Pawan Jury BhilwaraRj
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Pawan Jury BhilwaraRj:
## [**क्या सत्ता सुख के लिए पार्टियां अपने विचारधारा को ताख पर रख देती हैं?**](<https://hi.quora.com/%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%96-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F>)
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दरअसल आपके प्रतिनिधि कितनी ईमानदारी बरतेंगे और चुनाव जीतने के बाद कैसे पेश आयेंगे यह कानूनों से तय होता है, विचारधारा से नहीं।
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राजनीती में विचारधारा नाम की कोई चीज नहीं होती है। जो भी होती है, वह क़ानूनधारा होती है। पेड मीडियाकर्मी एवं पेड बुद्धिजीवी राजनीती के सन्दर्भ में विचारधारा की बात बार बार इसीलिए घोटते है, ताकि क़ानूनधारा की चर्चा को टाला जा सके। जहाँ तक राजनेताओ की बात है, मैं उन सभी नेताओ को पहली नजर में फ्रॉड मानता हूँ जो विचारधारा पर बात करने में काफी रुचि दिखाते है, किन्तु यह नहीं बताते कि उनकी विचारधारा को लागू करने के लिए वे कौनसे क़ानून गैजेट में छापेंगे।
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उदाहरण के लिए — बहुत पुरानी बात है, जब 1910 से पहले तक इस तरह का क़ानून था कि अमेरिका में सीनेटरों ( राज्य सभा सदस्य ) को राज्यों के विधायकों द्वारा चुना जाता था। तब अमेरिका में जो विधायक होते थे उनका कुछ वर्गीकरण इस तरह होता था :
* कुछ विधायको की विचारधारा अच्छी होती थी,
* कुछ विधायको की विचारधारा बहुत अच्छी होती थी,
* कुछ विधायको की विचारधारा बुरी होती थी,
* और कुछ की विचारधारा बहुत बुरी होती थी।
किन्तु सभी प्रकार की विचारधाराओं के विधायक राज्यसभा के उम्मीदवारों से घूस खाते थे !! अंततोगत्वा अमेरिका के कार्यकर्ताओ ने समाधान के लिए शासन को मजबूर करके ऐसा कानून लागू करवाया जो कहता था कि — *सीनेटर सीधे नागरिकों द्वारा चुने जाएंगे।*
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**नतीजा : **विधायको के हाथ से राज्यसभा सदस्यों से घूस खाने का अवसर निकल गया !! तो इस प्रकार एक क़ानूनधारा ने सभी प्रकार की विचारधाराओं के विधायको को ईमानदार बनने पर बाध्य कर दिया !!
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अब भारत में आइये :
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भारत में राज्यसभा चुनावों का तमाशा 1951 से शुरू हुआ, और 2003 में राज्यसभा के चुनाव तब खुली नीलामी बन गए जब एनरॉन पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी ने वोटिंग को सार्वजनिक बनाने के लिए 'दल बदल व्हिप' कानून लागू किया, और इसका दायरा राज्य सभा चुनावों तक विस्तृत कर दिया।
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दूसरे शब्दों में, इस कानून ने यह सुनिश्चित कर दिया कि, राजनैतिक दलों के मुखिया अपनी पार्टी के विधायकों को लिखित में आदेश दे सकेंगे कि उन्हें राज्यसभा के किस उम्मीदवार को वोट करना है, और यदि उन्होंने इस आदेश की अवमानना की तो उन्हें पार्टी से बाहर निकाला जा सकेगा !! बताइये !!!
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इस व्यवस्था के आने से कांग्रेस से लेकर बीजेपी, आम आदमी पार्टी, सीपीएम और अन्य भी सभी प्रकार की विचारधाराओं की राजनैतिक पार्टियों के शीर्ष नेताओं ने घूस खाकर राज्य सभा सीटे खुले आम बेचनी शुरू कर दी।
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इस क्रमिक विकास को जारी रखते हुए बेहतर होगा कि हम राज्यसभा सीटों की नीलामी को सार्वजनिक कर विधिवत रूप दें दे। तथा इस क्षेत्र के संसदीय विकास के लिए इसमें एफडीआई की अनुमति भी दी जानी चाहिए, ताकि विदेशी धनिक पारदर्शी तरीके से राज्य सभा की सीटें खरीद सके !! क्या इससे भारत सरकार के खजाने में राजस्व की आवक नहीं बढ़ेगी ?
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तो भारत में राज्य सभा की सीटें बिकती है, क्योंकि हमारी क़ानून धारा ही ऐसी है। अमेरिका में भी कभी विधायक इसी तरह बिकते थे। किन्तु उन्होंने विचारधारा नामक पर बकवास पर बहस चलाकर समय बर्बाद करने की जगह क़ानून बदला, और वहां स्थिति पलट गयी।
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दूसरा उदाहरण आप हॉर्स ट्रेडिंग का देख सकते है। भारत में विधायक सरकार बनाने के लिए इस पार्टी से उस पार्टी में जाने के लिए मोटा पैसा वसूलते है, क्योंकि भारत के नागरिको के पास ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है कि वे विधायको को यह बता सके कि नागरिक किस व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना चाहते है।
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अमेरिका में नागरिक सीधे मुख्यमंत्री को भी चुनते है और नागरिको के पास विधायको को नौकरी से निकालने का अधिकार भी है। तो इन दो कानूनों की वजह से वहां के विधायक ईमानदारी से पेश आते है, चाहे वे किसी भी विचारधारा के हो। जबकि भारत में सभी पार्टियाँ के सभी विधायक टके टके पर बिकने के लिए तैयार रहते है। तो यहाँ भी फर्क क़ानूनधारा की वजह से है, न कि विचारधारा की वजह से !!
