> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2017-10-17

Pawan Jury BhilwaraRj

जीएसटी में 5 गंभीर समस्याएं है, जो कि वेल्थ टेक्स में नहीं है :
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१) यह "रिग्रेसिव टेक्स" है - रिग्रेसिव टेक्स का ढांचा इस तरह होता है कि गरीब तबके को सबसे ज्यादा और अमीर वर्ग को सबसे कम टेक्स चुकाना होता है। रिग्रेसिव टेक्स गरीब व्यक्ति को और भी गरीब एवं अमीर व्यक्ति को और भी अमीर बनाता है।
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२) इसमें "मिसिंग ट्रेडर प्रॉब्लम" है - यदि कारोबारी B कारोबारी A से सामान खरीदेगा तो B उसे खरीद पर 28% जीएसटी ( या जो भी दर हो ) चुकाएगा। A यह जीएसटी सरकार में जमा कर देगा और B को इसका इनपुट क्रेडिट मिल जाएगा। लेकिन यदि A यह राशि सरकार में जमा नहीं करता है और धंधा बंद कर देता है तो B को यह राशि सरकार के खाते में फिर से जमा करनी होगी !! अत: इस परिस्थिति से बचने के लिए कारोबारी छोटी इकाइयों से माल लेने से कतराएंगे और वे बड़ी कंपनियों को तरजीह देंगे। इस वजह से छोटे कारोबारी बाजार से बाहर हो जाएंगे और बड़ी कंपनियों का बिजनेस बढ़ेगा।
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३) इसमें "डबल टेक्सेशन ऑन स्मॉल ट्रेडर" प्रॉब्लम है - कम्पोजिट ट्रेडर यदि जीएसटी में पंजीकृत कारोबारी को माल बेचता है तो जीएसटी में पंजीकृत कारोबारी को इनपुट क्रेडिट नहीं मिलेगा। मतलब जीएसटी में पंजीकृत कारोबारी पर डबल जीएसटी आ जाएगा और उसका माल महंगा हो जाएगा। इस वजह से जीएसटी में पंजीकृत ट्रेडर कम्पोजिट कारोबारी से माल नहीं लेंगे। इससे कम्पोजिट ट्रेडर का धंधा सिकुड़ेगा और वे बाजार से बाहर हो जाएंगे। यदि कम्पोजिट ट्रेडर फुल जीएसटी में जाता है तो वह "मिसिंग ट्रेडर प्रॉबल्म" का शिकार हो जाएगा।
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४) यह छोटे कारोबारी की लागत बढ़ाता है - बड़ी कम्पनियो के पास अलग से एकाउंट्स डिपार्टमेंट होता है अत: उन्हें बिल, रिटर्न वगैरह भरने में किसी अतिरिक्त लागत का सामना नहीं करना पडेगा। किन्तु छोटे कारोबारी धंधा भी करते है और टेक्स रिटर्न आदि भी खुद ही भरते है। जीएसटी में प्रति माह रिटर्न फ़ाइल करने होंगे। अब वे खुद इसे करेंगे तो उनके कार्य घंटे कम हो जाएंगे और इसके अलावा कई कारोबारी इन सब पचड़ो को समझते नहीं है। वे इसमें उलझ कर अपनी कार्य क्षमता गँवा देंगे। यदि वे इसके लिए स्टाफ रखते है तो उनकी अतिरिक्त लागत बढ़ जायगी और उन्हें नुकसान होगा। यदि रिटर्न फ़ाइल करने की अवधि को मासिक से बदल कर त्रे मासिक कर दिया जाता है तो मिसिंग ट्रेडर प्रॉब्लम तीन गुना तक बढ़ जायेगी !!
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५) e-way बिल - e-way बिल सिस्टम बहुत ही अव्यवहारिक है, किन्तु यदि इसे लागू नहीं किया गया तो जीएसटी काम ही नहीं कर पायेगा और एक समानांतर आपूर्ति श्रृंखला खड़ी हो जायेगी। और यदि इसे लागू किया गया तो छोटे और मझोले कारोबारियों को बड़े पैमाने पर आर्थिक दंड का सामना करना पड़ेगा और उनके माल की लागत बढ़ जायेगी !!
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कुल मिलाकर जीएसटी में दरो को लेकर कोई समस्या ही नहीं है। दर 10% रखो या 20% , इससे ऊपर दी गयी समस्याओ का समाधान नही होता। अंततोगत्वा टेक्स तो अंतिम उपभोक्ता यानी कि पब्लिक को ही चुकाना होता है, तो दर के कम ज्यादा होने से कारोबारी को कोई विशेष नुक्सान नहीं है। किन्तु पेड मीडिया, पेड अर्थशास्त्रियों एवं राजनैतिक पार्टियों ने जीएसटी दरो को ही मुख्य समस्या के रूप में उछाला है और ऊपर दी गयी बुनियादी एवं खतरनाक समस्याओ को परिदृश्य से गायब कर दिया है। और अब पूरा देश और कारोबारी जीएसटी की दरो को लेकर बहस कर रहे है !!
