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Pawan Jury BhilwaraRj

Tue Aug 29 2017 21:37:42 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

संघ के नेता और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह "मदर" टेरेसा की प्रशंषा कर रहे है !! तो इसीलिए ये लोग उन हिन्दू संतो से घृणा करते है जो मिशनरीज का रास्ता रोक रहे है !!!
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श्री रमन सिंह जी ने ट्वीट किया है -- "Humble tribute to the great Mother Teresa. Her unfailing commitment & unconditional love for humanity will forever inspire us."

माने ; "मदर टेरेसा को भावभीनी श्रद्धांजलि। उनका अदम्य समर्पण एवं मानवता के लिए अटूट प्रेम हमें हमेशा प्रेरणा देता रहेगा"
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ट्वीट का लिंक -- <https://twitter.com/drramansingh/status/901285457010479105>;
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मुझे समझ यह बात नहीं आयी कि, इस ट्वीट के के पहले उन्होंने "वन्दे मातरम" क्यों नहीं जोड़ा !!
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दरअसल रमन सिंह जी बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के सामने यह साबित करने के लिए छटपटा रहे है कि, वे भी मिशनरीज के वफादार है। इससे बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के मालिक खुश जो जाएंगे और अपने मीडिया कर्मियों से कहेंगे कि रमन सिंह जी को सकारत्मक कवरेज देकर उन्हें चुनाव जीतने में मदद करे।
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और यहां आप इस बात को भी नोट करें कि संघ के 90% कार्यकर्ता रमन सिंह जी के इस ट्वीट के भरपूर समर्थन में है।
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तो इससे यह बात समझ आती है कि आखिर क्यों संघ के कार्यकर्ता ओह माय गॉड जैसी फिल्मो का समर्थन और श्री गुरमीत जी राम रहीम, संत श्री आसाराम जी बापू आदि का विरोध करते है।
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श्री श्री रविशंकर जी एवं स्वामी रामदेव जी अब तक सिर्फ इसीलिए "बचे" हुए है क्योंकि वे मिशनरीज को रोकने के लिए कोई गतिविधियां नहीं कर रहे है। लेकिन संघ के कार्यकर्ताओ ने राम रहीम जी एवं संत श्री आसाराम जी बापू को गिराने में एड़ी से चोटी तक का जोर इसीलिए लगा दिया क्योंकि वे मिशनरीज के रास्ते में रोड़े कर रहे थे।
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संघ के कार्यकर्ता मिशनरीज के रास्ते में आने वाली बाधाओं को हटाने के लिए पूरी मुस्तैदी से काम करते है ताकि मिशनरीज आसानी से इस मार्ग ने होकर दलितों तक यीशु का सन्देश पहुंचा सके। और इसी वजह से संघ के कार्यकर्ता मंदिरो से सरकारी नियंत्रण को हटाने और मंदिरो / मठो के प्रशासन को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक कानूनों का विरोध करते है, क्योंकि ऐसा होने से हिन्दू संतो की ताकत बढ़ेगी। आप देश सकते है कि संघ के कार्यकर्ता किसी भी तरह से कांग्रेस / आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओ से कम नहीं है। वे मिशनरीज को अपनी माशूक की तरह देखते है , जो कि उन्हें मीडिया में सकारात्मक कवरेज दिलवाकर उन्हें चुनाव जितवाती है।
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मेरा सभी हिंदूवादी कार्यकर्ताओ से आग्रह है कि वे संघियो द्वारा लगाए जा रहे नारों की उपेक्षा करते हुए उनकी इन चेष्टाओं को नोट करें कि, कब वे हरकत में आते है और कब "जानबूझकर" चुप्पी साध लेते है।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Aug 30 2017 08:48:03 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

