Pawan Jury BhilwaraRj
भारत की एक विशिष्ट प्रजाति ; जागरूक वर्ग उर्फ़ पेड कु-बुद्धिजीवी
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भारत में कई प्रकार के लोग रहते है। इन्ही लोगो में एक विशिष्ट प्रकार की प्रजाति पायी जाती है। ये प्रजाति देश के लिए बहुत ही हानिकर है, और देश को गड्ढे में धकेलने में अपनी सबसे सक्रीय भूमिका निभाती है। ये लोग देश को राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने भारतीयों को कोसने एवं सार्वजनिक रूप से उनका मोरल डाउन करने की गतिविधियों में लिप्त है। यह लेख इस प्रजाति के लक्षणों एवं उनकी विकृत सोच की पड़ताल करता है।
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लेखन में सुविधा की दृष्टी इस प्रजाति को यहाँ "जागरूक" नागरिक शब्द से सम्बोधित किया गया है। इनके दो प्रकार है - "छोटे जागरूक" एवं "ज्यादा जागरूक"।
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"ज्यादा जागरूक" लोग अमूमन टीवी चैनलों और अखबारों आदि में पाए जाते है। पेशे से ये लोग ज्यादातर आला दर्जे के शिक्षाविद , सामाजिक कार्यकर्ता, स्तंभकार, कलाकार आदि होते है। "छोटे जागरूक" इनका गुटका संस्करण है। ये सामान्य व्यक्ति की तरह ही होते है। लेकिन "ज्यादा जागरूक" लोगो के ज्यादा वर्चुअल सम्पर्क में रहने के कारण इनमे भी "जागरूकता" का संक्रमण हो जाता है। फेसबुक से लेकर गली-नुक्क्ड़ो पर, चाय-पान की दुकानों पर या छोटी मोटी विचार गोष्ठियों में आप इन "छोटे जागरूक" नागरिको को जागरूकता फैलाते मतलब भारतीयों को कोसते हुए देख सकते है।
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आम तौर पर इन्हें बुद्धिजीवी कहा जाता है। वैसे इनका सही संबोधन "पेड कु-बुद्धिजीवी" है। और व्यवहारिक रूप से ये लोग वैचारिक प्रदुषण फैलाकर वातावरण को प्रदूषित करते है।
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लक्षण - 1 :
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ये लोग जब भी किसी विषय पर अपने विचार प्रकट करते है तो अमुक समस्या को घुमा फिरा कर भारत के लोगो के चरित्र से जोड़ देते है। उदाहरण के लिए यदि ये चोरी पर बात करेंगे तो बताएँगे कि भारत के लोग चोट्टे है, इसीलिए चोरियां हो रही है। जब ये गंदगी पर बात करेंगे तो यह स्थापित करने की कोशिश करेंगे कि भारतीय लोग सूअर है, अत: गंदगी फैलाना उनका स्वाभाविक आचरण है। ये लोग दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति तक यह बात पहुँचा देना चाहते है कि --
भारत पिछड़ गया -- क्योंकि भारतीय निकम्मे और आलसी है !
भारत में बलात्कार होते है -- क्योंकि भारतीय लम्पट एवं दुराचारी है !!
वोटिंग पर जब ये बोलेंगे तो यह जरूर कहेंगे कि -- भारतीय बिकाऊ है और नोट लेकर अपने वोट बेचते है !!
भारत को लूटा गया -- क्योंकि भारतीय लोगो में देश प्रेम नहीं है और वे गद्दार है !
महिलाओं की जब बात करेंगे तो कहेंगे कि -- भारतीय पुरुष महिलाओं का उत्पीडन करने के आदि है !
भ्रष्टाचार पर कहेंगे कि -- भारत में भ्रष्टाचार है, क्योंकि आम भारतीय भ्रष्ट है !!