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अब आप भारत के किसी भी बुद्धिजीवी से पूछिए कि भारत में विधायक क्यों बिक जाते है तो वे आपको कई प्रकार की बौद्धिक बकवास सुनायेंगे। वे आपको बताएँगे कि इसके लिए भारत की राजनैतिक संस्कृति दोषी है, भारत का लोकतंत्र अभी परिपक्व नहीं है, भारतीय दलों की विचारधारा घटिया है, आदि आदि !!
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क्या कोंग्रेस-बीजेपी-सीपीएम और आम आदमी पार्टी के इस खुले भ्रष्टाचार के लिए भारतीय और उनकी संस्कृति जिम्मेदार है ?
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असल में 1790 से 1910 तक अमेरिका में इसी तरह का कानून था, जो कहता था कि -- राज्यों के विधायक राज्यसभा सांसदों (सीनेटर) को चुनेंगे। और अमेरिका भी इसी समस्या का सामना कर रहा था — ज्यादातर विधायक नोटों के बदले बिक जाते थे !!!
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1910 में अमेरिका के कार्यकर्ताओ ने इस विषय पर आंदोलन चलाया और रिप्रेजेंटेटिव्स / सीनेटर्स ( लोकसभा एवं राज्यसभा सदस्य ) को ऐसा कानून लाने के लिए बाध्य कर दिया जो यह धारित करता था कि, "राज्य सभा सदस्य सीधे नागरिकों द्वारा चुने जाएंगे"।
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चूंकि सभी नेता मौजूदा व्यवस्था से पैसा बना रहे थे अत: अमेरिका का कोई नेता इस कानून को लागू नहीं होने देना चाहता था। पर चूंकि कार्यकर्ताओ का प्रचार व्यापक था अत: नेताओं ने श्रेय लेने के लिए इस कानून का समर्थन करना शुरू किया। लेकिन सिर्फ अंतिम चरण में, जबकि शुरुआत में सभी नेता राज्य सभा उम्मीदवारों को सीधे नागरिकों द्वारा चुने जाने के कानून का विरोध कर रहे थे।
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दूसरे शब्दों में, कांग्रेस, बीजेपी, सीपीएम और आम आदमी पार्टी के विधायक राज्य सभा चुनावों में अपना वोट इसीलिए नहीं बेच देते है क्योंकि भारतीय संस्कृति में दोष है, बल्कि इसका कारण यह है कि भारत में एक कंडम और अलोकतांत्रिक कानून लागू है जो कि यह कहता है कि, "राज्य सभा सांसदों को नागरिक नहीं बल्कि विधायक चुनेंगे"। यही कानून विधायकों को बिक जाने का अवसर मुहैया कराता है, किन्तु इन्ही पार्टियों के नेता और पैड मीडिया एक तरफ इस कानून का समर्थन करते है, और साथ ही भारत में यह झूठ भी फैलाते है कि भारत में भ्रष्टाचार होने का कारण भारतीय संस्कृति है !!
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और इसी दुष्प्रचार के चलते कतिपय कार्यकर्ताओ के दिमाग में यह कचरा इतना घर कर गया है कि उन्हें आप बहुधा यह कहते पाएंगे कि— 'भारत में भ्रष्टाचार इसीलिए है क्योंकि भारतीय और उनकी संस्कृति भ्रष्ट है'।
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तो अमेरिका के कार्यकर्ताओ ने अपने देश की इस समस्या को हल कर लिया, लेकिन भारत इसका समाधान क्यों नहीं कर पाया ?
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क्योंकि भारत के कार्यकर्ताओ ने समस्या के समाधान के लिए कानून धारा पर बल देने की जगह विचारधारा, राजनैतिक संस्कृति जैसी बौद्धिक बकवास पर बहस चलाने को तरजीह दी। और फिर उन्होंने इस बात का भी प्रचार किया कि, "देश की किसी भी समस्या का समाधान सिर्फ नेता-भक्ति / पार्टी भक्ति से ही किया जा सकता है। ड्राफ्ट्स वगैरह पर चर्चा करना भी समय की बर्बादी है" !!! और जब उनसे पुछा जाता है कि, आपके अमुक नेता / पार्टी के पास ऐसा क्या है ? तो उनके पास फिर से यही बकवास तर्क होता है — मेरा नेता / पार्टी की विचारधारा अच्छी है !!
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कुल मिलाकर आपके क़ानून अच्छे है तो नेता तमीज से पेश आयेंगे, और यदि क़ानून बुरे है तो नेताओ से ईमानदारी की उम्मीद करके आप उनके साथ ज्यादती कर रहे है !!
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किन्तु पेड मीडियाकर्मी एवं पेड बुद्धिजीवी कार्यकर्ताओ का समय चूसने एवं उन्हें समाधान से दूर धकेलने के लिए विचारधारा नाम की बकवास पर बहस चलाते रहते है। यदि कोई व्यक्ति राजनीती के संदर्भ में विचारधारा शब्द का इस्तेमाल करता है तो आपको उससे तुरन्त कहना चाहिए कि मुझे आपकी विचारधारा में कतई रुचि नहीं है।
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उनसे पूछिए कि - आप अपनी विचारधारा को लागू करने के लिए कौनसे क़ानून गेजेट में छापने वाले है। यदि वे आपको क़ानून ड्राफ्ट नहीं देते तो समझ जाइए कि अब उनके पास आपको देने के लिए सिर्फ एक चीज है -- भाषण / डायलोग / बयान / उपदेश !! और भाषणों के इसी बौद्धिक प्रदुषण को विचारधारा के नाम से परोसा जाता है।
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