Pawan Jury BhilwaraRj
डेरा सच्चा सौदा प्रकरण ; समस्या एवं समाधान
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अध्याय
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1) समस्या यह है कि आबादी के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राम रहीम जी के साथ न्याय नहीं किया गया है ।
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2) वजहें, जो इस बात की पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट है
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3) तर्क ; जिनसे यह स्थापित किया जाता है कि भारत के जज बेहद ईमानदार एवं निष्पक्ष है
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4) डेरा और राजनीति
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5) राम रहीम जी के मुकदमे से सम्बंधित कुछ तथ्य जो अदालत के फैसले को संदिग्ध बनाते है
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6) समाधान
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7) प्रस्तावित जूरी सिस्टम क़ानून का सारांश
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8) भारत में ज्यूरी सिस्टम लाने के लिए आप क्या कर सकते है ?
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समस्या यह है कि करोड़ो डेरा समर्थको एवं लाखों स्वतंत्र कार्यकर्ताओ का मानना है कि श्री राम रहीम जी के मामले में अदालत द्वारा दिया गया फैसला संदिग्ध है।
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हो सकता है श्री राम रहीम जी दोषी हो, और ये भी हो सकता है कि वे निर्दोष हो। किन्तु इतना तो तय है कि देश की आबादी का एक वर्ग इस फैसले से संतुष्ट नहीं है। इसी तरह का असंतोष संत श्री आसाराम जी बापू के मामले में भी देखने को मिला था। आसाराम जी के मामले में भी देश की आबादी का एक वर्ग यह मानता था एवं आज भी मानता है उनके साथ न्याय नहीं किया गया। संत रामपाल जी, जयेंद्र सरस्वती जी एवं नित्यानंद जी से जुड़े हुए मामलो में भी देश की एक बड़ी आबादी की यही धारणा थी।
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इस तरह यहाँ दो वर्ग बन जाते है। पहला वर्ग वह है जो यह मानता है कि श्री राम रहीम जी के साथ कोई अन्याय नहीं हुआ है और वे दोषी है, और उनके दोषी होने का सबसे बड़ा सबूत यह है कि अदालत ने उन्हें दोषी ठहरा दिया है !! अदालत ने उन्हें किस आधार पर दोषी ठहराया है और क्या सबूत बरामद किये गए है, इससे उन्हें कोई लेना देना नहीं है !! जबकि दुसरे वर्ग का मानना है कि, हो सकता है वे दोषी हो या हो सकता है कि दोषी नहीं भी हो। इस वर्ग को अदालत के फैसले पर विश्वास नहीं है, तथा इस अविश्वास की "पर्याप्त एवं वाजिब" वजहें मौजूद है।
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नोट - इस लेख में उन नागरिको के लिए कुछ नहीं है जो यह मानते है कि 2000 के नोटों में चिप लगी हुयी है, और इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि टीवी-अख़बार पर ऐसा बताया गया था, और वे यह भी मानते है कि भारत के जज चाहे पैदाइशी ईमानदार न हो किन्तु नियुक्ति मिलते ही एक प्रकार की जादुई प्रक्रिया द्वारा वे ईमानदार हो जाते है !!! यह लेख सिर्फ उन लोगो के काम का है जो जाया तौर पर न्यायमूर्ति पूजक नहीं है और साथ ही यह भी मानते है कि 2000 के नोटों में ऐसी कोई चिप नहीं है।
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अदालतों पर अविश्वास का कारण एवं इन्हें बहाल करने के उपाय :
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एक पोचा तर्क यह है कि इन सभी संतो की भक्ति के कारण इनके भक्त अदालत पर अंगुली उठा रहे है। संतो और उनके भक्तो की बात को जाने दीजिये। सलमान खान का उदाहरण लीजिये। जब उन्हें छोड़ दिया गया था तब देश की आबादी का एक बड़ा वर्ग इस तरह की आवाजे उठा रहा था कि हमारी अदालते भ्रष्ट है। तो यह खुली हुयी बात है कि भारत का एक वर्ग यह मानता है कि हमारी अदालतें भ्रष्ट है।
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क्यों कार्यकर्ताओ के एक वर्ग का मानना है कि हमारी अदालतें भ्रष्ट है ?
