Pawan Jury BhilwaraRj
विधानसभा चुनाव 2018 में वितरित किये गए 8 पेज का पेम्पलेट : ( पीडीऍफ़ कमेन्ट बॉक्स में देखें )
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00 अपने क्षेत्र के उम्मीदवार से पूछे कि वे अपने वादे “कैसे” पूरे करेंगे ?
चुनावो के दौरान यदि कोई प्रत्याशी आपसे वादा करता है कि वह ग़रीबी दूर करेगा या भ्रष्टाचार ख़त्म कर देगा तो आप उससे पूछिए कि वह ऐसा “कैसे” करेगा ? दरअसल विधायक का काम सिर्फ़ क़ानून बनाना है। क़ानून विधानसभा में बनते है। इसीलिए हम उम्मीदवार को चुन कर विधानसभा में भेजते है। तो यदि कोई उम्मीदवार आपसे कहता है कि वह ग़रीबी दूर करेगा , तो आपको उससे पूछना चाहिए कि वह ऐसा कौनसा क़ानून पास करने वाला है जिससे ग़रीबी दूर हो जाएगी ? उससे पूछिए कि वह पुलिस विभाग का भ्रष्टाचार कम करने के लिए कौनसा क़ानून पास करने वाला है ?
अपने क्षेत्र के उम्मीदवार से उस क़ानून का लिखित ड्राफ्ट मांगिये। और तब आप देखेंगे कि वे उम्मीदवार जो भी वादे कर रहे है , उन्हें पूरा करने के लिए उनके पास कोई निश्चित योजना नहीं है। यह पेम्पलेट इतना लम्बा इसीलिए है क्योंकि इसमें हमने उन कानूनों के ड्राफ्ट एवं उनके संक्षिप्त विवरण दिए है जिन्हें गेजेट में प्रकाशित करने से किसी समस्या का समाधान होगा। विस्तृत विवरण के लिए कृपया यह लिंक देखें – JuryIndia .org
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01. राईट टू रिकॉल क्या है ? ( और द अन्ना एवं श्री अरविन्द केजरीवाल से हमारा कोई लेना देना नहीं है )
राइट टू रिकॉल का मतलब है वोट वापस लेने का अधिकार होना। राईट टू रिकॉल का अर्थ उन क़ानून प्रक्रियाओ से है जिनके गेजेट में छपने के बाद मतदाता यदि अपने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सुप्रीम कोर्ट जज, हाई कोर्ट जज, लोकपाल, जिला पुलिस प्रमुख, जिला शिक्षा अधिकारी, दूरदर्शन चेयरमेन, विधायक, सांसद आदि को किसी भी दिन बदलना चाहे तो अपने बहुमत का प्रदर्शन करके इन्हें सीधे बदल सकेंगे। यदि मतदाता अपने प्रधानमंत्री या सांसद को हटाकर किसी दुसरे व्यक्ति को लाना चाहते है तो उन्हें अगले 5 वर्ष तक इन्तजार नहीं करना होगा। जिला पुलिस प्रमुख , जिला शिक्षा अधिकारी आदि जैसे अधिकारी भी जिले के मतदाताओं के अनुमोदन से नियुक्त होंगे एवं राईट टू रिकॉल के दायरे में रहेंगे। हम ये कानून भारत में लागू करवाने का अभियान 1999 से चला रहे है। हमने द अन्ना ( The Anna ) एवं श्री अरविन्द केजरीवाल से आग्रह किया था कि वे जनलोकपाल के ड्राफ्ट में राईट टू रिकॉल की धाराएं जोड़े। किन्तु द अन्ना एवं श्री अरविन्द केजरीवाल ने जनलोकपाल को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार नागरिको को देने से इनकार कर दिया। अत: द अन्ना एवं श्री अरविन्द केजरीवाल राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओ के छद्म समर्थक है , एवं उनसे हमारा कोई सरोकार नहीं है।
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02. राजपत्र अधिसूचना या गेजेट नोटिफिकेशन क्या है ?