ऐसे करके आप सभी विषयों की सूची बनाते जाइए, ये जब भी मुहँ खोलेंगे तब इनके मुहँ से यही निकलेगा कि सभी समस्याओं की जड़ "आम भारतीय" है।
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भारतीयों को अशिक्षित, उज्जड, जाहिल, गवांर, गंदे, भ्रष्ट, असभ्य, चरित्रहीन , पाखंडी, धूर्त , गद्दार बताना इनका मुख्य शगल होता है। लेकिन भारतीयो को कोसने और उन्हें गाली देने के लिए वे जिस टर्म का इस्तेमाल करते है वह है -- "हम लोग" !!! मतलब वे ऐसा नहीं कहते कि भारतीय लोग जाहिल है, क्योंकि इससे उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ सकता है या स्थिति बिगड़ने पर फौजदारी भी हो सकती है। इसके लिए वे हमेशा "हम लोग" शब्द का इस्तेमाल करते है। मतलब वे कहेंगे कि "हम भारतीय लोग" भ्रष्ट है , जाहिल है , अशिक्षित और असभ्य है आदि। इस तरह वे देश के अन्य जागरूक नागरिको को भी अपने साथ चिपका लेते है, और अन्य लोग भी उनके सुर में सुर मिलाकर कहने लगते है कि, हाँ "हम लोग" भ्रष्ट और चरित्रहीन है !! कौन हम लोग ? हम भारतीय !!! हालांकि वे शुरू से ही यह मानकर चलते है कि, "हम लोग" में वह स्वयं शामिल नहीं है !!! ये खुद को बेहद समझदार मानते है, ईसीलिये शेष भारतीयों को सुधरने के उपदेश देते है।
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लक्षण - 2 :
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तो पहले ये लोग यह स्थापित करते है कि "हम भारतीय" गवांर और असभ्य है। और जब यह स्थापित हो जाता है तो समाधान के रूप में बताते है कि -- हमें सुधर जाना चाहिए !!! हमें ? मतलब हम भारतीयों को !! देश की किसी भी समस्या का समाधान ये लोग इसी बात पर ख़त्म करेंगे कि, जब तक भारतीय सुधरेंगे नहीं तब तक भारत की किसी भी समस्या का इलाज संभव नहीं है। भारत की सभी समस्याओ की जड़ भारतीय है। जागरूकता का स्तर और भी बढ़ने पर ये लोग दिन में एक बार अवश्य कहते है कि -- भारत का कुछ नहीं हो सकता, क्योंकि भारतीय लोग जाहिल है। भारत के लोगो में राष्ट्रीय चरित्र का अभाव है। भारतीय लोगो में देश प्रेम की भावना नहीं है, भारतीयों की सोच अच्छी नहीं है, भारतीय अनैतिक है, भारतीयों के जीवन मूल्य गिरे हुए है आदि आदि।
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क्या भारत के लोग वाकयी जाहिल, असभ्य, गवांर, देशद्रोही और लम्पट है ? क्या भारत के लोगो में राष्ट्रीय चरित्र का अभाव है, क्या भारत के लोगो की सोच घटिया है ?
