Pawan Jury BhilwaraRj
विधानसभा चुनाव 2018 में वितरित किये गए 24 पेज के पेम्पलेट के अंश : भाग - 2 ( पूरा पीडीऍफ़ कमेन्ट बॉक्स में देखें )
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12. महात्मा सुभाष चन्द्र बोस को राष्ट्रपिता घोषित करने एवं राष्ट्र गान को बदलने जैसे विषयों के लिए नागरिको के
बहुमत का प्रयोग करना :
1. नागरिको के बहुमत का प्रयोग करके हमें करेंसी नोट आदि को शामिल करते हुए सभी सरकारी दस्तावेजो से मोहन
दास गांधी के चित्रों को अहिंसा मूर्ती महात्मा सुभाष चन्द्र बोस के चित्रों से बदल देना चाहिए। सरकार तब से अपने
किसी भी दस्तावेज, योजनाओं, इमारतो आदि में मोहन गांधी के नाम एवं चित्रों का इस्तेमाल नहीं करेगी. क्योंकी
मोहन भाई का आजादी की लड़ाई से कोई लेना देना नहीं रहा था। निजी स्तर पर कोई संगठन या व्यक्ति चाहे तो मोहन
भाई का बढ़ावा कर सकता है।
2. हमें नागरिको के बहुमत का प्रयोग करके सरकारी कार्यक्रमों एवं सरकारी परिक्षेत्रो में जन गण मन के गायन पर
प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए। रविन्द्रनाथ ने जन गण मन में ब्रिटिश सम्राट को ईश्वर तुल्य एवं भारत का भाग्य
विधाता बताया है। इस गीत से प्रसन्न होकर बाद में ब्रिटिश साम्राज्य ने रविन्द्र नाथ को नोबेल पुरूस्कार दिलाने में
सहयोग किया और नाईट हुड की उपाधि दी। बाद में नागरिको के बहुमत से वन्दे मातरम गीत को राष्ट्रगान बनाया जा सकता है।
3. महिलाओ के बहुमत से 498A ( दहेज़ वाला क़ानून ) को रद्द करना - देश भर की महिलाओं के बहुमत का प्रयोग
करते हुए इस धारा को रद्द किया जा सकता है। हमारा अनुमान है कि यदि देश की महिलाओं की राय शुमारी की
जाती है तो महिलाओं का बहुमत इस धारा को रद्द करने के पक्ष में अपना मत प्रकट करेगा। एक वैकल्पिक समाधान
जूरी सिस्टम के ड्राफ्ट को गेजेट में प्रकाशित करना है। दहेज़ के सभी मुकदमो की सुनवाई 12-15 महिलाओं के जूरी
मंडल द्वारा की जायेगी। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के विवाद के लिए भी हमारा यही प्रस्ताव है ।
4. किसी विषय पर नागरिको के बहुमत की रायशुमारी के लिए आवश्यक टीसीपी क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करना -
भारत के नागरिको के पास ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है जिससे वे अपनी शिकायत या सुझाव सीधे प्रधानमंत्री के सम्मुख
रख सके और यह पता लगाया जा सके कि देश के कितने नागरिक इस सुझाव या शिकायत से सहमत है।
12.1. गैजेट में प्रकाशित करने के लिए टीसीपी = Transparent Complaint Procedure का प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट
1) कलेक्टर : कोई मतदाता यदि कलेक्टर कार्यालय में उपस्थित होकर कोई शपथपत्र प्रस्तुत करता है तो कलेक्टर शपथपत्र को 20 रूपये प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर दर्ज करेगा और एक सीरियल नंबर जारी करेगा. कलेक्टर इस शपथपत्र को स्कैन करके शपथकर्ता की मतदाता संख्या के साथ प्रधानमन्त्री की वेबसाइट पर रखेगा।
2) पटवारी : कोई मतदाता यदि धारा-1 के तहत प्रस्तुत किये गए किसी शपथपत्र पर अपनी हाँ/ ना दर्ज कराने पटवारी कार्यालय आता है तो पटवारी 3 रू शुल्क लेकर मतदाता की हाँ / ना को उसकी मतदाता संख्या के साथ दर्ज करेगा तथा मतदाता की हाँ / ना को उसकी मतदाता संख्या के साथ प्रधानमन्त्री की वेबसाइट पर रखेगा।
3) प्रधानमंत्री : ये प्रक्रिया कोई जनमत-संग्रह या रेफेरेंडम नहीं है। मतदाताओ द्वारा दर्ज की गयी हाँ / ना किसी भी अधिकारी, मंत्री, जज, सांसद, विधायक आदि पर बाध्यकारी नहीं है। यदि भारत के कुल मतदाताओं के 51% मतदाता किसी शपथपत्र पर "हाँ" दर्ज कर देते है तो प्रधानमंत्री उस शपथपत्र पर कार्यवाही कर सकते है या प्रधानमंत्री अपना इस्तीफा दे सकते है। इस बारे में प्रधानमन्त्री का निर्णय अंतिम होगा।
12.2 ये 3 धाराएं गेजेट में आने के बाद कैसे काम करेगी ?
