts-set-to-rise-as-government-pushes-for-electric-cars/articleshow/68418422.cms?fbclid=IwAR12E5B9JQOWmYyp9L3xPWQGCHDNLlVBqhn03HVAaJhxYLuKT3oZru94078>;
.
======

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Mar 21 2019 10:23:31 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

किल स्विच : अजित डोवल द्वारा शेयर किये गए इस वीडियो के 1:30 मिनिट का हिस्सा देखें। पेड आज तक पर एक पेड रक्षा विशेषग्य यह बता रहे है कि F-16 में किल स्विच लगे हुए है। किन्तु वे इस बात को छुपा ले गए कि रफाल में भी किल स्विच है !!

Ajit Kumar Doval:

वह सच्चाई जो कोई भी नरेंद्र मोदी का विरोधी स्वीकारने को तैयार नहीं

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Fri Mar 22 2019 22:51:26 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

superb information revealed by Rahul Arya Rrg .

Rahul Arya Ballari Karnataka:

For the past week or so, I've been reading extensively about the End Use Monitoring Agreement (EUMA) signed between the US and Indian govts in 2009; what it means for the future of Indian armed forces and more importantly, for India's sovereignty.
.
I started by looking into the Press Releases and Lok Sabha debates from July 20, 2009. I'd like to quote some of the relevant sections of the debates pertaining to the EUMA, the arguments of various MPs and the links to these debates.
.
1. Foreign Minister S.M. Krishna (Congress) on July 20, 2009: We have agreed on the end-use monitoring arrangements that will ensure their effort too in letters of acceptance for Indian procurement of U.S. defense technology can take effect.
.
2. US Secretary of State Hillary Clinton on July 20, 2009: We have shown progress already by finalizing important agreements today, including an end-use monitoring agreement that will pave the way for greater defense cooperation between our countries.
.
US Govt website Link: <https://2009-2017.state.gov/secretary/20092013clinton/rm/2009a/july/126259.htm>;
Indian Govt website Link: <https://mea.gov.in/outoging-visit-detail.htm?5212/Joint+Press+Interaction+by+EAM+and+US+Secretary+of+State>;
.
3. L.K. Advani (BJP) on July 21, 2009: But today we expected that the External Affairs Minister would come out with a clarification on this point where he has said that we have also agreed on the end-use monitoring arrangements that will henceforth be referred to in letters of acceptance for Indian procurement of US defence technology and equipment. Not only that. He goes on to say that this systematizes ad hoc arrangements for individual defence procurements from the USA entered into by previous Governments also so that it is in a way trying to have end-use arrangements made into a formal systematic arrangement even in respect of earlier matters. This is something very disturbing.
.
4. Basu Deb Acharia (CPI-M) on July 21, 2009: None of the questions that we raised today in the morning has been clarified by the Minister while making the statement. We did not want this statement. The points we raised were about why we wanted a statement. That is why we demanded a statement. We demanded a clarification from the Government. Why did the Government of India agree for end use monitoring by the United States of America? And they want to formalize the system! This is nothing but surrendering to the United States of America. So, none of the questions that had been raised by the entire Opposition has been clarified by the Minister of External Affairs.
.
5. Yashwant Sinha (BJP) on July 21, 2009: सारी सूचना अखबारों के माध्यम से हमें नहीं मिली। हमें कुछ-कुछ सूचना मिली कि एंड यूज मॉनीटरिंग एग्रीमैन्ट, एंड यूज वैरिफिकेशन एग्रीमैन्ट ऐसा कुछ भारत सरकार और अमेरिका के बीच में तय हुआ है। चूंकि इसके बारे में थोड़ी जानकारी हमें भी है, उस मंत्रालय में मैंने भी सर्व किया है, इसलिए मेरे मन में कई प्रकार की शंकाएं पैदा हुईं, जिन्हें मैंने यहां रखा। मैंने कहा कि जैसे स्पेसिफिकली जो थर्ड कंट्री इम्पोर्ट्स होते हैं, उसमें अगर अमेरिकन इक्युपमैन्ट लगा है, अमेरिकन टैक्नोलोजी का इस्तेमाल हुआ है तो उस पर भी यह लागू होगा। यह एक सवाल था, जो मैंने पूछा कि खास तौर पर सरकार की तरफ से बताया जाए कि अमेरिका से जो खरीदेंगे, उस पर तो लगेगा ही लगेगा, तीसरे मुल्क से जो खरीदेंगे, उस पर भी लगेगा और मैं जानता हूं कि इस प्रकार की बात है।
.
इसीलिए मैं इस सदन में जिम्मेदारी के साथ इस बात को उठा रहा हूं। इसके बाद मैंने कहा कि सरकार की तरफ से यह बयान दिया गया है कि जो चल है, चल मतलब अचल से भिन्न चल, जो मूवेबल है, उसे हम लोग दिखा देंगे। प्रधान मंत्री के लिए एयरक्राफ्ट है, एक हाई सिक्युरिटी एयरक्राफ्ट खरीदा जा रहा है, जिसमें कि बहुत विशेष तौर के रडार वगैरह लगाये जायेंगे, लिखा गया कि इसे हम किसी नॉन एयरफोर्स बेस पर लाकर दिखा देंगे। लेकिन मैंने सवाल किया जो अचल है, जो इम्मूवेबल है, उसमे वैरिफिकेशन कैसे होगा, उसे उठाकर कैसे लायेंगे? बंगलुरू में अगर कोई संयंत्र लगा, जिसमें इनकी टैक्नोलोजी या इनका इक्युपमैन्ट यूज किया गया तो उसे कैसे लायेंगे? इसलिए मुझे शक हुआ कि जनता को गुमराह करने के दृष्टिकोण से इस प्रकार का सलैक्टिवली मीडिया में किया जा रहा है, ताकि देश संतुष्ट रहे कि ऐसा कुछ नहीं है।
.
6. Sushma Swaraj (BJP) on July 21, 2009: महोदय, सबसे पहले मैं मंत्री महोदय को यह बताना चाहती हूं कि एंड यूज़ मॉनीटरिंग एग्रीमेंट का विरोध इस सदन में आज पहली बार नहीं हो रहा है। वर्ष 2008 में भी इसका विरोध इतने ही पुरजोर ढ़ंग से इसी सदन में हुआ था। यह अलग बात है कि विदेश मंत्री जी उस समय इस सदन के सदस्य नहीं थे, लेकिन सरकार एक निरन्तरता का नाम है और उन्हें यह बात जरूर बतायी जा चुकी होगी कि देश की संसद इसके विरोध में थी। मैं मंत्री महोदय से जानना चाहती हूं कि केवल सांसद ही नहीं आपके अपने ऑफिसियल स्टैब्लिशमेंट ने भी इसका विरोध किया है। ...* ने इस एग्रीमेंट को इन्ट्रयुसिव कहा है। उन्होंने कहा है कि जब हम कोई चीज खरीदते हैं तो हम पैसा दे देते हैं, हमने पैसा दे दिया, टैक्नोलॉजी खरीद ली, अब उसके मास्टर हम हैं और अब उस पर कोई इंस्पैक्शन नहीं कर सकता है।
.
इसके लिए उन्होंने इन्ट्रयुसिव शब्द का प्रयोग किया है। सीएजी की रिपोर्ट आयी है, इसमें भी विरोध किया गया है। मैं यह जानना चाहती हूं कि संसद के विरोध को, अपने ऑफिसियल स्टैब्लिशमेंट के विरोध को, सीएजी के विरोध को एक तरफ रखते हुए आपने इस तरह के समझौते पर हस्ताक्षर क्यों किये? महोदय, मेरा दूसरा सवाल है कि हम भी अमेरिका के साथ अच्छे रिश्तों के पक्षधर रहे हैं, लेकिन माननीय मंत्री जी हम दोस्ती के स्तर पर रिश्ता चाहते हैं, दासता के स्तर पर नहीं। आपका यह समझौता दासता का प्रदर्शन कर रहा है इसलिए हम इसका विरोध कर रहे हैं।
.
7. M. Thambidurai (AIADMK) on July 21, 2009: The Minister in his Statement has stated, “We have also agreed on the End-use Monitoring Agreement”. What does this mean? How can the USA come and monitor the whole thing here? We have to safeguard our sovereignty. As has been said by the other Member, when we are purchasing these equipment, we have every right to do whatever we want to do. Shrimati Sushma Swaraj just now said that a friendly relationship should be there and not the kind of relationship where they could dictate terms to us, that is why, we are worried. The Minister says, ‘we will continue discussion’. Now what are you going to discuss? Once you have signed the agreement, you have concluded everything. Therefore, what are you going to discuss? Are you going to withdraw the agreement? This is what we want to know. All the hon. Members’ serious concern is that we cannot pledge our sovereignty to any foreign country. Therefore, first of all, you withdraw this kind of agreement. This is our expectation from you.
.
Link: For point no.3 to 7 (i.e. July 21, 2009):
<http://164.100.47.194/Loksabha/Debates/Result15.aspx?dbsl=760>;
.
8. Prime Minister Manmohan Singh (Congress) on July 29, 2009: One (issue) relates to the end-use monitoring arrangement we have made with the United States for Defence purchases. All Governments, Madam, including our Government, are particular about end-uses to which exported Defence equipment and technologies are put to and for preventing them from falling into wrong hands. Since the late 1990s, the Governments of India and the United States have entered into end-use monitoring arrangement for the import of US high-technology Defence equipment and supplies. These were negotiated before this Agreement in each case by successive Governments of India. The Government has only accepted those arrangements which are fully in consonance with our sovereignty and dignity. What we have now agreed with the United States is a generic formulation which will apply to future such supplies that India chooses to undertake.
.
By agreeing to a generic formulation, we have introduced an element of predictability in what is otherwise an ad-hoc case by case negotiation. Government has taken all precautions to ensure an outcome that guarantees our sovereignty and national interest. Nothing in the text that has been agreed to compromises India’s sovereignty. There is no provision – I repeat, there is no provision – for any unilateral action by the United States side with regard to inspection or related matters. India has the sovereign right to jointly decide, including though joint consultations, the verification procedure. Any verification has to follow a request; it has to be on a mutually-acceptable date and at a mutually acceptable venue. There is no provision for on-site inspections or granting of access to any military site or sensitive areas. This is the position with regard to end-use monitoring.
.
Link: <http://164.100.47.194/Loksabha/Debates/Result15.aspx?dbsl=285>;
.
9. Basu Deb Acharia (CPI-M) on July 30, 2009: The Prime Minister said that this end use monitoring was in existence since 1990. Whatever equipment we have purchased from the USA, all of them are subject to end use monitoring by the USA. But it was on an ad hoc basis. There was no agreement with the USA; that has been stated by the Prime Minister, while intervening yesterday. When the agreement has been signed by India and the USA, what will happen? This is very important, but that question has not been addressed by the Prime Minister yesterday. The US will have the right to check whether India is using any purchased weapon for the purpose for which it was intended. This could mean a weapon system bought by India to bolster defence; say, for instance, against China or if India wants to use it against Pakistan, they will not be able to use it against Pakistan. EUMA restricts what purchasing country like India can do with US-origin defence equipment, even within its own border; you will not be able to do anything with the equipment which we purchase from the USA.
.
Under the terms of EUMA, India cannot modify the purchased defence article or system in any form. And, it also cannot prevent the buyer country from freeing itself from dependency on United States for maintenance. India would not be able to undertake maintenance of any of the equipment purchased from America. This is not so with the other countries. We have purchased a number of Defence equipment from Russia, erstwhile USSR but this end-use monitoring system was not there for the equipment purchased from other countries. This restricts India from getting ordinary US Defence equipment serviced by any other country without prior American permission.
.
The Prime Minister has stated that the inspection will be fixed on mutually agreed date and the inspector from America will inspect the equipment supplied by America. Those inspectors will not be allowed to visit any sensitive establishment in our country. If any equipment is installed in a sensitive establishment in our country, then that equipment has to be brought to other place for inspection. This is nothing but infringement on our sovereignty, our independence.
.
So, by signing the End-Use Monitoring Agreement with the United States of America, we have become different as with no other country this system is there. When there was an ad hoc arrangement, why did India sign the Agreement? Our C&AG and Air Chief has also criticised signing the Agreement with the United States of America in regard to the End-Use Monitoring. We think this is an infringement on our sovereignty. Our independence has been surrendered to the United States of America and we opposed this End-Use Monitoring Agreement which has been signed between the Government of India and the United States of America.
.
Link: <http://164.100.47.194/Loksabha/Debates/Result15.aspx?dbsl=625>;
.
10. Minister of State Maj Gen (Retd) VK Singh (BJP) on August 13, 2014: Since the late 1990s, the Governments of India and the United States have entered into end-use monitoring arrangements for the import of US high-technology defence equipment and supplies. Although a formal Agreement was not signed, a generic formulation was agreed in 2009 between India and the United States for such future supplies that India chooses to procure to give predictability in what was otherwise an ad-hoc case by case arrangement for procurement of defence technology and equipment from the US.
.
There is no provision in the 2009 End Use Monitoring formulation with the United States for any unilateral action by the United States with regard to inspection or related matters. It provides for joint consultations on modalities; in no way does it compromise our sovereignty, or limit our sovereign choice of whether, where and what we choose to buy for our national defence or scientific establishments. The arrangements to which we have agreed are fully in consonance with our sovereignty and national interest.
.
Link: <http://pib.nic.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=108660>;
------------------------------------------------------------------
.
A few important observations:
.
a. Sushma Swaraj opposed the EUMA back in 2009 when she was in the opposition. Today, she's the Foreign Minister. Why doesn't she / her "nationalist" party abolish the EUMA? Doesn't this prove that there is no REAL difference between the Congress and the BJP?
.
b. It is interesting to note that both the then PM Manmohan Singh and the then Foreign Minister S.M Krishna use the term "arrangements" i.e. End-Use Monitoring arrangements; they don't use the word "Agreement". Does this mean that no agreement was signed? Well, when you go through Hillary Clinton's statement, which was made just a few minutes after S.M Krishna's statement, she uses the word "Agreement" !!
.
If there was no agreement signed, then what does the word "arrangements" mean? And how can any "arrangement" be binding on the new govt? Looks like the UPA govt was playing with words.
.
c. But then, 5 years later, Minister of state in the Ministry of External Affairs and Overseas Indian Affairs VK Singh ji also says that no agreement was signed !! So what was it? Was an agreement signed or was it an "arrangement"?
.
It is also very interesting to see that VK Singh ji's statement is almost an exact copy of Manmohan Singh's statement. Please compare the two statements (points no. 8 & 10) and you'll see how similar they are !!! Is this the party with a difference (BJP)??!! This is one reason why I always maintain that all parties are the same; the differences between them are superficial.