ज्यादातर राजनेता और राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर आदि इस बार पर काफी जोर देते है कि नागरिको को इस तथ्य के बारे में सूचित नहीं किया जाना चाहिए कि देश की व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए गेजेट में छपी हुयी इबारत की कितनी निर्णायक एवं शक्तिशाली भूमिका होती है। हम रिकालिस्ट्स का सबसे महत्त्वपूर्ण लक्ष्य भारत के नागरिको तक यह बात पहुँचाना है कि – (1) गेजेट नोटिफिकेशन क्या है , और (2) देश की व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए सबसे आसान और सबसे महत्त्वपूर्ण तरीका यह है कि अमुक प्रक्रिया को गेजेट में प्रकाशित किया जाए। और (3) कैसे “क़ानून ड्राफ्ट के नेतृत्व में अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी केन्द्रित और कार्यकर्ता निर्देशित जन आन्दोलन” के माध्यम से नागरिक प्रधानमंत्री को आवश्यक क़ानून ड्राफ्ट लागू करने के लिए बाध्य कर सकते है। और एक बार जब भारत के नागरिक गेजेट नोटिफिकेशन की शक्ति से परिचित हो जायेंगे तो वे जान जायेंगे कि देश में व्याप्त किसी भी समस्या का समाधान कितना आसान है।
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गेजेट नोटिफिकेशन या राजपत्र अधिसूचना एक पुस्तिका है जिसका प्रकाशन केन्द्रीय एवं राज्य मंत्रियो द्वारा हर महीने या समय समय पर जब आवश्यक हो तब किया जाता है। गेजेट में मंत्रियो द्वारा प्रशासनिक अधिकारियों के लिए आदेश जारी किये जाते । कलेक्टर आदि अधिकारी सिर्फ वही कार्य करते है जो गेजेट में लिखा होता है , अधिकारी को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि अमुक मंत्री ने प्रेस में या पब्लिक रेली के भाषण में क्या कहा था। उदाहरण के लिए यदि कोई मंत्री प्रेस कोंफ्रेंस में, या रेली में या अपने पार्टी के मेनिफेस्टो में यह कहता है कि “प्रत्येक परिवार को 20 लीटर कैरोसिन मिलेगा” , लेकिन यदि मंत्री ने गेजेट में 10 लीटर लिखा है तो कलेक्टर प्रत्येक परिवार को 10 लीटर कैरोसिन ही देगा। क्योंकि कलेक्टर को वही करना होता है जो गेजेट में लिखा गया है , न कि वह करना होता है जो मंत्री अपने भाषण में कह रहा है। क्योंकि यदि कलेक्टर आदि अधिकारी गेजेट की अवहेलना करेंगे तो उनकी नौकरी जा सकती है , उन पर फाइन हो सकता है, पेंशन रुक सकती है और यहाँ तक कि उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है।
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आप देखेंगे कि सभी पार्टियों के नेता घोषणाएं करने एवं भाषण सुनाने में तो बेहद रुचि रखते है, किन्तु वे अपने चुनावी प्रचार के दौरान यह कभी नहीं बताते कि सत्ता में आने के बाद वे कौनसे क़ानून ड्राफ्ट गेजेट में प्रकाशित करने वाले है। यदि आप अधिकारियो को किसी निर्माणधीन इमारत के कारीगरों की तरह देखते है तो गेजेट उस इमारत के निर्माण का ब्लू प्रिंट एवं नक्शा है। जो कार्यकर्ता देश की व्यवस्था में कोई भी बदलाव लाना चाहते है तो उन्हें यह सोचना चाहिए कि गेजेट में क्या छपवाने से यह बदलाव लाया जा सकता है , और तब कार्यकर्ताओ को मंत्रियो से अमुक ड्राफ्ट को गेजेट में तुरंत छपवाने की मांग करनी चाहिए। जब प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट गेजेट में छपेगा , सिर्फ तब ही वास्तविक बदलाव आएगा , अन्यथा नहीं। अत: आप देश की किसी समस्या के समाधान के लिए कम से कम एवं अधिक से अधिक क्या कर सकते है ? आप मंत्रियो से कह सकते है कि अमुक क़ानून ड्राफ्ट को गेजेट में प्रकाशित किया जाये। यदि कोई नेता या कार्यकर्ता देश की किसी समस्या का समाधान करने की बात कर रहा है किन्तु वह अपने श्रोताओं को यह जानकारी नहीं देता कि अमुक समस्या का समाधान करने के लिए वह गेजेट में क्या छपवाने का प्रस्ताव कर रहा है तो यह तय है कि उसकी रुचि समस्या के समाधान में नहीं बल्कि समस्या को उभारकर वोट इकट्ठे करने में है। और ऐसा वे जानबूझकर करते है। हमारे विचार में मतदाताओं को उम्मीदवारों से यह कहना शुरु करना चाहिए कि , "हमें आपके ओजस्वी भाषणों और आवेशमय नारों में कोई रुचि नहीं है। हमें आप उन कानूनों के ड्राफ्ट दिखाइये जिन्हें जीतने के बाद आप गेजेट में प्रकाशित करने का वादा करते है।"