मान लीजिये कोई व्यक्ति चाहता है कि धारा 498A ख़त्म की जानी चाहिए। तो वह प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए इस धारा को ख़त्म करने का शपथपत्र कलेक्टर कार्यालय में जाकर प्रस्तुत कर सकता है। कलेक्टर अमुक प्रति पेज के 20 रू की दर से शुल्क लेकर अमुक शपथपत्र का एक सीरियल नंबर जारी कर देगा। कलेक्टर यह शपथपत्र जस का तस स्कैन करके पीएम की वेबसाईट पर रखेगा. अब यदि देश का कोई भी नागरिक 498A को ख़त्म करने का समर्थन करता है तो वह पटवारी कार्यालय में जाकर 3 रू देकर इस शपथपत्र पर हाँ दर्ज कर सकता है। बाद में पीएम इस तरह का आदेश भी दे सकते है कि नागरिक अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर या एटीएम के माध्यम से अपना अनुमोदन दर्ज करवा सके। अब मान लीजिये कि कुछ ही महीनो में 50 करोड़ नागरिक इस शपथपत्र पर हाँ दर्ज कर देते है, तो प्रधानमंत्री जनादेश का सम्मान करते हुए इस धारा को ख़त्म कर सकते है। इस तरह टीसीपी देश के नागरिको को विभिन्न मुद्दों पर अपनी आवाज मिलाने का अवसर देगा, और सरकार को भी इस बात की जानकारी रहेगी कि किसी विषय पर देश के कितने प्रतिशत नागरिक क्या बदलाव चाहते है।
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13. दलितों व सामान्य वर्ग की सहमती से आरक्षण का समाधान करना
13.1. भारत में आरक्षण की इतनी मांग क्यों है , और कैसे इस मांग को स्थायी रूप से कम किया जा सकता है ?
सरकारी सेवाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार, घूसखोरी और आरामतलबी के भयंकर अवसरों के कारण इतनी बड़ी तादाद में लोग सरकारी नौकरियों के लिए सड़को पर उतर आते है। अमेरिका में सरकारी नौकरियों में 'रोजगार के समान अवसर' नाम से योजना लागू है जो कि एक प्रकार का आरक्षण है। इस के तहत कुछ अफ़्रीकी अमेरिकन वर्ग के नागरिको को आरक्षण का लाभ दिया जाता है। लेकिन वहाँ न तो इस आरक्षण को मांगने वालो की तादाद ज्यादा है न ही इसका विरोध करने वालो की। क्योंकि इस कोटे के तहत नौकरी पाने वाले को लॉटरी नहीं लगी जा रही है। उन्हें वहाँ जितना वेतन मिलता है उसके अनुसार काम करना पड़ता है, और निकम्मापन दिखाने पर सेवा सुरक्षा खतरे में आ जाती है। इसका कारण है कि कई विभागों जैसे पुलिस, शिक्षा, न्यायपालिका आदि के मुख्य अधिकारियों को नौकरी से निकालने का अधिकार वहाँ की जनता के पास है, तथा सरकारी कर्मचारियों की शिकायत आने पर नागरिको की जूरी इसकी सुनवाई करती है। भारत में भी सरकारी प्रशासन को यदि चुस्त व जवाबदेह बना दिया जाए और निजी क्षेत्र में स्वरोजगार को बढावा देने वाले क़ानून लागू कर दिए जाए तो आरक्षण की मांग में अपने आप गिरावट आ जायेगी।
1. राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम आने से सरकारी पदो पर भ्रष्टाचार घटकर लगभग शून्य तक हो जाएगा और
सरकारी नौकरी की मांग घटेगी।
2. टीसीपी क़ानून आने से सरकारी नौकरियों के मौजूदा वेतनमान में लगभग आधे से ज्यादा कटौती आएगी, जिससे
आरक्षण की मांग घटेगी।
3. वेल्थ टेक्स आने से जमीनो की कीमतो में गिरावट आएगी और स्थानीय इकाइयों को सरंक्षण मिलेगा जिससे
स्वरोजगार में बढ़ोतरी होगी और सरकारी नौकरियों की मांग घटेगी।
4. भ्रष्ट अधिकारियों का जूरी द्वारा सार्वजनिक नार्को टेस्ट होने से विभागों में घूस खाने की प्रवृति में कमी आएगी। इससे
सरकारी नौकरियों की मांग घटेगी और आरक्षण की मांग में भी कमी आएगी।
हमारे विचार में आरक्षण एक हल्का एवं महत्त्वहीन मुद्दा है , एवं इसका देश की उत्पादकता पर नगण्य प्रभाव है। किन्तु यह इस नजरिये से महत्त्वपूर्ण है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियां पेड मीडिया एवं नेताओं का इस्तेमाल करके इस मुद्दे को जाया तौर पर उभारकर भारत को एक जातिगत गृह युद्ध की और धकेल सकते है। हमारा मत है कार्यकर्ताओ को राईट टू रिकॉल ज्यूरी सिस्टम क़ानून ड्राफ्ट्स को गेजेट में प्रकाशित करने में अपनी शक्ति लगानी चाहिए , ताकि आरक्षण की मांग स्वत: ही गिर जाए। राईट टू रिकॉल, जूरी सिस्टम के अभाव में देश की उत्पादकता एवं अन्य समस्याएं जस की तस बनी रहेगी। चाहे आरक्षण जारी रहे या इसे ख़त्म कर दिया जाए। बहरहाल हमने आरक्षण की समस्या को दलितों की सहमती से हल करने के लिए “दलितों के लिए आर्थिक विकल्प” का प्रस्ताव किया है। इस कानूनी ड्राफ्ट का विवरण यहाँ देखें - JuryIndia .org
14. प्रस्तावित धन वापसी क़ानून नामक खतरे से निपटने के लिए , प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोकने के लिए एवं
