Pawan Jury BhilwaraRj
भाग - 2 ; संघ का शीर्ष नेतृत्व हमेशा से ही इस्लाम का छद्म विरोधी, ईसाइयत का प्रबल समर्थक और हिन्दू हितो के प्रति उदासीन रहा है।
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( यह लेख दो वर्ष पूर्व 2015 में लिखा गया था। फेसबुक मानकों के तहत न होने से इसे फेसबुक ने साल भर पहले इनविजिबल कर दिया था। असुरक्षित लिंक्स को हटाकर तथा दो भागो में विभाजित करके इसे re post किया जा रहा है। इस पोस्ट के पहला भाग का लिंक - )
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अध्याय - 3
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यह भाग इस बारे में है कि संघ किस तरह अपने प्रिय मुद्दों को हल करने की जगह उनका इस्तेमाल अपनी राजनैतिक ताकत बढाने और सत्ता हासिल करने में करता है।
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मेरे विचार में भारत की कमजोर होती सेना और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का हमारी अर्थव्यवस्था, प्रशासन और राजनैतिक व्यवस्था पर बढ़ता नियंत्रण सबसे गंभीर मुद्दे है। किन्तु यह कहा जा सकता है कि यह मेरा एजेंडा हो सकता है, संघ का नही। इसलिए मैं इस भाग में संघ के उन मुद्दों पर चर्चा करूँगा, जो मुद्दे संघ का अस्तित्व है।
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संघ का गायवाद
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चूंकि पुलिस प्रशासन राज्यों के अधीन है, अत: केन्द्रीय स्तर पर बनाया गया कोई भी क़ानून गौ-हत्या रोकने में सक्षम नही है। 1966 के गौ-आन्दोलन के बाद पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों को छोडकर, समय के साथ सभी राज्यों में धीरे धीरे गौ-हत्या निषेध बिल पास हुए। तो पहली बात तो यह है कि पूर्वोत्तर को छोड़कर सभी राज्यों में गौ-हत्या पहले से निषेध है, लेकिन दूसरी बात यह है कि चूंकि क़ानून बेहद कमजोर और लचीले है, अत: गौ-हत्या जारी है। अब यदि हमें गौ-हत्या रोकनी है तो वर्तमान क़ानूनो की जगह राज्यों में नए मजबूत क़ानून लाने होंगे।
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संघ से जब मैंने सम्पर्क करके कहा कि मैं भारत में गौ-हत्या निषेध करने का समर्थन करता हूँ तथा आपके इस कार्य में सहयोग करना चाहता हूँ, अत: आप मुझे आपका गौ-हत्या निषेध करने का कानूनी ड्राफ्ट दीजिये, ताकि मैं नागरिको में इस क़ानून का प्रचार कर सकूं। तो संघियों ने मुझसे कहा कि हमने ऐसा कोई क़ानून प्रस्तावित नही किया है। तब मैंने उन्हें यह क़ानून दिखाया :
www.facebook.com/pawan.jury/posts/822256167892621
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संघ ने कहा कि हम इस क़ानून का समर्थन नहीं करते। संघ ने न तो मुझे कोई कानूनी ड्राफ्ट दिया न ही मेरे ड्राफ्ट को समर्थन दिया।
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पड़ताल करने पर अनाधिकृत जानकारी मिली कि मोहन भागवत ने बीजेपी शासित सभी मुख्यमंत्रियों को गौ-हत्या निषेध के लिए कठोर क़ानून पास न करने के निर्देश दे रखे है। बीजेपी की इस विरोधाभासी नीति को एक्सपोज़ करने के लिए जब कोंग्रेस के विधायक आकिल आसिफ ने एमपी विधानसभा में गौ-हत्या निषेध बिल पेश किया तो, भागवत ने शिवराज सिंह से कह कर इस बिल को विधान सभा में गिरवा दिया। तारीख थी, 13 जुलाई 2014.
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यह इत्तिफाक है कि देश की सभी गौ-शालाएं संघ और उसके आनुषांगिक संगठनो द्वारा संचालित है, और उनमे करोडो का दान आता है, किन्तु उनकी गणना तथा पंजीयन की कोई व्यवस्था नही है। इत्तेफाक है कि, जब मोदी साहेब ने 2002 में गुजरात की सत्ता संभाली तब मीट का उत्पादन 9 लाख मीट्रिक टन था जो 2012 में बढ़कर 22 लाख मीट्रिक टन हो गया, इत्तिफाक से मनोहर पर्रीकर बैलो की कटवाई को कानूनी बनाए जाने के लिए हाईकोर्ट में केस लड़ रहे है, इत्तिफाक है कि दान से गायो के पलने के कारण गौ-मांस 170 रू किलो में उपलब्ध है जबकि मटन और चिकन के लिए 400 रू चुकाने पड़ते है। इत्तिफाक से मोदी साहेब ने कत्लखानो को दी जा रही सब्सिडी को जारी रखा है, तथा कटवाई में काम आने वाली मशीनों का आयात शुल्क 4% घटा दिया है। ये सुपर पिंक रिवोलुशन है।
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आरएसएस और उसके स्वयंसेवक सोशल मिडिया पर गाय बचाने के नारे लगा कर गौ-हत्या निषेध करना चाहते है। क़ानून बनाने मैं उनकी रुचि नही है। रुचि क्यों नही है, इसे ऊपर दिए विवरण से समझने में कोई कठिनाई नही होनी चाहिए। बहरहाल गाय वोट और नोट का मुनाफा देंने वाला कारोबार है, और इस धंधे को कोंग्रेस और आम आदमी पार्टी नियंत्रित नही करती।
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"मंदिरों का प्रशासन सुधारने के लिए क़ानून बनाने की जगह जिस तरह आनंदी बेन ने अपील जारी की कि, 'कृपया मंदिरों को दान न दे', उसी तर्ज पर गौ-शालाओं का प्रबंधन सुधारने की जगह यदि कल भागवत ऐसी अपील जारी नही करते है कि, 'गौ-शालाओ को दान न दे', तो इसका कारण हितो का टकराव है।"
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संघ का मंदिर वाद
