> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2018-08-22

Pawan Jury BhilwaraRj

नोटा , राईट टू रिजेक्ट एवं राईट टू रिकॉल ;
.
1) नोटा - नोटा उम्मीदवारों को खारिज करने की प्रक्रिया नहीं है। नोटा में दिए गए वोट निरस्त माने जाते है। मान लीजिये किसी निर्वाचन क्षेत्र में 100 वोट गिरे है , और उनमे से 90 वोट नोटा को मिले , तो चुनाव आयोग 90 वोटो को invalid मान कर रद्द कर देता है, और सिर्फ 10 वोट ही वैध माने जायेंगे। इन 10 वोटो में जिस उम्मीदवार को अधिक वोट मिले है वो उम्मीदवार जीत जायेगा। इस तरह नोटा उम्मीदवार को ख़ारिज नहीं करता, बल्कि आपके वोट को मतों की गिनती से बाहर कर देता है। इस तरह नोटा व्यवस्था किसी भी तरह का बदलाव लाने में सक्षम नहीं है।
.
2) राईट टू रिजेक्ट - यह भी एक कमतर और अनुपयोगी प्रस्ताव है। राईट टू रिजेक्ट में सभी उम्मीदवारों को खारिज कर दिया जाता है। यदि रिजेक्ट करने वाले मतदाताओ का बहुमत है तो फिर से चुनाव कराये जाते है। इस तरफ राईट टू रिजेक्ट उम्मीदवारों को खारिज करने की व्यवस्था है। अब मान लीजिये कि अगले चुनाव में जो जो उम्मीदवार मैदान में है जनता उनमे से किसी "योग्य एवं ईमानदार" व्यक्ति को चुन लेती है। लेकिन चुनाव जीतने के अगले दिन ही यह उम्मीदवार भ्रष्ट हो जाएगा। अब मतदाता के पास इसे 5 साल झेलने के अलावा कोई इलाज नहीं है। 5 साल बाद मतदाता फिर किसी दूसरे उम्मीदवार को चुनेंगे और भगवान से मनाएंगे कि ये उम्मीदवार भ्रष्ट न हो जाए। किन्तु चुनाव जीतने के अगले दिन ही यह भी बिक जाएगा। बस यही चक्र चलता रहेगा। राईट टू रिजेक्ट इस चक्र को रोकने सक्षम नहीं है।
.
3) राईट टू रिकॉल - यह सबसे ताकतवर प्रस्ताव है। यदि मतदाता किसी उम्मीदवार को चुनते है , और यह उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद बिक जाता है तो मतदाता बहुमत का प्रदर्शन करके इसे पद से निष्काषित कर सकते है। इस तरह राईट टू रिकॉल चुनाव जीतने वाले व्यक्ति को निरंतर ईमानदार बनाए रखता है। यदि उम्मीदवार बिक जाता है , तो जनता उसे नौकरी से निकाल बाहर करेगी।
.
क्या मतदाताओ को नोटा का प्रयोग करना चाहिए ?
.
मेरे विचार में , जो कार्यकर्ता आगामी चुनावों में नोटा दबाने के पक्ष में है उन्हें खुद चुनाव "लड़ने" (*) की कोशिश करनी चाहिए। यदि वे चुनाव "लड़ने" की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे है तो उन्हें अपने विधानसभा क्षेत्र में अन्य कार्यकर्ताओ को चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। साथ ही यह भी जरुरी है कि वे अपने एजेंडे में राईट टू रिकॉल के ड्राफ्ट शामिल करे। क्योंकि वास्तविक बदलाव राईट टू रिकॉल कानूनों के आने से आएगा।
.
नोटा के समर्थको को राईट टू रिकॉल के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को समर्थन क्यों देना चाहिए ?
.
क्योंकि यदि राईट टू टू रिकॉल क़ानून होता तो इन मतदाताओं को नोटा का रुख करने की जरुरत नहीं होती। वे राईट टू रिकॉल का प्रयोग करके मौजूदा प्रतिनिधि को किसी अन्य प्रतिनिधि से बदल सकते थे। 5 साल इन्तजार किये बिना।
.
(*) चुनाव लड़ने से अभिप्राय चुनाव जीतने से नहीं है। चुनाव जीतने के लिए विराट संसाधनों की जरुरत होती है , किन्तु 5-6 कार्यकर्ताओ के सहयोग एवं 30-40 हजार रूपये में काफी अच्छे से चुनाव लड़ा जा सकता है। जितने ज्यादा उम्मीदवार राईट टू रिकॉल मुद्दों के ऊपर चुनाव में उतरेंगे उतने ज्यादा नागरिको तक इन कानूनों की जानकारी पहुंचेगी। अत: कार्यकर्ताओ को प्रचार करने के लिए चुनाव लड़ना चाहिए , जीतने के लिए नहीं।
.
प्रस्तावित राईट टू रिकॉल कानूनों के ड्राफ्ट देखने के लिए इस लिंक पर जाए ---- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
.
===================