> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2018-04-06

Pawan Jury BhilwaraRj

मैकाले व्यवस्था Vs गुरुकुल व्यवस्था Vs वर्तमान शिक्षा व्यवस्था -- प्रस्तावित समाधान
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यह आलेख अकादमिक शिक्षा व्यवस्था के बारे में सामान्य एवं मूलभूत जानकारी देता है। अकादमिक शिक्षा व्यवस्था के मूलभूत तत्वों की अवहेलना करने के कारण शैक्षिक सुधार के इच्छुक कार्यकर्ता बहुधा व्यवस्था में सुधार की सही दिशा में कार्य नहीं कर पाते। साथ ही इस लेख में ऐसी प्रस्तावित प्रक्रिया के बारे में भी बताया गया है जो कि ज्ञात शिक्षा व्यवस्थाओ में सबसे बेहतर है।
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शिक्षा का उद्देश्य - शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य "युद्ध में" तथा द्वितीय उद्देश्य "बाजार में" टिके रहने की काबिलियत जुटाना है।
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युद्ध में टिके रहने से सम्बंधित शिक्षा से क्या आशय है ?

शिक्षा व्यवस्था को इस तरीके का होना चाहिए जिससे छात्रों के तकनीकी कौशल में वृद्धि हो ताकि ये छात्र आगे चलकर इंजीनियरिंग के क्षेत्र में विभिन्न आविष्कार करने में सक्षम हो जाये। यदि देश की तकनिकी शिक्षा का स्तर बेहतर होगा तो वहां के छात्र आगे चलकर तकनीक के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन करेंगे। इससे नागरिक जीवन में आ रही विभिन्न समस्याओ का समाधान तकनीकी आविष्कारो से किया जा सकेगा और यही तकनीक आगे चलकर आधुनिक हथियारों का निर्माण करेगी। यदि किसी देश की पीढ़ी में बेहतर स्वदेशी हथियारों को बनाने की काबिलियत होगी तो अमुक देश की सेना मजबूत होगी तथा यह देश दुश्मन देश की सेनाओं से युद्ध के दौरान टिका रहेगा। तकनिकी शिक्षा के अभाव में इसका उल्टा होगा। तकनीक में पिछड़ने से देश हथियारों के निर्माण में पिछड़ जायेगा। सैन्य दृष्टी से कमजोर होने पर वह आसान निशाना बनेगा और युद्ध में हारकर अपनी सभी संपदा गवां देगा।

उदाहरण के लिए दो देशो "अ" तथा "ब" पर विचार कीजिये। 'अ' देश में छात्रों को भूगोल, इतिहास, दर्शन, साहित्य, कला, संगीत आदि की प्रमुख रूप से शिक्षा दी जाती है जबकि देश 'ब' में छात्रों को प्रमुख रूप से गणित एवं विज्ञान पढाया जाता है। इस स्थिति में गणित एवं विज्ञान के अध्यापन के कारण 'ब' देश के छात्र रोजगार के लिए निर्माण उद्योग की और रूख करेंगे और धनार्जन के लिए इसी क्रम में वे नयी तकनीको का आविष्कार कर लेंगे। वे साईकिल में इंजन लगाकर मोटर साइकिल बना देंगे , फिर कारो के इंजन बनाने लगेंगे और जल्दी ही ट्रेन एवं ट्रक के इंजन बनाने लगेंगे और अंत में वे टैंक का इंजन बना लेंगे।

चूंकि देश 'अ' के नागरिक इंजीनियरिंग में इतने कुशल नहीं है अत: वे तकनीक के क्षेत्र में पिछड़े हुए रहेंगे। जब 'ब' देश के पास के पास बेहतर टेंक बनाने की क्षमता आ जायेगी तो वे बड़े पैमाने पर इनका निर्माण करेंगे और देश 'अ' पर हमला करके उसे लूट लेंगे। देश 'अ' के नागरिको को अपनी सम्पत्ति गवांनी पड़ेगी और उन पर 'ब' देश का शासन स्थापित हो जाएगा। मानव सभ्यता का पूरा इतिहास युद्धों का इतिहास है। जिन देशो ने बेहतर हथियार बनाये उन्होंने सम्पन्न किन्तु तकनिकी रूप से पिछड़े हुए देशो पर कब्ज़ा कर लिया। इसीलिए एक बेहतर शिक्षा व्यवस्था उसी को कहा जा सकता है जो अमुक देश की सैन्य शक्ति को मजबूत बनाए।
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बाजार में टिके रहने की काबिलियत जुटाने से क्या आशय है ?
