देश में जब भी कोई क़ानून तोड़ा जाता है तो सबसे पहले आदमी के पास पुलिस पहुँचती है, और पुलिस जांच करने के बाद अमुक व्यक्ति को अदालत में जज के पास ले जाती है। तो आप कितने भी अच्छे क़ानून बना दीजिये, जब तक देश की पुलिस एवं अदालतें ईमानदार नहीं है, तब तक कोई भी क़ानून काम नहीं कर पायेगा। इस तरह किसी भी देश की पूरी व्यवस्था पुलिस एवं अदालतों पर टिकी होती है।
पुलिस एवं अदालतें ईमानदार है तो भ्रष्टाचार समेत देश की 80% समस्याएं हल हो जाती है। नेताओं के भ्रष्टाचार का भी पुलिस एवं अदालतों के साथ गहरा सम्बन्ध है ।भारत की पुलिस नेताओ के अधीन काम करती है, और इसीलिए पुलिस नेताओं पर कभी कार्यवाही नहीं कर पाती। यदि पुलिस प्रमुख को नेताओं के चंगुल से निकालकर सीधे जनता के अधीन कर दिया जाए तो नेताओं के भ्रष्टाचार में 80% तक की गिरावट आ जायेगी। और यही स्थिति जजों की है। भारत के जज भी किसी के प्रति जवाबदेह नही है, और जनता का उन पर शून्य नियंत्रण है !! नतीजा हमारे सामने है। जिसकी जेब में पैसा है उसकी जेब में पुलिस एवं अदालतें है। और इसी वजह से जिसकी जेब में पैसा है, उसकी जेब में क़ानून है।
भारत की पुलिस एवं अदालतें पिछले 60 साल से जैसे काम कर रही थी, आज भी वैसे ही काम कर रही है। मोदी साहेब ने इन्हें सुधारने के लिए एक भी क़ानून नहीं छापा। बीजेपी=संघ एवं कोंग्रेस का मेनिफेस्टो देखिये। उनके मेनिफेस्टो में पुलिस-अदालतें सुधारने का कोई भी प्रस्ताव नहीं है। मेरा मुख्य मुद्दा पुलिस एवं अदालतें सुधारना है, और इसके लिए मैंने राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख एवं जूरी सिस्टम का लिखित ड्राफ्ट दिया है। यदि ये दो क़ानून गेजेट में छाप दिए जाए तो सिर्फ 6 महीने के अंदर भारत की 80% समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
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(1) कैसे हम भारत के पुलिस विभाग को नेताओं के चंगुल से आजाद करके ईमानदार बना सकते है ?
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हमें भारत में ऐसी प्रक्रिया चाहिए जिससे हम आम नागरिक अपने जिले के पुलिस प्रमुख को बदल सके। हमने इसके लिए “राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख” का क़ानून ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। यह ड्राफ्ट यदि प्रधानमंत्री गेजेट में प्रकाशित कर दे तो भारत के नागरिको को जिला पुलिस प्रमुख को बदलने की प्रक्रिया मिल जायेगी।
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भारत का धनिक वर्ग, सभी बड़ी राजनैतिक पार्टियों के नेता, न्यायाधीश, राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर, नामचीन लेखक, समाचार पत्रों के सम्पादक , आदि हमेशा से यह कहते आये है कि भारतीयों के पास अपने जिला पुलिस प्रमुख को बदलने की शक्ति नहीं होनी चाहिए। उनका मानना है कि जिला पुलिस प्रमुख उनके नियन्त्रण से निकल कर यदि आम नागरिको के हाथ में चला गया तो उन्हें भारी क्षति होगी। मौजूदा व्यवस्था धनी लोगो की शक्ति को बढ़ाती और नागरिको की शक्ति घटाती है , अत: ये गठजोड़ मौजूदा व्यवस्था को ही कायम रखना चाहता है।
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(2) राईट टू रिकॉल जिला पुलिस प्रमुख के लिए प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट का सारांश :
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(2.1) उम्मीदवारी : 30 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक जिसने 5 वर्षों से अधिक समय तक सेना में काम किया हो, या पुलिस विभाग में एक भी दिन काम किया हो, या सरकारी कर्मचारी के रूप में 10 वर्षों तक काम किया हो या राज्य लोक सेवा आयोग या संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित प्रशासनिक सेवाओ की लिखित परीक्षा पास की हो, अथवा उसने विधायक / सांसद या पार्षद / जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीता हो, तो ऐसा व्यक्ति जिला पुलिस प्रमुख के उम्मीदवार के रूप में अपना आवेदन जिला कलेक्टर कार्यालय में जमा करवा सकेगा।
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(2.2) मतदाताओ द्वारा स्वीकृती दर्ज करना : जिले का कोई भी मतदाता अपनी पसंद के अधिकतम 5 उम्मीदवारो को SP के लिए स्वीकृत कर सकेगा। मतदाता किसी भी दिन किसी भी उम्मीदवार को स्वीकृत कर सकते है, या किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में दी गयी स्वीकृति रद्द कर सकते है।