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यह दुःख का विषय है भारत में बहुत ही कम कार्यकर्ता गेजेट नोटिफिकेशन की शक्ति के बारे में जानते है , और हमारा सबसे पहला लक्ष्य भारत के अधिकतम नागरिको एवं कार्यकर्ताओ तक यह जानकारी पहुँचाना है कि देश को गेजेट चलाता है, और यदि आप देश में कि बदलाव लाना चाहते है तो आपको यह नहीं सोचना चाहिए कि किस पार्टी या नेता को वोट देने से यह समस्या हल होगी , बल्कि यह सोचना चाहिए कि इस समस्या का समाधान करने के लिए हमें गेजेट में क्या छपवाना चाहिए . इस अध्याय का विस्तुत विवरण इस लिंक पर देखें - JuryIndia .org
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03. अमेरिका की पुलिस एवं अदालतें भारत की तुलना में ज्यादा कार्यकुशल एवं ईमानदार क्यों है ?
आपने अमेरिका के अपने रिश्तेदार, मित्रों से यह अवश्य सुना होगा कि अमेरिका के पुलिस / कोर्ट में भ्रष्टाचार भारत की तुलना में बहुत कम है। भारत के प्रत्येक अनिवासी भारतीय ने भी इस तथ्य पर पहले दिन से ही ध्यान दिया होगा। उदाहरण के लिए अमेरिका में 9 वर्ष रहकर 1999 में भारत लौट आये सोफ्टवेयर डेवलेपर एवं रिकालिस्ट राहुल चिमनभाई मेहता अपने संस्मरण में बताते है कि - "जब मैं अमेरिका में था तो मुझे ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने पर हवलदारों ने 5 बार रोका था। ट्रैफिक नियम तोड़ने पर हवलदारों ने मुझसे 3 बार जुर्माना लिया और 2 बार मुझे वैसे ही जाने दिया। परन्तु एक बार भी उन्होंने यह संकेत तक नहीं दिया कि घूस लेने में उनकी जरा भी रूचि है। मुझ पर लगाए गए जुर्माने की राशि 1500$ थी , और मैं यह समझ नहीं पा रहा था कि यह पुलिस वाला मुझसे 50$ घूस लेकर मामला यहीं पर रफा दफा करने की कोशिश क्यों नहीं कर रहा है ?" और यह बात आपको भी अजीब लग रही होगी कि आखिर अमेरिका की पुलिस / जज भारत की तरह घूस वसूलने में इतनी माहिर क्यों नहीं है ?
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क्या अमेरिका की पुलिस / जज आदि भारत की पुलिस / जज की तुलना में इतने बेवकूफ है कि वे अपने नागरिकों से घूस वसूलने के तौर तरीके नहीं सोच सकते ? नहीं, वे इतने भी बेवकूफ नहीं है। क्या वे इतने डरपोक है ? नहीं, वे भी घूस वसूलने में उतने ही साहसी है जितने कि भारत के अधिकारी है। तो क्या अमेरिका के पुलिस वाले लालची नहीं है ? नहीं ऐसा भी नहीं है। किसी भी देश में ऐसा नहीं हो सकता कि वहाँ के लाखों व्यक्तियों में सभी संत हो और कोई भी लालची न हो। तो क्या अधिक वेतन प्राप्त करने के कारण वे नागरिको से घूस नही लेते ? अच्छा, मान लीजिये कि यदि हम भारत में अपने अधिकारियों के वेतन इस सप्ताह दोगुने कर दें, तो क्या वे हमें अगले सप्ताह से घूस में 10% की छूट देंगे ? उदाहरण के लिए, वर्ष 2009-2010 में सरकार ने सभी न्यायाधीशों के वेतन तीन गुना कर दिए थे। तो क्या जजों ने अपनी घूस की राशि में अगले दिन 1% की भी छूट दी थी ? मेरा अनुमान है, नहीं दी थी। यदि भारत सरकार का कोई कर्मचारी यह कहता है कि , यदि उसके वेतन को दोगुना कर दिया जाए तो उसे घूस लेने की जरूरत नही होगी, तो आप भी यही कहेंगे कि वह बकवास कर रहा है। क्योंकि उनमें से अधिकतर कभी भी घूस लेना बंद नही करेंगे। इस प्रकार, वेतन अवश्य ही एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, पर भारत और अमेरिका में भ्रष्टाचार के स्तर में बदलाव लाने हेतु यह कोई बड़ा कारक नहीं है। तो वहाँ की पुलिस एवं जजों में भ्रष्टाचार कम होने का और क्या कारण हो सकता है ?
