Pawan Jury BhilwaraRj
भारत , श्रीलंका एवं बांग्लादेश के मुकाबले पाकिस्तान ज्यादा बेहतर तेज गेंदबाज क्यों पैदा कर पाता है ?
अमेरिका में इंजीनियरिंग भारत के मुकाबले ज्यादा उन्नत क्यों है ?
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सन्दर्भ ; भारत ने अब तक सिर्फ बल्लेबाज एवं स्पिनर ही पैदा किये है, जबकि हम अब तक एक अदद तेज गेंदबाज़ भी देने में नाकाम रहे है !! अमेंरीका कम्प्यूटर से लेकर लड़ाकू जहाज तक खुद से बनाता है जबकि हम एक बेहतर स्मार्टफोन बनाने के लिए भी जूझ रहे है !! क्यों ?
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तेज गेंदबाजी की मारक क्षमता गति एवं स्विंग पर निर्भर है। गेंद को स्विंग कराने के लिए गेंद की सीम का एक हिस्सा चमकीला एवं दूसरा हिस्सा खुरदरा होना जरुरी है। इसीलिए खेल के दौरान खिलाड़ी गेंद के एक हिस्से को चमकीला एवं प्लेन बनाये रखने के लिए पसीना लगाकर उसे लगातार घिसते रहते है। दूसरे हिस्से को नहीं घिसने से वह खुरदरा हो जाता है और गेंदबाज को बेहतर स्विंग मिलता है। इसीलिए क्रिकेट लेदर बॉल से खेला जाता है। लेकिन लेदर गेंद महंगी ( लगभग 1000 रू ) होने से इसका नियमित रूप से इस्तेमाल करना भारत एवं पाकिस्तान दोनों ही देशो के सामान्य वर्ग के बच्चों / किशोरों के बस के बाहर है। दूसरी समस्या मैदानो को लेकर है। मैदान में घास होने से गेंद की उम्र बढ़ जाती है , अन्यथा घास विहीन मैदान में एक मैच के दौरान ही गेंद के चीथड़े हो जाते है। निदान - दोनों देशो के बच्चे / किशोर अपने शुरूआती दौर में अन्य किस्म की गेंदों का इस्तेमाल करते है।
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लेदर गेंद के महंगा होने से भारत एवं पकिस्तान में प्राथमिक स्तर पर ज्यादातर क्रिकेट हॉकी / टेनिस की गेंद से खेला जाता है। लेकिन कुछ 90 के दशक में पाकिस्तान में गली-मुहल्लों-मैदानों में बच्चो द्वारा खेले जाने वाले खेल में एक नए तरीके का चलन आया। वे टेनिस गेंद के आधे हिस्से पर टेप लगाकर खेलने लगे !! टेनिस गेंद पर रोएं होते है जिससे वह खुरदरी होती है। आधे हिस्से पर चिकना टेप लगाने से उसका आधा हिस्सा चिकना एवं आधा खुरदरा हो जाता है, जिससे टेनिस गेंद लेदर गेंद की तरह व्यवहार करने लगती है। गेंद को धीरे फेंकने से वह स्विंग नहीं होती, स्विंग कराने के लिए उसे तेज फेंकना होता है। लेकिन हॉकी या टेनिस की सामान्य गेंद को कितना भी तेज फेंकने से वह स्विंग नहीं हो सकती, अत: बल्लेबाज सीधी गेंद को पीट देता है।
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किन्तु टेप की हुयी टेनिस गेंद को यदि तेज फेंका जाए तो वह स्विंग होती है , और बल्लेबाज के लिए खेलना मुश्किल हो जाता है। तो टेप की हुयी गेंद में स्विंग का अवसर होने के कारण वहां के बच्चे इसे स्विंग कराने की कोशिश करते है। और इस प्रक्रिया में उन्हें गेंद को तेज फेंकना होता है और इस तरह फेंकना होता है , कि गेंद की स्थिति ऐसी रहे कि हवा से होने वाले घर्षण से लीनियर इफेक्ट पैदा हो। तो वहाँ के बच्चे यह प्रयास लगातार करते रहते है और इस प्रयास में ही उन्हें गति एवं स्विंग का अभ्यास हो जाता है , और जब लेदर गेंद उनके हाथ में आती है तो वो इसे आसानी फेंक पाते है। गेंदबाजी में स्विंग का यह अवसर एवं तेज गेंद फेंकने का यह अभ्यास कुछ किशोरों / बच्चो को तेज गेंदबाज बनने की और धकेल देता है और उनके पास तेज गेंदबाजी के लिए पर्याप्त मानव संसाधन आ जाता है।