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(2.3) स्वीकृति दर्ज करने के तरीके : मतदाता पटवारी कार्यालय में जाकर किसी उम्मीदवार के पक्ष में हाँ / नहीं दर्ज कर सकते है, या मोबाईल एप द्वारा या अपने रजिस्टर्ड मोबाईल नंबर से SMS करके या ATM से भी अपनी स्वीकृति दर्ज करवा सकते है।
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(2.4) स्वीकृतियों का प्रदर्शन : प्रत्येक मतदाता द्वारा दर्ज हाँ / नहीं को मतदाता संख्या, नाम और उसके द्वारा स्वीकृत उम्मीदवारों के नाम के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखा जाएगा।
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(2.5) SP की नियुक्ति : यदि कोई उम्मीदवार जिले के सभी मतदाताओं के 50 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं की स्वीकृतियां प्राप्त कर लेता है तो मुख्यमंत्री उसे जिले में अगले 4 वर्ष के लिए नया SP नियुक्त कर सकते है, या नहीं भी कर सकते है। इस बारे में मुख्यमंत्री का निर्णय अंतिम होगा।
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(2.6) राज्यों के सभी नागरिक मतदाताओं के 51 प्रतिशत मतदाताओं के अनुमोदन से मुख्यमंत्री किसी जिले में इस कानून को 4 वर्षों के लिए हटा सकते है, और अपने विवेक से उस जिले में अपनी पसंद का जिला पुलिस प्रमुख नियुक्त कर सकते है।
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(3) अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न एवं उनका स्पष्टीकरण
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(3.1) क्या यह संविधान के खिलाफ नहीं है, कि जनता के पास एस.पी. को नौकरी से निकालने का अधिकार हो ?
जनता को एस.पी. को चुनने या निकालने का निर्णायक अधिकार नहीं दिया गया है। जिले के नागरिक केवल अपनी मंशा बता सकेंगे कि वे मौजूदा एस.पी. के काम काज से संतुष्ट है या नहीं है। अंतिम फैसला करने का अधिकार मुख्यमंत्री के पास ही रहेगा। यदि मुख्यमंत्री चाहेंगे तो एस.पी. को बदलेंगे और यदि सीएम उसकी नौकरी चालू रखना चाहते है तो एस.पी. की नौकरी चालू रहेगी। इस तरह यह प्रक्रिया मौजूदा व्यवस्था से न तो कोई छेड़छाड़ करती है, और न ही उनके अधिकारों में कटौती करती है।
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(3.2) जब अंतिम फैसला मुख्यमंत्री के हाथ में है, तो मुख्यमंत्री जनता की बात क्यों मानेंगे ?
मान लीजिये कि किसी जिले में 20 लाख मतदाता है, और उनमे से 12 लाख यह प्रदर्शित कर देते है कि मौजूदा एस.पी. X को हटाकर Y को एस.पी. की नौकरी दे देनी चाहिए, तो किसी मुख्यमंत्री में इतना साहस नहीं है कि वे जनता के बहुमत के खिलाफ जाए। यदि सीएम तब भी जनता के अनुमोदन को खारिज करते है तो मुख्यमंत्री की पार्टी के उम्मीदवार आगामी सभी प्रकार के चुनाव हारने लगेंगे।
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(3.3) जतना को कैसे पता चलेगा कि कौन व्यक्ति एस.पी. के लिए अच्छा उम्मीदवार है ?
यह समस्या उम्मीदवारो की है, जनता की नहीं है। उम्मीदवार अपने एजेंडे का प्रचार करेंगे और जनता को यह बताएँगे कि यदि उन्हें मौका दिया जाता है तो वे पुलिस व्यवस्था में क्या सुधार लायेंगे। ठीक उसी तरह जैसे आज पीएम का उम्मीदवार अपना प्रचार करता है।
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(3.4) लोग अपनी जाति के आदमी को एस.पी. बना देंगे तो क्या होगा ?
पहली बात - भारत के किसी भी जिले में किसी भी जाति के मतदाताओं का प्रतिशत 15-20 से ज्यादा नहीं है। जबकि एस.पी. बनने के लिए कम से कम 51% मतदाताओ के अनुमोदन की जरूरत होगी। दूसरी बात - हमने जो प्रक्रिया दी है, उसमे मतदाता अपनी पसंद के किन्ही 5 उम्मीदवारों को स्वीकृत कर सकेगा। तो मान लीजिये कि X एक स्वीकृति अपनी जाति वाले उम्मीदवार को दे देता है, परन्तु अपनी दूसरी, तीसरी स्वीकृति किसी अच्छे उम्मीदवार को देगा। इस तरह जो उम्मीदवार अच्छे उम्मीदवार होंगे उन्हें सभी जातियों की स्वीकृति मिलेगी और उनकी स्वीकृतियों की संख्या बढ़ जाएगी।
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(3.5) क्या एस.पी. स्वीकृतियां लेने के लिए नागरिको को धमकाएगा नहीं ?
