Pawan Jury BhilwaraRj

चिंटू - मास्टर जी, ये स्टेशन चलाने में भी बुलेट ट्रेन वाली टेक्नोलोजी चाहिए क्या ? जो बेच डाले !!

मास्टर जी - अरे नही ! स्टेशनों की हालत ख़राब है । सरकारी कर्मचारी काम तो करते नही । तो प्राइवेट लोगों को दे दिए है । वो इन्हें चमका देंगे ।
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चिंटू - और फिर स्टेशन में 5 रुपए के फ़ूल्ये के 50 रुपए माँगेंगे उसका क्या ?

मास्टर जी - सेना के जवान सीमा पे रोज़ पाकिस्तानियों की गोलियाँ खा रहे है, किसान ख़ुद को लटका दे रहे है , और तुम देश हित में इतना सा भी नही सह सकते । मल्टीप्लेक्स में भी तो दे ही रहे हो 5 के 50 !
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चिंटू - मास्टर जी, क़ायदे की बात करो । सरकारी स्कूलों और अस्पतालों का निजीकरण होने से जो भुगत रहे है वह नज़र नही आ रहा क्या ? लूट के अड्डे बन चुके है । और अब रेलों के बाद स्टेशन भी । 2 करोड़ लोग रोज़ सफ़र करते है ट्रेनों में । ग़रीब आदमी की मौत है । ज्यूरी सिस्टम और राईट टू रिकॉल रेल मंत्री का क़ानून डाल देते तो 6 महीने में ही रेल मंत्री इन्ही स्टेशनों को इसी स्टाफ़ और इसी ख़र्चे में एयरपोर्ट जैसा बना देता ।
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मास्टर जी - वो तो ठीक है । पर बात हो चुकी है । मोदी साहेब ने साफ़ बोल दिया है कि ज्यूरी सिस्टम-राईट टू रिकॉल का तो नाम भी मत लो । तो फिर ऐसी हालत में तो बेचने ही पड़ेंगे न । और वैसे भी राष्ट्रवादी लोग भी इनको बेचने का समर्थन ही कर रहे है !!

चिंटू - अयँ !! ये कौनसी क़िस्म के राष्ट्रवादी हुए ?
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मास्टर जी - राष्ट्रवादी की कोई दो चार क़िस्में थोड़े ही है । अपने संघी । वे मोदी साहेब के समर्थन में है । उनके कार्यकर्ता नए पेंट शर्ट पहन के बेल्ट लगा कर दोनो हाथ ऊपर उठाकर बोल रहे है कि -- आप बेचो । हम साथ है । अब तुम बित्ते से आदमी क्या राष्ट्रवादियों से ज़्यादा अक़्लमंद हो !

चिंटू - काहे के राष्ट्रवादी ? इनको भी इस पंगत में जीमने को मिल रहा है । तो समर्थन कर रहे है । मुफ़्त में नही । राष्ट्रवाद इनके ठेंगे पर है ।
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मास्टर जी - संघ के कार्यकर्ताओं को इसमें क्या मिल रहा है ।

चिंटू - अरे जो भी कम्पनी ठेके लेती है तो आगे कई छोटी कम्पनियों को ठेके ( sub contract ) दे देती है । तो संघ के मझौले नेता ये ठेके ले लेते है । और अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं को काम दिला देते है । इस तरह से जब ये तरबूज़ कटता है तो फाँके सब आपस में बाँटते है । इनके राष्ट्रवाद की जड़ यही है ।
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मास्टर जी - तो भी सबको इससे पैसा और काम नही मिलता है न ? तो संघ के शेष सभी छोटे कार्यकर्ता क्यों इन फ़ैसलों का समर्थन करते है ?

चिंटू - अरे जब स्थानीय स्तर पर इनके भाईसाहब लोग इस बेचान का समर्थन कर रहे है तो नाने नाने कार्यकर्ता क्या खाकर इनका विरोध करेंगे ? उन्हें भी आगे बढ़ना है । तो उन्हें अपने भाई साहेब लोगों का वरदहस्त चाहिए । ऐसे करके सब अपने अपने निजी हितो के लिए एक दूसरे से चिपके हुये है । देश हित से इनको कोई सरोकार नही । स्टेशन तो दूर की बात है, ये लोग तो शिक्षा, चिकित्सा, रेल, बीमा, रक्षा, दूर संचार, निर्माण से लेकर मीडिया तक सभी क्षेत्र विदेशियों को बेचने का समर्थन कर रहे है । कृषि में भी इनको विदेशी निवेश चाहिए । और जब इनसे पूछा जाता है कि ये विदेशी कंपनिया जो मुनाफ़ा कमाएगी उसके बदले में हम डॉलर कहाँ से देंगे, तो ये लोग भारत माता की जय, गाय हमारी माता है, मंदिर वहीं बनाएँगे जैसे औल फौल जुमले सुनाने लगते है ।
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मास्टर जी - मतलब ! भारत माता की जय नही है क्या ?

चिंटू - हाँ भई जय है । तो ! एक विदेशी कम्पनी ने भारत में कारोबार करके 700 करोड़ रुपए कमाएँ । अब वो हमें ये रुपए पकड़ा कर कहेगी कि इसके बदले में 10 करोड़ डॉलर दो । तो हम उन्हें डॉलर देने कि जगह कहेंगे कि भारत माता की जय है, इसलिए डॉलर टोलर कुछ नही मिलेगा !! यूँ ?
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मास्टर जी - हाँ तो अब चाह क्या रहा तू ?

चिंटू - क़ानून बनाओ कि जो भी विदेशी कम्पनी भारत में धंधा करेगी उसे मुनाफ़े के रुपयों के एवज़ में डॉलर नही मिलेंगे । जितना वे एक्सपोर्ट करेंगे उतना ही डॉलर मिलेगा । और रेल, रक्षा, दूर संचार, कृषि, बैंकिंग जैसे क्षेत्रों में एफडीआइ रद्द हो । इससे भारत माता की जय होगी । नारे से नही होगी ।
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सम्पूर्ण रूप से भारतीय नागरिको के स्वामित्व वाली कम्पनियों (WOIC) के लिए कानूनी ड्राफ्ट :
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