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नहीं। कदापि नहीं। पूरी दुनिया में कमोबेश एक जैसे लोग पाए जाते है। किन्तु अलग अलग देशो की क़ानून व्यवस्थाएं वहां अलग अलग शासन की रचना करती है। राजनैतिक / सामाजिक समस्याओ का निदान क़ानून व्यवस्थाओ में परिवर्तन करके किया जा सकता है। किन्तु इनकी रुचि प्रशासनिक परिवर्तन में नहीं होती। अत: ये किसी प्रशासनिक समस्या का दोष नागरिको के चरित्र पर थाप देते है।
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दरअसल ये बेहद धूर्त और पाखंडी किस्म के लोग है। प्रशासनिक एवं राजनीतिक समस्या की अनदेखी करने के लिए ये लोग जान बूझकर भारत के आम नागरिको को दोषी ठहराते है। उदाहरण के लिए, इन्हें यह बात मालूम है कि अमेरिका और भारत की पुलिस एक जैसी ही है , लेकिन अमेरिका के नागरिको के पास पुलिस प्रमुख को नौकरी से निकालने का अधिकार होने के कारण वहां की पुलिस में भ्रष्टाचार कम है। इस तरह पुलिस में भ्रष्टाचार होना एक प्रशासनिक / कानूनी वजह है। किन्तु यदि ये लोग कहेंगे कि, भारत के पुलिस प्रशासन में भ्रष्टाचार इसीलिए है क्योंकि भारत के नागरिको के पास पुलिस प्रमुख को नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं है, तो अगले दिन से ही पेड मीडिया इनका प्लग खींच लेगा और इनके स्तम्भ अखबार में प्रकाशित होने बंद हो जायेगे। तो ये लोग इस आशय की बात कहेंगे कि भारत की पुलिस इसीलिए भ्रष्ट है क्योंकि भारत के लोग भ्रष्ट है !!
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इनके द्वारा फैलाए जाने वाले कुछ झूठ और उनका खंडन :
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झूठ - भारत में भ्रष्टाचार है क्योंकि भारत के लोग भ्रष्ट है।
सच - भारत के नागरिको के पास नेताओं, अधिकारियो एवं जजों को नौकरी से निकालने का अधिकार नहीं है। इसीलिए भारत के नागरिक चाह कर भी भ्रष्ट लोगो को नौकरी से निकाल नहीं पाते।
झूठ - भारत के लोग पैसे एवं शराब के बदले अपने वोट बेचते है।
सच - किसी भी चुनाव क्षेत्र में ऐसे लोगो का प्रतिशत सिर्फ 1 से 2% ही होता है। यह सामान्य आंकड़ा है। यह इस बात की ताईद नहीं करता कि भारतीय लोग वोट बेचते है। भारत में चोरियां भी होती है। तो क्या आप यह कहेंगे कि भारत के लोग चोर है ? समाधान - वोट वापिस लेने का क़ानून लागू होने से वोटो की खरीद फरोख्त स्वत: ही पूरी तरह से बंद हो जायेगी।
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झूठ - भारत के लोग गंदगी फैलाते है।
सच - पूरी दुनिया में 2 से 5% लोग गंदगी फैलाते है। किन्तु वहां का क़ानून चुस्त होने के कारण उन पर दंड आता है और वे गंदगी फैलाना बंद कर देते है। जिस देश में दंड नहीं होता वहां इनकी तादाद बढती जाती है। यदि भारत के कानूनों को दुरुस्त किया जाए तो यहाँ भी सफाई रहने लगेगी , और यदि अन्य देशो में से ये क़ानून हटा लिए जाये तो वहां भी लोग गंदगी फैलाने लगेंगे।
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झूठ - भारत के लोगो का चरित्र खराब है और उनकी सोच घटिया है।
सच - ऐसा कहने वाले आला दर्जे के पाखंडी है। और खुद को अलग एवं जागरूक दिखाने के लिए वे ऐसा कहते है।
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झूठ - भारत के लोग अशिक्षित है इसीलिए असभ्य है
सच - भारत में अशिक्षा है , क्योंकि भारत में राइट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का क़ानून नहीं है। वैसे शिक्षा का व्यक्ति के चरित्र एवं सभ्यता से कोई लेना देना नहीं है। दोनों तत्व अलग अलग है।
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झूठ - भारत में लोग जातीय आधार पर वोटिंग करते है।
सच - मानव सामुदायिक प्राणी है। और जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र आदि के रूप में अपने समुदाय बनाता है। यह पूरी दुनिया में आम है। जातीय आधार पर मतदान की समस्या का समाधान इंस्टेंट रन ऑफ़ वोटिंग आने से एक दिन में ही हो जाएगा।
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इस सूची को काफी लम्बा किया जा सकता है। किन्तु इतने में सामान्य बुद्धि वाले मनुष्य को या बात समझ आ जानी चाहिए कि भारत के लोग भी वैसे ही है , जैसे कि अन्य देशो के है। किन्तु भारत के कु-बुद्धिजीवी लगातार भारत के लोगो को अकारण कोसते रहते है।
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भारतीयों को कोसने की वजह ?