पहली बात, एस.पी. बनने के लिए लाखों स्वीकृतियों की जरूरत होगी। किसी भी व्यक्ति या एस.पी. के पास इतना बल नहीं होता कि वे लाखों आदमियों को रोज धमका कर सके। दूसरी बात, यदि पुलिस प्रमुख नागरिको को धमकाता है, अथवा उसके या उसके स्टाफ के खिलाफ कोई शिकायत आती है तो इसकी सुनवाई जज नहीं, बल्कि 12 नागरिको की जूरी करेगी। जूरी सिस्टम के कारण तत्काल सुनवाई होगी और 2-3 दिन में फैसला आ जाएगा। मतलब नागरिको को शिकायत लेकर कोर्ट या नेताओं के यहाँ महीनो तक धक्के नहीं खाने पड़ेंगे।
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(3.6) एस.पी. नागरिको को पैसा देकर स्वीकृतियां क्यों नहीं खरीद लेगा ?
उम्मीदवार चुनावो में अनाप सनाप पैसा इसीलिए खर्च करता है, क्योंकि वह जानता है कि एक बार वोट देने के बाद अगले 5 साल तक मतदाता अपना वोट वापिस नहीं ले सकता। लेकिन जहाँ पर रिकॉल की व्यवस्था होती है, वहां कोई भी उम्मीदवार इस तरह पैसा नहीं बहाता। वह सोचता है कि आज कोई व्यक्ति पैसा लेकर मुझे स्वीकृति दे देगा और 5-7 दिन बाद अपनी स्वीकृति वापिस ले लेगा।
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(3.7) भारत के लोग अशिक्षित है, अत: उनको सही एस.पी. चुनने की अक्ल नहीं है।
शिक्षा का अक्ल से कोई लेना देना नहीं है। किताबें पढ़े बिना भी हर व्यक्ति में यह अक्ल होती है कि पुलिस कैसा काम कर रही है। वह समझ सकता है कि जिले में अपराध बढ़ रहे है या नहीं बढ़ रहे है। अत: इसे शिक्षा जोड़ देना एक बकवास तर्क है। खुद को ज्यादा समझदार दिखाकर अन्य को नीचा दिखाने के लिए लोग इस तरह के तर्क देते है।
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(4) राईट टू रिकॉल एस.पी. का क़ानून गेजेट में आने से निम्न परिवर्तन आयेंगे :
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(4.1) एस.पी. बड़े और रसूखदार आदमियों से घूस खाकर उनके गलत आदेश मानना बंद कर देगा। यदि वह ऐसा करेगा तो उसकी नौकरी जायेगी।
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(4.2) एस.पी. नेताओं और मंत्रियो के गलत आदेश मानना बंद कर देगा। यदि वह ऐसा करेगा तो नागरिक बहुमत का प्रयोग करके उसे नौकरी से निकाल देंगे।
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(4.3) इस समय एस.पी. सिर्फ मुख्यमंत्री, मंत्री, जज, डी.आई.जी., सांसद और विधायको को खुश रखने के हिसाब से ही काम करता है। जब ये लोग एस.पी. को ट्रांसफर और सस्पेंड करने की शक्ति खो देंगे तो एस.पी. इनके चंगुल से आजाद होकर जनता के प्रति जवाबदेह हो जाएगा।
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(4.4) जब नेता और आला अधिकारी एस.पी. पर अपनी पकड़ खो देंगे तो एस.पी. उनके खिलाफ निर्भीक होकर जांच कर सकेगा। आज एस.पी. इनके खिलाफ अपनी इच्छा से कोई जांच नहीं खोल सकता। वर्ना ये लोग एस.पी. का ट्रांसफर करवा देते है।
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(4.5) एस.पी. के साथ साथ पूरे पुलिस विभाग के व्यवहार में परिवर्तन आएगा और वे जनता के साथ तमीज से पेश आना शुरू कर देंगे।
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स्थानीय प्रशासन में एस.पी. सबसे ताकतवर अधिकारी है। भारत की सभी राजनैतिक पार्टियाँ और नेता राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख क़ानून के जबरदस्त खिलाफ है। उन्हें भय है कि यदि एस.पी. उनके हाथ से निकलकर जनता की तरफ चला गया तो वे भी एस.पी. की जाँच के दायरे में आ जायेंगे।
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इसीलिए भारत के पुलिस अधिकारी एवं आम पुलिसकर्मी तो राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख का समर्थन करते है, किन्तु भारत के नेता इस क़ानून को अपने दुश्मन की तरह देखते है। भारत में राईट टू रिकॉल पार्टी एक मात्र पार्टी है जिसके कार्यकर्ता पिछले 20 वर्षो ने भारत के नागरिको को राईट टू रिकॉल क़ानून ड्राफ्ट्स के बारे में जानकारी दे रहे है, और इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करने की मांग कर रहे है। गेजेट में प्रकाशित करने के लिए राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख पूरा ड्राफ्ट यहाँ देखें : rtrp.in/301h - (अध्याय - 22 - पेज 354)
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