> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2018-08-15

Pawan Jury BhilwaraRj

आजादी की लड़ाई में हम किस बिंदु पर निर्णायक मार खा गए और कैसे पिछले 71 सालो से हम यह मार लगातार खाते जा रहे है ? और समाधान ?
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राजनैतिक विमर्श में "आजादी" लफ्ज के कोई मायने नहीं होते। यह सिर्फ एक नारा / लेबल है। इसीलिए "आजादी" शब्द को केंद्र में रखकर की गयी सारी बहस निरर्थक है। सटीक ढंग से कहे तो, दरअसल स्वतंत्रता सेनानी "वोट देने का अधिकार" पाने की लड़ाई लड़ रहे थे , और जो स्वतंत्रता सेनानी यह बात समझ चुके थे कि "वोट देने का अधिकार" हासिल करने से कोई निर्णायक बदलाव नहीं आएगा, उन्होंने अपनी लड़ाई को "वोट वापिस भी ले लेने के अधिकार" तक विस्तृत कर दिया था।
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1947 से पहले तक जो भी भारत के शासक थे वे भारतीयों से पूछकर नहीं बने थे। तो लड़ाई इस बात को लेकर थी कि भारत पर वही व्यक्ति शासन करेंगे जिन्हें भारतीय नागरिक चुनेंगे। और उस समय भारतीयों के पास प्रतिनिधियों को चुनने की आजादी नहीं थी। लेकिन महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल , महात्मा चंद्रशेखर आजाद , महात्मा भगत सिंह जैसे क्रन्तिकारी यह बात जान चुके थे कि सिर्फ वोट देने का अधिकार मिलने से कुछ होने वाला नहीं है। इसीलिए उन्होंने 1925 में प्रकाशित अपने मेनिफेस्टो में यह मांग रखी कि -- "हम जिस गणराज्य कि स्थापना करना चाहते है उसमे भारतीयों के पास अपने प्रतिनिधियों को वापिस बुलाने ( रिकॉल करने ) का अधिकार भी होगा"।
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वजह यह थी कि 1919 को भारत में हुए पहले चुनाव में चुने गए कोंग्रेस के उम्मीदवार जीतने के अगले ही दिन अंग्रेजो की हाँ में हाँ मिलाने लगे थे। अत: क्रांतिकारियों ने इस बात को नोट कर लिया था कि अच्छे आदमी को चुनने से कुछ नहीं होगा , उसे "अच्छा बनाए रखने के लिए" यह जरुरी है कि उसके सिर पर निरंतर तलवार लटकती रहे। उन्हें राईट टू रिकॉल कानूनों में यह लोकतान्त्रिक तलवार नजर आयी।
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महादुरात्मा गांधी और जवाहर लाल गाज़ी ने देश वासियों को यह कभी नहीं बताया कि "अग्रेजो भारत छोड़ो" के बाद कौन लोग किस तरह से देश चलाएंगे। कोंग्रेस के इन नेताओं की सारी लड़ाई इस बात को लेकर थी कि जब अंग्रेज जाए तो कमान इन्हें सौंप जाए। पेड मीडिया ने अवाम को नारे बाजी में इतना उलझा दिया था कि कार्यकर्ताओ का ध्यान इस बात से हट गया कि अंग्रेजो के जाने के बाद हमें जो शासन व्यवस्था चाहिए उसकी ड्राफ्टिंग पर ध्यान देना चाहिए। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजो ने संविधान एवं कानूनों की जो ड्राफ्टिंग अपने चमचो को छापने के लिए कहा उन्होंने वही लागू किये।
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यदि उस समय कार्यकर्ताओ ने ड्राफ्टिंग पर ध्यान दिया होता तो हमें यह सर्कस देखने को नहीं मिलता , जो सर्कस आज देखने को मिल रहा है। आज भी हालात बदले नहीं है , आजादी को लानत भेजने वाले , इसे झूठी और आधी अधूरी आजादी बताने वाले कार्यकर्ता आज भी यह बात समझने को राजी नहीं है कि हमें टूटी फूटी आजादी मिली क्योंकि 1946-47 के निर्णायक समय में कार्यकर्ताओं ने ड्राफ्टिंग पर ध्यान देने से इनकार कर दिया था। वे या तो "आजादी आजादी" के नारे लगा रहे थे, या फिर इस भ्रम के शिकार थे कि अंग्रेजो के जाने से सब कुछ स्वत: ठीक हो जाएगा। और जो कार्यकर्ता प्रक्रिया एवं ड्राफ्टिंग का महत्त्व समझते थे उनकी संख्या कम होने से उन्हें अनसुना कर दिया गया।
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समाधान - आज आजादी पर लानत भेजने वाले कार्यकर्ताओं को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि किन कानूनों को देश में लागू करवाकर उनके हिसाब से देश में सही मायनों में आजादी लायी जा सकती है। जहां तक मेरी बात है , मैं आज से 90 वर्ष पहले क्रान्तिकारियो द्वारा कही गयी इस बात से सहमत हूँ कि -- "राईट टू रिकॉल कानूनों के अभाव में स्वराज्य एक मजाक बन कर रह जाएगा।"
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स्वतंत्रता आन्दोलन "लोकतंत्र" कि स्थापना को लेकर था। लोकतंत्र में लोक के पास निम्न 4 अधिकार अनिवार्य रूप से होते है -- 1) चुनने का अधिकार , 2) रिकॉल करने का अधिकार , 3) दंड देने का अधिकार , 4) हथियार रखने का अधिकार। 1947 में हमें सिर्फ चुनने का अधिकार दिया गया है। शेष 3 अधिकार आज भी नदारद है। जबकि अमेरिका के नागरिको के पास ये चारो अधिकार उसी समय आ गए थे जब उन्हें 1776 में आजादी मिली थी।
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राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम और हथियार बंद नागरिक समाज कि रचना के कानून लागू करवाने से भारत के नागरिको को ये तीनो अधिकार मिल जायेंगे। इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट देखने के लिए यह लिंक देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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