गरीबी कम करने के लिए हमारा प्रस्ताव – एम आर सी एम क़ानून ड्राफ्ट :
बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत के प्राकृतिक संसाधन अपने नियन्त्रण में लेना चाहती है। और इसके लिए वे ऐसे क़ानून को लागू करवाने के लिए प्रयासरत है जिससे भारत सरकार के स्वामित्व में मौजूद सभी कीमती जमीनों, खदानों आदि को नीलाम करके बेचा जा सके। जब इन संसाधनों की नीलामी होगी तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत की राष्ट्रीय सम्पत्तियों को खरीद लेगी। नागरिको का समर्थन लेने के लिए उन्होंने इस क़ानून में यह भी प्रावधान जोड़ा है कि बिक्री से प्राप्त इन रुपयों में से एक हिस्सा भारत के लोगो में बाँट दिया जाएगा। इस तरह यह क़ानून आने के बाद अगले 4-5 साल में भारत सरकार के स्वामित्व में मौजूद सभी प्राकृतिक संसाधन हमेशा के लिए बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नियन्त्रण में चले जायेंगे और हमारी सरकार हमेशा के लिए कंगाल हो जायेगी. इस तरह नागरिको को पैसे बांटने का लालच देकर इस क़ानून के माध्यम से भारत के नागरिको और देश को हमेशा के लिए कंगाल करने की व्यवस्था बनायी गयी है। ज्यादातर सम्भावना है कि मीडिया इस प्रस्तावित धन वापसी क़ानून को बड़े पैमाने पर कवरेज देने लगेगा, और कवरेज का यह पैमाना जनलोकपाल के तमाशे से भी बड़ा होगा। इस प्रस्तावित क़ानून में यह दावा किया गया है कि इससे गरीबी कम होगी। जबकि सच्चाई यह है कि इससे पहले दौर में गरीबी कम होगी, जबकि दुसरे दौर में गरीबी 5-10 गुणा और भी बढ़ जायेगी।
हमने प्राकृतिक संसाधनों की लूट को रोकने एवं गरीबी कम करने के लिए एम आर सी एम क़ानून ड्राफ्ट का प्रस्ताव किया है. प्रस्तावित एम आर सी एम क़ानून का संक्षिप्त विवरण निचे दिया गया है. हमने इस क़ानून में यह प्रस्ताव किया है कि सरकार के स्वामित्व में मौजूद सभी खदानों एवं सरकारी जमीनों को बेचा नहीं जाना चाहिये बल्कि इन्हें सालाना लीज पर ही दिया जाना चाहिए , और इससे प्राप्त रोयल्टी एवं किराया सभी नागरिको के खाते में सीधे जमा किया जाना चाहिए. इसमें से एक हिस्सा सेना के खाते में जाएगा।
गरीबी होने के मुख्य कारण है – जमीनों की ऊँची कीमतें , खनिज एवं प्राकृतिक संसाधनों की बेतहाशा लूट, महंगी होती
शिक्षा एव चिकित्सा, उत्पादन इकाइयों की घटती संख्या, निर्मित वस्तुओ का बढ़ता आयात, प्रतिगामी कर प्रणाली एव
सरकारी संस्थानों में अकूत भ्रष्टाचार। सरकारी स्कूलों, अस्पतालों को सुधारने एवं अन्य विभागों का भ्रष्टाचार दूर करने
के लिए हमने अलग से राईट टू रिकॉल एवं जूरी सिस्टम क़ानून ड्राफ्ट प्रस्तावित किये है। इसके अलावा निचे दिए गए
क़ानूनो को लागू करके गरीबी को काफी हद तक कम किया जा सकता है -
1. एम आर सी एम क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करवाना - इस प्रस्तावित क़ानून का ड्राफ्ट एवं विस्तृत विवरण अध्याय
5 में दिया गया है – JuryIndia .org
इस क़ानून के अनुसार -- आईआईएम ए प्लॉट, जेएनयू प्लॉट, सभी यूजीसी प्लॉट, अहमदाबाद एयरपोर्ट प्लॉट, सभी एयरपोर्टों के प्लॉट और हजारों ऐसे भारत सरकार के प्लॉटों से मिलने वाला जमीन का किराया और भारत के सभी खनिजों, कोयला और कच्चे तेल से मिलने वाली सारी रॉयल्टी हम भारत के नागरिकों और हमारी सेनाओं को जानी चाहिए किसी और को नहीं। और यह रॉयल्टी व किराया सीधे ही मिलना चाहिए किसी योजना या स्कीम के जरिए नहीं। उदाहरण के लिए, मान लीजिए भारत सरकार के प्लॉटों से मिलने वाला किराया और खनिज रॉयल्टी दिसम्बर, 2008 में 45 हजार करोड़ रूपया थी। तब हमारे द्वारा प्रस्तावित कानून के मुताबिक 15 हजार करोड़ रूपया सेना को जाएगा और लगभग 500 रूपया प्रत्येक भारतीय नागरिक के पोस्ट-आफिस या बैंक खाते में सीधे ही जमा होगा। नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) क़ानून-ड्राफ्ट से होने वाले सीधे धन वितरण से हर साल प्रति व्यक्ति को 6000 रूपए से ज्यादा की आय हो सकती है , अथवा जमीन या घर की कीमत कम हो सकती है। वह भी प्रति व्यक्ति, न कि प्रति परिवार। और इस तरह नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी क़ानून-ड्राफ्ट गरीबी कम कर देगा, आय बढ़ाएगा और वस्तुओ की मांग बढेगी, वस्तुओ की मांग बढ़ने से उधोग-धंधे और रोजगार बढ़ेगा। स्थानीय उद्योग बढ़ने से इंजिनियरिंग कौशल बढ़ेगा तथा हथियार बनाने के काम में भी सुधार होगा।
2. वेल्थ टेक्स गेजेट में प्रकाशित करवाना : प्रत्येक व्यक्ति को शहरी क्षेत्र में 3000 वर्ग फुट निर्माण एवं 1500 वर्ग फुट भूमि की छूट होगी तथा
