Pawan Jury BhilwaraRj
दांडी मार्च का क्या महत्व है?
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दांडी मार्च अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी की पूर्ण स्वराज्य की मांग को तोड़ने के लिए निकाला गया था !!
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गोरो ने नमक पर टेक्स प्लासी का युद्ध जीतने के साथ ही लगा दिया था। आगे जैसे जैसे वे अन्य इलाकों का अधिग्रहण करते गए वैसे वैसे नमक पर टेक्स भी बढता गया। 1860 में गोरो की कुल आय में 10% हिस्सा नमक के टेक्स से आता था। 1882 में साल्ट एक्ट पास होने से नमक बनाने पर ब्रिटिश साम्राज्य का एकाधिकार हो गया। इस दौरान नमक को लेकर लगातार देश भर में विरोध प्रदर्शन और आन्दोलन होते रहते थे। तो नमक का क़ानून और इसका देश में विरोध कोई नयी बात नहीं थी।
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1923 में गोरो ने नमक पर टेक्स अचानक दुगना कर दिया !! तो मोहन भाई को यह बात समझने में 7 साल क्यों लगे कि नमक पर डबल टेक्स डालना एक गलत फैसला है ? इसके जवाब के लिए आपको उनके दांडी मार्च की टाइमिंग देखनी पड़ेगी।
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अप्रेल , 1929 में अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी ने असेम्बली में बम फेंका, जून, 1929 में ट्रायल शुरू हुयी और जेल में 66 दिन की भूख हड़ताल के कारण सितम्बर, 1929 में महात्मा जतीन्द्र नाथ दास का प्राणांत हो गया।
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पहले सांडर्स का वध , फिर काकोरी काण्ड , और फिर असेम्बली में बम फेंक कर गिरफ्तारी देनें से ये क्रांतिकारी अचानक से सबकी नजरो में आ गए। और जब इन्होने 66 दिन लम्बी भूख हड़ताल की और अपने प्राण भी दे दिए तो इनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी की तस्वीर की भी इसमें भूमिका थी। असेम्बली में बम फेंकने से एन पहले अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी ने यह फोटो निकलवाई थी, और अपने साथी क्रांतिकारियों को देकर गए थे।
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फोटो का इस्तेमाल बांटे जाने वाले पर्चो एवं समाचार पत्रों के लिए किया जाना था। जैसे जैसे ट्रायल आगे बढ़ रही थी वैसे वैसे कार्यकर्ता भी पूर्ण स्वराज्य की मांग को लेकर जनता के बीच पर्चे बाँट रहे थे। छोटे समाचार पत्रों ने जब रोजाना ट्रायल के संवाद और घटनाक्रम छापना शुरू किये तो उनकी बिक्री बढ़ने लगी, और इस वजह से मुख्य धारा के बड़े समाचार पत्रों को अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी के बारे में ख़बरें छापनी पड़ी।
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इस पूरे घटनाक्रम का प्रभाव यह हुआ कि अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी की लोकप्रियता सिर्फ 1 वर्ष के भीतर मोहन दास से आगे निकल गयी थी। खुद जवाहर लाल और मोहन ने इस बात को स्वीकार किया था कि जनमानस की ऐसी लोकप्रियता और स्नेह सदियों में किसी को नसीब होता है। कुल मिलाकर भारत के लोगो को एन वक्त पर अनशन तोड़ देने के आदी एक बुड्ढे की बजाय 21-22 साल के ऐसे दिलेर नवयुवको पर ज्यादा भरोसा हो गया था जो अपनी जान की बाजी लगा चुके थे।
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गोरो को अब यह भय था कि - अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी की लोकप्रियता बढ़ने से देश के अन्य नवयुवक भी भगत सिंह जी का अनुसरण करेंगे। और उनका अनुसरण करने का मतलब है, वे कहीं से बन्दुक जुटाएंगे और आते जाते अंग्रेज अधिकारियो पर गोलियां चलाकर गुम हो जायेंगे। अगर इस तरह नवयुवको ने 10-12 गोरो को भी उड़ा दिया गया तो अंग्रेज अधिकारियो में दहशत फैलेगी और वे नौकरी छोड़ कर इंग्लेंड रवाना हो जायेंगे !!
