> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2018-02-13

Pawan Jury BhilwaraRj

1946 में श्री वल्ल्भ भाई पटेल ने भारत का प्रधानमंत्री बनने से इंकार क्यों कर दिया था ?
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तब ब्रिटिश जवाहर लाल गाज़ी को भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे एवं उन्होंने अपनी इस मर्जी के बारे में भारत के धनिक वर्ग - टाटा, बिरला, गोदरेज, बजाज, साराभाई आदि - को सूचित कर दिया था। भारत के इस विशिष्ट वर्ग ने पटेल को जवाहर लाल के पक्ष में दौड़ से बाहर हो जाने के लिए राजी किया, एवं जवाहर लाल गाज़ी देश के प्रधानमंत्री बने। भारतीय धनिक वर्ग एवं ब्रिटिशर्स द्वारा इस मामले में महादुरात्मा गांधी को भी दरकिनार कर दिया गया था।
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पिछले 70 सालों से हम यह कथा सुनते आये है कि -- जवाहर लाल को पीएम बनाने का फैसला महादुरात्मा गांधी ने किया था ; बकवास
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यदि ऐसा था तो पटेल ने महादुरात्मा गांधी को क्यों नहीं कहा कि -- तू अपने चरखी-डंडे के साथ भाड़ में जा, पर मैं जवाहर लाल को पीएम नहीं बनने दूंगा। "सम्मान या आदर करना" अच्छी बात है , लेकिन ऐसे मसलो पर ऐसी औपचारिकताएं निर्णायक बिंदु नहीं होती। राजनीती के शीर्ष स्तर पर सम्मान वगेरह का निर्वाह एक सीमा तक ही किया जाता है, सीमातीत नहीं। क्योंकि दांव पर पूरा देश उसकी अवाम होती है।
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पटेल को तब कोंग्रेस के 80% से ज्यादा कार्यकर्ताओ का समर्थन हासिल था। लेकिन तब की कोंग्रेस एवं मीडिया भी भारतीय धनिक वर्ग द्वारा प्रायोजित था। और सच्चाई यह है कि श्री वल्ल्भ भाई पटेल मीडिया, ब्रिटिशर्स एवं भारतीय धनिकों के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
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भारत के धनिक वर्ग ने ब्रिटिशर्स के आदेशो का पालन किया, क्योंकि उनकी औद्योगिक मशीनों के स्पेयर पार्ट्स ब्रिटेन से आते थे। यदि ब्रिटिश स्पेयर पार्ट्स भेजने बंद कर देते तो उनकी फेक्ट्रियां कुछ ही हफ्तों में बंद हो जाती।
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श्री वल्लभ भाई पटेल जवाहर लाल गाज़ी के मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर थे , किन्तु वे राष्ट्रपिता सुभाष चन्द्र बोस के समकक्ष नहीं थे। यदि इस परिस्थिति का सामना राष्ट्रपिता बोस से होता तो वे महादुरात्मा गांधी, मीडियाकर्मी, ब्रिटिश एवं भारतीय धनिकों को निश्चित रूप से खारिज करते करते हुए कोंग्रेस कार्यकर्ताओ की सहायता से आगे बढ़ जाते। लेकिन सरदार पटेल का ऐसा कोई इतिहास नहीं रहा जब उन्होंने ब्रिटिश एवं भारतीय धनिकों के खिलाफ किसी निर्णायक बिंदु पर लोहा लिया हो।
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तो ब्रिटिश 1946 में भी इतने ताकतवर थे। तब भी जब वे भारत को "आजादी देने" का निर्णय ले चुके थे और भारत का अपना खुद का प्रधानमंत्री बनना तय हो चुका था। इसके बावजूद न सिर्फ उन्होंने यह तय किया कि भारत का प्रधानमंत्री कौन होगा, बल्कि वे दौड़ में शामिल दुसरे नंबर के दावेदार को भी खामोश रहने पर विवश कर सके, और साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि इस पूरी तिकड़म के बारे में जनता को जानकारी न हो !!! यह भारत की सबसे बड़ी कमजोरी थी।
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ब्रिटिशर्स की इसीलिए चली क्योंकि तब भारत के धनिक वर्ग की इकाइयों में स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति ब्रिटिश द्वारा की जाती थी। लेकिन यह कमजोरी भारत के धनिक वर्ग की थी, भारत की नहीं। क्या भारत ने आजादी के बाद विदेश से आयात होने वाले स्पेयर पार्ट्स पर प्रतिबन्ध लगाया ताकि भारत के इंजीनियर्स इन्हें भारत में बनाने की काबिलियत जुटा सके ? लेकिन , इस प्रक्रिया में नए एवं वास्तविक कौशल वाले इंजीनियर्स भारत की अर्थव्यवस्था पर अपनी पकड बना लेते और भारतीय धनिक वर्ग अपने विशिष्ट होने का रुतबा खो देता। आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक - तीनो तौर से।