"अपुष्ट खबर" --- संघ के नेता मोदी साहेब और खट्टर ने सैनिको / पुलिसकर्मियों को आदेश दिया है कि वे डेरे द्वारा संचालित अस्पताल / स्कूल / कोलेज आदि खाली कर दे !!!
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सैनिक / पुलिस कर्मी स्टाफ / छात्रों / मरीजो आदि को अपने घर जाने को कह रहे है। प्रश्न यह है कि ये लोग अब जायेंगे कहाँ ? मिशनरीज के पास ?
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इन संस्थाओ को जिला कलेक्टर्स के माध्यम से आदेश दिया गया है कि वे अपनी नकदी प्रशासन को सौंप दे, साथ ही इन संस्थाओ के बैंक खाते भी फ्रिज किये जा रहे है !!! संघ के नेता खट्टर ने कोर्ट के इस आदेश को चुनौती देने से इनकार कर दिया है !!!
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समझा जा सकता है कि --- लक्ष्य सिर्फ श्री राम रहीम जी को जेल में पहुंचाना नहीं था। कोंग्रेस / संघ / आम आदमी पार्टी और जजों का उद्देश्य डेरे के उस इन्फ्रास्ट्रक्चर को तोडना है जो मिशनरीज को बाधा दे रहे है !!!
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Aug 30 2017 12:44:53 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

संत कौन है और इसकी परिभाषा क्या है ?
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भौतिक एवं व्यवहारिक जगत में इस प्रकार की परिभाषाओ पर बहस या विचार करना समय काटने एवं विद्वता झाड़ने के साधन है। इनकी परिभाषा मान्यता, स्वीकार्यता , आदर्श , धारणा आदि तत्वों से तय होती है। यदि आप किसी आध्यात्मिक विषय या धर्म के गूढ़ उपदेशो की मीमांसा कर रहे है तो इस तरह की चर्चा का महत्त्व है। किन्तु राजनैतिक एवं व्यवहारिक मामलो में इस मुद्दे को लाकर पटक देना कि संत क्या होता है और उसके लक्ष्ण क्या है, एक खुराफात है।
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हम 2017 में रह रहे है। संत की परिभाषा जो भी है वह आदर्शवादी समय की बात है। आज आपको ऐसा कोई ढूँढने से भी नहीं मिलेगा। अत: आदर्शवाद की लपेट में आकर आज के दौर के लोगो को पुराने दौर की कसौटी पर न कसे। चीजो और व्यक्तियों को क़ानून एवं चलन के अनुसार देखें। क्योंकि वैसे शुचितावादी तो आज आप भी नहीं रहे है जैसे आपके पुरखे थे।
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श्री राम रहीम जी एवं आसाराम जी को आप संत माने या न माने यह आपकी मान्यता पर निर्भर करता है। और एक ही व्यक्ति के बारे में एक ही समय में आपकी मान्यता के उलट भी कई मान्यताएं चलन में हो सकती है। अत: इस तरह के ऐलान देना बंद करे कि कौन संत है और कौन नहीं। क्योंकि जिन किन्ही लोगो को आप संत मान रहे है उन्हें कई लोग लट्ठ लेकर ढूंढ रहे है। और जिन्हें आप असंत ठहराने पर तुले हुए है उन्होंने कई लोगो की जिंदगियां बदल दी है। और इसीलिए वे उन्हें पूज रहे है।

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इन आदर्शो के चकमे में आने की जगह इस बात पर गौर करे कि इन लोगो ने जो दान प्राप्त किया उनमे से कितना हिस्सा गैर उत्पादक कार्यो एवं तडक भड़क में खर्च किया एवं कितनी राशी से उन्होंने स्कूल चलाए , दवाइयाँ बांटी, अस्पताल चलाये , लोगो में धर्म का प्रचार किया, उन्हें नशे से दूर किया, उन्हें आध्यामिक सलाहें दी आदि। आप पायेंगे कि उन्होंने सिर्फ दान से प्राप्त राशि में से सिर्फ 1% का ही गैर उत्पादक कार्यो में उपयोग किया है तथा शेष राशि परोपकार के कार्यो में लगायी।
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यदि मंदिरों ने ऐसा किया होता तो ये नए सम्प्रदाय कभी उभरते नहीं थे। मंदिरों ने जो पीड़ा दी उसका मरहम इन्होने उपलब्ध कराया। और आज भी हर लिहाज से ये नए सम्प्रदाय धर्म एवं परोपकार के क्षेत्र में ज्यादातर मंदिरों से बेहतर कार्य कर रहे है। श्रधालुओ ने जब मंदिरों में भ्रष्टाचार देखा तो दान में कमी आने लगी। मंदिरों में परोपकार के कार्य कम होने से एक वैक्यूम बना। इस वैक्यूम को इन लोगो ने पूरा किया। इन्होने मंदिरो की अपेक्षा ज्यादा बेहतर तरीके से परोपकार के कार्य किये और इसी वजह से इन्हें श्रद्धालु मिले और इन्हें मिलने वाले दान में वृद्धि हुयी।
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तो यदि आपको विचार करना है तो निम्नलिखित बिन्दुओ पर करे तथा अपना प्रतिभाव अपनी फेसबुक वाल पर लिखे :