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Mar 23 2019 21:01:44 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

1974 में कम्युनिस्ट सी. के. चंद्रप्पन ने लोकसभा में राईट टू रिकॉल सांसद का बिल पेश किया था। तब वाजपेयी ने इस बिल का समर्थन करते हुए कहा था कि --
.
"महोदय, मैं यहाँ राईट टू रिकॉल के समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हूँ, और सरकार से पूछना चाहता हूँ कि, जब सांसद सेवा करने का वादा करके सत्ता में आकर मेवा खाने लगे, और काम करने की जगह दाम कमाने लगे, तो क्या भारत की जनता अगले 5 वर्षो तक सोती रहेगी ? और फिर 5 साल में एक दिन के लिए वोट डालने के लिए उठेगी ? क्या भारतीयों के पास अपने भ्रष्ट प्रतिनिधियों को रिकॉल करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। आप कहते है स्विट्जर्लेंड छोटा है, इसीलिए इसका उदाहरण यहाँ लागू नहीं हो सकता, सोवियत रूस बड़ा है इसीलिए उसका उदाहरण यहाँ लागू नहीं हो सकता, और वह देश साम्यवादी भी है !! तो लोकतंत्र में आप किसी नए फार्मूले का अविष्कार क्यों नहीं करते !! "

" Sir, I stand to support Right to recall bill. Should the people sleep for 4 years and 364 days and wake up for one day for exercise their vote ? what should be done if they elected for seva but acquire meva ? should the people watch in silence if they get elected for kaam but make daam instead for work ? switzerland is a small country so its example cannot be applied here. soviet russia is a big country so its example cannot be applied here. it is a communist country too, so its example cannot be applied here. so why dont you introduce something new in democracy ?"
.
पर जब वाजपेयी सत्ता में आये तो उन्होंने राईट टू रिकॉल क़ानून गेजेट में छापने से इंकार कर दिया !!
.
लिंक - <https://books.google.co.in/books?dq=Right+to+Recall&id=87k_AAAAMAAJ&pg=RA11-PA1910#v=onepage&q=Right%20to%20Recall&f=false>;
.
==========
.

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Mar 25 2019 18:20:32 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

अच्छी ख़बर यह है कि — राईट टू रिकॉल पार्टी का नाम इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर विजिबल हो गया है — <https://suvidha.eci.gov.in>;
.
अभी तक हमें इलेक्शन कमीशन की और से लेटर नही मिला है, पर चूँकि पार्टी का नाम इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर अपडेट हो चुका है, अतः यह तय है कि चुनाव आयोग ने इसे क्लीयर कर दिया है ।
.
राकेश जी सूरी का विशेष रूप से धन्यवाद जो निरंतर इस वेबसाइट को चेक कर रहे थे ।
.
========
.

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Mon Mar 25 2019 21:57:52 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

2019 के आम चुनावों के लिए पेम्पलेट के अपडेटेड वर्जन :
.
2019 के आम चुनाव में वितरित किये जाने वाले पेम्पलेट की वर्ड फाइल, पेज 16 : <https://www.facebook.com/groups/RtrFiles/permalink/2298949317056255/>;
.
2019 के आम चुनाव में वितरित किये जाने वाले पेम्पलेट का पीडीऍफ़, पेज संख्या 16 :
<https://www.facebook.com/groups/RtrFiles/permalink/2297523340532186/>;
.
=========

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Mar 26 2019 13:19:38 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

राईट टू रिकॉल का सामान्य परिचय एवं इसकी भारत में स्थिति
.
राईट टू रिकॉल का सामान्य अर्थ है : वोट वापिस लेने का अधिकार होना !! किन्तु यह इससे कहीं अधिक है।
.
राईट टू रिकॉल से आशय ऐसी प्रक्रियाओ से है जिनका प्रयोग करके आम नागरिक शासक वर्ग को नियंत्रित करते है। उदाहरण के लिए, मान लीजिये किसी जिले में पुलिस ठीक से काम नही कर रही और इस वजह से अपराध बढ़ते जा रहे है। अब यदि अमुक जिले के नागरिको के पास यह प्रक्रिया हो कि वे अपने बहुमत का प्रदर्शन करके पुलिस प्रमुख को किसी दुसरे पुलिस प्रमुख से बदल सके, तो यह कहा जाएगा कि जिले के नागरिको के पास पुलिस प्रमुख को रिकॉल करने का अधिकार है।
.
और इसी तरह की प्रक्रियाएं जिला स्तर पर शिक्षा अधिकारी, चिकित्सा अधिकारी आदि पर तथा राज्य व केंद्र स्तर पर मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, हाई कोर्ट जज, सुप्रीम कोर्ट जज, सीबीआई निदेशक आदि पर भी हो सकती है।
.
मतलब राईट टू रिकॉल का बुनियादी आधार यह है कि, सत्ता में बैठे लोग यदि भ्रष्ट हो जाते है ऐसा क्या उपाय किया जाए कि जनता को उन्हें झेलना न पड़े, और वे भ्रष्ट को नौकरी से निकाल सके। और इस तरह उन्हें वापिस बुलाने की प्रक्रियाए लागू होना शुरू हुयी। किन्तु यह सिर्फ चुने हुए प्रतिनिधियों तक सीमित नहीं है। जिस भी सरकारी अधिकारी को आप जनता के नियंत्रण में बनाए रखना चाहते है उस पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं लागू की जा सकती है।
.
(1) यह भारत में अब तक लागू क्यों नहीं हुआ है ?
.
इसकी कई सारी वजहें है जिनमे दो वजहें मुख्य है
.
जानकारी का अभाव
ड्राफ्ट का अभाव
.
राईट टू रिकॉल ऐसा क़ानून है कि इसे किसी भी देश में बड़े आदमियों का कभी समर्थन नहीं मिलता। बड़े आदमी यानी अति धनिक वर्ग और उन पर आश्रित व्यक्ति। इन कानूनों की मांग छोटे छोटे एक्टिविस्ट और नागरिक आगे बढ़ाते है। जब कई वर्षो में जाकर इनकी मांग खड़ी हो पाती है, तो धनिक वर्ग किसी न किसी तरीके से मांग को रफा दफा कर देते है। फिर से छोटे छोटे लोग इन्हें आगे बढाते है, और बड़े लोग फिर किसी न किसी पैंतरे से इसे किनारे कर देते है।
.
बस यह इसी तरीके का एक रोटेशन है। दुनिया के कई देशो में इस तरह का रोटेशन पिछले 150 सालों से चल रहा है। कई देशो के एक्टिविस्ट चाहते है कि उनके देश में राईट टू रिकॉल क़ानून लागू हो जाए। लेकिन अब तक सिर्फ अमेरिका के एक्टिविस्ट ही इन्हें अपने देश में लागू करवाने में सफल हो पाए है। शेष सभी देशो में अब तक धनिक वर्ग इसे टालने में सफल रहे है। जूरी सिस्टम और वेल्थ टेक्स का भी यही हिसाब है।
.
(2) भारत में राईट टू रिकॉल आन्दोलन का इतिहास एवं स्थिति :
.
2.1. भारत में राईट टू रिकॉल का अप्रत्यक्ष उल्लेख सबसे पहले महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने किया था। सत्यार्थ प्रकाश के छठे अध्याय के पहले ही पृष्ठ में महर्षि दयानंद राज धर्म की बुनियाद के बारे में बताते हैं। महर्षि ने इसमें 3 शब्द दिए है - प्रजा अधीन राजा, और इन 3 शब्दों में उन्होंने अच्छी राजनीति पर 10,000 से अधिक प्रस्तावों का सार दे दिया है। आगे वे इन 3 शब्दों का विस्तार करते है --

"राजा को प्रजा के अधीन होना चाहिए, वर्ना वह नागरिकों को लूट लेगा और राज्य का विनाश होगा।"

और उन्होंने ये श्लोक अथर्ववेद से लिए है।
.
2.2. राईट टू रिकॉल कानूनों की सीधी मांग सबसे पहले अहिंसामूर्ती महात्मा चंद्रशेखर आजाद द्वारा की गयी थी। 1 जनवरी 1925 को अहिंसामूर्ती महात्मा चंद्रशेखर आज़ाद तथा अहिंसामूर्ती महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल ने HRA = हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन की स्थापना की। यह वही संगठन था जिसमे रहकर अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह तथा उनके सहयोगियों ने पुलिस प्रमुख सैंडर्स के वध की योजना बनायी थी। 1 जनवरी 1925 को जारी हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के घोषणापत्र में कहा गया कि -
.
"In this Republic (that we wish to create) the electors shall have the right to recall their representatives, if so desired, otherwise the democracy shall become a mockery."
.
"जिस गणराज्य की हम स्थापना करना चाहते है, उसमे मतदाताओं के पास यह अधिकार होगा कि वे आवश्यकता होने पर निर्वाचित प्रतिनिधियों को रिकॉल कर सकें। अन्यथा लोकतंत्र एक मजाक बन कर रह जायेगा !!"
.
1925 ई. में राइट टू रिकॉल की यह मांग किसी अटकल में नही की गयी थी, बल्कि इसके पीछे वास्तविक राजनैतिक अनुभव था। 1919 ई. में भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत पहली एवं 1923 में दूसरी बार चुनाव आयोजित किये गये थे, और उसमे निर्वाचित होने वाले अधिकांश भारतीय प्रतिनिधि चुने लिए जाने के अगले ही दिन भ्रष्ट हो गये। इससे सीख लेकर अहिंसामूर्ती महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल जैसे बुद्धिमान व्यक्तियों ने राइट टू रिकॉल की अनिवार्यता को महसूस किया और वर्षों पूर्व 1925 ई. में इसकी जरुरत बता दी !!
.
मतलब, जब लोकतंत्र नहीं आया था और सभी भारतीयों के पास वोटिंग राइट्स तक नहीं थे, तब इन महात्माओं ने संकेत भर से यह ताड़ लिया था, कि सिर्फ चुनने का अधिकार होने से कोई बदलाव नहीं आयेगा, बदलाव के लिए यह जरुरी है कि नागरिको के पास प्रतिनिधियों को हटाने का अधिकार भी रहे !! इससे अंदाजा मिलता है कि उनमें कितना सहज कॉमन सेन्स था !!
.
पेड मीडिया एवं धनिक वर्ग राइट टू रिकॉल कानूनो के अत्यंत विरोधी है। चूंकि अधिकांश बुद्धिजीवी, पाठ्यपुस्तक लेखक आदि धनिक वर्ग की कृपा पर टिके हुए है, अत: इन सभी बुद्धिजीवियों ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि समाचार पत्रों और पाठ्यपुस्तकों में राइट टू रिकॉल पर किसी भी प्रकार की जानकारी बिलकुल नही दी जानी चाहिए।।
.
इस हद तक कि भारत के इन बुद्धिजीवियों ने अपने स्तभों और पाठ्यपुस्तकों में इन तथ्यों को दर्ज करने से भी इनकार कर दिया है कि, अमेरिका के नागरिकों के पास जिला पुलिस प्रमुखों और जजों को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया है।
.
उन्हें भय है कि भारतीयों को यह जानकारी मिल गयी तो वे इस दिशा में सोचना शुरू कर सकते है। इतना ही नहीं राईट टू रिकॉल के इन विरोधियो ने HSRA के ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण दस्तावेज का भी पाठ्यपुस्तक में इसीलिए उल्लेख नहीं किया। आज, शायद ही कोई युवा यह जानता है कि अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह जी राईट टू रिकॉल कानूनों की मांग कर रहे थे !!
.
2.3. आजादी आने के बाद जब एक्टिविस्ट्स ने देखा कि अंग्रेजो के जाने के बाद जिन लोगो के पास सत्ता आई है वे प्रजा हितो की अवहेलना कर रहे है तो उन्होंने विभिन्न स्तरों पर फिर से इन कानूनों की मांग करना शुरू किया। इस तरह छोटे छोटे एक्टिविस्ट लगातार नागरिको को इन कानूनों के बारे में जानकारी देकर यह मांग खड़ी करने के लिए काम करते रहे।
.
अंतत कार्यकर्ताओ के दबाव में 1974 में कम्युनिस्ट पार्टी ने राईट टू रिकॉल mp के लिए लोकसभा में बिल पेश किया था, जिसका वाजपेयी ने समर्थन भी किया था। संसद में वाजपेयी द्वारा दिया गया उद्बोधन --
.
"Sir, I stand to support Right to recall bill. Should the people sleep for 4 years and 364 days and wake up for one day for exercise their vote ? what should be done if they elected for seva but acquire meva ?

should the people watch in silence if they get elected for kaam but make daam instead for work ? switzerland is a small country so its example cannot be applied here. soviet russia is a big country so its example cannot be applied here. it is a communist country too, so its example cannot be applied here. so why dont you introduce something new in democracy ?"
.
"महोदय, मैं यहाँ राईट टू रिकॉल के समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हूँ, और सरकार से पूछना चाहता हूँ कि, जब सांसद सेवा करने का वादा करके सत्ता में आकर मेवा खाने लगे, और काम करने की जगह दाम कमाने लगे, तो क्या भारत की जनता अगले 5 वर्षो तक सोती रहेगी ? और फिर 5 साल में एक दिन के लिए वोट डालने के लिए उठेगी ?

