> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2019-07-29

Pawan Jury BhilwaraRj

क्या मोदी सरकार ने RTI को कमजोर कर दिया है?
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छोटे छोटे कार्यकर्ताओ के प्रयासों से जब इस क़ानून की मांग खड़ी हुयी तो 2005 में कोंग्रेस सरकार ने इस क़ानून को लूला लंगड़ा बनाकर पास किया था। और अब मोदी साहेब इसे पूरी तरह से अपाहिज बनाने की दिशा में काम कर रहे है !!
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क़ानून दो तरह के होते है :
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(a) वे जो सरकार की शक्ति में इजाफा करते है
(b) एक वे जिनसे जनता की शक्ति में वृद्धि होती है।
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डेमोक्रेसी का मतलब जनता को अधिकार देने से है। जब जनता के अधिकारों में वृद्धि होती है तो सरकार एवं नेताओं पर अंकुश आता है। तो व्यवहारिक पहलू यह है कि बेहद दुर्लभ अपवाद को छोड़ दें तो लगभग सभी देशो की राजनैतिक पार्टियाँ एवं नेता लोकतंत्र के जबरदस्त खिलाफ होते है।
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चूंकि सत्ता में आने के लिए उन्हें वोट लेने होते है इसीलिए नेता डेमोक्रेटिक होने का अभिनय करते है, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनका दिमाग इस दिशा में तेजी से काम करने लगता है कि कौनसे क़ानून छापने से मेरी ताकत में और भी इजाफा होगा। और जब भी कोई क़ानून सरकार की ताकत में इजाफा करेगा तो वह जनता के अधिकारों में कटौती अवश्य करेगा।
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चूंकि RTI श्रेणी (b) के अंतर्गत आता है अत: यदि सरकार ( चाहे वह मोदी सरकार ही क्यों न हो ) RTI को कमजोर कर रही है तो यह स्वाभाविक है। जैसे जैसे किसी सरकार की सीटों की संख्या बढती है, वैसे वैसे सरकार / नेता इस तरह के क़ानून छापना शुरु करते है, जिससे उसकी शक्ति में और वृद्धि हो। तो इसमें कोई नयी बात नहीं है।
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स्मृति ईरानी और मोदी साहेब की डिग्री के विवादों में आने के बाद से ही RTI मोदी साहेब के रडार में था। तब मैंने कहीं लिखा था कि ज्यादातर सम्भावना है कि जल्द ही मोदी साहेब RTI का कुछ इंतजाम कर देंगे। 300 सीट आने के बाद अब इस तरह के क़ानून छापने में उन्हें समस्या पेश नहीं आएगी।
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सरकारें हर महीने ऐसे दर्जनों क़ानून गेजेट में छापती है जिनसे जनता के अधिकारों में कटौती होकर सरकार की शक्ति में इजाफा होता है। किन्तु पेड मीडिया इन्हें कवरेज नहीं देता इसीलिए ये नोटिफिकेशन कभी चर्चा में नहीं आते।
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पर क़ानून RTI का संशोधन इतनी चर्चा में क्यों है ?
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दरअसल RTI का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर कई छोटे छोटे कार्यकर्ताओ द्वारा किया जाता है, और इस वजह से देश के एक बड़े समूह का इससे जुड़ाव है। इस वजह से इस क़ानून का संशोधन चर्चा में आ गया है। वर्ना पेड मीडिया की कृपा से बहुधा ऐसे मामले चर्चा में नही आ पाते।
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मोदी साहेब ने RTI में क्या बदलाव किया है ?
