> Facebook Archive | Pawan Jury BhilwaraRj | 2018-04-29

Pawan Jury BhilwaraRj

लाल किले के संचालन का निजीकरण -- "विक्रीते करिणि किमंकुशे विवाद" !! अर्थात जब हाथी ही बेच दिया तो अंकुश का क्या झगड़ा ?
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भारत में लाखों लोग रोज रेलवे प्लेटफोर्म का इस्तेमाल करते है, और एक आवश्यक सेवा होने के कारण रेलवे का इस्तेमाल करना जरुरी है। इससे बचा नहीं जा सकता। मोदी साहेब ने रेलवे के साथ रेलवे प्लेटफोर्म भी निजी कम्पनियों के हवाले कर दिए। अब निजी कम्पनियां इन प्लेत्फोर्म्स का उपयोग मुनाफा कमाने में करेगी। और यह मुनाफा सेवाओं के रूप में आम नागरिक यात्रियों से वसूला जाएगा।
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निजी कम्पनियां इस आवश्यक सेवा एवं राष्ट्रिय संपत्ति का दोहन कर सकेगी। इसी तरह से सरकारी स्कूल एवं सरकारी अस्पताल जैसी आवश्यक संस्थाओ को लगातार बदतर किया गया एवं इनके निजीकरण को बढ़ावा दिया गया। एयरपोर्ट से लेकर , खदाने , बैंक से लेकर ऊर्जा, तक सभी राष्ट्रीय संपत्तियां निजी कंपनियों को बेची जा रही है। तो बिकवाली के इस भम्भड़ में लाल किला तो बहुत ही अदना मुद्दा है। अच्छी बात यह हुयी कि सरकार ने डालमियाँ समूह को वहां पर प्लाट काट कर बेचने की अनुमति नहीं दी। मेहरबानी !!
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लाल किला एक अद्वितीय एवं अपने आप में अनूठी ईमारत है। इसका अपना ऐतिहासिक महत्त्व है। देश की राजधानी के दिल में बसी हुयी इस ईमारत के मेंटेनेंस का ठेका भी निजी हाथों में सौंप देना यह दिखाता है कि सरकार प्रबंधन में निकम्मी है , और उनका आत्म गौरव जमीन चाट रहा है। अन्य क्षेत्रो में निजीकरण इसीलिए किया गया क्योंकि संघ के नेता निकम्मे होने के साथ साथ भ्रष्ट भी है। अत: उन्होंने निजीकरण के एवज में घूस खाकर पैसे बनाये।
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लेकिन लाल किले जैसे राष्ट्रिय प्रतिक को निजी हाथों में सौंप देना सरकार के निकम्मेपन को दर्शाता है। इस फैसले में यह स्वीकारोक्ति है कि -- हम सिर्फ बेच सकते है , इन्हें ठीक नहीं कर सकते। लाल किला सिर्फ एक इमारत है। सिर्फ एक इमारत। ऐसी इमारत का प्रबधन करने के लिए किसी विशेष तकनीक या योग्यता की जरुरत नहीं होती। लेकिन सरकार की हैसियत एक इमारत का प्रबंधन करने की भी नहीं रही है। और नीयत तो खैर है ही नहीं।
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जनमत संग्रह प्रक्रियाएं एवं राईट टू रिकॉल पीएम क़ानून न होने का यह नतीजा है। इन प्रक्रियाओ के अभाव में अब सत्ताधारी लोग यह दर्शाने में सफल हो जाते है कि हमें जनता ने लाल किला बेचने के लिए ही वोट दिया था। देखो हमारे पास बहुमत है !! हमें अगले 5 साल तक सब कुछ करने की छूट है। और यह सब कुछ हम इस नाम पर करेंगे कि जनता हमारे साथ है।
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राईट टू रिकॉल पीएम का क़ानून एवं जनमत संग्रह की प्रक्रिया इस तरह की मनमानी पर रोक लगाती है। यदि भारत में राईट टू रिकॉल पीएम क़ानून या टीसीपी होता तो जनता मोदी साहेब को अपना अनुमोदन देकर या बता सकती थी कि -- हमने तुम्हे लाल किले का सञ्चालन निजी हाथो में देने के लिए वोट नहीं किया था। तुम्हे जिस काम के लिए वोट किया है वह काम करो।"
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लेकिन इन प्रक्रियाओ के अभाव में संघ के स्वयंसेवक अब नागरिको को यह कह रहे है कि -- हमारे सभी फैसलों में जनता की सहमती है।
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हम लगातार यह बात कह रहे है कि -- राईट टू रिकॉल कानूनों के बिना ये लोग किसी भी तरह से सुधरने वाले नहीं है। अत: यदि आप चाहते है कि आपके द्वारा चुना हुआ नेता आपके ही समर्थन का हवाला देकर देश को मटियामेट न कर दें , तो राईट टू रिकॉल पीएम एवं टीसीपी क़ानून की मागं करें। इन कानूनों के आने से आप देश के प्रधानमन्त्री के सामने अधिकृत रूप से यह दर्ज कर सकेंगे कि किस फैसले में आप पीएम के साथ है और किस में नहीं।
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और फिर भी यदि पीएम जनमत की अवहेलना करता है तो बहुमत का प्रदर्शन करके आप उन्हें नौकरी से निकालने की प्रक्रिया शुरू कर सकते है। जैसे ही आप पीएम को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया शुरू करेंगे वैसे ही पीएम सुधर कर सूत की तरह सीधा हो जाएगा। नौकरी से निकालने की नौबत नहीं आएगी।
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इन कानूनों के प्रस्तावित ड्राफ्ट देखने के लिए मेरी फेसबुक कवर पिक्चर पर क्लिक करके डिस्क्रिप्शन देखें।
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"वेल्थ टेक्स पार्टी"
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