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शिक्षा रोजगारोन्मुख होनी चाहिए। इतिहास, भूगोल, साहित्य, कला, संगीत, राजनीति विज्ञान, लोक प्रशासन, दर्शन शास्त्र आदि विषय बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन नहीं करते। दरअसल इन विषयों में कोई उत्पादकता ही नहीं है। इनका अध्ययन देश के लिए अनुत्पादक है। जबकि विज्ञान, गणित तथा तकनिकी हुनर से सम्बंधित विषय निर्माण इकाइयों को बढ़ावा देते है तथा इससे बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन होता है। होलसेल, ट्रेडिंग, रिटेलिंग, सेवा आदि व्यवसाय निर्माण इकाइयों पर ही निर्भर करते है। यदि किसी देश में तकीनीकी शिक्षा प्राप्त मानव संसाधन ज्यादा होगा तो अमुक देश में बड़े पैमाने पर निर्माण इकाइयों की स्थापना होगी। इस तरह से विज्ञान-गणित एवं तकनीकी शिक्षा बड़े पैमाने पर रोजगार जुटाती है। आधुनिक तकनिकी उत्पादन बढने से निर्माता की बिक्री बढकर उसे मुनाफा में रुपया प्राप्त होता है। उत्पादकता बढ़ने से निर्यात बढ़ता है, जिससे दूर दराज का पैसा भी देश अपनी और खींचने लगता है , एवं इससे पूरे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। इस तरह नागरीय जीवन समृद्ध हो जाता है।
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अकादमिक शिक्षा व्यवस्था के अंग :
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1. शिक्षण स्थल एवं कक्षा कक्ष
2. परीक्षा
3. अध्यापन विधियाँ
4. अध्यापको का प्रशिक्षण
5. पाठ्यक्रम
6. प्रायोगिक शिक्षा
7. नैतिक शिक्षा
8. भाषा
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1. शिक्षण स्थल एवं कक्षा कक्ष - शिक्षक द्वारा छात्रों को सामूहिक शिक्षा घर पर भी दी जा सकती है, किसी अन्य शिक्षा केंद्र जैसे विद्यालय आदि पर भी दी जा सकती है। छात्र नियमित रूप से पढने विद्यालय भी जा सकते है और उनके आवास की व्यवस्था विद्यालय में भी की जा सकती है। शिक्षा स्थल वातानुकूलित भी हो सकते है और टिन टप्पर के भी। शिक्षण स्थल एक अप्रभावी अंग है। अत: यह शिक्षा की गुणवत्ता को अधिक प्रभावित नहीं करता।

शिक्षण स्थल पर अनुचित कोलाहल न हो, वातावरण शांत तथा अध्ययन के लिए अनुकूल हो, इतना काफी है। काल में परिवर्तन एवं विकास के साथ साथ शिक्षण स्थल में बदलाव आते रहेंगे। शिक्षा स्थलो का ढांचा किसी शिक्षा व्यवस्था के बेहतर या कमतर होने के निर्धारण का प्रभावी अंग नहीं है। अत: शिक्षा केंद्र के आधार के पर यह तय नहीं किया जा सकता कि अमुक तरीके का शिक्षा स्थल गुरुकुल एवं अमुक शिक्षा स्थल मेकाले व्यवस्था का द्योतक है। हालांकि सामूहिक शिक्षण समय एवं संसाधनों की बचत करता है तथा छात्रों के बीच आपसी संवाद उनकी समझ को बढ़ाता है। अत: सामूहिक शिक्षा ज्यादा बेहतर विकल्प है। एकाकी शिक्ष्ण छात्र के समुचित विकास एवं संवाद कुशलताओ को बाधित कर सकता है।
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2. परीक्षा एवं अंक : छात्र पाठ्यक्रम रट कर अच्छे अंक ला सकते है, अत परीक्षाओ का ढांचा इस तरह का होना चाहिए कि रटने वाले छात्रों की अपेक्षा वे छात्र अधिक अंक हासिल कर पाए जिनमे वास्तविक बोध विकसित हुआ है। परीक्षाएं छात्रों को सतर्क रखती है तथा मोटे तौर पर यह अंदाजा दे सकती है कि छात्र कैसा प्रदर्शन कर रहा है किन्तु असल परीक्षा बाजार लेता है। अत: अंततोगत्वा अकादमिक परीक्षाओ में लाये गए अंको का एक सीमा के बाद कोई महत्त्व नहीं है।

