> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2018-12-31

Pawan Jury BhilwaraRj

यदि -
1) जीएसटी की दर घटाकर 5% भी कर दी जाए, और
2) जीएसटी के दायरे में आने वाले कारोबार की सीमा की छूट को 20 लाख से बढ़ाकर 60 लाख तक कर दिया जाए ,
तो भी कुछ ही वर्षो में लाखों छोटे और मझौले कारोबारी बाजार से बाहर हो जायेंगे !!
.
जीएसटी से होने वाले नुकसान का इसकी दर ज्यादा या कम होने से कोई लेना देना नहीं है। जीएसटी को डिजाइन ही इस तरह से किया गया है कि यह छोटे और मझौले कारोबारियों को नुकसान एवं बड़े कारोबारी को गैर वाजिब फायदा पहुंचाता है। चाहे दर कितनी ही कम क्यों न हो !!
.
१) यह "रिग्रेसिव टेक्स" है - रिग्रेसिव टेक्स का ढांचा इस तरह होता है कि गरीब तबके को सबसे ज्यादा और अमीर वर्ग को सबसे कम टेक्स चुकाना होता है। रिग्रेसिव टेक्स गरीब व्यक्ति को और भी गरीब एवं अमीर व्यक्ति को और भी अमीर बनाता है।
.
२) इसमें "मिसिंग ट्रेडर प्रॉब्लम" है - मान लीजिये कि लोभ चंद मांगी लाल से 100,000 रू का माल खरीदता है और जीएसटी की दर 20% है तो लोभ चंद मांगी लाल को 1,20,000 रू चुकाएगा। अब यदि मांगी लाल जीएसटी के ये 20,000 रू सरकार को जमा नहीं कराता और फरार हो जाता है तो जीएसटी अधिकारी मांगी लाल के पीछे नहीं जायेंगे। जीएसटी क़ानून के अनुसार तब लोभ चंद को सरकार के खाते में जीएसटी के 20,000 रू फिर से जमा कराने होंगे !!! तो आगे से लोभ चंद और उसके जैसे कई कारोबारी छोटे कारोबारियों से माल लेना बंद कर देंगे और सिर्फ बड़े कारोबारियों से ही माल लेंगे। इस तरह छोटे कारोबारी बाजार से बाहर हो जायेंगे।
.
३) इसमें "डबल टेक्सेशन ऑन स्मॉल ट्रेडर" प्रॉब्लम है - यदि कोई अपंजीकृत ट्रेडर जीएसटी में पंजीकृत कारोबारी को माल बेचता है तो जीएसटी में पंजीकृत कारोबारी को इनपुट क्रेडिट नहीं मिलेगा। मतलब जीएसटी में पंजीकृत कारोबारी पर डबल जीएसटी आ जाएगा और उसका माल महंगा हो जाएगा। इस वजह से जीएसटी में पंजीकृत ट्रेडर ऐसे कारोबारी से माल नहीं लेंगे, जो जीएसटी में पंजीकृत नहीं है। इससे जो ट्रेडर जीएसटी में पंजीकृत नहीं है उसका धंधा सिकुड़ने लगेगा और वे बाजार से बाहर हो जाएंगे। अब यदि छोटा ट्रेडर जीएसटी में रजिस्टर्ड हो जाता है तो वह "मिसिंग ट्रेडर प्रॉबल्म" का शिकार हो जाएगा।
.
४) यह छोटे कारोबारी की लागत बढ़ाता है - बड़ी कम्पनियो के पास अलग से एकाउंट्स डिपार्टमेंट होता है अत: उन्हें बिल, रिटर्न वगैरह भरने में किसी अतिरिक्त लागत का सामना नहीं करना पडेगा। किन्तु छोटे कारोबारी धंधा भी करते है और टेक्स रिटर्न आदि भी खुद ही भरते है। जीएसटी में प्रति माह रिटर्न फ़ाइल करने होंगे। अब वे खुद इसे करेंगे तो उनके कार्य घंटे कम हो जाएंगे और इसके अलावा कई कारोबारी इन सब पचड़ो को समझते नहीं है। वे इसमें उलझ कर अपनी कार्य क्षमता गँवा देंगे। यदि वे इसके लिए स्टाफ रखते है तो उनकी अतिरिक्त लागत बढ़ जायगी और उन्हें नुकसान होगा। यदि रिटर्न फ़ाइल करने की अवधि को मासिक से बदल कर त्रे मासिक कर दिया जाता है तो मिसिंग ट्रेडर प्रॉब्लम तीन गुना तक बढ़ जायेगी !!
.
५) e-way बिल - e-way बिल सिस्टम बहुत ही अव्यवहारिक है, किन्तु यदि इसे लागू नहीं किया गया तो जीएसटी काम ही नहीं कर पायेगा और एक समानांतर आपूर्ति श्रृंखला खड़ी हो जायेगी। और यदि इसे लागू किया गया तो छोटे और मझोले कारोबारियों को बड़े पैमाने पर आर्थिक दंड का सामना करना पड़ेगा और उनके माल की लागत बढ़ जायेगी !!
.
कुल मिलाकर जीएसटी में दरो को लेकर कोई समस्या ही नहीं है। दर 10% रखो या 20% , इससे ऊपर दी गयी समस्याओ का समाधान नही होता। अंततोगत्वा टेक्स तो अंतिम उपभोक्ता यानी कि पब्लिक को ही चुकाना होता है, तो दर के कम ज्यादा होने से कारोबारी को कोई विशेष नुक्सान नहीं है। किन्तु पेड मीडिया, पेड अर्थशास्त्रियों एवं राजनैतिक पार्टियों ने जीएसटी दरो को ही मुख्य समस्या के रूप में उछाला है और ऊपर दी गयी बुनियादी एवं खतरनाक समस्याओ को परिदृश्य से गायब कर दिया है। और अब पूरा देश और कारोबारी जीएसटी की दरो को लेकर बहस कर रहे है !!
.
===========