१) मंदिरों में भ्रष्टाचार होने की क्या वजह है। क्यों मंदिर परोपकार के कार्यो को तवज्जो नहीं दे रहे है ?
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२) क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे मंदिरों के प्रशासन को मजबूत बनाया जा सके ?
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३) क्या ऐसा कोई तरीका है जिससे इस प्रकार के परोपकार के कार्य करने वाले डेरा / आश्रम प्रमुखों में मौजूद कतिपय* अनियमितताओ को और भी दुरुस्त किया जा सके ? ताकि इन सम्प्रदायो में मौजूद "मामूली खामियों" को बहाना बनाकर इन्हें नष्ट करने के षड्यंत्रों पर लगाम लगाई जा सके।
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४) मंदिरों के टूटने और इन नए सम्प्रदायों के उखड़ने का सबसे अधिक लाभ मिशनरीज को होगा। किन कानूनों की सहायता से हम मिशनरीज के बढ़ते प्रभाव को कम कर सकते है और हिन्दू मंदिरों के प्रशासन को मजबूत बना सकते है ?
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Aug 30 2017 13:55:22 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

भारत की व्यवस्था क्यों ख़राब है और कैसे पेड मीडिया पूरे देश को भांग पिलाता है ? ( अपनी फेसबुक वॉल देखें !! )
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अभी तक कोर्ट के जजमेंट की कॉपी सामने नहीं आयी है। अभी तक यह तथ्य सामने नहीं आये कि, किन भौतिक सबूतों , बयानों , गवाहों के आधार पर श्री गुरमीत जी राम रहीम क दोषी ठहराया गया है !! जब जजमेंट की कॉपी सामने आएगी तब यह मालूम होगा कि उन्हें किस आधार पर दोषी ठहराया गया है। और इन्हे पढ़ने के बाद ही यह मालूम होगा कि यह फैसला देने वाले जज का निर्णय कितना ठीक था।
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जहाँ तक मुकदमे के बात है, इस बात को सभी जानते है कि 2002 में दो गुमनाम खतो में कहा गया था कि -- आज से तीनसाल पहले उनके साथ बलात्कार हुआ था !!! और इन्ही खतो के आधार पर मामला दर्ज किया गया !! अब 18 साल बाद फैसला आया है !!! फैसले में क्या लिखा है अब तक किसी की मालूम नहीं है !! इस दौरान बयान के अलावा सी बी आई ने कितने गवाह दर्ज किये उनमे से कितनो ने पक्ष में और कितनो ने विपक्ष में गवाही दी, किसी को पता नहीं !! क्या कोई भौतिक सबूत बरामद हुए या नहीं हुए, किसी को पता नहीं !!
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पर मीडिया ने बिना फैसला पढ़े इन्हे बलात्कारी कहना शुरू कर दिया !!! इससे यह बात पता चलती है कि, या तो मिडिया को बलात्कारी का लेबल लगाकर प्रचार करने के लिए मोटी राशि दी गयी है या फिर वे मानते है कि जिस जज ने फैसला दिया है वह "भगवान् का अवतार" है !!!
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अब आप खुद अपने बारे में तय कीजिये :

१) क्या आप भी यह मानते है कि फैसला देने वाला जज भगवान् का अवतार है ? इसीलिए फैसला पढ़ने या देखने की जरूरत नहीं है। जज ने बोल दिया मतलब बात खत्म !!
२) या आप मानते मीडिया इतना ईमानदार है कि उस पर संदेह नहीं किया जा सकता ?
३) या आप मानते है कि जज और मीडिया बिक सकते है, लेकिन चूंकि आप संजय है इसीलिए सारा घटनाक्रम लाइव देखकर श्री राम रहीम जी को बलात्कारी कह रहे है ?
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Pawan Jury BhilwaraRj