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क्योंकि ऐसी कोई वजह ही नहीं है जो इस बात का इत्मीनान दिलाए कि भारत की अदालतें भ्रष्ट नहीं है। लेकिन ऐसी ढेर सारी वजहें है जो इस बात की पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट न हो ऐसा किसी भी तौर से संभव नहीं है। कुछ वजहें निचे दी गयी है :
१) भारत में जज बनने के लिए साक्षात्कार से गुजरना पड़ता है। साक्षात्कार में अंक देना जजों के हाथ में होता है। तो भाई भतीजावाद एवं घूस ( सेटिंग ) के अवसर यहीं से बन जाते है। इस तरह नियुक्ति से ही भ्रष्टाचार शुरू हो जाता है। जज एवं नेता साक्षात्कार की प्रक्रिया को हटाना नहीं चाहते। यदि साक्षात्कार को हटा दिया जाए तो जजों के भ्रष्ट होने की एक वजह समाप्त हो जायेगी। लेकिन फिलहाल साक्षात्कार है , अत: भ्रष्टाचार है। उल्लेखनीय है कि चीन में जजों की नियुक्ति में साक्षात्कार नहीं है। सिर्फ लिखित परीक्षा के माध्यम से ही जजों की नियुक्ति की जाती है। इस वजह से चीन के जज भारतीय जजों की तुलना में कम भ्रष्ट है।
समाधान - जजों की नियुक्ति प्रक्रिया से साक्षात्कार को हटाया जाना चाहिए।
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२) जजों की नियुक्ति, स्थानांतरण एवं पदोन्नतियां वरिष्ठ जजों के हाथ में होती है। शेषन जज हाई कोर्ट के एवं हाई कोर्ट के जज सुप्रीम कोर्ट के चंगुल में है। यदि हाई कोर्ट का जज भ्रष्ट है तो वह शेषन कोर्ट के सभी जजों पर मनचाहे फैसले करवाने के लिए चाबुक चला सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट के जज भ्र्ष्ट है तो वे पूरी न्यायपालिका को भ्रष्ट बना देते है। और सुप्रीम कोर्ट के जज पूरी तरह से निरंकुश है। यदि सुप्रीम कोर्ट का जज कुर्सी पर रहते हुए घूस खा रहा है तो उसकी शिकायत कहाँ करेंगे आप ? दरअसल शेषन कोर्ट, हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी एक टोली बना ली है। इनके फैसले में किसी का कोई दखल नहीं। जनता को तो भूल ही जाइए, सरकार तक का दखल नहीं !! जब किसी आदमी को यह पता हो कि उसे पकड़ने वाला कोई नहीं है, न ही कोई उससे सवाल पूछने वाला है, तो उसके भ्रष्ट होने की सम्भावना बढ़ जायेगी। यह निरंकुशता भ्रष्टाचार को जन्म देती है।
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उल्लेखनीय है कि जापान में जजों को हर आम चुनाव में नागरिको के अनुमोदन से गुजरना पड़ता है। जब भी चुनाव होते है तो बेलेट पेपर के साथ एक अतिरिक्त प्रश्न रखा जाता है कि क्या आप इस जज को नौकरी से निकालना चाहते है या नहीं। इस तरह से नागरिको के पास विकल्प होता है कि वे भ्रष्ट एवं निकम्मे जज को खारिज कर सके। जज को भय रहता है कि भ्रष्टाचार करने पर जनता मुझे खारिज कर सकती है। इस वजह से उनके भ्रष्टाचार में कमी आती है। किन्तु भारत के जज और नेता यह कतई नहीं चाहते कि नागरिको को जजों के काम काज पर टिप्पणी करने का अवसर दिया जाए।
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अमेरिका में इससे भी बेहतर प्रणाली है। वहां नागरिक जजों को चुनते है और किसी भी समय उन्हें नौकरी से भी निकाल सकते है। वहां के जज जानते है कि यदि वे भ्रष्टाचार करेंगे तो यह छिपेगा नहीं और जनता उन्हें नौकरी से निकाल देगी। इस तरह जनता द्वारा नौकरी से निकाले जाने का भय उन्हें कम भ्रष्ट बना देता है, और वे तमीज से पेश आते है। नागरिको द्वारा बहुमत का प्रयोग करके इस तरह नौकरी से निकालने की प्रक्रिया को राईट टू रिकॉल कहते है।
समाधान - भारत में जजों को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार आम नागरिको को दिया जाना चाहिए। इससे नागरिको का न्यायपालिका में दखल बढेगा और इस अंकुश से भ्रष्टाचार में कमी आएगी।
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३) क्या आप जानते है कि , उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिए अभ्यर्थी को लिखित परीक्षा से भी नहीं गुजरना होता है !! वरिष्ठ जज कोर्ट में प्रेक्टिस करने वाले किसी भी वकील को सीधे हाई कोर्ट में न्यायधीश के पद पर नियुक्ति दे सकते है !! एक तरह से यह नियम घूसखोरी को कानूनी करने के लिए बनाया गया है, जिसका परोक्ष अर्थ यह है कि -- यदि आपके भाई भतीजे वरिष्ठ जज है , यदि आप एक वकील है , और यदि आपके पास घूस देने के लिए मोटी राशि है तो आप सीधे ही हाई कोर्ट के जज बन सकते है !! अनुमान किया जा सकता है कि इस ढंग से जो व्यक्ति जज बनेगा वह कितना भ्रष्ट होगा, और इस तरीके से जो जज किसी को जज बनाएंगे वे कितने ईमानदार होंगे !!
