> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2017-10-29

Pawan Jury BhilwaraRj

कैसे मिशनरीज हिन्दू धर्म को विघटित कर रही है, और कैसे इसे रोका जा सकता है ?
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अध्याय
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(1) मिशनरीज की कार्य शैली
(2) प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव
(3) धार्मिक व्यवस्था में आने वाले बदलाव
(4) मंदिरों पर प्रहार
(5) मठ, आश्रम , डेरे एवं विभिन्न सम्प्रदाय
(6) समाधान
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(1) मिशनरीज की कार्य शैली
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वे धर्मान्तर के लिए सेवा कार्यो का इस्तेमाल करते है। स्कूलो एवं अस्पतालो का संचालन उनकी मुख्य गतिविधि है। धर्मान्तर मुख्यतया दो तरीको से किया जा सकता है -- a ) बल प्रयोग द्वारा , b) सेवा कार्यो द्वारा। सेवा कार्यो के माध्यम से बेहद आसानी से अहिंसक रूप से धर्मांतरण किया जा सकता है। शांति के साथ। और ऐसा धर्मांतरण पूरी तरह से कानूनी एवं स्वैछिक होता है। सेवा कार्यो के लिए विराट संसाधनों की जरूरत होती है। मिशनरीज को ये संसाधन बहुराष्ट्रीय कम्पनियो से प्राप्त होते है। CSR ( corporate social responsibility ) के रूप में। इस तरह किसी देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मजबूत होने से मिशनरीज भी ताकतवर होती चली जाती है।
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अमीर एवं मध्य वर्ग का धर्मांतरण सेवा कार्यो द्वारा नहीं किया जा सकता। वे खुद का खर्चा स्वयं उठा लेते है। किन्तु यदि किसी इलाके में गरीबी है तो स्कूल एवं अस्पताल सबसे बुनियादी आवश्यकताएं है। जिस संस्था के पास स्कूलों / अस्पतालों पर नियंत्रण होगा उस क्षेत्र के गरीब तबके के लोगो का समुदाय अमुक संस्था से जुड़ जायेगा। तीसरा बिंदु गरीबो को खाना खिलाना है। इसके अलावा वे धर्म को तोड़ने के लिए नेताओं, जजों , कलाकारों, अभिनेताओं , पत्रकारों, संपादको, स्तम्भकारो आदि का भी इस्तेमाल करते है। शान्ति पूर्वक धर्मान्तर करने का यह मॉडल बेहद सफल है और मिशनरीज फिलिपिन्स एवं साउथ कोरिया में इसे सफलतापूर्वक निष्पादित कर चुकी है। भारत में यह मॉडल तेजी से लागू हो रहा है।
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कृपया पूर्वोत्तर राज्यों की धार्मिक जनसँख्या वृद्धि दर पर गूगल करें। पिछले 30 साल में मिशनरीज पूर्वोत्तर के ज्यादातर इलाके को धर्मांतरित कर चुके है। उनका अगला निशाना पंजाब और हरियाणा है। राम रहीम जी के डेरे को उखाड़ देने के बाद पंजाब एवं हरियाणा में मिशनरीज के लिए कोई बाधा नहीं रही है। अत: पंजाब एवं हरियाणा में अब मिशनरीज बेहद तेजी से धर्मांतरण कर सकेगी।
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भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियो ने 1991 में आना शुरू किया था ( एफडीआई के माध्यम से )। 2002 से इस गति में और भी तेजी आयी। तब से सभी क्षेत्रो में लगातार उनकी आवक बढ़ रही है। जब किसी देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियो एवं मिशनरीज का नियंत्रण बढ़ेगा तो अंततोगत्वा आपको अमुक देश की प्रशासनिक व्यवस्था एवं धार्मिक व्यवस्था में निम्नलिखित बदलाव देखने को मिलेंगे :
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(2) प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव :
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सरकारी स्कूलों एवं अस्पतालों का तेजी से निजीकरण होगा एवं सरकारी स्कूलों / अस्पतालों की दशा बदतर होती चली जायेगी।

स्कूलों / अस्पतालों का निजीकरण गरीब और समृद्ध के बीच छंटनी कर देता है। निजीकरण इसीलिए किया जाता है ताकि मध्य वर्ग को विकल्प दिया जा सके। यदि बिना निजीकरण किये सरकारी स्कूलों / अस्पतालों को बदतर कर दिया गया तो मध्यवर्ग के पास विकल्प नहीं बचेगा और वे आंदोलन कर देंगे। जब सरकारी स्कूलों / अस्पतालों को बदतर किया जाता है तो मध्यवर्ग निजी स्कूलों / अस्पतालों में शिफ्ट हो जाता है और गरीबों के हिस्से में बदहाल सरकारी स्कूल अस्पताल रह जाते है। सुदूर ग्रामीण इलाकों में , आदिवासी क्षेत्र में , सीमावर्ती क्षेत्र में, रिमोट एरिया में , गरीब एवं पिछड़े हुए इलाको आदि में निवास करने वाला वर्ग सरकारी स्कूलों / अस्पतालों के बदहाल होने एवं निजी स्कूलों / अस्पतालों के महंगा होने से शिक्षा / चिकित्सा से वंचित हो जाता है या उन्हें इसके ऊँचे दाम चुकाने होते है।
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ऐसी स्थिति में मिशनरीज के लिए इन इलाको में जाकर अस्पताल एवं स्कूल खोलने का रास्ता तैयार हो जाता है। वे वहां जाकर अस्पताल / स्कूल एवं चर्च चलाते है। इस संचालन द्वारा पादरी वगेरह स्थानीय समुदाय में अपनी पकड़ बना लेते है। वंचित तबके की मिशनरीज के प्रति सहानुभूति बढ़ जाती है और वे इनके प्रति सह्रदय हो जाते है। अब यदि आप ऐसे किसी इलाके में जाएंगे तो आप इनकी प्रशंशा ही करेंगे। क्योंकि आप पाएंगे कि चर्च असहाय तबके को दवाइयाँ / शिक्षा दे रहा है और उन्हें खाना खिला रहा है। किन्तु इस एस्टाब्लिशमेंट के बाद वहां बेहद तेजी से धर्मांतरण होते है। वे पूरे के पूरे इलाके / गांव / कबीले / क्षेत्र को धर्मांतरित कर देते है।
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तो उन्हें अपने स्कूल एवं अस्पताल खोलने के लिए एक रिक्त स्थान चाहिए। सरकारी स्कूल एवं अस्पतालों के होते हुए यह रिक्त स्थान मिलना मुमकिन नहीं है। अत: जिस भी देश में मिशनरीज अपना प्रभाव बना लेती है वहां के राजनेताओ को प्रलोभित करके या दबाव में लाकर ऐसे कानूनों को लागू करने के लिए बाध्य करती है जिससे सरकारी स्कूलों एवं अस्पतालों की दशा बदतर होती चली जाए और निजी क्षेत्र में भी इसके ऊँचे दाम चुकाने पड़े।
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क्या भारत में आप यह देख पा रहे है कि क्रमिक रूप से दवाइयाँ / चिकित्सा / शिक्षा आदि लगातार महंगी होती जा रही है ?