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१) भारत का मीडिया बहुरास्ट्रीय कम्पनियों के कब्जे में है। अन्तराष्ट्रीय स्तर पर किसी देश का मोरल डाउन करने के लिए इस तरह की बातों का बेहद महत्त्व है। अत: "ज्यादा जागरूक" यानी ऊँची पांत के श्रेष्ठी वर्ग को ऐसी धारणा फ़ैलाने के लिए भुगतान किया जाता है। इसीलिए आप देखेंगे कि सभी न्यूज चेनल्स पर और अखबार के स्त्मभो में इस आशय की बातों को बार बार दोहराया जाता है कि भारत के लोगो की सोच घटिया है, भारत के लोगो में राष्ट्र प्रेम का अभाव है , भारत के लोगो को गंदगी फैलाने की लत है आदि आदि । यदि वे ऐसी बातें नहीं लिखेंगे तो अखबार एवं चैनल्स उन्हें फुटेज देना बंद कर देंगे।
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२) दूसरी वजह राजनैतिक है और यह ज्यादा गंभीर है। यदि किसी समस्या के वास्तविक प्रशासनिक पहलु पर लिखा जाएगा तो नागरिको तक या जानकारी पहुँच जायेगी कि इसका कारण प्रशासनिक है। तब वे प्रशासनिक सुधार की बात सोचने लगेंगे और इसके समाधान के लिए आवश्यक क़ानून की मांग करेंगे। इससे या बात खुलकर आ जायेगी कि समस्या की जड़ राजनेता और वांछित कानूनों का अभाव है। यह मांग खड़ी होने पर राजनैतिक पार्टियों को अमुक क़ानून लागू करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। यदि ऐसे क़ानून लागू हो गए तो जिनसे भ्रष्टाचार में कमी आये तो आला अधिकारियो, जजों, नेताओं आदि के हाथ से भ्रष्टाचार करने का अवसर निकला जाएगा और उन्हें हानि होगी। इसलिए ये लोग लगातार अपनी खाल बचाने के लिए ऐसे लोगो को आश्रय देते है जो देश की सारी समस्याओ का ठीकरा नागरिको के सिर पर ही फोड़ दे।
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३) समस्या की चर्चा को टाला नहीं जा सकता। और जब समस्या की चर्चा आएगी तो समाधान पर भी बात करनी पड़ेगी। तो एक बारीक चाल यह है कि मामले को शुरू से ही पटरी से उतार दिया जाये। रणनीति यह है कि -- जब समस्या की चर्चा की जाए तो समस्या का कारण अलग दिशा में बता दिया जाए। जब कारण उल्टी दिशा में बता दिया जाएगा तो समाधान भी उल्टा पुल्टा ही हाथ लगेगा। उदाहरण के लिए -- भ्र्ष्टाचार की समस्या का कारण यह बता दो कि भारत के लोग भ्र्ष्ट है और उनकी सोच घटिया है। अब समाधान यह सूझेगा कि, हमें भारतीयों की सोच को सुधारने का काम करना चाहिए। अब सोच सुधारने का कोई इंजेक्शन तो आता नहीं है। तो हर व्यक्ति माइक लेकर दूसरे से कहे कि, तुम अपनी सोच सुधारो। फिर दूसरा तीसरे से और तीसरा फिर से पहले से यही बात कह दे !! बस इस चक्र को असीमित रूप से चलाया जा सकता है !!!