समाधान - "पसंदगी के आधार पर" नियुक्ति देने की प्रक्रिया को ख़त्म किया जाना चाहिए। न्यायधीश जनता द्वारा चुने जाएँ और यदि वे भ्रष्ट आचरण करते है तो उन्हें नौकरी से निकालने का अधिकार जिले / राज्य / देश के मतदाताओं के पास हो।
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४) जब तक संसद दखल कर के इसे पलट न दे तब तक सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट की रुलिंग्स का प्रभाव कानूनों की तरह ही होता है। और, यदि संसद कोई क़ानून बनाती है तो सुप्रीम कोर्ट उसे अवैध भी घोषित कर सकती है। इस तरह कानूनों को वैध / अवैध घोषित करने और क़ानून / संविधान की व्याख्या का अधिकार जजों के पास है। दूसरे शब्दों में , भारत में अंततोगत्वा जज ही यह तय करते है कि कौनसा क़ानून लागू होगा और कौनसा नहीं होगा। क्या संवैधानिक है और क्या असंवैधानिक है यह तय करने का अधिकार भी जजों के पास है !! और ख़ास बात यह है कि जजों पर नागरिको का कोई नियंत्रण नहीं है।
समाधान - कानूनों एवं संविधान की व्याख्या का अधिकार आम नागरिको के पास होना चाहिए। इससे जनता यह निर्धारित कर सकेगी कि कौनसा क़ानून देश हित में है व कौनसा देश विरोधी।
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५) धीमी अदालती प्रकिया भ्रष्टाचार को जन्म देती है। जजों के पास किसी मामले को असीमित समय तक लटका कर रखने की शक्ति है। वे घूस खाकर किसी मुकदमें के फैसले को इच्छित समय तक टालते रह सकते है, तथा घूस मिलने पर किसी मामले में अति न्यायिक सक्रियता दिखा सकते है। भारत की अदालतों में 3 करोड़ मुकदमे लटके हुए है। इनमे कई नेता, अभिनेता, अधिकारी, उद्योगपति आदि शामिल है। वे इनके मामलों की सुनवाई धीमी गति से करते है ताकि लम्बे समय तक आरोपी जजों के पंजे में फंसा रहे। चीन के 2 लाख जजों के मुकाबले भारत में सिर्फ 18 हजार जज होने से अदालती प्रक्रिया धीमी है और इस वजह से जजों में भ्रष्टाचार है।
समाधान - भारत को जजों की संख्या 20 हजार से बढ़ाकर 2 लाख करने की जरुरत है।
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६) जजों को कोई भ्रष्ट कह कर न पुकारे, इसीलिए जजों ने अवमानना का क़ानून बनाया है। यदि आप जज को भ्रष्ट कहेंगे तो जज आपको अदालत की अवमानना के आरोप में जेल पहुंचा देंगे। इस क़ानून के कारण जजों के भ्रष्टाचार की चर्चा नहीं हो पाती और इससे जज निशंक होकर भ्रष्टाचार कर पाते है। एक तरह से जजों ने इस तरह का क़ानून बनाकर पूरे देश को बाध्य कर दिया है कि वे जजों को "ईमानदार एवं फ़रिश्ता" माने !!
समाधान - अवमानना के क़ानून को रद्द किया जाना चाहिए।
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७) जजों का विवेकाधिकार भी भष्टाचार को बढ़ावा देता है। कानूनों को कितना भी विस्तृत रूप से लिखा जाये, तब भी कई बिन्दुओ को तय करने के लिए दंडाधिकारी को अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करना होता है। यह "विवेकाधिकार" भारत के जजों को असीमित शक्ति प्रदान कर देता है। वे घूस खाकर अपने विवेकाधिकार का इस तरह से इस्तेमाल करते है, जिससे घूस देने वाले को लाभ पहुँचाया जा सके।
समाधान - विवेकाधिकार की शक्ति जजों की जगह नागरिको के ज्यूरी मंडल को दी जानी चाहिए।
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तो इस तरह हम समझ सकते है कि हमारी न्यायपालिका में ऐसी पर्याप्त व्यवस्थाएं है जो यह सिद्ध करती है कि ऐसी कोई वजह नहीं है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत के जज देश के अन्य अधिकारियो एवं नेताओ की तुलना में ज्यादा ईमानदार है। बल्कि स्थिति इसके उलट है। दरअसल जजों की नियुक्ति-पदोन्नति की प्रणाली, विवेकाधिकार का प्रयोग एवं अवमानना का क़ानून उन्हें ज्यादा भ्रष्ट होने के सहज अवसर प्रदान करता है। और यही वजह है कि हमारी न्यायपालिका में भारी भ्रष्टाचार है।
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सिर्फ दो कारण है जिससे यह स्थापित किया जा सकता है कि भारत के जज बेहद ईमानदार एवं निष्पक्ष है।
१) अवमानना के क़ानून का भय - यदि आप जजों पर अंगुली उठाएंगे तो वे आपको अवमानना का दोषी ठहरा कर जेल में डाल देंगे !! इस वजह से भारत के सभी "समझदार" एवं "बड़े" आदमी निरंतर यह दोहराते रहते है कि हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है !!!