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राम मंदिर मुद्दा जबकि 1949 से ही कोर्ट में लंबित है, 1990 में संघ ने कहा कि हमें वोट देने से हम संसद में मंदिर निर्माण के लिए क़ानून बना देंगे। वाजपेयी के सत्ता में आने पर बहुमत नहीं होने का हवाला दिया गया। अब बहुमत आने पर राज्यसभा में बहुमत नही होने का हवाला दिया जा रहा है। इस सम्बन्ध में राजनाथ का कहना है कि राज्यसभा में बहुमत नही है, शाह कहते है कि 370 सीट चाहिए, संघ कहता है कि अव्वल तो मामला अदालत में है दुसरे बीजेपी को मंदिर बनाने के लिए वक़्त दिया जाना चाहिए, जबकि बीजेपी के केन्द्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने राम मंदिर समर्थको को जोकर साबित करने के लिए यह कह दिया कि अयोध्या में राम मंदिर बन चुका है।
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हमने संघ के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि देश के करोड़ो नागरिक अयोध्या में राम-मंदिर बनाना चाहते है तो हम नेताओं और राज्यसभा में बहुमत के भरोसे क्यों बैठे है ? जबकि संविधान के अनुसार किसी भी विषय पर जनमत संग्रह द्वारा क़ानून बनाया जा सकता है।
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हमने उन्हें तीन लाइन के क़ानून के बारे में बताया
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[कलेक्टर के लिए निर्देश ]
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1) यदि कोई मतदाता कलेक्टर कार्यालय में उपस्थित होकर कोई शपथपत्र प्रस्तुत करता है, तो कलेक्टर 20 रू प्रति पेज की दर से शुल्क लेकर उस शपथपत्र को प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डाल देगा।
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[पटवारी के लिए निर्देश]
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2) यदि कोई मतदाता पटवारी कार्यालय में जाकर ऐसे किसी शपथपत्र पर हाँ या ना दर्ज करता है, तो पटवारी उसे दर्ज करेगा और प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डाल देगा।
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[सभी के लिए निर्देश]
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3) यदि देश के कुल मतदाताओं के 51% मतदाता किसी शपथपत्र पर हाँ दर्ज कर देते है, तो प्रधानमन्त्री ऐसे शपथ पत्र पर कार्यवाही कर सकते है।
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पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें - <https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/529823220529210>
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यदि इन तीन लाइनों को गेजेट में छाप दिया जाता है, तो अगले ही दिन संघ/ विहिप या कोई भी नागरिक राम मंदिर निर्माण का प्रस्ताव धारा एक के तहत पीएम की वेबसाईट पर दर्ज कर देगा, और धारा दो का उपयोग करके करोड़ो नागरिक इस प्रस्ताव पर हाँ दर्ज कर सकेंगे ।इस तरह जनता के समर्थन से राम मंदिर ही नही, बल्कि मथुरा में कृष्ण तथा काशी में विश्वनाथ मंदिर के निर्माण के प्रस्ताव को भी जनता के बहुमत से पास किया जा सकता है।
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जब हमने संघ को इस क़ानून का समर्थन करने को कहा तो उन्होंने इस क़ानून का विरोध किया। तब हमने संघ से कोई अन्य क़ानून ड्राफ्ट देने को कहा जिस से भारत के करोड़ो नागरिक अपनी बात पीएम के सम्मुख रख सके। संघ ने साफ़ कहा कि हम जनता को ऐसा कोई भी अधिकार देने के खिलाफ है, जिससे आम नागरिको को देश की किसी नीति पर हाँ / नहीं दर्ज करने की शक्ति हासिल हो !!! यदि आपको इस बात पर यकीन न हो तो आप खुद संघ के नेतृत्व से संपर्क करके इस तथ्य की पुष्टि कर सकते है।
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पाठक इस सम्बन्ध में स्वयं फैसला कर सकते है कि संघ क्यों ऐसे निरापद क़ानून का विरोध कर रहा है, जो कि आम नागरिक को अपनी सम्मति रखने का अधिकार देता है।
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मंदिरों के प्रशासन पर संघ की नीति
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धर्म के दो आयाम है, मीमांसा और प्रशासन। मीमांसा में धर्म की व्याख्या, दर्शन, विश्वास, अध्यात्म तथा यम नियम आदि शामिल है, जबकि प्रशासन धर्म की भौतिक संस्थाओं जैसे मंदिर, आश्रम, पूजा स्थल, दान आदि के प्रबंधन से सम्बंधित है। इस सम्बन्ध में हिन्दू धर्म के श्रधालुओं को बहुत कम जानकारी है कि धर्म का प्रशासन ही धर्म को मजबूत बनाता है। यदि किसी धर्म के पूजा स्थलों तथा संस्थाओं का प्रशासनिक संगठन सुव्यवस्थित होगा तो धर्म ज्यादा मजबूती से टिका रहेगा।
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प्रशासनिक दृष्टी से मौजूदा धर्मो में सिक्ख धर्म का प्रशासन सबसे मजबूत है, जबकि हिन्दू धर्म कुप्रबंधन का शिकार है। ईसाई और इस्लाम धर्म का प्रशासन भी हिन्दू धर्म की तुलना में काफी बेहतर है, फलस्वरूप पिछली दो शताब्दियों में इन धर्मो को पूरी दुनिया में विस्तार हुआ जबकि हिन्दू धर्म लगातार सिकुड़ता गया।
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कैसे हिन्दू धर्म के प्रशासन को लोकतांत्रिक और मजबूत बनाया जा सकता है, इसके लिए हमने यह क़ानून प्रस्तावित किया है :
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राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/570764579768407>