यदि आपकी आयु 30 वर्ष से कम है तो अपने वरिष्ठजनो से बात करके यह मालूम करे कि सन 2002 से पहले तक सरकारी स्कूलों / अस्पतालों का अनुपात निजी स्कूलों / अस्पतालों के मुकाबले में क्या था, एवं इनमे पढाई / चिकित्सा का स्तर कैसा था।

पता लगाइये कि पिछले 15 सालो में विभिन्न राज्यों एवं केंद्र की सरकारों ने सरकारी शिक्षा / चिकित्सा तोड़ने के लिए किन किन कानूनों को पास किया है और इन्हे बेहतर बनाने के लिए आवश्यक किन किन कानूनों को लागू करने की अवहेलना की है ?
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काम की बात -- यदि किसी देश में मिशनरीज जायेगी तो शिक्षा / चिकित्सा महंगी होगी , सरकारी स्कूलों / अस्पतालों का हाल बदतर होगा। यदि किसी देश में लगातार सत्ता परिवर्तन के बावजूद सरकारी स्कूलों / अस्पतालों की अवस्था में सुधार नहीं आ रहा है और यह दोनों सेवाएं निजी क्षेत्र पर टिकी हुयी है तो आपके दिमाग में संदेह के बादल तुरंत घुमड़ने चाहिए।
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अन्य व्यवस्थागत बदलाव - बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं मिशनरीज का प्रभाव बढ़ने के साथ ही "स्वदेशी स्थानीय छोटी एवं मझौली निर्माण इकाइयों" की संख्या मं कमी आएगी। स्वरोजगार घटेगा एवं नौकरी पेशा लोगो की संख्या में वृद्धि होगी। प्राथमिक तौर पर बेरोजगारी / महंगाई घटेगी लेकिन दूसरे चरण में बेरोजगारी एवं महंगाई बढ़ेगी। जमीनों के दाम बढ़ेंगे। गैर सरकारी संगठनों की संख्या एवं उनकी गतिविधियां बढ़ेगी। कृषि का दायरा लगातार सिकुड़ेगा , शहरीकरण बढ़ेगा। आयात लगातार बढ़ेगा एवं निर्यात गिरेगा। आरक्षण जैसे मुद्दों पर जातिगत अलगाव बढेगा। लेकिन विभिन्न व्यवस्थागत बदलावों के अंतिम नतीजे में गरीबी बढ़ेगी एवं श्रम सस्ता होगा। क्योंकि गरीबी न होने से धर्मांतरण करना बेहद मुश्किल हो जाता है। इस लेख में इन गैर धार्मिक बिन्दुओ पर विवरण नहीं रखा गया है। सिर्फ उन मुख्य बिन्दुओ को ही शामिल किया गया है जिनका सीधा सम्बन्ध धर्मांतरण से है।
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धर्म की प्रकृति एवं इसकी आवश्यकता ?
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धर्म दुनिया में सबसे पुरानी संस्था है। सभी सभ्यताओं में धर्म एक अनिवार्य तत्व रहा है। यदि किसी सभ्यता में प्रचलित धर्म कमजोर हो जायेगा तो अन्य ताकतवर धर्म उनके अनुयायियों को अपनी तरफ खींच लेगा, या फिर नए किसी धर्म का उदय होगा। किन्तु धर्म आदि काल से हर समय रहा है और बना हुआ है। वजह ?
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धर्म के दो आयाम है : १) मीमांसा २) परोपकार
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मीमांसा - धर्म क्या कहता है, धार्मिक ग्रंथो में क्या लिखा है, धर्म का उपदेश, उत्सव , धार्मिक शिक्षाएं, धर्म-अधर्म, पाप एवं पुण्य , कर्म फल , जन्नत-जहन्नुम , सृष्टि क्या है , किसने इसे रचा है , सत्य क्या है, इसका मालिक कौन है , माया , शैतान एवं फ़रिश्ते , इल्म, धर्म का तत्व और दर्शन क्या है आदि आदि तरह के विषयो पर विचार एवं उपदेश करना धर्म की मीमांसा है।
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धर्म की मीमांसा व्यक्ति को मानसिक / आध्यात्मिक खुराक मुहैया कराती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में आर्थिक / मानसिक / शारीरिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, और परिस्थितियों के विकट होने पर उसे मानसिक सम्बल की जरूरत होती है। धार्मिक उपदेश ऐसे समय में उसे सहारा देते है। इस तरह टूटे हुए व्यक्ति के लिए धर्म एक प्रकार से मनोचिकित्सक का काम करता है। यह जिज्ञासुओ की ज्ञान की भूख का शमन भी करता है। इसके अतिरिक्त जब व्यक्ति लौकिक जगत में सफल हो जाते है तो अपना परलोक सुधारने और अपने पापो का प्रायश्चित करने के लिए भी धर्म कार्यो की शरण ले लेते है। मानव सामजिक प्राणी है। धर्म सबसे आदि समाज है। धार्मिक उत्सव मानवो को सामुदायिक आमोद प्रमोद एवं मनोरंजन प्रदान करते है और एक समुदाय के रूप में उनमे प्रेरणा का संचार होता है। इस तरह धर्म विभिन्न वर्ग एवं श्रेणी के मनुष्यो को उनकी आवश्यकता के अनुसार पूर्ती देता है।