इससे अधिक भूखंड एवं निर्माण होने पर भूस्वामी को 1% सालाना की दर से कर देना होगा। इस क़ानून के आने से जमीन की कीमतों में
गिरावट आएगी। जमीन की कीमतें गिरने से दूकान / फैक्ट्री/ घर आदि के लिए भूमि ख़रीदना एवं किराए पर लेना सस्ता हो जाएगा, जिससे बड़े
पैमाने पर उत्पादन इकाईयो की स्थापना हो सकेगी। जीएसटी प्रतिगामी कर है , अत: यह छोटी इकाइयों को गैर वाजिब नुकसान एवं बड़ी
इकाइयों को गैर वाजिब फायदा पहुंचाता है। वेल्थ टेक्स आने के बाद जीएसटी की जरूरत नहीं रह जाएगी।
3. नागरिको को राशन कार्ड की दूकान बदलने का अधिकार देना : कंट्रोल की जिंसो का भ्रष्टाचार ख़त्म करने के लिए हमें ऐसी प्रक्रिया लागू करने
की जरूरत है जिससे नागरिक अपनी राशन की दूकान बदल सके। इसके अलावा हमें 3 किलोग्राम के गैस सिलेंडर भी जारी करने चाहिये, ताकि
गरीब से गरीब व्यक्ति भी इसका इस्तेमाल कर सके।
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15. चौथा सबसे चुनौतीपूर्ण एवं जरुरी काम – लगातार सिकुड़ते हिन्दू धर्म को मजबूत बनाने के लिए प्रस्तावित
क़ानून ड्राफ्ट।
300 ईस्वी पूर्व से हिंदू धर्म का विस्तार थम गया था, तथा 700 ई.पू. से यह लगातार सिमटना शुरू हो गया। 300 ई. पू. में हिंदूओ का प्रसार अफगानिस्तान से लेकर फिलीपींस तक था। 1600 ई. तक आते आते लगभग 35% जनसँख्या तथा 50% भूमि दूसरे धर्मों के अधीन चली गयी। सिखों तथा मराठाओ ने इस क्षति को काफी हद तक रोका तथा बहुत सारी भूमि फिर से प्राप्त भी कर ली। लेकिन धर्मान्तरित लोगों को वे फिर से जोड़ नहीं सके। इनकी यह पुनर्विजय स्पेन की धार्मिक पुनर्विजय ( जिसमें पहले ईसाई बहुल रहे स्पेन ने अपनी खोई हुई धार्मिक स्वतंत्रता को मुस्लिमों के हाथों से दोबारा प्राप्त कर लिया था ), की तुलना में काफी कमजोर रही। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि यह इतनी कमजोर क्यों थी ? फिर 1947 ई. में हिंदुओं ने अपनी भूमि का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के रूप में गवाँ दिया तथा बाद में इसी का एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेश बना और 1947 से लेकर अब तक उत्तर-पूर्व का कुछ तथा कश्मीर का लगभग आधा हिस्सा हम गँवा चुके है। 1700 ईस्वी से लेकर अब तक हिन्दू धर्म-परिवर्तन करके ईसाई / मुस्लिम बन रहे है। और पिछले 25 वर्षों में धर्म-परिवर्तन की ये प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है।
15.1 हमारे विचार में वर्तमान में मिशनरियों के हाथों हिन्दुत्व की लगातार होती हानि के मुख्य कारण निम्नलिखित है :
1. मिशनरियों का गठबंधन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों के साथ है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास भारत की तुलना में ज्यादा अच्छी तकनीक तथा सेना है। उनके पास ज्यादा अच्छी तकनीक होने का कारण है पश्चिमी देशों में राइट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख, राइट टू रिकॉल न्यायाधीश, ज्यूरी सिस्टम , संपत्ति कर आदि क़ानून प्रक्रियांए है । जबकि हमारे पास भारत मे ऐसे कानून नहीं है ; इसलिए मिशनरीज बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सहयोग से बढ़त बना रहे है |
2. चर्च में नियुक्तियों तथा धन को सामुदायिक समूहों में बांटने की प्रक्रियाएं मंदिरों की तुलना में ज्यादा अच्छी है। इसके ज्यादा अच्छे होने के निम्नलिखित कारण हैं :
(2a) चर्च ऑफ़ इंग्लैण्ड नामक एक प्रोटेस्टेंट संप्रदाय में चर्च के पैसों के वितरण सम्बन्धी सभी निर्णय पादरी (priests) लेते है। परन्तु ये पादरी प्रधानमंत्री/सांसदों के द्वारा नियुक्त होते है तथा कोई भी आपराधिक कार्य करने पर नागरिकों की ज्यूरी के नियंत्रण में होते है। साथ ही चर्च की संपत्ति पर उनका कोई उत्तराधिकार नही होता।
(2b) अन्य सभी प्रोटेस्टेंट सम्प्रदायों में स्थानीय बुजुर्गों द्वारा पादरी नियुक्त किया जाता है। चर्च के पैसों पर उत्तराधिकार लागू नही होता, और इसलिए प्रोटेस्टेंट चर्चों में धन इकठ्ठा करने की ओर झुकाव नही पाया जाता। अत: वे इस धन का उपयोग समुदाय के निर्माण व विकास में करते है।
(2c) कैथोलिक में चर्च के पैसों के समाज में बांटने सम्बन्धी निर्णय पादरी द्वारा लिए जाते है, जो कि पोप के अधीन होता है। पोप को नौकरी पर रखने के लिए 100-200 सर्वाधिक पुराने पादरी जिन्हें कार्डिनल्स कहते हैं, वोट करते हैं। चूँकि पादरी शादी नहीं कर सकता तथा उनमें गुरु प्रथा भी नही होती, अत: उत्तराधिकार यहाँ भी लागू नही होता। मतलब वर्तमान पादरी द्वारा अगले पादरी की नियुक्ति नहीं की जाती है। इसीलिए कैथोलिक चर्चों में भी संपत्ति संग्रह नही होता, तथा ये भी दान में मिले पैसों को समुदाय के निर्माण व विस्तार पर खर्च करते है।