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तो जीएसटी में बुनियादी गड़बड़ियाँ है। इन्हें सुधारा नहीं जा सकता। जिन जिन देशो में जीएसटी लागू है वहां पर छोटे कारोबारी बाजार से बाहर हो गए और बड़ी इकाइयों ने बाजार पर कब्ज़ा कर लिया। इसे डिजाइन ही इस तरह से किया गया है। समाधान वेल्थ टेक्स है। वेल्थ टेक्स ज्यादा कमाने वाले पर ज्यादा और कम कमाने वाले पर कम टेक्स लगाता है। इसका रिटर्न भी साल में एक दफा भरना पड़ता है, और यह एक प्रोग्रेसिव टेक्स है। सबसे बड़ी बात यह कि जीएसटी जितना रुपया इकठ्ठा करेगा, उससे कहीं ज्यादा रुपया वेल्थ टेक्स से जमा होगा। इससे सरकार की आय बढ़ेगी व हम अपनी सेना का बजट बढ़ा सकेंगे।
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अकेले वेल्थ टेक्स में भारत की पूरी इकोनोमी को दुरुस्त करने की ताकत है। इससे जमीनों की कीमते कम हो जायेगी, जिससे निर्माण इकाईया लगाना एवं कारोबार करना आसान हो जाएगा। आवास की समस्या हल होगी। जीडीपी में तेजी से उछाल आएगा, स्व रोजगार में वृद्धि होगी, गरीबी कम होगी एवं सबसे महत्त्वपूर्ण -- भ्रष्टाचार में कमी आएगी।
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समस्या यह है कि भारत का धनिक वर्ग एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जीएसटी एवं नोटबंदी लाने के एवज में सरकारों को अपना मीडिया और चुनाव लड़ने के लिए नकदी देती है। इसी मीडिया एवं नकदी के बल पर वे चुनाव लड़ते है और उनके प्रचार अभियान की चपेट में आकर जनता उन्हें वोट करती है। इस तरह से धनिक वर्ग एवं नेताओं में सौदा यह ठहरा हुआ है कि -- "तुम हमें इच्छित क़ानून दो , बदले में हम तुम्हे वोट दिलवाएंगे" !! इसका विपरीत भी समझ सकते है -- हम तुम्हे वोट दिलवाएंगे और बदले में तुम उन्ही कानूनों को लागू करोगे जो हम चाहते है !!
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पार्टी और नेता कोई भी हो। इस हम्माम में सभी नंगे है। राष्ट्रवादियो से लेकर छद्म सेकुलर और वामपंथियों से लेकर समाजवादियो तक !!
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तो आपको यह बात समझ लेनी चाहिए कि सिर्फ वोट देने से आपका काम नहीं चलेगा। आपके पास और भी ताकत होनी चाहिए। यदि आपके पास अपने नेताओं को नौकरी से निकालने का अधिकार हो तो यह एक अतिरिक्त ताकत होगी। तब चुनाव जीतने के बाद यदि नेता प्रजा-विरोधी क़ानून लागू करता है तो नागरिक उन्हें 5 साल से पहले ही नौकरी से निकाल सकते है।
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या फिर आपके पास राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष का क़ानून होना चाहिए। इस क़ानून के आने से दूरदर्शन इतना शक्तिशाली हो जाएगा कि निजी न्यूज चेनल्स के दर्शको की संख्या नाटकीय रूपस गिर जायेगी। इस तरह मुख्य धारा का मीडिया नागरिको के नियन्त्रण में आ जायेगा और धनिक वर्ग की सौदेबाजी करने की ताकत घट जायेगी। यह ताकत घटने से वे नेताओं को चुनाव जीतवाने की क्षमता खो देंगे और नेता उनके चंगुल से आजाद हो जायेंगे।
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हमने वेल्थ टेक्स का कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। इसे फिर से अद्यतन किया जा रहा है। जल्दी ही हम इसका परिवर्धित एवं अपडेटेड संस्करण उपलब्ध करवाएंगे। राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष एवं राईट टू रिकॉल पीएम का ड्राफ्ट इस लिंक पर देखा जा सकता है - <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/563544197157112>;
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"वेल्थ टेक्स ग्रुप"
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