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जब हमने संघ के नेतृत्व से इस क़ानून का समर्थन करने को कहा तो, उन्होंने इनकार कर दिया। हमने संघ से कहा कि भारतीय मंदिरों का प्रशासन टूटा हुआ है, जिससे हिन्दू धर्म कमजोर हो रहा है, अत: आप इस समस्या के समाधान के लिए अपना ड्राफ्ट दीजिये। संघ ने कोई भी ड्राफ्ट देने से मना कर दिया। यह विषय कितना गंभीर है, इसे समझने के लिए मैं आपसे आग्रह करूँगा कि आप ऊपर वर्णित ड्राफ्ट का अध्ययन करें।
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सारांश यह है की :
1. संघ शिक्षा, चिकित्सा के बुनियादी ढाँचे को सुधारने तथा खनिजो की रोयल्टी नागरिको के खाते में भेजने का विरोध कर रहा है, ताकि भारत में गरीबी बढे और मिशनरीज को धर्मान्तर में सहायता मिले।
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2. सुस्त और भ्रष्ट अदालतों को सुधारने, भारत की सेना को मजबूत बनाने तथा स्वदेशी हथियारों के उत्पादन को बढ़ावा देने वाले कानूनों का विरोध कर रहा है।
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3. राम-कृष्ण-विश्वनाथ मंदिर के निर्माण, मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने तथा हिन्दू धर्म के प्रशासन को सुगठित बनाने, गौ-हत्या निषेध के लिए आवश्यक कानूनों का विरोध कर रहा है।
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4. बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने, राष्ट्रीय पहचान पत्र प्रणाली, भारतीय मिडिया को स्वतंत्र बनाने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की घुसपेठ रोकने के लिए आवश्यक कानूनों का विरोध कर रहा है।
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इस प्रकार के हिन्दु राष्ट्रवाद को समझना मेरी सहज बुद्धि से बाहर है, फिर भी करोड़ो नागरिक और लाखों स्वयसेवक इस भ्रम को पाले बैठे है कि संघ हिन्दू तथा राष्ट्रहित में कार्य करता है।
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अध्याय - 4
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यह भाग इस बारे में है कि किस तरह संघ "इस्लाम का छद्म विरोध" करके यह भ्रम खड़ा किये रहता है कि, वह हिन्दू धर्म तथा राष्ट्र हितो के लिए कार्य कर रहा है।
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इस बात को समझने के लिए निम्नलिखित बिन्दुओ पर प्रमुखता से ध्यान देना होगा --1) वास्तविक परिवर्तन सिर्फ और सिर्फ कानूनों में बदलाव करके ही लाये जा सकते है, 2) कार्यकर्ताओं का मूल मुद्दो से ध्यान भटकाने के लिए उनका टाइम अनुपयोगी कार्यो में बरबाद कर देना राजनीति की सबसे चालाक रणनीति है, 3) पेड मीडिया जनता के मानस को नियंत्रित करने और धारणाएँ गढ़ने में मुख्य भूमिका निभाता है।
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देश को क़ानून चलाते है। प्रधानमन्त्री / मुख्यमंत्री / सांसद / विधायक आदि का काम क़ानून बनाना है। जो भी प्रस्ताव क़ानून का रूप लेता है, वही देश में लागू होता है। अन्य सभी गतिविधियाँ जैसे बयान, नारे, भाषण, एलान, मन की बातें, आरोप प्रत्यारोप, आश्वासन, वादे आदि जनता का मनोरंजन करने और उन्हें इन फिजूल कार्यो में व्यस्त रखने के पैंतरे है। हमारे नेता जान बूझकर बयानों की नौटंकी करते रहते है, ताकि जनता का ध्यान कानूनों की और न जा पाए। और संघ इस तमाशे का सबसे बड़ा मदारी है।
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संघ हिन्दू धर्म तथा राष्ट्र को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक सभी कानूनों का विरोध करता है, तथा लगातार इस्लाम को कोसता है। इससे संघ को निम्नलिखित फायदे होते है।
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1. पूरे विश्व में इस्लाम तथा ईसाइयत के बीच टकराव हो रहा है। अत: इस्लाम के खिलाफ नफरत फैलाना मिशनरीज़ और संघ का साझा एजेंडा बन जाता है। उदाहरण के लिए यदि भारत में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत उच्च जन्म दर और अवैध घुसपेठ के कारण बढ़ रहा है तो संघ के नेता बयान देंगे की हिन्दुओ को 10 बच्चे पैदा करने चाहिए, लेकिन यदि आप उनसे इसके समाधान के लिए टू चाइल्ड पालिसी का ड्राफ्ट देने को कहेंगे तो संघी इनकार कर देंगे, यदि आप उन्हें कोई ऐसा क़ानून दिखाएँगे तो उसका विरोध करेंगे। इस स्थिति में मुस्लिम जनसँख्या की वृद्धि दर जारी रहती है और धार्मिक जनसँख्या का असंतुलन बिगड़ता है, जबकि भावुक भक्त सोचते है कि संघ बिगड़ते धार्मिक असंतुलन पर कार्य कर रहा है। वे नहीं समझ पाते कि संघ "सिर्फ बयानबाजी" कर रहा है। समाधान में उनकी कोई रुचि नहीं है।
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2. इस्लाम के खिलाफ जहर उगलने से भावुक और सरल ह्रदय नागरिक समझते है कि संघ हिंदूवादी संगठन है, परन्तु वे यह नही समझ पाते कि संघ "इस्लाम का छद्म विरोधी" है न कि हिन्दुओ का हितेषी। इससे लोगो का सारा ध्यान इस्लाम को कोसने में लगा रहता है, तथा हिन्दू धर्म को कमजोर बनाए रखने के मिशनरीज़ और संघ के साझा एजेंडे पर कार्यकर्ताओं का ध्यान नही जा पाता। मुतमईन होने के लिये आप स्वयं संघ से पूछ सकते है कि पिछले 90 साल में हिन्दू धर्म को मजबूत बनाने के लिए संघ ने कितने क़ानून प्रस्तावित किये। अंडा !!!