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मोहन को चिंता थी कि - यदि अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी की लोकप्रियता इसी तरह से बढती रही तो आजादी आन्दोलन का नेतृत्व उनके हाथ से निकल जाएगा। क्योंकि अब ज्यादातर भारतीयों को उनकी चरखा रेजिमेंट पर भरोसा नहीं रह गया था।
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गोरो एवं मोहन भाई ने तय यह पाया थी कि कोई ऐसा आन्दोलन शुरू किया जाए जिससे पूरे देश का ध्यान भगत सिंह जी से हटाया जा सके। उस समय कोई बढ़िया मुद्दा नजर नहीं आ रहा था, तो 1923 के नमक क़ानून पर मूवमेंट खड़ी करने पर बात ठहरी। किन्तु मूवमेंट का डिजाइन तय नहीं हो पा रहा था। अनशन में उतना प्रभाव नहीं बनता , क्योंकि क्रन्तिकारी अनशन में अपनी जान देकर उनसे एक स्टेप आगे निकल चुके थे।
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धरना और चरखा वगेरह में भी खाली बैठ कर भजन गाने होते है , अत: इसका आकर्षण 2-3 दिन में ख़त्म हो जाता। कोई ऐसी युक्ति चाहिए थी कि महीने दो महीने तक जनता को पूरी तरह से फंसा कर रखा जा सके। जिसमे नयापन और एक ऐसा सिलसिला हो जो लोगो को किसी रोचक क्लाइमेक्स की तरफ ले जाता हो। तो इन तत्वों की मांग पूरी करने का आदर्श सामने रखकर 25 दिन के दांडी मार्च का फोर्मेट बनाया गया।
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मोहन ने पहले से ही घोषणा कर दी थी कि 12 मार्च को निकलेंगे। पेड मीडिया भी सभी को बता रहा था कि मोहन भाई बड़ी भयंकर मूवमेंट के लिए निकलने वाले है, और इससे अंग्रेजी राज में हडकंप है !! तब भी सिर्फ 60-70 लोग इकट्ठे हुए और उन्होंने इन लोगो के साथ यात्रा शुरू की। अंग्रेजो ने पेड समाचार पत्रों के सभी पेज पर मोहन की दांडी मार्च के विवरण छापने शुरू किये , और साथ में यह भी छापा जाता था कि वायसराय दांडी मार्च से बहुत घबरा गए है , यदि उन्होंने नमक बना दिया तो ब्रिटिश साम्राज्य पूरी तरह से हिल जाएगा।
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अखबारों में नियमित रूप से छापा जाता था कि आज मोहन भाई 10 किमी चले है , उन्होंने 3 किमी चलने के बाद अमुक जगह पर चिउड़ा खाया था, उस जगह यात्रियों को घूघरी दी गयी। अभिनव सेवा समिति ( इन्हें फंडिग टाटा , बिरला आदि कर रहे थे ) ने रात में टेंट लगवाये है।
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इसे कवर करने के लिए लन्दन से पत्रकारों को भी बुलाया गया , और वे अपनी डायरिया लेकर मोहन के साथ चलते जाते थे , और उनके साक्षात्कार लेते थे। मामले को रोचक बनाने के लिए अख़बार में रिपोर्ट किया जाता था कि गोरो द्वारा कल मार्च रोक दिया जायेगा। देखते है क्या होता है, आदि आदि। ख़बरों के साथ ही मोहन के फोटो भी प्रकाशित किये जाते थे। इस तरह 12 मार्च 1930 से 6 अप्रेल 1930 के बीच पेड मीडिया की सहायता से देश भर में वैसा ही एक सनसनीखेज तमाशा खड़ा किया गया जैसा कि 2012 में द अन्ना के लिए खड़ा किया गया था !!
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इस पूरी नौटंकी का नतीजा यह हुआ कि अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी एवं उनके द्वारा खड़ी की गयी पूर्ण स्वराज्य की मांग खबरो से बाहर हो गयी !! दांडी पहुँचने के बाद जनता का ध्यान खींचने के लिए लोगो को गिरफ्तार करना शुरू किया गया। मोहन को भी गिरफ्तार किया गया। इसी दौरान मोहन भाई को छोड़ कर बाकी लोगो को दांडी में लट्ठ भी खाने पड़े !!
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मोहन को गिरफ्तार करने के बाद भी जेल से रोज रिपोर्टिंग की जाती थी। इसी दौरान ट्रायल को स्पीड देने के लिए वायसराय ने 1 मई 1930 में एक स्पेशल ट्रिब्यूनल बनाया और नियमित सुनवाई के आदेश दिए। 30 सितम्बर को ट्रायल ख़त्म हुआ। कुछ दिन जेल में आराम करने के बाद मोहन भाई नमक क़ानून पर तबसरा करने के लिए द्वितीय गोलमेज सम्मलेन के लिए इंग्लेंड निकल गए !!
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लगभग 2 महीने तक चले डेली सोप ; दांडी मार्च का नतीजा -
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स्क्रिप्ट बहुत अच्छे से लिखी गयी थी , और सब कुछ अंग्रेजो एवं मोहन भाई की योजना के अनुसार हुआ। मोहन भाई ने महीने भर तक देश में माहौल बनाया , लोगो को मीलो पैदल चलवाया, नमक बनाने के एवज में कार्यकर्ताओ को लठ्ठ खिलाये , कुछ की हड्डियाँ तुड़वायी और बाद में मामला बीच में लटका कर लंदन निकल गए !!
और नमक के क़ानून का क्या हुआ ?
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वेल , गोरो ने न तो नमक क़ानून रद्द किया और न ही कोई राहत दी !!
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और इस पूरे भम्भड़ के अंत में सबसे रोचक बात यह हुयी कि ब्रिटिश को नमक से होने वाली आय बढ़ गयी !! मतलब उन्होंने इसकी निगरानी और भी बढ़ा दी थी। दांडी मार्च की सफलता के अन्य विवरण आपको पेड इतिहासकारों द्वारा लिखी गयी पेड पाठ्य पुस्तको में मिल जायेंगे !!
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[ क्या आप जानते है अहिंसा मूर्ती महात्मा चन्द्रशेखर आजाद एवं महात्मा सच्चिन्द्र नाथ सान्याल ने 1925 में HSRA = हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोशिएसन की स्थापना की थी एवं अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह ने इस संगठन की सदस्यता 1927 में ली थी।
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HSRA के मेनिफेस्टो में यह स्पष्ट रूप से लिखा था कि : हम जिस गणराज्य की स्थापना करना चाहते है उसमे नागरिको के पास वोट वापसी लेने का अधिकार भी होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो लोकतंत्र एवं मजाक बनकर रह जाएगा !! ]
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