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परोपकार - यह धर्म का वह निर्णायक तत्व है जो धर्म को टिकाये रखता है और उसे मजबूती प्रदान करता है। यदि किसी धर्म की धार्मिक संस्थाएं परोपकार के कार्य करती रहेगी तो ऊपर दी गयी मीमांसा करने के अवसर बने रहेंगे। यदि परोपकार घट जायेगा तो जिस धर्म की धार्मिक संस्थाएं ज्यादा परोपकार कर रही है वह धर्म अमुक धर्म के वंचित तबके को अपनी और खींच लेगा। ऐतिहासिक रूप से यह सिद्ध है कि, जिस धर्म की धार्मिक संस्थाओ ने परोपकार के कार्य किये उनका विस्तार होता गया और जिन्होंने अपनी शक्ति सिर्फ मीमांसा पर जाया कि वे सिकुड़ते चले गए। परोपकार कार्यो के अभाव में सिर्फ एक शर्त पर ही धर्म टिका रह सकता है -- यदि उसे किसी प्रतिद्वंदी धर्म का सामना नहीं करना पड़े। जिस धर्म की धार्मिक संस्थाओ का प्रशासन बेहतर होता है उन धर्मो में परोपकार के कार्यो में वृद्धि होती है। अत: मजबूत प्रशासन वाला धर्म कमजोर प्रशासन वाले धर्म के अनुयायीओ पर कब्ज़ा कर लेता है।
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मीमांसा की दृष्टी से सारे धर्म उपदेशक, पीर फ़क़ीर, पादरी, संत, स्वामी, महर्षि आदि कवि और कहानी कार है। और इनके मुखारविंद से निकली गयी कहानियों और कविताओं से धर्म के टिके रहने या नष्ट हो जाने का कोई लेना देना नहीं है। ये लोग समय समय पर आते है और अपने प्रवचन देकर चले जाते है।
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किन्तु इन कथित धर्म गुरुओ में से ही कभी कभी कोई उपदेशक श्रद्धालुओं पर अपना प्रभाव छोड़ कर दान खींचता है और इस दान से ऐसी व्यवस्था कायम कर देता है जिससे अमुक धर्म में परोपकार के कार्यो में तेजी आ जाती है। कुछ इससे भी आगे बढ़ जाते है और ऐसी व्यवस्था रच देते है जिससे उनके मर जाने के बाद भी अमुक संस्था / धर्म में दान आता रहता है और परोपकार के कार्य होते रहते है। ऐसे लोग सही अर्थो में धर्म को मजबूत बना देते है।
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तो इस तरह धार्मिक संस्थाएं एवं धर्म समाज में परोपकार के कार्य करने व व्यक्तियों को मनोवैज्ञानिक आश्रय देने का कार्य करते है।
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(3) धार्मिक व्यवस्था में आने वाले बदलाव :
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महत्त्व्पूर्ण बात - आवश्यक इकाइयों जैसे अस्पताल / स्कूल आदि का सरकारी ढांचा टूटने के बाद अगली एवं अंतिम बाधा धार्मिक संस्थाएं होती है। किसी धर्म के अनुयायियों को बड़े पैमाने पर धर्मांतरित तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक स्थानीय धर्म की संस्थाओ को कमजोर न किया जाए। जिस तरह खाना उसे ही खिलाया जा सकता है जो भूखा हो और आप पर आश्रित हो उसी तरह से धर्मांतरण के लिए भी पहले स्थानीय धर्म की संस्थाओ को तोडना होता है। यदि स्थानीय धार्मिक संस्थाओ का क्षरण नहीं किया गया तो अनुयायी अपने धर्म से चिपके रहेंगे और धर्मांतरण नहीं हो पायेगा।
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दूसरा पहलु यह है कि धर्म एक आदि संगठन है। सरकारों एवं शासको के उदय होने से काफी पहले भी धार्मिक संस्थाएं समाज को प्रबंधित करती थी। जब राजा / प्रशासन किसी मानविक-सामाजिक कल्याण के विषय को प्रबंधित नहीं करता तो धार्मिक संस्थाऐं इसकी क्षति पूर्ती करती रही है। उदाहरण के लिए सरकार यदि किसी व्यक्ति को वस्त्र या भोजन नहीं देती तो परोपकार करने वाले धार्मिक संस्थान इसकी आपूर्ति कर देते है। इस तरह से किसी भी देश का कोई शासन / राजा धार्मिक संस्थाओ की कमी को पूरा नहीं कर सकता। किन्तु धार्मिक संस्थाएं उन कल्याणकारी कार्यो की पूर्ती करती है जिसकी शासन / राजा द्वारा अवहेलना की गयी है।
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कैसे स्थानीय धार्मिक संस्थाएं मिशनरीज का रास्ता रोक देती है ?