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क्या संस्कृति इसका कारण है ?
क्या हमारी संस्कृति इसका कारण है ? भारत के बहुत से बुद्धिजीवी (कु-बुद्धिजीवी ?) जिनका बौद्धिक स्तर = IQ level 4 अंको में है, यह कहते है कि भारत में पुलिस वाले इसीलिए भ्रष्ट है, क्योंकि हम भारतीय अनपढ़ है, जागरूक नहीं है, हममें नैतिक सदाचार की कमी है, हमारी राजनीतिक संस्कृति दूषित है आदि आदि। दूसरे शब्दों में , इन बुद्धिजीवियों के अनुसार, हम नागरिक ही भारत की पुलिस एवं जजो के भ्रष्ट होने के लिए जिम्मेदार हैं !!! 4 अंकों के बौद्धिक स्तर वाले इन बुद्धिजीवियों द्वारा "पीड़ितों पर ही आरोप" लगाने वाले इन तर्कों को हम सफ़ेद झूठ कहकर अस्वीकार करते है। यह बात उसी तरह चुभने वाली है जैसे कोई कहे कि "बलात्कार के लिए महिला जिम्मेदार है"। यह तर्क कि "नागरिकों में जागरूकता नहीं है" या "नागरिक असभ्य है" बिलकुल बकवास है। एक अशिक्षित व्यक्ति भी अच्छी तरह जानता है कि भ्रष्टाचार अनैतिक है और यह एक अपराध भी है। और सभी पुलिसवालों, न्यायाधीशों व मंत्रियों को भी यह अच्छी तरह पता है कि भ्रष्टाचार अनैतिक और गैरकानूनी है। यहाँ तक कि जब अमेरिका में 1800 ईस्वी में शिक्षा 5 प्रतिशत से भी कम थी तब भी वहाँ की पुलिस एवं न्यायाधीश इतने भ्रष्ट नहीं थे। तो फिर आखिर अमेरिका की पुलिस में भ्रष्टाचार कम होने का असली कारण क्या है ? इस कारण को समझने के लिए हम पुलिस दल को मोटे तौर पर दो भागो में विभाजित करते है – जूनियर ऑफिसर जैसे हवलदार, उप निरीक्षक , दरोग़ा आदि एवं सीनियर ऑफिसर जैसे जिला पुलिस कमिश्नर।
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3.1 अमेरिकी पुलिस विभाग के जूनियर ऑफिसर भारत की तुलना में कम भ्रष्ट क्यों है ?
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अमेरिका में जूनियर पुलिसकर्मी शायद ही कभी घूस मांगते है, क्योंकि अमेरिका में जिला पुलिस कमिश्नर उनको ट्रेप करने के लिए जाल बिछाते हैं !!! हवलदार, पुलिसकर्मी आदि जानते है कि कानून का उल्लंघन करने वाले प्रत्येक 100 से 500 व्यक्तियों में से कोई एक व्यक्ति जिला पुलिस कमिश्नर का आदमी हो सकता है, और यदि वह घूस मांगेगा तो वह पकड़ा जा सकता है, उसकी नौकरी जा सकती है या जेल भी हो सकती है। तो अमेरिका के जूनियर अफसरों द्वारा घूस न लने का मुख्य कारण यह है कि वे जानते है कि यातायात उल्लंघन करने वाले कुछ 200 व्यक्तियों में से कोई एक व्यक्ति कमिश्नर द्वारा उसे ट्रेप करने के लिए बिछाया गया जाल हो सकता है। और उसे नहीं पता कि क़ानून तोड़ने वाले इन 200 व्यक्तियों में से कौन सा व्यक्ति कमिशनर द्वारा बिछाए गए जाल का हिस्सा है। इसलिए वह 200 मामलों में से एक में भी घूस नहीं लेता। और अमेरिका में बहुत से नोडल अधिकारी जैसे जिला शिक्षा अधिकारी, पब्लिक प्रोसिक्यूटर , मुख्यमंत्री , मंत्री , न्यायाधीश आदि भी अपने जूनियर कर्मचारियों को ट्रेप करने के लिए उनके विरुद्ध जाल बिछाते है। समय-समय पर जाल बिछाना सभी जूनियर स्टाफ को घूस लेने से रोक देता है।
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3.2 किन्तु अमेरिका में पुलिस कमिश्नर अपने जूनियर अधिकारियों को घूस लेने से रोकने के लिए जाल क्यों बिछाते है ?
