> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2020-02-19

Pawan Jury BhilwaraRj

फ़िल्म शोले से संबंधित कम ज्ञात तथ्य क्या है?
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शोले , 1954 में बनी अकिरा कुरोसोवा कि महान फिल्म सेवेन समुराई का रीमेक है !!
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सेवेन समुराई में एक्टिविज्म के एक क्रूर और अनिवार्य सिद्धांत BBB = Betrayal By Beneficiaries का स्पर्श है।
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एक गाँव डाकुओ के गिरोह से पीड़ित है। वे लड़ना नहीं चाहते। अत: 7 जरायम पेशा योद्धाओ को रोटीयों के बदले अपनी जंग लड़ने के लिए किराए पर ले आते है। हालांकि उनकी हैसियत समुराई योद्धाओ को अनुबंधित द्रव्य देने की भी नहीं है।
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किन्तु समुराई जंग लड़ने का फैसला करते है। एक लम्बी लड़ाई के बाद समुराई योद्धा डाकुओ का सफाया कर देते है, जिसमे 4 समुराई योद्धा भी मारे जाते है। लेकिन डाकुओ के भय से मुक्त होते ही गाँव के लोग अपने टुच्चेपन पर लौट आते है , और बचे हुए समुराई योद्धाओ को गाँव छोड़कर जाना पड़ता है। उनके लिए वहां कोई जगह नहीं है।
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बाद में लगभग सभी देशो में इस थीम पर फिल्मे बनायी गयी, और आज भी इस थीम पर लगातार फिल्मे बनायी जाती है। आपराधिक पृष्ठभूमि पर बनने वाली फिल्मो में यह सबसे ज्यादा लोकप्रिय थीम है। लेकिन किसी भी फिल्मकार ने सेवेन समुराई का अंत नहीं दोहराया। क्योंकि इस फिल्म का अंत कठोर यथार्थ है, व दर्शको के हाजमे के खिलाफ पड़ता है।
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शोले में वीरू बसंती के साथ वापिस शहर लौटने के लिए ट्रेन पर सवार हो रहा है। उसे विदाई देने के लिए प्लेटफोर्म पर सिर्फ ठाकुर खड़ा है !! शेष गाँव वाले अपने अपने रोजगार में व्यस्त है !!! वीरू गाँव में ही रह जाना चाहता था। किन्तु जंग जीत जाने के बाद वीरू के लिए यही बेहतर है कि वह गाँव छोड़ दे। अब गाँव वालो को उसकी जरुरत नहीं रह गयी है। यदि गब्बर जेल से फिर छूट आता है तो वीरू को फिर बुला लिया जाएगा !!
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शोले के दर्जनों वर्जन मौजूद है, और एक संस्करण यह है कि, गब्बर जज को पैसा देकर फिर छूट जाता है, और आकर ठाकुर के पैर भी काट देता है। लूटपाट शुरू होने पर गाँव वाले वीरू को फिर से बुलाते है, लेकिन बसंती वीरू को लौटकर जाने से मना कर देती है !!
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BBB = अर्थात , जिसे लाभ पहुँचाने के लिए पीड़ा सही गयी हो उसी के द्वारा तिरस्कृत होना !! जब एक्टिविस्ट देश की व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए गंभीर प्रयास करते है, और जब इनके लम्बे संघर्ष के नतीजे में अमुक परिवर्तन आते है, तो समुदाय इन्हें जीते जी भुला देता है, और बहुधा उन्हें तिरस्कार झेलना पड़ता है। किन्तु जब / यदि वे मर जाते है तो भरपयी करने के लिए इनमे से कुछ की मूर्तियाँ लगा दी जाती है !!
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लम्बे संघर्ष के कारण ज्यादातर इनमे वह शक्ति नहीं रह जाती कि, वे इन सकारात्मक परिवर्तनों का लाभ उठा कर इसका उपभोग कर सके। और समुदाय उन्हें एवज में अतिरिक्त लाभ देने की अवहेलना करता है। समुदाय हमेशा ऐसा करते आया है, और एक्टिविस्ट हमेशा बावजूद इसके समुदाय के लिए लड़ते रह कर तिरस्कृत होते रहते है !!
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अहिंसा मूर्ती महात्मा बटुकेश्वर दत्त जी ने अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी के साथ असेम्बली में बम फेंका था। उन्हें जेल हुई और लगभग 1947 तक वे निरंतर जेल में रहे। टीबी होने के कारण उनका शरीर अशक्त हो गया था।
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आजादी के बाद न तो उन्हें पेंशन दी गयी, न ही उनके जीवन यापन का कोई प्रबंध किया गया। 48 वर्ष की आयु में उन्होंने शादी की और ट्यूशन पढ़ाकर, सब्जी बेचकर अपना गुजारा किया !! बावजूद इसके वे लेंड रिफोर्म्स लाने के लिए आन्दोलन एवं प्रयास करते रहे !! बेहद गरीबी में जीवन बिताते हुए 1965 में महात्मा बटुकेश्वर दत्त को एक अनजान मृत्यु नसीब हुयी !! आजादी के बाद उन्होंने जो जीवन जिया, वह उस संघर्ष से ज्यादा त्रासद था जो उन्होंने आजादी पाने के लिए किया था !!
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