हिन्दू धर्म के संदर्भ में धार्मिक संस्थाओ के दो वर्ग है -- १) मंदिर , २) मठ, आश्रम , डेरे एवं विभिन्न सम्प्रदाय
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मंदिर क्या करते है ?
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बुनियादी रूप से ये सभी मंदिर दान प्राप्त करते है, और प्राप्त हुए इस दान से वे स्कूल चलाते है, अस्पताल चलाते है , दवाइयों का वितरण करते है, गरीबो को खाना खिलाते है , वस्त्र बांटते है , कथाएं आयोजित करवाते है , धार्मिक आयोजन करते है और इसी प्रकार की अन्य धार्मिक / परोपकारी गतिविधियां करते है। चूंकि मंदिर इस तरह की गतिविधियां करते है, इसीलिए श्रद्धालु इन्हे दान देते है। जब तक किसी धर्म की संस्थाएं परोपकार के कार्य करती रहेगी तब तक अन्य धर्म को अपनी जड़े जमाने का अवसर नहीं मिलेगा।
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किन्तु ! किन्तु भारत के ज्यादातर मंदिर दान का उपयोग परोपकार कार्यो और धर्म को मजबूत बनाने वाली गतिविधियों में नहीं करते है !! बल्कि वे दान का संग्रहण करने लगते है !! और यह हिन्दू धर्म को समेट कर रख देने की अकेली वजह बन रहा है।
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हिन्दू मंदिरो की तुलना गुरुद्वारों एवं चर्च से करे। पता लगाए कि क्या मंदिर उतने परोपकार के काम कर रहे है जितने कि गुरूद्वारे करते है। ज्यादातर गुरुद्वारों में लंगर चलते है। किन्तु कितने मंदिर प्राप्त दान में से खाना / दवाइयाँ बांटना / स्कूल / अस्पताल चलाना आदि गतिविधियां करते है ? आप पाएंगे कि मंदिरो की तुलना में गुरुद्वारों में दान से प्राप्त राशि का ज्यादा सदुपयोग किया जाता है। अकूत दान प्राप्त करने के बावजूद मंदिर परोपकार के कार्यो में पिछड़े हुए है। वजह ?
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वजह यह है कि -- मंदिर प्रमुख की नियुक्ति में विरासत व्यवस्था का पालन किया जाता है। और दान का इस्तेमाल कैसे किया जायेगा यह तय करने का अधिकार सिर्फ मंदिर प्रमुखों / ट्रस्टियो के पास होता है। इन्हे ये स्वामित्व विरासत से मिलता है और आगे भी इनके वारिसान को स्थानांतरित होना होता है। सैकड़ो सालो से यही परम्परा है। इस वजह से वे दान से प्राप्त राशि के एक बड़े हिस्से का इस्तेमाल तड़क-भड़क , विलासिता एवं ऐश्वर्य के प्रदर्शन मंर करते है। एक हिस्से का ट्रस्टी गबन कर लेते है और एक हिस्से का मंदिर के नाम से संग्रहण कर लेते है। और फिर भी कुछ बचता है तो निमित्त के लिए इनका इस्तेमाल परोपकार के कार्यो में करते है !!! श्रद्धालुओं या दान देने वालो के पास ऐसा कोई तरीका नहीं है कि वे इन्हे रोक सके या दान से प्राप्त राशि के उपयोग के बारे में निर्देश दे सके।