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कोंग्रेस के RTI में सरकार "अपने आदमी" को 5 साल के लिए सूचना आयुक्त नियुक्त करती थी। और मोदी साहेब के RTI में जब सरकार "अपने आदमी" की नियुक्ति करेगी तो यह भी तय करेगी कि इसे कितने टाइम के लिए आयुक्त बनाना है। यदि आयुक्त सरकार के कहने में चलेगा तो नौकरी चालू रहेगी और कार्यकाल में वृद्धि की जायेगी , और यदि आयुक्त सरकार को हानि पहुचाने वाली सूचनाएं लोगो को देने में रुचि दिखाता है तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाएगा। बस कोंग्रेस एवं बीजेपी के RTI में इतना ही अंतर है।
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( सैक्शन - A )
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मेरा प्रस्ताव है कि RTI एक्ट में निम्नलिखित 5 धाराएं जोड़ी जानी चाहिए :
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==RTI में जोड़े जाने वाले ड्राफ्ट का प्रारम्भ==
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(1) केन्द्रीय सूचना आयुक्त के लिए आवेदन एवं योग्यता :
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(1.1) 42 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक केन्द्रीय सूचना आयुक्त के लिए एवं 38 वर्ष से अधिक आयु का कोई कोई भी नागरिक किसी राज्य के लिए राज्य सूचना आयुक्त के लिए आवेदन कर सकेगा।
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(1.2) धारा 1.1.में दी गयी योग्यता धारण वाला कोई भी नागरिक यदि जिला कलेक्टर के सामने स्वयं या किसी वकील के माध्यम से ऐफिडेविट प्रस्तुत करता है, तो जिला कलेक्टर सांसद के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क‍ लेकर अर्हित पद के लिए उसका आवेदन स्वीकार कर लेगा, तथा उसे एक विशिष्ट सीरियल नम्बर जारी करेगा।
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(2) मतदाता द्वारा किसी प्रत्याशी के लिए स्वीकृति दर्ज करना :
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(2.1) कोई भी नागरिक किसी भी दिन मतदाता पहचान पत्र के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर पुलिस प्रमुख, शिक्षा अधिकारी, चिकित्सा अधिकारी, जिला जज, जूरी प्रशासक के प्रत्याशियों के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर में मतदाता की हाँ को दर्ज करके रसीद देगा। पटवारी मतदाताओं की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम एवं मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है।
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(2.2) स्वीकृति ( हाँ ) दर्ज करने के लिए मतदाता 3 रूपये फ़ीस देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी
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(2.3) प्रत्येक सोमवार को महीने की 5 तारीख को, कलेक्टर पिछले महीने के अंतिम दिन तक प्राप्त प्रत्येक प्रत्याशियों को मिली स्वीकृतियों की गिनती प्रकाशित करेगा। पटवारी अपने क्षेत्र की स्वीकृतियो का यह प्रदर्शन प्रत्येक सोमवार को करेगा। स्वीकृतियों का प्रदर्शन हर महीने की 10 तारीख को कैबिनेट सचिव द्वारा भी किया जाएगा।
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[ टिपण्णी : कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी स्वीकृति SMS, ATM एवं मोबाईल एप द्वारा दर्ज करवा सके। ]
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(3) सूचना आयुक्त की नियुक्ति :