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भारत में इसके उलट होता है। भारत में गली-मोहल्लो-मैदानों में जो प्राथमिक स्तर पर जो क्रिकेट खेला जाता है , उसमे बच्चे "सिर्फ बैटिंग" करने की नियत से आते है। गेंदबाज गेंद फेंकने की सिर्फ रस्म पूरी करता है, क्योंकि वह गेंद फेंकने नहीं बल्कि बेटिंग करने आया है। तो जब किसी मैदान में 12 खिलाड़ी क्रिकेट खेल रहे होते है वे सभी बेटिंग करने के लिए आये हुए होते है। और इसीलिए बेटिंग कराने के लिए जब उन्हें गेंद फेंकनी होती है तो वे दौड़ नहीं लगाते बल्कि स्पिन गेंद फेंकते है। तो जो बल्लेबाज नहीं बन पाते वे स्पिनर बन जाते है। और फिर जो कुछ बचे रहे तो वे मध्यम तेज गति के गेंदबाज बनने के लिए विवश हो जाते है। इस वजह से भारत ने हमेशा सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज एवं स्पिनर पैदा किये है, तेज गेंदबाज नहीं। और फिर टीम में ऐसे दो खिलाड़ियों को शामिल किया जाता है जिनका कद औसत से अधिक हो, तथा वे तेज दौड़ कर कम से कम पिच पर गेंद फेंक सके !! क्योंकि नयी गेंद टर्न नहीं होती , अत: गेंद को पुरानी करने के लिए तेज गेंदबाजों की जरूरत होती है।
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इस तरह भारत में क्रिकेटरों के उपलब्ध रॉ मेटेरियल ( मानविक संसाधन ) में से गेंदबाज निकलने के अवसर शुरू में ही सिकुड़ जाते है। क्योंकि रॉ मेटेरियल का अधिकांश बल्लेबाजी एवं स्पिन गेंदबाजी खींच लेती है, जबकि पाकिस्तान के रॉ मेटेरियल में से एक बड़ा हिस्सा तेज गेंदबाजी की और मुड़ जाता है।
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भारतीय क्रिकेट जगत में यह प्रश्न हमेशा से तैरता रहा है कि -- भारत में तेज गेंदबाज क्यों नहीं होते। यह विवरण इसका माकूल जवाब देता है कि, आखिर क्यों भारत पिछले 50 वर्षो में अंतराष्ट्रीय स्तर का एक भी तेज गेंदबाज पैदा नहीं कर सका , जबकि उन्ही परिस्थितियों के बावजूद पाकिस्तान ने आला दर्जे के तेज गेंदबाज दिए है।
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तो जब हम किसी क्षेत्र में अंतराष्ट्रीय स्तर पर जाना चाहते है तो हमें पहले उसकी बुनियाद डालनी पड़ती है। ऐसा कोई स्विच नहीं है जिससे किसी क्षेत्र में हम चुटकी बजाकर विश्वस्तरीय स्थिति हासिल कर सके। चाहे वह क्रिकेट ही क्यों न हो। पूरे देश के लाखों खिलाड़ी गली-मुहल्लों-मैदानों में जो क्रिकेट खेलते है, वहीं से गुणवत्ता प्राप्त करने की दिशा तय होती है। यदि स्थिति तकनिकी विकास को लेकर है, जिसका विवरण अगले कॉलम में दिया गया है।
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भारत अमेरिका के मुकाबले तकनिकी उत्पादन में इतना पिछड़ा हुआ क्यों है ?