Wed Aug 30 2017 21:16:31 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

किसी धर्म के धर्मानुरागी कार्यकर्ता यदि धर्म के इन दो आयामों में फर्क नहीं समझ पाए तो उनका धर्म नष्ट हो जाएगा ;
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धर्म के दो आयाम है -- १) मीमांसा २) परोपकार
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[ 1 ]
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मीमांसा - धर्म क्या कहता है, धार्मिक ग्रंथो में क्या लिखा है, धर्म का उपदेश क्या है, उत्सव क्या है, धर्म की शिक्षा क्या है, धर्म-अधर्म क्या है, पाप एवं पुण्य क्या है , पूर्व जन्म के फल क्या है, जन्नत-जहन्नुम क्या है , सृष्टि क्या है , किसने इसे रचा है , सत्य क्या है, इसका मालिक कौन है , माया क्या है , शैतान एवं फ़रिश्ते क्या है , इल्म क्या है, धर्म का तत्व और दर्शन क्या है आदि आदि तरह के विषयो पर विचार एवं उपदेश करना धर्म की मीमांसा है। किसी धर्म के टिके रहने या नष्ट हो जाने में धर्म की मीमांसा का कोई योगदान नहीं होता है। इस तरह की सभी बातें आभासी / आध्यात्मिक होती और इनकी जुगाली किसी के लिए दिमागी ऐयाशी है और किसी को यह मानसिक सम्बल देती है। यह एक प्रकार की चुहल है। पर जब ये चुहल ज्यादा बढ़ जाती है, और इस वजह से परोपकार के कार्यो में कमी आती है तो धर्म के पाँव उखड़ने लगते है।
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परोपकार - यह धर्म का वह निर्णायक तत्व है जो धर्म को टिकाये रखता है और उसे मजबूती प्रदान करता है। यदि किसी धर्म की धार्मिक संस्थाएं परोपकार के कार्य करती रहेगी तो ऊपर दी गयी मीमांसा करने के अवसर बने रहेंगे। यदि परोपकार घट जायेगा तो जिस धर्म की धार्मिक संस्थाएं ज्यादा परोपकार कर रही है वह धर्म अमुक धर्म के वंचित तबके को अपनी और खींच लेगा। क्योंकि रोटी और बुनियादी जरूरते पहली आवश्यकता है। जब पेट भर जाता है तब ही आदमी को चुहल सूझती है। ऐतिहासिक रूप से यह सिद्ध है कि, जिस धर्म की धार्मिक संस्थाओ ने परोपकार के कार्य किये उनका विस्तार होता गया और जिन्होंने अपनी शक्ति सिर्फ मीमांसा पर जाया कि वे सिकुड़ते चले गए। परोपकार कार्यो के अभाव में सिर्फ एक शर्त* पर ही धर्म टिका रह सकता है -- यदि उसे किसी प्रतिद्वंदी धर्म का सामना नहीं करना पड़े। जिस धर्म की धार्मिक संस्थाओ का प्रशासन बेहतर होता है उन धर्मो में परोपकार के कार्यो में वृद्धि होती है। अत: मजबूत प्रशासन वाला धर्म कमजोर प्रशासन वाले धर्म के अनुयायीओ पर कब्ज़ा कर लेता है।
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[ 2 ]
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मीमांसा की दृष्टी से सारे धर्म उपदेशक, पीर फ़क़ीर, पादरी, संत, स्वामी, महर्षि आदि कवि और कहानी कार है। और इनके मुखारविंद से निकली गयी कहानियों और कविताओं से धर्म के टिके रहने या नष्ट हो जाने का कोई लेना देना नहीं है। ये लोग समय समय पर आते है और अपना ज्ञान बाँट कर चले जाते है। किसी धर्म में कब कितना बड़ा उपदेशक या महात्मा हुआ इससे धर्म को कोई फर्क नहीं आता।
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पर इन कथित धर्म गुरुओ में से ही कभी कभी कोई उपदेशक श्रद्धालुओं को अपना तमाशा दिखा कर दान खींचता है और इस दान से ऐसी व्यवस्था कायम कर देता है जिससे अमुक धर्म में परोपकार के कार्यो में तेजी आ जाती है। कुछ इससे भी आगे बढ़ जाते है और ऐसी व्यवस्था रच देते है जिससे उनके मर जाने के बाद भी अमुक संस्था / धर्म में दान आता रहता है और परोपकार के कार्य होते रहते है। मेरी विचार में सिर्फ वही लोग असली धर्म गुरु एवं संत है जिन्होने अपने धर्म में परोपकार के कार्यो को सतत बनाये रखने के लिए व्यवस्था रची या इसके लिए ईमानदार प्रयास किये। और यदि ऐसे लोगो में चोरी चकारी की आदतें थी या उनका चरित्र कमतर / धूमिल था तब भी अनुकरणीय न होने बावजूद अपने धार्मिक योगदान के दृष्टिकोण से वे संत ही है।
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तो आप किसी भी धर्म से सरोकार रखते हो। इस बात पर ध्यान दीजिये कि आपके धर्म की संस्थाएं स्कूल / अस्पताल चलाना , दवाइयाँ / खाना बाँटना आदि परोपकार के कार्य कर रही है या नहीं। और यदि कर रही है तो क्या ये कार्य प्रतिद्वंदी धर्म के परोपकार कार्यो से कमतर है ? यदि प्रतिद्वंदी धर्म परोपकार के कार्यो में बढ़ा हुआ है तो आपका धर्म खतरे में है।
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(*) धर्म के नष्ट हो जाने की सबसे बड़ी वजह हथियार विहीन होना है। जिस धर्म के अनुयायियों के पास बेहतर हथियार होंगे वह धर्म अन्य धर्मो का अधिग्रहण कर लेगा।
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Pawan Jury BhilwaraRj