२) दूसरी बड़ी वजह पेड मिडिया है -- धनिक वर्ग एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भारत में जज सिस्टम को जारी रखना चाहते है, ताकि वे जजों को घूस देकर मनचाहे फैसले निकलवा सके। इस तरह धनिक वर्ग एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक अपने पक्ष में फैसले लेने के लिए जजों के भ्रष्टाचार का लाभ उठाते है। अत: वे जजों की छवि बनाये रखने के लिए मिडिया को भुगतान करते है। मिडिया निरंतर इस तरह की धारणा खड़ी करता है जिससे नागरिको में यह भ्रम फैले कि भारत के "माननीय" जज बेहद ईमानदार है।
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डेरा और राजनीति
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यह एक बहुत ही गलत धारणा है कि धर्म में राजनीति का एवं राजनीति में धर्म का दखल नहीं होना चाहिए। धर्म राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता। वजह ? कोई भी धार्मिक संस्था या धार्मिक गुरु लोगो से जुड़ा होता है तथा उसकी गतिविधियों में धार्मिक जमाव होता है। जहाँ भी लोगो का जमाव होगा वहां दखल करना राजनीति की मजबूरी है। राजनेता ऐसे सभी व्यक्तियों का पीछा करते है जिसके पास लोगो के किसी समूह को प्रभावित करने की क्षमता हो। धार्मिक संस्थाओ के पास यह क्षमता काफी बढ़ी हुयी होती है। अत: राजनेता चाहते है कि अमुक गुरु या संस्था अपने श्रद्धालुओं को उनके पक्ष में वोट करने के लिए प्रेरित करे। कोई गुरु या संस्था राजनीति से अलग रहना चाहे तो भी राजनेता उनका पीछा करते है। धार्मिक गुरुओ के पास इनसे बचने का कोई विकल्प नहीं है। और कभी कभी इसका उल्टा भी देखने में आता है। सभी धार्मिक संस्थाओ को अपने विस्तार के लिए सरकार से मधुर सम्बन्ध बनाये रखना जरुरी होते है। इसीलिए वे बढ़त बनाये रखने और स्वयं को सुरक्षित करने के लिए सत्ता के साथ गठजोड़ बनाते है। कुल मिलाकर धार्मिक संस्थाओ / गुरुओ के पास लोगो का जमाव है और ये लोग वोट करते है। राजनीति में प्रत्येक व्यक्ति एक वोट है। तो धर्म में राजनीति स्थायी तत्व है। इससे बचा नहीं जा सकता।
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मौजूदा स्थिति में राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ , कांग्रेस , अकाली और आम आदमी पार्टी में से कोई भी राजनैतिक दल डेरा के समर्थन में नहीं था / है। अकाली स्थानीय राजनीति और धार्मिक वजहों से तथा संघ राष्ट्रीय राजनीति की वजह से डेरे को गिराना चाहते थे। अपनी राजनैतिक वजहों के चलते कोंग्रेस एवं आम आदमी पार्टी की रुचि भी डेरे को बचाने में नहीं थी। संघ हिन्दू धर्म के अनुयायियों को अपने नीचे "एक" करने के मिशन पर है। संघ के अनुसार विभिन्न सम्प्रदाय एवं गुरु वगैरह हिन्दुओ को विभाजित कर रहे है, और इसकी वजह से हिन्दुओ को "एक" करने का उनका मिशन पिछड़ जाता है !! अत: संघ पिछले 90 वर्ष से विभिन्न सम्प्रदायों एवं गुरुओ को अपने प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है। गोल्डन टेम्पल पर अपना प्रभाव रखने वाले अकाली भी डेरे को अपने प्रतिस्पर्धी के रूप में देखते है। कोंग्रेस को डेरे ने एक लम्बे समय तक राजनैतिक समर्थन दिया था, किन्तु हाल ही में डेरे के बीजेपी की और चले जाने से कोंग्रेस को भी डेरे के गिर जाने से कोई दिक्कत नहीं है। इसके अलावा मिशनरीज द्वारा समर्थित तर्क शील सोसाइटी जैसे संगठन भी डेरे के खिलाफ है। बहरहाल, विभिन्न दलों और संगठनो के अपने हित और उनकी राजनीति है और इसके कई आयाम हो सकते है।
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इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि मिशनरीज एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां डेरे को गिराना चाहती थी। अत: इस बात से कोई फर्क नहीं आता कि संघ / कोंग्रेस / अकाली आदि क्या चाहते थे। भारत में एफडीआई बढ़ने से मिशनरीज की ताकत इतनी बढ़ चुकी है कि बीजेपी / कोंग्रेस / अकाली / आम आदमी पार्टी आदि कोई भी दल मिशनरीज के खिलाफ नहीं जा सकते। अत: इस प्रकरण में संघ / कोंग्रेस / अकाली एवं आम आदमी पार्टी की भूमिका को ज्यादा गंभीरता से लेने से हम मूल विषय से भटक जायेंगे। मिशनरीज एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हिन्दू धर्म को तोड़ने के लिए किस तरह से प्रयास रत है इस विषय पर विवरण इसी विषय पर लिखे एक भिन्न लेख में दिया गया है।