मैकाले व्यवस्था तथा आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में परीक्षांए छात्रों के बोध का सही आकलन नहीं कराती। ग्रेड सिस्टम एवं अंक प्रणाली का वर्चस्व होने के कारण छात्र / शिक्षक / अभिभावक अच्छे अंक लाने को ही एक मात्र उद्देश्य समझते है। सरकारी नौकरियों एवं विभिन्न निजी क्षेत्रो में नौकरी पाने की प्रतिस्पर्धा बढ़ने से अब छात्र बढ़त लेने के लिए कोचिंग संस्थानों का रूख करने लगे है। इस तैयारी के कारण छात्रों के पाठ्यक्रम एवं समझ का दायरा काफी विस्तृत हो जाता है। किन्तु उद्देश्य फिर भी वास्तविक कौशल विकसित करना न होकर परीक्षा पास करना ही होता है।
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3. अध्यापन विधियाँ - अध्यापन विधी ऐसी होनी चाहिए जिससे छात्रों को जो शिक्षा दी जा रही है वह पुस्तको में न रह जाए। गुरुकुल व्यवस्था में स्मरण करना अध्यापन का प्रधान अंग था। रोज का पाठ रोज स्मरण करके दोहराया जाता था, जिससे पढ़ाये जाने वाला पाठ याद रहता था। मैकाले व्यवस्था ने शिक्षा को पुस्तकों में पहुंचा दिया। अर्ध वार्षिक एवं वार्षिक परीक्षा होने से छात्र परीक्षा के दिनों में अध्ययन करते है तथा शेष सत्र में पढ़ाई पर ध्यान नहीं देते। उल्लेखनीय है कि कुछ 25 वर्ष पहले तक एक वर्ष में चार परीक्षाएं ली जाती थी -- प्रत्येक दो महीने एक कक्षा टेस्ट होता था, छह महीने में एक अर्द्ध वार्षिक परीक्षा होती थी तथा साल के अंत में वार्षिक परीक्षा होती थी। कक्षा टेस्ट तथा वार्षिक परीक्षा में प्राप्त अंको के 40% अंक वार्षिक परीक्षाओ में जुड़ते थे। किन्तु सत्र के दौरान ली जाने वाली ये परीक्षाएं ज्यादातर स्कूलों में समाप्त कर दी गयी तथा वर्तमान व्यवस्था में साल के अंत में सिर्फ एक परीक्षा होती है तथा इसी परीक्षा के आधार पर परिणाम तय होता है। जो कि एक अकुशल व्यवस्था है।
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4. अध्यापको का प्रशिक्षण एवं चयन - यह तीसरा सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है, जो शिक्षा को प्रभावित करता है। शिक्षक जितने बेहतर होंगे शिक्षण भी उतना ही बेहतर होगा। एक अच्छा शिक्षक वह है जिसका विषय पर पूर्ण अधिकार हो तथा साथ ही उसमे "शिक्षण तत्व" भी हो। समझाने का कौशल एवं रुचि शिक्षण तत्व कहलाता है। कई व्यक्तियों में यह बेहद उच्च स्तर का होता है जबकि कई में निम्न। यदि किसी व्यक्ति के पास विषय की ढेर सारी जानकारी है किन्तु उसमे पढ़ाने या सिखाने का कौशल या रूचि नहीं है तो ऐसा व्यक्ति अच्छे से शिक्षा नहीं दे पायेगा। अत: अकादमिक स्तर पर शिक्षण तत्व विहीन विद्वान् शिक्षक अनुपयोगी है।
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वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक को स्थायी वेतन दिया जाता है, किन्तु अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद उसे बोनस नहीं मिलता। इस वजह से जिन प्रतिभाशाली व्यक्तियों में शिक्षण तत्व होता है वे शिक्षा के पेशे की और आकर्षित नहीं होते और जो इस पेशे में आते वे भी जब देखते है कि ज्यादा मेहनत करने के बावजूद परितोष में कोई अतिरिक्त वृद्धि नहीं होगी तो कुछ ही समय में वे हतोत्साहित हो जाते है।

मैकाले व्यवस्था में भी शिक्षक वैतनिक होते थे तथा शिक्षण तत्व को आकर्षित करने की कोई नीति नहीं थी। गुरुकुल व्यवस्था में शिक्षक वैतनिक भी होते थे, अवैतनिक भी होते थे और स्वैच्छिक भी होते थे। किन्तु गुरुकुल व्यवस्था में भी शिक्षण तत्व को आकर्षित करने और उन्हें अतिरिक्त परितोष देने की व्यवस्था नहीं थी।