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15.2 इस्लाम का विस्तार - 600 ईस्वी के बाद इस्लाम ने भी इसीलिए विस्तार करना शुरू किया क्योंकि उनकी मस्जिदों का प्रशासन अन्य धर्मो की तुलना में ज्यादा बेहतर था। मौलवियों की नियुक्ति में उत्तराधिकार की परम्परा नहीं थी, और दान से प्राप्त सम्पत्ति का इस्तेमाल परोपकार के कार्यो में किया जाता था। दूसरी मुख्य वजह इस्लाम में एकत्रीकरण की प्रक्रिया होना है। समुदाय के नागरिको का सप्ताह में किसी एक निश्चित दिन , निश्चित समय पर निश्चित स्थान पर नियमित रूप से एकत्र होना एकत्रीकरण ( Gathering ) कहलाता है। एकत्रीकरण समुदाय को शक्ति प्रदान करता है , और इस वजह से इस्लाम ने विस्तार करना शुरू किया। किन्तु इस्लाम उन क्षेत्रो को अधिग्रहित करने में असफल रहा जहाँ ईसाइयत थी। इसकी मुख्य वजह यह थी कि मिशनरीज के पास जूरी सिस्टम था। जूरी सिस्टम एकत्रीकरण से ज्यादा बेहतर प्रक्रिया है। तो जूरी सिस्टम होने के कारण मिशनरीज ने इस्लाम के विस्तार को रोक दिया और आज भी जहाँ जहाँ पर मिशनरीज जा रहे है वहां वहां पर वे इस्लाम का अधिग्रहण कर रहे है। दरअसल जूरी सिस्टम का हथियारों के निर्माण की तकनीक जुटाने की क्षमता से गहरा सम्बन्ध है। जूरी सिस्टम होने के कारण ही ब्रिटेन एवं अमेरिका बड़े पैमाने पर आधुनिक हथियारों का निर्माण करने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियां एवं शक्तिशाली सेना खड़ी कर पाए। और यह व्यवहारिक सच्चाई है कि अंततोगत्वा वही धर्म दुनिया में सबसे ज्यादा विस्तार करेगा जिसके पास सबसे शक्तिशाली सेना होगी।
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15.3. प्राचीन काल में हिंदू धर्म के अंतर्गत "मंदिरों" का प्रशासन :
रामायण एवं महाभारत में एक भी ऐसे मंदिर की चर्चा नही मिलती जिसके पास प्रचुर मात्रा में स्वर्ण और धन हो !! इस सम्बन्ध में जो कुछ भी हमें पढ़ने को मिलता है उससे पता चलता है कि उस समय में मंदिरों की जगह आश्रम होते थे। इन आश्रमों को दान के रूप में मिले धन का उपयोग गायों की सेवा, सबको गायों का दूध उपलब्ध कराने, अमीर-गरीब का भेद किये बिना सभी बच्चों को गणित, विज्ञान, कानून, भाषा तथा अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा देने, गरीबों को दवाई दिलवाने तथा उनके भलाई के लिए किया जाता था। इसलिए आश्रम-प्रमुख को "पुरोहित" कहते थे जो दो शब्दों से बना है- "पर" तथा "हित", अर्थात ऐसा व्यक्ति जो दुसरो के कल्याण की चिंता करे। आश्रम उत्तराधिकार द्वारा नही चलता था। तथा जरूरी नही था कि आश्रम-प्रमुख के पुत्र को ही आश्रम की बागडोर सौंपी जाये। आश्रम की यह बागडोर एक संत से दूसरे ऐसे संत को दी जाती थी जो कि समाज में सम्मानित होते थे। इनका कार्यकाल भी स्थायी नही होता था। संत बहुधा यात्रा पर रहते थे और मुक्त विचरण करते थे। यह व्यवस्था अब बहुत ही कम हिन्दू समुदायों में बची हुई है।
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15.4. वर्तमान हिन्दू मंदिरों का प्रशासन :
वर्तमान हिन्दू मंदिरों में धन के समाज में बांटने सम्बन्धी निर्णय मंदिर प्रमुख या संप्रदाय प्रमुख द्वारा लिए जाते है, तथा इनका ही मंदिरों की संपत्ति के उपयोग पर पूर्ण नियंत्रण होता है। ट्रस्टी का पद उत्तराधिकार तथा गुरु प्रथा द्वारा हस्तांतरित होता है। मतलब आज का गुरु ही अगला गुरु नियुक्त करता है। अतः यहाँ संपत्ति इकठ्ठा करने की ओर झुकाव होता है, तथा इसका उपयोग तड़क-भड़क, दिखावे एवं ऐशो आराम में भी किया जाता है। इसका समाधान सिक्ख गुरुओं ने, खासकर 10 वें सिक्ख गुरु श्री गोविन्द सिंह जी ने ढूंढ निकाला था तथा इसे सभी सिक्ख गुरुद्वारों में लागू किया। किन्तु दुर्भाग्य से यह कभी भारत के सभी मंदिरों में लागू नही हो सका। हमारे विचार से हमें इसे आज ही लागू करवाने के प्रयास करने चाहिए। समस्या का समाधान यह है कि सभी हिन्दू मंदिरों के लिए सिक्ख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी ( एसजीपीसी ) जैसा कानून बनाया जाये। तथा इस प्रकार इस कानून के माध्यम से हम मंदिरों में संपत्ति को इकठ्ठा करने की प्रवृति को कम करके हिंदूवाद का पतन रोक सकते है।
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15.5. किस प्रकार पूरे जीवन के कार्यकाल और वारिसान व्यवस्था ( उत्तराधिकार ) से मंदिरों में जमाखोरी को बढ़ावा मिलता है ?