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यहाँ हमें इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि परदे के पीछे जो भी सियासत रही हो , लेकिन निष्पादन जज द्वारा ही किया जाता है। आशय यह कि किसी व्यक्ति को जेल में भेजने की शक्ति सिर्फ जज के पास ही होती है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी इस शक्ति से वंचित है। तो जब किसी व्यक्ति को फंसाना होता है तो "वे" हमेशा जज का ही इस्तेमाल करते है। जब तक जज नहीं चाहेगा तब तक किसी भी व्यक्ति को किसी तरह से जेल में नहीं पहुचायां सकता। और यदि जज किसी व्यक्ति को जेल में भेजना चाहता है तो उसे भी कोई बचा नहीं सकेगा। ऊपर उन कारणों को बताया गया है जो इस बात की पुष्टि करते है कि भारत की अदालतें उतनी ही भ्रष्ट है जितने कि अन्य विभाग।
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राम रहीम जी के मुकदमे से सम्बंधित कुछ तथ्य जो अदालत के फैसले को संदिग्ध बनाते है।
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(a) सन 2002 में वाजपेयी को दो गुमनाम खत प्राप्त हुए ! खतो के बारे में यह दावा किया गया था कि ये पत्र गुरु राम रहीम की साध्वियों द्वारा लिखे गए थे !! और इन खतो में यह दावा किया गया था कि गुरु श्री राम रहीम जी ने 1999 में इन साध्वियों का बलात्कार किया था !! ( मतलब बलात्कार के 2 से 3 वर्ष बाद गुमनाम खत भेजे गए ) !!!
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(b) घटना के 3 साल बाद यानी 2002 में इन गुमनाम खतो के आधार पर वाजपेयी ने सी बी आई जांच के आदेश जारी किये !!!
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(c) इन पत्रों में यह नहीं लिखा गया था कि ये पत्र किसने भेजे है। अत: सी बी आई के आईपीएस अधिकारीयों ने कुछ 20 साध्वियों से बेहद गहन ,संदिग्धार्थक, अनेकार्थक एवं घुमावदार प्रश्न किये। इन बयानों को crpc 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने रिकोर्ड किया गया। और पूछे गए इन अनेकार्थक प्रश्नों के जवाबो को आगे की जांच के लिए "सबूत" के तौर पर मान लिया गया !!!
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(d) 2005 तक सीबीआई ने पीडिताओ से कई बार पूछताछ की। किन्तु हर बार पिड़ीताओ ने बयान दिया कि हमारे साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ !!
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(e) सीबीआई का कहना है कि उन्होंने कथित पीडिताओ को 2002 में ही खोज निकाला था !! किन्तु सीबीआई ने उनके बयान 2006 में दर्ज किये, और 2006 में ही चालान पेश किया।
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(f) CBI ने दोनों पीडिताओ के बयान 2006 में फिर दर्ज किये, और इनमे यह कहा गया कि बलात्कार किया गया था !!
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(g) राम रहीम जी के वकील को दोनों पीडिताओ के बयानों की कॉपी नहीं दी गयी !!
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(h) राम रहीम जी के वकील को पीडिताओ से क्रोस क्वेशचन करने का मौका नहीं दिया गया !!
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(i) पीडिताओ ने अपने बयान बदलने की अनुमति मांगी किन्तु उन्हें बयान बदलने की अनुमति नहीं दी गयी !!
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तकनिकी रूप से मुकदमे का सार यह है कि -- 3 साल बाद प्राप्त हुए गुमनाम पत्रों के आधार पर सीबीआई जांच के आदेश किये गए !! 6 साल बाद सीबीआई ने ख़त लिखने वालो को खोज निकाला और उनके बयान दर्ज किये !! उन्होंने 4 वर्ष तक यह कहा कि "कोई बलात्कार नही हुआ था" !! किन्तु सीबीआई ने इसे नहीं माना !! 2006 में सीबीआई ने दो साध्वियों के बयान दर्ज किये जिनमे कहा गया कि, "बलात्कार हुआ था" !! वकील को इन पीडिताओ से क्रोस क्वेश्चन करने की अनुमति नहीं दी गयी !! पीडीताओ ने अपने बयान बदलने की अनुमति मांगी, किन्तु उन्हें अनुमति नहीं दी गयी !! 11 साल पहले लिए गए इन "बयानों के आधार पर" जज ने घटना के 18 साल बाद राम रहीम जी को दोषी ठहराया !!!
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ध्यान देने वाली बात यह है कि, इस मुकदमे के सम्बन्ध में कोई भी "भौतिक सबूत" बरामद नहीं किये गए। सिर्फ बयानों को आधार पर फैसला दिया गया। जज को यह फैसला करना था कि कौन सच बोल रहा था और कौन झूठ। इस स्थिति में अभियुक्त एवं पीडिताओ का नारको टेस्ट लेकर पता किया जा सकता है कि किसका बयान सच था। किन्तु नारको टेस्ट नहीं लिया गया और जज ने लड़कियों के बयानों को सच मानने का फैसला किया !!!