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आज कोचिंग सेंटर्स में जो अध्यापक शिक्षण देते है उन्हें प्रदर्शन के आधार पर अधिक भुगतान मिलता है। यही वजह है कि यदि आपको अच्छे शिक्षको की तलाश है तो आपको कोचिंग सेंटर्स की और रूख करना पड़ेगा। लेकिन कोचिंग सेंटर्स में शिक्षा लेने के लिए छात्रों को ऊँचे दाम चुकाने होते है। वंचित तबके के लोग यह भुगतान नहीं कर पाते और अच्छे शिक्षको से शिक्षा पाने से वंचित हो जाते है। उदाहरण के लिए पीएमटी ( डॉक्टर के लिए ली जाने वाली प्रवेश परीक्षा ) एवं आई आई टी में कक्षा 12 तक के पाठ्यक्रम में से प्रश्न पूछे जाते है। किन्तु जिन भी छात्रों को ये परीक्षाएं देनी होती है उनमे से अधिकांश छात्र 12 वी कक्षा पास करके कोचिंग सेंटर्स का रूख करते है, ताकि वे इन परीक्षाओ की अच्छी तैयारी कर सके। इस तरह आज कोचिंग सेंटर बड़ा व्यापार बन चुका है। और इसका एक मात्र कारण यह है कि स्कूलों के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि वे सर्वश्रेष्ठ शिक्षको को आकर्षित कर सके।
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इस तरह से शिक्षक तत्व एवं शिक्षको को प्रेरणा देने वाली प्रणाली शिक्षा व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण अंग है , किन्तु गुरुकुल व्यवस्था, वर्तमान व्यवस्था एवं मेकाले व्यवस्था में इस तरह के कोई प्रावधान नहीं थे जो श्रेष्ठ शिक्षको को आकर्षित कर सके। अत: इस श्रेणी में तीनो ही व्यवस्थाएं दोष पूर्ण है। इसी लेख में आगे वह प्रक्रिया सुझाई गयी है, जिससे हम अकादमिक शिक्षा में शिक्षक तत्व को आकर्षित कर सके।
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5. पाठ्यक्रम : पाठ्यक्रम या सिलेबस शिक्षा व्यवस्था का दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है। यदि किसी देश की शिक्षा व्यवस्था में गणित-विज्ञान प्रधान रूप से पढ़ाई जाती है तो अमुक देश तकनीक के क्षेत्र में तेजी से विकास करेगा और युद्ध एवं बाजार की प्रतिस्पर्धा में टिका रहेगा। तकनीकी कौशल और गणित-विज्ञान किस तरह से देश को अर्थव्यवस्था एवं सैन्य शक्ति को मजबूत बनाते है, इसका विवरण ऊपर "शिक्षा का उद्देश्य" शीर्षक के अंतर्गत दिया गया है।
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6. प्रायोगिक शिक्षा : यह किसी भी शिक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। क्योंकि जबानी शिक्षाएं या ज्ञान यदि व्यवहार में नहीं लाया जाए तो इसके कोई मायने नहीं होते। किन्तु व्यवहार में लाने के लिए इसका प्रयोग बाजार में किया जाना चाहिए न कि प्रयोग शाला में। व्यवहार में लाने के लिए बाजार में कौशल विकास एवं प्रयोग के अवसर होने चाहिए। यदि देश की प्रशासनिक एवं न्याय व्यवस्था अच्छी होगी तो बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होगी और कारीगरों / तकनीशियनों / इंजीनियरों को काम करने के समान अवसर मिलेंगे। उदाहरण के लिए, ज्यूरी सिस्टम किसी देश के औद्योगिकीय एवं तकनीकी विकास को सुरक्षा एवं गति देता है, जबकि जज सिस्टम निर्माण इकाइयों के समान अवसरों को समाप्त कर देता है। तो ज्यूरी सिस्टम होने के कारण ग्रीस के कारीगरों ने निर्माण के क्षेत्र में तेजी से विकास किया और वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ हथियारों का निर्माण कर पाए। इसी तरह से जब ब्रिटेन में ज्यूरी सिस्टम आया तो वहां औद्योगिक क्रांति हुयी। आज अमेरिका तकनीक के क्षेत्र में सबसे आगे है तो इसका कारण मजबूत ज्यूरी सिस्टम है। भारत में जज सिस्टम होने के कारण प्रशासन ने निर्माण इकाइयों एवं तकनीशियनों को प्रोत्साहित नहीं किया और हम आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में पिछड़े रहे तथा आज भी पिछड़े हुए है।
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सार यह है कि, किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू ऐसा प्रशासन है जो निर्माण इकाइयों एवं कारीगरों / तकनीशियनों / इंजीनियरों को सुरक्षा एवं प्रोत्साहन देता है, ताकि किताबो में पढाई गयी शिक्षा को व्यवहार में लाया जा सके। दूसरा महत्त्वपूर्ण अंग विज्ञान-गणित का पाठ्यक्रम है जो कि कारीगरों / तकनीशियनों / इंजीनियरों का आधार तैयार करता है। तथा तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग ऐसे शिक्षको को आकर्षित करने की व्यवस्था है जिनमे शिक्षक तत्व हो।