पाठक हमसे असहमत होकर यह कह सकते है कि यदि मंदिरों में पूरे जीवन के कार्यकाल तथा उत्तराधिकार प्रणाली है तो इसमें बुराई क्या है ? और गुरू प्रथा में गलत क्या है, जिससे आज के गुरू ही अपने शिष्यों में से किसी एक को अगला गुरू चुनते है ? यह एक जायज प्रश्न है।
आइये, हम दो परिस्थितियों की तुलना करके देखें - पहला, जिसमें मंदिर प्रमुख A का कार्यकाल मात्र 2 वर्षों का है, और दूसरी परिस्थिति जिसमें मंदिर प्रमुख B का कार्यकाल पूरे जीवन का है। मान लीजिये प्रमुख A तथा प्रमुख B दोनों हीं अलग-अलग मामलों में 1-1 करोड़ रूपये प्राप्त करते है। ऐसी स्थिति में B, जिसका कार्यकाल पूरे जीवन का है, उस 1 करोड़ रूपये को खर्च करने की बजाय लम्बे समय तक अपने पास रखना चाहेगा। लेकिन चूंकि A का कार्यकाल कुछ वर्षों के लिए निश्चित है, इसीलिए A इस पैसे को जितना सम्भव हो सकेगा, सामुदायिक कार्यों और धर्म के उत्थान में ही लगाएगा, ताकि उसे नाम मिले और उसके फिर से चुने जाने की सम्भावना भी बढ़ जाये। इस प्रकार पूरे जीवन के कार्यकाल से खर्च की इच्छा घटती है, और जमाखोरी की इच्छा बढ़ती है। जबकि कुछ वर्षों के निश्चित कार्यकाल से जमाखोरी की सम्भावना घटती है, और समाज के कार्यों में खर्च करने की इच्छा बढ़ती है। भारत में मंदिरों के प्रशासन में बहुधा उत्तराधिकार और पूरे जीवन का कार्यकाल दोनों ही साथ-साथ पाये जाते हैं। प्रत्येक ऐसी संस्था जिसमें पूरे जीवन का कार्यकाल होता है, वहाँ उत्तराधिकार भी होता है। इसी प्रकार उत्तराधिकार प्रथा वहीँ होती है जहाँ कि पुरे जीवन का कार्यकाल भी होता है। निश्चित समय का कार्यकाल होने से पूरे जीवन का कार्यकाल तथा गुरु प्रथा दोनों हीं अपने आप रद्द हो जाते है।
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15.6. किस प्रकार मंदिरों में पूरे जीवन के कार्यकाल एवं उत्तराधिकार से समाज की रक्षा पंक्ति कमजोर होती चली जाती है ?
सैक्शन B में दिए गये उदाहरण में प्रमुख B अपने उत्तराधिकारी के लिए धन इकठ्ठा करना चाहेगा और उत्तराधिकारी भी उस पर जितना सम्भव हो कम खर्च करने के लिए दबाव बनाएंगे। इसीलिए जमाखोरी आगे बढ़ते हीं जायेगी, और इस वजह से मंदिरो द्वारा किये जाने वाले परोपकार के कार्यों में गिरावट आएगी। इस तरह समाज के लिए कार्यों में धन खर्च करने की जगह धन इकठ्ठा करने के झुकाव से समाज की रक्षा क्षमता कमजोर पड़ती है।
उदाहरण के लिए मान लीजिये दो समुदाय A तथा B हैं। समुदाय A में मंदिर प्रमुख का कार्यकाल निश्चित है, तथा प्रमुख का चुनाव अनुयायियों द्वारा किया जाता है। समुदाय B में मंदिर प्रमुख का कार्यकाल पूरे जीवन का है, तथा उत्तराधिकार प्रथा भी है। मान लीजिए कि समुदाय B पर कोई बाहरी आक्रमण होता है, जिसमें समुदाय के 1000 में से लगभग 100 सदस्यों ने युद्ध में जाने का निर्णय लिया। मान लीजिये युद्ध में उनमें से 10 मारे गये तथा 10 बुरी तरह घायल हो गये। अब यदि घायलों तथा मारे गये व्यक्तियों के रिश्तेदारों को मंदिर कोई सहायता नही देते, तो अगली बार हमले में बहुत कम व्यक्ति लड़ने जायेंगे। इसका परिणाम ये होगा कि समुदाय का नियंत्रण हमला करने वालों के हाथों में चला जायेगा। यदि समुदाय A के साथ भी समान परिस्थिति की कल्पना करें तो चूँकि यहाँ धन इकठ्ठा करने की प्रवृति नहीं होती इसलिए मंदिर प्रमुख घायलों, मृत तथा घायल व्यक्तियों के रिश्तेदारों की सहायता करेंगे। इसलिए अगली बार भी युद्ध छिड़ने पर बड़ी संख्या में लोग अपनी जान जोखिम में डाल कर लड़ने जायेंगे।
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सिक्ख प्रशासन में उत्तराधिकार परम्परा नहीं होने से गुरूद्वारे प्रमुखों में धन संग्रह की प्रवृति नहीं थी और यही कारण है कि गैर सिक्ख हिन्दू पराजित हुए जबकि सिखों ने आक्रमणकारियों को युद्धों में कड़ी टक्कर दी। गैर सिक्ख हिन्दूओं में मंदिर प्रमुख आजीवन तथा उत्तराधिकार द्वारा नियुक्त होते हैं, इसलिए उनमें धन को इकठ्ठा करने की ओर झुकाव होती है, तथा वे घायलों व मृतकों के परिवार वालों की बहुत कम मदद कर पाते हैं या करते हीं नही। जबकि सिख गुरुद्वारा प्रबंधक का चुनाव निश्चित समय के कार्यकाल के लिए होने से उनमें धन को इकठ्ठा करने की ओर झुकाव नहीं पाया जाता, इसलिए वे घायलों और मरने वालों के रिश्तेदारों की मदद करते है, अत: उनमे धर्म के लिए लड़ने का जोश बना रहता है, तथा लगातार बढ़ता ही जाता है। और इस कारण सिक्ख अपने आप को और हिंदुओं को मुगलों व अफगानों के हिंसक आक्रमणों में सुरक्षा दे पाये।
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15.7. मंदिरों की संपत्ति पर मिशनरियों के कब्जे में उत्तराधिकार प्रथा किस प्रकार सहायक हुई ?
