Pawan Jury BhilwaraRj
जब कोई मतदाता नोटा दबाता है तो यह मालूम नहीं हो पाता कि उसने नोटा का बटन किस मुद्दे पर किसके विरोध में दबाया है !! और इस वजह से नोटा सभी पार्टियों को सेफ एक्जिट दे देता है !!! यदि कमजोर विकल्प भी मौजूद है तो मतदाता को विकल्प हीनता का आश्रय नहीं लेना चाहिए।
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मान लो किसी विधानसभा चुनाव में नोटा को 5000 वोट मिलते है, तो यह मालूम नहीं किया जा सकता कि ये 5000 लोगो का मुद्दा क्या है और ये किसी पार्टी से किस तरह के बदलाव की मांग कर रहे है , और किस मुद्दे को यदि कोई पार्टी तवज्जो देने लगे तो ये मतदाता नोटा की जगह किसी पार्टी के पक्ष में वोट करने लगेंगे। तो इस तरह कोई भी राजनैतिक दल या पेड मीडियाकर्मी इसकी व्याख्या अपनी इच्छानुरूप कर सकते है।
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इस स्थिति को एक उदाहरण से समझिये -- मान लीजिये कि कोई बालक किसी खिलोने को पाने के लिए रूठ जाता है। अब यदि बालक को खिलौना चाहिए तो उसे अपने माता-पिता को रोकर या गाकर यह बताना ही पड़ेगा है कि उसे खिलौना चाहिए। और जब अभिभावक को वजह मालूम हो जाती है सिर्फ तब ही वो ये फैसला करते है कि खिलौना खरीदकर देना है या नहीं देना है। लेकिन यदि बालक यह नहीं बतायेगा कि वो क्यों रूठ गया है तो माता पिता के पास अंदाजा लगाने के सिवाय कोई चारा नहीं है।
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नोटा के साथ भी यही समस्या है। इससे यह तो साबित हो जाता है कि मतदाता सभी पार्टियों से नाराज है , किन्तु यह नहीं पता चलता कि उनका मुद्दा क्या है ? मतलब नोटा का प्रतिशत बढ़ने से एक बात तो पता चलती है कि कोई या कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दे ऐसे है जिन्हें किसी भी पार्टी ने तवज्जो नहीं दी है , अत: मतदाता नोटा की और जा रहा है , लेकिन यह पता नहीं चल पाता कि वे मुद्दे कौनसे है , और वे किसी पार्टी से क्या चाहते है।
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मेरे विचार में किसी कार्यकर्ता को नोटा दबाने से पहले निम्नलिखित बिन्दुओ पर क्रमिक रूप से विचार करना चाहिए :
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1) उसे अपने फेसबुक पर यह स्पष्ट रूप से लिखना चाहिए कि मैं देश में X , Y या Z क़ानून या नीति चाहता हूँ और यदि किसी भी पार्टी ने नीति X को अपने एजेंडे में शामिल नहीं किया तो मैं नोटा को वोट दूंगा।
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2) उसे सभी बड़ी एवं छोटी पार्टी के कार्यकर्ताओ से स्पष्ट रूप से आग्रह करना चाहिए कि वे नीति X को अपने एजेंडे में शामिल करें।
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3) यदि कोई भी बड़ी एवं छोटी पार्टी X को अपने एजेंडे में शामिल नहीं करती है , तो उसे निर्दलीय प्रत्याशियों से कहना चाहिए कि वे X को अपने एजेंडे में शामिल करें।
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4) यदि कोई छोटी पार्टी या निर्दलीय प्रत्याशी इसे अपने एजेंडे में शामिल कर देता है तो नोटा के समर्थक को इन्हें अपना वोट देना चाहिए और अपने फेसबुक पर चुनावों से पूर्व भी यह लिखना चाहिए कि मैं A को वोट करने वाला हूँ , क्योंकि A ने नीति X को अपने एजेंडे में शामिल किया है।
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5) यदि कोई भी उम्मीदवार X को अपने एजेंडे में शामिल नहीं करता है तो नोटा समर्थक को अपने आस पास के कार्यकर्ताओ से कहना चाहिए कि यदि वे नीति X को शामिल करते हुए चुनाव लड़ते है तो मैं उन्हें वोट दूंगा एवं उनका प्रचार भी करूँगा।
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6) यदि तब भी अमुक लोकसभा क्षेत्र में कोई भी उम्मीदवार नीति X को अपने एजेंडे में शामिल नहीं करता है तो नोटा समर्थक को खुद चुनाव लड़ना चाहिए , और इस मुद्दे के समर्थको से कहना चाहिए कि इस मुद्दे को सपोर्ट किसी भी उम्मीदवार ने नहीं किया है अत: मैं इस मुद्दे का प्रचार करने के लिए चुनाव लड़ रहा हूँ। इस तरह नोटा समर्थक अपना मुद्दा आगे बढाने में सफल हो जायेंगे। नोटा दबाने से किसी मुद्दे को आगे नहीं बढाया जा सकता।
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7) यदि नोटा समर्थक चुनाव लड़ने में सक्षम नहीं है , तब उसके पास नोटा दबान के अलावा कोई विकल्प नहीं है। लेकिन अमुक नोटा समर्थक ने अपनी फेसबुक के कवर पेज पर या एल्बम बनाकर यह विवरण नहीं लिखा है कि वह किस मुद्दे पर विकल्प हीनता के कारण नोटा को वोट करने वाला है, तो मेरे विचार में नोटा दबाने वाले मतदाता के पास नोटा दबाने की पर्याप्त वाजिब वजह नहीं है !!
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जाहिर है , नोटा का समर्थक बनना आसान नहीं है। नोटा विकल्पहीनता है। लेकिन यदि विकल्प मौजूद है या फिर आप स्वयं विकल्प बन सकते है तो नोटा की और जाना कोई उपाय नहीं लाएगा। तो नोटा समर्थको से मेरा आग्रह है कि , पहले अपने मुद्दों को लेकर सभी विकल्पों की तलाश करे और तब खुद विकल्प बनने की कोशिश करे। और कैसे भी कोई विकल्प न मिले तो तो ही अंतिम रूप में विकल्प हीनता यानी नोटा का आश्रय ले।
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