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(3.1) केन्द्रीय सूचना आयुक्त : यदि किसी उम्मीदवार को देश की मतदाता सूची में दर्ज सभी मतदाताओं ( सभी मतदाता, न कि केवल वे जिन्होंने स्वीकृति दर्ज की है ) की 35% से अधिक स्वीकृतियां प्राप्त हो जाती है, और यदि यह स्वीकृतियां पदासीन सूचना आयुक्त से 1% अधिक भी है, तो प्रधानमंत्री मौजूदा आयुक्त को निकाल कर सबसे अधिक स्वीकृति पाने वाले उम्मीदवार को केन्द्रीय सूचना आयुक्त की नौकरी दे सकते है, या नहीं भी दे सकते है। या पीएम अपना इस्तीफा दे सकते है, या नहीं भी दे सकते है। नागरिको की अधिकतम स्वीकृति प्राप्त करने वाले व्यक्ति को सूचना आयुक्त बनाना है या नहीं इस बारे में अंतिम फैसला प्रधानमन्त्री ही करेंगे।
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(3.2) राज्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति : यदि किसी उम्मीदवार को किसी राज्य की मतदाता सूची में दर्ज सभी मतदाताओं ( सभी मतदाता, न कि केवल वे जिन्होंने स्वीकृति दर्ज की है ) की 35% से अधिक स्वीकृतियां प्राप्त हो जाती है, और यदि यह स्वीकृतियां पदासीन राज्य सूचना आयुक्त से 1% अधिक भी है, तो मुख्यमंत्री मौजूदा आयुक्त को निकाल कर सबसे अधिक स्वीकृति पाने वाले उम्मीदवार को राज्य सूचना आयुक्त की नौकरी दे सकते है, या नहीं भी दे सकते है। या मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा दे सकते है, या नहीं भी दे सकते है। नागरिको की अधिकतम स्वीकृति प्राप्त करने वाले व्यक्ति को राज्य सूचना आयुक्त बनाना है या नहीं इस बारे में अंतिम फैसला मुख्यमंत्री ही करेंगे।
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(4) सूचना आयुक्त के झगड़ो का जूरी द्वारा निपटान :
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[ टिप्पणी : प्रधानमंत्री जूरी मंडल के गठन एवं संचालन के लिए आवश्यक विस्तृत प्रक्रियाएं गेजेट में प्रकाशित करेंगे, जिन्हें इस क़ानून में जोड़ा जायेगा। प्रधानमंत्री के अलावा कोई अन्य मतदाता भी इसी क़ानून की धारा 6.1 का प्रयोग करते हुए ऐसी आवश्यक प्रक्रियाएं जोड़ने का शपथपत्र दे सकता है। ]
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(4.1) जूरी प्रशासक दिल्ली राज्य की मतदाता सूची में से 30 सदस्यीय महाजूरी मंडल की नियुक्ति करेगा। इनमे से हर 10 दिन में 10 सदस्य सेवानिवृत होंगे और नए 10 सदस्यो का चयन मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा कर लिया जाएगा। यह महा जूरी मंडल निरंतर काम करता रहेगा। महाजूरी सदस्य को प्रति उपस्थिति 500 रू एवं यात्रा व्यय मिलेगा। राज्यों के जूरी प्रशासक ऐसे महाजूरी मंडल की स्थापना प्रत्येक राज्य की राजधानी में करेंगे।
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(4.2). यदि केन्द्रीय सूचना आयुक्त या उनके स्टाफ से सम्बंधित कोई भी मामला है तो वादी अपने मामले की शिकायत दिल्ली के महाजूरी मंडल के सदस्यों को राज्य सूचना आयुक्त के बारे में शिकायत अमुक राज्य की राजधानी के महाजुरी मंडल को लिख कर दे सकते है। यदि महाजूरी मंडल मामले को निराधार पाते है तो शिकायत खारिज कर सकते है, अथवा इस मामले की सुनवाई के लिए एक नए जूरी मंडल के गठन का आदेश दे सकते है।
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(4.3) मामले की जटिलता एवं आरोपी की हैसियत के अनुसार महाजूरी मंडल तय करेगा कि 15-1500 के बीच में कितने सदस्यों की जूरी बुलाई जानी चाहिए। तब जूरी प्रशासक मतदाता सूची से लॉटरी द्वारा सदस्यों का चयन करते हुए जूरी मंडल का गठन करेगा और मामला इन्हें सौंप देगा।