मंदिरों में उत्तराधिकार व्यवस्था ने एक लम्बे समय तक बने रहने वाली समस्या को जन्म दिया। हम यहाँ एक मंदिर का उदाहरण बिना उसका नाम लिए देना चाहेंगे। यह मंदिर लगभग 1000 वर्ष पूर्व बनाया गया था तथा उसका एक महंत था। उसके 5 बेटे थे जो कि उसके बाद महंत बने। उनमें से हरेक कुछ समय के समय के लिए महंत की गद्दी पर बैठता था। फिर उन 5 में से हरेक को 2 या 3 पुत्र हुए, यानी कुल मिलकर लगभग 12 पुत्र। उन पाँचों के मरने के बाद उनके ये 12 पुत्र, यानी प्रथम महंत के पोते वारिस बने। अब ये 12 भी बारी बारी से कुछ समय से चक्रीय क्रम से ( बारी-बारी से ) महंत की गद्दी पर बैठते थे। लेकिन उनकी भागीदारी समान नहीं रहती। जैसे- यदि A के 2 पुत्र A1 तथा A2 थे एवं B के 4 पुत्र B1, B2, B3 तथा B4 थे। ऐसी स्थिति में A1 या A2 की भागीदारी B1, B2, B3 या B4 की तुलना में ठीक दोगुनी हो जायेगी। अक्सर ऐसा भी होता है कि किसी महंत का कोई पुत्र न हो और उसकी मृत्यु हो जाये। अब ऐसे में यदि उसने पुत्र गोद लिया है या पुत्र का जन्म उसकी मृत्यु के बाद हुआ हो तो ऐसे में वह महंत बनेगा या नहीं इस पर कानूनी विवाद चल सकता है। साथ हीं भागीदारी पर भी विवाद हो सकता है। इसलिए इस तरह लगभग 20-30 पीढ़ियों के बाद अमुक मंदिर के लगभग 500 महंत हैं। साथ ही उत्तराधिकार सम्बन्धी 50 से अधिक अनसुलझे मुकदमे भी कोर्ट में चल रहे हैं । इन मुकदमों का बहाना बनाकर भारत सरकार मंदिरों का अधिग्रहण कर सकती है। चूँकि भारत के प्रमुख राजनीतिक दलो ने मिशनरीज के साथ गठजोड़ बनाये हुए है, इसीलिए मंदिरों की दान द्वारा प्राप्त पैसा मिशनरियों द्वारा चलायी जा रही धर्मार्थ संस्थाओं के पास चला जाता है। इस प्रकार मिशनरियों को मंदिरों से पैसे प्राप्त होते हैं जिसका उपयोग वे हिन्दूओं का धर्मपरिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाने में करते है। इस प्रकार मंदिरों में उत्तराधिकार के चलते दर्जनों विवाद खड़े होते हैं जिससे कि सरकार द्वारा मंदिरों की संपत्ति पर कब्ज़ा करना आसान हो जाता है।
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15.8. समाधान : राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट = NHMDT के प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट का सारांश :
मंदिरों के प्रशासन को सुदृढ़ बनाने के लिए हम यहाँ शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी ( SGPC ) जैसा एक ढांचा प्रस्तावित कर रहे हैं। प्रत्येक हिन्दू, सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि इस ट्रस्ट के जन्म से सदस्य / वोटर होंगे, जब तक कि वे स्वयं अपनी सदस्यता नहीं छोड़ देते। "इन हिन्दू सदस्यों को अध्यक्ष एवं ट्रस्टियो को चुनने एवं किसी भी दिन बदलने का अधिकार भी होगा।" मुस्लिम तथा क्रिश्चियन इस ट्रस्ट के सदस्य नहीं बन सकेंगे।
(1) इस क़ानून के अनुसार यदि एवं जब भारत के मतदाता जनमत संग्रह या ऐसी कोई प्रक्रिया जो 45 करोड़ से अधिक मतदाताओं की मंशा सिद्ध करें, के माध्यम से प्रस्तावित (a) राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या (b) कृष्णा जन्म भूमि देवालय, मथुरा (c) काशी विश्वनाथ देवालय, वाराणसी (d) अमरनाथ देवालय, कश्मीर के भू-खंड NHMDT को सौंप देते है तो NHMDT इन 4 देवालयों का प्रबंधन करेगा।
(2) शुरू में NHDMT उपरोक्त 4 मंदिरों की देख-रेख करेगा। आगे चलकर यदि सम्बंधित संप्रदाय / मंदिर स्वेच्छा से अपने मंदिर सुपुर्द करते है तो यह अन्य मंदिरों की देख-रेख भी कर सकता है।
(3) प्रधानमंत्री प्रथम अध्यक्ष और 4 ट्रस्टियों की नियुक्त प्रधानमंत्री करेंगे। ये पांचो सदस्य हिन्दू होंगे।
