Pawan Jury BhilwaraRj

"सस्टेंड फायर असाल्ट" ( मतलब सर्जिकल स्ट्राइक - 2)
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1) इन्डियन आर्मी ने बयान जारी किया है कि, "भारत ने मोर्टार, हल्की व भारी मशीन गन, रोकेट्स आदि के माध्यम से सीमा पार स्थित पाकिस्तानी बेस केम्पस पर 'सस्टेंड फायर असाल्ट' कार्यवाही की, जिसमे 4 कैम्पस नष्ट हुए और कई पाकिस्तानी सैनिक हताहत हुए। लेकिन हताहतो की संख्या के बारे हम कोई अनुमान व्यक्त नहीं कर सकते"
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पेड टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर का लिंक : https://goo.gl/EwCiYS
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2) "पेड लाइव इण्डिया और पेड एनडीटीवी" को पेमेंट की गयी कि वे सेना के बयान का यह अर्थ निकाले कि, 'हमने 20 पाकिस्तानी सैनिको को मार कर एक के बदले 20 सिर लाने का बदला ले लिया है'। पेमेंट हो जाने पर लाइव इण्डिया व एनडीटीवी ने 20 सैनिक अपने मन से जोड़ दिए, और कह दिया कि हमें "सूत्रों के हवाले से 20 सैनिको के मारे जाने की खबर मिली है"।

पेड लाइव इंडिया : https://goo.gl/QbrdHN , पेड एनडीटीवी : https://goo.gl/m4wTtg
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3) "पेड ट्रिब्यून दैनिक" को पेमेंट की गयी कि वे इस बयान में सैनिको की संख्या 'अपनी तरफ से' जोड़ दे, तथा नष्ट की गयी पोस्ट्स की संख्या भी बढ़ा दे !! ट्रिब्यून ने इसमें 3 पोस्ट और जोड़ दी और मारे गए सैनिको की संख्या 23 बता दी !!! इस तरह पेड ट्रिब्यून दैनिक ने 3 पोस्ट्स और 23 सैनिको की सर्जिकल स्ट्राइक खुद ही कर दी !!
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अब चूंकि, ट्रिब्यून को सेना के बयान में खुद की संख्या भी जोड़नी थी इसीलिए उसने सेना के मूल बयान को संशोधित करके उसमे से संख्या "4" को ही निकाल दिया।

पेड ट्रिब्यून दैनिक : https://goo.gl/csfqhF
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4) "पेड लोक समाचार" नामक घटिया न्यूज पोर्टल बेहद कम पेमेंट में ही चौकियों की संख्या 23 और मारे गए सैनिको की संख्या 32 तक बढ़ाने पर राजी हो गया !!

पेड लोक समाचार : https://goo.gl/VQsHSj
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प्रश्न १ : टाइम्स ऑफ़ इण्डिया, इन्डियन एक्सप्रेस, इण्डिया टुडे, द हिन्दू, जी न्यूज आदि बड़े समूहों ने मारे गए पाकिस्तानी सैनिको की संख्या में इस बार हेराफेरी नहीं की है। क्यों ?