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(4.4) अब यह जूरी मंडल दोनों पक्षों, गवाहों आदि को सुनकर फैसला देगा। प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला बंद लिफ़ाफ़े में लिखकर ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर या जज को देंगे। दो तिहाई सदस्यों द्वारा मंजूर किये गये निर्णय को जूरी का फैसला माना जाएगा। किन्तु नौकरी से निकालने एवं नारको टेस्ट का फैसला लेने के लिए 75% सदस्यों के अनुमोदन की जरूरत होगी। जज या ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर सभी के सामने जूरी का निर्णय सुनायेंगे। यदि जज जूरी द्वारा दिए गए फैसले को खारिज करना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है। अंतिम फैसला देने का अधिकार जज के पास ही रहेगा। प्रत्येक मामले की सुनवाई के लिए अलग से जूरी मंडल होगा, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी। पक्षकार चाहे तो फैसले की अपील हाई कोर्ट में कर सकते है।
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(5) सूचना मांगने वाले की सुरक्षा के लिए प्रावधान :
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(5.1) केन्द्रीय सूचना आयुक्त एवं प्रत्येक राज्य सूचना आयुक्त एक वेबसाईट बनाएगा, और इसे अद्यतन बनाए रखेगा। यदि कोई नागरिक धारा 6.1 के तहत कोई सूचना मांगता है और इसके लिए 100 रू का शुल्क जमा करता है तो सूचना आयुक्त मांगे गए सभी पृष्ठों को स्कैन करके इसका पीडीऍफ़ इस वेबसाईट पर रखेगा। अब ये सूचनाएं सार्वजनिक होगी और कोई भी व्यक्ति इन्हें बिना शुल्क दिए पढ़ सकता है।
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(5.2) धारा (6.1) के तहत जितनी भी सूचनाएं मांगी जायेगी यदि वे सूचनाएं RTI एक्ट के दायरे में है तो सूचना आयुक्त उन्हें अनिवार्य रूप से तब भी वेबसाईट पर रखेगा जबकि आवेदन करने वाले की मृत्यु हो जाए या आवेदन करने वाला व्यक्ति इस तरह की अर्जी दे कि उसे अब यह सूचनाएं नहीं चाहिए।
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(5.3) धारा (6.1) के तहत वेबसाईट से ली गयी सूचनाओं को अदालतों आदि में अधिकृत दस्तावेज के रूप में स्वीकार नहीं किया जायेगा। इसके लिए आवेदक को इसकी सत्यापित कॉपी सम्बंधित विभाग से लेनी होगी। यदि सम्बंधित विभाग में वेबसाईट पर रखे गए किसी प्रप्रत्र की सत्यापित कॉपी लेने के लिए आवेदन किया जाता है तो सम्बंधित विभाग अगले 48 घंटे में इसकी सत्यापित कॉपी जारी करेगा।
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(6) जनता की आवाज :
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(6.1) यदि कोई मतदाता इस कानून की किसी धारा में कोई आंशिक या पूर्ण परिवर्तन चाहता है या इस क़ानून से सम्बंधित कोई अर्जी देना चाहता है तो वह कलेक्टर कार्यालय में एक एफिडेविट जमा करवा सकेगा। जिला कलेक्टर 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर एफिडेविट को मतदाता के वोटर आई.डी नंबर के साथ मुख्यमंत्री / प्रधानमन्त्री की वेबसाइट पर स्कैन करके रखेगा।
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(6.2) यदि कोई मतदाता धारा 6.1 के तहत प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर अपना समर्थन दर्ज कराना चाहे तो वह पटवारी कार्यालय में 3 रूपए का शुल्क देकर अपनी हां / ना दर्ज करवा सकता है। पटवारी इसे दर्ज करेगा और हाँ / ना को मतदाता के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ मुख्यमंत्री / प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल देगा।
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==RTI में जोड़े जाने वाले ड्राफ्ट का समापन==
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( सेक्शन - B )
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कोंग्रेस सरकार ने किस तरह एक लूला लंगड़ा RTI क़ानून पास किया था ?