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तकनिकी उत्पादन के लिए हमें भारत में ढेर सारी छोटी छोटी उत्पादन इकाइयाँ चाहिए। ढेर सारी छोटी इकाईया क्यों ? कुछ बड़ी इकाईया क्यों नहीं ? क्योंकि कोई भी विशिष्ट उत्पाद कई प्रकार के पार्ट्स को मिलाकर बनाया जाता है। सभी पार्ट्स यदि उच्च गुणवत्ता वाले होंगे तो ही उत्पाद बेहतर बनेगा। एक भी पुर्जा कमतर होने से उत्पाद अपनी गुणवत्ता खो देगा। उदाहरण के लिए एक मोबाईल फोन डिस्प्ले स्क्रीन, बेटरी, माइक्रोफोन, सेमी कंडकटर चिप, स्पीकर आदि जैसे कई पुरजो को जोड़कर बनाया जाता है। डिस्प्ले स्क्रीन बनाने की सैंकड़ो कम्पनियां हो सकती है। उनमे आपसी प्रतिस्पर्धा होने से कोई दो-चार कम्पनी सबसे बेहतर डिस्प्ले बना पायेगी। इसी तरह से सभी पुरजो के साथ होता है। मोबाइल बनाने वाली कम्पनी इन कम्पनियो से ये पुर्जे खरीदती है और इन्हें फिट करके एक डिजाइन तैयार करती है। हवाई जहाज से लेकर कारो तक और कंप्यूटर तक इसी तरह प्रोडक्ट तैयार किया जाता है। दुनिया में ऐसी कोई कम्पनी नहीं जो अपने जटिल प्रोडक्ट के सभी पुर्जो का उत्पादन स्वयं करती हो। यदि वह ऐसा करेगी तो उसकी गुणवत्ता गिर जायेगी।
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तो देश में ढेर सारी इकाइयां होने के लिए हमें ढेर सारे इंजीनियर्स चाहिए। ढेर सारे इंजीनियर्स होने के लिए हमें ऐसे छात्र चाहिए जो विज्ञान-गणित विषय में माहिर हो। अच्छे तकनिकी उत्पाद बनाने के लिए हमें जो श्रुंखला चाहिए वह कुछ ऐसी है -- बच्चे ( मानविक संसाधन ) ---> प्राथमिक स्तर पर गणित-विज्ञान की बेहतर शिक्षा ---> छोटी इकाइयों के लिए सस्ती जमीन की उपलब्धता ---> उत्पादन को प्रोत्साहित करने वाली कर प्रणाली ---> लागत घटाने एवं छोटी इकाइयों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनाये रखने के लिए भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन ---> औद्योगिक मामलो को निपटाने के लिए त्वरित, निष्पक्ष एवं ईमानदार अदालतें। यदि देश का मानविक संसाधन इस प्रक्रिया से गुजरेगा तो अंतिम रूप में हमारे पास लाखों कार्यशील निर्माण इकाइयाँ एवं इंजीनियर्स उपलब्ध होंगे जो कि जटिल प्रौद्योगिकीय उत्पादों के निर्माण के लिए वांछित जमीन तैयार करेंगे।
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भारत में प्रौद्योगिकीय निर्माण में सबसे बड़ी बाधा मिशनरीज एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियां है, और वे भारत के हुक्मरानो के माध्यम से इंजीनियरिंग कौशल के विकास में अड़ंगे लगाते है। वे ऐसा कैसे करते है ?
