> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2018-04-11

Pawan Jury BhilwaraRj

Lee Kuan Yew = LKY ने सिंगापुर की काया पलटने के लिए एक बेहद आसान रास्ता चुना --- उसने देश ब्रिटिश के हवाले कर दिया !!! नतीजा --- 1960 में सिंगापुर में ईसाई आबादी सिर्फ 4% थी , जो कि अब बढ़कर 20% हो गयी है। इसके अलावा आज सिंगापुर की पूरी अर्थव्यवस्था ब्रिटिश , अमेरिकन और यूरोपियन कम्पनियों के नियंत्रण में है !!
.
1920 के आसपास ब्रिटिश साम्राज्य ने अपना प्रभाव बढाने के लिए एक नए तरीके का इस्तेमाल करना शुरू किया। वे ऐसे नेताओं को प्रोत्साहन देने लगे जो बोलते तो ब्रिटिश के खिलाफ थे , लेकिन कार्य सभी ऐसे करते थे जिससे ब्रिटिश को फायदा हो। महादुरात्मा गांधी इस कैटेगरी में उनका सबसे बेहतर प्रोडक्ट था। उसकी भाषणबाजी ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ होती थी , अत: इसे सुनकर ब्रिटिश के खिलाफ लोगो में पनप रहा गुस्सा काफूर हो जाता था। लेकिन महादुरात्मा गांधी इस नौटंकी द्वारा क्रन्तिकारी युवाओं को बड़ी तेजी से नारेबाज एवं निरापद सामाजिक कार्यकर्ताओ में रूपांतरित कर रहा था।
.
बाद में इस तकनीक का इस्तेमाल उन नेताओं को उभारने में किया गया, जिनका ब्रिटिश जाहिर तौर पर छद्म विरोध करते थे एवं अमुक नेता भी इस तरह से प्रदर्शित करता था कि वह ब्रिटिश-विरोधी नजर आये। लेकिन अमुक नेता उन नीतियों का समर्थन करता था जिससे अमेरिकी-ब्रिटिश उद्योगपतियों को फायदा हो और स्थानीय उद्योग टूटते चले जाए। लेकिन इसे इस तरह रचा जाता था जिससे अवाम को यह लगे कि अमेरिकी-ब्रिटिश हमारे नेता का प्रतिरोध कर रहे है , लेकिन इस प्रतिरोध के बावजूद हमारा नेता आगे बढ़ता जा रहा है !!!
.
सिंगापुर का LKY = ली इसी श्रेणी का नेता था। उसके तेवर देखकर लगता था कि यह आदमी अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों के खिलाफ है , और अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक भी कभी कभार उसके प्रति अपना रोष प्रकट करते थे। साथ ही अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक इस तरह का दिखावा करते थे जिससे अवाम को यह लगे कि अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक 'ली' को तोडना चाहते है। लेकिन अमेरिकी-ब्रिटिश धनिको एवं 'ली' के बीच इस तरह का सुविधापूर्ण गठजोड़ था कि ये दोनों एक दुसरे को फायदा पहुंचाते थे !! और 'ली' ने पश्चिमी धनिकों के पक्ष में इस तरह की नीतियाँ बनायी कि पूरे सिंगापुर में स्थानीय उद्योगों का नाश हो गया !!
.
सिंगापुर आज सिर्फ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं कारोबारियों का हेडक्वाटर बन कर रह गया है। सिंगापुर में किसी भी प्रकार की निर्माण इकाइयां नहीं है , हथियारों का निर्माण तो दूर की बात है। सिंगापुर की तुलना यदि इस्राएल से की जाये तो इस्राएल में निर्माण इकाइयों का मजबूत ढांचा मौजूद है , एवं अपने आधुनिक हथियारों का उत्पादन इस्राएल खुद करता है।
.
1960 के बाद सिंगापुर के इतिहास में मुख्य रूप से ध्यान देने योग्य बात यह है कि --- आखिर क्यों मलेशिया व इंडोनेशिया सिंगापुर को आपस में आधा आधा बाँट लेने में सफल नहीं हुए थे ? जवाब अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक है। तब इंडोनेशिया एंव मलेशिया के नेताओं पर भी अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का पर्याप्त नियंत्रण था, और वे सिंगापुर को टेकओवर होने देना नहीं चाहते थे।
.
बाद में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों एवं जापानियों का कारोबारी नियंत्रण एशिया में बढ़ गया। लेकिन इन सभी देशो में सैन्य विद्रोह और / या कम्युनिस्ट क्रांति की सम्भावना के चलते उन्हें एक सुरक्षित देश की तलाश थी। उन्होंने पहली प्राथमिकता सिंगापुर को दी। हांगकांग उनकी दूसरी पसंद था।
.
'ली' ने सब कुछ आउटसोर्स कर लिया था -- नीतियों से लेकर निष्पादन तक !! बदले में अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने सिंगापुर शहर को उतने अच्छे से प्रबंधित किया, जितना पश्चिम में भी कोई शहर नहीं है।
.
तो इसमें दिक्कत क्या है ?
.