यह भी उल्लेखनीय है कि सभी मंदिरो में यह हाल नहीं है। कुछ मंदिर दान से प्राप्त संपत्ति का सदुपयोग भी करते है। लेकिन ऐसे मंदिरो की संख्या लगातार गिरती चली गयी और तेजी से गिरती चली जा रही है।
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सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पेड मीडिया ने मंदिरों के इस दोषपूर्ण प्रशासन को उछाला और जनता के मानस में यह स्थापित किया कि हिन्दू मंदिर भ्रष्टाचार के केंद्र है। फिर उन्होंने सरकार में बैठे नेताओं को घूस देकर मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लेना शुरू कर दिया। आज भारत के अधिकतर बड़े मंदिर सरकार अधिगृहित कर चुकी है। इस अधिग्रहण के बाद मंदिर पूरी तरह उनके कब्जे में है और वे बहुत ही सधे और धीमे तरीके से मंदिरों को तोड़ रहे है।
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विरासत व्यवस्था होने और श्रद्धालुओं का दखल न होने के कारण पुजारियों को मंदिरो पर पूर्ण स्वामित्व मिला और इसका सबसे मारक दुष्प्रभाव यह आया कि वे प्राप्त दान का उपयोग परोपकार के कार्यो में करने की जगह इसका संग्रहण करने लगे, तथा श्रधालुओ का मंदिर प्रशासन पर कोई नियंत्रण न होने के कारण मंदिरो में "सार्वजनिक" रूप से छुआछूत और भेदभाव पनपा। इससे दलितो एवं पिछड़े हुए तबके का मंदिरो से मोहभंग हो गया। दान का दुरूपयोग एवं भेदभाव के कारण मंदिर दानदाता व गरीबों का समर्थन खोने लगे। ऊंच नीच एवं भेदभाव ने दलितों / पिछड़ो को मंदिरो से दूर किया।
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सिक्खो में विरासत परम्परा न होने और गुरुद्वारों का प्रबंधन SGPC एक्ट द्वारा होने के कारण प्राप्त दान का ज्यादातर उपयोग परोपकार के कार्यो में हुआ और आज भी होता है। SGPC एक्ट आने से पहले भी सिक्खो में गुरुद्वारों में विरासत परम्परा नहीं थी और श्रद्धालुओं के पास अपने गुरुद्वारों के ग्रंथि को चुनने का अधिकार था। आजीवन स्वामित्व न होने के कारण और चुनाव प्रक्रिया की वजह से गुरुद्वारों ने दान से प्राप्त सम्पति का ज्यादातर इस्तेमाल परोपकार के कार्यो में किया। ब्रिटिश ने जब सिक्खो के धार्मिक प्रबंधन को तोड़ने का प्रयास किया तो सिक्खो ने आंदोलन करके ब्रिटिश शासन को SGPC एक्ट लागू करने के लिए बाध्य कर दिया था। इसी तरह मस्जिदों एवं चर्च में भी विरासत व्यवस्था नहीं होने से वे ज्यादा परोपकार के कार्य कर पाए, और उनके धर्म का विस्तार हुआ। 1970 से SGPC एक्ट का प्रबंधन कमजोर होने लगा और यह लगातार कमजोर होता जा रहा है।
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पता लगाइये - 1925 में लागू SGPC एक्ट में क्या प्रशासनिक कमियां थी और 70 के दशक से गुरुद्वारा प्रबंधन में क्या बदलाव आये जिससे दलित सिक्ख गुरुद्वारों से दूर होते चले गए ?
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(4) मंदिरों पर प्रहार :
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महत्त्वपूर्ण बात - यदि मंदिरों में दान आता रहेगा और वे छिटपुट परोपकार के कार्य करते रहेंगे तब भी मंदिरों द्वारा किये जाने वाले इन परोपकार के कार्यो में एकदम से तेजी आ जायेगी जब मिशनरीज अपनी गतिविधियाँ बढाने लगेगी। स्कूलों / अस्पतालों / दवाइयों / खाने की समस्या आने पर मंदिर इन गतिविधियों को संचालित करने लगेंगे और मिशनरीज के अवसर ख़त्म हो जायेंगे। इसीलिए मिशनरीज के लिए यह जरुरी है कि इनके ढाँचे को बेहद कमजोर कर दिया जाए। विरासत परम्परा होने के कारण मंदिरों का प्रशासन पहले से ही बदतर था / है । अत: इसे तोड़ने के लिए किसी प्रकार के अतिरिक्त प्रयासों की आवश्यकता नहीं है। यदि मिशनरीज को भारत में अपनी जगह बनानी है तो उसे सिर्फ दो काम करने है :

अ ) उन्हें यह सुनिश्चित करना है कि मंदिरों के प्रशासन में किसी तरह का सुधार न आये। यदि ऐसे क़ानून लागू कर दिए जाते है जिनसे मंदिरों का प्रबंधन सुधरे, तो अंततोगत्वा दान में तेजी आएगी एवं परोपकार के कार्यो में इजाफा होने लगेगा। अत: यथास्थिति मिशनरीज के अनुकूल है।

पता लगाइए कि पिछले 20 वर्षो में किसी भी राज्य सरकार ने या केंद्र सरकार ने ऐसे कितने कानूनों को पास किया है जिससे मंदिरों का प्रशासन सुगठित हो ?
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ब ) उन्हें यह सुनिश्चित करना है कि हिन्दूओ का धार्मिक जमाव* टूटे एवं मन्दिरों में आने वाले दान में कमी आये।
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(*) धार्मिक जमाव - विभिन्न धार्मिक उत्सवो जैसे डांडिया-गणपति-माताजी स्थापना आदि में श्रद्धालु बड़ी संख्या में इकठ्ठे होते है, कथाओं एवं प्रवचनों का आयोजन किया जाता है, धार्मिक मेलो जैसे कुम्भ आदि में बड़ी संख्या में लोग भाग लेते है, धार्मिक जुलुस, धार्मिक यात्राएं आदि तथा ऐसी सभी गतिविधियाँ धार्मिक जमाव की श्रेणी में शामिल है। उत्सवो एवं त्योहारों पर मंदिरागामी लोगो की संख्या में इजाफा होना भी धार्मिक जमाव है। धार्मिक जमाव की किसी धर्म को टिकाये रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह समुदाय के जुड़ाव में सीमेंट में काम करता है। उदाहरण के लिए इस्लाम को ताकत धार्मिक जमाव से ही आती है। ( जुम्मे को एक निश्चित समय पर नमाज अदा करने के लिए एकत्र होना धार्मिक जमाव है )
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धार्मिक जमाव तोड़ने एवं दानदाताओं को हतोत्साहित करने के लिए वे मीडिया का एवं नेताओं / अभिनेताओ / कलाकारो / लेखको का इस्तेमाल करते है। नेताओं को ऐसे बयान एवं उपदेश देने के लिए प्रेरित / प्रलोभित / बाध्य किया जाता है जिससे धार्मिक जमाव में कमी आये। अभिनेताओं से वे ऐसा फिल्मो के माध्यम से एवं लेखको / कलाकारो से वे ऐसा उनकी कृतियों के माध्यम से करवाते है। जहां ये दोनों वर्ग असफल रहते है वहां वे जजों का इस्तेमाल करते है। इसे फिर से पढ़िए -- जहां नेता / अभिनेता / कलाकार / लेखक आदि असफल रहते है वहां वे जजों का इस्तेमाल करते है। जो व्यक्ति इनके एजेंडे पर अमल करता है उसे मीडिया में सकारात्मक कवरेज दिया जाता है। जिससे उसके प्रशंषको / समर्थको की संख्या बढती है और उनका कैरियर चमक उठता है।
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वे धार्मिक जमाव एवं दान को किस तर्क से हतोत्साहित करते है ?