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देखिये RTI में आप सरकार के गलत फैसलों एवं भ्रष्टाचार खिलाफ अधिकृत दस्तावेज जुटा सकते है। इस तरह यह क़ानून सूचनाओं को नियंत्रित करने की सरकार की शक्ति में कमी लाता है। अभी सूचनाओं का एक मात्र स्त्रोत पेड मीडिया है। तो पेड मीडिया के स्पोंसर यह तय करते है कि जनता को कौनसी सूचना देनी है और कौनसी नहीं देनी है। RTI Act इसमें सुराख की तरह है। और स्वतंत्र कार्यकर्ता इस सुराख का इस्तेमाल करके काफी सारी ऐसी सूचनाएं निकाल सकते थे जिससे सरकार मुश्किल में आ सकती थी।
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नेता चाहते है कि कौनसी सूचना देनी है और कौनसी नहीं देनी है इसको तय करने का अधिकार जिस इंसान के पास होगा उस इंसान की नियुक्ति और बर्खास्तगी के डोरे हमारे पास रहने चाहिए। अत: उन्होंने RTI में यह प्रावधान जोड़ा कि सूचना आयुक्त की नियुक्ति सरकार करेगी। जब कोंग्रेस इसकी नियुक्ति करेगी तो वह कोंग्रेस का आदमी होगा, और जब बीजेपी नियुक्ति करेगी तो वह बीजेपी का आदमी होगा। तो देश की सभी पार्टियाँ इस बात पर सहमत थी कि सूचना आयुक्त की नियुक्ति सरकार ही करेगी और वह सरकार के अलावा अन्य किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होगा !!
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कारगिल युद्ध के बाद से भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भारत के पेड मीडिया पर नियंत्रण बनाना शुरू किया और तब से भारत की सभी बड़ी पॉलिटिकल पार्टियों के स्पोंसर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक है। इसमें तीसरा आयाम यह है कि, यदि सूचना आयुक्त की नियुक्ति का अधिकार सरकार के पास रहेगा तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सरकार में कौन है। क्योंकि दोनों ही सूरतो में ऐसी सूचनाएं बाहर नहीं आएगी जिससे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको को नुकसान होता है।
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इस समय सूचना आयुक्त नेताओं के प्रति जवाबदेह है, और इसीलिए अब तक आपने RTI के तहत जितनी भी सूचनाएं बाहर आती देखी है वह चिल्लर किस्म की है। यदि सूचना आयुक्त को जनता के प्रति जवाबदेह बना दिया जाए तो सिर्फ 1 साल में यह क़ानून इतनी महत्त्वपूर्ण सूचनाएं पब्लिक में लाकर डाल देगा कि राजनीति की धारा में ही बदलाव आ जाएगा। आज जो भी सूचनाएं कार्यकर्ताओ द्वारा मांगी जाती है और यदि ये सूचनाएं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ है तो RTI के दायरे में होने के बावजूद सूचना आयुक्त ये सूचनाएं देने से इनकार कर देता है। मान लीजिये यदि कुल 100 सूचनाएं मांगी गयी है तो इनमे 99% सूचनाएं चिल्लर किस्म की होती है, और इसीलिए ये दे दी जाती है। शेष 1% सूचनाएं बेहद महत्त्वपूर्ण होती है, किन्तु सूचना आयुक्त ये 1% सूचनाएं कभी नहीं देता !!!