अक्सर ऐसा होता है कि एक सवाल के जवाब से 10 और नए वाजिब सवाल खड़े हो जाते है, और इन्हें उत्तरित करना भी जरुरी होता है। तो अब एक नया एवं वाजिब प्रश्न यह है कि आखिर अमेरिका में पुलिस कमिश्नर अपने जूनियर अफसरों को ट्रेप करने के लिए जाल क्यों बिछाता है जबकि भारत में ज्यादातर पुलिस प्रमुख अपने जूनियर अफसरों को नागरिको से घूस इकट्ठी करने के लिए कहते है ? इस अंतर का कारण क्या है ? आखिर अमेरिका का पुलिस कमिश्नर अपने जूनियर अफसरों को घूस इकट्ठी करने का टार्गेट क्यों नहीं देता ? वह कौनसी चीज है जो उसे ऐसा करने से रोक देती है ? इसकी सिर्फ एक वजह है -- अमेरिका के नागरिको के पास अपने जिले के पुलिस प्रमुख को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया मौजूद है। दुसरे शब्दों में अमेरिका के नागरिको के पास पुलिस कमिशनर को रिकॉल करने अर्थात वापिस बुलाने का अधिकार होने के कारण, यदि वे यह मानते है कि पुलिस कमिशनर इमानदारी से कार्य नहीं कर रहा है, तो वे किसी भी दिन उसे हटाकर नए व्यक्ति को कमिशनर की नौकरी दे सकते है।
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मतलब, अमेरिका के किसी जिले में यदि नागरिक जिला पुलिस प्रमुख से संतुष्ट नहीं है और वे उसे नौकरी से निकालना चाहते है तो उन्हें डीआईजी या मुख्यमंत्री या गृह मंत्री के पास जाकर शिकायत करने की आवश्यकता नहीं है !! अमेरिका के नागरिकों को उच्च न्यायालयों के न्यायधीशों के पास जाकर अदालतों में धक्के खाने की भी जरूरत नहीं है। अमेरिका में किसी जिले के नागरिकों को बस यह साबित करने की आवश्यकता है कि जिले के मतदाताओ का बहुमत यह चाहता है कि मौजूदा पुलिस कमिश्नर को नौकरी से निकाल दिया जाए। और यदि किसी जिला पुलिस प्रमुख के विरूद्ध बहुमत साबित हो जाता है तो उसे निकाल दिया जाता है। और तब किसी भी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की इतनी हिम्मत नहीं है कि वह अमुक पुलिस प्रमुख के निलम्बन के निर्णय पर कोई रोक या स्टे का कोई आदेश दे सके। तो इस तरह अमेरिका में पुलिस प्रमुख इस बात का ध्यान रखता है कि यदि पुलिस प्रशासन में भ्रष्टाचार फ़ैल गया , अपराधो में वृद्धि हुयी और नागरिको को गलत वजह से उत्पीडन का सामना करना पड़ा तो नागरिको का बहुमत मुझे नौकरी से निकाल देगा , और इसी वजह से अमेरिका में पुलिस प्रमुख इस बात का निरंतर ध्यान रखता है कि उसके अधीन प्रशासन एवं स्टाफ ईमानदारी से कार्य करे।
जबकि भारत में पुलिस प्रमुख की नियुक्ति से लेकर निष्कासन का अधिकार नेताओं के पास होने के कारण पुलिस प्रमुख अपने आला अधिकारियो एवं नेताओं को खुश रखने का लक्ष्य लेकर काम करता है। हम भारत में ऐसी प्रक्रिया चाहते है जिससे नागरिक अपने जिले के पुलिस प्रमुख को बदल सके। जैसा कि ऊपर बताया गया है कि देश की किसी भी व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए हमें सबसे पहले उस क़ानून ड्राफ्ट की जरूरत होती है जिसे गेजेट में प्रकाशित करने से यह बदलाव आएगा। हमने इसके लिए “राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख” का क़ानून ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। यह ड्राफ्ट यदि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री गेजेट में प्रकाशित कर दे तो भारत के नागरिको को जिला पुलिस प्रमुख को बदलने की प्रक्रिया मिल जायेगी। यदि यह ड्राफ्ट मुख्यमंत्री द्वारा प्रकाशित किया जाता है तो यह क़ानून अमुक राज्य में लागू होगा , और यदि इसे प्रधानमंत्री लागू करते है तो यह पूरे देश में लागू हो जाएगा।
