Pawan Jury BhilwaraRj
हमें भारतीय संविधान में से अल्पसंख्यक शब्द निकाल देना चाहिए।
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यदि संविधान में संशोधन किये बिना इस समस्या को हल करना हो तो प्रधानमंत्री अल्पसंख्यक आयोग के बजट में 90% एवं आयोग के स्टाफ में 95% की कटौती करें। इससे अल्पसंख्यक आयोग जमा हो जाएगा , और निर्जीव होकर एक तरफ पड़ा रहेगा। संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि अल्पसंख्यक आयोग को इतना उतना बजट देना होगा , और इसमें इतना स्टाफ रखना होगा। इस तरह मोदी साहेब बिना संविधान में संशोधन किये भारत में "माइनोरिटी स्टेटस" का यह सर्कस ख़त्म कर सकते है।
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माइनोरिटी स्टेटस पाने के लिए किसी समुदाय को अलग से वर्ग बनाना होता है। तो इसी वजह से 2014 में जैन हिन्दू धर्म से अलग हो गये, एवं अब लिंगायत समुदाय ने भी भी खुद को हिन्दूओ से अलग कर लिया है। कर्नाटक सरकार ने लिंगायत को हिन्दू धर्म से अलग करने के लिए क़ानून पास कर दिया है।
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माइनोरिटी स्टेटस मिलने से पहला फायदा यह है कि, अमुक वर्ग को अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिलने लगते है , एवं अमुक समुदाय को सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि, उनके स्कूल एवं धर्म स्थल सरकारी पकड़ से बाहर हो जाते है। सरकार जिस गति से हिंदू मंदिरो को टेक ओवर करके हजम कर रही है , जिस तरह से निजी स्कूलो से हफ्ता वसूल रही है , उसे देखते हुए यह इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि जल्दी ही हम कई अन्य समुदायों को भी माइनोरिटी स्टेटस की मांग के लिए सड़को पर उतरते देखेंगे। सरकारें अपने वोट बढ़ाने के लिए इन्हे माइनोरिटी स्टेटस देती चली जायेगी।
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ज्ञातव्य है कि , RTE एक्ट अल्पसंख्यको के स्कूलों पर लागू नहीं होता , एवं सरकार सिर्फ हिन्दू मंदिरो को ही टेक ओवर कर सकती है, माइनोरिटी स्टेटस प्राप्त समुदाय के धर्म स्थलों को नहीं।
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