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7. नैतिक शिक्षा : व्यक्ति नैतिक शिक्षा वास्तविक परिस्थितियों से ग्रहण करता है, पुस्तकों से नहीं। मान लीजिये पाठ्यपुस्तकों में बच्चो को पढ़ाया जाता है कि, सफलता प्राप्त करने के लिए ईमानदारी से परिश्रम करना आवश्यक है , एवं बेईमानी करने या क़ानून का पालन न करने का परिणाम बुरा होता है। किन्तु जब बच्चे अपने आस पास देखते है कि भ्रष्ट आचरण करने वाले एवं क़ानून तोड़ कर किसी भी तरह की तिकड़म से पैसा बनाने वाले आलिशान जीवन जी रहे है जबकि ईमानदारी से मेहनत करने वाले तिकड़मों के अभाव में पिछड़ गए है तो वह यही शिक्षा ग्रहण करेगा कि यदि उसे सफल होना है तो येन केन प्रकारेण तिकड़म लगाना आवश्यक है। और जब बच्चे देखते है कि क़ानून तोड़ने वाले व्यक्ति पुलिस-जज आदि को घूस देकर आसानी से छूट जाते है तो आप उन्हें किसी भी तरह यह नहीं समझा सकते कि क़ानून का पालन न करने पर उसे बुरे परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
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कुल मिलाकर यदि हमें बच्चो को नैतिक शिक्षा देनी है तो पहले हमें अपने देश के पुलिस प्रशासन एवं अदालतों को सुधारना होगा। इन सुधारो के अभाव में पाठ्य पुस्तको में शामिल नैतिक शिक्षा व्यवहारिक जगत से सामना होते ही तिरोहित हो जायेगी। शिक्षा तब असर करती है जब उसके लिए हमारे पास व्यवहारिक नजीर हो। फिलहाल हमारे पास उल्टी नजीर है। अत: पाठयपुस्तको में शामिल नैतिक शिक्षा बच्चो पर कोई असर नहीं डालेगी।
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8. भाषा : भाषा गौण विषय है। जिस देश में जो भाषा प्रचलित हो शिक्षा उस भाषा में दी जा सकती है , या अभिभावक जिस भाषा में बच्चो को शिक्षा देना चाहे वे उस भाषा में शिक्षण करवा सकते है। किन्तु जिस भाषा में शिक्षण दिया जा रहा है , यह आवश्यक है कि अमुक भाषा में उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त पुस्तकें उपलब्ध हो। उदाहरण के लिए यदि आप बच्चो को विज्ञान-गणित एवं कंप्यूटर की शिक्षा देना चाहते है तो संस्कृत भाषा का चुनाव नहीं किया जा सकता। तब आपको मूल पुस्तकों के अनुवाद उपलब्ध कराने होंगे। जो कि अपने आप में एक दुष्कर कार्य है।
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भारत में शिक्षा सुधार के लिए हमने जो शिक्षा प्रणाली प्रस्तावित की है उसकी रूपरेखा नीचे दी गयी है।
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१) सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए प्रक्रिया :
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जिले के सरकारी स्कूल शिक्षा अधिकारी के नियंत्रण में काम करते है। हमने प्रस्ताव किया है कि जिला शिक्षा अधिकारी को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार जिले के स्थानीय अभिभावकों को दिया जाए। राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी क़ानून का सीधा प्रभाव यह होगा कि शिक्षा अधिकारी सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए कार्य करेगा या अपनी नौकरी गवांयेगा। शिक्षा अधिकारी को चुनने एवं निष्कासित करने की प्रक्रिया का विस्तृत ड्राफ्ट इस लिंक पर देखा जा सकता है -- <https://www.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/821128631398666>;
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कैसे राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी कानून शिक्षा में सुधार ले आएगा ?