वे इसके लिए "विज्ञान एवं तर्क" का सहारा लेते है। यहाँ यह समझना जरुरी है कि विज्ञान एवं तर्क का आस्था एवं विश्वास से कोई लेना देना नहीं है। धर्म आस्था है। और यह अध्यात्म से , परलोक से , मानसिक शान्ति से, मान्यता से एवं मनोविज्ञान से जुड़ा हुआ है। जबकि विज्ञान का सरोकार भौतिक जगत से व तर्क का सरोकार व्यवहारिकता व लाभ / हानि से होता है। यदि आप धर्म को व्यवहारिकता एवं वैज्ञानिक कसौटी पर कसेंगे तो दुनिया के सारे धर्म उड़ जायेंगे। किसी भी धर्म को विज्ञान एवं तर्क पर नहीं परखा जा सकता। लेकिन श्रधालुओ को चकमा देने के लिए वे ऐसा ही करते है।
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आपको ओह माय गॉड , पीके, सिंघ्म रिटर्न जैसी फिल्मे देखने को मिलेगी जिनमे तर्क के आधार पर यह स्थापित किया जायेगा कि मंदिरों में दान देना पैसे का दुरूपयोग करना है !! और इसके लिए वे वाजिब तर्क भी देंगे। वे आपको बताएँगे कि शिवलिंग पर चढ़ाया जाने वाला दूध बर्बाद हो रहा है। यह "तर्क" युवाओ को महाशिवरात्रि पर मंदिर जाने से रोक देगा और धार्मिक जमाव में कमी आएगी।