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१) इंजीनियरिंग कौशल का प्राथमिक चरण मानविक संसाधन ( बच्चे / किशोर ) है। तो वे यह सुनिश्चित करते है कि इनमे से ज्यादातर बच्चे मनोरंजन क्षेत्र की चपेट में आकर गणित-विज्ञान की शिक्षा से दूर हो जाए।
क्रिकेट का असीमित प्रसारण एवं ख़बरों में इसे मुख्य रूप से कवरेज देना इसी निति का हिस्सा है। वे चाहते है कि बच्चे क्रिकेट देखें , क्रिकेट खेले, इनके खिलाड़ियों को अपना आदर्श बनाए एवं सबसे बढ़कर वे अपना "कैरियर" क्रिकेट में बनाने की सोचें। कई प्रतिभाशाली बच्चे इस प्रचार के कारण क्रिकेट की चपेट में आ जाते है और पढाई में दिए जाने वाला अपना कीमती समय मैदानों की धूल फांकने में बिता देते है। यूँ समझे कि दो प्रतिभाशाली छात्र सचिन एवं कलाम थे। कलाम ने विज्ञान-गणित पढ़कर देश की उत्पादकता बढाई जबकि सचिन को बल्ला थमा दिया गया। नतीजतन सचिन की प्रतिभा कलाकारी में बदल गयी। वे दो दशक तक जनता का "मनोरंजन" करते रहे ,और देश की एक समूची पीढ़ी को मैदानों में जाकर पसीना बहाने का मसाला पकड़ा गए। आजकल यह दायित्व विराट कोहली निभा रहे है। इसीलिए सचिन जैसे व्यक्तियों को बेहिसाब मीडिया कवरेज के साथ ही भारत रत्न भी दिया जाता है। इससे वे यह स्थापित करते है कि आप करतब दिखाकर भी भारत रत्न के हकदार हो सकते है। बच्चो पर इसका प्रर्याप्त प्रभाव पड़ता है और एक बड़ा तबका खेलकूद खासकर क्रिकेट की भेंट चढ़ जाता है। इस तरह इंजीनियरिंग कौशल के लिए उपलब्ध मानविक संशाधन में कमी आ जाती है।
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गीत , संगीत , नृत्य दूसरा सीगा है, जहाँ वे बच्चो को खींचते है। टीवी पर बच्चो के गाने-बजाने एवं नाचने वाले कार्यक्रमो का निरंतर प्रसारण किया जाता है। बच्चे इन कार्यक्रमों में आकर करतब दिखाते है, तालियाँ बटोरते है एवं पुरुस्कार ग्रहण करते है। इन टीवी सीरियलों को देखते हुए माता-पिता जल्दी ही अपने बच्चे में भी कोई न कोई करतब ढूंढ निकालते है। इस तरह बच्चो का एक बड़ा हिस्सा अपने आप को तबला बजाने एवं सा रे गा मा पा के सुर साधने में खपा देता है। इस तरह हम इंजीनियरिंग कौशल के संसाधनों का एक और हिस्सा प्राथमिक स्तर पर ही खो देते है। विषय क्रिकेट या कला के खिलाफ नहीं है। किन्तु यह नयी प्रवृति है कि पूरी पीढ़ी को अनुत्पादक एवं कमतर क्षेत्रो में धकेलने के लिए मीडिया द्वारा काफी पैसा खर्च किया जा रहा है। जो कि वाकयी खतरनाक है।
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२) वे प्राथमिक शिक्षा का ढांचा इस तरह रच रहे है जिससे ज्यादातर छात्र गणित-विज्ञान की जगह आर्ट्स यानी कला विषय में खप जाएँ।
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वे भारत में ऐसा क़ानून लेकर आये जिसमे 8वीं कक्षा तक बच्चो को फेल नहीं किया जाता। गणित-विज्ञान दुरूह विषय है और अतिरिक्त प्रयास से ही समझ आता है। किन्तु फ़ैल होने का भय निकल जाने से बच्चे गणित-विज्ञान नहीं पढ़ते और सिर्फ अक्षर ज्ञान तक ही सीमित रह जाते है। 8वी कक्षा तक गणित-विज्ञान नहीं पढने के कारण भविष्य में भी वे इन विषयों को नहीं समझ पाते और अंतत इतिहास, राजनीती विज्ञान, अर्थशास्त्र एवं साहित्य जैसे कमतर एवं समय काटने वाले अनुत्पादक विषयों की और गिरते है। इस तरह हम इंजीनियरिंग के विकास के लिए उपलब्ध मानविक संसाधन का एक बड़ा हिस्सा फिर से खो देते है। और यही प्रतिभाशाली छात्र कला क्षेत्र में जाकर आगे बेरोजगारी की भीड़ बनाते है।