भारत में लगभग 700 जिला शिक्षा अधिकारी हैं । सभी बुद्धिमान, काबिल तथा कार्यकुशल है। और उनमें से, मान लीजिए, 10-15 ऐसे होंगे जो भ्रष्टाचार में रूचि नहीं रखते। इस राइट टू रिकॉल -जिला शिक्षा अधिकारी प्रक्रिया में एक धारा यह कहती है कि यदि कोई अधिकारी मुख्यमंत्री द्वारा शिक्षा अधिकारी नियुक्त होता है तो वह केवल एक ही जिले का शिक्षा अधिकारी हो सकता है। लेकिन यदि नागरिकों ने उसे शिक्षा अधिकारी बनाया है तो वह राज्य में 5 जिलों और पूरे भारत में 10 जिलों का भी जिला शिक्षा अधिकारी बन सकता है और वह इन सभी जिलों का वेतन प्राप्त करेगा। अर्थात यदि कोई व्यक्ति 4 जिलों का जिला शिक्षा अधिकारी है और उसे नागरिकों ने नियुक्त किया है तो उसका वेतन 4 गुना होगा। यह ज्यादा सस्ता है क्योंकि वेतन ही चार गुना बढ़ेगा, चिकित्सा लाभ और कई आजीवन मिलने वाले लाभ 4 गुना नहीं बढ़ेंगे।
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इसलिए वर्तमान 700 जिला शिक्षा अधिकारियों में से, मान लीजिए, 5-15 भ्रष्ट नहीं है । यदि एक बार रॉइट टू रिकॉल लागू हो जाता है तो उन्हें सीधी तरक्की और पदोन्नति का अवसर मिल जायेगा। वे अपने जिले के स्कूलों में अच्छे बदलाव लेकर आएँगे , एवं बीच के अधिकारियों को घूस लेने से रोकेंगे । इस बात का ध्यान रखेंगे कि ठेकेदार सही वस्तुएँ जैसे ब्लैकबोर्ड , कुर्सियां आदि स्कूलों को देते हैं। वे ध्यान रखेंगे कि शिक्षक स्कूल में हाजिर रहें, आदि। अब मान लीजिए, इन सभी मामलों में मुख्यमंत्री इन अधिकारियों का तबादला कर देते है । तब लगभग 7-15 ऐसे मामलों में से, कम से कम 2-3 मामलों में तो माता-पिता अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए जिला शिक्षा अधिकारी कानून का उपयोग करके उस तबादला किए गए अधिकारी को वापस ले आएंगे।
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इस तरह, भारत के 700 जिलों में से 2-5 जिलों में शिक्षा सुधार आएगा। तो शेष जिलों का क्या होगा ? मान लीजिए आप 'A' जिले में रहते है, तथा 'A' जिले का जिला शिक्षा अधिकारी भ्रष्ट और नाकाबिल है। मान लीजिए, पास में ही पांच अन्य जिले B, C, D, D और E है। मान लीजिए, केवल E जिले में ही अच्छा जिला शिक्षा अधिकारी है। तो जिला A के नागरिकों के पास विकल्प होगा कि वे अपने जिले के जिला शिक्षा अधिकारी को हटा सकते है और E जिले के जिला शिक्षा अधिकारी को डबल पोस्ट/दोहरा कार्यभार दे सकते है । इसी विकल्प और अधिकार के कारण कि “अब नागरिक राईट टू रिकॉल - जिला शिक्षा अधिकारी का उपयोग करके मुझे हटा सकते हैं और मेरे पद पर E जिले के जिला शिक्षा अधिकारी को ला सकते हैं”, अन्य जिलो के जिला शिक्षा अधिकारीयों के मन में भय पैदा होगा। इसलिए या तो वे 2-3 महीनों में ही सुधर जाएंगे या तो नागरिक उन्हें राइट टू रिकॉल-जिला शिक्षा अधिकारी का प्रयोग करके हटा देंगे। इस तरह इस कानून के गैजेट में प्रकाशित होने के 8-10 महीनों में ही सभी 700 जिला शिक्षा अधिकारी या तो सुधर जाएंगे या बदल दिए जाएंगे।
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10-20 महीनों के अंदर ही ,“जल्दी अमीर बनने” और “भाड़ में जाए जनता” की मानसिकता वाले अधिकारी प्रशासन से हटना शुरू होंगे और दुबारा इन प्रशासनिक पदों पर नहीं आ पाएंगे। इससे वास्तव में सेवा करने की इच्छा वाले लोगों को आने का ज्यादा मौका मिलेगा और भ्रष्टाचारी लोग ईमानदार लोगो के काम में कम बाधा डाल सकेंगे | वर्तमान सरकारी सिस्टम में एक कमी यह है कि यदि कोई ईमानदार व्यक्ति दो लोगों का काम करता है तो भी उसे दो व्यक्ति के बराबर वेतन नहीं मिलता, जबकि व्यापार में ऐसा होना आम बात है । ये बातें ईमानदार लोगों को सरकारी नौकरी में आने से हतोत्साहित करती हैं। पर इस प्रस्तावित राइट टू रिकॉल प्रक्रिया में, अधिकारीयों को एक से अधिक पद मिल सकता है तथा उसके अनुसार वे अधिक वेतन पा सकते है। इससे शासन में ईमानदार और समर्पित व्यक्तियों को आने का ज्यादा मौका मिलेगा।