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3. मिशनरीज़ / MNCs का मुख्य एजेंडा भारत की सेना को कमजोर बनाए रखना और हमारी अर्थव्यवस्था को अधिगृहित करना है, ताकि पूरे भारत को इसाई बनाया जा सके। अत: संघ इन मुद्दों पर खामोशी बरतता है, जिससे मिशनरीज़ / MNCs लगातार अपना एजेंडा आगे बढ़ाती रहती है। यदि कोई नागरिक आन्दोलन पनपता है तो संघ उसे तोड़ने के लिए काम करके मिशनरीज को सहायता पहुंचाता है।
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4. चूँकि इस्लाम के खिलाफ विष वमन करने से ध्रुवीकरण होता है, अत: इसका फायदा संघ को वोटो के रूप में मिलता है, और अपने राजनैतिक संगठन बीजेपी के सत्ता में आने पर संघी उच्च पदों पर विराजमान होकर सत्ता की मलाई खाते है। खट्टर, फड़नवीस, शिवराज, गडकरी आदि तथा खुद मोदी साहेब संघ से ही आये है, और सत्ता के मझौले स्तर पर कितने संघी कहाँ कहाँ घुसे पड़े है कोई हिसाब नहीं।
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नया उदहारण राम माधव का है, जिन्होंने अन्ना आंदोलन के दौरान अपने स्वयंसेवको को लोकपाल क़ानून का समर्थन करने का आदेश दिया था, क्योंकि भारत में लोकपाल क़ानून मिशनरीज़ / बहुराष्ट्रीय कम्पनियो का एजेंडा है अत: तोहफे के रूप में राम माधव संघ से प्रोमोट होकर पार्टी में ऊँचा पद पा गए है। ये आदमी जो तीन साल से MNCs के एजेंडे लोकपाल के समर्थन में मुहीम चला रहा है को दुनिया भर की पंचायत करने की फुर्सत है लेकिन बिगड़ते धार्मिक संतुलन को रोकने के लिए 'टू चाइल्ड पॉलिसी' का कानून लिखने की फुर्सत नहीं है।
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चूंकि समस्या का समाधान सिर्फ कानूनों से ही हो सकता है, अत: संघी समाधान के कानूनों की बात करने की जगह हिन्दुओ को "एक करने और जगाने" जैसे दार्शनिक जुमलो में उलझा कर रखते है। इस से समस्या का समाधान होने की जगह लाखो कार्यकर्ताओ की ऊर्जा और समय नष्ट हो जाता है, जिससे मिशनरीज़ को बढ़त मिलती है।
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भारत का मिडिया मिशनरीज और MNCs के नियंत्रण में है, तथा सभी राजनेतिक दल तथा नेता सकारात्मक कवरेज के लिए पेड मिडिया पर निर्भर है। चूंकि संघ मिशनरीज़ के एजेंडे पर कार्य करता है, अत: सभी पार्टियों के नेता जनता के सामने संघ को हिंदूवादी की छवी में प्रस्तुत करने के लिए उद्धत रहते है। इससे उन पर मिशनरीज़ की कृपा बनी रहती है।
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जैसा कि सभी जानते है बसपा, सपा तथा कोंग्रेस जैसे दल पूरी तरह मिशिनरीज / MNCs के हाथो बिकी हुयी पार्टियां है, अत: मुलायम और दिग्विजय जैसे नेता संघ पर हिन्दुवादी होने के बराबर आरोप लगाते रहते है। दरअसल ये नेता ऐसे बयान देकर संघ को नुकसान नही दे रहे होते है, बल्कि उसकी हिंदूवादी छवी को स्थापित कर रहे होते है। क्योंकि वे जानते है कि मिशनरीज़ / MNCs द्वारा संचालित पेड मिडिया इन बयानों को उछालेगा, जिससे संघ से चिपके स्वयंसेवक इस नशे में गाफिल बने रहेंगे कि संघ हिंदूवादी संगठन है। इस प्रकार पेड मिडिया लगातार संघ के हिंदूवादी छवी को उसी तरह बनाए रखता है, जिस तरह ब्रिटिश पेड मिडिया के माध्यम से करोड़ो नागरिको में ये भरोसा बनाए रखते थे कि मोहन गांधी आजादी की लड़ाई लड़ रहा है।
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दो शब्द दिग्गजों के बारे में जो संघ को कटघरे में खड़ा करते है।
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1. मोहन उर्फ़ दुरात्मा गांधी : अब यह लगभग खुली हुयी बात है कि मोहन गांधी अंग्रेजो के पार्टनर थे तथा अंग्रेजो के शासन को बचाने के लिए अनशन धरनो का नाटक करके टाइम पास कर रहे थे। संघ ने मोहन की इस नीति के विरोध में कभी कोई अधिकृत स्टेंड नही लिया बल्कि अधिकृत तौर पर संघ आज भी उस नराधम के आदर्श का समर्थक है, जिसने भारत को हथियार विहीन करने में मुख्य भूमिका निभायी और नतीजे में विभाजन के दौरान 20 लाख हिन्दुओ को जान से हाथ धोना पड़ा। लेकिन संघ ने अनाधिकृत रूप से गांधी को मुस्लिम-समर्थक बनाने पर कार्य किया, और ध्रुवीकरण करके वोटो की फसल काटी। आप आज भी संघ से पूछ सकते है कि, क्या वो मोहन के राष्ट्रपिता अलंकरण को बनाए रखने का समर्थन करता है, तो जवाब मिलेगा, हाँ। क्योंकि मोहन और संघ दोनों ही अंग्रेजो के लिए कार्य कर रहे थे।
