Pawan Jury BhilwaraRj
2019 आम चुनावों में यह बात स्पष्ट रूप से देखने में आयी कि नेताओं की निर्भरता पेड मीडिया पर बुरी तरह से बढ़ गयी है, और वे अब चुनाव लड़ने एवं जीतने के लिए जमीनी कार्यकर्ताओ पर निर्भर नहीं रह गए है। बीजेपी एवं कोंग्रेस - दोनों की यही स्थिति है।
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(1) प्रत्याशीयों ने अपने क्षेत्रो में लगभग नहीं के बराबर दौरे किये।
(2) कार्यकर्ताओ द्वारा जनसंपर्क भी नगण्य रहा।
(3) चुनाव कार्यालय भी नहीं खोले गए।
(4) बैनर, पोस्टर, पोलिंग बूथ आदि पर भी व्यय कम से कम किया गया।
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कुल मिलाकर चुनाव लड़ने में न तो कार्यकर्ताओ की कोई भूमिका थी और न ही प्रत्याशियों की। पूरा चुनाव टीवी एवं अख़बार द्वारा लड़ा गया। टीवी से ही मतदाताओ को वोट करने की पम्पिंग दी गयी और टीवी-अख़बार ने ही बताया कि वोट किसे किया जाना चाहिए। राजनीति में अब तक 4 सीगे होते थे, अब सिर्फ 2 ही रह गए है -- पेड मीडिया एवं मतदाता !! कार्यकर्ता एवं प्रत्याशियों को पेड मीडिया ने गायब कर दिया है। इससे कार्यकर्ताओ की प्रत्याशियों से और प्रत्याशियों की शीर्ष नेताओं से नेगोशिएट करने की शक्ति और सिकुड़ गयी है। और अब वे बड़े पैमाने पर कलाकारों और नचइयो जैसे आधारहीन नेताओं को संसद में भेज सकेंगे। पेड मीडिया द्वारा संसद में भेजे गए ये रीढ़ विहीन नेता संसद में वहां ठप्पे लगायेंगे जहाँ पेड मीडिया के स्पोंसर कहेंगे।
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जिस तरह चाहो बजाओ
ये आदमी नहीं है, झुनझुने है !!
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