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( सेक्शन - C )
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कोंग्रेस=बीजेपी Vs मेरे प्रस्ताव में अंतर :
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कोंग्रेस एवं बीजेपी के स्पोंसर एक ही है, (बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक) अत: शेष जवाब में मैंने कोंग्रेस=बीजेपी के RTI को MNC's RTI कहकर संबोधित किया है।
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(1) MNC's RTI में सूचना आयुक्त की नियुक्ति पीएम करते है और मेरे प्रस्ताव में भी सूचना आयुक्त की नियुक्ति का अंतिम एवं निर्णायक अधिकार पीएम के पास ही रहेगा। किन्तु मेरे द्वारा प्रस्तावित धाराओं को यदि MNC's RTI act में जोड़ दिया जाता है तो भारत के करोड़ो नागरिक यह बता सकेंगे कि वे मौजूदा आयुक्त के काम काज से संतुष्ट है या नहीं है। या वे किस व्यक्ति को आयुक्त बनाना चाहते है।
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कृपया इस बात को नोट करें कि अंतिम फैसला पीएम के पास ही होगा और वे अपनी पसंद के आदमी को ही इस पद पर नियुक्त करेंगे। लेकिन मेरे द्वारा प्रस्तावित धाराएं जोड़ देने से आम नागरिको को यह अधिकार होगा कि वे अपनी पसंद बता सके।
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मोदी साहेब एवं सोनिया जी के सभी भक्त इस प्रस्ताव का विरोध करते है। उनका स्टेंड है कि नागरिको की किसी भी सूरत में यह अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए कि वे यह बताए कि कौन सूचना आयुक्त होना चाहिए और कौन नहीं।
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(2) MNC's RTI में सूचना आयुक्त या उसके स्टाफ के खिलाफ यदि कोई शिकायत आती है तो उसका फैसला भ्रष्ट जज करता है। मेरे प्रस्ताव में है कि मामले को सुनने के लिए आम नागरिको की जूरी आएगी। जूरी मंडल जज के साथ सबुत / तथ्यों को देखेगी, दोनों पक्षों की बहस सुनेगी और अपना फैसला जज को बताएगी। किन्तु अंतिम फैसला देने का अधिकार जज के पास ही रहेगा और जज ही फैसला देगा।
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कृपया इस बात को नोट करें कि मेरे प्रस्ताव में अंतिम फैसला देने का अधिकार जूरी को नहीं दिया गया है। अंतिम फैसला जज के पास ही रहेगा। किन्तु मोदी साहेब एवं सोनिया जी के भक्तो का स्टेंड है कि नागरिको को सबूत देखने एवं बहस सुनने का अधिकार भी नहीं दिया जाना चाहिए !!
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(3) MNC's RTI अब तक लगभग 100 से ऊपर जाने ले चुका है। जिसमे से 50 से ज्यादा तो रिकॉर्ड में दर्ज है। यदि मेरे द्वारा सुझाई गयी धारा 5 MNC's RTI एक्ट में जोड़ दी जाती है तो एक भी आदमी की जान नहीं जायेगी। क्योंकि आवेदक धारा 6.1 के तहत ऐसी जानकारियां मागं सकता है। और फिर यदि आवेदक को मार भी दिया जाता है तो अमुक जानकारी पब्लिक में आ जायेगी। और इसी वजह से कोई अफसर / नेता अमुक आवेदक की जान नहीं लेगा।
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(4) MNC's RTI में यदि इस क़ानून में कोई बदलाव करना हो तो इसका सुझाव सिर्फ सरकार ही दे सकती है और सरकार ही इसमें कोई बदलाव कर सकती है। मेरे द्वारा प्रस्तावित धारा (6.1) के आने से आपके और मेरे जैसा कोई आम नागरिक भी इस एक्ट में कोई संशोधन करने का सुझाव दे सकता है। और यदि देश के 51% नागरिक किसी बदलाव के लिए स्वीकृति दर्ज कर देते है तो पीएम इसमें बदलाव कर सकते है।
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पाठक कृपया इस बात को नोट करें कि यहाँ भी फैसले का अंतिम अधिकार प्रधानमंत्री के पास ही रहेगा। किन्तु मोदी साहेब एवं सोनिया जी के भक्तो को यह भी गवारा नहीं है। उनका स्टेंड है कि आम नागरिको को इस तरह की राय प्रदर्शित करने का कोई अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए !!!
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( सेक्शन - D )
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जब सभी प्रकार के फैसले करने का अंतिम अधिकार प्रधानमंत्री के पास ही है तो ये धाराएं जोड़ने से क्या बदलाव आएगा ?
