Pawan Jury BhilwaraRj
(1) राईट टू रिकॉल एवं वोट वापसी पासबुक में क्या अंतर है ?
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राईट टू रिकॉल एक प्रक्रिया ड्राफ्ट विहीन सिद्धांत है, और ड्राफ्ट विहीन होने के कारण इस पर बहस तो की जा सकती है, किन्तु इसे लागू नहीं किया जा सकता। जबकि वोट वापसी पासबुक एक प्रक्रिया है, जिसे लागू किया जा सकता है।
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राईट टू रिकॉल सिर्फ और सिर्फ चुने हुए प्रतिनिधियों जैसे सांसद / विधायक / सरपंच / पार्षद पर लागू होता है, जबकि वोट वापसी पासबुक सरकारी अधिकारियों जैसे एसपी, जज, शिक्षा अधिकारी, चिक्तिसा अधिकारी, दूरदर्शन चेयरमेन एवं अप्रत्यक्ष रूप से चुने हुए प्रतिनिधियों जैसे पीएम, सीएम एवं मंत्रियो पर लागू होता है।
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(2) क्या राईट टू रिकॉल अस्थिरता ला सकता है ?
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बिलकुल ला सकता है। राईट टू रिकॉल की ड्राफ्टिंग इस तरह की जा सकती है कि, इससे राजनैतिक अस्थिरता आ सकती है। और ब्रिटेन के सांसदो ने यह करके भी दिखाया है। उन्होंने 2015 में राईट टू रिकॉल की ऐसी प्रक्रिया लागू की जिसमें सिर्फ 10% मतदाताओं के समर्थन से पदासीन सांसद को हटाया जा सकता है !! सांसद / विधायक कितना भी ईमानदार हो किन्तु 10% मतदाता हमेशा ही उसके खिलाफ रहते ही है। अत: इस तरह का राईट टू रिकॉल अस्थिरता लाता है।
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(3) क्या राईट टू रिकॉल खतरनाक हो सकता है ?
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हाँ, बिलकुल हो सकता है। बीजेपी के सांसद श्री वरुण गांधी 2016 में राईट टू रिकॉल की ऐसी प्रक्रिया लिखने में कामयाब रहे जिसमें रिकॉल यदि असफल हो जाता है तो रिकॉल का आवेदन करने वाले को जेल हो सकती है !! और वे यह चाहते भी है कि, इसे लागू कर दिया जाए।
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(4) क्या राईट टू रिकॉल में रोज चुनाव हो सकते है ?
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हाँ, हो सकते है। राईट टू रिकॉल सिद्धांत के अंतर्गत ऐसी प्रक्रिया लिखी जा सकती है, जिससे हर हफ्ते सांसद / विधायक का रिकॉल होगा, और हर महीने चुनाव होते रहेंगे।
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(5) राईट टू रिकॉल एवं वोट वापसी पासबुक में से कौनसा अच्छा है ?
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(5.1) देखिये राईट टू राईट टू रिकॉल तो सिर्फ एक सिद्धांत है। कोई भी चीज देश में लागू करनी हो तो पहले इसे गेजेट में छापना होता है, और राईट टू रिकॉल कोई प्रक्रिया नहीं है जिसे गेजेट में छापा जा सके। मतलब गेजेट में पीएम क्या लिखेगा -- राईट टू रिकॉल लागू किया जाता है !! यूं ? ऐसे नहीं होता है !! और जब लफ्ज “राईट टू रिकॉल” लागू ही नहीं किया जा सकता तो क्या अच्छा और क्या बुरा !! अलबत्ता कोई आदमी इसकी प्रक्रिया सामने रखता है तब ही हम कह सकते है कि, यह प्रकिया अच्छी है या बुरी। लेकिन लफ्ज “राईट टू रिकॉल” कोई प्रक्रिया नहीं है, इस पर कोई राय व्यक्त की जाए।
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मेरे विचार में, जब कोई व्यक्ति कहता है कि – “राईट टू रिकॉल अच्छा है” तो यह गलत बयान नहीं होता। क्योंकि हमें नहीं पता कि वह राईट टू रिकॉल की कौनसी प्रकिया पढ़कर आया है।
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और इसी तरह से जब कोई व्यक्ति कहता है कि, -- “राईट टू रिकॉल बुरा है” , तो यह भी एक गलत बयान नहीं होता। क्योंकि हमें नहीं पता कि वह कौनसी प्रक्रिया पढ़कर आया है !!
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(5.2) जहाँ तक वोट वापसी पासबुक की बात है वोट वापसी पासबुक में वह प्रक्रिया दी गयी है, जिसका इस्तेमाल करके आप अधिकारियों, प्रतिनिधियों को बदलने के लिए अपनी स्वीकृति दर्ज करवा सकेंगे। यहाँ रिकॉल से कोई लेना देना नहीं है। रिकॉल में वोटिंग होती है, लेकिन वोट वापसी पासबुक में वोटिंग का कोई सिस्टम नहीं नहीं है। सिर्फ स्वीकृति देने का सिस्टम है। वोट वापसी पासबुक अच्छी है या बुरी है, इसका फैसला करने के लिए आप वोट वापसी पासबुक पढ़ सकते है।
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यदि आपको वोट वापसी पासबुक चाहिए तो पीएम / सीएम से मांग कर सकते है, कि वे वोट वापसी पासबुक जारी करें। यदि आपको वोट वापसी पासबुक नहीं चाहिए तो आपको इसकी मांग करने की जरूरत नहीं है। मतलब.... मस्त रहिए स्वस्थ रहिये !!
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अतिरिक्त : जैसे जैसे वोट वापसी पासबुक की मांग आगे बढ़ेगी, वैसे वैसे पेड मीडिया के प्रायोजको की कुलबुलाहट बढ़ेगी। और वोट वापसी पासबुक की मांग को डायवर्ट करने के लिए वे राईट टू रिकॉल पर बहस आगे बढ़ाएंगे। और वे जब भी इस मुद्दे को डिस्कस करेंगे तो हमेशा बहस को “राईट टू रिकॉल” नामक लफ्ज़ के इर्द गिर्द रखेंगे, ताकि प्रक्रिया पर विमर्श को टाला जा सके।
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हमारी मांग वोट वापसी पासबुक की है, राईट टू रिकॉल की नहीं !!
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