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साथ ही उन्होंने सरकारी स्कूलों का ढांचा पूरी तरह तोड़ दिया है और प्राथमिक शिक्षा को निरंतर निजी क्षेत्र के हवाले किया जा रहा है। सरकारी स्कूलों के बदहाल हो जाने के कारण वंचित तबके का एक बड़ा हिस्सा विज्ञान-गणित की शिक्षा से वंचित होकर इंजीनियरिंग कौशल की दौड़ से बाहर हो जाता है।
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३) वे उच्च शिक्षा में भी राजनीति विज्ञान , इतिहास एवं अर्थशास्त्र जैसे अनुत्पादक विषयों को विज्ञान-गणित से ज्यादा प्रोत्साहित करते है।
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प्रशासनिक सेवाओं एवं एमबीए में चयनित छात्रों को मीडिया में पर्याप्त प्रचार दिया जाता है जबकि आईआईटी में चयनित छात्रों को मीडिया द्वारा प्रोत्साहित नहीं किया जाता। इस वजह से प्रतिभाशाली छात्र इन परीक्षाओ को पास करने की और दौड़ लगाते है। उन्हें यह सूचना नहीं होती कि प्रशासनिक सेवाए एवं एमबीए आदि अनुत्पादक सेवाएं है और देश के विकास में इनका कोई वास्तविक योगदान नहीं होता है। और एक दृष्टिकोण से यह भी सच है कि कमतर श्रेणी के छात्र ही प्रशासनिक सेवाओं का आश्रय लेते है।
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४) वे ऐसे क़ानून बनाते है जिससे निर्माण इकाईया लगाना जटिल एवं खर्चीला हो जाए।
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जमीनों का महंगा होना सबसे बड़ी बाधा है। भारत में हर कोई जानता है कि जमीनों की सर्किल रेट और बाजार मूल्य में बड़ा अंतर है। और जमीनों पर कोई टेक्स न होने के कारण समृद्ध वर्ग अपना अधिकाँश निवेश जमीनों में करता है। उनकी क्रय शक्ति अधिक होने कारण जमीने लगातार महंगी हो रही है जिससे कम पूँजी से व्यापार करना मुश्किल एवं महंगा हो जाता है। जमीनों के महंगी होने के कारण इकाइयां लगाने की लागत बढ़ जाती है और भूमिहीन या कम पूँजी वाले संभावित व्यक्ति इकाइयां लगाने के अवसर गवां देते है। इसके अलावा जीएसटी, वैट, एक्साइज जैसे प्रतिगामी कर छोटी इकाइयों के लिए व्यापार करना कठिन बनाते है जबकि बड़ी इकाईयों को गैर वाजिब लाभ पहुंचाते है। इस प्रकार के अन्याय पूर्ण कर ढांचे की वजह से छोटी इकाईया बाजार से बाहर हो जाती है एवं बड़ी इकाइयाँ उनके बाजार पर कब्ज़ा कर लेती है। तो इस स्तर पर हम इंजीनियरिग के विकास के अवसर फिर से गवां देते है।
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५) भ्रष्टाचार निर्माण इकाइयों की लागत बढ़ाता जाता है और अंतत वे दम तोड़ देती है।
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फैक्ट्री वगेरह लगाने के लिए जमीन लेना होती है एवं उसका व्यावसायिक अंतरण कराना होता है। मेरे निजी अनुभव में ऐसे कई मामले है जब इस अंतरण के लिए व्यक्ति को कम से कम 1-2 वर्ष तक पंचायत एवं तहसील के चक्कर लगाने होते है। और तब भी घूस में बड़ी राशि दिए बिना कभी काम नहीं होता। इससे योजना की लागत बढ़ जाती है। इस लागत को आगे चलकर बिजली अधिकारी, प्रदुषण बोर्ड अघिकारी, कर अधिकारी आदि की घूस और भी बढ़ा देती है। यह सभी पैसा लागत में जुड़ता जाता है। लागत बढ़ने से पूँजी कम हो जाती है या माल महंगा महंगा हो जाता है। और अंत में घाटा खाकर निर्माण इकाई बंद हो जाती है।
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६) सुस्त एवं भ्रष्ट अदालतें बड़ी इकाइयों से घूस खाकर छोटी इकाईयों को बाजार से बाहर कर देती है।