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(1) अभी यदि किसी आदमी को सूचना आयुक्त बनना हो तो उसके पास सिर्फ दो रास्ते है - या तो सरकार के चमचे बनो, या बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको की चमचागिरी करो। यह बात लिखने की जरूरत नहीं है कि सभी कृपा नियुक्तियां चमचो को ही दी जाती है। चूंकि चमचा ओछा शब्द है अत: पेड राजनीति विज्ञान के प्रोफेसरों द्वारा चमचागिरी के एवज में कृपा नियुक्तियां एवं प्रसाद पर्यंत नामक ज्यादा संभ्रांत शब्दों का आविष्कार किया गया !!!
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मेरे द्वारा प्रस्तावित धारा (1) के आने के बाद कोई भी काबिल एवं योग्य व्यक्ति बिना सरकार की चमचागिरी किये सूचना आयुक्त के पद के लिए आवेदन कर सकेगा। और यदि उसे 45 करोड़ नागरिको की स्वीकृति मिल जाती है तो दो चीजे होगी -- या तो पीएम उसे सूचना आयुक्त की नौकरी दे देंगे और फिर नहीं देंगे। यदि पीएम नागरिको के बहुमत द्वारा दिए गए आदेश की अवहेलना करते है तो यह बात स्थापित हो जायेगी कि अमुक पीएम जनता के बहुमत की राय को अहमियत नहीं देता है। फलत: पीएम एवं उसकी पार्टी के उम्मीदवार आगामी चुनाव हार जायेंगे !!! जाहिर है, किसी भी पीएम की इतनी हैसियत नहीं है कि वह स्थापित एवं अधिकृत बहुमत की अवहेलना कर सके। तो पीएम अमुक व्यक्ति को सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त कर देंगे।
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और अब यह सूचना आयुक्त जनता के समर्थन से नियुक्त होने के कारण पीएम की चमचागिरी नहीं करेगा। दुसरे शब्दों में, उसका कोई राजनैतिक आका नहीं है। अत: वह इस तरह के कदम उठाना शुरू करेगा कि सूचना मांगने वाले को तेजी से और जल्दी सूचनाएं मिले। ज्यादातर सम्भावना है कि वह खुद से ही सार्वजनिक महत्त्व की महत्त्वपूर्ण सूचनाओं को वेबसाईट पर निरंतर अपडेट करता रहेगा, ताकि सूचनाएं खोजने वाले व्यक्ति को समय और श्रम नहीं करना पड़े। क्योंकि उसे पता है कि मैं जितना निष्पक्ष एवं बेहतर काम करूँगा मेरी स्वीकृतियां उतनी बढ़ेगी और मेरी नौकरी चालू रहेगी।
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तो यदि जनता के समर्थन से यदि सूचना आयुक्त नौकरी पा जाता है, और तब आप उससे कोई ऐसी सूचना मांगते है जो सरकार के किसी महत्त्वपूर्ण भ्रष्टाचार को उजागर करती है, और आपको वह सूचना मिनिट से पहले मिल जायेगी। क्योंकि उसे पीएम का भय नहीं है।
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(2) यदि जनता के समर्थन से नियुक्त होने के बावजूद यदि वह पद पाते ही पीएम की चमचागिरी करना शुरू कर देता है, और सरकार के खिलाफ मांगी गयी सूचनाओं में अडंगे लगाता है तो उसका मामला नागरिको की जूरी सुनेगी। MNC's RTI में सबूत देखने और बहस सुनने का अधिकार सिर्फ जज के पास है। अत: जनता को मालूम नहीं हो पाता कि कौन सही था और कौन गलत। तो भ्रष्ट जज पैसा खाकर तारीखे देते रहते है, या फिर आरोपी को दोष मुक्त कर देते है !! जूरी के सामने मामला आने से यह बात जनता के सामने अधिकृत रूप से स्थापित हो जायेगी कि सूचना आयुक्त ईमानदारी से अपना काम नहीं कर रहा है।
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(3) 2011 के आस पास कई कार्यकर्ताओ ने इस बात को उठाना शुरु किया था कि RTI act में सरकारी निकायों की जो परिभाषा दी गयी हिया उसके अनुसार राजनैतिक पार्टियां RTI के दायरे में आनी चाहिए। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां यह बिलकुल नहीं चाहती थी कि उनकी फ़ैन्चाइज ( मुख्य धारा की सभी राजनैतिक पार्टियाँ) के हिसाब किताब RTI के दायरे में आये। तो उन्होंने कोंग्रेस सरकार को एक संशोधन लाने का आदेश दिया। निदान कोंग्रेस, बीजेपी, आम आदमी पार्टी आदि ने आपसी सहमती से इसमें एक संशोधन जोड़ा और राजनैतिक पार्टियों को RTI के दायरे से बाहर कर दिया !!!
