> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2018-04-16

Pawan Jury BhilwaraRj

A) क्या सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना करके बलात्कार , स्त्री शोषण , चोरी , डकैती , धोखाधड़ी जैसे अपराधो को रोका जा सकता है ?
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B) कैसे समुचित दंड विधान के अभाव में नैतिक मूल्यों का पालन करने वाले लोग पिछड़ जाते है ?
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A) क्या सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना करके बलात्कार एवं स्त्री शोषण जैसे अपराधो को रोका जा सकता है ?
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मान लीजिये कि किसी समुदाय के 1000 व्यक्तियों को सांस्कृतिक मूल्यों का पालन करने की शिक्षा दी जाती है। मान लीजिये कि इनमे से सिर्फ 1% यानी कि 10 लोगो पर पर इन उपदेशो का कोई असर नहीं होता , और ये 10 लोग सांस्कृतिक मूल्यों की अवहेलना करके लाभ उठाने की कोशिश करते है। जब ये 10 लोग ऐसा करेंगे तो इन्हें अतिरिक्त लाभ मिलेगा। अब यदि इन्हें कोई दंड न दिया जाए तो उनके हौंसले और भी बढ़ेंगे व ये और भी ज्यादा सांस्कृतिक मूल्यों की अवहेलना करके लाभ उठाने की कोशिश करेंगे। इन्हें लाभ की अवस्था में देखकर शेष लोग अपने आप को बेवकूफ समझने लगेंगे अत: वे भी सांस्कृतिक मूल्यों की अवहेलना करने लगेंगे। इस तरह सांस्कृतिक मूल्यों को धता बताने वालो की संख्या बढ़ती चली जायेगी !! जब इनकी संख्या क्रमिक रूप से बढती चली जायेगी तो सांस्कृतिक मूल्यों की अवहेलना करना चलन में आ जायेगा।
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अत: हमारे विचार में यदि आप सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना करना चाहते है तो आपको दंड के विधान को यानी अदालतों को चुस्त एवं निष्पक्ष बनाने की जरूरत है।
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B) कैसे समुचित दंड विधान के अभाव में नैतिक मूल्यों का पालन करने वाले लोग बर्बाद हो जाते है ?
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"ईमानदारी सर्वश्रेष्ठ नीति है" -- एक उदाहरण से समझते है कि यह नीति किस तरह किसी ईमानदार व्यक्ति को बर्बाद कर सकती है ;
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मान लीजिये कि किसी क्षेत्र में 100 कपड़ा डाई करने के कारखाने है। प्रत्येक प्रोसेस हाउस 1 लाख मीटर कपडा प्रतिदिन प्रोसेस करता है। मान लीजिये कि प्रोसेस करने की लागत 10 रूपये प्रति मीटर है। कानूनन इन प्रोसेस हाउस को अपशिष्ट जल को रिसाइकिल करना होता है। अब मान लीजिये कि इनमे से कोई एक प्रोसेस पैसा बचाने के लिए यह पानी रिसाइकिल न करके समीपस्थ नदी-नाले या मुक्त भूमि में बहाता है , और प्रदुषण अधिकारी को इसके बदले में 10 हजार की घूस दे देता है। इससे अमुक प्रोसेस की लागत 10 रूपये प्रति मीटर से घटकर 9.50 रह जायेगी और वह अपने टेक्सटाइल कम्पनियों को 50 पैसे कम में कपड़ा प्रोसेस करने का ऑफर देने लगेगा। अब यदि वह टेक्स भी चुराने लगता है तो उसकी लागत घटकर 9 रूपये रह जायेगी। यदि वह बिजली चोरी भी करने लगता है यह लागत घटकर और भी कम हो जायेगी। अब उसकी प्रतिस्पर्धी इकाइयों के पास सिर्फ दो विकल्प रहेंगे -- १) या तो वे भी बेईमानी करना शुरू करें, या २) बाजार से बाहर हो जाए !!
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यदि दंड का विधान करने की व्यवस्था चुस्त है तो अदालत इस एक व्यक्ति को त्वरित रूप से दण्डित कर देगी और अन्य प्रोसेस हाउस को बेईमानी करने के लिए बाध्य नहीं होना पड़ेगा।
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सार यह है कि जब हम देश में हो रहे अपराधो को कम करने पर विचार करे तो इसका समाधान हमें प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यस्था में ढूंढना चाहिए। बिना अदालतें सुधारे सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों से सम्बंधित विमर्श करना दिल्लगी है। इससे वास्तविक सुधार तो कभी आते नहीं परन्तु कार्यकर्ताओ का ध्यान वास्तविक समाधान से अवश्य हट जाता है। सांस्कृतिक-नैतिक मूल्यो का पालन करना अच्छी बात है , किन्तु हमें यह बात समझनी चाहिए कि समस्त सांस्कृतिक-नैतिक मूल्य प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था पर ही अवलंबित है।
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भारत के जज अव्वल दर्जे के भ्रष्ट है। नेता , अधिकारी आदि जजों के भ्रष्टाचार के सामने कही नही ठहरते। सिर्फ यही वजह है की भारत में सांस्कृतिक-नैतिक मूल्यों का निरंतर क्षरण होता जा रहा है।
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समाधान के रूप में हमारा प्रस्ताव है अदालतों को चुस्त एवं जजों को ईमानदार बनाने के लिए जूरी सिस्टम एवं राईट टू रिकॉल जज क़ानून गेजेट में प्रकाशित किये जाए। इन कानूनों के ड्राफ्ट देखने के लिए मेरी फेसबुक प्रोफाइल का कवर पेज क्लिक करके डिस्क्रिप्शन देखें।
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