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भारत की न्यायपालिका जितनी सुस्त है उतनी ही भ्रष्ट है। श्रम एवं अन्य विवादो से सम्बंधित मामले एक बार अदालतों में जाने के बाद वर्षो तक अटके रहते है, जिससे फैक्ट्रिया लम्बे समय तक बंद पड़ी रहती है। अंतत वे बंद हो जाती है। इसके अलावा बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के मालिक उच्चतम एवं उच्च न्यायलय के जजों के साथ अच्छे गठजोड़ बनाकर रखते है। इस वजह से फैसले हमेशा से बड़ी कम्पनियो के पक्ष में आते है और छोटी इकाइयां नुकसान उठाकर बाजार से बाहर हो जाती है।
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७) राज नेताओ का भ्रष्टाचार
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ऊपर दी गयी सभी समस्याओ की जड़ में राज नेताओं का भ्रष्टाचार है। क्योंकि उन्होंने ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से घूस खाकर ये क़ानून बनाए और ये व्यवस्था रची है।
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तो इस तरह हमारे प्रशासनिक, कानूनी एवं शैक्षिक ढांचे में यह व्यवस्था है कि हमारे इंजीनियरिंग कौशल के विकास के अवसर सिकुड़ते जाते है। ऐसे में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपनी तकनीक के बल पर भारत में आकर अपने उच्च तकनिकी उत्पादों के कारण बचा खुचा बाजार भी समेट लेती है।
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अमेरिका में किस तरह की व्यवस्था है कि अमेरिकी कम्पनियां लगभग सभी क्षेत्रो में तकनिकी रूप से उत्कृष्ट उत्पादन करती है ?
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१) शिक्षा व्यवस्था - अमेरिका में कुछ 200 साल पहले राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी प्रक्रियाएं लागू की गयी थी। इस क़ानून के आने से जिले के अभिभावकों को अपने जिले के शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने का अधिकार मिल गया। नौकरी से निकाले जाने के भय ने शिक्षा अधिकारियो अनुशासित एवं गंभीर बनाया। इसके अलावा गणित-विज्ञान विषयों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करने के लिए वहां "सात्य प्रणाली" जैसी व्यवस्था लागू हुयी। सात्य प्रणाली ने ज्यादातर छात्रों को विज्ञान-गणित की और धकेला एवं प्राथमिक स्तर पर ही गणित-विज्ञान में मारक प्रतिस्पर्धा होने से उनकी गणितीय क्षमता का स्तर बढ़ता गया।
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२) अमेरिका के बच्चे किशोर इस बात से सूचित है कि गीत, संगीत, वाद्य, अभिनय, खेल आदि मनोरंजन क्षेत्र से जुड़े पेशे सुरक्षित कैरियर नहीं दे पाते और वास्तविक सफलता हासिल करने के लिए उन्हें उत्पादक बनना होगा। यह सूचना उन्हें विज्ञान-गणित की पुस्तको की और धकेलती है और वे अनुत्पादक विषयों की चपेट में आने से बच जाते है। इसके अलावा वहां के समाज में मनोरंजन जगत के पेशो को अपेक्षाकृत कम सम्मानजनक माना जाता है।
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३) अमेरिका में जीएसटी जैसे प्रतिगामी कर का प्रभावी न होना भी एक बड़ी वजह है । वेल्थ टेक्स प्रोग्रेसिव कर है एवं गरीब एवं अमीर पर समान रूप से कर लगाता है। जबकि जीएसटी जैसे प्रतिगामी कर बड़ी एवं समृद्ध इकाइयों को फायदा एवं छोटी इकाइयों को नुक्सान पहुंचाते है।