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यदि मेरे द्वारा प्रस्तावित धाराएं RTI एक्ट में जोड़ दी जाती है तो कोई भी नागरिक धारा (6.1) का इस्तेमाल करते हुए राजनैतिक पार्टियो को मिलने वाले चंदे को इसके दायरे में लाने के लिए शपथपत्र दे सकता है। और यदि 45 करोड़ नागरिक इस पर हाँ दर्ज कर देते है तो पीएम पर यह दबाव बनेगा कि वह इस धारा को जोड़े। यदि पीएम बहुमत की अवहेलना करता है तो वे अगला चुनाव हार जायेंगे और वो पार्टी चुनाव जीतेगी जो इस धारा को जोड़ने का वादा करें।
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और फिर हम यह अधिकृत रूप से जान पायेंगे कि जो पार्टियाँ देश चलाती है हमारी उन पार्टियों को कौन कौन विदेशी कम्पनियां पाल रही है। उल्लेखनीय है कि अभी के लोकसभा चुनाव में बीजेपी=संघ को 1050 करोड़ विदेशियों से चंदे के रूप में मिले है और कोंग्रेस को विदेशियों से मिली यह राशि लगभग 150 करोड़ है। मतलब ऍफ़डीआई सिर्फ अन्य क्षेत्रो में ही नहीं है। हमारी राजनैतिक पार्टियाँ लीगली विदेशियों से चंदा लेती है। और ये विदेशी कम्पनियां कौन है हमें हमारे नेता बताना नहीं चाहते। मेरे द्वारा प्रस्तावित धाराएं RTI एक्ट में जोड़ देने से यह स्थिति पलट जायेगी।
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पेड मीडियाकर्मी , पेड बुद्धिजीवी एवं मुख्यधारा की सभी राजनैतिक पार्टियो के सभी नेता मेरे द्वारा सुझाए गए ड्राफ्ट के सख्त खिलाफ है, और वे इस पर बात भी करना पसंद नहीं करते। जैसे ही यह बात कही जाती है कि सूचना आयुक्त तो जनता का आदमी है, और इसीलिए जनता की भी इस पर राय ली जानी चाहिए, तो उन्हें चींटियाँ काटने लगती है।
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इसीलिए पेड मीडियाकर्मी सिर्फ ऐसे ही प्रस्तावों पर चर्चा करना चाहते है जिसमे नियुक्ति और बर्खास्तगी का अधिकार सरकार के पास रहे। क्योंकि उनके हिसाब से भारत के लोग जाहिल, अशिक्षित, अपरिपक्व, अजागरूक, मूर्ख और भ्रष्ट है !!! और इसीलिए भारत के आम नागरिको को अपनी राय दर्ज करवाने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए !! बहरहाल इनमे से कौनसा RTI एक्ट बेहतर है और आपको कौनसा RTI चाहिए, यह आप तय कर सकते है।
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