फिल्में मूर्ती पूजा करने वाले को बेवकूफ बताएगी एवं मंदिर जाने वालो के लिए कहेगी कि - जो डर गया वह मंदिर गया। इससे युवा मंदिर जाने को अवैज्ञानिक एवं दकियानूसी मानने लगेंगे और मंदिरो के धार्मिक जमाव में कमी आएगी। इन फिल्मो में सभी साधुओ / संतो आदि का चरित्र अय्य्याश एंव लम्पट बताया जाएगा। इन्हे बार बार टीवी पर दिखाया जाएगा एवं विभिन्न नेता इनका प्रमोशन करेंगे। समाज में समग्र तस्वीर इस तरह की बनेगी जिससे अगली पीढ़ी में मन्दिरगामी श्रद्धालुओं की संख्या में कमी आये। मंदिर गामी श्रद्धालुओं की संख्या में कमी आने से धार्मिक जमाव कम होगा और अंतत: दान में कमी आएगी। दान में कमी आने से मंदिर पंगु हो जायेंगे।
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धार्मिक उत्सवों को नीरस बनाने एवं इनमे जमाव कम करने के लिए विभिन्न नेता / अभिनेता वगैरह इस तरह के "तार्किक" सन्देश देंगे -- जल विहीन होली खेलकर हमें पानी बचाना चाहिए !! दिवाली पर की जाने वाली आतिशबाजी से प्रदूषण होता है !! जन्माष्टमी पर दही हांडी प्रतियोगिता से प्रतिभागियों की जान को खतरा है !! गणेश चतुर्थी पर ध्वनि प्रदुषण होता है , अत इसे शोर मुक्त होना चाहिए !! जल्लीकटू से बैलो का उत्पीड़न होता है !! तथा विभिन्न मीडिया समूहों में इन संदेशो को प्रमुखता से बार बार प्रसारित किया जाएगा। जो कलाकार / नेता ऐसी बातों को प्रोत्साहित करेंगे उन्हें मीडिया में सकारात्मक कवरेज दिया जाएगा। इसी क्रम में "साइलेंट गरबा" एवं दशहरे पर "धूम्रविहीन आतिशबाजी" नयी प्रवृतियां है।
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कुल मिलाकर नेता / अभिनेता / कलाकार / समाज एवं धर्म सुधारक आदि हिन्दू धर्म की व्यवस्था में मौजूद दोषों को दुरुस्त करने के लिए आवश्यक प्रशासनिक सुधारों की कभी भी बात नहीं करेंगे बल्कि वे इन दोषों की आड़ लेंगे और फिर इस प्रकार के सन्देश देंगे जिससे पूरी धार्मिक व्यवस्था पर आघात आये।
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(5) मठ, आश्रम , डेरे एवं विभिन्न सम्प्रदाय :
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भारत के मंदिरों का प्रशासन कमजोर होने के कारण विभिन्न सम्प्रदायों एवं गुरुओ आदि का उद्भव हुआ। उन्होंने धर्म से सम्बंधित उन गतिविधियों की पूर्ती करने का प्रयास किया जिन्हें मंदिर नहीं कर रहे थे। किन्तु भारत में इन्हें प्रबंधित करने का कोई क़ानून न होने के कारण मंदिरों स इतर इन विभिन्न धार्मिक संस्थाओ ने भी दान से प्राप्त होने वाली संपत्ति का उतना बेहतर उपयोग नहीं किया। लेकिन फिर भी यह तथ्य है कि मंदिरो की तुलना में इनका प्रदर्शन काफी बेहतर है और इन्होने हिन्दू धर्म को विघटित होने से काफी हद तक बचाये रखा।
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राम रहीम गुरमीत जी , श्री आसाराम जी बापू, कबीर पंथी श्री रामपाल जी , श्री श्री रविशंकर महाराज आदि संतो ने अपने असाधारण कार्यो से इस बात को सुनिश्चित किया कि गरीब / दलित / ओबीसी आदि मिशनरीज के आश्रय में चले जाने की जगह हिन्दू धर्म में बने रहे। यदि आज गरीब / दलित / ओबीसी आदि हिन्दू धर्म में बने हुए है तो मंदिर प्रमुखों, प्राचीन राजाओ, संघ के नेताओं, बीजेपी नेताओं का इसमें योगदान शून्य है। इसका असली श्रेय सिर्फ इन तथा इन जैसे अन्य संप्रदाय प्रमुखों की नयी खेप को जाता है। यदि संत गुरमीत जी , संत श्री आसाराम जी एवं संत रामपाल जैसे लोग कमजोर हो गए तो दलितों / ओ बी सी / गरीबो की एक बड़ी संख्या मिशनरीज की गोद में जा गिरेगी। ऐसे सभी व्यक्ति को इन संतो को 10-20 साल के लिए जेल में भेजने का जश्न मना रहे है दरअसल वे जाने / अनजाने मिशनरीज की मदद कर रहे है।
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विभिन्न आश्रम / सम्प्रदाय / डेरे आदि मंदिरो की कमी को पूरी कर रहे है। अत: मिशनरीज इन संस्थाओ को भी बाधा के रूप में देखती है। तो आप देखेंगे कि पिछले कुछ वर्षो ने मीडिया में झूठे-सच्चे आरोपों का बहाना बनाकर हिन्दू संतो के खिलाफ लगातार मीडिया ट्रायल की जा रही है , और पूरे देश में इस तरह की धारणा गढ़ी जा रही है कि सभी आश्रम / डेरे / संप्रदाय भ्रष्टाचार एवं ऐयाशी के केंद्र है। और जब भी वे किसी धार्मिक संस्था या गुरु को निशाना बनाते है तो हमेशा ही भ्रष्ट जजों का इस्तेमाल करते है।
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(6) समाधान ?
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हिन्दू धर्म पर यह हमला किसी एक दिशा से नहीं हो रहा है, इसीलिए किसी एक क़ानून द्वारा इसका समाधान नहीं किया जा सकता। इसके लिए हमें एक से अधिक क़ानून चाहिए। नीचे उन प्रस्तावित कानूनों के विवरण दिए गए है जिन्हे लागू करवा के इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।
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(१) हिन्दू मंदिरों के प्रशासन को सुदृढ़ बनाने के लिए हम यहाँ शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी ( SGPC ) जैसा एक ढांचा प्रस्तावित कर रहे हैं। प्रत्येक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध आदि इस ट्रस्ट के जन्म से सदस्य होंगे, जब तक कि वे स्वयं अपनी सदस्यता नहीं छोड़ देते। इन सदस्यों को अध्यक्ष एवं ट्रस्टियो को चुनने एवं किसी भी दिन बदलने का अधिकार भी होगा। मुस्लिम तथा क्रिश्चियन इस ट्रस्ट के सदस्य नहीं बन सकेंगे।
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शुरू में राष्ट्रीय हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट ( NHDMT ) 4 मंदिरों की देख-रेख करेगा -- कश्मीर का अमरनाथ देवालय, राम जन्म भूमि देवालय, कृष्ण जन्म भूमि देवालय तथा काशी विश्वनाथ देवालय। आगे चलकर यदि सम्बंधित संप्रदाय स्वेच्छा से अपने मंदिर सुपुर्द करते है तो यह अन्य मंदिरों की देख-रेख भी कर सकता है। इस क़ानून के आने से मंदिरों का प्रशासन मजबूत होगा और हिन्दू धर्म की संस्थाओ पर हिन्दू श्रधालुओ का नियंत्रण हो जाएगा।

राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट ( NHDMT ) के लिए प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट - <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/838551942989668>;
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(२) दूसरा क़ानून हमें विभिन्न सम्प्रदायों, आश्रमों , मठो आदि को प्रबंधित करने के लिए चाहिए। यह क़ानून उन ट्रस्टों के लिए लागू होगा जो कि हिन्दूओं, बौद्धों, अथवा जैनों के धार्मिक जगह के मालिक हों या उन पर मालिकाना हक़ रखने की इच्छा प्रकट करते हैं। किन्तु यह सिक्ख, इस्लाम, क्रिश्चियन या पारसी धर्म की संस्थाओ पर लागू नहीं होगा। इस अधिनियम में सभी भारतीय धर्म तथा संप्रदाय आते हैं, जैसे- जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, आर्य समाज आदि। सिख पंथ भी एक भारतीय संप्रदाय है लेकिन यह पहले से ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (SGPC) अधिनियम द्वारा शासित है, इसलिए सिक्ख पंथ को इस अधिनियम से बाहर रखा गया है। यह क़ानून विभिन्न सम्प्रदायों पर बाध्यकारी नहीं होगा। जो संप्रदाय, डेरे, आश्रम एवं इनके प्रमुख इस अधिनियम के अंतर्गत आना चाहते है वे इसमें आ सकते है।