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सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कि , "लड़की का बयान हर हाल में सच माना जाएगा और लड़की को अपना बयान बदलने की इजाजत नहीं होगी" - मुख्य वजह बनी जिसके कारण सरकार के नियन्त्रण में काम करने वाले सीबीआई के आई पी एस अधिकारी एवं जज श्री राम रहीम जी को जेल में पहुंचा सके।
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सीबीआई के अधिकारियों ने ये बयान मजिस्ट्रेट के सामने कथित crpc की धारा 164 के तहत दर्ज किये थे !! अब यदि बयान देने वाली लड़की अपने बयान को बदलती तो उसे झूठा बयान दर्ज करवाने के मुकदमे का सामना करना पड़ता। इस तरह उन्हें कोर्ट में श्री गुरु राम रहीम के खिलाफ फिर वही बयान देने के लिए बाध्य किया गया !! और फिर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का इस्तेमाल किया गया कि -- लड़की के बयान को अंतिम सत्य एवं अकाट्य सबूत माना जाएगा।
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और फिर हमारे पास ऐसे "शिक्षित" लोगो का जमघट है जो इस प्रक्रिया को "क़ानून का शासन" कह के संबोधित कर रहे है !!!
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इस सम्बन्ध में डेरा प्रमुख की पैरवी करने वाले वकील का साक्षात्कार इस लिंक पर देखें - <https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/1382470518537847>
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राम रहीम जी संत नहीं है , वे विलासी है, ऐश्वर्य प्रिय है, उनके पास गुफाएं है, उनके डेरे में स्वीमिंग पूल है, उन्होंने आलिशान महल बना रखा है, उनके पास दो बाज और 5 तीतर है, उनके पास ढेर सारी जमीन है, वे फिल्मे बनाते है, नाचते-गाते है, क्रिकेट खेलते है, कारोबार करते है , रंग बिरंगे कपड़े पहनते है आदि आदि जैसे बकवास आरोपों को पेड मीडिया द्वारा बार बार इसीलिए दोहराया जा रहा है ताकि बलात्कार के मूल मुकदमे पर चर्चा को टाला जा सके।
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यदि इन फर्जी आरोपों पर बहस नहीं चलाई गयी तो जनता का ध्यान बलात्कार के मुकदमे से जुड़े तथ्यों पर चला जाएगा। और तब जनता को यह मालूम होगा कि "सिर्फ बयान" को आधार बनाकर ही राम रहीम जी को दोषी ठहरा दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट की एक रूलिंग ने जज को यह तय करने का अधिकार दे दिया था कि वह यदि चाहे तो पीड़िता के बयान को सच मान सकता है !! और जज को इस बात में "सुविधा" थी कि लड़की के बयान को सच मान लिया जाए !! इस तथ्य को चर्चा से बाहर करने के लिए मीडिया ने ऊपर दिए गए फर्जी आरोपों की झड़ी बनाकर यह धारणा खड़ी करने की कोशिश की है कि श्री राम रहीम जी एक दुर्जन व्यक्ति है।
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समाधान
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हमारे द्वारा सुझाये गए समाधान निम्न है
(a) सभी प्रकार के मुकदमो की सुनवाई नागरिको की ज्यूरी द्वारा हो।
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(b) राईट टू रिकॉल सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, लोअर कोर्ट जज, पुलिस प्रमुख आदि क़ानूनो को गेजेट में प्रकाशित किया जाए।
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(c) SGPC की तरह हिन्दू धर्म एवं सम्प्रदायों के प्रबन्धन को मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय देवालय ट्रस्ट अधिनियम पारित हो। ताकि श्रद्धालु मंदिर / मठ/ आश्रम प्रमुखों को चुन सके और अनियमितता पाने पर पद से हटा सके। ( सबसे महत्त्वपूर्ण )
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(d) मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाये और मौजूदा ट्रस्टियों की रजामंदी से श्रधालुओ को ऐसी प्रक्रिया दी जाए जिस से वे अपने प्रमुख / ट्रस्टियो को बदल सके।
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जूरी सिस्टम क्या है ?