क्या भारतीयों के पास अपने भ्रष्ट प्रतिनिधियों को रिकॉल करने के अधिकार नहीं होना चाहिए। आप कहते है स्विट्जर्लेंड छोटा है, इसीलिए रिकॉल भारत में लागू नहीं होना चाहिए, रूस बड़ा है इसीलिए रिकॉल यहाँ लागू नहीं होना चाहिए, और वह देश साम्यवादी भी है !! तो लोकतंत्र में आप किसी नए फार्मूले का अविष्कार क्यों नहीं करते !!"
.
किन्तु जब वाजपेयी 1998 में और 1999 में सत्ता में आये तो उन्होंने राईट टू रिकॉल गेजेट में छापने से इंकार कर दिया था।
.
जब इन कानूनों की मांग खड़ी होने लगी तो विपक्ष के सभी नेताओं ने इस मांग का समर्थन करना शुरू किया। जनता पार्टी ने 1977 के चुनाव में राईट टू रिकॉल की मांग को अपने मेनिफेस्टो में शामिल किया था। तब लालू, मुलायम, पासवान, सुब्रह्मनियम स्वामी, नितीश कुमार, वाजपेयी, आडवानी आदि सभी युवा नेता राईट टू रिकॉल कानूनों का समर्थन कर रहे थे। किन्तु 1977 में चुनाव जीतने के साथ ही सभी नेता इन कानूनों के खिलाफ हो गए, और उन्होंने राईट टू रिकॉल क़ानून छापने से मना कर दिया। मेनिफेस्टो का टेक्स्ट -
.
"introduce electoral reforms after a careful consideration of suggestions made by various committees, including the Tarkunde Committee and, in particular, consider proposals for recall of errant legislators and for reducing election costs as well as the voting age from 21 to 18."
.
"तारकुंडे समिति सहित विभिन्न समितियों द्वारा दिए गए सुझावों पर सावधानी पूर्वक विचार करने के बाद और विशेष रूप से, भटक चुके विधायकों को वापस बुलाने, और चुनाव की लागत को कम करने , व मतदान की उम्र 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करने के प्रस्तावों को शामिल करते हुए चुनावी सुधार किये जायेंगे।"
.
तब कई छोटे एक्टिविस्ट्स जो राईट टू रिकॉल में मानते थे उन्होंने जनता पार्टी से किनारा कर लिया, और फिर से अपने अपने स्तर पर नागरिको में इन कानूनों की जानकारी पहुंचानी शुरू की, ताकि नागरिको में राईट टू रिकॉल की मांग खड़ी की जा सके।
.
2.4. सन 2000 के आस पास राईट टू रिकॉल आन्दोलन में एक और बड़ा परिवर्तन आया और यह आन्दोलन ड्राफ्ट केन्द्रित हो गया। दरअसल जनता पार्टी ने सत्ता में आने के बाद अगले 10 महीने तक यह कहकर टाइम पास किया था कि, राईट टू रिकॉल कानून किन किन पदों पर हमें लाने चाहिए और इनकी क्या प्रक्रिया होगी, इस बारे में विचार करना पड़ेगा, और विचार करने के लिए उन्होंने एक कमेटी बना दी।
.
इस तरह उन्होंने 10 महीने बर्बाद कर दिए। एक्टिविस्ट्स ने इस बात को समझ लिया था कि यदि हमने राईट टू रिकॉल की मांग को गंभीर और स्पष्ट रूप से आगे बढ़ाना है, तो सबसे पहले हमें इसका ड्राफ्ट चाहिए।
.
2008 तक आते आते कई एक्टिविस्ट ड्राफ्ट आधारित राईट टू रिकॉल का प्रचार करने लग गए थे। उन्होंने ड्राफ्ट के पर्चे छपवाकर नागरिको बांटने शुरू किये। इसी दौरान देशबन्धु राजिव जी दीक्षित ने भी राईट टू रिकॉल कानूनों का समर्थन करना शुरू किया। नवम्बर 2010 में वे राईट टू रिकॉल के समर्थन में और ऍफ़ डी आई के खिलाफ एक देश व्यापी आन्दोलन शुरू करने वाले थे, किन्तु इसके सप्ताह भर पहले रहस्यमयी परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी।
.
2.5. हमारे विचार में आजादी के बाद से राईट टू रिकॉल आन्दोलन लगातार असफल इसीलिए रहा क्योंकि रिकालिस्ट्स राईट टू रिकॉल के क़ानूनो के ड्राफ्ट्स नागरिको के सामने नहीं रख सके। क़ानून ड्राफ्ट के अभाव में राईट टू रिकॉल के समर्थक देश के नागरिको को यह समझाने में नाकाम रहे कि राईट टू रिकॉल की प्रक्रिया -
.
(a) तेजी से काम करती है।
(b) सस्ती है।
(c) अस्थिरता से रक्षा करती है।
(d) मतदाताओं की खरीद फरोख्त को रोकती है।
(e) पेड मीडिया की मतदाताओ को भ्रमित करने की ताकत में कमी लाती है।
(f) उम्मीदवारों द्वारा मतदाताओं को धमकाने से रक्षा प्रदान करती है।
(g) पारदर्शिता होने के कारण इस प्रक्रिया में धोखाधड़ी नहीं की जा सकती।
.
क़ानून ड्राफ्ट नही होने के कारण राईट टू रिकॉल के विरोधी ब्रांडेड लोग भारतीयों के दिमाग में यह भ्रम डालने में सफल रहे कि राईट टू रिकॉल आने से अस्थिरता आएगी, यह बहुत महंगा पड़ेगा, मतदाता अपना वोट बेच देंगे, रोज चुनाव होने लगेंगे , मतदाताओं को धमकाया जायेगा आदि आदि। किन्तु ड्राफ्ट सामने आने के बाद अब स्थिति पलट गयी है। जैसे जैसे कार्यकर्ताओ तक ड्राफ्ट पहुँच रहे है वैसे वैसे राईट टू रिकॉल के विरोधियो की नागरिको को भ्रमित करने की शक्ति घटती जा रही है।
.
(3) राईट टू रिकॉल के सच्चे एवं छद्म समर्थक की पहचान :
.
राईट टू रिकॉल क़ानूनो के सच्चे एवं फर्जी समर्थको में अंतर सिर्फ एक चीज से किया जाता है - ड्राफ्ट यानी राईट टू रिकॉल की प्रक्रिया
.
कृपया इस बात पर ध्यान दें कि लफ्ज राईट टू रिकॉल अपने आप में एक लेबल है, अत: सिर्फ राईट टू रिकॉल शब्द के उच्चारण से यह बोध नहीं होता कि यह क़ानून क्या है, एवं कैसे काम करेगा। इसके लिए हमें क़ानून ड्राफ्ट अर्थात इसकी प्रक्रिया देखनी होती है।
.
उदाहरण के लिए जिला पुलिस प्रमुख पर राईट टू रिकॉल का क़ानून ड्राफ्ट अलग होगा और पीएम पर यह अलग तरीके से काम करेगा। इस तरह कई पदों को शामिल करते हुए दर्जनों पदों पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं लायी जा सकती है। जिस भी पद पर हम राईट टू रिकॉल लाना चाहते है उसके लिए हमें एक अलग ड्राफ्ट चाहिए होगा, और इस ड्राफ्ट को गेजेट में प्रकाशित करने से ही देश में अमुक पर राईट टू रिकॉल लागू होगा।
.
अत: सच्चे समर्थक द्वारा जब भी राईट टू रिकॉल लफ्ज का प्रयोग किया जाता है तो इसके साथ पद का नाम अवश्य जोड़ा जाता है, जैसे - राईट टू रिकॉल पीएम, राईट टू रिकॉल एसपी, राईट टू रिकॉल जज आदि।
.
और यदि कोई व्यक्ति राईट टू रिकॉल पीएम की बात करता है किन्तु इसकी प्रक्रिया का ड्राफ्ट सामने नहीं रखता, तो हमें यह मालूम नहीं होता कि पीएम को रिकॉल कैसे किया जाएगा। क्योंकि प्रक्रिया ही यह तय करती है कि रिकॉल का ड्राफ्ट अच्छे नतीजे देगा या नहीं। एक छद्म समर्थक सिर्फ राईट टू रिकॉल लफ्ज का समर्थन करता है, किन्तु इसका ड्राफ्ट कभी नहीं देता।
.
कृपया इस बात को पुन: नोट करे कि -- एक छद्म समर्थक सिर्फ राईट टू रिकॉल लफ्ज का समर्थन करता है, किन्तु इसका ड्राफ्ट कभी नहीं देता।
.
(4) राईट टू रिकॉल के छद्म समर्थन के कुछ उदाहरण :
.
जैसे मैंने ऊपर बताया कि यह एक प्रकार का रोटेशन है। इसमें छोटे कार्यकर्ताओ द्वारा नागरिको में मांग खड़ी की जाती है, और जब मांग खड़ी हो जाती है तो धनिकों के दबाव या इशारे पर नेता वगेरह आकर विभिन्न तरीको से इसे तोड़ने का काम करते है। मीडिया एक्सेस होने के कारण वे 10-20 वर्षो में किये गए काम को सिर्फ 1 दिन में ही गिरा देते है।
.
अत: आज तक राईट टू रिकॉल के बारे में आपने पेड मीडिया में जितना भी सुना है वह सब इसीलिए सुना है क्योंकि कई सारे छोटे छोटे कार्यकर्ता जब हलचल मचाने जितनी मांग खड़ी कर देते है तो नेता इस पर मुहँ खोलने के लिए बाध्य हो जाते है। और जब भी वे मुहँ खोलते है तो राईट टू रिकॉल के बारे में कोई नकारात्मक डायलोग बोलकर मूवमेंट को कई सालो पीछे धकेल देते है।