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तो "ज्यादा जागरूक" लोगो की अपनी वजहें है जिस कारण वे भारतीयों को कोसते है। किन्तु आपने देखा होगा कि आपके आस पास गली मौहल्लो और शहरो में भी इस किस्म के "छोटे जागरूक" इफरात में पाए जाते है जिन्हे न तो कोई भारतीयो को कोसने का पैसा दे रहा है और न ही उनके पास ऐसा कोई वाजिब कारण है। फिर भी ये लोग आपके आस पास निरंतर रूप से यह वैचारिक प्रदुषण फैलाते रहते है कि -- भारत के लोगो की सोच घटिया है !! और कमाल की बात यह है कि ये खुद भी भारतीय ही है।
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इनकी वजह "क्राइसिस ऑफ कॉन्शियस" है । यह व्याधि आम तौर पर उन्ही को सताती है जो अपने को बुद्धिजीवी मानते है, और खुद को "बुद्धिजीवी एवं जागरूक" साबित करने के लिए अन्य लोगो को "जाग जाने" का उपदेश देते है। खुद को बुद्धिजीवी एवं जागा हुआ साबित करने का सबसे आसान एवं त्वरित तरीका यह है कि लोगो को जागरूक हो जाने, कुछ करने आदि का उपदेश दिया जाए। उन्हें कोसा जाए। अब किसी को नाम लेकर कोसेंगे तो प्रतिकार का सामना करना पड़ सकता है। तो ये लोग सारे भारतीयों को ही लपेट लेते है।
ये लोग अपनी बौध्दिक खुराक पेड मीडिया से प्राप्त करते है। पेड मीडिया के लगातार संपर्क में रहने के कारण इन्हें यह शुबहा होने लगता है कि भारत की सभी समस्याओ की जड़ यह है कि भारतीयों की सोच घटिया है !! और जागरूक व्यक्ति होने के नाते हमारा यह फर्ज बन जाता है कि हम भारतीयों को यह सूचना देना शुरू करे कि -- हमारी सोच घटिया है।
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इन्हें धूर्त या पाखंडी या कपटी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि ये ऐसा बिना किसी प्रतिफल के कर रहे है। इन्होने पेड मीडिया में सालो तक इस आशय के पाठ्य पढ़े-सुने है और ये लोग इस धारणा के शिकार हो गए है कि हमारे अलावा शेष भारतियो की सोच घटिया है, भारतीयों में राष्ट्रिय चरित्र का अभाव है , आम भारतीय भ्रष्ट है आदि। अब जो भी व्यक्ति इनके इस तरह के वक्तव्य पढता-सुनता है उसे यह अहसास होता है कि उसकी सोच घटिया है और उसमे राष्ट्रिय चरित्र का अभाव है। अत: खुद को जागरूक साबित करने के लिए वह भी इस उपदेश को आगे दोहराने लगता है। इस तरह हम देखते है कि कुछ लोग पूरे देश में एक चेन रिएक्शन खड़ी कर देते है, जिसमे तमाम भारतीय एक दुसरे की सोच को घटिया ठहरा रहे है। ऐसे लोगो एवं इस सोच का प्रतिकार करना जरुरी है।
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समाधान ?
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"ज्यादा जागरूक" लोगो का इलाज सिर्फ जूरी सिस्टम एवं एवं राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष क़ानून को लागू करके ही किया जा सकता है। जूरी सिस्टम आने के बाद अगले दिन से ही ये लोग भारतीयों को कोसना छोड़ देंगे। यदि "छोटे जागरूक" लोग आपके सम्पर्क में आते है और सार्वजनिक रूप से यह उपदेश करते है कि -- हम भारतीयों की सोच घटिया है , तो उनका प्रतिकार करें। उनसे पूछे कि वे किस आधार पर हमें घटिया मानसिकता वाला ठहरा रहे है। इससे उन्हें पुनर्विचार करने का अवसर मिलेगा और वे भारतीयों को गाली देने से बाज आने लगेंगे।
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