Thu Aug 31 2017 23:19:50 GMT+0000 (Coordinated Universal Time)

नोटबंदी भयंकर रूप से कामयाब रही -- सच्ची !!!
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भारत के कुछ 5 शीर्ष "राष्ट्रवादी" (*) नेताओं ने इस क़वायद से लगभग 50,000 से 1000,000 करोड़ रुपया कमाया !!!
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कैसे ?
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कुछ 10,00,000 करोड़ रुपए को वैध तरीक़े से बदला गया और लगभग 400,000 करोड़ रुपया बैंक अधिकारियों और राष्ट्रवादी नेताओं ने बाले बाले बदल दिया !! इसके लिए इन्होंने 30% के आस पास दलाली खाई । 30% की इस दलाली में से कुछ 5% बैंक अधिकारियों एवं राष्ट्रवादी "कार्यकर्ताओं के हाथ लगा और शेष 25% हमारे राष्ट्रवादी नेताओं की जेब में गया !!
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तो इस लिहाज़ से कहना चाहिए कि नोटबंदी इन राष्ट्रवादी नेताओं के लिए बेहद मुनाफ़ा देने वाली रही !
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और देश ? जिन्हें देश की ज़्यादा परवाह है वे अपने देश के साथ चाहे तो भाड़ में जा सकते है !! राष्ट्रवादियों को इससे कोई दिक़्क़त नही है !!
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कहना पड़ेगा कि -- हमारे राष्ट्रवादी नेताओं की जमात, "सेकुलर" नेताओं से ज़्यादा क़ाबिल है । सेकुलर नेता भी ये कांड करके इससे ज़्यादा रुपया कमाने को लालायित थे । लेकिन हिम्मत नही जुटा पाए !! शायद उनमे देश के नाम पर लोगों को पिस जाने के लिए तैयार कर देने का हुनर नही था ! वे कोयलो पर ही हाथ मारते रहे, और इसके एवज़ में सत्ता भी गँवाई ।
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बहरहाल - हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा !
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(* - मैं किसी पार्टी का नाम लेकर व्यक्तिगत आरोप नही लगाना चाहता । इस बारे में आप अनुमान लगा सकते है कि नोटबंदी के समय बेंको पर किन राष्ट्रवादियों का नियंत्रण था )
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