4.1. ड्राफ्ट विहीन मौखिक समर्थक : अरविन्द केजरीवाल, राहुल गांधी, नितीश कुमार, शिवराज चौहान, जैसे दर्जनों नेता राईट टू रिकॉल का मौखिक समर्थन कर चुके है। पर वे कभी भी इसके साथ पोस्ट का नाम नहीं बोलते, और ड्राफ्ट देने का तो खैर सवाल ही नहीं है। जनरल वी के सिंह जी भी एक टाइम पर राईट टू रिकॉल के ड्राफ्ट विहीन मौखिक समर्थक थे। लेकिन जैसे ही बीजेपी=संघ के टिकेट पर उन्होंने चुनाव जीता, वैसे ही वे राईट टू रिकॉल के विरोधी हो गए।
.
4.2. चिल्लर पदों पर राईट टू रिकॉल के समर्थक : द अन्ना इसमें मुख्य रूप से शामिल है। द अन्ना सरपंच और उप सरपंच पर राईट टू रिकॉल का मौखिक समर्थन करते है। किन्तु अन्य सभी पदों पर राईट टू रिकॉल का विरोध करते है। और ड्राफ्ट देने का तो खैर सवाल ही नहीं पैदा होता। पर इस प्रकार का समर्थन भी वे सिर्फ मीडिया में ही करते है, व्यवहार में नहीं।
.
उदाहरण के लिए उनके खुद के गाँव रालेगन सिद्धी में राईट टू रिकॉल सरपंच का क़ानून नहीं है। पर उन्होंने इसकी मांग के लिए कभी सीएम को एक चिट्ठी तक न लिखी, अनशन तो दूर की बात है। दरअसल वे यदि राईट टू रिकॉल की मांग उठाने लगेंगे तो पेड मीडिया से उनका प्लग खींच लिया जाएगा। सारा जलवा पेड मीडिया से ही होता है, और मीडिया एक्सेस कोई गंवाना नहीं चाहता।
.
4.3. राईट टू रिकॉल के विरोधी : सुब्रह्मनियम स्वामी इसमें शामिल है। वे कहते है राईट टू रिकॉल नॉन सेन्स है और इससे अस्थिरता आएगी। किन्तु वे यह कभी नहीं बताते कि वे राईट टू रिकॉल के किस पद पर किस प्रक्रिया की बात कर रहे है जिससे अस्थिरता आएगी !! और वे जनता पार्टी के 1977 के उस मेनिफेस्टो को सार्वजनिक करने से भी इनकार करते है, जिसमे राईट टू रिकॉल शामिल था !!
.
4.4. पेड बुद्धिजीवी विरोधी : ये लोग कहते है कि इससे रोज चुनाव होंगे, यह संविधान के खिलाफ है आदि। पर जब इनसे पुछा जाता है कि, वे किस पद की कौनसी प्रक्रिया के आधार पर यह बात कर रहे है तो, वे कोई जवाब नहीं देते।
.
4.5. खामोश विरोधी : बहुत बड़े शीर्ष लोग जैसे सोनिया गांधी, मोदी साहेब, मनमोहन सिंह जी आदि इसमें शामिल है। वे राईट टू रिकॉल पर कभी कुछ नहीं बोलते है। यदि ये इस पर बोलेंगे तो एक साथ बहुत सारे लोगो तक इन कानूनों की जानकारी पहुँच जायेगी।
.
1977 से पहले कब किस नेता ने राइट टू रिकॉल का समर्थन किया था, इस बारे में आपको कहीं कोई स्त्रोत उपलब्ध नहीं है। सिर्फ 1977 का मेनिफेस्टो है, जो यह बताता है कि तब कार्यकर्ता इस मांग को इतना आगे बढाने में सफल हो गए थे कि, उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की पार्टी को अपने मेनिफेस्टो में राईट टू रिकॉल डालने के लिए मजबूर कर दिया था।
.
किन्तु ड्राफ्ट न होने के कारण सत्ता में बैठे नेता टाइम पास करके मामला फेल करने में सफल रहे। तब से लालू से लेकर नितीश तक सभी सत्ता में आये पर उन्होंने हमेशा राईट टू रिकॉल का विरोध किया। इंदिरा जी भी राईट टू रिकॉल कानूनों की विरोधी थी।
.
इस तरह 1977 से 2008 तक मूवमेंट साइलेंट मोड में और धीरे धीरे सरकती रही। 1977 से 2010 तक किसी भी नेता या बड़े आदमी ने राईट टू रिकॉल पर मुहँ नहीं खोला। किन्तु 2008 में इंटरनेट और ड्राफ्ट आ जाने के कारण एक्टिविस्ट्स की पहुंच नागरिको तक और भी ज्यादा प्रभावी ढंग से बढ़ने लगी, और 2011 से 2019 तक कार्यकर्ता कई सारे बड़े नेताओं को इस बारे में बोलने के लिए बाध्य कर चुके है।
.
4.6. घटिया ड्राफ्ट वाले विरोधी : राईट टू रिकॉल मूवमेंट में अगला बड़ा मोड़ तब आया जब श्री वरुण गांधी ने 2016 में राईट टू रिकॉल सांसद का ड्राफ्ट प्रस्तावित किया। यह राईट टू रिकॉल मूवमेंट को तोड़ने का सबसे बड़ा कदम था। उन्होंने इसमें ऐसी प्रक्रिया रखी है कि सांसद को कभी भी रिकॉल न किया जा सके !! लेकिन अब चूंकि कार्यकर्ताओ प्रक्रिया के महत्त्व को समझ चुके थे, कार्यकर्ताओ ने उनके घटिया ड्राफ्ट को खारिज कर दिया।
.
———
.
तो अहिंसा मूर्ती महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल एवं अहिंसा मूर्ती महात्मा चंद्रशेखर आजाद से प्रारंभ हुयी यह मांग कई प्रकार के चरणों से गुजरती हुयी देश में आगे बढ़ रही है। जवाहर लाल एवं कोंग्रेस के शीर्ष नेता क्रांतिकारियों से इस वजह से भी नाराज रहते थे, क्योंकि क्रांतिकारियों में राईट टू रिकॉल की मांग काफी प्रबल हो चुकी थी। दरअसल स्थानीय निकायों के चुनावों में जो भारतीय नेता चुनकर जा रहे थे वे सब जीतने के साथ ही अंग्रेजो की हाँ में हाँ मिलाने लग जाते थे। और अंग्रेज तब भी मीडिया कवरेज उसे ही दिलवाते थे जो उनकी चमचा गिरी करता था। आप इतिहास की पेड पाठ्यपुस्तको में जो भी पढ़ते है, वह ज्यादातर इन चमचो का ही इतिहास है।
.
क्रांतिकारियों ने जब रिकॉल की मांग करना शुरू की तो, अंग्रेजो एवं धनिकों पर आश्रित भारत के तब के सभी नेता इन क्रांतिकारियों के खिलाफ हो गए थे। पर राईट टू रिकॉल कानूनों में एक पहलू यह है कि कोई भी नेता इन कानूनों का विरोध सार्वजनिक रूप से नहीं कर पाता। क्योंकि ऐसा करना अलोकतांत्रिक नजर आता है।
.
आखिर कोई राजनेता यह बात सार्वजनिक रूप से कैसे कह सकता है कि, जनता के पास सिर्फ चुनने का अधिकार होना चाहिए, हटाने का नहीं। यदि वे पेड बुद्धिजीवियों द्वारा दिए जा रहे इस बकवास तर्क कि "भारतीय जाहिल, अशिक्षित, गवांर, और मूर्ख है" इसीलिए इन्हें रिकॉल का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, कहेंगे तो जनता उन्हें वोट करना बंद कर देगी।
.
अत: जनता को कोसने और उन्हें नीचा दिखाने के लिए इस बकवास तर्क का इस्तेमाल सिर्फ पेड बुद्धिजीवी करते है, नेता नहीं। आजादी से पहले भारतीयों को वोटिंग राइट्स न देने के लिए गोरे इस बकवास का इस्तेमाल किया करते थे। तब भी भारत की पढ़ी लिखी एलिट क्लास अग्रेजो के इस तर्क का समर्थन करती थी, और आज भी भारत के पेड बुद्धिजीवी खुद को बुद्धिमान दर्शाने के साथ साथ आम भारतीयों का मोरल डाउन करने के लिये इसी पैंतरे का इस्तेमाल करते है !!
.
1947 में आजादी आने के बाद भी कोंग्रेस और क्रांतिकारियों में रिकॉल को लेकर यह विरोध बना रहा। तब कार्यकर्ताओ ने संविधान में राईट टू रिकॉल को शामिल किये जाने के लिए जवाहर लाल पर काफी दबाव बना दिया था। किन्तु भारत का धनिक वर्ग जैसे टाटा, बिरला, साराभाई, गोदरेज आदि एवं अंग्रेज नहीं चाहते थे कि रिकॉल को संविधान में जोड़ा जाए, अत: संविधान सभा में इसकी बहस होकर रह गई, पर इसे संविधान में जोड़ा नहीं गया !!
.
(5) राईट टू रिकॉल आन्दोलन का स्ट्रक्चर
.
राईट टू रिकॉल एक नेतृत्व विहीन, संगठन विहीन आन्दोलन है। छोटे छोटे एक्टिविस्ट* अपने जीवन काल में कुछ 3-4 साल तक पार्ट टाइम रूप से इनका प्रचार करते है, और फिर अन्य कार्यो जैसे करियर सामाजिक जिम्मेदारी आदि में व्यस्त होकर कई वर्षो तक एक्टिविज्म से बाहर हो जाते है, और अनुकूलता होने पर फिर से काम करने लगते है।
.
तब तक कुछ नए लोग आ जाते है, और काम आगे बढाते है। फिर ये अपना योगदान देकर चले जाते है, और दुसरे आते है। इस तरह यह मॉस मूवमेंट आगे बढ़ता रहता है। इसमें कोई फंडिंग वगेरह की भी व्यवस्था नहीं है। जो भी कार्यकर्ता इन कानूनों का प्रचार करते है, उसके लिए खर्च भी खुद ही उठाते है।
.
चूंकि राईट टू रिकॉल एक राजनैतिक मांग है, और किसी राजनैतिक मांग को उठाने का सबसे अनुकूल समय चुनाव होता है, अत: 2010 से पहली बार एक्टिविस्ट्स ने राईट टू रिकॉल क़ानून ड्राफ्ट्स के मुद्दों पर निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ना भी शुरू किया, और पिछले 10 वर्षो में लगभग 10–12 एक्टिविस्ट्स इन मुद्दों पर अलग अलग सीटो से चुनाव भी लड़ चुके है।
.
इस तरह सीमित संसाधनों का इस्तेमाल करके विकेन्द्रित तरीके से नागरिको में इन कानूनों का प्रचार आगे बढ़ते रहता है और यह आन्दोलन छोटे छोटे कार्यकर्ताओ के प्रयासों से धीरे धीरे आगे खिसक रहा है।
.
(*) एक्टिविस्ट कौन है ?
.
सभी राजनैतिक पार्टीयों जैसे बीजेपी=संघ, कोंग्रेस, सपा, बसपा, आपा के छोटे छोटे ग्रास रूट कार्यकर्ता, एवं समर्थक। सभी अराजनैतिक संगठनों, एन जी ओ, समितियों आदि के सदस्य। ऐसे सभी नागरिक जो राजनैतिक खबरों को फोलो करते है, राजनैतिक विमर्श करते है, और व्यवस्था में परिवर्तन के लिए अपनी सीमाओं में छोटे छोटे प्रयास करते है। ये सभी एक्टिविस्ट की श्रेणी में आते है। एक नामी आदमी या नेता बहुधा एक्टिविस्ट नहीं होते। वे धनिक वर्गों के हाथो बिक चुके होते है।
.
कोई भी देश मजबूत बनेगा या कमजोर होकर ख़त्म हो जाएगा, यह उस देश के एक्टिविस्ट मेटेरियल पर सबसे ज्यादा निर्भर करता है। यदि एक्टिविस्ट मेटेरियल अच्छा होगा तो देश बचेगा वर्ना धनिक वर्ग क़ानून बनाकर देश को लूट लेगा।
.
यदि एक्टिविस्ट नागरिको को अच्छे कानूनों के बारे में सूचित करने में कामयाब हो जाते है, तो नागरिक एक्टिविस्ट की मांगो का समर्थन करने लगते है। और नेताओं का काम यह देखना है कि जनता किस तरफ जा रही है। यदि जनता एक्टिविस्ट्स की तरफ जाने लगती है तो नेता एक्टिविस्ट्स की मांगो की तरफ लुढ़कने लगते है। वर्ना धनिकों के पाले में बने रहते है।
.
(6) राईट टू रिकॉल क़ानून ड्राफ्ट्स भारत में कब तक लागू हो सकते है ?
.
अब भारत में इन कानूनों की मांग कब खड़ी हो पाएगी कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। सारा मामला ड्राफ्ट की रीडरशिप पर टिका हुआ। एक्टिविस्ट्स को देश के करोड़ो नागरिको तक ड्राफ्ट पहुंचाने है, और उन्हें राजी करना है कि वे इन्हें पढ़ कर समझे। तो यह एक जटिल और थका देने वाला कार्य है।
.
इसकी बजाय पेड मीडिया के पास नारे, लेबल और घोषणाएं है, जिन्हें नागरिको तक पहुँचाना बहुत आसान होता है। भारत के ज्यादातर एक्टिविस्ट इस समय पेड मीडिया के चपेट में होने के कारण नारे एवं घोषणाएं जल्दी लपकते है, और इनसे कन्विंस हो जाते है।
.
उदाहरण के लिए पेड मीडिया में कोई नेता आकर सिर्फ यह डायलोग बोलकर चला जाता है कि - "राईट टू रिकॉल आने से अस्थिरता आएगी और रोज चुनाव होंगे" !! अब पेड मीडिया की चपेट में आये लोग इस डायलोग को पकड लेते है, और फिर जहाँ भी राईट टू रिकॉल का नाम आता है वहां वे यह डायलोग चिपका देते है। अब उनकी यह गलतफहमी तब तक दूर नहीं होती, जब तक कि वे ड्राफ्ट नहीं पढ़ते। और ड्राफ्ट की जानकारी पहुँचाने में काफी वक्त लगता है।
.
तो पेड मीडिया के स्पोंसर्स हमेशा एक नेता पकड़ कर लाते है, और उसके इर्द गिर्द ऐसा आभा मंडल खड़ा करते है, जिससे एक्टिविस्ट्स को यह विश्वास हो जाता है, कि यह मसीहा हमें और देश को बचाएगा। फिर अगला मसीहा और फिर अगला मसीहा का रोटेशन चलता रहता है। नेताओं एवं मसीहाओ के चक्कर में पड़कर कार्यकर्ता प्रक्रिया को तवज्जो नहीं देते, और कानूनों की मांग पिछडती जा रही है।
.
पिछले 90 साल से भारत में धनिक वर्ग ज्यादा प्रभावी ढंग से काम कर रहा है, जबकि भारत के एक्टिविस्ट्स उतने अच्छे तरीके से काम नहीं कर पा रहे है। और इस वजह से भारत में राईट टू रिकॉल क़ानून देश में लागू नहीं हो सका है। यदि भारत के एक्टिविस्ट नेताओं का पीछा करना छोड़ देते है और क़ानून ड्राफ्ट्स पर ध्यान केन्द्रित करते है, तो इन कानूनों की मांग खड़ी होने लगेगी, और राज नेता इन्हें गेजेट में छापने के लिए बाध्य हो जायेंगे।
.
1991 के बाद से धनिक वर्ग एवं एक्टिविस्ट्स के शक्ति अनुपात में एक बड़ा परिवर्तन आ गया है। अब भारत के धनिक वर्ग को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको ने प्रतिस्थापित कर दिया है।
.
1925 से 1947 तक यह लड़ाई ब्रिटिश से थी, फिर 1947 से 1990 तक यह लड़ाई भारतीय धनिकों के साथ थी, और अब एक्टिविस्ट्स की यह लड़ाई फिर से विदेशियों के खिलाफ हो गयी है। किन्तु इस बार ये विदेशी अमेरिकी है, और वे ब्रिटिश एवं भारतीय धनिकों से कई गुना ज्यादा ताकतवर है। और उनका सबसे ताकतवर हथियार है, पेड मीडिया।
.
तो पेड मीडिया ने भारत के ज्यादातर एक्टिविस्ट्स की हालत भीष्म पितामह जैसी कर दी है। मतलब वे किसी न किसी ब्रांडेड नेता या पार्टी से उसी तरह बंधे हुए है जिस तरह भीष्म पितामह हस्तिनापुर की गद्दी एवं महाराज के प्रति निष्ठा से बंधे हुए थे !!
.
(7) क्या किसी अन्य देश में ऐसा कोई क़ानून है ?
.
राईट टू रिकॉल कई देशो में है, किन्तु यह प्रतीकात्मक स्तर तक का है। राईट टू रिकॉल कैसे नतीजे देगा यह निर्भर करता है प्रक्रिया पर। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश / कर्नाटक में कोर्पोरेटर पर कमजोर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं है। जापान में जजों पर राईट टू रिकॉल है, किन्तु यह अमेरिका जितना प्रभावी नहीं है। चीन में भी स्थानीय स्तर पर कुछ चिल्लर पदों पर रिकॉल है।
.
दुनिया में सबसे मजबूत रिकॉल प्रक्रियाएं अमेरिका में है, और यह बेहद महत्तवपूर्ण पदों पर है। जैसे वहां पर जज, पुलिस प्रमुख, शिक्षा अधिकारी, मुख्यमंत्री, मेयर, पब्लिक प्रोसिक्यूटर आदि पदों पर रिकॉल है। राईट टू रिकॉल दूसरी वजह है जिससे अमेरिका तकनिकी उत्पादन में पूरी दुनिया से आगे बेहद आगे निकल गया। पहली वजह, जूरी सिस्टम और वेल्थ टेक्स का होना है
.
(8) इसके फायदे और नुकसान क्या है ?
.
इसके फायदे और नुकसान इसके ड्राफ्ट एवं पद पर निर्भर करते है। अत: जब तक आप यह नहीं बताते कि आप किस पद पर रिकॉल की बात कर रहे है, और इसकी प्रक्रिया क्या है, तब तक कुछ कहा नहीं जा सकता। आपने जिस भी व्यक्ति से यह लफ्ज सुना है कृपया उससे राईट टू रिकॉल का ड्राफ्ट मांगे।
.
(9) मेरे द्वारा समर्थित राईट टू रिकॉल पीएम क़ानून ड्राफ्ट की विशेषताएं :
.
मेरे द्वारा समर्थित राईट टू रिकॉल पीएम का पूरा क़ानून ड्राफ्ट यहाँ देखा जा सकता है -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;

