> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2019-07-31

Pawan Jury BhilwaraRj

हाल ही में ट्रिपल तलाक का जो क़ानून पास किया गया है, उसे पेड मीडिया द्वारा एवं सरकार द्वारा गलत तरह से रिपोट किया जा रहा है। उन्होंने एक गलत लेबल "ट्रिपल तलाक" का इस्तेमाल किया और पूरे देश को झांसा दे दिया। दरअसल यह बिल सिर्फ तलाक के बिद्दत के बारे में है न कि ट्रिपल तलाक के बारे में !!
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मुस्लिम शौहर अपनी बीबियों को मुख्यतया दो तरीके से तलाक देते है।
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(1) तलाक-ए-एहसान एवं तलाक-ए-हसन --- लगभग 99% मामलो में इस प्रक्रिया का प्रयोग किया जाता है। पुरुष एक बार तलाक कहता है और उसे दूसरी बार तलाक कहने के लिए अगले 30 दिनों तक इन्तजार करना होता है। दूसरी बार तलाक कहने के बाद शौहर को फिर से अगले 30 दिनों तक इन्तजार करना होता है , और 30 दिन गुजरने के बाद तीसरी बार तलाक कहा जाता है। मोदी साहेब द्वारा लाया गया क़ानून इस प्रकार दिए गए तलाक पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाता।
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(2) तलाक-ए-बिद्दत --- इस प्रकार से तलाक। 0.5% से भी कम मामलो में दिया जाता है। इस तरीके में शौहर सिर्फ दो सेकण्ड में तलाक-तलाक-तलाक फोन पर या आमने सामने कहता है, या व्हाट्स एप पर लिख कर भेज देता है। और तलाक हो जाता है।
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मोदी साहेब एवं संघ के सांसदों ने लोकसभा से जो क़ानून पास किया है वह सिर्फ तलाक-ए-बिद्दत पर रोक लगाता है, तलाक ए हसन पर नहीं। तो अब से इन 0.5% मामलों में शौहर को 60 दिनों तक इन्तजार करना होगा !! बस इतना ही है।
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होने वाला नुकसान :
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मोदी साहेब, संघ के कार्यकर्ता और पेड मीडिया यह बात नागरिको के दिमाग में डालने में कामयाब रहे है कि ट्रिपल तलाक बेन किया जा चुका है। तो अब जब कोई हिन्दू युवती किसी मुस्लिम से विवाह करेगी तो उसके परिवार वालो, मित्रो एवं स्वयं उसके अवचेतन में यह बात रहेगी कि अब ट्रिपल तलाक बेन हो चुका है, और युवक द्वारा उसे किसी भी समय तलाक दे देने की सम्भावना नहीं है !! किन्तु युवक अब भी तलाक-ए-एहसान का प्रयोग करके तीन बार तलाक बोलकर तलाक देकर निकल सकेगा !!

उल्लेखनीय है कि आज जब कोई हिन्दू युवती मुस्लिम युवक से शादी करती है तो उसके परिवार वाले उसे ज्यादातर इस बिंदु पर ही कन्विंस करने की कोशिश करते है कि इस्लाम में शादी एक कोंट्रेक्ट है और युवक कभी भी तीन तलाक बोलकर उसे छोड़ सकता है। यह वजह अब भी मौजूद रहेगी, किन्तु अब ज्यादातर युवतियां जब मुस्लिम युवको से शादी करेगी तो उनके दिमाग में यह गलत धारणा होगी कि वे ट्रिपल तलाक से सेफ है !!!

इकबाल का एक शेर है -

बड़ी बारीक है वाइज़ की चाले,
लरज़ जाता है आवाज़े अजाँ से !!
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समाधान :
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(1) प्रस्तावित क़ानून - यदि कोई हिन्दू युवती ( या मुस्लिम युवती ) किसी मुस्लिम युवक ( या हिन्दू युवक ) से विवाह करती है , तो चाहे वह विवाह के पूर्व या विवाह के पश्चात धर्मांतरण करे या न करे, दोनों ही परिस्थितियों में यदि युवती यह मंशा जाहिर करती है कि उसके वैवाहिक जीवन पर उसका जन्मना धर्म लागू होगा , तो वैवाहिक विवादों का निपटान युवती के जन्मना धर्म के क़ानून के अनुसार ही किया जाएगा। यह क़ानून लव जिहाद की समस्या को कुछ ही महीनो में जड़ से खत्म कर देगा।
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(2) इसके अलावा, सरकार को मुस्लिम महिलाओ को इस बात की सूचना देने के लिए अभियान चलाना चाहिए कि यदि वे चाहे तो निकाह के दौरान निकाहनामे में वे अपनी मर्जी से तलाक की शर्तें आदि तय कर सकती है। और उन्हें यह भी सूचित किया जाना चाहिए कि मुस्लिम युवतियां/युवक यदि चाहे तो अपना निकाह "स्पेशल मैरिज एक्ट" के तहत दर्ज करवा सकते है। ऐसे स्थिति में मामले का निपटान स्पेशल मरीज एक्ट के तहत होगा, न कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार। तो उस तरह मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव की कोई जरूरत नहीं रह जायेगी।
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और यह सारा सर्कस टू चाइल्ड पालिसी एवं बंगलादेशी घुसपेठ को चर्चा से बाहर रखने के लिए चलाया गया है। तो कार्यकर्ताओं को इन दो मुद्दों पर ज्यादा भार देना चाहिए।
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