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2. महात्मा राजिव भाई दिक्षित : इनके बारे में ऊपर विवरण दिया जा चुका है। संघ ने इनके भागीरथ कार्यो का विरोध किया, क्योंकि राजिव भाई ब्रिटेन और अमेरिकी सत्ता के बढ़ते नियंत्रण के खिलाफ कार्य कर रहे थे।
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3. महात्मा वीर सावरकर : भारत में हिन्दू राष्ट्र और प्रखर राष्ट्रवाद के दर्शन को स्थापित करने वाले पहले व्यक्ति, जिन्हें अंग्रेजो ने वैचारिक तौर पर अंग्रेजी शासन के लिए सबसे खतरनाक आँका, तथा उन्हें दो बार काले पानी भेजा। संघ ने उनका विरोध किया और उनके एजेंडे को नुक्सान पहुंचाया। विवरण ऊपर दिया जा चुका है।
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4. अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी : इनके बारे में नागरिको को बहुत कम जानकारी है। उधम सिंह जी ने जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के जिम्मेदार गवर्नर ड्वायर को 1940 में लन्दन जा कर फांसी दी थी। यदि आप उधम सिंह जी को विकृत एवं भटके हुए नौजवान की संज्ञा देते है तो आप संघ के सबसे लम्बे समय तक सरसंघ संचालक रहे माधवराव सदाशिव गोलवलकर है। यह लिखने की आवश्यकता नही कि उधम सिंह जी किसके खिलाफ काम कर रहे थे तथा संघ ने उनकी निंदा क्यों की थी।
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5. महात्मा सुभाष चन्द्र बोस : क्या संघ ने कभी सुभाष बाबू को राष्ट्रपिता का अलंकरण दिए जाने की मांग की ? जब सुभाष बाबू हिन्दुओं को हथियारों का प्रशिक्षण देने, सेना में भर्ती होने की मुहीम चला रहे थे, तो संघ ने उनका विरोध क्यों किया। कारण यह था कि सुभाष बाबू अंग्रेजो के खिलाफ बावर्दी सशस्त्र फ़ौज खड़ी कर रहे थे, न कि टाइम पास करने के लिए निकर और लाठी से लेस समूह की।
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6. देवी इंदिरा गांधी : इंदिरा जी ने आपातकाल लगाया था इसकी हम कड़े शब्दों में निंदा करते है, और संघ भी करता है। आपातकाल के लिए इंदिरा जी को माफ़ नही किया जा सकता, संघ भी नही करना चाहता। हालांकि अगले चुनावो में जनता ने इंदिरा जी को फिर से विराट बहुमत देकर उन्हें माफ़ कर दिया था। किन्तु आपातकाल 2 वर्ष के लिए था, इंदिरा जी ने अपने कार्यकाल के शेष 15 वर्ष में क्या किया, इस बारे में संघ कोई बात नही करना चाहता जबकि इस बारे में भी नागरिको को जानकारी दी जानी चाहिए। इंदिरा जी ने भारत की सेना को मजबूत बनाने के लिए युद्ध स्तर पर गतिविधियाँ प्रारम्भ की थी। उन्होंने रॉ का गठन किया, परमाणु बम का निर्माण किया, लड़ाकू विमान तेजस, अर्जुन टेंक निर्माण के प्रोजेक्ट शुरू किये, सेना की संख्या बढ़ाई, पाकिस्तान के दो टुकड़े किये, FDI को अनुमति नही दी, राजाओं के प्रिवीपर्स केंसिल किये, बेंको का राष्ट्रीयकरण किया, राजधानी और शताब्दी ट्रेने शुरू की, पेटेंट के क़ानून को पास करने से इनकार किया, थोरियम पर शोध को आगे बढ़ाया और खालिस्तान मूवमेंट का निस्तारण किया।
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सेना मजबूत करने के प्रयासों के कारण इंदिरा जी के खिलाफ मिशनरीज़ / MNCs लगातार षड्यंत्र कर रही थी, ऐसे में उनके पास दो ही विकल्प थे, --- 1) वे नियंत्रण बनाए रखने के लिए आपातकाल लगाए, 2) ज्यूरी सिस्टम और राईट टू रिकाल कानूनों को लागू करे। दुर्भाग्य से उन्होंने आपातकाल को चुना जो कि उनकी सबसे बड़ी भूल थी। यदि वे ये क़ानून लागू कर देती तो खालिस्तान की समस्या भी शान्ति पूर्ण तरीके से हल हो जाती और उन्हें ब्लू स्टार जैसे हत्याकांड से अपने हाथ नहीं रंगने पड़ते।
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आपातकाल और ब्लूस्टार को छोड़कर इंदिरा जी ने ऐसे कई फैसले किये जिनसे राष्ट्र मजबूत हुआ। बीजेपी एक राजनेतिक पार्टी है, अत: किसी अन्य राजनेतिक पार्टी के नेता की तारीफ़ करना उन्हें राजनेतिक नुक्सान पहुंचाएगा, किन्तु यदि संघ एक "राष्ट्रवादी" संघठन है तो संघ ने इंदिरा जी के इन फैसलों का हमेशा विरोध क्यों किया। इसकी जगह संघ ने अनाधिकृत रूप से इंदिरा जी को मुस्लिम होने से जोड़ा और उनकी इस छवी को उभाड़कर धुर्विकरण द्वारा वोट खींचे। आज भी संघ की आई टी सेल उनके मुस्लिम परस्त होने की सामग्रियों का सोशल मिडिया पर प्रचार करती है, तथा कुछ भ्रमित हिंदूवादी अफीमची उनके बारे में यह जानकारी जन जन तक फैलाने के कार्य में लगे हुए है जिसने पाकिस्तान के दो टुकड़े किये।