इस व्यवस्था में किसी भी मुक़दमे की सुनवाई के लिए मतदाता सूची में से रेंडमली 12 से 15 नागरिको को समन भेजे जाते है, इन नागरिको के समूह को ज्यूरी कहते है। मुकदमे की सुनवाई इन आम नागरिको द्वारा की जाती है और ये नागरिक ही मुक़दमे में फैसला देते है । हर मुक़दमे के लिए अलग अलग नागरिको की ज्यूरी होती है । ज्यूरी बहुमत से अपना फैसला देती है। हाईकोर्ट ज्यूरी में 50 - 60 जबकि केस विशेष में 1500 नागरिको तक की ज्यूरी सुनवाई कर सकती है, जिनका चयन राज्य की मतदाता सूची से किया जाता है । मुलजिम को जानकारी नही होती कि लाखो नागरिको में से कौन उसके मुकदमे का फैसला करने वाला है । इस प्रकार भ्रष्टाचार शून्य हो जाता है तथा लाखो न्यायधीश होने से फैसलों का निपटारा त्वरित गति से होता है।
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हमारा प्रस्ताव है कि सभी गवाहों और "तथ्यों" को 1500 नागरिको की ज्यूरी के समक्ष पेश किया जाये। इस ज्यूरी मंडल का रेंडम चयन हरियाणा की वोटर लिस्ट में से किया जाएगा एवं इनका आयुवर्ग 30-45 वर्ष के बीच होगा। यह ज्यूरी सबूतों एवं तथ्यों का अन्वेषण करके यह तय करे कि गुरमीत जी को रिहा किया जाना चाहिए या उन्हें कारावास में भेज दिया जाना चाहिए।
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संत श्री आसाराम जी बापू, संत श्री रामपाल जी , श्री श्री रविशंकर महाराज ( पर्यावरण का मामला ) , स्वामी नित्यानंद जी ( शुक्र है कि उनका मुकदमा निपट चुका है। ) आदि के मामलों में भी हमारा यही प्रस्ताव है कि इनके मुकदमो का निपटान ज्यूरी द्वारा किया जाए। जब जयललिता ने कांची के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती जी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया था तब भी हमने यही प्रस्ताव किया था।
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कुल मिलाकर हमें जजों पर कभी भी भरोसा नहीं रहा। और भरोसा करने का कोई कारण भी मौजूद नहीं है।
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यह देखना बेहद दुखद है कि, इन सभी संतो के अनुयायी करोडो रूपये लेकर वकीलों के चक्कर लगा रहे है, ताकि वकील उन्हें जजों से न्याय दिला सके। एक मात्र अपवाद संत श्री रामपाल जी रहे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि देश के 80% से ज्यादा जज भ्रष्ट है !!
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इन अनुयायियों को इस बात का भान नहीं है कि हमारे जज / प्रशासनिक अधिकारी / पुलिस अधिकारी / मंत्री एवं कल्कि पुरुष तृतीय मोदी साहेब समेत संघ के सभी मंत्री अमेरिकी धनिकों की फौलादी पकड़ में है। ये सभी नेता अधिकारी एवं सभी मीडिया कर्मी ( बिकाऊ अर्नव व बिकाऊ सरदेसाई समेत ) अमेरिकी धनिकों की कठपुतलियां मात्र है।
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गुरमीत जी , श्री आसाराम जी बापू, श्री रामपाल जी , श्री श्री रविशंकर महाराज आदि संतो ने अपने असाधारण कार्यो से इस बात को सुनिश्चित किया कि गरीब /दलित / ओबीसी आदि मिशनरीज के आश्रय में चले जाने की जगह हिन्दू धर्म में बने रहे। मैं फिर से दोहराता हूँ -- यदि आज गरीब /दलित / ओबीसी आदि हिन्दू धर्म में बने हुए है तो मंदिर प्रमुखों, प्राचीन राजाओ, संघ के नेताओं, बीजेपी नेताओं का इसमें योगदान शून्य है। इसका असली श्रेय सिर्फ इन तथा इन जैसे अन्य संप्रदाय प्रमुखों की नयी खेप को जाता है। और विडम्बना यह है कि आज उदारवादी / पढ़े लिखे / आधुनिक हिन्दू इन संतो को जेल में भेज दिए जाने का जश्न मना रहे है !!! हिन्दुओ को अपने नीचे "एक" करने की चाहत रखने वाले संघ के ज्यादातर कार्यकर्ता भी इससे खुश है। उनका नजरिया है कि, चलो अच्छा हुआ। यदि ये सभी संत हवालात में भेज दिए जाते है तो हम उनके अनुयायियों को आसानी से संघ में जोड़ लेंगे !! इन्हें यह अहसास ही नहीं है कि, मिशनरीज की ताकत के सामने इनकी कोई हैसियत नहीं है। यदि संत गुरमीत जी , संत श्री आसाराम जी एवं संत रामपाल जैसे लोग कमजोर हो गए तो दलितों / ओ बी सी / गरीबो की एक बड़ी संख्या मिशनरीज की गोद में जा गिरेगी। ऐसे सभी व्यक्ति जो इन संतो को गलत तरीके से 10-20 साल के लिए जेल में भेज दिए जाने का जश्न मना रहे है दरअसल वे जाने-अनजाने मिशनरीज की मदद कर रहे है।
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कानून का सारांश
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हमने देश में जूरी सिस्टम लागू करने के लिए क़ानून ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है। इस ड्राफ्ट में प्रक्रिया दी गयी है कि किस तरह ज्यूरी को चुना जाएगा , किस तरह ज्यूरी मामला सुनेगी और फैसला देगी आदि।
हमारे द्वारा प्रस्तवित जूरी सिस्टम क़ानून के ड्राफ्ट के मुख्य बिंदु दिए गए है :