.
इस प्रक्रिया की विशेषताओ के मुख्य बिंदु निम्नलिखित है :
.
9.1. उम्मीदवारी - 30 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी व्यक्ति जो सांसद का चुनाव लड़ने की योग्यता रखता है वह किसी भी दिन कलेक्ट्री में PM बनने के लिए अपना आवेदन जमा कर सकता है। जिस दिन आवेदन जमा होगा उसी दिन से अमुक व्यक्ति उम्मीदवार मान लिया जाएगा।
.
विशेषता : आज भारत में यह व्यवस्था है कि वोटिंग के सिर्फ 15 दिन पहले ही चुनाव आयोग द्वारा उम्मीदवार घोषित किया जाता है। बड़ी पार्टियों के पास पूरे देश में लाखों कार्यर्कार्ताओ का नेटवर्क होने और पेड मीडिया एक्सेस होने के कारण वे सभी मतदाताओं तक पहुँच जाते है, किन्तु छोटा उम्मीदवार 1% मतदाताओं तक भी नहीं पहुँच पाता।
.
इससे जिसके पास प्रचार मशीनरी पर पैसा फूंकने की क्षमता है वही व्यक्ति फायदे में रहता है। इस प्रस्ताव में कोई भी व्यक्ति चुनाव के 5 वर्ष पहले भी अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर सकेगा, और वह अपने सीमित संसाधनों से प्रचार करता रह सकता है। इससे छोटे किन्तु अच्छे उम्मीदवार बढ़त बनाना शुरू कर देंगे।
.
9.2. उम्मीदवार को स्वीकृत करना - भारत का कोई भी मतदाता अपनी पसंद के अधिकतम 5 उम्मीदवारो को PM के लिए स्वीकृत कर सकता है।
.
विशेषता : एक मतदाता इसमें 5 अनुमोदन दे सकता है। इस प्रकार की वरीय मतदान प्रणाली के कारण नकारात्मक मतदान में कमी आ जाती है। मान लीजिये कि आप मोदी साहेब को पीएम बनाना चाहते है तो पहली पसंद के रूप में उन्हें अनुमोदित करेंगे और फिर किसी छोटे या अच्छे उम्मीदवार को भी अनुमोदित कर सकेंगे। इस प्रक्रिया में जातिय आधार पर लड़ने वाले उम्मीदवार पिछड़ जाते है।
.
9.3. स्वीकृति दर्ज करना - मतदाता किसी भी दिन किसी भी उम्मीदवार को स्वीकृत कर सकते है या किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में दी गयी स्वीकृति रद्द कर सकते है।
.
विशेषता : यह धारा राईट टू रिकॉल की रचना करती है। यदि आप पाते है कि पीएम ने किसी मामले में गलत फैसला लिया है तो आप उसका अनुमोदन रद्द करके किसी दुसरे व्यक्ति को दे सकते है। किन्तु इस बात पर विशेष ध्यान दें कि केवल आपके अनुमोदन रद्द करने से पीएम का रिकॉल नहीं होगा। रिकॉल होने के लिए यह जरुरी है कि करोड़ो लोग अपना अनुमोदन बदलें।
.
9.4. स्वीकृति दर्ज करने के तरीके - मतदाता पटवारी कार्यालय में उपस्थित होकर किसी उम्मीदवार के पक्ष में हाँ / नहीं दर्ज कर सकते है , या मोबाईल एप द्वारा या अपने रजिस्टर्ड मोबाईल नंबर से SMS करके या ATM से भी अपनी स्वीकृति दर्ज करवा सकते है।
.
विशेषता : यह प्रक्रिया खर्चा बचाती है। और आपको किसी भी दिन अपना अनुमोदन दर्ज करने या रद्द करने की सुविधा देती है। मतलब अनुमोदन की प्रक्रिया 24*7 घंटें शुरू रहती है।
.
9.5. PM की नियुक्ति - यदि किसी उम्मीदवार की स्वीकृतियों की संख्या कार्यरत PM से 1 करोड़ अधिक हो जाती है तो PM त्याग पत्र दे सकते है , या सांसद अमुक उम्मीदवार को नया PM नियुक्त कर सकते है, या उन्हें ऐसा करने की आवयश्कता नही है। इस सम्बन्ध में सांसदों का निर्णय अंतिम होगा।
.
स्पष्टीकरण : मान लीजिये कि पीएम बनने के 2 साल बाद तक मोदी साहेब के अनुमोदन 43 करोड़ है। किन्तु जब तक किसी अन्य उम्मीदवार को 44 करोड़ अनुमोदन नहीं मिल जाते तब तक यह धारा सक्रीय नहीं होगी।
.
अब मान लीजिये कि एक के बाद एक गलत फैसलों के कारण 3 साल बाद मोदी साहेब के अनुमोदन गिर कर 30 करोड़ हो जाते है। किन्तु यदि तब भी राहुल गांधी के अनुमोदनो की संख्या 18 करोड़, केजरीवाल जी के अनुमोदनो की संख्या 4 करोड़। माया-मुलायम-नितीश की 2 करोड़ और योगी आदित्यनाथ के अनुमोदनो की संख्या 10 करोड़ है, तब भी यह धारा सक्रिय नहीं होगी, और मोदी साहेब पीएम बने रहेंगे।
.
अब मान लीजिये कि, अगले 6 महीने में योगी आदित्यनाथ यूपी में अच्छा काम करते है और इसी दौरान मोदी साहेब अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे है, और इस वजह से बीजेपी=संघ के सपोर्टर मोदी साहेब के अनुमोदन रद्द करके योगी जी देना शुरू करते है, और योगी जी के अनुमोदन बढकर 25 करोड़ व मोदी साहेब के अनुमोदन 24 करोड़ रह जाते है तो यह धारा सक्रीय हो जायेगी।
.
किन्तु अब भी यदि सांसद मोदी साहेब को ही पीएम बनाए रखना चाहते है तो मोदी साहेब ही पीएम बने रहेंगे। क्योंकि हमारे संविधान के अनुसार पीएम को चुनने और निष्कासित करने का अधिकार सांसदों को है, अत: हमने संविधान के अनुकूल ही यह अंतिम अधिकार सांसदों के पास ही रखा है।
.
तो सांसद चाहे तो योगी जी पीएम बना देंगे और फिर योगी जी अपनी कैबिनेट बनायेंगे। यदि सांसद चाहते है कि मोदी साहेब पीएम बने रहे तो मोदी साहेब ही पीएम बने रहेंगे।
.
विशेषता : तो इस ड्राफ्ट को लागू करने के लिए संविधान संशोधन की जरूरत नहीं है, सिर्फ गेजेट में निकालने से यह लागू हो जाएगा। इसे लोकसभा या राज्यसभा से भी पास करने की जरूरत नहीं है। इससे अस्थिरता इसीलिए नहीं आएगी क्योंकि पूरी सरकार को डिस्टर्ब नहीं किया गया है, सिर्फ पीएम बदला जा रहा है। और बदलने की शक्ति भी सांसदों के पास ही है।
.
तो वह शक्ति तो आज भी सांसदों एक पास ही है। बस हमने इसमें जनता के अनुमोदन के सार्वजनिक प्रदर्शन को और जोड़ दिया है। इसमें वोटिंग नहीं है, बल्कि अनुमोदन है। अत: चुनाव आयोग का इसमें कोई दखल या लेना देना नहीं है।
.
9.6. क्या इससे अस्थिरता आएगी ?
.
ऊपर दी गयी प्रक्रिया के तहत तो बिलकुल नहीं। कोई भी पीएम की कुर्सी गंवाना नहीं चाहता। अत: जब पीएम देखता है कि उसके गलत फैसलों से जनता नाराज होकर अनुमोदन रद्द कर रही है, तो वह तुरंत शासन व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन लाना शुरू कर देता है। और इस वजह से उसके अनुमोदन फिर से बढ़ने लगते है।
.
आप अमेरिका का उदाहरण देख सकते है। वहां पर कई पदों पर रिकॉल है, किन्तु 20–30 सालो के दौरान भी कभी किसी अधिकारी को रिकॉल करने की जरूरत नहीं पड़ती। रिकॉल होने के कारण वे अपना काम काज सुधार लेते है। इस तरह राईट टू रिकॉल नेताओं एवं अधिकारियो के व्यवहार में परिवर्तन लाकर उन्हें चुस्त और ईमानदार बनाता है।
.
(10) भारत में राईट टू रिकॉल कानून आने से देश में क्या परिवर्तन आएगा ?
.
मेरे विचार में पीएम पर रिकॉल लाये बिना हम प्रधानमंत्री को जूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स, एमआरसीएम, वोइक, राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख, राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी आदि क़ानून गेजेट में छापने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। और बिना इन कानूनों के भारत की सेना को आत्मनिर्भर नहीं बनाया जा सकता।
.
और यदि हम सेना को आत्मनिर्भर बनाने में असफल हो जाते है तो यह तय है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत के सभी प्राकृतिक संसाधनों एवं राष्ट्रिय सम्पत्तियों का अधिग्रहण करके भारत को आर्थिक-सामरिक-धार्मिक रूप से गुलाम बना देगी !! राईट टू रिकॉल, जूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स लाये बिना इसे किसी भी तरह रोका नहीं जा सकता !!!
.
===========

Read full post →



Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Mar 27 2019 19:00:32 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Mar 28 2019 21:38:44 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

चुनाव आयोग ने गाजियाबाद सीट से राइट टू रिकॉल पार्टी के उम्मीदवार के रूप में आज 28 मार्च 2019 को राकेश जी सूरी चुनाव चिन्ह "बैटरी टार्च" जारी किया।

EVM पर राकेश जी सूरी का उम्मीदवार क्रम संख्या 8 हैं।

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Mar 30 2019 06:47:51 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

Shri krishna murty is contesting from Bangalore to print Jury Sys, Wealth Tax and Right to Recall laws in India.

Read full post →


Pawan Jury BhilwaraRj

Sat Mar 30 2019 15:09:25 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

देशी गाय को कैसे बचाया जा सकता है?
.
ऍफ़ डी आई को रोके बिना भारत में गाय को बचाया नहीं जा सकता। यदि ऍफ़ डी आई जारी रही तो 2050 तक हिन्दुओ का एक अच्छा खासा तबका गौ मांस खाने लगेगा, और गौ मांस भक्षण को सार्वजनिक स्वीकार्यता मिल जायेगी। देशी गाय की संख्या इतनी सिकुड़ चुकी होगी कि, इसके दूध एवं उत्पादो से मध्यम वर्ग तक वंचित हो जाएगा, और सिर्फ अमीर लोग ही इसका इस्तेमाल कर सकेंगे।
.
देशी गाय A2 दूध देती है, जो कि एक औषधि है। वर्ण संकर गाय, भैंस समेत शेष सभी अन्य दुधारू जानवर A1 दूध देते है। A2 एवं A1 दूध में क्या फर्क है, और क्यों A2 दूध एवं गौ मूत्र फायदेमंद है, इस बार में कृपया गूगल करें। मैंने जवाब में इस विवरण को शामिल नहीं किया है।
.
गाय को लेकर अमेरिकी-ब्रिटिश धनिको के दो लक्ष्य है :

देशी गाय के A2 दूध, गौ मूत्र आदि पर एकाधिकार बनाना
भारत में ज्यादातर हिन्दुओ को गौमांस खाने के लिए तैयार करना, ताकि धर्मांतरण किये जा सके।
.
देशी गाय के उत्पादों पर एकाधिकार बनाने के लिए वे कानूनों का इस्तेमाल करते है, और हिन्दु युवाओं को गौ मांस भक्षण की तरफ धकेलने के लिए उनके पास पेड मीडिया है।
.
( इस जवाब में चार खंड है। खंड (स) एवं (द) महत्त्वपूर्ण है। आप चाहे तो सीधे खंड (स) एवं (द) पढ़ सकते है। )
.
————
खंड (अ)
————
.
(1) मुग़लो के शासन काल में ज्यादातर समय तक गौ कशी निषिद्ध थी। बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहाँ आदि के काल में गौ हत्या पर प्रतिबंध जारी रहे। औरंगजेब के शासन के शुरूआती वर्षो में गौ हत्या की अनुमति थी, किन्तु बाद में औरंगजेब ने गौ हत्या पर रोक लगाने के लिए गेजेट नोटिफिकेशन निकाले थे । तब से लेकर बहादुरशाह जफर तक बहुधा प्रतिबन्ध जारी रहा। जफ़र के शासन काल में भी गौ कशी पर मृत्यु दंड का प्रावधान था। मुगल शासको द्वारा गौ हत्या का समर्थन नहीं करने के कारण इस काल में गायें बची रही।
.
(2) ब्रिटिश गौ मांस खाते थे, और उन्होंने भारत में आने के साथ ही गायें काटने के लिए गेजेट नोटिफिकेशन छापने शुरू किये। जब कत्लखानों में गायें काटी जाने लगी तो मुस्लिम धर्मावलम्बी भी गौ मांस खाने लगे, और यहाँ से हिन्दू-मुस्लिम में गाय को लेकर प्रतिरोध प्रारंभ हुआ। ब्रिटिश द्वारा गौ कशी को प्रोत्साहन देने के पीछे दो कारण थे : धर्मांतरण , एवं हिन्दू-मुस्लिम में राजनैतिक अलगाव खड़ा करना।
.
(3) सैन्य नियंत्रण हासिल करने के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत के सैनिको को कन्वर्ट करने के प्रयास शुरु कर दिए थे। बैरको में हिन्दू देवी देवताओं के चित्र लगाने एवं धार्मिक चिन्ह शरीर पर धारण करने आदि पर प्रतिबन्ध लगाये गए, बैरको में चर्च खोले गए, और रविवार को पादरियों को बुलाकर उन्हें उपदेश किये जाने लगे। 1857 से पहले तक कारतूसो पर भैंस की चर्बी चढ़ाई जाती थी, किन्तु वायसराय ने इस पर गाय एवं सूअर की चर्बी मिक्स करके लगाने के आदेश दिए।
.
(4) क्रान्ति तो असफल हो गयी थी, लेकिन 1860 से भारत में देश के विभिन्न स्थानों से गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए छोटे मोटे आन्दोलन शुरू हुए, और ये फैलने-बढ़ने लगे। किन्तु गोरो ने गाय काटने पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया। गोरे जानते थे कि, यदि गाय कटती रहेगी तो मुस्लिम गौ मांस खायेंगे और इससे हिन्दू मुस्लिम के बीच के खाई बनेगी। और इस तरह भारत में हिन्दू-मुस्लिम के बीच गाय को लेकर पहली बार दंगो की शुरुआत हुयी !!!
.
इसी बीच गोरों ने दलितों को कन्वर्ट करने के लिए कुछ दलित नेताओं को सार्वजनिक रूप से गाय काटने और गौ मांस खाने के लिए चाबी देना शुरू किया। यदि दलित गाय खाना शुरू कर देते थे, तो वे हिन्दू धर्म से च्युत हो जाते थे, और फिर उन्हें कन्वर्ट करना आसान हो जाता था। किन्तु दलितों ने पेड नेताओं के झांसे में आने से इनकार कर दिया।
.
भारत में गाय बचाने की यह मूवमेंट देश व्यापी हो चुकी थी, और 1860 से 1895 के दौरान गाय को लेकर सैंकड़ो दंगे हुए। बाद में महर्षि दयानंद सरस्वती से लेकर देश के कई नेता, संत, महंत, राजनेता, सेनानी आदि भी इस मूवमेंट में जुड़ते चले गए। यह विकेन्द्रित आन्दोलन था। हिन्दुओ का तर्क था कि गाय काटना हमारे धर्म के खिलाफ है, और हम अपने देश में गौ कशी नहीं होने देंगे।
.
<https://goo.gl/2NHb54>;
.
(5) इसी समय इत्तिफाक से भारत में एक संत का अवतरण हुआ। इन्होने 1885 में भारत के हिन्दुओ को यह बात बतानी शुरू की कि :

"गौ मांस का सेवन हिन्दू धर्म एवं भारतीय संस्कृति का अनिवार्य अंग रहा है। और वैदिक काल में ऐसा कोई हिन्दू नहीं हो सकता था, जो गौ मांस न खाता हो। यदि हिन्दूओ को ताकतवर होना है तो उन्हें मांसाहार अवश्य करना चाहिए।"

उन्होंने यह भी बताया कि : "गीता पढ़ने की जगह यदि हिन्दू फ़ुटबाल खेलेंगे तो उन्हें मुक्ति जल्दी मिलेगी !!"