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निष्कर्ष यह है कि जो भी व्यक्ति / संगठन मिशनरीज / MNCs के एजेंडे के खिलाफ कार्य करेगा, संघ उनका विरोध करेगा । यदि ऐसे व्यक्ति को मुस्लिमो से जोड़ा जा सकता है तो संघ उन्हें इस्लाम से जोड़कर वोट खींचेगा और खुद के हिंदूवादी संगठन होने का भ्रम खड़ा करेगा।
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भाग- 5
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यह भाग समाधान के बारे में है कि किस तरह हम अपने देश की गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक क़ानून लागू करवा सकते है।
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1990 तक भारत के राजनेतिक दल और नेता एक हद तक खुदमुख्तार थे, लेकिन WTO एग्रीमेंट के बाद स्थिति बदल गयी। बेहिसाब FDI आने से विदेशी कम्पनियों ने भारत की अर्थ और राजनेतिक व्यवस्था में गहरी घुसपेठ बना ली है। आज सभी राजनेतिक दल मिशनरीज़ और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की गुलामी करने को मजबूर है। सभी नेता और राजनेतिक दल सकारात्मक कवरेज के लिए पेड मिडिया पर निर्भर है तथा पेड मिडिया बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और मिशनरीज़ पर निर्भर है। अत: किसी भी नेता को यदि कुर्सी पर बने रहना है तो उसे मिशनरीज़ और MNCs के एजेंडे पर कार्य करना होता है। संघ जैसे संगठन से देशहित में कार्य करने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन संघ के शीर्ष नेतृत्व ने भी अपने अस्तित्व को बचाने और अपनी ताकत बढाने के लिए मिशनरीज़ / MNCs के एजेंडे पर ही कार्य करने को चुना है।
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यदि हमें भारत को मजबूत बनाना है, जो कि सेना को मजबूत बनाए बिना सम्भव नही है, तो हम आम नागरिको को इसके लिए प्रयास करने होंगे। सिर्फ आम नागरिक ही ऐसा करने में सक्षम है, सरकारों, नेताओ, और अन्य विशाल संगठनो से इसकी उम्मीद करना बेमानी है।
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हम आम नागरिक कैसे देश को विकसित और मजबूत बना सकते है ?
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1. नेता-भक्ति बंद करे --- हमे नेता द्वारा पास किये जा रहे कानूनों पर ध्यान देना चाहिए, यदि वो अच्छे क़ानून बनाता है तो समर्थन करे, और बुरे कानूनों की आलोचना करे । इससे नेता पर अच्छे कानूनों को पास करने का दबाव बना रहता है।
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2. पार्टी की क़ानून धारा से जुड़े न कि विचार धारा से --- विचारधाराएँ लागू नही की जा सकती तथा इनकी व्याख्या करने वाला इन्हें अपनी सुविधानुसार बदलता रहता है। पार्टियाँ नागरिको को भरमाने कानूनों से ध्यान हटाने के लिए विचारधाराओं के गुब्बारे छोड़ती रहती है। नागरिको को चाहिए कि पार्टियों से प्रस्तावित कानूनों की मांग करे।
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3. देश को क़ानून चलाते है --- विचारधारा, उपदेश, भाषण, मन की बातें, प्रवचन, सलाहे आदि दर्शन शास्त्र के विषय है, जबकि नारे, आरोप-प्रत्यारोप आदि वोट खींचने के लटके। लेकिन राजनीति दर्शन और लटको का विषय नही है, राजनीति नीति ( क़ानून ) बनाने का विषय है। अत: राजनीति पर सभी प्रकार के विमर्श, बहस आदि कानूनों को केंद्र में ही रख कर करे।
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4. समस्याओं की जगह समाधान पर ध्यान केन्द्रित करे --- सभी दल समस्याओं को उभारकर मतदाताओं को विरोधी दल के प्रति उकसाते है, इससे मतदाता समझता है, कि अमुक दल समाधान पर कार्य कर रहा है। जबकि वो इस और ध्यान ही नही देते कि, समस्या उठाने वाला दल समाधान के लिए क़ानून प्रस्तावित कर रहा है या नही। नागरिको को समस्या की जगह समाधान पर ध्यान देना चाहिए, और राजनीति में सभी समाधान सिर्फ कानूनी ही हो सकते है, शेष सभी टाइम पास करने के पैंतरे है।
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5. मूल विषयों पर ध्यान बनाए रखे --- देश की सेना तथा अर्थव्यवस्था जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों पर ध्यान दे। आज ज़्यादातर कार्यकर्ता अपने नेता की गुणगान और विरोधी नेताओ को गरियाने में अपनी अधिकाँश ऊर्जा और समय खर्च कर रहे है, इस कारण देश की गंभीर समस्याओं के समाधानों पर कार्य नही हो पा रहा है।
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6. पेड मिडिया द्वारा उठाये गए फिजूल मुद्दों पर ध्यान न दें --- भारत का पेड मिडिया MNCs और मिशनरीज़ के नियंत्रण में है, तथा उनका एजेंडा गलत ख़बरें दिखाना नही बल्कि फ़ालतू खबरे दिखा कर जनता का टाइम पास करना है, ताकि मूल समस्याओं और उनके समाधान पर नागरिको का ध्यान नही जाए।