यह कानून पारित होने के बाद हत्या, अपहरण, बलात्कार, मारपीट तथा लापरवाही के कारण होनी वाली मौत आदि जैसे अपराधिक मामलो की सुनवाई करने और सजा सुनाने का अधिकार नागरिको की जूरी के पास रहेगा। इस जूरी मंडल का चयन किसी जिले या किसी राज्य अथवा भारत की मतदाता सूचियों में से क्रम रहित ( रेंडमली ) तरीके से किया जाएगा। जूरी सदस्यों का आयु वर्ग 25 से 55 वर्ष के बीच होगा तथा इस जूरी मंडल में 15 से 1500 तक जूरी सदस्य हो सकेंगे | बाद मे यदि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री चाहे तो अन्य प्रकार के अपराधों को भी इसमें जोड़ सकते है। इस क़ानून के लागू होने के बाद से इन मुकदमो का फैसला आम नागरिको के जूरी मंडल द्वारा किया जाएगा न कि जजों द्वारा |
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[ टिप्पणी : इस कानूनी ड्राफ्ट को लोकसभा और राज्यसभा में साधारण बहुमत से पास करके देश में लागू किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि इस कानून को पारित करने के लिए किसी भी प्रकार के संविधान संशोधन की जरुरत नहीं है। ]
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(1) यह कानून हत्या, अपहरण, बलात्कार, मार-पिटाई, धमकी और अन्य सभी ऐसे अपराधों जिनमे शारीरिक बल या शारीरिक हिंसा का प्रयोग किया गया है, के लिए मजिस्ट्रेट अदालतों, जिला अदालतों और सेशन अदालतों में जूरी सिस्टम की स्थापना करता है |
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(2) इस कानून के पारित होने बाद आप (आप अर्थात भारत में पंजीकृत मतदाता) को जूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है | जूरी ड्यूटी में आपको आरोपी, पीड़ित, गवाहों और दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा प्रस्तुत तथ्य और बहस सुननी होगी और सजा / जुर्माना या रिहाई तय करनी होगी |
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(3) किसी जिले में जूरी सिस्टम का पर्यवेक्षण एवं संचालन “जिला जूरी प्रशासक” द्वारा किया जायेगा | जिला जूरी प्रशासक की नियुक्ति मुख्यमंत्री करेंगे तथा आप ( अर्थात अमुक जिले के मतदाता ) जूरी प्रशासक को इस कानून में “राईट टू रिकॉल जिला जूरी प्रशासक” धाराओं में दी गयी प्रक्रिया का प्रयोग करके बदल सकेंगे |
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(4) “राईट टू रिकॉल जिला जूरी प्रशासक” के चयन के लिए आप अधिकतम 5 उम्मीदवारों को किसी भी दिन अनुमोदित कर सकते है, और किसी भी उम्मीदवार का अनुमोदन किसी भी दिन निरस्त कर सकते है | यदि आप अपना अनुमोदन दर्ज नहीं करना चाहते तो आपको अनुमोदन दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है |
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(5) जिस उम्मीदवार के अनुमोदनों की संख्या सबसे ज्यादा हो और यह अनुमोदनो की यह संख्या जिले में दर्ज सभी मतदाताओं के 35% से अधिक हो , तो ऐसा उम्मीदवार पदासीन जिला जूरी प्रशासक को प्रतिस्थापित करके नया जिला जूरी प्रशासक बनेगा |
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ज्यूरी सिस्टम का पूरा ड्राफ्ट देखने के लिए कृपया यह लिंक देखें -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/822033977974798>
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भारत में ज्यूरी सिस्टम लाने के लिए आप क्या कर सकते है ?
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यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो अपने प्रधानमंत्री को @pmoindia पर ट्वीट द्वारा निर्देश भेजें कि इसे गेजेट में प्रकाशित किया जाये।
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प्रधानमंत्री को भेजे जाने वाले ट्वीट का प्रारूप :
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@pmoindia I instruct you to print law mentioned in newindia.in/causes/jury-sys sha1-#8d6dca244ad6d964509df3f99e04a6adea1787fb #JurySystem
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कृपया ऊपर दिए गए ट्वीट को कॉपी करे तथा अपने ट्विटर एकाउंट से @pmoindia पर ट्वीट करे।
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- https://www.facebook.com/pawan.jury/posts/pfbid033dCeJYx2LzgPhzsPghcdXUa5cZLDyuvECvmAgeui7R5CTQ2XiyvD3XiJS4kL6Hmil
- https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/822033977974798
- https://l.facebook.com/l.php?u=http%3A%2F%2Fnewindia.in%2Fcauses%2Fjury-sys&h=AUCiLRSXn7WHUW2KGmF4RTIcYNVrKwDemLW2T2M6kpcF_2Bk5LI_JOWB_4wcfPJFZtCLOu5a1ZVthEp7JCwmAeMznJRgcXmBTjdlj-UabiN6b47kKDqpoBB_ILxMWn3GBmBTOwI1rGDfMavtJogn1wWaO3dvQWYC&s=1
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