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४) अमेरिका में स्थानीय प्रशासन में भ्रष्टाचार बेहद कम है। वजह राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं है। वहां के नागरिको के पास मुख्यमंत्री को शामिल करते हुए पुलिस प्रमुख, मेयर, सीनेटर , पब्लिक प्रोसिक्यूटर आदि को नौकरी से निकालने की प्रक्रियाएं मौजूद है। भ्रष्टाचार करने पर नागरिको द्वारा नौकरी से निकाले जाने का भय उन्हें ईमानदार एवं अनुशाषित बना देता है और उनके द्वारा की जाने वाली संभावित घूसखोरी में कमी आती है। इससे निर्माण इकाइयों की लागत में इजाफा नहीं होता और स्थापना एवं संचालन भी तीव्र होता है।
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५) अमेरिका की बेहतर तकनिकी उत्पादन क्षमता के सबसे बड़ी वजह उनकी अदालते है। और उनकी अदालतें इसीलिए बेहतर काम करती है क्योंकि वहां मुकदमो की सुनवाई नागरिको की ज्यूरी द्वारा की जाती है। प्रत्येक मुकदमे के लिए अलग से ज्यूरी होती है , अत: फैसला हफ्ते दो हफ्ते में आ जाता है। त्वरित दंड मिलने से अपराधियों में क़ानून का डर मौजूद रहता है और प्रत्येक प्रकार के शोषण, अत्याचार, घूसखोरी, धोखाधड़ी, गुंडा गिर्दी आदि में कमी आती है। इसके अलावा अमेरिकी नागरिको के पास जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार भी होने से वहां के जज घूस खाकर फैसले नहीं देते, और तमीज से पेश आते है।
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तो आप समझ सकते है कि कोई जुगाडू तरकीब भिडाकर तकनिक में आत्मनिर्भर नहीं हुआ जा सकता। इसके लिए हमें पूरे देश की व्यवस्था को इस तरह से रचना होता है कि हम इंजीनियरिंग कौशल का विकास कर सके। जब हमारे पास ऐसी क़ानून व्यवस्थाएं होगी जो इंजीनियरिंग कौशल को बढ़ावा दें तब पूरे देश के संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करके हम तकनिकी क्षेत्र में आत्म निर्भर हो सकते है। हमारा मानना है कि यदि भारत में वेल्थ टेक्स, ज्यूरी सिस्टम एवं राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं लागू कर दी जाती है तो भारत सिर्फ 5 वर्षो के भीतर फोन से लेकर हवाई जहाज तक का उत्पादन स्वदेशी तकनीक से कर सकता है। इतने तकनिकी विकास के बाद अंतत हम भारत में भारतीयों द्वारा निर्मित पूर्णतया स्वदेशी हथियारों का उत्पादन करने के सक्षम हो जायेंगे, जो कि तकनिकी विकास का अंतिम लक्ष्य एवं चरम बिंदु है। और हमारे ये स्वदेशी हथियार ( made in india, made by indians ) अमेरिकियों से ज्यादा बेहतर होंगे। लेकिन दुर्भाग्य का विषय है कि हमारे तमाम राजनेता उन सभी कानूनों का विरोध करते है जिससे भारत में स्वदेशी तकनीक पर आधारित स्वदेशी हथियारों का उत्पादन संभव हो सके। इसकी जगह वे विदेशी कम्पनियों को भारत में आकर व्यापार करने के लिए आमंत्रित करते है, जो कि एक आत्मघाती कदम है।
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भारत में निर्माण इकाइयों को बेहतर बनाने के लिए हमने जिन क़ानूनो का प्रस्ताव किया है उनके ड्राफ्ट्स देखने के लिए यह लिंक देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>
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यदि आप भारत को तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना चाहते है तो इन कानूनों का समर्थन करें एवं अपने पीएम को ट्वीट करके इन कानूनों को गैजेट में प्रकाशित करने की मांग करें। साथ ही ऐसे लोगो को विरोध अवश्य करें जो उन सभी कानूनों का विरोध करते है जिससे भारत में इंजीनियरिंग के विकास का ढांचा मजबूत हो।
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"वेल्थ टेक्स पार्टी"
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