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7. संगठन से जुड़ने की जगह मुद्दों से जुड़े --- जब आप किसी ऐसे संगठन से जुड़ते है जो क़ानून ड्राफ्ट विहीन सिद्धांत पर कार्य कर रहा है, तो आप उस संगठन के लिए कार्य कर रहे होते है न की मुद्दे के लिए। उस संगठन से अमुक मुद्दे के समाधान का ड्राफ्ट मांगे, यदि वह इनकार करे तो ऐसे संगठन को विषयुक्त भोजन समझ कर त्याग दें।
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संघ की दोहरी नीति का समाधान
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क्योंकि संघ के लाखो स्वयंसेवक देश के प्रति समर्पित है, किन्तु नेतृत्व भ्रष्ट है, इसलिए इसका विरोध करने, या नुक्सान पहुंचाना समाधान नही है। यदि संघ का नेतृत्व राष्ट्रवादी रास्ते पर आ जाता है, तो यह संगठन सबसे तेजी से देश की व्यवस्था में परिवर्तन लाने की ताकत रखता है। 60 लाख समर्पित स्वयंसेवको की फ़ौज और 50 हजार शाखाओं का नेटवर्क देश के अन्य किसी भी संगठन के पास नही है।
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1. यदि आप संघ से जुड़े हुए है तो, संघ से उसके द्वारा उठाये जा रहे मुद्दों जैसे राम-कृष्ण-विश्वनाथ देवालय, गौ रक्षा, बांग्लादेशी घुसपेठ, जनसँख्या का बढ़ता असंतुलन, धर्मान्तर, मंदिरों का प्रशासन आदि विषयों के समाधान के लिए प्रस्तावित ड्राफ्ट देने को कहें।
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2. संघ से देश की सेना, अदालतों, अर्थव्यवस्था, भुखमरी, गरीबी, खनन क्षेत्र में भ्रष्टाचार, पुलिस प्रशासन, पेड मिडिया, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का बढ़ता नियंत्रण, स्वदेशी सरंक्षण, गणित विज्ञान की शिक्षा, सरकारी स्कूलों और चिकित्सालयो का गिरता स्तर आदि महत्त्वपूर्ण विषयों पर अपने कानूनी ड्राफ्ट्स देने को कहें।
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3. यदि लाखो स्वयंसेवको द्वारा ऐसी मांग करने पर भी यदि संघ का नेतृत्व इन मुद्दों के कानूनी ड्राफ्ट नही देता है, तो या तो आप स्वयं इन समस्याओं के समाधान के ड्राफ्ट लिखें या किसी अन्य संगठन द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट लें या ड्राफ्ट के लिए राईट टू रिकाल ग्रुप के किसी कार्यकर्ता से संपर्क करके इन सम्बंधित ड्राफ्ट प्राप्त करे, तथा ये ड्राफ्ट संघ को देकर उनसे इन ड्राफ्ट्स का समर्थन करने को कहे । यदि तब भी संघ का नेतृत्व टाइम पास गतिविधियाँ छोड़ कर ड्राफ्ट आधारित एजेंडे को स्वीकार नही करता है तो आप निम्न में से कोई भी विकल्प अपना सकते है।
अ) संघ के नेतृत्व का देश हित में पूरी शक्ति से विरोध करे और उसे एक्सपोज़ करे।
ब) संघ के सरसंघ संचालक की चयन प्रक्रिया के लिए वोटिंग की मांग करे।
*ऐसी चयन प्रक्रिया में संघ के प्रचारक और स्वयंसेवक वोट करके ऐसे सरसंघ संचालक को चुन सकेंगे जो राष्ट्रवादी एजेंडे पर कार्य करे।
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4. राष्ट्रवादी-हिंदूवादी नागरिको को चाहिए कि अपने परिचित स्वयंसेवको से सम्बंधित समस्याओं के ड्राफ्ट देने को कहें, यदि स्वयंसेवक ड्राफ्ट देने से इनकार करते है तो उन्हें अंध-सेवक संबोधित करे और उन्हें एक्सपोज़ करे।
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सनद रहे
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यह उल्लेखनीय नही है कि, बीजेपी, कोंग्रेस, सपा, बसपा, आपा, लेफ्ट, राईट, शिवसेना, नव निर्माण सेना, राजद, बीजद तथा शेष सभी पार्टियाँ और इनके हीरोनुमा नेता चंदो, घूस के लिए और सकारात्मक कवरेज के लिए मिशनरीज़ / MNCs पर निर्भर करते है, अत: मिडिया द्वारा फैलाए हुए इस भ्रम का शिकार होने से बचे कि ये नेता देशहित में कार्य कर रहे है। मोदी से लेकर सोनिया-राहुल और केजरीवाल से लेकर अन्ना-टन्ना तक सभी कुर्सी और पुरूस्कारो के लिए कभी के खुद को दांव पर लगा चुके है। अत: ये सभी बघियार भी देश हित के इन कानूनों का विरोध कर रहे है और यथा शक्ति आगे भी करते रहेंगे।
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सिर्फ आम नागरिक ही देशहित में कार्य कर सकते है। जब कोई आम ख़ास बन जाता है, तो वह भी उतना ही भ्रष्ट हो जाता है, जितना कि अधिकतम हुआ जा सकता है। मान-वृद्धि महंगी वस्तु है।
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कैसे हम आम नागरिक देश में सकारात्मक बदलाव ला सकते है ?