प्रश्न २ : सेना ने इस बार प्रेस कोंफ्रेसं न करके सिर्फ प्रेस रिलीज़ जारी क्यों की ?
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सर्जिकल स्ट्राइक - 1
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ठीक एक महीने पहले 29 सितम्बर को सेना ने प्रेस कोंफ्रेंस कर बयान जारी किया था कि, "भारत ने कल रात सीमा से सटे आतंकी केम्पस पर सर्जिकल स्ट्राइक की, जिसमे कई आतंकी एवं उन्हें सहयोग देने वाले हताहत हुए"
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तब भी आर्मी ने यह नहीं बताया था कि, भारत ने सीमा पार की है, या कितने सैनिक मिशन में शामिल थे, या भारतीय सैनिको ने कितने आतंकियों को मार गिराया था। तब सेना ने सिर्फ यह कहा था कि, "भारत ने सीमा से सटे आतंकी केम्पस पर सर्जिकल स्ट्राइक कि व इस कार्यवाही में कई आतंकी हताहत हुए। बस इतना ही आर्मी ने तब कहा था, व इतना ही अब कहा है।
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इस प्रेस कोंफ्रेंस के बाद भारतीय मिडिया के सभी समूहों को मारे गए आतंकियों की संख्या, हेलिकोप्टर, ड्रोन, आदि को "जोड़" देने की लिए पेमेंट की गयी, तथा मिडिया ने इस कहानी को इस तरह से चलाया जैसे यह वर्जन भारतीय सेना का हो। मोदी सरकार इस पूरे प्रकरण पर खामोश बनी रही। उन्होंने मिडिया के अफसानो का ण तो खंडन किया न ही पुष्टि की। सरकार ने इन अफवाहों को फैलने दिया, क्योंकि यह प्रसारण सरकार के वोट बढ़ा रहा था।
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तब पेड बीबीसी ने यह खबर प्रकाशित की थी कि, "भारतीय सेना ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि, क्या सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान सीमा पार की गयी या नहीं। और मारे गए आतंकियों की संख्या के बारे में भी सेना ने कोई अनुमान व्यक्त नहीं किया है"। यहाँ ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि, बीबीसी एक ईमानदार न्यूज नेटवर्क है। लेकिन तब पेड बीबीसी सिर्फ सेना के वर्जन को ही हूबहू सामने रख रहा था, मतलब अपनी तरफ से उसमे कुछ मिला नहीं रहा था। क्या बीबीसी क पेमेंट नहीं की गयी थी ? या बीबीसी को पेमेंट की गयी थी कि, वह सेना के अधिकृत वर्जन के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करे ?
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प्रश्न १ : तो इस दफा बड़े मिडिया समूहों ने मारे गए पाकिस्तानी सैनिको की संख्या में हेराफेरी क्यों नहीं की है ? और न ही इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया है ?
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मेरे अनुमान में, पिछली दफा सेना द्वारा उच्चारित शब्द 'सर्जिकल स्ट्राइक' को आधार बनाकर मिडिया ने जो तमाशा गढ़ा था उसकी पुनुरावृत्ति करने से पहली सर्जिकल स्ट्राइक के प्रसारण में किया गया घालमेल और भी ज्यादा उभड़कर आ सकता था। इसीलिए बड़े समाचार समूहों से इसे उछालने से परहेज किया। किन्तु छोटे न्यूज समूहों को इस बात की पेमेंट की गयी कि, वे इस आशय की खबरे प्रकाशित करे कि, बदला ले लिया गया है, जबकि बड़े समाचार समूहों को इसके खंडन न करने के एवज में भुगतान किया गया।
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प्रश्न २ : सेना ने इस बार प्रेस कोंफ्रेसं न करके सिर्फ प्रेस रिलीज़ जारी क्यों की ?
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कई जवाब हो सकते है। एक पहलू यह भी हो सकता है कि, सेना फिर से मिडिया को सेना के नाम पर तमाशा खड़ा करने का राशन नहीं देना चाहती थी, अत: उन्होंने स्क्रीन पर आने से परहेज किया हो। एक कारण यह भी हो सकता है कि, इस बार सेना को प्रेस कोंफ्रेंस न करने के निर्देश मिले हो। या पिछली बार सेना को विशेष रूप से ऐसे निर्देश मिले हो। मुझे पक्के तौर पर नहीं पता।
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लेकिन सेना के दोनों बयानो में काफी साम्य है। और इस हिसाब से मिडिया को उसी तरह से खबर को कवरेज देना चाहिए था जैसा कि पहले दिया था। लेकिन शायद दिवाली पर दर्शको की व्यस्तता को देखते हुए और आतिशबाजी से होने वाले प्रदुषण को प्रसारण देने की पेमेंट एडवांस में ले लेने के कारण बड़े मिडिया समूहों ने इस बार स्टोरी नहीं बनायी। हालांकि मौजूदा घटना गल्प बनाने के लिए पेड मिडिया को ज्यादा उपजाऊ जमीन मुहैया कराता है। सेना ने इस बार रोकेट्स, हल्की/भारी मशीन गन व मोर्टार द्वारा हमला करने का स्पष्ट उल्लेख किया है। अत: पेड मिडिया अपने कार्टूनिस्टो की सेवाएं लेकर हमले का काफी प्रभावोत्पादक अधिकृत स्केच बना सकता था। ज्ञातव्य है कि, पिछली दफा मिडिया को हेलिकोप्टर वगेरह खुद ही जोड़ने पड़े थे, लेकिन 4 दिन बाद जब मेजर राज्यवर्धन ने हेलिकोप्टर के प्रयोग से इंकार कर दिया तो मिडिया को अपनी स्टोरी से हेलिकोप्टर को हटाना पड़ा था। हालांकि, मेजर के बयान के 24 घंटे के भीतर ही मोदी साहेब ने यह कड़ा निर्देश जारी कर दिया था कि, "सर्जिकल स्ट्राइक पर कोई अनाधिकृत मंत्री बयान नहीं देगा"।
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उल्लेखनीय है कि, सजिकल स्ट्राइक - 1 से 7 दिन पहले यानि कि उडी हमले के 2 दिन बाद ही कई न्यूज पोर्टल को एक "सर्जिकल स्ट्राइक" कर देने की पेमेंट की जा चुकी थी। अत: भास्कर समेत कई मझौले स्तर के समाचार पत्रों और न्यूज पोर्टल्स ने 22 सितम्बर को एक सर्जिकल स्ट्राइक करके पाकिस्तान की सीमा में 30 से 80 आतंकियों को मार गिराया था। लेकिन सेना ने इस मीडियाई सर्जिकल स्ट्राइक का 26 सितम्बर को खंडन कर दिया था।
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दिए गए दोनों प्रकरणों में, मैं सेना के वर्जन को सही मानता हूँ। लेकिन समस्या यह है कि सेना के वर्जन में पेड मिडिया पेमेंट लेकर तथ्य जोड़े दे रहा है, और पूरे देश में फैला रहा है। और मिडिया सिर्फ इसी विषय पर ऐसा नहीं करता। सुबह से शाम तक दिखाई जाने वाली सभी राजनैतिक खबरों का प्रसारण पेमेंट लेकर ही करता है। उक्त प्रकरण में मिडिया को यह सब तथ्य जोड़ने के लिए पेमेंट कौन कर रहा है यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्वपूर्ण यह है कि, हम कौनसे कानूनों की सहायता से मिडिया को पेमेंट लेकर इतने बड़े पैमाने पर खबरों को प्रदूषित करने से रोक सकते है ?
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समाधान ?
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राईट टू रिकॉल दूरदर्शन अध्यक्ष कानून और डीडी के स्टाफ पर ज्यूरी प्रक्रियाओं को लागू करके भारत में पेड मिडिया की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। इस सम्बन्ध में प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट देखने के लिए कृपया मेरी कवर पिक्चर पर क्लिक करके डिस्क्रिप्शन में दर्ज लिंक "महत्त्वपूर्ण आदेशो की सूची जो मैंने अपने सांसद को भेजे है" को पढ़े।
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