'भारतीय संप्रदाय देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/834846793300225>;
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ऊपर दिए गए दोनों क़ानून हिन्दू धर्म की संस्थाओ को इतना प्रभावी बना देंगे कि वह इस्लाम, ईसाई आदि धर्मो का मुकाबला कर सके, तथा एक सीमा के बाद ये क़ानून हिन्दू धर्म को फिर से विस्तार करने में सक्षम कर देंगे।
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(३) तीसरा क़ानून मीडिया से संबधित है। दूरदर्शन के पास बेहद विशाल संसाधन और संपत्तियां है। और कोई कारण नहीं कि दूरदर्शन अन्य निजी चैनल्स से अच्छा प्रदर्शन न कर सके। किन्तु दूरदर्शन अध्यक्ष निजी चैनल्स से घूस खाता है और अकार्यकुशल तरीके से कार्य करता है। राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष क़ानून आने से दूरदर्शन की कार्यकुशलता में वृद्धि होगी। राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष यह सुनिश्चित करेगा कि देश के सभी नागरिको तक सभी महत्व्पूर्ण जानकारी पहुंचे। इससे सभी निजी चैनल मिलकर भी किसी खबर को छुपा नहीं पाएंगे, क्योंकि दूरदर्शन उन खबरों का प्रसारण कर देगा और निजी चैनल एक्सपोज़ हो जाएंगे। बीबीसी इसी तरह से कार्य करता है। बीबीसी ब्रिटिश सरकार का चैनल है, तथा न्यूज के साथ साथ एक्शन, कॉमेडी आदि श्रेणियों के ढेर सारे गुणवत्ता प्रधान शालीन कार्यक्रमों का प्रसारण करता है।
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दूरदर्शन की गुणवत्ता बढ़ने से मिशनरीज द्वारा संचालित निजी चेनल्स की पकड़ कमजोर हो जायेगी और वे दर्शक खोने लगेंगे। इससे इन चेनल्स द्वारा हिन्दू धर्म के खिलाफ अभियान चलाने की क्षमता गिर जायेगी।

राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/546885878822944>;
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मीडिया को ठीक करने के लिए इसके अलावा राईट टू रिकॉल सेंसर बोर्ड चेयरमेन एवं सूचना प्रसारण मंत्री की भी जरूरत है। इस कानूनों के आने से हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाने वाली एवं हिन्दू परम्पराओं का विद्रूप चित्रण करने वाली फूहड़ फिल्मों का प्रसारण बाधित हो जाएगा।
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(५) भारत की सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट एवं लोअर कोर्ट सबसे अधिक भ्रष्ट महकमा है। भारत के 80% से ज्यादा जज भाई भतीजा वादी है और उन्होंने देशी-विदेशी धनिको के साथ कुटिल गठजोड़ बना रखे है। जो उन्हें पैसा देता है वे उसके हिसाब से काम करते है। शेष 20% भी किसी काम के नही है। क्योंकि वे भारत की अदालतों में किसी भी प्रकार का सुधार लाने के लिए कोई फ़िक्र मोल लेना नहीं चाहते। वे अपनी नौकरी करते है और आँखें मूँद कर पड़े रहते है।
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हमारी अदालते पूरी तरह से निरंकुश है और उनके पास असीम शक्ति है। धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करने से नेताओ को अपने वोट गवाने पड़ सकते है। अत: वे हिन्दू धर्म को तोड़ने के लिए बहुधा जजों का इस्तेमाल करते है। मिशनरीज की भारत की अदालतों में गहरी घुसपैठ है। जब तक जजों की नकेल नहीं कसी जाती तब तक ऊपर दिए गए कोई भी क़ानून काम नहीं कर पायेंगे। इसके लिए हमें राईट टू रिकॉल जज एवं ज्यूरी सिस्टम की जरूरत है।
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यह कानून पारित होने के बाद हत्या, अपहरण, बलात्कार, मारपीट तथा लापरवाही के कारण होनी वाली मौत आदि जैसे अपराधिक मामलो की सुनवाई करने और सजा सुनाने का अधिकार नागरिको की जूरी के पास रहेगा। इस जूरी मंडल का चयन किसी जिले या किसी राज्य अथवा भारत की मतदाता सूचियों में से क्रम रहित ( रेंडमली ) तरीके से किया जाएगा। जूरी सदस्यों का आयु वर्ग 25 से 55 वर्ष के बीच होगा तथा इस जूरी मंडल में 15 से 1500 तक जूरी सदस्य हो सकेंगे। इस क़ानून के लागू होने के बाद से इन मुकदमो का फैसला आम नागरिको के जूरी मंडल द्वारा किया जाएगा न कि जजों द्वारा |

जूरी सिस्टम का प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट :
<https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/829456537232542>;
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इन कानूनों को लागू करवाने में आप क्या सहयोग कर सकते है ?

a) इन कानूनों के ड्राफ्ट के लिंक को क्लिक करके इन्हें पढ़े और तय करे कि क्या आप इन कानूनों को समर्थन करते है। यदि आप इनका विरोध करते है तो वैकल्पिक क़ानून ड्राफ्ट मुहैया कराये जिससे हिन्दू धर्म को विघटित होने से बचाया जा सके।
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b) यदि आप इन कानूनों का समर्थन करते है तो @pmoindia पर ट्विट भेज कर प्रधानमंत्री से मांग करे कि इन कानूनों को गेजेट में प्रकाशित किया जाए। ट्विट का नमूना निचे दिया गया है।
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c) नागरिको तक इन कानूनों की जानकारी पहुंचाए एवं उन्हें भी पीएम को ट्विट करने को कहें।
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प्रधानमंत्री को भेजे जाने वाले ट्वीट का प्रारूप :
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@pmoindia I insturct you to print - <https://newindia.in/causes/nhdmt/>; , sha1- 5aa04b00713192b0e78263a7f31af3c334c838b5 #NHDMT
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( कृपया ऊपर दिए गए ट्वीट को कॉपी करे तथा अपने ट्विटर एकाउंट से @pmoindia पर ट्वीट करे। )
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