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चरण : 1
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1) कोई भी विषय / समस्या / मुद्दा चुने, जिसका आप समाधान चाहते है।
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2) अमुक समस्या के समाधान के लिए किसी भी संगठन / व्यक्ति / पार्टी से अमुक मुद्दे के समाधान का कानूनी ड्राफ्ट प्राप्त करे।
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3) एक ही विषय पर यदि आप कई ड्राफ्ट जुटा सके तो ज्यादा बेहतर है।
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4) इन ड्राफ्ट्स का अध्ययन करके उनमे से सबसे लोकतांत्रिक और अच्छे ड्राफ्ट को चुने।
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5) यदि आप किसी व्यक्ति / कार्यकर्ता / संगठन / दल से जुड़े हुए है तो उन्हें इस ड्राफ्ट को अपने एजेंडे में शामिल करने को कहें।
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6) यदि अमुक संगठन न तो इसे अपने एजेंडे में शामिल करता है न ही स्वयं कोई ड्राफ्ट देता है, तो उस संगठन को छोड़ दे। यदि वह संगठन क़ानून ड्राफ्ट्स को एजेंडे में शामिल करता है, तो आप ऐसे संगठन से जुड़ने के बारे में फैसला ले सकते है।
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7) अपने ड्राफ्ट्स का नागरिको / कार्यकर्ताओं में मुक्त रूप से प्रचार करे।
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8) अपनी ऊर्जा और समय का एक हिस्सा उन संगठनो को एक्सपोज़ करने में अवश्य लगाए जो देश में अच्छे कानूनों को लागू करने का विरोध कर रहे है, वरना उनकी शक्ति बढ़ती जायेगी, और वे लाखों करोड़ो नागरिको / कार्यकर्ताओं का समय फिजूल गतिविधियों में नष्ट करेंगे, फलस्वरूप राष्ट्रीय ऊर्जा का ह्रास होगा और अच्छे कानूनों का प्रचार करने के लिए कार्यकर्ताओं के पास समय ही नही बचेगा।
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ध्यातव्य है कि, महात्मा भगत सिंह, आजाद और सान्याल जैसे क्रांतिकारी इसीलिए अपने संगठन को नही बढ़ा पाए क्योंकि पूरे देश में जितने भी नौजवान आजादी की लड़ाई में योगदान देना चाहते थे, वे सभी मोहन गांधी के सामने बैठ कर चरखे चला रहे थे। मौजूदा हालात में हिन्दूवाद-राष्ट्रवाद के नाम पर वही तमाशा संघ लाखों कार्यकर्ताओं के साथ कर रहा है।
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चरण : 2 ( सबसे जरुरी )
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1) आप जिस भी क़ानून को देश में लागू कराना चाहते है, उस क़ानून की मांग अपने प्रधानमन्त्री से अवश्य करे। संविधान के अनुसार यह भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपने प्रतिनिधियों को देशहित में आवश्यक आदेश भेजे। प्रतिनिधि ( पढ़े नौकरो ) का एक मात्र कार्य मतदाताओं ( पढ़े मालिकों ) से आदेश प्राप्त करके उनकी पालना करना है। अत: यदि आप प्रतिनिधियों को आदेश नही भेजेंगे तो वे अपनी मर्जी और खुद के फायदे के क़ानून बनायेंगे, आपके और जनता के फायदे के नही।
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प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री को भेजा गया ऐसा आदेश स्पष्ट और अधिकृत होना चाहिए। आदेश को स्पष्ट बनाने के लिए उस क़ानून का ड्राफ्ट या उसका लिंक भेजे, जिस क़ानून को लागू करने की आप मांग कर रहे है, तथा क़ानून ड्राफ्ट के पीडीऍफ़ की sha1 हेश भी लिखें।
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यह क्रिया सबसे महत्वपूर्ण है। आप चाहे अन्य कोई गतिविधि करे या न करे, परन्तु प्रधानमंत्री को ट्विट अवश्य करें।
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प्रधानमंत्री को भेजे जाने वाले ट्वीट का प्रारूप :
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@pmoindia I instruct you to print draft- <https://newindia.in/causes/eiar-2/> sha1- 760246ad1068aa846f5295f717d6eb8a5f15d7a8 #ExpelBanglaInfiltrators
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कृपया ऊपर दिए गए ट्वीट को कॉपी करे तथा अपने ट्विटर एकाउंट से @pmoindia पर ट्वीट करे।
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