चूंकि ये संत बंगाली थे, अत: मांसाहार उनकी संस्कृति का अंग था, और यह स्वभाविक भी था। किन्तु अंत तक वे माँसाहारी ही बने रहे, और अपने अनुयायियों को भी मांसाहार करने की सलाह दी !! हालांकि, उन्होंने हिन्दुओ को गौ मांस खाने के लिए कभी प्रेरित नहीं किया, किन्तु इसे त्याज्य ही बताया। बात के साधारण होने के बावजूद इन उपदेशो की टाइमिंग का अपना महत्त्व था। इन महाशय ने उस समय गौ हत्या एवं गौ मांस भक्षण के पक्ष में एक वाजिब धार्मिक वजह दे दी थी !!
.
जाहिर है, ब्रिटिश काल में इन्हें काफी मकबूलियत प्राप्त हुयी, और आज भी ये भारत के सबसे महान संत माने जाते है !!
.
( मैं वेदों आदि का मर्मग्य नहीं हूँ। अत: मुझे नहीं पता कि वैदिक काल में हिन्दू होने के लिए गौ मांस भक्षण करना आवश्यक था, या नही। किन्तु भारत में शायद ये एक मात्र संत हुए, जिन्होंने गौ मांस भक्षण को वैदिक संस्कृति से जोड़ा, और इत्तिफाक से इन्हें अन्तराष्ट्रीय ख्याति भी मिली !! )
.
(6) अपने शुरूआती दौर में मोहन दास ने गौ हत्या का विरोध किया था, किन्तु 1947 में मोहन ने स्टेंड लिया कि गौ हत्या को प्रतिबंधित करने के लिए क़ानून नहीं बनाया जाना चाहिए। मोहन का मानना था - धर्म के आधार पर न तो मुस्लिमो के लिए क़ानून बनने चाहिए न हिन्दुओ के लिए।
.
(7) 1955 में कोंग्रेस के सांसद ने पहली बार गौ हत्या पर देश व्यापी प्रतिबन्ध लगाने के लिए बिल संसद में रखा था। किन्तु जवाहर लाल ने कोंग्रेस के सांसदों को धमकाया कि यदि यह बिल पास हुआ तो मैं इस्तीफा दे दूंगा। बिल गिर गया।
.
(8) 1966 में हजारो साधू-संतो ने संसद का घेराव करके देश व्यापी गौ हत्या पर रोक लगाने के लिए गेजेट नोटिफिकेशन निकालने की मांग की। पहले लाठी चार्ज, फिर टियर गैस और फिर इंदिरा जी ने गोली चलाने के आदेश दिए। लगभग 66 लोग मारे गए। सरकारी आंकड़ा शायद 11 के आस पास का है। संख्या के बारे में विकी पीडिया पर भी गलत जानकारी रखी है। 2 साल पहले तक वहां सही जानकारी थी। पिछले वर्ष इसे बदल दिया गया।
.
बाद में इंदिरा जी ने उन सभी राज्यों में गौ हत्या के क़ानून लागू किये, जहाँ जहाँ पर कोंग्रेस सत्ता में थी। उन सभी राज्यों में गौ हत्या के क़ानून लागू नहीं हुए जहाँ पर कम्युनिस्ट सरकार थी, या कोंग्रेस विपक्ष में थी। इस तरह 150 साल बाद देश के कई राज्यों में फिर से गौ हत्या निषेध के बिल पास हुए !!
.
( कृपया ध्यान दें कि गौ हत्या रोकने का क़ानून केंद्र सरकार द्वारा नहीं बनाया जा सकता। यह राज्य का विषय है। अत: सिर्फ राज्य सरकारें ही इस पर प्रभावी क़ानून बना सकती है। )
.
————
खंड (ब)
————
.
1966 से 1998 तक गाय राजनीती से लगभग बाहर रही। ऍफ़ डी आई का विस्तार होने के साथ ही भारत में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का नियंत्रण बढ़ने लगा और इस वजह से मिशनरीज की ताकत भी बढ़ना शुरू हुयी। पिछले 10 वर्षो से गाय फिर से राजनीति की मुख्यधारा में है। तो वह चक्र फिर से शुरू हो चुका है जो गोरों ने 200 साल पहले प्रारंभ किया था। इसमें कुछ नई चीजे यह है कि, अब ब्रिटिश-अमेरिकी धनिक पहले के मुकाबले कई गुणा ज्यादा ताकतवर है, और उनके एजेंडे में देशी गाय पर एकाधिकार करने की नीति भी शामिल है।
.
आज की तारीख में भारत की किसी भी राजनैतिक पार्टी या नेता में इतना साहस नहीं है कि वे अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के खिलाफ जा सके। तो वास्तविक रूप से वे अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के साथ है, किन्तु मौखिक रूप से गौ हत्या रोकने के पक्ष में बयान वगेरह देते रहते है।
किन्तु वास्तव में गाय बचाने के ये सारे बयान सिर्फ तनाव बढाने के लिए दिए जाते है। क्योंकि यदि गाय बचानी हो तो इसके लिए गेजेट में क़ानून छापने होते है। और क़ानून छापने को कोई पार्टी तैयार नहीं है। कार्यकर्ताओ को भाषण सुनाकर वे यह विश्वास दिला देते है, कि हम गाय बचाने के प्रयास कर रहे है !!
.
इसके सैंकड़ो उदाहरण है, किन्तु निचे मैंने कुछ उदाहरण दिए है, जिससे आपको इस नीति की झलक मिल सकती है। तनाव बढाने के इस सर्कस में सभी पॉलिटिकल पार्टियां शामिल है। कोई अपवाद नहीं। कोई भी नहीं।
.
(1) वाजपेयी ने 2003 में संसद में देश व्यापी गौ हत्या पर प्रतिबन्ध के लिए बिल पेश किया था। NDA में शामिल अन्य दलों ने इस बिल का विरोध किया और बिल गिर गया। मेरे विचार में बिल अव्यवहारिक था, और इसे गिरना ही था। केंद्र सरकार के पास पुलिस नहीं होती है, अत: गौ हत्या पर केंद्र द्वारा देश व्यापी बिल लाना अव्यवहारिक है। और यदि पास कर भी दिया जाता है, तो यह कभी लागू नहीं होगा।
.
<https://goo.gl/4oejVN>;
.
(2) 12 जुलाई 2014, एम पी विधानसभा में कोंग्रेस विधायक आरिफ अकील द्वारा गौ रक्षा हेतु निजी बिल सदन में रखा गया। इस बिल में प्रावधान थे कि : गाय की मृत्यु के बाद गायो का अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए , या तो उसे जलाया जाए या उसे दफनाया जाए। गाय के अंगो की तस्करी तथा खरीद फरोख्त पर प्रतिबन्ध लगाया जाए आदि आदि।
.
<https://goo.gl/b65Nf9>;
.
अक़ील ने सदन में कहा कि गाय को हिन्दू अपनी माता का दर्जा देते है इसलिए गाय की रक्षा तथा सम्मान के लिए सरकार को गौ सरक्षण के क़ानून को पास करना चाहिए। संघ=बीजेपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा में बिल को 55 वोटो से गिरवा दिया !!! संघ=बीजेपी सरकार द्वारा बिल गिरा दिए जाने पर आरिफ अकिल कोर्ट चले गए और यह बिल पास करने का ऑर्डर करवाने के लिए उन्होंने जनहित याचिका लगाई।
.
( इसका यह आशय नहीं है, कि कोंग्रेस गौ हत्या रुकवाना चाहती है। क्योंकि जब मैंने कोंग्रेस के कार्यकर्ताओ से पूछा कि एमपी को जाने दीजिये, आप उन राज्यों में ये बिल पास करवा दीजिये जहाँ आपकी सरकारें है, तो उन्होंने जवाब दिया कि, --- हमें ये बिल पास करने में कोई इंटरेस्ट नहीं है। पर हम यह स्थापित करना चाहते थे कि, गाय पर क़ानून बनाने को लेकर कोंग्रेस एवं बीजेपी=संघ एक ही है। बस भाषण एवं बयानो में भिन्नता है।)
.
(3) पेड आमिर खान ने जब युवाओं को मांस खाने को प्रोत्साहित करने के लिए दंगल फिल्म बनाई तो बीजेपी=संघ के सांसद उदित राज ने एक के बाद एक 3 ट्विट किये कि, गरीब दलितों को अच्छे स्वास्थ्य के लिए बीफ खाना चाहिए। उन्हें प्रेरित करने के लिए उन्होंने उसेन बोल्ट का उदाहरण भी दिया कि, बोल्ट गरीब थे , किन्तु बीफ खाने से ही वे गोल्ड मैडल जीत पाए। भारत में बीफ सबसे सस्ता पोषक आहार है, अत: गरीबों-दलितों को बीफ खाना चाहिए। ये बयान मैंने अपनी जेब से नहीं रखा है, संघ=बीजेपी के सांसद उदित राज ने ये ट्विट किये थे।
.
<https://goo.gl/cHxK3L>;
.
कैच इसमें यह है कि, उदित राज ने कार्ल लुईस का जिक्र जानबूझकर नहीं किया। दरअसल 90 के दशक के ओलम्पिक स्वर्ण पदक विजेता कार्ल लुइस 100% शाकाहारी है !! जब लुइस की आयु 20 वर्ष के क़रीब थी तो उन्होंने शाकाहार अपना लिया था, और अपने बेहतरीन प्रदर्शन का श्रेय वे शाकाहार को देते है। उनका दावा है कि, शाकाहार अपनाने के कारण ही उनके प्रदर्शन में सुधार हुआ और वे बेहतर एथलीट बन पाए।
.
जाहिर है, संघ=बीजेपी का लक्ष्य खेल और खुराक पर टिप्पणी करना नही था, बल्कि वे गौ माँस सेवन को प्रोत्साहित करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने गौ मांस का फेवर करने वाला किरदार चुना। संघ=बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने उदित राज पर कार्यवाही करने से इनकार कर दिया था।
.
(4) पहले संघ=बीजेपी के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि, जिन्हें गौ मांस खाना है वे पाकिस्तान चले जाए। और इसके जवाब में संघ=बीजेपी के केन्द्रीय राज्य मंत्री किरेन रिजुजू ने सार्वजनिक रूप से कहा कि -- " मैं गौ मांस खाता हूँ, और किसी में हिम्मत है तो मुझे रोक कर दिखाए !! संघ=बीजेपी के किसी भी कार्यकर्ता ने न तो नकवी एवं रिजीजू पर कार्यवाही की मांग की और न ही उनका विरोध किया !! लेकिन यदि किसी सामान्य नागरिक पर उन्हें गौ मांस खाने का शुबहा हो जाए तो वे उसे पीटना शुरू कर देते है !!
.
<https://goo.gl/Y9iyTv>;
.
(5) जब मनोहर पर्रीकर गोवा के सीएम थे तो हाईकोर्ट ने गोवा में गौ वंश की कटवाई पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। पर्रीकर तब इस प्रतिबन्ध को हटवाने के लिए कोर्ट गए। जब पर्रीकर को केंद्र में मंत्री बना दिया गया तो, संघ=बीजेपी के लक्ष्मीकान्त पार्सेकर गोवा के सीएम बने और उन्होंने गौ हत्या पर रोक का क़ानून लाने से इनकार कर दिया !! उनका तर्क था कि, हमें बड़ी मुश्किल से अल्पसंख्यको का विश्वास हासिल किया है, गौ हत्या पर बेन लगाकर हम लोगो को नाराज नहीं कर सकते। केंद्र में बीजेपी=संघ का जो भी एजेंडा रहा हो किन्तु गोवा में गौ कशी जारी रहेगी !!
.
<https://goo.gl/rvZ1rT>;
.
(6) मई 2017, केरल में यूथ कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से गाय काटी, गौ मांस का वितरण किया। और केरल के बीजेपी अध्यक्ष ने घटना का वीडियो ट्विटर पर अपलोड किया। यदि आप इस घटना की गहराई से पड़ताल करेंगे तो जान जायेंगे कि मिशनरीज गाय का इस्तेमाल किस तरह कर रही है। ऊपर दिए गए प्रसंग में 3 घटनाएं है और तीनो का प्रभाव अलग अलग है।
.
<https://goo.gl/xGQxen>;
.
केरल में गाय काटना कानूनी है। पर भारत में क्या आपने पहले कभी यह सुना या देखा है कि किन्ही नामचीन लोगो ने सार्वजनिक रूप से गाय काटी हो, और इसके फुटेज पूरे देश में फैलाए हो ? क्या ऐसे फुटेज कभी आप तक पहुंचे है ? नहीं !!
.
राज्य सरकार ने इन लोगो पर आईपीसी की धारा 428 एवं पशु क्रूरता अधिनियम के तहत केस दर्ज किया। दोनों धाराएं कमजोर है अत: आरोपी आसानी से बच निकलेंगे।
.
(!) धारा 428 : जो कोई दस रुपए या उससे अधिक के मूल्य के किसी जीवजन्तु या जीवजन्तुओं को वध करने, विष देने, विकलांग करने या निरुपयोगी बनाने द्वारा रिष्टि करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा ।
यह धारा "रिष्टि" होने की दशा में लागू होती है। रिष्टि करना तब कहा जाता है जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाए। इन लोगो ने जो गाय काटी है उसे ये किसी अन्य व्यक्ति से छीन कर तो नहीं लाये थे। गाय इन्ही की रही होगी। खुद की संपत्ति की रिष्टि नहीं की जा सकती, अत: अदालत में यह धारा उड़ जायेगी।
.
(!!) पशु क्रूरता अधिनियम में पहला अपराध करने से सिर्फ जुर्माने का प्रावधान है। वो भी 50 से 150 रुपये। दूसरा या तीसरा अपराध करने से जुर्माना 200 रूपये एवं अधिकतम सजा 3 महीने की है। इस तरह से आरोपी 50 रूपये देकर बरी हो जायेंगे।
केरल में गौ वध करना गैर कानूनी नहीं है, इसीलिए इन्हे गौ कशी के जुर्म में भी सजा नहीं दी जा सकती। स्पष्ट है कि कोंग्रेस के पदाधिकारियों ने सब देख भाल कर यह हरकत की थी।
.
यदि इन आरोपियों पर आईपीसी की धारा 295 के तहत केस दर्ज किया जाए तो इन्हे 2 साल की सजा हो जायेगी। किन्तु यह सजा तब होगी जब इन पर पुलिस यह धारा लगाए और जज घूस खाकर इन्हे छोड़ न दे। पुलिस राज्यों के अधीन आती है, अत: केंद्र सरकार तकनीकी रूप से इसमें कोई हस्तक्षेप करके यह धारा नहीं लगवा सकती। तो इस तरह यह नजर आता है, कि प्रधानमंत्री जी इसमें कुछ नहीं कर सकते थे। पर ऐसा नहीं है।
.
6.1. केंद्र सरकार कैसे यह सुनिश्चित कर सकती है कि इन सभी आरोपियों को जल्दी से जल्दी 2 साल की सजा हो जाए ?
.
इसके लिए केंद्र सरकार निम्न कदम उठा सकती थी :