(4) NHMDT अध्यक्ष और ट्रस्टी देवालय प्रबंधन के लिए अधीनस्थ कर्मचारियों की भर्ती करेंगे। कर्मचारियों के बीच यदि कोई विवाद होता है या हिन्दुओं व कर्मचारियों के बीच कोई विवाद होता है, तो विवाद के निपटान के लिए जिला या राज्य या भारत की मतदाता सूची में से क्रमरहित तरीके से चुने गए 12 से 1500 हिन्दुओं की जूरी जिनकी आयु 30 वर्ष से 55 वर्ष के मध्य होगी ,बुलाई जा सकती है। जूरी सदस्य दोनों पक्षों को सुनेंगे और अपना निर्णय देंगे। यदि आपका नाम इस जूरी ड्यूटी में चुना गया है, तब आपको जूरी सदस्य के रूप में प्रस्तुत होना पड़ेगा और मामले का फ़ैसला करना होगा।
(5) कोई भी भारतीय हिन्दू नागरिक जिसकी आयु 30 वर्ष से अधिक है , यदि अध्यक्ष / ट्रस्टी बनना चाहता है तो वह जिला कलेक्टर के सामने अपना शपथपत्र जमा करवाकर उम्मीदवार के रूप में पंजीकृत हो सकता है।
(6) मतदाता किसी भी दिन किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में अपनी स्वीकृति दर्ज करवा सकते है। मतदाता पटवारी कार्यालय में उपस्थित होकर किसी उम्मीदवार के पक्ष में हाँ / नहीं दर्ज कर सकते है , या मोबाईल एप द्वारा या अपने रजिस्टर्ड मोबाईल नंबर से SMS करके या ATM से भी अपनी स्वीकृति दर्ज या रद्द करवा सकते है।
(7) यदि किसी उम्मीदवार को 20 करोड़ से अधिक हिन्दू मतदाताओं की स्वीकृति मिल जाती है तो प्रधानमंत्री उसे नए ट्रस्टी के रूप में नियुक्त कर सकते है।
(8) NHDMT उन सभी देवालयो का प्रबंधन भी करेगा जो किसी संप्रदाय ने उसे सौंप दिया है। यदि सम्प्रदाय चाहे तो सौंपे गए देवालय को 5 साल के भीतर वापस ले सकता है। 5 साल बाद, ट्रस्ट औपचारिक रूप से संप्रदाय से पूछेगा कि क्या उसे देवालय वापस चाहिए। यदि सम्प्रदाय के 65% से ऊपर संप्रदाय मालिक "ना" में उत्तर करते है सिर्फ तब और तब ही NHDMT द्वारा देवालय अधिग्रहत किया जायेगा। लेकिन इसके बाद NHDMT संप्रदाय को देवालय वापस नहीं दे सकेगा।
(9) यदि कोई व्यक्ति 1000 दिनों के लिए अध्यक्ष के रूप में सेवाए दे चुका है तो पीएम उसे सबसे अधिक अनुमोदनों वाले व्यक्ति से बदल देंगे। गेजेट में प्रकाशित होने के लिए तैयार पूरा ड्राफ्ट यहाँ देखें -- Newindia
.in/TempleLaw5
हमारा मानना है कि ,यदि भारत के कार्यकर्ता राईट टू रिकॉल , जूरी सिस्टम , NHDMT , वेल्थ टेक्स , एमआरसीएम क़ानून ड्राफ्ट्स को गेजेट में प्रकाशित करवाने में असफल रहते है, तो यह तय है कि अमेरिका-ब्रिटेन की बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जल्द ही हमारे सभी प्राकृतिक संसाधनों का अधिग्रहण करके भारत को एक विशाल फिलिपिन्स में परिवर्तित कर देगी, और इस प्रक्रिया में करोड़ो की संख्या में धर्मान्तरण होंगे । और यदि वे भारत को एक विशाल फिलिपिन्स में तब्दील नहीं कर पाए तो हमारी स्थिति और भी बदतर हो जायेगी, क्योंकि तब ज्यादातर से भी ज्यादा सम्भावना है कि वे भारत का इराकीकरण करने में सफल हो जायेंगे ।
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इन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित करवाने के लिए आप क्या कदम उठा सकते है ?
(1) प्रधानमंत्री को निचे दिए गए फोर्मेट में पोस्टकार्ड भेजे -
“प्रधानमंत्री महोदय , मैं विनती करता हूँ कि इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करें – newindia .in/templelaw5 ,#TempleLaw5
( newindia .in प्रधानमंत्री की अधिकृत वेबसाईट है , जिस पर कोई भी नागरिक अपना सुझाव रख सकता है , और रखे गए किसी सुझाव पर वोट भी कर सकता है। हमने सभी ड्राफ्ट के पीडीऍफ़ newindia .in पर रख दिए है। अत: जब आप पोस्टकार्ड भेजे तो उस क़ानून ड्राफ्ट का लिंक जरुर रखें जिस ड्राफ्ट को आप गेजेट में प्रकाशित करवाना चाहते है।)
(2) यदि आप ट्विटर पर है तो @pmoindia पर यह ट्विट करें - “प्रधानमंत्री महोदय , मैं आपसे विनती करता हूँ कि इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करें – newindia .in/templelaw5 , #TempleLaw5”
(3) यदि आप स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते है तो newindia .in पर newindia .in/templelaw5 ड्राफ्ट को वोट करें।
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