Pawan Jury BhilwaraRj
Sc / St एक्ट के तहत दर्ज किये गए मुकदमो का निपटान नागरिको की जूरी द्वारा किया जाए। अन्य सभी तरीके शोषण और अलगाव को बढ़ावा देने वाले है।
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भारत में राईट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख का क़ानून न होने से पुलिस अपने हिसाब से ही चलती है। क़ानून में आप जो मर्जी छापते रहिये , पुलिस को इससे कोई मतलब नहीं। और पुलिस का हिसाब दो तरीको से तय होता है -- 1) किस पार्टी के लिए किस नेताजी का फोन आया है , 2) किस पार्टी के पास ज्यादा पैसा है।
तो वादी / प्रतिवादी में से जिसके पास ज्यादा पैसा है या जिसके राजनैतिक संपर्क ऊँचे है , जांच की दिशा उसी हिसाब से घूम जाती है।
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दूसरी समस्या यह है कि भारत में राईट टू रिकॉल जज का कानून नहीं है और ज्यूरी सिस्टम भी नहीं है। तो जज भी यहाँ अपने हिसाब से चलता है। क़ानून के हिसाब से नहीं। और जज का भी वही हिसाब है जो पुलिस का है। जिस पार्टी के पास ज्यादा पॉवर और पैसा है , फैसला उसके हिसाब से दे दिया जाता है।
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क़ानून में कुछ भी लिख देने से कुछ होता नहीं है। निर्भर इस बात पर करता है कि क़ानून का पालन करवाने वाले अधिकारी ( पुलिस ) और क़ानून तोड़ने पर सजा देने वाला व्यक्ति ( जज ) क्या करना चाहते है। भारत में पुलिस और जज दोनों ही जनता के नियन्त्रण से बाहर है , अत: इस तरह के सभी कानून इनकी शक्ति में इजाफा करते है।
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मेरे द्वारा प्रस्तावित समाधान यह है कि इस तरह के मुकदमो को नागरिको कि ज्यूरी के हवाले किया जाए। 25-55 वर्ष के आयुवर्ग के नागरिको के ज्यूरी इस प्रकार के मुकदमो कि सुनवाई करेगी और फैसला देगी। इसके अलावा पुलिस विभाग को ईमानदार बनाने के लिए राईट टू रिकॉल पुलिस अधिकारी के क़ानून को गेजेट में प्रकाशित किया जाए।
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इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>
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यदि sc / st एक्ट को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया जाए तो सार्वजनिक भेदभाव के मामलो पर कोई कार्यवाही न होने से इस तरह की घटनाएं बढ़ जायेगी जिससे दलितों और अगड़ो में अलगाव बढेगा। यदि बिना किसी जांच के सिर्फ शिकायत के आधार पर गिरफ्तारी होगी तो भी फर्जी मामलो में और भी इजाफा होगा और दलितों एवं अगड़ो में अलगाव बढ़ेगा। सिर्फ हिन्दू मुस्लिम ही नहीं , "वे" हिन्दू धर्म को दो समुदायों में बाँट कर उनमे वैमनस्य फैलाने के लिए भी काफी मेहनत कर रहे है। जब सरकार कहती है कि -- 'दलितों का 1000 साल से शोषण हो रहा है' , तो दरअसल वे दलितों में प्रतिशोध एवं वैमनस्य की भावना को भड़काना चाहते है। यह सुनकर दलित अच्छा महसूस करते है और उनका वोट बैंक बढ़ता है। वैमनस्य बढाने की उनकी इस नीति के वैतनिक कर्मचारी मीडियाकर्मी है , और ऐसे अवैतनिक कर्मचारियों की शिनाख्त करने के लिए फेसबुक / ट्विटर / व्हाट्स एप देखिये। आपको ज्यादातर वहां ऐसे विवरण दिखाई देंगे तो समाधान पर बात करने की जगह इस वैमनस्य को भड़का रहे है। कोई अगड़ो की तरफ से इस आग में घी डाल रहा है , कोई पिछडो की तरफ से।
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