केंद्र सरकार एक गेजेट नोटिफिकेशन निकाल सकती थी कि, पशु क्रूरता अधिनियम तथा आई पी सी की धारा 428 एवं धारा 295 के तहत दर्ज मामलो की सुनवाई नागरिको की ज्यूरी द्वारा की जायेगी।
.
यह अधिसूचना जारी होने के बाद यह मुकदमा ज्यूरी के सामने आता। अब ग्रांड ज्यूरी इस मुकदमे की सुनवाई के लिए केरल राज्य के 500 से 1500 नागरिको की ज्यूरी का गठन कर सकती थी। ग्रांड ज्यूरी को यह अधिकार होता है कि वह किसी मुकदमे की धाराएं बदल सके। इस तरह ग्रांड ज्यूरी इन आरोपियों पर धारा 295 लगा देगी। ज्यूरी में सुनवाई रोजाना होती है। तथा वीडियो एवं फोटो के रूप में सबूत मौजूद होने से ज्यूरी इन सभी आरोपियों को 2-3 दिन में ही 2 साल की सजा दे देती।
.
ज्यूरी चाहे तो इन आरोपियों का सार्वजनिक नारको टेस्ट भी ले सकती थी। नारको टेस्ट होने से यह सामने आता कि इन कार्यकर्ताओं को ऐसा करने के निर्देश कोंग्रेस के किन किन आला नेताओं से मिले थे। इस तरह इस साजिश में शामिल सभी व्यक्ति आरोपी बनते और ज्यूरी इन्हें भी दो दो साल की सजा दे देती। यदि ज्यूरी चाहे तो अपराध में भूमिका के आधार पर सजा को घटा बढ़ा सकती थी।
.
6.2. क्यों मैं कहता हूँ कि यदि जूरी होती कोंग्रेस के इन नेताओं को 100% सजा हो जाती ?
.
देखिये, यहाँ एक बात यह समझना जरुरी है कि, केरल में रहने वाले जो भी लोग गौ मांस खाते है, वे भी इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे कि कुछ लोग सार्वजनिक रूप से गाय काट कर इसके फुटेज पूरे देश में फैलाकर हिन्दुओ की भावनाएं जाया तौर पर भड़काएं। गौ मांस खाना और सार्वजनिक रूप से गाय काट कर पूरे देश में इसे फैलाना बिलकुल अलग बात है।
.
इसे एक और उदाहरण से समझिये :

भारत में कितने लोग गाली देते है, या पोर्न देखते है ? और
उनमें से कितने लोग यह स्वीकार करेंगे कि कोई व्यक्ति टीवी पर आकर गालियाँ दें ?

मेरे विचार में 99.99% लोग नग्नता-हिंसा-बर्बरता आदि के सार्वजनिक प्रदर्शन को बर्दाश्त नहीं करेंगे, और वे सोचेंगे कि यदि इन्हें रोका नहीं गया तो समाज में वैमनस्य एवं हिंसा फैलेगी। तो वे इन आरोपियों को सजा देंगे। जज का दिमाग इस तरीके से काम नहीं करता। उन्हें जो पैसा देता है, वे उस हिसाब से क़ानून की व्याख्या कर देते है। और मिशनरीज के पास पैसे का समन्दर है।

यदि धारा 295 के तहत ट्रायल होता, और ज्यूरी सुनवाई करती तो सजा होना तय था। क्योंकि वीडियो में यह साफ़ नजर आ रहा है कि जब गाय काटी जा रही थी, तो ये लोग कई मोबाइल से इसका वीडियो शूट कर रहे थे। इस तरह यह साबित है कि इनका उद्देश्य सिर्फ गाय काटना ही नहीं था, बल्कि गाय को बर्बर तरीके से काटते हुए वीडियो बनाना, और इसे जनता में फैलाना था। यदि इन्हें सिर्फ कानून का विरोध करना होता था तो ये वीडियो नहीं बनाते थे।
.
जूरी द्वारा सजा दिए जाने का परिणाम यह होता कि, आगे कोई इस तरह का दुस्साहस नहीं करता। क्योंकि ज्युरर इस बात पर भी ध्यान देते कि ऐसी घटना से देश में बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक दंगे फ़ैल सकते है, और सैंकड़ो जाने जा सकती है।
.
29 मई, 2017 को राईट टू रिकॉल-जूरी सिस्टम कार्यकर्ताओ ने प्रधानमंत्री जी को ट्विट भेजने शुरू किये कि, इन आरोपियों का जूरी ट्रायल करने के लिए पीएम एक नोटिफिकेशन निकाले। किन्तु पीएम ने इस तरह का नोटिफिकेशन नहीं निकाला। यदि तब बीजेपी=संघ के कार्यकर्ता भी इस मामले के लिए जूरी ट्रायल की मांग करनी शुरू करते तो पीएम के नोटिफिकेशन निकालने की सम्भावना बढ़ जाती।
.
मेरे द्वारा किया गया ट्विट - <https://twitter.com/pawanjury/status/869150717914869760>;
.
किन्तु संघ=बीजेपी के कार्यकर्ताओ की ज्यादा रुचि इस बात में थी कि कैसे इस बात को पूरे देश में फैलाया जाए कि, कोंग्रेस के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से गाय काटी है। उन्होंने सजा दिलवाने और इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कोई कदम न उठाये। यहाँ तक कि बीजेपी की केरल इकाई के शीर्ष नेताओं ने इसका बर्बर वीडियो अपनी प्रोफाइल पर अपलोड किया और इसे पूरे देश में फैलाया !! तो इस तरह गाय का इस्तेमाल सिर्फ लोगो का खून गरम करने के लिए किया जा रहा है, लेकिन समाधान की अवहेलना की जाती है।
.
यही बात जब आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओ से कही गयी कि, आप इन्हे सजा दिलवाने के लिए इनकी ज्यूरी ट्रायल की मांग का ट्वीट भेजने का समर्थन करो, तो उनका कहना यह था कि हम इसकी निंदा कर सकते है, लेकिन जूरी ट्रायल का समर्थन न करेंगे। और वैसे भी गाय हमारे एजेंडे में शामिल नहीं है। हम उसे अन्य पशुओ के सदृश ही समझते है।
.
मेरा मानना है कि, आप हिन्दू है या मुसलमान है या मांसाहारी है या शाकाहारी है, या कोंग्रेसी है या भाजपाई है उत्तर भारतीय है या दक्षिण भारतीय है, जो भी है एक भारतीय होने के नाते इस तरह की घटनाओ से देश को एवं देश के हर वर्ग को हर तरफ से नुकसान ही होगा। ऐसी घटनाएं देश में बारूद बिछा देती है, और कभी एक चिंगारी इसमें विस्फोट कर देगी। मिशनरीज पेड मीडिया के माध्यम से गाय का इस्तेमाल देश में इसी तरह का बारूद बिछाने के लिए कर रहा है।
.
(7) और कैसे वे गायों का इस्तेमाल समुदाय में आपसी प्रतिरोध बढाने के लिए कर रहे है ?
.
अन्य राज्यों का हाल मुझे पता नही । लेकिन राजस्थान में सड़कों पर काफी गायें बढ़ गयी है। इक्का दुक्का नही। बल्कि उनके झुंडो ने सड़कों को अपना ठिकाना बना लिया है । राजमार्ग से लेकर शहरों के मुख्य मार्गों और गलियों तक। सभी जगह। वाहन चलाने वालों को इससे बहुत समस्या का सामना करना पड़ रहा है, और एक्सीडेंट्स भी हो रहे है।
.
वे चाहते है कि गाएँ और गौ रक्षक नागरिकों की आँखों में चुभने लगे। यदि नागरिकों को गाये मुसीबत की तरह दिखने लगेंगी तो वे इन्हें बचाने की मुहिम के प्रति उदासीन हो जाएँगे। आवारा पशुओं को प्रबंधित करने तथा नागरी यातायात को समुचित बनाए रखने की ज़िम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की है, तथा पशु कल्याण अधिकारी गायों के रख रखाव के लिए उत्तरदायी है। लेकिन शहर के नागरिकों के पास ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है कि वे इन अधिकारियों को नियंत्रित कर सके।
.
नगर पालिकाओ ने अचानक से गौ वंश को अधिग्रहीत करके उन्हें आश्रय देना बंद कर दिया है। मुझे नहीं पता, ऐसा क्यों हुआ। अचानक से लावारिस मवेशियों को पकड़ने वाले वाहन निष्क्रिय हो गए है, इस विभाग के कर्मचारियों की ड्यूटी अन्य विभागों में लगा दी गयी है, पालिकाओ द्वारा संचालित कोईंन हाउसेस ने गायों को आश्रय देना बन्द ही नही कर दिया बल्कि उलटे उन्हें बाज़ार में छोड़ दिया है, तथा गौ शालाओं को दिए जा रहे अनुदानों को लम्बित कर दिया गया है। और नतीजे में गौ वंश के झुंडो ने सड़कों पर अपना जमाव बना लिया।
.
सड़कों पर गायों की संख्या बढ़ने से अब सड़क दुर्घटनाएँ भी हो रही है । सिर्फ़ वडोदरा में ही गौ वंश के चलते दो व्यक्तियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। देश भर में इस तरह की दुर्घटनाओं में इजाफा हुआ है, और पेड मीडिया द्वारा रिपोर्ट भी किया जा रहा है, कि दुर्घटनाओ की वजह गौ वंश है।
.
और यह प्रक्रिया इस तरह समुदाय में प्रतिरोध बढ़ाती है :
.
पहले पेड आमिर खान दंगल में युवाओं को मांस खाने के लिए प्रेरित करते है। फिर सांसद उदित राज कहते है कि गरीब-दलित बच्चों को पोषक तत्वों के लिए गौ मांस का सेवन करना चाहिए। ( दरअसल, गौ मांस चिकेन, मटन से सस्ता है। सस्ता होने की वजह भी राजनैतिक है। ) , इसके बाद कोइन हाउस एवं स्थानीय प्रशासन के कमजोर प्रबंधन के कारण गौ वंश की आवक सड़को पर बढ़ने लगी।
.
फिर प्रधानमंत्री जी एक के बाद एक सार्वजनिक रूप से गौ रक्षको को गुंडा एवं असामाजिक तत्व कहते है, और नतीजे में गौ रक्षको को ऐसे अन वांछित समूहों के रूप में देखा जाने लगता है, जो एक तरफ तो सड़को पर गायों को संख्या बढाकर दुर्घटनाओ के लिए जिम्मेदार है, और दूसरी तरफ उनकी वजह से गरीब-दलित गौ मांस का सेवन करके खुद को पोषित नहीं कर पा रहे है !!! जबकि सच्चाई यह है कि गौ रक्षक कुछ न कर रहे है, बल्कि सारी अव्यवस्था की वजह वांछित कानूनों का अभाव और गलत कानूनों का लागू होना है।
.
ब्रिटिश राज द्वारा सेना को दूध आपूर्ति के लिए जो गौ शालाएं स्थापित की गयी थी, उन्हें भी बंद करने के आदेश दिए गए है, और अब 1 लाख रूपये मूल्य तक की गाय को 1000 रूपये के टोकन एमाउंट में विभिन्न उपक्रमों को दिया जा रहा है !!
.
<https://goo.gl/ZC4Kys>;
.
इन 40 गौ शालाओं में कुल 25,000 गायें है !! दरअसल बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की निगाहें इस जमीन पर है । अभी अगले 5-10 साल में ये लोग मुक्त हुयी इस 20,000 हैक्टेयर जमीन को ठिकाने लगा देंगे, मतलब बेच बाच देंगे। यानी हमारे हाथ से गायें भी गयी और अब जमीन भी जायेगी !!
.
<https://goo.gl/uAjXHg>;
.
तो वक्त के साथ साथ गाय को लेकर बयान बाजी और हिंसा और भी बढ़ेगी, गौ रक्षको द्वारा स्ट्रीट जस्टिस की घटनाओ में भी इजाफा होगा, पेड मीडिया पर इन्हें बड़े पैमाने पर रिपोर्ट भी किया जाएगा, और ऐसे कोई क़ानून नही छापे जायेंगे जिससे बढ़ते हुए तनाव को कम किया जा सके। और फिर हम किसी भी समय हम गाय को लेकर एक देश व्यापी दंगे के गवाह बनेंगे, जिसके अलाव पर फिर से वोट इकट्ठे किये जायेंगे !!
.
और जब गौ मांस पर भक्षण पर इस तरह की बहस शुरू होगी तो अचानक से आप टीवी-अखबारों में कुछ बुद्धिजीवियों को यह तर्क देते हुए सुनेंगे कि हिन्दू धर्म में गौ मांस खाना जायज है, और ऐसा खुद स्वामी विवेकानंद ने कहा है !! अब पिछले 100 वर्षो से पेड मीडिया ने पूरे देश के हिन्दुओ के मानस पर स्वामी विवेकानन्द जी को इतना गहरा छापा है, कि आम राय में स्वामी विवेकानंद को हिन्दू धर्म का प्रतीक मान लिया गया है।
.
तो मुझे नहीं लगता कि पेड मीडिया की चपेट में आये नागरिक स्वामी विवेकानंद के वक्तव्यों को डिफेंड करेंगे, बल्कि वे विभिन्न तर्क देकर इन्हें स्वीकार करना शुरू कर देंगे। गौ मांस को सार्वजनिक रूप से धार्मिक स्वीकृत मिलने लगेगी, और फिर मिशनरीज अन्य हिन्दू संतो को मीडिया कवरेज के एवज में गौ मांस का सार्वजनिक समर्थन करने के लिए बाध्य करेंगे।
.
और वे ऐसा करेंगे भी। बाकी का काम सँभालने के लिए उनके पास मीडिया कवरेज के भूखे नेता है, और वे इसमें और भी इंधन डालेंगे। तो अब उनके पास आरक्षण के अलावा देश में आग लगाने के लिए एक और मुद्दा गाय है !!
.
यह सब इतने धीमी गति से होगा कि आपको लगेगा यह खुद ब खुद हो रहा है !! जैसे आज भारत में हर महीने जीएसटी के कारण सैंकड़ो छोटे-मझौले व्यापारी अपना धंधा गँवा रहे है, और उन्हें इसका अहसास नहीं है, कि वे अपना कारोबार एक गलत क़ानून की वजह से खो रहे है।
.
———-
खंड (स)
———-
.
(1) और कैसे अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भारत में देशी गाय की नस्ल को ख़त्म कर देंगे ?
.
बहुराष्ट्रीय कम्पनियां A2 दूध के उत्पादन पर एकाधिकार बनाना चाहती है, ताकि इन्हें ऊँचे दाम पर बेचा जा सके। आज से कई दशको पहले अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने भारत की देशी गाय की नस्ल आयात की और विदेश में इसे संवर्धित करना शुरू किया। किन्तु जब तक भारत में इस नस्ल की गाये इतनी बड़ी संख्या में मौजूद है, तब तक देशी गाय के उत्पादों को ऊँची कीमत पर नहीं बेचा जा सकता।
.
तो भारत में देशी गाय की नस्ल की गायो की संख्या कम करने के लिए उन्होंने मनमोहन सिंह जी + सोनिया जी को 2014 में यह निर्देश दिए थे कि, वे भारत में देशी गायों का निषेचन जर्मन सांडो से बड़े पैमाने पर करवाने के लिए आवश्यक क़ानून गेजेट में छापे। मनमोहन सिंह जी ने इस योजना को हरी झंडी दे दी थी, किन्तु सांडो का आयात होने से पहले ही सत्ता परिवर्तन हो गया। बाद में मोदी साहेब ने पीएम बनने के बाद इन सांडो का आयात किया।
.
<https://goo.gl/QE4Ht4>;
.
NDDB ( राष्ट्रीय डेयरी बोर्ड ) चेयरमेन को आदेश दिए गए कि पशुपालको को जर्सी सांडो का वीर्य उपलब्ध करवाया जाए। भारत की लाखों देशी गायो का गर्भाधान अब जर्मन सांडो द्वारा करवा दिया जाएगा। देशी गायों की अगली पीढ़ी में देशी गायों के सिर्फ 50% जींस ही देशी होंगे, और इससे अगली पीढ़ी 25% देशी होगी। तीसरी और चौथी पीढ़ी में क्रमश: देशी जींस 12% एवं इससे कम रह जायेंगे।
.
एक गाय की अगली पीढ़ी 6 वर्ष में आती है। इस तरह अगले 20-30 वर्षो में भारत की ज्यादातर देशी गायों का आनुवंशिक रूपांतरण भैंसों-सुअरों में हो चुका होगा। और इस निषेचन के बाद देशी गायें A2 की जगह A1 दूध देने लगेगी !!
.
<https://goo.gl/pgytYJ>;
.
देशी गाय कम दूध देती है लेकिन भारत की शुद्ध नस्ल की गाय के दूध में A2 प्रोटीन होने के कारण यह दूध प्राकृतिक रूप से सेहत के लिए लाभदायक होता है। जबकि जर्सी जानवर के दूध में A1 प्रोटीन होने से यह दूध सेहत के लिए हानिकर है। A1 प्रोटीन होने से हार्ट अटेक, हाई कोलेस्ट्रोल, एवं पाचन सम्बन्धी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
.
यदि सरकार जर्सी सांडो का आयात नहीं करेगी तब भी इस प्रक्रिया को धीमा तो किया जा सकता है किन्तु रोका नहीं जा सकता। क्योंकि सरकार के न करने से भी प्राइवेट कम्पनियां इन सांडो का आयात करेगी और पशुपालक मुनाफा कमाने के लिए अपनी गायों का गर्भाधान इन सांडो से करवाएंगे। उदाहरण के लिए बाबा रामदेव ने भी भारतीय गायों की नस्ल "सुधारने" के लिए ब्राजील के सांडो की सेवाएं लेने का प्रोजेक्ट शुरू किया है। वे इस मद में 500 करोड़ रूपये का निवेश करेंगे।
.
<https://goo.gl/WYt6yY>;
.
बड़े पैमाने पर इस दूध का उत्पादन होने के कारण इस दूध की लागत कम होती चली जाएगी जबकि देशी गायों का दूध बहुत महंगा पड़ने लगेगा। इस तरह धीरे धीरे कुछ ही दशको में भारतीय प्रजाती की शुद्ध नस्ल की गाये लुप्त हो जायेगी। यह कुछ उसी तरह से होगा जिस तरह से बाजार से देशी टमाटर, देशी बैंगन, देशी लौकी, देशी आम आदि गायब हो गए है।
.
भारत में इस तरह का कोई क़ानून नहीं है कि यदि कोई व्यक्ति A1 दूध को A1 बताकर बेचता है तो उस पर कार्यवाही की जा सके। और इस क़ानून के न होने की वजह से जो गौ पालक शुद्ध देशी गाय का दूध बेचना चाहते है, वे यह कभी साबित नहीं कर पायेंगे कि उनका दूध A2 श्रेणी का है। क्योंकि यदि कोई व्यक्ति A2 दूध में A1 दूध मिलाकर बेचता है तो यह पूरी तरह से कानूनी है।
.
तो होगा यह कि रंग, रूप काठी में गायें देशी नस्ल की ही रहेगी लेकिन उनके दूध की किस्म बदल जायेगी। दूध A2 नहीं रहेगा, बल्कि A1 हो जाएगा। और जब देशी गायों की संख्या काफी घट जायेगी तो वे इस तरह का क़ानून ले आयेंगे कि A1 दूध को A2 दूध बताकर बेचना गैर कानूनी है। तब वे A2 दूध के दोगुने दाम वसूलना शुरू करेंगे !! और उस समय वे A2 दूध के सबसे बड़े सप्लायर होंगे !!
.
यदि आज की तारीख में इस तरह का क़ानून छाप दिया जाता है तो जिन लोगो के पास देशी गायें है वे अपने दूध पर A2 दूध की छाप डालकर बेच सकेंगे और देशी गाय को सरंक्षण मिलने लगेगा।
.
————
खंड (द)
————
.
समाधान
.
(1) कृषि मंत्रालय को तीन हिस्सों में विभाजित किया जाए :