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राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का क़ानून आने से शिक्षा अधिकारी अपने जिलो में बेहतर पाठ्यक्रम शामिल करेंगे , योग्य शिक्षको की नियुक्ति करेंगे , शिक्षको के काम का निरंतर मूल्यांकन करेंगे एवं निष्पक्ष ढंग से परीक्षाओं का संचालन सुनिश्चित करेंगे। यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो जिले के अभिभावक बहुमत का प्रदर्शन करके उन्हें नौकरी से निकाल सकेंगे। यदि किसी जिले के अभिभावक किसी विषय को पाठ्यक्रम में शामिल करवाना चाहते है या हटाना चाहते है तो वे बहुमत का प्रदर्शन करके शिक्षा अधिकारी को ऐसा करने के लिए निर्देश दे सकते है। प्रस्तावित राईट टू रिकॉल क़ानून में शिक्षा अधिकारी को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार सिर्फ अभिभावकों को होगा, आम मतदाताओ को नहीं। अत: इस हेतु जिला स्तर पर अभिभावकों की अलग से मतदाता सूचियाँ तैयार की जायेगी।
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२) गणित-विज्ञान का स्तर सुधारने के लिए "सात्य प्रणाली" की रूपरेखा
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गणित-विज्ञान एक जटिल विषय है, तथा यह बेहद महत्त्वपूर्ण भी है। इसके स्तर में विशेष रूप से सुधार लाने के लिए हमने सात्य प्रणाली प्रस्तावित की है। सात्य प्रणाली राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी का क़ानून आने के बाद ही लागू की जा सकेगी। इसकी प्रकिया निम्न तरीके से होगी :
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a) कोई भी व्यक्ति शिक्षा अधिकारी कार्यालय में जाकर 200 रू जमा करके खुद को शिक्षक के रूप में पंजीकृत करवा सकेगा। शिक्षा अधिकारी उसका आवेदन स्वीकार करके एक रजिस्ट्रेशन नंबर जारी करेगा।
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b) कोई भी छात्र शिक्षा अधिकारी कार्यालय में जाकर खुद को एक छात्र के रूप में पंजीकृत करवा सकेगा।
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c) शिक्षक छात्रों को आकर्षित करेगा एवं उन्हें स्वतन्त्र रूप से पढ़ायेगा।
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d) पढ़ाने की जगह , ब्लेक बोर्ड, फर्नीचर आदि की व्यवस्था शिक्षक को स्वयं करनी होगी।
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e) यदि छात्र को पाठ समझ नहीं आ रहा है तो छात्र अपना शिक्षक किसी भी समय बदल सकता है।
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f) शिक्षा अधिकारी शिक्षको को कोई भी वेतन नहीं देगा। यदि अभिभावक चाहे तो शिक्षक को कुछ शुल्क दे सकते है।
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g) शिक्षा अधिकारी मासिक , त्रेमासिक , अर्ध वार्षिक एवं वार्षिक परीक्षाएं आयोजित करवाएगा। सभी प्रश्न बहु वैकल्पिक प्रकार के होंगे।
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h) शिक्षा अधिकारी प्रश्नमाला पहले से प्रकाशित करेगा। प्रश्नमाला में 10,000 से 25,000 तक प्रश्न हो सकते है।
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i) शिक्षा अधिकारी जिले के परीक्षा परिणाम के आधार पर ग्रेडिंग करेगा तथा प्रदर्शन के आधार पर शिक्षको को पुरूस्कार देगा। जितना पुरूस्कार शिक्षक को मिलेगा, उतना ही पुरूस्कार उन छात्रों को भी दिया जाएगा जिन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया है।