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राईट टू रिकॉल - पुलिस प्रमुख ( Rtr-SP ) के लिए प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट का सारांश :
(1) उम्मीदवारी - 30 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक जिसने 5 वर्षों से अधिक समय तक सेना में काम किया हो, या पुलिस विभाग में एक भी दिन काम किया हो, या सरकारी कर्मचारी के रूप में 10 वर्षों तक काम किया हो या राज्य, लोक सेवा आयोग या संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित प्रशासनिक सेवाओ की लिखित परीक्षा पास की हो, अथवा उसने विधायक / सांसद या पार्षद / जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीता हो, तो ऐसा व्यक्ति जिला पुलिस प्रमुख के उम्मी दवार के रूप में अपना आवेदन जिला कलेक्टर कार्यालय में जमा करवा सकेगा।
(2) मतदाताओ द्वारा स्वीकृती - जिले का कोई भी मतदाता अपनी पसंद के अधिकतम 5 उम्मीदवारो को SP के लिए स्वीकृत कर सकता है।
(3) स्वीकृति दर्ज करना - मतदाता किसी भी दिन किसी भी उम्मीदवार को स्वीकृत कर सकते है या किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में दी गयी स्वीकृति रद्द कर सकते है।
(4) स्वीकृति दर्ज करने के तरीके - मतदाता पटवारी कार्यालय में उपस्थित होकर किसी उम्मीदवार के पक्ष में हाँ / नहीं दर्ज कर सकते है , या मोबाईल एप द्वारा या अपने रजिस्टर्ड मोबाईल नंबर से SMS करके या ATM से भी अपनी स्वीकृति दर्ज करवा सकते है।
(5) स्वीकृतियों का प्रदर्शन - प्रत्येक मतदाता द्वारा दर्ज हाँ / नहीं को मतदाता संख्या, नाम और उसके द्वारा स्वीकृत उम्मीदवारों के नाम के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखा जाएगा।
(6) SP की नियुक्ति - यदि कोई उम्मी।दवार जिले के सभी मतदाताओं के 50 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं का अनुमोदन प्राप्तन कर लेता है तो मुख्यामंत्री उसे जिले में अगले 4 वर्ष के लिए नया जिला SP नियुक्त कर सकते है , या नहीं भी कर सकते है। इस सम्बन्ध में मुख्यमंत्री का निर्णय अंतिम होगा।
7) राज्यै के सभी नागरिक मतदाताओं के 51 प्रतिशत मतदाताओं के अनुमोदन से मुख्यनमंत्री किसी जिले में इस कानून को 4 वर्षों के लिए हटा सकते है, और अपने विवेक से उस जिले में अपनी पसंद का जिला पुलिस प्रमुख की नियुक्तइ कर सकते है।
प्रभाव - इस प्रक्रिया के आने से मतदाता सीएम को बता सकेंगे कि वे अमुक भ्रष्ट SP को हटाकर अमुक व्यक्ति को SP बनाना चाहते है। इस प्रक्रिया के आने के बाद पुलिस प्रमुख यदि भ्रष्ट आचरण करता है और क़ानून व्यवस्था में सुधार नहीं लाता है तो नागरिक उसे किसी अन्य व्यक्ति द्वारा बदल सकेंगे।
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04. किसी विषय पर नागरिको के बहुमत की रायशुमारी के लिए आवश्यक टीसीपी क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करना : भारत के नागरिको के पास ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है, जिससे वे अपनी शिकायत या सुझाव सीधे प्रधानमंत्री के सम्मुख रख सके और यह पता लगाया जा सके कि देश के कितने नागरिक इस सुझाव या शिकायत से सहमत है। हमने इसके लिए 3 धाराओं का क़ानून टीसीपी प्रस्तावित किया है . इस क़ानून के आने से भारत के नागरिक किसी भी विषय पर अपना बहुमत प्रदर्शित कर सकेंगे।