कृषि मंत्रालय
पशुपालन मंत्रालय
गाय मंत्रालय।
.
फिलहाल डेयरी उद्योग, पशुपालन, गाय आदि सभी मवेशी कृषि मंत्री के अधीन आते है। जो कि काफी बड़ा मंत्रालय है। अब से तीन मंत्री होंगे। कृषि मंत्री अलग होगा। पशुपालन मंत्री अलग से होगा। तथा गाय मंत्री अलग से होगा। जर्सी एवं अन्य सभी प्रकार के विदेशी नस्ल के गाय के सदृश नजर आने वाले जानवर मवेशी की श्रेणी में रखे जायेंगे। जबकि गाय मंत्रालय सिर्फ देशी गायों या भारतीय नस्ल की गायों का ही नियमन करेगा।
.
(2) डेयरी उद्योगों एवं दूध विक्रेताओ को अपने दूध के डिब्बे या बोतल पर स्पष्ट रूप से यह अंकित करना होगा कि इसमें जो दूध है वह देशी गाय का है या वर्ण संकर प्रजाति का। दूध विक्रेता अपनी गायों की नस्ल की शुद्धता के लिए विभाग से सर्टिफिकेट ले सकेंगे एवं छोटे पशुपालक अपनी गायों की नस्ल की शुद्धता का सेल्फ सर्टिफिकेट जारी कर सकेंगे। गाय मंत्री इन स्व घोषित सर्टिफिकेट को अनुमोदित करेगा।
.
(3) यदि कोई विक्रेता अपने दूध पर देशी गाय के दूध का चिन्ह अंकित करता है और उसमे 5% से अधिक मिलावट पायी जाती है तो उस पर आर्थिक दंड या लाइसेंस का रद्दीकरण किया जाएगा। सभी मामलो की सुनवाई नागरिको की ज्यूरी करेगी। दूध के अन्य उत्पादों जैसे पनीर, घी आदि पर भी यही नियम लागू होंगे।
.
(4) गाय मंत्री को नौकरी से निकालने का अधिकार मतदाताओ के पास होगा, तथा कोई शिकायत आने पर सुनवाई करने का अधिकार नागरिको की जूरी के पास होगा। ( यह सबसे महत्तवपूर्ण धारा है। इसके बिना कोई भी प्रावधान लागू नहीं हो पायेगा । सिर्फ कागज में ही रहेगा। )
.
(5) गाय मंत्री नस्ल परिक्षण आदि के लिए लेब आदि की का आधारभूत ढांचा उपलब्ध करवाएगा एवं गौ शालाओं का नियमन करेगा।
.
(6) देशी गायों का पंचायत स्तर पर पंजीकरण किया जाएगा।
.
(7) गाय मंत्री देश में विभिन्न स्तरों पर इस तरह के वैज्ञानिक अनुसन्धान एवं शोध करवाएगा जिससे इन तथ्यों की वैज्ञानिक रूप से पुष्टि हो कि भारतीय गाय का दूध किस तरह से एवं किन मायनों में सेहत के लाभदायक है। वह देश में नागरिको में इन तथ्यों के बारे में जानकारी भी फैलाएगा।
.
(8) किसी एक राज्य से दूसरे राज्य में गाय को ले जाने पर पाबन्दी हो । ऐसा करने वालों को भी ज्यूरी पाँच वर्षों की सजा दे सकती है।

( भारत के कई राज्यों जैसे केरला, गोवा, आन्ध्र, बंगाल आदि में गौ हत्या पर प्रतिबन्ध नहीं है। तो अन्य राज्यों से गाये इन राज्यों में ले जायी जाती है, और फिर कानूनी रूप से काट दी गाती है। यह क़ानून ठीक से काम करे इसके लिए पुलिस प्रमुख पर राईट टू रिकॉल एवं जूरी सिस्टम होना जरुरी है, वर्ना गायों को इस राज्य से उस राज्य में ले जाने के एवज में पुलिस एवं जज बड़े पैमाने पर हफ्ता वसूली करना शुरू कर देंगे। )
.
(9) गाय का चमड़ा बेचने पर प्रतिबन्ध लगाया जाए। मृत गाय को दफनाया जायेगा या जलाया जायेगा। जूतों आदि पर "हरा गो-हत्या मुक्त लेबल" लगाना, जिसका मतलब होगा कि चमड़ा जिस पशु से आया है, उसकी प्राकृतिक मृत्यु हुई है और उसका मांस खाने के लिए प्रयोग नहीं किया गया था।

( इस "हरा" चमड़े का मूल्य अधिक होगा लेकिन गो-हत्या और जीव-हत्या कम हो जायेगी।)
.
(10) गाय-भैंस खरीदने पर सरकार द्वारा कोई सब्सीडी नहीं मिलेगी।

( छूट के कारण गो-हत्या बढ़ रही है, क्योंकि गाय सस्ते दामों पर कसाई को मिल जाती है और मुनाफा अधिक होता है। उस मुनाफे का एक भाग दोषी जज, पुलिस आदि को रिश्वत के रूप में देते है और छूट जाते है। )
.
(11) सरकार बूढ़ी गायों को एक निर्धारित कीमत पर खरीदेगी ।
.
(12) शुक्राणु-विभाजन की प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिये पूंजी निवेश किया जाए ताकि सांड की पैदावार कम की जा सके, और इस प्रकार सांड की हत्या कम होगी।
.
(13) सरकार गौ-शालाएँ चलायेगी जिसके लिये धन बिना दान से आयेगा। किन्तु जो कोई इसके लिए दान देगा उसे टेक्स में कोई छूट नहीं मिलेगी। शहरों में 10,000 से 30,000 आबादी वाले हर बस्ती में कम से कम एक गौशाला जरूर होनी चाहिये। इस तरह शहरों में हर वार्ड में कम से कम 1 या 2 गौशाला अवश्य हो जायेंगी।
.
(14) गायो को ढोने के लिए सिर्फ जालीदार वाहनों का ही उपयोग किया जाएगा, ऐसा क़ानून बने। इन वाहनों पर गौ परिवहन यान लिखा रहेगा और सिर्फ इन्ही वाहनों में गायो को ले जाया जा सकेगा।
.
ये कुछ सुझाव मोटे तौर पर दिए गए है। इस सम्बन्ध में अन्य ड्राफ्ट देखने के लिए कृपया यह एल्बम देखें - <https://www.facebook.com/pawan.jury/media_set?set=a.1450971748354390&type=3>;
.
————
.
काम की बात : यदि उपरोक्त प्रावधान गेजेट में आते है, तो गाय बचेगी वर्ना नहीं बचेगी। इस बात से कोई फर्क नहीं आएगा कि आप किस नेता को वोट कर रहे है। लेकिन एक बात तय है कि, सरकार को जितनी ज्यादा सीटे मिलेगी, सरकार उतनी ही ज्यादा ताकतवर होगी, और सरकार जितनी ज्यादा ताकतवर होगी, गायें भी उतनी तेजी से कटेगी !! और इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि सरकार किसकी है और पीएम कौन है !! तस्दीक के लिए आप पीछे मुड़कर पिछले 10 साल का हिसाब देख सकते है !!
.
राईट टू रिकॉल पार्टी
.
=========

Read full post →