स्पष्टीकरण -- मान लीजिये कोई शिक्षक 30 छात्रों को पढाता है। इनमे से 3 छात्र "अ ,ब एवं स' वरीयता सूची में स्थान पाते है , एवं 1 छात्र 'द' जिले में 100 वीं रेंक हासिल करता है। यदि वरीयता सूची के लिए शिक्षा अधिकारी 10,000 रूपये एवं 100 वी रेंक के लिए 2000 रूपये पारितोषिक तय करता है तो शिक्षक 10,000*3 = 30,000 + 2000 =32,000 रूपये प्राप्त करेगा। साथ ही शिक्षा अधिकारी इन छात्रों को भी क्रमश: 10,000 एवं 2,000 रूपये का पुरूस्कार देंगे।
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j) गणित-विज्ञान के अतिरिक्त इतिहास, सामाजिक विज्ञान , भूगोल आदि विषयों से ग्रेड का निर्धारण नहीं होगा, एवं इन विषयों में छात्र को सिर्फ पास होना होगा।
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तो हमारे द्वारा प्रस्तावित व्यवस्था शिक्षा प्रणाली के मूलभूत बिन्दुओ को इस तरह प्रभावित करती है --
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1. शिक्षण स्थल एवं कक्षा कक्ष -- इस पर हमने कम भार दिया है। मौजूदा व्यवस्था की तरह ही शिक्षण स्थलों एवं कक्षा कक्ष में शिक्षण दिया जाएगा।
2. परीक्षा -- गणित-विज्ञान की परीक्षाएं मासिक , त्रेमासिक , अर्ध वार्षिक एवं वार्षिक होगी। परीक्षाएं खुली एवं कम्प्युटरीकृत होगी।
3. अध्यापन विधियाँ - सात्य प्रणाली के तहत। इस पर हमने विशेष रूप से भार दिया है।
4. अध्यापको का प्रशिक्षण - स्वतंत्र एवं प्रतिस्पर्धी। शिक्षको को अच्छा प्रदर्शन करने पर आर्थिक पारितोषिक एवं सम्मान।
5. पाठ्यक्रम - विशेष रूप से गणित-विज्ञान को शामिल किया जाएगा। अभिभावकों की सहमती से शिक्षा अधिकारी तय करेगा।
6. प्रायोगिक शिक्षा - गणित-विज्ञान के लिए शिक्षा अधिकारी प्रयोगशालाएं स्थापित करेगा।
7. नैतिक शिक्षा - न्यूनतम भार
8. भाषा -- पाठ्यक्रम द्विभाषी होगा। अभिभावक यह तय करेंगे कि किस भाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए।
9 . प्रशासन - जिला शिक्षा अधिकारी को चुनने एवं बदलने का अधिकार अभिभावकों के पास होगा।
10. लागत -- सरकारी स्कूलों को बेहतर करने पर विशेष भार दिया गया है।
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इस व्यवस्था के आने से अंतिम परिणाम यह होगा कि सरकारी स्कूलो की दशा बेहतर हो जाएगी एवं उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा छात्रों को मुफ्त मिलेगी। साथ ही छात्रों एवं शिक्षको को अच्छा प्रदर्शन करने पर पारितोषिक भी मिलेगा। यह शिक्षा प्रणाली भारत में गणित-विज्ञान के स्तर को इतना बेहतर बना देगी कि हमें निर्माण इकाइयों के लिए पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध हो जाएगा। अगला चरण वेल्थ टेक्स एवं जूरी सिस्टम लाना होगा। यदि तब हम भारत में जूरी सिस्टम एवं वेल्थ टेक्स लाने में सफल हो जाते है , तो कुछ ही वर्षो में हम प्रोद्योगिकीय विकास में आत्मनिर्भर होकर "मेड इन इण्डिया , मेड बाय इन्डियन" हथियारों का उत्पादन करने में सक्षम हो जायेंगे।
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यदि आप राईट टू रिकॉल शिक्षा अधिकारी एवं सात्य प्रणाली का समर्थन करते है तो कृपया पीएम के ट्विटर हेंडल पर यह ट्विट करें --

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@pmoindia , I insturct you to print law mentioned in <https://newindia.in/causes/rtr-deo/>; , sha1 - 11a286e10a7341dbfc3b4fb4c0d8843fb3af286f , #RtrDeo
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