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04.1. गैजेट में प्रकाशित करने के लिए टीसीपी = Transparent Complaint Procedure का प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट :
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1) कलेक्टर : कोई मतदाता यदि कलेक्टर कार्यालय में उपस्थित होकर कोई शपथपत्र प्रस्तुत करता है तो कलेक्टर शपथपत्र को 20 रूपये प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर दर्ज करेगा और एक सीरियल नंबर जारी करेगा. कलेक्टर इस शपथपत्र को स्कैन करके शपथकर्ता की मतदाता संख्या के साथ प्रधानमन्त्री की वेबसाइट पर रखेगा। ताकि कोई भी व्यक्ति इसे बिना log in के देख सके ।
2) पटवारी : कोई मतदाता यदि धारा-1 के तहत प्रस्तुत किये गए किसी शपथपत्र पर अपनी हाँ/ ना दर्ज कराने पटवारी कार्यालय आता है तो पटवारी 3 रू शुल्क लेकर मतदाता की हाँ / ना को उसकी मतदाता संख्या के साथ दर्ज करेगा तथा मतदाता की हाँ / ना को उसकी मतदाता संख्या के साथ प्रधानमन्त्री की वेबसाइट पर रखेगा।
3) प्रधानमंत्री : ये प्रक्रिया कोई जनमत-संग्रह या रेफेरेंडम नहीं है। मतदाताओ द्वारा दर्ज की गयी हाँ / ना किसी भी अधिकारी, मंत्री, जज, सांसद, विधायक आदि पर बाध्यकारी नहीं है। यदि भारत के कुल मतदाताओं के 51% मतदाता किसी शपथपत्र पर "हाँ" दर्ज कर देते है तो प्रधानमंत्री उस शपथपत्र पर कार्यवाही कर सकते है या प्रधानमंत्री अपना इस्तीफा दे सकते है। इस बारे में प्रधानमन्त्री का निर्णय अंतिम होगा।
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04.2 ये 3 धाराएं गेजेट में आने के बाद कैसे काम करेगी ?
मान लीजिये कोई व्यक्ति चाहता है कि राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख के क़ानून को गेजेट में प्रकाशित किया जाना चाहिए या सुभाष चन्द्र बोस को राष्ट्रपिता घोषित किया जाना चाहिए । तो वह इस प्रस्ताव का शपथपत्र कलेक्टर कार्यालय में जाकर प्रस्तुत कर सकता है। कलेक्टर अमुक प्रति पेज के 20 रू की दर से शुल्क लेकर अमुक शपथपत्र का एक सीरियल नंबर जारी कर देगा। कलेक्टर यह शपथपत्र जस का तस स्कैन करके पीएम की वेबसाईट पर रखेगा, ताकि कोई भी व्यक्ति बिना लोग इन के इसे देख सके। अब यदि देश का कोई नागरिक इस प्रस्ताव का समर्थन करता है तो वह पटवारी कार्यालय में जाकर 3 रू देकर इस शपथपत्र पर हाँ दर्ज कर सकता है। बाद में पीएम इस तरह का आदेश भी दे सकते है कि नागरिक अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर या एटीएम के माध्यम से अपना अनुमोदन दर्ज करवा सके। अब मान लीजिये कि कुछ ही महीनो में 50 करोड़ नागरिक इस शपथपत्र पर हाँ दर्ज कर देते है, तो प्रधानमंत्री जनादेश का सम्मान करते हुए अमुक प्रस्ताव को लागू कर सकते है। इस तरह टीसीपी देश के नागरिको को विभिन्न मुद्दों पर अपनी आवाज मिलाने का अवसर देगा, और सरकार को भी इस बात की जानकारी रहेगी कि किसी विषय पर देश के कितने प्रतिशत नागरिक क्या बदलाव चाहते है।
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05. अन्य पदों पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं