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यही वजह थी कि, 1949 में सत्ता पर नियन्त्रण हासिल करते ही अपने "पहले" आदेश में चेयरमेन माओ ने यूरोपियन मशीनों को नष्ट करने का फैसला जारी किया था !!! न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। यूरोप पर अपनी निर्भरता ख़त्म करने के लिए चीन ने अपनी यूरोपीय मशीनों को आग के हवाले कर दिया। और इस फैसले ने चीन को अपनी खुद की मशीने बनाने के लिए बाध्य किया। चीन में निर्माण इकाइयों की कार्य क्षमता बढ़ने लगी एवं इंजीनियरिंग का व्यावहारिक विकास शुरू हुआ। हालांकि उन्हें अपने प्राथमिक दौर में उत्पादन की गुणवत्ता एवं क्षमता को लेकर काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनकी मशीने यूरोपीय मशीनों की तुलना में काफी पिछड़ी हुयी थी।
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तो श्री वल्लभ भाई पटेल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नहीं बन सके, क्योंकि भारत के मंत्रियो / धनिक वर्ग की रुचि भारत की यूरोपीय मशीनों पर निर्भरता ख़त्म करने में बिलकुल भी नहीं थी, वे सिर्फ अपने निहित स्वार्थ देख रहे थे। और तब के कार्यकर्ता भी इस तथ्य को समझने को नाकाम रहे कि ब्रिटिश किस तरह से अपनी मशीनों पर भारत की निर्भरता के चलते भारत के शीर्ष राजनेताओ को नियंत्रित कर रहे है।
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और आज मोदी साहेब FDI का समर्थन करके इसी स्थिति को और भी बदतर से बदतरीन बनाने में जुटे हुए है !!!
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उस समय कार्यकर्ताओ को जवाहर लाल गाज़ी सरदार पटेल से कमतर नजर आ रहे थे क्योंकि तब पेड मीडिया मौजूदा दौर की अपेक्षा उतना प्रभावी एवं ताकतवर नहीं था। सिर्फ 2% नागरिक ही तब समाचार पत्र पढ़ते थे और टीवी तो था ही नहीं। यदि आज के हालात को उस परिस्थति पर लागू करे तो निश्चित ही ब्रिटिश अपने टीवी चेनल्स एवं समाचार पत्रों के माध्यम से भारतीय जन मानस पर यह धारणा आरोपित करने में कामयाब रहते की जवाहर लाल गाज़ी श्री वल्लभ भाई पटेल से बेहतर प्रधानमन्त्री साबित होंगे। और इसी तरह आज के दौर में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक अपने मीडिया का प्रयोग करते हुए भारतीय नागरिको को यह विश्वास दिलाने में कामयाब है कि मोदी साहेब शेर प्रधानमंत्री है।
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दुसरे शब्दों में, जब मोदी साहेब सरदार पटेल को दरकिनार किये जाने का हवाला देते है तो जानबूझकर घटनाक्रम के महत्त्वपूर्ण हिस्सों को छुपा लेते है। मोदी साहेब इस बात का उल्लेख करने से इनकार कर देते है कि तब ऐसा क्यों हुआ था। तब जवाहर लाल गाज़ी प्रधानमंत्री नहीं बने थे, और न ही कोंग्रेस उनके धन पर निर्भर थी। तो ऐसी स्थिति में यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है कि - किस वजह से मह्दुरात्मा गाँधी ने जवाहर लाल गाजी का समर्थन किया ? लेकिन मोदी साहेब इस प्रश्न की जानबूझकर अवहेलना कर देते है। और मोदी साहेब इस तथ्य को भी छुपा ले जाते है कि तब संघ अपने खर्चे के लिए भारतीय राजाओं एवं भूमिपतियों पर निर्भर था और संघ के प्रायोजक राजा / भूमिपति संघ के नेतृत्व को वही आदेश दे रहे थे जो आदेश उन्हें ब्रिटिश से मिल रहे थे। और मोदी साहेब इस घटनाक्रम के इस सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य पर भी चुप रहते है कि , ब्रिटिश मशीनों पर निर्भरता ने तब भारत को एक कमजोर प्रधानमंत्री दिया। और आज मोदी साहेब एफडीआई का समर्थन करके इस निर्भरता को कई गुना बढ़ा रहे है। और यह निर्भरता वे बेहद तेजी से बढ़ा रहे है।
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