इस तरह के विकास के लिए मोटी कीमत चुकानी पड़ती है। पहला नुकसान यह है कि जब विदेशी पूँजी आती है तो वह स्थानीय धर्म को अपने धर्म से बदल देती है --- कोई दया नहीं , कोई अपवाद नहीं। मोदी साहेब के अंध भगत एवं संघ के स्वयंसेवक विदेशी निवेश आने की ख़ुशी में जो बार-बालाओं की तरह सड़को पर नृत्य कर रहे है उसकी वजह यह है कि, वे इस कड़वे सत्य पर चर्चा से बचना चाहते है !! 1960 में जब 'ली' ने सत्ता सम्भाली थी तो सिंगापुर में इसाईयत सिर्फ 4% थी, जो कि अब बढ़कर 20% हो गई है !! यह वृद्धि दर भी तब है , जब ईसाई समुदाय में जन्म दर काफी निम्न रहती है। इस सम्बन्ध में और अधिक जानकारी के लिए गूगल करें।
.
अगला नुकसान -- अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियों ने स्थानीय निर्माण एवं हथियार निर्माण इकाइयों को पूरी तरह से ख़त्म कर दिया। आज सिंगापुर बन्दुक नहीं बनाता , कारतूस नहीं बनाता और यहाँ तक कि वे 1 ग्राम गन पाउडर तक नहीं बनाते !! सिंगापुरियन कारे तो नहीं बनाते , लेकिन वे कारो के टायर तक नहीं बनाते !! वहां सभी प्रकार का बेहतरीन सामान उपलब्ध है -- लेकिन यह सभी आयातित है !!
.
गणित-विज्ञान एवं इंजनियरिंग की शिक्षा का स्तर वहां अच्छा है --- लेकिन वास्तविक निर्माण इकाइयां न होने की वजह से यह शिक्षा सिर्फ पाठ्यक्रम एवं जबानी जमा खर्च तक ही सीमित है। वहां इसकी कोई व्यवहारिक उपयोगिता नहीं। आप पसंद करे या न करे, लेकिन सिर्फ निर्माण इकाइयों की आपसी प्रतिस्पर्धा ही इंजीनियरिंग के स्नातको को अपना हुनर तराशने का अवसर देती है। किताबी ज्ञान सिर्फ आभासी ज्ञान है। एक दुसरे का चमड़ा उधेड़ देने वाली वास्तविक प्रतिस्पर्धा में इंजीनियरिंग के स्नातको की क्षमता उस किशोर के समान है , जिसने ब्रूस ली की सभी फिल्मे दर्जनों बार देखी हो लेकिन उसे कभी रिंग में उतरने का अवसर न मिला हो।
.
लेकिन अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने सिंगापूर को अधिगृहित करने बाद उनकी विज्ञान-गणित एवं इंजीनियरिंग की शिक्षा का कबाड़ा क्यों नहीं कर दिया ? वजह -- अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक सिंगापुर को समृद्ध होता दिखाना चाहते थे , वर्ना सिंगापुर के मलेशिया में विलय होने की मांग बढ़ जाती। लेकिन फिलिपिन्स के साथ ऐसी कोई शर्त नहीं थी, अत: अमरीकी-ब्रिटिश धनिकों ने फिलिपिन्स में विज्ञान-गणित की शिक्षा को बर्बाद कर दिया। अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने साउथ कोरिया में भी 1960 में प्रवेश किया था। तब कोरिया में ईसाई आबादी 4% थी, जो आज बढ़कर 40% हो गयी है !! लेकिन नार्थ कोरिया के साथ संभावित प्रतिरोध से निपटने के लिए अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने साऊथ कोरिया में निर्माण इकाईयो को बनाए रखा , लेकिन हथियार निर्माण इकाइयों को पूरी तरह से खत्म कर दिया। साउथ कोरिया में भी आज जो निर्माण इकाईया है उन पर तथा उनकी समूची अर्थव्यस्था पर अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का नियंत्रण है।
.
लेकिन जैसे ही अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक मलेशिया को ख़त्म करने में सफल होंगे , जो कि वे चाइना को कमजोर करने के बाद ही कर सकेंगे, वैसे ही सिंगापुर को वे फिलिपिन्स में रूपांतिरत कर देंगे। और तब सिंगापुर किसी भी तरह अपनी अर्थव्यवस्था बचा नहीं सकेगा , क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था पर आज भी उनका नियंत्रण नहीं है।
.
समाधान ?
.
हमारे पास यहाँ भारत में पहले से इतनी समस्याएँ मौजूद है कि हमें दुसरे देशो की समस्याओ पर अपना सिर एवं डेटा खपाना शोभा नहीं देता। अत: उनकी समस्या के समाधान पर अपनी उर्जा खर्च करने से हमें परहेज करना चाहिए।
.
परन्तु सिंगापुर की दशा से हम एक जाना पहचाना एवं सीधा सबक ले सकते है --- विदेशी पूँजी किसी भी तरीके से हमारे लिए अच्छे परिणाम नहीं देने वाली है। अत: संघ के स्वयंसेवको द्वारा एफडीआई के पक्ष में दिए जा रहे सभी एलान पूरी तरह से गलत एवं भ्रामक है। स्थानीय निर्माण इकाइयों को सुधारने का सबसे आसान एवं सटीक तरीका है -- राईट टू रिकॉल , ज्यूरी सिस्टम , वेल्थ टेक्स एवं जनमत प्रक्रियाओ से युक्त शासन।
.
इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट देखने के लिए मेरे कवर पिक्चर पर क्लिक करें एवं डिस्क्रिप्शन देखें।
.
========