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पुलिस प्रमुख , जिला शिक्षा अधिकारी के अलावा हमने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री , सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट एवं जिला जजों को शामिल करते हुए लगभग 30-50 पदों पर राईट टू रिकॉल प्रक्रियाए प्रस्तावित की है। केंद्र, राज्य एवं जिला प्रशासन को शामिल करते हुए लगभग 30 हजार अधिकारी, नेता, जज आदि राईट टू रिकॉल के दायरे में आ जायेंगे। राईट टू रिकॉल लागू होने के 24 घंटे के अंदर इन अधिकारियो में से लगभग 15 हजार अधिकारी तुरंत सुधर जायेंगे , और जब पहले महीने में नागरिको द्वारा कुछ 5-7 अधिकारियों को रिकॉल किया जाएगा तो शेष अधिकारी भी अपना काम काज सुधार लेंगे। आशय यह कि राईट टू रिकॉल क़ानून आने के बाद नागरिको को 30 हजार अधिकारियो में से 50 अधिकारियो को भी नौकरी से नहीं निकालना पड़ेगा। सिर्फ 5-7 भ्रष्ट अधिकारियो को बदलने से ही शेष अधिकारीयों के रवैये में बदलाव आने लगेगा। इस तरह राईट टू रिकॉल प्रशासन में कोई अस्थिरता नहीं लाएगा। सिर्फ 4-5 अधिकारियों को नौकरी से निकालना अन्य अधिकारियों के लिए चेतावनी की तरह काम करेगा और शेष अधिकारी अपनी नौकरी बनाए रखने के लिए तुरंत सुधरना शुरू कर देंगे।
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हमारा मानना है कि ,यदि भारत के कार्यकर्ता राईट टू रिकॉल , जूरी सिस्टम , NHDMT , वेल्थ टेक्स , एमआरसीएम आदि क़ानून ड्राफ्ट्स को गेजेट में प्रकाशित करवाने में असफल रहते है, तो यह तय है कि अमेरिका-ब्रिटेन की बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जल्द ही हमारे सभी प्राकृतिक संसाधनों का अधिग्रहण करके भारत को एक विशाल फिलिपिन्स में परिवर्तित कर देगी, और इस प्रक्रिया में करोड़ो की संख्या में धर्मान्तरण होंगे । और यदि वे भारत को एक विशाल फिलिपिन्स में तब्दील नहीं कर पाए तो हमारी स्थिति और भी बदतर हो जायेगी, क्योंकि तब ज्यादातर से भी ज्यादा सम्भावना है कि वे भारत का इराकीकरण करने में सफल हो जायेंगे । हमारे द्वारा प्रस्तावित जूरी सिस्टम , वेल्थ टेक्स , एम आर सी एम आदि अन्य कानूनों के ड्राफ्ट देखने के लिए यह लिंक देखें -- JuryIndia .org
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इन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित करवाने के लिए आप क्या कदम उठा सकते है ?
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(1) प्रधानमंत्री को निचे दिए गए फोर्मेट में पोस्टकार्ड भेजे -
“प्रधानमंत्री महोदय , मैं विनती करता हूँ कि इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करें – newindia .in/RtrDeo3 ,# RtrDeo3
( newindia .in प्रधानमंत्री की अधिकृत वेबसाईट है , जिस पर कोई भी नागरिक अपना सुझाव रख सकता है , और रखे गए किसी सुझाव पर वोट भी कर सकता है। हमने सभी ड्राफ्ट के पीडीऍफ़ newindia .in पर रख दिए है। अत: जब आप पोस्टकार्ड भेजे तो उस क़ानून ड्राफ्ट का लिंक जरुर रखें जिस ड्राफ्ट को आप गेजेट में प्रकाशित करवाना चाहते है।)
(2) यदि आप ट्विटर पर है तो @pmoindia पर यह ट्विट करें - “प्रधानमंत्री महोदय , मैं आपसे विनती करता हूँ कि इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करें – newindia .in/ RtrDeo3 , #RtrDeo3”
(3) यदि आप स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते है तो newindia .in पर newindia .in/templelaw5 ड्राफ्ट को वोट करें।
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